राईटर —वेणीशंकर पटेल ‘ब्रज’
मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास पनागर थाना क्षेत्र में एक छोटा सा गांव है मछला. जिस की आबादी बमुश्किल एकडेढ़ हजार होगी. इसी गांव में 40 साल का नरेश मिश्रा अपनी पत्नी ऊषा और 13 साल के बेटे के साथ रहता है.
10 जनवरी, 2021 की शाम करीब सवा 7 बजे नरेश अपनी बोलेरो ले कर घर पहुंचा. घर के सामने खाली जगह में गाड़ी खड़ी कर वह घर के अंदर जाने के बजाय बाहर जाने को हुआ तो पत्नी ऊषा ने टोक दिया, ‘‘कहां जा रहे हो, पहले हाथमुंह धो कर खाना खा लो, फिर बाहर जाना.’’
‘‘मुझे अभी भूख नहीं है, मैं थोड़ी देर में आता हूं.’’ नरेश इतना कह कर घर से बाहर निकल गया.
ऊषा नरेश की रोजाना की आदत को जानती थी, उसे पता था कि नरेश गांव के नशेड़ी युवकों के साथ बैठ कर शराब पिएगा और आधी रात को लड़खड़ाते हुए घर वापस आएगा. लिहाजा वह नरेश की बात को अनसुना कर अपने कामों में लग गई.
10 जनवरी की शाम घर से निकला नरेश उस रात घर वापस नहीं आया तो दूसरे दिन अलसुबह ऊषा ने इस की जानकारी अपने पड़ोसियों को दी. पड़ोसी भी नरेश की हरकतों से वाकिफ थे. उन्होंने ऊषा से कहा, ‘‘रात में ज्यादा टिका ली होगी तो कहीं सो गया होगा. जब होश आएगा तो खुदबखुद आ जाएगा.’’
जब दोपहर होने तक भी नरेश घर नहीं लौटा और न ही उस का कोई पता चला तो 11 जनवरी की शाम को ऊषा ने पनागर पुलिस थाने में जा कर उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई.
ऊषा ने पुलिस को बताया कि उस का पति नरेश मिश्रा खेतीकिसानी के साथ खुद की बोलेरो चलाता है. उस ने हाल ही में आधा एकड़ खेत बेच कर बोलेरो खरीदी थी. गांव में उस की सोहबत ठीक नहीं है. अकसर गांव के लड़कों से उस का झगड़ा होता रहता है.
ऊषा ने बताया कि 10 जनवरी को भी नरेश का गांव के बाहर बनी पुलिया पर गांव के युवकों से विवाद हो गया था, उस झगड़े के बाद से उस का पता नहीं चल रहा है. उसे अंदेशा है कि कोई उसे शराब पिला कर कोई अनहोनी न कर दे. पनागर पुलिस थाना के टीआई ने ऊषा की सूचना दर्ज करते हुए जल्द ही उसे खोजने का भरोसा दिया.
12 जनवरी की सुबह पनागर पुलिस थाने के टीआई आर.के. सोनी नरेश मिश्रा की गुमशुदगी की जांच कर ही रहे थे कि उन के मोबाइल पर घंटी बज उठी. जैसे ही काल रिसीव की दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘साब, मैं मछला गांव से सुखचैन गोंटिया बोल रहा हूं, गांव के नरेश मिश्रा का कटा हुआ सिर मछला गांव से 50 मीटर दूर बेलखाड़ू रोड पर उस के ही भतीजे अशोक के खेत में पड़ा हुआ है.’’
टीआई जानते थे कि नरेश मिश्रा का भतीजा अधारताल सीएसपी के यहां रीडर है. इस बजह से उन्होंने इस सूचना पर तत्काल एक्शन लेते हुए पुलिस के आला अधिकारियों को सूचना दे दी. इस के बाद पनागर पुलिस टीम, एफएसएल, डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.
पुलिस टीम ने देखा कि सिर को किसी चीज से बेरहमी से कुचला गया था. पुलिस टीम ने धड़ की तलाश शुरू कर दी. आसपास के इलाकों की सघन चैकिंग के दौरान खून के दागधब्बों के निशान देख कर आखिरकार पुलिस धड़ को खोजने में भी कामयाब हो गई.
दोपहर में 100 मीटर दूर रोड के दूसरी ओर धड़ मिल गया. धड़ के पास काफी खून फैला हुआ था. खून छिपाने के लिए उस पर मिट्टी डाल दी गई थी. पनागर पुलिस ने अनुमान लगाया कि जहां धड़ मिला है, वहां पर ही घटना को अंजाम दिया गया होगा. उस के जांघ व सिर पर भी वार करने के निशान मिले.
गांव के खेत में कटा सिर मिलने से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई और लोगों की भीड़ उसे देखने जमा हो गई थी. गांव के लोगों ने कपड़ों के आधार पर पहचान कर इस बात की पुष्टि कर दी कि धड़ भी नरेश मिश्रा का ही है.
इसी बीच नरेश की पत्नी ऊषा भी खबर लगते ही खेत पर पहुंच गई और नरेश मिश्रा के सिर और धड़ के पास जा कर जोरजोर से रोने लगी. किसी तरह गांव के लोगों ने उसे समझाबुझा कर वहां से दूर किया. सिर को ले कर 2 तरह की बातें सामने आ रही थीं. सिर या तो वहां आरोपी ने जानबूझ कर पुलिस को भ्रमित करने के लिए फेंका होगा या फिर किसी जानवर ने वहां खींच कर पहुंचा दिया होगा. सिर व धड़ को बेरहमी से कुल्हाड़ी से काट कर अलग करने की बात कही जा रही है. घटनास्थल पर शराब की खाली बोतल भी मिली थी.
जबलपुर जिले में इस से पहले तिलवारा में इसी तरह सिर काट कर हत्या करने का सनसनीखेज मामला सामने आ चुका था. तिलवारा में प्रेम विवाह से नाराज धीरज शुक्ला ने 11 मार्च, 2021 को जीजा विजेत कश्यप की कुल्हाड़ी से गरदन उड़ा दी थी और बोरी में सिर ले कर वह खुद ही तिलवारा थाने पहुंच गया था.
इसी तरह 28 नवंबर, 2021 को परासिया झिरी गांव में 60 साल के गया प्रसाद कुसराम की गरदन काट कर हत्या कर दी गई. उस की गरदन 30 नवंबर को एक किलोमीटर दूर पुराने शमशान घाट में जमीन में गड़ी मिली थी.
इस तरह की तीसरी वारदात होने से जबलपुर जिले के एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा, एडीशनल एसपी संजय अग्रवाल, एसपी (सिटी) प्रियंका करचाम भी उसी दिन शाम को मछला गांव पहुंचे. गांव में दहशत का माहौल था और लोगों में आक्रोश भी.
मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी (जबलपुर) सिद्धार्थ बहुगुणा द्वारा मौके पर उपस्थित अधिकारियों को आवश्यक दिशानिर्देश देते हुए शीघ्र पतासाजी कर आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए.
एडीशनल एसपी संजय कुमार अग्रवाल एवं गोपाल खांडेल तथा एसपी (सिटी) प्रियंका करचाम के मार्गदर्शन में उन्होंने एक टीम का गठन किया.
टीम में थानाप्रभारी आर.के. सोनी, एसआई अंबुज पांडे, आकाशदीप साहू, एएसआई ब्रह्मदत्त दूबे, संतोष पांडेय, कांस्टेबल राममिलन, विनय जायसवाल, देशपाल, कुलदीप, मोनू करारे, विवेक, नरेंद्र, लेडी कांस्टेबल मोनिका, अभिलाषा एवं क्राइम ब्रांच जबलपुर के एएसआई रामसनेही शर्मा, हैडकांस्टेबल अजीत पटेल, हरिशंकर गुप्ता, अरविंद, कांस्टेबल राजेश केवट आदि को शामिल किया गया.
एफएसएल टीम की डा. सुनीता तिवारी द्वारा मौके की पूरी कर लेने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. फिर पुलिस टीम जांच में जुट गई.
पुलिस ने सब से पहले गांव के उन 5 लड़कों को बुला कर पूछताछ की, जिन से नरेश का उसी दिन विवाद हुआ था. पूछताछ में यह बात सामने आई कि नरेश को उसी रात 8 बजे नरेश के जिगरी दोस्त अखिलेश विश्वकर्मा के साथ देखा गया था.
पुलिस ने जब नरेश के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि घटना वाले दिन उस की अखिलेश से बातचीत हुई थी. इस के बाद पुलिस ने अखिलेश के फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. उस से यह पता चला कि अखिलेश की बातचीत नरेश की पत्नी ऊषा से कई बार हुई थी.
घटना वाली रात को भी 11 बजे दोनों की बातचीत हुई थी. इसी काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने अखिलेश विश्वकर्मा से पूछताछ की तो पहले वह पुलिस को गुमराह करता रहा, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे वह जल्द ही टूट गया. पुलिस पूछताछ में अखिलेश ने नरेश मिश्रा की हत्या का जुर्म कुबूल करते हुए जो कहानी बताई, उसे जान कर लोग हैरान रह गए.
कहानी की शुरुआत आज से 7 साल पहले 2015 में हुई थी. अपने मातापिता की इकलौती संतान नरेश मिश्रा पनागर में ट्रक चलाता था. एक दिन ट्रक ले कर वह घर लौट रहा था. रात का वक्त था, उस ने सोचा कि किसी ढाबे पर खाना खा कर ही वह घर की तरफ रवाना होगा.
कटनी के एक ढाबे पर ट्रक खड़ा कर वह खाना खाने के लिए रुका. वह ढाबे पर बिछी खाट पर बैठा कुछ सोच रहा था कि पानी ले कर आई एक युवती की आवाज से उस का ध्यान टूटा गया, ‘‘लो उस्ताद पानी पी लो.’’
नरेश ने उस युवती को देखा तो बस देखता ही रह गया. बाद में पता चला कि तीखे नाकनक्श वाली उस युवती का नाम ऊषा कुशवाहा है. ऊषा की शादी कटनी के पास के एक गांव में हुई थी और उस का 6 साल का एक बेटा भी था. उस का पति कोई कामधंधा करने के बजाय आवारागर्दी कर शराब पीता था.
घर में खाने के लाले थे. ऊषा अपने बच्चे को पढ़ालिखा कर कुछ बनाना चाहती थी. इसी वजह से उस ने ढाबे में खाना बनाने के साथ ग्राहकों को चायपानी देने का काम करना शुरू कर दिया था. 25 साल की ऊषा भरे हुए बदन की थी. उसे देख कर नरेश कुछ ऐसा मोहित हुआ कि वह रोज ही ढाबे पर आनेजाने लगा.
बातों ही बातों में नरेश उसे अपना दिल दे बैठा. पति से प्रताडि़त ऊषा को किसी पुरुष की सहानुभूति की जरूरत थी, लिहाजा वह भी अपनी भरी जवानी पर काबू न रख सकी. जब नरेश ने उस के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा तो ऊषा ने नरेश को बता दिया था कि वह शादीशुदा और 6 साल के बेटे की मां है.
नरेश इस की परवाह न करते हुए उस से शादी करने को राजी हो गया. ऊषा कटनी से पति को छोड़ कर बेटे संग नरेश के साथ मचला आ गई. नरेश की इस शादी को ले कर गांव में विरोध हुआ था. नरेश पहले ऊषा को ले कर अपने घर आया तो उस के मातापिता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. गांव में भी जातिबिरादरी के लोगों ने नरेश के इस तरह एक महिला को रखने पर ऐतराज जताया.
धुन के पक्के नरेश ने किसी की नहीं मानी और उस ने ऊषा से विधिवत शादी रचा ली और बाद में ऊषा अपने बेटे के साथ आ कर नरेश के घर में पत्नी बन कर रहने लगी.
इस बीच नरेश के मातापिता का निधन हो गया और सारी प्रौपर्टी उस के नाम हो गई. ऊषा का बेटा अब 13 साल का हो गया था. ऊषा नरेश पर अपने बेटे के नाम कुछ प्रौपर्टी करने का दबाव बना रही थी, पर नरेश इस के लिए तैयार नहीं था. क्योंकि उस की खुद की कोई औलाद नहीं हुई थी.
नरेश शराब के नशे में ऊषा से झगड़ा और मारपीट भी करने लगा, जिस के कारण ऊषा का झुकाव अखिलेश नाम के युवक की तरफ हुआ.
अखिलेश और नरेश अच्छे दोस्त थे. नरेश रंगीनमिजाज था. उस के गांव की एक महिला से अवैध संबंध थे, जिस की जानकारी उस की पत्नी ऊषा को हो गई थी. इस बात को ले कर अकसर ही उन के बीच झगड़ा होता रहता था.
ऊषा सोचती कि जिस प्यार के लिए उस ने अपने पति को छोड़ दिया उसे वह प्यार भी नसीब नहीं हो रहा.
अखिलेश गांव के ही गिरिजाप्रसाद विश्वकर्मा का बेटा था. नशाखोरी की वजह से 32 साल की उम्र होने के बाद भी उस की शादी नहीं हुई थी. नरेश के साथ रहने से उसे मुफ्त की शराब पीने को मिलती थी.
दोनों ही अकसर गांव में साथसाथ घूमतेफिरते और साथ शराब पीते थे. सन 2019 में नरेश ने अपनी फितरत के अनुसार मौका पा कर अखिलेश की भाभी के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की थी, जिस की रिपोर्ट पनागर थाने में दर्ज की गई थी. मगर पैसों का लालच दे कर उस समय मामला रफादफा हो गया था.
उसी समय से अखिलेश मन ही मन नरेश से रंजिश रखने लगा था. उस के साथ बैठ कर वह शराब तो पीता था, मगर हरदम नरेश से बदला लेने की फिराक में रहता था.
अखिलेश मौका पा कर नरेश की पत्नी से भी मेलजोल बढ़ाने लगा था. अखिलेश नरेश से मिलने अकसर उस के घर आता रहता था. नरेश की पत्नी ऊषा भी उस की खूब आवभगत करती थी.
