क्या मिला: उसने पूरी जिंदगी क्यों झेली तकलीफ

अब मैं 70 साल की हो गई. एकदम अकेली हूं. अकेलापन ही मेरी सब से बड़ी त्रासदी मुझे लगती है. अपनी जिंदगी को मुड़ कर देखती हूं तो हर एक पन्ना ही बड़ा विचित्र है. मेरे मम्मीपापा के हम 2 ही बच्चे थे. एक मैं और मेरा एक छोटा भाई. हमारा बड़ा सुखी परिवार. पापा साधारण सी पोस्ट पर थे, पर उन की सरकारी नौकरी थी.

मैं पढ़ने में होशियार थी. मुझे पापा डाक्टर बनाना चाहते थे और मैं भी यही चाहती थी. मैं ने मेहनत भी की और उस जमाने में इतना कंपीटिशन भी नहीं था. अतः मेरा सलेक्शन इसी शहर में मेडिकल में हो गया. पापा भी बड़े प्रसन्न. मैं भी खुश.

मेडिकल पास करते ही पापा को मेरी शादी की चिंता हो गई. किसी ने एक डाक्टर लड़का बताया. पापा को पसंद आ गया. दहेज वगैरह भी तय हो गया.

लड़का भी डाक्टर था तो क्या मैं भी तो डाक्टर थी. परंतु पारंपरिक परिवार होने के कारण मैं भी कुछ कह नहीं पाई. शादी हो गई. ससुराल में पहले ही उन लोगों को पता था कि यह लड़का दुबई जाएगा. यह बात उन्होंने हम से छुपाई थी. पर लड़की वाले की मजबूरी… क्या कर सकते थे.

मैं पीहर आई और नौकरी करने लगी. लड़का 6 महीने बाद आएगा और मुझे ले जाएगा, यह तय हो चुका था. उन दिनों मोबाइल वगैरह तो होता नहीं था. घरों में लैंडलाइन भी नहीं होता था. चिट्ठीपत्री ही आती थी.

पति महोदय ने पत्र में लिखा, मैं सालभर बाद आऊंगा. पीहर वालों ने सब्र किया. हिंदू गरीब परिवार का बाप और क्या कर सकता था? मैं तीजत्योहार पर ससुराल जाती. मुझे बहुत अजीब सा लगने लगा. मेरे पतिदेव का एक महीने में एक पत्र  आता. वो भी धीरेधीरे बंद होने लगा. ससुराल वालों ने कहा कि वह बहुत बिजी है. उस को आने में 2 साल लग सकते हैं.

मेरे पिताजी का माथा ठनका. एक कमजोर अशक्त लड़की का पिता क्या कर सकता है. हमारे कोई दूर के रिश्तेदार के एक जानकार दुबई में थे. उन से पता लगाया तो पता चला कि उस महाशय ने तो वहां की एक नर्स से शादी कर ली है और अपना घर बसा लिया है. यह सुन कर तो हमारे परिवार पर बिजली ही गिर गई. हम सब ने किसी तरह इस बात को सहन कर लिया.

पापा को बहुत जबरदस्त सदमा लगा. इस सदमे की सहन न कर पाने के कारण उन्हें हार्ट अटैक हो गया. गरीबी में और आटा गीला. घर में मैं ही बड़ी थी और मैं ने ही परिवार को संभाला. किसी तरह पति से डाइवोर्स लिया. भाई को पढ़ाया और उस की नौकरी भी लग गई. हमें लगा कि हमारे अच्छे दिन आ गए. हम ने एक अच्छी लड़की देख कर भैया की शादी कर दी.

मुझे लगा कि अब भैया मम्मी को संभाल लेगा. भैया और भाभी जोधपुर में सैटल हो गए थे. मैं ने सोचा कि जो हुआ उस को टाल नहीं सकते. पर, अब मैं आगे की पढ़ाई करूं, ऐसा सोच ही रही थी. मेरी पोस्टिंग जयपुर में थी. इसलिए मैं यहां आई, तो अम्मां को साथ ले कर आई. भैया की नईनई शादी हुई है, उन्हें आराम से रहने दो.

मैं भी अपने एमडी प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगी. राजीखुशी का पत्र भैयाभाभी भेजते थे. अम्मां भी खुश थीं. उन का मन जरूर नहीं लगता था. मैं ने कहा, ‘‘अभी थोड़े दिन यहीं रहो, फिर आप चली जाना.‘‘ ‘‘ठीक है. मुझे लगता है कि थोड़े दिन मैं बहू के पास भी रहूं.‘‘

‘‘अम्मां थोड़े दिन उन को अकेले भी एंजौय करने दो. नईनई शादी हुई है. फिर तो तुम्हें जाना ही है.‘‘
इस तरह 6 महीने बीत गए. एक खुशखबरी आई. भैया ने लिखा कि तुम्हारी भाभी पेट से है. तुम जल्दी बूआ बनने वाली हो. अम्मां दादी.

इस खबर से अम्मां और मैं बहुत प्रसन्न हुए. चलो, घर में एक बच्चा आ जाएगा और अम्मां का मन पंख लगा कर उड़ने लगा. ‘‘मैं तो बहू के पास जाऊंगी,‘‘ अम्मां जिद करने लगी. मैं ने अम्मां को समझाया, ‘‘अम्मां, अभी मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी? जैसे ही छुट्टी मिलेगी, मैं आप को छोड़ आऊंगी. भैया को हम बुलाएंगे तो भाभी अकेली रहेंगी. इस समय यह ठीक नहीं है.‘‘

वे भी मान गईं. हमें क्या पता था कि हमारी जिंदगी में एक बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है. मैं ने तो अपने स्टाफ के सदस्यों और अड़ोसीपड़ोसी को मिठाई मंगा कर खिलाई. अम्मां ने पास के मंदिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ाया. परंतु एक बड़ा वज्रपात एक महीने के अंदर ही हुआ.

हमारे पड़ोस में एक इंजीनियर रहते थे. उन के घर रात 10 बजे एक ट्रंक काल आया. मुझे बुलाया. जाते ही खबर को सुन कर रोतेरोते मेरा बुरा हाल था. मेरे भाई का एक्सीडेंट हो गया. वह बहुत सीरियस था और अस्पताल में भरती था.

अम्मां बारबार पूछ रही थीं कि क्या बात है, पर मैं उन्हें बता नहीं पाई. यदि बता देती तो जोधपुर तक उन्हें ले जाना ही मुश्किल था. पड़ोसियों ने मना भी किया कि आप अम्मां को मत बताइए.

अम्मां को मैं ने कहा कि भाभी को देखने चलते हैं. अम्मां ने पूछा, ‘‘अचानक ही क्यों सोचा तुम ने? क्या बात हुई है? हम तो बाद में जाने वाले थे?‘‘

किसी तरह जोधपुर पहुंचे. वहां हमारे लिए और बड़ा वज्रपात इंतजार कर रहा था. भैया का देहांत हो गया. शादी हुए सिर्फ 9 महीने हुए थे.

भाभी की तो दुनिया ही उजड़ गई. अम्मां का तो सबकुछ लुट गया. मैं क्या करूं, क्या ना करूं, कुछ समझ नहीं आया. अम्मां को संभालूं या भाभी को या अपनेआप को?

मुझे तो अपने कर्तव्य को संभालना है. क्रियाकर्म पूरा करने के बाद मैं भाभी और अम्मां को साथ ले कर जयपुर आ गई. मुझे तो नौकरी करनी थी. इन सब को संभालना था. भाभी की डिलीवरी करानी थी.

भाभी और अम्मां को मैं बारबार समझाती.

मैं तो अपना दुख भूल चुकी. अब यही दुख बहुत बड़ा लग रहा था. मुझ पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. उन दिनों वेतन भी ज्यादा नहीं होता था.

मकान का किराया चुकाते हुए 3 प्राणी तो हम थे और चौथा आने वाला था. नौकरी करते हुए पूरे घर को संभालना था.

अम्मां भी एक के बाद एक सदमा लगने से बीमार रहने लगीं. उन की दवाई का खर्चा भी मुझे ही उठाना था.

मैं एमडी की पढ़ाईलिखाई वगैरह सब भूल कर इन समस्याओं में फंस गई. भाभी के पीहर वालों ने भी ध्यान नहीं दिया. उन की मम्मी पहले ही मर चुकी थी. उन की भाभी थीं और पापा बीमार थे. ऐसे में किसी ने उन्हें नहीं बुलाया. मैं ही उन्हें आश्वासन देती रही. उन्हें अपने पीहर की याद आती और उन्हें बुरा लगता कि पापा ने भी मुझे याद नहीं किया. अब उस के पापा ना आर्थिक रूप से संपन्न थे और ना ही शारीरिक रूप से. वे भला क्या करते? यह बात तो मेरी समझ में आ गई थी.

अम्मां को भी लगता कि सारा भार मेरी बेटी पर ही आ गया. बेटी पहले से दुखी है. मैं अम्मां को भी समझाती. इस छोटी उम्र में ही मैं बहुत बड़ी हो गई थी. मैं बुजुर्ग बन गई थी.

भाभी की ड्यू डेट पास में आने पर अम्मां और भाभी मुझ से कहते, ‘‘आप छुट्टी ले लो. हमें डर लगता है?‘‘

‘‘अभी से छुट्टी ले लूं. डिलीवरी के बाद भी तो लेनी है?‘‘

बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया. रात को परेशानी हुई तो मैं भाभी को ले कर अस्पताल गई और उन्हें भरती कराया. अस्पताल वालों को पता ही था कि मैं डाक्टर हूं. उन्होंने कहा कि आप ही बच्चे को लो. सब से पहले मैं ने ही उठाया. प्यारी सी लड़की हुई थी.

सुन कर भाभी को अच्छा नहीं लगा. वह कहने लगी, ‘‘लड़का होता तो मेरा सहारा ही बनता.‘‘

‘‘भाभी, आप तो पढ़ीलिखी हो कर कैसी बातें कर रही हैं? आप बेटी की चिंता मत करो. उसे मैं पालूंगी.‘‘

उस का ज्यादा ध्यान मैं ने ही रखा. भाभी को अस्पताल से घर लाते ही मैं ने कहा, ‘‘भाभी, आप भी बीएड कर लो, ताकि नौकरी लग जाए.‘‘

विधवा कोटे से उन्हें तुरंत बीएड में जगह मिल गई. बच्चे को छोड़ वह कालेज जाने लगी. दिन में बच्ची को अम्मां देखतीं. अस्पताल से आने के बाद उस की जिम्मेदारी मेरी थी. पर, मैं ने खुशीखुशी इस जिम्मेदारी को निभाया ही नहीं, बल्कि मुझे उस बच्ची से विशेष स्नेह हो गया. बच्ची भी मुझे मम्मी कहने लगी.

नौकरानी रखने लायक हमारी स्थिति नहीं थी. सारा बोझ मुझ पर ही था. किसी तरह भाभी का बीएड पूरा हुआ और उन्हें नौकरी मिल गई. मुझे थोड़ी संतुष्टि हुई. पर पहली पोस्टिंग अपने गांव में मिली. भाभी बच्ची को छोड़ कर चली गई. हफ्ते में या छुट्टी के दिन ही भाभी आती. बच्ची का रुझान अपनी मम्मी की ओर से हट कर पूरी तरह से मेरी ओर और अम्मां की तरफ ही था. हम भी खुश ही थे.

पर, मुझे लगा कि भाभी अभी छोटी है. वह पूरी जिंदगी कैसे अकेली रहेगी?

मैं ने भाभी से बात की. भाभी रितु बोली, ‘‘मुझे बच्चे के साथ कौन स्वीकार करेगा?‘‘

मैं ने कहा, ‘‘तुम गुड़िया की चिंता मत करो. उसे हम पाल लेंगे.‘‘

उस के बाद मैं ने भाभी रितु के लिए वर ढूंढ़ना शुरू किया. माधव नाम के एक आदमी ने भाभी से शादी करने की इच्छा प्रकट की. हम लोग खुश हुए. पर उस ने भी शर्त रख दी कि रितु भाभी अपनी बेटी को ले कर नहीं आएगी, क्योंकि उन के पहले ही एक लड़की थी.

मैं ने तो साफ कह दिया, ‘‘आप इस बात की चिंता ना करें. मैं बिटिया को संभाल लूंगी. मैं उसे पालपोस कर बड़ा करूंगी.‘‘

उस पर माधव राजी हो गया और यह भी कहा कि आप को भी आप के भाई की कमी महसूस नहीं होने दूंगा.

सुन कर मुझे भी बहुत अच्छा लगा. शुरू में माधव और रितु अकसर आतेजाते रहे. अम्मां को भी अच्छा लगता था, मुझे भी अच्छा लगता था. मैं भी माधव को भैया मान राखी बांधने लगी. सब ठीकठाक ही चल रहा था.

उन्होंने कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई, परंतु अपने शहर से हमारे घर पिकनिक मनाने जैसे आ जाते थे. इस पर भी अम्मां और मैं खुश थे.

जब भी वे आते भाभी रितु को अपनी बेटी मान अम्मां उन्हें तिलक कर के दोनों को साड़ी, मिठाई, कपड़े आदि देतीं.

अब गुड़िया बड़ी हो गई. वह पढ़ने लगी. पढ़ने में वह होशियार निकली. उस ने पीएचडी की. उस के लिए मैं ने लड़का ढूंढा. अच्छा लड़का राज भी मिल गया. लड़कालड़की दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. अब लड़के वाले चाहते थे कि उन के शहर में ही आ कर शादी करें.

मैं उस बात के लिए राजी हो गई. मैं ने सब का टिकट कराया. कम से कम 50 लोग थे. सब का टिकट एसी सेकंड क्लास में कराया. भाभी रितु और माधव मेहमान जैसे हाथ हिलाते हुए आए.

यहां तक भी कोई बात नहीं. उस के बाद उन्होंने ससुराल वालों से मेरी बुराई शुरू कर दी. यह क्यों किया, मेरी समझ के बाहर की बात है. अम्मां को यह बात बिलकुल सहन नहीं हुई. मैं ने तो जिंदगी में सिवाय दुख के कुछ देखा ही नहीं. किसी ने मुझ से प्रेम के दो शब्द नहीं बोले और ना ही किसी ने मुझे कोई आर्थिक सहायता दी.

