शादी से पहले इन 10 बातों का रखें खास ध्यान

आमतौर पर सगाई होते ही लड़का लड़की एकदूसरे को समझने के लिए, प्यार के सागर में गोते लगाना चाहते हैं. एक बात तो तय रहती है खासकर लड़के की ओर से, क्या फर्क पड़ता है, अब तो कुछ दिनों में हम एक होने वाले हैं, फिर क्यों न अभी साथ में घूमेंफिरें. उस की ओर से ये प्रस्ताव अकसर रहते हैं कि चलो रात में घूमने चलते हैं, लौंग ड्राइव पर चलते हैं.

वैसे तो आजकल पढ़ीलिखी पीढ़ी है, अपना भलाबुरा समझ सकती है. वह जानती है उस की सीमाएं क्या हैं. भावनाओं पर अंकुश लगाना भी शायद कुछकुछ जानती है. पर क्या यह बेहतर न होगा कि जिसे जीवनसाथी चुन लिया है, उसे अपने तरीके से आप समझाएं कि मुझे आनंद के ऐसे क्षणों से पहले एकदूसरे की भावनाओं व सोच को समझने की बात ज्यादा जरूरी लगती है. मन न माने तो ऐसा कुछ भी न करें, जिस से बाद में पछतावा हो.

मेघा की शादी बहुत ही सज्जन परिवार में तय हुई. पढ़ालिखा, खातापीता परिवार था. मेघा मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे ओहदे पर थी. खुले विचारों की लड़की थी. मंगनी के होते ही लड़के के घर आनेजाने लगी. जिस बेबाकी से वह घर में आतीजाती थी, लगता था वह भूल रही थी कि वह दफ्तर में नहीं, ससुराल परिवार में है. शुरूशुरू में राहुल खुश था. साथ आताजाता, शौपिंग करता. ज्योंज्यों शादी के दिन नजदीक आते गए दूरियां और भी सिमटती जा रही थीं. एक दिन लौंग ड्राइव पर जाने के लिए मेघा ने राहुल से कहा कि क्यों न आज शाम को औफिस के बाद मैं तुम्हें ले लूं. लौंग ड्राइव पर चलेंगे. एंजौय करेंगे.

पर यह क्या, यहां तो अच्छाखास रिश्ता ही फ्रीज हो चला. राहुल ने शादी से इनकार कर दिया. कार्ड बंट चुके थे, तैयारियां पूरी हो चली थीं. पर ऐसा क्या हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ? पूछने पर नहीं बताया, बस इतना दोटूक शब्दों में कहा कि रिश्ता खत्म. बहुत बाद में जा कर किसी से सुनने में आया कि मेघा बहुत ही बेशर्म, चालू टाइप की लड़की है. राहुल ने मेघा के पर्स में लौंग ड्राइव के समय रखे कंडोम देख लिए. यह देख कर उस ने रिश्ता ही तोड़ना तय कर लिया. शायद उसे भ्रम था मेघा पहले भी ऐसे ही कई पुरुषों के साथ इस बेबाकी से पेश आ चुकी होगी.

कौन सी बातें जरूरी

इसलिए बेहतर है कोर्टशिप के दौरान आचरण पर, अपने तौरतरीकों पर, बौडी लैंग्वेज पर विशेष ध्यान दें. वह व्यक्ति जिस से आप घुलमिल रही हैं, भावी जीवनसाथी है, होने वाला पति है, हुआ नहीं. तर्क यह भी हो सकता है, सब कुछ साफसाफ बताना ही ठीक है. भविष्य की बुनियाद झूठ पर रखनी भी तो ठीक नहीं. लेकिन रिश्तों में मधुरता, आकर्षण बनाए रखने के लिए धैर्य की भावनाओं को वश में रखने की व उन पर अंकुश लगाने की जरूरत होती है.

प्यार में डूबें नहीं

शादी के पहले प्यार के सागर में गोते लगाना कोई अक्षम्य अपराध नहीं. मगर डूब न जाएं. कुछ ऐसे गुर जरूर सीखें कि मजे से तैर सकें. सगाई और शादी के बीच का यह समय यादगार बन जाए, पतिदेव उन पलों को याद कर सिहर उठें और आप का प्यार उन के लिए गरूर बन जाए और वे कहें, काश, वे पल लौट आएं. इस के लिए इन बातों के लिए सजग रहें-

  1. बहुत ज्यादा घुलना-मिलना ठीक नहीं.
  2. मुलाकात शौर्ट ऐंड स्वीट रहे.
  3. घर की बातें न करें.
  4. अभी से घर वालों में, रिश्तेदारों में मीनमेख न निकालें.
  5. एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान करें.
  6. अनर्गल बातें न करें.
  7. बेबाकी न करें. बेबाक को बेशर्म बनते देर नहीं लगती.
  8. याद रहे, जहां सम्मान नहीं वहां प्यार नहीं, इसलिए रिश्तों को सम्मान दें.
  9. कोशिश कर दिल में जगह बनाएं. घर वाले खुली बांहों से आप का स्वागत करेंगे.
  10. मनमानी को ‘न’ कहने का कौशल सीखें.

अपनी मरजी: उन बच्चों को किसने सहारा दिया?

मैंने जैसे ही जनाजे को कंधा दिया, बदन में कंपकंपी सी दौड़ गई. दिल बिलख उठा. लाश के आखिरी दीदार के लिए आई औरतें एकबारगी रोनेसिसकने लगीं. पर इन सब से ज्यादा दर्द में डूबी आवाजें बच्चों की थीं. 4 छोटेबड़े बच्चे एकसाथ बिलख रहे थे.

अमीना भाभी अपने पीछे 4 बच्चे छोड़ गई थीं. 5वें को जन्म देते वक्त वे खुद बच्चे के साथ ही इस दुनिया से कूच कर गई थीं.

पिछली रात जब उसे दर्द उठा था, तो अनवर भाई ने उसे शहर के एक अच्छे अस्पताल में भरती कराया. पर डाक्टर अमीना भाभी को मौत के मुंह में जाने से नहीं बचा पाए और न ही उस के 5वें बच्चे को ही.

हंसमुख अमीना भाभी की लाश को जब मैं हमेशा के लिए विदा देने जा रहा था, तो गुजरे वक्त की यादों में डूब गया.

अनवर मेरी बूआ का एकलौता बेटा था. हम एक ही शहर में रहते थे, इसलिए अकसर एकदूसरे के यहां आनाजाना लगा रहता था. वह मुझ से

4 साल बड़ा था, इसलिए मुझ पर बड़े भाई का रोब झाड़ता रहता था. पर जब उस की शादी हुई, तब मैं ने उसे और अमीना भाभी को खूब सताया.

सुहारागत को भाभी के कमरे में अनवर के जाने से पहले मैं पहुंच गया. अमीना शर्म व हया की गठरी बनी लंबा सा घूंघट निकाले पलंग पर बैठी थी. मेरी आहट पा कर वह और सिमट गई.

मैं आहिस्ताआहिस्ता चलता पलंग तक पहुंचा और बड़ी अदा के साथ उस की कलाई पकड़ी और घूंघट उलट दिया.

मुझे सामने पा कर वह एकदम डर गई. पर मेरे पीछेपीछे आई मेरी बहनों की खिलखिलाहट ने उस के डर को दूर कर दिया. फिर वह भी मुसकराए बिना न रह सकी.

इधर जब अनवर झूमता कमरे की तरफ बढ़ रहा था, तो हम से मुठभेड़ हो गई. वह बनावटी गुस्से से आंखें तरेर कर पूछने लगा, ‘‘तुम सब मेरे कमरे में क्या कर रहे थे?’’

‘‘बात यह है… मियां…’’ मैं हकलाते हुए बोला.

‘‘क्या बात है?’’ वह बेताबी से पूछ बैठा.

‘‘तुम सब जाओ,’’ मैं बहनों को इशारा करते हुए बोला, ‘‘हां, तो बात यह है जनाब, भाभी मायके से एक अनमोल तोहफा साथ लाई?है.’’

‘‘तोहफा हो या और कुछ, वह तो मेरे लिए है. तुम्हें इस से क्या? चलो फूटो,’’ अनवर हाथ में बांधे फूलों को सूंघते हुए बोला.

‘‘पर मियां साहब, वह तो तोहफे में 4 महीने का पेट लाई है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, असरारी और फातमा ने बताया,’’ मैं बनावटी भोलेपन से बोला.

मेरे इतना कहते ही अनवर का खिला चेहरा एकबारगी मुरझा गया. पर दूर खड़ी मेरी बहनें फिर खिलखिला पड़ीं और वह मेरा कान मरोड़ता हुआ कमरे की तरफ बढ़ गया.

पर फिर शुरू हुआ बच्चों का पैदाइशी दौर. शादी का एक साल बीततेबीतते अनवर एक बच्ची का बाप बन बैठा. हम सब ने उसे पहली औलाद के लिए मुबारकबाद दी और दूसरी के लिए संभलसंभल कर कदम रखने की हिदायतें भी दीं.

पर अनवर कब मानने वाला था. पहली बेटी 2 साल की भी न होने पाई थी कि दूसरे का पैगाम आ गया. चौथे साल के आखिर में अमीना भाभी ने एक लड़के को जन्म दिया. अनवर लड़का पा कर खुशी से पागल हो गया. रिश्तेदारों को खूब खिलायापिलाया.

छठी के दिन मैं ने उसे नसीहत दी, ‘‘मियां, अब मेरी मानो तो यहीं रुक जाओ. छोटा परिवार, सुखी परिवार.’’

वह बोला, ‘‘भाई, इस में आदमी क्या कर सकता है. यह सब तो ऊपर वाले की मरजी है. वह देता है, बंदे

लेते हैं. उस की मरजी में दखल देना गुनाह है.’’

मैं चुप ही रहा. क्या करता? समझदारों को भी समझाना कभीकभी मुश्किल हो जाता है. बीए पास स्कूल के मास्टर को भला मैं क्या समझाता.

देखते ही देखते गुजरे सालों के साथ वह 4 बच्चों का बाप बन बैठा यानी 1 बेटा और 3 बेटियां.

अब तक देश में सत्ता बदल चुकी थी. हिंदूमुसलिम बहुत होने लगा था. यह कहना कि कोई चौथा बच्चा है, एक बेइज्जती लगता था. फिर भी कुछ कट्टरपंथी अपनी धार्मिक दुकानदारी बचाने के लिए बच्चों को ऊपर वाले की अमानत ही मानते रहे हैं और इस का भरपूर प्रचार करते रहे हैं.

अनवर ने जब चौथे बच्चे पर हमें दावत दी, तो हम तकरीबन बिगड़ ही पड़े थे, ‘‘क्यों दकियानूसी का लिबास ओढ़े हुए हो, अनवर? भाभी की सेहत का भी खयाल करो. बेचारी की हड्डियां नजर आने लगी है. जवानी में ही बूढ़ी हो गई?है.’’

पर अनवर सफाई देते हुए कहने लगा, ‘‘यकीन करो भाई, मैं तो नहीं चाहता था. पर क्या करूं, ऊपर वाले की मरजी के आगे हमारी कहां चलती हैं. और भाई, यह मर्दानगी का भी तो सवाल है. मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं, यह बात हर बच्चा साबित करता है.’’

