Hindi Story: फोन कौल्स – आखिर कौन था देर रात मीनाक्षी को फोन करने वाला

Hindi Story, लेखक – सोनू कुमार ‘सुमन’

‘ट्रिंग ट्रिंग… लगा फिर से फोन बजने,‘ फोन की आवाज से पूरा हौल गूंज उठा. आज रात तीसरी बार फोन बजा था. उस समय रात के 2 बज रहे थे. मीनाक्षी गहरी नींद में सो रही थी. उस के पिता विजय बाबू ने फोन उठाया. उस तरफ से कोई नाटकीय अंदाज में पूछ रहा था, ‘‘मीनाक्षी है क्या?’’

‘‘आप कौन?’’ विजय बाबू ने पूछा तो उलटे उधर से भी सवाल दाग दिया गया, ‘‘आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘यह भी खूब रही, तुम ने फोन किया है और उलटे हम से ही पूछ रहे हो कि मैं कौन हूं.’’

‘‘तो यह मीनाक्षी का नंबर नहीं है क्या? मुझे उस से ही बात करनी है, मैं बुड्ढों से बात नहीं करता?’’

‘‘बदतमीज, कौन है तू? मैं अभी पुलिस में तेरी शिकायत करता हूं.’’

‘‘बुड्ढे शांत रह वरना तेरी भी खबर ले लूंगा,’’ कह कर उस ने फोन काट दिया.

विजय बाबू गुस्से से तिलमिला उठे. उन्हें अपनी बेटी पर बहुत गुस्सा आ रहा था. उन का मन हुआ कि जा कर दोचार थप्पड़ लगा दें मीनाक्षी को.

‘2 दिन से इसी तरह के कई कौल्स आ रहे हैं. पहले ‘हैलोहैलो’ के अलावा और कोई आवाज नहीं आती थी और आज इस तरह की अजीब कौल…’ विजय बाबू सोच में पड़ गए.

मीनाक्षी ने अच्छे नंबरों से 12वीं पास की और एक अच्छे कालेज में बी कौम (औनर्स) में दाखिला लिया था. पहले स्कूल जाने वाली मीनाक्षी अब कालेज गोइंग गर्ल हो गई थी. कालेज में प्रवेश करते ही एक नई रौनक होती है. मीनाक्षी थी भी गजब की खूबसूरत. उस के काफी लड़केलड़कियां दोस्त होंगे, पर ये कैसे दोस्त हैं जो लगातार फोन करते रहते हैं तथा बेतुकी बातें करते हैं.

अगली सुबह जब विजय बाबू चाय की चुसकियां ले रहे थे और उधर मीनाक्षी कालेज के लिए तैयार हो रही थी, तभी विजय बाबू ने मीनाक्षी को बुलाया, ‘‘मीनाक्षी, जरा इधर आना.’’

डरतेडरते वह पिता के सामने आई. उस का शरीर कांप रहा था. वह जानती थी कि पिताजी आधी रात में आने वाली फोन कौल्स के बारे में पूछने वाले हैं क्योंकि परसों रात जो कौल आई थी, मीनाक्षी के फोन उठाते ही उधर से अश्लील बातें शुरू हो गई थीं. वह कौल करने वाला कौन है, उसे क्यों फोन कर रहा है, ये सब उसे कुछ भी मालूम नहीं था. वह बेहद परेशान थी. इस समस्या के बारे में किस से बात की जाए, वह यह भी समझ नहीं पा रही थी.

‘‘कालेज जा रही हो?’’ विजय बाबू ने बेटी से पूछा.

मीनाक्षी ने सिर हिला कर हामी भरी.

‘‘मन लगा कर पढ़ाई हो रही है न?’’

‘‘हां पिताजी,’’ मीनाक्षी ने जवाब दिया.

‘‘कालेज से लौटते वक्त बस आसानी से मिल जाती है न, ज्यादा देर तो

नहीं होती?’’

‘‘हां पिताजी, कालेज के बिलकुल पास ही बस स्टौप है. 5-10 मिनट में बस मिल ही जाती है.’’

‘‘क्लास में न जा कर दोस्तों के साथ इधरउधर घूमने तो नहीं जाती न,’’ मीनाक्षी को गौर से देखते हुए विजय बाबू ने पूछा.

‘‘ऐसा कुछ भी नहीं है पिताजी.’’

‘‘देखो, अगर कोई तुम्हारे साथ गलत व्यवहार करता हो तो मुझे फौरन बताओ, डरो मत. मेरी इज्जतप्रतिष्ठा को जरा भी ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए. मैं इसे कभी बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

मीनाक्षी ने ‘ठीक है’, कहते हुए सिर हिलाया. आंखों में भर आए आंसुओं को रोकते हुए वह वहां से जाने लगी.

‘‘मीनाक्षी’’, विजय बाबू ने रोका, मीनाक्षी रुक गई.

‘‘रात को 3 बार तुम्हारे लिए फोन आया. क्या तुम ने किसी को नंबर दिया था?’’

‘‘नहीं पिताजी, मैं ने अपने क्लासमेट्स को वे भी जो मेरे खास दोस्त हैं, को ही अपना नंबर दिया है.’’

‘‘उन खास दोस्तों में लड़के भी हैं क्या?’’ विजय बाबू ने पूछा.

‘‘नहीं, कुछ परिचित जरूर हैं, पर दोस्त नहीं.’’

‘‘ठीक है, अब तुम कालेज जाओ.’’

इस के बाद विजय बाबू ने फोन कौल्स के बारे में ज्यादा नहीं सोचा, ‘कोई आवारा लड़का होगा,’ यह सोच कर निश्चिंत हो गए.

शाम को जब विजय बाबू दफ्तर से लौटे तो मीनाक्षी की मां लक्ष्मी को कुछ परेशान देख उन्होंने इस का कारण पूछा तो वे नाश्ता तैयार करने चली गईं.

दोनों चायबिस्कुट के साथ आराम से बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगे, लेकिन विजय बाबू को लक्ष्मी के चेहरे पर कुछ उदासी नजर आई.

‘‘ऐसा लगता है कि तुम किसी बात को ले कर परेशान हो. जरा मुझे भी तो बताओ?’’ विजय बाबू ने अचानक सवाल किया.

‘‘मीनाक्षी के बारे में… वह… फोन कौल…‘‘ लक्ष्मी ने इतना ही कहा कि विजय बाबू सब मामला समझते हुए बोले, ‘‘अच्छा रात की बात? अरे, कोई आवारा होगा. अगर उस ने आज भी कौल की तो फिर पुलिस को इन्फौर्म कर ही देंगे.’’

लक्ष्मी ने सिर हिला कर कहा, ‘‘नहीं. पिछले 2-3 दिन से ही ऐसे कौल्स आ रहे हैं. मैं ने मीनाक्षी को फोन पर दबी आवाज में बातें करते हुए भी देखा है. जब मैं ने उस से पूछा तो उस ने ‘रौंग नंबर‘ कह कर टाल दिया. आज दोपहर में भी फोन आया था. मैं ने उठाया तो उधर से वह अश्लील बातें करने लगा. मुझे तो ऐसा लगता है कि हमारी बेटी जरूर हम से कुछ छिपा रही है.’’

‘‘तुम्हारा क्या सोचना है कि ऐसे लड़के मीनाक्षी के बौयफ्रैंड्स हैं?’’

‘‘कह नहीं सकती. पर क्या बौयफ्रैंड्स ऐसे लफंगे होते हैं. हमारे समय में भी कालेज हुआ करते थे. उस वक्त भी कुछ लड़के असभ्य होते थे. लड़कियां, लड़कों से बातें करने में शरमाती थीं कि कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा. वे तो हमें कीड़ेमकोड़े की तरह दिखते थे.

फिर भी वहां लड़केलड़कियों में डिग्निटी रहती थी.’’

‘‘ऐसे कीड़े तो हर जगह होते हैं लक्ष्मी, जरूरी होता है कि हम उन कीड़ों से कितना बच कर रहते हैं. आज रात अगर फोन कौल आई तो हम इस की खबर पुलिस में करेंगे, तुम भी मीनाक्षी से प्यार से पूछ कर देखो,’’ विजय बाबू ने समझाया.

लक्ष्मी ने गहरी सांस लेते हुए सिर हिला कर हामी भरी और गहरी सोच में डूब गई. जवान होती लड़कियों की समस्याओं के बारे में वे भी जानती थीं. प्रेमपत्र, बदनामी, जाली फोटो, बेचारी लड़कियां न किसी को बता पाती हैं और मन में रख कर ही घुटघुट कर जीती हैं. कुछ कहने पर लोग उलटे उन्हीं पर शक करते हैं. कितनी यातनाएं इन लड़कियों को सहनी पड़ती हैं.

पहले जमाने में लोग लड़कियों को घर से बाहर पढ़ने नहीं भेजते थे बल्कि घरों में ही कैद रखते थे. लोग सोचते थे कि कहीं ऊंचनीच न हो जाए जिस से समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. इस से उन के व्यक्तित्व पर कितना बुरा असर पड़ता है, लेकिन अब समय के साथ लोगों की मानसिकता बदली है. लोग बेटियों को भी बेटे के समान ही मानते हैं. उन्हें जीने की पूरी आजादी दे रहे हैं. इस से इस तरह की कई समस्याएं भी सामने आ रही हैं.

लक्ष्मी ने मन ही मन सोचा कि मीनाक्षी को बेकार की बातों से परेशान नहीं करेंगी तथा प्यार से सारी बातें पूछेंगी.

उस रात भी फोन कौल्स आईं. फोन एक बार तो विजय बाबू ने उठाया, फिर लक्ष्मी ने उठाया तो कोई जवाब नहीं आया. जब तीसरी बार फोन आया तो उन दोनों ने मीनाक्षी से फोन उठाने को कहा और उस का हौसला बढ़ाया. मीनाक्षी ने डरतेडरते फोन उठाया. मीनाक्षी बोली, ‘‘मैं तुम्हें बिलकुल नहीं जानती. मैं ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो मेरे पीछे पड़े हो. मेरा पीछा छोड़ दोे.’’ यह कह कर वह फफक पड़ी. ‘अभी पूछना सही नहीं होगा,‘ यह सोच मीनाक्षी को चुप करा कर सभी सो गए. पर नींद किसी की आंखों में नहीं थी. अगली सुबह दोनों ने मीनाक्षी से पूछा, ‘‘बेटी, यह क्या झमेला है?’’

मीनाक्षी रोंआसी हो कर बोली, ‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘रात को फोन करने वाले ने तुझ से क्या कहा.’’

‘‘कह रहा था कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम बहुत खूबसूरत हो. क्या तुम कल सुबह कालेज के पास वाले पार्क में मिलोगी.’’

‘‘ठीक है, अब तुम निडर हो कर कालेज जाओ. बाकी मैं देखता हूं, इस के बारे में तुम बिलकुल मत सोचो, अब तुम अकेली नहीं, बल्कि तुम्हारे मातापिता भी तुम्हारे साथ हैं.’’

‘‘मीनाक्षी ने हामी भरी और कालेज जाने की तैयारी करने लगी. विजय बाबू सीधे पुलिस स्टेशन गए और वहां उन्होंने शिकायत दर्ज कराई और सारा माजरा बता दिया. इंस्पैक्टर ने उन्हें जल्द कार्यवाही करने की तसल्ली दे कर घर जाने को कहा.’’

2-3 दिन गुजर गए. अगले दिन पुलिस स्टेशन से फोन आया. मीनाक्षी को भी साथ ले कर आने को कहा गया था. विजय बाबू जल्दीजल्दी मीनाक्षी को साथ ले कर थाने पहुंचे.

पुलिस इंस्पैक्टर ने उन्हें बैठने को कहा और कौंस्टेबल को बुला कर उसे कुछ हिदायतें दीं. वह अंदर जा कर एक लड़के के साथ वापस आया.

इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या आप इस लड़के को जानती हैं?’’

‘‘जी नहीं, मैं इसे नहीं जानती.’’