मुझे लगा, मुझे सब को देने के लिए ही ऊपर वाले ने पैदा किया है, लेने के लिए नहीं. पेड़ सब को फल देता है, वह स्वयं नहीं खाता. मुझे भी पेड़ बनाने के बदले ऊपर वाले ने मनुष्यरूपी पेड़ का रूप दे दिया लगता है.

मुझे भी लगने लगा कि देने में ही सुख है, खुशी है, संतुष्टि है, लेने में क्या रखा है?

मैं ने भी अपना ध्यान भक्ति की ओर मोड़ लिया. अस्पताल जाना, मंदिर जाना, बाजार से सौदा लाना वगैरह.

गुड़िया की ससुराल तो उत्तर प्रदेश में थी, परंतु दामाद राज की पोस्टिंग चेन्नई में थी. शादी के बाद 3 महीने तक गुड़िया नहीं आई. चिट्ठीपत्री बराबर आती रही. अब तो घर में फोन भी लग गया था. फोन पर भी बात हो जाती. मैं ने कहा कि गुड़िया खुश है. उस को जब अपनी मम्मी के बारे में पता चला, तो उसे भी बहुत बुरा लगा. फिर हमारा संबंध उन से बिलकुल कट गया.

3 महीने बाद गुड़िया चेन्नई से आई. मैं भी खुश थी कि बच्ची देश के अंदर ही है, कभी भी कोई बात हो, तुरंत आ जाएगी. इस बात को सोच कर मैं बड़ी आश्वस्त थी. पर गुड़िया ने आते ही कहा, ‘‘राज का सलेक्शन विदेश में हो गया है.‘‘

इस सदमे को कैसे बरदाश्त करूं? पुरानी बातें याद आने लगीं. क्या इस बच्ची के साथ भी मेरे जैसे ही होगा? मेरे मन में एक अनोखा सा डर बैठ गया. मैं गुड़िया से कह न पाई, पर अंदर ही अंदर घुटती ही रही.

शुरू में राज अकेले ही गए और मेरा डर मैं किस से कहूं? पर गुड़िया और राज में अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी थी. बराबर फोन आते. मेल आता था. गुड़िया प्रसन्न थी. मैं अपने डर को अंदर ही अंदर महसूस कर रही थी.

फिर 6 महीने बाद राज आए और गुड़िया को ले गए. मुझे बहुत तसल्ली हुई. पर अम्मां गुड़िया के वियोग को सहन न कर पाईं. उस के बाद अम्मां निरंतर बीमार रहने लगीं.

अम्मां का जो थोड़ाबहुत सहारा था, वह भी खत्म हो गया. उन की देखभाल का भार और बढ़ गया.

एक साल बाद फिर गुड़िया आई. तब वह 2 महीने की प्रेग्नेंट थी. राज ने फिर अपनी नौकरी बदल ली. अब कनाडा से अरब कंट्री में चला गया. वहां राज सिर्फ सालभर के लिए कौंट्रैक्ट में गया था. अब तो गुड़िया को ले जाने का ही प्रश्न नहीं था. गुड़िया प्रेग्नेंट थी.

क्या आप मेरी स्थिति को समझ सकेंगे? मैं कितने मानसिक तनावों से गुजर रही थी, इस की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता. मैं किस से कहती? अम्मां समझने लायक स्थिति में नहीं थीं. गुड़िया को कह कर उसे परेशान नहीं करना चाहती थी. इस समय वैसे ही वह प्रेग्नेंट थी. उसे परेशान करना तो पाप है. गुड़िया इन सब बातों से अनजान थी.

डाक्टर ने गुड़िया को बेड रेस्ट के लिए कह दिया था. अतः वह ससुराल भी जा नहीं सकती थी. उस की सासननद आ कर कभी उस को देख कर जाते. उन के आने से मेरी परेशानी ही बढ़ती, पर मैं क्या करूं? अपनी समस्या को कैसे बताऊं? गुड़िया की मम्मी ने तो पहले ही अपना पल्ला झाड़ लिया था.

मैं जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहती थी, परंतु विभिन्न प्रकार की आशंकाओं से मैं घिरी हुई थी. मैं ने कभी कोई खुशी की बात तो देखी नहीं, हमेशा ही मेरे साथ धोखा ही होता रहा. मुझे लगने लगा कि मेरी काली छाया मेरी गुड़िया पर ना पड़े. पर, मैं इसे किसी को कह भी नहीं सकती. अंदर ही अंदर मैं परेशान हो रही थी. उसी समय मेरे मेनोपोज का भी था.

इस बीच अम्मां का देहांत हो गया.

गुड़िया का ड्यू डेट भी आ गया और उस ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया. मैं खुश तो थी, पर जब तक उस के पति ने आ कर बच्चे को नहीं देखा, मेरे अंदर अजीब सी परेशानी होती रही थी.

जब गुड़िया का पति आ कर बच्चे को देख कर खुश हुआ, तब मुझे तसल्ली आई.

अब तो गुड़िया अपने पति के साथ विदेश में बस गई और मैं अकेली रह गई. यदि गुड़िया अपने देश में होती तो मुझ से मिलने आती रहती, पर विदेश में रहने के कारण साल में एक बार ही आ पाती. फिर भी मुझे तसल्ली थी. अब कोरोना की वजह से सालभर से ज्यादा हो गया, वह नहीं आई. और अभी आने की संभावना भी इस कोरोना के कारण दिखाई नहीं दे रही, पर मैं ने एक लड़की को पढ़ालिखा कर उस की शादी कर दी. भाभी की भी शादी कर दी. यह तसल्ली मुझे है. पर बुढ़ापे में रिटायर होने के बाद अकेलापन मुझे खाने को दौड़ता है. इस को एक भुक्तभोगी ही जान सकता है.

अब आप ही बताइए कि मेरी क्या गलती थी, जो पूरी जिंदगी मैं ने इतनी तकलीफ पाई? क्या लड़की होना मेरा गुनाह था? लड़का होना और मेरी जिंदगी से खेलना मेरे पति के लड़का होने का घमंड? उस को सभी छूट…? यह बात मेरी समझ में नहीं आई? आप की समझ में आई तो मुझे बता दें.

सबसे हसीन वह : दुल्हन के ससुराल आने के बाद क्या हुआ

इन दिनों अनुजा की स्थिति ‘कहां फंस गई मैं’ वाली थी. कहीं ऐसा भी होता है भला? वह अपनेआप में कसमसा रही थी.

ऊपर से बर्फ का ढेला बनी बैठी थी और भीतर उस के ज्वालामुखी दहक रहा था. ‘क्या मेरे मातापिता तब अंधेबहरे थे? क्या वे इतने निष्ठुर हैं? अगर नहीं, तो बिना परखे ऐसे लड़के से क्यों बांध दिया मुझे जो किसी अन्य की खातिर मु झे छोड़ भागा है, जाने कहां? अभी तो अपनी सुहागरात तक भी नहीं हुई है. जाने कहां भटक रहा होगा. फिर, पता नहीं वह लौटेगा भी या नहीं.’

उस की विचार शृंखला में इसी तरह के सैकड़ों सवाल उमड़ते घुमड़ते रहे थे. और वह इन सवालों को झेल भी रही थी.  झेल क्या रही थी, तड़प रही थी वह तो.

लेकिन जब उसे उस के घर से भाग जाने के कारण की जानकारी हुई, झटका लगा था उसे. उस की बाट जोहने में 15 दिन कब निकल गए. क्या बीती होगी उस पर, कोई तो पूछे उस से आ कर.

सोचतेविचारते अकसर उस की आंखें सजल हो उठतीं. नित्य 2 बूंद अश्रु उस के दामन में ढुलक भी आते और वह उन अश्रुबूंदों को देखती हुई फिर से विचारों की दुनिया में चली जाती और अपने अकेलेपन पर रोती.

अवसाद, चिड़चिड़ाहट, बेचैनी से उस का हृदय तारतार हुआ जा रहा था. लगने लगा था जैसे वह अबतब में ही पागल हो जाएगी. उस के अंदर तो जैसे सांप रेंगने लगा था. लगा जैसे वह खुद को नोच ही डालेगी या फिर वह कहीं अपनी जान ही गंवा बैठेगी. वह सोचती, ‘जानती होती कि यह ऐसा कर जाएगा तो ब्याह ही न करती इस से. तब दुनिया की कोई भी ताकत मु झे मेरे निर्णय से डिगा नहीं सकती थी. पर, अब मु झे क्या करना चाहिए? क्या इस के लौट आने का इंतजार करना चाहिए? या फिर पीहर लौट जाना ही ठीक रहेगा? क्या ऐसी परिस्थिति में यह घर छोड़ना ठीक रहेगा?’

वक्त पर कोई न कोई उसे खाने की थाली पहुंचा जाता. बीचबीच में आ कर कोई न कोई हालचाल भी पूछ जाता. पूरा घर तनावग्रस्त था. मरघट सा सन्नाटा था उस चौबारे में. सन्नाटा भी ऐसा, जो भीतर तक चीर जाए. परिवार का हर सदस्य एकदूसरे से नजरें चुराता दिखता. ऐसे में वह खुद को कैसे संभाले हुए थी, वह ही जानती थी.

दुलहन के ससुराल आने के बाद अभी तो कई रस्में थीं जिन्हें उसे निभाना था. वे सारी रस्में अपने पूर्ण होने के इंतजार में मुंहबाए खड़ी भी दिखीं उसे. नईनवेली दुलहन से मिलनजुलने वालों का आएदिन तांता लग जाता है, वह भी वह जानती थी. ऐसा वह कई घरों में देख चुकी थी. पर यहां तो एकबारगी में सबकुछ ध्वस्त हो चला था. उस के सारे संजोए सपने एकाएक ही धराशायी हो चले थे. कभीकभार उस के भीतर आक्रोश की ज्वाला धधक उठती. तब वह बुदबुदाती, ‘भाड़ में जाएं सारी रस्मेंरिवाज. नहीं रहना मु झे अब यहां. आज ही अपना फैसला सुना देती हूं इन को, और अपने पीहर को चली जाती हूं. सिर्फ यही नहीं, वहां पहुंच कर अपने मांबाबूजी को भी तो खरीखोटी सुनानी है.’ ऐसे विचार उस के मन में उठते रहे थे, और वह इस बाबत खिन्न हो उठती थी.

इन दिनों उस के पास तो समय ही समय था. नित्य मंथन में व्यस्त रहती थी और फिर क्यों न हो मंथन, उस के साथ ऐसी अनूठी घटना जो घटी थी, अनसुल झी पहेली सरीखी. वह सोचती, ‘किसे सुनाऊं मैं अपनी व्यथा? कौन है जो मेरी समस्या का निराकरण कर सकता है? शायद कोई भी नहीं. और शायद मैं खुद भी नहीं.’

फिर मन में खयाल आता, ‘अगर परीक्षित लौट भी आया तो क्या मैं उसे अपनाऊंगी? क्या परीक्षित अपने भूल की क्षमा मांगेगा मुझ से? फिर कहीं मेरी हैसियत ही धूमिल तो नहीं हो जाएगी?’ इस तरह के अनेक सवालों से जूझ रही थी और खुद से लड़ भी रही थी अनुजा. बुदबुदाती, ‘यह कैसी शामत आन पड़ी है मु झ पर? ऐसा कैसे हो गया?’

तभी घर के अहाते से आ रही खुसुरफुसुर की आवाजों से वह सजग हो उठी और खिड़की के मुहाने तक पहुंची. देखा, परीक्षित सिर  झुकाए लड़खड़ाते कदमों से, थकामांदा सा आंगन में प्रवेश कर रहा था.

उसे लौट आया देखा सब के मुर झाए चेहरों की रंगत एकाएक बदलने लगी थी. अब उन चेहरों को देख कोई कह ही नहीं सकता था कि यहां कुछ घटित भी हुआ था. वहीं, अनुजा के मन को भी सुकून पहुंचा था. उस ने देखा, सभी अपनीअपनी जगहों पर जड़वत हो चले थे और यह भी कि ज्योंज्यों उस के कदम कमरे की ओर बढ़ने लगे. सब के सब उस के पीछे हो लिए थे. पूरी जमात थी उस के पीछे.

इस बीच परीक्षित ने अपने घर व घर के लोगों पर सरसरी निगाह डाली. कुछ ही पलों में सारा घर जाग उठा था और सभी बाहर आ कर उसे देखने लगे थे जो शर्म से छिपे पड़े थे अब तक. पूरा महल्ला भी जाग उठा था.

जेठानी की बेटी निशा पहले तो अपने चाचा तक पहुंचने के लिए कदम बढ़ाती दिखी, फिर अचानक से अपनी नई चाची को इत्तला देने के खयाल से उन के कमरे तक दौड़तीभागतीहांफती पहुंची. चाची को पहले से ही खिड़की के करीब खड़ी देख वह उन से चिपट कर खड़ी हो गई. बोली कुछ भी नहीं. वहीं, छोटा संजू दौड़ कर अपने चाचा की उंगली पकड़ उन के साथसाथ चलने लगा था.

परीक्षित थके कदमों से चलता हुआ, सीढि़यां लांघता हुआ दूसरी मंजिल के अपने कमरे में पहुंचा. एक नजर समीप खड़ी अनुजा पर डाली, पलभर को ठिठका, फिर पास पड़े सोफे पर निढाल हो बैठ गया और आंखें मूंदें पड़ा रहा.

मिनटों में ही परिवार के सारे सदस्यों का उस चौखट पर जमघट लग गया. फिर तो सब ने ही बारीबारी से इशारोंइशारों में ही पूछा था अनुजा से, ‘कुछ बका क्या?’

उस ने एक नजर परीक्षित पर डाली. वह तो सो रहा था. वह अपना सिर हिला उन सभी को बताती रही, अभी तक तो नहीं.’

एक समय ऐसा भी आया जब उस प्रागंण में मेले सा समां बंध गया था. फिर तो एकएक कर महल्ले के लोग भी आते रहे, जाते रहे थे और वह सो रहा था जम कर. शायद बेहोशी वाली नींद थी उस की.

अनुजा थक चुकी थी उन आनेजाने वालों के कारण. चौखट पर बैठी उस की सास सहारा ले कर उठती हुई बोली, ‘‘उठे तो कुछ खिलापिला देना, बहू.’’ और वे अपनी पोती की उंगली पकड़ निकल ली थीं. माहौल की गर्माहट अब आहिस्ताआहिस्ता शांत हो चुकी थी. रात भी हो चुकी थी. सब के लौट जाने पर अनुजा निरंतर उसे देखती रही थी. वह असमंजस में थी. असमंजस किस कारण से था, उसे कहां पता था.