एक दिन जब अखिलेश नरेश से मिलने आया तो नरेश और उस का बेटा घर पर मौजूद नहीं थे. ऊषा ने अखिलेश से बातचीत के दौरान अपनी परेशानी बताई. उस ने कहा, ‘‘लगता है मेरे पति का मुझ से मन भर गया है और वह किसी दूसरी औरत में दिलचस्पी लेने लगा है.’’
इस पर अखिलेश बोला, ‘‘घर में जिस की इतनी खूबसूरत बीवी हो वह भला और कहीं और मुंह क्यों मारेगा.’’
ऊषा अपनी खूबसूरती की तारीफ सुनते ही शरमा कर बोली, ‘‘हमारी खूबसूरती किसे दिखती है.’’
‘‘भाभी, हमें तो तुम अप्सरा लगती हो. हमारी शादी तुम से हुई होती तो हम तो तुम्हारे कदमों में चांदतारे बिछा देते,’’ अखिलेश ने अपने मन की बात कह डाली.
‘‘तुम ठिठोली तो खूब कर लेते हो, पर तुम्हें मेरी कोई फिक्र ही नहीं है,’’ ऊषा ने शिकायती लहजे में कहा.
‘‘ऐसा नहीं है भाभी, मुझ से तुम्हारी हालत देखी नहीं जाती. मुझे मालूम है कि नरेश तो शराब पी कर तुम्हें मारतापीटता भी है. उसे तुम्हारे बेटे से भी कोई मतलब नहीं है. अगर उस के दिल में तुम्हारे और बेटे के प्रति जरा सी चाहत होती तो अपनी प्रौपर्टी उस के नाम नहीं कर देता.’’ अखिलेश सहानुभूति जताते हुए बोला.
‘‘मैं तंग आ गई हूं कब ऐसे मर्द से छुटकारा मिले,’’ ऊषा बोली.
‘‘भाभी, इस ने मेरी भाभी के साथ संबंध बनाने का प्रयास किया था, तब से मेरे अंदर भी इंतकाम की आग जल रही है. तुम कहो तो इसे रास्ते से हटा दूं.’’ अखिलेश ने ऊषा का मन जानने के लिए कहा.
‘‘सचमुच यदि तुम ऐसा कर दो तो मैं तुम्हें 2 लाख रुपए दूंगी,’’ ऊषा बोली.
‘‘तो भाभी, समझो काम हो गया. तुम बस रुपयों का इंतजाम कर लो,’’ पैसे के लालच और बदले की भावना से ग्रस्त अखिलेश ने ऊषा का प्रस्ताव मानते हुए कहा.
ऊषा अब नरेश से छुटकारा पाने का मन बना चुकी थी. जैसे ही उसे अखिलेश की शह मिली, वह पति को जान से मरवाने की योजना बनाने लगी. नरेश ने कुछ समय पहले अपनी आधा एकड़ जमीन बेच कर एक बोलेरो गाड़ी खरीदी थी, जिसे वह खुद किराए पर चलाता था. बाकी पैसे उस ने घर पर ही रखे थे. ऊषा ने सोचा कि घर में रखे हुए नरेश के पैसों से 2 लाख रुपए अखिलेश को दे कर नरेश का कत्ल करा कर वह उस की प्रौपर्टी की मालिक हो जाएगी. अखिलेश को पैसों के लालच के साथ नरेश से बदला लेना था.
अखिलेश तैयार हो गया तो ऊषा ने ही नरेश की हत्या के लिए उसे एक फरसा भी दिया. जिसे पहले ही खेत में एक पेड़ के नीचे छिपा कर अखिलेश ने रख दिया था.
तय साजिश के मुताबिक 10 जनवरी, 2022 की शाम अखिलेश ने नरेश को फोन किया और गांव के बाहर श्याम मिश्रा के खेत में शराब पीने के लिए बुलाया. दोनों ने साथ में बैठ कर शराब पी. नरेश को अखिलेश ने ज्यादा शराब पिला दी, जिस से वह नशे में धुत्त हो कर बेसुध हो गया.
इस के बाद अखिलेश ने पहले से खेत में छिपा कर रखा फरसा निकाला और 4-5 वार कर नरेश की गरदन पर कर धड़ से अलग कर दी. अखिलेश शातिर दिमाग का था. कुछ देर इंतजार करने के बाद जब नरेश के सिर से खून निकलना बंद हो गया तो उस ने नरेश का सिर उठा कर रोड के दूसरी तरफ सुखचैन गोटियां के पीछे अशोक पटेल के खेत में ले जा कर फेंक दिया.
अखिलेश ने सोचा कि सुखचैन एवं अशोक पर नरेश की हत्या का शक पुलिस करेगी. क्योंकि अखिलेश को पता था कि सुखचैन गोटियां और नरेश के बीच मनमुटाव रहने से हमेशा विवाद होता रहता था.
इतना ही नहीं, नरेश की हत्या करने के बाद अखिलेश ने ऊषा को काम पूरा होने की खबर मोबाइल से दी और खून से सना फरसा घर के आंगन में फेंक वह घर चला गया, जिसे ऊषा ने धो कर घर में ही छिपा दिया था. नरेश की हत्या के बाद ऊषा ने पहले थाने जा कर उस की गुमशुदगी की सूचना लिखवाई. लाश मिलने पर अखिलेश और ऊषा दोनों दुखी होने का नाटक करते रहे. पुलिस ने जब पूछताछ की तो सारी कहानी सामने आ गई.
पुलिस ने नरेश की पत्नी ऊषा मिश्रा को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने भी स्वीकार कर लिया कि पति से परेशान हो कर उसे उस की हत्या कराने के लिए मजबूर होना पड़ा. पुलिस ने अखिलेश और ऊषा की निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त फरसा एवं घटना के वक्त उपयोग में लाए गए 2 मोबाइल फोन बरामद कर लिए. दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर पुलिस ने जबलपुर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा ने 24 घंटे के अंदर केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की सराहना की.
—कथा पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित
‘‘जल्दी करो मां. मुझे देर हो रही है. फिर ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी,’’ अरुण ने कहा.
मां बोलीं, ‘‘तेरी गाड़ी तो 12 बजे की है. अभी तो 7 भी नहीं बजे हैं.’’
‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो. मैं यार्ड में ही जा कर डब्बे में बैठ जाऊंगा. प्लेटफार्म पर सभी जनरल डब्बे बिलकुल भरे हुए ही आते हैं,’’ अरुण बोला.
उन दिनों ‘श्रमजीवी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन पटना जंक्शन से 12 बजे खुल कर अगले दिन सुबह 5 बजे नई दिल्ली पहुंचती थी. अरुण को एक इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाना था. अगले दिन सुबह के 11 बजे दिल्ली के दफ्तर में पहुंचना था.
अरुण के पिता किसी प्राइवेट कंपनी में चपरासी थे. अभी कुछ महीने पहले ही वे रिटायर हुए थे. वे कुछ दिनों से बीमार थे. वे किसी तरह 2 बेटियों की शादी कर चुके थे. सब से छोटे बेटे अरुण ने बीए पास करने के बाद कंप्यूटर की ट्रेनिंग ली थी. वह एक साल से बेकार बैठा था.
अरुण 1-2 छोटीमोटी ट्यूशन करता था. उस के पास स्लीपर क्लास के भी पैसे नहीं थे, इसीलिए पटना से दिल्ली जनरल डब्बे में जाना पड़ रहा था.
मां ने कहा, ‘‘बस हो गया. मैं ने परांठा और भुजिया एक पैकेट में पैक कर दिया है. तुम याद से अपने बैग में रख लेना.’’
पिता ने भी बिस्तर पर पड़ेपड़े कहा, ‘‘जाओ बेटे, अपने सामान का खयाल रखना.’’
अरुण मातापिता को प्रणाम कर स्टेशन के लिए निकल पड़ा. यार्ड में जा कर एक डब्बे में खिड़की के पास वाली सिंगल सीट पर कब्जा जमा कर उस ने चैन की सांस ली.
ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुंची, तो चढ़ने वालों की बेतहाशा भीड़ थी. अरुण जिस खिड़की वाली सीट पर बैठा था, वह इमर्जैंसी खिड़की थी. एक लड़की डब्बे में घुसने की नाकाम कोशिश कर रही थी. उस लड़की ने अरुण के पास आ कर कहा, ‘‘आप इमर्जैंसी खिड़की खोलें, तो मैं भी डब्बे में आ सकती हूं. मेरा इस ट्रेन से दिल्ली जाना बहुत जरूरी है.’’
अरुण ने उसे सहारा दे कर खिड़की से अंदर डब्बे में खींच लिया.
लड़की पसीने से तरबतर थी. दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछते हुए उस ने अरुण को ‘थैंक्स’ कहा. थोड़ी देर में गाड़ी खुली, तो अरुण ने अपनी सीट पर जगह बना कर लड़की को बैठने को कहा. पहले तो वह झिझक रही थी, पर बाद में और लोगों ने भी बैठने को कहा, तो वह चुपचाप बैठ गई.
तकरीबन 2 घंटे बाद ट्रेन बक्सर पहुंची. यह बिहार का आखिरी स्टेशन था. यहां कुछ लोकल मुसाफिरों के उतरने से राहत मिली.
अरुण के सामने वाली सीट खाली हुई, तो वह लड़की वहां जा बैठी.
अरुण ने लड़की का नाम पूछा, तो वह बोली, ‘‘आभा.’’
अरुण बोला, ‘‘मैं अरुण.’’
दोनों में बातें होने लगीं. अरुण ने पूछा, ‘‘पटना में तुम कहां रहती हो?’’
आभा बोली, ‘‘सगुना मोड़… दानापुर के पास.’’
‘‘मैं बहादुरपुर… मैं पटना के पूर्वी छोर पर हूं और तुम पश्चिमी छोर पर. दिल्ली में कहां जाना है?’’
‘‘कल मेरा एक इंटरव्यू है.’’
‘‘वाह, मेरा भी कल एक इंटरव्यू है. बुरा न मानो, तो क्या मैं जान सकता हूं कि किस कंपनी में इंटरव्यू है?’’
आभा बोली, ‘‘लाल ऐंड लाल ला असोसिएट्स में.’’
अरुण तकरीबन अपनी सीट से उछल कर बोला, ‘‘वाह, क्या सुहाना सफर है. आगाज से अंजाम तक हम साथ रहेंगे.’’
‘‘क्या आप भी वहीं जा रहे हैं?’’
अरुण ने रजामंदी में सिर हिलाया और मुसकरा दिया. रातभर दोनों अपनीअपनी सीट पर बैठेबैठे सोतेजागते रहे थे. ट्रेन तकरीबन एक घंटा लेट हो गई थी. इस के बावजूद काफी देर से गाजियाबाद स्टेशन पर खड़ी थी. सुबह के 7 बज चुके थे. अरुण नीचे उतर कर लेट होने की वजह पता लगाने गया.
अरुण अपनी सीट पर बैठते हुए बोला, ‘‘गाजियाबाद और दिल्ली के बीच में एक गाड़ी पटरी से उतर गई है. आगे काफी ट्रेनें फंसी हैं. ट्रेन के दिल्ली पहुंचने में काफी समय लग सकता है.’’
आभा यह सुन कर घबरा गई. अरुण ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘डोंट वरी. हम दोनों यहीं उतर जाते हैं. यहीं फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लेते हैं. फिर यहां से आटोरिकशा ले कर सीधे कनाट प्लेस एक घंटे के अंदर पहुंच जाएंगे.’’
दोनों ने गाजियाबाद स्टेशन पर ही चायनाश्ता किया. फिर आटोरिकशा से दोनों कंपनी पहुंचे. दोनों ने अलगअलग इंटरव्यू दिए. इस के बाद कंपनी के मालिक मोहनलाल ने दोनों को एकसाथ बुलाया.
मोहनलाल ने दोनों से कहा, ‘‘देखो, मैं भी बिहार का ही हूं. दोनों की क्वालिफिकेशंस एक ही हैं. इंटरव्यू में दोनों की परफौर्मेंस बराबर रही है, पर मेरे पास तो एक ही जगह है. अब तुम लोग बाहर जा कर तय करो कि किसे नौकरी की ज्यादा जरूरत है. मुझे बता देना, मैं औफर लैटर इशू कर दूंगा.’’
अरुण और आभा दोनों ने बाहर आ कर बात की. अपनीअपनी पारिवारिक और माली हालत बताई.
आभा की मां विधवा थीं. उस की एक छोटी बहन भी थी. वह पटना के कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम नौकरी करती थी, पर उसे बहुत कम पैसे मिलते थे. परिवार को उसी को देखना होता था.
अरुण ने आभा के पक्ष में सहमति जताई. आभा को वह नौकरी मिल गई. मालिक मोहनलाल अरुण से बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘नौकरी तो तुम भी डिजर्व करत थे. मैं तुम से बहुत खुश हूं. वैसे तो किराया देने का कोई करार नहीं था. फिर भी मैं ने अकाउंटैंट को कह दिया है कि तुम्हें थर्ड एसी का अपडाउन रेल किराया मिल जाएगा. जाओ, जा कर पैसे ले लो.’’
अरुण ने पैसे ले लिए. आभा उसे धन्यवाद देते हए बोली, ‘‘यह दिन मैं कभी नहीं भूलूंगी. मिस्टर मोहनलाल ने मुझे बताया कि तुम ने मेरी खाितर बड़ा त्याग किया है.’’
दोनों ने एकदूसरे का फोन नंबर लिया और संपर्क में रहने को कहा.
अरुण जनरल डब्बे में बैठ कर पटना लौट आया. उस ने किराए का काफी पैसा बचा लिया था. मातापिता को जब पता चला कि उसे नौकरी नहीं मिली, तो वे दोनों उदास हो गए.
कुछ ही दिनों में अरुण के पिता चल बसे. अरुण किसी तरह 2-3 ट्यूशन कर अपना काम चला रहा था. जिंदगी से उस का मन टूट चुका था. कभी सोचता कि घर छोड़ कर भाग जाए, तो कभी सोचता गंगा में जाकर डूब जाए. फिर अचानक बूढ़ी मां की याद आती, तो आंखों में आंसू भर आते.
एक दिन अरुण बाजार से कुछ सामान खरीदने गया. एक 16-17 साल का लड़का अपने कंधे पर एक बैग लटकाए कुछ बेच रहा था. उस के एक पैर में पोलियो का असर था. लाठी के सहारे चलता हुआ वह अरुण के पास आ कर बोला, ‘‘भैया, क्या आप को पापड़ चाहिए? 10 रुपए का एक पैकेट है.’’
