Bhojpuri Celebrity Interview: किरदार बनावटी-न हो अनूप अरोरा

Bhojpuri Celebrity Interview: भोजपुरी सिनेमा के शानदार और संजीदा एक्टरों में शुमार अनूप अरोरा ने अपनी एक्टिंग से एक अलग पहचान बनाई है. उन्होंने अब तक सैकड़ों फिल्मों में अलगअलग किस्म के किरदार निभा कर यह साबित किया है कि वे केवल एक एक्टर नहीं हैं, बल्कि एक्टिंग के प्रति समर्पित कलाकार हैंअदाकारी के प्रति उन का जुनून और अनुशासन ही उन्हें भीड़ से अलग बनाता है. 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान उन से बातचीत हुई. पेश हैं, उस के खास अंश :

इतने
लंबे समय तक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में टिके रहना, आप इसे कैसे देखते हैं?
यह एक लगातार चलने वाला सफर है. यहां हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, वरना लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं.

भोजपुरी सिनेमा की मौजूदा दशा और दिशा को आप कैसे देखते हैं?
आज हमारे पास प्लेटफार्म और पहुंच दोनों हैं, लेकिन कंटैंट की सोच कमजोर हो रही है. हमें अच्छे कंटैंट से जुड़ना होगा. भोजपुरी में कम बजट में भी दमदार फिल्में बन सकती हैं. भोजपुरी सिनेमा के कुछ ऐसे चेहरे हैं, जो दर्शकों के दिल और दिमाग में बसते हैं. उन्हीं चुनिंदा लोगों में आप का नाम शामिल है.

आप इस उपलब्धि को कैसे देखते हैं?
मेरे लिए यह किसी अवार्ड से कम नहीं है. दर्शकों के दिल और दिमाग में जगह बनाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है और खुशी भी. मैं ने हमेशा कोशिश की है कि जो भी किरदार करूं, उस में सच्चाई हो, बनावटीपन हो. कलाकार वही होता है जिसे लोग स्वीकार करें.

अगर आप को किसी फिल्म में पूरी तरह लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो आप किस तरह की कहानी और किरदार को चुनेंगे?
हर कलाकार के अंदर कहीं कहीं एक सपना होता है कि वह ऐसा किरदार निभाए जो दर्शकों के दिल में लंबे समय तक जिंदा रहे. अगर लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो मैं ऐसी कहानी करना चाहूंगा, जो समाज से जुड़ी हो, जिस में मनोरंजन के साथसाथ एक मजबूत संदेश भी हो. किरदार की बात करूं तो मैं एक आम इनसान की असाधारण कहानी निभाना चाहूंगा, जो हालात से लड़ कर अपनी पहचान बनाता है. ऐसा रोल जिस में इमोशन, एक्शन और ग्रे शेड्स तीनों हों.                             

कौमेडियन को अलग पहचान मिले – रोहित सिंह ‘मटरू’
भोजपुरी फिल्मों में जब भी परदे पर हंसी की फुहार छूटती है, तो अकसर उस के पीछे किसी कौमेडियन की मेहनत छिपी होती है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि कौमेडियन को अकसर उतना सम्मान नहीं मिलता जितना किसी हीरो या विलेन को मिलता है.
भोजपुरी फिल्मों के चर्चित हास्य कलाकार रोहित सिंहमटरूइस सच्चाई को खुल कर स्वीकार करते हैं. अपनी देशी शैली, सहज संवाद और सटीक कौमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वालेमटरूसे पटना में हुई मुलाकात में हुई लंबी बातचीत में उन्होंने सिर्फ अपने संघर्षों की कहानी सुनाई, बल्कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की कई अनकही बातों पर भी बेबाक राय रखी. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप की पहचान आज एक कौमेडियन के रूप में बन रही है. लेकिन इस की शुरुआत कैसे हुई?
सच कहूं तो मैं ने कभी प्लान कर के कौमेडियन बनने का फैसला नहीं किया था. बचपन से ही मेरी आदत थी कि माहौल गंभीर हो जाए तो मैं कोई मजाक कर देता था. परिवार वाले कहते थे कि तुम जहां जाते हो, वहां हंसी का माहौल बन जाता है. धीरेधीरे लगा कि अगर यही काम लोगों को खुशी देता है, तो इसे ही अपना रास्ता क्यों बनाया जाए. बस, वही आदत आज मेरा पेशा बन गई. अकसर कहा जाता है कि

भोजपुरी फिल्मों में कौमेडियन को सिर्फ हलके मनोरंजन के लिए रखा जाता है. आप क्या सोचते हैं?
यह बात काफी हद तक सच है. कई फिल्में ऐसी होती हैं जहां कौमेडियन को सिर्फ 2-3 सीन दे कर कहा जाता है कि बस लोगों को हंसा देना. लेकिन कौमेडी करना इतना आसान नहीं है. एक कौमेडियन पूरी फिल्म का मूड बदल सकता है. अगर कहानी में सही तरीके से कौमेडी जोड़ी जाए, तो फिल्म और भी मजबूत हो सकती है.

आप की कौमिक टाइमिंग की काफी तारीफ होती है. इस का राज क्या है?
कौमेडी में सब से जरूरी चीज टाइमिंग है. अगर संवाद एक सैकंड पहले या बाद में बोल दिया, तो पूरा मजाक खराब हो सकता है. मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि सीन को महसूस करूं. जब कलाकार सीन को जीता है, तब ही असली कौमेडी निकलती है.
आप को सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स जैसे मंच पर सम्मान मिलता है तो आप को कैसा लगता है?
अवार्ड मिलना हर कलाकार का सपना होता है. अगर ऐसा सम्मान मिलता है तो निश्चित रूप से खुशी होती है. लेकिन सच कहूं तो जब कोई दर्शक मिल कर कहता है कि आप की वजह से हम हंसे, तो वह मेरे लिए किसी भी ट्रौफी से बड़ा पुरस्कार होता है.

आने वाले समय में आप का सपना क्या है?
मैं चाहता हूं कि भोजपुरी फिल्मों में कौमेडी को अलग पहचान मिले. हमारे यहां इतने अच्छे कौमेडियन हैं, लेकिन उन्हें सही मौके नहीं मिलते. अगर उन्हें अच्छे किरदार और मजबूत कहानी मिले, तो भोजपुरी कौमेडी पूरे देश में लोकप्रिय हो सकती है. आज की जिंदगी में तनाव बहुत बढ़ गया है. अगर मेरी कौमेडी से किसी के चेहरे पर दो मिनट की मुसकान जाती है, तो लगता है कि मेरा मकसद कामयाब हो गया है.                        

Political Kahani: हम रह गए जीरो पड़ोसी बन रहा हीरो

Political Kahani:: मार्च में एकदम से मौसम का मिजाज बदल गया था. अनामिका ने सोचा कि विजय से मिल लेती हूं, पर जब वह उस के घर गई, तो विजय का मूड उखड़ा हुआ था.
‘‘मुंह क्यों लटकाया हुआ है?
सब ठीक है ?’’
अनामिका ने विजयसे पूछा.
‘‘सब मस्त. देख बिन मौसम की बारिश ने ठंडक बढ़ा दी है,’’ विजय बेमन से बोला.
‘‘हम्म, पर तुम्हारे चेहरे पर बारह क्यों बजे हैं?’’ अनामिका ने कहा.
‘‘चल , रणवीर सिंह की नई फिल्म देखने चलते हैं. सिनेमाघर पर फिल्म देखे बहुत दिन हो गए हैं. कौर्नर की सीट लेंगे,’’ विजय यह कह तो रहा था, पर उस का ध्यान कहीं और ही था.
‘‘विजय, सच बताओ कि क्या बात है? तुम्हें तो अभी कोई अवार्ड भी मिला है. तुम ने उस का भी नहीं बताया. मैं ने सोशल मीडिया पर तेरा फोटो देखा था अवार्ड लेते हुए,’’ अनामिका बोली.
‘‘फिल्म देखते हुए हम समोसे खाएंगे. बारिश के मौसम में समोसे खाने का अलग ही मजा है,’’
विजय ने कहा.

‘‘पता है, रसोई गैस कितनी महंगी हो गई है. 15 रुपए का समोसा अब 20 रुपए में मिल रहा है. सिनेमाघर में तो कम से कम 50 रुपए का होगा. और तू मु? अपने अवार्ड की बात क्यों नहीं बता रहा है?’’ अनामिका ने विजय का हाथ पकड़ कर पूछा.
‘‘अरे यार, क्या बताऊंमैं तो बड़ी मुसीबत में फंस गया. चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौट वाली कहावत  फिट बैठती है,’’ विजय ने धीरे से कहा.
‘‘ पूरी बात बताओ,’’ अनामिका ने विजय के बालों में हाथ फेरते हुए कहा.
‘‘तुम तो जानती हो कि पड़ोस में जो जसवंत अंकल हैं, वे लोकल गुरुद्वारा के मैंबर हैं. इस बार उन्होंनेयुवा शक्ति अवार्डके लिए चुना था. मतलब उन की गुरुद्वारा कमेटी ने. पिछले
रविवार को वहां हुए एक कार्यक्रम में उन लोगों ने मेरा सम्मान किया था. मु? एक शील्ड, सर्टिफिकेट और शौल भी दिया था.’’
‘‘हां, मैं ने तुम्हारे सोशल मीडिया हैंडल पर उस कार्यक्रम से जुड़े फोटो और वीडियो देखें थे. पर यह तो खुशी की बात है. मुंह किस बात पर फूला हुआ है, यह बताओ?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस अवार्ड के चक्कर में मैं अब घनचक्कर बन गया हूं. हुआ यों कि मंगलवार को हमारे पड़ोस में रहने वाले अग्रवाल अंकल और मिस्टर जोसेफ का जसवंत अंकल के साथ ?ागड़ा हो गया. शोर सुन कर मैं भी वहां चला गया,’’ विजय ने बताया.
‘‘फिर आगे क्या हुआ?’’ अब अनामिका थोड़ा परेशान हो गई थी.
‘‘सारा ?ागड़ा एक नाली के गंदे पानी को ले कर था. अग्रवाल अंकल और जोसेफ अंकल बोल रहे थे कि जसवंत अंकल की वजह से नाली का पानी भर कर सड़क पर गया है, पर वे बोले कि पीछे वाले करीम भाई की वजह से ऐसा है.