मैं उस की इस दलील से झुंझला उठा, ‘‘इसे ऊपर वाले की मरजी नहीं, खुद की मरजी कहो. तुम अगर

परिवार नियोजन के तरीके अपनाओगे, तो बच्चे कैसे पैदा होंगे? मर्दानगी का मतलब सिर्फ बच्चे पैदा करना नहीं है. अच्छा कमा कर घर को खुशहाल करना भी है.’’

मेरी दलील के आगे अनवर कुछ नरम पड़ गया और कहने लगा, ‘‘भाई, आगे मैं खयाल रखूंगा. अब से कंडोम जरूर इस्तेमाल करूंगा. पर ऐसी खबर अम्मी तक नहीं पहुंचनी चाहिए कि मैं अगला बच्चा रोकने के लिए कुछ उपाय कर रहा हूं.’’

मैं ने हामी भर ली और अनवर बेफिक्र हो गया.

दरअसल बात यह थी कि मेरी बूआ और फूफा जान दोनों कट्टर मजहबी खयालों के थे. वह हर नए जमाने की चीज को मजहब पर चोट मानते थे. टीवी, सिनेमा, मोबाइल और परिवार नियोजन से उन्हें काफी चिढ़ थी. इन सब का साया अनवर पर बचपन से ही पड़ा था. सो, वह भी मजहब का लिबास पहने हुए था. हालांकि वह स्कूल मास्टर था, पर था पुराने खयालों का ही.

सिनेमा से अनवर को परहेज नहीं था, पर घर में लगे टीवी से उसे उसी तरह चिढ़ थी, जिस तरह मेरी बूआ और फूफा को थी. उन में से कोई भी अगर मेरे घर आता तो हमें उन की खातिर टीवी बंद करना पड़ता था.

घर में मोबाइल भी बड़ी मुश्किल से आया. जब हर जगह उस की जरूरत हर काम में पड़ने लगी. अनवर और बूआ ने बेटियों को ज्यादा पढ़ने भी नहीं दिया. वे फटेहाल रहती थीं, जबकि हम सब कुनबे के लोग अपनेअपने कामों में अच्छी कमाई भी कर रहे थे और बेटेबेटियों को प्राइवेट स्कूलों में भी भेज रहे थे.

इस मामले में अनवर और बूआ से कई बार बहस भी हो चुकी थी. एक बार मैं बूआ को पाकिस्तान और दूसरे मुसलिम देशों के बारे में बताने

लगा, ‘‘बूआ, पाकिस्तान में भी तो धड़ल्ले से फिल्में बनती हैं. वहां भी घरों में टीवी बड़े चाव से देखा जाता है. साथ ही, अब होटलों में कैबरे भी होने लगे हैं.’’

तब बूआ गरम हो कर कहने लगीं, ‘‘पाकिस्तान या दुनिया जाए भाड़ में.

उन को देख कर हम अपना ईमान क्यों खराब करें…’’

‘‘पर, वे भी तो मुसलमान हैं. हम से ज्यादा मजहब को मानने वाले हैं, फिर मजहब के खिलाफ ऐसे काम क्यों करते हैं?’’ मैं ने दलील दी.

इस पर बूआ चोट करने के अंदाज से कहने लगीं, ‘‘अब अगर कोई जानबूझ कर सूअर खाए, तो दूसरा कोई क्या कर सकता है? जब मैं तुम्हें ही नहीं समझा पाई, तो पाकिस्तान या अरब के बारे में क्या कह सकती हूं.’’

‘‘पर बूआ, टीवी या परिवार नियोजन सूअर नहीं हैं,’’ मैं ने बहस को आगे बढ़ाया.

इस पर वह बिफर पड़ीं, ‘‘हांहां, क्यों नहीं, बहूबेटियों के साथ घर पर नाच देखना नेकी का काम है. खूब देखो. पर हमें इस से परहेज है.’’

‘‘पर, इस के अलावा भी तो इस में अच्छे नाटक आते हैं.’’

‘‘अरे, खाक अच्छे आते हैं. वही कूल्हे मटकाती चिकने चेहरे वालियों के सिवा और क्या आ सकता है, जिस पर तुम जैसे बिगड़ैल ही जान देते हैं.’’

मैं बूआ को और भड़काता कि इस से पहले ही अब्बा ने मुझे किसी काम से बाहर भेज दिया.

इन्हीं साएदार पेड़ों के बीच अनवर भी पला था. सो, पढ़ालिखा होने के बावजूद वह अपनेआप को ढकोसलों की दुनिया से बाहर निकाल नहीं पाया था. यही वजह थी कि चौथे बच्चे के बाद किए गए वादे के बावजूद वह 5वें बच्चे का बाप बनता, इस से पहले ही उस की दुनिया उजड़ गई.

हम जब जनाजे के साथ कब्रिस्तान पहुंचे, तब तक कब्र तैयार हो चुकी थी. हम सब ने लाश को कब्र में लिटाया. आखिरी दीदार के लिए अमीना भाभी के चेहरे से कफन हटाया गया. सूखी लकड़ी की तरह पिचका चेहरा दिख रहा था.

अनवर अपनी बीवी का आखिरी दीदार कर के मुझ से लिपट गया और सिसकने लगा, ‘‘मैं ने खुदा की मरजी का लबादा ओढ़ कर अपनी मरजी चलाई… काश, मैं तुम्हारी एक भी बात पर अमल करता. मेरे बच्चों का अब

क्या होगा…’’

मैं उस के कंधों को थपथपा कर हौसला देने लगा था, ‘‘अब पछताने से क्या फायदा… आंसू पोंछ लो और बच्चों की परवरिश के बारे में कुछ सोचो.’’

लिव इन पार्टनर की मौत का राज

9 सितंबर, 2019 को अनीता अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी. अगले दिन अपराह्न 2 बजे जब वह दिल्ली के लाजपत नगर में स्थित अपने फ्लैट में पहुंची तो वहां का खौफनाक मंजर देखते ही उस के मुंह से चीख निकल गई. उस के पैर दरवाजे पर ही ठिठक गए.

उस के लिवइन पार्टनर सुनील तमांग की लहूलुहान लाश फर्श पर पड़ी थी. उस की गरदन से खून निकल कर पूरे फर्श पर फैल चुका था, जो अब जम चुका था. अनीता ने सब से पहले अपने फ्लैट के मालिक ए.के. दत्ता को फोन कर इस घटना की जानकारी दी. ए.के. दत्ता पास की ही एक दूसरी कालोनी में रहते थे. लिहाजा कुछ देर में वह अपने लाजपत नगर वाले फ्लैट पर पहुंचे, जहां बुरी तरह घबराई अनीता उन का इंतजार कर रही थी.

सुनील की खून से सनी लाश देखने के बाद उन्होंने घटना की जानकारी दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को दी तो कुछ ही देर के बाद थाना अमर कालोनी के थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए और घटनास्थल की जांच में जुट गए. उन्होंने डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

घटनास्थल की फोटोग्राफी और वहां पर मौजूद खून के धब्बों के नमूने एकत्र करने के बाद थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने तहकीकात शुरू की. मृतक सुनील की गरदन पर पीछे की तरफ से किसी तेज धारदार हथियार से जोरदार वार किया गया था, जिस से ढेर सारा खून निकल कर फर्श पर फैल गया था.

कमरे के सभी कीमती सामान अपनी जगह मौजूद थे, जिसे देख कर लगता था कि यह हत्या लूटपाट के लिए नहीं बल्कि रंजिशन की गई होगी. उन्होंने अनीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह और सुनील पिछले एक साल से इस फ्लैट में लिवइन पार्टनर के रूप में रह रहे थे. वह एक ब्यूटीपार्लर में काम करती थी, जबकि सुनील एक रेस्टोरेंट में कुक था. लेकिन कई महीने पहले किसी वजह से उस की नौकरी छूट गई थी.

कल रात साढ़े 11 बजे किसी जरूरी काम से वह अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी. रात को वह वहीं रुक गई थी. रात में उस ने फोन पर काफी देर तक सुनील से बातें की थीं.

आज दोपहर को वह यहां पहुंची तो देखा फ्लैट का दरवाजा खुला था और अंदर प्रवेश करते ही उस की नजर सुनील की लाश पर पड़ी थी. इस के बाद उस ने अपने मकान मालिक को फोन कर इस घटना के बारे में बताया तो उन्होंने यहां पहुंचने के बाद इस घटना की सूचना पुलिस को दी.

थानाप्रभारी ने मकान मालिक ए.के. दत्ता से भी पूछताछ की तो उन्होंने भी वही बातें बताईं जो अनीता ने बताई थीं.

सारी काररवाई से निपटने के बाद थानाप्रभारी ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और थाने लौट कर सुनील की हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

इस केस की गुत्थी सुलझाने के लिए दक्षिणपूर्वी दिल्ली के डीसीपी चिन्मय बिस्वाल ने कालकाजी के एसीपी गोविंद शर्मा की देखरेख में एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन, एसआई अभिषेक शर्मा, ईश्वर, आर.एस. डागर, एएसआई जगदीश, कांस्टेबल राजेश राय, मनोज, सज्जन आदि शामिल थे.

विरोधाभासी बयानों से हुआ शक  अगले दिन थानाप्रभारी ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई, ताकि वारदात की रात फ्लैट के आसपास घटने वाली सभी गतिविधियों की बारीकी से जांच की जा सके. साथ ही मृतक सुनील तमांग और अनीता के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स और सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांचपड़ताल करने के बाद थानाप्रभारी ने गौर किया कि अनीता के बयान विरोधाभासी थे. इसलिए अनीता को पुन: पूछताछ के लिए अमर कालोनी थाने बुलाया गया. उस से सघन पूछताछ की गई तो अनीता यही कहती रही कि वह रात साढ़े 11 बजे अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी, लेकिन वह वहां देर रात को क्यों गई, इस की वजह नहीं बता पाई.

पुलिस को लग रहा था कि वह झूठ पर झूठ बोल रही है. उस ने उस रात जिनजिन नंबरों पर बात की थी, उन के बारे में भी वह संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. लिहाजा उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और सुनील तमांग की हत्या में खुद के शामिल होने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

उस ने बताया कि इस हत्याकांड में उस का भाई विजय छेत्री तथा जीजा राजेंद्र छेत्री भी शामिल थे. ये दोनों पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग शहर के रहने वाले थे. अनीता द्वारा अपने लिवइन पार्टनर की हत्या में शामिल होने की बात स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

बाकी आरोपियों विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री को गिरफ्तार करने के लिए थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने एसआई अभिषेक शर्मा के नेतृत्व में एक टीम गठित की. यह टीम 13 सितंबर, 2019 को वेस्ट बंगाल के कालिंपोंग शहर पहुंच गई. स्थानीय पुलिस के सहयोग से दिल्ली पुलिस ने विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया.

दोनों से जब सुनील तमांग की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उन दोनों ने पुलिस को बरगलाने की काफी कोशिश की लेकिन बाद में जब उन्हें बताया गया कि अनीता गिरफ्तार हो चुकी है और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, तो उन दोनों ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

वेस्ट बंगाल की स्थानीय कोर्ट में पेश करने के बाद दिल्ली पुलिस दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर दिल्ली लौट आई.

