Crime Story: औरत की दीवानगी काट दी मर्दानगी

Crime Story: गोवा के बाद मुंबई दूसरा ऐसा शहर है, जहां के लोग नए साल का जश्न पूरे जोरशोर और जोश से मनाते हैं. इस के लिए कई दिन पहले से प्लान भी बनने लगते हैं कि इस बार 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच की रात को क्याक्या करना है. अगर घर पर ही पार्टी देनी है, तो किसकिस को बुलाना है, खाने में क्याक्या आइटम रखना है, डांस और म्यूजिक का क्या इंतजाम करना है और इन सब से भी ज्यादा अहम बात यह कि मेहमानों का स्वागत कैसे करना है और उन्हें तोहफे में क्या देना है.


मुंबई के सांताक्रूज (पूर्व) इलाके में रहने वाली 25 साला कंचन देवी महतो ने भी नए साल के स्वागत का प्लान बना रखा था. एक आटोरिकशा ड्राइवर की पत्नी और 2 बच्चों की मां कंचन देवी ने अपने 44 साला आशिक और रिश्तेदार जोगिंदर लखन महतो को मिठाई खाने के लिए अपने घर आने का न्योता दिया था, जिसे स्वीकार करने की कोई वजह जोगिंदर जैसे आशिक के पास नहीं होती. पेशे से कैब ड्राइवर जोगिंदर भी सांताक्रूज (पूर्व) में ही रहता था. कंचन देवी का न्यू ईयर प्लान कितना खतरनाक था, इस से पहले यह जान लें कि उस की और जोगिंदर की आशिकी तकरीबन 7 साल पुरानी थी. जब भी मौका मिलता था, वे दोनों एकदूसरे से मिल कर अपने तन और मन की प्यास बु? लिया करते थे, क्योंकि शादीशुदा और बालबच्चेदार होने के चलते दोनों को एहतियात बरतनी पड़ती थी.


हालांकि, नजदीकी रिश्तेदार होने से उन्हें दूसरे माशूक और आशिक की तरह चोरीछिपे नहीं मिलना पड़ता था, लेकिन जिस मकसद से वे मिलते थे, उस में सावधानी जरूर रखनी पड़ती थी. पिछले कुछ दिनों से वही हो रहा था, जो ऐसे नाजायज रिश्तों में अकसर अपराध की वजह बनता है. कंचन देवी जोगिंदर के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी कि अब तुम बिन रहा और सहा नहीं जातातुम अपनी पत्नी को छोड़ कर मु? से शादी कर लोमैं भी तो सबकुछ छोड़ने के लिए तैयार हूं. इस मांग और जिद से जोगिंदर इस कदर घबराया था कि नवंबर, 2025 में मुंबई छोड़ कर अपने घर बिहार वापस चला गया था. लेकिन कंचन देवी अब भी जिद पर अड़ी थी और हर कभी फोन कर उस पर शादी करने का दबाव बनाती रहती थी.
नए साल पर कंचन देवी ने जोगिंदर लखन को बुलाया तो वह मना नहीं कर पाया. ऐसे नाजायज संबंधों की एकलौती खूबी यह होती है कि हमबिस्तरी का लुत्फ चोरी के आम सरीखा आता है और इन्हें छोड़ पाना आसान नहीं रह जाता.


जब जोगिंदर लखन कंचन देवी के घर पहुंचा जो दोनों बच्चों को सुला कर तमाम तैयारियों के साथ वह उस का ही इंतजार कर रही थी. दोनों ने पहले जीभर कर 2 महीने की अपनी प्यास बु?ाई, फिर कंचन मिठाई ले कर गई. कर दिया बड़ा कांड रात के तकरीबन डेढ़ बजे कंचन देवी और जोगिंदर बिना कपड़ों के थे. कंचन देवी के भरेपूरे जिस्म और सैक्स हरकतों की गिरफ्त में आया जोगिंदर उस वक्त कसमसा उठा, जब कंचन देवी ने एकाएक ही बिना उसे संभलने का मौका दिए चाकू से उस का प्राइवेट पार्ट काट डाला.
यह था नए साल का महबूबा का तोहफा जिसे जोगिंदर तो जोगिंदर, इस घटना को पढ़ने और इस के बारे में सुनने वाले लोग तय है कि जिंदगीभर नहीं भुला पाएंगे. लहूलुहान और तड़पता जोगिंदर लखन गिरतापड़ता जैसेतैसे घर पहुंचा, तो उस का बेटा उसे ले कर तुरंत वीएन देसाई अस्पताल पहुंचा और इलाज शुरू करवाया. यहां से मरहमपट्टी कर डाक्टरों ने उसे सायन अस्पताल रैफर कर दिया, जहां उस के प्राइवेट पार्ट को दोबारा जोड़ने के लिए 2 आपरेशन हुए.


नए साल के इस पहले और अनूठे जुर्म की खबर मिलते ही तुरंत हरकत में आई वाकोला पुलिस कंचन देवी के घर पहुंची, तो पाया कि वह बच्चों समेत पहले ही फरार हो चुकी थी. पर जल्द ही कुर्ला रेलवे स्टेशन से वह गिरफ्तार भी कर ली गई. पुलिस ने बीएनएस यानी भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 (2) के तहत मामला दर्ज कर के कंचन देवी को जेल भेज दिया. आरोप साबित होने पर उसे 10 साल की सजा हो सकती है. लेकिन जोगिंदर को जो सजा मिली, उसे वह जिंदगीभर नहीं भूल पाएगा. भूल तो आगरा का योगेश भी नहीं पाएगा कि उस का भी प्राइवेट पार्ट कटा था. लेकिन काटने वाली पत्नी या माशूका नहीं, बल्कि उस की सगी भाभी थी.


उत्तर प्रदेश में प्रयागराज जिले के मलखानपुर के बाशिंदे राम आसरे के 5 बेटों में से दूसरे नंबर के बेटे उदय कुमार की शादी मंजू से हुई थी. जैसा कि ऐसी करीबी रिश्तेदारी में अकसर होता है, मंजू के देवर उमेश का टांका अपनी भाभी की छोटी बहन अंजू (बदला हुआ नाम) से भिड़ गया यानी अफेयर हो गया. दोनों एकदूसरे से बेइंतिहा प्यार करने लगे और शादी करने के कसमेवादे भी हो गए. दोनों के घर वालों ने भी इस बाबत बातचीत करना शुरू कर दिया था. भाभी ने लिया बदला बात यहां तक किसी के एतराज या हर्ज की नहीं थी. मंजू खुद भी चाहती थी कि अंजू उस की देवरानी बन कर इस घर में जाए, जिस से मांबाप के सिर से एक लड़की की जिम्मेदारी और उतरे. सबकुछ तकरीबन पक्का था कि एक दिन उमेश ने अंजू से शादी करने से इनकार कर दिया. इस से मंजू को हैरानी हुई, लेकिन सबकुछ उस के बस में नहीं था. उस ने उमेश को सम?ाने की बहुत कोशिश की, पर वह टस से मस हुआ.


इस इनकार से अंजू डिप्रैशन में चली गई और जान देने की बात करने लगी. अपनी बहन को इस हालत में देख कर मंजू को गुस्सा आना लाजिमी था, क्योंकि उस की बहन अंजू मन ही मन उमेश को पति मान बैठी थी और शादी से पहले अपना सबकुछ उमेश को सौंप चुकी थी. चूंकि देवर और बहन के अफेयर को परवान चढ़ने देने में मंजू का रोल अहम था, इसलिए वह इस धोखे से बदले की आग में जलने लगी और जब यह अगन बरदाश्त नहीं हुई, तो उस ने उमेश को उस की बहन से बेवफाई करने पर सबक सिखाने का फैसला कर लिया. 16 अक्तूबर, 2025 की रात जब घर में सभी सो रहे थे, तब मंजू चुपके से उठी, हाथ में चाकू लिया और उमेश के नजदीक जा कर उस का प्राइवेट पार्ट काट डाला. मंजू ने उमेश के प्राइवेट पार्ट पर 1-2 नहीं, बल्कि 4 वार किए, जिस से वह चिल्ला कर उठ बैठा. आवाज सुन कर सारा घर जाग
गया और उमेश को अस्पताल पहुंचाया. उस का प्रयागराज के रूपरानी नेहरू अस्पताल में लंबा इलाज चला. जोगिंदर की तरह उस का भी आपरेशन हुआ, तब कहीं जा कर जान बची, लेकिन जो चीज चली गई, उस की भरपाई कोई डाक्टर अब नहीं कर सकता.


आम हो रहे ऐसे अपराध देशभर में अब हर कभी और हर कहीं मर्दों के प्राइवेट पार्ट औरतों द्वारा काटे जाने की वारदात बेहद आम हो चली हैं, जो काफीकुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं. 17 दिसंबर, 2025 को पंजाब के लुधियाना में उस वक्त सनसनी मच गई थी, जब सीएमसी अस्पताल में अमित नाम का एक नौजवान अपना कटा लटकता सा प्राइवेट पार्ट ले कर इलाज के लिए पहुंचा था. डाक्टरों के पूछने पर अमित ने मनगढ़ंत कहानी यह बताई कि जालंधर बाईपास के पास कुछ बदमाशों ने उसे घेर कर लूटा और प्राइवेट पार्ट काट कर चलते बने. इलाज शुरू हुआ और फिर पुलिस आई तो असली कहानी सामने आई कि अमित का प्राइवेट पार्ट बदमाशों ने नहीं, बल्कि उस की माशूका रेखा ने काटा था. दरअसल, अमित और रेखा एकदूसरे से प्यार करते थे और मौजमस्ती के लिए शहर के इंडोअमेरिकन होटल में कमरा ले कर ठहरे थे. वहीं दोनों में ?ागड़ा हो गया. वजह वही पुरानी थी. रेखा जिद कर रही थी कि इतने दिन हो गए मुहब्बत करते हुए, शादी कब करोगे?


रेखा को सैकड़ों बार भोग चुका अमित अब गले में ढोल लटकाने के मूड में नहीं था, सो उस ने साफ मना कर दिया. इस बात पर दोनों में हाथापाई होने लगी. गुस्साई रेखा ने कटर से अमित का प्राइवेट पार्ट काट डाला. गुस्सा अमित को भी गया, तो उस ने पहले तो रेखा को ताबड़तोड़ घूंसे मारे और फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. जाहिर है कि अमित को तगड़ी सजा होगी, लेकिन रेखा जो सजा दे गई है, वह जिंदगीभर उसे सालती रहेगी. मर्दों से कम नहीं औरतें आखिरकार पेशे से नर्स रेखा में इतनी ताकत और हिम्मत आई कहां से, जो उस ने लंबेतगड़े अमित का प्राइवेट पार्ट काट डाला? इतनी ही हिम्मत और ताकत कंचन देवी में भी गई थी और इतनी ही हिम्मत मंजू में भी गई थी. हालांकि, जब उस ने देवर का प्राइवेट पार्ट काटा, तब वह गहरी नींद में सो रहा था. मंजू ने आगेपीछे की परवाह नहीं की और ही ससुराल और मायके वालों के बारे में कुछ सोचा.


दरअसल, औरतें अब पहले जैसी नाजुक नहीं रह गई हैं और मर्दों के हाथों खाए धोखे को किस्मत मान कर चुप नहीं बैठती हैं. सजा देने के लिए वे कानून पर भरोसा करती हैं या नहीं करती, यह ऐसी दर्जनों वारदात से साफ है कि नहीं करतीं, क्योंकि अदालतें धोखे को धोखा ही कई बार नहीं मानतीं, उलटे फैसले में यह कह देती हैं कि दोनों बालिग थे और रजामंदी से सैक्स संबंध बने थे, इसलिए कोई मामला ही नहीं बनता.
बात एक हद तक सही भी है, लेकिन इन औरतों की नजर और नजरिए से देखें, तो उन्होंने मर्द का सब से अहम और नाजुक अंग काट कर धोखे का बदला ही लिया है और ज्यादातर मामलों में वे तय कर चुकी थीं कि इस से बेहतर सबक और सजा कोई हो नहीं सकती कि मर्द जिंदगीभर सैक्स सुख के लिए तरसता रहे और जब भी तरसे तो उन्हें याद जरूर करे.


कोई दर्जनभर मामले प्राइवेट पार्ट काटने के देखें, तो सम? आता है कि तकरीबन सभी में मर्द या तो बिना कपड़ों के था या फिर सिर्फ अंडरवियर में था, जिस से पत्नी या माशूका को ज्यादा मशक्कत नहीं करना पड़ी और उस ने सहूलियत से अपनी मंशा को अंजाम दे दिया. अब वह दौर गया कि माशूका या पत्नी अपनी किस्मत को कोसते हुए खामोश रह जाती थीं. जब से लड़कियां कमानेखाने बाहर निकली हैं या नौकरियां करने लगी हैं, तब से इस तरह के जुर्म और बढ़े हैं. मर्द औरत के हाथों पिट भी खूब रहे हैं और उन की हत्याएं भी माशूका या पत्नी कर रही हैं. पर हत्या जैसे संगीन अपराध के लिए आमतौर पर औरतों को दूसरे मर्द का साथ या सहारा चाहिए रहता है. प्राइवेट पार्ट काटने में यह जरूरी नहीं रह जाता, क्योंकि मर्द पूरे भरोसे के साथ उन के सामने हथियार डाल चुका होता है और उसे सपने में भी यह अंदाजा नहीं रहता कि थोड़ी देर पहले जो पत्नी या माशूका बिस्तर में उस के साथ तरहतरह से मजे लूट और लुटा रही थी, उस के दिमाग में कितना खतरनाक प्लान पनप रहा है.

तकरीबन सभी मामलों में औरतों ने सैक्स का लुत्फ लेने और देने के बाद ही मर्द को हमेशा के लिए मजे से महरूम किया. ऐसा ही एक मामला बीती 7 जनवरी को सोनीपत से सामने आया था, जिस में सरिता नाम की एक औरत ने अपने पति रामकिशन की हत्या प्राइवेट पार्ट दबा कर कर दी थी. रामकिशन एक मैरिज गार्डन में केयरटेकर की नौकरी करता था और गांजा पीने की लत का शिकार था. यहां तक तो सरिता बरदाश्त करती रही, लेकिन परेशान उस वक्त हो उठती जब पोर्न फिल्में देखने का भी आदी हो गया रामकिशन जबरन उसे भी पोर्न फिल्में दिखाता था और उन्हीं के मुताबिक जिस्मानी ताल्लुक बनाने के लिए मजबूर करने लगता था. इसी बात के चलते सरिता तंग चुकी थी, इसलिए उस ने सतपाल नाम के एक नौजवान की मदद से रामकिशन की हत्या कर दी.                     


अमेरिका से आया घातक चलन
भारत में मर्दों के प्राइवेट पार्ट काटने का जुर्म अब फैशन की शक्ल में पसर रहा है, लेकिन यह बहुत पुराना नहीं है. पिछले 5 सालों में ऐसी वारदात बढ़ी हैं. इन की छानबीन बताती है कि शायद पहली एफआईआर साल 2017 में केरल के तिरुअनंतपुरम में दर्ज हुई थी, जिस पर देशभर का ध्यान गया था. 23 साला कानून की एक छात्रा ने एक धर्मगुरु हरि स्वामी का प्राइवेट पार्ट काट डाला था और खुद ही पुलिस को खबर की थी. हरि स्वामी छात्रा के बीमार पिता को तंत्रमंत्र और ?ाड़फूंक के जरीए ठीक करने के बहाने घर में आताजाता था. इसी दौरान उस ने छात्रा का यौन शोषण करना शुरू कर दिया था, जो कोई 3 साल तक चला. इस से छात्रा तंग गई और उस ने रहेगा बांस और बजेगी बांसुरी की तर्ज पर हरि स्वामी का प्राइवेट पार्ट ही काट डाला. हालांकि, इस से पहला ऐसा कभी नहीं हुआ था या नहीं हुआ होगा, यह गारंटी से नहीं कहा जा सकता. मुमकिन यह है कि कोई रिपोर्ट ही दर्ज हुई हो या फिर लोकलाज के चलते मामलों ने तूल पकड़ा हो. अब मामले जानबू? कर तूल दिए जाते हैं, ताकि औरतों को बदनाम किया जा सके और उन की इमेज बिगाड़ी जा सके.


यहां मकसद कतई अपराधी औरतों या किसी भी किस्म के अपराध की वकालत करना नहीं है, लेकिन इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब कोई औरत किसी अपराध को अंजाम देती है, तो मीडिया उसे बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है. पेश क्या करता है, अपनी दुकान चलाने के लिए सुर्खियां लगा कर बेचता है. यह उस की मजबूरी भी दिखती है, क्योंकि प्राइवेट पार्ट काटे जाने पर मीडिया में ही प्रचलित यह कहावत काम करती है कि कुत्ता आदमी को काटे तो कोई खास खबर नहीं बनती, लेकिन कोई आदमी अगर कुत्ते को काट ले, तो जरूर खबर खास हो जाती है. दुनियाभर की बात करें तो पहला चर्चित मामला अमेरिका के वर्जिनिया राज्य से  साल 1993 के जून महीने में सामने आया था. 24 साला बेहद खूबसूरत लारेना बाबिट की शादी 26 साला जौन बेन बाबिट से साल 1989 में हुई थी. 23 जून, 1993 को लारेना ने जौन का प्राइवेट पार्ट काट डाला था, क्योंकि घटना की शाम जौन जबरदस्ती सैक्स पर उतारू हो आया था, जबकि लारेना की रत्तीभर इच्छा भी उस वक्त सैक्स की नहीं थी. यह सौ फीसदी रेप करने जैसा था, क्योंकि जितना लारेना मना करती जा रही थी, उतना ही जौन उस पर हावी हुआ जा रहा था.