‘‘बस, फिर क्या था, जसवंत अंकल को अकेला देख कर वे दोनों उन से भिड़ गए और धकियाने लगे. जब मैं ने जसवंत अंकल की साइड ली, तो अग्रवाल अंकल बोले, ‘तु? तो अवार्ड दिलाया है , तू तो इस का पक्ष लेगा ही.’ ‘‘इस पर जसवंत अंकल बिफर गए. हट्टेकट्टे तो वे हैं ही, उन्होंने दोनों अंकल को अकेले ही पीट डाला. मैं ने बीचबचाव की कोशिश की, पर तब तक तो मामला बिगड़ चुका था. कुछ लोगों ने उन तीनों को छुड़ाया, पर इस सब में मैं बुरा बन गया. अग्रवाल अंकल और जोसेफ अंकल मु? से बहुत ज्यादा नाराज हैं.
‘‘जोसेफ अंकल ने तो इतना तक कह दिया, ‘जसवंत तो करीम भाई से जलता है, इसलिए उस का नाम लगा रहा है. तू ने भी गलत आदमी का साथ दिया.’
‘‘यार, अनामिका, मैं तो बेवजह फंस गया. अब तो मैं अग्रवाल अंकल और मिस्टर जोसेफ से नजरें भी नहीं मिला पा रहा. उन दोनों के घर के दरवाजे तो मेरे लिए जैसे बंद हो गए हैं,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘ओह, तो यह मामला है. अब आया . पर तू जानता है कि किसी और के साथ भी ऐसा हुआ है…’’ अनामिका बोली.
‘‘किस के साथ?’’ विजय ने हैरानी से पूछा.
‘‘हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ. उन्हें इजराइल ने अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दिया और उसी के बाद से इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया. इस सब से दुनियाभर में यह संदेश गया कि भारत इजराइल और अमेरिका के साथ है ओर ईरान हमारा दुश्मन देश है.

‘‘कोढ़ पर खाज तो यह रही कि हमविश्वगुरुकी तरह सुलह कराने के सपने देख रहे थे कि नरेंद्र मोदी अमेरिका और इजराइल से कह कर युद्ध रुकवा देंगे, पर उन की कहीं भी नहीं चलती दिख रही.
‘‘अब खबर आई है कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर ऐसा कुछ करिश्मा कर सकते हैं कि यह युद्ध रुक जाए,’’ इतना कह कर जैसे अनामिका ने विजय पर कोई बम फोड़ दिया.
‘‘मु? पूरी बात बता कि सारा माजरा क्या है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘खबरों की मानें तो ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से उपजी चिंताओं के बीच पाकिस्तान मीडिएटर के रोल में नजर रहा है. वह अमेरिका के संदेश ईरान तक पहुंचा रहा है और तेहरान के जवाब वाशिंगटन को देने का काम कर रहा है.

‘‘इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर से फोन पर बातचीत की. व्हाइट हाउस के मुताबिक, चर्चा का मेन मुद्दा ईरान युद्ध था. हालांकि, इस बातचीत को संवेदनशील बताते हुए बड़े अफसरों ने और ज्यादा बताने से इनकार कर दिया.
‘‘व्हाइट हाउस की प्रैस सचिव कैरोलिन लिविट ने पहले कहा था
कि यह संवेदनशील कूटनीतिक चर्चा है और अमेरिका मीडिया के जरीए कोई बातचीत नहीं करेगा.
‘‘सूत्रों के मुताबिक, आसिम मुनीर
ने डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की और पाकिस्तान ने खुद को अमेरिकी और ईरान के बड़े अफसरों के बीच बातचीत की संभावित जगह के रूप में पेश किया.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से बात की. एक्स पोस्ट के जरीए उन्होंने ईद उल फितर और नवरोज की शुभकामनाएं दीं और ईरान के लोगों के साथ अपनी हमदर्दी जताई.
‘‘शहबाज शरीफ ने कहा कि दोनों पक्षों ने खाड़ी क्षेत्र के गंभीर हालात पर चर्चा की और तनाव कम करने, डायलौग और कूटनीति की जरूरत पर सहमति जताई. उन्होंने इसलामी दुनिया में एकता और क्षेत्र में शांति बहाल करने में पाकिस्तान के रोल पर भी जोर दिया.
‘‘इस बीच सोमवार, 23 मार्च को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेहरान के साथ बेहतर और ठोस बातचीत के बाद उन्होंने हमले को 5 दिनों तक टालने की घोषणा की थी. हालांकि, यह साफ नहीं है कि पाकिस्तान का मीडिएटर बनने का डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से सीधा संबंध है या नहीं.
‘‘ईरान ने सीधे अमेरिका के साथ बातचीत से इनकार किया है, लेकिन विदेश मंत्रालय ने कहा कि कुछ मित्र देशों के जरूरी संदेश मिले हैं. जानकारों के मुताबिक, यह कूटनीतिक कोशिश अभी शुरुआती चरण में है.’’

‘‘तुम्हें इस से क्या सम? आता है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यही कि ईरान और अमेरिका के बीच सुलह की कोशिशें तेज हो गई हैं. अमेरिकी समाचार आउटलेट एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के अफसरों की इसी कड़ी में पाकिस्तान में मुलाकात और बातचीत मुमकिन है. पाकिस्तान में अमेरिकी और ईरानी अफसरों के बीच यह बैठक हो सकती है.
‘‘इजराइल के न्यूज चैनल-12 ने इजराइली अफसर के हवाले से बताया कि पाकिस्तान में होने वाली संभावित बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख हो सकते हैं.
‘‘अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने सोमवार, 23 मार्च को इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी ईरान से खुली बातचीत करने पर चर्चा की. ‘‘इस से पहले एक रिपोर्ट में यह
भी कहा गया कि तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान के प्रतिनिधि व्हाइट हाउस के दूत स्टीव विटकौफ से मुलाकात कर चुके हैं. साथ ही, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से भी अलग से मिले.
‘‘इस से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने के संकेत दे चुके हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ पर ईरान के साथ पौजिटिव बातचीत की बात कही थी. साथ ही, ईरान के पावर प्लांट्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले हमलों को 5 दिन के लिए टाल दिया था.
‘‘डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि चर्चाओं का यह दौर पूरे हफ्ते जारी रहेगा. दोनों देशों के बीच गहन चर्चाओं के पौजिटिव रवैए को देखते हुए, मैं ने अमेरिकी रक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि ईरान के पावर प्लांट्स और ऊर्जा ढांचे पर सभी सैनिक हमलों को फिलहाल 5 दिनों के लिए टाल दिया जाए.’’
‘‘तो तुम यह मानती हो कि पाकिस्तान इस युद्ध को रुकवा सकता है, जबकि नरेंद्र मोदी नहीं?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘बात अगर इस खबर की करें, तो क्यों नहीं. सोचो कि इस सब में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर का नाम लिया जा रहा है और अगर पाकिस्तान कामयाब रहता है, तो फिर हमारे पड़ोसी का कद बढ़ना तय है. ‘‘मेरे खयाल से असली कूटनीति यही होती है कि चुपचाप काम को करो, ढिंढ़ोरा मत पीटो. पर हमारे देश मे पिछले कुछ साल से काम कम हो रहे हैं और बातें ज्यादा बनाई जा रही हैं.
‘‘तेल और रसोई गैस की कोई कमी नहीं है, पर जनता जो भुगत रही है वह भी सब के सामने है. गैस सिलैंडर की कालाबाजारी हो रही है. जो चाय कल तक 10 रुपए की एक कप थी, वह आज 15 रुपए हो गई हैऔर भी जाने किस तरह से महंगाई ने देश को कब्जे में ले लिया है.’’
‘‘कह तो तुम सही रही हो.

जैसा हाल मेरे पड़ोसियों ने क्या है, वैसा ही हाल देश चलाने वालों का हो गया है. गलत का साथ देने से पहले कई बार सोचना चाहिए. हर पड़ोसी से बना कर रखनी चाहिए, फिर चाहे वह कोई देश हो या पासपड़ोस,’’ विजय ने कहा. ‘‘अब ज्यादा मुंह मत लटकाओ और स्माइल करो. हमें हर बात से सीख लेनी चाहिए. फिलहाल जनता अगर चुप है, तो इस का मतलब यह नहीं है कि उस में अपना गुस्सा दिखाने की ताकत नहीं है. जैसे तुम ने इस मामले से सबक सीखा है, उसी तरह देश के नेताओं खासकर सत्ता पक्ष को भी सबक सीखना चाहिए वरना 2 बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बाजी मार जाता है.
‘‘हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालत फिलहाल तो किसी खिसियानी बिल्ली जैसी है, जो अपनी फर्जी कामयाबी का खंभा नोंच रही है,’’ अनामिका ने दो टूक कहा.         

Award Night: कामयाबी टैलेंट से मिलती है -संजना पांडेय

Award Night: भोजपुरी सिनेमा मेंटीआरपी क्वीनके नाम से मशहूर हीरोइन संजना पांडेय ने बतौर लीड एक्ट्रेस कई दर्जन हिट फिल्में भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को दी हैं. उन्होंने अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत भोजपुरी के लोकप्रिय सिंगर समर सिंह के साथलाल चुनरिया वालीसे की थी, जिस में उन के काम को खूब सराहा गया था. आज वे भोजपुरी की उन हीरोइनों में शुमार हैं, जिन की फिल्में सिनेमाघर के साथसाथ टीवी पर भी खूब देखी जाती हैं. उन की फिल्में टीवी पर टीआरपी के मामले में अव्वल रहती हैं. उन कीप्रीत का दामन’, ‘कलक्टर साहब’, ‘कारपोरेट बहू’, ‘कुंआरी कन्या’, ‘रानी बेटी राज करेगीजैसी फिल्मों ने टीआरपी के मामले में बड़े स्टारों को भी पीछे छोड़ दिया है. ‘रानी बेटी राज करेगीने तो रिकौर्ड ही तोड़ दिया है.
7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान संजना पांडेय से हुई मुलाकात में उन के फिल्म कैरियर के कई अनछुए पहलुओं पर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

आप के लिए बिना किसी गौडफादर के इंडस्ट्री में कदम रखना कितना चुनौती से भरा रहा?
मेरा मानना है कि इंडस्ट्री में आगे बढ़ने के लिए गौडफादर का होना कोई जरूरी नहीं है. मैं ने बिना गौडफादर के अपने टैलेंट के बलबूते अपना रास्ता तय किया. हां, यह रास्ता मुश्किल जरूर रहा, लेकिन टैलेंट ने कामयाबी भी दिलाई.

