उत्तर प्रदेश : मांगा इलाज, मिली मौत

गोरखपुर में औक्सिजन की कमी से 2 दिन के अंदर 50 से भी ज्यादा बच्चों की मौत के मामले में सरकार खुद का बचाव कर रही है. दिल्ली में उपहार सिनेमा कांड में घटना के तत्काल बाद सिनेमाघर के मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया था. कोलकाता के निजी अस्पताल में आग लगने की वजह से हुई मौतों के मामले में अस्पताल के मालिकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था और उन्हें महीनों जेल में रखा गया. बड़ी घटनाओं को छोड़ दें, तो छोटी छोटी घटनाओं में रोज ही निजी अस्पतालों के खिलाफ मुकदमे दर्ज होते रहते हैं.

गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में हुई मौतों के बाद वहां औक्सिजन सप्लाई करने करने वाली फर्म पुष्पा सेल्स की भूमिका की जांच कर सरकार उस के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात कह रही है.

जिस तरह से किसी भी हादसे के मामले में निजी अस्पताल के संचालक पर मुकदमा दर्ज होता है, उसी तरह से सरकारी अस्पताल में होने वाली मौतों पर सरकार के मुखिया प्रदेश के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री पर भी मुकदमा दर्ज होना चाहिए और उन्हें गिरफ्तार करा जाना चाहिए. तभी सरकारी अस्पतालों में होने वाली ऐसी मौतों का सिलसिला रुक सकेगा.

गोरखपुर की घटना के कुछ दिन पहले ही लखनऊ के मैडिकल कालेज में आग लग गई थी. वहां भी सरकार के मुखिया ने जिम्मेदारी नहीं ली.

गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ घटना से पहले कई बार दौरा कर चुके थे.

9 अगस्त में भी वे अस्पताल आए थे और इंसेफेलाइटिस वार्ड में भी गए थे. इस के बाद भी उन को अंदाजा नहीं लग सका कि हालात किस हद तक खराब हैं.

जिस दौरान मुख्यमंत्री ने वहां का दौरा किया था, उस समय औक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी का पैसा आ चुका था, पर उस को दिया नहीं गया था.

मैडिकल कालेज को पुष्पा सेल्स का 68 लाख, 65 हजार रुपए का भुगतान करना था. मैडिकल कालेज के खाते में एक करोड़, 86 लाख रुपए थे. इस के बाद भी भुगतान नहीं किया गया. यह भुगतान कमीशनबाजी को ले कर रोका गया था.

घटना के बाद अस्पताल के प्रिंसिपल डाक्टर राजीव कुमार मिश्रा ने अपना इस्तीफा देते हुए खुद पर जिम्मेदारी ली और कहा कि शासन ने 2 अगस्त को पैसा खाते में भेज दिया था. 9 अगस्त को मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक की तैयारी में बिजी होने के चलते भुगतान नहीं हो सका. 11 अगस्त को पैसा पुष्पा सेल्स के खाते में भेज दिया गया.

इस के बाद सरकार ने डाक्टर राजीव कुमार मिश्रा को निलंबित कर दिया. इंडियन मैडिकल एसोसिएशन ने गोरखपुर मैडिकल कालेज के प्रिंसिपल डाक्टर राजीव कुमार मिश्रा के निलंबन का विरोध किया.

दरअसल, यह सभी जानते हैं कि औक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी का पैसा दबाव में ही रोका गया था. जानकार कहते हैं कि राजधानी लखनऊ में बैठे लोगों के दबाव में यह काम किया गया था.

अस्पताल के प्रिंसिपल डाक्टर राजीव कुमार मिश्रा के बस में नहीं था कि वे भुगतान को रोक पाते. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अपना क्षेत्र है.

इस से यह आरोप पुख्ता होता है कि कमीशनखोरी में सरकार या शासन का कोई बड़ा नाम शामिल होगा, जिस के कहने पर ही भुगतान रोका गया था. लिहाजा, सरकार घटना को दबाने के लिए हर तरह की कोशिश में लग गई. इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी डाक्टर कफील खान को हटा दिया गया.

सरकार का समर्थन करने वालों की प्रोपेगैंडा टीम ने डाक्टर कफील खान को ले कर एक अलग मुहिम चला दी. हिंदू मुस्लिम मुद्दे को भी हवा दी गई. जिस प्रदेश में गाय के मरने पर हंगामा या तोड़फोड़ होने लगती है, वहां एकसाथ इतने बच्चों के मरने पर कोई हंगामा नहीं हुआ.

सरकार अपने बचाव में एक तरफ तो औक्सिजन की कमी न होने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ वह औक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी पर दोष मढ़ रही है. सरकारी रिपोर्ट घटना की वजह लिक्विड औक्सिजन में ब्रेक होना बता रही है.

सरकार अपने बचाव में पुराने आंकड़ों को भी पेश कर रही है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने बताया कि साल 2014, 2015 और 2016 के अगस्त महीने में हर रोज 17 से 18 बच्चों की मौत होती रही है. सरकार की इन दलीलों से साफ है कि उसे गरीबों के इलाज की कितनी चिंता है.

साफ दिखी बदहाली

गोरखपुर के बीआरडी कालेज की ही बात है. अनीता अपने बीमार बेटे रामू को लेकर अस्पताल गई थी. डाक्टरों ने बच्चे को भर्ती कर लिया. वह दर्द से बेहाल था. उस का शरीर ऐंठ रहा था.

अनीता पहली बार अस्पताल में आई थी. डाक्टर ने रामू को ड्रिप लगा दी और अनीता से कहा, ‘ध्यान रखना कि यह ड्रिप निकले नहीं.’

अनीता जब रामू का हाथ पकड़ती, तो उसे यह लगता कि कहीं ड्रिप उस के शरीर में चुभ न जाए. ऐसे में वह ठीक से उस के हाथ को पकड़ नहीं पा रही थी.

अनीता का पति दवा लेने बाहर चला गया था. इतने में बेटे रामू ने हाथ झटक दिया, जिस से ड्रिप उस के साथ से निकल गई. लिहाजा, बच्चे की देखभाल कर रही अनीता डाक्टर को बुलाने गई.

डाक्टर आया, तो पहले उस ने दर्द से तड़प रहे रामू को थप्पड़ जड़ दिए, इस के बाद अनीता को भी एक थप्पड़ लगा दिया.

अनीता कुछ बोल नहीं पाई. चुपचाप बच्चे को मार खाते देखती रही. डाक्टर ने ड्रिप दोबारा लगा दी.

डाक्टर का ऐसा बरताव केवल अनीता के साथ ही नहीं हुआ, बल्कि दूसरे कई मरीज भी इस तरह के बरताव के शिकार हो जाते हैं.

देवरिया जिले के भाटपरानी इलाके का रहने वाला 4 साला सुमित बीआरडी कालेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड में भरती था. 10 अगस्त की रात को जब एक के बाद एक बच्चे सांस न ले पाने के चलते मर रहे थे, तो मातापिता उस को अंबु बैग से औक्सिजन दे रहे थे.

13 अगस्त की सुबह सुमित की सांसें उखड़ने लगीं. 10 बजते बजते उस का शरीर ठंडा पड़ गया. उस के माता पिता इस बात का यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि जो बच्चा उस काली रात में बच गया था, वह अब नहीं रहा.

मौत के बाद मैडिकल कालेज वालों ने तुरंत बच्चे को ले जाने के लिए परिवार वालों को कह दिया.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस दिन बच्चों की मौत के बाद वहां जाने वाले थे. ऐसे में सुमित की लाश को ले कर उस के परिवार वालों को जल्द बाहर कर दिया गया.

जब वे लोग मुख्यमंत्री से मिलने की जिद करने लगे, तो पुलिस ने उन्हें जिप्सी में बिठा कर शहर से बाहर कर दिया.

अस्पताल वालों को इस बात का डर था कि मुख्यमंत्री से मिलने के बाद वे लोग कोई हंगामा खड़ा कर सकते हैं.

गोरखपुर के रहने वाले रमेश का

12 साल का बेटा इंसेफेलाइटिस वार्ड में भरती था. तबीयत खराब होने पर रमेश को अंबु बैग दिया गया, जिस के दबाने से औक्सिजन दी जा सकती है. वह बैग भी सही से काम नहीं कर रहा था. ऐसे में बच्चे की मौत हो गई.

अस्पताल के लोगों ने उस को सब से पहले बाहर कर दिया, जिस से वे किसी से अपनी बात ही न कह सकें.

न अच्छा इलाज…

सरकारी अस्पतालों में बीमार का हाल उस के परिवार वालों को ही देखना पड़ता है. ऐसे में जो मातापिता होशियार होते हैं, वे तो अपने बच्चे की देखभाल कर भी लेते हैं, पर जिन को बीमारी और इलाज का कुछ पता ही नहीं होता, वे परेशान होते हैं, डाक्टरों की डांट खाते हैं. कई बार डाक्टर या सहायक लोगों के साथ मारपीट भी देते हैं.

लखनऊ में मैडिकल कालेज के जच्चाबच्चा वार्ड में भरती औरतों की नर्सों द्वारा की गई पिटाई के मामले सामने आ चुके हैं. सब से बड़ी बात यह है कि सरकारी अस्पतालों में गरीब लोगों के साथ अच्छा बरताव नहीं किया जाता है.

कोलकाता से ले कर लखनऊ और गोरखपुर तक सरकारी अस्पतालों में घटी घटनाओं से पता चलता है कि गरीब अपनी बीमारी का इलाज कराने सरकारी अस्पताल जाते जरूर हैं, पर वहां उन्हें इलाज के बदले मौत ही मिलती है.

मौत केवल अस्पताल में आग लगने या औक्सिजन की कमी से ही नहीं होती. एकसाथ ढेर सारी मौतें होने से हल्ला मचता है, पर धीरेधीरे लीपापोती के बाद सब उसे भूल जाते हैं.

