फोटोशूट के लिए बिना कपड़ों के पेड़ पर चढ़ी अभिनेत्री

हौलीवुड की फेमस एक्ट्रेस किम कर्दाशियन दुनिया भर में अपनी बोल्डनेस को लेकर चर्चा में रहती हैं. कई बार उनकी न्यूड फोटोज भी सोशल मीडिया पर धमाका मचा चुकी हैं. कभी उनका सेक्स टेप आ जाता है तो कभी वे इस तरह की तस्वीरें डाल देती हैं कि हंगामा हो जाता है. यही नहीं, अगर प्रेग्नेंट होती हैं तो अपने बेबी बंप के साथ वे तहलका मचा देती हैं. एक बार फिर से उन्होंने ऐसा कुछ किया है. इस बार उन्होने न्यूड फोटोशूट करवा लिया है, जिसकी वजह से लोगों ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया. कुछ लोगों ने उन्हें पोर्न स्टार बनने की सलाह दी तो कुछ ने उन्हें भद्दी गालियां भी दीं. इसी के साथ ही कुछ लोगों ने उनका मजाक भी बनाया.

आपको बता दें कि अब वे अपने ताजा फोटोशूट में न्यूड हैं और पेड़ पर चढ़ी हुई नजर आ रही हैं. उन्होंने इंस्टाग्राम  पर यह फोटो शेयर की है. यानी किम को पता है कि किस तरह हिट हुआ जाता है. किम तस्वीर में ब्लान्ड बालों में दिखाई दे रही हैं. यह फोटो ब्लैक एंड व्हाइट है और उन्होंने सिर्फ ब्लैक बूट्स पहन रखे हैं.

36 वर्षीया किम ने इंस्टाग्राम पर तस्वीर के साथ कैप्शन में लिखा , ‘जब आप इस प्रकार होते हैं कि आपके पास पहनने को कुछ नहीं है. उन्होने आगे कहा कि बहुत सम्मान की बात है कि मर्ट और मार्कस ने अपनी नई किताब के लिए मेरी फोटो खींची. इस किताब को तैयार करने में 20 साल लगे हैं. यह 7 सितंबर को न्यूयार्क में रिलीज हो रही है.

कुछ दिन पहले ही उनकी इस बात को लेकर आलोचना हुई थी कि वे फेमिनिज्म के नाम पर न्यूड सेल्फी शेयर करती हैं. हालांकि लोग चाहे जो मर्जी कहते रहें. लेकिन किम कर्दशियां ने इस बात की कभी परवाह नहीं की. वे हमेशा से अपनी बोल्डनेस और न्यूड पिक्चर्स की वजह से सुर्खियों में रही हैं.

बीवी की जुदाई में जान देते शौहर

मध्य प्रदेश में भोपाल के रातीबड़ इलाके का 24 साला राजू कुशवाहा प्राइवेट स्कूल में टीचर था. इसी साल फरवरी महीने में उस की शादी भोपाल के ही छोला मंदिर इलाके की रहने वाली आस्था नाम की लड़की से हुई थी. खूबसूरत और पढ़ीलिखी बीवी पा कर राजू बेहद खुश था और आस्था को भी खुश रखने की हरमुमकिन कोशिश करता था. राजू ने भी शादीशुदा जिंदगी के कई ख्वाब संजो रखे थे, लेकिन ये ख्वाब एक झटके में उस की मौत की वजह भी बन गए.

हुआ यों कि न मालूम किन वजहों के चलते आस्था शादी के कुछ दिन बाद ही मायके चली गई और वापस नहीं आई. राजू ने कई दफा बीवी की बेरुखी की वजह जानने की कोशिश की, पर उस ने कुछ नहीं बताया, तो वह परेशान हो उठा.

अप्रैल महीने की 10 तारीख को राजू घर वालों के कहने पर आस्था को लेने ससुराल पहुंचा, तो भी उस ने साथ जाने से इनकार कर दिया और वजह भी नहीं बताई.

दुखी राजू खाली हाथ घर लौट आया और बीवी के गम में जहर पी लिया. इतना ही नहीं, मरने का जुनून उस के सिर पर इस तरह सवार था कि जहर पीने के बाद उस ने अपने गले में फांसी का फंदा भी लगा लिया.

घर वालों को शक हुआ, तो उन्होंने राजू के कमरे का दरवाजा खटखटाया, पर मरा आदमी भला क्या दरवाजा खोलता, इसलिए घबराए घर वालों ने दरवाजा तोड़ा, तो देखा कि वह फांसी के फंदे पर झूल रहा था. अस्पताल में डाक्टरों ने उस की मौत पर अपनी मुहर लगा दी.

ये करते हैं बीवी से प्यार

 राजू जैसे शौहर कितने जज्बाती होते हैं, इस की एक और मिसाल 23 जून, 2017 को मध्य प्रदेश के ही सतना जिले से सामने आई थी, जब 40 साला भगवान सेन ने रेल से कट कर खुदकुशी कर ली थी.

भगवान सेन की तकलीफ यह थी कि कुछ महीने पहले ही उस की बीवी उसे छोड़ कर किसी दूसरे मर्द के साथ रहने लगी थी, जिस से दुखी हो कर उसे अपनी जिंदगी खत्म कर लेना ही बेहतर लगा.

7 जून, 2017 को फैजाबाद के बाबा बाजार के मवई थाना इलाके के गांव दीवाना मजरे भवानीपुर में एक दीवाने रामसूरत ने बीवी के मर जाने पर खुद भी खेत में आम के पेड़ पर फांसी लगा कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली.

गांव वालों के मुताबिक, रामसूरत अपनी बीवी को बहुत चाहता था और उस की मौत के बाद गुमसुम रहने लगा था. बच्चा जनने के दौरान हुई बीवी की मौत ने उसे भीतर तक हिला कर रख दिया था.

रामसूरत चाहता तो कुछ दिनों बाद दूसरी शादी कर सकता था, लेकिन बीवी की जगह जो दिल में बन गई थी, उसे किसी और के देने की बात शायद ही उस ने सोची होगी, इसलिए फांसी लगा कर अपना दुख जता दिया.

प्यार और चाहत की ऐसी मिसालें कम ही देखने में आती हैं, जिन में शौहर मरने की हद तक बीवी को चाहता हो. ऐसा ही सोचने के लिए मजबूर कर देने वाला मामला 9 फरवरी, 2017 को बिहार से सामने आया था.

पूर्णिया जिले के गांव रामडेली का लड्डू शर्मा भी अपनी बीवी कोमल पर लट्टू था. राजस्थान की एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले लड्डू शर्मा को कोमल नाम की एक लड़की से मुहब्बत हो गई थी. दोनों ने शादी कर ली, तो जिंदगी मानो जन्नत सी हो गई.

चंद महीने बाद ही कोमल पेट से हो गई, तो लड्डू शर्मा की खुशियों को तो मानो पंख लग गए. पर अकेला लड्डू शर्मा पत्नी की जचगी नहीं करा सकता था, इसलिए उस ने कोमल को रामडेली गांव भेज दिया, जिस से जचगी घर वालों की निगरानी में अच्छे से हो सके.

