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गिरफ्त: भाग 2- क्या सुशांत को आजाद करा पाई शोभा

Writer- Dr. Kshama Chaturvedi

मनीषा तो जैसे आगे कुछ सुन ही नहीं पा रही थी. कौन है यह शोभा और सुशांत क्यों इसे सारी बातें बताता रहा है. उस का माथा भन्नाने लगा. ‘‘देखिए, आप सुशांत को फोन दें.’’

‘‘हां सुशांत, तुम अपने घरवालों से बात कर लो.’’

‘‘पर मनीषा…’’ सुशांत कह रहा था, पर मनीषा ने तब तक मोबाइल बंद कर दिया था. 2 बार घंटी बजी थी, पर उस ने फोन उठाया ही नहीं.

‘ओफ, क्या सोचा था और क्या हो गया. अब वह क्या करे. सुहावने सपनों का महल जैसे भरभरा कर गिर गया. अब अजमेर जा कर मांपापा से क्या कहेगी,’ उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था.

मोबाइल की घंटी लगातार घनघना रही थी. नहीं, उसे अब सुशांत से कोई बात नहीं करनी और वह गर्लफैंड. वह खुद को बुरी तरफ अपमानित अनुभव कर रही थी. कहां तो अभी इतनी तेज भूख लग रही थी, लेकिन अब भूखप्यास सब गायब हो गई थी. कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था कि अब क्या करे? मांपापा को फोन पर तो यह सब बताना ठीक नहीं रहेगा, वे लोग घबरा जाएंगे. मां तो वैसे ही ब्लडप्रैशर की मरीज हैं.

और उसे यह भी नहीं पता कि आखिर वह शोभा है कौन? सुशांत उस के कहने भर से शादी स्थगित कर रहा है या फिर शादी के लिए मना ही कर रहा है.

ठीक है, उसे भी ऐसे आदमी के साथ जिंदगी नहीं बितानी है, अच्छा हुआ अभी सारी बातें सामने आ गईं और उस ने नौकरी से अभी रिजाइन नहीं दिया वरना मुश्किल हो जाती.

पर चारों तरफ सवाल ही सवाल थे और वह कोईर् उत्तर नहीं खोज पा रही थी. रोतेरोते उस की आंखें सूज गई थीं.

‘नहीं, उसे कमजोर नहीं पड़ना है, जब उस की कोई गलती ही नहीं है तो वह क्यों हर्ट हो,’ यह सोच कर वह उठी ही थी कि मोबाइल की घंटी फिर बजने लगी थी. सुशांत का ही फोन होगा. अब फोन मुझे स्विचऔफ करना होगा, यह सोच कर उस ने मोबाइल उठाया. पर यह तो सरलाजी थीं, सुशांत की मां. अब ये क्या कह रही हैं.

उधर से आवाज आ रही थी, ‘‘हां, मनीषा बेटी, मैं हूं सरला.’’

‘‘हां, आंटी,’’ बड़ी मुश्किल से उस ने अपनी रुंधि हुई आवाज को रोका.

‘‘बेटी, यह मैं क्या सुन रही हूं, अभीअभी सुशांत का फोन आया था. अरे बेटे, शादी क्या कोई मजाक है. क्यों मना कर रहा है वह. उस के पापा तो इतने नाराज हुए कि उन्होंने उस का फोन ही काट दिया. अब पता नहीं यह शोभा कौन है और क्यों वह इस के बहकावे में आ रहा है, पर बेटी, मेरी तुम से विनती है, तुम एक बार बात कर के उसे समझाओ.’’

‘‘आंटी, अब मैं क्या कर सकती हूं,’’ मनीषा ने अपनी मजबूरी जताते हुए कहा.

‘‘बेटा, तू तो बहुत कुछ कर सकती है, तू इतनी समझदार है, एक बार बात कर उस से. अब हम तो तुझे अपनी बहू मान ही चुके हैं.’’

‘‘ठीक है आंटी, मैं देखूंगी,’’ कह कर मनीषा ने मोबाइल स्विचऔफ कर दिया था. अब नहीं करनी उसे किसी से भी बात. अरे, क्या मजाक समझ रखा है. बेटा कुछ कहता है तो मां कुछ और, और मैं क्यों समझाऊं किसी को. मैं ने क्या कोई ठेका ले रखा सब को सुधारने का, मनीषा का सिरदर्द फिर से शुरू हो गया था, रातभर वह सो भी नहीं पाई.

फिर सुबहसुबह उठ कर बालकनी में आ गई. अभी सूर्योदय हो ही रहा था. ‘नहीं, कुछ भी हो उसे उस शोभा को तो मजा चखाना ही है, भले ही यह शादी हो या नहीं, पर यह शोभा कौन होती है अड़ंगे लगाने वाली. वह एक बार तो बेंगलुरु जाएगी ही,’ सोचते हुए उस ने मोबाइल से ही बेंगलुरु की फ्लाइट का टिकट बुक करा लिया था. फिर तैयार हो कर उस ने सुशांत को फोन कर दिया, वह अब औफिस आ चुका था.

‘‘मैं बेंगलुरु आ रही हूं, तुम से तुम्हारे औफिस में ही मिलूंगी.’’

‘‘अच्छा, पर…’’

‘‘पहुंच कर बात करते हैं,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया था.

एकाएक यह कदम उठा कर उस ने ठीक भी किया है या नहीं, यह वह अब तक समझ नहीं, पा रही थी, पर जो भी हो फ्लाइट का टिकट तो बुक हो ही चुका है, पर बेंगलुरु में ठहरेगी कहां. एकाएक उसे अपनी सहेली विशु याद आ गई. हां, विशु बेंगलुरु में ही तो जौब कर रही है. उसे फोन लगाया, ‘‘अरे मनीषा, व्हाट्स सरप्राइज…पर तू अचानक…’’ विशु भी चौंक गई थी.

‘‘बस, ऐसे ही, औफिस का एक काम था, तो सोचा कि तेरे ही पास ठहर जाऊंगी, तुम वहीं हो न.’’

‘‘हां, हूं तो बेंगलुरु में, पर अभी किसी काम से मुंबई आई हुई हूं, कोई बात नहीं, मां है वहां, तू घर पर ही रुकना. तू पहले भी तो मां से मिल चुकी है, तो उन्हें भी अच्छा लगेगा. मुझे तो अभी हफ्ताभर मुंबई में ही रुकना है.’’

‘‘ठीक है, मैं आती हूं, वहां पहुंच कर तुझे फोन करूंगी.’’

फिर उस ने मां को अजमेर फोन कर के कह दिया कि अभी छुट्टी मिल नहीं पा रही है, 2 दिनों बाद आ पाऊंगी.

बेंगलुरु पहुंचतेपहुंचते शाम हो गई थी. सुशांत औफिस में ही उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘अचानक कैसे प्रोग्राम बन गया,’’ उसे देखते ही सुशांत बोला था.

मनीषा ने किसी प्रकार अपने गुस्से पर काबू रखा और कहा, ‘‘बस…शादी नहीं हो रही तो क्या, दोस्त तो हम हैं ही, सोचा कि मिल कर बात कर लेती हूं कि आखिर वजह क्या है शादी टालने की, फिर मुझे कुछ काम भी था बेंगलुरु में तो वह भी हो जाएगा.’’ आधा सच, आधा झूठ बोल कर उस ने बात खत्म की.

‘‘हांहां, चलो, पहले कहीं चल कर चायकौफी पीते हैं, तुम थकी हुई होगी.’’ कौफी शौप में कौफी पी कर बाहर निकले तो सुशांत ने कहा, ‘‘मैं ने शोभा को भी फोन कर दिया था तो वह घर पर हमारा इंतजार कर रही है, पहले घर चलें.’’

‘शोभा…पहले इस शोभा को ही देखा जाए,’ वह मन ही मन सोचते हुए मनीषा ने कहा, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो,’’ कहते हुए मनीषा के शब्द भी लड़खड़ा गए थे.

औफिस घर के पास ही था, घर के बाहर लौन में शोभा इंतजार करती मिली उन दोनों का.

‘‘आइए, आइए,’’ गेट पर खड़ी महिला को देख कर मनीषा चौंकी, तो यह है शोभा, यह तो

40-45 साल की होगी, हां, बनावशृंगार कर के खुद को चुस्त बना रखा है, पर यह सुशांत की फ्रैंड कैसे बनी, उस का दिमाग फिर चकराने लगा था.

गिरफ्त: भाग 3- क्या सुशांत को आजाद करा पाई शोभा

Writer- Dr. Kshama Chaturvedi

‘‘मनीषा, यह है शोभा, बहुत खयाल रखती है मेरा, बेंगलुरु जैसे शहर में एक तरह से इस पर ही निर्भर हो गया हूं मैं.’’

‘‘हांहां, अंदर तो चलो,’’ शोभा कह रही थी. अंदर सीधे वह डाइनिंग टेबल पर ही ले गई. कौफीनाश्ता तैयार था. शोभा ने बातचीत भी शुरू की, ‘‘मनीषा, असल में सुशांत काफी परेशान थे कि तुम्हें कैसे मना करें शादी के लिए, क्योंकि तैयारी तो सब हो चुकी होगी, पर अभी शादी के लिए सुशांत खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे. तो मैं ने ही इन से कहा कि तुम मनीषा से बात कर लो, वह सुलझी हुई लड़की है. तुम्हारी प्रौब्लम जरूर समझेगी. असल में ये तुम्हारी सारी बातें मुझे बताते रहते थे तो मैं भी तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जान गई थी,’’ कह कर शोभा थोड़ी मुसकराई.

मनीषा समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे, बड़ी मुश्किल से उस ने खुद को संभाला और फिर बोली, ‘‘शोभाजी, मैं बस 2 दिनों के लिए आई हूं और अपनी एक फ्रैंड के यहां रुकी हूं. मैं चाहती हूं कि मैं और सुशांत बाहर जा कर कुछ बात कर लें, अगर आप चाहें तो.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, खाना खा कर जाना, खाना तैयार है.’’ फिर शोभा ने सुशांत की तरफ देखा था, ‘‘तुम्हारी पसंद की चिकनबिरयानी बनाई है, अगर मनीषा को नौनवेज से परहेज हो तो कुछ और…’’

‘‘नहींनहीं, हम लोग बाहर ही खा लेंगे, चलते हैं,’’ कह कर मनीषा उठ गई तो सुशांत को भी खड़ा होना पड़ा. उधर, मनीषा सोच रही थी कि सुशांत तो कहता था कि वह तो नौनवेज खाता ही नहीं है, फिर… पर हां, यह तो समझ में आ ही गया कि अच्छा खाना खिला कर सुशांत को फुसलाया जा रहा है.

शोभा का मुंह उतर गया था, पर मनीषा सुशांत को ले कर बाहर आ गई. ‘‘कहां चलें?’’ सुशांत ने मनीषा से पूछा.

‘‘कहीं भी, तुम तो इतने समय से बेंगलुरु में रह रहे हो, तुम्हें तो पता ही होगा कि कहां अच्छे रैस्तरां हैं. वैसे, अभी मुझे खाने की कोई इच्छा नहीं है, इसलिए पहले कहीं गार्डन में बैठते हैं.’’

कुछ देर पास में बगीचे में पड़ी बैंच पर ही दोनों बैठ गए.

मनीषा ने ही बात शुरू की, ‘‘हां, अब बताओ, क्या कह रहे थे तुम शोभाजी के बारे में.’’

फिर सुशांत ने जो कुछ बताया, मनीषा चुपचाप सुनती रही. पता चला कि शोभा के पति विदेश में हैं. यहां वह अपने 2 बच्चों के साथ रह रही है. बच्चे पढ़ रहे हैं. सुशांत से शोभाजी को बहुत सहारा है. सुशांत उस की आर्थिक मदद भी कर रहा है. बातों ही बातों में मनीषा समझ गई थी कि सुशांत से काफी पैसा शोभाजी ने उधार भी ले रखा है. इसलिए सोच रही होगी कि ऐसे मुरगे को आसानी से कैसे जाने दें.

‘‘बहुत खयाल रखती है शोभा मेरा,’’ सुशांत बारबार यही कह रहा था.

‘‘देखो सुशांत, हो सकता कि शोभाजी जैसा बढि़या खाना मैं तुम्हें बना कर न खिला सकूं, पर फिर भी कोशिश करूंगी.’’  मनीषा ने मजाक किया तो सुशांत चौंक गया, ‘‘नहीं, यह बात नहीं है,’’ सुशांत ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘पुणे वाली जौब के लिए अप्लाई कर दिया था न तुम ने?’’

‘‘वह…मैं कर ही रहा था पर शोभा ने मना कर दिया कि अभी रहने दो.’’

