असम से बुलंद हुआ बगावत का  झंडा

हाजगह : असम के गुवाहाटी का हातीगांव. तारीख : 12 दिसंबर, 2019. समय : शाम के 6.15 बजे.

स्कूल में पढ़ने वाला एक 16 साला छात्र सैम स्टेफर्ड अपनी मां से मोबाइल फोन पर कहता है, ‘‘मां, नागरिकता कानून का विरोध करने के लिए सभी लोग गुवाहाटी की सड़कों पर उतर आए हैं. मैं भी वहीं हूं. मेरी चिंता मत करना.’’

सैम स्टेफर्ड तलासील प्लेग्राउंड में हो रहे विरोध प्रदर्शन में ‘नो कैब’ का नारा लगाते हुए अपने घर लौट रहा था कि अचानक पुलिस की गोली चली और कुछ देर छटपटाने के बाद सैम स्टेफर्ड का शरीर शांत हो गया.

दिसंबर का महीना असम के लिए अच्छा नहीं रहा. पूरा गुवाहाटी शहर 10 दिसंबर से परेशान था. इस परेशानी की वजह नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 को लोकसभा में पास कराना था. इस के विरोध में उत्तरपूर्व क्षेत्रीय छात्र संघ ने 11 घंटे का पूर्वोत्तर बंद रखा था.

नया नागरिकता बिल पास होने के बाद इस के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए और रैलियां निकालीं. सड़कों पर टायर जला कर विरोध प्रदर्शन के साथ असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और वित्त मंत्री हिमंत विश्व सरमा मुरदाबाद के नारे लगाए गए.

पूर्वोत्तर में चारों तरफ नागरिकता कानून के विरोध की आग भड़की. दिसपुर सचिवालय के सामने सरेआम उपद्रवियों ने गाडि़यों में आग लगाई. अहिंसक आंदोलन को हिंसा का रूप लेने में देर नहीं लगी. पुलिस ने बारबार लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोडे़.

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इस के बाद सेना को सड़कों पर उतारा गया और कर्फ्यू लगाने के साथ इंटरनैट सेवा बंद कर दी गई. यही रवैया ऊपरी असम के तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, चबुआ, गोलाघाट, तेजपुर समेत पूर्वोत्तर में यह आंदोलन और ज्यादा बढ़ा.

क्या है नागरिकता कानून

नागरिकता कानून, 2019 के मुताबिक, सीमा से सटे पड़ोसी देश बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गैरमुसलिमों को भारतीय नागरिकता मिलेगी. इतिहास गवाह है कि इन नागरिकों का बो झ अकेले असम को उठाना पड़ेगा. ऐसे में असमिया समाज के वजूद पर सवालिया निशान लगना लाजिमी है.

नागरिकता के सवाल पर जिस तरीके से विरोध जताया जा रहा है, वह दिन दूर नहीं जब एक बार फिर 6 साल तक चले असम आंदोलन की शुरुआत हो सकती है. नागरिकता कानून, 2019 को ले कर राज्य की विभिन्न राजनीतिक पार्टियां, संगठन, शिल्पी समाज, वरिष्ठ नागरिकों और पढे़लिखे लोगों के बीच यह मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है.

भूल आखिर कहां हुई

पूर्वोत्तर बंद के दौरान आल असम छात्र संघ की जिम्मेदारी थी कि सबकुछ शांतिपूर्वक रहे, लेकिन इस संघ ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. इस के बदले डिब्रूगढ़ में असम कृषक मुक्ति संग्राम समिति के नेता अखिल गोगोई ने कहा था कि 11 दिसंबर को यह बिल राज्यसभा में पास होगा. ऐसे में असम की जनता अपने घरों से बाहर निकल कर रेल, सड़क, केंद्र व राज्य सरकार के कामकाज में बाधा पहुंचाए.

मीडिया का रोल

नागरिकता कानून, 2019 को ले कर हो रहे आंदोलन पर राज्य के इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने निष्पक्षता के साथ खबरें पेश नहीं कीं. लोगों ने देखा कि सड़कों पर विरोध जता रहे प्रदर्शनकारी चिल्ला रहे थे, हालात बेकाबू हो रहे थे.

उस समय ज्यादातर टैलीविजन रिपोर्टर चिल्लाचिल्ला कर बोल रहे थे कि आप सभी अपने घरों से निकल आएं, असम की रक्षा का सवाल है.

असमझौते का पालन

नागरिकता कानून, 2019 का विरोध पूर्वोत्तर में तूल पकड़ता जा रहा है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और असम गण परिषद  के विधायक प्रफुल्ल कुमार महंत ने वही पुराना राग दोहराते हुए कहा कि यह कानून स्थानीय निवासियों का विरोध और गैरमुसलिम घुसपैठियों का समर्थन करता है. हम ने इस का विरोध किया है. असम आंदोलन में 855 लोग शहीद हुए थे. बाद में केंद्र सरकार और आसू के बीच सम झौता हुआ. इस सम झौते का पूरी तरह से पालन होना चाहिए.

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हिंसा भड़काने वाला कौन

नागरिकता कानून, 2019 के खिलाफ और असमिया जाति की सुरक्षा को ले कर राज्य की जनता सड़कों पर उतर आई है. उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था. लोग विरोध जताते हुए गुवाहाटी महानगर की सड़कों पर नारेबाजी करते हुए दिसपुर सचिवालय की ओर बढ़ रहे थे. इस बीच कुछ शरारती तत्त्व तैयारी के साथ भीड़ में घुस आए और विरोध के नाम पर हिंसा की आग कुछ इस कदर फैलाई थी कि सरकारी संपत्तियों का नुकसान हुआ.

पुलिस और केंद्र को यह गुमान है कि पिछले कुछ सालों की तरह वह लोगों को डराधमका कर हर तरह की नाराजगी को नजरअंदाज किया जा सकता है. यह गरूर है.