अनीता, विजय और राजेंद्र से की गई पूछताछ तथा पुलिस की जांच के आधार पर इस हत्याकांड के पीछे की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

अनीता मूलरूप से पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग की रहने वाली थी. करीब 5 साल पहले वह अपने पति से अनबन होने पर उसे छोड़ कर अपने सपनों को पंख लगाने के मकसद से दिल्ली आ गई थी. यहां उस की एक सहेली थी, जो बहुत शानोशौकत से रहती थी. वह सहेली जरूरत पड़ने पर उस की मदद भी कर दिया करती थी.

दरअसल, अनीता स्कूली दिनों से ही खुले विचारों वाली एक बिंदास लड़की थी. वह जिंदगी को अपनी ही शर्तों पर जीना चाहती थी, जबकि उस का पति एक सीधासादा युवक था. उसे अनीता का ज्यादा फैशनेबल होना तथा लड़कों से ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं था.

विपरीत स्वभाव होने के कारण शादी के थोड़े दिनों बाद ही वे एकदूसरे को नापसंद करने लगे थे. बाद में जब बात काफी बढ़ गई तो एक दिन अनीता ने पति को छोड़ दिया और वापस अपने मायके चली आई. कुछ दिन तो वह मायके में रही, फिर बाद में उस ने अपने पैरों पर खडे़ होने का फैसला कर लिया. और वह दिल्ली आ गई.

वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, महज 8वीं पास थी. छोटे शहर की होने और कम शिक्षित होने के बावजूद उस का रहने का स्टाइल ऐसा था, जिसे देख कर लगता था कि वह काफी मौडर्न है.

दिल्ली पहुंचने के बाद अनीता ने अपनी उसी सहेली की मदद से ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग ली. इस के बाद वह एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी करने लगी. नौकरी करने से उस की माली हालत अच्छी हो गई और जिंदगी पटरी पर आ गई.

इसी दौरान एक दिन उस की मुलाकात सुनील तमांग नाम के युवक से हुई जो नेपाल का रहने वाला था. उस की मां कुल्लू हिमाचल प्रदेश की थी. 28 वर्षीय सुनील दक्षिणी दिल्ली के साकेत में स्थित एक रेस्टोरेंट में कुक था.

दोनों एकदूसरे को चाहने लगे  कुछ दिनों तक दोस्ती के बाद वह सुनील को अपना दिल दे बैठी. सुनील अनीता की खूबसूरती पर पहले से ही फिदा था. एक दिन सुनील ने अनीता को अपने दिल की बात बता दी और कहा कि वह उसे दिलोजान से प्यार करता है. इतना ही नहीं, वह उस से शादी रचाना चाहता है.

अनीता उस के दिल की बात जान कर खुशी से झूम उठी. उस ने सुनील से कहा कि पहले कुछ दिनों तक हम लोग साथ रह लेते हैं. फिर घर वालों की रजामंदी से शादी कर लेंगे. इस की एक वजह यह भी थी कि अभी पहले पति से अनीता का तलाक नहीं हुआ था. तलाक के बाद ही दूसरी शादी संभव हो सकती थी.

कोई 4 साल पहले अनीता ने सुनील तमांग के साथ चिराग दिल्ली में किराए का मकान ले कर रहना शुरू कर दिया. दोनों एकदूसरे को पा कर बेहद खुश थे. सुनील अनीता का काफी खयाल रखता था. अनीता भी सुनील के साथ लिवइन में रह कर खुद को भाग्यशाली समझती थी.

सुनील न केवल देखने में स्मार्ट था, बल्कि एक अच्छे पार्टनर की तरह उस की प्रत्येक छोटीछोटी बात का विशेष ध्यान रखता था. अनीता भी सुनील की खुशियों का खूब खयाल रखती थी. वह अपनी तरफ से कोई ऐसा काम नहीं करती थी, जिस से सुनील की कोई भावना आहत हो.

अनीता और सुनील 3 सालों तक चिराग दिल्ली स्थित इस मकान में रहे. इस बीच जब अनीता की पगार अच्छी हो गई तो वह चिराग दिल्ली से लाजपत नगर आ गई. यहां वह ए.के. दत्ता के फ्लैट में किराए पर रहने लगी. यहां उस का फ्लैट तीसरी मंजिल पर था.

इतने दिनों तक लिवइन रिलेशन में रहने के कारण दोनों के परिवार वाले भी उन के संबंधों से परिचित हो गए थे. अनीता का भाई विजय छेत्री जबतब कालिंपोंग से दिल्ली में उस के पास आता रहता था. उसे सुनील का व्यवहार पसंद नहीं था.

विजय ने अनीता की पसंद पर ऐतराज तो नहीं जताया लेकिन एक दिन उस ने सुनील की गैरमौजूदगी में अपने मन की बात अनीता को बता दी. चूंकि अनीता सुनील से प्यार करती थी, इसलिए उस ने भाई से सुनील का पक्ष लेते हुए कहा कि सुनील दिल का बुरा नहीं है लेकिन फिर भी अगर सुनील की कोई बात उसे अच्छी नहीं लगती है तो वह उसे कह कर इस में सुधार लाने का प्रयास करेगी.

विजय ने जब देखा कि उस की बहन ने उस की बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है तो उस ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. सुनील और अनीता को विजय की बातों से जरा भी फर्क नहीं पड़ा था.

लेकिन कहते हैं कि हर आदमी का वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है. सुनील तमांग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. किसी बात को ले कर सुनील की रेस्टोरेंट से नौकरी छूट गई. नौकरी छूट जाने की वजह से वह परेशान तो हुआ लेकिन अनीता अच्छा कमा रही थी, इसलिए घर का खर्च आराम से चल जाता था.

हालांकि कुछ दिन बाद अनीता सुनील को समझाबुझा कर जल्दी कहीं नौकरी खोजने का दबाव बना रही थी, मगर 6 महीने तक सुनील को उस के मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली.

धीरेधीरे अनीता को ऐसा लगने लगा जैसे सुनील जानबूझ कर नौकरी नहीं करना चाहता है और अब वह उस के ही पैसों पर मौज करना चाहता है. ऐसा विचार मन में आते ही उस ने एक दिन तीखे स्वर में सुनील से कहा, ‘‘सुनील, या तो तुम जल्दी कहीं पर नौकरी ढूंढ लो अन्यथा मेरा साथ छोड़ कर यहां से कहीं और चले जाओ.’’

हालांकि अनीता ने यह बात सुनील को समझाने के लिए कही थी, लेकिन उस दिन के बाद सुनील के तेवर बदल गए. उस ने अनीता से कहा कि वह उसे छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा और फिर भी अगर वह उसे जबरन खुद से दूर करने की कोशिश करेगी तो उस के पास अंतरंग क्षणों के कई फोटो मोबाइल पर पड़े हैं, जिन्हें वह उस के सगेसंबंधियों के मोबाइल पर भेज देगा, जिस के बाद वह कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी.

रुपयों की तंगी तथा सुनील की धमकी को सुन कर अनीता कांप उठी. इस घटना के कुछ दिनों बाद तक अनीता ने सुनील को नौकरी ढूंढने पर जोर देती रही, लेकिन सुनील पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा.

अंत में अनीता ने कालिंपोंग स्थित अपने भाई विजय को अपनी मुसीबत के बारे में बताया तो विजय गुस्से से भर उठा. उस ने अनीता से कहा कि वह जल्द ही सुनील नाम के इस कांटे को उस की जिंदगी से निकाल फेंकेगा.

भाई ने बनाया हत्या का प्लान  भाई की बात सुन कर अनीता को राहत महसूस हुई. विजय को सुनील पहले से नापसंद था. अब जब अनीता खुद ही उस से छुटकारा पाना चाहती थी तो उस ने अपने रिश्ते के बहनोई राजेंद्र के साथ मिल कर सुनील को मौत की नींद सुलाने की योजना तैयार कर ली. इस के बाद उस ने अनीता को अपनी योजना के बारे में बताया तो अनीता ने दोनों को दिल्ली पहुंचने के लिए कह दिया.

7 सितंबर, 2019 को विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग से नई दिल्ली पहुंचे और पहाड़गंज के एक होटल में रुके. अनीता फोन से बराबर भाई के संपर्क में थी. लेकिन सुनील अनीता और विजय के षडयंत्र से अनजान था. उसे सपने में भी गुमान नहीं था कि अनीता उस की ज्यादतियों से तंग आ कर उस का कत्ल भी करवा सकती है.

9 सितंबर को विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री पूर्वनियोजित योजना के अनुसार रात के 10 बजे अनीता के फ्लैट पर पहुंचे. अनीता दोनों से ऐसे मिली जैसे उन्हें पहली बार देखा हो. सुनील भी उन से घुलमिल कर बातें करने लगा.

साढ़े 11 बजे उस ने अचानक सब को बताया कि उसे अभी इसी वक्त अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा जाना है. इस के बाद वह तैयार हो कर फ्लैट से बाहर निकल गई.  रात में अनीता सुनील के मोबाइल पर काल कर के उस से 2-3 घंटे तक मीठीमीठी बातें करती रही.

तड़के करीब 4 बजे जैसे ही सुनील सोया, तभी विजय ने राजेंद्र के साथ मिल कर उस की गरदन पर चाकू से वार किया. थोड़ी देर तड़पने के बाद जब उस का शरीर ठंडा पड़ गया तो दोनों वहां से आनंद विहार के लिए निकल गए, क्योंकि वहां से उन्हें कालिंपोंग के लिए ट्रेन पकड़नी थी.

आनंद विहार जाने के दौरान रास्ते में विजय ने खून से सना चाकू एक सुनसान जगह पर फेंक दिया. आनंद विहार स्टेशन से रेलगाड़ी द्वारा वे कालिंपोंग पहुंच गए.

इन से विस्तार से पूछताछ करने के बाद अगले दिन 16 सितंबर, 2019 को थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने सुनील तमांग की हत्या के आरोप में उस की लिवइन पार्टनर अनीता, विजय छेत्री तथा राजेंद्र छेत्री को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से तीनों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन कर रहे थे.

बड़ी बहन : रोशनी का छोटा भाई कैसा था

मेरा नाम रोशनी है. यह मेरी कहानी है और एक ऐसी जगह से शुरू होती है, जहां पिछले कुछ दिनों से मच्छरों ने हम सब का जीना हराम कर दिया था. जिन गरीबों के पास जालीदार दरवाजे लगाने के पैसे नहीं होते, उन्हें मच्छरों के साथ जीना भी सीखना पड़ता है.

मच्छरों से बचने के लिए मैं ने पंखे की रफ्तार बढ़ाई और डबलबैड की चादर ओढ़ कर सोने की कोशिश करने लगी. मुझे लगा कि इतनी बड़ी चादर मुझे मच्छरों से बचा लेगी. मैं ने मन ही मन प्रमिला मैडम को शुक्रिया कहा, जिन्होंने आज ही यह चादर मां को दी थी.

मेरी मां प्रमिला मैडम के घर का सारा काम करती हैं… झाड़ूपोंछे से ले कर रसोई के बरतन और घर के दूसरे काम भी. प्रमिला मैडम बहुत दयालु हैं. वे हमें जबतब बहुत सा सामान देती रहती हैं. सामान भले ही पुराना हो, लेकिन वह बड़े काम का होता है.

