Hindi Story: बजरंग बिहारी यादव, जिन्हें इलाके के लोग प्यार सेपहलवान भैयाकहते थे, लगातार 10 साल नवादा जिले की नारंगपुर सीट से विधायक रहे. वे भले ही 62 साल के थे, लेकिन उन की आवाज में एक खास किस्म की कड़क थी.

पूरी विधानसभा में जितने भी गांव थे, सब का नाम उन्हें उंगलियों पर याद था. याद्दाश्त इतनी तेज कि जिस से एक बार भी मिल लेते उसे भूलते नहीं थे. पहलवान भैया का एक बेटा पटना में डेयरी चलाता था और दूसरा बेटा सड़क महकमे में ठेकेदार था. पहलवान भैया ने अपने पुश्तैनी घर के आलावा पटना में बोरिंग रोड पर अपना मकान बनवाया था. अपनी सेहत को ले कर वे काफी ज्यादा सचेत रहते थे और रोज सुबह
3 किलोमीटर पैदल जरूर चलते थे. पहलवान भैया का बचपन बहुत गरीबी में बीता था. उन के गांव दुल्फा में 3 घर क्षत्रियों के थे, जो कभी इस इलाके के जमींदार रहे थे. हालांकि, उन की ज्यादातर जमीनें मूंछों में इंपोर्टेड खिजाब लगाने, अरबी इत्र छिड़कने, महंगी शराब पीने और तवायफों का मुजरा देखने में ही खत्म गई थीं, लेकिन फिर भी इलाके में उन की हनक कायम थी.

पड़ोस के गांव इंदौर में भूमिहारों और ब्राह्मणों का दबदबा था, जिन के साथ मिल कर इन लोगों ने इलाके में ऐसी तिकड़ी बना रखी थी कि इन से उल?ाने के बारे में पूरे इलाके में कोई सोच ही नहीं सकता था.
इन सब ने दुसाधों की एक लठैत टीम भी बना रखी थी, जिस का इस्तेमाल इलाके के छोटी जाति के लोगों को धमकाने, खौफ कायम करने या सूदखोरी के धंधे में ब्याज और सूद वसूली के लिए होता था.
पहलवान भैया का घर जिस महल्ले में था, उसे दुल्फा गांव का अहिरान महल्ला बोलते थे. वह तकरीबन 50 घरों का महल्ला था. मजदूरी, पशुपालन और दूध बेचने का पुश्तैनी धंधा करने वाले इन परिवारों के पास कोई खास खेती नहीं थी.

हालांकि, इस पीढ़ी के लड़के अब स्कूलों का रुख भी करने लगे थे, लेकिन बजरंग बिहारी कुछ खास नहीं पढ़ पाए. बिहार में 80 के दशक के सामाजिक न्याय आंदोलन का असर अब इन गांवमहल्लों तक भी पहुंचने लगा था. पहलवान भैया को उन के बाबा कुश्ती सिखाना चाहते थे, इसलिए वे बचपन से ही अखाड़े में वर्जिश करने जाते थे. गांव में सामाजिक तानेबाने में इतनी दूरी थी कि ऊंची जाति के बच्चे निचलों को देख कर नाक दबा लेते थे, जो एक तरह से उन से नफरत करने का संदेश देता था. वहीं, यादवों के दरवाजे से निचली जाति के लोग निकल नहीं सकते थे. जातपांत के सामाजिक ढांचे का सभी समुदाय कड़ाई से पालन करते थे.

एक बार पहलवान भैया की एक बिगड़ैल भैंस अपनी रस्सी तोड़ कर जमींदार हुकुम सिंह के धान के खेत में चली गई और फसल का कुछ नुकसान कर दिया. हुकुम सिंह बहुत दबंग थे, जमींदार थे. नाराज हुकुम सिंह ने पहलवान भैया के घर पर हमला कर दिया और उन के बुजुर्ग बाबा राम दुलारे को पीट कर अधमरा कर डाला. बारबार गलती मानने के बावजूद हुकुम सिंह ने पूरे गांव के सामने उन्हें बेइज्जत किया. उन की हनक के आगे गांव के किसी आदमी ने कोई विरोध नहीं किया और मुंह भी नहीं खोला. पुलिस में शिकायत के बाद भी कोई खास कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि थानेदार भी हुकुम सिंह की हवेली में दोपहर गश्त के बाद आराम करते थे.