अरुण ने कहा, ‘‘नहीं चाहिए पापड़.’’
लड़के ने थैले से एक शीशी निकाल कर कहा, ‘‘आम का अचार है. चाहिए? पापड़ और अचार दोनों घर के बने हैं. मां बनाती हैं.’’ अरुण के मन में दया आ गई. उस के पास 5 रुपए ही बचे थे. उस ने लड़के को देते हुए कहा, ‘‘मुझे कुछचाहिए तो नहीं, पर तुम इसे रख लो.’’
अरुण ने रुपए उस के हाथ में पकड़ा दिए. दूसरे ही पल वह लड़का गुस्से से बोला, ‘‘मैं विकलांग हूं, पर भिखारी नहीं. मैं मेहनत कर के खाता हूं. जिस दिन कुछ नहीं कमा पाता, मांबेटे पानी पी कर सो जाते हैं.’’
इतना बोल कर उस लड़के ने रुपए अरुण को लौटा दिए. पर वह अरुण की आंखों में उम्मीद की किरण जगा गया. वह सोचने लगा, ‘जब यह लड़का जिंदगी से हार नहीं मान सकता है, तो मैं क्यों मानूं?’
अरुण के पास दिल्ली में मिले कुछ रुपए बचे थे. वह कोलकाता गया. वहां के मंगला मार्केट से थोक में कुछ जुराबें, रूमाल और गमछे खरीद लाया. ट्यूशन के बाद बचे समय में न्यू मार्केट और महावीर मंदिर के पास फुटपाथ पर उन्हें बेचने लगा.
इस इलाके में सुबह से ले कर देर रात तक काफी भीड़ रहती थी. अरुण की अच्छी बिक्री हो जाती थी.
शुरू में अरुण को कुछ झिझक होती थी, पर बाद में उस का इस में मन लग गया. इस तरह उस ने देखा कि एक हफ्ते में तकरीबन 7-8 सौ रुपए, तो कभी हजार रुपए की बचत होती थी.
इस बीच बहुत दिन बाद उसे आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘अगले हफ्ते मेरी शादी होने वाली है. कार्ड पोस्ट कर दिया है. तुम जरूर आना और मां को भी साथ लाना.’’
अरुण मां के साथ आभा की शादी में सगुना मोड़ उस के घर गया. आभा ने अपनी मां, बहन और पति से उन्हें मिलवाया और कहा, ‘‘मैं जिंदगीभर अरुण की कर्जदार रहूंगी. मुझे नौकरी अरुण की वजह से ही मिली थी.’’
शादी के बाद आभा दिल्ली चली गई. अरुण की दिनचर्या पहले जैसी हो गई.
एक दिन आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘मेरे पति गुड़गांव की एक गारमैंट फैक्टरी में डिस्पैच सैक्शन में हैं. फैक्टरी से मामूली डिफैक्टिव कपड़े सस्ते दामों में मिल जाते हैं. तुम चाहो, तो इन्हें बेच कर अच्छाखासा मुनाफा कमा सकते हो.’’
अरुण बोला, ‘नेकी और पूछपूछ… मैं गुड़गांव आ रहा हूं.’
इधर अरुण उस पापड़ वाले लड़के का स्थायी ग्राहक हो गया था. उस का नाम रामू था. हर हफ्ते एक पैकेट पापड़ और अचार की शीशी उस से लिया करता था. अब अरुण महीने 2 महीने में एक बार दिल्ली जा कर कपड़े लाता और उन्हें अच्छे दाम पर बेचता.
धीरेधीरे अरुण का कारोबार बढ़ता गया. उस ने कंकड़बाग में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली थी. बीचबीच में कोलकाता से भी थोक में कपड़े लाया करता. कारोबार बढ़ने पर उस ने एक बड़ी दुकान ले ली.
अरुण की शादी थी. उस ने आभा को भी बुलाया. वह भी पति के साथ आई थी. अरुण ने उस पापड़ वाले लड़के को भी अपनी शादी में बुलाया था.
शादी हो जाने के बाद जब अरुण अपनी मां के साथ मेहमानों को विदा कर रहा था, अरुण ने आभा को उस की मदद के लिए थैंक्स कहा.
आभा ने कहा, ‘‘अरे यार, नो मोर थैंक्स. हिसाब बराबर. हम दोस्त हैं.’’
फिर अरुण ने रामू को बुला कर सब से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस लड़के की वजह से हूं. मैं तो जिंदगी से निराश हो चुका था. मेरे अंदर जीने की इच्छा को इस स्वाभिमानी मेहनती रामू ने जगाया.’’
तब अरुण रामू से बोला, ‘‘मुझे अपनी दुकान में एक सेल्समैन की जरूरत है. क्या तुम मेरी मदद करोगे?’’
रामू ने हामी भर कर सिर झुका कर अरुण को नमस्कार किया.
अरुण बोला, ‘‘अब तुम्हें घूमघूम कर सामान बेचने की जरूरत नहीं है. मैं ने यहां के विधायक को अर्जी दी है तुम्हें अपने फंड से एक तिपहिया रिकशा देने की. तुम उसे आसानी से चला सकते हो और आजा सकते हो.’’
अरुण, आभा, रामू और बाकी सभी की आंखें खुशी से नम थीं. तीनों एकदूसरे के मददगार जो बने थे.
बेटी पारुल से फोन पर बात खत्म होते ही मेरे मस्तिष्क में अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे. पति के औफिस से लौटने का समय हो रहा था, इसलिए डिनर भी तैयार करना आवश्यक था. किचन में यंत्रचालित हाथों से खाना बनाने में व्यस्त हो गई. लेकिन दिमाग हाथों का साथ नहीं दे रहा था.
बचपन से ही पारुल स्वतंत्र विचारों वाली, जिद्दी लड़की रही है. एक बार जो सोच लिया, सो सोच लिया. होस्टल में रहते हुए उस ने कभी मुझे अपनी छोटीबड़ी समस्याओं में नहीं उलझाया, उन को मुझे बिना बताए ही स्वयं सुलझा लेती थी. इस के विपरीत, मैं अपने परिचितों को देखती थी कि जबतब उन के बच्चों के फोन आते ही, उन की समस्याओं का समाधान करने के लिए उन के होस्टल पहुंच जाया करते थे.
एक दिन अचानक जब पारुल ने अपना निर्णय सुनाया कि एक लड़का रितेश उसे पसंद करता है और वह भी उस को चाहती है, दोनों विवाह करना चाहते हैं तो मैं सकते में आ गई और सोच में पड़ गई कि जमाना खराब है, किसी ने अपने जाल में उसे फंसा तो नहीं लिया. देखने में सुंदर तो वह है ही, उम्र भी अभी अपरिपक्व है, पूरी 22 वर्ष की तो हुई है अभी. ये सब सोच कर मैं बहुत चिंतित हो गई कि यदि उस ने सही लड़के का चयन नहीं किया होगा और जिद की तो वह पक्की है ही, तो फिर क्या होगा.
कुछ दिनों के सोचविचार के बाद तय हुआ कि रितेश से मिला जाए. पारुल के जन्मदिन पर उस को आमंत्रित किया गया और वह आ भी गया. वह सुदर्शन था, एमबीए की पढ़ाई पूरी कर के किसी नामी कंपनी में सीनियर पोस्ट पर कार्यरत था. पढ़ाई में आरंभ से ही अव्वल रहा. वह हम सब को बहुत भा गया था. केवल विजातीय होने के कारण विरोध करने का कोई औचित्य नहीं लगा. हम ने विवाह की स्वीकृति दे दी. लेकिन रितेश के मातापिता ने आरंभ में तो रिश्ता करने से साफ इनकार कर दिया था, लेकिन इकलौते बेटे की जिद के कारण उन्हें घुटने टेकने पड़े और विवाह धूमधाम से हो गया. पारुल अनचाही बहू बन कर ससुराल चली गई.
पारुल अपने मधुर स्वभाव के कारण ससुराल में सब की चहेती बन गई. सब के दिल में स्थान बनाने के लिए उसे बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि ऐसा करने में उसे रितेश का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ. उस ने पाया कि रितेश का अपने परिवार से तालमेल ही नहीं था. बिना लिहाज के अपने मातापिता को कभी भी कुछ भी बोल देता था. पारुल हैरान होती थी कि कोईर् अपने जन्मदाता से ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता था. उसे समझाने की कोशिश करती तो वह और भड़क जाता था.
धीरेधीरे उस को एहसास हुआ कि दोष उस में नहीं, उस की परवरिश में है. उस के अपने मातापिता के विपरीत, रितेश के मातापिता उस की भावनाओं की कभी भी कद्र नहीं करते थे. अब इतना बड़ा हो गया था, फिर भी उस की बात को महत्त्व नहीं देते थे, जिस का परिणाम होता था कि वह आक्रोश में कुछ भी बोल देता था. कभीकभी पारुल असमंजस की स्थिति में आ जाती थी कि किस का साथ दे, मातापिता की गलती देखते हुए भी बड़े होने का लिहाज कर के उन को कुछ भी नहीं बोल पाती थी.
एक दिन मांबेटे में विवाद इतना बढ़ गया कि रितेश ने तुरंत अलग घर लेने का निर्णय ले डाला. पारुल ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह अपने इरादे से टस से मस नहीं हुआ. वह क्या करती, मां ने भी अपने अहं के कारण उसे नहीं रोका. वह दोनों के बीच पिस गई. अंत में उसे पतिधर्म निभाना ही पड़ा.
अपने परिवार से अलग होने के बाद तो रितेश और भी मनमाना हो गया. जो लड़का विवाह के पहले कभी अपनी मां से ही नहीं जुड़ा, वह अपनी पत्नी से क्या जुड़ेगा. विवाह जैसे प्यारभरे बंधन के रेशमी धागे उसे लोहे की जंजीरें लगने लगीं. आरंभ से ही होस्टल में स्वच्छंद रहने वाले रितेश को विवाह एक कैद लगने लगा.
एक दिन अचानक रितेश का फोन मेरे पास आया, बोला, ‘अपनी बेटी को समझाओ, बच्ची नहीं है अब…’ इस से पहले कि वह अपनी बात पूरी करे, पारुल ने उस के हाथ से फोन ले लिया और कहा, ‘ममा, आप बिलकुल परेशान मत होना. ऐसे ही इस ने बिना सोचेसमझे आप को फोन घुमा लिया. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं.’ लेकिन रितेश को पहली बार इतनी अशिष्टता से बात करते हुए सुन कर मैं सकते में आ गई, सोचने लगी कि उन की अपनी पसंद का विवाह है, फिर क्या समस्या हो सकती है.
एक बार मैं ने और मेरे पति ने मन बनाया कि पारुल के यहां जा कर उस का घर देखा जाए. उस ने कईर् बार बुलाया भी था. विचार आते ही हम दोनों पुणे पहुंच गए. वे दोनों स्टेशन लेने आए थे. सालभर बाद हम उन से मिल रहे थे. मिलते ही मेरी दृष्टि पारुल के चेहरे पर टिक गई. उस का चेहरा पहले से अधिक कांतिमय लग रहा था. सुंदर तो वह पहले से ही थी, अब अधिक लावण्यमयी लग रही थी. मुझे याद आया कि जब रितेश के मातापिता ने विवाह से इनकार कर दिया था तो उस का चेहरा कितना सूखा और निस्तेज लगता था, तब हम कितना घबरा गए थे. आज उस को देख कर बहुतबहुत तसल्ली हुई थी.
10 किलोमीटर की दूरी पर उन का घर था. वहां पहुंच कर मैं ने पाया कि वह 2 बैडरूम का घर था. पारुल ने अपने घर को बहुत व्यवस्थित ढंग से सजा रखा था. घर के रखरखाव में तो उसे बचपन से ही बहुत रुचि थी. यह देख कर बहुत संतोष हुआ कि सासससुर के साथ रहते हुए, रितेश का उन से तालमेल न होने के कारण रातदिन जो विवाद होते थे, वे समाप्त हो गए हैं और वे दोनों आपस में बहुत प्रसन्न हैं.
लेकिन मेरा यह भ्रम शीघ्र ही टूट गया. अगले दिन ही सुबह मैं ने देखा कि रितेश पारुल को छोटीछोटी बातों में नीचा दिखाने से नहीं चूकता था, चाहे उस के खाने का, कपड़े पहनने का या खाना बनाने का ढंग हो. वह उस के किसी भी कार्यकलाप से खुश नहीं रहता था. बातबात में उसे ताने देता रहता था कि उस को कुछ नहीं आता, वह कुछ नहीं कर सकती.
पारुल चुपचाप सुनती रहती थी. रितेश की उस से इतनी अधिक अपेक्षाएं रहती थीं कि उन को पूरा करना उस के वश की बात नहीं थी. उस के जिन गुणों, उस का मासूम लुक देता चेहरा, उस की नाजुकता, उस की मीठी आवाज, के कारण विवाह से पहले उस पर रीझा था, वे सब उस के लिए बेमानी हो गए थे.
हम दोनों अवाक उस की बेसिरपैर की बातें सुनते थे. मैं मन ही मन सोचती रहती थी कि क्या यही प्रेमविवाह की परिणति होती है. रितेश ने जिस से विवाह करने के लिए एक बार अपने मातापिता का गृह तक त्याग कर दिया था, आज उसी का व्यंग्यबाणों से कलेजा छलनी कर रहा था. दामाद था इसलिए उसे क्या कहते, लेकिन, आखिर कब तक?
एक दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं पारुल से बोली, ‘चल, अभी हमारे साथ वापस चल. हम ने देख लिया और बहुत झेल लिया तुम लोगों का तमाशा.’ मेरे बोलते ही रितेश उठ कर घर से चला गया.
पारुल बोली, ‘ममा, मुझे उस की तो आदत पड़ गई है. मेरा उस को छोड़ कर आप के साथ जाना ठीक है क्या? ऐसी बातें तो होती रहती हैं. देखना थोड़ी देर में वह सबकुछ भूल जाएगा और सामान्य हो जाएगा.’ मैं अपनी बेटी पारुल की बात सुन कर दंग रह गई. इतनी सहनशील तो वह कभी नहीं थी पर आत्मसम्मान भी तो कोई चीज होती है. मैं ने कहा, ‘बेटा, तूने उस के इस बरताव के बारे में हमें कभी कुछ बताया नहीं.’