प्रमिला मैडम ने हमारे इस छोटे से घर को कई तरह के सामान से भर दिया है, जिस में एक छोटा एलईडी, पुरानी मिक्सी, वाशिंग मशीन और कूलर भी हैं. इस सामान को देख कर सगेसंबंधी हम से जलते हैं.

सुबह मां ने जगाया, तो मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी और बोली, ‘‘वाह मां, वाह, आज तो बहुत अच्छी नींद आई. मच्छर मुझे जरा भी न काट सके. यह सब इस चादर की ही करामात है वरना सिंगल बैड की चादर में तो मच्छर आसानी से घुस जाते हैं और फिर तो खुजलातेखुजलाते मेरा बुरा हाल.’’

मां शायद जल्दी में थीं. वे बोलीं, ‘‘बेटी, मैं मैडम के यहां जा रही हूं. तू जल्दी से उठ कर बाकी काम निबटा कर कालेज चली जाना.’’

‘‘ठीक है मां, आप जाओ,’’ मैं ने मुसकरा कर कहा.

मैं ने जब से होश संभाला है, तब से मां को जिंदगी की जद्दोजेहद झोलते या उस से लड़तेरोते ही देखा है. मैं ने जिस जाति में जन्म लिया है, उस में ऐसा कोई घर नहीं, जहां घर के लोग पियक्कड़ न हों और यही वजह हमारी जाति के पिछड़ेपन की भी रही है.

घर के मर्द शराब पी कर घर की औरतों को बुरी तरह मारतेपीटते हैं, उन्हें भद्दीभद्दी गालियां देते हैं और औरत के कमाए पैसे भी झपट कर अपनी झूठी मर्दानगी दिखाते हैं. घर के बच्चे भी यह सब देख कर दहशत में जीते हैं.

मैं ने घर में सब से बड़ी औलाद के रूप में जन्म लिया था. मां मेरे जन्म के बाद मुझे सीने से चिपकाए पता नहीं कितने घरों में जा कर झाड़ूपोंछा, बरतन धोने का काम करती थीं.

सुबह वे घर से रोटी बना कर निकलती थीं, तो शाम को ही वापस घर का मुंह देखती थीं. घर पर आ कर ही मां को पता चलता था कि बापू आज बेलदारी पर गए हैं या नहीं.

अगर बापू घर पर मिलते, तो मां को गालियों का सामना करना पड़ता था और उन्हें बापू को कुछ रुपए शराब पीने के लिए देने ही पड़ते थे. अगर बापू बेलदारी के लिए चले जाते, तो उन के घर न लौटने तक ही शांति रहती थी. जब वे घर लौटते थे, तो शराब के नशे में चूर हो कर लड़खड़ाते कदमों से घर में घुसते और हमारी जिंदगी नरक बना देते थे.

जब मैं ने मां का हाथ पकड़ कर चलना सीख लिया था, तभी मां के पैर फिर भारी हो गए थे और इस तरह उन की मुसीबतें भी और ज्यादा बढ़ गई थीं.

मैं ने रसोईघर में आ कर कटोरदान देखा… मां कल शाम की बनाई एक रोटी चाय के साथ खा कर चली गई थीं. यह रोजाना का सिलसिला था, क्योंकि मां कभी कोई नागा नहीं करती थीं, जब तक कि उन्हें तेज बुखार न चढ़ जाए.

आटा गूंदते हुए मैं फिर से उन दिनों में गोता लगाने लगी थी, जब मेरे खेलनेकूदने के दिन थे. यह बात अलग है कि मु?ो खेलनाकूदना जरा भी पसंद नहीं था.

तब मेरा छोटा भाई राजू घुटने के बल चलने लगा था और मां लोगों के घरों में जातीं, तो राजू को मेरे भरोसे छोड़ कर बेफिक्र हो जाती थीं.

राजू को छोड़ कर मैं कोई भी काम नहीं कर सकती थी, लेकिन जब वह थक कर सो जाता था, तब मैं जल्द से जल्द सारे काम निबटाने की कोशिश किया करती थी.

बापू को शराब पीने की लत बहुत ज्यादा बढ़ गई थी और उन्होंने काम पर जाना तकरीबन बंद ही कर दिया था. वैसे भी नशे में चूर रहने वाले को कौन काम पर रखेगा?

बापू के शराब के पैसे की कमी मां की खूनपसीने की कमाई से ही पूरी होती थी. अगर कभी मां के पास पैसे न होते, तो गालियों के अलावा मां को मार भी खानी पड़ती थी.

तब मां रोतेरोते कहती थीं, ‘‘मु?ो इस जिंदगी में सुख तो तभी मिलेगा, जब मेरा राजू बड़ा होगा और मैं घरबैठे उस के कमाए पैसों से चैन से रह सकूंगी.’’

‘‘मां, अपनी बिरादरी में तो सारे मर्द औरतों पर जुल्म करने के लिए ही पैदा होते हैं, इसलिए तुम्हें राजू से कोई आस नहीं बांधनी चाहिए,’’ मेरी बात को मां ने सिरे से कई बार खारिज कर दिया था.

मां को यकीन था और वे कहती थीं, ‘‘नहीं, राजू हमारी बिरादरी के मर्दों जैसा नहीं होगा. वह अपनी मां के साथ हो रही नाइंसाफी की वजह से कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाएगा.’’

‘‘काश, ऐसा ही हो मां,’’ मेरे मुंह से यह बात निकलती थी.

दिन हवा में उड़ान भरतेभरते एक दिन ठहर से गए. उस दिन मां के पास पैसे न होने के चलते बापू ने उन्हें बहुत मारा था… मारतेमारते किसी तरह बापू के हाथ मां की एकमात्र पैर की उंगली में अटकी चांदी की बिछिया को छू गए.

बस, फिर क्या था. बापू ने बिछिया को इतनी तेजी से खींचा कि मां की बिछिया के निकलने के साथ ही पैर की उंगली भी लहूलुहान हो गई. खैर, बापू को तो मां की बिछिया से मतलब था, खून निकलने से नहीं.

बापू के पास शराब पीने का इंतजाम होते ही वे पीने चले गए और मां को रोताबिलखता छोड़ गए.

उस दिन मां ने दिल से बापू के मरने की कामना की थी. उन की इस कामना को मेरा भी साथ मिला था… और शाम को सचमुच उन की लाश ही घर पर आई. बापू मां की बिछिया बेच कर दिनभर शराब ही पीते रहे और अचानक लुढ़क गए.

कुछ दिनों तक रोनापीटना हुआ, फिर घर में मां की मेहनत की कमाई का एकदम सही इस्तेमाल होने लगा. हालांकि, मां ने मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में ही कराया था, लेकिन मैं अपना ध्यान पढ़ाई पर देने में कामयाब रही.

पता नहीं, मुझे अपनी जाति के समाज के सामने एक उदाहरण बनने की सनक सवार हो गई कि जिस जाति में सब के सब मर्द पियक्कड़ और आवारा हैं, उसी समाज की एक लड़की ऐसे मर्दों को पछाड़ कर बहुत आगे भी निकल सकती है. इतना ही नहीं, पढ़लिख कर और अच्छा पद पाने के बाद उस लड़की पर समाज के मर्दों की मनमानी नहीं चल सकती.

हालांकि मां ने राजू का दाखिला एक प्राइवेट इंगलिश मीडियम स्कूल में कराया था, लेकिन उस का मन कभी भी पढ़ने में लगा ही नहीं. मैं उसे पढ़ाने की कोशिश करती, तो वह उलटे मुझ पर ही बरसने लगता था. मुझे न जाने क्यों लगता था कि वह बापू की ही तरह का बरताव करने पर आमादा रहता है.

राजू ने मां की कुछ हजार रुपए की कमाई पर पानी फेर दिया था और एक बिगड़ैल लड़के का तमगा लगा कर उसे स्कूल के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

उस दिन मां फूटफूट कर रोई थीं. मां के सपने की उड़ान एकाएक ही क्रैश हो गई थी.

मैं ने मां को बहुत प्यार से सम?ाया, ‘‘मेरी अच्छी मां, तुम मत रोओ… भले राजू न सही, लेकिन मैं तुम्हें कुछ

अच्छा बन कर दिखाऊंगी… और मैं ने सोच लिया है कि मेरी नौकरी लगते ही तुम्हें किसी के घर में काम करने नहीं दूंगी.’’

मां ने तुरंत कहा, ‘‘शादी के बाद तो बेटी पराई हो जाती है पगली.’’

‘‘तो मां, शादी कर कौन रहा है? और क्या तुम उम्मीद करती हो कि मैं किसी पियक्कड़ या शराबी के लिए हां भर दूंगी?’’

मां को चुप हो जाना पड़ा.

इंगलिश में एमए और बीऐड करने के बाद उन दिनों मैं स्कूल टीचर के पद के लिए तैयारी में जुटी थी कि एकाएक छोटा भाई पहली बार शराब पी कर घर में घुसा था.

राजू को नशे की हालत में देख कर मैं और मां सकते में आ गईं.

पहली बार मां का हाथ अपने बेटे पर उठा… मां गुस्से में चिल्लाई थीं, ‘‘तो अब यही देखना बाकी रह गया था. तेरे बाप ने भी शराबी बन कर मुझे खूब मारापीटा और मेरी जिंदगी तबाह कर दी थी.

‘‘मैं ने तुझे अच्छे संस्कार दिए और तुझे कभी शराब को हाथ न लगाने का पाठ पढ़ाया था, लेकिन तू… तू भी वही शैतान की औलाद निकला.

‘‘मैं ने खूब कोशिश की थी कि तू पढ़लिख जाए और इसीलिए तुझे अपना पेट काट कर एक सभ्य इनसान बनाने की कोशिश करती रही, लेकिन आज यह दिन दिखाने के लिए तुझे बड़ा किया था मैं ने? अरे, कुछ तो सीख ले लेता अपनी बड़ी बहन से, लेकिन नहीं… तू तो गंदी नाली के कीड़े की जिंदगी ही जीना चाहता है न, बिलकुल अपने बाप की ही तरह?’’

‘‘मां, आज तू ने थप्पड़ मारा है मुझे? मैं ने क्या गुनाह कर दिया? शराब ही तो पी है, बल्कि शराब न पीना एक भद्दा मजाक ही तो है हमारे समाज में और मैं तो वही कर रहा हूं, जो सब करते हैं. और नहीं पीऊंगा तो मजाक नहीं उड़ेगा मेरा?’’

मां को कोने में पड़ी एक लकड़ी दिखाई दे गई. मां ने वही उठा ली थी… वह फुफकारी, ‘‘इस के पहले कि शराब तुझे पी कर खत्म करे, मैं ही तुझे खत्म कर देती हूं.’’

मैं किताबें छोड़ कर भागी और लपक कर मां को पकड़ लिया और बोली, ‘‘नहीं मां, मैं तुम्हें यह नहीं करने दूंगी, कभी नहीं. राजू के शराब पीने की सजा तुम्हें नहीं भुगतने दूंगी.’’

‘‘हो जाने दे मुझे जेल… लेकिन, लोगों के घरों में जिंदगीभर जूठे बरतन रगड़ने से तो अच्छा है, हो जाए मुझे जेल. कम से कम एक जगह बैठ कर चैन से जी तो सकूंगी. मुझे जिंदगीभर घर में तो सुख नहीं मिला, शायद जेल में ही मिल जाए?’’