‘‘हां, क्योंकि अभी शोभाजी को तुम्हारी जरूरत है,’’ न चाहते हुए भी मनीषा के मुंह से निकल ही गया. सुशांत अवाक था.

उधर, मनीषा कहे जा रही थी, ‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा, पर एक बात जरूर कहूंगी कि शोभाजी कभी भी तुम्हें बेंगलुरु से बाहर नहीं जाने देंगी, क्योंकि तुम जरूरत हो उन की. तुम्हारा इतना पैसा उन के बच्चों की पढ़ाई पर लगा है. अब तुम्हें जो करना है करो. अगर सोच सको तो शोभाजी के बारे में न सोच कर अपना हित सोचो. शोभाजी क्या, उन्हें और पेइंगगैस्ट मिल जाएंगे. बेंगलुरु में तो ऐसे बहुत लोग होंगे.’’

सुशांत एकदम चुप था.

‘‘चलो, अब खाना खाते हैं, फिर मुझे मेरी फ्रैंड के यहां छोड़ देना,’’ मनीषा ने बात खत्म की.

‘‘अभी तो तुम रुकोगी?’’

‘‘हां, कल शाम को मिलते हैं, फिर रात को मेरी फ्लाइट है, बस जो कुछ मैं ने कहा है, उस पर विचार करना. अब तक मनीषा ने अपनेआप को काफी संयत कर लिया था. उसे जो कहना था कह दिया. अब सुशांत जो चाहे करे पर वह इतना कमजोर इंसान होगा, इस की उस ने कल्पना नहीं की थी.’’

दूसरे दिन सुशांत सुबह ही उसे लेने आ गया था, ‘‘मैं तो रातभर सो ही नहीं पाया मनीषा, और आज औफिस से मैं ने छुट्टी ले ली है. आज पूरा दिन मैं तुम्हारे साथ ही बिताऊंगा और हां, रात को ही पुणे की पोस्ट के लिए भी मैं ने अप्लाई कर दिया है.’’

उस की बातें सुन कर मनीषा भी आश्चर्यचकित थी.

फिर रास्ते में ही सुशांत ने कहा, ‘‘मैं रातभर तुम्हारी बातों पर ही विचार करता रहा. शायद तुम ठीक ही कह रही हो. मैं आज मां से भी बात करता हूं. शादी की तारीख वही रहने दो…’’

‘‘नहीं सुशांत,’’ मनीषा ने उसे रोक दिया.

‘‘इतनी जल्दी भी नहीं है. तुम खूब सोचो और पुणे जा कर फिर मुझ से बात करना, अभी तो मैं भी शादी की डेट आगे बढ़ा रही हूं. जब तुम अपने भविष्य के बारे में सुनिश्चित हो जाओ, तभी हम बात करेंगे शादी की.’’

‘‘पर मनीषा…मैं…’’

‘‘हां, हम बात तो करते रहेंगे न, आखिर दोस्त तो हम हैं ही. कुछ जरूरत हो तो पूछ लेना मुझ से.’’

पूरा दिन सुशांत के साथ ही गुजरा, एअरपोर्ट पहुंच कर फिर उस ने कहा था, ‘‘तुम मेरा इंतजार तो करोगी न…’’

‘‘हां, क्यों नहीं…’’ कह कर मनीषा हंस पड़ी थी.

प्लेन के टेकऔफ करते ही वह अपनेआप को हलका महसूस कर रही थी. भविष्य में जो भी हो, पर फिलहाल शोभाजी की गिरफ्त से तो उस ने सुशांत को आजाद करा ही दिया.

सत्यकथा: लव सेक्स और धोखे का खिलाड़ी- एक दिलचस्प क्राइम केस

लेखक-मुकेश तिवारी

पुलिस ने भी नहीं सोचा था कि मारपीट और धोखाधड़ी का मामला सीरियल मर्डर तक पहुंचेगा. जो हकीकत सामने आई, वह हैरान करने वाली थी, क्योंकि यह मामला एक दशक पहले हुई 4 हत्याओं का निकला.

कहते हैं कि अपराधी कितना भी शातिर क्यों न हो, एक न एक दिन कानून की गिरफ्त में आता जरूर है, हालांकि हत्या जैसा जघन्य अपराध जब भी कोई अपराधी करता है, तो निश्चित ही वह यही सोचता है कि उस ने जो अपराध किया है, उसे करते किसी ने देखा नहीं है, अत: वह साफ बच निकलेगा.

इस कहानी में आरोपी का अगला शिकार बनने वाली उस की दूसरी पत्नी के साहस ने उस की असलियत पुलिस के सामने ला दी. गजब के चतुर आरोपी ने इस सनसनीखेज हत्याकांड को कैसे अंजाम दिया, इस में कौनकौन शामिल रहा? उस का इरादा क्या था? इतने लंबे समय तक वह कैसे पुलिस को छकाता रहा? ऐसे तमाम सवालों के जवाब सिलसिलेवार विस्तार से जानते हैं.

इस की शुरुआत मारपीट की शिकायत से हुई. 14 मार्च, 2022 की दोपहर अनामिका नाम की एक महिला बदहवास हालत में ग्वालियर शहर के झांसी रोड थाने पहुंची. वह काफी घबराई हुई थी. थाने के गेट पर राइफल ले कर खड़े संतरी से जब उस ने थानाप्रभारी के बारे में पूछा तो संतरी ने उन के कक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘साहब अंदर बैठे हैं, आप चली जाइए.’’

अनामिका तेज कदमों से सीधे थानाप्रभारी के कक्ष में दाखिल हुई. उस वक्त थानाप्रभारी अपने मातहतों के साथ किसी अहम मसले पर चर्चा कर रहे थे. अनजान महिला को अपने कक्ष में आया देख कर उन्होंने उस से पूछा, ‘‘कहिए क्या काम है?’’

घबराई हुई अनामिका ने कहा, ‘‘साहब, मुझे अपने पति राजेंद्र यादव के जुर्म के संबंध में कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी मय दस्तावेज और फोटो के आप को देनी है और उस के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करवानी है.’’

थानाप्रभारी ने महिला को कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘आप आराम से बैठ कर पूरी बात बताइए. आखिरकार आप के साथ क्या हुआ?’’

थानाप्रभारी के कहने पर अनामिका कुरसी पर बैठ गई, लेकिन पता नहीं क्यों, उस के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. उस की जुबान सूख गई थी. उस की हालत देख कर थानाप्रभारी ने उसे पानी पिलवाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम अनामिका है.’’

तसल्ली देते हुए थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आप के साथ क्या और कैसे हुआ, विस्तार से बताइए. मैं आप को भरोसा दिलाता हूं कि पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी.’’

थानाप्रभारी के भरोसा देने पर अनामिका के अंदर थोड़ी हिम्मत आई. उस ने उन से कहा, मेरे पति राजेश मेहरा (36) द्वारा मेरे साथ मारपीट और गालीगलौज करने की शिकायत दर्ज कराने के साथ ही उस की असलियत से भी आप को अवगत कराना है.

अनामिका ने बताया कि उस के पिता ग्वालियर के बड़े ट्रांसपोर्टर हैं. उन्होंने बड़ी शानोशौकत से उस की शादी राजेश के साथ की थी.

इस के बाद अनामिका के साथ जो हुआ, उस की कहानी इस तरह सामने आई. समय अपनी गति से गुजरता रहा. शादी के कुछ दिनों बाद ही पति उसे परेशान करने लगा था. पति के व्यवहार में काफी बदलाव आ गया था, वह बातबात में उस से झगड़ा करने लगा था. यही नहीं, उस के साथ मारपीट भी करने लगा था.

अनामिका पति के बदले व्यवहार से काफी खफा रहती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. अनामिका जब भी कभी उस के बदले व्यवहार की शिकायत करती तो वह कोई न कोई बहाना बना देता.

यही नहीं, इस के बाद जब देखो तब राजेश मेहरा अनामिका की पिटाई कर उसे घर से निकल जाने को भी कहता. यहां तक कि उस ने घर खर्च के लिए पैसे देने भी बंद कर दिए थे. जब राजेश के अत्याचारों की हद हो गई, तब अनामिका ने अपने पिता को सारी बातें बता दीं.

राजेश ने अनामिका के सामने इस तरह के हालात खड़े कर दिए कि अनामिका परेशान हो कर खुदबखुद अपने पति का घर छोड़ कर अपने मायके में आ कर रहने लगी. 6 महीने पहल॒े पति की सच्चाई सामने आने के बाद वह अपने पति से अलग हो गई.

दरअसल, 6 महीने पहले इत्तफाक से कुछ कागजात अनामिका के हाथ लगे, जिस से उसे पता चला कि उस के पति का असली नाम राजेश मेहरा नहीं बल्कि राजेंद्र कमरिया है, राजेश मेहरा तो उस का बोगस नाम है. वह धोखाधड़ी और हत्या जैसे अपराधों में शामिल होने की वजह से फरार चल रहा है.

इस के बाद ही अनामिका पति से अलग हो कर अपने पिता के पास चेतकपुरी में रहने लगी थी. पति राजेश मेहरा उर्फ राजेंद्र कमरिया ने उसे फोन कर उस के पास लौटने को कहा. अनामिका ने जब लौटने को मना कर दिया तो राजेंद्र अनामिका को फोन पर जान से मारने की धमकी देने लगा,

एक दिन तो हद ही हो गई. 12 मार्च, 2022 को अनामिका अपने पिता से थोड़ी देर में आने को कह कर घर से निकली ही थी कि रास्ते में राजेंद्र अपने साथियों निक्की, प्रमोद और राजा के साथ खड़ा मिल गया.

वह अनामिका को जबरन अपनी गाड़ी में डाल कर सुनसान स्थान पर ले गया और उस के साथ जम कर मारपीट की.

इस मारपीट में अनामिका की आंख पर भी चोट लगी. अनामिका ने बताया कि उस दिन पति राजेंद्र उसे जान से मारने की फिराक में था, लेकिन वह जैसेतैसे उस के चंगुल से छूट कर भाग आई.

इस के बाद अनामिका सीधी ग्वालियर के झांसी रोड थाने पहुंची और पुलिस को अपने पति की असलियत बताने के साथ ही कई अहम दस्तावेज भी सौंपे.

जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही थी, पुलिस को नित नईनई जानकारी मिल रही थी. पुलिस ने अपना रिकौर्ड खंगाला तो इसी थाने में राजेंद्र मारपीट के एक मामले में फरार निकला. राजेंद्र को दबोचने के लिए बिलौआ पुलिस से संपर्क किया गया तो पता चला कि 2014 में हुई 36 लाख रुपए की धोखाधड़ी और मारपीट के मामले में वह वहां से भी फरार चल रहा है.

राजेंद्र यादव को गिरफ्तार करने के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में क्राइम ब्रांच के टीआई दामोदर गुप्ता, थानाप्रभारी (बिलौआ) रमेश साख्य, क्राइम ब्रांच के एएसआई राजीव सोलंकी, हैडकांस्टेबल रामबाबू सिंह, कांस्टेबल आशीष शर्मा व सोनू परिहार तथा बिलौआ थाने में पदस्थ एएसआई जीत बहादुर, कांस्टेबल सुशांत पांडे, धरमवीर और महेश आदि को शामिल किया गया.

इस के बाद मुखबिर की सूचना पर 16 मार्च, 2022 को पुलिस ने उसे बिलौआ क्षेत्र स्थित उस के फार्महाउस से हिरासत में लिया.

पुलिस ने थाने ला कर उस से पूछताछ की तो उस ने एक ऐसे सनसनीखेज अपराध का खुलासा कर दिया, जिस के बारे में सुनते ही पुलिस वालों के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई.

पकड़े गए युवक का असली नाम राजेंद्र यादव था. राजेंद्र ने पूछताछ में जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिस असमंजस में पड़ गई. वजह यह थी कि वह एक संगीन अपराध था और वह आज जिन 4 हत्याओं के बारे में पुलिस को बता रहा था, उस से ग्वालियर पुलिस अभी तक पूरी तरह अनभिज्ञ थी.

पूछताछ में राजेश मेहरा उर्फ राजेंद्र मेहरा उर्फ राजेंद्र यादव उर्फ राजेंद्र कमरिया से पता चला कि वह सिर्फ 12वीं कक्षा तक ही पढ़ा है. ग्वालियर के बालाबाई के बाजार में उस का एक दोस्त मनोज गहलोत परिवार के साथ रहता था.

राजेंद्र यादव भी उस के पड़ोस में ही रहता था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. राजेंद्र ने अपने से 10 साल बड़ी मनोज की पत्नी गीता को अपने प्रेम जाल में फांस लिया था. दोनों के बीच अवैध संबंध हो गए थे.