‘‘मैं बताता हूं, यह कौन है और इस ने क्या किया है.’’ इंस्पैक्टर ने कहना जारी रखा, ‘‘आप अपनी सहेली नीलू को जानती हैं न.’’

‘‘जी हां, मैं उसे बखूबी जानती हूं. वह मेरी कालेज में सब से क्लोज फ्रैंड है.’’

‘‘और यह आप की क्लोज फ्रैंड का सगा भाई नीरज है. यह बहुत आवारा किस्म का इंसान है. यह अपनी बहन नीलू के मोबाइल में आप का फोटो देख कर आप का दीवाना हो गया और फिर उसी के मोबाइल से आप का नंबर ले कर आप को कौल्स करने लगा. इसी तरह यह आप के सिवा और भी कई लड़कियों के नंबर्स नीलू के मोबाइल से ले कर चोरीछिपे उन्हें तंग करता है. इस के खिलाफ कईर् शिकायतें हमें मिलीं हैं. अब यह हमारे हाथ आया है और मैं इस की ऐसी क्लास लूंगा कि यह हमेशा के लिए ऐसी हरकतें करना भूल जाएगा. मैं ने इस के मातापिता तथा नीलू को खबर कर दी है. वे यहां आते ही होंगे.’’

‘‘मैं इस पर केस करना चाहता हूं. इस तरह के अपराधियों को जब सजा मिलेगी तभी ये ऐसी घिनौनी हरकतें करना बंद करेंगे,’’ विजय बाबू ने जोर दे कर कहा.

मीनाक्षी चुपचाप उन की बातें सुन रही थी. वह अंदर ही अंदर उबल रही थी कि 4-5 थप्पड़ जड़ दे उसे.

इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘आप का कहना भी सही है पर ऐसे केस जल्दी सुलझते नहीं हैं. बारबार कोेर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इन्हें बेल भी चुटकी में मिल जाती है.’’

इतने में नीरज के मातापिता तथा बहन नीलू भी वहां आ पहुंचे. नीलू को देख कर मीनाक्षी उस के गले लिपट कर रोने लगी. नीलू की मां ने नीरज को जा कर 4-5 थप्पड़ जड़ दिए और बोलीं, ‘‘नालायक तुझे इतना भी खयाल नहीं आया कि तेरी भी एक बहन है और बहन की सहेली भी बहन ही तो होती है. इंस्पैक्टर साहब, इसे जो सजा देना चाहते हैं दीजिए.’’

नीरज के पिता, विजय बाबू से विनती कर बोले, ‘‘भाई साहब, इसे माफ कर दीजिए. मैं मानता हूं कि इस ने गलती की है.  इस में इस की उम्र का दोष है. इस उम्र के बच्चे कुछ भी कर बैठते हैं. ये अब ऐसी हरकतें नहीं करेगा. इस की जिम्मेदारी मैं लेता हूं और आप को विश्वास दिलाता हूं कि यह दोबारा ऐसे फोन कौल्स नहीं करेगा.’’ फिर बेटे की तरफ देख कर बोले, ‘‘देखता क्या है जा अंकल से सौरी बोल.’’

नीरज सिर झुका कर विजय बाबू के पास गया और उन के सामने हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मुझे माफ कर दीजिए अंकल, अब मुझ से ऐसी गलती कभी नहीं होगी. आज से मेरे बारे में कोई शिकायत आप के पास नहीं आएगी,’’ फिर वह मीनाक्षी की ओर मुखातिब हो कर बोला, ‘‘आई एम वैरी सौरी मीनाक्षी दीदी, प्लीज मुझे माफ कर दो. आज से मैं तुम्हें तो क्या कभी किसी और लड़की को तंग नहीं करूंगा.’’

गुस्से से लाल मीनाक्षी ने सिर उठा कर नीरज की तरफ देखा और फिर सिर हिला दिया.

Family Story: मायका – सुधा को मायके का प्यार क्यों नहीं मिला?

Family Story: सुबह घर की सब खिड़कियां खोल देना सुधा को बहुत अच्छा लगता था. खुली हवा, ताजगी और आदित्य देव की रश्मियों में वह अपने मन के खालीपन को भरने की कोशिश करती. हर दिन नई उम्मीदें लाता है, सुधा इस नैसर्गिक सत्य को जी रही थी. लेकिन मांजी को यह कहां पसंद आता? शकसंदेह के चश्मे से बहू को देखने की उन की आदत थी. बिना सोचेसमझे वे कुछ भी कह डालतीं.

‘‘किस यार को देखती है जो सुबहसुबह खिड़कियां खोल कर खड़ी हो जाती है.’’

कहते हैं तीरतलवार शायद इतनी गहरी चोट न दे सकें जितने शब्द घायल कर जाते हैं. यहां तो रोज का किस्सा था. औरत जो थी, जिस की नियति सब की सुनने की होती है, इसलिए सुधा उन के कटु शब्दों को भुला देती. सच ही तो है, जब विकल्प न रहे तो सीमा पार जा कर भी समझौते करने पड़ते हैं. इस समझदारी ने ही उसे ऐसा तटस्थ बना दिया था जिसे सब ‘पत्थर’ कह देते थे. कुछ असर नहीं, जो चाहे, कहो. लेकिन यह किसे पता था कि उस का अंतर्मन आहत हो कर कब टूटबिखर गया. यह तो उसे खुद भी पता नहीं था.

उस के मायके को ले कर ससुराल में खूब बातें बनतीं. रोजरोज के ताने सुधा को अब परेशान नहीं करते. आदत जो बन गईर् थी, सुनना और पत्थर की मूरत बनी रहना जिस की न जबान थी न कान. इस मूर्ति में भी दिल धड़कता था, यह एहसास शायद अब किसी को नहीं था. सास की फब्तियां उस के दिल को छलनी करतीं, लेकिन फिर भी वह उसी मुसकराहट से जीती जैसे कुछ हुआ ही नहीं. कितनी अजीब बात है, बहू मुसकराए तो बेहया का तमगा पाती है, बोले या प्रतिकार करे तो संस्कारहीन.

ससुराल में उस की एक देवरानी भी थी, प्रिया. बड़े घर की बेटी जिस के आगे सासुमां की जबान भी तलुए से चिपकी रहती. जब प्रिया अपने मायके जाती तो सुधा को भी अपने घर की बहुत याद आती. पर जाए तो कैसे? किस के घर जाए वह? रिश्ते इतने खोखले हो चुके थे कि अब कोई एक फोन कर के उस का हालचाल पूछने वाला भी नहीं था.

आज जब प्रिया अपने मायके से वापस आई तो उस का मन भी तड़पने लगा. सासुमां उस के लाए उपहारों, कपड़ेगहनों को देख फूली नहीं समा रही थीं. रहरह कर सुधा को कोसना जारी था. प्रिया, सुधा को अपने कमरे में ले आई. उसे अपने पीहर के मजेदार किस्से बताने लगी. सुधा जैसे अतीत

में खोने लगी. अपनी भाभी के कड़वे शब्द उसे फिर याद आने लगे. महारानी, जब चाहे मुंह उठा कर चली आती है. जैसे बाप ने करोड़ों की दौलत छोड़ रखी है.

प्रिया जा चुकी थी. दोपहर का समय था, इसलिए उदास मन के साथ सुधा बिस्तर पर सुस्ताने लेट गई. अतीत की यादें, कटु स्मृतियां चलचित्र की तरह मनमस्तिष्क में साकार होने लगीं. पापा दुनिया से विदा हुए तो पीहर का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया. मां बचपन में ही गुजर गई थीं. पापा ने ही दोनों भाईबहनों को संभाला था. यह सच था कि उन्होंने कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

सुधा ने छोटे भाई को ऐसा ही ममताभरा प्यार दिया जैसा बच्चा अपनी मां से उम्मीद करता है. उम्र में वह 3 साल बड़ी भी तो थी. लेकिन बचपन से उसे बड़ा भी तो बना दिया था. मासूमियत छिन गई, लेकिन भाई राहुल भी उस पर जान छिड़कता था.

समय पंख लगा कर ऐसे उड़ा कि पता ही न चला कि गुड्डेगुडि़यों से खेलते वे कब बड़े हो गए. पापा जल्दी से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते थे. विवान का रिश्ता आया. इंजीनियर, सुंदरसौम्य स्वभाव, प्रतिष्ठित परिवार, बस पापा को और क्या चाहिए था? झट से रिश्ता पक्का कर दिया.

सुधा खुदगर्ज नहीं थी. उसे अपनी शादी के अरमान खुशी तो दे रहे थे लेकिन पापा और भाई का खयाल उसे बेचैन करने लगा. वह विदा हुई तो फिर? कौन संभालेगा घर को? नारी के बिना घर, घर नहीं हो सकता. भाई के प्रति असीम प्रेम और पिता के स्नेह को समझ सुधा ने जिद पकड़ ली, ‘मैं शादी करूंगी तो एक ही शर्त पर, भाई की शादी भी उस के साथ हो.’ किसे पता था कि यह प्रेम ही आगे समस्या बन जाएगा. सरल जीवन को कठिन कर देगा, रिश्तों में दूरी बढ़ती जाएगी.

सब को झुकना पड़ा और सात दिनों के अंतराल पर दोनों की शादी संपन्न हो गई. सुधा ससुराल के लिए विदा हुई तो पीहर में उस की भाभी आ गई. बहुत खुश थी सुधा. कुदरत ने बहुत दिनों बाद कुछ ऐसा सुखद दिया था जिस से उन की अधूरी जिंदगी पूर्णता की ओर कदम बढ़ाने लगी थी.

लेकिन जिंदगी इतनी सरल कहां होती है? मन का सोचा पूरा हो जाए, तो क्या कहने. नई जिंदगी में सुधा के सपने यथार्थ की कठोर धरा पर शीघ्र ही दम तोड़ने लगे. विवान बहुत अच्छे समझदार पति थे लेकिन घर की स्थिति ऐसी थी कि वे खुलेरूम में अपनी पत्नी का साथ देने की स्थिति में नहीं थे. प्रतिभाशाली हो कर भी अभी बेरोजगार थे. दोनों ही सासससुर पर निर्भर थे, इसलिए मजबूरियों से समझौता समझदारी था. पापा को शायद यह उम्मीद न रही होगी, इसलिए सुधा की शादी के बाद क्षुब्धबेचैन रहने लगे. दूसरी तरफ राहुल भी अपनी पत्नी और पिता के बीच संतुलन बैठाने में पिस रहा था. पापा को दुख न पहुंचे, इसलिए सुधा ने मुंह सिल लिया.

लेकिन पापा थे कि उस की आंखों को पढ़ जाते. जितना वह छिपाने की कोशिश करती, पापा अनकही बातों को झट से पकड़ जाते. संतान के प्रति प्रेम ऐसा ही होता है जो बच्चे की हर बात को बिना कहे समझ जाता है. जिंदगी इसी का नाम है. अकसर हम अपने घरों में वही व्यवस्था लागू करने की जिद करने लगते हैं जो बेटियां अपनी ससुराल में जीती हैं. नतीजतन, घर में लोग टूटनेबिखरने लगते हैं. सच तो यह था कि सुधा को कहीं चैन नहीं मिल रहा था.

ससुराल में व्यंग्यतानों के बीच पिस रही थी तो मायके में अपने भाई राहुल और पिता के खयाल से. उस की भाभी ने जो समझदारी दिखानी चाहिए थी, उस के विपरीत आचरण किया. सुधा न तो मां बन सकी, न ही विवान के दिल में स्थान पा सकी. दूरी, तटस्थता, यंत्रचालित, कृत्रिम जीवन उसे आहत करता चला गया.

घड़ी ने टन्नटन्न अलार्म बजाया. सुधा जैसे चौंक पड़ी. उसे अपने जिंदा होने का एहसास हुआ. चेहरे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं. वह उठी, एक गिलास पानी पिया और खाली कमरे में फिर अपने खालीपन से खेलने लगी. पुरानी यादें फिर से न चाहते हुए भी उस के आगे नाचने लगीं. जब पिता का देहांत हुआ तो 12 दिन भी उस ने मायके में कैसे निकाले थे, वह कटु अनुभव उसे याद आने लगा. भाई राहुल बेचारा कितनी कोशिश करता रहा कि दीदी को कुछ महसूस न हो लेकिन सुधा कोई बच्ची नहीं थी.