शुरुआती दिनों में सब से बड़ा रिजैक्शन कौन सा था और आप ने उस से क्या सीखा?
शुरुआत के दिनों में सब से बड़ा रिजैक्शन मेरे लिए यह था कि मैं ने अपने कैरियर की शुरुआत गायन से की थी. ऐसे में भोजपुरी की कई बड़ी फिल्में बड़े एक्टरों के साथ इसलिए हाथ से निकल जाती थीं कि वे मु? बतौर हीरोइन एक्सैप्ट नहीं कर रहे थे.
ऐसे में बड़ेबड़े हीरो के मना करने के चलते शुरुआती दौर की कई फिल्में मेरे हाथ से निकल गईं. लेकिन मैं ने भी ठान लिया था कि मु? गायिका के साथ ही बतौर हीरोइन भी अपनी जगह बनानी है.

आप की एक्टिंग जर्नी में ऐसा कौन सा मोड़ आया, जिस ने सबकुछ बदल दिया?
मेरे फिल्म सफर में मेरी दूसरी फिल्मप्रीत का दामनने सबकुछ बदल कर रख दिया था. जब यह फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों नें मेरे रोल को इतना पसंद किया कि मैं हिट क्या सुपरहिट हीरोइनों की लिस्ट में शामिल हो गई.

क्या थिएटर आर्टिस्ट्स फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा मजबूत होते हैं?
थिएटर आर्टिस्ट्स फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा मजबूत होते हैं, क्योंकि मैं ने दिल्ली में रह कर
4 साल थिएटर के जरीए अभिनय सीखा है. थिएटर ने मेरे अंदर के कलाकार को और भी निखार कर बाहर लाने का काम किया है. जो भी कलाकार थिएटर बैकग्राउंड से फिल्म इंडस्ट्री में आते हैं, वे हर रोल में फिट बैठ जाते हैं.

किसी किरदार को ‘जीने’ के लिए आप क्या तैयारी करती हैं?
सब से पहले मैं फिल्म की स्क्रिप्ट में अपने किरदार को सम?ाने की कोशिश करती हूं और उस किरदार में ढलने की कोशिश करती हूं. मैं अपने किरदार को कई बार पढ़ती हूं, जिस से मैं खुद उस कैरेक्टर के साथ इंसाफ कर पाऊं.

आप ने कहा कि कामयाबी अंग प्रदर्शन से नहीं, टैलेंट से मिलती है. ऐसा कहने की क्या वजह है?
मेरा मानना है कि कामयाब होने के लिए अंग प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं है. आप पुरानी हिंदी फिल्मो को ले लीजिए. इन फिल्मों की हीरोइनों में रेखा को ले लीजिए या मेरे पसंदीदा एक्ट्रेस मीना कुमारी या नूतन, वैजयंती माला और साधना को ले लीजिए. इन्होंने कभी भी अंग प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन कामयाबी ने इन के कदम चूमे. अगर आप में टैलेंट है तो आप को लोग सिरआंखों पर बैठा लेते हैं.

एक्टिंग या सिंगिंग, आप किसे अपने ज्यादा करीब मानती हैं?
एक्टिंग और सिंगिंग दोनों ही मेरे बहुत करीब हैं. चूंकि बचपन से गायन से जुड़ी रही, इसलिए यह कह सकती हूं कि सिंगिंग मेरे ज्यादा करीब है. लेकिन मेरे कैरियर में अभिनय और गायन दोनों माने रखते हैं, इसलिए मैं दोनों को बराबर के नजरिए से देखती हूं.

आप का कोई ऐसा गाना जो आप के दिल के बहुत करीब है?
अपने सभी गाने मु? पसंद हैं. मेरी एक फिल्म आई थीसेनुर’, जिस में मैं ने खुद ही गाना गाया था. गाने के बोल थेबेटीबेटी कहिके…’ यह गाना मेरे दिल के काफी करीब है.

लाइव परफौर्मैंस और स्टूडियो रिकौर्डिंग में आप को क्या फर्क महसूस होता है?
लाइव परफौर्मैंस के दौरान हम आडियंस से आमनेसामने कनैक्ट हो जाते हैं. आडियंस का जिस तरह का मूड होता है, उसी तरह से परफौर्म करना पड़ता है. स्टूडियो में हम बारबार रीटेक कर सकते हैं, लेकिन लाइव परफौर्मैंस के दौरान आडियंस को ध्यान में रखना पड़ता है.

आप की जिंदगी का सब से बड़ा मोटिवेशन क्या है?
मैं अपने पापा के खिलाफ जा कर इस इंडस्ट्री में आई थी, क्योंकि पापा चाहते थे कि मैं डाक्टर बनूं. लेकिन मैं जिद ठान कर इस इंडस्ट्री में आई. पापा कीमनाने मु? मोटिवेट किया और मेरीहांने मु? टूटने नहीं दिया. इसी मोटिवेशन के चलते  कामयाबी मिली.

क्या आप सोशल मीडिया को जरूरी मानती हैं?
आज के दौर में सोशल मीडिया बहुत जरूरी है, क्योकि अपनी चीजों को देशदुनिया में पहुंचाने का यह बहुत बड़ा जरीया है. लेकिन कुछ लोगों को इस की बुरी लत लग जाती है. लोग दिनभर सोशल मीडिया में डूबे रहते हैं. ऐसे लोग अपना नुकसान कर बैठते हैं.

क्या आप किसी बड़ी हस्ती की बायोपिक में काम करना चाहेंगी?
मैं जब तक शारदा सिन्हाजी की बायोपिक नहीं कर लूंगी, तब तक मेरे अंदर का कलाकार अधूरा रहेगा.

महिलाओं के लिए इस इंडस्ट्री में क्याक्या बदलाव जरूरी हैं?
सैटेलाइट टीवी आने से महिलाओं को काफी आजादी मिली है. आज की भोजपुरी हीरोइनों का कैरियर हीरो की बदौलत नहीं, बल्कि हीरो का कैरियर हीरोइनों की बदौलत चल रहा है. आज की महिलाएं बहुत आजादी के साथ काम कर रही हैं.                                         

Crime Story: सीमा पार इश्क के लिए 3 करोड़ की साइबर ठग

Crime Story:  कहते हैं कि इश्क सरहदें नहीं देखता. दूरी, देश, भाषा सब पीछे छूट जाते हैं. मोबाइल की स्क्रीन पर उभरता एक नाम धीरेधीरे आदत बन जाता है. दिन की शुरुआत उसी संदेश से होती है और रात उसी आवाज के साथ खत्म. भरोसा बनता है, सपने जुड़ते हैं और भविष्य की तसवीरें भी खिंचने लगती हैं. लेकिन जब यही रिश्ता पैसे के लेनदेन से जुड़ जाए, तो कहानी केवल प्यार की नहीं रहती. वह कानून, जांच और अदालत तक पहुंच जाती है.

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के डबलीराठान गांव का हरदीप सिंह इस समय ऐसी ही एक कहानी का केंद्र है. साइबर थाना पुलिस के मुताबिक उसे एक साइबर ठगी मामले में गिरफ्तार किया गया है, जिस में तकरीबन 3 करोड़, 26 लाख रुपए डिजिटल तरीके से ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि यह राशि क्रिप्टोकरैंसी के जरीए भेजी गई. मामला फिलहाल कोर्ट में कल रहा है.
हरदीप सिंह एक साधारण किसान परिवार से जुड़ा नौजवान था. उस के पिता खेती करते थे. घर की आमदनी लिमिटेड थी. उस ने गांव के स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई की. आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सका. बेहतर रोजगार की तलाश में उसने कंप्यूटर का काम सीखा. इंटरनैट और सोशल मीडिया उस के लिए नई उम्मीदों की दुनिया थे.

तकरीबन 2 साल पहले सोशल मीडिया के जरीए उस का मेलजोल पाकिस्तान की एक लड़की राबिया से हुआ. शुरुआत सामान्य बातचीत से हुई. फिर नियमित चैटिंग शुरू हुई. धीरेधीरे बातचीत निजी होती गई.
पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह भावनात्मक रूप से जुड़ गया था. बातचीत में भविष्य और शादी तक की चर्चा होने की बात सामने आई है. जांच अफसरों के मुताबिक कुछ समय बाद पैसे से जुड़ी मदद की मांग शुरू हुई. शुरुआत छोटी रकम से हुई. कभी जरूरत का हवाला, कभी उपहार की बात. आरोपी ने कथिततौर पर कुछ भुगतान किया. लेकिन मांगों का दायरा बढ़ता गया. भावनात्मक दबाव और पैसे के बीच वह उल?ाता गया.

पुलिस के मुताबिक इसी दौर में आरोपी ने गैरकानूनी तरीके से पैसा कमाने की दिशा में कदम बढ़ाया. पूछताछ में उस ने बताया कि उसे साइबर ठगी के जरीए कमाई का सु?ाव मिला था. इस दावे की जांच जारी है. डिजिटल चैट, काल रिकौर्ड और बैंक ट्रांजैक्शन की जांच की जा रही है. जांच में सामने आया कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सस्ते सामान बेचने के नाम पर लोगों को आकर्षित किया गया. इश्तिहार में कीमत बाजार से कम बताई जाती थी. ग्राहकों से पहले भुगतान लिया जाता था. कई मामलों में भुगतान के बाद सामान नहीं भेजा गया. बाद में पीडि़तों ने शिकायत दर्ज कराई.

धीरेधीरे यह गतिविधि संगठित रूप लेने लगी. पुलिस के मुताबिक ठगी की रकम अलगअलग खातों में जमा की जाती थी. आरोपी ने अपने गांव के कुछ लोगों को यह कह कर भरोसे में लिया कि उस का बैंक खाता अस्थायी रूप से बंद है और कुछ समय के लिए उन के खाते की जरूरत है. गांवदेहात के समाज में सामाजिक भरोसा मजबूत होता है. कुछ लोगों ने सहमति दे दी. जांच में सामने आया कि ठगी की रकम उन्हीं खातों में जमा की जाती थी. बाद में रकम निकाल कर डिजिटल वालेट में डाली जाती और फिर क्त्रिप्टोकरैंसी में बदली जाती थी.

पुलिस का दावा है कि तकरीबन 3 करोड़, 26 लाख रुपए यूएसडीटी के जरीए ट्रांसफर किए गए. यह रकम डिजिटल चैनलों से सीमा पार पहुंची होने की बात जांच में सामने आई. क्रिप्टोकरैंसी के इस्तेमाल ने मामले को और मुश्किल बना दिया. पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम में लेनदेन का रास्ता साफ रहता है. लेकिन डिजिटल टोकन के जरीए राशि कई वालेट में ट्रांसफर की जा सकती है. साइबर माहिरों के मुताबिक ऐसे मामलों में जिस के पास पैसा गया है, उस की पहचान करना चुनौती से भरा होता है. मामला तब उजागर हुआ जब हनुमानगढ़ के रहने वाले एक आदमी ने साइबर ठगी की शिकायत दर्ज कराई. उस ने सोशल मीडिया पर सामान खरीदने के लिए भुगतान किया था, लेकिन सामान नहीं मिला.