मां दहाड़ें मार कर रो रही थीं और महल्ले वाले इकट्ठा हो कर तमाशा देखने लगे.

मां टूट गई थीं आज. मैं ने उन्हें इतना हताश कभी नहीं देखा था. मुझे लगा, कोई भी पत्नी अपने बिगड़ैल पति को एक बार सहन कर सकती है, लेकिन जिस बेटे से इतनी उम्मीद पाल ले, उसे गड्ढे में गिरते देख कर वह बरदाश्त नहीं कर सकती.

खैर, कुछ दिनों के बाद मेरी पहली कोशिश में ही एक दूसरे जिले के सरकारी स्कूल में इंगलिश टीचर की नौकरी मिल गई.

मां को निराशा के भंवर से निकालते हुए मैं ने कहा, ‘‘मां, तुम्हारे लिए यह घर किसी मनहूस से कम नहीं. तुम्हें सुख ही क्या मिला है इस घर में? मैं चाहती हूं कि तुम अब मेरे साथ वहीं रहो. हम किराए के मकान में खुशीखुशी साथ रह लेंगे.’’

जाते समय मकान को राजू के हवाले कर मैं ने कहा, ‘‘वादा करो भाई कि अब कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाओगे. जिस मां ने हम को इतने कष्ट सह कर बड़ा किया, उस का रत्तीभर कर्ज भी अगर उतार सकें तो बड़ी बात होगी. और उसे सुख नहीं तो कम से कम दुख तो न ही दें.’’

राजू बोला, ‘‘ठीक है बड़ी बहन. मैं वादा करता हूं, शराब को कभी हाथ नहीं लगाऊंगा और काबिल इनसान बन कर भी दिखाऊंगा.’’

भाई द्वारा किए इस वादे को मैं गांठ बांध कर साथ ले गई.

मां को मेरी काम करने की जगह पर आ कर बहुत सुकून मिला. मां ने जिंदगीभर न जाने कितने कष्ट सहे और अपनी काया को मशीन की तरह बना दिया था. अब जा कर उन्होंने चैन की सांस ली थी. बीते दिनों में बेटे ने मां की काया को इतना छील दिया था कि अब वे उस का नाम भी नहीं लेना चाहती थीं.

धीरेधीरे कर के मैं ने सभी जरूरी सामान खरीद लिया था और मकान भी थोड़ा और सुविधाजनक ही लिया था.

अभी 6 महीने ही गुजरे थे कि एक दिन राजू मेरे स्कूल में कार ले कर चला आया और बोला, ‘‘बड़ी बहन, मैं ने आप से जो वादा किया था, बिलकुल भी नहीं तोड़ा है और न कभी तोड़ूंगा. लेकिन एक संकट खड़ा हो गया है.’’

‘‘कैसा संकट…?’’ मैं ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘आप के यहां आने के बाद मैं ने सोचा था कि एक कार लोन पर ले कर टैक्सी के रूप में चलाऊं?’’

‘‘लोन कैसे मिला?’’

‘‘इस के लिए मुझे मकान के कागजात बैंक में रखने पड़े और 10 लाख रुपए का लोन जुटा कर यह कार खरीदी.

‘‘मैं 6 महीने से टैक्सी चला रहा हूं, लेकिन पूरी किस्तें नहीं चुका पा रहा हूं. क्या करूं? अब बैंक वाले तकाजा कर रहे हैं.’’

भरी दोपहरी में सूरज की गरमी जब सहन नहीं हुई, तो मैं राजू को नीम के पेड़ के नीचे ले आई और पूछा, ‘‘कितना लोन लिया और किस्त कितनी है?’’

‘‘लोन 10 लाख रुपए का है और किस्त 20,000 रुपए महीना.’’

‘‘तो आमदनी कितनी हुई?’’

‘‘जो आमदनी हुई, उस से 2 किस्तें ही चुका पाया हूं.’’

‘‘तो कार बेच दो.’’

‘‘कार के 6 लाख रुपए से ज्यादा नहीं मिलेंगे.’’

‘‘जितने भी मिलें… फिर जो किस्त आएगी, देखेंगे. किस्त नहीं चुकाने से मकान की नीलामी हो जाएगी न.’’

‘‘इसीलिए मजबूर हो कर आया हूं बड़ी बहन.’’

‘‘भाई, बड़ी बहन हूं, इसलिए अपना फर्ज निभाने से पीछे नहीं हटूंगी. कार बेच कर पहले जो पैसा मिले, वह सारा बैंक वालों को जमा करा दो. फिर मुझे बैंक से डिटेल्स ले कर माहवार किस्त का ब्योरा भेज देना, ताकि मैं हर महीने किस्त समय पर सीधे बैंक में भेज सकूं.’’

‘‘ठीक है, मैं यह काम जाते ही करता हूं.’’

‘‘सुनो भाई, ध्यान रहे कि नया धंधा ऐसा हो जिस में पैसा कम लगे, नुकसान भी न हो. अगर तुम ईमानदार रहोगे तभी मुझ से मदद की उम्मीद कर पाओगे. कभी मेरा भरोसा मत तोड़ना. तुम्हारा शराब पीना मां ही नहीं, मैं भी सहन नहीं करूंगी.’’

‘‘बड़ी बहन, मेरा वादा है कि जिंदगी में किसी भी हालात में शराब के पास नहीं फटकूंगा और आप का भरोसा कभी तोड़ने की हिम्मत तो हरगिज नहीं करूंगा.’’

‘‘फोन पर अपडेट करते रहना,’’ मेरे कहने पर उस ने हां भरी, फिर पूछा, ‘‘मां कैसी हैं?’’

‘‘अब ठीक हैं.’’

वह बोला, ‘‘मैं उन से तभी मिलूंगा, जब कुछ कमाने लायक हो जाऊंगा,’’ कहते हुए उस ने विदा ली. कार स्टार्ट होने से ले कर उस के वहां से जाने तक मैं बुत बनी खड़ी रह गई.

इस बीच सूरज बादलों की ओट में छिप गया था. चारों ओर सुहावनी छाया घिर आई थी. मैं उम्मीद से भरी अपने क्लासरूम में लौट आई.

महकती विदाई : अंजू और उस की अम्मां सास

अम्मां की नजरों में शारीरिक सुंदरता का कोई मोल नहीं था इसीलिए उन्होंने बेटे राज के लिए अंजू जैसी साधारण लड़की को चुना. खाने का डब्बा और कपड़ों का बैग उठाए हुए अंजू ने तेज कदमों से अस्पताल का बरामदा पार किया. वह जल्द से जल्द अम्मां के पास पहुंचना चाहती थी. उस की सास जिन्हें वह प्यार से अम्मां कह कर बुलाती है, अस्पताल के आई.सी.यू. में पड़ी जिंदगी और मौत से जूझ रही थीं. एक साल पहले उन्हें कैंसर हुआ था और धीरेधीरे वह उन के पूरे शरीर को ही खोखला बना गया था. अब तो डाक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी.

आज जब वह डा. वर्मा से मिली तो वह बोले, ‘‘आप रोगी को घर ले जा सकती हैं. जितनी सांसें बाकी हैं उन्हें आराम से लेने दो.’’

पापा मानने को तैयार नहीं थे. वह बोले, ‘‘डाक्टर साहब, आप इन का इलाज जारी रखें. शायद कोई चमत्कार हो ही जाए.’’

‘‘अब किसी चमत्कार की आशा नहीं है,’’ डा. वर्मा बोले, ‘‘लाइफ सपोर्ट सिस्टम उतारते ही शायद उन्हें अपनी तकलीफों से मुक्ति मिल जाए.’’

पिछले 2 माह में अम्मां का अस्पताल का यह चौथा चक्कर था. हर बार उन्हें आई.सी.यू. में भरती किया जाता और 3-4 दिन बाद उन्हें घर लौटा दिया जाता. डाक्टर के कहने पर अम्मां की फिर से घर लौटने की व्यवस्था की गई लेकिन इस बार रास्ते में ही अम्मां के प्राणपखेरू अलविदा कह गए.

घर आने पर अम्मां के शव की अंतिम यात्रा की तैयारी शुरू हुई. वह सुहागन थीं इसलिए उन के शव को दुलहन की तरह सजाया गया. अंजू ने अम्मां के खूबसूरत चेहरे का इतना शृंगार किया कि सब देखते ही रह गए.

अंजू जानती थी कि अम्मां को सजनासंवरना कितना अच्छा लगता था. वह अपने रूप के प्रति हमेशा ही सजग रही थीं. बीमारी की अवस्था में भी उन्हें अपने चेहरे की बहुत चिंता रहती थी.

उस दिन तो हद ही हो गई जब अम्मां को 4 दिन तक अस्पताल में रहना पड़ा था. कैंसर ब्रेन तक फैल चुका था इसलिए वह ठीक से बोल नहीं पाती थीं. अंजू जब उन के कमरे में पहुंची तो नर्स ने मुसकरा कर कहा, ‘दीदी, आप की अम्मां मुझ से कह रही थीं कि मैं पार्लर वाली लड़की को बुला कर लाऊं. पहले तो मुझे समझ में नहीं आया, फिर उन्होंने लिख कर बताया तो मुझे समझ में आया. आंटी मरने वाली हैं फिर भी पार्लर वाली को बुलाना चाहती हैं.’

यह बता कर नर्स कमरे से चली गई तो अंजू ने पूछा, ‘अम्मां, क्या चाहिए?’

अम्मां ने इशारे से बताया कि थ्रेडिंग करवानी है. जब से उन की कीमोथेरैपी हुई थी उन के सिर के बाल तो खत्म हो गए थे पर दाढ़ीमूंछ उगनी शुरू हो गई थी. घर में थीं तो वह अंजू से प्लकिंग करवाती रहती थीं पर अस्पताल जा कर उन्होंने महसूस किया कि 4-5 बाल चेहरे पर उग आए हैं इसलिए वह पार्लर वाली लड़की को बुलाना चाहती थीं.

अम्मां की तीव्र इच्छा को देख कर अंजू ने ही उन की थे्रडिंग कर दी थी. फिर उन के कहने पर भवों को भी तराश दिया था. एक संतोष की आभा उन के चेहरे पर फैल गई थी और थक कर वह सो गई थीं.

नर्स जब दोबारा आई तो उस ने अम्मां के चेहरे को देखा और मुसकरा दी. उस ने पहले तो अम्मां को गौर से देखा फिर एक भरपूर नजर अंजू पर डाल कर बोली, ‘दीदी, आप की लवमैरिज हुई थी क्या?’

‘नहीं.’

‘ऐसा नहीं हो सकता,’ नर्स बोली, ‘अम्मां तो इतनी गोरी और सुंदर हैं फिर आप जैसी साउथ इंडियन लगने वाली लड़की को उन्होंने कैसे अपनी बहू बनाया?’

ऐसे प्रश्न का सामना अंजू अब तक हजारों बार कर चुकी थी. सासबहू की जोड़ी को एकसाथ जिस किसी ने देखा उस ने ही यह प्रश्न किया कि क्या उस का प्रेमविवाह था?