लेकिन जचगी का वक्त उन दोनों की खुशियों पर ग्रहण बन कर आया. कोमल की मौत हो गई.

यह खबर सुन कर लड्डू शर्मा भागाभागा रामडेली गांव पहुंचा. वहां उस ने जहर खा लिया और श्मशान घाट में अपनी जान दे दी, जहां कोमल की लाश जलाई गई थी.

इंदौर, मध्य प्रदेश के 54 साला सोमाजी पटेल ने अपनी बीवी बेबी बाई की मौत के 6 साल बाद फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली थी.

कुलकर्णी का भट्टा इलाके के रहने वाले सोमाजी पटेल अपनी बीवी बेबी बाई की मौत के बाद से ही तनाव में थे और उन की कमी महसूस कर रहे थे. जैसेजैसे वक्त गुजरता गया, वैसेवैसे पत्नी की यादें और ज्यादा बढ़ती गईं. 6 साल तो उन्होंने बेटेबहुओं और नातीपोतों के साथ जैसेतैसे गुजार दिए, पर प्यार को यों ही प्यार नहीं कहा जाता, यह सोमाजी पटेल की खुदकुशी से भी साबित हुआ.

खटकती है कमी

 इन कुछ मामलों से साफ महसूस होता है कि बीवी की अहमियत एक शौहर की जिंदगी में क्या होती है. साथ ही, यह भी साबित होता है कि सिर्फ औरतें ही जज्बाती नहीं होतीं, बल्कि कई मामलों में मर्द भी उन से कहीं ज्यादा जज्बाती होते हैं.

आमतौर पर मर्दों के बारे में कहा यह जाता है कि वे बीवी के मरते ही या अलग होते ही दूसरी शादी कर के चैन से गुजरबसर करने लगते हैं. यह बात पूरी तरह सच नहीं है.

दूसरी शादी कर के वही लोग सुखी रह पाते हैं, जो दूसरी बीवी में पहली बीवी देखते हैं और दूसरी बीवी भी उन्हें पहली बीवी सरीखा प्यार और सहारा देती है.

यह भी होता है

बीवी की जुदाई में जान देने वाले या घुटघुट कर जीने वाले जरूरी नहीं है कि बीवी को बहुत प्यार करते हों. कई मामलों में तो बीवी शौहर की चाहत और जज्बात को नजरअंदाज करती रहती है, पर मर्द उसे चाहना नहीं छोड़ पाता. भोपाल का राजू कुशवाहा इस की मिसाल है.

 

वैसे, बीवी की ज्यादतियों से तंग आ कर भी जान देने वाले शौहरों की तादाद कम नहीं है. 1 जुलाई, 2017 को राजस्थान के जोधपुर में रहने वाले 30 साला इंजीनियर दिनेश मांकड़ ने अपनी बीवी की धमकियों और ज्यादतियों से तंग आ कर खुदकुशी कर ली थी.

शादी के 7 साल तो ठीकठाक गुजरे, पर एकाएक ही बीवी ने गिरगिट की तरह रंग बदला और दिनेश पर घर से अलग रहने का दबाव बनाने लगी. घर वालों से अलग होने की कोई मुकम्मल वजह नहीं थी, इसलिए दिनेश ने बीवी को समझायाबुझाया, जिस का कोई असर नहीं हुआ. उलटे बात न मानने पर वह मायके जा कर रहने लगी.

यह दिनेश जैसे शौहरों के लिए बेहद मुश्किल वक्त होता है, जब बीवी अलग होने की जिद पर अड़ जाती है. ऐसे में शौहर की पहली कोशिश यह होती है कि वह बीवी को समझाए कि उस की भी अपने घर वालों के प्रति कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं.

बीवियां जब इस बात से इत्तिफाक नहीं रखतीं, तो वाकई शौहरों की जिंदगी नरक हो जाती है. कई दफा तो लोग उन की मर्दानगी तक पर भी उंगली उठाने लगते हैं.

बीवी मायके में क्यों है? कलेजे पर नश्तर से चुभते इस सवाल का जवाब दुनिया को न केवल शौहर, बल्कि उस के घर वालों के लिए भी दे पाना मुश्किल हो जाता है.

अकसर बीवी के मायके वाले भी आग में घी डालने का काम करते हुए अपनी लड़की की गलती छिपाते हैं कि उसे ससुराल में दहेज के लिए मारापीटा जाता था या दूसरी तरह की तकलीफें दी जाती थीं, इसलिए वह ससुराल नहीं जा रही है.

ऐसे लोगों को यह समझाने वाला कोई नहीं होता कि बात अकेले पेट की नहीं होती, बल्कि शादीशुदा जिंदगी की जिम्मेदारियां व कुछ उसूल भी होते हैं, जिन्हें उन की बेटी ढंग से नहीं निभा पा रही है, इसलिए वापस जाने से कतरा रही है.

कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि बीवियों पर जुल्म नहीं होते. उन पर जुल्म होते हैं और कहर भी ससुराल वाले ढाते हैं, पर रिश्तेदारी और समाज में ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. कौन गलत और कौन सही के फैसले के लिए अदालतें हैं, जिन में तलाक के करोड़ों मुकदमे चल रहे हैं.

यहां यह कहना भी बेमानी है कि आज की औरतें ससुराल के जुल्मोसितम घूंघट ढक कर बरदाश्त कर लेती हैं. रोजाना लाखों शिकायतें शौहर और उस के घर वालों के खिलाफ दर्ज होती हैं और उन पर कार्यवाही भी होती है.

दिनेश ने अपने सुसाइड नोट में जो बातें लिखीं, उन से जाहिर होता है कि समाज, धर्म और कानून के फंदे में शौहर की हालत अधर में लटके शख्स जैसी हो जाती है. वह इन तीनों चक्रव्यूहों को नहीं भेद पाता, इसलिए खुदकुशी कर लेता है.

दिनेश ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि अगर सरकार और समाज मर्दों के लिए कोई कानून बनाए, तो कुछ बेकुसूरों की जान बच सकती है. हर बार औरत मासूम नहीं होती. वह अकसर औरतों के लिए बने कानून का फायदा उठाती है और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए हमदर्दी हासिल करती है.

शौहर को समझें

 दिनेश बहुत कम लफ्जों में अपनी तकलीफ और दर्द बयां कर गया, जिसे हर बीवी को समझना चाहिए कि यह शौहर का प्यार ही है, जो सालोंसाल वह उस के घर वापस लौटने का इंतजार करता रहता है. उस के दिल में एक आस होती है कि आज नहीं तो कल बीवी को अक्ल आ जाएगी.

बीवी के मर जाने और मायके जाने की जुदाई में फर्क इतना भर होता है कि पहले मामले में शौहर एकदम नाउम्मीद हो उठता है, जबकि मायके में रह रही बीवी के मामलों में उसे उम्मीद बंधी रहती है.

