Social Story: गहरी पैठ

Social Story: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने वर्कर्स की एक मांग की सुनवाई करते हुए कहा कि यूनियनों ने देश के कारखानों को बंद कराने का बड़ा काम किया है. उन्होंने कहा कि बचपन में उन्होंने सैकड़ों छोटीबड़ी फैक्टरियों को चलते देखा जो अब यूनियनों की वजह से बंद हो गई हैं.


यह सही ही लगता है क्योंकि 1950 के बाद अचानक देश के थोड़े से कारखानों में भी धड़ाधड़ हड़तालें होने लगी थीं. हर छोटीबड़ी फैक्टरी के सामने 1 नहीं 10-10 अलगअलग यूनियनों के ?ांडे लग जाते थे और यूनियनों को कंट्रोल करने के तरहतरह के कानूनों के बावजूद यूनियनबाजी में मोटा मुनाफा होने लगा था. जो भी जरा सा सम?ादार वर्कर होता वह अपनी यूनियन खोल लेता था.


इस की वजह शायद यह रही कि जब से देश में हिंदू राजाओं का राज खत्म हुआ, काम करने के आदी ब्राह्मणों को रोजीरोटी के लाले पड़ने लगे. वे गांवों में हाथ का काम भी नहीं कर पाते थे. बिहार में जहां उन्होंने खेती करनी शुरू की उन्हें निचले पायदान का भूमिहार ब्राह्मण कहा जाने लगा.


जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने पैर जमाए तो उन्होंने बढ़चढ़ कर उस की सेना में नौकरी शुरू कर दी और अपने ही देश के लोगों के खिलाफ  लड़ाइयां शुरू कर दीं. 1957 का विद्रोह ब्राह्मण सैनिकों ने शुरू किया क्योंकि गांवों में उन्हें गोरों की सेना में काम करने और चरबी वाले कारतूसों का इस्तेमाल करने पर जाति से बाहर किया जाने लगा.


बाद में जब कारखाने लगने लगे तो वे बड़ी तादाद में गांवों से शहर आए और चूंकि वे थोड़े सम?ादार थे, उन्होंने मशीनें चलाना जल्दी सीख लिया. वे बातचीत में भी अच्छे थे, व्यवहार में भी और इसलिए अंगरेज और देशी सेठों ने उन्हें नौकरियां भी दीं.


पर उन का मन हाथ के काम में क्या लगना था, इसलिए उन्होंने यूनियनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. दुनियाभर में मार्क्सवादी स्लोगन चल ही रहे थे, वर्कर्स औफ वर्ल्ड यूनाइट के नारे लगा रहे थे. इन को सम?ाने में इन ऊंची जातियों के वर्कर्स को देर नहीं लगी और देश के कारखाने यूनियनबाजी, हड़तालों, काम रोको, नियम के हिसाब से काम के शिकार हो गए.


आज यूनियनें कमजोर हो गई हैं क्योंकि अब कारखानों में पिछड़ी निचली जातियों के लोग हैं जो काम करने को जिंदगी का असल मानते हैं. उन के लिए कैसा भी काम, कितना भी काम अच्छा ही है. आज अगर कम्यूनिस्ट पार्टियां आखिरी सांसें ले रही हैं तो इसलिए कि अब वर्कर्स तो ओबीसी एससी जातियों के हैं जिन के लिए काम बेइज्जती नहीं है. वे कमाई भी अच्छी करते हैं और पढ़लिख कर आगे बढ़ रहे हैं. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सही कहा है पर अब लेबर कोर्ट काम को जाति के चश्मे से नहीं देखती. तभी तो देश तरक्की कर पा रहा है.


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सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला कि पीरियड के दिनों में स्कूली बच्चों को स्कूल में मुफ्त सैनिटरी पैड पाना उन का मौलिक हक है और स्कूलों को पैड बदलने की जगह और मुफ्त पैड देने ही पड़ेंगे, एक अच्छा फैसला है. लाखों लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल ही नहीं आतीं क्योंकि स्कूलों के शौचालय गंदे होते हैं और वहां पैड बदलना मुश्किल होता है. बहुत सी लड़कियों के पास सैनिटरी पैड खरीदने के पैसे नहीं होते और वे फटेपुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं पर उन्हें बैग में लाना मुश्किल होता है और इसलिए वे 4-5 दिन स्कूल ही नहीं आतीं.


गांवदेहात की ही नहीं कसबों और शहरों की लड़कियों को भी पैड बदलने में मुश्किल होती है जबकि थोड़ी सी बदन में कमजोरी के बावजूद वे पढ़ने या काम करने लायक रहती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस का इंतजाम करने का जिम्मा स्कूलों पर डाल कर अच्छा काम किया है, यह तो सरकारों और पंचायतों को कब का कर लेना चाहिए था. सैनिटरी पैड मुफ्त राशन की तरह जरूरी है और चाहे जो भी खर्च हो, यह इंतजाम होना चाहिए.


जैसेजैसे लड़कियां स्कूलों में आगे बढ़ रही हैं, पढ़ने में लड़कों को पछाड़ रही हैं, देश को उन्हीं से उम्मीद है. लड़कों ने तो अपनी जिंदगी फालतू की रीलबाजी, गली के नुक्कड़ पर खड़े हो कर कमैंट पास करने में, धर्म के नाम पर कांवड़ ढोने और नशे में जिंदगी बरबाद करनी शुरू कर दी है. घरों में अब लड़कियों का जन्म खुशी लाने लगा है क्योंकि पेरैंट्स को लगता है कि उन का घर चलाने वाली अब कोई पैदा हो गई है जबकि लड़के एक आफत बनने लगे हैं जिन्हें पालना मुश्किल होता जा रहा है.


आज जरूरत है कि देश ही नहीं घर भी लड़कियों के आड़े आने वाली हर दिक्कतको दूर करे. सदियोें से धर्मों ने ऐसी बिसात बिछाई है कि लड़कियों को या तो सैक्स सुख के लिए रिजर्व कर दिया गया या फिर घरेलू काम के लिए ताकि लड़के और मर्द मौजमस्ती कर सकें. तरहतरह के रीतिरिवाज, त्योहार, परंपराएं, तीर्थयात्राएं लड़कियों और औरतों को फालतू में थकाने के लिए बनाई गई हैं और जो भी इन में भाग नहीं लेतीं, समाज का नाम ले कर घर के आदमी जबरन उन से ये सब करवाते हैं.


माहवारी के दिनों में जहां भी कहीं काम से छुटकारा मिलता था, वहां लड़कियों को किसी गंदे कमरे में बंद कर दिया जाता था यह जताने के लिए वे पैदा ही गंद में हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्कूलों को सैनिटरी पैड खरीदने की ग्रांट मिलेगी और इस में बड़े घपले होंगे जिस से स्कूलों के अफसरों को मोटा फायदा होगा. यही लड़कियों के लिए नया मौका देगा कि वे अपना दमखम दिखाएं और कोर्ट के आदेश पर बनी कमेटियों को शिकायतें कर सकें. स्कूली पढ़ाई लड़कियों को जहालत से निकालने के लिए जरूरी है. सैनिटरी पैड इतना ही जरूरी है जितनी बेटियां.                                                                                      

Crime: रंगदारी की बदरंग दुनिया

Crime: नैटफ्लिक्स परटौप बौयनाम की एक ब्रिटिश वैब सीरीज है, जिस की मूल कहानी यह है कि 2 ड्रग डीलर उत्तरी लंदन में गरीबों के लिए बने सरकारी रिहायशी इलाके से अपना धंधा चलाते हैं और मोटा मुनाफा बनाते हैं. इस वैब सीरीज को आईएमडीबी पर 10 में से 8.4 रेटिंग मिली है.


इस वैब सीरीज में ड्रग की दुनिया का ऐसा काला सच दिखाया गया है, जहां जुर्म की बस्ती का सरताज बनने के लिए खूनखराबा करना जरूरी है. यहां महासागर की बड़ी मछली ही छोटी मछली को नहीं खाती है, बल्कि तालाब का नन्हा सा टैडपोल भी कब आप के सिर पर गन तान कर आप का गेम बजा दे, पता ही नहीं चलता है.


ड्रग्स के धंधे में तो तमाम तरह के खतरे होते हैं, पर आजकल रंगदारी (एक्सटौर्शन) का धंधा भी काफी फलफूल रहा है, जिस में किसी को धमकी दी जाती है कि अगर जान की सलामती चाहिए, तो इतने पैसे दो वरना राम नाम सत्य सम?. टौप बौयके ड्रग माफिया और जबरन वसूली के रंगदार में एक समानता है कि इस धंधे में बौस भले ही अधेड़ उम्र का हो, पर गुरगे कम उम्र के नौजवान होते हैं. भारत में ड्रग्स और रंगदारी दोनों गैरकानूनी धंधे फलफूल रहे हैं.


रंगदारी से जुड़ा एक मामला देखते हैं. दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में रोहित खत्री नाम का एक शख्सआरके फिटनैसनाम का अपना जिम चलाता है. 12 और 13 जनवरी, 2026 की दरमियानी रात को इस जिम पर अज्ञात लोगों द्वारा ताबड़तोड़ फायरिंग की गई. रोहित खत्री एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर भी है. इस के जिम पर हुई गोलीबारी की जिम्मेदारी लारैंस बिश्नोई गिरोह ने ली है.

सोशल मीडिया पर रणदीप मलिक नाम के एक यूजर ने कहा कि जिम को इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि गिरोह द्वारा जिम के मालिक को किए गए फोन का कोई जवाब नहीं मिला था. साथ ही, उस ने रोहित खत्री को जान से मारने की धमकी भी दी है. लारैंस गैंग के शूटर ने धमकी देते हुए कहा है कि अगर उस ने (रोहित खत्री) अगले टाइम फोन नहीं उठाया, तो उसे धरती से उठवा देंगे.


बता दें कि रोहित खत्री और उस की पत्नी सोनिया खत्री दोनों अपनी फिटनैस और लाइफस्टाइल के लिए काफी फेमस हैं. रोहित खत्री देश के टौप 20 फिटनैस यूट्यूबरों में से एक है. उस के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 24 लाख फौलोवर हैं. एक दूसरे मामले में 12 जनवरी, 2026 को ही पूर्वी दिल्ली के वैस्ट विनोद नगर इलाके में जितेंद्र्र गुप्ता नाम के एक प्रोपर्टी डीलर से लारैंस बिश्नोई के नाम पर 2 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी गई. रकम नहीं देने पर बदमाशों ने जितेंद्र्र गुप्ता के घर के बाहर फायरिंग कर दहशत फैलाने की कोशिश की गई. यह वारदात घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई.