गोरखपुर के बीआरडी मैडिकल कालेज में 2 दिन के अंदर 50 से ज्यादा मौतें हुईं, तो एक बार फिर से सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत सामने आ गई.

दरअसल, सरकारी अस्पतालों में हालात बहुत खराब हैं. वहां मरीजों के मुकाबले डाक्टरों की तादाद बहुत कम है. ऐसे में मरीजों को सामान्य सुविधाओं से ले कर पोस्टमार्टम तक के सारे काम बड़े डाक्टरों की जगह पर वार्ड बौय और सफाई कर्मचारी जैसे लोग करते हैं.

ऐसे में वे बीमार लोगों के साथ अच्छा बरताव नहीं करते हैं. हां, आम जनता के साथ गलत बर्ताव करने वाले ये लोग वीआईपी नेताओं, अफसरों की देखभाल पूरी शिद्दत से करते हैं. केवल इन्हीं लोगों को ही नहीं, बल्कि इन की जान पहचान वालों को भी पूरी सुविधाएं मिलती हैं.

कमीशन का खेल

केवल बर्ताव में ही गरीब और वीआईपी मरीज का फर्क नहीं दिखता, बल्कि दवा देने में भी फर्क दिखता है. कई बार गरीब लोगों को दवा नहीं दी जाती, पर पहुंच वाले लोगों को उसी अस्पताल से महंगी से महंगी दवा भी दे दी जाती है.

गरीबों में बड़ी तादाद दलित और पिछड़ों की है. गोरखपुर हादसे में मरने वाले बच्चों में 80 फीसदी इसी तबके से आते हैं. ऐसे में यह साफ पता चलता है कि देश में सरकारी अस्पतालों का इंतजाम भले ही गरीब लोगों के लिए किया गया हो, पर यहां गरीबों की सुनने वाला कोई नहीं है.

गरीब लोगों को सरकारी अस्पतालों से दूर प्राइवेट अस्पतालों में ले जाने का काम भी होता है. ऐसे में कई डाक्टर और अस्पताल के कर्मचारी प्राइवेट अस्पतालों में कमीशन पर मरीज भेजने का काम करते हैं.

सरकारी अस्पतालों में अच्छा इलाज न होता देख लोग अपने मरीज को ले कर प्राइवेट अस्पताल चले जाते हैं, जहां डाक्टर महंगा इलाज करते हैं.

कई बार महंगे इलाज के बाद भी मरीज की मौत हो जाती है. ऐसे में इलाज के बकाया पैसों को ले कर झगड़ा अलग शुरू होता है.

कई डाक्टर सरकारी अस्पताल में कम और अपने प्राइवेट अस्पताल में ज्यादा मरीज देखते हैं. गोरखपुर कांड में यह बात भी खुल कर सामने आई है कि यहां के डाक्टर प्राइवेट क्लिनिक या अस्पताल भी चलाते हैं, जिस की वजह से वे यहां कम समय दे पाते हैं.

हावी होती अफसरशाही

पूरे देश की व्यवस्था पर अफसरशाही हावी हो रही है. अफसरशाह और बाबू मिल कर हर जगह अपना दखल बढ़ा रहे हैं.

पिछले कुछ सालों को देखें, तो स्वास्थ्य सेवाओं में बुरी तरह से कटौती की जा रही है. अफसर और बाबू नेताओं की चमचागीरी से अपना दखल हर जगह रखना चाहते हैं.

नेताओं के लिए भी सरकार चलाने का मतलब केवल जनता को भड़काना रह गया है. कभी जाति के नाम पर, तो कभी धर्म के नाम पर, तो कभी क्षेत्र के नाम पर वे वोट बैंक बनाने की कोशिश में रहते हैं.

पिछले कई सालों से सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की व्यवस्था में सेंधमारी की जा रही है, जिस से सरकारी स्कूल और अस्पताल दोनों ही बुरी हालत में पहुंच गए हैं.

नतीजन, निजी स्कूलों और निजी अस्पतालों की एक मजबूत व्यवस्था बन गई है. यह गरीब लोगों को बुरी तरह से फंसाने का काम कर रही है.

गोरखपुर कांड में बड़ी चालाकी से अस्पताल की अव्यवस्था को दरकिनार कर दूसरे मुद्दों को उठाया गया. भड़काऊ राजनीति ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है और अब इस का असर हर जगह दिखने लगा है.

स्कूलों में पढ़ने लिखने के लिए चाक डस्टर नहीं हैं. सरकारी अस्पतालों में औक्सिजन नहीं है. इन बुनियादी बातों पर किसी सरकार का ध्यान नहीं जाता है. हर घटना के बाद उस पर लीपा पोती का काम शुरू हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा, ‘इस तरह की घटनाएं पहले भी होती रही हैं.’

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ‘गोरखपुर में कोई घटना औक्सिजन की कमी से नहीं हुई.’

सरकार एक ओर तो यह कहती है कि औक्सिजन की कमी से कोई नहीं मरा, वहीं दूसरी ओर औक्सिजन सप्लाई करने वाली कंपनी को वह दोष दे रही है.

इस से साफ है कि सरकार के अफसर बेलगाम हैं. वे अपने फायदे के लिए काम कर रहे हैं. इसके लिए वे सरकार को गुमराह कर रहे हैं.

तलाक के बाद घर वापसी का मामला

राजस्थान का जैसलमेर जिला अपनी खास विशेषताएं रखता है. भारत वहां पोखरण इलाके में परमाणु बम का टैस्ट कर चुका है. जब जब देश पर संकट के बादल मंडराए, वहां के मुस्लिम एकजुट नजर आए और देशभक्ति दिखाई. वहां मुस्लिमों की तादाद लाखों में है. उनके अपने रिवाज हैं. शादियां अपने ही समाज में पैसे लेकर या दे कर की जाती हैं.

जिस शख्स के पास 4 बेटियां हैं, वह उन चारों की शादी जहां करता है, उन से लाखों रुपए लेता है. वहां बेटियों वाले लखपति माने जाते हैं.

ऐसे भी लोग हैं, जो बेटी का एक रुपया भी लड़के के पक्ष से नहीं लेते हैं. वैसे, इतने रुपए दे कर की गई शादियां कभी टूटती नहीं.

पुलिस के एक रिकौर्ड के मुताबिक, जैसलमेर में 17 जून तक तीन तलाक का एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ. यहां जो जीवनसाथी बन गया, वही ताउम्र मंजूर होता है.

ऐसे समाज में जब तीन तलाक का एक केस चर्चा में आया, तो जैसलमेर जिले में मानो भूचाल सा आ गया. लोग सकते में आ गए. वे कहने लगे कि यह सब टैलीविजन की देन है.

नगीना, जो गफूर भट्टा, जैसलमेर में अपने अब्बा के घर ससुराल जोधपुर से आई थी, को जुलाई, 2017 के दूसरे हफ्ते में पति अब्दुल ने फोन पर तीन तलाक कह दिया और पतिपत्नी का रिश्ता 3 सैकंड में तोड़ दिया.

नगीना की अम्मी सायरा पिछले एक साल से मायके बैठी नगीना और उस की फूल सी मासूम बेटी को देख देख कर अंदर ही अंदर घुल रही थीं. नगीना के अब्बा बीमार रहने लगे थे.

दरअसल, नगीना की शादी 4 साल पहले अब्दुल से हुई थी. कुछ दिन तक तो सबकुछ ठीक चलता रहा. हां, नगीना गाहेबगाहे मायके जाने की जिद करती थी. नहीं भेजने पर वह जबरदस्ती जैसलमेर चली जाती.

अब्दुल उसे वापस आने को कहता, तो नगीना कहती कि कुछ दिन बाद आऊंगी. ये छोटी छोटी बातें खटास पैदा करने लगीं.

एक बार मनमुटाव हुआ, तो वह बढ़ने लगा. दिलों की दूरियां भी बढ़ने लगीं.

इस बीच नगीना के पैर भारी हुए. उस ने एक मरी हुई बेटी को जन्म दिया. इस से न केवल नगीना को दुख हुआ, बल्कि ससुराल वालों की उस पर निगाहें टेढ़ी हो गईं. उन्हें बेटा चाहिए था वंश बेल बढ़ाने वाला. और कहां वह मरी हुई बच्ची पैदा कर बैठी.

इस के बाद नगीना को परेशान किया जाने लगा. वह अगर कुछ कहती, तो सास, जेठजेठानी, पति और एक पड़ोसन भी उसे मारने पीटने लगे.

ससुराल वालों का कहना था कि उन्हें बेटा चाहिए. अगर वह बेटा नहीं दे सकती, तो अपने मायके चली जा. वे लोग उसे नहीं रखेंगे.

किचकिच करते ससुराल वालों व पति से नगीना परेशान हो गई. बेटा पैदा करना उस के हाथ में नहीं था.

नगीना के दूसरी बार पैर भारी हुए. राजस्थान में  रिवाज है कि बेटी की पहली औलाद मायके में पैदा हो. इस वजह से नगीना मायके आ गई.

कुछ दिनों बाद नगीना को दर्द उठा, तो उसे जैसलमेर के सरकारी अस्पताल ले जाया गया. वहां पर डाक्टरों ने चैकअप कर नगीना को जोधपुर रैफर कर दिया.

3 सौ किलोमीटर दूर जोधपुर नगीना को ले जाना खतरे से खाली नहीं था. सो, जैसलमेर के एक प्राइवेट माहेश्वरी अस्पताल में भरती करा दिया गया. आपरेशन से नगीना को बेटी हुई.

इस बात की खबर नगीना की ससुराल पहुंची, तो वहां खुशी की जगह मातम पसर गया. उन लोगों को बेटा जो चाहिए था.

बस, ससुराल वालों ने नगीना से एक तरह से रिश्ता तोड़ दिया. उस को देखने कोई नहीं आया.