अब तक 5 मारे गए

विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतरे लोगों पर पुलिस को मजबूर हो कर फायरिंग करनी पड़ी, क्योंकि उग्र भीड़ हिंसा पर उतारू हो गई थी. पुलिस की गोली से मारे गए लोगों में 16 साल का सैम स्टेफर्ड, 18 साल का दीपांजल दास, 25 साल का ईश्वर नायक, 25 साल का अब्दुल आलिम और डिब्रूगढ़ में मारा गया 32 साल का विजेंद्र पांगि शामिल है.

राज्य सरकार की भूल

गुवाहाटी शहर जब आग की लपटों में था, मशाल अंतिम सीमा पार कर चुकी थी, तब राज्य की भाजपा सरकार की नींद खुली. मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल समेत इन के मंत्री, विधायकों और आला अधिकारी सो कर उठे. दरअसल, इस कानून को ले कर राज्य के 80 फीसदी लोगों के पास सही जानकारी नहीं है.

प्रदेश भाजपा सरकार के पास अपना सूचना और जनसंपर्क विभाग है. इस विभाग के रहते हुए भी इस बारे में राज्य की जनता को जानबू झ कर सही जानकारी नहीं दी गई. या यों कहिए कि भाजपा सरकार इस मामले में भी ऐसे ही नाकाम रही है, जैसे विकास के मामले में पिछड़ रही है.

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पौलिटिकल राउंडअप: अब नई दलित पार्टी

साल 2017 में सहारनपुर में हुई हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि बहुजन समाज पार्टी मुद्दों से भटक गई है. लिहाजा, उन के नए सियासी दल में ईमानदार और समर्पित नौजवानों की भागीदारी रहेगी. वे ‘एक नोट एक वोट’ के फार्मूले पर अपनी पार्टी की बुनियाद रखेंगे. ऐसा माना जा रहा है कि कांशीराम का जन्मदिन 15 मार्च को है, उस दिन या उस से पहले इस का ऐलान कर दिया जाएगा.

यह दलित वोटों में विभाजन करेगा और वे भारतीय राजनीति में निरर्थक हो जाएंगे.

बागी हुए प्रशांत किशोर

पटना. अपनी चाणक्य वाली सोच से बड़ेबड़े नेताओं को तारने वाले प्रशांत किशोर फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सारथी बने हुए हैं, पर कब तक उन का साथ देंगे, कह नहीं सकते.

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दरअसल, इस नए नागरिकता संशोधन विधेयक को समर्थन देने के मामले में जनता दल (यूनाइटेड) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर पार्टी की चेतावनी के बाद भी अपने रुख से पीछे नहीं हटे और उन्होंने 13 दिसंबर को दोबारा नागरिकता संशोधन कानून को ले कर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी.

पार्टी ने प्रशांत किशोर को ऐसी बयानबाजी से बचने की सलाह दी, पर वे अपने रुख से पीछे नहीं हटने का मन बना चुके हैं और इसी बीच उन के ऐसे बगावती तेवर को देखते हुए विपक्षी दलों ने अपने महागठबंधन में उन्हें आने का न्योता दिया है. वैसे, उन के आम आदमी पार्टी से मिलने के भी कयास लगाए गए.

नेताजी के बोल बचन

सतना. यों तो भारतीय जनता पार्टी के बहुत से नेता अपने बयानों से देश की जनता का मनोरंजन करते रहते हैं, पर मध्य प्रदेश के सतना से भाजपा सांसद गणेश सिंह ने 11 दिसंबर को दावा किया है कि संस्कृत बोलने से इनसानी नर्वस सिस्टम बेहतर होता है और डायबिटीज और कोलैस्ट्रौल कंट्रोल में रहता है. इस के लिए उन्होंने अमेरिका के एक अकादमिक संस्थान के शोध का हवाला दिया.

सांसदजी यहीं पर नहीं रुके, बल्कि उन्होंने यह भी दावा किया कि यूएस स्पेस रिसर्च और्गनाइजेशन नासा के शोध के मुताबिक, अगर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग संस्कृत में की जाए तो उस में कोई रुकावट नहीं होगी.

राजस्थान में ‘जन आधारकार्ड’

जयपुर. राजस्थान सरकार ने अपने नागरिकों को सरकारी योजनाओं का फायदा देने के लिए एक नए ‘जन आधारकार्ड’ को शुरू करने की तैयारी की है. प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी सरकार का एक साल पूरा होने के मौके पर 18 दिसंबर को जयपुर में इस योजना की शुरुआत की और अगले साल 1 अप्रैल से यही कार्ड मान्य होगा.

इस योजना के तहत राज्य के हर परिवार को 10 अंक की परिवार पहचान संख्या वाला ‘जन आधारकार्ड’ दिया जाएगा. परिवार में 18 साल या इस से ज्यादा उम्र की महिला को मुखिया बनाया जाएगा. महिला नहीं है तो 21 साल या इस से ज्यादा उम्र का पुरुष मुखिया होगा.

पिनराई विजयन ने चेताया

तिरुअनंतपुरम. देशभर में हिंसा की आग सुलगा चुके नागरिकता संशोधन कानून को ले कर केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि वर्तमान माहौल को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पैदा किया और वे देश में अपना एजेंडा लागू करना चाहते हैं. केरल नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ खड़ा है.

मंगलवार, 10 दिसंबर को लोकसभा में इस बिल के पास होने पर पिनराई विजयन ने कहा था कि नागरिकता संशोधन विधेयक देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र पर एक हमला है. यह लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कवायद है.

फारूक की हिरासत बढ़ी

श्रीनगर. जम्मूकश्मीर राज्य के 3 बार मुख्यमंत्री रह चुके फारूक अब्दुल्ला की हिरासत 14 दिसंबर को 3 महीने के लिए और बढ़ा दी गई. वे तकरीबन जेल बना दिए गए अपने घर में नजरबंद रहेंगे.

याद रहे कि केंद्र सरकार ने इसी साल 5 अगस्त को जम्मूकश्मीर राज्य का विशेष दर्जा हटाने और उसे बांटने का ऐलान किया था और उसी दिन से फारूक अब्दुल्ला हिरासत में हैं.