31 दिसंबर, 2011 को राजेंद्र ने अपनी प्रेमिका गीता के साथ मिल कर उस के पति मनोज गहलोत को बियर में नशे की गोली मिला कर पिला दी.

इस के बाद उस का गला दबा कर मौत के घाट उतार दिया और फिर मनोज की लाश झांसी के पास बेतवा नदी में फेंक दी थी. उधर मनोज के परिवार वालों ने कोतवाली थाने में मनोज की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

मनोज की हत्या के बाद राजेंद्र और गीता ने शादी कर ली थी. शादी के बाद गीता और राजेंद्र मऊरानीपुर रहने चले गए, यहां पर गीता का मकान था.

तकरीबन 2 साल बाद जब गीता से राजेंद्र का मन ऊब गया तो सन 2013 में राजेंद्र ने बड़े ही सुनियोजित ढंग से गीता का मकान हड़प लिया. उस के बाद राजेंद्र ने रहस्यों से भरी किसी फिल्म की तरह गीता, उस के बेटे निक्की और भतीजे सूरज को भी चाकू से गोद कर मार डाला.

उस के इस अपराध में राजेंद्र के भाई कालू और उस के जीजा के भाई राहुल ने भी उस की मदद की थी. इस वारदात के बाद राजेंद्र मऊरानीपुर से फरार हो गया.

तिहरे हत्याकांड से मऊरानीपुर क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद पुलिस किसी तरह इस हत्याकांड के आरोपियों का पता लगाने में सफल हो गई.

इतना ही नहीं, पुलिस ने हत्याकांड में शामिल रहे कालू और राहुल को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली. लेकिन राजेंद्र यादव नाम और हुलिया बदल कर इधरउधर छिपता रहा. पुलिस ने उस के ऊपर ईनाम तक घोषित कर दिया.

खुद को कुंवारा बता कर राजेश उर्फ राजेंद्र ने अनामिका को सन 2014 में अपने प्रेम जाल में फांस लिया. अनामिका ने पुलिस को बताया कि राजेश से उस की दोस्ती सन 2014 में ट्रेन के सफर में हुई थी.

दोस्ती बढ़ने पर राजेश ने दिल्ली में अनामिका की नौकरी लगवाने में काफी मदद की थी, इस वजह से दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई. बाद में दोनों ने आपसी सहमति से शादी कर ली थी.

शादी के वक्त राजेश उर्फ राजेंद्र ने अपने को कुंवारा बताया था. राजेंद्र ने अनामिका से एक नहीं, बल्कि कई झूठ बोले थे.

उन में सब से बड़ा तो यही था कि उस ने अपनी पत्नी से मकान मालिक कुलदीप मेहरा का परिचय अपने पिता के रूप में करवाया था. राजेंद्र ने अपना नाम भी अनामिका को राजेश मेहरा बताया था. बाद में अनामिका को पता चला कि कुलदीप मेहरा राजेश उर्फ राजेंद्र का पिता नहीं बल्कि मकान मालिक है.

बाद में पता चला कि राजेश ने कुलदीप मेहरा की तकरीबन 5 करोड़ रुपए की जमीन भी ठग ली थी. शादी के बाद राजेंद्र ने अपनी पत्नी को बहन के घर रखा था. राजेंद्र और अनामिका के एक बेटा भी है.

पिछले 10 सालों से राजेंद्र अपना नाम और भेष बदल कर रहता रहा. कभी पगड़ी लगा लेता तो कभी क्लीन शेव रहता. कभी दाढ़ी बढ़ा लेता था, कभी राजेंद्र यादव बन जाता तो कभी राजेश मेहरा. वह लग्जरी कारों का भी शौकीन है. साथ ही वह अय्याश प्रवृत्ति का तो है ही.

पहले वह लड़की से दोस्ती करता है, उस के बाद उन की प्रौपर्टी पर सुनियोजित ढंग से कब्जा कर खुर्दबुर्द कर देता. बात करने में हाजिरजवाब राजेंद्र यादव के अपराधों का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए ग्वालियर के एसपी अमित सांघी, एडिशनल एसपी (क्राइम) राजेश दंडोतिया ने संयुक्त रूप से पत्रकार सम्मेलन में पत्रकारों को जानकारी दी.

2011 में खास दोस्त मनोज गहलोत की हत्या, 2012 में ग्वालियर में पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर के मकान में भाड़े पर रहा. उस की पत्नी को फांस कर 60 लाख की ठगी की. चैक बाउंस मामले में गिरफ्तारी वारंट 18 जून, 2013 में धारा 420, 467, 468, 471, 120 भादंवि का केस उस के खिलाफ दर्ज हुआ.

2013 में अपने भाई और जीजा के छोटे भाई के साथ मिल कर अपनी प्रेमिका गीता और उस के बेटे और भतीजे की निर्मम हत्या कर दी.

कड़वा सच तो यह है कि अनामिका का कई मर्तबा मन हुआ कि वह अपने पति के बारे में पुलिस को सब कुछ सचसच बता दे, लेकिन राजेंद्र के खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं जुटा पाई.

जब अति हो गई तो वह पति के खिलाफ पक्के सबूतों के साथ थाने में जा कर खड़ी हो गई, वैसे भी पति के खिलाफ खड़ी होने में ही अनामिका की भलाई थी.

पति की कारगुजारियों से अनामिका को गहरा झटका लगा है. इस से उबरने में फिलहाल उसे वक्त लगेगा.

पूछताछ के बाद राजेंद्र को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जीवनज्योति- भाग 2: क्या हुआ था ज्योति के साथ

ज्योति तो उन के दिल का टुकड़ा थी, उसे मर जाने तक को कह दिया उन्होंने. कैसे निकली यह बात उन की जबान से. खुद को धिक्कारते हुए बिस्तर से उतर कर विक्षिप्तों की तरह टहलने लगे थे मुंशीजी. बारबार एक ही यक्षप्रश्न, आखिर कैसे हुआ यह हादसा?

आत्मग्लानि की आग से पसीज उठा था उन का सर्वस्व. यह सोच कर अपने कमरे से निकल गए थे कि ज्योति बिटिया को सारा अंतर्द्वंद्व, सारी व्यथा सुना कर पश्चात्ताप कर लेंगे.

…इस बार मुंशीजी की व्यथा सुमित्रा नहीं सह सकी. लौट कर बिस्तर पर उन के लेटते ही धीरे से उन के सीने पर हाथ रखा था सुमित्रा ने. करवट बदल कर मुंशीजी ने भी देखा था सुमित्रा की बंद पलकों से सहानुभूति की बूंदें अब भी लुढ़क रही थीं.

आंख लगी ही थी कि अचानक चिहुंक कर जाग गई ज्योति.

बाबूजी का क्रोध एवं आवेश में फुंफकारता चेहरा अवचेतन से निकल कर बारबार उसे डरा रहा था. प्रतिध्वनित हो रही थी वही सारी दिल दरकाती बातें जो उस के अंतस में बहुत दूर जा कर धंस गई थीं. इस असह्य पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए ज्योति कईकई प्रयास कर चुकी थी, पर सब बेकार.

अचानक ही उस का चेहरा सख्त हो गया. आंखों में बेगानेपन का एक ऐसा मरुस्थल उतर आया था जहां मोहमाया, वेदनासंवेदना, मानअपमान के न तो झाड़झंखाड़ थे और न ही आंसूअवसाद का कोई अस्तित्व. एक निर्णय ने उस के भय के सारे अंतर्द्वंद्वों को धो डाला था और दरवाजे का सांकल खोल, अमावस की इस काली निशा में वह गुम हो गई थी.

वह अपने घर से जितनी दूर होती जा रही थी, बाबूजी का स्वर अनुगूंज अंतस में और अधिक शोर मचाने लगा था. वह जल्द से जल्द उस पुल पर पहुंच जाना चाहती थी जहां नदी का अथाह पानी उसे इन तमाम पीड़ाओं से मुक्ति दिला कर अपने आगोश में बहा ले जाता. दूर, बहुत दूर.

इस धुन में उस की चाल तेज, और तेज होती जा रही थी. बाहर में गूंजते बाबूजी के शब्द ‘मरती क्यों नहीं…नदी, तालाब में डूब क्यों नहीं जाती…बोझ है…अभिशाप है…’ और अंदर में जान दे देने की, खुद को मिटा देने की एक खीझभरी जिद.

अचानक ज्योति को लगा कि बाबूजी की आवाज के साथसाथ कहीं से कोई दूसरा स्वर भी घुलमिल कर आ रहा है. उस ने थोड़ा थम कर उस आवाज को गौर से सुननेसमझने की चेष्टा की थी. हां, कोई तो था जो दबे स्वर में उसे बारबार पुकार रहा था, ‘ज्योति…ज्योति…ज्योति…’

एक पल को ठिठक गई ज्योति. पलट कर उस ने चारों ओर देखा तो कोई नहीं था दूरदूर तक. तो फिर कौन है इस निर्जन वन में जो उसे आवाज दे रहा था.

‘‘आत्महत्या करने जा रही हो ज्योति,’’ करीब आता स्वर सुनाई दिया ज्योति को.

ज्योति ने खीज कर पूछा था, ‘‘देखो, तुम जो भी हो मेरे सामने आ कर बात करो. मुझे डराने की कोशिश मत करो. आखिर कौन हो तुम?’’ ज्योति ने अपना मन कड़ा किया था.

‘‘मौत के जिस रास्ते पर तुम जा रही हो उसी रास्ते में मैं तुम्हारे सामने हूं, ज्योति.’’

कानों पर तो यकीन हो रहा था, मगर कहीं आंखें तो धोखा नहीं दे रही हैं उसे. पलकों को कस कर भींचा और झपकाया था ज्योति ने. विस्फारित नेत्रों से इस अंधेरे की खाक छान रही थी वह. कुछ भी तो नहीं था आसपास.

‘‘सामने? खड़े हो तो दिखाई क्यों नहीं देते?’’

‘‘इसलिए कि तुम मुझे देखना नहीं चाहतीं. देखो, मैं ठीक तुम्हारे सामने आ कर खड़ा हो गया हूं देख रही हो मुझे?’’

‘‘नहीं…मगर तुम चाहते क्या हो, कौन हो तुम?’’ गहराते रहस्य ने ज्योति की व्यग्रता को और उत्प्रेरित किया था.

‘‘मुझे अनदेखा कर रही हो तुम. जरा दिल की गहराइयों में मन की आंखों से देखो, ज्योति…मैं जीवन हूं.’’

‘‘जीवन, कौन जीवन? मैं किसी जीवन को नहीं जानती…’’

‘‘तुम जैसी समझदार लड़की के मुंह से इस तरह की बातें अच्छी नहीं लगतीं. मुझे पहचानो. मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन.’’

‘‘बकवास बंद करो और हट जाओ मेरे रास्ते से.’’

अदृश्य तत्त्व का स्वर फिर ज्योति के कानों से टकराया था, ‘‘ठीक है, तुम्हारे रास्ते से हट जाऊंगा, मगर मुझे बता दो कि क्या तुम सचमुच आत्महत्या करने जा रही हो या…’’

‘‘जी हां, मैं सच में आत्महत्या ही करने जा रही हूं. पुल से नदी में कूद कर जान दे दूंगी, और कुछ?’’

एक क्षण की खामोशी और फिर, ‘‘अरे हां, सुनो? ज्योति, जब तक तुम मर नहीं जातीं, तब तक क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूं? इस बीच बातें करते हुए तुम्हारा यह अंतिम सफर भी अच्छे से कट जाएगा…तो चलूं तुम्हारे साथ?’’

‘‘तुम आओ या जाओ, मेरी बला से,’’ एकदम से भन्ना कर बोली ज्योति.

और एक झटके के साथ आगे बढ़ी तो अनजान रास्ता और उस पर से किसी अदृश्य रहस्य की उपस्थिति का आभास. इसी घबराहट में किसी कटे पेड़ के ठूंठ से जा टकराई और दर्द से बिलबिला उठी थी.

फिर वही आवाज, ‘‘चोट लग गई न. बिना सोचेसमझे तुम कितने दुर्गम रास्ते पर निकल पड़ी हो, ज्योति.’’

‘मर नहीं जाऊंगी इन छोटीमोटी ठोकरों से,’ क्रोध के मनोवेग से चीखती हुई बड़बड़ाने लगी थी, ‘…बहुत चोटें सही हैं मैं ने अपने कलेजे पर…मर तो नहीं गई मैं. हां, मरूंगी…आत्महत्या करूंगी. मुझे चोट लगे, तुम्हें इस से क्या मतलब?’