‘क्या बताती ममा, शादी भी तो मेरी मरजी से हुई थी, आप सुन कर करतीं भी क्या? लेकिन इस में रितेश की भी गलती नहीं है, ममा. आप को पता है उस की मां ने बचपन में ही उसे होस्टल में डाल दिया था. उस ने कभी जाना ही नहीं परिवार क्या होता है और उस का सुख क्या होता है. कभी उस की इच्छाओं को प्राथमिकता दी ही नहीं गई, न ही कभी कोई कार्य करने पर उसे प्रोत्साहन के दो बोल ही सुनने को मिले. इसलिए ही ऐसा है. वह दिल का बुरा नहीं है. आज उस की बदौलत ही इतनी अच्छी जिंदगी जी रही हूं. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. आप चिंता न करें.’
लेकिन मुझ पर उस के तर्क का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था. पारुल ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ कर रितेश को फोन कर के घर आने के लिए कहा. और वह आ भी गया. दोनों ने एक ओर जा कर कोईर् बात की. उस के बाद रितेश हमारे पास आया और बोला, ‘सौरी ममापापा.’ हम दोनों का मन यह सुन कर थोड़ा हलका हुआ. हमारे लौटने का दिन करीब होने पर हम पारुल के सासससुर से मिलने गए. उस की सास ने कहा, ‘मेरी बहू पारुल तो बहुत स्वीट नेचर की है. मुझे उस से कोई शिकायत नहीं है.’ हमें यह सोच कर बहुत संतोष हुआ कि कम से कम उस की सास तो उस से बहुत प्रसन्न रहती है.
एक दिन पारुल ने जब मुझे मेरे नानी बनने का समाचार दे कर हमें चौंका दिया तो हम खुशी से फूले नहीं समाए. उस का कहना था कि उस की डिलीवरी के समय मुझे ही उस के पास रहना होगा, नहीं तो रितेश और अपनी सास के विवादों से उस समय वह परेशान हो जाएगी.
नियत समय पर मैं उस के पास पहुंच गई. उस ने चांद सी बेटी को जन्म दिया. दोनों ओर के परिवार वालों के साथ रितेश भी बहुत प्रसन्न हुआ. मैं ने मन में सोचा, पारुल के मां बनने के बाद शायद उस का बरताव उस के प्रति बदल जाए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मैं जब भी पारुल से उस के स्वभाव के बारे में जिक्र करती, उस का कहना होता, ‘ममा, आप उस की अच्छाइयां भी तो देखो, कितना स्वावलंबी और मेहनती है, मेरा कितना खयाल रखता है. थोड़ा जबान का वह कड़वा है, तो होने दो. अब उस की आदत पड़ गई है, जो मुश्किल से ही छूटेगी.’
मैं मां थी, मुझे तो रितेश के रवैये से तकलीफ होनी स्वाभाविक थी. 2 महीने किसी तरह निकाल कर मैं भारी मन से वापस लौट आई.
प्रिशा के जन्म के बाद पारुल ने नौकरी छोड़ दी और उस के लालनपालन में मग्न रहने लगी. लेकिन रितेश उस के इस निर्णय से बहुत क्षुब्ध रहता था. उस का कहना था कि प्रिशा को क्रैच में छोड़ कर भी तो वह नौकरी जारी रख सकती थी. उस के विचारानुसार उस के लिए सुखसुविधाओं के साधन जुटाने मात्र से उन का उस के प्रति कर्तव्यों की पूर्ति हो सकती है.
इस के विपरीत, पारुल सोचती थी कि कोई भी संस्था बच्चे के पालनपोषण में मां का विकल्प हो ही नहीं सकती. वह नहीं चाहती थी कि उस से दूर रहने के कारण वह भी अपने पापा का पर्याय बने. ऐसा कोई आर्थिक कारण भी नहीं था कि उसे मजबूरी में नौकरी करनी पड़े.
पारुल अपनी बेटी प्रिशा की बढ़ती हुई उम्र की एकएक गतिविधि का आनंद उठाना चाहती थी. उस के लालनपालन में वह किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहती थी. उस की तो पूरी दुनिया ही बेटी में सिमट कर आ गई थी. जो भी देखता, उस के पालने के ढंग को देख कर प्रशंसा किए बिना नहीं रहता था. इस का परिणाम बहुत जल्दी प्रिशा की गतिविधियों में झलकने लगा था. प्रिशा अपने हावभाव से सब का मन मोह लेती थी. मुझे भी यह देख कर पारुल पर गर्व होता था. लेकिन रितेश ने तो उस के विरोध में बोलने का जैसे प्रण ले रखा था.
पारुल की सास तो मेरे सामने उस की प्रशंसा करते हुए नहीं थकती थीं. पोती होने के बाद तो वे अकसर पारुल के पास जाती रहती थीं. अपने बेटे के पारुल के प्रति उग्र स्वभाव से वे भी बहुत दुखी रहती थीं. उन्होंने कई बार पारुल से कहा कि वह उन के साथ आ कर रहे, लेकिन उस ने मना कर दिया. उसे लगा कि रितेश के अकेले की गलती तो है नहीं.
मुझे पारुल पर गुस्सा भी आता था कि आखिर स्वाभिमान भी तो कुछ होता है, पढ़ीलिखी है, अकेले रह कर भी नौकरी कर के प्रिशा को पाल सकती है. पहले वाला जमाना तो है नहीं कि विवश हो कर लड़कियां पति के अत्याचार सहते हुए भी उन के साथ रहें. मैं ने उसे कई बार समझाया, ‘वह सुधरने वाला नहीं है. आदमी दिल का कितना भी अच्छा हो, उसे अपनी जबान पर भी तो कंट्रोल होना चाहिए. तू उस से अलग हो जा, हम तुझे पूरा सहयोग देंगे. मैं रितेश से बात करूं क्या?’ तो उस ने आज जो फोन पर उत्तर दिया, उस ने तो मेरी सोच पर पूर्णविराम लगा दिया था.
‘ममा, शादी का निर्णय मेरा था. आप मेरी चिंता बिलकुल न करें. आगे मेरे भविष्य के लिए मुझे ही सोचने दीजिए. मेरे ही जीवन का प्रश्न नहीं है, मुझे प्रिशा के भविष्य के बारे में भी सोचना है. बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए मांबाप दोनों का उस के साथ होना आवश्यक है. फिर रितेश उसे कितना प्यार करता है और उस के पालनपोषण में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ता है.
‘आप जानती हैं, मेरी ससुराल वाले भी मुझे और प्रिशा दोनों को कितना प्यार करते हैं. रितेश से रिश्ता टूटने पर हम दोनों का उन से भी रिश्ता टूट जाएगा. आखिर उन का क्या कुसूर है? प्रिशा को उस के पापा और दादादादी के प्यार से वंचित रखने का मुझे क्या अधिकार है? प्रिशा को थोड़ा बड़ा हो जाने दो. 3 साल की हो गई है. आज के बच्चे पहले की तरह दब्बू नहीं हैं. देखना, वही अपने पापा का सुधार करेगी.
‘शादी एक समझौता है. यह 2 व्यक्तियों का ही नहीं, 2 परिवारों का बंधन है. इस के टूटने से बहुत सारे लोग प्र्रभावित हो सकते हैं. अभी ऐसी स्थिति नहीं है कि मैं रितेश से संबंध तोड़ लूं. आखिर मैं ने उस से प्यार किया है. उस को आदत पड़ गई है छोटीछोटी बातों पर रिऐक्ट करने की, जो, हालांकि, अर्थहीन होती हैं. कभी न कभी उसे समझ आएगी ही, ऐसा मुझे विश्वास है.’
पारुल ने धाराप्रवाह बोल कर मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया. एक बार तो यह लगा कि मैं उस की मां नहीं, वह मेरी मां है. विवाह के बाद कितनी समझदार हो गई है वह. यह तो मैं ने सोचा ही नहीं कभी कि पति से रिश्ता तोड़ने पर पूरे परिवार से संबंध टूट जाते हैं. मुझे अपनी बेटी पर गर्व होने लगा था.
—शाहनवाज
3सितंबर, 2021 का दिन उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में नौगवां नरोत्तम गांव के रहने वाले 25 वर्षीय आशीष सिंह के लिए बेहद खुशी का दिन था. इस की वजह यह थी कि आशीष अपने दूसरे बच्चे का पिता जो बना था. उस की पत्नी दीपा ने बेटी को जन्म दिया था, इस खुशी में वह फूला नहीं समा रहा था.
आशीष और दीपा का एक साल का बेटा रौनक भी था. लेकिन वह इस खुशी के पलों में अपने परिवार के साथ नहीं, बल्कि घर से दूर नोएडा में था. वह नोएडा में एक एलईडी बल्ब की फैक्ट्री में काम करता था.
उस ने जब अपने मालिक से इस मौके पर घर जाने के लिए कुछ दिनों की छुट्टी मांगी तो फैक्ट्री मालिक ने साफ मना कर दिया. फैक्ट्री नियमों के अनुसार किसी को भी छुट्टी लेने के लिए कम से कम 10 दिन पहले बताना पड़ता है. तो ऐसे में आशीष के पास 10 दिनों के इंतजार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था.
10 दिनों के बाद 14 सितंबर को आशीष नोएडा से अपने परिवार और बच्चों के लिए ढेर सारे खिलौने ले कर अपने गांव लौटा. अपनी बेटी को देख कर आशीष की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. गांव लौटने के बाद आशीष ने अपने पिता बनने की खुशी में पूरे गांव में मिठाई बांटी और अपने करीबियों को दावत दी.
मिठाई बांटते हुए वह अपने घर के पास उस घर में गया, जहां उस की जवानी की यादें जुड़ी हुई थीं. यह घर किशनपाल का था.
दरअसल, किशनपाल की 22 वर्षीय बेटी बंटी से आशीष का प्रेम संबंध करीब 7 साल पुराना था. आशीष और बंटी के बीच संबंध को गांव में रहने वाला हर कोई जानता था.
किशनपाल और बंटी की मां को मिठाई दे कर वहां से निकल आया और सोचते हुए अपने घर की ओर चला गया. दरअसल, आशीष पिछले साल उत्तर प्रदेश में हुए प्रधानी के चुनावों में प्रत्याशी के तौर पर खड़ा हुआ था. लेकिन उसे बेहद बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. जिस के बाद उसे गांव में अन्य प्रधान प्रत्याशियों से जान से मारने की धमकी मिली थी.
मामला शांत और ठंडा करने के लिए आशीष के घर वालों ने उसे कुछ दिनों के लिए गांव से बाहर चले जाने की नसीहत दी. उसी दौरान वह नोएडा में एलईडी बल्ब की फैक्ट्री में काम करने लगा था.
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए, लेकिन आशीष के दिलोदिमाग से बंटी हर समय छाई रही. अपनी शादी के 2 साल और 2 बच्चे हो जाने के बाद भी वह 7 साल के अपने प्यार को भुला नहीं पा रहा था. हालांकि आशीष और बंटी दोनों साथ में अपनी जिंदगी गुजारना चाहते थे. लेकिन उन के मांबाप और घर के बाकी सदस्यों को उन का ये संबंध मंजूर नहीं था.
मामला धर्म का नहीं था और न ही जाति का था. बल्कि दोनों एक ही गौत्र से थे, जिस की वजह से दोनों के घर वालों को उन का रिश्ता मंजूर नहीं था.
बंटी से मिल कर बात करने की ख्वाहिश आशीष के दिमाग में इतनी सवार हुई कि उस ने ऐसा करने के लिए सारी हदें पार करने का फैसला कर लिया.
16 सितंबर, 2021 की रात को बिस्तर पर लेटे हुए आशीष ने अपने दिमाग में बंटी से मिलने का प्लान बनाया. उस ने यह तय कर लिया कि वह अपनी बीवी दीपा और अपने बच्चों के साथ नहीं, बल्कि अपनी प्रेमिका बंटी के साथ बाकी की जिंदगी गुजारेगा.
रात के करीब एक बजे आशीष अपने बिस्तर से उठा और दबेपांव अपने घर से बिना किसी को बताए निकल गया. उस के घर से बंटी का घर मात्र 200 मीटर यानी सिर्फ 4-5 मिनट की दूरी पर था. आशीष गली से होते हुए बंटी के घर के नजदीक पहुंचा तो देखा कि उन के घर पर रोशनी फैली हुई थी.
उस ने रास्ता बदला और बंटी के घर के पीछे वाले रास्ते पर जा कर छलांग लगा कर घर के आंगन में जा घुसा. किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई कि घर में कोई घुस आया है.
छिपतेछिपाते सीढि़यों के सहारे दूसरी मंजिल में बंटी के कमरे में जा पहुंचा और दरवाजे के पीछे छिप कर बंटी का इंतजार करने लगा.
इधर बंटी नीचे अपनी मां के साथ रोटियां सेंक रही थी. उस के पिता किशनपाल जल्दी ही खाना खा कर सो गए थे. रात के करीब सवा बज रहे थे. बंटी खाने की प्लेट ले कर अपने कमरे की ओर चल पड़ी.
सीढि़यों से चढ़ते हुए बंटी दूसरी मंजिल पर अपने कमरे का दरवाजा खोल अंदर घुसी और लाइट जलाई तो अपनी आंखों पर उसे भरोसा नहीं हुआ. उस ने देखा कि बिस्तर पर आशीष बैठा हुआ था. लेकिन बंटी ने आशीष को देख कर शोर नहीं मचाया. वह चुप रही और अंदर से कमरे का दरवाजा बंद कर लिया.
आशीष को अपने कमरे में देख आश्चर्यचकित हो कर बंटी धीमी आवाज में फुसफुसाई, ‘‘यहां क्या कर रहे हो तुम? जल्दी यहां से भागो. मेरी मां किसी भी समय यहां आती ही होगी. जल्दी निकलो.’’