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कांग्रेस ने भरी हुंकार

दिल्ली. जहां एक तरफ केजरीवाल सरकार ‘अब की बार 67 पार’ का नारा लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस दिल्ली में मोदी सरकार को घेरने के नाम पर अपनी ताकत आजमा रही है. इसी सिलसिले में कांग्रेस ने 14 दिसंबर को ‘भारत बचाओ रैली’ निकाली, जिस का मकसद भाजपा की देश को बांटने वाली नीतियों को उजागर करना था.

इस रैली में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी के अलावा पार्टी के तमाम नेताओं ने मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोला. कांग्रेस का दावा है कि बेरोजगारी, बेकारी, भूख, किसानों की बदहाली और माली मंदी की वजह से आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है.

यह कांग्रेस का एक तीर से दो शिकार करना रहा. मोदी सरकार को तो कोसा ही, दिल्ली में भीड़ इकट्ठी कर के अरविंद केजरीवाल की भी परेशानियां बढ़ा दीं.

आंध्र प्रदेश ने दिखाई ‘दिशा’

हैदराबाद. हाल ही में एक महिला डाक्टर से गैंगरेप, हत्या और फिर लाश जला देने की वारदात के बाद राज्य समेत पूरे देश में गुस्से का उफान था. इसी के मद्देनजर आंध्र प्रदेश विधानसभा ने 13 दिसंबर को ‘दिशा’ बिल पास कर दिया है, जिस के तहत रेप और गैंगरेप के अपराध के लिए ट्रायल को तेज किए जाने, 21 दिन के अंदर फैसला देने और मौत की सजा का प्रावधान है.

इस बिल में आईपीसी की धारा 354 में संशोधन कर के नई धारा 354(ई) बनाई गई है. लिहाजा, रेप के मामले में मौत की सजा का प्रावधान देने वाला आंध्र प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है.

पूर्वोत्तर में बदलाव की चिनगारी

गुवाहाटी. नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ असम एक रणभूमि बना और सुलग गया. दिसंबर में वहां जमा हुई भीड़ की ‘होहो’ की गूंज, असमिया ‘गमछा’ और ‘जय आई असोम’ के नारे ने केंद्र सरकार के इस फैसले का पुरजोर विरोध किया. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि इस नागरिकता कानून से असम की पहचान को खतरा है.

इतना ही नहीं, असम के पड़ोसी राज्य सिक्किम में भी नागरिकता बिल का विरोध किया गया. देश के नामचीन फुटबाल खिलाड़ी और हामरो सिक्किम पार्टी के संस्थापक और अध्यक्ष बाइचुंग भूटिया ने कहा कि वे नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 से हताश हैं. सिक्किम के मूल निवासियों को सिरे से गायब कर दिया गया है और उन पर लगातार खतरा बना हुआ है.

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महाराष्ट्र में हुआ कैबिनेट का विस्तार, अजित पवार ने चौथी बार उपमुख्यमंत्री बन बनाया रिकौर्ड

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के वरिष्ठ नेता अजित पवार ने सोमवार को महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. महा विकास अघाड़ी के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और अन्य गणमान्य लोगों की उपस्थिति में राज्यपाल बी.एस. कोश्यारी ने अजित पवार को शपथ दिलाई. राकांपा प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित (60) ने रिकॉर्ड चौथी बार उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है. उन्होंने सबसे पहले नवंबर 2010 में, उसके बाद अक्टूबर 2012 में, उसके बाद मुश्किल से 80 घंटों के लिए नवंबर 2019 में और अब सोमवार को शपथ ली है.

एक बार से ज्यादा बार उपमुख्यमंत्री बनने का कारनामा उन्हीं की पार्टी के नेता छगन भुजबल भी कर चुके हैं. वह पहले अक्टूबर 1999 में तथा उसके बाद दिसंबर 2008 में उपमुख्यमंत्री बने थे. इनके अलावा नासिकराव तिरपुडे, सुंदरराव सोलंके, रामराव आदिक, गोपीनाथ मुंडे, आर.आर. पाटील (सभी का निधन हो चुका) और विजयसिंह मोहिते-पाटील एक-एक बार उप मुख्यमंत्री बन चुके हैं.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया. उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे सहित 35 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली, जिसमें कैबिनेट के 25 और राज्यमंत्री के 10 पद शामिल हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के वरिष्ठ नेता अजीत पवार ने रिकॉर्ड बनाते हुए चौथी बार उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

नरीमन पॉइंट स्थित महाराष्ट्र विधानमंडल परिसर के बाहर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सभी नए मंत्रियों को पद और गोपनियता की शपथ दिलाई. मंत्रिमंडल के विस्तार का स्वागत करते हुए शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने इसे ठाकरे का अच्छी तरह से संतुलित निर्णय करार दिया. उन्होंने कहा कि इस विस्तार से राज्य के सभी वर्गो, समुदाय और धर्म का उचित प्रतिनिधित्व हुआ है.

महा विकास अगाड़ी के अन्य नेताओं सहित आदित्य ठाकरे को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. राज्य के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के अशोक चव्हाण, परिषद में विपक्ष के नेता रहे राकांपा के धनंजय मुंडे, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दिलीप वाल्से-पाटिल और राकांपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवाब मलिक इस विस्तार का हिस्सा बने हैं.

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मंत्रिमंडल में तीन महिलाएं भी शामिल हैं. राकांपा की अदिति तटकरे (राज्य मंत्री) और कांग्रेस कीं वर्षा गायकवाड़ और यशोमती ठाकुर को भी मंत्रिमंडल में स्थान मिला है. वहीं, शिवसेना की तरफ से सरकार में कोई महिला प्रतिनिधित्व नहीं है. साल 2014 के बाद पहली बार मंत्रालय में चार मुस्लिम चेहरे आए हैं. शिवसेना के अब्दुल सत्तार नबी (राज्य मंत्री), राकांपा के नवाब मलिक व हसन मुशरीफ और कांग्रेस के असलम शेख, इन सभी को कैबिनेट स्तर का पद दिया गया है.