यह मुकदमा दुनियाभर में चर्चित रहा था. अदालत में लारेना ने बयान दिया था कि रेप करने के बाद जौन जब सो गया तो वह बिस्तर से उठी, किचन में जा कर पानी पिया जहां उसे प्लेटफार्म पर रखा चाकू दिख गया और जिसे हाथ में ले कर वह वापस बैडरूम में आई और सोते हुए जौन का प्राइवेट पार्ट काट डाला.
लारेना यहीं नहीं रुकी, बल्कि उस ने कटा हुआ प्राइवेट पार्ट उठाया और अपनी कार में बैठ कर चली गई और काफी देर तक वह सड़कों पर बेमकसद घूमती रही. लेकिन उसे कार चलाने में दिक्कत हो रही थी, क्योंकि एक हाथ में उस ने कटा हुआ प्राइवेट पार्ट थामा हुआ था, जिसे कुछ देर बाद एक खेत में फेंक दिया. कुछ देर सोचने के बाद उस ने ही पुलिस को फोन कर सारी बात बता दी. पुलिस ने लारेना को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन मुकदमे की कार्रवाई के दौरान जो कई बातें उजागर हुईं उन से जौन का असल चेहरा सामने आया कि वह अव्वल दर्जे का लंपट था और जिस के कई और लड़कियों से भी अफेयर थे. असलियत लारेना की भी सामने आई कि उस ने एक पागलपन के तहत प्राइवेट पार्ट काटा था, इसलिए उसे 45 दिन की मामूली सजा के बाद वहां के कानून के तहत बरी कर दिया गया.


यह कहानी बहुत लंबी और दिलचस्प है. जौन को इस मामले और मुकदमे से शोहरत तो मिली ही साथ ही डाक्टरों ने आपरेशन कर उस का प्राइवेट पार्ट जोड़ दिया, जो पुलिस ने लारेना की निशानदेही पर बरामद किया था. इस से भी ज्यादा हैरत की बात यह कि वह पहले की तरह काम भी करने लगा. इतना काम करने लगा कि जौन ने 2 पोर्न फिल्मो में काम भी किया और कुछ टीवी शो में भी वह दिखा.
इस मामले को दुनियाभर के मीडिया ने कवरेज दिया था, क्योंकि बात वही आदमी द्वारा कुत्ते को काटे जाने की खबर जैसी थी.       

Hindi Story: 3 मौत और कोरियन चक्रव्यूह

Hindi Story: फरवरी महीना आते ही दिल्ली की सर्दी पर वैलेंटाइन डे की गरमी चढ़ने लगी थी. इस बार विजय और अनामिका ने सूरजकुंड मेला देखने का प्लान बनाया था. पर अचानक से अनामिका ने अपना मोबाइल फोन औफ कर दिया था. पहले तो विजय को लगा कि कोई खास वजह होगी, पर जब 2 दिन हो गए तो उसे थोड़ी चिंता हुई.


‘‘मम्मी, अनामिका मेरा फोन नहीं उठा रही है. क्या उस ने आप से कुछ कहा था?’’ विजय ने अपनी मम्मी
से पूछा. ‘‘नहीं तो. क्या हुआ?’’ मम्मी ने रसोई में सब्जी छोंकते हुए कहा. ‘‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. वह अगर अपने घर मम्मीपापा से भी मिलने जाती है तो मु? बता देती है. फोन तो वह कभी औफ करती नहीं है,’’ विजय ने चिंता जताई.
‘‘तुम उस के घर क्यों नहीं चले जाते?’’ पापा ने विजय से कहा.
‘‘लेकिन पापा, मु? तो एक हफ्ते के लिए दिल्ली से बाहर जाना है. आज
1 तारीख है, मैं 7 तारीख तक वापस जाऊंगा,’’ विजय ने कहा.
‘‘पर तुम्हें एक बार उस का हालचाल ले लेना चाहिए,’’ मम्मी ने कहा.
‘‘मैं उसे फोन कर लूंगा,’’ विजय ने कहा और जयपुर चला गया.
विजय ने वहां से अनामिका को कई बार फोन किया, पर उस से बात
हो पाई. जैसे ही वह 7 तारीख को दिल्ली वापस आया तो सीधा अनामिका के घर गया.
घर पर कोई नहीं था, पर दरवाजे पर ताला भी नहीं लगा था. विजय ने कई बार डोरबैल बजाई, पर कोई दरवाजे पर नहीं आया.


लेकिन विजय का मन नहीं मान रहा था. उसे महसूस हो रहा था कि अनामिका घर पर ही है और उस के साथ कुछ सही नहीं हुआ है. वह एक खिड़की के रास्ते उस के घर में घुसने की कोशिश कर रहा था. बड़ी मुश्किल से वह घर में दाखिल हुआ. भीतर अंधेरा था. अनामिका के बैडरूम का दरवाजा भी बंद था. विजय ने खटखटाया, तो काफी देर के बाद अनामिका ने दरवाजा खोला, पर विजय को देखते है उस ने दरवाजा बंद करने की कोशिश की. विजय ने धक्का दे कर दरवाजा खोला और गुस्से में अनामिका से पूछा, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें? तुम मेरे फोन का जवाब क्यों नहीं दे रही?’’


‘‘तुम से मतलबमु? अकेला छोड़ दो. मैं कुछ दिन किसी से बात नहीं करना चाहती,’’ अनामिका बोली.
‘‘पर तुम ऐसा क्यों कर रही हो? हुआ क्या है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘मु? कुछ नहीं हुआ है, बस मु? अकेले रहना है,’’ अनामिका बोली. ‘‘सब करो अपनी मरजी. मैं भी अपनी मरजी करता हूं और इस बालकनी से छलांग लगा देता हूं,’’ कह कर विजय अनामिका की बालकनी की रेलिंग पर चढ़ने लगा.
यह सुन कर अनामिका डर गई. उस ने विजय को कस कर पकड़ लिया और बोली, ‘‘तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते होआज के बाद कभी ऐसा मत करना.’’
‘‘क्यों नहीं कर सकता ऐसागाजियाबाद में भी तो 3 लड़कियों ने खुदकुशी कर ली. सब जगह यही तो
हो रहा है. जरा सा मन उदास हुआ नहीं कि दे दो अपनी जान,’’ विजय झल्ला कर बोला.
‘‘गाजियाबाद में क्या हुआ है?


तुम वहां की क्यों बात कर रहे हो?’’ अनामिका ने हैरान हो कर पूछा.
विजय थोड़ा रुक गया. उस के चेहरे पर अभी भी परेशानी के भाव थे. एक ठंडी सांस ले कर उस ने बताया, ‘‘गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में चेतन अपनी 2 पत्नियों और 5 बच्चों के साथ रहते थे. 4 फरवरी, 2026 की रात को उन की 15 साल की बड़ी बेटी निशिका, 14 साल की मं?ाली बेटी प्राची और 11 साल की छोटी बेटी पाखी ने अपने अपार्टमैंट की 9वीं मंजिल से कूद कर खुदकुशी कर ली थी.’’
‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ. कहीं
यह किसी की साजिश तो नहीं थी?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘खबरों के मुताबिक, ट्रांस हिंडन जोन के डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि पुलिस ने मौके की जगह पर सीन रिक्रिएट कर के यह परखा था कि कहीं बच्चियों को जबरन धक्का देने या नीचे फेंके जाने की संभावना तो नहीं थी.


‘‘जांच में सामने आया कि जिस स्लाइडिंग खिड़की से कूदने की बात सामने आई, वहां से एक समय में केवल एक शख्स ही बाहर निकल सकता था. इस से यह साफ हुआ कि तीनों बहनों ने बारीबारी से छलांग लगाई. हालांकि, यह साफ नहीं हो सका था कि सब से पहले किस बहन ने छलांग लगाई थी.’’
‘‘यह तो बहुत ही दर्दनाक हादसा है. पुलिस ने और क्या बताया?’’ अनामिका ने चिंता जताई.
‘‘डीसीपी निमिष पाटिल ने आगे बताया कि कमरे के अंदर संघर्ष या जबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले थे. कमरा अंदर से बंद था, जिसे पुलिस को तोड़ कर खोलना पड़ा. खिड़की के शीशे और पूजा घर से फिंगरप्रिंट लिए गए, जिन्हें फोरैंसिक जांच के लिए भेजा गया.


‘‘पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि कमरा काफी सलीके से सजाया गया था. फर्श पर परिवार के साथ लड़कियों की तसवीरें सजा कर रखी गई थीं. कमरे से एक डायरी और मोबाइल फोन अलग रखे हुए मिले थे. खिड़की तक पहुंचने के लिए प्लास्टिक के स्टूल का इस्तेमाल किया गया था.’’
‘‘उस डायरी में क्या लिखा था?’’ अनामिका ने जानना चाहा.
‘‘पुलिस के मुताबिक, डायरी में मिले सुसाइड नोट से लड़कियों के मानसिक तनाव की ?ालक मिली थी. नोट में लिखा था, ‘मार खाने से बेहतर मर जाना है’. डायरी में शादी को ले कर डर और तनाव का भी जिक्र था.


‘‘पुलिस का कहना था कि पिता द्वारा मोबाइल फोन छीने जाने और कोरियन ड्रामा देखने को ले कर हुए विवाद ने भी बच्चियों को गहरे मानसिक दबाव में डाल दिया था.’’
‘‘यह कोरियन ड्रामा क्या बला है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘मैं ने बीबीसी की रिपोर्ट में पढ़ा था, जिस में डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया था कि इस मामले की शुरुआती जांच में यह सम? आया कि फोन और कोरियाई संस्कृति के प्रति लड़कियों का जुनून इस घटना की मेन वजह हो सकती है.’’


‘‘कोरियाई संस्कृति का मतलब?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘पुलिस के मुताबिक वे तीनों लड़कियां कोरियाई संगीत, ड्रामा, हस्तियों, जापानी फिल्मों औरडोरेमोनके अलावाशिन चैनजैसे कार्टूनों
के साथसाथ औनलाइन गेम्स की
शौकीन थीं.
‘‘साथ ही वे कोरियाई कल्चर से इस हद तक प्रभावित थीं कि उन्होंने अपने नाम भी बदल लिए थे. लेकिनब्लू व्हेलजैसे टास्क देने से जुड़े गेम को
इस घटना की एकमात्र या मेन वजह नहीं माना जा सकता.


‘‘पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में बताया गया कि तीनों बच्चियों की मौत शरीर से ज्यादा खून निकलने और चोट से हुई. ऊंचाई से गिरने के चलते कई हड्डियां टूटी हुई थीं. ‘‘डीसीपी निमिष पाटिल ने आगे कहा कि सुसाइड नोट में एक लाइन मारपीट की थी, लेकिन पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में ऐसी कोई चोट नहीं मिली है. यह परिवार पैसे की तंगी की मार ?ोल रहा था और घर में मची कलह ने भी चीजें मुश्किल बना दी थीं.
‘‘कोविड के बाद परिवार को पैसे का भारी नुकसान उठाना पड़ा और
काफी कर्ज में गया. कुछ साल
पहले लड़कियों को परिवार ने स्कूल से निकाल लिया था.


‘‘परिवार में ?ागड़े भी होते थे. पिता बेटियों को ले कर बहुत कड़ाई बरतते थे. शुरू में इन बच्चियों के पास 2 मोबाइल थे, जिसे वे सा? करती थीं. लेकिन पैसे के दबाव के चलते पिता ने 6 महीने पहले एक मोबाइल को बेच दिया. फिर दूसरा मोबाइल घटना के 10-15 दिन पहले बेच दिया था.’’
‘‘क्या इस परिवार को पैसे की तंगी थी? इस मामले में आसपास के लोग क्या बोल रहे हैं?’’ अनामिका ने पूछा.


‘‘जब पैसे की तंगी के बारे में इन मारी गई लड़कियों के पिता चेतन कुमार से पत्रकारों ने सवाल पूछा, तो उन का कहना था, ‘‘मु? 20-30 लाख रुपए का नुकसान जरूर हुआ था, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि बच्चे खुदकुशी जैसा कदम उठा लें. बच्चों ने अपने नाम तक बदल लिए थे.
‘‘पुलिस ने बताया कि चेतन कुमार की 2 पत्नियां हैं, जो आपस में सगी बहनें हैं. घर में उन के साथ उन की एक साली भी रहती हैं. अपनी दोनों पत्नियों से उन के कुल 5 बच्चे हैं.
‘‘चेतन पेशे से स्टौक ब्रोकर हैं. उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि उन की बेटियां कहती थीं कि पापा हम कोरिया जाएंगी. उन्हें भारतीय नामों से चिढ़ होने लगी थी.


‘‘बीबीसी ने स्थानीय लोगों से इस घटना के बारे में बात की तो सोसाइटी में इन बच्चियों के घर से ठीक 2 फ्लोर नीचे रहने वाले आरके सिंघानिया की उस रात नींद एक धमाके की आवाज से टूटी. ‘‘आवाज सुनने के बाद सोसाइटी के लोग घर से बाहर आने लगे और देखा कि जमीन पर 3 बच्चियों के शव थे, जिस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. ‘‘सोसाइटी के सचिव राहुल कुमार ? ने बीबीसी न्यूज हिंदी को बताया कि जब मैं प्राइमरी एविडैंस के तौर पर ऊपर गया, तो वह कमरा अंदर से बंद था. इसी कमरे से बच्चियों के कूदने की बात कही जा रही है. पुलिस ने उस दरवाजे को तोड़ा. अंदर फैमिली की तसवीरें पूरे फर्श पर बिखरी हुई थीं और कमरे में एक सुसाइड नोट भी मिला, जिस मेंसौरी पापालिखा हुआ था.’’
‘‘यह तो बहुत उल? हुआ मामला है. वहां तो दहशत का माहौल बन गया होगा?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस घटना के बाद बच्चों के बीच फोन एडिक्शन को ले कर फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं. उस सोसाइटी की रहने वाली कुसुम ने मीडिया को बताया कि हमारे बच्चे रात को सो नहीं पा रहे हैं. वे इतने डरे हुए हैं. मैं मानती हूं कि कम से कम मांबाप को पता होना चाहिए कि बच्चे फोन में क्या चला रहे हैं.


‘‘वैसे, डीसीपी निमिष पाटिल ने इस मामले में बताया कि बच्चियों के सुसाइड नोट में गेमिंग ऐप्स का भी जिक्र था, जो उन की दिमागी सेहत पर नैगेटिव असर डाल रहे थे.’’
‘‘कौन से गेमिंग ऐप्स?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘बताया जा रहा है कि ये गेम्सपौपी प्लेटाइम’, ‘ बेबी इन यैलो’, ‘ईविल नन’, ‘आइसक्रीम मैनहैं.’’
‘‘इन गेम्स में क्या है?’’ अनामिका ने हैरान हो कर पूछा.
‘‘पौपी प्लेटाइम एक डरावने माहौल का खेल है, जो बच्चों को एक सुनसान खिलौना फैक्टरी में ले जाता है, जहां अजीबोगरीब गुडि़या, अंधेरे कोने और अचानक डराने वाले सीन मौजूद होते हैं.
‘‘इस का किरदारहगी वगीभले ही टीनएजर्स को ध्यान में रख कर बनाया गया हो लेकिन माहिर मानते हैं कि यह कंटैंट बड़े बच्चों के लिए भी मानसिक रूप से भारी पड़ सकता है.
‘‘ बेबी इन यैलो नाम का यह गेम जितना मासूम लगता है, असल में उतना ही खौफनाक है. इस में खिलाड़ी एक ऐसे बच्चे की देखभाल करता है जिस के साथ धीरेधीरे अलौकिक घटनाएं जुड़ती जाती हैं.
‘‘मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की देखभाल जैसे सामान्य विषय को हौरर से जोड़ना छोटे बच्चों के लिए भरम और डर पैदा कर सकता है.


‘‘ईवल नन गेम में खिलाड़ी को एक डरावने स्कूल में बंद कर दिया जाता है, जहां से एक खतरनाक नन से बच कर निकलना होता है, जबकि आइस स्क्रीम गेम में एक आइसक्रीम बेचने वाले विलेन की कहानी है, जो बच्चों का अपहरण करता है. भले ही इन गेम्स का ग्राफिक्स कार्टून जैसा हो लेकिन इन
के विषय डर, कैद और अपहरण संवेदनशील बच्चों में चिंता और डर को बढ़ा सकते हैं.’’
‘‘सरकार इस बारे में क्या कर रही है?’’ अनामिका ने पूछा.


‘‘पुलिस ने उत्तर प्रदेश सरकार से सिफारिश की है कि इन गेम्स पर तुरंत बैन लगाया जाए, साथ ही यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भी भेजा जाएगा. ‘‘घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबीता सिंह चौहान ने पीडि़त परिवार से मुलाकात की. उन्होंने जिलाधिकारियों को निर्देश देने की बात कही है कि स्कूलों को जमात 5 तक के बच्चों को मोबाइल फोन पर प्रोजैक्ट या असाइनमैंट भेजने से रोका जाए, ताकि बच्चों की मोबाइल लत को कम किया जा सके.’’ ‘‘कह तो तुम सही रहे हो. बच्चे क्या हम बड़े भी मोबाइल के फेर में फंसे हुए हैं. अगर थोड़ी देर के लिए भी मोबाइल देखें तो ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है. हम लोग किताबों और पत्रिकाओं से दूर हो रहे हैं, जबकि उन्हें पढ़ने की आदत हमें डालनी होगी


‘‘सरकार को ऐसे गेम्स पर लगाम लगानी चाहिए, जो बच्चों को हिंसक बना रहे हैं, टास्क क्लियर करने के
नाम पर उन्हें बरगलाया जा रहा है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी. ‘‘और तुम ने भी मु? डरा दिया था. कोई इस तरह दुनिया से कटता है क्या, जो तुम पिछले इतने दिन से गायब सी हो गई थी,’’ विजय ने कहा.
‘‘सौरी विजय, हो सके तो मु? माफ कर देना. मेरी हरकत वाकई बचकाना थी. मैं आगे से ध्यान रखूंगी,’’ अनामिका ने इतना कहा और विजय के गले से लग गई.   Hindi Story                 
    

Hindi Story: इश्कबाज को सबक-क्या मोड़ लाई वर्तिका और गजाला की दोस्ती

Hindi Story: ग्रेजुएशन करने के बाद वर्तिका बैंक में प्रोबेशनरी अफसर बनने की तैयारी में लगी हुई थी. इस के लिए उस ने एक जानेमाने कोचिंग सैंटर में दाखिला ले लिया था. वहीं उस की मुलाकात गजाला से हुई थी. वह भी उसी कोचिंग सैंटर में प्रोबेशनरी अफसर की तैयारी कर रही थी. जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई थी.

एक दिन गजाला ने वर्तिका को अपने भाई के दोस्त विक्रम से मिलवाया, ‘‘वर्तिका, इन से मिलो. ये हैं मेरे भाई के दोस्त विक्रम. काफी हैंडसम हैं न… क्यों?’’ यह कह कर गजाला मुसकराई.