बैंक लेनदेन की जांच करते हुए पुलिस आरोपी तक पहुंची. मोबाइल फोन और सिम कार्ड की जांच में कई गलत ट्रांजैक्शन सामने आए. पुलिस के मुताबिक, आरोपी से 26 बैंक पासबुक, 8 चैकबुक, 18 एटीएम कार्ड, 8 सिम कार्ड और 3 मोबाइल फोन बरामद किए गए. पाकिस्तान से जुड़े कुछ दस्तावेज भी मिलने की बात कही गई. जांच में यह भी सामने आया कि इन खातों से जुड़े 14 राज्यों में 36 साइबर ठगी शिकायतें दर्ज हैं. संबंधित राज्यों की एजेंसियों के साथ तालमेल किया जा रहा है. जिला पुलिस सुपरिंटैंडैंट के मुताबिक पूछताछ में आरोपी ने पाकिस्तान जा कर शादी करने की इच्छा जताई थी. उस ने वीजा के लिए अर्जी भी दी थी, लेकिन रजामंदी नहीं मिली. सीमापार मेलजोल और पैसे के लेनदेन की पूरी कड़ी की जांच जारी है.

राबिया के रोल की फिलहाल जांच चल रही है. डिजिटल सुबूतों की बुनियाद पर उस के जुड़े होने की तसदीक की जा रही है. आखिरी नतीजा अदालत में पेश सबूतों पर ही साफ होगा. यह मामला केवल 3 करोड़, 26 लाख रुपए के डिजिटल ट्रांसफर का नहीं है. यह उस बदलती डिजिटल संस्कृति का उदाहरण भी है, जिस में गांव का नौजवान भी वर्ल्ड नैटवर्क से जुड़ा है. इंटरनेट ने मौके दिए हैं, लेकिन जोखिम भी बढ़ाए हैं. सोशल मीडिया पर बनी पहचान असली भी हो सकती है और फर्जी भी. साइबर माहिर बताते हैं कि मौडर्न ठगी का बड़ा हिस्सा तकनीकी हैकिंग से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तरीकों से होता है. पहले विश्वास जीता जाता है. इनसान को भावना के लैवल पर जोड़ा जाता है. फिर पैसे की मांग जोड़ी जाती है.

इसे सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता है. इस सब में इनसान खुद अपने पैसे सौंप देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह किसी अपने की मदद कर रहा है. नैशनल लैवल पर साइबर अपराध के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. औनलाइन शौपिंग धोखाधड़ी, इन्वैस्टमैंट ठगी और सोशल मीडिया से जुड़ी धोखाधड़ी बढ़ रही है. डिजिटल भुगतान की सुविधा जितनी आसान हुई है, अपराध का तरीका भी उतना ही तेज हुआ है. गांवदेहात के इलाकों में इंटरनैट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन डिजिटल जागरूकता अभी भी कम है. गांव के लोगों के लिए बैंक खाता भरोसे का सिंबल है. कोई परिचित मदद मांगे तो शक कम होता है. यही भरोसा कई बार अपराध की कड़ी बन जाता है.

कानूनी नजरिए से ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराएं लागू हो सकती हैं. आर्थिक अपराध केवल पैसों का नुकसान नहीं करता, बल्कि सामाजिक इज्जत और भविष्य पर भी बुरा असर डालता है. यह घटना समाज के लिए चेतावनी है. इंटरनैट पर बने रिश्तों में पैसे के लेनदेन से पहले पूरी सावधानी जरूरी है. बैंक खाता, एटीएम कार्ड, पिन या ओटीपी सा? करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है. साइबर ठगी में तुरंत 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए. एक साधारण गांवदेहात का नौजवान, एक औनलाइन रिश्ता और 3 करोड़, 26 लाख रुपए का डिजिटल ट्रांसफर. यह कहानी अब अदालत के फैसले का इंतजार कर रही है. आखिरी फैसला कोर्ट करेगा. लेकिन यह घटना एक बड़ा मैसेज छोड़ती है. डिजिटल जमाने में भावनाएं तेज हैं, लेकिन कानून उस से भी तेज है. सीमा पार इश्क अगर पैसे के लेनदेन से जुड़ जाए, तो उस का अंजाम केवल निजी नहीं, कानूनी भी हो सकता है. इश्क अपनी जगह है. इंटरनैट अपनी जगह. लेकिन जिम्मेदारी और कानून दोनों से ऊपर हैं.   

राकेश खुडिया

Crime Story: औनर किलिंग-घर आए दामाद को दी दर्दनाक मौत

त्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का एक बहुत पौश इलाका है आशियाना, जहांऔनर किलिंगका ऐसा कांड किया गया कि सुनने और देखने वाली की रूह कांप गई. वहां के सैक्टरआई में मंगलवार, 17 मार्च, 2026 की रात एक एडवोकेट तीरथ राज सिंह ने अपनी बेटी साक्षी के प्रेम विवाह से नाराज हो कर अपने ही दामाद विष्णु यादव की बेरहमी से हत्या कर दी, जिस से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया.

मिली जानकारी के मुताबिक, प्रतापगढ़ के सांगीपुर इलाके के रहने वाले 32 साल के विष्णु यादव ने महज 4 साल पहले एडवोकेट तीरथ राज सिंह की बेटी साक्षी से प्रेम विवाह किया था. पर तीरथ राज सिंह इस शादी के खिलाफ थे और तब से ही अपने दामाद और बेटी से  दुश्मनी पाल बैठे थे.विष्णु यादव और साक्षी अपनी 3 साल की बेटी अर्चिता के साथ प्रतापगढ़ में ही रहते थे. पर 17 मार्च को विष्णु यादव अपनी पत्नी साक्षी की जिद पर ससुराल में लखनऊ आए थे.

मंगलवार की रात को तकरीबन साढ़े 10 बजे विष्णु यादव और उन के ससुर तीरथ राज सिंह के बीच किसी बात को ले कर तीखी बहस शुरू हो गई और देखते ही देखते यह बहस हाथापाई में बदल गया.
घर के भीतर शोर सुन कर विष्णु यादव की सालियां और परिवार के दूसरे सदस्य भी वहां पहुंच गए. इसी बीच, गुस्से से तमतमाए तीरथ राज ने पास पड़ी चारपाई का पाया उठाया और विष्णु के सिर पर ताबड़तोड़ चोट कर दी, जिस से विष्णु का सिर फट गया और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. बीचबचाव करने साक्षी भी पिता के हमले में घायल हो गई.

इस हत्याकांड की सूचना मिलते ही पुलिस सुपरिंटैंडैंट (मध्य) विक्रांत वीर और एसीपी कैंट अभय प्रताप मल्ल भारी पुलिस बल और फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौका वारदात
से हत्या में इस्तेमाल चारपाई का पाया बरामद कर लिया, जबकि फोरैंसिक टीम ने मौके से फिंगरप्रिंट्स और दूसरे तमाम सुबूत जुटाए. इतना ही नहीं, पुलिस ने तीरथ राज सिंह और उन की चार बेटियों को हिरासत में ले लिया. पुलिस सुपरिंटैंडैंट विक्रांत वीर ने बताया कि पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इस हत्याकांड की साजिश पहले से रची गई थी या यह अचानक हुए  का नतीजा है.   

Readers Problem: प्रेमी प्रेमिका का ब्रेकअप-गम काहे का

Readers Problem: 23 साल की संजना का अपने प्रेमी रोहन से ब्रेकअप हो गया था. वह कई सालों से उस से प्यार करती थी. वह इस ब्रेकअप के बाद काफी दुखी और हताश हो चुकी थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि रोहन को कैसे समझाए कि वह उसे दिलोजान से प्यार करती है, जबकि रोहन ने कई बार अपनी शारीरिक जरूरतें पूरी करने के बाद ‌उस से किनारा कर लिया था.

उन दोनों के बीच ब्रेकअप होने बड़ी वजह है थी रोहन का नताशा नाम की लड़की के प्यार में पड़ जाना. नताशा काफी बोल्ड किस्म की लड़की थी. अब‌ वे दोनों खुल कर मिल रहे थे. संजना यह सब देख कर जलभुन रही‌ है. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे हालात में क्या किया जाए.

गहरी निराशा में एक दिन संजना ने ढेर सारी नींद की गोलियां खा कर खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की. उस के मातापिता ने समय रहते इलाज कराया, तब जा कर वह बच पाई.

20 साल की नाजिया अपने साथ पढ़ने वाले फरहान से प्यार करती थी, पर कुछ दिन से वह फरहान को अनदेखा करने लगी थी, क्योंकि वह अपने बचपन के दोस्त इकबाल से नजदीकियां बढ़ाने लगी थी. इस बात से फरहान काफी निराश और दुखी रहने लगा था और डिप्रैशन में चला गया था.

नाजिया से प्यार में धोखा खाने के बाद फरहान खुदकुशी करने की कोशिश करने लगा था, पर उस के एक खास दोस्त ने मौके पर पहुंच कर उसे बचा लिया था.

आज ज्यादातर नौजवान प्यार में नाकाम हो कर उलटीसीधी और ऊलजुलूल हरकते करने लगते हैं. कई बार तो भावनाओं में बह कर संजना और फरहान की तरह वे खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने लगते हैं या फिर खुदकुशी तक करने पर उतारू हो जाते हैं, जबकि यह नासमझी भरा कदम होता है.

2 लोगों के बीच का प्यार बहुत ही नाजुक अहसास होता है. जब कोई लड़की किसी लड़के से प्यार करती है तो उसे दिलोजान से चाहती है. उस के बिना अपनेआप को अधूरा समझने लगती है. यह बिलकुल स्वाभाविक है. यही लड़के के साथ भी होता है. कोई लड़का अगर किसी लड़की को दिल से चाहता है, तो उस के बिना अपनेआप को अधूरा समझने लगता है. जैसा कि फरहान अपनेआप को समझने लगा था और खुदकुशी करने पर उतारू हो गया था. वह तो गनीमत थी कि उस के दोस्त मौके पर पहुंच कर उसे बचा लिया था.

माना कि प्यार में धोखा खाने के बाद या ब्रेकअप होने के बाद के हालात असहज हो जाते हैं, लेकिन इतना भी नहीं होते कि एकदूसरे के बिना खुद को नुकसान पहुंचाया जाए या खुदकुशी जैसे अपराध को अंजाम दिया जाए.