तीनों पार्टियों के अन्य बड़े नामों में अनिल परब, विजय वादीतिवार, जितेंद्र अवध, अनिल देशमुख, अमित (विलासराव) देशमुख, राजेश टोपे, और सतेज पाटिल (राज्यमंत्री), विश्वजीत कदम और बच्चू कडू शामिल हैं.

नेता बांटे रेवड़ी, अपन अपन को देय !

यहां सत्ता की खनक की गुंज, गली गली में गूंज रही है. जिसका सबसे बड़ा असर नगरीय निकाय चुनाव में देखने को मिल रहा है .सन 1999 में अविभाजित मध्यप्रदेश के दरम्यान पहला नगरीय निकाय चुनाव हुआ था और अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी मुख्यमंत्री थे दिग्विजय सिंह.

उस समय चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से हुआ था. मतदाताओं ने महापौर, अध्यक्ष, सरपंच और पार्षदों के चुनाव प्रत्यक्ष पृणाली से मतदान करके किया था. तदुपरांत 2004,2009, 2014 तक चुनाव भाजपा के शासन काल में भी इसी प्रत्यक्ष प्राणाली से हुए .इस चुनाव का लाभ यह था की जहां महापौर, अध्यक्ष सीधे मतदाताओं के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं वहीं राजनीतिक खरीदी बिक्री की संभावना भी खत्म हो जाती है. सत्ता की प्रेशर की राजनीति पर अंकुश लगता है मगर छत्तीसगढ़ में नई परिपाटी शुरू की है उन्होंने एक्ट मैं बदलाव किए और अबकि चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से हुए जिसमें पार्षद ही अपने महापौर चुनेंगे अध्यक्ष चुनेंगे. ऐसे में खरीदी बिक्री और राजनीतिक बवंडर दिखाई पड़ने लगे हैं.

कांग्रेस का सूपड़ा साफ !

मुख्यमंत्री बन कर भूपेश बघेल ने सबसे बड़ा काम यही किया की अपनी साख बचाने के लिए नगरीय निकाय चुनाव को आखिरकार अप्रत्यक्ष प्राणाली से कराने का ऐलान कर दिया .इस पर उनकी कश्मकश देखी गई पहले कहा प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव होंगे लोग महापौर पद की तैयारी में जुट गए .मगर विपक्षी नेताओं का आरोप है जब भूपेश बघेल को यह सीक्रेट जानकारी मिली कि प्रत्यक्ष चुनाव हुए तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा तो उन्होंने अपनी साख हाईकमान से बचाने की खातिर चुनाव की पद्धति बदलवा दी.

विरोध स्वरूप मामला उच्च न्यायालय पहुंचा .सुनवाई शुरू हुई मगर सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी और चुनाव हो गए अब हालात यह है की लगभग सभी नगर निगम, नगर पालिका, और नगर पंचायतों में घमासान मचा हुआ है.

कहीं भाजपा आगे है तो कहीं कांग्रेस कहीं बराबर की टक्कर. अब पार्षदों की खरीदी बिक्री का खेल शुरू हो गया है .कांग्रेस के मंत्री, दावा कर रहे हैं की सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं में हम कांग्रेस के महापौर बैठायेगे. दरअसल यह सीधे-सीधे सत्ता की धमक और खनक का ही परिणाम होगा की कांग्रेसी पत्ते महापौर बनेंगे.

संवैधानिक संस्थाओं से छेड़छाड़

भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बड़ी ही शान से बने थे छत्तीसगढ़ में 67 सीटों पर ऐतिहासिक बहुमत मिला जिसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी .भाजपा, जोगी कांग्रेस के हाथों के तोते उड़ गए. ऐसे में भूपेश बघेल चाहते तो प्रदेश के साथ देश की राजनीति में एक नजीर बन कर उभर सकते थे .राजनीति में सत्ता ही सब कुछ नहीं होती आपकी छवि आम जनमानस में कैसे बन रही है यह महत्वपूर्ण होता है .आज भी लोग अर्जुन सिंह, अजीत जोगी के कार्यकाल को याद करते हैं क्योंकि उन्होंने आम जनता के हित में संवेदनशील कदम उठाए थे .मगर छत्तीसगढ़ में एक वर्ष में बदलापुर की राजनीति और जीत के जश्न मनाए जाते रहे हैं. आम जनता जिनमें किसान, मजदूर, श्रमिक शामिल है मानौ ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं . किसानों को चक्का जाम करना पड़ रहा है मगर भूपेश बघेल कानों में रूई डालकर भव्य आयोजनों में शिरकत कर रहे हैं.

यह है जमीनी हकीकत

रायपुर नगर निगम जहां कांग्रेस के प्रमोद दुबे महापौर थे इस चुनाव में 70 में 34 पार्षद चुनकर आए हैं दो पार्षदों को कांग्रेस अपने पक्ष में करने एड़ी चोटी का जोर लगा रही है .राजधानी रायपुर के बाद न्यायधानी बिलासपुर में 70 पार्षदों में 35 कांग्रेस के पास आ चुके हैं बहुमत के लिए एक पार्षद को तोड़ा जा चुका है . उर्जा नगरी कोरबा में भाजपा को बढ़त मिली है उसके 32 पार्षद विजई हुए हैं मगर 26 सीटों वाली कांग्रेस सारी नैतिकता ताक पर रखकर पार्षदों को खरीदने प्रभावित करने में लगी हुई है .रायगढ़ में 48 पार्षदों में कांग्रेस के पास 24 पार्षद हैं. इस तरह कांग्रेस हर नगरीय क्षेत्र में अपनी सत्ता बनाने सारे हथकंडे अपना रही है जिसकी नाराजगी राजनीतिक क्षेत्र के साथ आम आवाम में भी देखी जा रही है.