‘‘अरे, हम हैंडसम हैं, तो क्या आप की सहेली कम खूबसूरत हैं? हमें तो आप की सहेली किसी ‘ब्यूटी क्वीन’ से कम नहीं लगतीं,’’ विक्रम ने वर्तिका की खूबसूरती की तारीफ करते हुए कहा.

पहली मुलाकात में ही अपनी खूबसूरती की ऐसी तारीफ सुन कर वर्तिका झोंप गई. विक्रम अब हर रोज ही वर्तिका और गजाला से कोचिंग के बाद मिलने लगा.

एक दिन गजाला जानबूझ कर कोचिंग सैंटर नहीं आई. कोचिंग के छूटने के बाद विक्रम वर्तिका को रास्तेमें मिला.

वर्तिका उस से बचना चाहती थी, फिर भी उस ने वर्तिका का रास्ता रोकते हुए कहा, ‘‘वर्तिकाजी, आज गजाला नहीं आई क्या?’’

‘‘नहीं, वे तो आज नहीं आईं.’’

‘‘तो क्या आज आप हम से बात भी नहीं करेंगी? क्या हम इतने बुरे हैं?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. आप तो काफी हैंडसम हैं.’’

आखिरी शब्द वर्तिका के मुंह से अचानक ही निकल पड़े थे. अब तो विक्रम पर जैसे हैंडसम होने का नशा ही चढ़ गया, जबकि वर्तिका सोचने लगी कि उस की जीभ कैसे फिसल गई.

मौके का फायदा उठाते हुए विक्रम ने कहा, ‘‘वर्तिकाजी, मेरा दिल तो कहता है कि आप इस जहां की सब से हसीन लड़की हो. मेरा दिल तो आप से दोस्ती करने को चाहता है,’’ इतना कह कर वह मोटरसाइकिल स्टार्ट कर वहां से चला गया.

विक्रम के जाने के बाद वर्तिका सोचने लगी, ‘विक्रम हैंडसम है. वह मुझ से दोस्ती भी करना चाहता है. अगर उस से दोस्ती कर ली जाए, तो इस में हर्ज ही क्या है?’

अगले दिन वर्तिका ने बातोंबातों में गजाला से लड़कों से दोस्ती करने की बात कही. गजाला समझ गई कि वर्तिका के मन में क्या चल रहा है. उस ने वर्तिका की बातों पर रजामंदी

का ठप्पा लगाते हुए कहा, ‘‘वर्तिका, लड़कों से दोस्ती करने में आखिर बुराई ही क्या है?’’

फिर गजाला ने वर्तिका के चेहरे को पढ़ते हुए कहा, ‘‘लेकिन वर्तिका, तू यह सब क्यों पूछ रही है? कहीं तेरा मन भी किसी लड़के से दोस्ती करने को तो नहीं चाह रहा है? कहे तो विक्रम से तेरी दोस्ती करा दूं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है.’’

‘‘अरे झठी, तेरे चेहरे की मुसकराहट बता रही है कि तेरे मन में विक्रम को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’

‘‘चल हट, मैं तुझ से बात नहीं करती,’’ वर्तिका ने वहां से चलते हुए कहा.

अब गजाला सब समझ गई थी. उस ने विक्रम और वर्तिका की आपस में दोस्ती करा दी. फिर उन्होंने एकदूसरे से मोबाइल फोन नंबर भी ले लिए.

वर्तिका विक्रम के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उस ने विक्रम के बारे में कोई जानकारी जुटाना भी ठीक नहीं समझ.

इस के बाद वर्तिका और विक्रम एकदूसरे को प्यार भरे एसएमएस भेजने लगे. गजाला इश्क की इस आग में घी डालने का काम कर रही थी.

वर्तिका के जन्मदिन पर विक्रम ने उसे एक महंगा मोबाइल फोन गिफ्ट में दिया. जब विक्रम का जन्मदिन आया, तो वर्तिका ने उसे एक महंगी टीशर्ट गिफ्ट में दी.

विक्रम ने एक दिन मौका देख कर वर्तिका से डेटिंग पर चलने को कहा. वर्तिका तो जैसे तैयार ही बैठी थी. उस ने तुरंत हामी भर दी.

अगले दिन वर्तिका सहेली से मिलने का बहाना बना कर विक्रम के साथ डेटिंग पर चली गई.

विक्रम वर्तिका को मोटरसाइकिल पर बैठा कर शहर से दूर झल के किनारे पिकनिक स्पौट पर ले गया.

अभी वर्तिका और विक्रम एक पेड़ की छांव में बैठे ही थे कि तभी विक्रम का मोबाइल फोन बज उठा, लेकिन उस ने फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद फिर उस का मोबाइल फोन बज उठा.

वह वहां से उठ कर जाना चाहता था, लेकिन वर्तिका ने रोक लिया. अब विक्रम की मजबूरी हो गई थी कि वहीं पर फोन सुने.

उस ने जल्दबाजी में झठ बोला, ‘‘हैलो, मैं मोटरसाइकिल चला रहा हूं. बाद में बात करूंगा,’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया.

वर्तिका समझ गई थी कि यह किसी लड़की का फोन था. इसी वजह से विक्रम उस के सामने मोबाइल फोन पर बातें करने से बच रहा था. बस, यहीं से उस के मन में विक्रम के प्रति शक पैदा हो गया.

बातों ही बातों में उस ने असलियत जानने की एक तरकीब सोच ली. उसे कुछ दूरी पर एक आइसक्रीम वाला दिखाई दिया. उस ने विक्रम से कहा, ‘‘मेरा मन तो आइसक्रीम खाने को कर रहा है.’’

‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है. मैं अभी अपने और तुम्हारे लिए आइसक्रीम ले कर आता हूं.’’

इतना कह कर विक्रम जल्दी से वहां से उठा, पर उसे अपना मोबाइल फोन का ध्यान ही नहीं रहा.

जैसे ही विक्रम वहां से गया, वर्तिका ने उस का मोबाइल फोन खंगालना शुरू कर दिया. उस ने जल्दी से दीपा, कंगना और रूबीना के फोन नंबर ले लिए.

अब वर्तिका को पूरा यकीन हो गया था कि दाल में जरूर कुछ काला है. विक्रम के आने पर सिरदर्द का बहाना बना कर वापस चलने को कहा.

विक्रम अभी घर नहीं जाना चाहता था, लेकिन वह वर्तिका को नाराज भी नहीं करना चाहता था. लिहाजा, वह बुझे मन से घर चलने को तैयार हुआ.

अब वर्तिका ने दीपा, कंगना और रूबीना से मिल कर उन से दोस्ती कर ली. लेकिन विक्रम के बारे में उस ने किसी से कोई जिक्र नहीं किया.

एक दिन दीपा ने खुश हो कर वर्तिका को बताया कि अगले दिन वह अपने बौयफ्रैंड के साथ डेटिंग पर जा रही है. वर्तिका तुरंत समझ गई कि वह किस के साथ डेटिंग पर जा रही है.

तब वर्तिका ने दीपा और विक्रम की डेटिंग कन्फर्म करने के लिए विक्रम को फोन लगाया. उस ने विक्रम से डेटिंग पर चलने को कहा, लेकिन उस ने एक जरूरी काम बता कर टाल दिया.

अगले दिन वर्तिका ने विक्रम का पीछा करना शुरू किया. विक्रम मोटरसाइकिल पर था, जबकि वर्तिका अपनी स्कूटी पर. वह जानती थी कि विक्रम दीपा को डेटिंग के लिए झल पर ही ले जाएगा, क्योंकि प्रेमी जोड़ों की डेटिंग के लिए इस से बढि़या जगह कोई दूसरी न थी.

विक्रम दीपा को लेकर झल की ओर चल पड़ा. जब झल पर पहुंच कर दीपा और विक्रम मटरगश्ती करने लगे, तभी दीपा ने वहां पहुंच कर चुपके से अपने मोबाइल फोन में लगे कैमरे से उन की वीडियो फिल्म बना ली और घर चली आई.

वर्तिका ने ऐसी ही वीडियो फिल्में कंगना और रूबीना के साथ भी इश्कबाज विक्रम की बना डालीं.

एक दिन वर्तिका ने दीपा, कंगना और रूबीना को अपने घर बुलाया, फिर उस ने उन वीडियो फिल्मों को कंप्यूटर में डाउनलोड कर के उन तीनों को दिखलाया.

अब विक्रम की इश्कबाजी का कच्चा चिट्ठा खुल चुका था. अब चारों ने विक्रम को सबक सिखाने की ठानी. साथ ही, उन्होंने फैसला किया कि लड़कियों को पे्रमजाल में फंसाने वाली गजाला का भी दिमाग ठिकाने लगाना चाहिए.

वर्तिका ने अपने मम्मीपापा से सब बातें साफसाफ बता दीं और उन से अपनी गलती की माफी भी मांग ली.

पहले वर्तिका के मम्मीपापा उस की बात पर राजी नहीं हुए, लेकिन जब उस ने उन्हें अपनी योजना समझ , तो वे भी ऐसे मक्कार इश्कबाजों को सबक सिखाने के लिए तैयार हो गए.

तब योजना के मुताबिक, वर्तिका ने एक दिन विक्रम और गजाला को अपने घर बुलाया और उन्हें अपने कमरे में ले गई. वहां उस ने उन्हें कंप्यूटर पर दीपा, कंगना और रूबीना वाली वीडियो फिल्में दिखाईं. विक्रम और गजाला की काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई.

वे चुपचाप वहां से खिसकना चाहते थे, लेकिन वर्तिका उन्हें ऐसे कैसे जाने देती. उस ने 3 तालियां बजाईं, जिन्हें सुन कर पास के कमरे में छिपी बैठी दीपा, कंगना और रूबीना भी वहां आ गईं.

कंगना ने विक्रम से पूछा, ‘‘कहिए मियां मजनू, क्या हाल है? और कितनी लड़कियां चाहिए तुम्हें इश्क फरमाने के लिए?’’

विक्रम ने अचानक चाकू निकाल लिया और कंगना की गरदन पर रखते हुए बोला, ‘‘तुम सब कमरे के एक कोने में जाओ, नहीं तो चाकू से कंगना की गरदन हलाल कर दूंगा.’’

इस के बाद गजाला ने वर्तिका, दीपा और रूबीना के मोबाइल फोन अपने कब्जे में कर लिए और विक्रम के कहने पर गजाला ने उन के मुंह व हाथपैरों को कस कर बांधने के बाद सब को बाथरूम में बंद कर दिया.

विक्रम और गजाला घर से निकल कर बाहर की ओर भागे, लेकिन सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े. सामने दरवाजे पर इंस्पैक्टर शोभित रिवाल्वर ताने खड़ा था. उस के ‘हैंड्सअप’ कहते ही विक्रम और गजाला ने अपने हाथ ऊपर कर लिए.

तब इंस्पैक्टर शोभित ने अपने साथ आए पुलिस वालों को आदेश देते हुए कहा, ‘‘रामदीन, इस लड़के की तलाशी लो. और अर्चना, तुम इस लड़की की तलाशी लो.’’

पुलिस को देख कर विक्रम और गजाला चौंक गए. उन की हैरानी को दूर करते हुए इंस्पैक्टर शोभित ने कहा, ‘‘तुम दोनों को जरा भी हैरान होने की जरूरत नहीं है. तुम दोनों जब से इस घर में घुसे हो, तभी से हमारी गिरफ्त में हो.

‘‘वर्तिका के मम्मीपापा के साथ हम यहां पहले से ही मौजूद थे. हम सामने वाले पड़ोसी के घर में छिपे थे.

‘‘हम जानते थे कि तुम जैसे मक्कार लोग कोई न कोई गुस्ताखी जरूर करते हैं, इसलिए घर में घुसने से ले कर बाहर आने तक की तुम्हारी वीडियोग्राफी हम ने तैयार करा ली.

‘‘पड़ोसी की छत से आ कर हमारे फोटोग्राफर ने सारा काम बखूबी अंजाम दिया. अब यह वीडियोग्राफी तुम दोनों को अदालत में सजा दिलवाने में बड़ी काम आएगी.’’

यह सुन कर गजाला और विक्रम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वे इंस्पैक्टर शोभित के सामने गिड़गिड़ाने लगे, लेकिन इंस्पैक्टर शोभित ने कानून के अनुसार अपना काम किया.

बाथरूम में बंद वर्तिका, दीपा, कंगना व रूबीना के हाथपैरों और मुंह को खोला गया और उन के बयान लिए गए.

वर्तिका की बढि़या योजना और हिम्मत पर शाबाशी देते हुए इंस्पैक्टर शोभित ने कहा, ‘‘अगर हमारे देश की सारी लड़कियां वर्तिका की तरह हिम्मत और होशियारी से काम लें, तो वे ऐसे मक्कार इश्कबाजों से धोखा खाने से बच जाएं.’’

इस के बाद इंस्पैक्टर शोभित गजाला और विक्रम को जीप में बैठा कर अपने साथ आगे की कार्यवाही के लिए थाने ले गया. Hindi Story

Hindi Story: विकराल शून्य : निशा की कौनसी बीमारी से बेखबर था सोम?

Hindi Story: ‘‘कैसी विडंबना है, हम पराए लोगों को तो धन्यवाद कहते हैं लेकिन उन को नहीं, जो करीब होते हैं, मांबाप, भाईबहन, पत्नी या पति,’’ अजय ने कहा.

‘‘उस की जरूरत भी क्या है? अपनों में इन औपचारिक शब्दों का क्या मतलब? अपनों में धन्यवाद की तलवार अपनत्व को काटती है, पराया बना देती है,’’ मैं ने अजय को जवाब दिया.

‘‘यहीं तो हम भूल कर जाते हैं, सोम. अपनों के बीच भी एक बारीक सी रेखा होती है, जिस के पार नहीं जाना चाहिए, न किसी को आने देना चाहिए. माना अपना इनसान जो भी हमारे लिए करता है वह हमारे अधिकार या उस के कर्तव्य की श्रेणी में आता है, फिर भी उस ने किया तो है न. जो मांबाप ने कर दिया उसी को अगर वे न करते या न कर पाते तो सोचो हमारा क्या होता?’’ अजय बोला.

अजय की गहरी बातें वास्तव में अपने में बहुत कुछ समाए रखती हैं. जब भी उस के पास बैठता हूं, बहुत कुछ नया ही सीख कर जाता हूं.

बड़े गौर से मैं अजय की बातें सुनता था जो अजय कहता था, गलत या फिजूल उस में तो कुछ भी नहीं होता था. सत्य है हमारा तो रोमरोम किसी न किसी का आभारी है. अकेला इनसान संपूर्ण कहां है? क्या पहचान है एक अकेले इनसान की? जन्म से ले कर बुढ़ापे तक मनुष्य किसी न किसी पर आश्रित ही तो रहता है न.

‘‘मेरी पत्नी सुबह से शाम तक बहुत कुछ करती है मेरे लिए, सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक, मेरे कपड़े, मेरा कमरा, मेरी व्यक्तिगत चीजों का खयाल, यहां तक कि मेरा मूड जरा सा भी खराब हो तो बारबार मनाना या किसी तरह मुझे हंसाना,’’ मैं अजय से बोला.

‘‘वही सब अगर वह न करे तो जीवन कैसा हो जाए, समझ सकते हो न. मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन की बीवियां तिनका भी उठा कर इधरउधर नहीं करतीं. पति ही घर भी संभालता है और दफ्तर भी. पत्नी को धन्यवाद कहने में कैसी शर्म, यदि उस से कुछ मिला है तुम्हें? इस से आपस का स्नेह, आपस की ऊष्मा बढ़ती है, घटती नहीं,’’ अजय ने कहा.

सच ही कहा अजय ने. इनसान इतना तो समझदार है ही कि बेमन से किया कोई भी प्रयास झट से पहचान जाता है. हम भी तो पहचान जाते हैं न, जब कोई भावहीन शब्द हम पर बरसाता है.

उस दिन देर तक हम साथसाथ बैठे रहे. अपनी जीवनशैली और उस के तामझाम को निभाने के लिए ही मैं इस पार्टी में आया था, जहां सहसा अजय से मुलाकात हो गई थी. हमारी कंपनी के ही एक डाइरेक्टर ने पार्टी दी थी, जिस में मैं हाजिर हुए बिना नहीं रह सकता था. इसे व्यावसायिक मजबूरी कह लो या तहजीब का तकाजा, निभाना जरूरी था.

12 घंटे की नौकरी और छुट्टी पर भी कोई न कोई आयोजन, कैसे घर के लिए जरा सा समय निकालूं? निशा पहले तो शिकायत करती रही लेकिन अब उस ने कुछ भी कहनासुनना छोड़ दिया है. समूल सुखसुविधाओं के बावजूद वह खुश नजर नहीं आती. सुबह की चाय और रात की रोटी बस यही उस की जिम्मेदारी है. मेरा नाश्ता और दोपहर का खाना कंपनी के मैस में ही होता है. आखिर क्या कमी है हमारे घर में जो वह खुश नजर नहीं आती? दिन भर वह अकेली होती है, न कोई रोकटोक, न सासससुर का मुंह देखना, पूरी आजादी है निशा को. फिर भी हमारे बीच कुछ है, जो कम होता जा रहा है. कुछ ऐसा है जो पहले था अब नहीं है.

सुबह की चाय और अखबार वह मेरे पास छोड़ जाती है. जब नहा कर आता हूं, मेरे कपड़े पलंग पर मिलते हैं. उस के बाद यंत्रवत सा मेरा तैयार होना और चले जाना. जातेजाते एक मशीनी सा हाथ हिला कर बायबाय कर देना.

मैं पिछले कुछ समय से महसूस कर रहा हूं, अब निशा चुप रहती है. हां, कभी माथे पर शिकन हो तो पूछ लेती है, ‘‘क्या हुआ? क्या आफिस में कोई समस्या है?’’

‘‘नहीं,’’ जरा सा उत्तर होता है मेरा.

आज शनिवार की छुट्टी थी लेकिन पार्टी थी, सो यहां आना पड़ा. निशा साथ नहीं आती, उसे पसंद नहीं. एक छत के नीचे रहते हैं हम, फिर भी लगता है कोसों की दूरी है.