उसी मार के बाद, अगले 6 महीने में पहलवान भैया के बाबा की मौत हो गई. हुकुम सिंह ने उन के बाबा पर 400 रुपए जुर्माना ठोंका, जो फसल नुकसान के एवज में पहलवान भैया के पिता को चुकाना था.
पहलवान भैया अपने बाबा की मौत को भुला नहीं पाए. घटना के तीसरे ही दिन हुकुम सिंह के लड़के से इस बाबत उन की कहासुनी के बाद हाथापाई हो गई. इस के बाद तो गांव में हंगामा ही मच गया. एक अहीर के बच्चे ने क्षत्रिय को कैसे छू लिया? इसे क्षत्रियों ने अपने दबदबे पर हमला माना और अहिरान बस्ती पर अचानक हमला कर दिया. जो जहां मिला उसे वहीं पीटा.

यादवों के दरवाजे पर बंधी भैंसों के पैर भी पीटपीट कर तोड़ डाले गए. कुछ मवेशी इस हमले में मारे भी गए. अचानक हुए इस हमले में अहिरान बस्ती के किसी भी आदमी को संभलने का मौका नहीं मिला.
यही नहीं, पहलवान भैया पर भी हुकुम सिंह ने पुलिस केस करवा दिया और पुलिस ने उन्हें जेल भेज दिया. उस समय उन की उम्र केवल 18 साल थी. गठीले बदन का यह नौजवान बजरंग बिहारी पहलवानी के गुर अभी सीख ही रहा था, लेकिन जेल जाने के बाद यह सफर खत्म हो गया. पहलवान भैया 7 महीने नवादा जिला जेल में बंद रहे. घर वाले 1-2 बार ही उन से मिल सके, क्योंकि पैसे की तंगी के चलते उन के पास जेल में मिलने का किराया भी नहीं हो पाता था.

जेल में पहलवान भैया की मुलाकात कई पेशेवर अपराधियों के साथ, लाल ?ांडा के आंदोलनकारियों से भी हुई. लाल ?ांडा वालों ने जमींदारों के खिलाफ अपने संघर्ष की कहानी भी बताई और यह भी बताया कि क्षत्रियों की सारी अकड़ की वजह उन की जमीन है. उन्हें और भी बहुतकुछ तरीकों से सम?ाने की कोशिश हुई, लेकिन पहलवान भैया को वह कम सम?में आया. हालांकि, जेल में बातचीत के एक अलग किस्म के दबदबे और जोश ने बजरंग बिहारी का सिक्का जेल में कुछ ही दिनों में जमा दिया.
खैर, किसी तरह बजरंग बिहारी जेल से बाहर आए, लेकिन घर वालों ने उन्हें एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया, ताकि गांव के क्षत्रियों से आगे कोई और टकराव नहीं हो.

लेकिन बजरंग बिहारी अब रुकने वाले नहीं थे. उन्होंने जेल में बंद अपराधियों की मदद से बंदूक और कट्टा चलाना सीखा. इस के लिए वे कुछ दिन गिरिडीह के जंगलों में भी रहे. तकरीबन एक साल बाद पहलवान भैया अपने गांव कुछ दिन के लिए वापस आए. अब वे 20 साल के हो चुके थे. घर वालों ने उन्हें सम?ाया और सबकुछ भूल कर नए सिरे से जिंदगी शुरू करने को कहा. उन की राय थी कि वे लोग इन जमींदारों से नहीं लड़ पाएंगे, क्योंकि पुलिस, जेल, अफसर, कचहरी सबकुछ उन की ही जेब में बैठा है. जल्द ही यह खबर फैल गई कि पहलवान गांव में आया है. इस के अगले ही दिन हुकुम सिंह 4 लठैत ले कर पहलवान के घर पहुंच गए.

हालांकि उस समय वे घर पर नहीं थे, लेकिन हुकुम सिंह ने उन की एक भैंस यह कह कर खूंटे से खुलवा लिया कि फसल नुकसान का हिसाब ले कर जा रहे हैं. जब पैसा हो तो ले जाना. जब पहलवान भैया वापस आए, तो उन्हें इस घटना का पता चला. महल्ले के लोगों ने उन्हें सम?ाया कि हुकुम सिंह की हवेली पर अभी जाना ठीक नहीं है. भैंस खोल ले गए तो क्या हुआउन से उल?ाना ठीक नहीं है.5 दिन बीत गए, लेकिन पहलवान भैया को किसी ने नहीं देखा. फिर अचानक एक दिन सुबह 3 लड़कों ने हुकुम सिंह के घर पर धावा बोल दिया. गोलियां चलने लगीं. 2 लोग दरवाजे पर ही ढेर हो गए. तीसरे ने अस्पताल में दम तोड़ दिया. अचानक हुए इस हमले में हुकुम सिंह भी गंभीर रूप से घायल हुए और अस्पताल में महीनों पड़े रहे, विकलांग हो कर ही घर लौट पाए.