इस सिलसिले में पीडि़त जितेंद्र गुप्ता ने बताया कि उन्हें सितंबर, 2025 से लगातार धमकी भरे फोन रहे थे और मैसेज मिल रहे थे. ऐसा करने वाले खुद को लारैंस बिश्नोई गैंग से जुड़ा बता रहे थे और उन से 2 करोड़ रुपए की मांग की जा रही थी. लारैंस बिश्नोई एक बहुत बड़ा गैंगस्टर है, जो जेल से अपनी काली करतूतों को अंजाम देता है. उस के एक इशारे पर कुछ लोग बाइक पर कर अपने टारगेट पर बेतहाशा फायरिंग कर के चले जाते हैं. ऐसे भाड़े के लोग ज्यादातर गरीब घर के वे नौजवान होते हैं, जो चंद पैसों के चक्कर में इस तरह के अपराध को अंजाम देते हैं.


रंगदारी के और मामलों और उन के खतरनाक असर के बारे में बात करने से पहले यह सम? लेते हैं कि रंगदार कौन होता है और यह रंगदारी शब्द आया कहां से है. दरअसलरंगदारीशब्द का जन्म बिहार में हुआ है, जो एक जबरन या गैरकानूनी वसूली है और इसेरंगदारी टैक्सभी कहा जाता है. इस में अपराधी या गुंडे टाइप लोग कारोबारियों, ठेकेदारों या आम लोगों सेप्रोटैक्शन मनीके नाम पर जबरन पैसे ऐंठते हैं.


आसान शब्दों मेंरंगदारवह आदमी होता है, जो इस गैरकानूनी टैक्स को वसूलता है. ऐसे लोगों का अपने इलाके में दबदबा होता है और धीरेधीरे ये अपने फैलाए गए डर और दादागीरी की वजह से चर्चा में बने रहते हैं. पर सवाल उठता है कि जब कोई रंगदार किसी से जबरदस्ती प्रोटैक्शन मनी मांगता है, तो पीडि़त पर उस का क्या असर होता है? यह तो कड़वा सच है कि पीडि़त चाहे कोई कारोबारी हो, ठेकेदार हो या फिर आम नागरिक ही क्यों हो, को रंगदार को जबरन पैसे देने पड़ते हैं, जिस से उस की आमदनी कम होती है. बहुत बार तो ऐसे लोग दूसरों से पिछड़ जाते हैं या उन के कामधंधे तक बंद हो जाते हैं.


पैसे की मार तो लोग किसी तरह ?ोल जाते हैं, पर रंगदारों से लगातार मिलती धमकियों से उन में डर, तनाव और असुरक्षा की भावना बढ़ती है. सब से बड़ा नुकसान, जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है कि समाज में अराजकता और डर का माहौल बनता है. कानून से भरोसा उठ जाता है. अपनी या किसी अपने की जान तक जाने का डर बना रहता है, क्योंकि रंगदारी की वारदात में अकसर धमकी, मारपीट, बमबारी और गोलीबारी जैसी हिंसक घटनाएं शामिल होती हैं. यह सब अपराध की दुनिया को बढ़ावा देता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है.


पर क्या ऐसे गैंगस्टर या रंगदार मौज की जिंदगी जीते हैं? जो नौजवान इस दलदल में धंसते हैं, उन के मन में क्या चल रहा होता है? वे अपराध की राह चुन कर क्या साबित करना चाहते हैं? कई साल पहले एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर बड़ी वायरल हुई थी, जिस में सहारनपुर, उत्तर प्रदेश का बिल्लू सांडा नाम का एक शख्स पश्चिम उत्तर प्रदेश का सब से बड़ा डौन बनने का सपना देखता था. संजय दत्त की फिल्मखलनायकउस ने इतनी बार देख ली थी कि उस का एकएक डायलौग उसे रटा हुआ था.


उस वीडियो क्लिप में एक पत्रकार ने बिल्लू सांडा से पूछ लिया था कि अब कितने दिन रहोगे जेल में? इस पर बिल्लू सांडा ने जवाब दिया था कि मुश्किल से 6 महीने. बहुत से लोगों को यह वीडियो क्लिप किसी मसालेदार फिल्म के सीन जैसी लगी होगी, पर यहां चिंताजनक बात यह है कि बिल्लू सांडा आदतन अपराधी था. खबरों के मुताबिक, उस ने फरवरी, 2015 में आलम चौकीदार का खून किया था. उसे इस के लिए 6 लाख रुपए मिले थे. पहली हत्या के कुछ महीने बाद उस ने दूसरी हत्या की.


उस ने इश्तिकार नामक एक शख्स का खून करने के पौने 6 लाख लिए थे. इस के बाद बिल्लू सांडा इन पैसों से अपने शौक पूरे करने लगा था. खून करना उसे बाएं हाथ का खेल लगने लगा था. भारत में ऐसे जाने कितने नौजवान हैं जो जुर्म की काली दुनिया का सच जाने बिना इस दलदल में धंस जाते हैं. बिल्लू सांडा जैसे आदतन अपराधी का अंजाम बहुत बुरा होता है. सब से ज्यादा तो वे लोग भुगतते हैं, जो ऐसे लोगों के शिकार बनते हैं.


दिल्ली में धमकी के दम पर वसूली अगर सिर्फ दिल्ली और एमसीआर की बात करें तो यहां पीछे तकरीबन
2 साल में ही ऐसे कांड हुए हैं, जिन की जड़ में रंगदारी रही है. कुछ उदाहरण देखते हैं :
*12 सितंबर, 2024 को दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-1 में लारैंस बिश्नोई गैंग ने एक जिम ट्रेनर नादिर शाह की हत्या की थी, जिस की साजिश साबरमती जेल से रची गई थी.
*15 मार्च, 2025 को हरियाणा के गुरुग्राम में सैक्टर-65 में गोल्डी बराड़ और लारैंस बिश्नोई गैंग ने एक रिएल एस्टेट बिल्डर के औफिस पर 10 राउंड फायरिंग की थी और 10 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी थी.
* 22 जून, 2025 को दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में हिमांशु भाऊ गैंग
ने एक होटल कारोबारी की कार पर फायरिंग की थी और सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी ली थी.
*10 अगस्त, 2025 को दिल्ली के नजफगढ़ में कपिल सांगवान (नंदू) स्क्रैप डीलर से 50 लाख रुपए की रंगदारी के लिए उस के घर पर हमला किया गया था.
*18 अगस्त, 2025 को दिल्ली के विकासपुरी में प्रिंस तेवतिया गुट ने मिठाई की एक दुकान पर फायरिंग की थी.
*10 नवंबर, 2025 को दिल्ली के द्वारका इलाके में अनमोल बिश्नोई द्वारा एक नामी बिल्डर के गेट पर फायरिंग कर के खुली धमकी दी गई थी.


इस तरह की रंगदारी उन नौजवानों के लिए बड़ी मुसीबत बनती है जो अपनी मेहनत से पैसे कमाते हैं. यहां एक विचार भी काम करता है कि इस अदना से इनसान ने इतनी जल्दी पैसे कैसे बना लिए. इस से तो प्रोटैक्शन मनी लेनी पड़ेगी. फिर शुरू होता है किसी का मनोबल तोड़ने का सिलसिला. गरीब अमीर होने पाए. ऐसे में छुटभैया गैंगस्टर प्रोटैक्शन मनी के नाम पर छोटी रकम तक मांग लेते हैं. जैसे फिल्मों में गरीब कामगारों सेहफ्ता वसूलीहोती है.


दीवारजैसी फिल्म में तो अमिताभ बच्चन हफ्ता वसूलने वालों को सबक सिखा देता है, पर असल जिंदगी में ऐसा नहीं हो पाता. यहां सरकार की अनदेखी भी गैंगस्टर को बढ़ावा देती है. दबी जबान में कहा जाता है कि फलां गैंगस्टर के पीछे अमुक पार्टी की सपोर्ट है. यही गठजोड़ आम आदमी को डराने के लिए काफी है.


किसी के घर के बाहर तड़ातड़ गोलियां बरसाना सुनने में बड़ा कौमन लगता है, पर जिस घर की दीवार पर उन गोलियों के निशान बनते हैं, उन के मन पर भी डर के फफोले निकल आते हैं, जो काफी लंबे समय तक दर्द देते हैं



सिंगर बी प्राक को मिली धमकी


बी प्राक का असली नाम प्रतीक बच्चन है और वे हिंदी फिल्मकेसरीके गानेतेरी मिट्टी में मिल जावां…’ से बहुत ज्यादा मशहूर हुए हैं. हाल ही में उन्हें लारैंस बिश्नोई गैंग से धमकी मिली है किएक हफ्ते में 10 करोड़ रुपए दे देनहीं तो बहुत बड़ा नुकसान कर देंगे…’


ऐसा बताया जा रहा है कि यह धमकी भरी आडियो रिकौर्डिंग पंजाबी सिंगर दिलनूर को 6 जनवरी, 2026 की दोपहर भेजी गई. इस के पहले दिलनूर को 5 जनवरी, 2026 को 2 बार फोन किया गया. लेकिन दिलनूर ने फोन नहीं उठाया. 6 जनवरी, 2026 को भी विदेशी नंबर से फोन किया गया. दिलनूर की शिकायत के मुताबिक, उस ने फोन उठाया, लेकिन बात जब अजीब लगी, तो उस ने फोन काट दिया. इस के बाद दिलनूर को वौइस मैसेज भेजा गया.


इस मैसेज में फोन करने वाले ने अपना नाम आरजू बिश्नोई बताया, जो लारैंस बिश्नोई के लिए काम करता है. मैसेज में यह था, ‘हैलोआरजू बिश्नोई बोल रहा हूं, उस बी प्राक को मैसेज कर देना 10 करोड़ रुपए चाहिए. तेरे पास एक हफ्ते का टाइम है. जिस मरजी कंट्री (देश) में चला जा, आसपास इस के साथ वाला कोई भी मिल गया तो नुकसान कर देंगे. और इस को फेक काल मत सम?ाना. मिल के चलेगा तो ठीक, नहीं तो उस को बोल मिट्टी में मिला देंगे.


इस मैसेज के मिलने के बाद दिलनूर ने 6 जनवरी, 2026 को ही एसएसपी, मोहाली को लिखित शिकायत दी थी. वैसे, इस से पहले हनी सिंह, एपी ढिल्लों, बब्बू मान, जानी, पवन सिंह, हंसराज रघुवंशी जैसे सिंगर को भी ऐसे ही धमकी मिल चुकी है.



डिजिटल रंगदारी का बढ़ा दबदबा



जब से तकनीक ने अपना कमाल दिखाना शुरू किया है, अपराध भी डिजिटल प्लेटफार्म पर सिर उठाने लगे हैं. अब तो डिजिटल रंगदारी का जन्म हो चुका है. ‘डिजिटल रंगदारीएक साइबर अपराध है, जिस में अपराधी डिजिटल तरीकों जैसे सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर के किसी को धमकाते हैं और बदले में पैसे मांगते हैं.