‘‘नहीं, कोई मतलब नहीं. मगर मैं नहीं चाहता कि मरने से पहले तुम्हारे शरीर पर कोई चोट लगे. क्योंकि तुम्हारी चोट से मैं भी आहत होता हूं. जानती हो ज्योति, आत्महत्या में ऐसा भी होता है कि कई बार आदमी मर नहीं पाता. टूटफूट कर एक लंगड़ेलूले, अपंगता की जिंदगी जीता है. तब वह दोबारा आत्महत्या का प्रयास भी नहीं करता. क्योंकि एक बार के प्रयास का कठोर एहसास जो उसे होता है.’’

खामोश रहना ही उचित समझा था उस ने. कदम और तेज हो गए थे उस के संकल्पित लक्ष्य की ओर. तभी जीवन ने फिर पूछा, ‘‘तुम आत्महत्या क्यों करना चाहती हो?’’

इस तरह चुप रह कर आखिर कब तक वह इस आफत को टालती. गरज उठी थी, ‘‘क्या बताऊं मैं, क्या दुखड़ा रोऊं मैं, तुम जैसे अनजान, अदृश्य, गैर के सामने? यह बताऊं कि एक गरीब मुनीम के घर हम 3 बेटियां अभिशाप हैं, एक बोझ हैं हम. सब से बड़ी बोझ मैं, ज्योति सहाय, एम.ए. फर्स्ट क्लास. फर्स्ट… मगर नौकरी के लिए मोहताज…’’

‘‘मगर बेरोजगारी की समस्या तो सिर्फ तुम्हारे अकेले की समस्या नहीं है. यह तो एक आम सामाजिक बीमारी है जिस से हर कोई जूझ रहा है.’’

‘‘हां, बेरोजगारी मेरे अकेले की समस्या नहीं. मगर मैं एक समस्या हूं, गरीब बाप के सर पर पड़ी एक बोझ, क्या तुम नहीं जानते कि समाज में मध्य वर्गीय लड़कियों के लिए कई वर्जनाएं हैं. बातबात में मातापिता की पगडि़यां उछलती हैं. हर वक्त खानदान की इज्जत और भविष्य के सामने बदनामी, लोकलज्जा, मुंह चिढ़ाता समाज नजर आता है और वैसे भी लोग एक मजबूर, जरूरतमंद, गरीब और जवान लड़की को सिर्फ देखते ही नहीं, बल्कि निर्वस्त्र कर के महसूस भी करते रहते हैं. लेकिन तुम हो कौन, जो परत दर परत मुझ से सब कुछ जान लेना चाहते हो?’’

‘‘मैं ने कहा न, मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन. बिलकुल सत्य और संघर्षों से भरा हूं. कोई मुझे प्यार का गीत समझ कर गुनगुनाता है तो कोई पहेली, कोई जंग समझता है. मैं तो एक सच हूं, ज्योति, मगर इतना कमजोर कि स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता. मौत के कू्रर पंजे एक झटके में मुझे शरीर से अलग कर देते हैं. मेरी भौतिकता ही खत्म कर देते हैं. और जबजब अपने अस्तित्व पर मुझे खतरा महसूस होता है, लोगों के सामने आता हूं, बातें करता हूं, खुद को तसल्ली देता हूं. आज भी तो इसीलिए आया हूं तुम्हारे पास, मेरी रक्षा करोगी न.’’

विचारों की इस उमड़घुमड़ में ज्योति इतना गुम हो गई कि जंगल कब खत्म हो गया पता तक नहीं चला. सड़क पर और तेज कदमों से उस पुल की दिशा में बढ़ गई थी वह जो अब ज्यादा दूर नहीं था. अचानक एक झटका सा लगा ज्योति को कि इतनी देर से जीवन ने कुछ कहा नहीं, कहां गया वह? इतना चुप तो रहने वाला नहीं था वह. कहीं चला तो नहीं गया अचानक.

आगे पढ़ें- अचानक ठठा कर हंस पड़ी ज्योति. कुछ ऐसा कि…

रिश्तों की मर्यादा- भाग 2: क्या तरुण ने नमिता को तलाक दिया?

राइटर- नीरज कुमार मिश्रा

नमिता अब भी बिस्तर पर पड़ी कसमसा रही थी. जब वह हथकड़ी से आजाद नहीं हो पाई, तो हार कर तरुण को ही उस के हाथों को खोलना पड़ा और उसे खोलते ही नमिता नीचे पड़े हुए अपने कपड़ों को पहनने लगी, तो तरुण उसे भद्दीभद्दी गालियां देने लगा और गुस्से में उसे 2 तमाचे और जड़ दिए.

‘‘तुम को मेरे साथ रहने का कोई हक नहीं है… तुम अभी और इसी समय मेरे घर से निकल जाओ,’’ एक फरमान सा सुना दिया था तरुण ने, जिसे सुनने के बाद नमिता इतना तो सम?ा गई थी कि इस समय तरुण के सामने रोने या गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं होने वाला, इसलिए वह सिर ?ाकाए सुनती रही.

अपने पति के घर से निकाले जाने के बाद नमिता को कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे और कहां जाए…

सड़क के किनारे बहुत देर तक नमिता शून्य की हालत में खड़ी रही और सड़क पर आनेजाने वाले सैकड़ों लोगों को देखती रही. काफी देर बाद उस ने सुदेश को फोन लगाया, तो सुदेश का मोबाइल स्विच औफ आ रहा था. शायद उस ने ऐसा तरुण के डर के चलते किया होगा या फिर वह नमिता से पीछा छुड़ाना चाहता है? ऐसे ढेरों सवाल नमिता के मन में थे.

आज से पहले नमिता ने कभी नहीं सोचा था कि अपने ही शहर में वह एकदम बेगानी हो जाएगी… तो क्या उस ने

एक पराए मर्द के साथ शारीरिक संबंध बना कर जो अपराध किया है, उस की सजा तो मिलनी ही चाहिए उसे… पर कैसा अपराध?

तरुण भी तो दूध के धुले नहीं हैं… कई बार तो नमिता ने खुद ही अपने कानों से उन्हें अपनी एक दोस्त से फोन पर बातें करते सुना है और फिर तरुण कई दिनों तक घर से बाहर भी तो रहते हैं… ऐसे में उस का किसी पराए मर्द के प्रति आकर्षित हो जाना सहज ही तो है.

नमिता अपने मन में तमाम बातें सोच रही थी और अपने मन को सम?ाने की कोशिश कर रही थी.

‘‘कहां जाना है मैडम आप को?’’ एक ईरिकशा वाले ने ब्रेक लगाते हुए पूछा.

‘‘घर जाना है मु?ो…’’ यह कहते हुए नमिता ईरिकशा में बैठ गई और उस से बसस्टैंड चलने को कहा.

बसस्टैंड पर आ कर नमिता अपने मायके यानी सीतापुर जाने वाली बस में बैठ गई. जल्दबाजी में वह पर्स लाना भूल गई थी और पास में पैसे तो थे नहीं, पर नमिता के हाथ में मोबाइल था. सो, टिकट की चिंता नहीं थी, क्योंकि आजकल बस वाले भी औनलाइन पैसे लेने से मना नहीं करते.

3 घंटे के सफर के बाद नमिता अपने मायके पहुंच गई थी. वहां पर सिर्फ उस के भैयाभाभी और विधवा मां ही थीं. सब से मिल कर वह ?ाठी खुशी दिखाने की कोशिश तो कर रही थी, पर मायके वालों को यह सम?ाते देर नहीं लगी कि पतिपत्नी में ?ागड़ा हुआ है.

हालांकि कुछ महीने बीत जाने के बाद नमिता ने खुद ही अपनी मां को सारी बात सचसच बता दी. मां कुछ बोल न सकीं, सिर्फ नमिता को गले से लगा लिया. नमिता का मन भर आया था.

नमिता की पढ़ाईलिखाई अब काम आई, जब जीविका चलाने और भैयाभाभी पर बो?ा न बने रहने के नाते उस ने सीतापुर में ही एक डिगरी कालेज में पढ़ाना शुरू कर दिया और वैसे भी नमिता के पास उस की पुरानी सेविंग्स तो थीं ही, इसलिए पैसे की ज्यादा चिंता नहीं थी उसे… और इस बीच उस ने कई बार कांपते हाथों से तरुण का नंबर मिलाया, पर वह कभी उठा नहीं…

जिंदगी में मुश्किल समय जल्दी नहीं बीतता… यही हाल नमिता का भी था, पर अब काम में बिजी हो जाने के चलते उस का समय भी बीत रहा था और घर में पैसे भी आ रहे थे, पर मायके में शादीशुदा लड़की का रहना आसपड़ोस के लोगों के लिए एक प्रपंच का विषय तो बन ही चुका था, लेकिन नमिता ने इन सब बातों की परवाह करनी छोड़ दी थी.

नमिता को लखनऊ छोड़े तकरीबन एक साल बीत गया था. इस बीच सुदेश का कई बार फोन भी आया, पर नमिता ने एक बार भी उस का फोन रिसीव नहीं किया.

तरुण ने कोई खोजखबर नहीं ली, पर आज एक नंबर से नमिता के मोबाइल पर एक फोन आया, तो उधर से तरुण की धीमी आवाज थी, ‘नमिता… क्या तुम मेरे पास आ सकती हो… कुछ जरूरी काम है और कुछ बात भी करनी है…’

नमिता बहुतकुछ बोलना चाहती थी, पर कुछ कह नहीं सकी. उसे लग रहा था कि निश्चित ही तरुण उसे तलाक देने के लिए कागजी कार्यवाही करना चाहता है.

नमिता ने सिर्फ हां में जवाब दिया और अगले दिन ही तरुण के पास पहुंच गई.

दरवाजा तरुण ने ही खोला. वह काफी थका सा लग रहा था. नमिता ने मन में सोचा था कि हो सकता है, तरुण ने किसी वकील को बुलाया हो जो कुछ कागजों पर दस्तखत करवाएगा, पर यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं था. अलबत्ता, मेज पर कुछ दवाएं जरूर पड़ी हुई थीं.

‘‘दरअसल, तुम्हें घर से निकालने के बाद मैं काफी सदमे में रहा और कुछ दिन बाद बिस्तर से लग गया. चैकअप कराया, तो मुझे कैंसर निकला. मैं ने इलाज तो कराया, पर कोई फायदा नहीं हुआ और आगे महंगे इलाज के लिए मेरे पास पैसे भी नहीं थे…

रिश्तों की मर्यादा-भाग 1: क्या तरुण ने नमिता को तलाक दिया?

राइटर- नीरज कुमार मिश्रा

लखनऊ शहर के इंदिरानगर इलाके में बने हुए फ्लैट नंबर 256 में इस समय हवस से भरी फुसफुसाहटें गूंज रही थीं. फ्लैट की दीवारें नमिता और सुदेश के सैक्स की आवाजों की गवाह बनी हुई थीं.

सुदेश नमिता के तन पर लिपटा हुआ आखिरी कपड़ा भी अलग कर देना चाहता था, पर नमिता थी कि बारबार अपने बदन को सिकोड़ लेती थी.

सुदेश के एक हाथ में मोबाइल फोन का वीडियो रिकौर्डर चल रहा था, जिस से वह नमिता की वीडियो क्लिप बनाने में लगा हुआ था.

‘‘अब मेरी वीडियो क्लिप मत बनाओ… प्लीज,’’ नमिता ने बनावटी अंदाज में कहा, पर सुदेश ने उस की एक नहीं सुनी और नमिता के बदन पर लिपटा हुआ आखिरी कपड़ा भी हटा दिया.

अपने सामने नमिता के हुस्न का दीदार कर के सुदेश पागल हो उठा. उस ने अपना मोबाइल फोन एक तरफ रख दिया और नमिता के नंगे बदन पर अपने होंठों को बेतहाशा रगड़ने लगा.

नमिता ने भी अपनी आंखें बंद कर ली थीं और सुदेश भी पूरी तरह से जोश में आ चुका था.

सुदेश के मर्दाने और कठोर जिस्म ने नमिता के नरम और गुदगुदे जिस्म में प्रवेश कर लिया. नमिता भी अपने हाथों से सुदेश की पीठ को सहलाने लगी.

अभी दोनों ने सैक्स का मजा लेना ही शुरू किया था कि नमिता ने सुदेश से कहा, ‘‘तुम नीचे आओ… मैं तुम्हारे ऊपर आना चाहती हूं.’’

नमिता को इतने सैक्सी अंदाज में सुदेश ने पहले कभी नहीं देखा था. वह मुसकराने लगा और नमिता के बदन से बिना अलग हुए ही एक करवट ले कर नमिता के बदन के नीचे हो गया और अब नमिता सुदेश के ऊपर बैठी हुई थी.