मैं पार्टी से लौट कर घर आया, चाबी लगा कर घर खोला. चुप्पी थी घर में. शायद निशा कहीं गई होगी. पानी अपने हाथ से पीना खला. चाय की इच्छा नहीं थी. बीच वाले कमरे में टीवी देखने बैठ गया. नजर बारबार मुख्य

द्वार की ओर उठने लगी. कहां रह गई यह लड़की? चिंता होने लगी मुझे. उठ कर बैडरूम में आया और निशा की अलमारी खोली. ऊपर वाले खाने में कुछ उपहार पड़े थे. जिज्ञासावश उठा लिए. समयसमय पर मैं ने ही उसे दिए थे. मेरा ही नाम लिखा था उन पर. स्तब्ध रह गया मैं. निशा ने उन्हें खोला तक नहीं था. महंगी साडि़यां, कुछ गहने. हजारों का सामान अनछुआ पड़ा था. क्षण भर को तो अपना अपमान लगा यह मुझे, लेकिन दूसरे ही क्षण लगा मेरी बेरुखी का इस से बड़ा प्रमाण और क्या होगा?

उपहार देने के बाद मैं ने उन्हें कब याद रखा. साड़ी सिर्फ दुकान में देखी थी, उसे निशा के तन पर देखना याद ही नहीं रहा. कान के बुंदे और गले का जड़ाऊ हार मैं ने निशा के तन पर सजा देखने की इच्छा कब जाहिर की? वक्त ही नहीं दे पाता हूं पत्नी को, जिस की भरपाई गहनों और कपड़ों से करता रहा था. जरा भी प्यार समाया होता इस सामान में तो मेरे मन में भी सजीसंवरी निशा देखने की इच्छा होती. मेरा प्यार और स्नेह ऊष्मारहित है. तभी तो न मुझे याद रहा और न ही निशा ने इन्हें खोल कर देखने की इच्छा महसूस की होगी. सब से पुराना तोहफा 4 महीनों पुराना है, जो निशा के जन्मदिन का उपहार था. मतलब यह कि पिछले 4 महीनों से यह सामान लावारिस की तरह उस की अलमारी में पड़ा है, जिसे खोल कर देखने तक की जरूरत निशा ने नहीं समझी.

यह तो मुझे समझ में आ गया कि निशा को गहनों और कपड़ों की भूख नहीं है और न ही वह मुझ से कोई उम्मीद करती है.

2 साल का वैवाहिक जीवन और साथ बिताया समय इतना कम, इतना गिनाचुना कि कुछ भी संजो नहीं पा रहा हूं, जिसे याद कर मैं यह विश्वास कर पाऊं कि हमारा वैवाहिक जीवन सुखमय है.

निशा की पूरी अलमारी देखी मैं ने. लाकर में वे सभी रुपए भी वैसे के वैसे ही पड़े थे. उस ने उन्हें भी हाथ नहीं लगाया था.

शाम के 6 बज गए. निशा लौटी नहीं थी. 3 घंटे से मैं घर पर बैठा उस का इंतजार कर रहा हूं. कहां ढूंढू उसे? इस अजनबी शहर में उस की जानपहचान भी तो कहीं नहीं है. कुछ समय पहले ही तो इस शहर में ट्रांसफर हुआ है.

करीब 7 बजे बाहर का दरवाजा खुला. बैडरूम के दरवाजे की ओट से ही मैं ने देखा, निशा ही थी. साथ था कोई पुरुष, जो सहारा दे रहा था निशा को.

‘‘बस, अब आप आराम कीजिए,’’

सोफे पर बैठा कर उस ने कुछ दवाइयां मेज पर रख दी थीं. वह दरवाजा बंद कर के चला गया और मैं जड़वत सा वहीं खड़ा रह गया. तो क्या निशा बीमार है? इतनी बीमार कि कोई पड़ोसी उस की सहायता कर रहा है और मुझे पता तक नहीं. शर्म आने लगी मुझे.

आंखें बंद कर चुपचाप सोफे से टेक लगाए बैठी थी निशा. उस की सांस बहुत तेज चल रही थी. मानो कहीं से भाग कर आई हो. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी पास जाने की. शब्द कहां हैं मेरे पास जिन से बात शुरू करूंगा. पैसों का ढेर लगाता रहा निशा के सामने, लेकिन यह नहीं समझ पाया, रुपयापैसा किसी रिश्ते की जगह नहीं ले सकता.

‘‘क्या हुआ निशा?’’ पास आ कर मैं ने उस के माथे पर हाथ रखा. तेज बुखार था, जिस वजह से उस की आंखों से पानी भी बह रहा था. जबान खिंच गई मेरी. आत्मग्लानि का बोझ इतना था कि लग रहा था कि आजीवन आंखें न उठा पाऊंगा.

किसी गहरी खाई में जैसे मेरी चेतना धंसने लगी. अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह के साथ मेरा घर, मेरी गृहस्थी कहीं उजड़ने तो नहीं लगी? हंसतीखेलती यह लड़की ऐसी कब थी, जब मेरे साथ नहीं जुड़ी थी. मेरी ही इच्छा थी कि मुझे नौकरी वाली लड़की नहीं चाहिए. वैसी हो जो घर संभाले और मुझे संभाले. इस ने तो मुझे संभाला लेकिन क्या मैं इसे संभाल पाया?

‘‘आप कब आए?’’ कमजोर स्वर ने मुझे चौंकाया. अधखुली आंखों से मुझे देख रही थी निशा.

निशा का हाथ कस कर अपने हाथ में पकड़ लिया मैं ने. क्या उत्तर दूं, मैं कब आया.

‘‘चाय पिएंगे?’’ उठने का प्रयास किया निशा ने.

‘‘कब से बीमार हो?’’ मैं ने उठने से उसे रोक लिया.

‘‘कुछ दिन हो गए.’’

‘‘तुम्हारी सांस क्यों फूल रही है?’’

‘‘ऐसी हालत में कुछ औरतों को सांस की तकलीफ हो जाती है.’’

‘‘कैसी हालत?’’ मेरा प्रश्न विचित्र सा भाव ले आया निशा के चेहरे पर. वह मुसकराने लगी. ऐसी मुसकराहट, जो मुझे आरपार तक चीरती गई.

फिर रो पड़ी निशा. रोना और मुसकराना साथसाथ ऐसा दयनीय चित्र प्रस्तुत करने लगा मानो निशा पूर्णत: हार गई हो. जीवन में कुछ भी शेष नहीं बचा. डर लगने लगा मुझे. हांफतेहांफते निशा का रोना और हंसना ऐसा चित्र उभार रहा था मानो उसे अब मुझ से

कोई भी आशा नहीं रही. अपना हाथ खींच लिया निशा ने.

तभी द्वार घंटी बजी और विषय वहीं थम गया. मैं ही दरवाजा खोलने गया. सामने वही पुरुष खड़ा था, मेरी तरफ कुछ कागज बढ़ाता हुआ.

‘‘अच्छा हुआ, आप आ गए. आप की पत्नी की रिपोर्ट्स मेरी गाड़ी में ही छूट गई थीं. दवा समय से देते रहिए. इन की सांस बहुत फूल रही थी इसलिए मैं ही छोड़ने चला आया था.’’

अवाक था मैं. निशा को 4 महीने का गर्भ था और मुझे पता तक नहीं. कुछ घर छोड़ कर एक क्लीनिक था, जिस के डाक्टर साहब मेरे सामने खड़े थे. उन्होंने 1-2 कुशल स्त्री विशेषज्ञ डाक्टरों का पता मुझे दिया और जल्दी ही जरूरी टैस्ट करवा लेने को कह कर चले गए. जमीन निकल गई मेरे पैरों तले से. कैसा नाता है मेरा निशा से? वह कुछ सुनाना चाहती है तो मेरे पास सुनने का समय नहीं. तो फिर शादी क्यों की मैं ने, अगर पत्नी का सुखदुख भी नहीं पूछ सकता मैं.

चुपचाप आ कर बैठ गया मैं निशा के पास. मैं पिता बनने जा रहा हूं, यह सत्य अभीअभी पता चला है मुझे और मैं खुश भी नहीं हो पा रहा. कैसे आंखें मिलाऊं मैं निशा से? पिछले कुछ महीनों से कंपनी में इतना ज्यादा काम है कि सांस भी लेने की फुरसत नहीं है मुझे. निशा दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और मैं ने एक बार भी पूछा नहीं, उसे क्या तकलीफ है.

निशा के विरोध के बावजूद मैं उसे उठा कर बिस्तर पर ले आया. देर तक ठंडे पानी की पट्टियां रखता रहा. करीब आधी रात को उस का बुखार उतरा. दूध और डबलरोटी ही खा कर गुजारा करना पड़ा उस रात, जबकि यह सत्य है, 2 साल के साथ में निशा ने कभी मुझे अच्छा खाना खिलाए बिना नहीं सुलाया.

सुबह मैं उठा तो निशा रसोई में व्यस्त थी. मैं लपक कर उस के पास गया. कुछ कह पाता, तब तक तटस्थ सी निशा ने सामने इशारा किया. चाय ट्रे में सजी थी.

‘‘यह क्या कर रही हो तुम? तुम तो बीमार हो,’’ मैं ने कहा.

‘‘बीमार तो मैं पिछले कई दिनों से हूं. आज नई बात क्या है?’’

‘‘देखो निशा, तुम ने एक बार भी मुझे नहीं बताया,’’ मैं ने कहा.

‘‘बताया था मैं ने लेकिन आप ने सुना ही नहीं. सोम, आप ने कहा था, मुझे इस घर में रोटीकपड़ा मिलता है न, क्या कमी है, जो बहाने बना कर आप को घर पर रोकना चाहती हूं. आप इतनी बड़ी कंपनी में काम करते हैं. क्या आप को और कोई काम नहीं है, जो हर पल पत्नी के बिस्तर में घुसे रहें? क्या मुझे आप की जरूरत सिर्फ बिस्तर में होती है? क्या मेरी वासना इतनी तीव्र है कि मैं चाहती हूं, आप दिनरात मेरे साथ वही सब करते रहें?’’ निशा बोलती चली गई.

काटो तो खून नहीं रहा मेरे शरीर में.

‘‘आप मुझे रोटीकपड़ा देते हैं, यह सच

है. लेकिन बदले में इतना बड़ा अपमान भी करें, क्या जरूरी है? सोम, आप भूल गए, पत्नी का भी मानसम्मान होता है. रोटीकपड़ा तो मेरे पिता के घर पर भी मिलता था मुझे. 2 रोटी तो कमा भी सकती हूं. क्या शादी का मतलब यह होता है कि पति को पत्नी का अपमान करने का अधिकार मिल जाता है?’’ निशा बिफर पड़ी.

याद आया, ऐसा ही हुआ था एक दिन. मैं ने ऐसा ही कहा था. इतनी ओछी बात पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गई थी. सच है, उस के बाद निशा ने मुझ से कुछ भी कहना छोड़ दिया था. जिस खबर पर मुझे खुश होना चाहिए था उसे बिना सुने ही मैं ने इतना सब कह दिया था, जो एक पत्नी की गरिमा पर प्रहार का ही काम करता.

निशा को बांहों में ले कर मैं रो पड़ा. कितनी कमजोर हो गई है निशा, मैं देख ही नहीं पाया. कैसे माफी मांगूं अपने कहे की. लाखों रुपए हर महीने कमाने वाला मैं इतना कंगाल हूं कि न अपने बच्चे के आने की खबर का स्वागत कर पाया और न ही शब्द ही जुटा पा रहा हूं कि पत्नी से माफी मांग सकूं.

पत्नी के मन में पति के लिए एक सम्मानजनक स्थान होता है, जिसे शायद मैं खो चुका हूं. लाख हवा में उड़ता रहूं, आना तो जमीन पर ही था मुझे, जहां निशा ने सदा शीतल छाया सा सुख दिया है मुझे.

मेरे हाथ हटा दिए निशा ने. उस के होंठों पर एक कड़वी सी मुसकराहट थी.

‘‘ऐसा क्या हुआ है मुझे, जो आप को रोना आ गया. आप रोटीकपड़ा देते हैं मुझे, बदले में संतान पाना तो आप का अधिकार है न. डाक्टर ने कहा है, कुछ औरतों को गर्भावस्था में सांस की तकलीफ हो जाती है. ठीक हो जाऊंगी मैं. आप की और घर की देखभाल में कोई कमी नहीं आएगी,’’ निशा ने कहा.

‘‘निशा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो. पता नहीं क्यों मेरे मुंह से

वह सब निकल गया,’’ मैं निशा के आगे गिड़गिड़ाया.

‘‘सच ही आया होगा न जबान पर, इस में माफी मांगने की क्या जरूरत है? मैं जैसी हूं वैसी ही बताया आप ने.’’

‘‘तुम वैसी नहीं हो, निशा. तुम तो संसार की सब से अच्छी पत्नी हो. तुम्हारे बिना मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा. अगर मैं अपनी कंपनी का सब से अच्छा अधिकारी हूं तो उस के पीछे तुम्हारी ही मेहनत और देखभाल है. यह सच है, मैं तुम्हें समय नहीं दे पाता लेकिन यह सच नहीं कि मैं तुम से प्यार नहीं करता. तुम्हें गहनों, कपड़ों की चाह होती तो मेरे दिए तोहफे यों ही नहीं पड़े होते अलमारी में. तुम मुझ से सिर्फ जरा सा समय, जरा सा प्यार चाहती हो, जो मैं नहीं दे पाता. मैं क्या करूं, निशा, शायद आज संसार का सब से बड़ा कंगाल भी मैं ही हूं, जिस की पत्नी खाली हाथ है, कुछ नहीं है जिस के पास. क्षमा कर दो मुझे. मैं तुम्हारी देखभाल नहीं कर पाया.’’ मैं रोने लगा था.

मुझे रोते देख कर निशा भी रोने लगी थी. रोने से उस की सांस फूलने लगी थी. निशा को कस कर छाती से लगा लिया मैं ने. इस पल निशा ने विरोध नहीं किया. मैं जानता हूं, मेरी निशा मुझ से ज्यादा नाराज नहीं रह पाएगी. मुझे अपना घर बचाने के लिए कुछ करना होगा. घर और बाहर में एक उचित तालमेल बनाना होगा, हर रिश्ते को उचित सम्मान देना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं जब मेरे बैंक खातों में तो हर पल शून्य का इजाफा होगा ही, वहीं शून्य अपने विकराल रूप में मेरे जीवन में भी स्थापित हो जाएगा. Hindi Story

Hindi Story: ए सीक्रेट नाइट इन होटल, झांसे में न आएं लड़कियां

Hindi Story:अप्रैल के तीसरे सप्ताह में नोएडा की रहने वाली रश्मि (बदला नाम) जब भी अपना फेसबुक एकाउंट खोलती, उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट में एक अंजान शख्स की रिक्वैस्ट जरूर दिखाई दे जाती. वह जानती थी कि आवारा, शरारती और दिलफेंक किस्म के मनचले युवक लड़कियों की कवर फोटो और प्रोफाइल देख कर ऐसी फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजा करते हैं. अगर इन की रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली जाए तो जल्द ही ये रोमांस और सैक्स की बातें करते हुए नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगते हैं.

आमतौर पर ऐसी फ्रैंड रिक्वैस्ट पर समझदारी दिखाते हुए रश्मि ध्यान नहीं देती थी. इसलिए इस पर भी उस ने ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वह बैठेबिठाए आफत मोल नहीं लेना चाहती थी. लेकिन 20 अप्रैल को उस ने इस अंजान फ्रैंड रिक्वैस्ट के साथ एक टैगलाइन लगी देखी तो वह बेसाख्ता चौंक उठी. वह लाइन थी ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल.’

इस टैगलाइन ने उसे भीतर तक न केवल हिला कर रख दिया, बल्कि गुदगुदा भी दिया. उसे पढ़ कर अनायास ही वह 20 दिन पहले की दुनिया में ठीक वैसे ही पहुंच गई, जैसे फिल्मों के फ्लैशबैक में नायिकाएं पहुंचने से खुद को रोक नहीं पातीं.

कीबोर्ड पर चलती उस की अंगुलियां थम गईं और दिलोदिमाग पर ग्वालियर छा गया. वह वाकई सीक्रेट और हसीन रात थी, जब उस ने पूरा वक्त पहले अभिसार में अपने मंगेतर विवेक (बदला नाम) के साथ गुजारा था. जिंदगी के पहले सहवास को शायद ही कोई युवती कभी भुला पाती है. वह वाकई अद्भुत होता है, जिसे याद कर अरसे तक जिस्म में कंपकंपी और झुरझुरी छूटा करती है.

रश्मि को याद आ गया, जब वह और विवेक दिल्ली से ग्वालियर जाने वाली ट्रेन में सवार हुए थे तो उन्हें कतई गर्मी का अहसास नहीं हो रहा था. उस के कहने पर ही विवेक ने रिजर्वेशन एसी कोच के बजाय स्लीपर क्लास में करवाया था. दिल्ली से ग्वालियर लगभग 5 घंटे का रास्ता था. कैसे बातोंबातों में कट गया, इस का अंदाजा भी रश्मि को नहीं हो पाया.

आगरा निकलतेनिकलते रश्मि के चेहरे पर पसीना चुहचुहाने लगा तो विवेक प्यार से यह कहते हुए झल्ला भी उठा, ‘‘तुम से कहा था कि एसी कोच में रिजर्वेशन करवा लें, पर तुम्हें तो बचत करने की पड़ी थी. अब पोंछती रहो बारबार रूमाल से पसीना.’’

विवेक और रश्मि की शादी उन के घर वालों ने तय कर दी थी, जिस का मुहूर्त जून के महीने का निकला था. चूंकि सगाई हो चुकी थी, इसलिए दोनों के साथ ग्वालियर जाने पर घर वालों को कोई ऐतराज नहीं था. यह आजकल का चलन हो गया है कि एगेंजमेंट के बाद लड़कालड़की साथ घूमेफिरें तो उन के घर वाले पुराने जमाने की तरह ऊंचनीच की बातें करते टांग नहीं अड़ाते.

रश्मि को अपनी रिश्तेदारी के एक समारोह में जाना था, जिस के बाबत घर वालों ने ही कहा था कि विवेक को भी ले जाओ तो उस की रिश्तेदारों से जानपहचान हो जाएगी. बारबार पसीना पोंछती रश्मि की हालत देख कर विवेक खीझ रहा था कि इस से तो अच्छा था कि एसी में चलते. उसे परेशानी तो न होती.