इसलिए बीवियों को चाहिए कि वे बेवजह छोटीमोटी बातों, खुदगर्जी या सहूलियत के लिए उन शौहरों की परेशानी का सबब न बनें, जो उन्हें प्यार करते हैं. मियांबीवी गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिए बेवजह नहीं कहे जाते, इसलिए अपने हिस्से की जिम्मेदारी बीवी को उठानी आनी चाहिए और इस के लिए कुछ समझौते करने हों, तो करने चाहिए. इस से उन्हें अपने शौहर का सौ गुना प्यार मिलेगा.

गंवाने का चसका कहीं भारी न पड़ जाए

रिंकू ने कौंट्रैक्ट पर एक नई नौकरी हासिल की थी.  6 महीने में 10 लाख रुपए की आमदनी होनी थी. एक महीना बीततेबीतते रिंकू के बीवीबच्चों ने नई कार की फरमाइश कर डाली. 10 लाख रुपए आने के पहले ही रिंकू ने नौकरी के 2 महीने पूरे होतेहोते 8 लाख रुपए की नई कार ले ली. भले ही कार को फाइनैंस कराना पड़ा. आज की नई पीढ़ी खर्च करने में माहिर है. आयुष के पुलिस अफसर होने का उस के बच्चों पर यह असर पड़ा कि बेटी कृति ने सिंगापुर जाने का और बेटे ने आस्ट्रेलिया जाने का मन बना लिया. अब पुलिस अफसर होने के बावजूद आयुष के सामने हमेशा लाखों रुपए कमाने का टारगेट होता है. बच्चों को विदेश भेजना था, तो पुश्तैनी जमीन भी बेच दी.

क्या करें, आज की पीढ़ी के पास खर्च करने की लंबीचौड़ी लिस्ट जो होती है. बच्चा बाद में पैदा होता है, उस के कैरियर की प्लानिंग आज के मांबाप पहले ही कर लेते हैं, इसलिए वे उस की परवरिश अपनी जमापूंजी से भी ज्यादा की हैसियत से करते हैं.

पहले के जमाने में भले ही यह फार्मूला अपनाया जाता था कि आमदनी एक रुपया हो, तो अठन्नी ही खर्चना और अठन्नी बचा लेना. पर आज यह सोच जैसे खत्म हो चुकी है. यही वजह है कि बच्चों के खर्चों को दरकिनार करने की हिम्मत आज के मांबाप में नहीं है. हर कोई अपनी औकात से ज्यादा बच्चों पर खर्च कर रहा है.

आज से कुछ साल पहले तक एक केक ला कर और रिकौर्ड प्लेयर पर गाना बजा कर बच्चे का जन्मदिन मना लिया जाता था, पर आज की पीढ़ी के पास होटल बुक करने और पार्टी करने का चसका है. डांस फ्लोर पर थिरके बगैर पार्टी पूरी नहीं होती है. नए कपड़े लिए जाते हैं. मतलब, सबकुछ स्पैशल होता है.

आज ‘सादा जीवन उच्च विचार’ निहायत ही बोरिंग किस्म का विचार है. लोगों में अपनी साख बनाने के लिए ब्रांडैड चीजों का इस्तेमाल जरूरी है. सोडा हब और बीयर पार्टी आम बात है. ‘टी पार्टी’ को तो लोग पुराना फैशन मानते हैं.

नौकरी लगते ही नीलेश ने पहले नई कार का और्डर किया. आखिर फ्लैट से भी पहले कार जरूरी है. जिस के पास कार होगी, उस की ही तो चलेगी.

लोग दूसरे की शानोशौकत से प्रभावित होते हैं. उस के पास अपनी काम की जानकारी कितनी है, इस की किसी को परवाह नहीं है. बैंक बैलैंस हो और आलीशान कोठी हो, तो आप को बोलने की जरूरत नहीं. जिस की खर्च करने की औकात जितनी ज्यादा होगी, वह उतना बड़ा हिट होगा.

किस ने अपने जन्मदिन पर कितनी बड़ी पार्टी दी, इस से उस के रसूख का अंदाजा लगाते हैं लोग. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि आप बैंक में कितना पैसा जमा करते जा रहे हैं. मगर आप की पार्टी करने में दिलचस्पी नहीं है, तो लोगों की आप में दिलचस्पी खत्म होते देर नहीं लगेगी.

एक बेटे ने अपनी नाकामी का ठीकरा मांबाप के सिर पर यह कह कर फोड़ा, ‘‘आप ने तो मुझे कभी ‘पौकेटमनी’ दी नहीं. मैं पैसे खर्च नहीं कर सका, तो मेरे दोस्त नहीं बने. मैं हमेशा अकेला रहा, इसीलिए आज नाकाम हूं.’’

उसी लड़के ने अपनी मां को यह कह कर लताड़ा, ‘‘तुम ने मुझे कभी किसी लड़के के साथ जाने नहीं दिया, दोस्ती करने नहीं दी, पैसे नहीं देती थीं. यहां तक कि मुझे गालियां तक नहीं देने दीं, इसीलिए मैं इंजीनियरिंग नहीं कर सका.’’

आजकल कोई आदर्श नहीं बनना चाहता. सब चाहते हैं कि मांबाप का पैसा खर्च कर अपना स्टैंडर्ड बनाएं. इमेज प्लेबौय की हो. लड़कियों को गिफ्ट दे सकें. दोस्तों को पार्टी दे सकें वगैरह.

होटल, मल्टीप्लैक्स वगैरह के इस जमाने में आप अपने बच्चों को पुराने ढर्रे से आगे नहीं बढ़ा सकते. उन्हें आज की लाइफ स्टाइल से ही कामयाबी मिलती है, इसलिए उन्हें ‘कड़का’ नहीं, बल्कि खर्चे का ‘तड़का’ चाहिए.

हौरर फिल्म में नजर आएंगी अर्चना प्रजापति

भोजपुरी फिल्मों की हीरोइनें अब हिंदी फिल्मों में भी कमाल दिखा रही हैं. अर्चना प्रजापति की हौरर फिल्म ‘कौटेज नंबर 1303’ में वे कौमेडी करती नजर आएंगी. अर्चना की दूसरी हिंदी फिल्म ‘है तुझे सलाम’ भी तैयार है. इस के अलावा वे कौमेडी सीरियल ‘भाभीजी घर पर हैं’ में भी दिखेंगी.

मुंबई में पलीबढ़ी अर्चना प्रजापति मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली हैं. स्कूल से ही उन्हें ऐक्टिंग करना अच्छा लगता था. जब वे ग्रेजुएशन करने के लिए कालेज पहुंचीं, तो उन को एक म्यूजिक अलबम में काम करने का मौका मिला. इस के बाद वे फिल्मों की तरफ चल पड़ीं.

सिंगर के रोल में नजर आएंगी पायल पांडेय

पटना की रहने वाली पायल पांडेय भोजपुरी में 10 से ज्यादा फिल्में कर चुकी हैं. भोजपुरी फिल्म ‘फूल और कांटे’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली पायल पांडेय की ‘इश्कबाज’ सब से हिट फिल्म रही है. अब वे फिल्म ‘गदर-2’ में पाकिस्तानी सिंगर के रोल में आ रही हैं.