वह समझ गईर् कि पापा के बाद उस का रिश्ता भी इस घर से टूट गया है. फिर एक दिन वह अनुभव भी हो गया जिस ने सुधा के सारे भ्रम तोड़ दिए. राहुल की जिद पर वह मायके चली गई. भाई के साथ बहन को देख भाभी का मुंह फूल गया. रात को सुधा ने उन के कमरे से आती तेज आवाजों को सुन लिया. राहुल अपनी पत्नी के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार से खीझ उठा था. उस की बीवी ने साफसाफ शब्दों में अल्टीमेटम दे दिया, ‘अगर यह बेहया मुझे दोबारा यहां दिखी, तो समझ लेना उसी क्षण फांसी के फंदे से झूल जाऊंगी. मुझे क्या बेवकूफ समझते हो. मुझे पता है, यह मायके में क्यों मंडराती है? पूरी संपत्ति हड़पने के बाद तुम्हें सड़क पर न ला दे, तो कहना.’

इस के बाद शायद हाथापाई भी हुई होगी. राहुल यह बात कैसे सहन कर पाता? नफरत से सुधा तड़प उठी. छी, क्या कोई ऐसी नीच सोच भी हो सकती हैं? पूरी रात सुधा ने जागते निकाल दी. वह घर जिस में वह पलीबढ़ी थी, अचानक जहर की तरह चुभने लगा. सुबह होते ही वह बिना कुछ कहे वापस अपनी ससुराल आ गई. उसे इंतजार था कि राहुल आएगा माफी मांगने. लेकिन वह नहीं आया.

अब सुधा को अपना फैसला सही लगने लगा. भाईभाभी की जिंदगी में वह दीवार नहीं बनना चाहती थी. उस ने फैसला कर लिया. अब कभी नहीं… खून के रिश्ते पानी हो गए. राखी का त्योहार आया, भाईदूज भी, लेकिन मायके से कोई बुलावा न आया. कहना आसान होता है लेकिन भाई की सूरत देखने को सुधा भी तड़पती. अब उस ने अपना मुंह सिल लिया. किसी से कोई शिकायत नहीं.

एक साल बीत गया. विवान को अच्छी नौकरी मिल गई. अब सुधा की हालत भी पहले से बेहतर होने लगी. विवान उसे नौर्मल करने की बहुत कोशिश करता, लेकिन बुझेमन में अब उमंग, उम्मीदें फिर से जागना मुश्किल लगने लगा था.

आज फरवरी की 22 तारीख थी. वैसे तो खास दिन, उस का जन्मदिन था, लेकिन यहां किसे कद्र थी उस की? सुबह के 8 बजे थे. विवान अभी भी सो रहे थे. सासुमां व्यस्त थीं. तभी दरवाजे की घंटी बजी. सुधा ने खिड़की से बाहर देखा. अचानक उस का रोमरोम खिल उठा. अपनों का प्यार सैलाब बन फूट कर बाहर निकलने लगा. दरवाजे पर राहुल और भाभी खड़े थे. सुधा चहकते हुए दौड़ी, ‘‘हैप्पी बर्थडे, दीदी.’’ राहुल ने पैर छूते हुए दी को शुभकामनाएं दीं. भाभी भी उस के पैर छू रही थीं. स्नेहिल क्षणों में कटुता क्षणभर में छूमंतर हो गई.

सास और प्रिया आश्चर्यचकित थे. राहुल आज उन सब के लिए उपहार लाया था. सुधा किचन की तरफ दौड़ी. ससुराल में बहू का सब से बड़ा मेहमान भाई होता है. सुधा के मन पर जमी बर्फ बहने लगी थी. भाभी भी उस का हाथ बंटाने रसोई में आ गई. दोनों खिलखिला कर ऐसे बातें करने लगीं जैसे पहली बार मिली हों.

विवान भी उठ गए. नाश्ते की तैयारी होने लगी. मौका देख विवान ने सुधा को बांहों में भर चूम लिया. ‘‘कैसा लगा मेरा गिफ्ट?’’ सुधा कुछ पूछती, उस से पहले राहुल आ गया, बोला, ‘‘दीदी, यह लो आप का सब से कीमती गिफ्ट… मुझे जीजू ने ही सजैस्ट किया.’’

सुधा पैकेट खोलने लगी. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. एक बड़ी सी फ्रेम की हुई पापा की तसवीर, जिस में उन की मुसकराहट सुधा को नया जीवन देती महसूस हो रही थी. फोटो के अलावा गुड्डेगुडि़या भी थे जिन से सुधा और राहुल बचपन में खेला करते थे.

उपहार तो और भी बहुत लाया था राहुल, लेकिन यह चीज उस का दिल छू गई. आज पूरा दिन सुधा के नाम था. विवान ने शाम को एक आलीशान होटल में डिनर रखा था.

रात में जब सुधा विवान के पास आई, तो देखा सामने की दीवार पर पापा की फोटो टंगी है. विवान कह रहा था, ‘‘सुधा, ससुराल में मायके की यादें न हों, तो जीवन अधूरा रह जाता है.

अब अपने बैडरूम में आधी चीजें मेरी और आधी तुम्हारे मायके की यादगार वाली होंगी.’’

‘‘ओ विवान, तुम इतना चाहते हो मुझे?’’ सुधा भावविह्वल हो विवान से लिपट गई.

‘‘सुधा, चाहने का मतलब ही यही है कि हम बिना कुछ कहे एकदूसरे को समझें, एकदूसरे की कमी को पूरा करें. तुम अंदर ही अंदर घुल रही थीं लेकिन मैं तुम्हें जीतेजी मरता नहीं देख सकता था.’’ बत्ती बुझ गई. दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए. आज अचानक बर्फ पूरी तरह पिघल गई.

Hindi Story: कलम का जादूगर

Hindi Story.‘‘को आदमी अपनी गाड़ी के सामने गया है,’’ अपने पति मोहन की यह बात सुन कर किसी अनहोनी के डर से गीता का कलेजा कांप उठा.अभी नीचे उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि उस आदमी का चेहरा देख कर गीता चौंक गई. उसने  हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया. वह कोई और नहीं, बल्कि गीता का सालों का खोया हुआ प्यार अजय था, लेकिन गाड़ी की टक्कर से उसे चोट नहीं आई आई थी.


‘‘सर, आप ठीक तो हैं ?’’ मोहन ने  गाड़ी से नीचे उतर कर अजय को संभालते हुए पूछा.
गीता और मोहन अपने एकलौते बेटे को लेने के लिए दिल्ली के रेलवे स्टेशन जा रहे थे, तभी यह हादसा हुआ था.‘‘हां, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अजय ने कहा. ‘‘लेकिन सर, आप यहां कैसे? मोहन ने पूछा.
‘‘सर, आज ही मेरी बेटी लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर के घर वापस आई थी. उस के यहां घूमने की जिद के चलते मैं यहां था,’’ अजय ने बताया.


‘‘लेकिन आप की बेटी इस समय आप के साथ नहीं है?’’ मोहन ने पूछा. ‘‘वह कुछ खरीदारी करने गई थी, आती ही होगी,’’ जवाब में अजय ठहाका मार कर हंस पड़ा, तो गीता भी उस के साथ मुसकरा उठी. काफी अरसे बाद वे दोनों साथ हंस रहे थे, लेकिन अजय को इस बात की जानकारी नहीं थी. देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जमा होने लगी. सब की आंखें अजय पर टिकी हुई थीं. लेकिन गीता की समझ में कुछ नहीं रहा था.


तभी उस भीड़ को चीरती हुई एक बेहद खूबसूरत गाड़ी कर रुकी. उस गाड़ी के सामने गीता की गाड़ी फीकी लग रही थी. उस गाड़ी की ड्राइविंग सीट से एक लड़की उतरी और अजय को देखते हुए बोली,‘‘पापा, आप यहां क्या कर रहे हैं? सब ठीक तो है ? यहां इतनी भीड़ क्यों जमा है?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटाबस ऐसे ही’’ अजय ने कहा. ‘‘तो फिर घर चलें हम?’’ वह लड़की बोली.‘‘चलता हूं,’’ अजय ने वहां जमा भीड़ की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया. उस के बैठते ही गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी.


जब अजय की गाड़ी दूर निकल गई और गीता को यह यकीन हो गया कि अब वह भीड़ की तरफ मुड़ कर देखेगा, तो भी उसे नहीं पहचान पाएगा, लिहाजा वह गाड़ी से नीचे उतर गई. ‘‘कौन था यह आदमी?’’ गीता ने अनजान बनते हुए मोहन से पूछा.‘‘जादूगर,’’ मोहन ने कहा. ‘‘जादूगर?’’ गीता ने मोहन का यह शब्द बड़े ही जबरदस्त अंदाज में दोहराया. ‘‘हां, कलम का जादूगर. दुनियाभर में इस के लिखे उपन्यास खूब बिकते हैं. फुरसत के पलों में मैं भी इस के उपन्यास बड़े ही चाव से पढ़ता हूं,’’ मोहन ने गीता को बताया.


उस समय रात के 2 बज रहे थे, लेकिन गीता की आंखों से नींद कोसों दूर गायब थी. आज उसे रहरह कर पुरानी यादें ताजा हो रही थीं. गीता अजय की सादगी पर मरमिटी थी. वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे और प्यार भी करते थे. लेकिन उन दोनों के प्यार को गीता के भैया की नजर लग गई थी.
गीता के भैया नहीं चाहते थे कि वह एक गरीब लड़के से प्यार करे, क्योंकि गीता एक अमीर परिवार से थी, इसलिए उस के भैया की नजर में अजय गरीब होने के साथसाथ एक गंवार और जाहिल लड़का भी था.
लेकिन प्यार तो प्यार होता है.

एक दिन गीता के भैया ने उन दोनों को एकसाथ देख लिया. उसी दिन भैया ने गीता की शादी अपने दोस्त के बेटे के साथ तय कर दी. भैया, मैं यह शादी नहीं कर सकती,’ गीता ने कहा.क्यों? क्या बुराई है इस रिश्ते में?’ भैया ने पूछा. कुछ नहीं भैया. बुराई तो आप की बहन में है जो किसी से बेपनाह मुहब्बत कर बैठी है.’ किस से? उस अनपढ़, जाहिल, गंवार लड़के से, जिस के पास कोई ठिकाना नहीं है?’हां भैया. आप की यह बहन उस के बगैर जिंदा नहीं रह सकती, इसलिए आप मेरा प्यार मेरी ?ाली में अपनी तरफ से भीख समझ कर डाल दीजिए,’ यह कहते हुए गीता ने अपना आंचल भाई के आगे फैलाया ही था कि भाई ने गीता के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया.
थप्पड़ इतना जोरदार था कि गीताधड़ामसे फर्श पर गिर गई.
गीता को इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी. आज अपने मांबाप की बहुत कमी खल रही थी कि तभी अजय की आवाज उस के कानों में गूंजी.
देख लीजिए भैया. अजय आज अपने प्यार को छिनते देख कर आप के पास चला आया है.’
मैं इस की हिम्मत का कद्र करता हूं, लेकिन आज यह मेरे हाथों से जिंदा बच कर नहीं जाएगा,’ कहते हुए भैया दीवार पर टंगी हुई म्यान से तलवार खींच कर दरवाजे की तरफ बढ़ गए.
नहीं भैया, आप ऐसा नहीं करेंगे. आप जहां चाहेंगे, मैं वहीं शादी करने के लिए तैयार हूं,’ जब गीता ने यह कहा, तो भैया के बढ़ते कदम रुक गए.
तो जा कर उस से कह दो कि तुम इस शादी से खुश हो. साथ ही यह भी बोल देना कि आज के बाद वह
यहां आसपास भी दिखाई दे,’ भैया ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा.
अजय गली में खड़ा था. गीता के बाहर आते ही उस ने गीता का हाथ कस कर पकड़ कर कहा, ‘यह मैं क्या सुन रहा हूं…’
तुम ने ठीक सुना है…’ गीता की आवाज कड़क थी, ‘आखिर जिस से मेरी शादी हो रही है, उस के पास सबकुछ है. तुम्हारे पास क्या है?’
क्या तुम ने इसलिए मु? से प्यार किया था कि आज मेरी हैसियत का मजाक उड़ा सको?’
गीता ने कुछ नहीं सुना और घर के भीतर चली गई.
देखते ही देखते जाने कैसे 25 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला और अजय की याद दिल के कोने में ही दब गई. लेकिन उस की याद गीता में एक टीस पैदा कर देती थी.
‘‘गीता सुबह हो गई, तुम कहां खोई हो?’’ मोहन के कहने पर वह वर्तमान
में आई.
‘‘अभी थोड़ी देर में उठती हूं,’’ कह कर गीता ने मोहन से पीछा छुड़ाया. थोड़ी देर में मोहन नहाने के लिए बाथरूम में चले गए.
अब मोहन से क्या कहती गीता कि वह कभी अजय से दिलोजान से मुहब्बत करती थी. उस दिन के बाद जब भी वह उस के लिखे गए उपन्यास को पढ़ती है, तो उसे अजय से हुई आखिरी मुलाकात याद जाती है.
गीता रोते हुए अजय से बोल रही थी, ‘अजय, आज मु? इस बात की उतनी तकलीफ नहीं है कि कल सवेरे हम दोनों एकदूसरे से हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे, जितना मु? इस बात की तकलीफ है कि मेरे भैया तुम्हें एक अनपढ़, जाहिल, गंवार से ज्यादा कुछ नहीं सम?ाते हैं, क्योंकि तुम गरीब हो.
इसे हमदर्दी मत समझना पर तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नजात दिलाने के लिए मैं तुम्हारे लिए एक कलम लाई हूं. जिस तरह तुम ने मेरे बगैर जीना नहीं सीखा है, उसी तरह तुम इस कलम से सीख लेना और अच्छा लिखना.
तुम अपना चेहरा तभी मु? दिखाना जब तुम एक कलम का जादूगर बन चुके होगे,’ इतना कह कर अजय की जेब में कलम रख दी और गीता अपने घर की तरफ बढ़ गई.                       द्य