बंटी की बात सुन आशीष अपने पंजों के सहारे उस की ओर बढ़ा और उस का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘नहीं, मैं यहां से नहीं जाऊंगा. मैं तुम्हें लेने आया हूं. मैं ने फैसला कर लिया है, मुझे तुम्हारे ही साथ अपनी आगे की पूरी जिंदगी काटनी है.’’
कहते हुए आशीष ने बंटी के हाथों को कस कर पकड़ लिया. बंटी आशीष के हाथों से अपने हाथों को झटके से छुड़ाते हुए बोली, ‘‘यह क्या मजाक है. तुम्हारी बीवी है. 2 बच्चे हैं. तुम इस बारे में अब सोच भी कैसे सकते हो.’’
बंटी की बात सुन कर आशीष कुछ पलों के लिए मौन हो गया. लेकिन अपनी चुप्पी तोड़ते हुए और अपने दोनों हाथों को बंटी के गाल पर लगाते हुए बोला, ‘‘तुम्हें उन के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है. तुम खुद सोचो, हम एकदूसरे से प्यार करते हैं. यह बात पूरे गांव वालों को मालूम है. लेकिन हम घर वालों की वजह से कभी एक नहीं हो पाए. सिर्फ कमबख्त एक गौत्र की वजह से हम दोनों का कभी मिलन नहीं हो पाया. इस बार मैं ने तय कर लिया है कि मैं तुम्हें यहां से अपने साथ ले कर ही जाऊंगा.’’
सुन कर बंटी ने खुद को आशीष से दूर किया और बोली, ‘‘बहुत देर हो चुकी है अब. यह खयाल अपने मन से निकाल दो. और तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए राजी हो जाऊंगी. वो भी तब जब तुम्हारी शादी हो गई, 2 बच्चे भी हो गए. अगर मुझ से प्यार था और ये हिम्मत पहले दिखाई होती तो मैं मान भी जाती.
‘‘हम साथ मिल कर दुनिया से लड़ लेते. अब मैं तुम्हारे साथ रहने के लिए दीपा और तुम्हारे बच्चों की जिंदगी खराब नहीं कर सकती. मुझे माफ कर देना. वैसे भी तुम्हारी शादी के बाद मैं ने खुद को संभाल लिया है. अब मैं भी खुद की एक नई जिंदगी शुरू करना चाहती हूं. बेहतर होगा तुम मुझे भुला दो.’’
लेकिन बंटी के साफ इनकार करने के बाद वह अपने होशोहवास खो बैठा. किसी तरह खुद को संभालते हुए आशीष ने बंटी को समझाने की एक और कोशिश की. लेकिन वह नाकामयाब रहा.
सुबह के करीब 6 बजे नौगवां नरोत्तम गांव के लोग अपने बिस्तर से उठे ही थे और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो ही रहे थे कि अचानक गांव वालों ने गांव के सब से बड़े पीपल के पेड़ के नीचे कुछ ऐसा देखा, जिस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.
लोग उस पेड़ के नीचे सुबहसुबह पूजा करने के लिए जब पहुंचे तो उन्होंने वहां आशीष के शव को पड़ा देखा. आशीष के करीबी लोगों में से सुरेश ने भी आशीष के शव को जब देखा तो वह भाग कर उस के पिता सुखपाल सिंह को बुलाने पहुंचा.
सुबह के सवा 6 बजे सुखपाल सिंह खेतों की तरफ से घर की ओर आ ही रहे थे तो सुरेश हांफते हुए उन से बोला, ‘‘काका, पीपल के पेड़ पर. जल्दी चलो.’’
सुखपाल भीड़ को हुए आशीष के शव के सामने जा कर खड़े हो गए. आशीष की लाश जमीन पर चित्त पड़ी थी. उस के सीने में दिल की ओर गोली लगी थी. अपने जवान बेटे का शव जमीन पर पड़ा देख सुखपाल के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई थी. वह चीखचीख कर आशीष का नाम ले कर रोनेपीटने लगे. इतने में पेड़ के पास किशनपाल के घर से भी रोने और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. गांव वालों को समझ नहीं आया कि आखिर हुआ तो हुआ क्या.
जब गांव के लोग किशनपाल के घर पता करने पहुंचे तो पता चला कि दूसरी मंजिल पर उस की बेटी बंटी की लाश उस के कमरे में पड़ी थी. बंटी के शरीर पर भी ठीक उसी जगह पर गोली लगी थी, जहां आशीष को लगी थी. सीने पर, दिल के पास.
दोनों मौतों की यह खबर पूरे गांव में तो क्या आसपास लगभग सभी गांवों में आग की तरह फैल गई कि फलां गांव में एक ही दिन में 2 लोगों को गोली लगी, वह भी एक ही जगह पर.
सुबह के साढ़े 7 बजे गडि़यारंगीन पुलिस मौकाएवारदात पर पहुंच गई. क्योंकि मामला बेहद संगीन था और इलाके में तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी, गडि़यारंगीन थानाप्रभारी सुंदरलाल ने आसपास के इलाकों की पुलिस टीम को सूचित कर जल्द से जल्द घटनास्थल पर बुला लिया.
सूचना मिलते ही जैतीपुर, कटरा और तिलहर पुलिस थाने से फोर्स जल्द से जल्द घटनास्थल पर पहुंच गई. देखते ही देखते घटनास्थल छावनी में बदल गया.
थानाप्रभारी सुंदरलाल, सीओ परमानंद पांडेय और एएसपी (ग्रामीण) संजीव कुमार वाजपेयी ने दोनों परिवारों से अलगअलग पूछताछ की.
एक तरफ आशीष के पिता सुखपाल ने अपने बेटे की मौत का जिम्मेदार किशनपाल और उस के घर वालों को बताया तो दूसरी तरफ किशनपाल ने अपनी बेटी की मौत का जिम्मेदार सुखपाल और उस के घर वालों को बताया.
एक तरफ आशीष और बंटी दोनों के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया तो वहीं फोरैंसिक टीम बारीकी से साक्ष्य जुटाने में व्यस्त हो गई.आशीष के शव के पास से टीम ने गोली का एक खोखा और एक जीवित गोली भी बरामद की. लेकिन उन्हें कहीं भी पिस्तौल नहीं मिली.
टैक्निकल टीम ने आशीष के फोन की अंतिम लोकेशन का पता लगाया तो पुलिस को यह जान कर हैरानी हुई कि आशीष की अंतिम लोकेशन बंटी के घर की ही मिली थी. ऐसे में पुलिस के शक की सुई किशनपाल और उस के परिवार की ओर घूम गई.
जब दोनों के बारे में आसपड़ोस के लोगों से पूछताछ हुई तो पता चला दोनों आशीष और बंटी एकदूसरे से प्यार करते थे और एक गौत्र से होने की वजह से उन की शादी नहीं हो पाई थी.
ऐसे में पुलिस को यह मामला औनर किलिंग का लगा. लेकिन पुलिस सभी साक्ष्य जुटाने के बाद और सभी एंगल से मामले की छानबीन कर किसी नतीजे पर पहुंचना चाहती थी. ऐसी स्थिति में पुलिस ने किशनपाल और सुखपाल दोनों ही परिवारों से सख्ती से पूछताछ की.
करीब एक हफ्ते की कमरतोड़ मेहनत के बाद पुलिस ने किशनपाल को हिरासत में लेते हुए सख्ती से पूछताछ की. उस ने पुलिस के सामने सारा सच उगल दिया.
उस ने बताया कि जिस रात आशीष उस की बेटी बंटी से मिलने के लिए उस के घर आया था, उस रात को बंटी की मां नीचे खाना खा रही थी. तभी करीब रात के 2 बजे बंटी की मां को ऊपर जोर से कुछ गिरने की आवाज आई. उसे ऐसा लगा जैसे बंटी ने ऊपर अपने कमरे में कुछ गिरा दिया हो.
अपना खाना खत्म कर के बंटी की मां दूसरी मंजिल पर बंटी के कमरे में पहुंची और दरवाजा खोला तो कमरे का नजारा देख उस के होश उड़ गए थे. कमरे में बंटी और आशीष की लाशें पड़ी थीं.
यह देख कर बंटी की मां दौड़ कर नीचे किशनपाल के पास भाग कर आई और रोतेकुलबुलाते हुए उस ने दूसरी मंजिल पर जाने के लिए कहा. किशनपाल बिस्तर से उठ कर दूसरी मंजिल पर बंटी के कमरे में घुसा तो उस का भी वही हाल हुआ जो उस की पत्नी का हुआ था. किशनपाल अपनी बेटी का शव देख कर बुरी तरह से घबरा गया.
काफी देर तक अपने बेटी के शव के पास बैठे रह कर रोनेबिलखने के बाद उस ने अपना होश संभाला और इस मामले में वह और उस का परिवार न फंस जाए, इस डर से उस ने आशीष के शव को अपने कंधों पर उठा कर अपने घर से बाहर पीपल के पेड़ के नीचे डाल आया. और उसी दौरान किशनपाल ने आशीष के शव के पास पड़ी पिस्तौल भी उठा ली.
उस ने आशीष के शव को पेड़ के नीचे रखने के बाद अपना खून से पूरी तरह सना अपना कुरता और पिस्तौल अपने ही घर में दबा दिया ताकि कोई उसे ढूंढ न सके. वह गोली का एक खोखा और एक जीवित गोली लाश के पास ही डाल आया.
दरअसल, आशीष पूरी प्लानिंग के तहत उस रात बंटी को भगाने के उद्देश्य से उस के घर चुपके से पहुंचा था. अपने घर से निकलते समय वह अपने दोस्त से मिला और उस ने अपनी सुरक्षा के नाम पर उस की लोडेड पिस्तौल ले ली.
वह किसी और को इस काम में शामिल नहीं करना चाहता था, इसलिए वह अकेले ही बंटी के घर पर पहुंचा था. प्यार से समझानेबुझाने के बाद जब आशीष को यह यकीन हो गया कि उस की प्रेमिका उस के साथ नहीं रहना चाहती तो उस ने उसे एक और आखिरी मौका दिया.
वह बंटी से बोला, ‘‘बंटी, तुम्हें हमारे प्यार की कसम. तुम एक बार हां तो करो, फिर देखना हम पूरी दुनिया से लड़ जाएंगे. आखिरी बार सोच लो एक और बार.’’
इस पर बंटी ने उसे तुरंत जवाब दिया, ‘‘मैं ने सोच लिया है. मैं तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाने वाली. तुम ने तो अपनी जिंदगी जी ली है. अपने बीवीबच्चों के साथ हंसीखुशी जी रहे हो. तुम्हारे साथ भाग कर मुझे किसी की बददुआ नहीं चाहिए. घर वालों से जब लड़ने का मौका था, तब तुम से कुछ हुआ नहीं. लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है. यही मेरा आखिरी फैसला है.’’
बंटी के ये सब कहने के बाद आशीष के मन को गहरा सदमा लगा. उस ने आव देखा न ताव, अपनी जेब में रखी पिस्तौल निकाली और बंटी के सीने पर गोली चला दी. इस से पहले कि बंटी को कुछ एहसास होता, गोली उस की छाती चीरते हुए उस के दिल को भेदते हुए अंदर दाखिल हो चुकी थी.
बंटी को गोली मारने के बाद आशीष को अचानक होश आया. उसे खुद पर बिलकुल यकीन ही नहीं हुआ, आखिर उस ने ये क्या कर दिया. उस के बाद उस ने बिना कुछ सोचेसमझे ठीक जिस तरह से उस ने बंटी को मारी थी, खुद की छाती पर भी गोली चला दी.
ये हत्या तो थी ही साथ ही आत्महत्या भी थी. यदि दोनों के घर वाले उन के रिश्ते को मंजूरी दे देते तो शायद दोनों आज भी जिंदा होते और एक अच्छी जिंदगी गुजारते.
बंटी के पिता किशनपाल ने बेशक दोनों में से किसी की भी जान न ली हो लेकिन पुलिस ने किशनपाल को वास्तविकता छिपाने, मनगढ़ंत साक्ष्य पैदा करने, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने इत्यादि का आरोप लगाते हुए हिरासत में ले लिया.
किशनपाल को हिरासत में ले कर उस की निशानदेही पर पुलिस ने उसी के घर से रक्तरंजित कुरता और पिस्तौल भी बरामद कर ली. पुलिस ने किशनपाल को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
“मतलब?”
“मतलब हम चाइनीज तरीके से भी शादी करें और इंडियन तरीके से भी.”
“ऐसा कैसे होगा रिद्धिमा?”
“आराम से हो जाएगा. देखो हमारे यहां यह रिवाज है कि दूल्हा बारात ले कर दुलहन के घर आता है. सो तुम अपने खास रिश्तेदारों के साथ इंडिया आ जाना. इस के बाद हम पहले भारतीय रीतिरिवाजों को निभाते हुए शादी कर लेंगे उस के बाद अगले दिन हम चाइनीज रिवाजों को निभाएंगे. तुम बताओ कि चाइनीज वैडिंग की खास रस्में क्या हैं जिन के बगैर शादी अधूरी रहती है?”
“सब से पहले तो बता दूं कि हमारे यहां एक सैरिमनी होती है जिस में कुछ खास लोगों की उपस्थिति में कोर्ट हाउस या गवर्नमैंट औफिस में लड़केलड़की को कानूनी तौर पर पतिपत्नी का दरजा मिलता है. कागजी काररवाई होती है.”
“ठीक है, यह सैरिमनी तो हम अभी निबटा लेंगे. इस के अलावा बताओ और क्या होता है?”
“इस के अलावा टी सैरिमनी चाइनीज वैडिंग का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. इसे चाइनीज में जिंग चा कहा जाता है जिस का अर्थ है आदर के साथ चाय औफर करना. इस के तहत दूल्हादुलहन एकदूसरे के परिवार के प्रति आदर प्रकट करते हुए पहले पेरैंट्स को, फिर ग्रैंड पेरैंट्स को और फिर दूसरे रिश्तेदारों को चाय सर्व करते हैं. बदले में रिश्तेदार उन्हें आशीर्वाद और तोहफे देते हैं.”
“वह तो ठीक है इत्सिंग, पर इस मौके पर चाय ही क्यों?”
“इस के पीछे भी एक लौजिक है.”
“अच्छा वह क्या?” मैं ने उत्सुकता के साथ पूछा.