झारखंड में क्यों नहीं जीत पाई भाजपा ये 26 आदिवासी सीटें? कहीं ये इन बिलों की वजह तो नहीं

साल 2019 भाजपा के लिए ज्यादा अच्छा नहीं रहा. दो बड़े प्रदेशों से सत्ता का छिनना बीजेपी को रास नहीं आ रहा. लेकिन इन हारों के पीछे भाजपा की कुछ कमियां जरुर थीं. महाराष्ट्र में जनता ने बहुमत दिया लेकिन 30 साल का रिश्ता मुख्यमंत्री पद के लिए तोड़ दिया गया. शायद ये जो गठबंधन टूटा था उसमें कहीं न कहीं शिवसेना को समझ आ गया था कि महाराष्ट्र की राजनीति से उनका पत्ता साफ होता जा रहा है. खैर, सबसे ज्यादा चिंतनीय बात तो ये है कि झारखंड का सीएम भी अपनी सीट नहीं बचा सके. उनको सरयू राय ने हरा दिया. सरयू राय भी बीजेपी के बागी नेता थे और रघुबर दास की नीतियों से खफा थे.

अगर मुख्यमंत्री रहते हुए रघुवर दास कुछ विवादित विधेयक विधानमंडल से पास न कराते तो विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति अच्छी हो सकती थी. ये दो विधेयक छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी) में संशोधन से जुड़े थे. इन दोनों विधेयकों का जिन 28 विधानसभा क्षेत्रों की आदिवासी जनता पर असर पड़ना था, वहां की 26 सीटों पर भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है. भाजपा सिर्फ खूंटी और तोरपा ही जीत पाई। राज्य में भाजपा से आदिवासियों की नाराजगी के पीछे यही दोनों विधेयक जिम्मेदार माने जा रहे हैं.

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दरअसल, रघुवर सरकार ने विपक्ष के वॉकआउट के बीच छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम(एसपीटी) में संशोधन के लिए बिल पास कराए थे. भूमि अधिग्रहण कानूनों में भी रघुवर सरकार ने संशोधन की कोशिशें की थी. ये कानून कभी आदिवासियों की जमीनों से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए बने थे.

सरकार की ओर से इन कानूनों में संशोधन से आदिवासियों को अपने अधिकारों का हनन होता दिखा. विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाते हुए काफी विरोध किया. बाद में गृह मंत्रालय की आपत्तियों के बाद राष्ट्रपति ने भी हस्ताक्षर करने से इन्कार करते हुए विधेयक को लौटा दिया था. इस घटना के बाद आदिवासियों को लगने लगा कि राज्य की रघुवर सरकार उनके अधिकारों के विपरीत काम कर रही है.

सूत्रों का कहना है कि आदिवासियों की नाराजगी के कारण उत्तरी और दक्षिणी छोटा नागपुर और संथाल प्रमंडल में उनके लिए आरक्षित कुल 28 सीटों के चुनाव में भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा. इन 28 में से भाजपा को 26 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा.

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‘अबकी बार 65 पार’ का हुआ सूपड़ा साफ, झारखंड में सोरेन सरकार

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा पसंद नहीं आया और मतदाताओं ने इस नारे को नकार दिया. झारखंड के मतदाताओं ने ‘अबकी बार सोरेन सरकार’ नारे को अपना लिया है. अभी तक के रुझानों से साफ है कि कांग्रेस, राजद और झामुमो गठबंधन के मुख्यमंत्री प्रत्याशी हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य की अगली सरकार बनेगी.

भाजपा 30 से कम सीटों पर सिमटती दिख रही है. जबकि झामुमो गठबंधन 41 सीटों के बहुमत के आंकड़े को पार कर रही है. गौरतलब है कि भाजपा इस चुनाव में अकेले मैदान में उतरी थी. ऐसे में उसके साथ कोई सहयोगी भी नहीं है, जो किसी तरह उसकी नैया पार लगा सके. भाजपा के लिए सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास स्वयं जमशेदपुर पूर्व सीट से चुनाव हार गए और उनके प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय सरयू राय ने जीत दर्ज की.

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दूसरी ओर, झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने हेमंत सोरेन को चुनाव पूर्व ही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया था, जिसका लाभ भी गठबंधन को हुआ है. भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने यहां जोरदार चुनाव प्रचार किया था. जबकि गठबंधन की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी हेमंत सोरेन के साथ साझा रैलियों को संबोधित किया था.

भाजपा की इस स्थिति के संबंध में जब मुख्यमंत्री रघुवर दास से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जनादेश का सम्मान है. उन्होंने ’65 पार’ के नकारने के संबध में पूछे जाने पर कहा कि लक्ष्य कभी भी बड़ा रखना चाहिए, और उसी के अनुरूप लक्ष्य बड़ा रखा गया था. झामुमो के प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा ने यह नारा झामुमो गठबंधन के लिए दिया था.

पिछले चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन तब सरकार बनाने के करीब थी और उसके साथ सहयोगी भी थे. 2014 में भाजपा ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की थी। चुनाव के बाद झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के छह विधायक भी उसके साथ आ गए थे.

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क्या क्षेत्रीय दल के वापसी का समय आ गया है !

2014 के चुनाव के बाद कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए , तो 2018 तक क्षेत्रीय पार्टी के नेताओं को कुछ कमाल नहीं देखा पाए , लेकिन बीते कुछ महीनों के चुनावी नतीजों में इनको शक्ति एक बार फिर उभरने लगी है .

2017 के दिसम्बर में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा का शासन कई राज्यों के सत्ता में भी था . भारत के एक वृहद भूभाग पर था , वहीं 2019 के अंत आते आते वह सिमट कर आधे पर आ गया.

इसमें भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी कांग्रेस ने अपने क्षेत्रीय चेहरों के मदद से कई राज्यों में सत्ता में वापसी का रास्ता तय किया, तो दूसरे तरफ कई अन्य राज्यों के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कई राजनीतिक पार्टी से समझौता कर सत्ता तक पहुंचने का रास्ता साफ किया.

सत्ता में वापसी करें वाले इन क्षत्रपों में हरियाणा के जेजेपी के दुष्यत चौटाला , आंध्र प्रदेश के वी एस आर के जगन मोहन रेड्डी , महाराष्ट्र के शिवसेना के ठाकरे एवम् एन सी पी के पावर फैमली , झारखंड में जे.एम.एम के हेमंत सोरेन हैं.