पायल पांडेय कहती हैं, ‘‘मुझे बचपन से ही गाने का शौक था. अब सिंगर का रोल कर के अच्छा लग रहा है. यह एक लव स्टोरी है. इस में हीरो भी सिंगर है. हमारा आपस में प्यार होता है.’’

फिल्म ‘गदर-2’ के बाद पायल पांडेय की कई फिल्में बन रही हैं, जिन में वे अच्छे रोल कर रही हैं.

भौजाई से प्यार, पत्नी सहे वार

19 जनवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश के जिला सिद्धार्थनगर के थाना जोगिया उदयपुर के थानाप्रभारी शमशेर बहादुर सिंह औफिस में बैठे मामलों की फाइलें देख रहे थे, तभी उन की नजर करीब 4 महीने पहले सोनिया नाम की एक नवविवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में ससुराल में हुई मौत की फाइल पर पड़ी. सोनिया की मां निर्मला देवी ने उस के पति अर्जुन और उस की जेठानी कौशल्या के खिलाफ उस की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. घटना के बाद से दोनों फरार चल रहे थे. उन की तलाश में पुलिस जगहजगह छापे मार रही थी. लेकिन कहीं से भी उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी.

आरोपियों की गिरफ्तारी को ले कर एसपी राकेश शंकर का शमशेर बहादुर सिंह पर काफी दबाव था, इसीलिए वह इस केस की फाइल का बारीकी से अध्ययन कर आरोपियों तक पहुंचने की संभावनाएं तलाश रहे थे. संयोग से उसी समय एक मुखबिर ने उन के कक्ष में आ कर कहा, ‘‘सरजी, एक गुड न्यूज है. अभी बताऊं या बाद में?’’

‘‘अभी बताओ न कि क्या गुड न्यूज है,ज्यादा उलझाओ मत. वैसे ही मैं एक केस में उलझा हूं.’’ थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘जो भी गुड न्यूज है, जल्दी बताओ.’’

इस के बाद मुखबिर ने थानाप्रभारी के पास जा कर उन के कान में जो न्यूज दी, उसे सुन कर थानाप्रभारी का चेहरा खिल उठा. उन्होंने तुरंत हमराहियों को आवाज देने के साथ जीप चालक को फौरन जीप तैयार करने को कहा. इस के बाद वह खुद भी औफिस से बाहर आ गए. 5 मिनट में ही वह टीम के साथ, जिस में एसआई दिनेश तिवारी, सिपाही जय सिंह चौरसिया, लक्ष्मण यादव और श्वेता शर्मा शामिल थीं, को ले कर कुछ ही देर में मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. वहां उन्हें एक औरत और एक आदमी खड़ा मिला.

पुलिस की गाड़ी देख कर दोनों नजरें चुराने लगे. पुलिस जैसे ही उन के करीब पहुंची, उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं. शमशेर बहादुर सिंह ने उन से नाम और वहां खड़े होने का कारण पूछा तो वे हकलाते हुए बोले, ‘‘साहब, बस का इंतजार कर रहे थे.’’

‘‘क्यों, अब और कहीं भागने का इरादा है क्या?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, आप क्या कह रहे हैं, हम समझे नहीं, हम क्यों भागेंगे?’’ आदमी ने कहा.

‘‘थाने चलो, वहां हम सब समझा देंगे.’’ कह कर शमशेर बहादुर सिंह दोनों को जीप में बैठा कर थाने लौट आए. थाने में जब दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपने नाम अर्जुन और कौशल्या देवी बताए. उन का आपस में देवरभाभी का रिश्ता था.

अर्जुन अपनी पत्नी सोनिया की हत्या का आरोपी था. उस की हत्या में कौशल्या भी शामिल थी. हत्या के बाद से दोनों फरार चल रहे थे. थानाप्रभारी ने सीओ महिपाल पाठक के सामने दोनों से सोनिया की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने सारी सच्चाई उगल दी. सोनिया की जितनी शातिराना तरीके से उन्होंने हत्या की थी, वह सारा राज उन्होंने बता दिया. नवविवाहिता सोनिया की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले का एक थाना है जोगिया उदयपुर. इसी थाने के अंतर्गत मनोहारी गांव के रहने वाले जगदीश ने अपने छोटे बेटे अर्जुन की शादी 4 जुलाई, 2013 को पड़ोस के गांव मेहदिया के रहने वाले रामकरन की बेटी सोनिया से की थी. शादी के करीब 3 सालों बाद 25 अप्रैल, 2016 को गौने के बाद सोनिया ससुराल आई थी.

पति और ससुराल वालों का प्यार पा कर सोनिया बहुत खुश थी. अपने काम और व्यवहार से सोनिया घर में सभी की चहेती बन गई. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक सोनिया ने पति अर्जुन में कुछ बदलाव महसूस किया. उस ने गौर करना शुरू किया तो पता चला कि अर्जुन पहले उसे जितना समय देता था, अब वह उसे उतना समय नहीं देता.

पहले तो उस ने यही सोचा कि परिवार और काम की वजह से वह ऐसा कर रहा होगा. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. उस ने महसूस किया कि अर्जुन अपनी भाभी कौशल्या के आगेपीछे कुछ ज्यादा ही मंडराता रहता है. वह भाभी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताता है.

जल्दी ही सोनिया को इस की वजह का भी पता चल गया. अर्जुन के अपनी भाभी से अवैध संबंध थे. भाभी से संबंध होने की वजह से वह सोनिया की उपेक्षा कर रहा था. कमाई का ज्यादा हिस्सा भी वह भाभी पर खर्च कर रहा था. यह सब जान कर सोनिया सन्न रह गई.

कोई भी औरत सब कुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन यह हरगिज नहीं चाहती कि उस का पति किसी दूसरी औरत के बिस्तर का साझीदार बने. भला नवविवाहिता सोनिया ही इस बात को कैसे बरदाश्त करती. उस ने इस बारे में अर्जुन से बात की तो वह बौखला उठा और सोनिया की पिटाई कर दी. उस दिन के बाद दोनों में कलह शुरू हो गई.

सोनिया ने इस बात की जानकारी अपने मायके वालों को फोन कर के दे दी. उस ने मायके वालों से साफसाफ कह दिया था कि अर्जुन का संबंध उस की भाभी से है. शिकायत करने पर वह उसे मारतापीटता है. यही नहीं, उस से दहेज की भी मांग की जाती है. सोनिया की परेशानी जानते हुए भी मायके वाले उसे ही समझाते रहे.

वे हमेशा उस के और अर्जुन के संबंध को सामान्य करने की कोशिश करते रहे, पर अर्जुन ने भाभी से दूरी नहीं बनाई, जिस से सोनिया की उस से कहासुनी होती रही, पत्नी की रोजरोज की किचकिच से अर्जुन परेशान रहने लगा. उसे लगने लगा कि सोनिया उस के रास्ते का रोड़ा बन रही है. लिहाजा उस ने भाभी कौशल्या के साथ मिल कर एक खौफनाक योजना बना डाली.