“देखो, यह तो तुम जानती ही होगी कि चाय के पेड़ को हम कहीं भी ट्रांसप्लांट नहीं कर सकते. चाय का पेड़ केवल बीजों के जरीए ही बढ़ता है. इसलिए इसे विश्वास, प्यार और खुशहाल परिवार का प्रतीक माना जाता है.”
“गुड,” कह कर मैं मुसकरा उठी. मुझे इत्सिंग से चाइनीज वैडिंग की बातें सुनने में बहुत मजा आ रहा था.
मैं ने उस से फिर पूछा,” इस के अलावा और कोई रोचक रस्म?”
“हां, एक और रोचक रस्म है और वह है गेटक्रशिंग सैशन. इसे डोर गेम भी कह सकती हो. इस में दुलहन की सहेलियां तरहतरह के मनोरंजक खेलों के द्वारा दूल्हे का टैस्ट लेती हैं और जब तक दूल्हा पास नहीं हो जाता वह दुलहन के करीब नहीं जा सकता.”
इस रिवाज के बारे में सुन कर मुझे हंसी आ गई. मैं ने हंसते हुए कहा,”थोड़ीथोड़ी यह रस्म हमारे यहां की जूता छुपाई रस्म से मिलतीजुलती है.”
“अच्छा वही रस्म न जिस में दूल्हे का जूता छिपा दिया जाता है और फिर दुलहन की बहनों द्वारा रिश्वत मांगी जाती है? ”
मैं ने हंसते हुए जवाब दिया,”हां, यही समझ लो. वैसे लगता है तुम्हें भी हमारी रस्मों के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी है.”
“बिलकुल मैडम जी, यह गुलाम अब आप का जो बनने वाला है.”
उस की इस बात पर हम दोनों हंस पड़े.
“तो चलो यह पक्का रहा कि हम न तुम्हारे पेरैंट्स को निराश करेंगे और न मेरे पेरैंट्स को,” मैं ने कहा.
“बिलकुल.”
और फिर वह दिन भी आ गया जब दिल्ली के करोलबाग स्थित मेरे घर में जोरशोर से शहनाइयां बज रही थीं. हम ने संक्षेप में मगर पूरे रस्मोरिवाजों के साथ पहले इंडियन स्टाइल में शादी संपन्न की जिस में मैं ने मैरून कलर की खूबसूरत लहंगाचोली पहनी. इत्सिंग ने सुनहरे काम से सजी हलके नीले रंग की बनारसी शाही शेरवानी पहनी थी जिस में वह बहुत जंच रहा था. उस ने जिद कर के पगड़ी भी बांधी थी. उसे देख कर मेरी मां निहाल हो रही थीं.
अगले दिन हम ने चीनी तरीके से शादी की रस्में निभाई. मैं ने चीनी दुल्हन के अनुरूप खास लाल ड्रैस पहनी जिसे वहां किपाओ कहा जाता है. चेहरे पर लाल कपड़े का आवरण था. चीन में लाल रंग को खुशी, समृद्धि और बेहतर जीवन का प्रतीक माना जाता है. इसी वजह से दुलहन की ड्रैस का रंग लाल होता है.
सुबह में गेटक्रैशिंग सेशन और टी सैरिमनी के बाद दोपहर में शानदार डिनर रिसैप्शन का आयोजन किया गया. दोनों परिवारों के लोग इस शादी से बहुत खुश थे. इस शादी को सफल बनाने में हमारे रिश्तेदारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी. दोनों ही तरफ के रिश्तेदारों को एकदूसरे की संस्कृति और रिवाजों के बारे में जानने का सुंदर अवसर भी मिला था.
इसी के साथ मैं ने और इत्सिंग ने नए जीवन की शुरुआत की. हमारे प्यारे से संसार में 2 फूल खिले. बेटा मा लोंग और बेटी रवीना. हम ने अपने बच्चों को इंडियन और चाइनीज दोनों ही कल्चर सिखाए थे.
आज दीवाली थी. हम बीजिंग में थे मगर इत्सिंग और मा लोंग ने कुरतापजामा और रवीना ने लहंगाचोली पहनी हुई थी.
व्हाट्सएप वीडियो काल पर मेरे मम्मीपापा थे और बच्चों से बातें करते हुए बारबार उन की आंखें खुशी से भीग रही थीं.
सच तो यह है कि हमारा परिवार न तो चाइनीज है और न ही इंडियन. मेरे बच्चे एक तरफ पिंगपोंग खेलते हैं तो दूसरी तरफ क्रिकेट के भी दीवाने हैं. वे नूडल्स भी खाते हैं और आलू के पराठों के भी मजे लेते हैं. वे होलीदीवाली भी मनाते हैं और त्वान वू या मिड औटम फैस्टिवल का भी मजा लेते हैं. हर बंधन से परे यह तो बस एक खुशहाल परिवार है. यह एक जहान है प्यार भरा.
Writer —सुरेशचंद्र रोहरा
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का एक छोटा सा नगर है अभनपुर. यहां अशोक कुमार साहू वार्ड
नंबर 15, बड़े उरला में अपने छोटे से परिवार के साथ रहते थे. वह 31 जुलाई, 2021 सुबह घर के निकट स्थित एटीएम में जा कर कुछ पैसे निकालने लगे. और जब उन के हाथ में परची आई तो वह दंग रह गए. उन्होंने देखा कि उन के अकाउंट में लगभग 65 लाख रुपए की रकम की जगह सिर्फ एक लाख रुपए ही शेष बचे हुए हैं.
उन्होंने परची को फिर गौर से देखा और घबरा कर इधरउधर देखने लगे. उन के हिसाब से उन के भारतीय स्टेट बैंक अभनपुर के अकाउंट में लगभग 65 लाख रुपए की रकम होनी चाहिए थी मगर परची में तो एक लाख बैलेंस दिखा रहा था. वह पसीनापसीना हो गए. जल्दीजल्दी घर पहुंचे और छोटे बेटे राजेश को आवाज दी, ‘‘बेटा आओ, देखो तो यह क्या है?’’
उन का बड़ा बेटा किशोर साहू का हाल ही में कोरोना से संक्रमित हो कर निधन हो गया था. अब पतिपत्नी और बेटे राजेश व उस की पत्नी और एक बच्चा ही उन का परिवार था. राजेश ने पिता की आवाज सुनी तो पास आ गया और पूछा, ‘‘क्या हो गया है पापा?’’
घबराए पसीने से लथपथ अशोक कुमार साहू ने परची बेटे राजेश को देते हुए कहा, ‘‘बेटा, देखो. बैंक में कुछ गड़बड़ हो गई है, देखो, इस में तो एक लाख रुपए के आसपास ही बैलेंस बता रहा है, लगता है हम बरबाद हो गए.’’
राजेश ने परची को गौर से देखा तो वह भी आश्चर्यचकित रह गया. मगर उस ने पिता को धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘कभीकभी बैंक में कोई गलती हो जाती है, मैं बैंक जा कर के पता कर आता हूं कि मामला क्या है.’’
‘‘हांहां बेटा, तुम चले जाओ. बल्कि रुको, मैं भी साथ चलता हूं. मुझे जब तक इस का सच पता नहीं चलेगा, मुझे चैन ही नहीं आएगा, चलो मैं चलता हूं.’’
राजेश साहू अपने पिता अशोक कुमार साहू जोकि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल में पर्यवेक्षक औडिटर के रूप में लगभग 40 साल की नौकरी के बाद हाल ही में रिटायर हुए थे को ले कर के स्टेट बैंक औफ इंडिया की शाखा मेन रोड अभनपुर की ओर बढ़ चला. राजेश ने देखा पिता अभी भी बहुत घबराए हुए हैं. उस ने पिता को आश्वस्त किया, मगर अशोक कुमार साहू का पूरा ध्यान अपने बैंक अकाउंट को ले कर के चिंता में था.
वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि इतने सारे रुपए होने के बाद जोकि सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने इसी अकाउंट में जमा करवा रखे थे, कहां गायब हो गए.
राजेश पिता के साथ जब बैंक पहुंचा और वहां बैंक मैनेजर से मिल कर एटीएम से निकली परची दिखा कर के बैंक बैलेंस की जानकारी ली, जवाब सुन कर तो मानो अशोक कुमार साहू और राजेश साहू को काठ मार गया.
मैनेजर एस.के. शर्मा ने उन्हें बताया कि आप के अकाउंट में अब लगभग एक लाख रुपए की राशि शेष है और लगभग 2 माह पहले 64 लाख रुपए से अधिक की राशि आप के एकाउंट में थी. इस बीच लगातार 2 लाख रुपए से ले कर के 50 हजार रुपए की राशि तक 25 दफा अलगअलग तारीखों को औनलाइन निकाली गई है.
उन्होंने राजेश साहू को स्टेटमेंट निकाल कर के हाथ में थमा दिया, जिस के अनुसार 63,33,439 रुपए उन के एकाउंट से छूमंतर हो चुके थे.
यह सब देखसमझ कर राजेश साहू हतप्रभ रह गया, वहीं अशोक कुमार साहू सिर पकड़ कर बैठ गए और रोआंसा हो कर के बैंक मैनेजर से बोले, ‘‘सर, हम ने कोई भी रुपया का लेनदेन नहीं किया है, मेरे अकाउंट से लाखों रुपए पता नहीं किस ने निकाल लिया है, मैं तो बरबाद हो गया. आप इस पर कुछ काररवाई करिए.’’
इस पर स्टेट बैंक मैनेजर ने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘‘अगर आप को लगता है कि आप के साथ किसी ने गलत तरीके से बैंक से पैसे निकलवा लिए हैं तो अब आप के सामने एक ही विकल्प बचता है, आप हमें एक पत्र लिख कर दे दीजिए. और आज ही पुलिस में जा कर के अपनी कंप्लेंट करिए.’’
इस पर अशोक कुमार साहू भड़क गए और चिल्ला कर के कहने लगे, ‘‘यह कैसा बैंक है और कैसी व्यवस्था है. हम ने भी 40 साल विद्युत मंडल में नौकरी की है, मैं औडिटर था, मगर एक रुपए भी इधरउधर कभी नहीं होता था. और आज बैंक में मेरे लाखों रुपए किसी ने निकाल लिए और मुझे खबर भी नहीं हुई.’’
भारतीय स्टेट बैंक मैनेजर शर्मा ने उन्हें शांत करते हुए बैठाया पानी पिलाया और विनम्रतापूर्वक कहा, ‘‘साहूजी, अब जो हो गया, उस का रोना छोड़ कर आगे की सुध लीजिए.
आप चिंता बिल्कुल मत करिए अगर आप ने पैसे नहीं निकाले हैं तो आप के सारे पैसे यह समझिए कि सुरक्षित बैंक में रखे हुए हैं और जो भी कहीं चूक या गलती हुई है अथवा फ्रौड हुआ है तो पुलिस उन को पकड़ कर जेल में डाल देगी. आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए.’’
सुन कर के अशोक कुमार साहू को ढांढस बंधाया और वे बेटे राजेश के साथ थाना अभनपुर पहुंचे, जहां अपने कक्ष में इंसपेक्टर बोधन साहू प्रतिदिन का कार्य संपादित कर रहे थे.
अशोक कुमार साहू और राजेश ने उन के कक्ष में अनुमति ले कर प्रवेश किया और सामने की कुरसियों पर बैठ गए. बोधन साहू ने बुजुर्गवार अशोक कुमार साहू की ओर देखा और कहा, ‘‘बताइए, आप लोगों का कैसे आना हुआ है?’’
इस पर राजेश साहू ने कहा, ‘‘सर, मेरा नाम राजेश कुमार साहू है और यह मेरे पिता अशोक कुमार साहू हैं जोकि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल में औडिटर के पद पर कार्यरत थे. मार्च 2021 में आप रिटायर हुए हैं. सेवानिवृत्ति के बाद लगभग 65 लाख रुपए स्टेट बैंक की स्थानीय शाखा में इन्होंने जमा किए थे, जो अचानक गायब हो गए हैं. हम लोग अभी बैंक मैनेजर से भी मिले हैं और वहां अपनी कंप्लेंट लिखवाई है, हम आप के पास भी कंप्लेंट के लिए आए हुए हैं.’’
63 लाख रुपए के बड़ी रकम की ठगी की बात सुन कर के बोधन साहू के कान खड़े हो गए. उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए अशोक कुमार साहू से कहा, ‘‘आप लोग सारी घटना एक कागज पर लिख कर के दीजिए. मैं एफआईआर दर्ज करवाता हूं. आप लोग निश्चिंत रहें. जल्द से जल्द आप अपराधियों को जेल की हवा खाते देखेंगे.’’
राजेश ने नगर निरीक्षक बोधन साहू के कक्ष में बैठेबैठे ही एक तहरीर लिखी और अपनी सारी स्थिति को अवगत कराते हुए पुलिस अधिकारियों से यह आग्रह किया कि इस मामले पर संज्ञान लिया जाए और अपराधियों को पकड़ लिया जाए.
अभनपुर थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद बोधन साहू ने अपने उच्च अधिकारी एडिशनल एसपी लखन पटले से बातचीत कर के उन्हें साइबर क्राइम की इस संपूर्ण घटना से अवगत कराया.
63 लाख रुपए गायब होने की खबर सुन कर लखन पटले ने उन्हें निर्देश दिया कि मामला अभनपुर पुलिस और साइबर क्राइम शाखा के साथ मिल कर के डिटेक्ट करें और बीचबीच में मेरे समक्ष प्रोग्रेस रिपोर्ट प्रस्तुत करें.
रायपुर पुलिस के एसएसपी अजय यादव ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अभनपुर थाने के जांच अधिकारी बोधन साहू और साइबर क्राइम शाखा के वीरेंद्र चंद्रा को इस मामले की जांच का प्रभार देते हुए 12 सदस्यीय टीम बनाई, जिसे इस मामले को जल्द से जल्द हल करने का आदेश दिया गया.
अशोक कुमार साहू ने पुलिस को बताया कि 31 मार्च, 2021 को छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के परीक्षण पर्यवेक्षक पद से रिटायर हुआ हूं. इसी दरमियान अप्रैल में बड़े बेटे किशोर कुमार साहू की अचानक मृत्यु हो गई. इसी अवसाद के समय में उन के पास एक काल आई थी, जिस के बाद से उन के साथ यह ठगी का कारनामा अंजाम दिया गया है.