इस से उलट आज की यंग जैनरेशन पुरानी सोच से परे हो कर ‘तू नहीं‌ कोई और सही’ के फार्मूले पर चलती है. प्यार में धोखे खाने पर वह भावनाओं में बह कर नहीं सोचती है, बल्कि उस से सीख ले कर अगली बार नए प्रेमी या प्रेमिका के साथ पिछले गलतियों को नहीं दोहराती है.

19 साल की कालेज में पढ़ने वाली अलका मौडर्न सोच की लड़की है. उस का कहना है, “मेरे एक नहीं, बल्कि 2-2 बौयफ्रैंड रह चुके हैं. मैं एक प्रेमी के साथ लिवइन में भी रह चुकी हूं. हालांकि जिस प्रेमी के साथ लिवइन में रही थी, उस के साथ बेहद ही बुरा अनुभव रहा था.

“मैं जिस लड़के के साथ जिंदगीभर का साथ निभाना चाहती थी, उस के बारे में धीरेधीरे बहुत कुछ जान गई थी. वह लड़का जीवनसाथी बनने लायक नहीं था, इसलिए मैं उस से समय रहते अलग हो गई. उस लड़के से मैं शुरुआती दिनों में बहुत प्यार करती थी, उसे दिलोजान से चाहती थी. उस से अलग होना इतना आसान नहीं था.”

आज अलका जिस लड़के के साथ जिंदगी बिताना चाहती है, वह उस के साथ कुछ दिन समय बिता कर संतुष्ट हो चुकी है. यह सब लंबे समय तक एकदूसरे के साथ घूमनेफिरने से ही मुमकिन हो पाया है. लेकिन बिना सोचेसमझे जल्दीबाजी में जिंदगी गुजारने की बात सोचना भी ठीक नहीं है.

किसी इनसान को देख लेने भर से और इधरउधर थोड़ाबहुत मिलनेजुलने से उस की अच्छाइयों या बुराइयों को हम बहुत जल्दी नहीं जान पाते हैं. आजकल के कुछ लड़केलड़कियां थोड़ीबहुत मुलाकात में अच्छा होने का नाटक तो जरूर करते हैं, लेकिन आप जैसेजैसे उन से खुलते जाएंगे या उन के साथ कुछ दिन बिता लेंगे, तो ज्यादातर चीजों के बारे में जान लेंगे.

लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या किसी प्रेमीप्रेमिका के चले जाने से जिंदगी रुक जाती है? क्या जिंदगी को अधूरा मान लेना चाहिए? नहीं. ऐसा करना शायद खुद के साथ बेईमानी होगा.

आज किसी भी लड़कालड़की को ब्रेकअप होने के बाद या उस के चाहने वाले के जिंदगी से अलग हो जाने के बाद यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उस के बिना जिंदगी अधूरी हो गई है, बल्कि यह सोचना चाहिए कि प्रेमीप्रेमिका का मिलना या बिछड़ना एक आम बात है.

सभी प्यार करने वाले या प्यार का दिखावा करने वाले जीवनसाथी बनने लायक नहीं होते हैं. ऐसे लोग लंबे समय तक जिंदगी में टिक भी नहीं पाते हैं. कहीं न कहीं उन की खामियां समय पर नजर आ ही जाती हैं और दोनों को अलग होने पर मजबूर कर देती हैं.

हां, ऐसे लोग जिंदगी में बहुत बड़ी सीख दे जाते हैं. आगे की जिंदगी में हमें सोचसमझ कर कदम उठाना होता है. अपने लिए बौयफ्रैंड या गर्लफ्रैंड का चुनाव करते समय सावधानी बरतनी होती है कि कहीं आगे किसी धोखे की गुंजाइश न रहे.

कई लोगों को प्यार नहीं हवस की भूख होती हैं. ऐसे लोग शारीरिक जरूरतें पूरी हो जाने के बाद किनारा कर लेते हैं या धीरेधीरे यह जता देते हैं कि हमारी जरूरत पूरी हो गई है.

ऐसे लोगों की नजर में आप की भावनाओं का कोई मोल नहीं होता है. आप के प्यार की कोई कद्र नहीं होती है. ऐसे में अपनेआप को नुकसान पहुंचाना समझदारी नहीं है, बल्कि समय रहते चेतने की जरूरत होती है.

अगली बार जब‌ आप अपने प्रेमीप्रेमिका का चुनाव करें तो सोचसमझ कर करें. उसे भावनात्मक रूप से समझने की कोशिश करें. जब आप का मन यह स्वीकार कर ले कि आप का प्रेमी या प्रेमिका आप के लिए परफैक्ट है, तभी उसे सबकुछ सौंपें.

Politics: पंजाब एक अनाज फैक्ट्री

Politics: पंजाब जो देश की एक तरह की अनाज फैक्ट्री रहा है और आज भी उत्तर भारत के अमीर राज्यों में से एक है, एक बार फिर अलगाववादी ताकतों की वजह से सुलगने लगा है. अमृतपाल ङ्क्षसह ही वारिस पंजाब दे के समर्थक पूरे पंजाब में फैले हुए है और हजारों को बंद करने के बावजूद हर कोने में खुले आम दिख रहे हैं. हालांकि पंजाब में इंटरनैट पर पाबंदी है और हथियार ले कर घूमना मना है, ये लोग अमृतपाल ङ्क्षसह को दूसरा ङ्क्षमडरावाला मानते हुए कमजोर आम आदमी पार्टीकी सरकार का पूरा फायदा उठा रहे हैं.

पंजाब की खुशहाली पंजाबी सिखों के लिए ही जरूरी नहीं है, वह उन लाखों मजदूरों के लिए भी जरूरी है जो दूसरे राज्यों से यहां काम करने आए हैं और अपने गौयूजक राज्य की पोल खोलते हुए क्याक्या कर अपने गांवों में भेज रहे हैं. पंजाब में कोई भी गड़बड होगी तो इन लाखों बिहारी, राजस्थानी, उत्तर प्रदेश के उडिय़ां,

मध्यप्रदेश मजदूरों के लिए आफत हो जाएगी. इन सब राज्यों में तो पूजापाठ का काम ही पहला धंधा है पर पंजाब में किसानी का काम बड़ा है और इसीलिए किसान कानूनों का जबरदस्त मुकाबला पंजाबी किसानों ने किया था. अब ये ही किसान अमृतपाल ङ्क्षसह जैसे जबरन आधे अधूरे जने को नेता मान कर चल रहे है और पीलीे झंडों के नीचे इकट्ठा हो रहे हैं तो गलती कहीं केंद्र की

राजनीति की है जो ङ्क्षहदूङ्क्षहदू राग आलाप रही है और मुलसमानों को डराते हुए यह नहीं सोच पा रही थी कि यह शोर पंजाब के सोए खालिस्तानियों को भी जगा देगा. भारत दूसरे कई देशों के मुकाबले अच्छी शक्ल में है तो इसलिए कि यहां लोकतंत्र ने जड़े जमाई हुई हैं और आजादी के 75 साल में से ज्यादा ऐसी सरकारें रहीं जो धर्म से परे रहीं. भारतीय जनता पार्टी ने धाॢमक धंधों का फायदा उठा कर मंदिरों के इर्दगिर्द राजनीति तो चला ली और सत्ता पर कब्जा तो कर लिया पर भूल गर्ई कि मंदिर राजनीति दूसरे धर्मों को भी यही दोहराने के उकसाती है.

अब पंजाब के गुरूद्वारे फिर से राजनीति का गढ़ बनने लगे हैं और धीरेधीरे अमृतपाल ङ्क्षसह के पिछलग्गू गुरूद्वारों पर कब्जा करने लगे हैं या यूं कहिए कि गुरूद्वारों को चलाने वाले अमृतपाल ङ्क्षसह का खुल कर नही तो छिप कर साथ दे रहे हैं.

यह पंजाब के मजदूरों को दहशत में डालने वाली बात है क्योंकि ये मजदूर पूरी तरह ङ्क्षहदू अंधविश्वासों से भरे हैं. गरीब, अधपढ़े, अपने गांवों से, घरों से दूर रहने वाले मजदूर समझ नहीं पाते कि जिस मंदिर के पास वे अपनी मन्नते पूरी कराने जाते हैं उस के पास के गुरूद्वारों में दूसरे धर्म के लोग कुछ और कह रहे हैं. मंदिरों में होने वाली आमदनी पर सब की निगाहें रहती हैं और जब लगता है किमंदिर के सहारे पूरी सत्ता पर कब्जा किया जा सकता है तो जैसे रणजीत ङ्क्षसह के जमाने में इच्छा, गुरूद्वारों के सहारे वैसा क्यों नहीं हो सकता.

देश को आज अलगाव नहीं चाहिए आज कंधे और हाथ चाहिए जो अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान का मुकाबला कर सकें और अपना रहनसहन इन देशों की तरह का बना सकें. अगर हम अपनी ताकत धर्म के नाम खर्च करते रहेंगे तो हमारी हालत पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसी हो सकती है. हम ने बीज तो उस के बो रखे हैं पर लोकतंत्र का पेस्टीसाइड इन को फूटने नहीं दे रहा. जब भी लोकतंत्र कमजोर हुआ, क्या होगा कह नहीं सकते. यह पक्का है कि पंजाब में काम कर रहे दूसरे राज्यों के मजदूरों के लिए आफत हो सकती है.

Sociopolitical: अब इस देश में जवानों का बोलना मना है

Sociopolitical: ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भारत के प्रधानमंत्री रह चुके लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. उन्होंने माना था कि देश जवानों और किसानों से चलता है. उस के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के साथसाथ ‘जय विज्ञान’ को भी जोड़ा यानी टैक्नोलौजी की भी बातें होने लगीं. लेकिन आज ‘जय जवान, जय किसान’ और ‘जय विज्ञान’ से जुड़े तीनों समूहों का हाल बेहाल है.

जवानों को दिमागी रूप से पंगु बना कर उन के वेतनमान में बढ़ोतरी तो की गई, लेकिन उन की हालत भी एक नए गुलामों की तरह ही है. वहीं किसानों और मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि उन की हालत और भी खराब होती जा रही है.

हमारे देश के वैज्ञानिकों और विज्ञान के छात्रों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र के बजाय ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.

नई आर्थिक नीति लाने वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ के सपनों को मटियामेट कर दिया.

कांग्रेस शासित नरसिंह राव व मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद किसानों की जमीनें पूंजीपतियों को दी जाने लगीं. बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर दबाव बनाया गया कि वे नई तरह की खेती करें. इस नई खेती के चलते बहुत से किसान कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी करने लगे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 1995 से ले कर अब तक तकरीबन साढ़े 3 लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, जबकि गैरसरकारी आंकड़े इस से भी ज्यादा हैं. सरकारी नीतियों ने इन किसानों को ‘जय किसान’ की जगह ‘मर किसान’ बना दिया.