पुलिस से उगाही करने वालों
पर लगा मकोका

दिल्ली में पुलिस वालों कोब्लैकमेलकर वसूली करने वाले गैंग को दबोच कर उस पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ और्गैनाइज्ड क्राइम एक्ट लगा दिया गया. क्राइम ब्रांच की एंटी रौबरी एंड स्नैचिंग सैल ने इस मामले में केस दर्ज किया और गिरोह के सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा को गिरफ्तार कर लिया. उसे दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश किया, जहां से 7 दिन की रिमांड मिली. पुलिस अफसरों ने बताया कि यह उगाही गैंग दिल्ली नौर्थईस्ट जिले में साल 2018 से सक्रिय था, जो ज्यादातर ट्रैफिक पुलिस वालों को टारगेट करता था. ट्रैफिक स्टाफ से कथिततौर पररिश्वतलेते हुए का वीडियो होने का दावा किया जाता था. इस के बाद वे एक लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक मांगते थे. पैसा नहीं देने पर गैंग मैंबर आला अफसरों के साथसाथ सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर कैरियर बरबाद करने की धमकी देते थे. कई पुलिस वाले इस गिरोह के जाल में फंसे, जिन्होंने मोटी रकम दे कर अपना पीछा छुड़ाया.  

लेखक आनंद कुमार नायक

Social Story: सोनपुर मेला-दिन पशुओं का रात लड़कियों की

Social Story: रात के तकरीबन 10 बज चुके हैं. गंगा और गंडक के संगम पर बहती हवा में ठंडक है, पर इस ठंडक के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है. चांद आसमान में अपने पूरे शबाब के साथ मौजूद है, लेकिन लगता है कि उसे भी अंदाजा है कि उस के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे उजाला भी छूने से डरता है.

सोनपुर मेले का मैदान दूरदूर तक फैला हुआ है. दिन में जहां यही जगह पशुओं की आवाजों से भरी रहती है, वहीं रात का रंग कुछ और ही होता है. आवाजें बदल जाती हैं, ताल बदल जाती है और लोगों की भीड़ किसी और ही चाह में इकट्ठा होने लगती है. ऐसा लगता है जैसे 2 मेलों की 2 दुनिया एक ही धरती पर उगती हैं… एक दिन में और दूसरी रात में. दिन का मेला पशुओं का है, रात का मेला लड़कियों का और इन दोनों दुनिया के बीच कहीं, एक रोशनी से भरा थिएटर खड़ा है, जिस के भीतर कलाकार हैं और बाहर दर्शक. पर जिस दुनिया में वे रहते हैं, वहां कलाकार होना ‘सुख’ नहीं, बल्कि ‘जद्दोजेहद’ का दूसरा नाम है.
सोनपुर, जहां दिन में व्यापार होता है, बूढ़े हाथी बिकते हैं, किसान अपनी जरूरतें खरीदते हैं, व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं, वहीं रात होते ही एक दूसरी दुनिया उभर आती है. भीड़ के बीच से छनती तेज रोशनियां, लाउडस्पीकरों पर बजते मिक्स गीत, और हर मंच की ओर बढ़ती हजारों आंखें पर इन में से किसी को भी अंदाजा नहीं है कि इस चकाचौंध के पीछे क्या कीमत चुकानी पड़ती है.

आंखों में बसती थकान, मेकअप छिपा नहीं सकता स्टेज पर खड़ी हर लड़की के चेहरे पर मेकअप की कई परतें होती हैं, पर जिंदगी की दरारें इन परतों से नहीं छिपतीं. एक लड़की ने बात ही बात में कहा, ‘‘कपड़ा जितना छोटा, उतना नोट ज्यादा. पूरा शरीर तोड़ डालते हैं पर कहते हैं कि ‘आखिरी तक मुसकराना’. हम भी मुसकराते हैं, क्योंकि रोना किसी को पसंद नहीं आता. ‘‘कपड़े जितने छोटे होते हैं, लोग उतना पैसा लुटाते हैं. हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं रहता. स्टेज पर जाने से पहले नीला लैंस लगाती हूं. पीरियड में भी नाचना पड़ता है. लोग कहते हैं कि हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है पर किसी ने यह नहीं पूछा कि हम ने क्या खो कर यह सीखा?’’ मेकअप कर रही 17 साल की एक लड़की बोली, ‘‘हम तो गांव के मेले में नाचते थे. यहां आ गए तो पता चला कि यहां नाच नहीं, तन दिखाना ज्यादा जरूरी है. पहली बार बहुत रोई थी पर घर में खाने को कुछ नहीं था.’’

उस लड़की की आवाज में कोई ड्रामा नहीं, कोई शिकायत नहीं. बस, एक लंबा जमा हुआ सच है. ऐसा सच, जिसे मेले की भीड़ देखने नहीं आती, पर उस की बदौलत ताली जरूर बजाती है. जहां जानवरों का मेला लगता है, वहां लड़कियों का नाच भी दिखाया जाता है. सोनपुर मेला दुनिया का सब से बड़ा पशु मेला है. यह बात हर गाइड, हर पंपलैट, हर इतिहासकार लिखता है और यह सच भी है. दिन में तंबुओं में बंधे हाथी, रस्सी से बंधे घोड़े, चमकदार काठी वाले ऊंट और अनगिनत पालतू जानवरों को देखने हजारों लोग आते हैं. किसान उन का दांत देखते हैं, चाल देखते हैं, वजन देखते हैं, बरताव देखते हैं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती है, वही मैदान, वही तंबू किसी और रंग में रंग जाते हैं.

दिन में जहां जानवर बिकते हैं, रात में वहां लड़कियों के नाच बिकते हैं. मजबूरी और जिंदगी की कीमत सोनपुर मेले या किसी दूसरे मेले में नाचने वाली लड़कियों की माली हालत आमतौर पर बेहद कमजोर होती है. ज्यादातर लड़कियां गरीबी, अनाथालय या टूटे परिवार से आती हैं. उन के पास औप्शन बहुत सीमित होते हैं, जैसे स्कूल छोड़ना, घर चलाना या परिवार का पालनपोषण करना. यही वजह है कि वे थिएटर में काम करने को मजबूर होती हैं. हालांकि स्टेज पर उन के नाच के बदले उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन वह रकम उन की मेहनत, थकान और जोखिम के मुताबिक नहीं होती.

कभीकभी उन्हें सिर्फ खानेपीने, सफर और छोटेछोटे खर्चों के लिए ही भुगतान मिलता है. उन के लिए स्टेज एक ऐसा व्यवसाय है, जो आज जीविका दे सकता है, पर अच्छा भविष्य नहीं. थिएटर मालिकों का रवैया थिएटर मालिक आमतौर पर इन लड़कियों को एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखते हैं न कि इनसान के रूप में. स्टेज पर उन की चमक, थिरकन और आकर्षण ही उन की कीमत तय करती है. कुछ मालिक कलाकारों की सिक्योरिटी, भोजन और सेहत का ध्यान रखते हैं, पर ज्यादातर केवल कमाई और दर्शकों की तादाद पर फोकस करते हैं. लड़कियों के दर्द, सेहत और मानसिक हालात को नजरअंदाज किया जाता है. अगर कोई प्रदर्शन में नाकाम होती है या कमजोर पड़ती है, तो उसे धमकाया जाता है, काम से हटा दिया जाता है या अगले शो में जगह नहीं दी जाती है.

इज्जत की हिफाजत, सब से कमजोर कड़ी थिएटर की लड़कियों के लिए सब से बड़ा खतरा उन की इज्जत का होता है. स्टेज पर उन के शरीर को नजरों के सामने लाया जाता है और कई बार दर्शक की छेड़छाड़, गालीगलौज, वीडियो बनाना या स्टेज के पीछे दबाव डालना आम बात हो जाती है. सिक्योरिटी का उपाय तकरीबन नाममात्र होता है और लड़कियां अपनी हिफाजत के लिए अकेली रहती हैं. अकसर वे अपनी इज्जत के लिए चुप रहने को मजबूर होती हैं, क्योंकि विरोध करने पर नौकरी या आमदनी छिन सकती है.
समाज में नजरअंदाज होना समाज में इन लड़कियों की हालत बहुत बुरी है. लोग उन की जद्दोजेहद और मेहनत को नहीं देखते, बस उन्हें ‘नाचने वाली’ के रूप में देखते हैं.

यह पेशा उन्हें इज्जत देने के बजाय बदनाम कर देता है. उन के पास शादी, स्थायी संबंध या सामाजिक सुरक्षा के मौके भी अकसर सीमित हो जाते हैं. समाज उन की मजबूरी को नजरअंदाज करता है और

Social Story: एक क्लिक पर खत्म कमाई

Social Story: को कहता है, ‘‘बैंक खाता बंद हो जाएगा.’’
कोई कहता है, ‘‘लोन की वसूली होगी.’’
कोई कहता है, ‘‘पुलिस केस हो गया है.’’
कोई कहता है, ‘‘गिरफ्तार कर लेंगे.’’


और इस डर में अच्छेअच्छों की सम? काम नहीं करती. बदलती दुनिया में मोबाइल फोन अब केवल एक गैजेट नहीं रहा, बल्कि यह हमारी जेब में रखा एक पूरा बैंक, पहचानपत्र, दफ्तर, फोटो अलबम, पर्स और संचार का साधन बन चुका है, लेकिन इसी बदलाव ने अपराधियों के लिए भी एक नया दरवाजा खोल दिया है.