‘‘सुदेश, तुम भले ही औफिस में मेरे बौस होगे, पर बिस्तर पर मैं तुम्हारी बौस हूं. यहां तो मेरी मरजी ही चलेगी… अब तुम देखो, मैं तुम्हे कैसे मजा देती हूं…’’

नमिता ने सुदेश की टांगों के बीच

में बैठेबैठे ही आंखें बंद कर लीं और

वे दोनों सैक्स के चरमसुख के लिए एकसाथ बढ़ चले.

कमरे की दूधिया रोशनी में नमिता का गोरा बदन मक्खन जैसा चमक रहा था. सुदेश की नजर नमिता पर पड़ी, तो उसे लगा कि जैसे वह किसी हाईक्लास धंधे वाली के साथ सैक्स कर रहा है.

नमिता के लटके?ाटकों से उन दोनों को चरमसुख मिल चुका था और नमिता एक मीठी सी हिचकी लेने के बाद सुदेश के सीने पर निढाल हो कर लिपट गई थी. दोनों बहुत देर तक एकदूसरे से चिपके पड़े रहे.

सुदेश एक पैसे वाला आदमी था. उस का औफिस लखनऊ के हजरतगंज में बने विशाल टौवर में था और उस के औफिस में ही नमिता काम करती थी.

नमिता 27 साल की एक शादीशुदा और काफी आकर्षक औरत थी. 5 फुट, 7 इंच की नमिता को अपनी लंबाई और हुस्न का गुमान भी था, इसलिए उस ने मौडलिंग में भी काम किया, पर वहां कुछ खास न कर पाने के चलते मौडलिंग को छोड़ दिया और प्राइवेट नौकरी करने लगी.

हालांकि नमिता को अभी सुदेश का औफिस जौइन किए हुए एक साल ही हुआ था, पर अपनी दिलकश अदाओं और खूबसूरती के चलते जल्दी ही उस

ने बौस सुदेश को अपने हुस्न का दीवाना बना दिया था.

सुदेश को नमिता के जिस्म का मजा मिलता, तो बदले में वह नमिता को नौकरी में प्रमोशन देता और आएदिन उस पर पैसे भी लुटाता रहता था.

उन दोनों में कई बार सैक्स हो चुका था, कभी किसी होटल में, तो कई बार तो वे दोनों कार के अंदर ही सैक्स का मजा ले चुके थे.

नमिता का पति तरुण एक सेल्स कंपनी में काम करता था, जिस के चलते उसे कभीकभी कई दिनों तक घर से बाहर रहना पड़ता था, पर ऐसा नहीं था कि तरुण शारीरिक रूप से या नमिता को बिस्तर पर संतुष्ट कर पाने में कुछ कमजोर था, बल्कि नमिता एक ऐसी औरत थी, जो खूबसूरत मर्दों की तरफ सहज ही आकर्षित हो जाती थी और अगर वह मर्द पैसे वाला है, तो उस के साथ फ्लर्ट करने से भी नहीं चूकती थी.

एक दिन सुदेश ने शाम के 4 बजे नमिता को अपने केबिन में बुलाया और बोला, ‘‘आज शाम का क्या प्लान है मैडम?’’

‘‘सर, आज शाम को मैं जल्दी घर जाने वाली हूं, क्योंकि आज मेरे पति को बाहर जाना है और फिर मेरी तबीयत भी ठीक नहीं लग रही है,’’ नमिता ने शरारत भरी मुसकराहट के साथ कहा, जिस पर सुदेश खुश होते हुए बोला, ‘‘कोई बात नहीं… लगता है कि तुम्हारी तबीयत सही करने मु?ो तुम्हारे फ्लैट पर आना होगा.’’

सुदेश की बात का जवाब नमिता ने रूमानी अंदाज से मुसकरा कर दिया.

उस दिन नमिता औफिस से जल्दी ही निकल गई और तरुण का ट्रैवल बैग तैयार कराने में उस की मदद करने लगी. कुछ देर बाद तरुण ‘बाय’ कर के निकल गया, तो नमिता सोफे पर बैठ गई और उस ने सुदेश के मोबाइल फोन पर काल कर के तरुण के बाहर चले जाने की बात बता दी.

तकरीबन एक घंटे बाद सुदेश नमिता के दरवाजे पर खड़ा था. उस के हाथ में ह्विस्की की एक बोतल थी.

‘‘आज तो बड़े खतरनाक मूड में लग रहे हो तुम,’’ नमिता ने दरवाजा बंद करते हुए कहा. इस के बदले में सुदेश नमिता को अपनी बांहों में भरने लगा.

‘‘अरे, अभी नहीं बाबा… अभी मु?ो खाना बनाना है.’’

‘‘खाना तुम पकाती रहना और खाती रहना… मु?ो तो जल्दी निकलना है,’’ ह्विस्की की बोतल खोलते हुए सुदेश ने कहा और फटाफट पैग बना कर पी गया.

सुदेश की आंखों में खुमारी और हवस के लाल डोरे तैरने लगे थे. उस ने अपनी बांहों में नमिता को भर लिया और उस के कोमल जिस्म को सहलाने और चूमने लगा. नमिता भी बराबर उस का साथ दे रही थी. उसे सुदेश की गरम सांसों से आती हुई महंगी शराब की खुशबू बहुत अच्छी लग रही थी.

सुदेश और नमिता दोनों पूरी तरह बिना कपड़ों के हो चुके थे और जम कर सैक्स का मजा लेने जा रहे थे. इस से पहले कि सुदेश नमिता में प्रवेश करता, उस ने अपने छोटे से बैग से एक हथकड़ी निकाल ली और नमिता के हाथों को उस में फंसाने की कोशिश करने लगा.

‘‘यह क्या कर रहे हो तुम?’’ नमिता ने पूछा.

‘‘अरे मेरी जान… यह विदेशी स्टाइल है. सैक्स का असली मजा तो अंगरेज लोग ही लेते हैं… अब बस तुम अपने हाथ इस में फंसा लो और फिर देखो तुम्हें कितना मजा आता है…’’

नमिता की दोनों बांहें हथकड़ी से बिस्तर के सिरहाने इस तरह से लौक कर दी गई थीं कि वह चाह कर भी इस से आजाद नहीं हो सकती थी.

नमिता को हथकड़ी में कैद कर के सुदेश उसे बंधा हुआ देख कर मजा लेने लगा और उस के बदन को सहलाने लगा. नमिता भी जोश में आ कर गरम सिसकियां भर रही थी.

सुदेश और नमिता की गरमागरम सिसकियों से पूरा कमरा धधक उठा था और इस से पहले कि वे दोनों चरमसुख तक पहुंचते, फ्लैट के दरवाजे में इंटरलौक में चाबी फंसने की आवाज आई और इस से पहले कि वे दोनों कुछ सम?ा पाते, फ्लैट के कमरे का दरवाजा खुल चुका था और उन की आंखों के सामने तरुण खड़ा था.

सुदेश की सारी मर्दानगी इस तरह अचानक तरुण को देख कर रफादफा हो गई. वह अपने कपड़ों की ओर लपका और जल्दबाजी में उलटेसीधे ढंग से पहनने लगा और इस कोशिश में वह गिरतेगिरते भी बचा.

तरुण अब भी हैरान खड़ा था और सब से बुरी हालत तो नमिता की हो रही थी, जो पूरी तरह से बेपरदा अपने पति के सामने पड़ी हुई थी और उस के दोनों हाथ हथकड़ी में बंधे हुए थे.

‘तड़ाक…’ एक जोरदार तमाचा तरुण ने नमिता के गाल पर लगाया और उस के बालों को गुस्से में खींच लिया. इतनी देर में सुदेश को वहां से भागने का मौका मिल चुका था.

रिश्तों की मर्यादा: क्या तरुण ने नमिता को तलाक दिया?

झोपड़ी में बुझाई तन की आग: रसवंती को रास न आया अवैध संबंध

सौजन्य- सत्यकथा, अप्रैल 2022

बात मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के चितरंगी थानांतर्गत धवई गांव की है. थानाप्रभारी अपने औफिस में दैनिक कामों में लगे हुए थे. तभी उन्हें चितरंगी-कर्थुआ रोड पर स्थित एक झोपड़ी में किसी महिला की लाश मिलने की सूचना मिली.

सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ वह पर घटनास्थल के लिए रवाना हुए. उन के वहां पहुंचने से पहले ही काफी भीड़ वहां जुट चुकी थी. थानाप्रभारी ने भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति से इस बारे में बात की.

उस व्यक्ति ने बताया कि हम गांव वालों को काफी दिनों से आसपास में अजीब सी दुर्गंध आ रही थी. हमें लगा कि कोई जानवर मरा होगा, उसी से बदबू आ रही होगी. किंतु ऐसा नहीं था. यह बदबू तो रसवंती नामक महिला की झोपड़ी से आ रही थी.

पुलिस द्वारा तुरंत मौके का बारीकी से निरीक्षण किया गया, वहां चारपाई के नीचे रसवंती की लाश पड़ी थी, जो पूरी तरह से सड़ चुकी थी. मामले की गंभीरता को देखते हुए थानाप्रभारी डी.एन. राज ने इस की सूचना अपने एसडीपीओ राजीव पाठक को दी. सूचना मिलते ही वह तत्काल मौके पर पहुंचे. यह बात 11 नवंबर, 2021 की थी.

लाश को देखने के बाद यह तय कर पाना काफी मुश्किल था कि यह मामला स्वाभाविक मौत का है या हत्या का. पुलिस ने सुराग तलाशने के लिए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. जिस के बाद गांव वालों से पूछताछ शुरू की, लेकिन कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आने पर पता चला कि रसवंती की मृत्यु गला घोटने से हुई थी. जिस के बाद एसडीपीओ राजीव पाठक के निर्देश पर चितरंगी थाने में अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर जांच प्रारंभ कर दी.

चूंकि महिला की सुरक्षा एवं उन से जुड़े मामले शासन के उच्च प्राथमिकता वाले विषयों में से हैं, जिस के कारण एसपी (सिंगरौली) वीरेंद्र कुमार सिंह स्वयं ही इस मामले की जांच को खुद आगे बढ़े.

एसडीपीओ राजीव पाठक ने सब से पहले गांव वालों से पूछताछ की, जिस में पता चला कि रसवंती शादीशुदा और एक बच्चे की मां थी, मगर लंबे समय से अपने पति व बच्चे को छोड़ कर धवई गांव में अपने भाई के साथ रहती थी.

जिस के बाद पारिवारिक झगड़ों के चलते वह गांव से बाहर चितरंगी और कर्थुआ रोड पर एक झोपड़ी बना कर अकेली ही रहने लगी थी.

चूंकि रसवंती अकेली रहती थी और काफी समय से गांव में ही रहती थी, इस कारण उस के बारे में जो भी जानकारी मिल सकती थी, वह गांव वालों से ही मिलती. लेकिन गांव वालों का सहयोग पुलिस को नहीं मिला.

तब थानाप्रभारी ने अपने मुखबिरों को सक्रिय किया और अपने मुखबिरों द्वारा जानकारी हासिल करने का प्रयास शुरू कर दिया था.

इस कोशिश में कई महत्त्वपूर्ण जानकारी पुलिस के हाथ लगी थीं. पता चला कि रसवंती कोई काम नहीं करती थी. वह केवल एक छोटी सी किराने की दुकान लगा कर अपना गुजारा करती थी, जोकि काफी नहीं था. पुलिस को पता चला कि वह इस दुकान की आड़ में अपना जिस्म बेच कर गुजारा चलाया करती थी.

इस की जानकारी मिलने पर थानाप्रभारी को यह मामला अवैध संबंधों का लगा. एसडीपीओ के निर्देश पर ऐसे लोगों की जानकारी जुटाने का काम शुरू किया गया जो अकसर रसंवती के संपर्क में रहते थे या उस से मिलने झोपड़ी में आया करते थे.

जांच के दौरान पुलिस को इस बात की जानकारी मिली कि रसवंती की झोपड़ी में बिजली नहीं थी. उसे अपने काम के लिए प्राकृतिक रोशनी पर ही निर्भर रहना पड़ता था. जिस वजह से वह अपने पास टौर्च या मोबाइल तो रखती ही होगी, लेकिन पुलिस को ये दोनों की सामान मौके से नहीं मिले.

इस से शक हुआ कि शायद मोबाइल और टौर्च दोनों ही हत्यारे अपने साथ ले गए होंगे. एसडीपीओ ने गांव वालों से पूछताछ करतेकरते इतना तो समझ लिया था कि हत्यारा इसी गांव का होगा.