24-25 सितंबर, 2016 की रात अर्जुन और कौशल्या ने साजिश रच कर सोनिया के खाने में जहरीला पदार्थ मिला दिया. अगले दिन यानी 25 सितंबर की सुबह जब सोनिया की हालत बिगड़ने लगी तो अर्जुन उसे जिला अस्पताल ले गया.

उसी दिन सुबह सोनिया के पिता रामकरन को मनोहारी गांव के किसी आदमी ने बताया कि सोनिया की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, वह जिला अस्पताल में भरती है. यह खबर सुन कर वह घर वालों के साथ सिद्धार्थनगर स्थित जिला अस्पताल पहुंचा. तब तक सोनिया की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी. डाक्टरों ने उसे कहीं और ले जाने को कह दिया था.

26 सितंबर की सुबह 4 बजे पता चला कि सोनिया की मौत हो चुकी है. बेटी की मौत की खबर मिलते ही रामकरन अपने गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर बेटी की ससुराल मनोहारी गांव पहुंचा तो देखा सोनिया के मुंह से झाग निकला था. कान और नाक पर खून के धब्बे थे. हाथ की चूडि़यां भी टूटी हुई थीं. लाश देख कर ही लग रहा था कि उस के साथ मारपीट कर के उसे कोई जहरीला पदार्थ खिलाया गया था.

बेटी की लाश देख कर रामकरन की हालत बिगड़ गई. उन के साथ आए गांव वालों ने पुलिस कंट्रोल रूम को हत्या की सूचना दे दी. सूचना पा कर कुछ ही देर में थाना जोगिया उदयपुर के थानाप्रभारी शमशेर बहादुर सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने सोनिया के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

बेटी की मौत से रामकरन को गहरा सदमा लगा था, जिस से उन की तबीयत खराब हो गई थी. उन्हें आननफानन में इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. इस के बाद पुलिस ने सोनिया की मां निर्मला की तहरीर पर अर्जुन और उस की भाभी कौशल्या के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए, 304बी, 3/4 डीपी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था.

2 दिनों बाद जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि सोनिया के साथ मारपीट कर के उसे खाने में जहर दिया गया था. घटना के तुरंत बाद अर्जुन और कौशल्या फरार हो गए थे. लेकिन पुलिस उन के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी. उन दोनों की गिरफ्तारी न होने से लोगों में आक्रोश बढ़ रहा था.

आखिर 4 महीने बाद मुखबिर की सूचना पर अर्जुन और कौशल्या गिरफ्तार कर लिए गए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे तक दोनों की जमानतें नहीं हो सकी थीं.पुलिस अधीक्षक राकेश शंकर ने घटना का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की हौसलाअफजाई करते हुए 2 हजार रुपए का नकद इनाम दिया है.

भाभी के चक्कर में अर्जुन ने अपना घर तो बरबाद किया ही, भाई का भी घर बरबाद किया. इसी तरह कौशल्या ने देह की आग को शांत करने के लिए देवर के साथ मिल कर एक निर्दोष की जान ले ली.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

चंडीगढ़ में छेड़छाड़ तो गांवों में क्या होता होगा

जब चंडीगढ़ जैसे शहर में पढ़ीलिखी गाड़ी चलाती लड़कियों की खैर नहीं है, तो देश के कसबों और गांवों में क्या होता होगा, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. भारतीय जनता पार्टी के जाट नेता व हरियाणा अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास बराला का एक दोस्त के साथ रात को काम से लौट रही लड़की की गाड़ी का पीछा करना और उसे अगवा करने की कोशिश में गाड़ी को रोकने की कोशिश करना तूल पकड़ गया, क्योंकि लड़की एक ऊंचे आईएएस अफसर की बेटी थी.

चारों ओर के दबाव के कारण विकास बराला और उस के दोस्त को पुलिस ने काफी नानुकर के बाद गिरफ्तार तो कर लिया, पर उसे सजा मिलेगी, इस की गारंटी नहीं है. चंडीगढ़ पढ़ेलिखे शांत लोगों का शहर है, जहां आमतौर पर लफंगबाजी कम होती है, पर सत्ता का नशा विकास के सिर पर ऐसा चढ़ा कि उस ने सोचा कि हर लड़की दलित या मुसलमान जैसी है, जिसे जहां चाहो मारपीट लो. हिंदू धर्म के रीतिरिवाज तो रोज ही दोहराते हैं कि औरत नर्क की खान है.

देशभर में कल के लठैत आज राजनीति में घुस कर जो दंगा मचा रहे हैं, यह जमीनी लोग ही बता सकते हैं. कभी गौरक्षा के नाम पर, कभी पाकिस्तान के हिमायतियों को सबक सिखाने के नाम पर, तो कभी देशद्रोह के नाम पर भारत माता की जय का नारा लगवाने को ले कर ये लठैत अब सत्ता का पूरा फायदा उठा रहे हैं.

गांवगांव, कसबेकसबे में इन खुद के तैनात पहरेदारों ने लड़कियों को दुरुस्त करने का ठेका ले लिया है. सोशल मीडिया पर सैकड़ों वीडियो घूम रहे हैं, जिन में लाठी पर भगवा रिबन बांधे लड़के लड़केलड़की के जोड़ों की जम कर पिटाई भी कर रहे हैं और उन्हीं में से एक लड़का अपने मोबाइल पर वीडियो खींच कर सोशल मीडिया पर अपने को दिए गए मैडल की शक्ल में डाल रहा है.

इन्हीं लोगों ने एकदम से विकास बराला की तरफदारी शुरू कर दी और रात के 12 बजे लड़की के बाहर निकलने पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. उस लड़की के पुराने फोटो निकाले गए हैं, ताकि साबित करा जा सके कि उस का तो चालचलन ही खराब था. जो भाजपा की गंगा में नहा रहा है, वही पाकसाफ है, उस को सजा देने का भी हक है. उस को मारनेपीटने का हक वोटरों ने दे दिया है.

सदियों तक ऊंची जातियों ने इन लठैतों की आड़ में दलितों, पिछड़ों, किसानों, मजदूरों, गरीबों और ऊंची जातियों की विधवाओं, निपूतियों, पति द्वारा छोड़ी गई औरतों को बुरी तरह मारपीट कर गुलाम बना कर रखा है. पहले राजाओं, जमींदारों ने और बाद में पुलिस अफसरों ने इन लोगों को बेहद छूट दे रखी थी. आजादी के बाद ये हर बार सत्ता वाली पार्टी में घुस कर आतंक मचाते रहे हैं. कभी कांग्रेस में होते, कभी जनता पार्टी में, तो कभी लोकदल में.

हरियाणा में जो हुआ है, वह सदियों से चला आ रहा है. लड़कियां और औरतें दलितों की तरह हमेशा बिन पैसे की गुलामी करती रही हैं. उन की आजादी आज भी नहीं सही जा रही है और हिंदू संस्कृति के नाम पर उन्हें बारबार उपदेश दिए जा रहे हैं. आज भारत माता न बोलना गुनाह है, पर भारत माता की बेटी की सरेआम इज्जत लूट लेना धर्म की रक्षा बन गया है.