अस्पताल से छुट्टी मिलने पर नगीना अपनी बेटी के साथ मांबाप के घर आ कर रहने लगी. एक साल से वह जैसलमेर में ही रह रही थी.

नगीना ससुराल फोन करती, तो उसे गालियां दी जातीं और कहा जाता कि उस ने बेटी पैदा की है. इस वजह से उस के लिए ससुराल के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं.

नगीना पूछती है कि उस का क्या कुसूर है, तो जवाब में उस का पति अब्दुल कहता है कि तुम्हारा कुसूर है बेटी पैदा करना.

इस तरह समय बीतता गया और जुलाई, 2017 के दूसरे हफ्ते में नगीना को

उस के पति अब्दुल ने फोन पर ही ‘तलाक, तलाक, तलाक…’ कह कर रिश्ता खत्म कर दिया.

नगीना ने यह बात अपने अम्मी अब्बा को बताई, तो घर में कुहराम मच गया.

नगीना अपने परिवार वालों व रिश्तेदारों के साथ जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक गौरव यादव से मिली और फोन पर दिए गए तलाक व ससुराल वालों द्वारा सताए जाने का आरोप लगा कर इंसाफ की गुहार लगाई.

अफसरों ने नगीना को महिला थाना, जैसलमेर भेज दिया.

महिला थाने के थाना प्रभारी जेठाराम ने नगीना की अर्जी के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 398ए के तहत अब्दुल व उस के परिवार वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

नगीना और उस के अम्मीअब्बा हर रोज थाने के चक्कर लगाने लगे. यह खबर जब मीडिया में आई, तो मामला हाईलाइट हो गया.

नगीना और उस की अम्मी सायरा का आरोप था कि पुलिस उन्हें टरका रही है, कार्यवाही करने के लिए पैसे मांगे जा रहे हैं.

थाने में कोई कार्यवाही होते न देख नगीना महिला आयोग की जैसलमेर जिलाध्यक्ष सुधा पुरोहित से मिली व उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

सुधा पुरोहित नगीना को इंसाफ दिलाने के लिए खड़ी हो गईं. उन्होंने पुलिस अधीक्षक से मिल कर नगीना

के तलाक व ससुराल वालों द्वारा सताए जाने के केस में बातचीत की और उस का दोबारा घर बसाने की बात पर भी चर्चा की.

महिला थाना प्रभारी इंस्पैक्टर जेठाराम हरकत में आए और नगीना के पति से बात करने के साथ ही उस के परिवार वालों को भी समझाया. उन से कहा गया कि या तो वे लोग तलाकनामा वापस लें और उसे साथ रखें, वरना कानूनी कार्यवाही कर उन सभी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाएगा. थाना प्रभारी जेठाराम ने समझाया कि यह तलाक गैरकानूनी है. ससुराल वालों के साथसाथ अब्दुल भी समझ गया कि उन लोगों का काम गलत है और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ सकती है.

18 जुलाई, 2017 को नगीना ने महिला आयोग के सामने अपनी पीड़ा सुनाई. 19 जुलाई को महिला आयोग की टीम नगीना के घर पहुंची और उन से बातचीत कर उन के पास से मामले के समझौते के कागजात लिए.

उसी दिन महिला थाना प्रभारी जेठाराम ने नगीना के ससुराल वालों को जैसलमेर बुला लिया.

महिला थाना, जैसलमेर में हुई काउंसलिंग के दौरान दोनों पक्षों के लोगों ने एकदूसरे पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. नगीना ने अपने पति, जेठ और जेठानी समेत सास व एक पड़ोसन पर आरोप लगाए, वहीं उस की ससुराल वालों ने कहा कि नगीना बारबार अपने माता पिता के पास जाने की जिद करती है और वापस बुलाने पर भी ससुराल नहीं आती है.

दोनों पक्षों के बीच सुलह के दौरान गंभीर आरोप लगाने का सिलसिला चलता रहा, तो महिला आयोग की जैसलमेर जिलाध्यक्ष सुधा पुरोहित ने नगीना व उस के पति को अलग कमरे में ले जा कर समझाया. उस के बाद दोनों को आपस में सुलह करने की सलाह दी गई.

तकरीबन आधा घंटे तक दोनों में बातचीत हुई, पर जैसे ही वे बाहर निकले, नगीना ने फिर से आरोप लगाने शुरू कर दिए. ऐसे में उन्हें दोबारा अकेले में सभी गिलेशिकवे दूर करने की बात कही गई.

यह बात रंग लाई और दोनों पक्षों के बीच सुलह हो गई. लिखित में सभी समझौते हो गए. इस के बाद तीन तलाक रद्द हो गया और नगीना द्वारा दायर किया मुकदमा वापस ले लिया गया.

सुधा पुरोहित ने हाईकोर्ट की सीनियर वकील सुमन पोरवाल से गाइडलाइंस ले कर दोनों से आपसी सहमति लिखवाई, जिस में अब्दुल ने लिखा, ‘मैं ने गुस्से में तीन तलाक कह दिया था. मैं अपने शब्द वापस लेता हूं.’

इस के बाद नगीना की ओर से महिला थाने में दर्ज मुकदमा भी वापस ले लिया गया. इस तरह नगीना का घर दोबारा बस गया.

इस मामले से सीख लेनी चाहिए और थोड़ी सी कड़वाहट बढ़ने पर तीन तलाक देने से पहले सोचना चाहिए कि यह गलत है.

तीन तलाक के केस में जहां से मामला जुड़ा होता है, वहां का पुलिस प्रशासन व महिला आयोग सतर्क हों, तो नगीना की तरह दोबारा घर बस सकता है.

अब्दुल नगीना व अपनी मासूम बेटी को ले कर जोधपुर चला गया है. नगीना के माता पिता ने भी चैन की सांस ली है. अब सब खुश हैं.

जमघट बिच्छुओं का और देश का हाल

इस देश का हाल यह है कि एक गरीब की बुढ़ापे से पहले मौत का राज खोलने के लिए पैकिंग का जरा सा कागज हटाओ कि जहरीले बिच्छुओं का जमघट दिखाई दे जाएगा. हर गरीब की मौत चाहे आग लगने पर हो, सड़क दुर्घटना में हो, दंगे में हो, अस्पताल में हो, खुदकुशी से हो, मारपीट से हो, ढूंढ़ोंगे तो पता चलेगा कि वह उन जहरीले बिच्छुओं से मरा है, जो अमीर ऊंची पहुंच वाले लोगों के रहमोकरम पर पल रहे हैं.

गोरखपुर में औक्सिजन की कमी की वजह से 60 बच्चे मरे तो अखबारों की जांच से एकएक बिच्छू निकल रहा है. कभी पता चलता है कि औक्सिजन का ठेका तो 3 सौ मील दूर इलाहाबाद या लखनऊ की फर्मों को दिया गया था. कभी पता चलता है कि सप्लायरों को भुगतान महीनों नहीं किया जाता. कभी पता चल रहा है कि सिलैंडर में औक्सिजन ही कम आती है.

बिहार और उत्तर प्रदेश में आजादी के 70 साल बाद भी बाढ़ आने पर हर साल सैकड़ों जानें जाती हैं, लाखों भूखे तरसते हैं. सरकारें बाढ़ नहीं रोक सकतीं, तो पक्के 2-3 मंजिले मकान तो बनवा सकती हैं, पर सरकारों को तो बिच्छू पालने हैं, जो लोगों को जहर के डंक मारें. अब सरकार के बिच्छू और खूंख्वार हो गए हैं, क्योंकि अब एक पार्टी का राज पूरे देश में है.

यही बिच्छू किसानों को खा रहे हैं. जब अकाल पड़ता है, तो उन की जेब खाली. जब बारिश ज्यादा हो, तो फसल डूब जाती है. जब भरपूर फसल हो जाए, तो अनाज टका सेर मिलना शुरू हो जाता है. इस दौरान महाजन और बैंक का सूद बिच्छुओं के लिए जहर बनाता रहता है. कोई बिच्छुओं को मारे नहीं, सरकार इस के लिए कानून बनाती रहती है.

सरकार की हर फाइल में सैकड़ों बिच्छू पाले जाते हैं. सरकार के हर कानून से बिच्छुओं को पैदा करने की जमीन तैयार होती है. हर आदेश से बिच्छुओं को आम आदमी को जहर से डसने का हक दिया जाता है. बच्चे, बड़े, औरतें, जवान मरते हैं, पर सरकारें आराम से चलती हैं.

गोरखपुर के बाबा राघवदास अस्पताल का नाम कहने को चाहे किसी संतमहंत पर हो, पर संतोंमहंतों के यहां भी यही होता है. वहीं गरीबों, दलितों, मुसलमानों, औरतों के बारे में नियमकानून बनाए जाते हैं, ताकि वे बिच्छुओं के जहर से कमजोर और गरीब के गरीब रह जाएं. जो मर जाते हैं, उन पर दुख नहीं होता. उन की लाशों पर राजनीति की रोटियां सेंकी जाती हैं. मौत तो आतीजाती रहती है. शरीर नश्वर है. जो जल्दी मर गया, वह पिछले जन्मों के पापों के कारण मरा. बिच्छू तो भगवान की कृपा हैं.

बादशाहो : नई बोतल में पुरानी शराब

आपातकाल की पृष्ठभूमि में प्यार, धोखा, गुस्सा, नफरत, बदले की कहानी व एक्शन से भरपूर मिलन लूथरिया की फिल्म ‘‘बादशाहो’’ बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं डालती. सत्तर व अस्सी के दशक में इस तरह की कहानी पर तमाम मसाला फिल्में बन चुकी हैं. सिर्फ आपातकाल की पृष्ठभूमि बताने से कहानी असरदार नहीं बनती.