परिवार के, महल्ले के लोगों ने भी सहानुभूति जताते कहा था, ‘बेचारे ने क्या हालत बना रखी है अपनी. जाने कहांकहां, मारामारा फिरता रहा होगा? उफ.’

आधी रात में वह जगा था. उसी समय ही वह नहाधो, फिर से जो सोया पड़ा, दूसरी सुबह जगा था. तब अनुजा सो ही कहां पाई थी. वह तो तब अपनी उल झनोंपरेशानियों को सहेजनेसमेटने में लगी हुई थी.

वह उस रात निरंतर उसे निहारती रही थी. एक तरफ जहां उस के प्रति सहानुभूति थी, वहीं दूसरी तरफ गहरा रोष भी था मन के किसी कोने में.

सहानुभूति इस कारण कि उस की प्रेमिका ने आत्महत्या जो कर ली थी और रोष इस बात पर कि वह उसे छोड़ भागा था और वह सजीसंवरी अपनी सुहागसेज पर बैठी उस के इंतजार में जागती रही थी. वह उसी रात से ही गायब था. फिर सुहागरात का सुख क्या होता है, कहां जान पाई थी वह.

उस रात उस के इंतजार में जब वह थी, उस का खिलाखिला चेहरा पूनम की चांद सरीखा दमक रहा था. पर ज्यों ही उसे उस के भाग खड़े होने की खबर मिली, मुखड़ा ग्रहण लगे चांद सा हो गया था. उस की सुर्ख मांग तब एकदम से बु झीबु झी सी दिखने लगी थी. सबकुछ ही बिखर चला था.

तब उस के भीतर एक चीत्कार पनपी थी, जिसे वह जबरन भीतर ही रोके रखे हुए थी. फिर विचारों में तब यह भी था, ‘अगर उस से मोहब्बत थी, तो मैं यहां कैसे? जब प्यार निभाने का दम ही नहीं, तो प्यार किया ही क्यों था उस से? फिर इस ने तो 2-2 जिंदगियों से खिलवाड़ किया है. क्या इस का अपराध क्षमायोग्य है? इस के कारण ही तो मु झे मानसिक यातनाएं  झेलनी पड़ी हैं.

मेरा तो अस्तित्व ही अधर में लटक गया है इस विध्वंसकारी के कारण. जब इतनी ही मोहब्बत थी तो उसे ही अपना लेता. मेरी जिंदगी से खिलवाड़ करने का हक इसे किस ने दिया?’ तब उस की सोच में यह भी होता, ‘मैं अनब्याही तो नहीं कहीं? फिर, कहीं यह कोई बुरा सपना तो नहीं?’

दूसरे दिन भी घर में चुप्पी छाई रही थी. वह जागा था फिर से. घर वालों को तो जैसे उस के जागने का ही इंतजार था.  झटपट उस के लिए थाली परोसी गई. उस ने जैसेतैसे खाया और एक बार फिर से सो पड़ा और बस सोता ही रहा था. यह दूसरी रात थी जो अनुजा जागते  बिता रही थी. और परीक्षित रातभर जाने क्याक्या न बड़बड़ाता रहा था. बीचबीच में उस की सिसकियां भी उसे सुनाई पड़ रही थीं. उस रात भी वह अनछुई ही रही थी.

फिर जब वह जागा था, अनुजा के समीप आ कर बोला, तब उस की आवाज में पछतावे सा भाव था, ‘‘माफ करना मु झे, बहुत पीड़ा पहुंचाई मैं ने आप को.’’

‘आप को,’ शब्द जैसे उसे चुभ गया. बोली कुछ भी नहीं. पर इस एक शब्द ने तो जैसे एक बार में ही दूरियां बढ़ा दी थीं. उस के तो तनबदन में आग ही लग गई थी.

रिमझिम, जो उस का प्यार थी, इस की बरात के दिन ही उस ने आत्महत्या कर ली थी. लौटा, तो पता चला. फिर वह भाग खड़ा हुआ था.

लौटने के बाद भी अब परीक्षित या तो घर पर ही गुमसुम पड़ा रहता या फिर कहीं बाहर दिनभर भटकता रहता. फिर जब थकामांदा लौटता तो बगैर कुछ कहेसुने सो पड़ता.

ऐसे में ही उस ने उसे रिमझिम झोड़ कर उठाया और पहली बार अपनी जबान खोली थी. तब उस का स्वर अवसादभरा था, ‘‘मैं पराए घर से आई हूं. ब्याहता हूं आप की. आप ने मु झ से शादी की है, यह तो नहीं भूले होंगे आप?’’

वह निरीह नजरों से उसे देखता रहा था. बोला कुछ भी नहीं. अनुजा को उस की यह चुप्पी चुभ गई. वह फिर से बोली थी, तब उस की आवाज विकृत हो आई थी.

‘‘मैं यहां क्यों हूं? क्या मुझे लौट जाना चाहिए अपने मम्मीपापा के पास? आप ने बड़ा ही घिनौना मजाक किया है मेरे साथ. क्या आप का यह दायित्व नहीं बनता कि सबकुछ सामान्य हो जाए और आप अपना कामकाज संभाल लो. अपने दायित्व को सम झो और इस मनहूसियत को मिटा डालो?’’

चंद लमहों के लिए वह रुकी. खामोशी छाई रही. उस खामोशी को खुद ही भंग करते हुए बोली, ‘‘आप के कारण ही पूरे परिवार का मन मलिन रहा है अब तक. वह भी उस के लिए जो आप की थी भी नहीं. अब मैं हूं और मु झे आप का फैसला जानना है. अभी और अभी. मैं घुटघुट कर जी नहीं सकती. सम झे आप?’’

अनुजा के भीतर का दर्द उस के चेहरे पर था, जो साफ  झलक रहा था. परीक्षित के चेहरे की मायूसी भी वह भलीभांति देख रही थी. दोनों के ही भीतर अलगअलग तरह के झंझावात थे,  झुंझलाहट थी.

परीक्षित उसे सुनता रहा था. वह उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमाए रहा था. वह अपने प्रति उपेक्षा, रिमिझम के प्रति आक्रोश को देख रहा था. जब उस ने चुप्पी साधी, परीक्षित फफक पड़ा था और देररात फफकफफक कर रोता ही रहा था. अश्रु थे जो उस के रोके नहीं रुक रहे थे. तब उस की स्थिति बेहद ही दयनीय दिखी थी उसे.

वह सकपका गई थी. उसे अफसोस हुआ था. अफसोस इतना कि आंखें उस की भी छलक आई थीं, यह सोच कर कि ‘मु झे इस की मनोस्थिति को सम झना चाहिए था. मैं ने जल्दबाजी कर दी. अभी तो इस के क्षतविक्षत मन को राहत मिली भी नहीं और मैं ने इस के घाव फिर से हरे कर दिए.’

उस ने उसे चुप कराना उचित नहीं सम झा. सोचा, ‘मन की भड़ास, आंसुओं के माध्यम से बाहर आ जाए, तो ही अच्छा है. शायद इस से यह संभल ही जाए.’ फिर भी अंतर्मन में शोरगुल था. उस में से एक आवाज अस्फुट सी थी, ‘क्या मैं इतनी निष्ठुर हूं जो इस की वेदना को सम झने का अब तक एक बार भी सोचा नहीं? क्या स्त्री जाति का स्वभाव ही ऐसा होता है जो सिर्फ और सिर्फ अपना खयाल रखती है? दूसरों की परवा करना, दूसरों की पीड़ा क्या उस के आगे कोई महत्त्व नहीं रखती? क्या ऐसी सोच होती है हमारी? अगर ऐसा ही है तो बड़ी ही शर्मनाक बात है यह तो.’

उस की तंद्रा तब भंग हुई थी जब वह बोला, ‘‘शादी हो जाती अगर हमारी तो वह आप के स्थान पर होती आज. प्यार किया था उस से. निभाना भी चाहता था. पर इन बड़ेबुजुर्गों के कारण ही वह चल बसी. मैं कहां जानता था कि वह ऐसा कर डालेगी.’’

‘‘पर मेरा क्या? इस पचड़े में मैं दोषी कैसे? मु झे सजा क्यों मिल रही है? आप कहो तो अभी, इसी क्षण अपना सामान समेट कर निकल जाऊं?’’

‘‘देखिए, मु झे संभलने में जरा वक्त लगेगा. फिर मैं ने कब कहा कि आप यह घर छोड़ कर चली जाओ?’’

तभी अनुजा फिर से बिफर पड़ी, ‘‘वह हमारे वैवाहिक जीवन में जहर घोल गई है. अगर वह भली होती तो ऐसा कहर तो न ढाती? लाज, शर्म, परिवार का मानसम्मान, मर्यादा भी तो कोई चीज होती है जो उस में नहीं थी.’’

‘‘इतनी कड़वी जबान तो न बोलो उस के विषय में जो रही नहीं. ऊलजलूल बकना क्या ठीक है? फिर उस ने ऐसा क्या कर दिया?’’ वह एकाएक आवेशित हो उठा था.

वह एक बार फिर से सकपका गई थी. उसे, उस से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा तो नहीं थी. फिर वह अब तक यह बात सम झ ही नहीं पाई थी कि गलत कौन है. क्या वह खुद? क्या उस का पति? या फिर वह नासपीटी?

देखतेदेखते चंद दिन और बीत गए. स्थिति ज्यों की त्यों ही बनी रही थी. अब उस ने उसे रोकनाटोकना छोड़ दिया था और समय के भरोसे जी रही थी.

परीक्षित अब भी सोते में, जागते में रोतासिसकता दिखता. कभी उस की नींद उचट जाने पर रात के अंधेरे में ही घर से निकल जाता. घंटों बाद थकाहारा लौटता भी तो सोया पड़ा होता. भूख लगे तो खाता अन्यथा थाली की तरफ निहारता भी नहीं. बड़ी गंभीर स्थिति से गुजर रहा था वह. और अनुजा झुंझलाती रहती थी.

ऐसे में अनुजा को उस की चिंता सताने भी लगी थी. इतने दिनों में परीक्षित ने उसे छुआ भी नहीं था. न खुद से उस से बात ही की थी उस ने.

उस दिन पलंग के समीप की टेबल पर रखी रिमझिम की तसवीर फ्रेम में जड़ी रखी दिखी तो वह चकित हो उठा. उस ने उस फ्रेम को उठाया, रिमझिम की उस मुसकराती फोटो को देर तक देखता रहा. फिर यथास्थान रख दिया और अनुजा की तरफ देखा. तब अनुजा ने देखा, उस की आंखें नम थीं और उस के चेहरे के भाव देख अनुजा को लगा जैसे उस के मन में उस के लिए कृतज्ञता के भाव थे.

अनुजा सहजभाव से बोली, ‘‘मैं ने अपनी हटा दी. रिमझिम दीदी अब हमारे साथ होंगी, हर पल, हर क्षण. आप को बुरा तो नहीं लगा?’’

उस ने उस वक्त कुछ न कहा. काफी समय बाद उस ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने खाना खाया?’’ फिर तत्काल बोला, ‘‘हम दोनों इकट्ठे खाते हैं. तुम बैठी रहो, मैं ही मांजी से कह आता हूं कि वे हमारी थाली परोस दें.’’

खाना खाने के दौरान वह देर तक रिमझिम के विषय में बताता रहा. आज पहली बार ही उस ने अनुजा को, ‘आप’ और ‘आप ने’ कह कर संबोधित नहीं किया था. और आज पहली बार ही वह उस से खुल कर बातें कर रहा था. आज उस की स्थिति और दिनों की अपेक्षा सामान्य लगी थी उसे. और जब वह सोया पड़ा था, उस रात, एक बार भी न सिसका, न रोया और न ही बड़बड़ाया. यह देख अनुजा ने पहली बार राहत की सांस ली.

मानसिक यातना से नजात पा कर अनुजा आज गहरी नींद में थी. परीक्षित उठ चुका था और उस के उठने के इंतजार में पास पड़े सोफे पर बैठा दिखा. पलंग से नीचे उतरते जब अनुजा की नजर  टेबल पर रखी तसवीर पर पड़ी तो चकित हो उठी. मुसकरा दी. परीक्षित भी मुसकराया था उसे देख तब.

अब उस फोटोफ्रेम में रिमझिम की जगह अनुजा की तसवीर लगी थी.

‘तुम मेरी रिमझिम हो, तुम ही मेरी पत्नी अनुजा भी. तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल है और तुम ने मेरे कारण ही महीनेभर से बहुत दुख  झेला है, पर अब नहीं. मैं आज ही से दुकान जा रहा हूं.’

और तभी, अनुजा को महसूस हुआ कि उस की मांग का सिंदूर सुर्ख हो चला है और दमक भी उठा है. कुछ अधिक ही सुर्ख, कुछ अधिक ही दमक रहा है.

कुरसी का करिश्मा : कैसे रानी बन गई कलावती

दीपू के साथ आज मालिक भी उस के घर पधारे थे. उस ने अंदर कदम रखते ही आवाज दी, ‘‘अजी सुनती हो?’’

‘‘आई…’’ अंदर से उस की पत्नी कलावती ने आवाज दी.

कुछ ही देर बाद कलावती दीपू के सामने खड़ी थी, पर पति के साथ किसी अनजान शख्स को देख कर उस ने घूंघट कर लिया.

‘‘कलावती, यह राजेश बाबू हैं… हमारे मालिक. आज मैं काम पर निकला, पर सिर में दर्द होने के चलते फतेहपुर चौक पर बैठ गया और चाय पीने लगा, पर मालिक हालचाल जानने व लेट होने के चलते इधर ही आ रहे थे.

‘‘मुझे चौक पर देखते ही पूछा, ‘क्या आज काम पर नहीं जाना.’

‘‘इन को सामने देख कर मैं ने कहा, ‘मेरे सिर में काफी दर्द है. आज नहीं जा पाऊंगा.’

‘‘इस पर मालिक ने कहा, ‘चलो, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’

‘‘देखो, आज पहली बार मालिक हमारे घर आए हैं, कुछ चायपानी का इंतजाम करो.’’

कलावती थोड़ा सा घूंघट हटा कर बोली, ‘‘अभी करती हूं.’’