आज मोबाइल पर एक गलत क्लिक से आप अपनी पूरी जमापूंजी खो बैठते हैं. नौजवान, जो डिजिटल दुनिया को सब से ज्यादा सम?ाते हैं, वे भी अपराधियों की तकनीक देख कर भरम में पड़ जाते हैं और मिडिल क्लास लोग, जिन के लिए हर पाई की अहमियत बहुत ज्यादा होती है, उन के लिए डिजिटल ठगी सिर्फ माली नुकसान नहीं है, बल्कि यह इज्जत, आत्मविश्वास और मानसिक शांति की दुश्मन बन जाती है.
भारत में रोजाना हजारों लोग डिजिटल ठगी के शिकार होते हैं. हम अखबार में पढ़ते हैं :


महिला के खाते से 85,000 की ठगी. बुजुर्ग से केवाईसी अपडेट के नाम पर पैसा उड़ाया. फर्जी पुलिस अफसर बन कर नौजवान से 3 लाख की ठगी. ये खबरें तो हम पढ़ लेते हैं, पर इन में हमें पीडि़तों का दर्द नहीं दिखता. बिहार के सहरसा जिले की 40 साल की शशि देवी को सुबहसुबह मोबाइल फोन पर मैसेज आया कि आप का बैंक खाता केवाईसी अपडेट होने के चलते बंद किया जा रहा है. मैसेज के साथ एक लिंक भी था. शशि देवी ने उस लिंक पर क्लिक किया. मोबाइल पर एक परिचित जैसा फार्म खुलानाम, खाता संख्या, पता.


उन्हें लगा कि यह सामान्य प्रक्रिया है. उन्होंने फार्म भर दिया. इस के 2 घंटे बाद बैंक से फोन आया कि आप के खाते से 97,500 रुपए निकाले गए हैं. शशि देवी का पहला वाक्य था कि हम तो खाते में इतने पैसे होना भी नहीं जानते थे. इतना पैसा हम ने 10-10 रुपए बचा कर जमा किया था. डिजिटल दुनिया का
असली सच लोग तकनीक नहीं, डर से हारते हैं. हर डिजिटल अपराध में एक बात कौमन होती है कि अपराधी डर पैदा करता है. छपरा, बिहार के शिवनंदन प्रसाद, जो पूरी जिंदगी पोस्ट औफिस में लोगों के पैसे संभालते रहे, एक दिन खुद ठगी का शिकार हो गए. उन्हें फोन आया कि आप का पैंशन कार्ड ब्लौक हो गया है. वैरिफिकेशन कराइए, नहीं तो अगले महीने पैंशन नहीं आएगी.


शिवनंदन ने कहा कि बाबू, मैं बूढ़ा आदमी हूं, बताओ क्या करना है? उन्होंने ठग के कहने पर एक ऐप डाउनलोड किया और कुछ ही मिनट में उन के खाते से डेढ़ लाख से ज्यादा रुपए गायब हो गए.
शिवनंदन का दुखद वाक्य यह था कि मैं तो जिंदगीभर लोगों को सम?ाता रहा कि कागज सही रखो, अब मु? कौन सम?ाएगा कि डर क्या होता है? पहचान का गलत इस्तेमाल अपराधी अब सिर्फ पैसे नहीं, चेहरा और आवाज भी चुराते हैं. डिजिटल अपराध का सब से डरावना पक्ष है पहचान की चोरी. आज अपराधियों के हाथों में ऐसे उपकरण हैं, जिन से आप की फोटो एडिट की जा सकती है. आप की आवाज क्लोन की जा सकती है. आप की डीपफेक वीडियो बनाई जा सकती है. किसी भी पहचान को मिनटों में बदला जा सकता है. यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानसिक आतंक है.


पटना, बिहार में 22 साल की रीता को एक दिन व्हाट्सऐप पर फोन आया. लोन ऐप के गुंडे कह रहे थे कि आप ने लोन लिया है, वापस कीजिए. नहीं तो आप की अश्लील फोटो बना कर सब को भेज देंगे.
रीता सदमे में गई. उस ने कहा कि मैं ने कोई लोन नहीं लिया. लेकिन अपराधियों ने 10 मिनट में उस की फोटो को विकृत कर के आधे से ज्यादा दोस्तरिश्तेदारों को भेज दिया. रीता ने रोते हुए कहा कि पैसा तो नहीं गया, लेकिन मेरी इज्जत, मेरा आत्मविश्वास सब चला गया. औनलाइन कस्टमर केयर,
बड़ा धोखा लोग गूगल पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं और सब से ऊपर दिखाई देता है फर्जी नंबर, जिसे अपराधियों ने विज्ञापन दे कर ऊपर चढ़ाया होता है. नवादा के एक टीचर राजेश कुमार एक छोटा सामान लौटाने के लिए फ्लिपकार्ट कस्टमर केयर खोजते हैं. पहले नंबर पर फोन किया. सामने से आवाज आई कि आप का रिफंड शुरू कर रहे हैं, स्क्रीन शेयरिंग औन कीजिए.


राजेश ने सोचा कि कस्टमर केयर वाला ही तो है. उन्होंने स्क्रीन शेयर किया और 2 लाख, 70,000 रुपए गायब. राजेश बोले कि गलती मेरी नहीं है. गूगल मु? सही नंबर क्यों नहीं दिखाता? ठग बन बैठे हैं नएजमींदारबक्सर के रामचरण को कोई बिजली महकमे का आदमी बन कर ठग काल करता है कि हम कनैक्शन काट देंगे, तुरंत अपडेट कराइए. फिर ठग एक ऐप डाउनलोड कराता है. रामचरण कहता है कि हम पढ़ेलिखे नहीं है. हमें क्या करना है? ठग कहता है कि बस उंगली स्क्रीन पर रखें और ऐसा करते ही 68,000 रुपए गायब.


रामचरण की पत्नी रोते हुए कहती है कि हमारे घर में तो कभी 68,000 रुपए एकसाथ नहीं रहे. जो भी था, उसी ठग ने ले लिया. फर्जी पुलिस, सब से बड़ा डर आजकल अपराधी खुद को पुलिस अफसर, साइबर सैल प्रमुख, एनआईए अफसर, सीबीआई अफसर, इनकम टैक्स अफसर, कोर्ट का क्लर्क बता कर फोन करते हैं. वे वरदी में वीडियो काल भी कर देते हैं. दिल्ली के करनदीप को वीडियो काल पर 2 आदमी वरदी में दिखे. उन्होंने कहा कि आप के नाम पर ड्रग्स वाला पार्सल पकड़ा गया है. तुरंत जुर्माना भरिए.
करनदीप डर के मारे कांपने लगा. उस ने 4 लाख रुपए भेज दिए. बाद में पता चला कि वह वीडियो डीपफेक थी.


लोग क्यों फंसते हैं अपराधी साधारण नहीं होते. उन के पास पूरी टीम होती है जैसे मनोविज्ञान सम?ाने वाले, स्क्रिप्ट लेखक, टैक्निकल एक्सपर्ट, काल सैंटर चलाने वाले, डाटा बेचने वाले. वे लोगों की कमजोरी जानते हैं. डर, लालच, शर्म, अनजान तकनीक, भरोसा जीतना, तेजी से बात करना, घबराहट पैदा करनाठग यही खेल खेलते हैं. सिस्टम है कमजोर साइबर ठगी के ज्यादातर मामलों को पुलिस वाले गंभीरता से लेते हैं, पर समस्या यह है कि अपराधी दूसरे राज्यों में होते हैं. फर्जी बैंक खाते, फर्जी सिम, वीपीएन लोकेशनऔर मिनटों में पैसा विदेश भेजना. केस करोड़ों में दर्ज, लेकिन रिकवरी 5 से 10 फीसदी.
एक साइबर अफसर ने कहा कि अपराधी हर महीने तकनीक बदल देता है. पुलिस के पास उतने संसाधन नहीं हैं.


अपराधियों का इकोनौमिक मौडल डिजिटल ठगी का खेल एक उद्योग की तरह चलता है. कमाई का तरीका. एक काल सैंटर, 15-20 मुलाजिम. रोज तकरीबन 1000 काल. 40-50 लोग फंसते हैं. रोजाना कमाई 10 लाख से 50 लाख. महीने में करोड़ों रुपए. पैसे नेपाल, बंगालदेश, दुबई, चीन तक भेजे जाते हैं.
राजस्थान की एक बुजुर्ग औरत 2 घंटे तक रोती रहीं. उन्हें किसी का बैंक मैनेजर बन कर फोन आया. ठग बोला कि आप का खाता ब्लौक हो गया, जल्दी करें. बुजुर्ग औरत ने 3 बार कहा कि बेटा, मैं बूढ़ी हूं. ठग बोलता गया और खाते से एक लाख से ज्यादा रुपए निकल गए.बुजुर्ग औरत ने रोते हुए कहा कि बेटा, हम को लगा तू ही बैंक वाला है.

हमारी आवाज सुन कर भी तू ने दया नहीं दिखाई? जनता को डिजिटल भाषा सिखानी होगी सुरक्षा सब से पहले जनता को ही सम?ानी होगी. ध्यान रखना होगा ओटीपी किसी को नहीं बताना होगा. बैंक कभी फोन नहीं करता. स्क्रीन शेयरिंग भूल कर भी करें. पुलिस वीडियो काल नहीं करती. डिजिटल अरैस्टिंग नहीं होता. केवाईसी लिंक के नाम पर 100 फीसदी धोखा. कस्टमर केयर नंबर गूगल से खोजें. अनजान ऐप डाउनलोड करें. बिजली, गैस, बैंक मैसेज नकली भी हो सकता है. कोई डरा रहा है, तो इस का मतलब साइबर अपराधी है. 1930 नंबर पर तुरंत शिकायत करें.


डिजिटल अपराध सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या भी है. डिजिटल ठगी ने भारत के हर घर को प्रभावित किया है. यह सिर्फ मोबाइल और ऐप की समस्या नहीं, यह भरोसे, सम?, डर, सिस्टम और समाज की समस्या है. हम अगर जागरूक नहीं हुए, तो आने वाले समय में डिजिटल ठगी किसी महामारी की तरह फैल जाएगी. अपराधी तकनीक से तेज हैं और हमें भी अपनी सम?ाबू? से तेज होना पड़ेगा.  Social Story

Political Story: 2025 धुरंधर साल की मजाकिया पड़ताल

Political Story: सा 2025 को भारतीय इतिहास में उस ब्लौकबस्टर फिल्म की तरह दर्ज किया जाएगा, जिस में डायरैक्टर बदलते रहे, पटकथा रोज लिखी गई, कलाकार खुद ही डायलौग बोलते रहे और दर्शक बेचारे टिकट ले कर भी सिनेमाघरों से बाहर नहीं निकल पाए.
इस में कहानी थी, सस्पैंस था, रोमांस था, वादविवाद था, संवाद था, एक्शन था, थ्रिलर था, बस नहीं था तो इंटरवल और ही चैनल बदलने का औप्शन, क्योंकि पूरा देश ही सिनेमाघर और देशवासी दर्शक बने हुए थे.


भक्ति, भीड़ और व्यूअरशिप का त्रिवेणी संगम फिल्म की ओपनिंग भव्य रही. प्रयागराज महाकुंभ में तकरीबन 65 करोड़ श्रद्धालुओं ने पाप धोने के लिए आस्था की डुबकी लगाई. कुछ श्रद्धालु ऐसे भी थे, जिन्होंने मनका विक्रेता मोनालिसा की आंखों में डुबकी लगा कर वैतरणी पार करने का शौर्टकट रास्ता खोज लिया. भक्ति, भावुकता और व्यूअरशिप, तीनों का त्रिवेणी संगम हुआ. कैमरे भी श्रद्धा में लीन थे, बस लाइक और शेयर बाकी रह गया था.


एक्शन सीन : भगदड़ से ब्लास्ट तक
जैसे फिल्म में हर मसाला होता है, वैसे ही शांत भक्ति के बाद भारतीय पटल पर एक्शन सीन भी देखने को मिले. महाकुंभ, दिल्ली रेलवे स्टेशन और रथ यात्रा की भगदड़. एयर इंडिया का प्लेन क्रैश, पहलगाम आतंकी हमला, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की हिंसा, दिल्ली ब्लास्ट, गोवा नाइट क्लब आगजनी और रोहित शेट्टी की फिल्म की तरह कोहरे में यमुना एक्सप्रैसवे पर गाडि़यों की टक्कर, इन सब ने साल को पूरी तरहधमाकेदारबना दिया.