फिल्म ‘‘बादशाहो’’ की कहानी शुरू होती है 1973 में जयपुर की महारानी गीतांजली के महल में चल रही एक पार्टी से. इस पार्टी में शासक दल के बड़े नेता संजीव (प्रियांशु चटर्जी) भी मौजूद हैं, जो कि महारानी से नाराज होकर महल से बाहर निकलते हैं. दो साल बाद आपातकाल लगने पर संजीव सेना को आदेश देते हैं कि अब महाराज नहीं रहे, इसलिए जयपुर के राजमहल की तलाशी लेकर महारानी गीतांजली के पास मौजूद सारा सोना जब्त करके दिल्ली के सरकारी खजाने में जमा किया जाए.

सेना का अफसर सैन्य बल के साथ राजमहल पहुंचता है. उसे जो कुछ मिलता है, उसकी जानकारी वह संजीव को देता रहता है. सोना मिलने के बाद महारानी को जेल भेज दिया जाता है. जेल के बाहर महारानी को छुड़ाने के लिए हंगामा होता है. इसी हंगामे में बदमाश भवानी सिंह (अजय देवगन) गिरफ्तार होकर जेल के अंदर पहुंचते हैं, जहां महारानी गीतांजली उनसे अपना सोना सरकारी खजाने तक पहुंचने से पहले वापस लाकर देने के लिए कहती हैं. पता चलता है कि भवानी सिंह कभी राजमहल में ही रहा करता था. वह महाराजा का अतिविश्वासपात्र था. महाराजा की मौत के बाद महारानी ने उस पर विश्वास किया था. दोनों के बीच कुछ ज्यादा ही अच्छे संबंध रहे हैं. पर एक गांव के जलाए जाने पर भवानी सिंह को अहसास हुआ था कि महारानी ने अपने चेहरे पर कई मुखौटे ओढ़ रखे हैं. तब वह महल से दूर चला गया था. पर अब वह महारानी की मदद के लिए तैयार है.

महारानी की सेक्रटरी संजना (ईशा गुप्ता) भी भवानी सिंह के साथ हैं. इसके अलावा भवानी सिंह ने महारानी के सोने को सरकारी खजाने में पहुंचने से पहले ही लूट लेने के मकसद से अपने सहयोगी दलिया (इमरान हाशमी) तथा ताला खोलने में माहिर तिकला (संजय मिश्रा) को बुला लिया है.

सरकार ने जब्त सोने आर्मी ट्रक में भरकर दिल्ली लाने की जिम्मेदारी सैन्य अधिकारी व कमांडो सहर (विद्युत जामवाल) को दी है. यह ट्रक व सैन्य अधिकारी चलते हैं. रास्ते में भवानी सिंह अपने साथियों के साथ सभी को हराकर ट्रक पर कब्जा कर भागते हैं. रास्ते में एक पुलिस अफसर (शरद केलकर) उनका पीछा करता है. अंततः एक जंगल में जाकर भवानी सिंह व उसके साथी सारा सोना पिघलाकर उसे ऊंटो पर लादकर चल देते हैं. इधर पता चलता है कि कमांडो सहर तो महारानी गीतांजली से मिला हुआ है.

अंततः सारा सोना उस गांव में जाकर बंट जाता है, जिस गांव को जलाने का आदेश कभी महारानी गीतांजली ने दिया था. खैर, अब आर्मी कहां गयी, महारानी कहां गयी, कुछ स्पष्ट नहीं होता. पर एक खंडहर में भवानी सिंह व उसके साथी आपस में बातें करते हुए नजर आते हैं.

अस्वाभाविक दृश्यों से भरपूर तितर बितर व अति कमजोर  पटकथा से युक्त फिल्म ‘‘बादशाहो’’ में आकर्षण वाला कोई मामला नही है. किरदारों का चरित्र चित्रण भी गड़बड़ है. अति कमजोर कहानी व पटकथा वाली यह फिल्म बोर ही करती है. संजीव के किरदार को संजय गांधी जैसा लुक दिया गया जिसकी वजह महज फिल्म को आपातकाल की पृष्ठभूमि से जोड़ना रहा या कुछ और यह फिल्मकार ही बेहतर जानते होंगे.

फिल्म की लोकेशन अच्छी है. कैमरामैन ने कुछ अच्छे दृश्य कैमरे में कैद किए हैं. जहां गीत संगीत का सवाल है, तो फिल्म का एक गाना ‘‘मेरे रश्के  कमर..’ ही ठीक है. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अजय देवगन कुछ कमाल नहीं दिखा पाए. इमरान हाशमी निराश करते हैं. ईलियाना डिक्रूजा जरुर अच्छी लगी हैं. विद्युत जामवाल का अभिनय भी ठीक ही है. संजय मिश्रा के हिस्से कुछ संवाद अच्छे आ गए हैं और उनकी परफार्मेंस भी अच्छी है.

दो घंटे तीस मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण मिलन लूथरिया, भूषण कुमार व किशन कुमार ने किया है. फिल्म के लेखक रजत अरोड़ा, निर्देशक मिलन लूथरिया, संगीतकार तनिष्क बागची व अंकित तिवारी तथा कलाकार हैं-अजय देवगन, इमरान हाशमी, ईलियाना डिक्रूजा, शरद केलकर, संजय मिश्रा, ईशा गुप्ता व अन्य.

कमियों के बावजूद अच्छी फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’

पुरुषों की स्तंभन की कमजोरी की बीमारी के इर्दगिर्द बुनी गयी प्रेम कहानी  युक्त हास्य फिल्म ‘‘शुभ मंगल सावधान’’ में हास्य व नामदर्गी को एक साथ कहानी के ताने बाने में बुनने में लेखक असफल रहे. क्लायमेक्स तक पहुंचते पहुंचते फिल्म पूरी तरह से बिखरी हुई लगती है. जैसे ही दर्शक हास्य का लुत्फ उठाता है, पता चलता है कि फिल्म अपने मूल कथानक से भटक चुकी है. पर फिल्मकार ने मुदित के मुंह से मर्दानगी और मर्द की नई परिभाषा देते हुए कहलवाया है-‘‘मर्द वह होता है, जो न दर्द लेता है और न किसी को दर्द देने देता है.’’

फिल्म की कहानी दिल्ली में रह रहे मुदित शर्मा (आयुष्मान खुराना) और सुगंधा जोशी (भूमि पेडणेकर) के इर्द गिर्द घूमती है. दोनों के माता पिता उन पर शादी का दबाव डाल रहे हैं. पर दोनों शादी के लिए हां नहीं कह रहे हैं. मुदित और सुगंधा दोनों ही नौकरी करते हैं. अचानक दोनों की मुलाकातें हो जाती हैं. उनके बीच प्यार पनपता है. दोनों अपने प्यार का इजहार करते, उससे पहले ही अपनी मां के कहने पर मुदित, सुगंधा के परिवार वालों के पास आन लाइन शादी का प्रस्ताव भेज देता है. इस प्रस्ताव से सुगंधा भी खुश हो जाती है और सगाई की तारीख तय हो जाती है. अब सुगंधा इस अरेंज मैरिज को लव मैरिज में बदलने की बात सोच लेती है. वह मुदित से उसके आफिस में जाकर मिलती है.

मुलाकातें बढ़ती हैं. नाटकीय अंदाज में सुगंधा व मुदित की सगाई हो जाती है. फिर शादी दिल्ली की बजाय सुगंधा के चाचा के घर हरिद्वार में होनी है. सुगंधा के माता पिता हरिद्वार चले जाते हैं. इधर एक रात मुदित, सुगंधा के घर पहुंचता है. प्यार में आगे बढ़ते हुए शारीरिक संबंध बनाना चाहते हैं. पर मुदित को पुरुषों की बीमारी यानी कि स्तंभन की कमजोरी का अहसास होता है. अब सुगंधा, मुदित का हौसला बढ़ाना चाहती है. एक बार मुदित कह देता है कि वह शादी नहीं करेगा. पर सुगंधा कहती है कि यदि यही बात शादी के बाद पता चलती तो? हम शादी करेंगे.

मुदित अपने दोस्तों से इस मर्दाना बीमारी के बारे में बात कर हल खोजने का असफल प्रयास करता है. पर सुगंधा के दबाव में व अपने परिवार की इज्जत की खातिर मुदित बारात लेकर हरिद्वार पहुंचता है. जहां पता चलता है कि सुगंधा के पिता को पता चल चुका है कि मुदित नामर्द है. वह उसे लेकर एक डाक्टर के पास जाते हैं. डाक्टर मुदित को समझाते हैं कि यह उसकी अपनी दिमागी सोच है. एक बार तनाव के चलते ऐसा हो गया, उसके बाद वह डर उसके मन से नहीं निकला. फिर मुदित की बीमारी दूर हो जाती है. कुछ नाटकीय घटनाक्रम के बाद सुगंधा व मुदित शादी के बंधन में बंध जाते हैं.

पटकथा व एडीटिंग के स्तर पर फिल्म में काफी कमियां हैं. फिल्म के शुरू होने के दस मिनट बाद ही फिल्म भटक सी जाती है. इंटरवल के बाद तो फिल्म को जबरन खींचा गया है. फिल्म में जो परिवार दिखाए गए हैं, वह भी पूरी तरह से नकली यानी कि पूरी तरह से फिल्मी परिवार नजर आते हैं. लेखक के तौर पर हितेश कैवल्य निराश करते हैं. फिल्म का क्लायमेक्स तो बची खुची फिल्म को भी तहस नहस कर देता है. लेखक व निर्देशक मुदित व सुगंधा की शादी के सीन व फिल्म के समापन को लेकर दुविधा में नजर आते हैं. इसी के चलते लेखक ने पूर्व प्रेमिका, केले के पेड़ से शादी सहित कई दृश्य व चीजें बेवजह भर दी हैं. फिल्म में कंडोम का विज्ञापन करने वाला जिम्मी शेरगिल का सीन भी जबरन ठूंसा हुआ लगता है.