दिल्ली पुलिस के एक बड़े अफसर के मुताबिक, साल 2025 में डिजिटल वसूली के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. अपराधी अब पारंपरिक फोन करने के बजाय सिगनल, टैलीग्राम और व्हाट्सऐप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर रहे हैं.


गैंगस्टर के निशाने पर अब सिर्फ बड़े अमीर लोग ही नहीं हैं, बल्कि जिम चलाने वाले, प्रोपर्टी डीलर, किराना दुकानदार और व्यापारी भी रडार पर चुके हैं. इस की वजह यह है कि छोटे कारोबारी पुलिस के पास जाने से डरते हैं और 10 से 50 लाख रुपए की मांग को मजबूरी में स्वीकार कर लेते हैं. यही वजह है कि यह तरीका गैंगस्टर के लिए ज्यादा महफूज और फायदेमंद साबित हो रहा है.


इन का घमकी देने का तरीका तकरीबन एक सा है, जिस में पहले विदेशी नंबर से धमकी भरा फोन या वौइस नोट आता है. रकम और समय तय किया जाता है. अगर कारोबारी फोन को नजरअंदाज करता है, तो अगले 24 घंटे के भीतर उस के घर, दुकान या दफ्तर के बाहर गोलियां बरसा कर पूरे इलाके में दहशत फैला दी जाती है.    

 

Film: किसी और की हिट फिल्म का फार्मूला न उठाएं -शाहिद कपूर

भारतीय सिनेमा के फलक पर कुछ कलाकार पहली फिल्म से ही अपनी पहचान तय कर लेते हैं, लेकिन बतौर कलाकार शाहिद कपूर की कहानी एक लगातार होतेपुनर्जन्मकी कहानी है.


शाहिद कपूर ने साल 2003 में फिल्मइश्कविश्कसे एक मासूम चेहरे वालेचौकलेटी बौयके रूप में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था. फिर उन्होनेविवाहजैसी सामाजिक फिल्म की. तब किसी ने कल्पना नहीं की थी कि लोग उन्हेंहैदरजैसी फिल्म में एक पेचीदा किरदार निभाते हुए देखेंगे या फिर फिल्मकबीर सिंहके रूप में वे एक गुस्सैल और शराबी प्रेमी के किरदार में नजर सकते हैं.


शाहिद कपूर को विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्मों में अलगअलग किरदार निभाने का मौका दिया है और अब उन की नई फिल्म रोमियोमें वे फिर डार्क शेड वाला किरदार निभा रहे हैं. पेश हैं, शाहिद कपूर से हुई बातचीत के खास अंश :


विशाल भारद्वाज नेकमीने’, ‘हैदरऔररंगूनजैसी फिल्मों में आप को एक अलग इमेज दी. अब आप 7 साल बाद उन के साथ वापसी कर रहे हैं. इस पर आप क्या कहेंगे? यह वापसी नहीं है. बतौर कलाकार मेरी एक अलग यात्रा है और डायरैक्टर के तौर पर विशाल सर की अपनी अलग यात्रा है, लेकिन सच यह है कि विशाल सर कुछ औफर करेंगे, तो मैं उसे सुनूंगा जरूर.

इस फिल्म की स्क्रिप्ट सुनतेसुनते मु? अहसास हुआ कि मेरी फिल्मोग्राफी में यह फिल्म होनी चाहिए.
फिल्महैदरमें एक पिता अपने बेटे की तलाश कर रहा है, जबकि रोमियोमें आप का किरदार खुद को बहुत ही ज्यादा भयावह साबित करने की कोशिश कर रहा है. इन दोनों किरदारों के बीच जो खामोशी है, वह क्या है?


रोमियोका किरदारहैदरके किरदार से काफी अलग है. ‘हैदरका किरदार शुरू में थोड़ा सौफ्ट है, पर फिर पागल हो जाता है, जबकि रोमियोका हुसैन उस्तरा बहुत हार्ड किरदार है, लेकिन मुहब्बत इसे बदल देती है.


फिल्म रोमियोके हुसैन उस्तरा के किरदार को निभाते समय आप को प्रोस्थैटिक मेकअप का इस्तेमाल करने की जरूरत क्यों पड़ी?


आप ने कहां प्रोस्थैटिक मेकअप देख लियाफिल्म में थोड़ाबहुत ही प्रोस्थैटिक मेकअप है, कहीं भी ज्यादा हैवी प्रोस्थैटिक मेकअप नहीं है. इस में फुल बौडी एक टैटू है, जिसे लोग प्रोस्थैटिक मेकअप की संज्ञा दे रहे हैं. हर दिन इस टैटू को लगाने में 2 से ढाई घंटे लगते थे.


इस किरदार को निभाने से पहले आप को किस तरह की मानसिक तैयारी करनी पड़ी? मेरे लिए किसी भी किरदार को निभाते समय उस की फिजिकल यात्रा पर काम करना हो होता है, लेकिन जो इमोशनल यात्रा और मानसिक तैयारी होती है, असल में दर्शकों पर उसी का असर पड़ता है. मेरे लिए यही तैयारी बहुत खास होती है.


क्या कबीर सिंह से हुसैन उस्तरा तक पहुंचतेपहुंचते शाहिद कपूर डार्क किरदार निभाना सीख गए हैं?
हर कलाकार की शुरुआत स्वीट क्यूट लवरबौय जैसे किरदारों से होती है. उस के बाद थोड़ा कौम्प्लैक्स किरदार निभाना शुरू करता है, जिस में अलगअलग एलीमैंट होते हैं. तब तक कलाकार रोमांटिक क्यूट जोन से बाहर चुका होता है, जैसा कि मेरे साथ फिल्मकमीनेमें हुआ, फिरउड़ता पंजाबके साथ हुआ.


क्या आप को लगता है कि आप की सोच के मुताबिक फिल्म कहानियां लिखी जा रही हैं?
जैसी फिल्में पहले मिलती थीं, उस के मुकाबले अब काफी बदलाव गया है. अब मु?    हर तरह के किरदार के औफर रहे हैं, लेकिन अच्छी लिखाई होने की समस्या जरूर है.

ऐसी स्क्रिप्ट्स बहुत कम मिलती हैं, जो सच में नई हों, अलग हों और ताजा लगें. आज ज्यादातर फिल्में एकदूसरे की कौपी जैसी लगती हैं. किसी और की हिट फिल्म का फार्मूला उठा कर फिल्में बनाना बंद होना चाहिए.       

शांति स्वरूप त्रिपाठी


   

Social Story: 6 मुसहरों की  मौत ब्लास्ट  में

Social Story: ज किसी औद्योगिक हादसे की खबर टैलीविजन या डिजिटल प्लेटफार्म परब्रेकिंग न्यूजबन कर उभरती है, तब कुछ पल के लिए पूरा देश सिहर उठता है. मीडिया के कैमरे धुएं, आग और एंबुलैंसों की तसवीरें दिखाते हैं. एंकर मारे गए लोगों की तादाद गिनाते हैं. फिर धीरेधीरे खबर ठंडी पड़ जाती है.


छत्तीसगढ़ के भिलाई क्षेत्र के आयरन प्लांट रियल इस्पात फैक्टरी में हुए भीषण ब्लास्ट की खबर भी इसी तरह आई और चली गई. पर इस खबर के भीतर जो सच छिपा है, वह सिर्फ एक औद्योगिक हादसा नहीं, बल्कि बिहार, खासकर गया जिले के सब से वंचित समुदायों की जिंदगी और मौत की कहानी है.


जैसे ही खबर फ्लैश हुई, स्वाभाविक जिज्ञासा के साथ एक गहरा डर भी मन में उभरा कि मारे गए मजदूर आखिर हैं कहां के? सालों से एक पैटर्न बन चुका है कि देश के अलगअलग हिस्सों में होने वाले औद्योगिक हादसों, खदान हादसों, फैक्टरियों में ब्लास्ट और फर्नेस में ?ालसने वाली खबरों के पीछे ज्यादातर चेहरे बिहार के होते हैं खासकर वे जिले, जहां से पलायन जिंदगी की कड़वी हकीकत बन चुका है, जैसे गया, औरंगाबाद, नवादा, जमुई, खगडि़या, सहरसा वगैरह.


मुसहरों पर टूटा कहर पहले दिन खबर में मजदूरों की पहचान नहीं थी, लेकिन अगले ही दिन अखबार में छपी तसवीरों और नामों ने डर को सच में बदल दिया. मारे गए सभी 6 मजदूर गया जिले के थे. जो जिंदा थे, वे भी मौत और जिंदगी के बीच ?ाल रहे थे. इस हादसे में मारे गए सभी 6 मजदूर मुसहर जाति से थे. बिहार की सब से गरीब और सब से हाशिए पर धकेली गई जाति. 4 घायलों में से 2 मुसहर थे और 2 मुसलिम.


यह आंकड़ा अपनेआप में बहुतकुछ कह जाता है. यह बताता है कि देश की औद्योगिक प्रगति का बो? किन कंधों पर लादा जा रहा है. जिन लोगों के पास जमीन है, स्थायी घर, सामाजिक सिक्योरिटी, वही लोग सब से खतरनाक कामों में ?ांक दिए जाते हैं. बिहार के 90 फीसदी से ज्यादा मुसहर भूमिहीन हैं. उन के पास खेत नहीं हैं, मकान नहीं हैं और अकसर सरकारी जमीन पर ?ांपड़ी बना कर रहना ही उन की मजबूरी होती है और जब सरकार इन्हें गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर बुलडोजर चलाती है, तब उन के पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.


हाल के सालों में बिहार में बुलडोजर की राजनीति ने जिस तरह से गरीबों और दलितों को निशाना बनाया है, उस ने मुसहर समुदाय को और ज्यादा असुरक्षित बना दिया है. जिन के पास पहले से कुछ नहीं था, उन से वह भी छीन लिया गया. नतीजा यह हुआ कि गांव में रहने की आखिरी जमीन भी खिसक गई. ऐसे में परिवार के मर्द ही नहीं, बल्कि किशोर और कभीकभी बच्चे भी काम की तलाश में बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं.


गया, जिसे अब सरकारी कागजों में गयाजी कहा जाने लगा है, वहां ऐसे हालात कोई नई बात नहीं हैं. अपने निजी अनुभव से कहा जा सकता है कि यहां मजदूरी के लिए पलायन बचपन से ही शुरू हो जाता है. इस हादसे में मारे गए लोगों में से कम से कम 3 लोग 18 से 20 साल से ज्यादा के नहीं लगते. यह सवाल बेहद गंभीर है. अगर ये मजदूर नाबालिग थे या 18 साल के आसपास थे, तो यह सिर्फ श्रम शोषण नहीं, बल्कि सीधे सीधे मानव तस्करी का मामला बनता है.