अशोक कुमार साहू ने बताया कि 17 जून को एक अज्ञात व्यक्ति का काल आया. उस ने कहा, ‘‘हैलो, क्या आप अशोक साहू बोल रहे हैं?’’
अशोक कुमार साहू ने कहा, ‘‘जी हां, मैं अशोक कुमार ही बोल रहा हूं.’’
दूसरी तरफ से कहा गया, ‘‘मैं भारतीय स्टेट बैंक अभनपुर से फूल दास बोल रहा हूं. सर, आप के बेटे किशोर साहू की मृत्यु हो गई है. आप के बेटे की कोरोना से हुई मृत्यु के कारण भारत सरकार की योजना अंतर्गत 5 लाख रुपए मिलेंगे.’’
यह सुन कर अशोक कुमार साहू खुश हो गए. बोले, ‘‘ऐसा है तो बताइए, मैं यह रकम कैसे पा सकता हूं? बैंक आ जाऊं?’’
‘‘नहींनहीं, आप को बैंक आने की अभी जरूरत नहीं है, यहां तो बहुत भीड़ रहती है जब समय आएगा हम आप को स्वयं बुला लेंगे. अब तो मोबाइल में बड़ी सुविधा है, बात भी हो सकती है. और ओटीपी भी हम पूछ सकते हैं. इसलिए आप घर में आराम से रहें, वैसे भी कोरोना वायरस चल रहा है.’’
यह सुनकर के अशोक कुमार साहू को महसूस हुआ कि फूल दास सही कह रहा है अभी करोना काल में कहीं भी बाहर जाना उचित नहीं है. और जब घर बैठे काम हो रहा है तो भला घर से क्यों निकलूं.
फूल दास ने बड़े ही मधुर आवाज में कहा, ‘‘साहूजी आप बहुत सज्जन आदमी लगते हैं क्या करते हैं आप?’’
‘‘मैं अब तो रिटायर हो गया हूं. वैसे विद्युत मंडल में मैं औडिटर हुआ करता था.’’ उन्होंने बड़े गर्व के साथ बताया.
‘‘अरे वाह! आप तो बहुत ही पढ़ेलिखे सम्मानित व्यक्ति नजर आते हैं, औडिटर का पद तो बहुत ही सम्मान का है. यह सुन कर के हमारी निगाह में आप का सम्मान और भी बढ़ गया है हमारे लिए आप रेस्पेक्टेड परसन हैं.’’
इस तरह की मीठी बातें कर के फूल दास ने अशोक कुमार साहू को अपने शीशे में उतार लिया. और बातोंबातों में ओटीपी नंबर भी ले लिया.
फूल दास ने अशोक कुमार साहू से कहा कि बहुत जल्द आप को अपने अकाउंट में 5 लाख रुपए घर बैठे ही अकाउंट में मिल जाएंगे, यह मेरी जिम्मेदारी है. बस आप, मैं जैसे ही काल करूं, आप फोन रिसीव कर लिया करें.’’
अशोक कुमार साहू ने उस की बात से सहमति व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘हां, आप हमें सहयोग करते रहें.’’
अशोक कुमार साहू के बेटे किशोर साहू की कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई थी, स्वयं भी बुजुर्ग हो गए थे और कुछ दिनों बाद कोरोना पौजिटिव हो गए थे. इस बीच लगातार काल आता, वह बात करते और ओटीपी बता दिया करते. फूल दास आश्वस्त करता, शीघ्र ही आप के खाते में 5 लाख रुपए आ जाएंगे.
इस बीच अशोक कुमार साहू कोरोना कोविड-19 से लंबे समय तक परेशान रहे और उन का सब कुछ अस्तव्यस्त हो गया. इधर देखते ही देखते उन के खाते से छोटीछोटी रकम कर के लाखों रुपए ट्रांसफर कर दिए गए. जिस की उन को भनक तक नहीं लगी.
साइबर ठगी के इस मामले में बी.एम. साहू और वीरेंद्र चंद्रा की टीम ने जब जांच को आगे बढ़ाई तो उन्हें यह जान कर बहुत आश्चर्य हुआ कि जो पैसे अशोक कुमार साहू के अकाउंट से निकाले गए थे, वे दूसरे अकाउंट से तीसरे फिर चौथे फिर पांचवें से छठवें अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए गए थे.
उन्हें यह समझते देर नहीं लगी थी कि उन का ट्रांजैक्शन साइबर क्राइम के शातिर ठगों ने किया है. जांच में यह तथ्य भी सामने आता चला गया कि सारी ठगी का खेल जामताड़ा, झारखंड से चलता रहा है.
पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर 12 साइबर क्राइम एक्सपर्ट और पुलिस अधिकारियों की एक टीम आरोपियों को पकड़ने के लिए जामताड़ा के लिए 8 अगस्त, 2021 को रायपुर से रवाना हुई.
जामताड़ा के एसपी कार्यालय में आमद देने के बाद बी.एम. साहू ने जिले के उच्च अधिकारियों को लाखों रुपए के साइबर क्राइम की जानकारी दी और आरोपियों तक पहुंचने के लिए सहयोग की गुजारिश की तो पुलिस अधिकारियों ने अपनी एक टीम बना कर के उन के साथ लगा दी.
पुलिस टीम ने जब जांच आगे बढ़ाई तो यह तथ्य सामने आया कि जामताड़ा के नारायणपुर मौलीडीह गांव के फूल दास, अशोक दास, दुलाल दास इन 3 लोगों का हाथ है.
पुलिस ने इन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछाया, मगर वे लोग गायब हो जाते थे. उन के रहनसहन को देख कर के जांच अधिकारी बी.एम. साहू, वीरेंद्र चंद्रा और टीम के सदस्य आश्चर्यचकित थे.
इन में फूल दास और दुलाल दास दोनों सगे भाई हैं जिन्हें उन के भव्य आवास से आखिरकार 10 अगस्त की रात हिरासत में ले लिया गया. उसी रात अशोक दास को भी झारखंड पुलिस की मदद से हिरासत में ले लिया गया.
इस तरह अंतत: बड़ी मशक्कत के बाद तीनों कथित आरोपियों को ले कर के छत्तीसगढ़ पुलिस जिला जामताड़ा से रायपुर, छत्तीसगढ़ के लिए रवाना हुई.
छत्तीसगढ़ प्रदेश की सब से बड़ी साइबर ठगी के इस मामले में सब से महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस ठगी में 221 सिम कार्ड आरोपियों ने इस्तेमाल किए, जोकि पश्चिम बंगाल से लाए गए थे.
वहीं एक सब से बड़ी कमी भारतीय स्टेट बैंक की भी उजागर हो गई. जबजब पैसे अशोक कुमार साहू के अकाउंट से ट्रांसफर हुए तो उन के अकाउंट में आखिरकार पैसे ट्रांसफर की सूचना का मैसेज क्यों नहीं आया.
कहां गड़बड़ हुई. पुलिस के लिए यह भी जांच का विषय हो गया कि क्या बैंक का कोई कर्मचारी इस मामले में संलिप्त तो नहीं है.
अभनपुर जिला रायपुर की पुलिस ने 11 अगस्त को रायपुर में एक प्रैस कौन्फ्रैंस करते हुए मीडिया के समक्ष केस का खुलासा किया. एडिशनल एसपी लखन पटले ने मीडिया से रूबरू हो कर बताया कि 63,33,439 रुपए के बड़े ठगी के चैलेंजिंग मामले में पुलिस को किस तरह सफलता हासिल की है और आरोपियों को शीघ्र ही न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा.
पुलिस ने आरोपियों का इकबालिया बयान दर्ज किया है, जिस में उन्होंने बताया है कि किस तरह वे लोगों को भरमा कर के मीठी बातें करते थे. अपना संबंध बनाने के बाद उन्हें लालच देते हुए लाखों रुपए अकाउंट में भिजवाने की बात कहते थे और ओटीपी ले लिया करते थे. और दूसरी तरफ अपने अकाउंट से पैसे ट्रांसफर कर लिया करते थे.
पुलिस ने धारा 420,120बी भादंवि के तहत 11 अगस्त 2021 को तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर के रिमांड पर लिया.
महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि ठगी के शिकार अशोक कुमार साहू को इस कथा के लिखे जाने तक एक रुपए भी वापस नहीं मिला था, क्योंकि यह एक लंबी प्रक्रिया है. आरोपियों के पास से सिर्फ लगभग 30 हजार रुपए ही बरामद हुए हैं.
अब सवाल यह है कि 63 लाख रुपए की बड़ी रकम आखिर अशोक कुमार साहू को किस तरह मिल पाएगी और मिल भी पाएगी या फिर कानून की लंबी लड़ाई और इंतजार में वे परेशान हलकान रहेंगे.
मगर, अशोक कुमार साहू और उन के बेटे राजेश साहू को यह संतोष है कि उन के साथ ठगी करने वाले आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ गए और एक न एक दिन, उन्हें उन का पैसा मिलेगा.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में बैंक मैनेजर का नाम काल्पनिक है.
Dr. Kshama Chaturvedi
‘‘मां, क्या इस शनिवार भी पिताजी नहीं आएंगे?’’ अंजू ने मुझ से तीसरी बार पूछा था. मैं खुद समझ नहीं पा रही थी. अभय का न तो पिछले कुछ दिनों से फोन ही आया था, न कोई खबर. सोचने लगी कि क्या होता जा रहा है उन्हें. पहले तो कितने नियमित थे. हर शनिवार को हम लोग उन के पास चले जाते थे 2 दिन के लिए और अगले शनिवार को उन्हें आना होता था. सालों से यह क्रम चला आ रहा था, पर पिछले 2 महीनों से उन का आना हो ही नहीं पाया था. बच्चियों के इम्तिहान करीब थे, इसलिए उन्हें भी ले जाना संभव नहीं था. मैं ही 2 बार हो आई थी, पर क्या अभय को बच्चियों की भी याद नहीं आती होगी?
‘‘मां, पिताजी तो इस बार मेरे जन्मदिन पर भी आना भूल गए…’’ मंजू ने रोंआसे स्वर में कहा था.
‘‘हां…और क्या…इस बार वह आएंगे न तो मैं उन से कुट्टी कर लूंगी…मैं नहीं जाऊंगी कहीं भी उन की कार में घूमने…’’
‘‘अरे, पहले पिताजी आएं तो सही…’’ अंजू ने मंजू को चिढ़ाते हुए कहा था.
‘‘ऐसा करते हैं, शाम तक उन का इंतजार कर लेते हैं, नहीं तो फिर मैं ही सुबह की बस से चली जाऊंगी…आया रह लेगी तुम लोगों के पास…क्या पता, उन की तबीयत ही ठीक न हो या फिर दादीजी बीमार हों,’’ मैं आशंकाओं में घिरती जा रही थी. रात को ठीक से नींद भी नहीं आ पाई थी. मन देर तक उधेड़बुन में ही लगा रहा. अगर बीमार थे या कोई और बात थी तो खबर तो भेज ही सकते थे. यों अहमदाबाद से आबूरोड इतना अधिक दूर भी तो नहीं है. फिर इतने सालों से आतेजाते तो यह दूरी और भी कम लगने लगी है.
इन गरमियों में हमारी शादी को पूरे 9 वर्ष हो जाएंगे. मुझे आज भी याद है वह घटना जब अभय से मेरी गृहस्थी से संबंधित बातचीत हुई थी. शुरूशुरू में जब मुझे अहमदाबाद में नौकरी मिली थी तब मैं कितना घबराई थी, ‘तुम राजस्थान में हो…हम लोग एक जगह तबादला भी नहीं करवा पाएंगे.’
‘तो क्या हुआ…मैं हर हफ्ते आता रहूंगा,’ अभय ने समझाया था.
समय अपनी गति से गुजरता रहा.
अभय को अभी 2 छोटी बहनों की शादी करनी थी. पिता का देहांत हो चुका था. बैंक में मात्र क्लर्क की ही तो नौकरी थी उन की. मेरा अचानक ही कालेज में व्याख्याता पद पर चयन हो गया था. यह अभय की ही हिम्मत और प्रेरणा थी कि मैं यहां अलग फ्लैट ले कर बच्चियों के साथ रह पाई थी. छोटी ननद भी तब मेरे साथ ही आ गई थी. यहीं से कोई कोर्स करना चाहती थी. अलग रहते हुए भी मुझे कभी लगा नहीं था कि मैं अभय से दूर हूं. वह अकसर दफ्तर से कालेज फोन कर लेते. शनिवार, इतवार को हम लोग मिल ही लेते थे.
घर की आर्थिक दशा भी धीरेधीरे सुधरने लगी थी. बड़ी ननद का धूमधाम से विवाह कर दिया था. फिर पिछले साल छोटी भी ब्याह कर ससुराल चली गई. कुछ समय बाद अभय की भी पदोन्नति हो गई थी. महीने पहले ही आबूरोड में बैंक मैनेजर हो कर आए थे. नई कार ले ली थी, पर अब एक नई जिद शुरू हो गई थी. वे अकसर कहते, ‘रितु, तुम अब नौकरी छोड़ दो…मुझे अब स्थायी घर चाहिए. यह भागदौड़ मुझ से नहीं होती है और फिर मां का भी स्वास्थ्य अब ठीक नहीं रहता है…’
मैं हैरान हो गई थी, ‘5 साल हो गए, इतनी अच्छी नौकरी है, फिर जब बच्चियां छोटी थीं, इतनी परेशानियां थीं तब तो मैं नौकरी करती रही. अब तो मुझ में आत्म- विश्वास आ गया है. बच्चियां भी स्कूल जाती हैं. इतनी जानपहचान यहां हो गई है कि कोई परेशानी नहीं. अब भला नौकरी छोड़ने में क्या तुक है?’
पिछली बार यही सब जब मैं ने कहा था तो अभय झल्ला कर बोले थे, ‘तुम समझती क्यों नहीं हो, रितु. तब जरूरत थी, मुझे बहनों की शादी करनी थी, पैसा नहीं था, पर अब तो ऐसी कोई बात नहीं है.’
‘क्यों, अंजू, मंजू के विवाह नहीं करने हैं?’ मैं ने भी तुनक कर जवाब दिया था.