इसलिए उन्होंने जांच के परिणामों को गांव वालों के बीच फैलाना शुरू कर दिया. इस का नतीजा भी जल्द ही सामने आ गया, जब 2 दिनों बाद गांव में एक जगह पर रसवंती की टौर्च पड़ी मिली, जो हत्या के बाद से ही गायब थी.

टौर्च जिस स्थान पर मिली, उस के आसपास रहने वालों की सूची तैयार करवाई गई तथा इस बात की जानकारी जुटाई कि इन में से कौन रसवंती से रात में मिलने आया करते थे. इस में से एक नाम सामने आया 22 साल के प्रिंस यादव का.

पुलिस को जानकारी मिली कि भले ही प्रिंस रसंवती से आधे से भी कम उम्र का था, लेकिन रसवंती के पास उस का आनाजाना भी काफी था. यहां तक कि शादी होने के बाद भी प्रिंस ने रसवंती के यहां आनाजाना नहीं छोड़ा था.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने प्रिंस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस में पता चला कि प्रिंस और रसवंती के बीच अकसर फोन पर काफीकाफी देर तक बातचीत होती रहती थी.

इतना ही नहीं, लाश मिलने के 15 दिन पहले जिस रोज रसवंती का फोन बंद हुआ था. तब उस के फोन पर आखिरी बार बात प्रिंस ने ही की थी. इसलिए पुलिस ने प्रिंस यादव को हिरासत में ले कर पूछताछ की, जिस में पहले तो वह पुलिस को गुमराह करने का प्रयास करने लगा.

लेकिन वह ज्यादा देर टिक नहीं पाया और उस ने अपने दोस्त गांव के ही युवक अजीत यादव के साथ मिल कर रसवंती की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली.

इस के बाद पुलिस ने गांव से अजीत यादव को भी गिरफ्तार कर लिया, जिस के बाद हत्या के पीछे की कहानी इस प्रकार सामने आई—

पति को छोड़ कर मायके लौटी रसवंती कुछ साल तक तो भाई के घर में आराम से रही, लेकिन समय के साथ उसे अपनी जिंदगी में एक पुरुष की कमी खलने लगी थी.

पति को छोड़ कर अकेली रह रही रसवंती पर गांव के कुछ युवकों की भी नजर थी और यह बात रसवंती भी जानती थी. फिर उस ने उन्हीं युवकों में से एक को चुन लिया और अपने तन की प्यास बुझाने का रास्ता खोज निकाला.

युवक से दोस्ती हुई तो वहां जरूरत पड़ने पर उसे खर्च करने के लिए पैसे भी देने लगा. यहीं से रसवंती को अपनी देह की कीमत का पता चला. उसे लगा कि यदि वह 2-4 युवकों को अपने पास आने का मौका दे तो उस की शारीरिक जरूरत तो पूरी होगी ही, साथ ही कुछ आमदनी भी हो जाया करेगी.

यही सोच कर उस ने गांव के कई युवकों से संबंध बना लिए थे. रसवंती के हरकतों की यह जानकारी जब उस के भाई को हुई तो उस ने उसे टोका तो 10 साल पहले रसवंती ने भाई का घर छोड़ दिया और खुद एक झोपड़ी बना कर रहने लगी.

चूंकि यह झोपड़ी रसवंती की अपनी थी तो वह जिसे चाहे उसे वहां मिलने के लिए बुला लिया करती थी. इस के अलावा उस ने दिखावे के लिए वहां एक छोटी सी दुकान भी लगा ली थी. वक्त के साथ रसवंती की उम्र बढ़ने लगी, इसलिए गांव के युवकों ने उस में दिलचस्पी लेनी कम कर दी.

जो उस की उम्र के थे, वे घरपरिवार वाले थे सो जब रसवंती के पास आने वाले मर्दों की संख्या घटने लगी तो रसवंती ने नया दांव खेला. उस ने कम उम्र के लड़कों को सैक्स का चस्का लगाना शुरू किया.

प्रिंस यादव भी रसवंती की इस योजना का शिकार 16 साल की उम्र में ही बन गया था. चूंकि उस वक्त तक प्रिंस के मन में सैक्स के प्रति एक नया ही नशा था, सो वह रसवंती को ही सब से बड़ा सुख मान कर उस के पास आने लगा.

रसवंती इश्क तो किसी से करती नहीं थी. उस के लिए तो यह काम भी पैसा कमाने का एक जरिया था. इसलिए प्रिंस से भी वह अपनी पूरी कीमत वसूलती थी.

वह रसवंती के पास केवल सैक्स का सुख लेने आया था, लेकिन धीरेधीरे वह उस का दीवाना हो गया. वह लगभग रोज ही उस से मिलने आने लगा.

कहना नहीं होगा कि अब रसवंती प्रिंस के लिए प्यार बन गई थी. जबकि प्रिंस, रसवंती के लिए एक सौदा था, इसलिए वह आए दिन उस से पैसों की मांग करती रहती थी. प्रिंस भी उसे यदाकदा खर्च के लिए पैसे देता रहता था.

प्रिंस 21 साल का हो गया तो उस के घर वालों ने उस की शादी कर दी. लेकिन पत्नी के आने के बाद भी उस का रसवंती के पास जाना कम नहीं हुआ.

दरअसल, रसवंती के लिए सैक्स एक धंधा था, इसलिए वह जानती थी कि उस के पास दूसरों से कुछ अलग नहीं होगा तब तक उस के पास ग्राहक क्यों आएगा. इसलिए प्रिंस जैसे युवकों को वह हर उस तरीके से संतुष्ट करने को राजी रहती थी. जिस की मांग युवा वर्ग में अधिक है.

इस की वह कीमत भी खूब वसूलती थी. लेकिन वह भूल चुकी थी कि प्रिंस के मन में जो पागलपन 16 साल में था, वह इन 6 सालों मे नहीं रह गया. दूसरा प्रिंस की शादी भी हो चुकी थी, इसलिए रसवंती उस की जरूरत भी नहीं रह गई थी. रसंवती द्वारा पैसों की मांग उस के लिए अब भारी पड़ने लगी थी.

जबकि उम्र बढ़ने से दीवानों की संख्या कम हो जाने के कारण रसवंती प्रिंस से ज्यादा से ज्यादा पैसा वसूलना चाहती थी. इसलिए दोनों के बीच पैसों को ले कर विवाद होने लगा था.

इस से तंग आ कर प्रिंस ने रसवंती के पास जाना बंद कर दिया. रसवंती जवान होती तो दूसरा दीवाना खोज लेती. अब 48 साल की उम्र में उसे कोई प्रिंस के जैसा दीवाना तो मिलने से रहा, इसलिए वह प्रिंस पर मिलने के आने के लिए दबाव बनाने लगी.

उस का कहना था कि अगर प्रिंस उस से मिलने नहीं आएगा तो वह पूरे गांव में पिं्रस के साथ अपने संबंधों का ढिंढोरा पीट देगी. प्रिंस इस बात से परेशान हो गया तो उस ने अपने दोस्त अजीत यादव के साथ मिल कर रसवंती की आवाज हमेशा के लिए खामोश करने की ठान ली.

इस के लिए योजना बना कर दोनों दोस्त 27 अक्तूबर, 2021 की शाम रसवंती के पास पहुंचे, जहां उसे कुछ रुपए दे कर दोनों ने बारीबारी से पहले तो रसवंती के साथ संबंध बनाए. फिर साथ में लाई जानवर बांधने की रस्सी से उस का गला दबा कर हत्या कर दी और लाश को वहीं चारपाई के नीचे डाल कर घर आ गए.

चूंकि रसवंती गांव में बदनाम थी, इसलिए उस के गांव में न दिखने पर भी किसी ने न तो उस की चर्चा की और न ही खोजखबर ली.

रसवंती की हत्या का पता उस समय चला, जब उस की लाश सड़ जाने के कारण फैल रही बदबू से लोग परेशान हो गए और उन्होंने पुलिस को खबर दी.

पुलिस ने आरोपी प्रिंस यादव और अजीत यादव से पूछताछ कर उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

जीवनज्योति- भाग 3: क्या हुआ था ज्योति के साथ

सुनसान रात में जिस भय की उपस्थिति से भी नहीं घबराई थी ज्योति, अचानक उस के न होने की कल्पना मात्र से कांप गई थी वह. एक हांक लगाई थी ज्योति ने, ‘‘ज…ज…जीवन?…मिस्टर जीवन, चले गए क्या?’’

‘‘गलत सोच रही हो, ज्योति. मैं तो तुम्हारा जीवन हूं और तुम्हारी खातिर मौत से भी लड़ने को तैयार हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं तो तुम्हें तभी छोड़ं ूगा जब मुझे यह विश्वास हो जाएगा कि मौत की गोद में तुम गहरी नींद सो गई हो.’’

‘‘अच्छा, फिर तुम गायब कहां हो गए थे?’’

‘‘गायब तो नहीं, हां चुप जरूर हो गया था. क्यों मेरा चुप हो जाना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?’’

अब क्या जवाब दे ज्योति इस प्रश्न का. एकदम से कोई बहाना नहीं सूझ रहा था उसे.

‘‘ऐ ज्योति, सच क्यों नहीं कहतीं कि तुम्हें मुझ से यानी अपने इस जीवन से पे्रम हो गया है.’’

अचानक ठठा कर हंस पड़ी ज्योति. कुछ ऐसा कि एक क्षण तक कुछ बोल नहीं पाई. किसी तरह खिलखिलाते हुए एकएक शब्द जोड़जोड़ कर बोल पड़ी वह, ‘‘तुम्हारा मतलब प्यार,’’ और इसी के साथ हंसती हुई वह दोहरी होती जा रही थी.

‘‘हंसो ज्योति, इतना हंसो कि अवसाद का अंधेरा छंट जाए, निराशा भरी इस निशा का अंत हो जाए. आशा की एक नई सुबह आए, उम्मीदों की किरणें फूटें, उमंग और उत्साह के पक्षी चहचहाने लगें.’’

हांफती हुई ज्योति ने स्वयं को कुछ नियंत्रित किया और आंखों की नमी को पोंछती हुई कह उठी थी, ‘‘पता नहीं मैं इतना क्यों हंसने लगी?’’

‘‘इसलिए कि तुम्हारा जीवन बहुत प्यारा है. वह तुम्हें हंसाना चाहता है. जिंदा देखना चाहता है क्योंकि जीवन ही हंसी है, खुशी है, आशा है, प्रेम है और मौत निराशा है, खामोशी है.’’

ज्योति ने गंभीरता ओढ़ ली थी. लेकिन जीवन गंभीर नहीं था. उस ने एक के बाद एक कई सवाल कर डाले.

‘‘अच्छा ज्योति, यह तो बता दो कि तुम ने अपने घर वालों के नाम कोई संदेश, कोई चिट्ठी छोड़ी है या नहीं? तुम्हारे इस तरह चले जाने से क्या बीतेगी तुम्हारे मांबाप पर, बहनें क्या सोचेंगी, इस बारे में भी तुम ने कुछ सोचा है? वह बेचारा मुनीम, क्या तुम्हारी मौत और समाज की उठती उंगलियों को एकसाथ झेल पाएगा?’’

सच के एकएक बड़े पत्थर बारबार जीवन व्यावहारिकता के उस तालाब में फेंक रहा था जिस की ऊपरी परत पर बर्फ का एक बड़ा आवरण पसर गया था. ऐसा भी नहीं था कि बर्फ के नीचे का पानी हिलोरे नहीं ले रहा था. क्षोभ की तरंगें उठ रही थीं ज्योति के अंतस में भी. पर सोच लिया था उस ने कि अब किसी बात की कोई सफाई नहीं देगी वह.

‘‘वाह, ज्योति वाह, जिंदगी भर तुम्हारी खुशी के लिए जीतेमरते तुम्हारे बाप ने अपने दिल का बोझ कम करने के लिए दो कड़वे बोल बोल दिए जो तुम्हें इतने चुभ गए कि अब आत्महत्या कर के यह जताना चाहती हो कि बेटी के बाप को हर वक्त पश्चात्ताप की आग में ही जलते रहना चाहिए. अरे, वह तो एडि़यां घिसघिस कर तुम तीनों बहनों की शादी करने और गृहस्थी बसा देने के बाद ही मरेगा मगर तुम अभी से ही उसे जीतेजी क्यों मारना चाहती हो?