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हरियाणा में तो भाजपा ने चुनाव परिणामों के बाद जे.जे.पी से गठबंधन के सत्ता को अपने पास ही बरकरार रखने में कामयाबी पाई , जबकि महाराष्ट्र में अपने ही पूर्व सहयोगी दल शिवसेना से टकराव कर सत्ता से बाहर हो गई.

झारखंड में पार्टी का किसी से गठबंधन नहीं हुआ . पार्टी आत्मविश्वास से चुनाव में उत्तरी, लेकिन परिणाम सीटों के नहीं बदल पाया. वोट प्रतिशत में तो बढ़ोतरी हुई लेकिन सीटों के संख्या ने उम्मीद से अधिक गिरावट देखने को मिला.

परिणास्वरूप भाजपा के हाथ से एक और राज्य सत्ता से निकल गया . इन सब के पीछे कहीं ना कहीं क्षेत्रीय दलों के आपसी समझदारी और किसी भी शर्त पर सत्ता में रहेंगी की जिद्द है.

अगर समय रहते अगर केंद्रीय सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भाजपा इन बातों पर गौर नहीं करती है, तो एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां सत्ता में होगी.

झारखंड का चुनावी नतीजे बिहार को भी प्रभावित करेंगे . जहां तक संभव है , आरजेडी जो इस झारखंड के जे.एम.एम के चुनावी गठबंधन में सहयोगी है, वहीं सरकार में भी भूमिका होगी . लंबे समय के बाद सरकार में आने के बाद आरजेडी के लिए यह जीत संजीवनी का काम करेंगी . वहीं इसकी भी पूरी संभावना है कि रिम्स में लालू के अच्छे दिन आ गए हैं . वह वहां अपना दरबार लगा पाएंगे. अगले साल बिहार में चुनाव है , इसका असर साफ तौर पर बिहार में देखने को मिलेगा.

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साथ ही इन इस पराजय के बाद भाजपा से बिहार चुनाव में अपने लिए अधिक सीटों को मांग कर अगर नीतीश कुमार अपने पार्टी के लिए करते है तो उसमें कोई नई बात नहीं होगी. आगामी छह महीनों में भाजपा को इन बातों पर ध्यान देना ही होगा नहीं तो बिहार विधानसभा चुनाव में भी परिणाम अनुकूल नहीं होगा.

शिव सेना का बड़ा कदम

हिंदुत्व को देश पर एक बार फिर से थोप कर पंडेपुजारियों को राजपाट देने की जो छिपी नीति अपनाई गई थी उस में शिव सेना एक बहुत बड़ी पैदल सेना थी जिस के कट जाने का भाजपा को बहुत नुकसान होगा और हो सकता है कि महाराष्ट्र को बहुत फायदा हो.

कोई भी देश या समाज तब बनता है जब कामगार हाथों को फैसले करने का भी मौका मिले. पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान, कोरिया की सफलता का राज यही रहा है कि वहां गैराज से काम शुरू करने वाले एकड़ों में फैले कारखानों के मालिक बने थे. महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई देश के पैसे वालों की राजधानी है पर जो बदहाली वहां के कामगारों की है कि वे आज भी चालों, धारावी जैसी झोपड़पट्टियों में, पटरियों पर रहने को मजबूर हैं.

महाराष्ट्र और मुंबई का सारा पैसा कैसे कुछ हाथों में सिमट जाता है, यह चालाकी समझना आसान नहीं, पर इतना कहा जा सकता है कि शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन इस के लिए वर्षों से जिम्मेदार है, चाहे सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की. यह बात पार्टी के बिल्ले की नहीं पार्टियों की सोच की है.

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शिव सेना से उम्मीद की जाती है कि वह अब ऐसे फैसले लेगी जो आम कामगारों की मेहनत को झपटने वाले नहीं होंगे. जमीन से निकल कर आए, छोटी सी चाल में जिन्होंने जिंदगी काटी, सीधेसादे लोगों के बीच जो रहे, वे समझ सकते हैं कि उन पर कैसे ऊंचे लोग शासन करते हैं और कैसे चाहेअनचाहे वे उन्हीं के प्यादे बने रहने को मजबूर हो जाते हैं.

पिछड़ों की सरकारें उत्तर प्रदेश व बिहार में भी बनी थीं, पर उस का फायदा नहीं मिला, क्योंकि तब पिछड़ों की कम पढ़ीलिखी पीढ़ी को सत्ता मिली थी. अब उद्धव ठाकरे, उन के बेटे आदित्य ठाकरे, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले जैसों को उन बाहरी सहायकों की जरूरत नहीं जो जनमानस की तकलीफों को पिछले जन्मों के कर्मों का फल कह कर अनदेखा कर देते हैं. वे रगरग पहचानते होंगे, कम से कम उम्मीद तो यही है.

मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल आदि में भगवाई लहर मंदी हो गई है और महाराष्ट्र का झटका अब फिर मेहनती, गरीबों को पहला मुद्दा बनाएगा. ऐसा नहीं हुआ तो समझ लें कि देश को कभी भूख और बदहाली से आजादी नहीं मिलेगी.

शौचालय का सच

भारत सरकार ने बड़े जोरशोर से शौचालयों को ले कर मुहिम शुरू की थी, पर 5 साल हुए भी नहीं कि शौचालयों की जगह मंदिरों ने ले ली है. अब सरकार को मंदिरों की पड़ी है. कहीं राम मंदिर बन रहा है, कहीं सबरीमाला की इज्जत बचाई जा रही है. कहीं चारधाम को दोबारा बनाया जा रहा है, कहीं करतारपुर कौरिडोर का उद्घाटन हो रहा है.

भाजपा सरकार के आने से पहले 19 नवंबर को 2013 से संयुक्त राष्ट्र संघ ‘वर्ल्ड टौयलेट डे’ मनाने लगा है, जब नरेंद्र मोदी का अतापता भी न था. दुनियाभर में खुले में पाखाना फिरा जाता है, पर भारत इस में उसी तरह सब से आगे है जैसे मंदिरों, मठों में सब से आगे है. भारत की 60-70 करोड़ से ज्यादा आबादी खुले में पाखाना फिरने जाती है और कहने को लाखों शौचालय बन गए हैं, पर पानी की कमी की वजह से अब तो वे जानवरों को बांधने या भूसा भरने के काम में आ रहे हैं.