बच्चों को काम के नाम पर दूसरे राज्यों में ले जाना, उन्हें खतरनाक उद्योगों में ?ांक देना और उन की हिफाजत के कोई इंतजाम करना, यह सब कानून प्रवर्तन एजेंसियों की आंखों के सामने हो रहा है.
यह कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है. रेलवे स्टेशनों से रोज सैकड़ों मजदूर ट्रेनों में भर कर जाते हैं. ठेकेदार खुलेआम दलाली करते हैं. फिर भी श्रम विभाग की नींद टूटती है, ही पुलिस की.


बिहार और खासकर गया जिले से मजदूरों को देश के हर कोने में ले जाया जाता है, जैसे छत्तीसगढ़, ?ारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब. जहां कहीं खदान है, फैक्टरी है, फर्नेस है, वहां बिहार का मजदूर मिलेगा और अकसर वहां के हालात बदतर होती हैं. सिक्योरिटी उपकरणों की कमी, लंबी शिफ्ट, न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान, रहने के लिए बदहाल ?ांपडि़यां, यह सब आम बात है.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में हुए इस हादसे से जुड़ी खबर बताती है कि घटना के समय मजदूरों ने सेफ्टी सूट तक नहीं पहना था. फर्नेस के आसपास काम कर रहे मजदूरों के लिए यह सीधा मौत को न्योता देने जैसा है. घेरे में प्रशासन इस पूरे मामले में राज्य के रोल पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. बिहार सरकार ने हाल ही में श्रम संसाधन विभाग का नाम बदल करश्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभागकर दिया है.

नाम से यह संकेत मिलता है कि सरकार प्रवासी मजदूरों को ले कर संवेदनशील है, लेकिन सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से हकीकत बदल जाती है? अगर विभाग सच में प्रवासी मजदूरों के कल्याण को ले कर गंभीर है, तो उस कल्याण को कागजों से बाहर निकालना होगा. सब से पहला कदम यह होना चाहिए कि उन रेलवे स्टेशनों पर विभाग के स्थायी बूथ खोले जाएं, जहां से बड़ी तादाद में मजदूर पलायन करते हैं.

गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा जैसे स्टेशनों पर अगर श्रम विभाग की मौजूदगी होती, तो मजदूरों का रजिस्ट्रेशन हो सकता था. यह पता चल सकता था कि कौन कहां जा रहा है, किस ठेकेदार के साथ जा रहा है और किस तरह के काम में लगाया जा रहा है. इस से सिर्फ मानव तस्करी पर रोक लगाई जा सकती थी, बल्कि हादसे के हालात में जिम्मेदारी तय करना भी आसान होता.


दूसरा, विभाग को सिर्फ स्रोत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, क्योंकि प्रवासी मजदूरों का कल्याण तभी मुमकिन है, जब राज्य गंतव्य स्थलों तक भी पहुंचे. छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बिहार के मजदूर भारी तादाद में काम करते हैं. वहां महकमों के अफसरों की तैनाती, श्रम शिविरों का निरीक्षण और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल बेहद जरूरी है.

अभी हालात ये हैं कि बिहार का मजदूर दूसरे राज्य में मरता है, तो उस का शव बिहार लौटता है और उस के साथ लौटता है कुछ मुआवजे का चैक और बहुत सारा सन्नाटा. मुसहर समुदाय ऐतिहासिक रूप से सामाजिक अनदेखी का शिकार रहा है. पढ़ाईलिखाई, जमीन और संसाधनों से दूर रखे गए इस समुदाय के लिए औद्योगिक मजदूरी ही एकमात्र रास्ता बचता है.

लेकिन जब यही मजदूरी मौत में बदल जाती है, तब यह सवाल उठता है कि क्या विकास की कीमत हमेशा वही लोग चुकाएंगे, जिन की आवाज सब से कमजोर है? सुरक्षा की खुली पोल औद्योगिक सुरक्षा मानकों की बात करें तो यह हादसा देश की औद्योगिक व्यवस्था की पोल खोलता है. आयरन प्लांट जैसे खतरनाक उद्योगों में सिक्योरिटी स्टैंडर्ड का पालन कोई औप्शन नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए.

लेकिन अकसर ठेकेदारी प्रथा के चलते मजदूरों की जान सब से सस्ती सम? जाती है. परमानैंट मुलाजिमों के लिए सिक्योरिटी उपकरण, ट्रेनिंग और बीमा का इंतजाम होता है, जबकि ठेका मजदूरों को बिना किसी सिक्योरिटी के काम पर लगा दिया जाता है. जब हादसा होता है, तो जिम्मेदारी तय करने के बजाय जांच समितियां बना दी जाती हैं और कुछ दिनों बाद सबकुछ भुला दिया जाता है.


मीडिया का रोल भी यहां सवालों के घेरे में आता है. हादसे के पहले दिन तक मजदूरों की पहचान सामने नहीं आई थी. यह भी एक तरह की अनदेखी है. जब तक यह नहीं बताया जाता कि मरने वाले कौन थे, कहां से थे, किस सामाजिक बैकग्राउंड से थे, तब तक यह हादसा सिर्फ एक संख्या बन कर रह जाता है,
6 की मौत, 11 घायल.


पर जैसे ही पता चलता है कि ये सभी गया के मुसहर थे, तब इस खबर का सामाजिक मतलब बदल जाता है. तब यह सवाल उठता है कि क्यों हर बार यही समुदाय सब से ज्यादा मरता है?
जिम्मेदारी लेनी होगी इस पूरी व्यवस्था में केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बनती है. प्रवासी मजदूरों के लिए बने कानून, जैसे अंतर्राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी लैवल पर उन का पालन नहीं होता.


इन कानूनों को सख्ती से लागू किया जाता, तो ठेकेदारों की मनमानी पर रोक लग सकती थी. मजदूरों का रजिस्ट्रेशन, न्यूनतम मजदूरी, हैल्थ बीमा और दुर्घटना बीमा तय किया जा सकता था. लेकिन जब राज्य खुद गरीबों को गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर उन के घर गिरा देता है, तब उन से यह उम्मीद करना कि वे सिक्योर रहेंगे और इज्जत से काम पाएंगे, एक तरह का मजाक लगता है.

बिना जमीन, बिना घर और पढ़ाईलिखाई से दूर मुसहर के लिए औप्शन बेहद सीमित हैं. गांव में रोजगार नहीं, शहर में सिक्योरिटी नहीं. ऐसे में वह फर्नेस के सामने खड़ा होता है, पिघले लोहे के बीच काम करता है और किसी दिन उसी में ?ालस कर मर जाता है. यह हादसा हमें एक बार फिर चेतावनी देता है कि अगर प्रवासी मजदूरों को ले कर नीतिगत और ठोस बदलाव नहीं किए गए, तो यही ट्रैंड जारी रहेगा.

बिहार के मजदूर स्लैब के नीचे दब कर, खदानों में फंस कर और फर्नेस के पिघले लोहे में पिघल कर मरते रहेंगे और हम हर बार कुछ दिनों तक शोक जता कर फिर अगली खबर की ओर बढ़ जाएंगे. यह सरकार की नाकामी है, आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक तीनों लैवलों पर. जब तक यह नहीं मान लिया जाएगा कि प्रवासी मजदूरों की मौतें विकास की जरूरी कीमत नहीं, बल्कि नीतियों की नाकामी हैं, तब तक कुछ नहीं बदलेगा.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में मारे गए गया के मुसहर मजदूर सिर्फ 6 लोग नहीं थे, बल्कि वे उस भारत का चेहरा थे, जो चमकते उद्योगों के पीछे अंधेरे में काम करता है. अगर हम सच में एक अच्छे समाज की बात करते हैं, तो हमें यह पक्का करना होगा कि विकास की आग में सब से गरीब और वंचित जलें वरना इतिहास हमें इसी सवाल के साथ याद रखेगा कि जब मजदूर पिघलते लोहे में ?ालस रहे थे, तब राज्य और समाज क्या कर रहे थे?                  

Hindi Story: धोखाधड़ी

Hindi Story: अजय वर्मा ने अपना रेलवे टिकट का रिफंड मांगने का औनलाइन तरीका अपनाया और एक अनजान नंबर से आए लिंक पर क्लिक कर दिया. उस के बाद शुरू हुआ एक ऐसा खेल जो उन पर भारी पड़ा. क्या था माजरा?

मे  रा नाम अजय वर्मा है और मेरा रेलवे का टिकट रद्द किए हुए पूरा एक महीना बीत चुका था, लेकिन 12,850 रुपए का रिफंड अभी तक मेरे खाते में नहीं आया था. थकहार कर मैं ने रेलवे को एक ट्वीट कर दिया. उम्मीद थी कि एक हफ्ते में जवाब मिल जाएगा, पर जो हुआ, वह उम्मीद से तेज और अचरज से भरा हुआ था.


शिकायत डालने के कुछ ही मिनट बाद इनबौक्स में संदेश गया. प्रोफाइल पर रेलवे का लोगो था और संदेश जैन्युइन लग रहा था. संदेश बहुत भरोसेमंद अंदाज में लिखा हुआ था, ‘प्रिय ग्राहक, आप की शिकायत प्राप्त हुई. कृपया अपना संपर्क नंबर भेजें, ताकि तत्काल रिफंड प्रोसैस शुरू किया जा सके.’
दिल में एक उम्मीद जगी. मन में एक सवाल कौंध गया. क्या वाकई अब सरकारी तंत्र इतना तेज हो गया है?


मैं ने बिना देरी किए उसे अपना फोन नंबर भेज दिया. यह मेरी पहली और सब से बड़ी गलती थी.
कुछ ही पलों में मु? फोन गया. सामने एक आत्मविश्वासी आवाज थी, ‘सर, मैं रेलवे रिफंड सैल से बोल रहा हूं.’ उस आदमी की भाषा और लहजा बिलकुल आधिकारिक लग रहे थे. उस ने पूछा, ‘टिकट कहां से बुक किया था आप ने?’’


मैं ने अपने बैंक का नाम बताया और कहा, ‘‘इस के ईमोबाइल ऐप से.’’ उस ने कहा, ‘ठीक है सर, आप के अकाउंट को कन्फर्म करना होगा. कृपया अपना यूजरनेम बताएं.’ यहीं मु? थोड़ा शक हुआ. मैं ने फोन होल्ड कर अपने बेटे से पूछा, ‘‘यूजरनेम मांग रहा है. बता दूं क्या?’’ बेटा बोला, ‘‘दे दो पापा, इस में कोई दिक्कत नहीं है.’’