बतौर निर्देशक आर एस प्रसन्ना की हिंदी में यह पहली और उनके करियर की यह दसरी फिल्म है, पर उनके अंदर संभावनाएं नजर आती हैं. हरिद्वार में रहने वाले सुगंधा के चाचा को एक तरफ मध्यमवर्गीय परिवारों की संस्कृति का वाहक दिखाया गया है, जो कि छोटों द्वारा बड़ों के पैर न छूने पर नाराज होता है, वहीं बारात आने पर हर किसी, यहां तक कि होने वाले दामाद के गाल चूमते नजर आते हैं. यह अजीबोगरीब विरोधाभास है.

यू तो यह फिल्म 2013 में प्रदर्शित तमिल रोमांटिक फिल्म ‘‘कल्याण समयाल साधम’’ का हिंदी रीमेक है. मगर फिल्म के निर्माता आनंद एल राय के अनुसार तमिल फिल्म की आइडिया पर नए सिरे से लिखी गयी पटकथा पर बनी यह ताजी फिल्म है. ‘‘शुभ मंगल सावधान’’ देखकर इस बात का अहसास ही नहीं होता कि इस फिल्म का निर्माण उन्ही आनंद एल राय ने किया है, जो कि अतीत में ‘तनु वेड्स मनु, ‘रांझणा’ व ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ के अलावा सिर्फ निर्माता के रूप में ‘निल बटे सन्नाटा’ जैसी फिल्म दे चुके हैं. पर वह इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होने एक व्यावसायिक फिल्म में सेक्स, पुरुष स्तंभन कमजोरी जैसे मुद्दे को उठाया, जिस पर हमारे देश में लोग खुलकर बात करना पसंद नहीं करते. पर वह पुरुषों की इस बीमारी का नाम फिल्म में लेने से बचते हुए नजर आए हैं. शायद वह इसे पारिवारिक फिल्म से इतर नहीं बनने देना चाहते थे. इस फिल्म से युवा पीढ़ी के लड़के व लड़कियों के बीच पुरुषों की इस बीमारी को लेकर जागरुकता आ सकती है. पर यदि फिल्म के निर्माता ने लेखक के साथ बैठकर कुछ काम किया होता, तो शायद यह फिल्म ज्यादा बेहतर बन जाती.

फिल्म की खासियत इसकी लोकेशन है. फिल्म में एक भी लोकेशन ऐसी नहीं हैं, जो पहले दूसरी फिल्मों में नजर आयी हों. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो  आयुष्मान खुराना कमाल नहीं दिखा पाए. भूमि पेडणेकर ने भी अपने आपको दोहराया ही है. ब्रजेंद्र काला व सीमा पाहवा ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

फिल्म का गीत संगीत साधारण है. फिल्म का ‘कान्हा’ गीत जरुर प्रभावित करता है. एक घंटे 50 मिनट की अवधि की आनंद एल राय और कृषिका लुल्ला निर्मित फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ के निर्देशक आर एस प्रसन्ना, लेखक हितेश कैवल्य, संगीतकार तनिष्क वायु, कैमरामैन अनुज राकेश धवन तथा कलाकार हैं-आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, ब्रजेंद्र काला, सीमा पाहवा व अन्य.

आंखों का भेंगापन : समय से कराएं इलाज

बोलचाल की भाषा में भेंगापन को आंखों का तिरछापन भी कहते हैं. अगर इस का समय पर पता न चले और इलाज न कराया जाए, तो बाद में इस का पूरी तरह ठीक होना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.

लखनऊ के राजेंद्र अस्पताल के आंखों के जानेमाने डाक्टर सौरभ चंद्रा कहते हैं, ‘‘आंखों का भेंगापन या तिरछापन, जिस को अंगरेजी में सिक्विंट कहते हैं, ऐसी बीमारी है, जो किसी भी उम्र में आदमी और औरत को हो सकती है. अगर इस बीमारी का पता शुरू में ही चल जाए, तो इलाज आसान हो जाता है.’’

जब कभी आंख में चोट लगे या फिर एक समय पर एक चीज के 2 इमेज दिखाई दें, तो डाक्टर को एक बार आंख दिखा कर उस का चैकअप जरूर करा लेना चाहिए. छोटे बच्चों में इस बात का पता आसानी से नहीं लगता, इसलिए मातापिता को जागरूक रहने की जरूरत होती है.

जब भी बच्चा पढ़ने से जी चुराए या उस की आंखों में पानी आए और वह टैलीविजन देखते या पढ़ते समय आंख पर ज्यादा जोर देता हो, तो उसे डाक्टर के पास लाना चाहिए.

भेंगापन के लक्षण

डाक्टर सौरभ चंद्रा कहते हैं, ‘‘इस बीमारी में एक आंख से दूसरी आंख का तालमेल नहीं रहता है. इस के चलते एक आंख की देखने की दिशा और दूसरी आंख की देखने की दिशा में फर्क आ जाता है. इस बीमारी में दोनों आंखों के परदे पर एक ही समय में एक चीज का अलगअलग चित्र बन जाता है.

‘‘यह बीमारी 2 तरह की होती है. एक में सामने से देखने पर ही पता चल जाता है कि आंखों में भेंगापन है, जबकि  दूसरी में  सामने से  देखने में पता नहीं चलता है.’’

आंखों में होने वाले भेंगापन का पहला प्रकार पैरालिटिक कहलाता है.  इस बीमारी में आंखों को घुमाने वाली मांसपेशी या उस की नसों में लकवा मार जाता है. इस तरह का भेंगापन आंख में चोट लगने, ब्लडशुगर, हाई ब्लडप्रैशर होने के चलते हो सकता है. कभीकभी यह बीमारी दिमाग में होने वाली बीमारियों के चलते भी हो जाती है.

डाक्टर सौरभ चंद्रा कहते हैं, ‘‘दिमाग में ट्यूमर और दिमाग की झिल्ली में सूजन आ जाने के चलते भी ऐसा हो सकता है.

‘‘भेंगापन क्यों है? जब इस बात का पता चल जाता है, तो पहले उस वजह को दूर करना होता है. मिसाल के लिए, अगर भेंगापन की वजह ब्लडशुगर है, तो पहले उस का इलाज होगा, फिर भेंगापन का इलाज होगा. अगर समय पर इस का इलाज न हो, तो फिर भेंगापन लाइलाज हो जाता है.

‘‘दूसरी तरह का भेंगापन ऐसा होता है, जिस में चीज डबल नहीं दिखती है. इस बीमारी में नसों और आंखों की मांसपेशियों में कोई कमी नहीं होती है.  इस बीमारी में आंख से दिमाग और फिर दिमाग से मांसपेशियों को मिलने वाले सिगनल में कमी आ जाती है. इस के चलते भेंगापन हो जाता है.

‘‘इस तरह के भेंगापन में आमतौर पर आंखों का तिरछापन थोडे़ समय के लिए होता है. अगर इस का इलाज न कराया जाए, तो यह हमेशा के लिए भी हो सकता है. इस बीमारी की वजह आंखों की कमजोरी होती है. अगर चश्मा लगाने की जरूरत हो और चश्मा न लगाया जाए, तो यह बीमारी बढ़ सकती है. एक आंख के लैंस या एक आंख के परदे में कोई खराबी हो, तो भी यह बीमारी हो सकती है.

‘‘यह बीमारी ज्यादातर बढ़ती उम्र के बच्चों में यानी 5 साल से 8 साल की उम्र के बीच हो सकती है. इस का पता नहीं चलता, यही परेशानी की बात है, इसलिए मातापिता को जागरूक रहने की जरूरत होती है.

‘‘अगर बच्चे का पढ़ाई में मन न लगे या फिर वह आंखों पर जोर डाल कर काम करे, तो उस को ले कर डाक्टर के पास आना चाहिए.’’

डाक्टर सौरभ चंद्रा आगे कहते हैं, ‘‘इन 2 तरह के भेंगापन के अलावा एक तीसरी तरह का भेंगापन भी होता है और यह जन्मजात होता है. इस में आंखों की तंत्रिका में शुरू से ही खराबी होती है. इस का कुछ हद तक आपरेशन से इलाज हो सकता है, पर पूरी तरह से इस का ठीक होना आसान नहीं होता है. यह सामने से देखने में ही पता चल जाता है. ऐसे मरीज को जल्दी से जल्दी इलाज के लिए लाना चाहिए.’’

भेंगापन का इलाज

डाक्टर सौरभ चंद्रा कहते हैं कि भेंगापन का इलाज करते समय पहले आंख को अच्छी तरह चैक किया जाता है. अगर आंखों को चश्मे की जरूरत होती है, तो चश्मा लगा कर ही इलाज किया जाता है. अगर चश्मा लगाने से इलाज नहीं होने वाला होता है, तो घर में की जाने वाली कसरतें मरीज को बताई जाती हैं और उन से इलाज किया जाता है. इस के बाद भी अगर कुछ परेशानी महसूस होती है, तो मरीज को अस्पताल में बुला कर मशीन द्वारा आंखों की कसरत कराई जाती है.

इस के बाद भी अगर जरूरत होती है, तो ही आपरेशन किया जाता है.  आपरेशन के बाद आंखों की मांसपेशियों को इस तरह बना दिया जाता है, जिस से उन के बीच तालमेल बन सके.

किस मरीज का कैसा इलाज करना है, यह उस की परेशानी को देखने के बाद ही पता चल सकता है. भेंगापन का इलाज समय रहते कराया जाए, तो नतीजा अच्छा रहता है. बच्चों में जिस तरह का भेंगापन होता है, उस में अगर कम उम्र में ही उस का इलाज न हो, तो मुश्किल हो जाती है, इसलिए 3 साल से 4 साल की उम्र के बीच बच्चों का चैकअप जरूर आंखों के माहिर डाक्टर से करा लेना चाहिए.