इस वजह से बदली गई उमा भारती की कुर्सी

बात भले ही हल्के ढंग से कही गई हो पर है सच्ची. सोशल मीडिया पर वायरल होती पोस्ट की बातों पर यकीन करें तो उमा भारती की कुर्सी उनके बड़बोलेपन की वजह से बदली गई. उमा भारती को जब गंगा संरक्षण विभाग का मंत्री बनाया गया था तो उमा भारती ने बयान दिया था कि ‘वह गंगा को स्वच्छ और निर्मल करके ही दम लेंगी अगर ऐसा नहीं कर पाई तो पहले पद यात्रा करेंगी बाद में अपना जीवन त्याग देंगी’.

उमा भारती ने यह बात औन रिकार्ड कही और कई बार कही थी. केन्द्र सरकार के 3 साल बीत चुके हैं. गंगा में पानी के जहाज को चलाने और उसके जरीये यातायात का रास्ता खुलना तो दूर की बात है अभी तक गंगा की सफाई का कोई अतापता नहीं है. पूरे देश में गंगा की सफाई का दावा करने वाला गंगा जल सरंक्षण विभाग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में भी गंगा को पूरी तरह से साफ नहीं कर सका.

गंगा सफाई को लेकर सरकारी दावे और हकीकत में जमीन आसमान का अंतर है. बाकी बचे 2 साल में गंगा कितना साफ होगी यह पता चल रहा है. ऐसे में केन्द्र सरकार को हो सकता है कि इस बात का डर रहा हो कि गंगा सफाई के मुद्दे को विरोधी दल उमा भारती के जीवन देने वाले बयान से जोड़कर केन्द्र सरकार की आलोचना न शुरू कर दें. खासतौर पर जिस तरह से सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने जोर पकड़ा उससे यह साफ हो गया कि गंगा सफाई को लेकर उमा भारती के बहाने केन्द्र सरकार को घेरना सरल हो गया था. विभाग बदले जाने के बाद उमा भारती यह कह सकती हैं कि उनको पूरा मौका नहीं मिला इसलिये वह गंगा को साफ नहीं कर पाईं.

पिछले लोकसभा चुनाव के प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद भी गंगा की सफाई को एक बडा मुद्दा बनाया था. इसके लिये खुद वाराणसी से लोकसभा का चुनाव लडा. प्रधानमंत्री ने उस समय अपने हर चुनावी भाषण में गंगा का जिक्र करते हुए कहा कि उनको मां गंगा ने बुलाया है. वह गंगा को साफ करके ही रहेगे. गंगा के लिये बहुत बड़ी बड़ी योजनाओं का जिक्र हुआ. उमा भारती को गंगा संरक्षण मंत्री बनाया जिससे लोगों को यह लगे कि साध्वी के गंगा मंत्री बनने से गंगा का भला होगा. उमा भारती ने भी उसी तर्ज पर बयान दिया कि अगर वह मंत्री रहते गंगा को साफ नही कर पाई तो गंगा में डूब कर जान दे देंगी. अब गंगा तो साफ हुई नहीं ऐसे में उमा भारती को अपने बयान से बचाने के लिये केन्द्र सरकार ने उनका विभाग बदल दिया.

सनी लियोन ने किया ये चौंकाने वाला खुलासा

फिल्‍म ‘रईस’ की लैला से लेकर ‘रागिनी एमएमएस’ की बेबी डौल तक, बौलीवुड की हर फिल्‍मों में सनी लियोन अपने आइटम नंबर का तड़का लगा चुकी हैं और हाल ही में वे संजय दत्त की कमबैक फिल्‍म ‘भूमि’ के एक आइटम नंबर में नजर आने वाली हैं. लगभग हर बड़ी फिल्‍म में आइटम नंबर करती नजर आईं सनी लियोन ने एक अनोखा खुलासा किया. उनका कहना है कि बौलीवुड इंडस्ट्री में उनका कोई असली दोस्‍त नहीं है.

दरअसल सनी लियोन हाल ही में नेहा धूपिया के शो ‘नो फिल्‍टर नेहा’ में मेहमान के रूप में पहुंचीं थी. इस शो में इंटरव्यू के दौरान सनी लियोन ने नेहा धूपिया से अपनी जिन्दगी से सम्बन्धित कई बातें की. नेहा ने जब सनी लियोन से पूछा कि क्‍या आप बौलीवुड में सच्‍चे दोस्‍त बना पायी हैं, तो सनी ने अपने जवाब में कहा, शायद नहीं.  उन्होंने इस सवाल का आगे जवाब देते हुए कहा ‘मेरा मतलब है कि मैं काम के दौरान कई अच्‍छे लोगों से मिली हूं. काम के अलावा मैं लोगों से मिलती ही कहां हूं. मैं तो सिर्फ काम के दौरान ही लोगों से मिलती हूं. मैं किसी सोशल क्‍लब या ग्रुप का हिस्‍सा भी नहीं हूं क्‍योंकि मैंने देखा है कि लोग मेरे साथ काफी अजीब और निचले स्‍तर के हो जाते हैं और वह मुझे नहीं बल्कि किसी और को जानना चाहते हैं.

‘नो फिल्‍टर नेहा’ में नेहा धूपिया ने सनी लियोन से पूछा, ‘आप ने एक जगह कहा था, आपके पहले पुरस्कार समारोह में आपको स्टेज पर आना था और बौलीवुड के सितारो के साथ मंच साझा करना था, लेकिन सबने ही आपके साथ मंच साझा करने के लिए मना कर दिया था लेकिन एक बहुत ही नेक इंसान ने आपको हां कहा था, वह इंसान कौन था. इस पर सनी ने बताया कि वह चंकी पांडेय थे.

फुटपाथ : रोशनी के बीच पसरा अंधकार

फुटपाथों पर बनी झुग्गियों और बाजारों से सरकार और प्रशासन अनजान नहीं होते हैं या गरीबों पर रहम खा कर उन्हें फुटपाथों पर कारोबार करने या बसने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस के पीछे हरे नोटों की चमक काम करती है.

रिटायर्ड पुलिस अफसर एसके भारद्वाज बताते हैं कि फुटपाथ पर रहने वालों या कोई कामधंधा करने वालों को इस के एवज में अच्छीखासी रकम चुकानी पड़ती है. फुटपाथियों को पुलिस वाले और लोकल रंगदार दोनों की मुट्ठी गरम करनी पड़ती है.

इस से तो अच्छा है कि अगर सरकार फुटपाथ से कब्जे को हटा नहीं सकती, तो उसे वहां रहने वालों या कारोबार कराने वालों को पट्टे पर दे दे. इस से सरकार के खजाने में काफी पैसा आ सकता है.

पटना के ऐक्जिबिशन रोड पर वड़ा पाव और औमलेट का ठेला लगाने वाले एक दुकानदार ने नाम नहीं छापने की गारंटी देने के बाद बताया कि वह दिनभर में 2 हजार रुपए का धंधा कर लेता है. रोज शाम होते ही पुलिस वाले और लोकल दादा टाइप लोग ‘टैक्स’ वसूलने के लिए पहुंच जाते हैं.