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शहरों के आसपास कहींकहीं चमकदार शौचालय बन गए हैं, पर अभी पिछले सप्ताह से दिल्ली के ही अमीर बाजारों कनाट प्लेस और अजमल खां रोड पर दीवारों पर पेशाब के ताजे निशान दिख रहे थे. ये दोनों इलाके भाजपा समर्थकों से भरे हैं. हर दुकानदार ने अपनी दुकान में एक छोटा मंदिर बना रखा है, हर सुबह बाकायदा एक पंडा पूजा करने आता है. हर थोड़े दिन के बाद लंगर भी लगता है. पर वर्ल्ड टौयलेट और्गेनाइजेशन बनी थी सिंगापुर में जहां के एक व्यापारी ने ही 2001 में इसे शुरू किया था. सिंगापुर दुनिया का सब से ज्यादा साफ शहर माना जाता है. वहां हर जने की आय दिल्ली के व्यापारियों की आय से भी 30 गुना ज्यादा है. वहां मंदिर न के बराबर हैं. हिंदू तमिलों के मंदिर जरूर दिखते हैं और उन के सामने बिखरी चप्पलें भी और जमीन पर तेल की चिक्कट भी.

सड़क पर पड़ा पाखाना कितना खतरनाक है, इस का अंदाजा इस बात से लगाइए कि 1 ग्राम पाखाने में 10 लाख कीटाणु होते हैं और जहां पाखाना खुले में फिरा जाता है, वहां बच्चे ज्यादा मरते हैं.

भारत सरकार ने खुले में शौच पर जीत पा लेने का ढोल पीट दिया है पर लंदन से निकलने वाली पत्रिका ‘इकौनोमिस्ट’ ने इस दावे को खोखला बताया है. अभी 2 माह पहले ही तो मध्य प्रदेश में 2 बच्चों की पिटाई घर के सामने पाखाना फिरने पर हुई है, वह भी भरी बस्ती में जहां पिछड़ी और दलित जातियों के लोग रहते हैं. मारने वाले का कहना था कि दलितों की हिम्मत कैसे हुई कि उन से ऊंचे पिछड़ों के घरों के सामने फिरने जाए. पिछड़ों की हालत भी ज्यादा बेहतर नहीं हुई है, क्योंकि लाखों बने शौचालयों में पानी ही नहीं है.

यह ढोल जो 2 अक्तूबर को पीटा गया था, यह तो 5,99,000 गांवों के खुद की घोषणा पर टिका था. अब जब शौचालय के मिले पैसे सरपंच ने डकार लिए हों तो वह कैसे कहेगा कि खुले में पाखाना हो रहा है.

जब तक गांवों में घरघर पानी नहीं पहुंचेगा, जब तक सीवर नहीं बनेंगे, खुले में पाखाना होगा ही. दिल्ली की ही 745 बस्तियों में अभी भी सीवर कनैक्शन नहीं है तो 5,99,000 गांवों में से कितनों में सीवर होगा?

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अंधविश्वास: भक्ति या हुड़दंग

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

11 नवंबर, 2019 को लखनऊ से तकरीबन 110 किलोमीटर दूर सीतापुर रोड पर सीतापुर जिले के हरगांव नामक कसबे में एक वाकिआ देखने को मिला. यह मौका था कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले ‘दीपदान महोत्सव’ का, जो वहां के सूर्य कुंड तीर्थ में दीप जला कर मनाया जाता है.

आसपास के गांवों से सैकड़ों की तादाद में लोग वहां पहुंचे हुए थे और दीपदान कर रहे थे. वहीं पर शिव के मंदिर के ही पास एक मंच भी बनाया गया था. यहां तक तो सब अच्छा लग रहा था, पर हद तो तब हो गई, जब 2-3 किशोर लड़के राधाकृष्ण के वेश में आए और एक लड़का मोर के पंख लगा कर आ गया. वह लड़का एक अलग अंदाज में अपने पंखों को फैला रहा था और सब लोग उस के साथ सैल्फी लेने के लिए टूट पड़ रहे थे.

राधाकृष्ण और मोर बने लड़के मंच पर पहुंच गए और नाचना शुरू कर दिया. जनता तो जैसे इसी के लिए इंतजार में ही थी. तमाम नौजवान उन के वीडियो बनाते रहे, क्योंकि लोगों को उस समय धर्म से मतलब न हो कर उन लड़कों के नाच में ज्यादा मजा आ रहा था. जनता खुश हो कर पैसे लुटा रही थी और इस का मजा वहां की आयोजक समिति के लोग, जो मंदिर के पंडे ही थे, उठा रहे थे, जबकि इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा इन लोक कलाकारों और नर्तकों को दिया जाना चाहिए था, पर ऐसा होता नहीं दिखा, पैसे पर तो हक पंडे-पुजारियों का ही होता दिख रहा था. नतीजतन, लोगों के लिए वह एक डांस पार्टी जैसा कार्यक्रम हो गया था.

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उन्हीं लोगों में एक लड़का शिव के रूप में भी वहां पर आया था. अपने रौद्र रूप के चलते वह भी लोगों के कौतूहल और सैल्फी का केंद्र नजर आ रहा था और उस ने भी नाचनागाना शुरू किया. लोगों ने आस्था के नाम पर पैसे भी चढ़ाए.

माइक पर बोलता आदमी इस डांस को झांकी बोल रहा था, पर इस नाच में कलाकारों का अच्छा मेकअप था, उन के कपड़े अच्छे थे, उन की अच्छी भाव-भंगिमा थी, पर धार्मिकता कहीं नहीं थी. शायद सारी जनता इसे बस इस मनोरंजन का साधन मान कर देख रही थी और जी भर कर पैसा लुटा रही थी.