यह तो आज तक अंजू भी नहीं जान पाई थी कि अम्मां ने उसे अपने बेटे राज के लिए कैसे पसंद कर लिया था. जितना दमकता हुआ रूप अम्मां का था वैसा ही राज का भी था, यानी राज अम्मां की प्रतिमूर्ति था. जब अंजू को देखने अम्मां अपने पति और बेटे के साथ पहुंची थीं तो उन्हें देखते ही अंजू और उस के मातापिता ने सोच लिया था कि यहां से ‘ना’ ही होने वाली है पर उन के आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा था जब दूसरे दिन फोन पर अम्मां ने अंजू के लिए ‘हां’ कह दी थी.

अम्मां कुंडली के मिलान पर भरोसा रखती थीं और परिवार के ज्योतिषी ने अम्मां को इतना भरोसा दिला दिया था कि अंजू के साथ राज की कुंडली मिल रही है. लड़की परिवार के लिए शुभ है.

अंजू कुंडली में विश्वास नहीं रखती थी. हां, कर्तव्य पालन की भावना उस के मन में कूटकूट कर भरी थी इसीलिए वह अम्मां के लिए उन की बेटी भी थी, बहू भी और सहेली भी. सच है कि दोनों ही एकदूसरे की पूरक बन गई थीं. उन के मधुर संबंधों के कारण परिवार में हमेशा ही खुशहाली रही.

अम्मां के रूप को देख कर अंजू के मन में कभी भी ईर्ष्या उत्पन्न नहीं हुई थी. कहीं पार्टी में जाना होता तो अम्मां, अंजू की सलाह से ही तैयार होतीं और अंजू को भी उन को सजाने में बड़ा आनंद आता था. अंजू खुद भी बहुत अच्छी तरह से तैयार होती थी. उस की सजावट में सादगी का समावेश होता था. अंजू की सरलता, सौम्यता और आत्म- विश्वास से भरा व्यवहार जल्दी ही सब को अपनी ओर खींच लेता था.

घर में भी अंजू ने अपनी सेवा से अम्मां को वशीभूत कर रखा था. जबजब अम्मां को कोई कष्ट हुआतबतब अंजू ने तनमन से उन की सेवा की. 10 साल पहले जब अम्मां का पांव टूट गया था और वह घर में कैदी बन गई थीं, ऐसे में अंजू 3 सप्ताह तक जैसे अम्मां की परछाई ही बन गई थी.

उन्हीं दिनों अम्मां एक दिन बहुत भावुक हो गईं और उन की आंखों में अंजू ने पहली बार आंसू देखे थे. उन को दुखी देख कर अंजू ने पूछा था, ‘अम्मां क्या बात है? क्या मुझ से कोई गलती हो गई है?’

‘नहींनहीं, तेरे जैसी लड़की से कोई गलती हो ही नहीं सकती है. मैं तो अपने बीते दिनों को याद कर के रो रही हूं.’

‘अम्मां, जितने सुंदर आप के पति हैं, उतना ही सुंदर और आज्ञाकारी आप का बेटा भी है. घर में कोई आर्थिक तंगी भी नहीं है फिर आप के जीवन में दुख कैसे आया?’

‘अंजू, दूर के ढोल सुहाने लगते हैं, यह कहावत तो तुम ने भी सुनी होगी. मेरी ओर देख कर सभी सोचते हैं कि मैं सब से सुखी औरत हूं. मेरे पास सबकुछ है. शोहरत है, पैसा है और एक भरापूरा परिवार भी है.’

‘अम्मां, साफसाफ बताओ न क्या बात है?’

‘आज तेरे सामने ही मैं ने अपना दिल खोला है. इस राज को राज ही बना रहने देना.’

‘हां, अम्मां, आप बताओ. यह राज मेरे दिल में दफन हो जाएगा.’

‘जानना चाहती है तो सुन. राज के पापा की बहुत सारी महिला दोस्त हैं जिन पर वे तन और धन दोनों से ही न्यौछावर रहते हैं.’

‘आप जैसी सुंदर पत्नी के होते हुए भी?’ अंजु हैरानी से बोली.

‘हां, मेरा रूप भी उस आवारा इनसान को बांध नहीं पाया. यही मेरी तकदीर है.’

‘आप को कैसे पता लगा?’

‘खुद उन्होंने ही बताया. शादी के 2 साल बाद जब एक रात बहुत देर से घर लौटे तो पूछने पर बोले, ‘राज की मां, औरतें मेरी कमजोरी हैं. पर तुम्हें कभी कोई कमी नहीं आएगी. लड़नेझगड़ने या धमकियां देने के बदले यदि तुम इस सच को स्वीकार कर लोगी तो इसी में हम दोनों की भलाई है.’

‘और जल्दी ही यह सचाई मुझे समझ में आ गई. मैं ने अपने इस दुख को कभी दुनिया के सामने जाहिर नहीं किया. आज पहली बार तुम को बता रही हूं. मैं उसी दिन समझ गई थी कि शारीरिक सुंदरता महत्त्वपूर्ण नहीं है इसीलिए जब तुम्हें देखा तो न जाने तुम्हारे साधारण रंगरूप ने भी मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं तुम्हें बहू बना कर घर ले आई. राज भी इस सच को शायद जानता है इसीलिए उस ने भी तुम्हें स्वीकार कर लिया. यह बेहद अच्छी बात है कि बाप की कोई भी बुरी आदत उस में नहीं है.’

अम्मां की आपबीती सुन कर अंजू को इस घर की बहू बनने का रहस्य समझ में आ गया. राज अपनी मां से भावनात्मक रूप से इतना अधिक जुड़ा हुआ था कि उस की मां की पसंद ही उस की पसंद थी.

‘अरे, तू क्यों रो रही है पगली. इन्हीं विसंगतियों का नाम तो जीवन है. हर इनसान पूर्ण सुखी नहीं है. परिस्थितियों को जान कर उन्हें मान लेना ही जीवन है.’

‘अम्मां, आप ने यह सब क्यों बरदाश्त किया? छोड़ कर चली जातीं.’

‘सच जानने के बाद मैं ने अपने जीवन को अपने हाथों में ले लिया था. अपने दुखों के ऊपर रोते रहने के बदले मैं ने अपने सुखों में हंसना सीख लिया. मैं ने अपना ध्यान अपनी कला में लगा दिया. कला का शौक मुझे बचपन से था. मैं ने अपने चित्रों की प्रदर्शनियां लगानी शुरू कर दीं. जरूरतमंद कलाकारों को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया. कला और सेवा ने मेरे जीवन को बदल दिया.’

‘सच, अम्मां, आप ने सही कदम उठाया. मुझे आप पर गर्व है.’

‘मुझे स्वयं पर भी गर्व है कि एक आदमी के पीछे मैं ने अपना जीवन नरक नहीं बनाया,’ अम्मां बोलीं, ‘ऐसी बात नहीं थी कि वह मुझ से प्यार नहीं करते थे. जब एक बार मुझे टायफाइड और मलेरिया एकसाथ हुआ तो वे मेरे पास ही रहे. जैसे आज तुम मेरी सेवा कर रही हो वैसे ही 21 दिन इन्होंने दिनरात मेरी सेवा की थी.’

अब जब से अम्मां को कैंसर हुआ था तब से पापा ही दिनरात अम्मां की सेवा में लगे थे. आज उन की मृत्यु पर वे ही सब से ज्यादा रो रहे थे. उन के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. अम्मां के अंतिम दर्शन पर वे बोले, ‘‘अंजू बेटा, तुम ने अपनी मां को सजा तो दिया है पर एक बात तुम बिलकुल भूल गई हो.’’

‘‘पापा, क्या बात?’’

‘‘परफ्यूम लगाना भूल गई हो. वह बिना परफ्यूम लगाए कभी बाहर नहीं जाती थीं. आज तो लंबी यात्रा पर जा रही हैं. उन के लिए एक बढि़या परफ्यूम लाओ और उन पर छिड़क दो. मेरे लिए उन की यही पहचान थी. जब भी किसी बढि़या परफ्यूम की खुशबू आती तो मैं बिना देखे ही समझ जाता था कि मेरी पत्नी यहां से गुजरी है. आज भी जब वह जाए तो बढि़या परफ्यूम की खुशबू मुझ तक पहुंचे. मैं इसी महक के सहारे बाकी के बचे हुए दिन निकाल लूंगा,’’ इतना कह कर पापा फफकफफक कर रो पड़े. अंजू ने परफ्यूम की सारी शीशी अम्मां के शव पर छिड़क दी और 4 लोग उन की अर्थी को उठा कर अंतिम मुकाम की ओर बढ़ चले.

एक ऐसी जिंदगी : इला की जिंदगी में क्या चल रहा था

18 साल की इला रामपुर में रहती थी. वह इसी साल कालेज में आई थी और हर रोज कालेज जाती थी. वह एक भी क्लास मिस नहीं करती थी. दरअसल, इला को पढ़ाईलिखाई बहुत ही खास लगती थी.

एक दिन इला मनोविज्ञान की क्लास में मगन हो कर व्यवहार मनोविज्ञान के एक बिंदु पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही थी कि उस के ठीक बगल में एक अजनबी लड़की आ कर बैठ गई.

इला ने चौंक कर देखा. वह एक जवान लड़की लग रही थी. इस से पहले कि इला कुछ कह पाती या कुछ सोचती, वह जवान लड़की आगे बढ़ कर इला से बोली, ‘‘हैलो, मेरा नाम गीता है. मैं ने आज ही कालेज में दाखिला लिया है.’’

इला को गीता की आवाज एकदम सच्ची और खरी सी लगी, इसलिए इला ने उस से बात करनी शुरू कर दी.

गीता इला से 2 साल बड़ी थी. किसी वजह से कालेज की पढ़ाई देर से शुरू कर रही थी. इला ने उसे मनोविज्ञान की प्रयोगशाला दिखाई. उसे पिछले नोट्स भी दे दिए.

धीरेधीरे गीता और इला की आपस में अच्छी ट्यूनिंग बन गई. गीता बहुत ही संयत और सुलझ हुई थी. गीता की कुछ बातें खास थीं. वह अपने हैंडबैग खुद ही बनाती थी. उस के हाथ में जो रूमाल रहता था, वह भी गीता किसी पुराने कुरते को काटछांट कर तैयार कर लेती थी.

इला आज तक गीता के घर नहीं गई थी, मगर इला मन ही मन में यह कल्पना करती थी कि गीता का परिवार बहुत ही शानदार होगा. मगर, गीता ने उसे कभी भी अपने घर नहीं बुलाया था. इला ने भी कभी जिद नहीं की थी.

वजह यह थी कि इला कालेज की पढ़ाई के बाद एक संस्थान से जुड़ कर समाजसेवा किया करती थी. यह संस्थान अपने शिविर लगा कर झुग्गी बस्ती में रहने वालों को साफसफाई की आदतें सिखाया करता था.

इला को उस संस्थान से बहुतकुछ सीखने को मिला था. उस ने यह जाना था कि इस दुनिया में करोड़ों लोग गरीबी में जी रहे हैं. उन्हें अगर हम कुछ भी दे सकें, तो हमारी जिंदगी उपयोगी हो जाएगी.