और हम ने उसे अपना यूजर नेम दे दिया. यह मेरी दूसरी गलती थी. अब वह आदमी सीधा मेरे बेटे से बात करने लगा, क्योंकि उसे लगा कि यह स्मार्ट तरीके से जवाब करेगा. उस आदमी ने कहा, ‘अभी एक लिंक भेज रहा हूं. अपना ईमोबाइल ऐप खोल कर लिंक पर क्लिक कर दीजिए. आप की रकम 12,850 रुपए आप के खाते में जाएंगे.’ कुछ ही सैकंड में उस आदमी का भेजा गया एक लिंक आया और हम ने क्लिक भी कर दिया, बिना पढ़े, बिना सोचे. वह लिंकपेमेंट रिक्वैस्टका था. यहीं से शुरू हुआ असली खेल.
जल्दी कीजिए सर,’ वह आदमी लगातार दबाव बना रहा था.


घबराहट में हम ने सबमिट बटन दबा दिया और तुरंत मैसेज आया, ‘12,850 रुपए आप के खाते से डैबिट किए गए.’ मैं दंग रह गया, ‘‘अरे, हमारे पैसे कैसे कट गए?’’ सामने से आवाज आई, ‘नो प्रौब्लम सर, यह सिर्फ डमी ट्रांजैक्शन है. अभी नया लिंक भेजता हूं, उस से आप को रिफंड जाएगा.’ और हम ने वही गलती दोहराई, एक बार 2 बार कुल 5 बार. अब हमारे खाते से 64,250 रुपए निकल चुके थे. जब उस ने छठी बार 10,000 रुपए का नया लिंक भेजा, बेटे ने कांपती आवाज में पूछा, ‘‘बारबार पैसे कट रहे हैं पापा, रिफंड क्यों नहीं रहा?’’


फोन पर आदमी झल्ला गया, ‘सर, यह कन्फर्मेशन है. फास्ट करिए.’ बेटे ने बैंक ऐप खोला और उस ने देखा तो पता चला पूरे 64,250 रुपए हमारे खाते से निकल चुके थे. हम ने उसे एक भद्दी सी गाली दी और उस ने तुरंत फोन काट दियाअब हम ने बैंक की हैल्पलाइन से बात की. जवाब मिला, ‘यह फिशिंग फ्रौड है. तुरंत साइबर क्राइम में शिकायत दर्ज करें.’ मेरा मन बहुत बो?िल हो गया था. मरता क्या करता. 2 घंटे में हम ने एफआईआर से ले कर औनलाइन शिकायत तक सबकुछ पूरा किया.


लेकिन अगले ही दिन सुबह एक चमत्कार हुआ. फोन खोला तो देखा पूरर 64,250 रुपए वापस मेरे खाते में जमा हो गए थे. खुशी के आंसू गए. पहली बार लगा कि सरकारी विज्ञापन सच बोलते हैं, ‘तुरंत शिकायत करो, पूरा पैसा वापस मिल जाएगा.’ एक महीना बीत गया. जिंदगी धीरेधीरे सामान्य हो चली थी, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. बैंक से फिर हमें 4 एसएमएस मिले. चैक किया तो पता चला कि कुल 5 में से 4 रिफंड वापस ले लिए गए थे. मतलब 51,400 रुपए फिर से काट लिए गए थे.


मैं ने घबरा कर बैंक को फोन लगाया. जवाब मिला, ‘सर, हम ने रिफंड की पुष्टि के लिए आप को फोन किया था. आप ने रिसीव नहीं किया, इसलिए रकम वापस डैबिट हो गई है.’ मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई. ठगी से बचने के डर ने मु? अनजान फोन उठाने नहीं दिया और अब उसीसतर्कताकी सजा मिल गई थी. हम ने बैंकिंग लोकपाल में शिकायत की. एक महीने बाद जवाब आया, ‘आप की शिकायत निराधार है.’


सरकारी तंत्र ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के नाम पर बस औपचारिकता कर दी थी. उस दिन सम? में आया कि खतरा सिर्फ ठगों से नहीं, खतरा उस व्यवस्था से भी है, जो जनता से जागरूकता की उम्मीद तो करती है, पर खुद कभी संवेदनशीलता नहीं दिखाती. अब मु? एक ही बात सम? में रही थी, वह यह थी कि सावधानी कोई औप्शन नहीं, बल्कि आज की पहली जरूरत है. एक गलत क्लिक हमारी सारी सिक्योरिटी में सेंध लगा सकता है. किसी तंत्र, संस्था या नियम से पहले अपनी सोच पर भरोसा करना ही सब से बड़ा कवच है.    Hindi Story                     

Crime Story: गोंडा में औनर किलिंग – लड़की को करंट लगा कर मारा

Crime Story: उत्तर प्रदेश का गोंडा जिला अपनी चीनी इंडस्ट्री के लिए मशहूर है, पर यहीं से एक ऐसी खबर आई है, जो समाज और परिवार में फैले जहर की दर्दनाक मिसाल है. यहां के पांडेय बाबा पुरवा इलाके में रहने वाली 19 साल की शिवानी पांडेय की 30 जनवरी, 2026 की सुबह संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी. इस बारे में शिवानी के पिता चंद्र प्रकाश पांडे और भाई राहुल ने सुबह 7 बजे पुलिस को सूचना दी और बताया कि शिवानी कपड़े इस्तरी कर रही थी और करंट लगने से उस की मौत हो गई.


पर यह मामला इतना सीधा था नहीं, क्योंकि इसी बीच शिवानी के प्रेमी ने उस के पिता और भाई के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करा दिया. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंची. शिवानी की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज कर जांच शुरू की. साथ ही, पुलिस को यह भी पता चला कि शिवानी का गांव में रहने वाले परमेश्वर पाठक से तकरीबन 5 साल से अफेयर चल रहा था. जब यह बात शिवानी के पिता और भाई को मालूम हुई, तो उन्होंने शिवानी को सम?ाने की कोशिश की, लेकिन शिवानी यह रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार नहीं थी.


इस के बाद पुलिस ने शिवानी के भाई और पिता को गिरफ्तार कर लिया. कड़ाई से हुई पूछताछ में उन दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. क्यों हुआ यह कांड 28 मई, 2025 को शिवानी के प्रेमी परमेश्वर पाठक ने उस के पिता चंद्र प्रकाश पांडे से शादी को ले कर बात की थी, लेकिन उन्होंने शादी करने से इनकार कर दिया. बाद में किसी तरह नवंबर, 2025 में शादी तय हुई, लेकिन उस से पहले ही परमेश्वर पाठक के पिता की मौत हो गई और यह शादी टल गई.


हाल ही में फिर से शादी की बात उठी, लेकिन शिवानी के घर वालों ने साफ मना कर दिया. इतना ही नहीं, वे शिवानी के साथ मारपीट भी करने लगे. इस बात से तंग आई शिवानी ने अपने प्रेमी परमेश्वर पाठक को 2 बार चिट्ठी लिख कर भेजी और उस ने डर जाहिर किया कि उस के साथ कुछ भी गलत हो सकता है. इधर, शिवानी के पिता और भाई गुस्से में थे. पुलिस पूछताछ में इन दोनों आरोपियों ने बताया कि वारदात वाले दिन शिवानी सुबह के तकरीबन 5 बजे घर से चुपचाप भागने की फिराक में थी. यह पता चलने पर वे शिवानी को कमरे में ले गए और भाई राहुल ने उसे तख्त पर लिटा दिया, फिर उस के हाथों को मफलर से बांध दिया.


इस के बाद पिता चंद्र प्रकाश ने शिवानी के मुंह को दुपट्टे से बांधा और बिजली की इस्तरी के तार से उस के पैर में करंट लगाया गया. इस से कुछ देर में तड़पतड़प कर उस की मौत हो गई. इस पूरे मामले के बारे में एसपी विनीत जायसवाल ने बताया कि बेटी की पिता और भाई ने मिल कर हत्या की थी और पुलिस को गुमराह करने के लिए करंट से मौत की सूचना दी थी, पर पोस्टमौर्टम रिपोर्ट और आरोपियों के कुबूलनामे
से मामले का खुलासा हो गया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.                                

Hindi Story: होली पर खुली पोल

Hindi Story: रंगतेज पालजी को अपनी ताई की असीम कृपा से भारतीय नाट्यकला केंद्र में प्रवेश मिल गया. वहां होली के रंगोत्सव के लिए नाटक तैयार करने के लिए राइटर और डायरैक्टर साहब ने उन्हें जो रोल प्ले करने के लिए दिया उस में उन्हें अपनी कभी होली खेलने वाली प्रेमिका को उस के घर जा कर रंग लगाना था. उन्होंने नाटक की स्क्रिप्ट बिना पढ़े ही अपना यह रोल करने की ठान ली.


दरअसल, जवानी के दिनों में होली पर रंगतेज पालजी ने अपना दिलफेंक पानी भरा गुब्बारा आसपड़ोस की जवान लड़कियों पर मारा था. यह बात अलग थी कि उन का पानी भरा गुब्बारा किसी एक को भी लगा. हां, एक बार पड़ोस वाली सविता भाभी जरूर उन के फटे गुब्बारे के पानी पर फिसली थीं. उन की गोरी टांग में फ्रैक्चर हुआ तो उन्हें अपनी कार में उन की बनारसी साड़ी उन के घुटनों तक उठा कर आहिस्ता से बैठा कर अस्पताल ले जाना पड़ा था.


खबर पा कर जब तक सविता के पति अस्पताल पहुंचे तब तक तो अस्पताल के परचे में पति के नाम की जगह पर रंगतेज पाल का नाम दर्ज हो चुका था. सविता टूटा पैर लिए स्ट्रैचर पर बैठी थीं और रंगतेज पालजी उन को अपने हाथों से उन की पीठ से सरके पल्लू को साइड से और सरकाते हुए उन की कट स्लीव्स ओपन गहरे कट वाले ब्लाउज से झांकती गुलाबी पीठ को अपने धड़ से लगा कर जकड़े हुए थे. उन के पति को आता देख वे संभले और बिल्ली रास्ता काट गई जैसी हालत से गुजर कर तुरंत सावधान हो गए.


खैर, बात चल रही थी होली के नाटक में रोल प्ले करने की तो अनुभवी रंगतेज पालजी ने अपनेआप को संभाला, रंगीन रंगों से लैस किया. राइटर और डायरैक्टर साहब ने बताया कि तुम्हें धोखे से होली खेलने वाली अपनी प्रेमिका के घर में घुस कर उस के थानेदार बाप से बच कर उसे रंग लगाना है. ‘बुरा मानो होली हैकह कर सबक सिखाना है. उन की बांछें फिर खिल उठीं. वे तैयार होने लगे.