प्यार की बात का जवाब भी प्यार से देते रश्मि उसे समझा रही थी कि उस का साथ है तो क्या गर्मी और क्या सर्दी, वह सब कुछ बरदाश्त कर लेगी. बातों ही बातों में रश्मि ने अपना सिर विवेक के कंधे पर टिका दिया तो सहयात्री प्रेमीयुगल के इस अंदाज पर मुसकरा उठे. लेकिन उन्हें किसी की परवाह नहीं थी. ट्रेनों में ऐसे दृश्य अब बेहद आम हो चले हैं.

आगरा निकलते ही विवेक ने उस से वह बात कह डाली, जिसे वह दिल्ली से बैठने के बाद से दिलोदिमाग में जब्त किए बैठा था कि क्यों न हम रिश्तेदार के यहां कल सुबह चलें. वैसे भी फंक्शन कल ही है, आज की रात किसी होटल में गुजार लें. यह बात शायद रश्मि भी अपने मंगेतर के मुंह से सुनना चाहती थी.

क्योंकि स्वाभाविक तौर पर शरम के चलते वह एदकम से कह नहीं पा रही थी. दिखाने के लिए पहले तो उस ने बहाना बनाया कि घर वालों को पता चल गया तो वे क्या सोचेंगे? इस पर विवेक का रेडीमेड जवाब था, ‘‘उन्हीं के कहने पर तो हम साथ जा रहे हैं और फिर बस 2 महीने बाद ही तो हमारी शादी होने वाली है. उस के बाद तो हमें हर रात साथ ही बितानी है.’’

इस पर रश्मि बोली, ‘‘…तो फिर उस रात का इंतजार करो, अभी से क्यों उतावले हुए जा रहे हो?’’

रश्मि का मूड बनते देख विवेक ऊंचनीच के अंदाज में बोला, ‘‘अरे यार, क्या तुम्हें भरोसा नहीं मुझ पर?’’

यह एक ऐसा शाश्वत डायलौग है, जिस का कोई जवाब किसी प्रेमिका या मंगेतर के पास नहीं होता. और जो होता है, वह सहमति में हिलता सिर वह जवाब होता है.

‘‘तुम पर भरोसा है, तभी तो सब कुछ तुम्हें सौंप दिया है.’’ रश्मि ने कहा.

यही जवाब विवेक सुनना चाहता था. जब यह तय हो गया कि दोनों रात एक साथ किसी होटल के कमरे में गुजारेंगे तो बहने वाली पसीने की तादाद तो बढ़ गई, पर बरसती गर्मी का अहसास कम हो गया. दोनों आने वाले पलों की सोचसोच कर रोमांचित हुए जा रहे थे. अलबत्ता रश्मि के दिल में जरूर शंका थी कि धोखे से अगर किसी जानपहचान वाले ने देख लिया तो वह क्या सोचेगा?

अपनी शंका का समाधान करते हुए वह विवेक की आवाज में खुद को समझाती रही कि सोचने दो जिसे जो सोचना है, आखिर हम जल्द ही पतिपत्नी होने जा रहे हैं. आजकल तो सब कुछ चलता है. और कौन हम होटल के कमरे में वही सब करेंगे, जो सब सोचते हैं. हमें तो रोमांस और प्यार भरी बातें करने के लिए एकांत चाहिए, जो मिल रहा है तो मौका क्यों हाथ से जाने दें?

ट्रेन के ग्वालियर स्टेशन पहुंचतेपहुंचते अंधेरा छा गया था, पर इस प्रेमीयुगल के दिलोदिमाग में एक अछूते अंजाने अहसास को जी लेने का सुरूर छाता जा रहा था. स्टेशन पर उतर कर विवेक ने औटोरिक्शा किया. नई सवारियों को देख कर ही औटोरिक्शा वाले तुरंत ताड़ लेते हैं कि ये किसी लौज में जाएंगे. कुछ देर औटोरिक्शा इधरउधर घूमता रहा. दोनों ने कई होटल देखे, फिर रुकना तय किया होटल उत्तम पैलेस में.

ग्वालियर रेलवे स्टेशन के प्लेटफौर्म नंबर एक के बाहर की सड़क पर रुकने के लिए होटलों की भरमार है. चूंकि आमतौर पर रेलवे स्टेशनों के बाहर की होटलें जोड़ों को रुकने के लिए मुफीद नहीं लगतीं, इसलिए विवेक और रश्मि को उत्तम होटल पसंद आया. जो रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर दूर रेसकोर्स रोड पर सैनिक पैट्रोल पंप के पास स्थित है. दोनों को यह होटल सुरक्षित लगा.

औटो वाले को पैसे दे कर दोनों काउंटर पर पहुंचे तो वहां एक बुजुर्ग मैनेजर बैठा था, जिस की अनुभवी निगाहें समझ गईं कि यह नया जोड़ा है. मैनेजर पूरे कारोबारी शिष्टाचार से पेश आया और एंट्री रजिस्टर उन के आगे कर दिया. आजकल होटलों में रुकने के लिए फोटो आईडी अनिवार्य है, जो मांगने पर विवेक और रश्मि ने दिए तो मैनेजर ने तुरंत उन की फोटोकौफी कर के अपने पास रख ली.

खानापूर्ति कर दोनों अपने कमरे में आ गए. 6 घंटों से दिलोदिमाग में उमड़घुमड़ रहा प्यार का जज्बा अब आकार लेने लगा. दरवाजा बंद करते ही विवेक ने रश्मि को अपनी बांहों में जकड़ लिया और ताबड़तोड़ उस पर चुंबनों की बौछार कर दी. एक पुरानी कहावत है, आग और घी को पास रखा जाए तो घी पिघलेगा, जिस से आग और भड़केगी.

यही इस कमरे में हो रहा था. मंगेतर की बांहों में समाते ही रश्मि का संयम जवाब दे गया. जल्द ही दोनों बिस्तर पर आ कर एकदूसरे के आगोश में खो गए. तकरीबन एक घंटे कमरे में गर्म सांसों का तूफान उफनता रहा. तृप्त हो जाने के बाद दोनों फ्रेश हुए तो शरीर की भूख मिटने के बाद अब पेट की भूख सिर उठाने लगी.

रश्मि का मन बाहर जा कर खाना खाने का नहीं था, इसलिए विवेक ने कमरे में ही खाना मंगवा लिया. खाना खा कर टीवी देखते हुए दोनों दुनियाजहान की बातें करते आने वाले कल का तानाबाना बुनते रहे कि शादी के बाद हनीमून कहां मनाएंगे और क्याक्या करेंगे?

एक बार के संसर्ग से दोनों का मन नहीं भरा था, इसलिए फिर सैक्स की मांग सिर उठाने लगी, जिस में उस एकांत का पूरा योगदान था, जिस की जरूरत एक अच्छे मूड के लिए होती है. इस बार दोनों ने वे सारे प्रयोग कर डाले, जो वात्स्यायन के कामसूत्र सोशल मीडिया और इधरउधर से उन्होंने सीखे थे.

2-3 घंटे बाद दोनों थक कर चूर हो गए तो कब एकदूसरे की बांहों में सो गए, दोनों को पता ही नहीं चला. और जब चला तब तक सुबह हो चुकी थी. रश्मि और विवेक, दोनों के लिए ही यह एक नया अनुभव था, जिसे उन्होंने जी भर जिया था. दोनों के बीच कोई परदा नहीं रह गया था, पर इस बात की कोई ग्लानि उन्हें नहीं थी, क्योंकि दोनों शादी के बंधन में बंधने जा रहे थे.

सुबह अपना सामान समेट कर दोनों काउंटर पर पहुंचे और होटल का बिल अदा कर रिश्तेदार के यहां पहुंच गए. रश्मि ने चहकते हुए सभी रिश्तेदारों से विवेक का परिचय कराया, लेकिन दोनों यह बात छिपा गए कि वे रात को ही ग्वालियर आ गए थे और रात उन्होंने एक होटल में गुजारी थी. जाहिर है, यह बात बताने की थी भी नहीं.

उसी दिन शाम को दोनों वापस नोएडा के लिए रवाना हो गए. साथ में था एक रोमांटिक रात का दस्तावेज, जिसे याद कर दोनों सिहर उठते थे और एकदूसरे की तरफ देख हौले से मुसकरा देते थे. बात आई गई हो गई, पर दोनों के बीच व्हाट्सऐप और फेसबुक की चैटिंग में वह रात और उस की बातें और यादें ताजा होती रहीं. अब न केवल दोनों, बल्कि उन के घर वाले भी शादी की तैयारियां और खरीदारी में लग गए थे.

इन यादों से उबरते रश्मि की नजर फिर से टैग की हुई इस लाइन पर पड़ी ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल’ तो वह चौंक उठी कि अजीब इत्तफाक है. फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजने वाले ने जैसे उस की यादों को जिंदा कर दिया था. रश्मि की जिज्ञासा अब शबाब पर थी कि आखिर इस लाइन का मतलब क्या है? लिहाजा उस ने कुछ सोच कर उस अंजान व्यक्ति की फ्रैंड रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली.

जैसे ही उस ने इस नए फेसबुक फ्रैंड का एकाउंट खोला, वह भौचक रह गई. भेजने वाले ने एक पैराग्राफ का यह मैसेज लिख रखा था.

‘रश्मिजी, आप का कमसिन फिगर लाखों में एक है. जब से मैं ने आप को देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. वीडियो में आप एक लड़के को प्यार कर रही हैं. सच कहूं तो मुझे उस लड़के की किस्मत से जलन हो रही है. काश! उस युवक की जगह मैं होता तो आप मुझे उसी तरह टूट कर प्यार करतीं. आप को यकीन नहीं हो रहा हो तो अब वीडियो देखिए.’

अव्वल तो मैसेज पढ़ कर ही रश्मि के दिमाग के फ्यूज उड़ गए थे. रहीसही कसर वह वीडियो देखने पर पूरी हो गई, जिस में उत्तम होटल के कमरे में उस के और विवेक के बीच बने सैक्स संबंधों की तमाम रिकौर्डिंग कंप्यूटर स्क्रीन पर दिख रही थी.

वीडियो देख कर रश्मि पानीपानी हो गई. अब उसे लग रहा था कि उस ने और विवेक ने जो किया था, वह किसी ब्लू फिल्म से कम नहीं था. वह हैरान इस बात पर थी कि यह सब रिकौर्ड कैसे हुआ? जबकि विवेक ने कमरे में दाखिल होते ही अच्छे से ठोकबजा कर देख लिया था कि कमरे में कोई कैमरा वगैरह तो नहीं लगा.

पर जो हुआ था, वह कंप्यूटर स्क्रीन पर चल रहा था. वीडियो देख कर सकते में आ गई रश्मि ने तुरंत फोन कर के विवेक को अपने घर बुलाया. विवेक आया तो रश्मि ने उसे सारी बात बताई, जिसे सुन कर वह भी झटका खा गया. यह तो साफ समझ आ रहा था कि वीडियो उसी रात का था, पर इसे भेजने वाले की मंशा साफ नहीं हो रही थी कि वह क्या चाहता है, सिवाय इस के कि वह गलत मंशा से रश्मि पर दबाव बना रहा था.

दोनों गंभीरतापूर्वक काफी देर तक इस बिन बुलाई मुसीबत पर चरचा करते रहे. बात चिंता की थी, इस लिहाज से थी कि अगर यह वीडियो वायरल हो गया तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे. दोनों अब अपनी जवानी के जोश में छिप कर किए इस कृत्य पर पछता रहे थे. लंबी चर्चा के बाद आखिरकार उन्होंने तय किया कि भेजने वाले से उस की मंशा पूछी जाए.

लिहाजा उन्होंने इस बाबत मैसेज किया तो जवाब आया कि अगर इस वीडियो को वायरल होने से बचाना है तो ढाई लाख रुपए दे दो. अब तसवीर साफ थी कि उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था. विवेक और रश्मि, दोनों निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों से थे, इसलिए ढाई लाख रुपए का इंतजाम करना उन की हैसियत के बाहर की बात थी. पर होने वाली बदनामी का डर भी उन के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

आखिरकार विवेक ने सख्त और समझदारी भरा फैसला लिया कि जब पौकेट में इतने पैसे नहीं हैं तो बेहतर है कि पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जाए. दोनों अपनेअपने घर से बहाना बना कर बीती 1 मई को ग्वालियर पहुंचे और सीधे एसपी डा. आशीष खरे से मिले. मामले की गंभीरता और शादी के बंधन में बंधने जा रहे इन दोनों की परेशानी आशीष ने समझी और मामला पड़ाव थाने के टीआई को सौंप दिया.

पुलिस वालों ने दोनों को सलाह दी कि वे ब्लैकमेलर से संपर्क कर किस्तों में पैसा देने की बात कहें. रश्मि ने पुलिस की हिदायत के मुताबिक ब्लैकमेलर को फोन कर के कहा कि वह ढाई लाख रुपए एकमुश्त तो देने की स्थिति में नहीं हैं, पर 5 किस्तों में 50-50 हजार रुपए दे सकती है. इस पर ब्लैकमेलर तैयार हो गया.

सीधे उत्तम होटल पर छापा न मारने के पीछे पुलिस की मंशा यह थी कि ब्लैमेलर को रंगेहाथों पकड़ा जाए. ऐसा हुआ भी. आरोपी आसानी से पुलिस के बिछाए जाल में फंस गया और रश्मि से 50 हजार रुपए लेते धरा गया. जिस युवक को पुलिस ने पकड़ा था, उस का नाम भूपेंद्र राय था. वह उत्तम होटल में ही काम करता था.

भूपेंद्र को उम्मीद नहीं थी कि रश्मि पुलिस में खबर करेगी, इसलिए वह पकड़े जाने पर हैरान रह गया. पूछताछ में उस ने बताया कि वह तो बस पैसा लेने आया था, असली कर्ताधर्ता तो कोई और है.

वह कोई और नहीं, बल्कि होटल का 63 वर्षीय मैनेजर विमुक्तानंद सारस्वत निकला. उसे भी पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने पूछताछ में मान लिया कि उन्होंने इस तरह कई जोड़ों को ब्लैकमेल किया था.

भूपेंद्र ने बताया कि इस होटल में उसे उस के बहनोई पंकज इंगले ने काम दिलवाया था. काम करतेकरते भूपेंद्र ने महसूस किया कि होटल में रुकने वाले अधिकांश कपल सैक्स करने आते हैं. लिहाजा उस के दिमाग में एक खुराफाती बात वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने की आई, जिस का आइडिया एक क्राइम सीरियल से उसे मिला था.

भूपेंद्र ने दिल्ली जा कर नाइट विजन कैमरे खरीदे, जो आकार में काफी छोटे होते हैं. इन कैमरों को उस ने टीवी के औनऔफ स्विच में फिट कर रखा था. इस से कोई शक भी नहीं कर पाता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं. आमतौर पर ठहरने वाले इस बात पर ध्यान नहीं देते कि टीवी का स्विच औन है, क्योंकि इस से कोई खतरा रिकौर्डिंग का नहीं होता.

ग्राहकों के जाने के बाद भूपेंद्र कैमरे निकाल कर फिल्म देखता था और जिन लोगों ने सैक्स किया होता था, उन के नामपते होटल में जमा फोटो आईडी से निकाल कर फेसबुक, व्हाट्सऐप या फिर सीधे मोबाइल फोन के जरिए ब्लैकमेल करता था. दोनों ने माना कि वे ब्लैकमेलिंग के इस धंधे से लाखों रुपए अब तक कमा चुके हैं. दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

मामला उजागर हुआ तो ग्वालियर में हड़कंप मच गया. पता यह चला कि कई होटलों में इस तरह के कैमरे फिट हैं और ब्लैकमेलिंग का धंधा बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है. इस तरह की रिकौर्डिंग के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रदर्शन भी किया.

इस पर पुलिस ने कई होटलों में छापे मारे, पर कुछ खास हाथ नहीं लगा. क्योंकि संभावना यह थी कि भूपेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही ब्लैकमेलर्स ने कैमरे हटा दिए थे. हालांकि उम्मीद बंधती देख कुछ लोगों ने पुलिस में जा कर अपने ब्लैकमेल होने का दुखड़ा रोया.

जब यह सब कुछ हो गया तो विवेक और रश्मि ब्रेफ्रिकी से नोएडा वापस चले गए और दोबारा शादी की तैयारियों में जुट गए. पर एक सबक इन्हें मिल गया कि हनीमून मनाते वक्त  होटल में इस बात का ध्यान रखेंगे कि टीवी के खटके में कैमरा न लगा हो और घर आने के बाद फिर फेसबुक पर यह मैसेज न मिले कि ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल.’ Hindi Story

Hindi Story: कोई लौटा दे मेरे: कैसे उजड़ी अशफाक की दुनिया

Hindi Story: ‘अशफाक अंसारी, वल्द एसआर अंसारी, ऐशबाग, भोपाल, आप को रिहा किया जाता है और पुलिस की गलती के लिए अदालत आप से खेद जाहिर करती है,’ जज साहब का लिखा यह वाक्य पढ़ कर जेलर ने अशफाक को सुना दिया और शाम के 4 बजे उसे रिहा कर दिया गया.

पुलिस द्वारा दिए गए 15 सौ रुपए के साथ जब अशफाक भोपाल लौटा, तो वहां की दुनिया देख कर दंग रह गया. महज 4 सालों में ही उस की दुनिया उजड़ गई थी.

पुलिस की एक छोटी सी भूल ने अशफाक को सड़क पर ला कर पटक दिया था. वह खो गया यादों में…

आज से 4 साल पहले 45 साला अशफाक मंडी में आलू का कारोबार करता था और अपनी बीवी व 4 बच्चों के साथ सुख की जिंदगी गुजार रहा था.

अशफाक की बड़ी बेटी तकरीबन 18 साल की थी, जिस का निकाह उस ने सलमान भाई के बेटे के साथ ठीकठाक किया था. दोनों परिवारों में हंसीखुशी का माहौल था.