शिल्पा शिंदे : टीवी की दुनिया का डूबा सितारा

टीवी इंडस्ट्री फिल्मों से भी आगे निकल गई है. साल भर में भारत में जितनी फिल्में बनती हैं, उस से कहीं ज्यादा टीवी शो बनते हैं, जिन में रियल्टी शो भी शामिल हैं. टीआरपी के खेल के चलते ऐसे में गलाकाट प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है. हर निर्मातानिर्देशक चाहता है कि उस के शो की टीआरपी सब से ऊपर रहे. ऐसा हो नहीं पाता, यह अलग बात है.

अगर टीआरपी की बात करें तो इस के लिए सब से पहले कहानी का दमदार होना जरूरी है, दूसरे शो में काम करने वाले कलाकारों का अभिनय भी मायने रखता है. चूंकि एकएक शो को बनाने और चैनल पर लाने में करोड़ों रुपया लगता है, इसलिए यह काम छोटे निर्माताओं के वश में नहीं रहा, भले ही वह कितनी ही अच्छी कहानी और कलाकारों के साथ छोटे परदे पर आना चाहते हों.

टीवी इंडस्ट्री की इसी गलाकाट प्रतियोगिता के बीच ऐंड टीवी चैनल पर 2 मार्च, 2015 को एक शो शुरू हुआ था ‘भाबीजी घर पर हैं’. इस के निर्माता हैं संजय कोहली और बिनायफर कोहली. इस शो की खास बात यह है कि इस में 2-3 एपीसोड में कहानी बदल जाती है. हलकेफुलके हास्यव्यंग्य वाले इस शो की हर कहानी केवल 4 कैरेक्टरों के इर्दगिर्द घूमती है. मतलब यूसुफ शेख यानी विभूति नारायण मिश्रा, सौम्य टंडन यानी अनीता मिश्रा, रोहिताश गौड़ यानी मनमोहन तिवारी और शिल्पा शिंदे (अब शुभांगी अत्रे) यानी अंगूरी भाभी.

कुछ अलग फ्लेवर वाले इस शो ने जब शोहरत पाई, तब यह यूसुफ शेख, रोहिताश गौड़, सौम्या टंडन और शिल्पा शिंदे के ही कंधों पर ही टिका था. मासूम और बौड़म सी दिखने वाली अंगूरी (शिल्पा शिंदे) के चालढाल और खास डायलौग ‘सही पकड़े हैं’ ने इसे और ज्यादा रोचक और मशहूर बना दिया था. कहानी में तड़का लगाने का काम किया योगेश त्रिपाठी यानी दारोगा हप्पू सिंह और सानंद वर्मा यानी अनोखेलाल सक्सेना के किरदारों ने.

‘भाबीजी घर पर हैं’ के लोकप्रिय होने के कई कारण थे, जिन में मुख्य थे आंचलिक भाषा और कलाकारों के अच्छे अभिनय के साथसाथ हर दूसरेतीसरे दिन कहानी का बदल जाना. बहरहाल, इस शो की सफलता को देख कर कई चैनलों ने इसी तरह के शो लाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी शो कामयाब नहीं हो पाया. बहरहाल, लोगों ने ‘भाबीजी घर पर हैं’ को पसंद भी किया, सराहा भी.

जब इस शो की टीआरपी अच्छीभली ऊंचाई पर थी, तभी अचानक शो से शिल्पा शिंदे यानी अंगूरी भाभी गायब हो गईं. शो में बताया गया कि अंगूरी अपने मायके गई हुई हैं, कुछ एपीसोड बिना शिल्पा शिंदे के ही बनाए और प्रसारित किए गए. धीरेधीरे खबरें आईं कि फीस न बढ़ाए जाने की वजह से शिल्पा शिंदे शो छोड़ रही हैं.

शिल्पा और सीरियल के निर्माताओं के बीच कुछ बातों को ले कर मतभेद की भी बातें सुनने को मिलीं. जो भी रहा हो, इस से शो के दर्शकों को काफी बड़ा झटका लगा. महसूस किया गया कि बिना शिल्पा शिंदे के शो बंद हो जाएगा, क्योंकि इस स्तर की अंगूरी को ढूंढना आसान नहीं होगा.

दूसरी ओर निर्माताओं ने शिल्पा के इस तरह हट जाने से उन्हें कानूनी नोटिस थमा दिया, साथ ही फिल्म और टीवी कलाकारों की एसोसिएशन में भी शिल्पा की शिकायत की गई, क्योंकि शिल्पा ने एग्रीमेंट की शर्तों को पूरा नहीं किया था. शिल्पा शिंदे भी अपने हिसाब से जवाब दे रही थीं.

इधर यह सब चल रहा था और दूसरी ओर निर्माता शुभांगी अत्रे को शो में ले कर अंगूरी के कैरेक्टर के लिए तैयार कर रहे थे. बहरहाल, पूरी तरह तैयार हो कर अंगूरी के रूप में शुभांगी परदे पर आईं. उन के आने से शुरूशुरू में दर्शकों को अजीब लगा, लेकिन अपनी मेहनत के बूते पर जल्दी ही शुभांगी अत्रे अंगूरी के किरदार में ढल गईं.

एक साल बीततेबीतते दर्शकों ने शिल्पा शिंदे को भुला कर शुभांगी को पूरी तरह अंगूरी के रूप में स्वीकार कर लिया. दूसरी ओर सिनटा ने शिल्पा शिंदे पर सिनेमा और टेलीविजन इंडस्ट्री में काम करने पर पाबंदी लगा दी थी, जिस से उन्हें काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया.

शो छोड़ने के अब एक साल बाद शिल्पा शिंदे ने सीरियल के निर्माता संजय कोहली पर आरोप लगाते हुए पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है कि संजय ने उन का पैसा देना तो दूर, उन का सैक्सुअल हैरेसमेंट किया था. शिल्पा ने बताया कि शूटिंग के दौरान संजय कोहली कई बार उन के स्तन और कमर पर हाथ लगाते थे, जो उन्हें बहुत बुरा लगता था. जब वह इस सब का विरोध करती थीं तो वह सौरी बोल देते थे. इंडस्ट्री में चूंकि ऐसी बातें कौमन होती हैं, इसलिए वह इसे गंभीरता से नहीं लेती थीं.

शिल्पा के अनुसार, संजय उन्हें हौट और सैक्सी बताते थे. चूंकि उन्हें शो में काम करना था, इसलिए वह इस सब को इग्नोर कर देती थीं. लेकिन हद तो तब हो गई, जब संजय ने उन से सैक्स की डिमांड शुरू कर दी. इस का जिक्र उन्होंने शो के अपने सहकलाकारों से भी किया, लेकिन किसी ने भी उन का साथ नहीं दिया. वजह यह कि उन्हें शो में संजय के साथ काम करना था.

शिल्पा शिंदे के अनुसार, उन का संजय पर 3 महीने के काम का मेहनताना बाकी था, इसलिए वह शो छोड़ना नहीं चाहती थीं, लेकिन उन का इस तरह मानसिक उत्पीड़न किया गया कि उन्हें शो छोड़ कर घर बैठना पड़ा. सिनटा ने भी उन के काम करने पर पाबंदी लगा दी.

बहरहाल, शो के प्रोड्यूसर संजय कोहली और बिनायफर ने अब उन पर 12 करोड़ रुपए का दावा किया है, साथ ही उन्होंने शिल्पा के आरोपों को भी झूठ बताया है. बहरहाल, पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिल्पा ने सैक्सुअल हैरेसमेंट की शिकायत एक साल बाद क्यों की?

वैसे ग्लैमर की दुनिया में इस तरह की शिकायतें मिलती रहती हैं, क्योंकि कलाकार एग्रीमेंट के हिसाब से एक तरह से बंधक बन कर रह जाता है. समस्या यह है कि उसे काम करना होता है, इसलिए वह कहीं पर शिकायत भी नहीं कर सकता.

बहरहाल, अभी तक लोग इस मामले में पूरी तरह शिल्पा शिंदे को ही घमंडी मान कर दोषी समझ रहे थे. लेकिन अब जबकि एक और एक्ट्रैस समीक्षा ने शिल्पा शिंदे के पक्ष में खड़े हो कर संजय कोहली और बिनायफर कोहली के खिलाफ आवाज उठाई है तो शिल्पा के पक्ष में वजन नजर आने लगा है.

तमिल, तेलुगू और पंजाबी की कई फिल्मों में काम कर चुकी समीक्षा ने अपना टीवी डेब्यू बिनायफर के प्रोडक्शन हाउस के शो ‘जारा’ से किया था. उस शो में जारा का किरदार निभाने वाली समीक्षा बताती हैं कि संजय और बिनायफर के साथ अपना पहला टीवी शो करते समय उन के साथ बिलकुल वैसी ही परिस्थितियां आई थीं, जैसी शिल्पा शिंदे के सामने आईं. लेकिन मैं चाह कर भी तब कुछ नहीं कर सकी थी. अब जब मैं ने शिल्पा शिंदे का इंटरव्यू देखा तो मुझे लगा कि मुझे उन के पक्ष में खड़ा होना चाहिए. इस से उन्हें इंसाफ मिलने में मदद मिल सकती है, वरना ये प्रोड्यूसर एक के बाद एक एक्टर का शोषण करते रहेंगे.

समीक्षा के अनुसार, बिनायफर के सेट पर बहुत खराब माहौल होता है. ऐसे तो लोग फैक्ट्री के मजदूरों से भी काम नहीं कराते होंगे, जैसे बिनायफर के एडिट टू प्रोडक्शन के लोग एक्टर्स से काम कराते हैं. लोग सेट पर बहुत ही गंदी भाषा बोलते हैं. बिनायफर से शिकायत करो तो वह एक्टर्स को ही उलटा बोलने लगती हैं.