घूंघट के हटने से राजेश ने कलावती का चेहरा देख लिया, मानो उस पर आसमान ही गिर पड़ा. चांद सा दमकता चेहरा, जैसे कोई अप्सरा हो. लंबी कदकाठी, लंबे बाल, लंबी नाक और पतले होंठ. सांचे में ढला हुआ उस का गदराया बदन. राजेश बाबू को उस ने झकझोर दिया था.

इस बीच कलावती चाय ले आई और राजेश बाबू की तरफ बढ़ाती हुई बोली, ‘‘चाय लीजिए.’’

राजेश बाबू ने चाय का कप पकड़ तो लिया, पर उन की निगाहें कलावती के चेहरे से हट नहीं रही थीं. कलावती दीपू को भी चाय दे कर अंदर चली गई.

‘‘दीपू, तुम्हारी बीवी पढ़ीलिखी कितनी है?’’ राजेश बाबू ने पूछा.

‘‘10वीं जमात पास तो उस ने अपने मायके में ही कर ली थी, लेकिन यहां मैं ने 12वीं तक पढ़ाया है,’’ दीपू ने खुश होते हुए कहा.

‘‘दीपू, पंचायत का चुनाव नजदीक आ रहा है. सरकार ने तो हम लोगों के पर ही कुतर दिए हैं. औरतों को रिजर्वेशन दे कर हम ऊंची जाति वालों को चुनाव से दूर कर दिया है. अगर तुम मेरी बात मानो, तो अपनी पत्नी को उम्मीदवार बना दो.

‘‘मेरे खयाल से तो इस दलित गांव में तुम्हारी बीवी ही इंटर पास होगी?’’ राजेश बाबू ने दीपू को पटाने का जाल फेंका.

‘‘आप की बात सच है राजेश बाबू. दलित बस्ती में सिर्फ कलावती ही इंटर पास है, पर हमारी औकात कहां कि हम चुनाव लड़ सकें.’’

‘‘अरे, इस की चिंता तुम क्यों करते हो? मैं सारा खर्च उठाऊंगा. पर मेरी एक शर्त है कि तुम दोनों को हमेशा मेरी बातों पर चलना होगा,’’ राजेश बाबू ने जाल बुनना शुरू किया.

‘‘हम आप से बाहर ही कब थे राजेश बाबू? हम आप के नौकरचाकर हैं. आप जैसा चाहेंगे, वैसा ही हम करेंगे,’’ दीपू ने कहा.

‘‘तो ठीक है. हम कलावती के सारे कागजात तैयार करा लेंगे और हर हाल में चुनाव लड़वाएंगे,’’ इतना कह कर राजेश बाबू वहां से चले गए.

कुछ दिन तक चुनाव प्रचार जोरशोर से चला. राजेश बाबू ने इस चुनाव में पैसा और शराब पानी की तरह बहाया. इस तरह कलावती चुनाव जीतने में कामयाब हो गई.

कलावती व दीपू राजेश बाबू की कठपुतली बन कर हर दिन उन के यहां दरबारी करते. खासकर कलावती तो कोई भी काम उन से पूछे बिना नहीं करती थी.

एक दिन एकांत पा कर राजेश बाबू ने घर में कलावती के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘कलावती, एक बात कहूं?’’

‘‘कहिए मालिक,’’ कलावती राजेश बाबू के हाथ को कंधे से हटाए बिना बोली.

‘‘जब मैं ने तुम्हें पहली बार देखा था, उसी दिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए प्यार जाग गया था. तुम को पाने के लिए ही तो मैं ने तुम्हें इस मंजिल तक पहुंचाया है. आखिर उस अनपढ़ दीपू के हाथों

की कठपुतली बनने से बेहतर है कि तुम उसे छोड़ कर मेरी बन जाओ. मेरी जमीनजायदाद की मालकिन.’’

‘‘राजेश बाबू, मैं कैसे यकीन कर लूं कि आप मुझ से सच्चा प्यार करते हैं?’’ कलावती नैनों के बाण उन पर चलाते हुए बोली.

‘‘कल तुम मेरे साथ चलो. यह हवेली मैं तुम्हारे नाम कर दूंगा. 5 बीघा खेत व 5 लाख रुपए नकद तुम्हारे खाते में जमा कर दूंगा. बोलो, इस से ज्यादा भरोसा तुम्हें और क्या चाहिए.’’

‘‘बस… बस राजेश बाबू, अगर आप इतना कर सकते हैं, तो मैं हमेशा के लिए दीपू को छोड़ कर आप की हो जाऊंगी,’’ कलावती फीकी मुसकान के साथ बोली.

‘‘तो ठीक है,’’ राजेश ने उसे चूमते हुए कहा, ‘‘कल सवेरे तुम तैयार रहना.’’

दूसरे दिन कलावती तैयार हो कर आई. राजेश बाबू के साथ सारा दिन बिताया. राजेश बाबू ने अपने वादे के मुताबिक वह सब कर दिया, जो उन्होंने कहा था.

2 दिन बाद राजेश बाबू ने कलावती को अपने हवेली में बुलाया. वह पहुंच गई, तो राजेश बाबू ने उसे अपने आगोश में भरना चाहा, तभी कलावती अपने कपड़े कई जगह से फाड़ते हुए चीखी, ‘‘बचाओ… बचाओ…’’

कुछ पुलिस वाले दौड़ कर अंदर आ गए, तो कलावती राजेश बाबू से अलग होते हुए बोली, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, यह शैतान मेरी आबरू से खेलना चाह रहा था. देखिए, मुझे अपने घर बुला कर किस तरह बेइज्जत करने पर तुल गया. यह भी नहीं सोचा कि मैं इस पंचायत की मुखिया हूं.’’

इंस्पैक्टर ने आगे बढ़ कर राजेश बाबू को धरदबोचा और उस के हाथों में हथकड़ी डालते हुए कहा, ‘‘यह आप ने ठीक नहीं किया राजेश बाबू.’’

राजेश बाबू ने गुस्से में कलावती को घूरते हुए कहा, ‘‘धोखेबाज, मुझ से दगाबाजी करने की सजा तुम्हें जरूर मिलेगी. आज तू जिस कुरसी पर है, वह कुरसी मैं ने ही तुझे दिलाई है.’’

‘‘आप ने ठीक कहा राजेश बाबू. अब वह जमाना लद गया है, जब आप लोग छोटी जातियों को बहलाफुसला कर खिलवाड़ करते थे. अब हम इतने बेवकूफ नहीं रहे.

‘‘देखिए, इस कुरसी का करिश्मा, मुखिया तो मैं बन ही गई, साथ ही आप ने रातोंरात मुझे झोंपड़ी से उठा कर हवेली की रानी बना दिया. लेकिन अफसोस, रानी तो मैं बन गई, पर आप राजा नहीं बन सके. राजा तो मेरा दीपू ही होगा इस हवेली का.’’

राजेश बाबू अपने ही बुने जाल में उलझ गए.

18 साल के लड़के ने समोसे बेचने के साथ-साथ किया नीट का एग्जाम पास

कहते है फल की इच्छा मत कर, काम किए जा, यानी जो काम आप कर रहे हो आपको उसका फल जरूर मिलेगा. ऐसे ही एक मिसाल 18 साल के बच्चे ने दी है. जिसने अपने सोमसे बचने के साथ साथ पढ़ाई भी की और नीट की परीक्षा भी पास कर ली.

 

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ये सफलता की एक कहानी इन दिनों नोएडा की सड़कों से आ रही है. सड़क के किनारे समोसा बेचने वाले एक लड़के ने वो कर दिखाया, जो कई स्टूडेंट्स महंगे महंगे कोचिंग के बाद भी नहीं कर सकते. इस लड़के ने बिना किसी कोचिंग क्लास के नीट यूजी 2024 क्लियर कर लिया.

नोएडा के 18 साल के सनी कुमार ने नीट की परीक्षा पास कर ली. उसने 884 में से 720 अंक पाए. लेकिन सनी की ये सफलता लोगों के लिए खास बन गई. दरअसल, सनी ने बिना किसी कोचिंग के नीट क्लियर किया. वो भी दिनभर सड़क पर समोसे बेचने के साथ साथ.

सनी दिन में सड़क के किनारे समोसे बेचा करता था, लेकिन रात में मन लगाकर पढ़ाई करता था. इस तरह से मेहनत करके सनी ने नीट क्लियर कर लिया.

बता दें, सनी की ये स्टोरी फिजिक्स वाला के संस्थापक ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर शेयर की. उन्होंने सनी की स्टोरी उन लोगों को प्रेरणा देने के लिए शेयर की, जो परेशानियों से घबरा जाते हैं. उनके लिए सनी की स्टोरी मिसाल है. हर दिन तीन सौ रुपए की कमाई करने वाला सनी ही पूरे घर को चलाता है. लेकिन उसकी मां का सपना था कि उसका बेटा डौक्टर बने. ऐसे में सनी ने दिन में समोसा बेचा और रात में पढ़ाई कर आखिरकार नीट की परीक्षा पास कर ली.

आपको बता दें कि सनी के पास महंगे कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे. इस स्थिति में सनी ने चार हजार रुपए फीस भरकर औनलाइन ही नीट की तैयारी शुरु की. कई लोगों ने सनी को ठेले पर काम करने के दौरान औनलाइन लेक्चर अटेंड करते भी देखा है. अब सनी अपनी कामयाबी के चलते हर जगह छाएं हुए है.

पिता चलाते थे रिक्शा बेटा बना आईएएस

22 साल के उम्र में IAS बनने वाले गोविंद के पिता रिक्शा चलाकर उनकी पढ़ाई के लिए पैसे भेजते थे. IAS Govind Jaiswal का नाम उन आईएएस औफिसर्स में लिया जाता है, जिनकी कहानी लाखों युवाओं को प्रेरित करने वाली है.

जब चाय वाली की बेटी बनीं अफसर

चाय बेचने वाले की बेटी ने 10 साल की कड़ी मेहनत के बाद CA पास किया. दिल्ली की रहने वाली अमिता प्रजापति ने कहा कि उनके पिता ने अपने रिश्तेदारों को नजरअंदाज कर उन्हे आगे बढ़कर पढ़ाई करवाई. जिसे पूरे आत्मविश्वास के साथ अमिता ने पूरी भी किया और सीए का एग्जाम पास किया.

क्या आप भी होते है कपल की ओर आकर्षित, तो Symbiosexual है आप

अब तक गे, होमोसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, बाइसेक्शुअल तरह के लोग तो आपने सुने होंगे और देंखे भी हो. लेकिन अमेरिका ने एक और कम्युनिटी का खुलासा किया है. जिसमें पता चला है कि कुछ लोग जो दूसरे कपल में इंट्रस्ट दिखाते है वे सिम्बियोसेक्सुअल (Symbiosexual) होते है.

 

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इस नई सेक्सुएलिटी में व्यक्ति किसी ऐसे जोड़े की तरफ आकर्षित होता है, जो पहले से ही एक दूसरे के साथ रिश्ते में है. इंसानों की इस नई रुचि का खुलासा एक शोध में हुआ है. इस रिश्ते में आने वाले लोग सिर्फ अपनी फिजिकल नीड्स को पूरा करने के लिए आते हैं उनको किसी इसके अलावा किसी तरह का अटेचमेंट नहीं होता है.

अमेरिका में सिएटल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने जो थ्योरी दी है उसमें इस नई सेक्सुएलिटी का खुलासा हुआ है. इस शोध को करने वाली प्रोफेसर डॉ. सैली जौनस्टन का कहना है कि जितना हम कामुकता के बारे में जानते हैं वो पूरा नहीं है, इसमें जानने के लिए और भी बहुत कुछ है.शोध में सामने आया कि जिस व्यक्ति को पता होता है कि वो सिम्बियोसेक्सुअल है तो उसको दो लोगों के बीच में तालमेल बैठाना अच्छा लगता है. मतलब वो इस जोड़े के साथ रिश्ते में आना पसंद करता है. इस तरह के केस हर तरह के लोगों में देखने को मिले हैं.

सैपियोसेक्शुअलिटी (SPIOSEXUAL)

ये भी एक तरह की कामुकता है. जिसमें कोई व्यक्ति दिमागी तौर पर किसी ओर कपल की तरफ आकर्षित होता है. ये दिमाग ही जो यौन आकर्षण को उत्तेजित करता है. इस तरह के लोगों में दूसरे की लव कपल के बारें गहरी बातें होती है.

गे (Gay)

गे उस तरह के युवक होते है जिमसे एक लड़का दूसरे लड़के को पसंद करता है उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है साथ ही, शादी भी रचा लेते है. इसे अग्रेंजी में गे कहते है.

लेस्बियन (Lesbian)

जब एक लड़की, दूसरी लड़की को दिल दें बैठती है और बात सैक्स तक पहुंच जाती है और समाजिक तौ पर एक दूसरे के हो जाते है तो इसे लेस्बियन कहते है.

बाईसेक्सुअल (Bisexual)

बाइसेक्शुअल – ऐसे महिला और पुरुष,  जो दोनों के प्रति आकर्षित होते हैं यानि महिला और पुरुष दोनों के साथ सेक्स करते हैं उन्हें बाइसेक्शुअल कहते हैं. लड़के और लड़कियां दोनों में बाइसेक्शुअल होते हैं.

ट्रांसजेंडर (Transgender)

ट्रांसजेंडर लोग वे लोग होते हैं जिनकी लिंग पहचान उस लिंग से अलग होती है. जिसे वे जन्म के समय मानते थे. “ट्रांस” शब्द का इस्तेमाल अक्सर ट्रांसजेंडर के लिए संक्षिप्त रूप में किया जाता है. जब हम पैदा होते हैं, तो डॉक्टर आमतौर पर हमारे शरीर की बनावट के आधार पर हमें पुरुष या महिला बताते हैं. जिसमे व्यक्ति अपनी लिंग बदलवा लेते है.

एंड्रोसेक्सुअल (Androsexual)

ये एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है. ये शब्द ब्यौज के लिए बना हे. जिसमें लड़कियों लड़को की मसकुलर बौड़ी देखकर अट्रैक्ट होती है.

मिट्टी का तेल: चिंकी को किस बात का डर था

बूआ और फूफा गुड़गांव से अपने बेटे और नई बहू के साथ मिलने आए थे. दिन भर का कार्यक्रम था. खाना खा कर उन्हें वापस जाना भी था. उमाशंकर ने भी अपने बेटे अतुल की शादी कुछ माह पहले ही की थी. शादी के बाद बूआ और फूफा पहली बार आए थे. स्वागत का विशेष प्रबंध था.