2 सौ रुपए पुलिस वालों और 3 सौ रुपए गुंडों को हर रोज चढ़ाने पड़ते हैं. इस के बाद भी वे लोग वड़ा पाव और आमलेट मुफ्त में हजम करना नहीं भूलते हैं.

समूचे देश में मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पटना से लेकर किसी भी बड़े या छोटे शहर के फुटपाथों पर रहने वालों की जिंदगी एकजैसी ही होती है. टूटेफूटे बांस और लकडि़यों के टुकड़ों और पौलीथिनों को जोड़जोड़ कर बनाई गई झोंपडि़यों के पास पहुंचते ही नथुनों में तेज बदबू का एहसास होता है. बगल में बह रही संकरी नाली में बजबजाती गंदगी… कचरा भरा होने की वजह से गंदा पानी गली की सतह पर आने को बेचैन दिखता है… तंग और सीलन से भरी छोटी छोटी झोंपडि़यों से झांकते चेहरे… खांसते और लड़खड़ाती जिंदगी से बेजार हो चुके बूढ़े… पास की सड़कों और गलियों में हुड़दंग मचाते मैलेकुचैले बच्चे… यही है फुटपाथों की जिंदगी.

इस के साथ ही फुटपाथों पर ठेला, खोमचा, रेहड़ी, पटरी का बड़ा कारोबार भी चलता है. महानगरों, नगरों और कस्बों के फुटपाथों पर चलने वाले ऐसे बाजारों का सालाना टर्नओवर करोड़ों रुपए का होता है.

फलों, सब्जियों, रेडीमेड कपड़ों, फास्ट फूड, पानी पूरी, चाट, खिलौनों, किताबों, साइकिल से लेकर कारों व कंप्यूटर, मोबाइल फोन वगैरह की मरम्मत करने की दुकानों से फुटपाथ पटे हुए हैं.

फुटपाथों और झोंपड़पट्टियों में रहने वालों के बीच पिछले 12 सालों से लगातार काम कर रहे समाज विज्ञानी आलोक कुमार कहते हैं कि गरीब लोग गांव छोड़ कर शहर इसलिए आते हैं कि उन्हें कोई बढि़या और पक्का काम मिलेगा, लेकिन ज्यादातर लोग मजदूर, रिकशा व ठेला गाड़ी चलाने वाले या भिखारी बन कर रह जाते हैं.

शहरों में इधर उधर भटकते हुए वे लोग फुटपाथों पर टिक जाते हैं. कभी कभार जब लोकल पुलिस थानों पर ‘ऊपरी दबाव’ आता है, तो आनन फानन मुहिम शुरू कर फुटपाथ को साफ करा दिया जाता है और पुलिस की ‘हल्ला गाड़ी’ यानी बुलडोजर या जेसीबी के वापस लौटते ही फिर से फुटपाथों पर कब्जा कायम होने लगता है. कुछ ही घंटों में एक बार फिर फुटपाथ की जिंदगी गुलजार हो जाती है.

पटना के एक फुटपाथ पर पिछले 26 सालों से रह रहा जीतन बताता है कि महीने में 15-16 दिन मुफ्त में पूरीसब्जी और मिठाई खाने का मजा मिलता है. जीतन अपने 3 बच्चों और बीवी के साथ छोटी सी झोंपड़ी में रह रहा है.

पटना शहर का पुराना इलाका है अशोक राजपथ. इसी सड़क के किनारे बने फुटपाथ पर भिखारियों की झोंपडि़यां बसी हुई हैं. अपने परिजनों की आत्मा को शांति पहुंचाने के टोटके के नाम पर अमीर लोग यहां के लोगों के बीच पूरीसब्जी और मिठाई के पैकेट बांटते रहते हैं.

समाज में फैले अंधविश्वास ने भी फुटपाथों को जिंदा रखने में अहम रोल अदा किया है. शहर में रोज कोई न कोई मरता ही है और उस के परिवार वाले फुटपाथ पर रहने वाले गरीबों के बीच खाने के पैकेट बांटने की रस्म निभा कर समझते हैं कि इस से मरे हुए परिजन की आत्मा को शांति मिलेगी. इसी सोच की वजह से शहरी फुटपाथों के बाशिंदों को कभी पकवानों की कमी नहीं होती है.

15 साल का दिलीप बताता है, ‘‘जब तक अमीर लोग हम कंगालों को खाना नहीं खिलाएंगे, तब तक मरने वाले की आत्मा भटकती रहेगी. दूसरी जिंदगी पाने के लिए उसे कोई शरीर ही नहीं मिलेगा.’’

दिलीप की बातें सुन कर यही लगता है कि उस के मां बाप ने भी उसे यह बात घुट्टी में पिला दी है कि लोग उसे खाना खिला कर या दान दे कर कोई अहसान नहीं करते हैं, बल्कि अपना मतलब साधने के लिए ऐसा करते हैं.

अपने 4 बच्चों के साथ रांची, झारखंड में रहने वाले डोमन दास से जब पूछा गया कि वह कोई कामधंधा क्यों नहीं करता है? अपंग नहीं होने के बाद भी भीख और दान के भरोसे क्यों जिंदगी चला रहा है? मजदूरी कर के अपनी कमाई को बढ़ाना क्यों नहीं चाहता है? अपने बच्चों को स्कूल में क्यों नहीं भेजता है?

इन सब सवालों के जवाब में वह उलटा सवाल करता है, ‘‘अगर हम लोग दूसरा कामधंधा करने लगेंगे, तो पैसे वालों के दानपुण्य का काम कैसे चलेगा? गरीबों को दान दे कर ही तो रईस लोग पुण्य बटोरते हैं.’’

झारखंड की राजधानी रांची के मेन रोड इलाके में फुटपाथ पर रहने वाले ज्यादातर लोग किसी भी सूरत से अपंग और लाचार नहीं हैं. इस के बाद भी वे कोई कामधंधा नहीं करना चाहते हैं. मेहनत मजदूरी कर के पैसा कमाने और पेट पालने के बारे में वे लोग सोचते ही नहीं हैं.

पटना के लोहानीपुर इलाके के रहने वाले वंचित जन मोरचा के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि हर सरकार और प्रशासन फुटपाथ और झुग्गियों में बसे लोगों को हटाने या दूसरी जगह बसाने के बजाय उसे बनाए रखने में दिलचस्पी रखते हैं. कभीकभार आम जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए प्रशासन पर सनक सवार होती है, तो फुटपाथ से कब्जा हटा दिया जाता है और उस के बाद वे दोबारा कान में तेल डाल कर सो जाते हैं.

प्रशासन के इसी रवैए की वजह से फुटपाथ पर रहने वालों को पुलिस के डंडों और बुलडोजरों से अब डर नहीं लगता है. वे समझ चुके हैं कि जब उन्हें उजाड़ा जाएगा, तो वे फिर उसी जगह बस जाएंगे. उस के बाद कुछ सालों तक उन्हें कुछ नहीं होने वाला है.