यहां तक कि वह 3-4 दिनों में ही हमारे क्लोजअप शूट कर लेती थीं और फिर 5-6 दिन के लिए घर बैठा देती थीं, ऊपर से कहती थीं कि समीक्षा डेट नहीं दे रही है. जबकि मैं घर बैठी अपने बुलावे का इंतजार करती रहती थी. कुछ कहो तो बिनायफर कहती थीं कि यहां तो ऐसा ही होता है. हम यहां सीरियल छापने आए हैं. हमें कोई क्वालिटी नहीं चाहिए, क्योंकि हमें टाइम पर एपीसोड देना होता है. ज्यादा एक्टिंग का कीड़ा काट रहा है तो जा कर आर्ट मूवी करो.

समीक्षा बताती हैं कि मैं ने वहां डेढ़ साल काम किया और बहुत मेंटल टौर्चर सहा. तब हमारे डायरेक्टर पवन साहू थे, जो बहुत गालीगलौज करते थे. लड़कियों के साथ भी गलत बिहैव करते थे और कहते थे कि हमारे बिहार में तो लड़कियों को जूती की तरह रखा जाता है, इसलिए यह सब हमारी आदत में शामिल है.

ऐसी बातें हमें बहुत बुरी लगती थीं. लगातार शूटिंग के चलते हमें रातरात भर जाग कर काम करना होता था, सो तक नहीं पाते थे, ऊपर से ऐसा माहौल. बिनायफर से शिकायत करो तो कहतीं, ‘टीवी में ऐसे ही काम होता है.’ जारा मेरा पहला टीवी शो था. पहले ही अनुभव ने मुझे इतना डरा दिया कि मैं ने टीवी के लिए ज्यादा काम नहीं किया.

बिनायफर के खिलाफ समीक्षा ने सिनटा में फीस न दिए जाने की भी शिकायत दर्ज कराई थी. समीक्षा के अनुसार, काम खत्म हो जाने के बाद बिनायफर ने उन की 5 महीने की फीस भी नहीं दी. वह सब के साथ ऐसा ही करती हैं और खुलेआम कहती हैं कि जितना मिल रहा है ले लो, वरना वह भी नहीं मिलेगा.

तमाम एक्टर्स ऐसे हैं, जो काम न मिलने के डर से चुप रह जाते हैं. कुछ बोलो तो इमेज खराब करने की धमकी दी जाती है. फिर भी मैं ने सिनटा में केस किया. जवाब में मुझ पर लीगल केस लगा दिया गया. मैं एक साल तक लड़ी, लेकिन लाइफ में आगे बढ़ने की चाह थी, इसलिए हार कर बैठ गई.

संजय कोहली की छेड़छाड़ और फ्लर्ट करने की बात समीक्षा ने भी कबूली. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा, ‘हम ऐसी इंडस्ट्री में हैं, जहां लोग फ्लर्ट करते हैं. कमेंट पास करना तो आम बात है. इस सब को हम तब तक अपने तरीके से हैंडल करते हैं, जब तक कोई जीना हराम न कर दे. मेरे लिए इस से भी बड़ा इश्यू था सैट का माहौल.’

प्रोड्यूसर और एक्टर्स के बीच विवाद होना आम बात है. इस में कई बार प्रोड्यूसर डायरेक्टर गलत होते हैं तो कभी एक्टर. ऐसे विवादों को निपटाने के लिए सिने एंड टेलीविजन आर्टिस्ट एसोसिएशन बनाई गई है. पिछले 2 सालों में सिनटा के पास 200 केस आए, जिन में ज्यादातर फीस न मिलने को ले कर थे.

स्टारप्लस के शो ‘दीया और बाती हम’ की संध्या यानी दीपिका सिंह को इस सीरियल की वजह से काफी पसंद किया गया था. लेकिन सीरियल खत्म होने के बाद निर्माता पर उन के 1.14 करोड़ रुपए रह गए. अपनी इस बकाया फीस के लिए उन्हें सिनटा के पास जाना पड़ा. दीपिका की तरह ही जी टीवी का शो ‘जमाई राजा’ जब खत्म होने को आया तो इस के एक्टर्स मौली, शाइनी, नीलू कोहली और संजय स्वराज को अपनी 5 महीने की फीस के लिए सिनटा की शरण में जाना पड़ा. सिनटा के हस्तक्षेप के बाद ही उन्हें उन की फीस मिली.

निर्माता और एक्टर्स के बीच जो साझा सहमतिपत्र साइन होता है, उस के हिसाब से शो टेलीकास्ट होने के 90 दिनों के बाद एक्टर्स को पेमेंट कर दिया जाना चाहिए. लेकिन तमाम प्रोड्यूसर्स इस नियम का पालन नहीं करते और थोड़ीबहुत रकम दे कर एक्टर से काम कराते रहते हैं. एक्टर्स को चूंकि काम न मिलने या प्रोड्यूसर द्वारा बदनाम करने का डर सताता रहता है, इसलिए चुप रहना उन की मजबूरी बन जाता है.

बहरहाल, शिल्पा शिंदे को उन के घमंड की वजह से ‘भाबीजी घर पर हैं’ शो से निकाला गया या उन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, जैसा समीक्षा के साथ हुआ था, कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन इस में कोई दोराय नहीं कि सफलतापूर्वक चल रहे शो को कोई एक्टर यूं ही नहीं छोड़ेगा. कहीं तो कुछ गड़बड़ रही होगी.

लेकिन यह सच है कि शुभांगी अत्रे ने भले ही अंगूरी के किरदार को सफलतापूर्वक निभा लिया हो, पर शिल्पा शिंदे के जाने के बाद इस शो की टीआरपी गिरी. वैसे भी इस शो में अब पहले वाली बात नहीं रही. दूसरी बात यह भी है कि इस विवाद में शिल्पा शिंदे का कैरियर तो एक तरह से खत्म ही हो गया.

महिलाओं से छेड़खानी और सर्वे की रिपोर्ट

महिलाओं के अधिकारों और बराबरी के लिए कार्य कर रही संस्था यूनाइटेड नेशंस वीमन ऐंड प्रोमुंडो ने मिस्र, मोरक्को, लेबनान और फिलिस्तीन में सर्वे कर पाया है कि मर्दों को विश्वास है कि औरतें छेड़खानियों का आनंद लेती हैं. छेड़खानियों में घूरना, ताड़ना, छूना, अंगों को मसलना, सैक्सी कमैंट मारना और बलात्कार तक शामिल हैं. सर्वे में मजेदार बात यह रही कि अशिक्षित और अर्धशिक्षित छेड़खानी कम करते हैं जबकि शिक्षित ज्यादा करते हैं.

पुरुषों को विश्वास है कि औरतें यदि अच्छा पहनती हैं या अच्छा शरीर रखती हैं तो इस का मतलब होता है कि पुरुष उन्हें सराहें और यदि जानपहचान न हो तो सीटियां बजा कर अपनी पसंद प्रदर्शित करें. पुरुषों का यह मानना है कि अगर औरतों को छेड़खानी से डर लगता तो वे इतनी सजधज कर क्यों रहतीं.

औरतों से छेड़खानी के पीछे जहां पुरुषों की कामुकता हो सकती है, वहीं उन की आर्थिक विफलता की खीझ भी है. वे किसी कमजोर पर जोर आजमाना चाहते हैं और जानते हैं कि औरतों को समाज ने नीचा दरजा दे रखा है. ऐसे में वे मानते हैं कि जब कुत्तों को लात मारी जा सकती है तो सड़क पर चलती लड़की को कम से कम छूते हुए तो निकला जा ही सकता है.

भारत के उत्तर प्रदेश में बड़ी धूमधाम से रोमियो स्क्वैड बनाए गए पर धार्मिक हवन की तरह ये स्क्वैड खबरों में आते तभी, जब जोड़ों को तंग करते हैं. लड़कियों को छेड़ने पर कभी कोई रोकटोक लग पाईर् हो, इस का कोई सुबूत नहीं है.

औरतों को एकतरफ घरों में बंद रखना और दूसरी ओर जो बाहर निकल आएं उन्हें छेड़ने के दोगलेपन की बीमारी भारत ही नहीं, सारे देशों में है. अमेरिका तक इस से आजाद नहीं है. अगर यूरोप की पौर्न इंडस्ट्री जम कर चल रही है तो इसीलिए कि उन फिल्मों में औरतों को गुलामों से भी बदतर दिखाया जाता है. उन्हें कष्ट सहने में आनंद लेती हुई फिल्माया

जाता है. यह विकृति गरीब, अमीर, उदार, कट्टर सभी देशों में है. कहीं भी अकेली लड़की को पकड़ कर गाड़ी में या कमरे में खींच लेना आम बात है.

जो लोग औरतों की इज्जत से खेलते हैं, वही उन की इज्जत की रक्षा के नाम पर उन्हें उपदेश देते हैं कि घर से बाहर न निकलो, ढंग से कपड़े पहनो, पराए मर्दों से बात न करो, यह कैसी नैतिकता है? वास्तव में, इस सर्वे ने कट्टरपंथी देशों के मर्दों की असली सोच की पोल तो खोली ही है, समाज के नियमों की बेतुकी वकालत का भंडाफोड़ भी कर दिया है.

धर्म परिवर्तन की घुट्टी और भक्तों का तांडव

धर्म की घुट्टी इतनी मजबूत होती है कि हत्या की धमकी भी भक्तों को डराती नहीं है. पिछले साल केरल में एक हिंदू युवक ने इसलाम धर्म अपना लिया था जिस पर नाराज हो कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थानीय नेताओं ने उस युवक के बहनोई के साथ उस की हत्या कर दी थी. इस से धर्म परिवर्तन करने वाले परिवार में खौफ तो पैदा हुआ पर मुसलमानों ने उस परिवार को संरक्षण दिया और अब उस परिवार के कई सदस्य मुसलिम बन चुके हैं.