उमाशंकर की पत्नी राजरानी ने झिड़क कर कहा, ‘‘कुछ तो सोच कर बोला करो. बहुएं घर में हैं और सुन भी रही हैं.’’

उमाशंकर ने झिड़की की परवा न कर हंसते हुए कहा, ‘‘अरे यार, उन्हें ही तो सुना रहा हूं. समय पर चेतावनी मिल जाए तो आगे कोई गड़बड़ नहीं होगी और तुम भी आराम से उन पर राज कर सकोगी.’’

‘‘मुझे ऐसा कोई शौक नहीं,’’ राजरानी ने समझदारी से कहा, ‘‘मेरी बहू सुशील, सुशिक्षित और अच्छे संस्कार वाली है. कोई शक?’’

गुड़गांव से आए फूफाजी उठ कर कुछ देर पहले हलके होने के लिए बाथरूम गए थे. जब लौटे तो हंस रहे थे.

कौशल्या ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘किस बात पर हंस रहे हो? बाथरूम में जो पोस्टर चिपका हुआ है उसे पढ़ कर आए हो?’’

‘‘अजीबोगरीब पोस्टर बाथरूम और अपने कमरे में चिपकाना आजकल के नौजवान लड़केलड़कियों का शौक है, पर मुझे हंसी उस पर नहीं आ रही है,’’ फूफाजी ने उत्तर दिया.

‘‘तो फिर?’’ कौशल्या ने पूछा.

फूफाजी ने उमाशंकर से पूछा, ‘‘क्यों भई, बाथरूम में मिट्टी का तेल क्यों रखा हुआ है?’’

उमाशंकर ने जोरदार हंसी के साथ जो उत्तर दिया उस से न चाहते हुए भी दोनों नई बहुएं सहम गईं.

रात के अंधेरे में चिंकी ने बेचैनी से पूछा, ‘‘पिताजी क्या सच कह रहे थे?’’

‘‘क्या कह रहे थे?’’ अतुल ने चिंकी का हाथ पकड़ कर खींचते हुए पूछा.

‘‘वही मिट्टी के तेल वाली बात,’’ चिंकी ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

‘‘ओ हो, तुम भी कितनी मूर्ख हो,’’ अतुल ने चिढ़ कर कहा, ‘‘पिताजी मजाक कर रहे थे और उन्हें मजाक करने की आदत है. तुम औरतों की कमजोरी यही है कि मजाक नहीं समझतीं. अब उस दिन बिना बात तुम्हारी मम्मी भी भड़क गई थीं.’’

‘‘मेरी मां तुम्हारी भी तो कुछ लगती हैं. बेचारी कितनी सीधीसादी हैं. उन का मजाक उड़ाना कोई अच्छी बात थी?’’ चिंकी ने क्रोध से कहा, ‘‘मेरी मां के बारे में कभी कुछ मत कहना.’’

‘‘अच्छा बाबा माफ करो,’’ अतुल ने प्यार से चिंकी को फिर पास खींचा, ‘‘अब तो चुप हो जाओ.’’

‘‘मैं चुप कैसे रह सकती हूं,’’ चिंकी ने शंका से पूछा, ‘‘बताओ न, क्या पिताजी सच कह रहे थे?’’

अब अतुल चिढ़ गया. खीज कर बोला, ‘‘हां, सच कह रहे थे. तो फिर? और यह भी सुनो. इस घर में पहले भी 3-4 बहुएं जलाई जा चुकी हैं और शायद अब तुम्हारी बारी है.’’

चिंकी छिटक कर दूर हो गई. उस रात समझौते की कोई गुंजाइश नहीं थी.

अगले दिन सबकुछ सामान्य था क्योंकि सब अपने- अपने काम रोज की तरह कर रहे थे. कोई तनाव नहीं. सबकुछ एक बदबू के झोंके की तरह उड़ गया था. फिर भी चिंकी जितनी बार बाथरूम जाती, मिट्टी के तेल की बोतल को नई दृष्टि से देखती थी और तरहतरह के दुष्ट विचार मन में आ जातेथे.

एकांत पा कर मां के नाम पत्र लिखा. सारी बातें विस्तार से लिखीं कि शादी में कहीं दहेज में तो कोई कमी नहीं रह गई? लेनेदेने में तो कहीं कोई चूक नहीं हो गई? अतुल को तो किसी तरह मना लेगी, पर ससुर के लिए आने वाली होली पर सूट का कपड़ा और सास के लिए कांजीवरम वाली साड़ी जो जानबूझ कर नहीं दी गई थी, अब अवश्य दे देना. हो सके तो अतुल के लिए सोने की चेन और सास के लिए कंगन भी बनवा देना. पता नहीं कब क्या हो जाए? वैसे माहौल देखते हुए ऐसी कोई आशंका नहीं है. ऊपर से सब का व्यवहार अच्छा है और प्यार से रखते हैं.

पत्र पढ़ कर मां घबरा गईं.

‘‘मेरा मन तो बड़ा घबरा रहा है,’’ मां ने कहा, ‘‘आप जाइए और चिंकी को कुछ दिनों के लिए ले आइए.’’

‘‘अब ऐसे कैसे ले आएं?’’ पिताजी ने चिंता से कहा, ‘‘चिंकी ने किसी की शिकायत भी तो नहीं की है. ले आने का कोई कारण तो होना चाहिए. हम दोनों का रक्तचाप ठीक है और मधुमेह की भी शिकायत नहीं है.’’

‘‘यह कोई हंसने की बात है,’’ मां ने आंसू रोकते हुए कहा, ‘‘कुछ तो बात हुई होगी जिस से चिंकी इतना परेशान हो गई. जो कुछ उस ने मांगा है वह होली पर दे आना. मेरी बेटी को कुछ हो न जाए.’’

‘‘कुछ नहीं होगा. तुम बेकार में दुखी हो रही हो,’’ पिताजी ने कहा, ‘‘उमाशंकरजी को हंसीमजाक करने की आदत है. दहेज के लिए उन्होंने आज तक कोई शिकायत नहीं की.’’

‘‘आदमी का मन कब फिर जाए कोई कह सकता है क्या? आप समझा कर अतुल को एक चिट्ठी लिख दीजिए,’’ मां ने कहा.

‘‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा,’’ पिताजी ने दृढ़ता से कहा, ‘‘हां, तुम चिंकी को जरूर लिख दो. कोई चिंता की बात नहीं है. सब ठीक हो जाएगा.’’

मां ने नाराजगी से पति को देखा और चिंकी को सांत्वना का पत्र लिखने बैठ गईं.

होली आई तो अतुल और चिंकी को घर आने की दावत दी. दामाद का खूब सत्कार हुआ. कुछ अधिक ही.

चिंकी ने मां को अलग ले जा कर पूछा, ‘‘आप ने सूट का कपड़ा और साड़ी खरीदी?’’

‘‘नहीं, तेरे पिताजी नहीं मानते. कहते हैं कि फालतू देने से लालच बढ़ जाता है. फिर कोई मांग भी तो नहीं की. हां, अतुल के लिए सोने की चेन बनवा दी है,’’ मां ने प्यार से कहा.

‘‘मां, बस तुम भी…चिंकी ने निराशा से कहा,’’ भुगतना तो मुझे ही पड़ेगा. आप को क्या. बेटी ब्याह दी, किस्सा खत्म. क्या अखबार नहीं पढ़तीं? टीवी नहीं देखतीं? हर रोज बहुओं के साथ हादसे हो रहे हैं.’’

‘‘बेटी, तेरे सासससुर ऐसे नहीं हैं,’’ मां ने समझाने की कोशिश की.

‘‘ठीक है मां…’’ चिंकी ने गिरते आंसुओं को थाम लिया.

जब बेटी और दामाद को बिदा किया तो ढेरों मिठाई और पकवान साथ में दिया. हजारहजार रुपए से टीका भी कर दिया.

अतुल ने विरोध किया, ‘‘मम्मीजी, इतना सब देने की क्या जरूरत है?’’

‘‘बेटा, करना तो बहुत कुछ चाहते थे पर अभी तो इतना ही है,’’ सास ने कहा, ‘‘तुम सब खुश रहो यही मन की इच्छा है.’’

‘‘मम्मीजी, आप का आशीर्वाद है तो सब ठीक ही होगा,’’ अतुल ने जल्दी से कहा, ‘‘अब चलें, देर हो रही है.’’

‘‘उमाशंकरजी और अपनी मम्मी को हमारा आदर सहित प्रणाम कहना,’’ पिताजी ने कहा.

ससुराल आने पर चिंकी बाथरूम गई तो मिट्टी के तेल की बोतल को अपनी जगह पाया. पता नहीं क्या होगा? सासससुर को शिकायत का कोई अवसर नहीं देगी. वैसे धीरेधीरे अतुल को रास्ते पर लाना होगा. जल्दी से जल्दी दूसरा घर या तबादले का प्रबंध करना पड़ेगा. मन के किसी एक कोने में आशंका का दिया जल रहा था.

छुट्टी का दिन था. रात हो चली थी. अतुल किसी काम से बाहर गया हुआ था. अचानक घर की रोशनी चली गई. घोर अंधेरा छा गया. अकसर आधे घंटे में बिजली आ जाती थी, पर आज बहुत देर हो गई.

अंधेरे में क्या करे कुछ सूझ नहीं रहा था.

उमाशंकर ने टटोलते हुए कहा, ‘‘राजरानी, एक टार्च थी न, कहां है? कुछ याद है.’’

‘‘आप की मेज की दराज में है,’’ राजरानी ने कहा, ‘‘पर उस का क्या करोगे? बैटरी तो है नहीं. बैटरी लीक कर गई थी तो फेंक दी थी.’’

उधर रसोई में टटोलते हुए और कुछ बर्तन इधरउधर गिराते हुए राजरानी बड़बड़ा रही थी, ‘‘मरी माचिस भी कहां रख दी, मिल ही नहीं रही है. और यह अतुल भी पता नहीं अंधेरे में कहां भटक रहा होगा.’’

अगर अचानक अंधेरा हो जाए तो बहुत देर तक कुछ नहीं सूझता. राजरानी, उमाशंकर और चिंकी तीनों ही कुछ न कुछ ढूंढ़ रहे थे, पर कभी दीवार से तो कभी फरनीचर से और कभी दरवाजे से टकरा जाते थे.

कमरे में टटोलते हुए चिंकी के हाथ में कुछ आया. स्पर्श से ध्यान आया कि कुछ दिन पहले उस ने एक लैंप देखा था. शायद वही है. पता नहीं कब से पड़ा था. अब बिना तेल के तो जल नहीं सकता.

उसे ध्यान आया, मिट्टी के तेल की बोतल बाथरूम में रखी है. कुछ तो करना होगा. दीवार के सहारे धीरेधीरे कमरे से बाहर निकली. पहला कमरा सास का था. फिर टीवी रूम था. आगे वाला बाथरूम था. दरवाजा खुला था. कुंडी नहीं लगी थी. एक कदम आगे कमोड था. बोतल तक हाथ पहुंचने के लिए कमोड पर पैर रख कर खड़े होना था. चिंकी यह सब कर रही थी, पर न जाने क्यों उस का दिल जोरों से धड़क रहा था.

जैसे ही बोतल हाथ लगी उसे मजबूती से पकड़ लिया. आहिस्ता से नीचे उतरी. फिर से दीवार के सहारे अपने कमरे में पहुंची. अब लैंप का ढक्कन खोल कर उस में तेल डालना था. अंधों की तरह एक हाथ में लैंप पकड़ा और दूसरे हाथ में बोतल. कुछ अंदर गया तो कुछ बाहर गिरा.

लो कितनी मूर्ख हूं मैं? चिंकी बड़बड़ाते हुए बोली. अब माचिस कहां है? माचिस इतनी देर से उस की सास को नहीं मिली तो उसे क्या मिलेगी? सारी मेहनत बेकार गई. अतुल तो सिगरेट भी नहीं पीता.

तभी चिंकी को ध्यान आया कि पिछले माह वह अतुल के साथ एक होटल में गई थी. होटल की ओर से उस के नाम वाली माचिस हर ग्राहक को उपहार में दी गई थी. अतुल ने वह माचिस अपनी कोट की जेब में डाल ली थी. माचिस को अभी भी जेब में होना चाहिए.

जल्दी से तेल की बोतल नीचे रखी और कपड़ों की अलमारी तक पहुंची. सारे कपड़े टटोलते हुए वह कोट पकड़ में आया. गहरी सांस ली और जेब में हाथ डाला. माचिस मिल गई. वह बहुत खुश हुई. जैसे ही जलाने लगी बोतल पर पैर लगा और सारा तेल गिर कर फैल गया.

उमाशंकर ने पूछा, ‘‘राजरानी, मिट्टी के तेल की बदबू कहां से आ रही है? क्या तुम ने तेल की बोतल तो नहीं गिरा दी?’’

‘‘अरे, मैं तो कब से यहां रसोई में खड़ी हूं,’’ राजरानी ने कहा, ‘‘मरी माचिस ढूंढ़ रही हूं.’’

‘‘अब छोड़ो भी माचिसवाचिस,’’ उमाशंकर ने कहा, ‘‘यहां आ जाओ और बैठ कर बिजली आने का इंतजार करो.’’

चिंकी ने माचिस जलाई और गिरी बोतल को हाथ में उठा लिया.

उमाशंकर ने लाइट की चमक देखी तो चिंकी के कमरे की ओर आए और वहां जो नजारा देखा तो सकपका गए. झट से दौड़ कर गए और चिंकी के हाथ से जलती माचिस की तीली छीन ली और अपने हाथ से मसल कर उसे बुझा दी.

‘‘लड़की तू कितनी पागल है?’’ उमाशंकर ने डांट कर कहा, ‘‘तू भी जलती और सारे घर में आग लग जाती.’’

तभी बिजली आ गई और सब की आंखें चौंधिया गईं. चिंकी ने जो दृश्य देखा समझ गई कि वह कितनी बड़ी भूल करने जा रही थी. घबरा कर कांपने लगी.

उमाशंकर ने हंस कर उसे झूठी सांत्वना दी, ‘‘मरने की बड़ी जल्दी है क्या?’’

और चिंकी को जो शर्म आई वह कभी नहीं भूली. शायद भूलेगी भी नहीं.