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसानों की हालत सुधरी नहीं, बल्कि बदतर ही हुई और उन्हीं के शासन में जवानों के शव उठाने वाले ताबूत का घोटाला हो गया.

‘जय विज्ञान’ का नारा देने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन किया और ठेकेदारी प्रथा को लागू किया. मजदूरों को न्यूनतम वेतन से भी आधे पैसों पर काम करना पड़ रहा है और उन की मेहनत की कमाई लूट बन कर ठेकेदारों को मालामाल कर रही है. हालत यह हो गई कि सभी सरकारी दफ्तरों में फोर्थ क्लास के कर्मचारी ठेके पर रखे जाने लगे. यहां तक कि डाक्टर और मास्टर भी ठेकेदारी प्रथा के शिकार हो गए. यही हालत ‘श्रमेव जयते’ की भी है.

मोदी सरकार के आने के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि जवान ही ‘देशभक्त’ हैं और उन्हीं की बदौलत हम सुरक्षित और जिंदा हैं. आप उन पर कोई सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि इस से उन का मनोबल गिरता है. वहां कोई भ्रष्टाचार नहीं है, जाति और धर्म का भेदभाव नहीं है. नतीजतन, ड्यूटी के बाद बैंक या एटीएम की लाइन में अपनी तकलीफ जाहिर करने पर भी किसी शख्स को ड्यूटी पर तैनात जवानों के साथ जोड़ कर देशभक्ति का पाठ पढ़ाते कुछ सिरफिरे मिल जाते हैं. झूठी देशभक्ति के जज्बे दिखा कर सही सवालों को हमेशा छिपाया गया है.

ऐसा नहीं है कि तेज बहादुर यादव का वीडियो वायरल होने से पहले मंत्रियों, अफसरों, मीडिया वालों को इस तरह के गलत बरताव का पता नहीं था. इस वीडियो के आने से पहले भी जवानों की खुदकुशी, डिप्रैशन, अफसरों के बुरे बरताव, छुट्टियां नहीं मिलने व अपने साथियों पर गोली चलाने की खबरें कई बार आ चुकी हैं. यहां तक कि वीके सिंह ने भी माना है कि सेना का जनरल रहते हुए रक्षा सौदों में उन्हें घूस का औफर मिला था. डीजल बेचने या दूसरे सामान की हेराफेरी के मामले भी आ चुके हैं. दबी जबान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा की बातें भी सामने आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव ने अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल साइट का इस्तेमाल किया, लेकिन यही बात सीमा सुरक्षा बल के अफसरों को नागवार गुजरी. वे इसे अनुशासनहीनता और तय की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन मान रहे हैं.

यहां तक कि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके जनरल प्रकाश सिंह का भी कहना है, ‘‘जवान ने नियमों का उल्लंघन किया है. कमांडैंट से शिकायत करनी चाहिए थी. डीआईजी, आईजी से शिकायत की जा सकती थी.’’

पूर्व महानिदेशक जनरल प्रकाश सिंह को यह डर है कि जवान इस तरह से करने लगेंगे, तो अनुशासन छिन्नभिन्न हो जाएगा.

तेज बहादुर यादव का कहना है कि इस की सूचना उस ने अपने कमांडैंट को पहले दी थी और बारबार कहने पर भी ऐक्शन नहीं लिया गया. क्या यही सब बातें ‘अनुशासनहीनता’ में आती हैं?

सीमा सुरक्षा बल के जम्मू फ्रंटियर के आईजी डीके उपाध्याय ने यह बयान दिया है कि वीडियो वायरल करने वाला जवान आदतन अनुशासनहीन है. उस के खिलाफ नशे में धुत्त रहने, सीनियर अफसरों के साथ बदसुलूकी करने, यहां तक कि सीनियर अफसर पर बंदूक तानने की शिकायतें आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव का साल 2010 में कोर्ट मार्शल किया गया था, लेकिन उस के परिवार वालों को ध्यान में रखते हुए बरखास्त करने के बजाय 89 दिनों की कठोर सजा सुनाई गई.

इस तरह के आरोप के जवाब में तेज बहादुर यादव कहता है, ‘‘मुझे गोल्ड मैडल समेत 14 पदक मिल चुके हैं. मैं ने अपने कैरियर में कुछ गलतियां भी की हैं, लेकिन बाद में उन में सुधार भी किए हैं.’’

तेज बहादुर यादव के परिवार वालों का कहना है कि जब भी वे घर आते थे, तो खाने को ले कर शिकायत करते थे. उन की पत्नी शर्मिला यादव अफसरों को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछती हैं, ‘‘मेरे पति दिमागी तौर पर बीमार या अनुशासनहीन थे, तो उन को देश के संवेदनशील इलाके में बंदूक क्यों थमाई गई?’’

तेज बहादुर यादव की ही तरह बाड़मेर के जागसा गांव के खंगटाराम चौधरी सीमा सुरक्षा बल में थे, जिन्होंने 30 दिसंबर को वीआरएस ले ली थी.

खंगटाराम कहते हैं, ‘‘जवानों को ऐसा खाना खाने को दिया जाता है, जिसे आम आदमी नहीं खा सकता है. उस खाने को जवान मजबूरी में खाते हैं.’’

खंगटाराम के पिता एसके चौधरी का कहना है, ‘‘पहले खुशी हुई थी कि बेटा फौज में गया है, लेकिन वहां की परेशानियों को देख कर लगता है कि अच्छा हुआ कि वह यहां आ गया है और अब साथ में खेती का काम करेगा, तो कम से कम भरपेट खाना तो खाएगा.’’

तेज बहादुर यादव द्वारा लगाए गए आरोप को जब मीडिया ने लोगों से जानने के लिए बात की, तो श्रीनगर में सुरक्षा बलों के कैंपों के आसपास रहने वाले लोगों ने कहा कि बाजार से आधे रेट पर पैट्रोल, डीजल, चावल, मसाले जैसी चीजें मिल जाती हैं.

फर्नीचर के एक दुकानदार ने बताया कि फर्नीचर खरीदने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है, वे कमीशन ले कर उन लोगों को और्डर देते हैं, पैसों के लिए सामान की क्वालिटी से भी समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.

तेज बहादुर यादव का वीडियो आने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, वायु सेना और सेना के जवानों ने भी अपनीअपनी बात रखी.

रोहतक के वायु सेना के एक पूर्व जवान ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख कर मौत की गुहार लगाई है, ताकि उसे जलालत भरी जिंदगी से छुटकारा मिल सके.

इस जवान का आरोप है कि वायु सेना के अफसरों को 14 हजार रुपए नहीं देने पर उसे कई झूठे आरोप लगा कर नौकरी से निकाल दिया.

इसी तरह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, मथुरा के जवान जीत सिंह ने मिलने वाली सुविधाओं में भेदभाव का आरोप लगाया है.

सेना के जवान यज्ञ प्रताप ने वीडियो जारी कर सेना के अफसरों पर आरोप लगाया है कि अफसर सैनिकों से कपड़े धुलवाते हैं, बूट पौलिश कराते हैं, कुत्ते घुमाने और मैडमों के सामान लाने जैसे काम करवाते हैं. यह खबर जब मीडिया में आ रही थी, तो उसी समय यह खबर भी आई कि बिहार के औरंगाबाद में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर कुमार ने इंसास राइफल से अपने सहकर्मियों की हत्या कर दी.

पुलिस अधीक्षक सत्यप्रकाश ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि बलवीर कुमार ने छुट्टी पर जाने के लिए आवेदन किया था. उसे छुट्टी नहीं मिल पाई और दूसरे जवानों ने उस पर तंज कसा, तो गुस्से में आ कर उस ने गोलीबारी कर दी.

उसी दिन पुलवामा जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल  का जवान वीरू राम रैंगर ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी करने की कोशिश की थी.

सेनाध्यक्ष ने जवानों से कहा है कि वे अपनी बात सोशल मीडिया पर नहीं उठाएं. उस के लिए सेना मुख्यालय, कमान मुख्यालय व निचले स्तर के कार्यालयों में शिकायत पेटी रखने की घोषणा की और कहा कि इन पेटियों के माध्यम से उठाए गए मुद्दों को मैं खुद देखूंगा.

हम सभी जानते हैं कि जेल, थानों या दूसरे दफ्तरों में इस तरह के बौक्स पहले से ही वहा रखे हैं और उन पर भी यही लिखा होता?है कि आप की पहचान गुप्त रखी जाएगी और इस को अधिकारी ही खोलेंगे. लेकिन हम इस तरह के बौक्स के परिणाम को भी जानते हैं.

सेना के दफ्तरों में शिकायत निवारण बौक्स अभी तक क्यों नहीं था? जवानों के दर्द को गृह मंत्रालय ने बेबुनियाद बता कर खारिज कर दिया है यानी कम शब्दों में कहा जाए, तो गृह मंत्रालय और अधिकारी जवानों को झूठा बता रहे हैं.

यह हैरानी की बात है कि तेज बहादुर यादव और इरफान ने वीडियो बना कर जो सुबूत सरकार और जनता तक पहुंचाए हैं, उन को सरकार मानने से इनकार कर रही है. क्या जवानों के साथ इस तरह का बरताव नहीं होता है?

ऐसा सवाल सोशल मीडिया पर आ जाने से पूंजीवादपरस्त मीडिया घराने भी इस मामले को उठाने के लिए मजबूर हुए. सीमा सुरक्षा बल के एक जवान इरफान ने 29 अप्रैल को वाराणसी में प्रैस कौंफ्रैंस कर के बताया था कि भारतबंगलादेश सीमा पर अधिकारी तस्करी कराते हैं और जो जवान मुंह खोलने की बात करता है, उसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है.

इरफान ने बताया कि 15 जनवरी, 2016 को 50 बंगलादेशी भारत में आना चाहते थे, तो उस ने घुसपैठ कराने से इनकार कर दिया. इसी बीच एक घुसपैठिए ने सीमा सुरक्षा बल के कमांडर को फोन कर के इरफान से बात कराई. कमांडर ने इरफान को सभी घुसपैठियों को आने देने के लिए आदेश दिया.

इरफान ने इस घटना की शिकायत जब अधिकारियों से की, तो उसे चुप रहने की नसीहत दी गई. 19 जनवरी की रात जब गेट खोला गया था, तो उस का वीडियो इरफान ने बनाया था. उस की शिकायत भी अधिकारियों से की गई, लेकिन कोई असर नहीं हुआ.