पटना के पीरमुहानी महल्ले में फुटपाथ पर बसा कल्लू गोप कहता है कि वह यहां पिछले 8 सालों से रह रहा है, लेकिन हर दिन उस के सिर पर घर उजड़ने की तलवार लटकती रहती है.

कल्लू गोप का 12 साल का बेटा फेंकना बड़ी ही मासूमियत से कहता है कि उस के साथ कई बच्चों ने मिल कर ‘मुख्यमंत्री अंकल’ और ‘डीएम अंकल’ से कहा था कि उन्हें रहने को छोटा सा घर दे दिया जाए, जिस से झोंपड़ी के बच्चे मन लगा कर पढ़ सकें और बड़ा आदमी बन सकें, पर कोई सुनता ही नहीं है.

इस इलाके के लोग सर्किल अफसर से ले कर गवर्नर तक गुहार लगा चुके हैं, इस के बाद भी गरीबों को उन के हाल पर छोड़ दिया गया है. गांव से ये लोग शहर में काम की खोज में आए हैं, पर यहां न तो ढंग का कोई काम मिला और ऊपर से हर समय झोंपड़ी उजड़ने का डर अलग से बना रहता है. पुलिस वाले अकसर तरक्की के नाम पर डंडा भांजने पहुंच जाते हैं और किसी को भी नहीं बख्शते हैं.

बेलगाम पुलिस ने गंगा बिंद के 3 साल के मासूम बच्चे नीतीश को भी लाठी से पीट डाला था. अपनी झोंपड़ी के सामने खड़ी 70 साल की बीना देवी पर भी पुलिस ने रहम नहीं दिखाया और उस के पेट पर लाठी दे मारी. वह तड़प कर जमीन पर गिर पड़ी. उसके इलाज पर 2 हजार रुपए खर्च हो गए.

फुटपाथ पर रहने वालों की जिंदगी को देख कर यही महसूस होता है कि गांवघर को छोड़ कर बेहतर जिंदगी जीने का सपना देखने वालों के लिए शहर के फुटपाथ ही बिछौना और घर हैं. 6-7 फुट के झोंपड़े में न जाने कितनी जिंदगियां खाक हो गईं और न जाने कितने लोग खाक होने के इंतजार में तिलतिल कर रोज मर रहे हैं. सरकार उन्हें हटाने के बजाय बनाए रखने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती है, क्योंकि वहां उस का मोटा और ठोस वोट बैंक जो होता है.

अपंग संजू : फुटपाथियों के लिए बनी मिसाल

सरकार से जब कोई मदद नहीं मिली, तो 6 साल की उम्र से ही दोनों पैरों से लाचार संजू ने अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी. एक दिन वह उठी और अपनी पुरानी तिपहिया साइकिल ले कर दीघा सब्जी हाट पहुंच गई. अपने पास जमा कर के रखे 4 सौ रुपए से उस ने कुछ सब्जियां खरीदीं और राजीवनगर महल्ले के चौक के पास बेचने के लिए बैठ गई. पहले दिन ही उसे सौ रुपए की कमाई हो गई, जिस से संजू का हौसला बढ़ गया.

8वीं क्लास तक पढ़ी संजू कहती है, ‘‘जो काम करेगा, वह कभी भी भूखा नहीं मर सकता है. अपंग अगर सरकारी पैंशन या भीख मांगने के चक्कर में जितनी मेहनत करते हैं, उतनी मेहनत अपना कोई धंधा करने में लगाएं, तो वे अच्छीखासी कमाई कर सकते हैं. किसी की दया पर जिंदगी बर्बाद करने से बेहतर है कि मेहनत की जाए.’’

बिहार की राजधानी पटना में पौलिटैक्निक कालेज के पास बने बिंदेश्वरी नगर की रहने वाली 20 साल की संजू कुमारी के पिता दिलकेश्वर बिंद की मौत हो चुकी है और उस की मां चमेली देवी फुटपाथ पर सब्जियां बेच कर परिवार के पेट की आग को बुझाती है.

पैरों से लाचार संजू को अपनी मां की परेशानी देखी नहीं जाती है. वह कहती है, ‘‘सोचा था कि मुझे अपंगों वाली पैंशन मिलेगी, तो घर की कुछ परेशानी कम होगी. इस के लिए कई बार हाकिमों और बाबुओं के यहां अर्जी दी, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हो सकी.

‘‘एक दलाल ने कहा कि 6 सौ रुपए खर्च करोगी, तो तुम्हें अपंगों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पैंशन मिल जाएगी. कई महीने बीत गए, पर अब तक पैंशन नहीं मिल सकी है. आखिर कब तक पैंशन मिलने का इंतजार करें? लगता है कि दलाल रुपए ऐंठ कर डकार गया है.’’

आज संजू रोजाना 2 से 3 हजार रुपए की सब्जियां बेच लेती है, जिस से उसे अच्छाखासा मुनाफा हो जाता है. वह बताती है कि रोज 4 सौ से 5 सौ रुपए तक की कमाई हो जाती है, जिस से परिवार का खर्च आसानी से चल जाता है. वह अपनी कमाई से अपने छोटे भाई विमल को पढ़ा रही है, जो 10वीं क्लास में पढ़ रहा है.

संजू जानती है कि पढ़ाई पूरी नहीं कर पाने की वजह से ही उसे ये दिन गुजारने पड़े हैं. अगर वह पढ़लिख जाती, तो कहीं कोई अच्छा काम मिल सकता था. वह अपने भाई को सब्जी नहीं बेचने देगी. उसे पढ़ालिखा कर एक बड़ा आदमी बनाएगी.

फुटपाथ पर दबंगों का कब्जा

ऐसा कतई नहीं है कि केवल गरीब, भिखारी, रिक्शा ठेला चलाने वाले और मजदूर लोग ही फुटपाथों पर कब्जा जमाते हैं, बल्कि बड़े दुकानदार भी अपनी दुकानों के सामने बने फुटपाथ पर बड़े ही शान और दबंगई के साथ कब्जा जमाए रहते हैं. दुकान के सामने फुटपाथ के बड़े हिस्से पर सामान को डिस्प्ले में लगा कर रखते हैं. फुटपाथ के ऊपर महंगे और खूबसूरत शेड लगा दिए जाते हैं.

साइकिल, मोटरसाइकिल, खिलौने, चादर, बर्तन समेत हर तरह का सामान बेचने वाले अपनी दुकान के सामने के फुटपाथ को खुद की जागीर मानते हैं. इस के साथ ही ढाबा, जूस वाले, पानी वाले भी फुटपाथों पर इस कदर कब्जा जमा कर रखते हैं कि पता ही नहीं चल पाता है कि दुकान कहां तक है और फुटपाथ कहां है. पैदल चलने वाले बड़ी बड़ी गाडि़यों की तेज रफ्तार से बचने के लिए फुटपाथ को ढूंढ़ते रह जाते हैं, पर वह कहीं दिखता ही नहीं है.

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