‘‘सोच लो ज्योति, तुम्हारी मौत की खबर पा कर जमाने के ताने सुन कर तो तुम्हारे पिताजी किसी सेठ की ड्योढ़ी पर मुनीमगीरी के लायक भी नहीं रहेंगे. फिर क्या तुम्हारा बाप, मुंशी रामप्यारे सहाय, किसी मंदिर या रेलवे स्टेशन की सीढि़यों पर बैठ कर भीख मांगेगा? क्या तुम्हारी मां, सुमित्रा देवी इस बुढ़ापे में पेट के लिए घरघर जा कर झाड़ूबर्तन, चूल्हेचौके का काम करेंगी? नीतू और पिंकी अपनी तमन्नाओं का गला घोंट कर किसी नाचनेगाने वाली गली के कोठे की जीनत बनेंगी?’’

ऐसे सख्त पत्थरों की वार से दरक गया था ज्योति का मन. बर्फ का आवरण था, कोई लोहे की चादर नहीं. बिलबिला कर बाहर आ गया था भीतर का सारा गुबार, झल्ला कर चीख पड़ी थी ज्योति अपना फैसला सुनाते हुए, ‘‘तो जहन्नुम में जाएं? कोई जिए या मरे मुझे क्या? मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि लड़की होना अभिशाप है और मैं अपनी जीवनलीला समाप्त कर खुद को इस अभिशाप से मुक्त करना चाहती हूं, सुन रहे हो तुम? मैं खुद को मार देना चाहती हूं.’’

और इसी झल्लाहट में पुल के आखिरी किनारे पर अपना कदम बढ़ा गई थी ज्योति.

जीवन भी चुप नहीं था. जताना चाहता था कि सचमुच जिंदगी की आखिरी सांस तक वह उस के साथ है. उस की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘ज्योति, जीवन एक जंग है. इस से भागने वाले कायर कहलाते हैं. जिन में विश्वास, उत्साह, साहस और लगन होती है वह मौत को धत्ता बता कर जीवन को गले लगाते हैं. निराशा को नहीं आशा को गले लगाते हैं. वैसे तुम आत्महत्या कर रही हो तो करो, मगर मुझे यकीन है कि अनिश्चितताओं और हताशा के अंधेरे में भी राह दिखाने के लिए एक ज्योति जरूर जगमगाती रहेगी. याद रखना इस रात की भी एक सुबह जरूर होगी, इस निशा का अंत होगा, ज्योति.’’

हर रात की सुबह होती है. उस रात की भी सुबह हुई और सूर्य भी कब सिर पर चढ़ आया. पता नहीं चला. मुंशीजी के घर में व्याप्त खामोशी को किसी ने झंझोड़ा था, सांकल पीटपीट कर खटखट खट्टाक…खट…

आंखों पर चश्मा चढ़ाते मुंशीजी ने थके कदमों से चल कर दरवाजा खोला था. पोस्टमैन लिफाफा थामे बड़बड़ाया, ‘‘रजिस्ट्री डाक है, लीजिए और यहां दस्तखत कर दीजिए.’’

लिफाफे में से कागज निकाल कर पढ़ते ही मुंशी रामप्यारे सहाय की आंखें आश्चर्य से फैलती चली गईं. सहसा विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मुंशीजी को, उस आशय पर जो इस पत्र में लिखा था. झुरझुरी ले कर स्वयं को सामान्य किया तो आंखें बरस पड़ीं. रुंधे गले से भावातिरेक में उन्होंने पुकारा, ‘‘अजी सुनती हो, सुमित्रा… नीतू, पिंकी…जानता था मैं कि ज्योति एक न एक दिन जरूर कुछ न कुछ ऐसा करेगी. अरे, सुनती हो…सुमित्रा…’’

बाबूजी का इस तरह सुबहसुबह चिल्लाना सब को एक घबराहट दे गया था. बदहवासी के कुछ ऐसे ही आलम में सभी दौड़तेकूदते बाबूजी के पास आ गए थे. सुमित्रा, नीतू, पिंकी सब की आंखों में एक सवालिया निशान और मन में बेचैनी कि आखिर हुआ क्या?

बाबूजी, बच्चों की भांति बिलखते हुए बोले, ‘‘कितना गलत कहा था मैं ने सुमित्रा, काश, इतनी कड़वी बातें उसे कल न कहता तो इतनी आत्मग्लानि, इतना पछतावा तो मुझे न होता, ज्योति… ज्योति…कहां हो ज्योति?’’

‘‘जी, मैं यहां हूं, बाबूजी…’’ कमरे के अंदर, दरवाजे की ओट से लगी, ज्योति सामने आ कर खड़ी हो गई थी. बाबूजी के बचेखुचे शब्द ज्योति के करीब आते ही तरलता में परिवर्तित हो कर मुंह के अंदर ही उमड़ने लगे थे. क्या कहें, कैसे कहें, बाबूजी की इस भावविह्वलता को देख कर ज्योति की आंखें अपनेआप छलक आई थीं.

‘‘मैं ने सब सुन लिया है, बाबूजी. आप मन में ग्लानि क्यों लाते हैं. आप की जगह कोई भी होता तो वही कहता जो आप ने कहा था. दरअसल, गलती हमें समझने में हुई, बाबूजी.’’

खुशी से चहक उठे थे मुंशीजी, ‘‘अरे, गोली मार अलतीगलती को. सुमित्रा…3-3 बेटियों का बाप, यह मुनीम रामप्यारे सहाय ग्लानि क्यों करेगा? सीना ठोक कर चलेगा जमाने के सामने…सीना ठोक कर.’’

पत्र दिखाते हुए ज्योति के ठीक सामने तन कर खड़े हो गए थे बाबूजी, ‘‘ये देख, तेरा नियुक्तिपत्र. पढ़ न? पुलिस की सब से बड़ी आफीसर की नौकरी मिल गई है तुझे, ज्योति सहाय, आई.पी.एस. जयहिंद, मैडम.’’

जमीन पर पांव धमका कर एक जोरदार सैल्यूट दिया था मुंशीजी ने अपनी ज्योति बिटिया को.

पुलक उठी थी सुमित्रा, नीतू और पिंकी भी. सचमुच कंगले की ड्योढ़ी पर आसमान भी झुक गया था आज. और इस आसमान को झुका लाई थी एक बेटी, ज्योति.

कुछ खुशियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें सब के साथ बांटा तो जा सकता है, मगर उन्हें महसूस करने, आत्मसात करने के लिए किसी एकांत की आवश्यकता होती है. एक ऐसा एकांत जहां आंखें मूंद कर गुजरे वक्त के एकएक क्षण का हिसाबकिताब तो होता ही है, आने वाले समय के गर्भ में छिपे कई पहलुओं को सजायासंवारा भी जाता है.

ज्योति भाग कर अपने कमरे में चली गई. कभी हंसतेहंसते रोई, तो कभी रोतेरोते हंसती रही. मनोभावों का प्रवाह कम हुआ तो वह आईने के पास आ खड़ी हुई जहां अब ज्योति नहीं, बल्कि आई.पी.एस. ज्योति सहाय का अक्स उभर आया था. भरेपूरे गोरे बदन पर कसी खाकी वरदी, कंधे पर चमचमाता अशोक स्तंभ, सिर पर आई.पी.एस. बैज लगा हैट, चौड़े लाल बेल्ट में लटका रिवाल्वर, लाल बूट और चेहरे पर शालीनता से भरा एक अद्वितीय रौब.

शायद इसी अक्स को देख कर किसी ने बहुत करीब आ कर कहा था उसे, ‘‘बधाई हो, ज्योति.’’

मनप्राण में रचबस गई इस आवाज को अंतस में महसूस किया था ज्योति ने. आंखें बंद कर के वह अपने मन के अंदर झांक आई थी. जहां सचमुच मुसकराता हुआ उस का प्यारा जीवन था और जहां जल रही थी एक जीवनज्योति.

सत्यकथा: गुनाह बन गया भूला-बिसरा प्यार

12 जनवरी, 2022 सुबह के करीब 11 बजे का वक्त था. जबलपुर जिले के चरगवां पुलिस थाने के टीआई विनोद पाठक बाहर धूप में बैठे टेबल पर रखी कुछ फाइलें उलटपलट कर देख रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर बजी घंटी ने उन का ध्यान फाइलों से हटा दिया. जैसे ही काल रिसीव की, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘सर मैं घुघरी गांव का सरपंच राजाराम करपेती बोल रहा हूं.‘‘

‘‘हां सरपंचजी, बोलिए आज कैसे फोन किया?’’ टीआई ने कहा.

‘‘सर सुबह गांव के कुछ लोगों ने घुघरी कैनाल में एक लाश तैरती देखी है. आप पुलिस टीम ले कर जल्दी गांव आ जाइए, गांव में दहशत का माहौल है.’’

‘‘ठीक है सरपंचजी, चिंता मत कीजिए, मैं जल्द ही वहां पहुंच रहा हूं.’’ टीआई विनोद पाठक ने सरपंच से कहा और घटना की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देने के बाद पुलिस टीम के साथ वे घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

जबलपुर जिले का चरगवां पुलिस थाना क्षेत्र नरसिंहपुर जिले की सीमा से लगा हुआ है. पूरे इलाके में नर्मदा नदी पर बने वरगी डैम का पानी नहर (कैनाल) के माध्यम से खेतों में जाता है, जिस से सिंचाई का काम होता है.

चरगवां से करीब 10 किलोमीटर दूर घुघरी गांव में कुछ ही देर में पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. घुघरी कैनाल में जहां लाश तैर रही थी, वहां नहर के दूसरी तरफ सोमती गांव है.

नहर पार करने के लिए एक पुल बना हुआ था, जिस पर रैलिंग नहीं थी. पुलिस का अंदाजा था कि हो सकता है कि किसी दुर्घटना की वजह से कोई नहर में गिर गया होगा.

सरपंच और गांव वालों की मदद से काफी मशक्कत के बाद पानी में तैरती लाश रस्सी से बांध कर बाहर निकाला गया. तब तक बरगी जबलपुर की सीएसपी अपूर्वा किलेदार और फोरैंसिक टीम की डा. नीता जैन भी वहां पर पहुंच चुकी थीं. लाश काफी फूल चुकी थी.

मृतक के गले में एक मफलर लिपटा मिला था. मृतक काली पैंट, चैक वाली शर्ट और नीले रंग की जरकिन और पांव में जूते पहने हुए था. गले में लिपटे मफलर को हटाने पर मफलर के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश की शिनाख्त नहीं कर पाया था. तब पुलिस ने मृतक की शिनाख्त के लिए सोशल मीडिया पर उस की फोटो प्रचारित कर दी. वायरल हुई फोटो के आधार पर ही कुछ ही घंटों में पुलिस को पता चल गया कि नहर में मिली लाश जबलपुर के गोरखपुर थाना क्षेत्र के कैलाशपुरी में रहने वाले 41 साल के संदीप वगारे की है.

पुलिस की जांच में पता चला कि संदीप 9 जनवरी, 2022 की शाम करीब 7 बजे से अपने घर से निकला था, जिस की तलाश उस के घर के लोगों द्वारा की जा रही थी.

सूचना पा कर संदीप वगारे के घर वाले मौके पर पहुंच गए और उन्होंने लाश की शिनाख्त संदीप वगारे के रूप में कर ली. उस के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

2 दिन बाद आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि संदीप की गला घोट कर हत्या कर उसे नहर में फेंका गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ संदीप वगारे की हत्या कर लाश छिपाने का मामला दर्ज कर लिया.

जबलपुर जिले के एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा, एडीशनल एसपी शिवेश सिंह बघेल और सीएसपी अपूर्वा किलेदार के निर्देश पर टीआई विनोद पाठक के नेतृत्व में थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम गठित की गई.

टीम में एएसआई एस.आर. पटेल, उषा गुप्ता, हैडकांस्टेबल प्रदीप पटेल, कांस्टेबल रोशनलाल, लेडी कांस्टेबल भारती, क्राइम ब्रांच के एसआई राम सनेही शर्मा, हैडकांस्टेबल अरविंद श्रीवास्तव, साइबर सेल के अमित पटेल आदि को शामिल किया गया.

पुलिस के लिए संदीप वगारे की हत्या की गुत्थी सुलझाना किसी चुनौती से कम नहीं था. संदीप के घर वालों से पूछताछ में पता चला कि वह शराब पीने का आदी था. इसी वजह से कुछ महीने पहले उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई थी.

संदीप का मोबाइल भी घटनास्थल पर नहीं मिला था. पुलिस टीम ने उस के घर वालों से उस का मोबाइल नंबर ले कर काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स में पता चला कि उस की आखिरी बात 9 जनवरी, 2022 को शाम करीब 6 बजे किसी लक्ष्मी शिवहरे से हुई थी.

पुलिस लक्ष्मी शिवहरे तक पहुंच गई. 44 साल की लक्ष्मी शिवहरे नाम की महिला मूलरूप से मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के धूमा की रहने वाली थी, जो अपने पति शरद शिवहरे के साथ जबलपुर की हाथीताल कालोनी में रहती थी.