इरफान ने सीमा की बाड़ को काटते और जोड़ते हुए भी कुछ घुसपैठियों को पकड़ा था. उन लोगों ने भी कमांडर के आदेश पर ऐसा करने की बात कबूली थी. इस का वीडियो भी इरफान ने मीडिया के सामने दिखाया था.

इरफान का कहना है कि सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी सीमा पार तस्करी कराते हैं. साथ ही, उस ने यह भी बताया कि लंगर में बंगलादेशी घुसपैठियों को उस ने काम करते हुए देखा था और पूछने पर उसे बताया गया कि कमांडर ने रखा है.

इरफान आगे बताता है कि जब अधिकारियों के सामने तस्करी की कलई खोली थी, तो उसे कमरे में बंद कर के पीटा गया था और सिगरेट से दागा गया था. उस के बाद इरफान सीमा सुरक्षा बल की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ गया.

इरफान ने बताया कि अधिकारी उस के पीछे पड़े हुए हैं और उसे भगोड़ा घोषित करने की धमकी दे रहे हैं. वह सीमा सुरक्षा बल में नहीं जाना चाहता. उस के बाद इरफान के साथ क्या हुआ, किसी को नहीं पता है.

तेज बहादुर यादव, खंगटाराम, जीत सिंह या इरफान का न तो यह पहला मामला है और न ही आखिरी. ऐसा होता रहा है और होता रहेगा.

जब किसान अपनी खेती की जमीन को तथाकथित तरक्की के लिए पूंजीपतियों को नहीं देना चाहते, तो इन्हीं जवानों को भेजा जाता है कि जाओ तुम ‘देशभक्त’ होने का परिचय दो. मजदूर जब अपनी मांगों को ले कर धरनाप्रदर्शन करते हैं या आदिवासी, दलित अपनी जीविका के साधन की मांग करते हैं, तो इन्हीं ‘देशभक्तों’ द्वारा उन का कत्लेआम कराया जाता है. उस समय इन जवानों को ‘देशभक्त’ का तमगा दे दिया जाता है.

जब यही ‘देशभक्त’ जवान अपनी मांगों को उठाते हैं, तो इन को भगोड़ा, अनुशासनहीन, नशेड़ी बना कर सजा मुकर्रर की जाती है. ये जवान उन्हीं मजदूरकिसान के बेटे हैं, जिन पर अफसरों के कहने पर वे लाठियां और गोलियां बरसाते हैं.

अफसरों का वर्ग अलग होता है. वे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, नौकरशाहों के घरों से आते हैं, जिस की न तो जमीन जाती है और न ही जान. इस समाज में जवान, किसान और विज्ञान से जुड़े तीनों समूहों को मिल कर लड़ना होगा, तभी वे जीत सकते हैं, नहीं तो किसी दिन किसान मारा जाएगा, जवान मारा जाएगा और विज्ञान को टोकरी में फेंक दिया जाएगा.

Social Story: गांव देहात में स्मार्टफोन से बदल रही है जिंदगी

Social Story: पिछले 10 सालों में गांवदेहातों में रहने वालों की जिंदगी में सब से बड़ा बदलाव पहले मोबाइल फोन, फिर स्मार्टफोन के रूप में सामने आया है. साल 2011 की जनगणना के सामाजिक और माली आंकडे़ इस बात के गवाह हैं. तमाम तरह की परेशानियों और गरीबी के बाद भी गांवदेहात में तेजी से मोबाइल फोन का इस्तेमाल बढ़ा है. गरीब प्रदेशों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों में रहने वाले 88 फीसदी और 84 फीसदी घरों में आज मोबाइल फोन का इस्तेमाल होने लगा है. ये प्रदेश राष्ट्रीय औसत 68 फीसदी से कहीं आगे हैं.

गांवों में इस्तेमाल होने वाले दूसरे संसाधनों से भी तुलना करें, तो मोबाइल फोन का इस्तेमाल सब से ज्यादा किया जा रहा है. कच्चे घरों और झोंपडि़यों में रहने वाले लोग भी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने लगे हैं.

एक ओर गांवों में बिजली न आने से वहां बिजली से चलने वाले उपकरणों का इस्तेमाल घट रहा है, तो दूसरी ओर बिजली से चार्ज होने वाले मोबाइल फोन पर बिजली न होने का कोई ज्यादा असर नहीं हो रहा है.

आज के समय में मोबाइल फोन केवल बात करने तक सीमित नहीं रह गया है. स्मार्टफोन आने के बाद मोबाइल फोन मनोरंजन का सब से बड़ा साधन बन गया है. स्मार्टफोन में मनपसंद गानों के वीडियो देखे जा सकते हैं. इस के जरीए फेसबुक और ह्वाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के साधनों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

आज 2 हजार रुपए तक की कीमत से स्मार्टफोन मिलना शुरू हो जाता है. गांव के लोगों को स्मार्टफोन में सब से ज्यादा 2 चीजें पसंद आती हैं, वीडियो पर गाने देखना और सुनना. वे चाहते हैं कि फोन का म्यूजिक सिस्टम तेज हो, जिस से आवाज को दूर तक सुना जा सके. वे अब अपनी जिंदगी के हसीन पलों को कैमरे में कैद करना चाहते हैं, इसलिए कैमरा वाला फोन पसंद करते हैं.

गांवों के बाजार में कम कीमत वाले स्मार्टफोन की मांग है, इसलिए ज्यादातर कंपनियां गांव के बाजार को ध्यान में रख कर फोन बनाने लगी हैं. पहले नोकिया और अब माइक्रोसौफ्ट और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां गांव के बाजार में अपना कब्जा जमाने में केवल इसलिए पीछे रह गईं, क्योंकि इन के स्मार्टफोन महंगे थे. इन कंपनियों ने पहले गांव के लिए सस्ते मोबाइल फोन बनाए थे, जिन में रेडियो बजता था, पर गांव के लोग अपने मनपसंद गाने या वीडियो डाउनलोड कर के नहीं सुन सकते थे.

सस्ते फोन बनाने वाली कंपनियों ने गांव के बाजार की बदलती पसंद को पकड़ लिया और कम कीमत पर स्मार्टफोन बना कर गांव के बाजार से बड़ी कंपनियों को बाहर कर दिया.

गांवदेहात के बाजार में बिकने वाले 70 फीसदी फोन सस्ते किस्म के लोकल ब्रांड वाली कंपनियों के होते हैं. बड़ी कंपनियों के पुराने मोबाइल फोन ही यहां खरीदे जाते हैं. ब्रांडेड कंपनियों के मोबाइल फोन इसलिए भी नहीं पसंद किए जाते, क्योंकि इन में गाने धीमी आवाज में सुनाई देते हैं. इन का म्यूजिक सिस्टम तेज आवाज वाला नहीं होता है.

बदलाव की हकीकत

गांव में रोजीरोजगार की कमी है. ऐसे में बहुत सारे लोग कामधंधे की तलाश में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों और विदेशों तक में मेहनतमजदूरी करने जाते हैं. ये लोग स्मार्टफोन से अपने घरपरिवार और करीबी लोगों से जुड़े रहना चाहते हैं. स्मार्टफोन इस में सब से बड़ा रोल अदा कर रहा है.

अब रेल का टिकट लेना हो या ट्रेन का टाइम पता करना हो, इंटरनैट के जरीए यह आसान काम हो गया है, खासकर ट्रेन में टिकट का रिजर्वेशन कराना फोन के जरीए आसान हो गया है.

कई गांवों में यह रोजगार का साधन बन गया है. इस के अलावा स्मार्टफोन मनोरंजन का सब से बड़ा साधन बन गया है. इस में वीडियो डाउनलोड कर के मनपसंद गानों व फिल्मों को देखा और सुना जा सकता है.

स्मार्टफोन में लगने वाले मैमोरी कार्ड में गाने और फिल्म को बाजार से भी डाउनलोड कराया जा सकता है. इस के जरीए कम पैसे में गानों और फिल्मों का मजा लिया जा सकता है. यही नहीं, शादी और दूसरे मौकों के वीडियो तक इस स्मार्टफोन के जरीए बनाए जाने लगे हैं.

गंदी फिल्मों का शौक रखने वाले लोगों के लिए स्मार्टफोन वरदान जैसा हो गया है. वे गुपचुप तरीके से इन का भरपूर मजा लेने लगे हैं. यही वजह है कि गांव के बाजारों में बिकने वाली बेहूदा और कहानी टाइप की किताबों की बिक्री बंद हो गई है. 20 से 25 रुपए खर्च कर के मैमोरी कार्ड में 3 से 5 फिल्में लोड हो जाती हैं. इतना खर्च कर के केवल 1 या 2 किताबें ही मिल पाती थीं. ऐसी किताबों को दूसरों की नजरों से छिपाना मुश्किल काम होता था, जबकि मोबाइल फोन में कैद इन फिल्मों को छिपाना मुश्किल नहीं है.

स्मार्टफोन के बढ़ने से गांव के मनोरंजन में प्रयोग होने वाले दूसरे साधन भी बंद हो गए हैं. आज मनोरंजन के बाजार में गानों के कैसेट और टेपरैकौर्डर गायब हो गए हैं. इसी तरह से रेडियो भी गांव के बाजार से गायब हो गया है.

कुलमिला कर देखा जाए, तो स्मार्टफोन गांव में बातचीत करने के साथसाथ मनोरंजन का भी बड़ा साधन बन कर उभरा है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने गांवगांव अपनी बात को पहुंचाने के लिए मोबाइल फोन का सहारा लिया था. उस ने बड़ी तादाद में एसएमएस के जरीए अपना प्रचार किया.

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं. चुनाव लड़ने वाले लोग स्मार्टफोन के जरीए अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं.

कई जुझारू किस्म के नौजवानों ने स्मार्टफोन का सहारा ले कर ऐसी वीडियो क्लिप बनाईं, जिन्हें देख कर पुलिस और प्रशासन को कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा. थाना और तहसील की हकीकत को मोबाइल फोन में कैद कर के शहर के बडे़ अफसरों तक पहुंचाने का काम भी गांव के लोग करने लगे हैं, जिस से वहां के सरकारी नौकर गलत काम करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर होने लगे हैं.

अगर सरकारी लैवल पर इन साधनों को बढ़ावा दिया जाए और इस तरह से मिलने वाली शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए, तो ये फोन गांव के लोगों के लिए बड़े मददगार साबित हो सकते हैं.