इला को इस तरह के काम करने में बहुत ही खुशी मिलती थी. एक बार रविवार के दिन उस के संस्थान ने एक बस्ती में ऐसा ही शिविर लगाया. इला समय पर बस्ती में पहुंच गई थी. उस के बैग में तमाम सामान था. पानी की बोतल, घर पर तैयार सूजी के बिसकुट, पुरानी जींस को साफधो कर काट कर तैयार किए गए छोटेछोटे थैले थे.

इला के सीनियर भी शिविर में पहुंच गए थे. अपने कार्यक्रम के तयशुदा एजेंडे के मुताबिक वे सभी एकएक कर हर ?ाग्गी के पास जा कर दरवाजा खटखटाते हुए बढ़ते रहे.

हौलेहौले उन के साथ 50 से ज्यादा झुग्गी वाले शामिल हो गए. अब वे सभी एक जगह पर खड़े हो कर आपस में चर्चा करने लगे. तभी एक लड़की नल से पानी भर कर ले जाती दिखाई दी.

इला ने उस लड़की की तरफ पहले तो सरसरी नजर से ही देखा, मगर दोबारा देखा तो उस के मुंह से बरबस ही निकल गया, ‘‘गीता… ओ गीता…’’

उधर पानी भर कर जाती हुई गीता ने भी इला की आवाज पहचान ली थी. वह ठिठक कर पलट गई और, ‘‘अरे, इला…’’ कह कर गीता ने बालटी उसी जगह पर रख दी और इला से जा कर मिली. उस दिन इला ने गीता की असलियत जानी थी.

अब, इला के कहने पर गीता भी उस शिविर में शामिल हुई, मगर इला को उस के बारे में जान कर बहुत ही अजीब सा लगा था. इला को झुग्गी बस्ती में रहने वाली गीता से दोस्ती करने की कोई फिक्र नहीं थी, मगर गीता इतनी गरीबी में भी इतनी सहज है, इला को इस बात पर बहुत हैरानी होती थी.

अब इला को गीता से और भी ज्यादा लगाव होने लगा था… इला को अब हर बात पता चल गई थी. गीता की सौतेली मां, गीता के 2 सौतेले भाईबहन. उस के पिता का लापरवाह स्वभाव…

इला का तो बड़ा मन होता कि वह गीता को अपने घर पर ले कर आए, मगर यह भी तो बहुत ही मुश्किल था. इलाका संयुक्त परिवार था. 4 कमरे का मकान था, मगर उस छोटे से घर में भी तो

10 लोग रहते थे. इला के मातापिता और चाचाचाची सभी टीचर थे. बेमतलब सुविधा बढ़ाना किसी को भी पसंद नहीं था. यही आदत इला की भी थी.

गीता और इला मन लगा कर पढ़ती थीं. कालेज में उन दोनों ने वृक्षारोपण अभियान और प्लास्टिकमुक्त शहर अभियान में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था.

गीता तो वैसे भी खूब मेहनती थी. कालेज के आखिरी दिन वे दोनों अपनी ग्रेजुएशन की डिगरी पा कर खुश थीं. इला और आगे पढ़ना चाहती थी, मगर गीता की शादी तय कर दी गई थी. इला ने उसे बहुत सम?ाया कि ऐसे बेमेल रिश्ते को मना कर दे, मगर गीता ने उस की सलाह पर एक खामोशी ओढ़ ली थी.

कुछ पल ठहर कर गीता ने जवाब दिया था, ‘‘जितनी अशांति और असंतोष इस घर में है, पति का घर शायद ठीकठाक ही होगा.’’

गीता वहां से चली गई. इला के मन में अजीब खालीपन आने लगा. उस ने एक रैस्टोरैंट में पार्टटाइम नौकरी शुरू कर दी.

इला को एक महीना भी नहीं हुआ था कि रैस्टोरैंट की मालकिन ने उसे एक मनपसंद काम दे दिया. वह काम था मालकिन की बेटी को पढ़ाना. इला ने उस लड़की को खुशीखुशी सब पढ़ाया.

इला की मुलाकात वहां अकसर एक लड़के से होती थी. उस का नाम शान था. वह रैस्टोरैंट की मालकिन का भतीजा था.

शान यहां रह कर वर्क फ्रौम होम कर रहा था. वह मन ही मन इला को बेहद चाहने लगा था. इला की सरलता शान को बेहद भाती थी. सच यह था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी थी.

एक दिन उन दोनों ने एकदूसरे से अपने मन की बात कह दी. इला के मातापिता को कोई परेशानी नहीं थी. वे जातपांत, धर्मकर्म या किसी भी रीतिरिवाज में कतई भरोसा नहीं करते थे, इसलिए उन दोनों का चट मंगनी पट ब्याह हो गया.

शान की मुंबई में नई नौकरी लगी थी. शान और इला वहां आ गए. मुंबई की उन की नईनवेली जिंदगी शुरू हो गई.

एक दिन शान ने इला को खुशखबरी दी कि उसे एक खास ट्रेनिंग के लिए तकरीबन 3 महीने के लिए विदेश जाना है. शानदार मौका है, बहुतकुछ सीखने को मिलेगा.

इला को यह सुन कर बहुत खुशी हुई. वह शान की तरक्की से बेहद खुश थी.

शान विदेश चला गया. खाली समय में इला को यहां आ कर भी समाजसेवा और जनसेवा का मौका मिल गया. शान को उस की इस इच्छा से कोई परेशानी नहीं थी… फालतू समय बरबाद करने की जगह इला सम?ादारी ही कर रही थी.

अब इला साफसफाई की आदत सिखाने जबतब धारावी के तंग इलाके में जाती रहती थी. एक दिन इसी तरह इला मुंबई के धारावी के किसी तंग इलाके में साफसफाई की आदतें सिखा रही थी कि उस ने कुछ बच्चों के हाथ में रूमाल देखे.

वे रूमाल देख कर इला ठिठक गई. ऐसे रूमाल तो गीता तैयार करती थी, उसे अच्छी तरह से याद था. वह झट से बच्चों के पास आई.

एक बच्चे ने बताया कि बचपन फाउंडेशन की एक गीता दीदी हैं, उन्होंने ही ये रूमाल उन्हें दिए हैं.

वहां से घर लौट कर इला ने शान को आज की सारी बातें बताईं, उस के बाद गीता को फोन लगाया.

गीता ने आज तक इला को अपनी यह  सचाई नहीं बताई थी. वह हमेशा यही कहती थी कि ससुराल में सब

ठीक है, जबकि कुछ भी ठीक नहीं था. 3 महीने में ही गीता को उस घर से धक्के मार कर निकाल दिया गया था.

वजह यह थी कि गीता अपने से 12 साल बड़े पति को साफसफाई की आदत सिखाने लगती थी. यह बात उस के पति और सास को बिलकुल भी पसंद नहीं आई.

पर गीता ने हिम्मत नहीं हारी थी. वह अपने मन में हौसला रख कर अपने पैरों पर खड़ी होने का संकल्प ले चुकी थी. अब वह अपने दम पर जीना चाहती थी, इसलिए वापस रामपुर नहीं गई.

गीता अब मुंबई में ही रहती थी. वह नौकरी करती थी और अपना एक फाउंडेशन भी चला रही थी, मगर अभी बस शुरुआत ही थी. वह इला को सब बताने ही वाली थी.

इला को गीता का यही भोलापन बहुत पसंद था. इला को मालूम था कि गीता बहुत ही जरूरू है. वह कुछ बेहतर ही करेगी.

इला ने गीता को बताया कि वह भी मुंबई में आ कर रहने लगी है, तो गीता बहुत खुश हुई. गीता उस के लिए भेंट में अपने हाथों से बनाए रूमाल लाना चाहती थी, मगर इला को तो पूरी गीता ही मिल रही थी. वह समाज के लिए कुछ करना चाहती थी. अब तो उस की खुशी का ठिकाना न था. उसे उपयोगी जिंदगी जीने को मिल रही थी.

मैं 20 वर्षीय युवती हूं, शादी के 2-3 साल तक हम सैक्स करना चाहते हैं पर बच्चा नहीं चाहते. मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल


मैं 20 वर्षीय युवती हूं और 2 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. शादी के 2-3 साल तक हम बच्चा नहीं चाहते. इस के लिए क्या मुझे कोई गर्भनिरोधक गोली लेनी चाहिए. मैं ने कहीं पढ़ा है कि ‘बी गैप’ गोली लेने के बाद 6 महीने तक गर्भ ठहरने का खतरा नहीं रहता. मैं जानना चाहती हूं कि क्या यह गोली सुरक्षित है और क्या मुझे इस का सेवन करने से पहले किसी लेडी डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए?

जवाब

आप की उम्र अभी कम है, इसलिए आप का यह निर्णय कि कुछ सालों तक परिवार नियोजन का पालन किया जाए, बिलकुल सही है. आप किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञा से परामर्श लें. वे आप को बता देंगी कि आप को कौन सा गर्भनिरोधक उपाय अपनाना चाहिए.

राह से भटकते नौजवान

बेरोजगारी से तंग आकर अक्षत ने खुदकुशी करने की कोशिश की. यह बात जब अक्षत के दोस्त समीर को पता चली, तो वह हैरान रह गया, क्योंकि दोनों साथ में ही सरकारी नौकरी के इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे.

समय रहते समीर ने अपना रास्ता बदल लिया और अपने पापा के बिजनैस में लग गया. लेकिन अक्षत सरकारी नौकरी के पीछे पागल था, क्योंकि सरकारी नौकरी का मतलब परमानैंट नौकरी, अच्छी तनख्वाह वगैरह, इसलिए वह जीतोड़ मेहनत भी कर रहा था, मगर हर बार वह कुछ नंबरों से रह जाता था.

33 साल के हो चुके अक्षत को लगने लगा कि अब उस के पास कोई रास्ता नहीं बचा, सिवा खुदकुशी करने के.

बढ़ती बेरोजगारी से न सिर्फ देशभर के नौजवान परेशान हैं, बल्कि विदेशों में पढ़ेलिखे नौजवान भी इस की चपेट में हैं. बेरोजगारी से जुड़ा एक काफी पेचीदा मामला है. औक्सफोर्ड जैसी एक नामचीन यूनिवर्सिटी से पढ़े एक 41 साल के शख्स ने बेरोजगारी से तंग आ कर अपने मातापिता पर ही केस ठोंक दिया. यह बेरोजगार शख्स जिंदगीभर के लिए हर्जाने की मांग कर बैठा.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आतिश (बदला हुआ नाम) ने औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है. साथ ही, वह वकालत की ट्रेनिंग ले चुका है. इस के बावजूद वह बेरोजगार है.

आतिश का कहना है कि अगर उस के मांबाप उस की मदद नहीं करेंगे, तो उस के मानवाधिकार का उल्लंघन होगा.

आतिश के पिता की उम्र 71 साल है और उस की मां 69 साल की हैं. इतने उम्रदराज होने के बावजूद वे अपने बेटे को हर महीने 1,000 पाउंड भेजते हैं. इतना ही नहीं, वे अपने बेटे के दूसरे कई खर्च भी उठा रहे हैं यानी वह अपने सभी खर्चों के लिए अपने मातापिता पर ही निर्भर है.

लेकिन, अब मांबाप अपने बेटे की मांगों से तंग आ चुके हैं और छुटकारा चाहते हैं, पर कैसे? यह उन्हें समझ नहीं आ रहा है.