हमसफर भी तुम ही हो : संस्कृति ने किसे चुना अपना जीवनसाथी

अविनाश सुबह समय पर उठा नहीं तो संस्कृति को चिंता हुई. उस ने अविनाश को उठाते हुए उस के माथे पर हाथ रखा. माथा तप रहा था. संस्कृति घबरा उठी. अविनाश को तेज बुखार था. 2 दिन से वह खांस भी रहा था.

संस्कृति ने कल इसी वजह से उसे औफिस जाने से मना कर दिया था. मगर आज तेज बुखार भी था. उस ने जल्दी से अविनाश को दवा खिला कर माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखी.

संस्कृति और अविनाश की शादी को अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था. 2 साल ही हुए थे. पिछले साल तक सासससुर साथ में रहते थे. मगर कोरोना में संस्कृति की जेठानी की मौत हो गई तो सासससुर बड़े बेटे के पास रहने चले गए. उस के बाद करोना का प्रकोप बढ़ता ही गया.

पिछले कुछ समय से टीवी चैनल्स पर दिल्ली के अस्पतालों में कोरोना से जूझने वालों की हालत देख कर वह वैसे भी परेशान थी. कहीं वैंटीलेटर नहीं, तो कहीं औक्सीजन नहीं। मरीजों को अस्पतालों में बैड तक नहीं मिल रहा था. ऐसे में अब उन का क्या होगा, यह सोच कर ही वह कांप उठी.

जल्दी से उस ने मां को फोन लगाया,”मां, अविनाश को सुबह से बहुत तेज बुखार है, क्या करूं?”

“बेटा, यह समय ही बुरा चल रहा है. राजू भी कोरोना पौजिटिव है वरना उसे भेज देती. हम खुद उस की देखभाल में लगे हुए हैं. तू ऐसा कर, जल्दी से डाक्टर को बुला और दवाएं शुरू कर.”

“हां मां, वह तो करना ही होगा. मेरी सास की भी तबीयत भी सही नहीं चल रही है. वरना जेठजी को ही बुला लेती.”

“घबरा नहीं, बेटी. धैर्य से काम ले. सब ठीक हो जाएगा,” मां ने समझाने का प्रयास किया.

संस्कृति ने पति का कोरोना टेस्ट कराया. तब तक फैमिली डाक्टर से पूछ कर दवाएं भी देती रही. इस बीच अविनाश की हालत ज्यादा खराब होने लगी तो वह उसे ले कर अस्पताल भागी.

2 अस्पतालों से निराश लौटने के बाद तीसरे में मुश्किल से बैड का इंतजाम हो सका. सासससुर और जेठ भी दूसरे शहर में थे सो मदद के लिए आ नहीं सके. वैसे भी दिल्ली में लौकडाउन लगा हुआ था. रिश्तेदार चाह कर भी उस की मदद करने नहीं आ सकते थे.

आसपड़ोस वालों ने कोरोना के डर से दरवाजे बंद कर लिए. तब संस्कृति ने अपने दोस्तों को फोन लगाया पर सब ने बहाने बना दिए. अकेली संस्कृति पति की सेवा में लगी हुई थी.

अस्पताल में मरीजों की लंबी कतारों और मौत के तांडव के बीच किसी तरह संस्कृति खुद को बचाते हुए पति के लिए दौड़भाग करने में लग गई. कभी दवा की परची ले कर भागती तो कभी खाना ले कर। कभी डाक्टर से गिड़गिड़ाती तो कभी थकहार कर बैठ जाती.

उसे कोरोना वार्ड में जाने की इजाजत नहीं थी. बाहर रिसैप्शन में बैठ कर ही पति के ठीक होने की कामना करती रहती. उस पर पति की तबीयत अच्छी होने के बजाय बिगड़ती जा रही थी.

उस दिन भी डाक्टर ने परची में कई दवाएं जोड़ कर लिखीं. वह दवाएं लेने गई मगर जो सब से जरूरी दवा थी वही नहीं मिली. अस्पताल में उस का स्टौक खत्म हो चुका था. अब वह क्या करेगी? बदहवास सी वह अस्पताल के बैंच पर बैठ गई. बगल में ही परेशान सा एक युवक भी बैठा हुआ था.

संस्कृति ने उस की तरफ मुखातिब हो कर पूछा,”आप बता सकते हैं यह दवा मुझे कहां मिलेगी?”

“मैं खुद यह दवा ढूंढ़ रहा हूं. आसपास तो मिली नहीं. मेरे दोस्त ने बताया है कि नोएडा में उस की शौप है. उस ने कुछ दवाएं स्टौक कर के रखी हैं, सो वह मुझे दे देगा. अभी जाने की ही सोच रहा था. परची लाइए, मैं अपने साथ आप के लिए भी दवा ले आता हूं.”

“बहुत मेहरबानी होगी. सुबह से इस के लिए परेशान हो रही थी,”पसीना पोंछते हुए संस्कृति ने कृतज्ञ स्वर में कहा.

“मेहरबानी की कोई बात नहीं. इंसान ही इंसान के काम आता है. बस इतना शुक्र मनाइए कि दवा वहां मिल जाए,” कह कर वह चला गया.

करीब 2-3 घंटे बाद लौटा तो उस के चेहरे पर परेशानी की लकीरों के बावजूद खुशी थी.

“यह लीजिए, बड़ी मुश्किल से मिली, मगर मिल गई यही बहुत है.”

“बहुतबहुत शुक्रिया. कितने की है?” संस्कृति का चेहरा भी खिल उठा था.

“अरे नहीं, पैसे की जरूरत नहीं. आप पहले यह दवा खिलाइए मरीज को.

उस दिन के बाद से दोनों में बातचीत होने लगी. वह अपने भाई की देखभाल में लगा था और संस्कृति पति के लिए दौड़भाग कर रही थी. दोनों का दर्द एकसा ही था.

संस्कृति जब भी व्यथित होती तो उस के कंधों पर सिर रख कर रो लेती. कोई चीज लानी होती तो प्रतीक ले कर आता. संस्कृति को घर छोड़ कर आता.

धीरेधीरे तकलीफ के इन दिनों में 2 अजनबी एक बंधन में बंधते जा रहे थे. उन के बीच एक अजीब सा आकर्षण भी था, जो दोनों के इस बंधन को और मजबूत बना रहा था.

एक दिन अविनाश का औक्सीजन लेवल काफी घट गया. अस्पताल में औक्सीजन सिलैंडर नहीं था. तब प्रतीक ने यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. पूरे दिन कड़ी धूप और गरमी में लाइन में लग कर आखिर वह औक्सीजन सिलैंडर ले कर ही लौटा था.

उस दिन संस्कृति ने पूछा था,”आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हैं, इतना खयाल रखते हैं मगर क्यों? मैं तो आप की कुछ भी नहीं लगती. फिर बताओ न ऐसा क्यों कर रहे हो?”

“पहली बात, हर क्यों का जवाब नहीं होता और दूसरी बात, हम दोनों हमसफर नहीं हैं तो क्या हुआ हमदर्द तो हैं ना. आप के दर्द को मैं बहुत अच्छे से महसूस कर सकता हूं. आप की तकलीफ देख कर मुझे दुख होता है. बस, किसी भी तरह आप की मदद करना चाहता हूं.”

एक अनकहा सा मगर मजबूत साथ महसूस कर वह गमों के बीच भी मुसकरा उठी थी.

धीरेधीरे अविनाश की तबीयत और भी बिगड़ गई और उस को वैंटिलेटर पर रखना पड़ा. अस्पताल में वैंटीलेटर्स की भी कमी थी. कई वैंटिलेटर्स खराब हो गए.

बदहवास सी संस्कृति ने प्रतीक को फोन लगाया तो पता चला कि उस के भाई को भी कहीं और शिफ्ट करने की नौबत आ गई है.

“आप चिंता न करो संस्कृतिजी, मैं अपने भाई को जिस अस्पताल में ले कर जा रहा हूं, आप के पति को भी वहीं ले कर चलता हूं. वहां वैंटिलेटर की सुविधा है और डाक्टर्स भी अच्छे हैं,” प्रतीक ने उसे ढांढ़स बंधाया और फिर जल्दी ही शिफ्टिंग की सारी व्यवस्था करा दी.

शाम में सब निबट गया तो प्रतीक का हाथ पकड़ कर रुंधे गले से संस्कृति इतना ही कह सकी,”आप नहीं होते तो पता नहीं क्या होता.”

“मैं नहीं होता तो कोई और होता. अच्छे लोगों की मदद के लिए कोई ना कोई आ ही जाता है.”

“ऐसा नहीं है प्रतीकजी. मैं ने अपने दोस्तों, पड़ोसियों और परिचितों सब को देख लिया. इस कठिन समय में कोई भी मेरे साथ खड़ा नहीं. केवल आप हैं जिसे 4-6 दिन पहले तक मैं जानती भी नहीं थी. आज लगता है ऐसे आप के बिना रह ही नहीं सकती.”

उस की बात सुन कर प्रतीक ने एक अलग ही नजर नजर से संस्कृति की तरफ देखा और फिर मुसकरा कर चला गया.

संस्कृति के दिल में अजीब सी बेचैनी होने लगी. वह सोचने लगी कि प्रतीक का साथ इस परेशानी के समय में भी कितना सुकून दे जाता है. अस्पताल में मरीजों के रिश्तेदारों की भागदौड़ और परेशानियों के बीच भी चंद लम्हे वह केवल प्रतीक के बारे में सोचती रह गई.

इसी तरह 2-3 दिन और गुजरे. अविनाश की हालत काफी गंभीर थी. फिर एक दिन सुबहसुबह संस्कृति को सूचना मिली कि उस के पति की मृत्यु हो गई है. एक पल में संस्कृति को लगा जैसे वह अधूरी रह गई. उस का सबकुछ छिन गया है. प्रतीक ने जितना हो सका उसे धैर्य बंधाया. कोरोना की वजह से वह पति के शव को घर भी नहीं ला सकती थी. लौकडाउन लगा हुआ था. घर वालों का आना भी कठिन था. ऐसे में उसे समझ नहीं आ रहा था कि पति को अंतिम विदाई कैसे दे?

इस वक्त भी प्रतीक ही उस के काम आया. मुश्किल की इस घड़ी में सब से पहले उस ने संस्कृति को शांत कराया फिर उस के पति को शमशान तक ले जाने का सही से इंतजाम कराया. संस्कृति के साथ वह शमशान तक गया. फिर संस्कृति को उस के घर छोड़ने आया. संस्कृति लगातार रो रही थी. उस के हाथपैर कांप रहे थे.

प्रतीक समझ रहा था कि उस की तबीयत खराब है. वह अकेली है सो अपने खानेपीने को ले कर लापरवाह रहेगी तो और तबीयत खराब होगी.

तब प्रतीक ने हाथपैर धो कर और कपड़े बदल कर उस की रसोई में प्रवेश किया और सब से पहले चाय बनाई. संस्कृति के साथ खुद भी बैठ कर उस ने चाय पी. फिर संस्कृति को नहाने भेज कर खुद दालचावल बनाने लगा. संस्कृति को खाना खिला कर उस के लिए सब्जी, फल, दूध आदि का इंतजाम कर और सांत्वना दे कर वह वापस लौट गया.

2-3 दिनों बाद जब संस्कृति थोड़ी सामान्य हुई और पति की मौत के सदमे से उबरी तो उसे प्रतीक की याद आई. प्रतीक उस के लिए अपनों से बढ़ कर बन चुका था. मगर उसे पता नहीं था कि वह कहां रहता है, क्या जौब करता है? बस एक फोन नंबर था. उस ने फोन मिलाया तो नंबर बंद आ रहा था. संस्कृति घबरा उठी. वह प्रतीक से से संपर्क करना चाहती थी मगर ऐसा हो ना सका. 2-3 घंटे वह लगातार फोन ट्राई करती रही मगर फोन बंद ही आ रहा था.

अब उस से रहा नहीं गया. कुछ सोच कर वह उसी अस्पताल में पहुंची जहां उस के पति और प्रतीक का भाई ऐडमिट थे. वह रिसैप्शन एरिया में घूमघूम कर प्रतीक को खोजने लगी क्योंकि अकसर दोनों वहीं बैठे होते थे. फिर वह उसे खोजती हुई कैंटीन में भी गई. हर तरफ चक्कर लगा लिया मगर प्रतीक कहीं नजर नहीं आ रहा था. थक कर वह वापस रिसैप्शन में आ कर बैठ गई और सोचने लगी अब क्या करे.

तभी उसे वह नर्स नजर आई जिस से संस्कृति की जानपहचान हो गई थी. संस्कृति के पति की देखभाल वही नर्स करती थी. संस्कृति उसे अकसर अम्मां कह कर पुकारा करती. नर्स ने प्रतीक को भी उस के साथ कई बार देखा हुआ था. संस्कृति दौड़ कर नर्स के पास गई.

दुखी स्वर में नर्स ने कहा,”सौरी बेबी, तुम्हारे पति को हम बचा नहीं पाए.”

“जो लिखा था वह हो गया पर यह बताओ, अम्मां आप को प्रतीक याद है, जो अकसर मेरे साथ होता था? उस के भाई का इलाज चल रहा था.”

“हां बेबी, उस के भाई की भी तो मृत्यु हो गई. वह खुद भी ऐडमिट है. उसे भी कोरोना है और जानती हो, बेबी वह तेरे पति वाले बैड पर ही है. बैड नंबर 125.”

“सच अम्मां, आप उसे पहचानती हो ना?”

“हां बेबी, पहचानती हूं. तेरी बहुत हैल्प करता था. पर अब उस की हैल्प करने वाला कोई नहीं. अकेला है वह.”

“मैं हूं न अम्मां. अब उस के लिए किसी भी चीज की जरूरत पड़े तो मुझे बताना. मैं उस के अटेंडैंट के रूप में अपना नाम लिखवा देती हूं.”

“ठीक है, बेबी मैं बताती हूं तुझे.”

इस के बाद संस्कृति पूरे मन से प्रतीक की सेवा में लग गई. उस के लिए घर का खाना, फल, दवाएं वगैरह ले कर आना, उस की हर जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना, डाक्टरों से उस की तबियत की हर वक्त जानकारी लेते रहना जैसे काम वह पूरे उत्साह से कर रही थी. इस बीच प्रतीक की हालत बिगड़ी और उसे आईसीयू ले जाने की जरूरत पड़ गई.