वाशरूम में 4-5 बार शेव बनाने के बाद जब उन्हें अपना चेहरा चिकना और सलोना लगने लगा तो मेकअपरूम में पहुंचे. आईने के सामने खड़े हो कर अपने माथे पर लाल बिंदी, आंखों में काजल, गालों पर गुलाबी चटक रोज, होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक और बौबकट बालों पर औरतों जैसी लंबी चुटिया वाली विग लगा कर अपनी मांग में चुटकीभर सिंदूर भी भर लिया.


चेहरे की खूबसूरती को पूरा करने के बाद उन्होंने पेटीकोट और साड़ीब्लाउज को पहनने के लिए उठाया और जैसे ही उन्होंने इधरउधर देख कर सावधानी से अपनी पैंट उतारने के लिए उस के आगे का बटन खोला और जिप के रोलर को नीचे की तरफ सर्र से सरकाया ही था कि एकाएक उन्हेंसावधानी हटी दुर्घटना घटीवाला मूलमंत्र याद गया, सो, उन्होंने तुरंत जिप के रोलर को सर्र से ऊपर की तरफ चढ़ाने के बाद आगे का बटन बंद कर लिया. अपने तन से पैंट और टीशर्ट को नहीं उतारा.


पैंट के ऊपर ही पेटीकोट पहन लिया और टीशर्ट के ऊपर जैसे ही ब्लाउज पहन साड़ी पहनने लगे तो उन का ध्यान आईने में चला गया. अपनी खूबसूरती पर इतराते हुए पहले तो भाभियों सी मुसकराहट मारी, देवर सी आंख मारी और इठलातेइतराते हुएआंखों ही आंखों में इशारा हो गया, बैठेबैठे जीने का सहारा हो गया…’ गीत गाते हुए अपनी आंखों के इशारे से आड़ीतिरछी नैनकटारी मारने की प्रैक्टिस करने लगे.


आईने में ब्लाउज के एरिया पर ध्यान गया तो अपने सपाट हिस्से को भरने के लिए उन्होंने अटैंडैंट छोटू को भेज कर तुरंत 2 संतरे मंगवा लिए. छोटू के मेकअपरूम से बाहर जाते ही उन्होंने दोनों संतरे अपने ब्लाउज में फिट कर लिए. मगर अंदर ब्रा पहने होने के कारण उन दोनों संतरों के निकल कर गिर जाने का डर उन के मन में समाया तो ?ाटपट उन्होंने राइटर और डायरैक्टर साहब को इंटरकौम कर के एक ब्रा का इंतजाम करवाया. फिर ब्रा पहन कर उस में संतरे महफूज रख लिए.


साड़ी पहनी तो फिर मन में खयाल आया कि क्यों बेबी बंप भी बना लिया जाए. आड़े वक्त में काम आएगा. अगर दुष्ट सास यानी प्रेमिका की मां सामने गईं तो मेरा बेबी बंप देख तरस खा कर कुछ बोलेंगी. उन्होंने अपना बेबी बंप बनाने के लिए तुरंत पेटीकोट को ऊपर की तरफ चढ़ाया और अपने मजबूत अंडरवियर बनियान का सहारा ले कर सोफासैट के एक कुशन को उस के अंदर सैट किया तो उन का बेबी बंप कभी ज्यादा ऊपर की तरफ उठा हुआ दिखे तो कभी नीचे की तरफ ?ाका हुआ.

खैर, कस कर साड़ी लपेटने के बाद साड़ी के पल्लू की मदद से वे अपना नया बेबी बंप बनाने में कामयाब हो गए. मेकअप रूम से बाहर निकल वे मंच पर पहुंच गए. प्ले चालू हो चुका था. उन का रोल आया तो वे अपना नया बेबी बंप संभाल आहिस्ता से मंच पर चढ़े. रोल के मुताबिक, सब से पहले उन का सामना हुआ होने वाले खुर्राट थानेदार ससुर से. मगर वह उन को पहचान पाया और सामने आती प्रैग्नैंट लुगाई को देख अपना सिर नीचे की ओर कर के घर से बाहर निकल गया.


फिर सामना हुआ होने वाली सास यानी प्रेमिका की मां से. तो वे अपने बेबी बंप पर हाथ फेर उन से बोले, ‘‘चाची, होली मुबारक हो. महल्ले में नई आई हूं. ये तो अपने औफिस के दोस्तों के साथ होली खेलने बाहर निकल गए तो मैं ने सोचा, होली का मौका है, मां भी साथ में नहीं है. ऐसे में आप से ही मिल कर होली की शुभकामनाएं बांट लूं, आप का आशीर्वाद ले लूं.’’ चाची को भी अपने जमाने का बेबी बंप याद गया, वे बोलीं, ‘‘आओ, पलंग पर संभल कर बैठ जाओ. मैं तुम्हारे लिए होली के पकवान ले कर आती हूं.’’


चाची रसोई में जाने से पहले अपनी हसीन बिटिया रजनी को आवाज दे कर बुलाती हैं और नई पड़ोस वाली प्रैग्नैंट भाभी से परिचय करवाती हुई कहती हैं, ‘‘रजनी, बैठ जा इन के पास और कुछ गुर ले ले इन से. आज नहीं तो कल तु? भी ससुराल जा कर ऐसे ही पेट फुला कर मेरे पास बच्चा जनने आना होगा.’’ रजनी शरमा जाती है और अपनी मम्मी के रसोई में जाते ही उन के पास ही पलंग पर बैठ जाती है.


प्रैग्नैंट भाभी को मौके की तलाश थी. रजनी को पलंग पर अकेला साथ बैठा हुआ देख मानो, अंधे को दो नैन मिल गए हों, ऐसा महसूस करते हुए उन्होंने अपनी प्रेमिका को अपनी भरपूर बांहों में प्यार से जकड़ा. सिर पर हाथ फेरते हुए उस के बदन को नीचे तक सहलाया. उस के साथ गले लग कर ?ामे और नजर बचा कर अपना पेटीकोट उठा कर उस के नीचे पहनी हुई पैंट की जेब से रंगगुलाल निकाल उस को जम करबुरा मानो होली हैकहते हुए पोत दिया लेकिन होली खेलने के चक्कर में वे औरतों वाली दबी हुई आवाज में बोलना भूल गए और एकाएक मर्दाना आवाज में सबकुछ बोल गए.


रजनी को शक हुआ और इस बार उस ने प्यार से भाभी को थोड़ा जोर से गले लगाया कि तभी उन के दोनों संतरे ब्रा में से निकल जमीन पर गिर पड़े. संतरे बाहर निकल गिरते हुए देख वे तुरंत दौड़ कर घर से बाहर निकलने लगे तो उन का बेबी बंप भी ज्यादा नीचे लटक गया. यह सब देख रजनी को अब दाल में कुछ काला नजर गया. उस ने रंग लगा कर लालपीला कर के जाती हुई भाभी की चुटिया को पीछे से आहिस्ता से पकड़ कर वापस रोकना चाहा तो चुटिया ही हाथ में गई. तब सारा मामला सम? रजनी चौंकी और उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे, तुम?’’


‘‘बुरा मानो रजनी, तुम्हारे प्यार ने मेरा यह हाल कर दिया जो मेरे साथ शादी करने के बाद तुम्हारा हाल होना चाहिए था. इस होली के मौके पर तुम्हें रंगने के चक्कर में मेरा हो गया. ‘‘अब मु? जाने दो. मेरा काम तो हो गया. वैसे भी, कहीं मांजी गईं और उन को सब पता चल गया तो दिन में रात हो जाएगी. वे लातों से मारमार कर मु? काला भूत बना देंगी.’’ तभी रजनी ने आंगन में रखी पानी से भरी बालटी अपनी पड़ोस वाली प्रैग्नैंट भाभी पर यह कहते हुए उड़ेल डाली, ‘‘जाओ, अब घर जाओ. अब कभी चोर नहीं, असली मर्द बन कर सामने आना. मैं तभी तुम से शादी करूंगी वरना अगली होली तक किसी और की हो लूंगी.’’    Hindi Story                       

Hindi Story: बच्चों के भीतर नफरत का बीज

Hindi Story: बच्चे जन्म से हिंसक नहीं होते. उन का मन एक कोरे कागज की तरह होता है, जिस पर समाज, परिवार और माहौल अपनेअपने रंग भरते हैं. यह हम हैं, बड़े लोग, जो अनजाने में या जानबू? कर बच्चों के मन में प्रेम, करुणा और भाईचारे के बीज बो सकते हैं या फिर नफरत, डर और शक के जहरीले अंकुर उगा सकते हैं.


आज सब से बड़ा और सब से चिंताजनक सवाल यही है कि हमारे बच्चों के भीतर दूसरे धर्म, जाति और समुदाय के प्रति नफरत और अविश्वास का बीज आखिर बो कौन रहा है? बचपन सीखने की उम्र है. बच्चे अपने आसपास जो देखते हैं, सुनते हैं और महसूस करते हैं, वही उन की पर्सनैलिटी की बुनियाद बनता है. घरपरिवार की बातचीत, बड़ों की सोच, महल्ले की चर्चाएं, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों की भाषा और यहां तक कि चुटकुलों अफवाहों का असर भी उन के कोमल मन पर गहराई से पड़ता है. वह वही सच मान लेता है, जो उस के भरोसेमंद बड़े उसे बताते हैं.


पर आज हालत यह है कि बहुत छोटेछोटे बच्चे ऐसे राजनीतिक और धार्मिक जहर से लैस कर दिए जा रहे हैं, जिसे वे सम? भी नहीं सकते. एक 11 साल के बच्चे को महात्मा गांधी की जन्मतिथि या पुण्यतिथि की जानकारी नहीं है, लेकिन उसे यहज्ञानजरूर दे दिया गया है कि मुसलिमों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और जो भारत में रह गए, वे गांधी कीगलतीकी वजह से रह गए.


वह बच्चा यह भी मानता है कि देश की सारी समस्याओं की जड़ मुसलिम हैं. सवाल यह नहीं है कि यह बच्चा ऐसा क्यों सोचता है, बल्कि सवाल यह है कि उसे यह सोच सिखाई किस ने? दूसरी ओर, एक मुसलिम बच्चे को यह बताया जाता है कि हिंदुओं के घरों में शादीब्याह के मौके पर दाल में जो घी डाला जाता है, वह सूअर की चरबी का होता है. जब उस परिवार से पूछा जाता है कि यह बात उसे कैसे पता चली, तो उस का जवाब होता है किहमारी बिरादरी के हमारे साथी यही कहते हैं…’


जब उस परिवार को यह सम?ाया जाता है कि हिंदू परिवारों में गाय या भैंस के दूध से बना घी ही इस्तेमाल होता है, तब भी वह भरोसा नहीं कर पाता. अविश्वास इतना गहरा कर दिया गया है कि सच भी ?ाठ लगने लगता है. इसी तरह, हिंदू बच्चों के बीच यह डर बैठा दिया जाता है कि अगर वे मुसलिमों के यहां खाना खा लेंगे, तो उन्हें किसी किसी रूप में गाय का मांस खिला दिया जाएगा. यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि किसी हिंदू को अगर मुसलिम गाय का मांस खिला दे, तो उसे मसजिद बनाने कापुण्यमिलता है.