इन घटनाओं से देश कुछ देर के लिए जरूर थमा, लेकिन इन हालात में भी माननीयों के चुनावी दौरे और विदेशी यात्राएं बदस्तूर जारी रहीं. दर्शक कन्फ्यूज हो गए कि यह ब्रेकिंग न्यूज है या अगली वैब सीरीज का ट्रेलर या फिर अविराम जीवन का परम सत्य. गौसिप, गलतफहमियां और टीआरपी की दुलहन
पिछले साल केबंटोगे तो कटोगेके बाद इस सालआई लव मोहम्मदऔरआई लव महादेवजैसे नारे राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज हुए. एसआईआर, शरबत जिहाद, बीएलओ, टैरिफ, जीएसटी और जेनजी जैसे शब्द चर्चा में रहे. बाबाओं और नेताओं का बड़बोलापन, अक्षय का ठुमकना, माननीय द्वारा हिजाब हटाने की घटना, सब ने सुर्खियां बटोरीं.


इधर मोस्ट बैचलर राहुल गांधी और सलमान खान को इस साल भी दुलहन नहीं मिली, उधर वक्फ संशोधन विधेयक और एसआईआर प्रक्रिया, सब ने मिल कर गौसिप चैनलों की टीआरपी को दुलहन बना दिया.
इंटरनैशनल कूटनीति का मल्टीस्टारर सीन इंटरनैशनल फ्रेम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपग्लोबल फूफाका रोल निभाते हुए नोबेल अवार्ड की तलाश में भटकते रहे, लेकिन भारतीय कूटनीति और नार्वेजियन नोबेल कमेटी ने मोगेंबो कोखुशहोने का मौका ही नहीं दिया. टैरिफ की आड़ में ट्रंप भारत के पीछे ऐसे पड़े रहे, जैसे कुत्तों के पीछे दिल्ली कोर्ट.


आपरेशन सिंदूर और एशिया कप के दौरान पाकिस्तान को कूटा गया. कूटनीति का यह मल्टीस्टारर सीन था, जिस में संवाद कम और संदेश ज्यादा था. रोमांस, क्राइम और नीला ड्रम रोमांस और थ्रिलर ने भी दर्शकों को निराश नहीं किया. समधीसमधन, चाचीभतीजा और सासदामाद की भागमभाग प्रेमकथाएं ट्रैंड में रहीं. शादीशुदा मर्दों की जिंदगी में राहुकेतु साथसाथ गोचर करते दिखे. ‘वोके चक्कर में नीला ड्रम, हौरर हनीमून और हसीन दिलरुबा टाइप घटनाओं ने सस्पैंस को हद पर पहुंचा दिया. मीडिया और सोशल मीडिया सनसनी तैमूर के घर उस के अब्बाजान छोटे नवाब पर चाकू से हमला किया गया. मीडिया नेसब से तेजबनने की होड़ में वीरू पाजी को असली देहांत से पहले ही श्रद्धांजलि दे दी.


सोशल मीडिया पर भारतीयधुरंधरसे ज्यादा पाकिस्तानी डकैत ने लोकप्रियता हासिल की. अपने सैयारा के लिए नौजवान सिनेमाघरों में सिसकियां लेते दिखे. कपिल शर्मा के शो में हंसी की बौछार कम और उस के कैफे पर गोलियों की बौछार ज्यादा चर्चा में रही. खेल, चुनाव और क्षेत्रीय संगीत आईपीएल में बैंगलुरु की जीत के जश्न में फैंस ने कुरबानी तक दे डाली. एसआईआर के बाद बिहार चुनाव में प्लसमाइनस का खेला देखने को मिला. पुराने उम्मीदवारों का टिकट और पुराने अवैध वोटर का नाम कटा, तो नए उम्मीदवार को टिकट और वोटर लिस्ट में नए वोटर का नाम जुड़ा.


फाइनली सुशासन की रीलौंचिंग हुई, हालांकि इस दौरान मछलीपालन नौटंकी, टिकटकटवा ड्रामा, जूतमपैजार और गालीगलौज के चुनावी मैटेरियल ने वोटरों का भरपूर मनोरंजन किया. आखिरी सीन : गो इंडिया से इंडगोक्राइसिस हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा का सपना भले ही पूरा हुआ हो, लेकिन इंडिगो क्राइसिस ने टाई पहनने वालों को भी हलकान कर दिया. इस साल के आखिर में इंडिगो ने यात्रियों केगोपरइंडलगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. साल 2025 में भी नाम बदलो, भाग्य बदलो अभियान जारी रहा. राजभवन से लोक भवन, पीएमओ से सेवा तीर्थ, मनरेगा सेजी राम जी’… नाम बदलते रहे. डौलर के मुकाबले रुपया भी नेताओं के चारित्रिक असर का अनुसरण करता दिखा और गिरने में मौद्रिक महारत हासिल की.


बाढ़, चुनाव और अपराध का सीजन समय पर आया. दिवालिया साल में दीवाली को यूनैस्को की विश्व धरोहर में जगह मिली. भारत में पाकिस्तानीरहमान डकैतका डांस और हिजाब मामले के चलते पाकिस्तान में भारतीयसुशासन बाबूसुर्खियों में बने रहे. कुलमिला कर, साल 2025 ने साबित कर दिया कि भारत में मनोरंजन के लिए सिनेमाघर की जरूरत नहीं, बल्कि खबरें ही काफी हैं. धुरंधर साल 2025 के इस मजाकिया पोस्टमार्टम का यहीं एंड किया जाता है, क्योंकि नए साल 2026 का लाइव टैलीकास्ट शुरू हो चुका है.      Political Story   

Hindi Story: दांव

Hindi Story: औफिस के नए मैनेजर मिस्टर आलोक बहुत ज्यादा हैंडसम थे, पर उन की पत्नी रीता एकदम साधरण सी औरत. लोगों को लगा कि मिस्टर आलोक ने दहेज के चक्कर में रीता मैडम से शादी की है, पर मामला एकदम उलट था. क्या था इस बेमेल शादी का राज?

कं पनी के नए मैनेजर के आने की खबर सुन कर सभी मुलाजिम अपनेअपने काम में जुट गए थे. असिस्टैंट मैनेजर नितिन की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. उन के ऊपर दोहरा दबाव था, एक घर का और दूसरा औफिस का. मैनेजर और असिस्टैंट मैनेजर दोनों के सरकारी मकान अगलबगल थे. इसी वजह से पारिवारिक संबंधों को निभाने की जिम्मेदारी भी नितिन पर पड़ी थी. पुराने मैनेजर मिस्टर कपिल से नितिन के परिवार जैसे संबंध थे. उन के जाने के बाद से नितिन का पड़ोस एकदम सूना हो गया था. अब महीनेभर बाद कल मिस्टर आलोक यह जिम्मेदारी संभालने वाले थे.


मिस्टर आलोक फिलहाल अकेले रहे थे. उन की पत्नी रीता के साथ आने के चलते नितिन का तनाव थोड़ा कम हो गया था. नितिन ने मिस्टर आलोक के आने से पहले ही घर और औफिस दोनों जगह का इंतजाम ठीक करवा दिया था. औपचारिक मुलाकात के लिए शाम की चाय पर उन्हें घर बुलाने की बात भी अपनी पत्नी रेखा से कह दी थी. मिस्टर आलोक दोपहर में घर पहुंच गए. औफिस वालों ने उन के घर को ठीक तरह से सजासंवार दिया था. मिस्टर आलोक इस समय बहुत कम सामान साथ ले कर आए थे. उन्होंने मातादीन के अलावा वहां पर तैनात दूसरे मुलाजिमों को वापस भेज दिया था.


औफिस से कर नितिन को मिस्टर आलोक को घर पर मुलाकात कर उन्हें चाय पर आने का न्योता भी देना था. नितिन ठीक 5 बजे घर पहुंचे. मिस्टर आलोक ने उन्हें आते हुए देख लिया. जरा देर में वे खुद ही नितिन के घर पहुंच गए. उन्होंने डोर बैल बजाई. रेखा ने दरवाजा खोला. उस के कुछ पूछने से पहले ही मिस्टर आलोक ने अपना परिचय भी दे दिया. तभी नितिन की आवाज सुनाई दी, ‘‘कौन है रेखा?’’
रेखा के मुंह से अभी आवाज तक नहीं निकल रही थी. इतनी देर में नितिन वहां गए और बोले, ‘‘सर, आप…’’
‘‘शुक्र है, तुम मु? देख कर
चौंके नहीं.’’
‘‘मैं आप से मिलने आने वाला ही
था सर.’’
‘‘उस से पहले मैं ही चला आया. कायदे से नए पड़ोसी को पुराने
पड़ोसी के घर जाना चाहिए. तुम औपचारिकता निभाने के लिए ही मेरे घर आने वाले थे.’’
‘‘नहीं सर, यह बात नहीं है. आप मेरे बौस हैं. मेरा फर्ज बनता है कि मैं पहले घर पर आप से मिलूं और आप को अपने घर आने का न्योता दूं.’’
‘‘मैं औफिस में तुम्हारा बौस हूं.
घर में हम सिर्फ पड़ोसी हैं,’’ मिस्टर आलोक बोले.
रेखा को मिस्टर आलोक का खुलापन बड़ा भला लग रहा था. लंबेचौड़े, स्मार्ट
और सुडौल देह के स्वामी मिस्टर आलोक बहुत दिख रहे थे. उन का गोरा रंग उन के कालेसफेद खिचड़ी बालों के साथ बहुत मेल खा रहा था.
‘‘बैठिए सर,’’ नितिन ने कहा.
तभी रेखा ने शांताबाई के हाथ पानी भिजवा दिया और खुद भी कर औपचारिकतावश हाथ जोड़ दिए.
‘‘यह मेरी पत्नी रेखा है और ये हमारे कंपनी के नए मैनेजर मिस्टर आलोक हैं,’’ नितिन ने उन दोनों का परिचय भी कराया.