धर्म परिवर्तन सदियों से इसी तरह चला आ रहा है. हिंदुओं में धर्म परिवर्तन नहीं होता पर फिर भी उन की संख्या बहुत अधिक है क्योंकि भारत में जन्मदर अधिक रही है. जाति के कहर के बावजूद नीची जातियों के हिंदू अपने कट्टरपन के कारण हिंदू बने रहे पर जो बहुत ही नाराज हो गए या जिन्हें नीची जातियों से भी किसी कारणवश बाहर कर दिया गया वे मुसलिम या ईसाई बनते चले गए. आमतौर पर सदियों से उन लोगों के धर्म परिवर्तन से हिंदुओं को फर्क नहीं पड़ा क्योंकि तब वोटतंत्र नहीं था.

अब चूंकि सत्ता वोटों के आधार पर मिलती है और वोट धर्म व जाति के आधार पर डलते हैं, धर्म परिवर्तन का अर्थ सत्ता में दखल देना हो गया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुरातन वर्णव्यवस्था में विश्वास रखता है जिस में कुछ जातियां येनकेन सत्ता में बनी रहती थीं. आज यही हो रहा है और इसीलिए धर्म परिवर्तन करने वालों को हिंसा का डर दिखाया जा रहा है. ऐसा केरल में ही नहीं, सारे देश में हो रहा है.

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हिंसा के बावजूद जिन्हें धर्म परिवर्तन करना होता है वे डरते नहीं हैं. ऐसा सदियों से हो रहा है. सुन्नी मुसलिम बहुमत में होने के बावजूद सभी शिया मुसलिमों को सुन्नी बनने पर मजबूर नहीं कर सके और जहां शियाओं का राज है वहां सुन्नियों ने अपना संप्रदाय नहीं बदला.

इसी तरह इसराईल से पूरे यूरोप तक में फैले यहूदियों ने सदियों ईसाई राजाओं के जुल्म तो सहे पर धर्म परिवर्तन यदाकदा ही किया.

हिंदुओं में आपसी जातियों में जाति परिवर्तन भी न के बराबर हुआ. अछूतों ने पैसा बना लिया और इज्जत भी पा ली लेकिन उन्होंने अपनी जाति की पहचान बनाए रखी है.

यही केरल में हुआ होगा. जब किसी बात पर नाराज हो कर कुछ हिंदू धर्म परिवर्तन कर मुसलिम बन गए तो वे अब न लौटने को तैयार हैं और न हिंसा के डर से अपने नजदीकियों का धर्म परिवर्तन कराने से हिचक रहे हैं.

यह दुख की बात है कि जब प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक विकास और सही सुखी जीवन का होना चाहिए, पूरा देश धार्मिक विवादों में डूबा हुआ है और धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा, कानूनों, नियमों के जरिए इन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है.

‘बिहार के लिए खतरनाक नीतीश कुमार की बीमारी’

राष्ट्रीय जनता दल की ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली में 6 घंटे तक 14 दलों के नेताओं ने नरेंद्र मोदी, भाजपा और नीतीश पर जम कर निशाना साधा. रैली से लालू यादव को कितना राजनीतिक फायदा मिलेगा, यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन रैली के बहाने लालू यादव ने अपनी ताकत दिखाने के साथ-साथ बड़ी ही चतुराई से भाजपा विरोध की राजनीतिक विरासत को अपने बेटों तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव के कंधे पर डाल दिया. रैली में आए लोग तेजस्वी और तेजप्रताप के भाषण पर जम कर हुंकार भरते नजर आए और भाजपा और नीतीश को सबक सीखाने के लिए आतुर दिखे. तेजस्वी रैली के ‘हीरो’ बन कर उभरे. रैली के जरिए लालू ने मंडल और कमंडल के अपने आजमाए जिन्न को एक बार फिर बोतल से निकालने की पुरजोर कोशिश की है. रैली की कामयाबी के बीच लालू का पूरा कुनबा सत्ता गंवाने और नीतीश-भाजपा के गठजोड़ के दर्द से कराहता भी रहा.

लालू ने कहा कि नीतीश कुमार का कोई उसूल ही नहीं है. वह पलटी मारने में माहिर हैं. भाजपा ने नीतीश को अपने सूंड में लपेट लिया है और अब नीतीश के दिन लद गए है. अब वह भरोसे के काबिल नहीं रहे. यह नीतीश की आखिरी पलटी है. तेजस्वी यादव के उभार से नीतीश को जलन हो रही थी इसलिए भाजपा से मिल गए. परिवार को झूठे मुकदमे में फंसा दिया, पर लालू कभी किसी से डरा नहीं है. 2020 के विधान सभा चुनाव में भाजपा और नीतीश को जनता सबक सीखाएगी.

अपने बच्चों पर अपनी सियासी विरासत खास कर भाजपा विरोध की राजनीति को सौंपने के अंदाज में उन्होंने कहा कि अब उनकी उमर हो गई है, अब बच्चों का समय आ गया है. सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स और अदालतों के जाल में फंसे होने के बाद भी लालू ने रैली के जरिए अपनी ताकत दिखा दी. उनके बेटे तेजस्वी और तेजप्रताप ने बड़े ही ठसक के साथ अपने पिता की राजनीतिक विरासत को उठाने के लिए हुंकार भरा. तेजप्रताप ने शंख फूंकने के बाद कहा कि अब उनका मकसद भाजपा को फूंकना है. उन्होंने मंच से कसम खाई कि जब तक भाजपा का खातमा नहीं कर देंगे, तब तक न सोएंगे और न ही सोने देंगे.

तेजस्वी ने लालू के 27 साल पुराने भाषण को दोहराते हुए कहा कि भाजपा हिंदू और मुसलमानों को लड़ाना चाहती है. सबसे बड़ी चीज इंसानियत होती है. जब इंसान ही नहीं रहेगा तो मंदिर की घंटियां कौन बजाएगा? इंसान ही नहीं रहेगा तो मस्जिद में इबादत कौन करेगा? ठीक यही बात लालू ने 21 अक्टूबर 1990 को पटना के गांधी मैदान में आयोजित सांप्रदायिकता विरोधी रैली में कही थी. सुबह 9 बजे से ही तेजस्वी के अब तक के भाषणों का औडियो-वीडियो टेप चलता रहा.

तेजस्वी ने नीतीश चाचा को जेल भिजवाने की ताल ठोंकते हुए कहा कि ठग और महाठग एक साथ मिल गए हैं और जनता को उल्लू बना रहे हैं. 2 हजार करोड़ के सृजन घोटाला के मसले पर नीतीश चाचा चुप्पी साधे हुए हैं.

लालू की रैली का असर बिहार समेत देश की राजनीति पर पड़ा है. गैरभाजपाई दलों को एकजुट होने का मंच और मौका दोनों ही लालू ने मुहैया करा दिया. अब लालू ने गेंद को मुलायम सिंह यादव, मायावती, शिबू सोरेन, अरविंद केजरीवल, वामदलों के पाले में डाल दिया है. अब इन नेताओं को सोचना-समझना है कि भाजपा विरोध की लड़ाई वह लालू के साथ मिलकर लड़ें, या फिर अपनी डफली अपना राग वाली नीति पर चलते रहें. अगर रैली के मंच पर मौजूद सभी दलों के नेताओं का मन मिलता है तो भाजपा के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है.

बिहार में सत्ता गंवाने के बाद हताश राजद को रैली ने नया उत्साह और हौसला दिया है. अगर गैर भाजपाई गठबंधन आकार लेता है तो उसमें राजद की अहम और बड़ी भूमिका होगी, क्योंकि सीट के हिसाब से वही सबसे  ताकतवर दल है. राजद कार्यकर्ताओं में जोश भरा है. इसके साथ ही राजद को नुकसान भी हो सकता है, बिहार और केंद्र सरकार का रवैया लालू और उनके परिवार के प्रति और सख्त हो सकता है. रैली में जुटी भीड़ और दलों को साल 2019 तक संभल कर रखना सबसे बड़ी मुश्किल है. रैली का सबसे बड़ा खतरा यह भी रहा कि वह लालू के परिवारवाद की छाया से बाहर नहीं निकल सकी. रैली पर परिवार ही हावी रहा. लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी, तेजप्रताप, मीसा भारती, समेत लालू के 3 दामाद रैली में मंच पर मौजूद रहे. कई बड़े नेताओं को बोलने का मौका ही नहीं दिया गया.

जदयू के बागी नेता मंच पर लालू से गलबहियां करते दिखे. शरद ने मोदी और नीतीश पर हमला करते हुए दावा किया कि असली जदयू उनके साथ है और नकली जदयू उनपर काररवाई करने की धमकी दे रहा है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि भाजपा को नोटबंदी उसी तरह ले डूबेगी, जैसे नसबंदी ने कांग्रेस को मिट्टी में मिलाया था.

राजद की रैली को सुपरफ्लौप करार देते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा कि रैली का मकसद लालू परिवार के भ्रष्टाचार पर परदा डालना था. राजनीति की खिसक रही जमीन को बचाने की नाकाम कोशिश की गई, जिसे जनता ने नकार दिया. रैली में भाड़े के लोग जुटाए गए और उन्हें बांध कर रखने के लिए गंदे गाने और डांस के साथ खाने का भरपूर इंतजाम किया गया था.

नीतीश की बीमारी बड़ी खतरनाक

लालू यादव ने मजाकिया लहजे में कहा कि नीतीश कुमार जब बीमार पड़े तो समझ लीजिए कोई खतरनाक साजिश में लगे हुए हैं. जब उनके घर छापा पड़ रहा था तो वह राजगीर में बीमारी का बहाना बना कर आराम फरमा रहे थे. उनसे बात नहीं हो पा रही थी, उनके लोगों ने कहा कि सेहतमंद होने के लिए पहाड़ का पानी पीने के लिए राजगीर गए हैं. जब भी कोई गंभीर बात होती है तो वह बीमारी का ड्रामा करके राजगीर में आराम फरमाने चले जाते हैं.

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