इस से भी आगे बढ़ कर, यह जहरीली सोच बच्चों के भीतर इस हद तक भर दी जाती है कि अगर कोई हिंदू किसी मुसलिम लड़की से संबंध बनाता है, तो उसे मंदिर बनाने काफलमिलता है. ये बातें इतनी भयावह हैं कि इन्हें दोहराते हुए भी शर्म आती है, लेकिन यही ?ाठ आज बच्चों के मन में सच की तरह बोया जा रहा है.


एक सच्ची घटना इस पूरे मामले को आईने की तरह सामने रखती है. एक ट्रेन यात्रा के दौरान एक हिंदू और एक मुसलिम परिवार अगलबगल की सीटों पर बैठे थे. हिंदू परिवार के साथ 8 साल का एक बच्चा था. जब मुसलिम परिवार ने अपना खाना निकाला, तो बच्चा उत्सुकता से उन की ओर देखने लगा. वे लोग उस बच्चे को भी परांठा और भुजिया देने लगे, लेकिन बच्चे के मातापिता ने तुरंत रोक दिया और कहा, ‘मत दीजिए, हम आप के यहां का खाना नहीं खाते. हमारे बापदादा ने भी नहीं खाया, तो हम अपने बच्चों को क्यों खाने दें…’


बात आईगई हो गई, पर रात के समय, जब सभी सो गए, अचानक वही बच्चा तेज पेटदर्द से रोने लगा. हिंदू परिवार के पास उस समय कोई दवा नहीं थी. थोड़ी ?ि?ाक के साथ मुसलिम परिवार ने पेटदर्द की दवा देने की पेशकश की. मजबूरी में दवा ली गई. कुछ ही देर में बच्चा ठीक महसूस करने लगा और गहरी में नींद सो गया. सुबह उठते ही वही बच्चा अपने पिता से बोला, ‘‘पापा, अगर अंकल दवा नहीं देते तो मेरा बहुत बुरा हाल हो जाता. मुसलिम लोग भी अच्छे होते हैं.’’


पिता के पास इस वाक्य का कोई जवाब नहीं था. वे बसहांहांकह कर बात टाल गए. उस एक रात ने बच्चे के भीतर सालों से भरे गए जहर को हिला दिया था. यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम बच्चों को धार्मिक और संस्कारी बनाने के नाम पर उन के दिमाग में जहर तो नहीं घोल रहे हैं? क्या हम उन्हें आस्था नहीं, बल्कि नफरत विरासत में दे रहे हैं? क्या हम उन्हें इनसान बनने से पहले हिंदूमुसलिम बनने की सीख नहीं दे रहे हैं?


आज जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों को यह सिखाएं कि समाज विविधताओं से बना है और यही उस की ताकत है. उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि इस देश को आजाद कराने, संवारने और आगे बढ़ाने में हर धर्म, हर जाति और हर समुदाय के लोगों का योगदान रहा है. खेत में काम करने वाला किसान हो या अस्पताल में सेवा देने वाला डाक्टर, स्कूल में पढ़ाने वाला टीचर हो या सड़क साफ करने वाला मजदूर, सभी इस देश को बनाने में बराबर के भागीदार हैं.


बच्चों के भीतर नफरत नहीं, बल्कि प्यार और भाईचारे का बीज बोना होगा. उन्हें सिखाना होगा कि धर्म, जाति और भाषा  इनसान को बांटने के औजार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के रंग हैं. अगर हम यह कर पाए, अगर हम बच्चों के मन में इनसानियत को सब से ऊपर रख पाए, तो यकीन मानिए कि आने वाला कल समाज और देश दोनों के लिए ज्यादा शांत, खुशहाल और सुखद होगा. Hindi Story

Film: परदे की दुनिया-पीरियड्स में किया आइटम डांस

Film: रणवीर सिंह की फिल्मधुरंधरने खूब पैसा बनाया है. अब उस का दूसरा पार्ट आने वाला है. पहले पार्ट में एक आइटम डांस नंबरशरारतबहुत पसंद किया गया था, जो आयशा खान पर भी फिल्माया गया था, जिस में उन के डांस की तारीफ हुई थी.
पर हाल ही में आयशा खान ने इस गाने के बारे में बताते हुए लोगों को चौंका दिया. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘हमारी 2 दिन की शूटिंग थी. बहुत
थकान वाली थी, मैं उन दिनों पीरियड्स पर थी. मतलब पीरियड्स में सूजन हो जाती है, चेहरा और शरीर बैस्ट नहीं लगता. काश, मैं शूटिंग के दौरान अपने बैस्ट फौर्म में होती.’’


कंगना पर किया सनसनीखेज दावा
कंगना राणावत अपने बोल्ड अंदाज के लिए जानी जाती हैं, फिर वह उन की फिल्में हों या निजी जिंदगी. अपने कैरियर की शुरुआत में उन्होंने कहा था कि वे हैंडसम पर अपने पिता की उम्र के आदित्य पंचोली के साथ रिलेशनशिप में थीं, पर यह भी दावा किया कि आदित्य पंचोली उन के साथ बदसलूकी, मारपीट और इमोशनल टौर्चर किया करते थे.
इस के उलट आदित्य पंचोली ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘हम पतिपत्नी की तरह थे. मैं तो यारी रोड पर हम दोनों के लिए घर बनवा रहा था. हम पिछले 3 साल तक एक दोस्त के घर पर साथ रहे. मैं उसे बहुत सारी फिल्में दिखाया करता था.’ आज कंगना और आदित्य दोनों अलग हैं, पर इन की यह रिलेशनशिप किसी मसाला फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी तीखी लगती है.


प्रतीक बब्बर ने खोला राज
राज बब्बर और स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक फिल्मों से ज्यादा अपनी निजी जिंदगी को ले कर खबरों में बने रहते हैं. जब उन्होंने प्रिया बनर्जी से दूसरी शादी की तो अपने पिता राज बब्बर तक को न्योता नहीं दिया था और अपने नाम से बब्बर भी हटा दिया था. हाल ही में प्रतीक और और प्रिया ने शादी के बारे में बात की और प्रिया ने कहा, ‘‘हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में
90 फीसदी शादियां दिखावटी होती हैं और मैं यह जानती हूं, क्योंकि मैं ने इसे करीब से देखा है.’’
इस पर प्रतीक ने सहमति जताते हुए ट्विंकल खन्ना के उस बयान का जिक्र किया, जिस में उन्होंने अपने टौक शो में फिजीकल चीटिंग के बारे में बात करते हुए कहा था, ‘अगर शादीशुदा लोग रात गई बात गईकह रहे हैं, तो आप सम? सकते हैं कि क्या हालात हैं.’                        

सोफी चौधरी की अमीरी का राज
खूबसूरत ऐक्ट्रैस और सिंगर सोफी चौधरी आज भले ही फिल्म इंडस्ट्री से दूर दिखाई देती हैं, पर वे बेरोजगार नहीं हैं, बल्कि अच्छीखासी कमाई कर रही हैं.
सोफी चौधरी नेशादी नंबर 1’, ‘प्यार के साइड इफैक्ट्स’, ‘हे बेबीऔरवन्स अपौन टाइम इन मुंबई दोबाराजैसी कई फिल्मों में काम किया है और कई म्यूजिक वीडियो में अपने गाने और डांस का हुनर दिखाया है, पर वे फिल्मों में कभी लीड हीरोइन नहीं बन पाईं, लेकिन अपने अलबम गानों की वजह से नाम और दाम दोनों कमा रही हैं. इस के अलावा वे अरबपतियों की शादी और फंक्शन भी होस्ट करती हैं.
      