पुलिस ने जब लक्ष्मी से संदीप वगारे के संबंध में पूछताछ की तो पहले तो वह पूरे घटनाक्रम से अंजान बनी रही. बाद में महिला पुलिसकर्मियों ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो संदीप के मर्डर की गुत्थी सुलझती चली गई.

लक्ष्मी ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी बहन के बेटे कपिल राय के द्वारा संदीप की हत्या कराई थी.

अब पुलिस टीम कपिल राय की खोज में जी जान से जुट गई. लक्ष्मी की बड़ी बहन का विवाह कंदेली नरसिंहपुर के संतोष राय से हुआ था. कपिल राय उन्हीं का बेटा था. पुलिस ने कपिल को भी हिरासत में ले लिया. उस ने पूछताछ में बताया कि मौसी लक्ष्मी के कहने पर ही उस ने वारदात को अंजाम दिया था.

कपिल राय और लक्ष्मी के इकबालिया बयान के आधार पर संदीप वगारे की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह शादी के पहले के प्रेम प्रसंग से जुड़ी निकली, जो इस प्रकार है—

लक्ष्मी शिवहरे का परिवार मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर के गुप्तेश्वर इलाके में रहता था. 2 बहनों में सब से छोटी लक्ष्मी तीखे नाकनक्श की खूबसूरत लड़की थी. स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही लक्ष्मी अपने मोहलले में रहने वाले संदीप वागरे को दिल दे बैठी.

संदीप के पिता उस समय जबलपुर कलेक्ट्रेट में सरकारी मुलाजिम थे. संदीप और लक्ष्मी का प्यार परवान चढ़ रहा था. वह अकसर स्कूल की क्लास बंक कर के शहर के पार्क में घूमने निकल जाते. दोनों शादी करना चाहते थे, मगर जाति की दीवार उन की शादी के रास्ते में सब से बड़ी रुकावट थी.

एक दिन जबलपुर के रौक गार्डन में दोनों भविष्य के सपने बुन रहे थे. संदीप की बाहों में बाहें डाले लक्ष्मी बोली, ‘‘मेरे घर वाले शादी के लिए लड़का देखने लगे हैं, मगर मैं तो तुम्हें चाहती हूं.’’

‘‘लक्ष्मी, मैं भी तुम्हारे बिना जी नहीं सकता. यदि घर वाले हमारी शादी के लिए राजी नहीं हुए तो हम दोनों घर से भाग कर शादी कर लेंगे.’’ प्यार के रंग में डूबे संदीप ने लक्ष्मी से कहा.

‘‘नहीं संदीप, इस से परिवार की बदनामी होगी, थोड़ा इंतजार करो हो सकता है हम घर वालों को राजी कर लें.’’ लक्ष्मी ने दिलासा दी.

संदीप और लक्ष्मी को जब भी मौका मिलता, वे एकांत में घूमतेफिरते. उन्होंने शहर के फोटो स्टूडियो जा कर एकदूसरे की बाहों में बाहें डाल कर जो फोटो खिंचवाई थी, वह संदीप के पर्स में हमेशा रहती थी.

जब लक्ष्मी के घर वालों को दोनों के प्रेम प्रसंग का पता चला तो समाज में बदनामी के डर से उन्होंने जुलाई 2006 में लक्ष्मी की शादी मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के धूमा में शरद शिवहरे से कर दी.

शरद ने उस समय धूमा में ठेकेदारी का काम शुरू किया था. लक्ष्मी की शादी होते ही वह ससुराल में रहने लगी, मगर संदीप जुदाई के गम में शराब पीने लगा. संदीप पेशे से पेंटर था. वह शहर में बनने वाले मकानों में पुट्टी और पुताई करने का काम करता था. अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वह शराबखोरी में खर्च कर देता था.

जब भी लक्ष्मी अपने मायके जबलपुर आती, संदीप उस से मिलने की कोशिश करता तो लक्ष्मी उसे समझा कर कहती, ‘‘देखो संदीप, शादी के पहले जो भी हुआ उसे भूल कर तुम भी शादी कर के अपना घर बसा लो.’’

मगर संदीप तो लक्ष्मी को भूलने तैयार नहीं था. संदीप के सिर पर तो प्यार का नशा चढ़ कर बोल रहा था. संदीप के मातापिता ने यह सोच कर उस की शादी बालाघाट जिले में कर दी कि धीरेधीरे वह लक्ष्मी को भूल कर अपनी नई जिंदगी शुरू कर देगा.

संदीप की शादी के बाद भी उस की शराब पीने की आदत नहीं छूटी, जिस का नतीजा यह हुआ कि उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई.

वक्त गुजरने के साथ लक्ष्मी एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी. अपनी मेहनत के बलबूते लक्ष्मी का पति अब माइनिंग क्षेत्र का नामी ठेकेदार बन चुका था. लक्ष्मी के पति शरद शिवहरे के पास हाईक्लास एक्सप्लोजन का लाइसैंस था. वह बड़ीबड़ी पहाडि़यों पर विस्फोटक लगा कर ब्लास्टिंग कर के अच्छीखासी आमदनी कर लेता था.

2020 में शरद अपनी पत्नी लक्ष्मी और बच्चों के साथ धूमा से आ कर जबलपुर के हाथीताल इलाके में रहने लगा था. उन का जीवन खुशहाल चल रहा था, लेकिन इस बीच लक्ष्मी के पूर्वप्रेमी संदीप वगारे को लक्ष्मी के जबलपुर आने की भनक लग गई.

हाथीताल में संदीप वगारे उस के घर के आसपास मंडराने लगा. वह अकसर पति की गैरमौजूदगी में आ कर लक्ष्मी से मिलनेजुलने लगा. पहले प्यार का नशा संदीप पर इस कदर छाया हुआ था कि आज भी वह लक्ष्मी की एक झलक पाने बेताब था.

संदीप जब भी लक्ष्मी से मिलता एक ही बात की रट लगा कर कहता, ‘‘लक्ष्मी, मैं 16 साल के बाद भी तुम्हें भुला नहीं पाया हूं.’’

इस बात को ले कर लक्ष्मी परेशान रहने लगी. लक्ष्मी भी उसे झूठमूठ की दिलासा दे कर कहती, ‘‘मेरे मनमंदिर में तो तुम्हारे नाम का ही दीया जल रहा है. मगर अपने बच्चों की खातिर अब मैं अपना परिवार नहीं छोड़ सकती.’’

संदीप उस से नजदीकियां बनाने की कोशिश करता, मगर लक्ष्मी उस से दूरी बनाने में ही अपनी भलाई समझती. संदीप अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. लक्ष्मी से मिल कर उस का पुराना प्रेम फिर से कुलांचे भरने लगा था.

एक दिन संदीप ने एक फोटो दिखा कर धमकी देते हुए कहा, ‘‘अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो ये फोटो मैं सोशल मीडिया पर वायरल कर तुम्हें बदनाम कर दूंगा.’’

लक्ष्मी ने गौर से उस फोटो को देखा तो उसे याद आ गया कि यह वही फोटो है जिसे शादी के पहले उस ने संदीप के गले में हाथ डाल कर जबलपुर के फोटो स्टूडियो में खिंचाया था.

फोटो देख कर लक्ष्मी बुरी तरह डर गई थी. उस ने संदीप से मिन्नतें करते हुए कहा, ‘‘प्लीज संदीप तुम्हें मेरे प्यार का वास्ता, ये फोटो तुम किसी को नहीं दिखाना.’’

संदीप के हाथ जब से लक्ष्मी ने अपने प्यार की फोटो देखी थी, तभी से उस का हर लम्हा डर और दहशत के साए में बीतने लगा था. लक्ष्मी को लगा कि यदि उस के पति शरद को पता चल गया तो उस की तो बसीबसाई गृहस्थी पलभर में ही रेत के महल की तरह बरबाद हो जाएगी.

उस ने कई बार संदीप को समझाने की कोशिश भी की, मगर संदीप उस का पीछा छोड़ने तैयार नहीं था.

चूंकि संदीप की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी, वह अकसर लक्ष्मी का पीछा करता. उस के घर के सामने खड़ा हो जाता. उस के घर में घुसने का प्रयास करता था. जब लक्ष्मी संदीप की हरकतों से परेशान हो गई तो इस बात की जानकारी उस ने नरसिंहपुर में रहने वाली अपनी बड़ी बहन को दे दी.

लक्ष्मी की समस्या हल करने के लिए बड़ी बहन ने यह सोच कर अपने बेटे कपिल को लक्ष्मी के पास भेज दिया कि कपिल संदीप को डराधमका कर मामले को शांत करा देगा.

नरसिंहपुर के गांधी वार्ड कंदेली में रहने वाला 25 साल का कपिल ड्राइवर होने के साथसाथ शातिर बदमाश था.

7 जनवरी, 2022 को कपिल जैसे ही अपनी मौसी के घर हाथीताल, जबलपुर पहुंचा तो लक्ष्मी ने संदीप की हरकतों से परेशान रहने की दास्तान सुनाते कहा, ‘‘कपिल, संदीप ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है. किसी भी तरह इसे मेरे रास्ते से हटा दो. यदि तुम्हारे मौसाजी को ये सब पता चल गया तो मैं किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहूंगी.’’

‘‘मौसी तुम चिंता मत करो, मैं हूं न. मैं उसे हमेशा के लिए आप के रास्ते से हटा दूंगा.’’ कपिल ने मौसी को भरोसा दिलाते हुए कहा.

पति शरद अपने काम के सिलसिले में घर से बाहर फील्ड पर रहता तो रात 9 बजे के बाद ही घर आता था. इसी समय मौसी के साथ मिल कर कपिल राय संदीप की हत्या की प्लानिंग बनाता.

कपिल राय भी अपने नाना के घर गुप्तेश्वर, जबलपुर आताजाता रहता था, इसलिए संदीप को वह अच्छी तरह से जानता था. कपिल उसे मामा कह कर बुलाता था. उसे पता था कि संदीप शराब का शौकीन है. कपिल ने मौसी को बताया कि उसे शराब पिला कर ही ठिकाने लगाना बेहतर होगा.

योजना के मुताबिक, 9 जनवरी को कपिल ने मौसी लक्ष्मी के मोबाइल से संदीप को काल कर के कहा, ‘‘हैलो मामा मैं कपिल बोल रहा हूं, नरसिंहपुर से आज ही मौसी के पास जबलपुर आया हूं. सोचा आज मामा के साथ महफिल जमा लूं.’’

इस तरह शराब पीने का न्यौता मिलने से संदीप की बांछे खिल उठीं. उस ने कपिल को सहमति देते हुए पूछा, ‘‘कहां पर आना है कपिल.’’

‘‘मामा कृपाल चौक आ जाओ. मैं स्कूटी ले कर आता हूं,’’ कपिल बोला.

शराब संदीप की बहुत बड़ी कमजोरी थी, वह शाम 7 बजे कपिल के बताए स्थान कृपाल चौक चला आया. कपिल अपनी मौसी की स्कूटी ले कर उसी का इंतजार कर रहा था. कपिल वहां से संदीप को ले कर तिलवारा के रास्ते चरगवां ले गया.

तब तक रात का अंधेरा हो चुका था, रास्ते में दोनों ने शराब पी कर इधरउधर की बातें की. कपिल ने बड़ी चालाकी से संदीप वगारे को अधिक शराब पिला दी.

जब वह नशे में धुत हो गया तो उसे बरगी कैनाल पर बने घुघरी सोमती पुल के ऊपर ले जा कर अपने मफलर से

संदीप का गला घोट दिया. थोड़ी ही देर में नशे में धुत संदीप की मौत हो गई.

कपिल शातिरदिमाग था, उस ने पहचान छिपाने के उद्देश्य से संदीप की जेब से उस का मोबाइल फोन और पर्स निकाल कर अपने पास रख लिया और अंधेरे का फायदा उठा कर संदीप को पुल के ऊपर से नहर में फेंक दिया.

घटना को अंजाम दे कर वह स्कूटी ले कर लक्ष्मी मौसी के घर आ गया. मौसी को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दे कर वह अपने घर नरसिंहपुर चला गया.

एडीशनल एसपी शिवेश सिंह बघेल ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर मामले का खुलासा कर मीडिया को जानकारी दी. संदीप की हत्या के आरोप में लक्ष्मी और कपिल को गिरफ्तार कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने संदीप व लक्ष्मी की निशानदेही पर संदीप का मोबाइल फोन, पर्स और वारदात में प्रयुक्त उस की स्कूटी को जब्त कर ली.

केस की जांच टीआई विनोद पाठक कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

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