मोबाइल फोन पर इन की राय

 जिस तरीके से सरकारी व्यवस्था कंप्यूटर के हवाले हो रही है, सरकार ईगवर्नैंस पर जोर दे रही है, उस से आने वाले दिनों में स्मार्टफोन का इस्तेमाल बढ़ने ही वाला है. इस से गांव के लोग अपनी शिकायत ऊपर के अफसरों तक पहुंचाने में कामयाब हो रहे हैं. वे इसे मनोरंजन का बेहतर साधन बना रहे हैं. इस के जरीए वे सीधे तमाम लोगों से जुडे़ रहते हैं. जिन लोगों के पास पैसा कम है, गरीब हैं, वे भी मिस काल मार कर अपनी बात को पहुंचाने का जरीया खोज ही लेते हैं. परिवार के लोग भी नातेरिश्तेदारों के संपर्क में पहले से ज्यादा रहने लगे हैं. स्मार्टफोन के चलन में आने के बाद गांव में चिट्ठी से खबरों का आदानप्रदान बंद सा हो गया है. आज लोगों में पढ़ाईलिखाई का लैवल भी बढ़ रहा है. गांव के बच्चे भी मोबाइल फोन चलाना सीख चुके हैं.

– शशिभूषण, समाजसेवी, पानी संस्थान.

 पहले मेरे गाने कैसेट पर आते थे. लोगों को सुनने के लिए टेपरैकौर्डर रखना पड़ता था. जब से मोबाइल फोन में गानों को डाउनलोड कर सुनने का तरीका आ गया है, लोग मेरे गानों को मोबाइल फोन पर डाउनलोड कर लेते हैं. इस तरह से लोग जब चाहे गानों को सुन सकते हैं. कुछ समय से लोगों की यह डिमांड होने लगी कि गाने यूट्यूब पर डाले जाएं. जिस से वहां से फोन पर सीधे डाउनलोड किए जा सकें. कई गानों को वीडियो के साथ देखा जाता है.

स्मार्टफोन आने के बाद से गांव के लोगों की मनोरंजन की दुनिया ही बदल गई है. जब हम कहीं जाते हैं, तो लोग हमारे फोटो अपने मोबाइल फोन से ही लेना चाहते हैं. कुछ लोग तो पूरा वीडियो शूट कर लेते हैं. गांव के लोगों में स्मार्टफोन के प्रति लगाव बढ़ा है. यह अब इन के लिए जरूरत की चीज बन गई है. यह बात गांव में रहने वालों को समझ आ चुकी है.

– खुशबू उत्तम, भोजपुरी गायिका.

 जरूरत एक की, मिलते एक हजार

 मोबाइल फोन के बाजार में भी शहर और गांव का अंतर देखने को मिलता है. गांव के लोगों को केवल एक मोबाइल फोन की जरूरत होती है. इस के बावजूद गांव के बाजार में एक हजार किस्म के मोबाइल फोन मिलते हैं. अलगअलग नामों से बिकने वाले ये फोन करीबकरीब एकजैसी कीमत और फीचर्स वाले होते हैं.

ज्यादातर फोन चाइनीज ब्रांड के सस्ते होते हैं. कुछ लोकल फोन भी गांव के बाजार में अपना प्रचारप्रसार करते हैं. सब से ज्यादा फोन उसी कंपनी के बिकते हैं, जो कंपनी दुकानदार को ज्यादा सुविधाएं और कमीशन देती है.

गांव के लोग जब मोबाइल फोन खरीदने दुकानदार के पास जाते हैं, तो दुकानदार अपनी बातों से उन को वही मोबाइल खरीदने के लिए मजबूर कर देता है, जो वह बेचना चाहता है. अगर ग्राहक किसी दूसरे ब्रांड का मोबाइल फोन मांगता भी है, तो दुकानदार कहता है कि इस फोन की जिम्मेदारी उस की नहीं है.

ऐसे में ग्राहक वही मोबाइल लेता है, जो दुकानदार कहता है. अगर मोबाइल कंपनियां अपने ब्रांड का सही प्रचारप्रसार गांव के लोगों के बीच कर सकें, तो ग्राहक को अपनी जरूरत के हिसाब वाला मोबाइल फोन लेने में सुविधा हो सकेगी.

गांव के लोगों को मोबाइल फोन ऐसा चाहिए, जिस से सही तरीके से बात हो सके. इस के लिए जरूरी है कि मोबाइल फोन नैटवर्क को ठीक से पकड़े. गांव में बिजली की परेशानी रहती है, इसलिए मोबाइल फोन की बैटरी लंबे समय तक चलने वाली हो. यह जल्द चार्ज होने वाली होनी चाहिए.

मोबाइल फोन में अब इंटरनैट का प्रयोग बढ़ रहा है. ऐसे में मोबाइल फोन पर इंटरनैट सही से चलना चाहिए. मोबाइल फोन में कीपैड होना चाहिए. क्योंकि टच स्क्रीन चलना थोड़ा मुश्किल होता है. वीडियो फिल्म और गानों को पसंद करने वाले लोग मोबाइल फोन की बड़ी स्क्रीन पसंद करते हैं. ये लोग चाहते हैं कि मोबाइल फोन में पड़ने वाला मैमोरी कार्ड ज्यादा कैपेसिटी का हो, जिस से ज्यादा से ज्यादा गाने और वीडियो लोड हो सकें.

दुकानदार पर निर्भर हैं ग्राहक

बाजार में जरूरत से ज्यादा मोबाइल फोन मुहैया होने से ग्राहक दुकानदार पर निर्भर हो गए हैं. इस के अलावा गांव के बाजार में बिकने वाले मोबाइल फोन अपना प्रचारप्रसार नहीं करते, जिस से ग्राहक उन के फोन की खासीयत को समझ सकें.

गांव के ग्राहकों को मोबाइल फोन के संबंध में बहुत जानकारी नहीं होती है. ऐसे में वे दुकानदार की बताई बात को मानने को मजबूर होते हैं. कई बार वे अपने आसपास के लोगों के फोन को देख कर फोन खरीदने की कोशिश भी करते हैं, तो दुकानदार उन्हें गारंटी न देने का डर दिखा कर रोक देते हैं.

ग्राहकों को चाहिए कि वे मोबाइल फोन खरीदने से पहले अपनी जरूरतों को समझ लें. मोबाइल फोन की कीमत उस में मौजूद फीचर्स से घटतीबढ़ती है. केवल एक दुकान पर देख कर ही मोबाइल फोन न खरीदें.

मोबाइल फोन को खरीदने के पहले आसपास की दुकानों को देख लें. अगर गांव से शहर ज्यादा दूर न हो, तो शहर की दुकान से मोबाइल फोन खरीद सकते हैं. हर मोबाइल कंपनी अपने फोन की वारंटी देती है. फोन लेने से पहले उस की वारंटी जरूर देख लें. फोन का पक्का बिल भी लें. कई बार पक्का बिल न होने की दशा में दुकानदार अपनी कही बात से मुकर जाता है.

मोबाइल फोन लेने के बाद उस की सिक्योरिटी का खास ध्यान रखें, खासकर स्मार्टफोन पानी वगैरह में गिर जाने से जल्दी खराब हो जाते हैं. इन की स्क्रीन जल्दी खराब हो सकती है. कई बार स्क्रीन पर कुछ लगने से वह टूट जाती है. स्क्रीन को महफूज रखने के लिए स्क्रीन गार्ड जरूर लगवा लें.

Lifestyle: 4 टिप्स-जाने क्यों है ब्लैक टी आपके लिए फायदेमंद

Lifestyle: सुबह की चाय हम में से अमुमन सभी की पहली पसंद होती है. चाय की चुस्की से की दिन शुरुआत पुरे दिन  को तरेताजगा कर देता है. चाय के शौकीन लोगों के लिए जरुरी है की वो किस प्रकार की चाय पी रहे है इसपर ध्यान दे. दूध वाली चाय, ग्रीन चाय या काली चाय सभी का अपना अपना स्वाद होता है. ये बात जानना बेहद है की सुबह खाली पेट दूध वाली चाय पीना आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकती है. इससे आपको डाईजेशन में तो समस्या होती ही है साथ ही और भी कई समस्या से दो चार होना पड़ता हैं. ऐसे में अगर आप दूध वाली चाय की जगह काली चाय पिएंगे तो ये आपकी सेहत के लिए काफी लाभदायक होगी. ब्लैक टी हृदय रोगों, दस्त, पाचन समस्याओं, हाई ब्लड प्रेशर, टाइप 2 शुगर और अस्थमा जैसी बीमारियों से लड़ने में मदद करती हैं. इसलिए हम आपको ब्लैक टी पीने के ऐसे चार फायदे बता रहे हैं, जिसके जरिए आप अपनी सेहत में सुधार कर सकते हैं और कई रोगों से दूर रहे सकते हैं.

शरीर की बदबू को दूर रखे ब्लैक टी

जिन्हें बहुत ज्यादा पसीना आता है और आपके आस-पास के लोग आपके पसीने की दुर्गंध से परेशान रहते हैं तो आपके लिए ब्लैक टी एक बेहद अच्छी है. ब्लैक टी बैक्टीरिया को पनपने नहीं देती, जिसके कारण पसीने से बदबू नहीं आती.

ब्लैक टी रखे टेंशन को रखे दूर

ब्लैक टी तनाव पैदा करने वाले हार्मोन के उत्पादन में कमी लाती है और इसे सामान्य बनाए रखने में सहायता करती है. एक अध्ययन के मुताबिक ब्लैक टी में मौजूद अमीनो एसिड और एल-थीनिन तनाव कम करता है और आपके शरीर को आराम भी देता है.

ब्लैक टी करें हृदय को बेहतर

शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है दिल. ब्लैक टी में मौजूद फ्लेवोन दिल के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में बेहद उपयोगी है. वैज्ञानिक भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि रोजाना तीन या उससे अधिक कप ब्लैक टी पीने से कोरोनरी हार्ट डिसीज का जोखिम कम हो जाता है. अगर आप भी अपनी डाइट में एंटीऑक्सिडेंट को शामिल करना चाहते हैं तो आप ब्लैक टी के साथ ऐसा कर सकते हैं.

शुगर को रखें दूर ब्लैक टी

मधुमेह(शुगर) एक ऐसी बीमारी है, जो सबसे तेजी से फैलने वाली बीमारियों में से एक है. मधुमेह का इलाज अगर प्रारंभिक चरण में हो तो इस रोग को प्रबंधित करना आसान होता है. हालांकि कुछ सावधानियों के साथ इस रोग का निदान आसान है. वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि ब्लैक टी टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम को कम करती है क्योंकि इसमें पाए जाने वाला कैटेचिन और थायफ्लाविंस शरीर के इंसुलिन स्तर के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है.

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