उस दिन मंगनी की रस्म अदा होनी थी कि अचानक अशफाक पर मानो तूफान आ गया. वह मंडी से आलू का कारोबार कर दोपहर के एक बजे नमाज अदा कर के उठा ही था कि एक पुलिस वाले ने उसे झट से पकड़ लिया और बोला, ‘अशफाक मियां, तुम्हें थाने में बुलाया गया है.’

अशफाक घर पर सब को बताता हुआ थाने पहुंचा, पर वहां उस से नाम पूछ कर हवालात में डाल दिया गया.

‘थानेदार साहब, मैं ने किया क्या है?’ अशफाक ने मासूमियत से पूछा. ‘ज्यादा भोला मत बन. लड़कियों को छेड़ना, उन की सोने की चेनें छीनना तुम्हारा काम है,’ इंस्पैक्टर उसे धमकाते हुए बोला.

‘साहब, वह अशफाक दूसरा है. वह गुंडा हमारे साथ वाली गली में रहता है. मैं तो आलू वाला हूं,’ अशफाक अपने बारे में सफाई देते हुए बोला.

‘अबे चुप, मैं तेरी नसनस से वाकिफ हूं. भोला बन कर लूटता है,’ यह कहते हुए इंस्पैक्टर ने अशफाक को मजिस्ट्रेट के पास भेजा, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

उस के बाद तारीख पर तारीख और महीनों गुजरते गए. अशफाक को पहले भोपाल और फिर जबलपुर की जेल में भेज दिया गया. इसी बीच एक दिन उसे पता चला कि उस की बेटी की मंगनी टूट गई है.

‘हमें किसी अपराधी की बेटी ब्याह कर नहीं लानी,’ यह बात खुद सलमान ने उसे जेल में मिल कर बताई.

‘आप को तो पता है कि मैं अपराधी नहीं हूं. मुझे दूसरे शख्स की जगह जेल में डाला गया है,’ यह सफाई देते हुए अशफाक थक गया.

‘कुछ भी कह लो भाई. मुझे माफ करना, लेकिन एक अपराधी की बेटी घर में ला कर मुझे अपनी इज्जत का जनाजा नहीं निकलवाना. आप हमें तो माफ ही करना,’ इतना कह कर बगैर उस की बात सुने सलमान लौट गया.

अब तो अशफाक को दोहरी मार झेलनी पड़ी. बीवी और बच्चे जैसेतैसे कर के घर की गाड़ी खींच रहे हैं और वह जेल में सड़ रहा है.

अशफाक ने मुश्किल से अपनी बात जज साहब को बता डाली, ‘साहब, मेरा नाम अशफाक अंसारी, मेरे पिता का नाम एसआर अंसारी है, जबकि दूसरा अशफाक फइमुद्दीन अंसारी का बेटा है. वह ऐशबाग की गली नंबर 412 में रहता है, जबकि मैं 214 में रहता हूं.

मेरा 20 सालों से सब्जी मंडी में आलू का कारोबार है, जबकि वह गुंडागर्दी करता है.’ अशफाक ने जब इतनी बातें बताईं, तो जज साहब ने पूछा, ‘तुम्हारे पास इस बात का कोई सुबूत है?’

‘जज साहब, आप के रिकौर्ड की सारी बातें उस गुंडे से मेल खाती हैं, जबकि मेरा वोटर आईडी कार्ड, राशनकार्ड वगैरह तमाम कागजात घर से मंगवा कर सचाई पता की जा सकती है,’ अशफाक रोते हुए अपनी बात रख रहा था.

‘देखो मियां, हमें तुम से पूरी हमदर्दी है. अगर तुम सही हो, तो हम तुम्हें यकीनन रिहा कर देंगे,’ जज साहब ने उसे हौसला देते हुए कहा.

अब उसे बाइज्जत वापस जेल भेज दिया गया. इस से जेलर और सभी मुलाजिम इज्जत से पेश आने लगे. फिर तो 3-4 तारीख में मामला साफ हो गया. कोर्ट में वकील की दलीलों ने उसे बेकुसूर और इंस्पैक्टर की गलती साबित कर दी.

इंस्पैक्टर को जब पता चला, तो वह असली मुजरिम की खोज में जुट गया, पर इस सब में 4 साल बीत गए.

अशफाक बीती यादों से बाहर निकल आया. अब उस के बीवीबच्चे झुग्गी में बड़ी मुश्किल से दिन गुजार रहे थे. मां तो पागल सी हो गई थी.

‘‘घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा. मैं काजी साहब से मिल कर सबकुछ सुधार दूंगा. धंधा भी ठीक हो जाएगा.’’ वह सब को दिलासा दे रहा था, पर खुद इंस्पैक्टर पर झंझला रहा था.

जब अशफाक ऐशबाग थाने के सामने से गुजर रहा था, तो वहां उस ने लिखा देखा, ‘पुलिस आप की सुरक्षा में’. हकीकत में पुलिस ने उसे इतनी सुरक्षा दी, जिस की हद नहीं.

यहां नाम ने उसे बदनाम कर दिया. कौन कहता है कि नाम कुछ नहीं है. बस, एकजैसे नाम ने उसे जेल और दूसरे को मौका दिया.

‘बेटीबेटा एकसमान’. इस नारे को पढ़ कर अशफाक टूट गया. उस की बेटी तो बिना गलती के ही पिस गई.

बेटी नहीं होती है, तो सबकुछ ठीक होता है. इस तरह ये सारे फूल उसे शूल की तरह चुभने लगे और वह बिस्तर पर लेट कर फूटफूट कर रोने लगा.Hindi Story

Hindi Story: कसौटी -कौन परख रहा था कामना को

Hindi Story: प्लेटफार्म पर गाड़ी लगते ही कामना अपने पिता के साथ डब्बे की ओर दौड़ पड़ी. गरमी से उस के होंठ सूख रहे थे. सूती साड़ी पसीने में भीग कर शरीर से चिपक गई थी, पर उसे होश कहां था. यह गाड़ी छूट गई, तो उस का मकसद पूरा नहीं हो पाएगा. किसी भी कीमत पर इस रेल में जगह बनानी ही होगी. बापबेटी दोनों अपनी पूरी ताकत से रेल में चढ़ने की नाकाम कोशिश करने लगे.

उसी डब्बे में एक सज्जन भी चढ़ने की कोशिश कर रहे थे. इसी बीच पैर फिसलने के चलते वे औंधे मुंह प्लेटफार्म पर लुढ़क गए. बापबेटी चढ़ना भूल कर उस गिरे हुए मुसाफिर की मदद को लपके.

दूसरे मुसाफिरों का चढ़नाउतरना लगातार जारी था. किसी ने भी मुड़ कर बेहोश पड़े हुए उन सज्जन को नहीं देखा. न किसी के पास समय था और न इनसानियत. कामना ने आव देखा न ताव और झुक कर उन बुजुर्ग को उठाने लगी.

‘‘पानी… पानी…’’ वे बुजुर्ग बुदबुदाए.

अगर कामना ने उन सज्जन के मुंह पर पानी का छींटा मार कर उन्हें भीड़ से उठा कर सीमेंट की बैंच पर लिटा नहीं दिया होता, तो वे मुसाफिरों के पैरों तले कुचले जाते.

ठंडे पानी के छींटों से वे सज्जन कुनमुनाए और ऊपरी जेब की ओर इशारा किया. कामना ने  झट से जेब में हाथ डाला. दवा की शीशी थी. चंद बूंद होंठों पर पड़ते ही वे बुजुर्ग उठ कर बैठने की कोशिश करने लगे.

इधर गार्ड ने हरी  झंडी दिखाई, सीटी दी और ट्रेन चल पड़ी. बापबेटी हड़बड़ा गए. गाड़ी पकड़ें या अनजान इनसान की मदद करें. मंजिल तक उन का पहुंचना बहुत जरूरी था वे कुछ फैसला लेने ही वाले थे कि उन बुजुर्ग ने कहा, ‘‘बेटी और एक खुराक दवा देना.’’

कामना उन्हें दवा खिलाने लगी. ट्रेन जा चुकी थी. बचे हुए तमाशबीन लोग उन के इर्दगिर्द जमा होने लगे थे.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘कैसे गिर पड़े?’’

‘‘आप लोगों के साथ हैं क्या?’’

तरहतरह के सवाल बापबेटी के कानों से टकराने लगे. कुछ शोहदे नजदीक आने का प्रपंच करने लगे. गाड़ी खुलने के साथ ही बापबेटी के अरमानों का महल ढह गया. वे ठंडी सांस ले कर रह गए. मंजिल हाथ आ कर एक बार फिर फिसल गई थी.

यह अफसोस करने का समय नहीं था. वे दोनों उन सज्जन की तीमारदारी में लग गए. अनजान शहर में किसी तरह पूछताछ करते हुए एक डाक्टर के पास पहुंचे. डाक्टर भले इनसान थे. मुआयना कर के वे बोल उठे, ‘‘दिल का दौरा था. यह तो अच्छा हुआ कि इन्होंने समय पर दवा खा ली, वरना जान भी जा सकती थी.’’

वे बुजुर्ग सज्जन कामना और उस के पिता के प्रति कृतज्ञ हो उठे. डाक्टर ने उन्हें कुछ दवाएं दीं और खतरे से बाहर बताया. कुछ जरूरी हिदायतों के साथ उन्हें घर तक जाने की इजाजत दे दी.

दिल्ली जाने वाली दूसरी ट्रेन रात के 9 बजे थी. कामना और उस के पापा वापस जाने की सोचने लगे.

‘‘क्यों…? आप वापस किसलिए जा रहे हैं?’’ उन सज्जन ने पूछा.

‘‘अब दिल्ली जाने का कोई मतलब नहीं, क्योंकि रात वाली गाड़ी कल शाम को पहुंचेगी और हमारा काम वहां दिन में 10 बजे तक ही था,’’ पिता की आवाज में उदासी थी.

‘‘ऐसा कौन सा काम था, अगर एतराज न हो तो मु झे बताएं,’’ उन सज्जन की उत्सुकता बढ़ गई.

‘‘एतराज कैसा, वहां एक फर्म में बिटिया का इंटरव्यू था. उम्मीद थी कि नौकरी मिल जाएगी, पर लगता है कि अब ऐसा नहीं हो पाएगा. खैर, आप की जान बच गई, यही इस सफर की उपलब्धि रही.’’

कामना उन बुजुर्ग सज्जन की सेवा में लगी थी, अब वापसी के लिए तैयार हो गई. बुजुर्ग सज्जन ने पहली बार बापबेटी को गौर से देखा.

‘‘कौन सी फर्म?’’

कामना से जानकारी पा कर वे सज्जन चिंता में पड़ गए. एक बेरोजगार के हाथ से नौकरी जाने की वजह अपनेआप को सम झ कर उन्हें आत्मग्लानि होने लगी.

‘‘सुनिए, आप दोनों मेरे साथ रात की गाड़ी से दिल्ली चलिए. वहां फर्म में अपनी समस्या बताएंगे तो शायद वे लोग आप को एक मौका दे दें,’’ उन बुजुर्ग ने कहा.

‘‘वहां कौन हमारी बात सुनेगा. इंटरव्यू तो सुबह 10 बजे ही है,’’ कामना ने कहा.

‘‘आप मेरी बात तो मानिए और दिल्ली चलिए. काम नहीं होगा तो लौट आइएगा. क्यों बिटिया, मैं ठीक कह रहा हूं न? नहीं तो मैं अपनेआप को माफ नहीं कर पाऊंगा,’’ अनायास वातावरण गंभीर हो उठा.

‘‘बाबा, चलिए एक बार हो आते हैं,’’ कामना ने अपने पिता से कहा.

‘‘पर, दिल्ली में आप लोग कहां ठहरेंगे?’’ उन बुजुर्ग ने पूछा.

‘‘दिल्ली में हमारा कोई परिचित नहीं है. उस फर्म में मिल कर स्टेशन आ जाएंगे और वापसी के लिए जो भी गाड़ी मिलेगी, पकड़ लेंगे,’’ कामना ने कहा.

‘‘कहीं रुकना पड़ा तो,’’ उन बुजुर्ग ने कहा, तो कामना के पिता का सब्र जवाब दे गया, ‘‘फर्म वाले हमें क्यों रोकेंगे? देर से जाने पर वैसे ही भगा देंगे.’’

बहरहाल, वे तीनों दिल्ली आ पहुंचे.

‘‘कृपया आप लोग मेरी गाड़ी से चलिए. मु झ पर भरोसा कीजिए,’’ उन बुजुर्ग ने हाथ जोड़ कर कहा. इस प्रस्ताव पर बापबेटी चौंक उठे.

‘‘नहींनहीं, हम आटोरिकशा से चले जाएंगे. आप कष्ट न करें,’’ कामना ने कहा.

‘‘इस में कष्ट कैसा? आप ऐसा न सम झें कि मैं आप के एहसान का बदला चुका रहा हूं. मेरी गाड़ी आई है और मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, इसलिए आप की मुश्किल हल करने की छोटी सी कोशिश है.’’

उन बुजुर्ग की बातों ने बापबेटी को ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया. वे इनकार नहीं कर सके. नई चमचमाती विदेशी कार, वरदीधारी ड्राइवर को देख कर वे दोनों हैरान थे.

ज्यादा सोचनेसम झने का वक्त नहीं था. एक फाइवस्टार होटल के सामने कार रुकी. ड्राइवर को कोई जरूरी निर्देश दे कर वे बुजुर्ग कामना के पिता से बोले, ‘‘आप के लिए कमरा बुक है. जब तक चाहें रुकें. मेरा ड्राइवर आ कर उस फर्म तक ले जाएगा. गाड़ी आप के पास ही रहेगी. कामना जैसी आप की बेटी, वैसी ही मेरी.’’

कामना भावुक हो कर उन बुजुर्ग के पैरों पर  झुक गई, ‘‘चाचाजी, होटल का खर्चा हम देंगे. आप ने हमारे बारे में सबकुछ जान लिया है, पर अपने बारे में कुछ नहीं बताया.’’

उन बुजुर्ग सज्जन ने कहा, ‘‘बेटी, बातों में समय मत गंवाओ.’’

थोड़ी देर में गाड़ी फर्राटे से लहराती आगे बढ़ गई. फर्म पहुंच कर धड़कते दिल से वे दोनों सीढि़यां चढ़ने लगे.

‘‘कामना सिंह…’’ उस के पहुंचते ही कटे बाल, मिनी स्कर्ट वाली एक लड़की ने पूछा.

‘‘जी हां,’’ कामना ने कहा.

‘‘अंदर आइए, आप का इंतजार हो रहा है,’’ लड़की ने मधुर आवाज में कहा.

‘‘इंतजार और मेरा?’’ कामना बुदबुदाई.

कामना जब इंटरव्यू दे कर निकली तो उस के पैर जमीन पर नहीं थे. हाथ में पकड़ा हुआ नियुक्तिपत्र हवा में फड़फड़ा रहा था.

‘‘पिताजी, मु झे यह नौकरी मिल गई.’’

‘‘सच…’’ पिता को यकीन ही नहीं हुआ.

‘‘हां पिताजी, अच्छी सैलरी, फ्लैट अपने गांव के निकट वाले शहर में पोस्टिंग.’’

कालेसफेद मोतियों की तरह दिनरात बीतने लगे. आज कामना को नौकरी में आए

3 साल बीत गए. उस की शादी के रिश्ते आने लगे.

आज कामना की छुट्टी थी. वह घरेलू काम में जुटी हुई थी. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. आया ने किवाड़ खोल कर उसे आवाज दी. वह अपने आंचल से गीले हाथ पोंछ कर पीठ पर लहराते खुले बालों को समेटती हुई बैठक में पहुंची.

‘‘अरे, आप…’’ कामना को अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था.

‘‘हां, मैं. कैसी हो बेटी?’’ वे वही बुजुर्ग थे, जिन की कामना ने जान बचाई थी.

भीतर आने के बाद वे बुजुर्ग देर तक उस के पिता से बातें करते रहे.

बात आईगई हो गई. एक जगह कामना के ब्याह की बात पक्की हो गई. ब्याह का न्योता उन बुजुर्ग सज्जन को देने की हार्दिक इच्छा थी, पर उन का अतापता कामना के पास नहीं था.

बरात आ गई. शहनाई की गूंज तेज हो गई. बैंडबाजे की धुन और फिल्मी गीतों पर लड़केलड़कियां डांस करने लगे. दुलहन बनी कामना का दिल तेजी से धड़कने लगा. वरमाला के लिए सहेलियां उसे मंडप की ओर ले चलीं. जयमाल के समय उस की निगाहें बरातियों की ओर उठी गईं. अगली लाइन में वही बुजुर्ग छींटदार साफा बांधे उस की ओर देख कर मंदमंद मुसकरा रहे थे.

कामना चौंक उठी. उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

‘‘यही मेरे दादाजी हैं. इन की ही फर्म में नौकरी करती हैं आप. और इन्होंने ही मेरे लिए आप को पसंद किया है,’’ दूल्हा शरारत से फुसफुसाया.

‘‘मु झे पहले क्यों नहीं बताया?’’

‘‘दादाजी से पूछ लेना.’’

कामना ने हड़बड़ा कर अपने पिता की ओर देखा. उन की आंखों में मौन स्वीकृति थी. तो यह बात है. सभी ने मिल कर यह खूबसूरत नाटक खेला है उस के साथ. एक दिलकश साजिश की शिकार हुई है वह.

शादी के बाद कामना एक दिन दादाजी से पूछ ही बैठी, ‘‘आप ने हमें पहले क्यों नहीं बताया कि वह फर्म आप की है?’’

‘‘बेटी, मैं तुम बापबेटी के अच्छे बरताव से काफी प्रभावित हुआ था. अगर तुम दोनों ने भी मु झे दूसरे मुसाफिरों की तरह तड़पने के लिए प्लेटफार्म पर छोड़ दिया होता, तो निश्चित ही मेरी मौत हो गई होती. मैं तुम दोनों को अच्छी तरह परखना चाहता था, इसीलिए मैं ने 3 साल लिए.

‘‘मेरी जायदाद का एकलौता वारिस मेरा पोता भी तुम्हें जांचपरख ले. कोई जल्दबाजी नहीं. अगर संतुष्ट हो जाए तो तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बना ले. तुम मेरी कसौटी पर खरी उतरी और पोते के सपनों को साकार करने वाली भी.’’