‘उन के लिए मेरी तनख्वाह काफी है,’ उन्होंने एक ही वाक्य कहा था.
मैं फिर कुछ नहीं बोली थी, पर अनुभव कर रही थी कि पिछले कुछ दिनों से यही मुद्दा हम लोगों के आपसी तनाव का कारण बना हुआ था. कितनी ही बहस कर लो, हल तो कुछ निकलने वाला नहीं था. पर अब मैं नौकरी कैसे छोड़ दूं? इतने साल तक एक कामकाजी महिला रहने के बाद अब नितांत घरेलू बन कर रह जाना शायद मेरे लिए संभव भी नहीं था.
ठीक है, मां बीमार सी रहती थीं पर नौकर भी तो था. फिर हम लोग भी आतेजाते ही रहते थे. अहमदाबाद में बच्चियां अच्छे स्कूल में पढ़ रही थीं.
‘साल दो साल बाद तुम्हारा तबादला भी तो होता रहता है,’ मैं ने तनिक गुस्से में कहा था.
‘जिन के तबादले होते रहते हैं उन के बच्चे क्या पढ़ते नहीं?’ अभय ने चिढ़ कर कहा था. मैं क्या कहती? सोचने लगी कि इन्हें मेरी नौकरी से इतनी चिढ़ क्यों होने लगी है? कारण मेरी समझ से परे था. यों भी हम लोग कुछ समय के लिए ही मिल पाते थे. इसलिए जब भी मिलते, समय आनंद से ही गुजरता था.
शुरू में बातों ही बातों में एक दिन उन्होंने कहा था, ‘रितु, मेरा तो अब मन करता है कि तुम लोग सदा मेरे साथ ही रहो. अब और अलग रहना मुझे अच्छा नहीं लगता है.’ मैं तो तब भी नहीं समझी थी कि यह सब अभय गंभीरता से कह रहे हैं. बाद में जब उन्होंने यही सब बारबार कहना शुरू कर दिया, तब मैं चौंकी थी, ‘आखिर तुम अब क्यों नहीं चाहते कि मैं नौकरी करूं? अचानक तुम्हें क्या हो गया है?’ ‘रितु, मैं ने बहुत सोच कर देखा है, इस तरह तो हम हमेशा ही अलगअलग रहेंगे. फिर अब जब आर्थिक स्थिति भी पहले से बेहतर है, तब क्यों अनावश्यक रूप से यह तनाव झेला जाए? बारबार आना मुश्किल है, मेरा पद भी जिम्मेदारी का है, इसलिए छुट्टियां भी नहीं मिल पातीं.’
मुझे अब यह प्रसंग अरुचिकर लगने लगा था, इसलिए मैं ने उन्हें कोई जवाब ही नहीं दिया था.
रात को नींद देर से ही आई थी. सुबह फिर मैं ने आया को बुला कर सारा काम समझा दिया था. बच्चियों की पढ़ाई आवश्यक थी. इसलिए उन्हें साथ ले जाने का इरादा नहीं था.
बस का 4-5 घंटे का सफर ही तो था, पर रात को सो न पाने की वजह से बस में ही झपकी लग गई थी. जब एक जगह बस रुकी और सब लोग चायनाश्ते के लिए उतरे, तभी ध्यान आया कि सुबह मैं ने ठीक से नाश्ता नहीं किया था, पर अभी भी कुछ खाने की इच्छा नहीं थी. बस, एक प्याला चाय मंगा कर पी. मन फिर आशंकित होने लगा था कि पता नहीं, अभय क्यों नहीं आ पाए.
आबूरोड बस स्टैंड से घर पास ही था. रिकशा कर के जब घर पहुंची तो अभय घर से निकल ही रहे थे.
‘‘रितु, तुम?’’ अचानक मुझे इस तरह आया देख शायद वह चौंके थे.
‘‘इतने दिनों से आए क्यों नहीं?’’ मैं ने अटैची रख कर सीधे प्रश्न दाग दिया था.
‘‘अरे, छुट्टी ही नहीं मिली… आवश्यक मीटिंग आ गई थी. आज भी दोपहर को कुछ लोग आ रहे हैं, इसीलिए तो तुम्हें फोन करने जा रहा था. चलो, अंदर तो चलो.’’
अटैची उठा कर अभय भीतर आ गए थे.घर इस बार साफसुथरा और सजासंवरा लग रहा था, नहीं तो यहां पहुंचते ही मेरा पहला काम होता था सबकुछ व्यवस्थित करना. मांजी भी अब कुछ स्वस्थ लगी थीं.
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‘‘शालू…चाय बनाना अच्छी सी…’’ अभय ने कुछ जोर से कहा था. मैं सहसा चौंकी थी.
‘‘अरे, शालिनी है न…पड़ोस ही में तो रहती है. वही आ जाती है मां को संभालने…बीच में तो ये काफी बीमार हो गई थीं…मुझे दिन भर बाहर रहना पड़ता है, शालिनी ने ही इन्हें संभाला था.’’
तभी मुझे कुछ ध्यान आया. पिछली बार आई थी, तब मांजी ने ही कहा था, ‘पड़ोस में रामबाबू हैं न…रिटायर्ड हैडमास्टर साहब, उन की बेटी यहीं स्कूल में पढ़ाती है. बापबेटी ही हैं. बड़ी समझदार बिटिया है. मां नहीं है उस की, दिन में 2 बार पूछ जाती है.’
‘‘दीदी, चाय लीजिए,’’ शालिनी चाय के साथ बिस्कुटनमकीन भी ले आई थी. दुबलीपतली, सुंदर, घरेलू सी लड़की लगी थी. फिर वह बोली, ‘‘आप जल्दी से नहाधो लीजिए. मैं ने खाना बना लिया है. आप तो थकी होंगी, मैं अभी गरमागरम फुलके सेंक देती हूं.’’
मैं कुछ कह न पाई थी. मुझे लगा कि अपने ही घर में जैसे मेहमान बन कर आई हूं. मैं सोचने लगी कि यह शालिनी घर की इतनी जिम्मेदार सदस्या कब से हो गई?
अटैची से कपड़े निकाल कर मैं नहाने चली गई थी.
‘‘वह बहादुर कहां गया है?’’ बाथरूम से निकल कर मैं ने पूछा.
‘‘छुट्टी पर है. आजकल तो शालू सुबहशाम खाना बना देती है, इसलिए घर चल रहा है. वाह, कोफ्ते…और मटर पुलाव…वाह, शालूजी, दिल खुश कर दिया आप ने,’’ अभय चटखारे ले कर खा रहे थे.
मेरे मन में कुछ चुभा था. रसोई का काम छोड़े मुझे काफी समय हो गया था. नौकरी और फिर घर पर बच्चों की संभाल के कारण आया ही सब कर लेती थी. यहां पर बहादुर था ही.
‘रितु, तुम्हारे हाथ का खाना खाए अरसा हो गया. कहीं खाना पकाना भूल तो नहीं गईं,’ अभय कभी कह भी देते थे.
‘यह भी कोई भूलने की चीज है. फिर ये लोग ठीक ही बना लेते हैं.’
‘पर गृहिणी की तो बात ही और होती है.’
मैं समझ जाती थी कि अभय चाहते हैं कि मैं खुद उन के लिए कुछ बनाऊं पर फिर बात आईगई हो जाती.
अचानक अभय बोले, ‘‘तुम्हें पता है, शालू बहुत अच्छा सितार बजाती है?’’
अभय ने कहा तो मुझे लगा कि जैसे मैं यहां शालू के ही बारे में सबकुछ जानने आई हूं. मन खिन्न हो उठा था. खाना खातेखाते ही फिर अभय ने कहा, ‘‘शालू, तुम्हें बाजार जाना था न. दफ्तर जाते समय तुम्हें छोड़ता जाऊंगा.’’
‘‘ठीक है,’’ शालिनी भी मुसकराई थी.
मैं सोच रही थी कि इतने दिनों बाद मैं यहां आई हूं, अभय को न तो मेरे बारे में कुछ जानने की इच्छा है, न घर के बारे में और न ही बच्चियों के बारे में. बस, एक ‘शालू…शालू’ की रट लगा रखी थी.
‘‘अच्छा, मैं चलूंगा.’’
‘‘ठीक है,’’ मैं ने अंदर से ही कह दिया था. तभी खिड़की से देखा, शालिनी कार में अगली सीट पर अभय के बिलकुल पास बैठी थी. पता नहीं अभय ने क्या कहा था, उस के मंद स्वर में हंसने की आवाज यहां तक आई थी.
मन हुआ कि अभी इसी क्षण लौट जाऊं. सोचने लगी कि आखिर मैं यहां आई ही क्यों थी?
मांजी खाना खा कर शायद सो गई थीं. मेज पर रखा अखबार उठाया, पर मन पढ़ने में नहीं लगा था.
अभय शायद 2 घंटे बाद लौटे थे. मैं ने उठ कर चाय बनाई.
‘‘रितु, रात का खाना हमारा शालू के यहां है,’’ अभय ने कहा था.
‘‘शालू…शालू…शालू…मैं क्या खाना भी नहीं बना सकती. समझ में नहीं आता कि तुम लोग क्यों उस के इतने गुलाम बने हुए हो. बहादुर छुट्टी पर क्या गया, लगता है, उस छोकरी ने इस घर पर आधिपत्य ही जमा लिया है.’’
‘‘रितु, क्या हो गया है तुम्हें? इस तरह तो तुम कभी नहीं बोलती थीं. घर का कितना ध्यान रखती है शालिनी…तुम्हें कुछ पता भी है? तुम्हें तो अपनी नौकरी… अपने कैरियर के सिवा…’’
‘‘हां, सारी अच्छाइयां उसी में हैं…मैं अभद्र हूं…बहुत बुरी हूं…कह लो जो कुछ कहना है…मैं क्या जानती नहीं कि उस का जादू तुम्हारे सिर पर चढ़ कर बोल रहा है. उसे घुमानेफिराने के लिए समय है तुम्हारे पास…और बीवी, जो इतने दिनों बाद मिली है, उस के पास दो घड़ी बैठ कर बात भी नहीं कर सकते.’’
‘‘वह बात करने लायक भी तो हो…’’ अभय भी चीखे थे…और चाय का प्याला परे सरका दिया था. फिर मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘क्यों बात का बतंगड़ बनाने पर तुली हो?’’
‘‘बतंगड़ मैं बना रही हूं कि तुम? क्या देख नहीं रही कि जब से आई हूं तब से शालू…शालू की रट लगा रखी है…यह सब तो मेरे सामने हो रहा है…पता नहीं पीठ पीछे क्याक्या गुल…’’
‘‘रितु…’’ अभय का एक जोर का तमाचा मेरे गाल पर पड़ा. मैं सचमुच अवाक् थी. अभय कभी मुझ पर हाथ भी उठा सकते हैं, मैं तो ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती थी. मेरा इतना अपमान…वह भी इस लड़की की खातिर…
तकिए में मुंह छिपा कर मैं सिसक पड़ी थी…अभय चुपचाप बाहर चले गए थे. शायद उन्होंने महरी से कहा था कि शालिनी के यहां खाने के लिए मना कर दे. मांजी तो शाम को खाना खाती नहीं थीं. उन्हें दूध दे दिया था. मैं सोच रही थी कि अभय कुछ तो कहेंगे, माफी मांगेंगे फिर मैं रसोई में जा कर कुछ बना दूंगी…पर वे तो बैठक में बैठे सिगरेट पर सिगरेट पीते जा रहे थे. मन फिर जल उठा कि आखिर ऐसा क्या कर दिया मैं ने. शायद इस तरह बिना किसी पूर्व सूचना के आ कर उन के कार्यक्रम को चौपट कर दिया था, उसी का इतना गम होगा. गुस्से में आ कर मैं ने फिर अटैची में कपड़े ठूंस लिए थे.
‘‘मैं जा रही हूं…अहमदाबाद…’’ मैं ने ठंडे स्वर में कहा था.
‘‘अभी…इस समय?’’
‘‘हां…अभी बस मिल जाएगी…’’
‘‘कल चली जाना, अभी तो रात काफी हो गई है.’’
‘‘क्या फर्क पड़ता है,’’ मैं भी जिद पर आमादा थी. शायद अभय के थप्पड़ की कसक अब तक गालों पर थी.
‘‘ठीक है, मैं छोड़ आता हूं…’’
अभय चुपचाप कार निकालने चले गए थे. मैं और भी जलभुन गई थी कि कितने आतुर हैं मुझे वापस छोड़ आने को. मैं चुप थी…और अभय भी चुपचाप गाड़ी चला रहे थे. मेरी आंखें छलछला आईं कि कभी यह रास्ता कितना खुशनुमा हुआ करता था.
‘‘रितु, मैं ने बहुत सोचविचार कर देख लिया है…तुम्हें अब यह नौकरी छोड़नी पड़ेगी…और कोई चारा नहीं है…’’ अभय ने जैसे एक हुक्म सा सुना डाला था.
‘‘क्यों, क्या कोई लौंडीबांदी हूं मैं आप की, कि आप ने फरमान दे दिया, नौकरी करो तो मैं नौकरी करने लगूं…आप कहें नौकरी छोड़ दो…तो मैं नौकरी छोड़ दूं?’’
‘‘हां, यही समझ लो…क्योंकि और किसी तरह से तो तुम समझना ही नहीं चाहती हो और ध्यान से सुन लो, अगर तुम अब अपनी जिद पर अड़ी रहीं तो मैं भी मजबूर हो कर…’’
‘‘क्या? क्या करोगे मजबूर हो कर, मुझे तलाक दे दोगे? दूसरी शादी कर लोगे उस…अपनी चहेती…क्या नाम है, उस छोकरी का…शालू के साथ?’’ गुस्से में मेरा स्वर कांपने लगा था.
‘‘बंद करो यह बकवास…’’ अभय का कंपकंपाता बदन निढाल सा हो गया था. गाड़ी डगमगाई थी. मैं कुछ समझ नहीं पाई थी. सामने से एक ट्रक आता दिखा था और गाड़ी काबू से बाहर थी.
‘‘अभय…’’ मैं ने चीख कर अभय को खींचा था और तभी एक जोरदार धमाका हुआ था. गाड़ी किसी बड़े से पत्थर से टकराई थी.
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