इस के लिए अस्पताल के क्लर्क ने उस के आगे एक फौर्म बढ़ाया. उस में मरीज के साथ क्या संबंध है, यह लिख कर हस्ताक्षर करना था.

संस्कृति कुछ पलों के लिए सोचती रही कि वह क्या लिखे. फिर उस ने उस खाली जगह पर ‘पत्नी’ लिख कर साइन कर दिया. क्लर्क को कागज थमा कर वह खुद में ही मुसकरा उठी.

2-3 दिन आईसीयू में रह कर प्रतीक की हालत में सुधार शुरू हुआ और उसे कोविड वार्ड में वापस शिफ्ट कर दिया गया.

7-8 दिनों तक लगातार सुधार होने और रिपोर्ट नैगेटिव आने के बाद उसे डिस्चार्ज भी कर दिया गया. इतने दिनों तक संस्कृति ने भी अपना खानापीना और नींद भूल कर दिनरात प्रतीक की सेवा की थी.

डिस्चार्ज वाले दिन वह बहुत खुश थी. उस ने सीधा अपने घर के लिए कैब बुक किया और प्रतीक को अपने घर ले आई.

प्रतीक ने टोका तो संस्कृति ने थोड़े शरारती अंदाज में जवाब दिया,” मैं ने फौर्म में एक जगह यह लिख कर साइन किया है कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं और इसलिए अब मेरा और तुम्हारा घर अलगअलग नहीं, बल्कि एक ही होगा.”

“मगर संस्कृति लोग क्या कहेंगे?”

“लोगों का क्या है प्रतीक, जब मुझे जरूरत थी तो क्या लोग मेरी मदद के लिए आगे आए थे? नहीं न… उस वक्त तुम ने मेरा साथ दिया. अब मेरी बारी है. इस में गलत क्या है? तुम थोड़े ठीक हो जाओ फिर सोचेंगे कि क्या करना है,” संस्कृति ने अपना फैसला सुना दिया.

करीब 10 दिन संस्कृति ने जीभर कर प्रतीक का खयाल रखा. हर तरह से उस की सेहत पहले की तरह बनाने और खुश रखने का प्रयास करती रही.

संस्कृति एक संयुक्त परिवार से संबंध रखती थी. ससुराल में धनसंपत्ति की कमी नहीं थी. यह घर भी पति के बाद उस के नाम हो चुका था. पति ने उस के लिए काफी संपत्ति और गहने भी छोड़े थे. बस एक हमसफर की कमी थी, जिसे प्रतीक पूरा कर सकता था.

उस दिन शाम में संस्कृति ने प्रतीक के हाथों को थाम कर कहा,”जो बात मैं ने अनजाने ही उस फौर्म में लिखा, क्या हम उसे हकीकत का रूप नहीं दे सकते? क्या मैं तुम्हें अपने हमदर्द के साथसाथ एक हमसफर के रूप में भी स्वीकार हूं?”

“मुझे लगता है संस्कृति कि अब यह बात कहना फुजूल है.”

“मतलब?”

“मतलब यह कि तुम औलरेडी मेरी हमदर्द और हमसफर बन चुकी हो. हम हमेशा साथ रहेंगे. तुम से बढ़ कर कोई और मेरा खयाल नहीं रख सकता,” कह कर प्रतीक ने संस्कृति को गले से लगा लिया.

इनसानियत: कालू मेहतर की समझदारी

सु बह से ही रुकरुक कर बारिश हो रही थी. बच्चे नहाने का पूरा मजा लूट रहे थे. गांव के सभी तालतलैया लबालब थे.दोपहर बाद बारिश रुकी. थोड़ी ही देर बाद गांव में तूफान सा आ गया. लोग एक ही दिशा में भागे जा रहे थे. गांव के दक्षिणी छोर पर भारी भीड़ जमा हो रही थी. जोरजोर से शोर हो रहा था. ऐसा जान पड़ता था, जैसे कोई बहुत बड़ा तमाशा हो रहा हो.जब कालू मेहतर वहां पहुंचा, तो दिल दहला देने वाला नजारा था. अलादीन के चारों बेटे अपने बाप के जनाजे के पास बैठे सुबक रहे थे.

कोई भी उन की हालत से पसीज नहीं रहा था. सब मरनेमारने को तैयार खड़े नजर आ रहे थे. किसी के पास लाठी, तो किसी के पास फावड़ा था.मौलवी नूरुद्दीन गिड़गिड़ा रहा था, ‘‘आखिर हम क्या करें? हमारा कब्रिस्तान पानी से लबालब है, मुरदा दफनाने को जगह तो चाहिए न?’’‘‘अपने मुरदे को यहां से ले जाओ, वरना हम इसे आग लगा देंगे.

किस से पूछ कर खोदी है यहां कब्र?’’ पंडितजी ने तैश में आ कर कहा.‘‘रहम करो पंडितजी, हमें लाश को दफना लेने दो या कोई दूसरी जगह बता दो,’’ नूरुद्दीन फिर गिड़गिड़ाया.‘‘हम ने आप को जगह बताने का ठेका नहीं ले रखा. मुरदे को उठा कर चलते बनो,’’ पंडितजी ने गुस्से से कहा.‘‘हमारा कब्रिस्तान कब्र खोदने लायक नहीं है. फिर हम कोई रोजरोज तो मुरदे यहां दफनाएंगे नहीं.

मौत पर तो किसी का बस नहीं होता,’’ नूरुद्दीन ने समझाया.‘‘ये ऐसे ही नहीं मानेंगे, इस कब्र को मिट्टी से भर डालो,’’ पंडितजी ने अपने आदमियों से कहा.पंडितजी का इशारा पाते ही कुछ जवान लड़के हाथों में फावड़े ले कर कब्र पाटने के लिए आगे बढ़े. उन को आगे बढ़ता देख कालू मेहतर बोल उठा, ‘‘रुक जाओ. खबरदार, किसी ने कब्र पाटने की हिम्मत की तो…’’जवानों के आगे बढ़ते कदम जाम हो गए. अचानक पंडितजी ने कालू की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे कालू, तू ने आने में देर कर दी.’’

‘‘हां पंडितजी, मैं ने आने में देर कर दी, वरना अब तक मुरदा कब का ही दफनवा देता,’’ कालू ने उन की ओर देखते हुए कहा.‘‘क्यों?’’ पंडितजी ने सवाल किया.‘‘क्योंकि धर्मकर्म तो सब जीतेजी के झगड़े हैं. मरे हुए आदमी का कोई धर्म नहीं होता, वह तो माटी होता है.’’‘

‘लेकिन, एक मुसलमान हिंदू मंदिर की जगह पर तो नहीं दफनाया जा सकता…’’‘‘हिंदू मंदिर है ही कहां? यह तो एक बेरी का पेड़ है.’’‘‘यह एक पेड़ ही नहीं, बल्कि इस से भी ज्यादा बहुतकुछ है.’’‘‘क्या है? बताओ तो, जरा हम भी सुनें.’’‘‘इस पेड़ की पूजा होती है. हर सुहागिन हिंदू औरत इस पेड़ पर आए महीने की शुक्ल अष्टमी को तेल चढ़ा कर अपने बच्चों के लिए आशीष मांगती है.’’

‘‘हिंदू औरत इस की पूजा करती है, तभी यह हिंदू पेड़ है?’’ कालू मेहतर ने कहा.‘‘हां.’’‘‘बहुत खूब, पंडितजी. आप जैसे लोगों ने पेड़ों को भी जातियों में बांट दिया. पेड़ का धर्म तो परोपकार होता है, वह हिंदूमुसलिम का फर्क नहीं करता. इस बेरी के बेर तो सभी खाते हैं.

इस के ‘देवता’ ने तो कभी किसी का हाथ नहीं पकड़ा?’’‘‘तू समझता क्यों नहीं कालू, आखिर इस पेड़ के साथ हमारी पूजा का सवाल जुड़ा हुआ है, इसीलिए तो इस के चारों ओर की जगह खाली रखवा रखी है, नहीं तो यहां कब के मकान बन गए होते.’’

‘‘आप जैसे लोगों के लिए देवस्थान अलग बनाना कोई बड़ी बात नहीं है. आप इस बेरी के देवता को दूसरी बेरी में बैठा दीजिए.’’‘‘नामुमकिन.’’‘‘जब आप लोगों के घरों के भूत भगा सकते हैं, उन के रूठे देवता मना सकते हैं, तब इस देवता को दूसरी जगह क्यों नहीं ले जा सकते?’’

‘‘इन दोनों बातों में रातदिन का फर्क है.’’‘‘कोई फर्क नहीं… फर्क है तो बस आप की नीयत का…’’‘‘मेरी नीयत में कोई खोट नहीं है. दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए ही मैं उन के भूत भगाता हूं.’’‘‘बड़े हमदर्द हैं आप दूसरों के… तभी तो शायद आप ने आज गांव में यह बवंडर फैला दिया कि मुसलिम हमारे देवता की जगह पर कब्जा कर रहे हैं.’’‘‘मैं ने कोई बवंडर नहीं फैलाया.

मैं ने तो गांव वालों को हकीकत बताई है.’’‘‘हकीकत नहीं पंडितजी, आप ने घरघर जा कर यह आग लगाई है.’’‘‘यह झूठ है. अगर मैं ने गांव में यह आग लगाई है, तो मैं किसी भी गाय की कसम खाने को तैयार हूं. चल कौन सी गाय की पूंछ पकड़वाता है. अगर मैं सच्चा हूं तो भगवान मेरी रक्षा करेंगे, नहीं तो मैं आसऔलाद समेत गल जाऊंगा. मुझ पर झूठे इलजाम मत लगाओ.’’

‘‘इलजाम सोलह आने सच हैं. गाय की पूंछ पकड़ना तो आप लोगों ने पेशा बना रखा है. क्या आप मेरे घर नहीं गए? आप ने मुझे नहीं कहा कि उस बेरी के पास चलो, नहीं तो वे लोग कब्जा कर लेंगे.’’‘‘हां, यह तो कहा था.’’‘‘आप ने न सिर्फ मुझे, बल्कि यहां आए हुए सभी लोगों के घरघर जा कर यही बात कही है. तभी हम सब यहां आए हैं, नहीं तो हमें कोई खुशबू नहीं आ रही थी कि वहां चलना है.’’

‘‘हां, कहा है. आप सब हिंदू हैं और मैं आप सब का पुजारी हूं. पुजारी होने के नाते यह मेरा फर्ज था… मैं ने उसे पूरा किया… और अब आप लोग जानो…’’‘‘हम सब हिंदू हैं?’’‘‘हां, इस में कोई शक नहीं.’’‘‘नहीं पंडितजी… आप सब हिंदू हो सकते हैं, पर मैं हिंदू नहीं हूं. मैं तो एक मेहतर हूं, गयाबीता हूं और न जाने क्याक्या हूं.’’‘‘यह तू क्या कह रहा है?’’‘‘मैं वही कह रहा हूं, जो आप ने कहा था.

याद करो, उस दिन को…’’‘‘किस दिन को?’’‘‘कृष्ण जन्माष्टमी… याद आया? मैं मंदिर में जाने लगा तो आप ने मुझे धक्के मार कर, गालियां दे कर बाहर निकाल दिया था. उस दिन मैं छोटी जाति का था और आज जब आप को भीड़ इकट्ठी करनी पड़ रही है, तब आप मुझे हिंदू बना कर मुझे इज्जत बख्श रहे हैं. क्या उस दिन मैं हिंदू नहीं था?’’‘‘मुझ से गलती हो गई थी.’’‘‘गलती तो मेरी थी, जो मैं दलित हो कर भी मंदिर दर्शन करने चल दिया.’’‘‘उन बातों को भूल जाओ.

आज मैं तुम्हें सारा मंदिर घुमाघुमा कर दिखा दूंगा.’’‘‘नहीं, मैं ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से आप को सारा मंदिर एक बार फिर धो कर पवित्र करना पड़े.’’‘‘देखो कालू, उस दिन मैं अंधा था. अब मेरी आंखें खुल गई हैं… मुझे और जलील न करो.’’‘‘आप अब भी अंधे हैं. अगर उस मंदिर और भगवान में मेरा कोई हिस्सा न था, तो इस बेरी के देवता पर मेरा क्या हक है? यहां भी तो सवर्णों का देवता है.’’‘‘अरे, तू समझता क्यों नहीं है, अवर्णसवर्ण क्या होता है?’’

‘‘अगर अवर्णसवर्ण नहीं होते, तो यह झमेला क्यों खड़ा कर रखा है? आप धर्मकर्म के लफड़े को छोड़ कर इनसानियत का रास्ता क्यों नहीं अपना लेते? अगर धर्मकर्म और अवर्णसवर्ण नहीं होते, तो आप ने इन लोगों को क्यों बुला रखा है? क्यों ये मरनेमारने को तैयार खड़े हैं?

‘‘पंडितजी, इनसानियत के नाते मुरदा अब भी यहां दफना लेने दीजिए, नहीं तो मुरदों के ढेर लग जाएंगे, तब न किसी को गाड़ने की जगह मिलेगी और न जलाने की.’’‘‘चाहे धरती उलटपलट हो जाए, पर धर्म भ्रष्ट नहीं होने दूंगा. किसी भी कीमत पर अलादीन को यहां नहीं दफनाया जाएगा.’’‘‘पंडितजी, सीधी तरह क्यों नहीं कह देते कि आज आप दोनों जातियों में खून की नदियां बहती देखना चाहते हैं?’’‘‘मुझे झगड़े से कोई सरोकार नहीं. मैं गांव में किसी तरह शांति चाहता हूं.’’

‘‘यदि दिल से शांति चाहते हो, तो आप को और गांव वालों को मेरी यह बात माननी पड़ेगी.’’‘‘कैसी बात?’‘‘मैं हिंदू या मुसलिम होने से पहले एक इनसान हूं और इसी नाते यह सबकुछ कर रहा हूं. यह जगह गांव से कुछ दूर है. इसे मैं ‘हड़खोरी’ (जहां मरे हुए पशुओं को डाला जाता है और उन के अस्थिपंजर इकट्ठे किए जाते हैं) बना लूंगा, और मेरी मंजूरशुदा ‘हड़खोरी’ की जमीन जो गांव के बिलकुल पास आ गई है, उसे मैं मंदिर और कब्रिस्तान दोनों के लिए दे दूंगा.’’