अच्छी पढ़ाईलिखाई होने के बावजूद भी कई नौजवान बेरोजगार हैं, तो यह बड़े हैरत की बात है. हाल ही में इंस्टीट्यूट फौर ह्यूमन डवलपमैंट ऐंड इंटरनैशनल लेबर और्गनाइजेशन ने इंडिया इंप्लायमैंट रिपोर्ट, 2024 जारी की है. यह रिपोर्ट भी भारत में रोजगार के हालात को बहुत गंभीर रूप में पेश करती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जो बेरोजगार कार्यबल में हैं, उन में तकरीबन 83 फीसदी नौजवान हैं.

यह कहना गलत नहीं होगा कि आज की नौजवान पीढ़ी बेरोजगारी से जू?ा रही है. कई नौजवान नौकरियों के लिए मौके तलाश रहे हैं. 15-20 हजार रुपए महीने की नौकरी पाने के लिए हजारोंलाखों बेरोजगार नौजवान अर्जी देते हैं और जब इस में भी उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाती है, तो वे बुरी तरह हताश और निराश हो जाते हैं.

सरकारी नौकरी नहीं लग पा रही है, तो इस का यह मतलब नहीं है कि आप कोई गलत कदम उठा लें या फिर अपने मांबाप पर बो?ा बन जाएं और उन से अपने खर्चे उठवाएं और उन्हें परेशान करें, तब, जब उन की उम्र हो चुकी है और वे खुद अपनी पैंशन पर गुजरबसर कर रहे हैं.

टैक्नोलौजी के इस जमाने में नौजवान पीढ़ी को अब अपनी सोच बदलनी होगी. उसे अब नौकरी ढूंढ़ने के बजाय नौकरी देने वाला बनने पर ध्यान देना चाहिए.

नौजवानों को अपने रोजगार और आजीविका के लिए अपने मातापिता का मुंह देखने के बजाय अपने रास्ते खुद तलाशने होंगे. इस में कोई दोराय नहीं है कि नौजवानों के पास भरपूर क्षमता और कौशल है और इसे साबित करने के लिए मौके भी खूब हैं. उन्हें केवल अपने टारगेट को पहचानने की जरूरत है.

मौडर्न टैक्नोलौजी इस काम में बहुत मददगार साबित हो सकती है. इस की वजह से न केवल नौजवान पीढ़ी रोजगार पा सकती है, बल्कि कइयों को रोजगार दे भी सकती है.

नौजवानों के पास आगे बढ़ने के कई मौके हैं. लेकिन मुद्दा यह है कि सही दिशा में कदम किस तरह उठाया जाए, जिस से कि परिवार, समाज और देश को फायदा पहुंचे?

इस के लिए नौजवानों के साथसाथ सरकार को भी आगे आना होगा. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज बुनियादी जरूरतों की कमी के चलते कई नौजवान टैलेंटेड होते हुए भी पीछे रह जाते हैं.

24 साल के एक नौजवान का कहना है कि वह अच्छा क्रिकेट खेलता है. लेकिन उस के पास क्रिकेट खेल को बेहतर बनाने के लिए कोई सुविधाएं नहीं हैं. अगर उसे सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, तो वह क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.

भारत में नौजवानों (15-29 साल की उम्र) में बेरोजगारी की दर सामान्य आबादी की तुलना में काफी ज्यादा है. साल 2022 में शहरी नौजवानों के लिए बेरोजगारी की दर 17.2 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर तकरीबन 10.6 फीसदी थी.

देश में बढ़ती बेरोजगारी के और भी कई कारण हैं, जैसे बढ़ती आबादी, उचित पढ़ाईलिखाई की कमी, कौशल विकास की कमी, नौकरियों के मौकों की कमी वगैरह.

सरकार की जिम्मेदारी केवल टैक्स कलैक्शन तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि देश का पूरा विकास हो, नौजवानों को रोजगार मिले, यह भी सरकार की ही जिम्मेदारी है.

Sex Life : डर्टी टौक्स से करें पार्टनर को खुश

आज के दौर में सोशल मीडिया का यूज इतना बढ़ गया है कि अब आप सब चीज़ें घर बैठेबैठे अपने स्मार्ट फोन की मदद से कर सकते हो फिर चाहे वे औनलाइन शौपिंग हो या घर बैठेबैठे राशन का समान मंगवाना हो. ऐसे में आजकल के कई यूथ जो अपने पार्टनर से दूर रहते हैं या कभी-कभी ही मिल पाते हैं वे अपने स्मार्ट फोन की मदद से अपने पार्टनर को सैटिस्फाई भी कर सकते हैं.

आप सब ने सैक्स टैक्सटिंग के बारे में तो सुना ही होगा तो चलिए आप मैं अपको सैक्स टैक्सटिंग के कुछ ऐसे फायदे बताने जा रहा हूं जिससे की आपकी सैक्स लाइफ और भी ज्यादा दिल्चस्प और इंट्रस्टिंग बन सकती है.

अगर आप औफिस में या अपने काम पर गए हुए हैं और आपको बीच में कुछ समय अपने पार्टनर के लिए निकालना है तो ऐसे में आप कभी कभी उन से डर्टी टौक्स करें और साथ ही सैक्सी फोटोज भेज के अपने पार्टनर को सैड्यूस कर सकते हैं जिससे कि आपकी सैक्स लाइफ में थोड़ा फन आने लगेगा.

सैक्स टैक्टिंग में आप अपने पार्टनर को डर्टी टौक्स करके, सैक्सी फोटोज या वीडियोज़ भेज कर और यहां तक की अपनी और उनकी सैक्स फैंटेसीज़ के बारे में बात करके सैड्यूस कर सकते हैं. सैक्स टैक्सटिंग से आप दोनों के मन में एकदूसरे से मिलने की बेसब्री से इंतजार करेंगे और जब आप शाम को घर जाकर अपने पार्टनर के साथ सैक्स करेंगे तो दिन में की गई सैक्ट टैक्सटिंग आपके फोरप्ले का काम करेगी.

आज के कई युवा नौजवान लौंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में रहते हैं और कभीकभी ही अपने पार्टनर से मिल पाते हैं तो इस कारण उनको ये शक रहता है कि उनका पार्टनर अपनी सैक्स डिजायर्स को पूरा करने के लिए किसी और के साथ संबंध ना बना ले. ऐसे लोगों को अपने पार्टनर के साथ ज्यादा से ज्यादा सैक्स टैक्सटिंग करनी चाहिए और अपने पार्टनर की सैक्स फैंटेसीज को समझ कर उन्हें वीडियो कौल या फिर सैक्स टैक्सटिंग से सैटिस्फाई करना चाहिए. इससे आपके पार्टनर के मन में किसी और के लिए कोई गलत विचार नहीं आएगा.

सैक्स टैक्सटिंग आपके सेक्स लाइफ के लिए बहुत ही ज्यादा जरूरी है क्योंकि सैक्स टैक्सटिंग से आप अपने पार्टनर से फिजिकली कनैक्टिड रह सकते हैं और एक अच्छी सैक्स लाइफ के लिए इमोशनली और फिजिकली कनैक्टिड रहना बेहद जरूरी है.

मैं 36 साल का हूं, सेक्स के दौरान मैं बहुत जल्दी ढीला पड़ जाता हूं, मुझे कोई बीमारी तो नहीं है?

सवाल

मैं 36 साल का हूं. मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं. सेक्स के दौरान मैं बहुत जल्दी ढीला पड़ जाता हूं. क्या मुझे कोई बीमारी तो नहीं है?

जवाब

आप को कोई बीमारी नहीं है. हर वक्त इस बारे में न सोचें. जब भी सेक्स का मूड बने, तो देर तक फोरप्ले करने के बाद ही हमबिस्तरी करें. फोरप्ले का मतलब होता है एकदूसरे को चूमना चाटना और नाजुक अंगों को सहला कर जोश में लाना.

वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाए रखने में सेक्‍स का बहुत अहम स्‍थान होता है. लेकिन, कई जोड़े इसका भरपूर आनंद नहीं उठा पाते. वजह, वे इसे सिर्फ शारीरिक जरूरत भी ही मानते हैं, नतीजतन जल्‍द ही उनकी सेक्‍स लाइफ बोरियत से भर जाती है.

बेहद भागमभाग वाली जिंदगी और काम की थकान भी सेक्‍स से दूरी एक बड़ी वजह बनती जाती है. सेक्‍स के प्रति उदासीनता का असर उनके वैवाहिक रिश्‍तों पर भी पड़ता है. जरूरत होती है सेक्‍स को रोचक और रोमांचक बनाए रखने की जरूरत होती है. और इस रोचकता को बनाए रखने में फोरप्‍ले बहुत महत्त्‍वपूर्ण होता है. फोरप्ले से न सिर्फ सेक्‍स संबंधों में नवीनता आती है, बल्कि रिश्‍ते भी मजबूत बनते हैं.

सेक्स तभी संपूर्ण माना जाता है जब दोनों को पूर्ण आनंद मिले. इसके लिए सबकी बड़ी जरूरत है आपके संबंधों में मधुरता का होना. यहां इस बात का ध्‍यान रखना भी जरूरी है कि आप सेक्‍स को महज शारीरिक जरूरत भर की चीज न समझें, बल्कि इसका भरपूर लुत्‍फ उठाएं. और इस लुत्‍फ के लिए सेक्स से पहले और बाद में फोरप्ले किया जा सकता है. जल्दबाजी या सिर्फ शरीर की जरूरत को पूरा करने के लिए हडबडाहट में कुछ मिनटों बाद मुंह फेरकर सो जाने से आपकी पत्नी या पार्टनर के मन में सेक्स के प्रति अरूचि पैदा हो जाती है.

काम क्रीडा स्त्री और पुरूष दोनों के मन में उत्साह जगाने का काम करती है. फोरप्ले से स्त्री और पुरूष दोनों की कामग्रंथियां खुलकर पूरी तरह से क्रियाशील हो जाती है. यह भी साबित हो चुका है कि पुरुष महिलाओं की अपेक्षा जल्‍दी उत्तेजित हो जाते हैं. महिलाओं को उत्तेजित होने के लिए सही माहौल, समय और कामक्रीडा की जरूरत होती है. स्त्री के उत्तेजित होने के समय को पुरूष अपने फोरप्ले से मेंटेन कर सकता है.

काम क्रीडा या फोरप्ले के जरिए स्‍त्री में काम भावना को बढ़ाया जा सकता है. पुरूष यदि चाहे तो स्त्री को फोरप्ले के माध्यम से ही चरम तक पहुंचा सकता है. औरतों की सेक्स चेतना बेहद गहरी और मानसिक होती है. औरतों चाहती हैं कि सेक्स के बाद भी उसका पार्टनर उसे तब तक जकडे रहे जब तक वह खुद तृप्त न हो जाए. ऐसा करने से स्त्री को अपार चरम सुख व संतुष्टि मिलती है. अत: पुरूष को सेक्स के बाद भी फोरप्ले करना चाहिए. फोरप्ले को अपनी सेक्स लाइफ में शामिल कीजिए और देखिए किस तरह से आपकी पार्टनर पूरी तरह से आपकी हो जाएगी और आपके संबंध मजबूत हो जाएंगे.

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