मामला
पुलिस में गया जरूर, क्षत्रियों के दावे के आलावा, किसी भी लैवल पर यह साबित नहीं हो पाया कि इस हमले में पहलवान भैया का कोई रोल था. पुलिस की निगाह में यह इलाके में लाल ?ांडे के गुंडों की दस्तक थीहालांकि, गांव के ही ?ालन मुराई ने पहलवान को घटना की पहले की शाम को स्थानीय बाजार में देखा था, लेकिन हुकुम सिंह के बेटों ने उस की जवान बेटी का हाल ही में रेप किया था, इसलिए उस ने जानबू? कर इस बाबत किसी से कुछ नहीं कहा, बल्कि वह बहुत ही खुश हुआ और तालाब वाले भैरव बाबा को एक कबूतर चढ़ाया. इस घटना के रिएक्शन में गांव के कुछ क्षत्रियों ने पहलवान को घेरा जरूर लेकिन, पहलवान ने 5 घंटे तक उन का मुकाबला किया.

इस घटना ने इलाके में पहलवान का सिक्का जमा दिया और लोगों के दिल दिमाग से क्षत्रियों की दहशत घटने लगी. अब क्षत्रियों में भी डर पैदा हो गया. उन्हें यह लगने लगा कि उन्हें भी चैलेंज किया जा सकता है.
इधर, पटना की सड़कें पहले ही सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी मांगने के नारों से गूंज रही थीं. बिहार का समाज और राजनीति बदल रही थी. बदलाव की ये आवाजें गांवगिरांव तक सुनाई पड़ने लगी थीं. दुल्फा गांव में नए सियासी और सामाजिक समीकरण बनने शुरू हुए और क्षत्रियों का दखल गांव में कमजोर हुआ. इसी बीच बजरंग बिहारी ने गांव के मुखिया का चुनाव लड़ा और क्षत्रियों के उम्मीदवार एक कुर्मी को चुनाव हरा दिया. यह क्षत्रियों की एक बड़ी हार थी. यह नतीजा दुल्फा गांव का एक ऐतिहासिक बदलाव था, जिसे मुख्यधारा की राजनीति ने भी नोट किया. 26 साल का लड़का नई इबारत लिख रहा था.

धीरेधीरे पहलवान भैया ने अपनी जातबिरादरी के नेताओं से पटना में मेलजोल कायम किया और अगले
5 साल में वे अपने क्षेत्र में यादव बिरादरी का एक प्रमुख चेहरा बन गएपहलवान भैया लगातार 3 बार गांव के मुखिया बने. इस से उन का समाज और मुखर हुआ. यही नहीं, बजरंग बिहारी ने दलितों और पिछड़ों को अपने साथ जोड़ा और जिला पंचायत के सदस्य भी बने. उन्होंने नारा दियाहम सब भाई हैं, अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेंगे’. इस के बाद पहलवान भैया ने निर्दलीय ही विधानसभा का चुनाव लड़ा. उन्हें भले ही केवल 8,000 वोट मिले, लेकिन पूरी विधानसभा में वे यादव समाज का चेहरा बन गए. लोगों ने उन के लिए चंदे और पैसे का इंतजाम किया और मुख्यधारा के नेताओं से उन का मेलजोल हुआ.

अगले विधानसभा चुनाव में पहलवान भैया ने निवर्तमान विधायक राम भरोसे तिवारी को दलितपिछड़ा विरोधी घोषित कर के विधानसभा में गर्दा मचा दिया. सीधी टक्कर दिखने लगी. उन्होंने कहा कि राम भरोसे
ने किसी दलितपिछड़ों के महल्ले में सड़क तक नहीं बनवाई, क्योंकि उन्हें दलितपिछड़ों से घिन आती है. उन्होंने आगे कहा कि वे विकास की यह कलम दलितपिछड़ों के महल्ले की तरफ घुमाने आए हैं. इस तरह पहलवान भैया ने विधानसभा के 12,000 भूमिहारों, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को अपराधी घोषित कर के दलितपिछड़ों को एकजुट किया. इस रणनीति ने उन्हें फायदा दिया और वे सदन में घुस गए.

इसके बाद पहलवान भैया ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उन की कहानी ने जिले की कई पंचायतों को मुखर और तेजतर्रार नेतृत्व दिया. आसपास के जिलों में दलितों और पिछड़ों का सियासत में हिस्सा लेना शुरू हुआ. वे कई नौजवानों के प्रेरणास्तंभ बने. हालांकि, पहलवान भैया को आंत में कैंसर का पता ही तब चला जब कैंसर लाइलाज हो चुका था. तकरीबन 2 साल के इलाज के बाद उन की मौत हो गई, लेकिन उन के संघर्ष ने कइयों को नया रास्ता दिखा दिया था.           

हरे राम मिश्रा

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