दोनों तरफ के लोगों में खुसुरफुसुर होने लगी. पंडितजी के माथे पर सोच की रेखाएं उभर आईं. अलादीन के जनाजे के इर्दगिर्द बैठे लोगों को भी कुछ उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी.‘‘पंडितजी, आप कुछ बोले नहीं?’’ कालू मेहतर ने पूछा.‘‘मुझे तो कुछ समझ नहीं आता.

यदि दोनों जगहों की अदलाबदली हो गई, कब्रिस्तान और पूजास्थल एक जगह हो गए, तो सतकाली (लगातार 7 अकाल) पड़ेगी. गांव उजड़ जाएगा… सत्यानाश हो जाएगा,’’ पंडितजी ने आखिरी हथियार फेंका.‘‘समझ में क्यों नहीं आता आप के? सतकाली पड़ेगी तब देखा जाएगा, पर फिलहाल तो शांति हो जाएगी. न गांव वालों को मरे पशुओं की सड़ांध आएगी और न कभी किसी को दफनाने की शिकायत होगी.’’‘‘इन के पास कब्रिस्तान की जगह न होती तब तो सोचते…’’

‘‘होने से क्या होता है? कुदरती मुसीबतों से बचने के लिए आधी से कम दे देना.’’‘‘लेकिन, यह होगा कैसे?’’‘‘हड़खोरी भी 2 बीघा जमीन पर है, और इतनी ही यह जमीन है. उस में भी एक तरफ बेरी का पेड़ है, आप चंदे से बाद में वहां चारदीवारी बनवा लेना, सारी दिक्कतें मिट जाएंगी.’’‘‘लेकिन…?’’‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं, आप इस बेरी वाले देवता को उस बेरी में बैठा दीजिए.’’

‘‘और तुम…?’’‘‘मेरे इस स्थान पर हड़खोरी बनाते वक्त जो दिक्कत आएगी, उस से अपनेआप ही निबट लूंगा,’’ कालू मेहतर ने अपनी बात कही और फिर गांव वालों से पूछा, ‘‘किसी को कोई एतराज हो, तो अब भी बोल देना, भाइयो?’’‘‘हमें कोई एतराज नहीं, बस झगड़ा हमेशाहमेशा के लिए मिट जाना चाहिए,’’ एक बूढ़े ने सब की तरफ से कहा.‘‘ठीक है, मैं अभी जा कर उस हड़खोरी को साफ करवा देता हूं. आप इन को बता दीजिए कि अलादीन की कब्र किस ओर खोदें,’’ कह कर कालू मेहतर चल पड़ा.सभी की तनी हुई लाठियां झुक गईं. सब अपनेअपने घरों की ओर चल पड़े.3-4 घंटे बाद हड़खोरी साफ हो गई. उस जमीन पर पंडितजी ने गंगाजल छिड़का.

फिर उन्होंने हवन कर के हड़खोरी को पवित्र किया और मंत्र बोलते हुए पुरानी बेरी के देवता को इस नई बेरी में बैठाया. उधर जो जगह मुसलिमों को दी गई, उस में मौलवीजी ‘तिलावत’ (इसलाम के मुताबिक क्रियाकर्म) करने में लग गए.शाम तक अलादीन की लाश दफना दी गई. गांव में सब तरफ कालू मेहतर की सूझबूझ की बातें हो रही थीं.वक्त गुजरता रहा और कालू मेहतर अपना काम करता रहा. न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर, अपने काम से काम.

एक दिन जब वह मरी हुई भैंस हड़खोरी में डाल रहा था, तो अचानक उस ने आवाजें सुनीं, ‘‘अरे ओ कालू, यहां जानवर मत डालना.’’‘‘क्यों भाई, क्या बात है? इस हड़खोरी में भी पशु न डालूं, तो कहां डालूं?’’ कालू मेहतर ने सवाल किया.‘‘कहांवहां का मुझे पता नहीं, यहां तो मेरा प्लाट है.’’‘‘यहां और प्लाट?’’‘‘हां, सरपंच ने परसों ही दिया है.’’‘‘कुछ तो शर्म करते भाई, यदि प्लाट ही लेना था तो किसी अच्छी जगह लेते.’’‘‘तू तो भोला है कालू, शर्म किस बात की?

बाबा आना चाहिए, चाहे पिछली गली से आ जाए. फिर गांव में और जगह है ही कहां?’’‘‘ठीक है भाई, तेरी मरजी. मैं इसे दूसरी जगह डाल दूंगा,’’ कह कर कालू मेहतर भैंस को दूसरी जगह डालने चल दिया.भैंस को दूसरी जगह डाल कर वह अपनी गधागाड़ी पर लौट आया. घर पहुंच कर वह हाथमुंह धो ही रहा था कि शेरू की आवाज सुनाई दी, ‘‘कालू, उस भैंस को उठा, उसे तू मेरे प्लाट में डाल आया है. आइंदा वहां कोई जानवर मत डालना, नहीं तो खैर मत समझना.’’

‘‘अरे भाई, उसे तो मैं हड़खोरी में ही डाल कर आया हूं,’’ कालू मेहतर ने धीरे से कहा.‘‘किस की हड़खोरी? वहां तो मेरा प्लाट है,’’ शेरू ने धौंस जमाई.‘‘ये प्लाट कब काट दिए?’’ कालू ने पूछा.‘‘तुझे पता नहीं, सरपंचों के चुनाव नजदीक हैं?’’‘‘तो यह करामात सरपंच ने की है. ठीक है भाई, आप चलो. मैं अभी आता हूं… उठा लूंगा. फिर कभी नहीं डालूंगा,’’ कह कर कालू मेहतर ने अपना पिंड छुड़़ाया.उस के चले जाने पर कुछ देर तो कालू मेहतर हैरानपरेशान सा बैठा रहा.

फिर गांव के लोगों के पास चला गया. सभी लोग मंदिर के चबूतरे पर इकट्ठे हो गए.कालू मेहतर ने पंडितजी से कहा, ‘‘हड़खोरी पर कब्जा हो गया है, वहां लोगों ने प्लाट ले लिए हैं, मैं मरे पशुओं को कहां डालूंगा?’’पंडितजी ने कोई जवाब नहीं दिया. वे लोगों की शक्ल पहचानने में लगे थे. कुछ देर बाद कालू मेहतर ने फिर कहा, ‘‘पंडितजी, मैं जानवरों को कहां डालूंगा?’’

‘‘अरे कालू, पंडितजी क्या जवाब देंगे, इन्होंने खुद वहां प्लाट ले रखा है,’’ भीड़ में से एक आवाज आई.‘‘यदि यह सच है तो डूब मरो, पंडितजी डूब मरो. याद करो उस दिन को, जब अलादीन को 5 हाथ जमीन नहीं देने दे रहे थे और आज खुद हड़खोरी पर कब्जा कर रहे हो?’’ कालू ने गरम होते हुए कहा.‘‘अरे, बोलते क्यों नहीं पंडितजी, कहां गई आप की वह भक्ति? कहां है आप का वह धर्म, जो दूसरों को गलत काम न करने की सलाह देता है? चुल्लूभर पानी में डूब मरो… ‘धर्मात्मा’ हो कर भी 20-30 गज टुकड़े के लिए मर रहे हो. बोलो, मैं पशुओं को कहां डालूंगा?’’

कालू मेहतर ने तेज आवाज में कहा.‘‘भाई कालू, जो करेगा, वह भरेगा. तू कोई और काम देख ले,’’ भीड़ में से फिर वही आवाज आई.‘‘पंडितजी चुप क्यों हो? मेरी बातों का जवाब दो… या तो यह कब्जा छोड़ देना या अपनी मरी हुई भैंस हड़खोरी से उठा लाना और अपने घर, खेत में कहीं डाल लेना. मैं आइंदा यह काम नहीं करूंगा,’’ कह कर कालू मेहतर चला गया.

दिन छिप चुका था. अंधेरा भी हो चुका था. हवा जोरों से बह रही थी. किसी ने आ कर कालू मेहतर का दरवाजा खटखटाया.कालू मेहतर की छोटी लड़की ने दरवाजा खोला. 2 आदमी अंदर आ गए. कालू भी बरामदे में आ गया.कालू मेहतर को देखते ही पंडितजी ने कहा, ‘‘जय श्रीरामजी की.’’कालू मेहतर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह खामोश बैठा पंडितजी के साथ आए सरपंच को सवालिया निगाहों से घूरता रहा. कुछ पल बीतने पर पंडितजी ने कहा, ‘‘यह लो कालू, संभालो.’’‘‘क्या है?’’ कालू मेहतर ने बेरुखी से पूछा.

‘‘प्लाट का पट्टा और 20,000 रुपए हैं. देखो, हड़खोरी वाले मामले को अब मत उछालना,’’ कहते हुए पंडितजी ने दोनों चीजें कालू को पकड़ाईं.‘‘मुझे इन से कोई सरोकार नहीं. आप की चीजें आप को मुबारक हों,’’ कहते हुए कालू मेहतर ने दोनों चीजें वापस करनी चाही.तभी सरपंच बोल उठा, ‘‘देखो कालू, गांव की राजनीति बड़ी घटिया होती है. उस में टांग अड़ा कर तुझे कुछ नहीं मिलेगा, उलटे तू उजड़ जाएगा.’’‘‘मुझे राजनीति से कोई मतलब नहीं. मैं तो हड़खोरी को टुकड़ों में बंटा नहीं देखना चाहता.

मुझे या तो हड़खोरी चाहिए या इस काम से नजात.’’‘‘भाड़ में जाए तारी हड़खोरी. तू ने मैला ढोने का ठेका ले रखा है क्या? इन पैसों से कोई और काम देख लेना.’’‘‘नहीं सरपंच साहब, मैं बिक नहीं सकता. अपने हक के लिए मैं कचहरी का दरवाजा खटखटाऊंगा,’’ कालू मेहतर ने इतमीनान से कहा.‘‘वहां तो तू हारेगा. पहले तो दानवीर कर्ण बन कर अपनी मंजूरशुदा हड़खोरी की जमीन गांव को दान में दे चुका है. और अब वाली हड़खोरी की जमीन पंचायत की है. इस जमीन पर पट्टे बांटने का पंचायत को पूरा हक है.

‘‘वैसे भी केस लड़ना कोई बच्चों का खेल नहीं. उस में पैसा भी पानी की तरह बहेगा, जो मेरी औकात की बात नहीं. हड़खोरी के लिए सारे पट्टे वालों से दुश्मनी मोल ले लेगा क्या? ये सब पट्टेदार गांव के पैसे वाले लोग हैं,’’ सरपंच ने धौंस जमाई.‘‘ठीक है सरपंच साहब, मैं एक गरीब आदमी हूं, लेकिन मेरा जमीर इस बात की गवाही नहीं देता. मैं चांदी के चंद टुकड़ों के बदले जमीर नहीं बेच सकता.

मैं मरे पशुओं की खाल नोचता हूं, मैला ढोता हूं, फिर भी इनसान हूं. इनसानियत मेरा धर्म है और इसी नाते मैं ने पुरानी हड़खोरी गांव को दे कर झगड़ा मिटाया था.‘‘अब अगर आप अपना धर्म बेच रहे हो तो बेचो, पर मैं अपना धर्म, ईमान नहीं बेचूंगा. ये लो अपने रुपए और ये रहा आप का पट्टा,’’ कहते हुए कालू मेहतर ने रुपए सरपंच की ओर फेंक दिए और पट्टे के टुकड़ेटुकड़े कर के हवा में उड़ा दिए.सरपंच और पंडितजी के चेहरे देखने लायक थे. शायद उन की हेकड़ी निकल चुकी थी.

मेरी अरेंज मैरिज हुई है मैं अपनी वाइफ से इमोशनली अटैच होना चाहता हूं, क्या करूं?

सवाल

मेरी नईनई शादी हुई है. अरेंज मैरिज है. मैं इमोशनल टाइप का लड़का हूं और शादी मेरे लिए जिंदगी की एक इंपोर्टैंट चीज है. मैं अपनी वाइफ से इमोशनली बहुत ज्यादा अटैच होना चाहता हूं, लेकिन हमारे बीच में कुछ ?ि?ाक सी है. हम दोनों एकदूसरे से खुल नहीं पा रहे. मैं खुल कर सैक्स करना चाहता हूं. लेकिन जैसा सोचता हूं वैसा हो नहीं पाता. इस कारण थोड़ा अपसैट सा रहने लगा हूं. वाइफ अच्छी है. मु?ा से कोई शिकायत नहीं करती. बस, मैं ही खुश नहीं रह पा रहा हूं. इस की क्या वजह हो सकती है?

पतिपत्नी का रिश्ता जितना खुला होगा उस में उतनी ही ताजगी होगी. पतिपत्नी के लिए अपने नए रिश्ते की शुरुआत में ही खुल कर सैक्स की बातें करने से हर चीज करनी आसान हो जाती है. कई लोगों को यह स्वीकार करने में एक ?ि?ाक महसूस होती है कि बैडरूम में उन्हें क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं. जब तक आप इसे अपने पार्टनर को नहीं बताएंगे, सैक्स को एंजौय नहीं कर पाएंगे.

जवाब

कई लोगों में सैक्स फैंटेसीज को ले कर डर होता है कि कहीं उन का पार्टनर उन्हें गलत न सम?ा ले या फिर उन की इच्छाओं को खारिज न कर दे. अपनी कल्पनाओं को स्वीकार करना सीखें, भले ही वे कैसी भी हों. अगर आप को अपने पार्टनर पर पूरा भरोसा है तो बिना ?ि?ाके आप उन से अपनी फैंटेसीज शेयर कर सकते हैं. सैक्स को गंभीरता से लेने के बजाय थोड़ा मस्तीमजाक की तरह लें और हर काम की तरह इसे भी प्राथमिकता दें.

आजकल सामाजिक हालत ठीक नहीं. व्यक्ति को घर के बाहरअंदर हर वक्त सतर्क रहना पड़ता है. बीमारी से खुद को बचा कर रखना है. लेकिन आप जब भी अपने पार्टनर के साथ हों, इंटीमेसी के समय शारीरिक तौर पर पार्टनर के साथ पूरी तरह से इनवौल्व होना जरूरी है. इस के लिए आप को हर चीज को महसूस करने की आदत डालनी चाहिए.

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सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem
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