इस दीपदान नामक महोत्सव में ही थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर मौत के कुएं में मोटरसाइकिल चलाने का खेल चल रहा था, जिस में एक लड़का अपनी जान की बाजी लगा कर अपनी रोजीरोटी जुटाने की कोशिश कर रहा था.

कितना फर्क था एक ही जगह के 2 कार्यक्रमों और उन के पैसे कमाने के तरीके में.

इसी तरह का नजारा कांवड़ यात्रा में देखने को मिलता है. कुछ समय पहले सच्चे कांवड़ श्रद्धालु चुपचाप कांवड़ ले कर चलते जाते थे, फिर धीरेधीरे वे अपने साथ डीजे वगैरह ले जाने लगे और फिर इस तरह की झांकियां आने लगीं. झांकी वाले ये लड़के पूरे रास्ते डांस करते हुए जाते हैं. इन में न कोई श्रद्धा होती है और न ही कोई भक्ति, बल्कि जो हरकतें कांवडि़ए करते हैं, वे नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं लगती हैं. पर धार्मिक लोगों को धर्म और आस्था से बढ़ कर तो इन लोगों के डांस में मजा आता है और जितना ज्यादा मजा, उतना ज्यादा चढ़ावा. जितना ज्यादा चढ़ावा आता है, अगले साल कांवडि़यों की तादाद में उतना इजाफा होता जाता है. आज की कांवड़ यात्रा भक्ति कम और हुड़दंग व दिखावा ज्यादा हो गई है.

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हुड़दंगी कांवडि़ए न ही ट्रैफिक की परवाह करते हैं, न ही किसी नियम और कायदेकानून की. कांवड़ के बहाने उन के अंदर जो हिंसा छिपी होती है, वह इस दौरान खूब बाहर आती है. हालांकि, इन में बड़ी उम्र के कुछ सुलझे हुए कांवडि़ए भी होते हैं, जो इन को काबू में करने की कोशिश करते हैं, पर वे नाकाम ही रहते हैं.

आम जनता को लूटने का यह दोतरफा तरीका है. एक तो उसे कामधाम से हटा कर धर्म में लगाया कि उस की आमदनी कम हो जाए. दूसरा यह कि उस की जेब में जो भी रुपएपैसे हैं, वे नाचगाने, सैरसपाटे, चाटपकौड़ी और भगवान की भक्ति के नाम पर लूट लेना. इस माहौल में गरीबी कैसे  दूर होगी और नगर पार्षद व पंच से ले कर प्रधानमंत्री व अदालतें तक इसी का गुणगान कर रही हैं.

क्या नागरिकता संशोधन कानून को लागू करने से बच सकती हैं गैर भाजपाई सरकारें ?

असम में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया है. यहां कई इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा है. कर्फ्यू के बाद भी प्रदर्शकारी सड़कों पर आए. असम से उठे विरोध प्रदर्शन की आग बंगाल तक पहुंच गई. बंगाल में शनिवार को पांच रेलगाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया. कई जगहों पर आगजनी की गई. दिल्ली में भी जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों और पुलिस को बीच हिंसक झड़पें भी हुईं.

केंद्र सरकार ने इस कानून को रुप तो दे दिया लेकिन एक प्रश्न सबके दिमाग में आ रहा है. वो ये हैं कि क्या गैर भाजपाई सरकारें इस बिल को अपने प्रदेश में लागू करेंगी या नहीं. क्योंकि पं बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, मध्य प्रदेश में सीएम कमलनाथ, पंजाब की कैप्टन की सरकार सभी ने इसको लागू करने से मना कर दिया है लेकिन गृह मंत्रालय के अधिकारी ने इसका राज बताया है. उनका दावा है कि राज्य सरकारों को इसे लागू करना पड़ेगा.

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गृह मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी बताया कि क्योंकि इसे संविधान की 7वीं अनुसूचि के तहत सूचिबद्ध किया गया है, इसलिए राज्य सरकारों के पास इसे अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है.गृह मंत्रालय के अधिकारी ने यह बयान उस समय दिया, जब पश्चिम बंगाल, पंजाब, केरल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ने इस कानून को असंवैधानिक बताया और अपने राज्यों में इसे लागू नहीं करने की बात कही. गृह मंत्रालय के अधिकारी ने बताया, ‘केंद्रीय कानूनों की सूची में आने वाले किसी भी कानून को लागू करने से राज्य सरकार इनकार नहीं कर सकती हैं.’ उन्होंने बताया कि यूनियन सूची के 7वें शेड्यूल के तहत 97 चीजें आती हैं, जैसे रक्षा, बाहरी मामले, रेलवे, नागरिकता आदि.

संशोधित विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद कानून बन चुका है लेकिन, इस पर देशव्यापी स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कई मुख्यमंत्रियों ने इसे असंवैधानिक बताया है. पंजाब के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अमरिंदर सिंह इस संबंध में अपने रुख को स्पष्ट करने वाले पहले व्यक्तियों में से हैं. उन्होंने गुरुवार को कहा कि उनकी सरकार राज्य में कानून को लागू नहीं होने देगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे मुखर आलोचकों में से एक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनर्जी ने यह स्पष्ट किया है कि वह अधिनियम को अपने राज्य में लागू नहीं होने देंगी. उन्होंने इससे पहले कहा था कि एनआरसी को पश्चिम बंगाल में अनुमति नहीं दी जाएगी.

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चुनावी रणनीतिकार व जद (यू) उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने शुक्रवार को लगातार तीसरे दिन ट्वीट कर नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने अपनी पार्टी के रुख के खिलाफ जाते हुए ट्वीट किया, “बहुमत से संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पास हो गया. न्यायपालिका के अलावा अब 16 गैर भाजपा मुख्यमंत्रियों पर भारत की आत्मा को बचाने की जिम्मेदारी है, क्योंकि ये ऐसे राज्य हैं, जहां इसे लागू करना है.”

उन्होंने आगे लिखा, “तीन मुख्यमंत्रियों (पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल) ने सीएबी और एनआरसी को नकार दिया है और अब दूसरे राज्यों को अपना रुख स्पष्ट करने का समय आ गया है.”

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