फिर वे दोनों आपस में बातें करने लगे. रेखा किचन की तरह बढ़ गई.
‘‘आप के साथ परिवार के बाकी सदस्य आते तो बहुत अच्छा लगता सर.’’
‘‘मेरी पत्नी रीता, बेटी रोशनी और बेटा राहुल भी जल्दी जाएंगे. अभी जरा वे काम में बिजी थे. वैसे, आप के बच्चे दिखाई नहीं दे रहे…’’ मिस्टर आलोक ने पूछा.
‘‘खेलने गए हैं. वे अभी छोटे हैं सर,’’ नितिन बोले.
कुछ ही देर में शांताबाई चायनाश्ते के साथ हाजिर हो गई.
‘‘इस सब की क्या जरूरत थी? सिर्फ चाय ही काफी थी,’’ मिस्टर आलोक बोले.
तीनों साथ बैठ कर चाय पीने लगे. कुछ देर बाद मिस्टर आलोक ने उन से विदा ली.
‘‘सर स्वभाव से बहुत सरल हैं. उन में बौस जैसी अकड़ नहीं है,’’ मिस्टर आलोक के जाने के बाद नितिन बोले.
अगले दिन मिस्टर आलोक ने औफिस जौइन किया था. उन के स्वभाव से सभी खुश थे. वे बहुत जल्दी सब के साथ घुलमिल गए. अकसर वे शाम को नितिन के पास जाते और खेल से ले कर राजनीति तक की चर्चा करते.
‘‘आप का परिवार कब रहा है?’’ एक दिन नितिन ने पूछा.
‘‘हफ्तेभर के अंदर जाएंगे वे लोग,’’ मिस्टर आलोक बोले.
‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है.’’
तकरीबन एक महीने बाद रीता मैडम के बच्चों के साथ आने की तारीख तय हो गई थी और मिस्टर आलोक ने इस की खबर नितिन को दे दी थी. उन के निर्देश पर मैडम के वैलकम की तैयारी होने लगी. रेखा भी उन के मकान का इंतजाम देख रही थी.
आखिर वह दिन गया और रीता मैम अपने जवान बच्चों के साथ गईं. औफिस के सब लोग सपरिवार मैडम के स्वागत के लिए आए हुए थे.
उम्मीद के उलट रीता मैम को देख कर औफिस के सभी लोग हैरान रह गए और उन की कल्पना एक ?ाटके में बिखर गई.
कंप्यूटर औपरेटर मिनी बोली, ‘‘कहां सर और कहां रीता मैडमदोनों में जमीनआसमान का अंतर है.’’
‘‘ऐसी जोड़ी की तो मैं सपने में
भी कल्पना नहीं कर सकती थी,’’ रिया ने कहा.
रीता मैडम को देख कर सब खुसुरफुसुर कर रहे थे, लेकिन ऊपर से चेहरे पर मुसकान ओढ़े हुए थे.
रेखा ने रीता मैडम को बुके थमा कर कहा, ‘‘वैलकम मैडम.’’
रीता ने एक गहरी नजर रेखा पर डाली लेकिन बोली कुछ नहीं. वह चारों तरफ नजर घुमा कर सब को देख रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि इस समय सब उसे देख कर क्या महसूस कर रहे हैं, लेकिन उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी. वजह, वह ऐसी ही प्रतिक्रिया पहले भी कई वैलकम पार्टी में देख चुकी थी. उसे अपने बारे में कोई गलतफहमी
नहीं थी.
रीता मोटी, नाटी और सांवली थी. कहीं से भी उन दोनों का कोई मेल नहीं था. उसे बात करने का सलीका था और ही उठनेबैठने और खानेपीने का. वह एक साधारण औरत की तरह सब
से पेश रही थी, जो मिस्टर आलोक के ओहदे से कहीं भी मेल नहीं खा रहा था. उस से मिल कर सभी को निराशा हुई थी.
जब रीता किसी समारोह में जाती, तो बातें पहले धीमी होतीं, फिर उस के कानों तक पहुंच ही जातीं.
‘‘देखो, वही है…’’
‘‘हां, वही सर की पत्नी
‘‘सम? नहीं आता, सर ने इस में क्या देखा…’’
एक बार किसी औरत ने सीधे पूछ ही लिया, ‘‘रीताजी, आप पहले क्या करती थीं?’’
रीता ने बिना किसी ?ि?ाक के कहा, ‘‘जीना…’’
पूछने वाली औरत थोड़ी असहज हो गई, ‘‘मतलब कोई काम?’’
‘‘काम तो अब भी करती हूं.’’
‘‘कौन सा?’’
‘‘अपने बच्चों का भविष्य संवारने का…’’ रीता ने जवाब दिया.
लोग अकसर रीता मैडम को तौलते थे. तराजू में रखते थे एक पल में.
‘‘ पढ़ीलिखी, सलीकेदार, ही खूबसूरत…’’
रीता को यह अजीब नहीं लगता था. वह जानती थी कि समाज कीमत दिखने वाली चीजों से लगाता है. जिस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि लोग उस की मौजूदगी से असहज हैं, उसी दिन उस ने तय कर लिया था कि वह खुद को हलका साबित नहीं करेगी.
एक सामाजिक कार्यक्रम में किसी सज्जन ने आलोक से हंसते हुए कहा, ‘‘आप की पत्नी बड़ी अलग हैं.’’
आलोक कुछ कहने ही वाले थे,
तभी रीता ने खुद जवाब दे दिया, ‘‘हां, क्योंकि मैं सही समय पर जीना सीख
गई थी.’’
वहां सन्नाटा छा गया. समाज को यही खलता था कि रीता शर्मिंदा नहीं थी. अगर वह सिर ?ाका लेती तो शायदबेचारीकहलाती. अगर रोती तोदयामिल जाती. पर वह रोती थी, ?ाकती थी. वह जानती थी कि समाज के लिए उस की कीमत सिर्फ इतनी थी कि वह किस की पत्नी है, उस से ज्यादा नहीं और कम भी नहीं. उसे यह भी पता था अगर वह खूबसूरत होती तो यही समाज उसेभाग्यशालीसे ज्यादा कुछ कहता.
रीता ने कभी सफाई नहीं दी, क्योंकि सफाई वही देता है जो अपराधी हो. रीता ने सिर्फ एक बात पकड़े रखी,
उस की जगह. आज भी जब लोग उसे देखते हैं, तो सोचते हैं कि यह यहां तक कैसे पहुंची?
समाज की नजर में रीता की कीमत कभी ऊंची नहीं रही, पर उसे अब यह फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि जिस औरत ने अपनी कीमत खुद चुकाई हो, उसे समाज के लेबल की जरूरत नहीं होती.
रेखा सोच रही थी कि एक मैनेजर की पत्नी में जिन गुणों की उम्मीद की जाती है उन में से एक भी रीता में नहीं था. इस से पहले भी 2 मैनेजर उन के बगल के बंगले में रह कर जा चुके थे. उन की पत्नियां बड़ी सुघड़ और सलीकेदार थीं. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि हो हो मिस्टर आलोक ने रुपयों की खातिर लालच में पड़ कर रीता मैम जैसी औरत से शादी की हामी भरी होगी.
आज दिनभर चर्चा का विषय रीता मैडम ही थीं.
‘‘मैडम तुम्हें बड़ी तिरछी नजर से देख रही थीं. तुम ने उन की तारीफ नहीं की रेखा.’’
‘‘किस बात की तारीफ करूं नितिन? उन में रूप है और ही कोई खास गुण दिखाई दे रहा था.’’
‘‘बारीकी से देखोगी तो तुम्हें उन में भी कोई खास गुण दिखाई दे जाएगा,’’ नितिन बोले, तो रेखा हंस दी.
मिनी और रिया तो अकसर आलोक सर को देखते ही मैडम की बातें ले कर बैठ जातीं. उन दोनों को बात करने के लिए एक अच्छाखासा टौपिक मिल
गया था.
‘‘तुम्हारा क्या खयाल है कि सर की लव मैरिज है या अरेंज?’’
‘‘जरूर दहेज के लिए घर वालों की मरजी से शादी की होगी, वरना…’’
‘‘यह भी हो सकता है रिया कि उन में कोई ऐसा गुण हो जिस पर सर मोहित हो गए हों. कहते हैं प्यार अंधा होता है.’’
‘‘मु? तो उस की उम्मीद नहीं है,’’ इतना कह कर दिया फाइल ले कर सर के केबिन में चली गई.
रीता से मुलाकात करने के बाद औफिस में अभी उसे ले कर बातों का बाजार गरम था. उसे अपने बारे में
किसी भी तरह का कोई शिकवा नहीं होता था. वह जैसी थी उस से कोई शिकायत नहीं थी और अपनी उपलब्धि पर खुश भी थी.
रीता को लोगों पर हंसी आती जो हरेक का बाहरी रूप देख कर बिना जाने जज करना शुरू कर देते थे. वह जानती थी कि मर्दों को खूबसूरती लुभाती है लेकिन वक्त पड़ने पर इस से उन का कोई लेनादेना नहीं होता. वे तो बस औरत की देह के मोह जाल में फंस
जाते हैं.
मिस्टर आलोक की पसंद हर मामले में अच्छी मानी जाती थी. कारोबार हो या रिश्ते लोग उन की सम? की मिसाल देते थे, लेकिन रीता को ले कर उन से चूक हो गई थी. सब उसे भाग्यशाली कहते, पर रीता भाग्यवादी नहीं थी. उस का मानना था कि भाग्य अपनेआप नहीं बनता, उसे बनाना पड़ता है और उसे बनाने में बहुतकुछ दांव पर भी लगाना पड़ता है.
अपने भविष्य के लिए रीता ने भी बड़ा दांव खेला था और वह दांव उस के हिसाब से सीधा पड़ा था.
लोगों ने रीता को देख कर अपनीअपनी राय बना ली थी. किसी को यकीन था कि वह किसी बड़े बिजनैसमैन परिवार से होगी, तो कोई कहता कि मिस्टर आलोक ने दहेज के लालच में शादी की है.
कोई नहीं जानता था कि यह शादी अरेंज नहीं थी. यह माना जाता है कि प्यार तन से ज्यादा मन की खूबसूरती देखता है. यह आम सोच थी, पर रीता की सोच इस से मेल नहीं खाती थी
उस का अनुभव कुछ और कहता था. वह खुद से कहती, ‘‘एक मर्द पहले तन देखता है, मन और उस की खूबसूरती के बारे में बाद में सोचता है.’’
शायद यही वजह थी कि जब एक साधारण सी औरत ने तन के बल पर सबकुछ हासिल कर लिया, तो उस के मन में यह विश्वास बैठ गया कि
एक खूबसूरत औरत के लिए इस
दुनिया में कुछ भी पाना नामुमकिन
नहीं है.
?ांपड़े में रहते हुए रीता ने बहुतकुछ देखा था. मर्दों की निगाह, उन की कमजोरी, उन का डर. उसे जल्दी सम? गया था कि गरीबी और देह दोनों का सौदा चलता है, फर्क सिर्फ कीमत का होता है. उस ने आलोक को चुना थाइसलिए नहीं कि वह सब से अच्छा आदमी था, बल्कि इसलिए कि वह
सब से असुरक्षित अमीर आदमी था.
रीता एक बहुत गरीब परिवार से थी. उस के पिताजी एक फैक्टरी में मजदूरी करते थे. अब वे नहीं रहे. आलोक खानदानी रईस थे और पढ़ाई करने के लिए परिवार से दूर दिल्ली आए थे. उन्होंने अपने लिए अलग घर ले रखा था. उस के ठीक सामने रीता का ?ांपड़ा था. उस की मां बरसों पहले गुजर गई थी.
4 भाईबहनों में रीता सब से बड़ी थी, जिन की परवरिश की खातिर उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. सब दिन में स्कूल चले जाते और रीता घर पर अकेली रहती. अब उन सब की शादी हो गई और उन के घर बस गए. सब अपने परिवार में खुश थे.
आलोक अकसर अपने घर से रीता के ?ांपड़े की ओर ?ांकते रहते. एक दिन वे रीता को देख कर मुसकराए. बदले में वह भी हंस दी. इशारा मिलते ही अगले दिन आलोक दोपहर में उस के घर गए और मुसकरा कर बोले, ‘‘मेरे घर पर काम करोगी?’’
रीता ने तुरंत हां कह दी. अब तो रोज आनेजाने और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया.
एक दिन आलोक ने जैसे ही रीता का हाथ पकड़ा, तो वह सारी लाजशर्म छोड़ कर उन से लिपट गई. उस ने आलोक को कस कर पकड़ लिया.
आलोक आखिर मर्द ही तो थे. जरा सी देर में पिघल गए और उन के बीच की सारी दीवारें टूट गईं.
रीता जानती थी कि वह जो कर रही है उस में बहुत ज्यादा रिस्क है, लेकिन उस के सामने कोई दूसरा उपाय नहीं था. वह गरीबी से परेशान थी और आलोक एक अमीर परिवार के बेटे थे. अगर उस का दांव सीधा पड़ गया, तो जिंदगीभर का आराम था, पर वह गलत भी पड़ता तो उन जैसों पर उस का ज्यादा असर पड़ता.
आलोक पर रीता का नशा चढ़ चुका था. रोज ही वह काम के बहाने आलोक के घर आती और उन के सामने समर्पित हो जाती. 6 महीने तक सबकुछ ठीक चला और फिर एक दिन रीता ने तब जबरदस्त धमाका कर दिया, जब उस ने आलोक को बताया कि वह पेट से है, तो उन के पैरों की नीचे से जमीन खिसक गई.
आलोक एकदम से बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो?’’
‘‘मैं सच कह रही हूं. जितनी जल्दी हो सके मु? से शादी कर लो.’’
‘‘शादी और तुम से…’’
‘‘क्या कमी है मु? में?’’
‘‘यह पूछो कि क्या है तुम में?’’
‘‘तो फिर क्यों रोज मेरे सामने गिड़गिड़ाते थे,’’ रीता चीखी तो आलोक नरम पड़ गए.
‘‘इस बच्चे से छुटकारा पा लो. जो मांगोगी मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘यह नहीं हो सकता. बच्चा तो मेरे साथ ही मरेगा यह जान लो और मैं तुम सब को फंसा कर मरूंगी,’’ रीता ने कहा.
मजबूर हो कर आलोक को यह बात अपने घर वालों को बतानी पड़ी. वह किसी के दबाव के आगे नहीं ?ाकी. आलोक लाचार हो गए थे. घर वालों ने फैसला आलोक पर छोड़ दिया. इन्हें अपनाने के लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार थी, पर लाखों रुपयों के लालच में करोड़ का भविष्य छोड़ने को राजी थी.
मजबूर हो कर आलोक को रीता से शादी करनी पड़ी. घर वालों का दबाव अभी भी बना हुआ था. वे अभी भी हर कीमत पर रीता से छुटकारा पाना चाहते थे, पर वह कानून की दुहाई दे कर इन पर अपना दबाव बनाए हुए थी.
तनाव भरे माहौल में पहली बेटी रोशनी का जन्म हुआ. घर वाले अभी भी यही कह रहे थे कि इसे छोड़ दो, लेकिन आलोक जानते थे कि यह इतना आसान नहीं था.
शादी और बेटी के हो जाने पर भी वे नहीं पिघले. रीता भी हार मानने वालों में थी. परिवार और दुनिया दोनों ही जगह उस का जीना मुश्किल हो रहा था और वह सुनहरे भविष्य के खातिर आलोक को छोड़ने को राजी थी.
उस ने अपनी जिंदगी को ले कर बहुत बड़ा दांव खेला था.
रीता की जिद के चलते परिवार की इज्जत खराब हो रही थी. उसी की खातिर उन्होंने रीता को घर में जगह दे दी थी, पर दिल में नहीं. वह खुश थी कि उस की जद्दोजेहद कामयाब हो रही थी. जवान मर्द आखिर क्या करता?