कामना पिछले दिनों की कड़ियों का सूत्र एकदूसरे से जोड़ने की फुजूल की कोशिश करती हुई मन ही मन खुश हो उठी. दादाजी की कसौटी पर खरा उतरने का संतोष उस के चेहरे पर साफ झलक रहा था. Hindi Story

Hindi Story: इंतजार-क्या रुक्मी का पति उसके पास लौटा

Hindi Story: रुक्मी ने दीवार पर टंगी लालटेन उतार कर जलाई और सदर दरवाजा बंद कर के आंगन में बिछी खटिया पर आ कर बैठ गई. चारों तरफ निगाह घुमाई, तो हर तरफ एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था. पिछले 40 सालों से यह सन्नाटा ही तो उस के अकेलेपन का साथी रहा है.

अब तो रुक्मी को इस की इतनी आदत पड़ गई है कि इस सन्नाटे की भी आहटें उसे सुनाई दे जाती हैं, मानो सन्नाटा उस से बात करने की कोशिश करता हो.

रुक्मी ने लौ धीमी कर के लालटेन को फर्श पर टिकाया और खटिया पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगी.

55-56 साल पहले जब 12 बरस की रुक्मी इस घर में ब्याह कर आई थी, तब शहर से दूर कुदरत की गोद में बसे इस छोटे से गांव में उस के ससुर की इस पक्की हवेली के अलावा बाकी सभी घर कच्चे थे, लेकिन लोगों का आपसी प्यार बहुत पक्का था.

पूरा गांव एक संयुक्त परिवार की तरह मिलजुल कर रहता था और रुक्मी के ससुर बैजनाथ चौधरी परिवार के मुखिया की तरह ही यहां रहने वाले हर इनसान के सुखदुख का खयाल रखते थे.

परिवार में सासससुर के अलावा रुक्मी का पति गौरीनाथ और 4 ननदें थीं. धीरेधीरे ननदें अपनीअपनी ससुराल चली गईं और रुक्मी अपने सासससुर और पति के साथ इस हवेली में रह गई.

सासससुर ने हमेशा रुक्मी को खूब स्नेह दिया, लेकिन गौरीनाथ जैसेजैसे नौजवान हुआ, उस की उड़ानें अपने घर और गांव से निकल कर शहर तक होने लगीं. कालेज की पढ़ाई करने के लिए उसे शहर क्या भेजा गया कि वह पूरे तौर से शहर का ही हो कर रह गया.

चौधरी साहब ने कई बार बेटे से कहा कि वह गांव वापस आ कर यहां का कारोबार संभाले, लेकिन उस ने साफ कह दिया कि इतना पढ़नेलिखने के बाद अब वह खेतीबारी का देहाती काम नहीं करेगा.

बेटे के इनकार से निराश और अपनी बढ़ती उम्र से लाचार चौधरी साहब अपनी सारी जमीनजायदाद बेचने के बारे में सोचने लगे, तब एक दिन रुक्मी ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, आप अपने पुरखों की जमीन मत बेचिए. मैं आप को वचन देती हूं कि इस की पूरी देखभाल मैं करूंगी.’’

अपनी बहू की बात सुन कर पहले तो बैजनाथ चौधरी ने उसे जमीनजायदाद से जुड़ी जिम्मेदारियों की मुश्किलें बताते हुए इस  झमेले में न पड़ने को कहा, लेकिन रुक्मी ने खेतखलिहानों की देखभाल करते हुए कुछ ही समय में अपनी काबिलीयत का लोहा चौधरी साहब को मनवा दिया और उन्होंने बहू को सारा काम देखने की आजादी दे दी.

शहर जाने के शुरू के दिनों में तो गौरीनाथ महीने 2 महीने में गांव आता रहता था और यहां से अनाज और रुपए भरभर कर शहर ले जाता था, लेकिन जब रुक्मी की बेटी आशा का जन्म हुआ, तब चौधरीजी ने बेटे से कहा कि वह अनाज तो यहां से चाहे जितना ले जा सकता है, लेकिन पैसे पर अब उस का कोई हक नहीं है, क्योंकि यह पैसा रुक्मी की कड़ी मेहनत का फल है, इसलिए उस पर रुक्मी और उस की बेटी का हक है.

बाबूजी की बात सुन कर गौरीनाथ चिढ़ गया, लेकिन पिता पर कोई बस नहीं चलता था, इसलिए रुक्मी को शहर के खर्चों और अपनी परेशानियों के बारे में बता कर रुपए देने के लिए दबाव डालने लगा, लेकिन रुक्मी ने अपने ससुर की बात की इज्जत रखते हुए पति को पैसे देने से साफ इनकार कर दिया.

पैसा मिलना बंद होने के चलते धीरेधीरे गौरीनाथ ने गांव आना बहुत कम कर दिया. चौधरी साहब बेटे की नीयत को सम झ गए थे, इसलिए उन्होंने अपनी जमीन और पुश्तैनी हवेली रुक्मी के नाम कर दी. साथ ही, आशा की पढ़ाईलिखाई का भी पूरा ध्यान रखते हुए उस का नाम गांव के स्कूल में लिखवा दिया और थोड़ी बड़ी होने पर उस के लिए एक मास्टर रख कर घर में भी उस की पढ़ाई का पूरा इंतजाम करा दिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि अपनी मां की तरह अनपढ़ रह कर आशा को भी जिंदगी में तकलीफें उठानी पड़ें.

जब आशा 20 साल की थी, तब रुक्मी के ससुर का देहांत हो गया. सास पहले ही नहीं रही थीं. पिता के देहांत के बाद गौरीनाथ ने रुक्मी से कहा कि वह तो गांव में रह नहीं पाएगा, इसलिए यहां की जमीन और हवेली बेच कर शहर में बंगला खरीदेगा, जिस पर रुक्मी ने कहा कि वह बाबूजी को दिए हुए अपने वचन को निभाएगी और मरते दम तक बाबूजी की इस हवेली को बिकने नहीं देगी.

उस समय तो गौरीनाथ शहर वापस लौट गया, लेकिन 2 साल बाद अचानक वह आशा के जन्मदिन पर बेटी के लिए ढेर सारे कपड़े और उपहार ले कर गांव आया और रुक्मी के लिए भी साड़ी, चूडि़यां और लालीपाउडर ले कर आया. वह 4 दिनों तक घर पर रुका था और रुक्मी से ढेरों बातें भी की थीं.

रुक्मी को लगा था कि उस का पुराना गौरी वापस आ गया है, लेकिन वह गलत थी, क्योंकि उस का गौरी तो उस से नाता तोड़ने के लिए आया था.

शहर वापस जाने से एक दिन पहले जब रुक्मी ने रोते हुए गौरी से गांव लौट आने को कहा, तो उस ने रुक्मी को अपने पास बैठा कर बड़े प्यार से उस का हाथ थाम कर कहा था, ‘‘रुक्मी, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं, लेकिन अब शहर छोड़ कर नहीं आ सकता और तुम्हें शहर ले नहीं जा सकता, क्योंकि तुम देहातन हो और शहर के तौरतरीके नहीं जानती, इसलिए मैं अब एक पढ़ीलिखी शहरी लड़की से शादी करूंगा, जो शहर में मेरा साथ दे सके.’’

यह कह कर गौरीनाथ ने एक कानूनी कागज आगे करते हुए रुक्मी से उस पर अंगूठा लगवा कर बताया कि वह रुक्मी से तलाक ले रहा है, इसलिए अब वह यहां के खेतों और हवेली की जिम्मेदारियों से छुटकारा पा कर अपने घर वापस जा सकती है.

गौरीनाथ की पूरी बात रुक्मी ने बड़े आराम से सुनी, मगर जब उस ने गांव छोड़ कर जाने की बात कही, तो रुक्मी अपना आपा खो बैठी और बोली, ‘‘ब्याह से पहले अम्मांबाबू कहते थे कि शादी के बाद तेरी ससुराल ही तेरा घर होगा. मैं तो इसे ही अपना घर सम झती रही हूं और बाबूजी भी मु झे अपनी बिटिया जैसा स्नेह करते रहे.

‘‘अब मैं तुम्हें बता देती हूं कि यह हवेली और खेत बाबूजी ने मेरे नाम लिख दिए हैं, सो अब यही मेरा घर है. तुम मु झे यहां से नहीं निकाल सकते.’’

रुक्मी की बात सुन कर गौरीनाथ बगलें  झांकने लगा. उसे यह आज तक नहीं मालूम था कि उस के बाबूजी ने अपनी जायदाद का हकदार बेटे को नहीं, बल्कि अपनी बहू को बना दिया था.

गौरीनाथ ने रुक्मी से वसीयतनामा दिखाने को कहा, मगर शहरी गौरीनाथ की देहातन पत्नी ने उसे जवाब दिया कि वसीयतनामा तो अब वह तलाक के समय कचहरी में ही दिखाएगी.

अपनी पत्नी के तेवर देख कर गौरीनाथ ने आगे कोई बहस नहीं की. उस का अंगूठा लगा हुआ तलाकनामा ले कर शहर वापस चला गया.

गौरीनाथ को तो जवाब दे दिया था कि रुक्मी इस हवेली को छोड़ कर अब कहीं नहीं जाएगी, लेकिन उस का मन तो अपने पति के बहुत दूर चले जाने के एहसास से तड़प रहा था. जब गौरीनाथ ने ही उसे छोड़ने का फैसला कर लिया है, तो इस हवेली और जमीन से क्या लगाव.

रुक्मी की इच्छा हुई कि सबकुछ छोड़ कर इस दुनिया से ही चली जाए, लेकिन आशा का चेहरा देख कर उस ने खुद को संभाला और कलेजे पर पत्थर रख कर इस सचाई को स्वीकार कर लिया कि पति अब उस का नहीं रहा है.

कुछ ही दिनों में गौरीनाथ द्वारा रुक्मी को छोड़ कर शहरी मेम से ब्याह करने की खबर पूरे गांव में फैल गई, लेकिन गांव वालों ने अपने चौधरी साहब की बहू को पूरा संरक्षण देते हुए उसे बेफिफ्री से हवेली में रहने के लिए कहा और हमेशा उस का साथ देने का वचन दिया.

आज तक गांव वाले अपना वचन निभा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर रुक्मी की मदद के लिए पूरा गांव उस के साथ खड़ा हो जाता है.

आज से 40 साल पहले एक बार गौरीनाथ अपनी दूसरी पत्नी और बेटे को ले कर गांव आया था और रुक्मी को जमीनजायदाद अपने बेटे के नाम करने का दबाव डालने लगा था. तब गांव की पंचायत ने गौरीनाथ को अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि गांव की जमीन और हवेली पर केवल रुक्मी बहू का और उस के बाद आशा का हक है, इसलिए वह अपने शहरी परिवार को ले कर यहां से जा सकता है.

उस दिन के बाद गौरीनाथ ने अपनी पत्नी और बेटी की कोई खोजखबर नहीं ली. आशा के ब्याह के समय भी वह नहीं आया था. रुक्मी ने अकेले ही बेटी का कन्यादान किया था.

आशा का ब्याह बगल के गांव में हुआ है और उस के ससुराल वाले और पति बहुत सज्जन लोग हैं, इसलिए आशा अपनी मां से मिलने आती रहती है और दामाद भी जरूरत पड़ने पर रुक्मी की मदद के लिए पहुंच जाता है और फिर पूरे गांव का सहयोग तो है ही रुक्मी को. उस ने भी गांव वालों के लिए अपनी हवेली के फाटक खोल दिए हैं.

हवेली के बड़े कमरे में सुबह बच्चों की पाठशाला लगती है और शाम को उसी जगह प्रौढ़ शिक्षा केंद्र बन जाता है. हवेली का पीछे का हिस्सा और जमीन रुक्मी ने स्कूल के लिए दे दी है, जिस से उस के गांव वालों को खेतीबारी में बहुत मदद मिलती है और इसलिए पूरा गांव रुक्मी बहू के गुणगान करते नहीं थकता है.

लेकिन गांव वालों की इतनी इज्जत और स्नेह पाने के बाद भी कई बार रुक्मी को अकेलापन कचोटने लगता है और वह गौरी को याद कर के बिलखने लगती है. यह बेचैनी तब से और भी बढ़ गई है, जब से उसे खांसीबुखार ने घेरा है.

आशा और उस का पति जब पिछले महीने उस से मिलने आए, तो मां को बीमार और कमजोर देख कर वह लोग जिद कर के उस को पास के कसबे के अस्पताल में जांच करवाने ले गए.

डाक्टर ने बताया कि टीबी के चलते दोनों फेफड़े गल चुके हैं और अब रुक्मी की जिंदगी के कुछ ही दिन बचे हैं. आशा ने रोते हुए मां से अपने साथ चलने की जिद की, तो उस ने प्यार से बेटी को मना करते हुए कहा, ‘‘बिटिया, अब अंत समय में मैं अपनी देहरी छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी. मेरी फिक्र न करो, ये गांव वाले मेरा पूरा खयाल रखते हैं. बस, एक इच्छा रही है कि एक बार तेरे बापू को देख लेती.’’

लाख कहने पर भी जब मां साथ जाने के लिए नहीं मानीं, तो आशा ने इस उम्मीद से पिता को फोन किया कि रुक्मी की हालत के बारे में सुन कर शायद उन का मन पसीज जाए और वे मां से मिलने आ जाएं, पर गौरीनाथ ने बेटी को दोटूक जवाब देते हुए कहा, ‘‘मेरा उस से अब कोई रिश्ता नहीं है. तुम्हारी मां है, तुम जानो.’’

रुक्मी की देखभाल करने के लिए आशा को उस के पास छोड़ कर रुक्मी का दामाद अपने गांव चला गया. शाम को रुक्मी ने आशा से कहा, ‘‘बिटिया, मेरे बक्से में एक लाल साड़ी रखी है, वह मु झे पहना दो और सिंदूर की डिबिया ले आओ.’’

अपनी मां की इस मांग से परेशान आशा ने तुरंत अपने पति को फोन कर के जल्दी आने को कहा और फिर अपने आंसू पोंछते हुए मां के बक्से में से लाल साड़ी निकाल कर रुक्मी को पहना कर उन के बाल संवारे और सिंदूरदानी और आईना मां के सामने कर दिया.

उस समय न जाने कहां से रुक्मी के बेजान शरीर में इतनी ताकत आ गई कि  झट से चारपाई पर बैठ कर उस ने कंघे से अपनी मांग में सिंदूर भरा और फिर उठने की कोशिश में लड़खड़ा कर चारपाई पर गिर गई.

आशा ने मां को ठीक से लिटाना चाहा, तो बेटी का हाथ पकड़ कर वह बोली, ‘‘मु झे जमीन पर बिठा दो.’’

आशा ने बहुत सम झाया और आराम करने को कहा, लेकिन रुक्मी ने जिद पकड़ ली, तो आशा ने अपनी मां को सहारा दे कर फर्श पर बिठाया और तभी रुक्मी की आंखें पलटने लगीं और वह वहीं पर गिर पड़ी.

थोड़ी ही देर में रुक्मी के देहांत की खबर गांवभर में फैल गई और उन के अंतिम दर्शनों के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा, लेकिन रुक्मी को जिंदगीभर जिस का इंतजार रहा, वह गौरीनाथ पत्नी के आखिरी समय पर भी नहीं आया. Hindi Story

Hindi Story:पति परदेस में तो फिर डर काहे का

Hindi Story: जिला अलीगढ़ मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना गोंडा क्षेत्र में एक गांव है वींजरी. इस गांव में एक किसान परिवार है अतर सिंह का. उस के परिवार में उस की पत्नी कस्तूरी के अलावा 5 बेटे हैं. इन में सब से छोटा है जयकिंदर. अतर सिंह के तीसरे नंबर के बेटे को छोड़ कर सभी बेटों की शादियां हो चुकी हैं. इस के बावजूद पूरा परिवार आज भी एक ही मकान में संगठित रूप से रहता है. अतर सिंह का सब से छोटा बेटा जयकिंदर आंध्र प्रदेश में रेलवे में नौकरी करता है. डेढ़ साल पहले उस की शादी पुरा स्टेशन, हाथरस निवासी फौजी रमेशचंद्र की बेटी प्रेमलता उर्फ मोना के साथ तय हो गई थी. मोना के पिता के सामने अतर सिंह की कुछ भी हैसियत नहीं थी. यह रिश्ता जयकिंदर की रेलवे में नौकरी लग जाने की वजह से हुआ था.

अतर सिंह ने समझदारी से काम लेते हुए जयकिंदर की शादी से पहले अपने मकान के ऊपरी हिस्से पर एक हालनुमा बड़ा सा कमरा, बरामदा और रसोई बनवा दी थी, ताकि दहेज में मिलने वाला सामान ढंग से रखा जा सके. साथ ही उस में जयकिंदर अपनी पत्नी के साथ रह भी सके. मई 2015 में जयकिंदर और मोना की शादी हुई तो मोना के पिता ने दिल खोल कर दहेज दिया, जिस में घर गृहस्थी का सभी जरूरी सामान था.

मोना जब मायके से विदा हो कर ससुराल आई तो अपने जेठजेठानियों की हालत देख कर परेशान हो उठी. उन की माली हालत ठीक नहीं थी. उस की समझ में नहीं आया कि उस के पिता ने क्या देख कर उस की शादी यहां की. मोना ने अपनी मां को फोन कर के वस्तुस्थिति से अवगत कराया. मां पहले से ही हकीकत जानती थी. इसलिए उस ने मोना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुझे उन सब से क्या लेनादेना. छत पर तेरे लिए अलग मकान बना दिया गया है. तेरा पति भी सरकारी नौकरी में है. तू मौज कर.’’

मोना मां की बात मान गई. उस ने अपने दहेज का सारा सामान ऊपर वाले कमरे में रखवा कर अपना कमरा सजा दिया. उस कमरे को देख कर कोई भी कह सकता था कि वह बड़े बाप की बेटी है. उस के हालनुमा कमरे में टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और गैस वगैरह सब कुछ था. सोफा सेट और डबलबैड भी. शादी के बाद करीब 15 दिन बाद जयकिंदर मोना को अपने घर वालों के भरोसे छोड़ कर नौकरी पर चला गया.

पति के जाने के बाद मोना ने ऊपर वाले कमरे में न केवल अकेले रहना शुरू कर दिया, बल्कि पति के परिवार से भी कोई नाता नहीं रखा. अलबत्ता कभीकभार उस की जेठानी के बच्चे ऊपर खेलने आ जाते तो वह उन से जरूर बोलबतिया लेती थी. वरना उस की अपनी दुनिया खुद तक ही सिमटी थी.