Hindi Story: पिघलता सावन

Hindi Story: डो बैल की आवाज सुन कर अमन ने दरवाजा खोला.
‘‘अरे, मंजरी तुम? यहां कैसे अचानक?’’
‘‘अंदर नहीं आने दोगे क्या? सारे सवालों के जवाब यहीं चौखट पर चाहिए?’’
‘‘अरे, नही. आओ, अंदर आओ,’’ अमन ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘यहां कैसे?’’
‘‘तुम एक्सपैक्ट नहीं कर रहे थे मुझे’’
‘‘यों अचानक कैसे कर सकता हूंतुम्हीं बताओ?’’
अभी उन्होंने बात शुरू ही की थी कि अचानक मौसम पलटने लगा. सुरमई घटाओं के साए यहांवहां दौड़ने लगे, हवा ने भी ठंडक से दोस्ती कर ली और बादल भी अपनी धीमी आवाज में ताल छेड़ने लगे. सावन का महीना, कब धूप कब बारिशवैसे भी दिल्ली का अपना कोई मौसम तो है नहीं. आसपास के मौसम में रंग जाता है और बिखर भी जाता है.
‘‘लगता है कि बारिश होगी…’’ अमन ने मंजरी के हाथ से गिलास वापस लेते हुए कहा.
‘‘हां, लगता तो है.’’
‘‘इस से तो तुम्हें वापसी में परेशानी हो सकती है.’’
‘‘तो क्या मैं यहां नहीं रुक सकती?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘फैसला तुम्हारा ही था, रुकने का,’’ अमन ने मंजरी की बु? सी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें जाना क्यों है? क्यों जाना चाहती हो अपना भरापूरा, बसाबसाया घर छोड़ कर
‘‘सबकुछ तो है तुम्हारे पास. एक बड़ा घर, बैंक बैलेंस, 2 खूबसूरत बच्चे, एक अच्छी नौकरी वाला सच्चा पति और उस पर तुम्हारी इतनी अच्छी जौब. मु? से ज्यादा ही कमाती हो, फिर संतुष्ट क्यों नहीं हो तुम?’’
‘‘हां, मैं संतुष्ट नहीं हूं तुम से.’’
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ अमन
ने पूछा
‘‘यही कि तुम मु? संतुष्ट नहीं कर पाते हो.’’
अमन पर जैसे बिजली गिरी. कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर अपने अंदर की सारी ताकत जमा करता हुआ वह बोला, ‘‘देखो, मैं एक आम इनसान हूं, कोई सुपरमैन नहीं.’’
‘‘पर मु? सुपरमैन ही चाहिए…’’ मंजरी ने अमन के चेहरे पर नजर गड़ाए हुए कहा, ‘‘जो मु? शारीरिक रूप से संतुष्ट कर सके, चरम सुख का अहसास
करा सके.’’
‘‘वाहियात किस्म की मैगजीन पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा.’’
‘‘छोड़ो, मैं तुम से किसी बहस में उल?ाना नहीं चाहती.’’
‘‘अगर मु? में कुछ कमी होती तो हमारे ये 2 बच्चे कैसे हो गए?’’
‘‘बच्चे तो हिजड़ों के भी हो जाते हैं,’’ मंजरी की यह बात सुन कर अमन भीतर ही भीतर गुस्से से तमतमाने लगा. उस का दिल चाहा कि 2 थप्पड़ में सारा चरम सुख पानी की तरह बहा दे, लेकिन उस ने खुद पर बड़ी मुश्किल से
कंट्रोल पाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी तुम बहकी हुई हो, सोचसम? कर सही फैसला लो.’’
‘‘अच्छी तरह सोच समझकर लिया है मैं ने यह फैसला. वैसे भी तुम्हारे साथ बहुत समय गंवा दिया है मैं ने. मैं तुम से तुम्हारी दौलत और जायदाद मैं से कोई हिस्सा नहीं मांग रही हूं और ही तुम्हें कोर्टकचहरी में फंसाना चाहती हूं. मैं बस तुम से आजाद हो कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बिताना चाहती हूंबिंदास.’’
‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि तुम्हें चरम सुख नहीं दे पाता हूं, मगर ऐसा
प्ले बौय टाइप का आदमी तुम्हें
मिलेगा कैसे और कहां?’’ अमन ने चिंतित आवाज में कहा.
मंजरी मुसकराती हुई अपना बैग उठा कर दरवाजे से बाहर निकल गई.
‘‘हां, फैसला तो मेरा ही था. बच्चे कहां हैं? आज तो संडे है, घर पर ही होना चाहिए,’’ मंजरी ने इधरउधर नजर दौड़ाते हुए कहा.
‘‘बच्चे याद हैं तुम्हें?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.
‘‘ताना दे रहे हो?’’
‘‘तुम जो चाहे सम?. तुम्हारा अपना दिमाग है और अपनी सोच.’’
‘‘जन्म तो मैं ने ही दिया था.’’
‘‘काश, जाते समय यह सोच लेती. खैर, छोड़ो मैं भी किन बातों में उल? गयाकौफी पियोगी?’’ अमन ने पूछा.
‘‘तुम ने बच्चों से क्या कहा? उन की मां कहां गई?’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं दिल्ली शिफ्ट हो गया हूं?’’ अमन
ने कुरेदा.
‘‘तुम सरकारी नौकर हो, आसानी से पता मिल गया. बच्चों से क्या कहा तुम ने? और बच्चे हैं कहां?’’
‘‘इन सब बातों में क्यों उल? रही हो तुम? वैसे, तुम आई क्यों हो?’’
‘‘बताते क्यों नहींबच्चे कहां हैं?’’
‘‘जैसे मेरा पता किया, बच्चों का भी पता कर लेती…’’
‘‘मतलब तुम नहीं बताओगे?’’
‘‘क्या तुम भी बच्चों की रट
लगा रही होतुम ने कल रात कोई
सामाजिक उपन्यास पढ़ लिया क्या पोर्न मैगजीन की जगह?’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
बादलों की तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और बारिश होने लगी. अभी बारिश थोड़ी हलकी ही थी,
लेकिन शोर बहुत था पानी काजो पानी कभीकभी गंदगी अपने साथ बहा ले जाता है और ले भी आता है.
बाहर लौन में पानी के ऊपर गंदगी जमा होने लगी. साथ ही बारिश धीरेधीरे तेज होने लगी, लेकिन अब शोर कुछ कम हो गया था.
मंजरी कुछ बोली, बस आंखें बंद किए सोफे से सिर टिकाए रही.
अमन ने उठ कर कौफी बनाई, साथ ही कुछ स्नैक्स भी टेबल पर ला कर रखते हुए बोला, ‘‘कौफी पियो.’’
‘‘तुम तो मेहमान सम? कर खातिरदारी कर रहे हो…’’ मंजरी ने अमन की आंखों में ?ांकते हुए कहा.
‘‘लेकिन मेहमानों से लोग खुश
होते हैं.’’
‘‘पर मेरे आने से तुम खुश नहीं हो.’’
‘‘सच तो यह है कि कोई अहसास ही नहीं हो रहा है.’’
‘‘अगर मैं आती तो?’’
‘‘तो कुछ नहींअब आई हो तो भी कुछ नहींकुछ जिंदा नहीं है.’’
‘‘ठीक कहा तुम ने. हम मर ही तो जाते हैं ख्वाहिशों में घिर कर…’’
‘‘तुम्हारे चरम सुख का अहसास कैसा रहा और अनुभव भी?’’
‘‘कुछ दिन तो अच्छा लगता है, फिर हम थकने लगते हैं.’’
‘‘तो अभी अच्छा लगता है या थक गई हो?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’
‘‘थकावट तुम पर ज्यादा भारी पड़ गई है शायद.’’
‘‘तुम पहले से भी ज्यादा सम?ादार हो गए हो.’’
बारिश अब मूसलाधार हो गई है.
घर के आंगन में थोड़ा पानी ठहरने लगा है. बाहर की सड़कें डूब गई हैं. सारा कूड़ाकचरा पानी पर तैरने लगा है. बारिश के दिनों में दिल्ली बद से बदतर हो
जाती है.
‘‘तुम यहां कहां ठहरी हुई हो? वैसे, मु? पूछना तो नहीं चाहिए था,’’ अमन ने चुप्पी तोड़ी.
‘‘क्या जाने के लिए कह रहे हो?’’
‘‘सम?ादार तो तुम भी बहुत हो,’’ कहते हुए अमन ने खिड़कियों के परदे हटा दिए और कांच वाले पल्ले खोल दिए. अब ड्राइंगरूम में कुछ ताजा हवा आने लगी.
‘‘अभी तो शाम होने में समय है,
जब बरसात रुक जाए तो चली जाना,’’ अमन बोला.
‘‘सैक्स में भी यही होता हैपानी खत्म सैक्स खत्म. बरसात हवस एकजैसे ही हैं, जब तक बरसात कायम है तब तक मौसम सुहाना रहता है, उस के बाद उमस. सैक्स में आकर्षण तो है, पर हमेशा के लिए नहीं.’’
‘‘हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता मंजरी.’’
‘‘प्यारहोता है हमेशा के लिए.’’
‘‘अब तुम 40 की हो गई हो. जब
28 की थी तो चरम सुख के लिए भटकी, अब प्यार के लिए? तुम ने जिंदगी को जरूरतों के हिसाब से जीने की कोशिश की, पर जिंदगी आपसी तालमेल और सहयोग से भी जी जा सकती थी,’’ अमन ने कहा.
‘‘उपदेश दे रहे हो?’’
‘‘जब उपदेश देना चाहता था, तब तुम ने सुना नहीं. अब क्या फायदा इन प्रवचनों का?’’
‘‘भूल सुधारी भी जा सकती है और राह से भटका इनसान सही राह पर भी सकता है.’’
‘‘बिलकुल, अगर वह भूल हो तो.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो ? मैं पछतावा करूं?’’ मंजरी थोड़ी तेज आवाज में अमन से बोली.
‘‘नहीं. मैं क्यों चाहूंगा? मेरा इस
से क्या सरोकार?’’ अमन ने कहा.
‘‘सरोकार होता तो तुम वह करते जो मैं कहती थी.’’
‘‘मतलबजोश बढ़ाने वाली
दवा? जो तुम मैगजीन में पढ़ कर सजैस्ट करती थी…’’
‘‘पर तुम एक बार कोशिश कर के तो देखते.’’
‘‘मैं जैसा था खुद से सैटिस्फाई था और हूं भी. तुम भी अब सैटिस्फाई
तो होगी? 12 साल से चरम सुख लेने
के बाद?’’
कमरे में खामोशी छा गई. सिर्फ बारिश की आवाज अपने सुरीले अंदाज में आलाप ले रही थी. हवा में थोड़ी और ठंडक बढ़ गई थी और थोड़ा अंधेरा भी बढ़ गया था. ऐसा लगता था सावन आज अपने पूरे जोबन पर है.
‘‘तुम मु? माफ नहीं कर सकते?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘शायद तुम जानती हो कि मैं इस तरह नहीं सोचता. अंधेरा बढ़ रहा है और बारिश भी. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. बारिश भी रुकेगी और अंधेरा भी छंटेगा. बस, थोड़ा सा समय लगेगा,’’ अमन ने कहा.
‘‘मगर, इस चक्कर में कहीं ज्यादा देर हो जाए?’’
‘‘तुम फिक्र मत करो, मु? खाना बनाना आता है. आज मेरे हाथ का बना खाना खा कर जाना,’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं ने खाने की बात नहीं की. और यह क्या तुम ने जाने की रट सी लगाई हुई है?’’
‘‘तो फिर…’’ अमन बोला.
‘‘मैं कहीं नहीं जाने वाली.’’
‘‘इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी मंजरी.’’
‘‘इस बार भी मेरी ही चलेगी. मैं यहां  तुम्हारे पास मरने आई हूं. मेरा हक है अपने घर में मरना. मैं अभी भी तुम्हारी पत्नी हूं.’’
‘‘कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘2 महीने हैं मेरे पास, वे तुम्हारे साथ  बिताना चाहती हूं. यूटरस में कैंसर पड़ गया है.’’
‘‘यूटरस तो निकाला जा सकता है.’’
‘‘तो तुम मु? जिंदा देखना चाहते हो?’’ मंजरी पहली बार खिलखिला
कर हंसी और हंसती ही रही बड़ी देर तक, फिर अचानक मंजरी की हंसी
रुक गई.
अमन ने मंजरी की तरफ देखा. वह एक ओर को लुढ़की हुई थी.
अमन लपक कर उस तक पहुंचा. मंजरी को सीधा कर लिटाया. उस
ने चैक किया, सांसें चल रही थीं.
उस ने जल्दी से पानी के छींटे मुंह
पर मारे.
कुछ ही देर के बाद मंजरी को होश गया. वह थकी हुई आवाज में
बोली, ‘‘लास्ट स्टेज. यूटरस निकलवा चुकी हूं. आपरेशन हो चुका है, पर
कैंसर बाकी हिस्से में फैल चुका है. सिर्फ 2 महीने…’’
बारिश आहिस्ताआहिस्ता कम होने लगी. काली घटाएं छटने लगीं और  अंधेरा भी कम होने लगा था. सड़क का पानी अपने साथ गंदगी बहा कर ले गया. घर का आंगन भी बरसात के पानी से धुल कर चमकने लगा था.
‘‘अब कहो तो मैं चली जाऊं?’’ मंजरी ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘नहीं. इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी,’’ मौसम की नमी अब अमन की आंखों में थी.
मौसम बिलकुल साफ था.      

लेखक – अहमद मुख्तार

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