कोई उपाय पा कर आलोक ने हार मान ली और उन दोनों के संबंध सामान्य होने लगे. फिर रीता की गोद में राहुल गया. बेटे के खातिर आलोक ने रीता को माफ कर दिया और इस तरह उसे मिस्टर आलोक के घर और जिंदगी में जगह मिल गई.


राहुल के जन्म के बाद आलोक बदले. पहली बार उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगता था?’’
‘‘हर दिन लगता था, पर डर के साथ भूख भी थी,’’ रीता ने कहा. आलोक कुछ नहीं बोले. आज लोग उसे देख कर कहते हैं कि सलीका है, सम?. रीता जानती है कि सलीका उस ने सीखा ही नहीं और सम? उस ने जरूरत से ज्यादा पाली है. वह कोई आदर्श औरत नहीं है और ही कहानी की हीरोइन. वह बस एक औरत है, जिस ने यह तय किया है कि वह हार कर नहीं जिएगी. उस का दांव गलत भी हो सकता था, पर उस ने दांव इसलिए नहीं खेला था कि वह सही साबित हो, उस ने इसलिए खेला था कि पीछे लौटने का रास्ता बंद हो जाए. और जब रास्ता बंद हो जाए तो आदमी चलना सीख ही जाता है.


यह सब किसी फिल्मी कहानी से कम था. क्याकुछ नहीं ?ोला था रीता ने अपनी जिंदगी में. भले ही घर वालों की नजर में इस का ज्यादा मोल था, पर रीता की आपबीती बयां कर रही थी कि आज जोकुछ भी उस के पास है, उस का रास्ता उस ने अपने तन से बनाया था. पति आलोक का खुला बरताव देख कर रीता अकसर सोचती, ‘इनसान का शरीर बूढ़ा होता है, पर मन नहीं. उस की खुशी के लिए वह रोजाना नए उपाय ढूंढ़ता रहता है.’ जिंदगी में रीता ने बड़ी जद्दोजेहद देखी थी. इसी ने उसे नए सिरे से सोचने का एक मौका दे दिया. उसे लगता कि दुनिया में बेकार कुछ भी नहीं है. सब की अपनी उपयोगिता है. बस, सही समय पर उस का इस्तेमाल करना आना चाहिए, लेकिन उस के साथ बहुत ज्यादा जोखिम भी जुड़ा होता है. हरेक के बस का यह ?ोलना नहीं होता, जिस ने जिंदगी में कभी भी बड़ा जोखिम नहीं उठाया था. उस के लिए यह रास्ता जायज नहीं ठहराया जा सकता था.          Hindi Story             

लेखक डा. के. रानी

Social Story: गहरी पैठ

Social Story: भीड़ का इस्तेमाल हर जबरदस्ती के खिलाफ करना नकेवल कानूनी है, यह आसान भी है. भीड़ चाहे सही काम की मांग कर रही हो या गलत की, यह अपनी बात सुनाने का एक तरीका है. 1973-74 में जयप्रकाश नारायण नेकुरसी खाली करो कि जनता आती हैका नारा दे कर 1971 की चुनावी और बंगलादेशी लड़ाई की जीत के बावजूद भीड़ के बल पर इंदिरा गांधी का सिंहासन हिला दिया था.


आज भीड़ को कुचलने की पूरी तैयारी हो गई है. वे लोग जिन्होंने भीड़ के बल पर बाबरी मसजिद गिराई थी, जिस ने भीड़ के बल पर भागलपुर में दंगे कराए थे, जिन्होंने गुजरात में 2002 के दंगे कराए थे, आज भीड़ को कुचल रहे हैं. राजनीतिक मामलों को तो छोडि़ए, अब दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ मोरचा निकालने वालों की भीड़ को कानून के हाथों बुरी तरह कुचला जा रहा है. आजकल भीड़ को कंट्रोल करने का आसान तरीका बन गया है अगर भीड़ सरकार के खिलाफ कुछ मांग कर रही हो. 1-2 लोगों से पाकिस्तानी नारे लगवा दो. फिर क्या पुलिस सब को बंद ही नहीं कर देगी, वर्षों जेलों में बंद रखेगी. सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी ?ांडी दे दी है कि पुलिस भीड़ को, ‘देश के खिलाफकाम करने वाली भीड़ को, बुलवाने वालों को बरसों बिना सजा दिए बंद कर सकती है.


यह आम जनता के हक को मारना है. आज वैसे ही आम जनता को अपने मोबाइल से फुरसत नहीं
कि वह दूसरों के फायदे के लिए किसी भीड़ में जाए. आजकल तो भीड़ भाड़े की होती है या भक्ति की. दोनों से चूंकि भीड़ जमा करने वाले को जम कर फायदा होने की उम्मीद होती है, लोग मोबाइल जेब में रखने लगे हैं. पर नारों का खतरा इन में भी है. 2-4 लोगों को फालतू के नारे लगाने के लिए तैयार किया जा सकता है जो चुपके से गायब हो जाएं. यह भीड़ तोड़ने का हथकंडा अब काम का है. सरकार आज भीड़ से नहीं डर रही. किसानों ने हरियाणा की सीमा पर भीड़ जमा कर 3 साल पहले खेती कानून वापस करा लिए थे, पर उस भीड़ पर तरहतरह के सच्चे?ाठे आरोप लगा कर उसे जबरदस्त बदनाम किया गया था. आज
किसान आंदोलन के नेता राकेश टिकैत दूसरे लोग घरों में दुबके हैं, क्योंकि लोग भीड़ में शामिल हो कर जेलों में नहीं सड़ना चाहते.


गांवों में जहां अखबार है, रेडियो स्टेशन, टीवी, लोगों को अपनी बात कहने का अब मौका ही नहीं मिलता, क्योंकि भीड़ जमा करना मुश्किल हो गया है. यह सरकार को हर मामले में मनमानी करने का मौका दे रहा है. जनता की बात सिर्फ ट्रोलिंग तब सीमित है और भीड़ की शक्ल नहीं लेती. ट्रोलर्स को कंट्रोल करने के लिए भी सरकार पूरी तरह जुट गई हैअब गांवों के लिए सब से बुरे दिन गए हैं. सरकारें उन्हें जैसे मरजी हांक सकती हैं.



हले प्राइवेट दलाल लोगों की तस्करी और चोरी करते थे ताकि उन्हें किसी और देश या राज्य में गुलामी करवाने के लिए ले जाया जाए, अब यह काम भारत सरकार ने करना शुरू कर दिया है. शुरू में जब कांग्रेस सरकार के जमाने में लोगों ने दलालों के हत्थे चढ़ कर विदेश जाना शुरू किया था तो सरकार ने इस की देखभाल के लिए एक विभाग बनाया था जिस की इजाजत के बिना किसी को हवाईजहाज या पानी के  जहाज पर नहीं चढ़ने दिया जाता था.


अब दलाली का यह काम सरकार खुद कर रही है. 200 साल पहले से भारत से एग्रीमैंट करा के गरीब मजदूरों को अंगरेज और दूसरे यूरोपीय दलाल भारत के लोगों को अफ्रीका, फिजी, मौरीशस, सूरीनाम ले जाते रहे हैं. यहां काम गुलामी का ही होता था पर वह गुलामी भारत में जाति की गुलामी से ज्यादा बेहतर थी. जो थोड़े से लोग कभीकभार जुगत भिड़ा कर वापस अपने गांव भी जाते थे, वे बढ़ाचढ़ा कर कसीदे पढ़ते थे.


यही काम आजादी के बाद हुआ जब तेल उगलने वाले देशों को पैसा मिलने लगा. उन के यहां आबादी तो थी नहीं. उन्होंने भरभर कर भारत से लोगों को बुलाना शुरू किया. काम गुलामी जैसा ही था पर भारत के गांवों में ईंट के भट्ठों या छोटी फैक्टरियों में जो गुलामी होती है, उस से कहीं कम मुश्किल था और पैसा ज्यादा मिलता था. आज भारत अगर फलताफूलता नजर रहा है तो इस की वजह राम मंदिर से निकलने वाला आशीर्वाद नहीं है, इन मजदूरों की मेहनत का पैसा है जो ये भारत में अपने घर वालों को भेजते हैं. अब घर वाले भी भारत से गए लोगों को नोट छापने की मशीन सम?ाते हैं और चाहे घर का आदमी अपनी हड्डियां गलाए, वे खुश ही रहते हैं.


सरकार तो बहुत खुश है. उसे बैठेबिठाए लगभग 14,00,000 करोड़ (14 लाख करोड़) की भारी रकम मिल रही है, इसीलिए जब इजरायल और गाजा की लड़ाई शुरू हुई और गाजा के मजदूरों ने इजरायल में जाना बंद कर दिया तो भारत सरकार ने बिना फिक्र किए कि यह लड़ाई का इलाका है. कई हजार मजदूरों को इजरायल भेजने की दलाली का काम अपने हाथों में ले लिया. सरकार की एक कंपनी नैशनल स्किल डवलपमैंट कौर्पोरेशन ने दलाली शुरू की और रामजी के प्रदेश से हिंदू मजदूर भक्तों को यहूदियों के देश में बढ़ईगीरी, नलसाजी, लुहारी, मजदूरी के काम के लिए भेजना शुरू कर दिया. अब चूंकि  मंदिरों की हिंदी बैल्ट में गरीबी बेतहाशा है लोगों ने अपनी जमीन, जायदाद, जेवर बेच कर नौजवानों और भगोड़ों को भी भेजने के लिए लाइनों में खड़ा कर दिया. दलाल पैसे नहीं देते थे, लेते थे. प्राइवेट दलाल घर वालों को पैसे दे कर गुलामी के लिए खरीदते हैं पर ये तो सरकारी दलाल हैं, ये लेते हैं.


अब कुछ लोग इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं कि इस दलाली में गुलामों से भेदभाव किया जा रहा है, जो बात कोर्ट की एप्लीकेशन में नहीं है वह यह है कि दलाल कंपनी के अफसरों ने घूस भी ली होगी. जहां घूस का मौका हो, वहां सरकार हाथ नहीं डालती. अब सरकार अपना निकम्मापन दिखाने के लिए ढोल बजा रही है कि देखो हम ने विधर्मी के यहां गुलामी के लिए मजदूर भेजे. चढ़ावे की बात वैसे ही छिपा दी जाती है जैसी सभी मंदिरों में छिपाई जाती है.    Social Story                      

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