उस की जिंदगी में अगर किसी का दखल था तो वह थी दिव्या. जयकिंदर के बड़े भाई की बेटी दिव्या रात को अपनी चाची मोना के पास सोती थी ताकि रात में उसे डर न लगे. इस के लिए जयकिंदर ही कह कर गया था. देखतेदेखते जयकिंदर और मोना की शादी को एकडेढ़ साल बीत गया. जयकिंदर 10-5 दिन के लिए छुट्टी पर आता और लौट जाता. उस के जाने के बाद मोना को अकेले ही रहना पड़ता था.

मोना को घर की जगह बाजार की चीजें खाने का शौक था. इसी के मद्देनजर उस के पति जयकिंदर ने एकदो बार नौकरी पर जाने से पहले उसे समझा दिया था कि जब उसे किसी चीज की जरूरत हो तो सोनू को बुला कर बाजार से से मंगा लिया करे. सोनू जयकिंदर के पड़ोसी का बेटा था जो किशोरावस्था को पार कर चुका था. वह सालों से जयकिंदर का करीबी दोस्त था. सोनू बिलकुल बराबर वाले मकान में रहता था. मोना को वह भाभी कह कर पुकारता था. मोना ने शादी में सोनू की भूमिका देखी थी. वह तभी समझ गई थी कि वह उस के पति का खास ही होगा.

जयकिंदर के जाने के बाद सोनू जब चाहे मोना के पास चला आता था, नीचे घर की महिलाएं या पुरुष नजर आते तो वह छज्जे से कूद कर आ जाता. दोनों आपस में खूब हंसीमजाक करते थे. मोना तेजतर्रार थी और थोड़ी मुंहफट भी. कई बार वह सोनू से द्विअर्थी शब्दों में भी मजाक कर लेती थी.

एक दिन सोनू जब बाजार से वापस लौटा तो मोना छत पर खड़ी थी. उस ने सोनू को देखते ही आवाज दे कर ऊपर बुला कर पूछा, ‘‘आज सुबह से ही गायब हो? कहां थे?’’

‘‘भाभी, बनियान लेने बाजार गया था.’’ सोनू ने हाथ में थामी बनियान की थैली दिखाते हुए बताया. यह सुन कर मोना बोली, ‘‘अगर गए ही थे तो भाभी से भी पूछ कर जाते कि कुछ मंगाना तो नहीं है.’’

‘‘कल फिर जाऊंगा, बता देना क्या मंगाना है?’’ सोनू ने कहा तो मोना ने पूछा, ‘‘और क्या लाए हो?’’

‘‘बताया तो बनियान लाया हूं.’’ सोनू ने कहा तो मोना बोली, ‘‘मुझे भी बनियान मंगानी है, ला दोगे न?’’

‘‘तुम्हारी बनियान मैं कैसे ला सकता हूं? मुझे नंबर थोड़े ही पता है.’’ सोनू बोला.

‘‘साइज देख कर भी नहीं ला सकते?’’

‘‘बेकार की बातें मत करो, साइज देख कर अंदाजा होता है क्या?’’

‘‘तुम बिलकुल गंवार हो. अंदर आओ साइज दिखाती हूं.’’ कहती हुई मोना कमरे में चली गई. सोनू भी उस के पीछेपीछे कमरे में चला गया.

कमरे में पहुंचते ही मोना ने साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया और सीना फुलाते हुए बोली, ‘‘लो नाप लो साइज. खुद पता चल जाएगा.’’

‘‘मुझ से साइज मत नपवाओ भाभी, वरना बहुत पछताओगी.’’

‘‘पछता तो अब भी रही हूं, तुम्हारे भैया से शादी कर के.’’ मोना ने अंगड़ाई लेते हुए साड़ी का पल्लू सिर पर डालते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ सोनू ने पूछा तो मोना बोली, ‘‘महीने दो महीने बाद घर आते हैं, वह भी 2 दिन रह कर भाग जाते हैं. और मैं ऐसी बदनसीब हूं कि देवर भी साइज नापने से डरता है. कोई और होता तो साइज नापता और…’’ मोना की आंखों में नशा सा उतर आया था. अभी तक सोनू मोना की बातों को केवल मजाक में ले रहा था. उस में उसी हिसाब से कह दिया, ‘‘जब भैया नौकरी से आएं तो उन्हीं को दिखा कर साइज पूछना.’’

‘‘अगर पति बुद्धू हो तो भाभी का काम समझदार देवर को कर देना चाहिए.’’ मोना ने सोनू का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘क्याक्या काम कराओगी देवर से?’’ सोनू ने शरारत से पूछा.

‘‘जो देवर करना चाहे, भाभी मना नहीं करेगी. बस तुम्हारे अंदर हिम्मत होनी चाहिए.’’ मोना हंसी.

‘‘कल बात करेंगे.’’ कहते हुए सोनू वहां से चला गया.

दूसरे दिन सोनू मां की दवाई लेने बाजार जाने के लिए निकला तो मोना के घर जा पहुंचा. उस वक्त मोना खाना बना कर खाली हुई थी. सोनू को देखते ही वह चहक कर बोली, ‘‘बाजार जा रहे हो क्या?’’

‘‘मम्मी की दवाई लेने जा रहा हूं. तुम्हें कुछ मंगाना हो तो बोलो?’’ सोनू ने पूछा. मोना बोली, ‘‘बाजार में मिल जाए तो मेरी भी दवाई ले आना.’’ मोना ने चेहरे पर बनावटी उदासी लाते हुए कहा.

‘‘पर्ची दे दो, तलाश कर लूंगा.’’

‘‘मुंह जुबानी बोल देना कि ‘प्रेमरोग’ है, जो भी दवा मिले, ले आना.’’

‘‘भाभी, तुम्हें ये रोग कब से हो गया?’’ सोनू ने हंसते हुए पूछा.

‘‘ये बीमारी तुम्हारी ही वजह से लगी है.’’ मोना की आंखों में खुला निमंत्रण था.

‘‘फिर तो तुम्हें दवा भी मुझे ही देनी होगी.’’

‘‘एक खुराक अभी दे दो, आराम मिला तो और ले लूंगी.’’ कहते हुए मोना ने अपनी दोनों बांहें उठा कर उस की ओर फैला दीं.

सोनू कोई बच्चा तो था नहीं, न बिलकुल गंवार था, जो मोना के दिल की मंशा न समझ पाता. बिना देर लगाए आगे बढ़ कर उस ने मोना को बांहों में भर लिया. थोड़ी देर में देवरभाभी का रिश्ता ही बदल गया.

सोनू जब वहां से बाजार के लिए निकला तो बहुत खुश था. मन में कई महीनों की पाली उस की मुराद पूरी हो गई थी.

दरअसल, जब से मोना ने उसे इशारोंइशारों में रिझाना शुरू किया था, तभी से वह उसे पाने की कल्पना करने लगा था. उस ने आगे कदम नहीं बढ़ाया था तो केवल करीबी रिश्तों की वजह से. लेकिन आज मोना ने खुद ही सारे बंधन तोड़ डाले थे. धीरेधीरे मोना और सोनू का प्यार परवान चढ़ने लगा. मोना को सासससुर, जेठजेठानी किसी का डर नहीं था. वह परिवार से अलग और अकेली रहती थी. पति परदेश में नौकरी करता था, बालबच्चा कोई था नहीं. बच्चों के नाम पर सब से बड़े जेठ की 14 वर्षीय बेटी दिव्या ही थी जो रात को मोना के साथ सोती थी. वह भी इसलिए क्योंकि जाते वक्त मोना का पति बडे़ भैया से कह कर गया था मोना अकेली है, दिव्या को रात में सोने के लिए मोना के पास भेज दिया करें.

तभी से दिव्या रात में मोना के पास सोती थी. सुबह को चाय पी कर दिव्या अपने घर आ जाती थी और स्कूल जाने की तैयारी करने लगती थी. उस के स्कूल जाने के बाद मोना 4-5 घंटे के लिए फ्री हो जाती थी. इस बीच वह शरारती देवर सोनू को बुला लेती थी. स्कूल से आने के बाद दिव्या कभी चाची के घर आ जाती तो कभी अपने घर रह कर काम में मां का हाथ बंटाती. कभीकभी वह अपनी सहेलियों को ले कर मोना के घर आ जाती और उसे भी अपने साथ खिलाती. मोना पूरी तरह सोनू के प्यार में डूब चुकी थी. वह चाहती थी कि दिन ही नहीं बल्कि पूरी रात सोनू के साथ गुजारे.

शाम ढल चुकी थी. अंधेरे ने चारों ओर पंख पसारने शुरू कर दिए थे. दिव्या को उस की मां मंजू ने कहा, ‘‘जब चाची के पास जाए तो किताबें साथ ले जाना, वहीं पढ़ लेना.’’ दिव्या ने ऐसा ही किया.

दिव्या चाची के घर पहुंची तो दरवाजे के किवाड़ भिड़े हुए थे. वह धक्का मार कर अंदर चली गई. अंदर जब चाची दिखाई नहीं दी तो वह कमरे में चली गई. कमरे में अंदर का दृश्य देख कर वह सन्न रह गई. वहां बेड पर सोनू और मोना निर्वस्त्र एकदूसरे से लिपटे पड़े थे. दिव्या इतनी भी अनजान नहीं थी कि कुछ समझ न सके. वह सब कुछ समझ कर बोली, ‘‘चाची, यह क्या गंदा काम कर रही हो?’’

दिव्या की आवाज सुनते ही सोनू पलंग से अपने कपड़े उठा कर बाहर भाग गया. मोना भी उठ कर साड़ी पहनने लगी. फिर मोना ने दिव्या को बांहों में भरते हुए पूछा, ‘‘दिव्या, तुम ने जो भी देखा, किसी से कहोगी तो नहीं?’’

‘‘जब चाचा घर वापस आएंगे तो उन्हें सब बता दूंगी.’’

‘‘तुम तो मेरी सहेली हो. नहीं तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी.’’ मोना ने दिव्या को बहलाना चाहा, लेकिन दिव्या ने खुद को मोना से अलग करते हुए कहा, ‘‘तुम गंदी हो, मेरी सहेली कैसे हो सकती हो?’’

‘‘मैं कान पकड़ती हूं, अब ऐसा गंदा काम नहीं करूंगी.’’ मोना ने कान पकड़ते हुए नाटकीय अंदाज में कहा.

‘‘कसम खाओ.’’ दिव्या बोली.

‘‘मैं अपनी सहेली की कसम खा कर कहती हूं बस.’’

‘‘चलो खेलते हैं.’’ इस सब को भूल कर दिव्या के बाल मन ने कहा तो मोना ने दिव्या को अपनी बांहों में भर कर चूम लिया, ‘‘कितनी प्यारी हो तुम.’’

26 दिसंबर, 2016 की अलसुबह गांव के कुछ लोगों ने गांव के ही गजेंद्र के खेत में 14 वर्षीय दिव्या की गर्दन कटी लाश पड़ी देखी तो गांव भर में शोर मच गया. आननफानन में यह खबर दिव्या के पिता ओमप्रकाश तक भी पहुंच गई. उस के घर में कोहराम मच गया. परिवार के सभी लोग रोतेबिलखते, जिन में मोना भी थी घटनास्थल पर जा पहुंचे. बेटी की लाश देख कर दिव्या की मां का तो रोरो कर बुरा हाल हो गया. किसी ने इस घटना की सूचना थाना गोंडा पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही गोंडा थानाप्रभारी सुभाष यादव पुलिस टीम के साथ गांव पींजरी के लिए रवाना हो गए. तब तक घटनास्थल पर गांव के सैकड़ों लोग एकत्र हो चुके थे. थानाप्रभारी ने भीड़ को अलग हटा कर लाश देखी. तत्पश्चात उन्होंने इस हत्या की सूचना अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी और प्रारंभिक काररवाई में लग गए.

थोड़ी देर में एसपी ग्रामीण संकल्प शर्मा और क्षेत्राधिकारी पंकज श्रीवास्तव भी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. लाश के मुआयने से पता चला कि दिव्या की हत्या उस खेत में नहीं की गई थी, क्योंकि लाश को वहां तक घसीट कर लाने के निशान साफ नजर आ रहे थे. मृत दिव्या के शरीर पर चाकुओं के कई घाव मौजूद थे.

जब जांच की गई तो जहां लाश पड़ी थी, वहां से 300 मीटर दूर पुलिस को डालचंद के खेत में हत्या करने के प्रमाण मिल गए. ढालचंद के खेत में लाल चूडि़यों के टुकड़े, कान का एक टौप्स, एक जोड़ी लेडीज चप्पल के साथ खून के निशान भी मिले.

जांच चल ही रही थी कि डौग एक्वायड के अलावा फोरेंसिक विभाग के प्रभारी के.के. मौर्य भी अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल से बरामद कान के टौप्स और चप्पलें मृतका दिव्या की ही थीं. जबकि लाल चूडि़यों के टुकड़े उस के नहीं थे. इस से यह बात साफ हो गई कि दिव्या की हत्या में कोई औरत भी शामिल थी. डौग टीम में आई स्निफर डौग गुड्डी लाश और हत्यास्थल को सूंघने के बाद सीधी दिव्या के घर तक जा पहुंची. इस से अंदेशा हुआ कि दिव्या की हत्या में घर का कोई व्यक्ति शामिल रहा होगा.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पंचनामा भर कर दिव्या की लाश को पोस्टमार्टम के लिए अलीगढ़ भिजवा दिया गया. पूछताछ में दिव्या के परिवार से किसी की दुश्मनी की बात सामने नहीं आई. अब सवाल यह था कि दिव्या की हत्या किसने और किस मकसद के तहत की थी.

हत्या का यह मुकदमा उसी दिन थाना गोंडा में अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत दर्ज हो गया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम दिव्या का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

दूसरे दिन थानाप्रभारी ने महिला सिपाहियों के साथ पींजरी गांव जा कर व्यापक तरीके से पूछताछ की. दिव्या की तीनों चाचियों से भी पूछताछ की गई. सुभाष यादव अपने स्तर पर पहले दिन ही दिव्या की हत्या की वजह के तथ्य जुटा चुके थे. बस मजबूत साक्ष्य हासिल कर के हत्यारों को पकड़ना बाकी था.

दिव्या की सब से छोटी चाची मोना से जब चूडि़यों के बारे में सवाल किया गया तो उस ने बताया कि वह चूड़ी नहीं पहनती, लेकिन जब तलाशी ली गई तो उस के बेड के पीछे से लाल चूडि़यां बरामद हो गईं, जो घटनास्थल पर मिले चूडि़यों के टुकड़ों से पूरी तरह मेल खा रही थीं. सुभाष यादव का इशारा पाते ही महिला पुलिस ने मोना को पकड़ कर जीप में बैठा लिया. पुलिस उसे थाने ले आई.

थाने में थानाप्रभारी सुभाष यादव को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. मोना ने हत्या का पूरा सच खुद ही बयां कर दिया. सच सामने आते ही बिना देर किए गांव जा कर मोना के प्रेमी सोनू को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

सोनू के अलावा नगला मोनी के रहने वाले मनीष को भी धर दबोचा गया. दोनों को थाने ला कर पूछताछ के बाद हवालात में डाल दिया गया. दिव्या हत्याकांड के खुलासे की सूचना एसपी ग्रामीण संकल्प शर्मा और सीओ इगलास पंकज श्रीवास्तव को दे दी गई.

दोनों अधिकारियों ने थाना गोंडा पहुंच कर थानाप्रभारी सुभाष यादव को शाबासी देने के साथ अभियुक्तों से खुद भी पूछताछ की.

पूछताछ में मोना के साथ उस के प्रेमी सोनू व उस के दोस्त ने जो कुछ बताया वह कुछ इस तरह था-

दिव्या ने सोनू को मोना के साथ शारीरिक संबंध बनाते देख लिया था. उस ने चाचा के घर लौटने पर उसे सब कुछ सचसच बता देने की बात भी कही थी. उस समय बात खत्म जरूर हो गई थी. फिर भी डर यही था कि बाल बुद्धि की दिव्या ने अगर यह बात जयकिंदर को बता दी तो उस का क्या हश्र होगा, इसी से चिंतित मोना व सोनू ने योजना बनाई कि जयकिंदर के आने से पहले दिव्या की हत्या कर दी जाए.

दिव्या हर रोज मोना के साथ ही सोती थी और अलसुबह चाची के साथ दौड़ लगाने जाती थी. कभीकभी वह दौड़ने के लिए वहीं रुक जाती थीं. जब कि मोना अकेली लौट आती थी. दिव्या को दौड़ का शौक था, ये बात घर के सभी लोग जानते थे. इसी लिए हत्या में मोना का हाथ होने की संभावना नहीं मानी जाएगी, यह सोच कर मोना ने सोनू के साथ योजना बना डाली, जिस में सोनू ने दूसरे गांव के रहने वाले अपने दोस्त मनीष को भी शामिल कर लिया.

26 दिसंबर को सोनू व मनीष पहले ही वहां पहुंच गए. मोना दिव्या को ले कर जब डालचंद के खेत के पास पहुंची तो घात में बैठे सोनू और मनीष ने दिव्या को दबोच कर चाकुओं से वार करने शुरू कर दिए. दिव्या ने बचने के लिए मोना का हाथ पकड़ा, जिस से उस के हाथ से 2 चूडि़यां टूट कर वहां गिर गईं. हत्यारे उसे खींच कर खेत में ले गए, जहां गर्दन काट कर उस की हत्या कर डाली. इसी छीनाझपटी में दिव्या के कान का एक टौप्स भी गिर गया था और चप्पलें भी पैरों से निकल गई थीं.

दिव्या की हत्या के बाद ये लोग लाश को खींचते हुए लगभग 300 मीटर दूर गजेंद्र के खेत में ले गए. इस के बाद सभी अपनेअपने घर चले गए.

हत्यारा कितना भी चतुर हो फिर भी कोई न कोई सुबूत छोड़ ही जाता है. जो पुलिस के लिए जांच की अहम कड़ी बन जाता है. ऐसा ही साक्ष्य मोना की चूडि़यां बनीं, जिस ने पूरे केस का परदाफाश कर दिया. Hindi Story

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