मैंने 6 वर्ष तक कई बार शारीरिक संबंध बनाए पर मैं कभी गर्भवती नहीं हुई. क्या मैं अपने पति को यौन सुख दे पाऊंगी.

सवाल
मैं 26 वर्षीय युवती हूं. एक युवक से प्रेम करती थी. 6 वर्ष तक हमारा प्रेम संबंध चला. हम ने कई बार शारीरिक संबंध भी बनाए पर मैं कभी गर्भवती नहीं हुई जबकि हम कोई एहतिय तक नहीं बरतते थे. मेरे बौयफ्रैंड से मेरा ब्रेकअप हो चुका है. अब मेरे घर वाले मेरी शादी के लिए प्रयास कर रहे हैं. मैं जानना चाहती हूं कि क्या मैं अपने भावी पति को यौन सुख दे पाऊंगी या नहीं और क्या मैं भविष्य में मां बन पाऊंगी या नहीं?

जवाब
यदि आप अपने बौयफ्रैंड से संबंध बनाने के दौरान कभी गर्भवती नहीं हुईं तो इस का अभिप्राय यह नहीं कि आप में कोई कमी है. इसलिए अपने मन में किसी तरह का पूर्वाग्रह न पालें और विवाह कर लें.

प्राण जाएं पर कीमत कहीं न जाए

नई तकनीकों पर आधारित नई दवाओं और नए उपचारों से लाखों जानें तो बचाई जा रही हैं पर उन के बढ़ते दाम की चिंता की बात भी उठ रही है. सरकार ने डाक्टरों और अस्पतालों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है कि वे ओवर चार्ज न करें पर यह एक ऐसी समस्या है जिस का हल आसान नहीं है. नई दवाओं, नए उपचारों और जांच की नई मशीनों की कीमत वाकई बहुत ज्यादा है, क्योंकि इन को खोजने में बहुत समय, पैसा और शक्ति लगती है. कंपनियां वर्षों तक पहले जानवरों पर और फिर आदमियों पर इन का ट्रायल करती हैं. इस दौरान वैज्ञानिक वेतन व सुविधाएं तो पाते ही हैं, बहुत बार बीच में ही दवा या मशीन का विकास छोड़ना पड़ता है, जिस से लगाया गया पैसा बेकार जाता है. इस की कीमत असल में मरीज से ही वसूल की जा सकती है, क्योंकि दवा, उपचार या नई बनने वाली मशीन का लाभ तो मरीजों को ही मिलता है.

दुनिया भर के अस्पतालों का खर्चा भी बढ़ गया है. उन के भवन 5 सितारा होटलों की तरह होने लगे हैं ताकि एक तरफ इन्फैक्शन कम हो तो दूसरी ओर मरीजों और उन के रिश्तेदारों को यह न लगे कि वे किसी जेल में आ गए हैं, जहां से रास्ता केवल मृत्यु की ओर जाता है. अस्पतालों को चलाने के लिए हर जने का प्रशिक्षित होना जरूरी है और यह काम महंगा और धैर्य वाला होता है. दर्द से कराहते मरीजों को रोजरोज देखना और उन्हें मौत के मुंह से निकाल कर लाना आसान नहीं होता. डाक्टरों और सपोर्ट स्टाफ का मानसिक संतुलन भी बना रहे यह खर्चीला काम है.

भारत सरकार ने नैशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथौरिटी गठित की है, जो अस्पतालों के खर्चों पर नजर रखने के लिए बनाई गई है पर इस तरह की अंकुश रखने वाली एजेंसियां अस्पतालों का खर्च बढ़ाती हैं. उन्हें लगाई गई पूंजी पर तो लाभ कमाना ही है खर्च भी पूरे करने हैं. एजेंसियां यदि सख्त हुईं तो अस्पताल वे इलाज देंगे ही नहीं जो महंगे हैं पर जिन से जान बच सकती है. मरीजों की जेब तो बचेगी पर जान चली जाएगी.

इस का उपाय यह है कि सरकार जनता से जमा किए टैक्स से चिकित्सा मुफ्त उपलब्ध कराए पर यह फार्मूला दुनिया भर में असफल हुआ है. चूंकि इस में मरीज पैसा नहीं देता, इसलिए सरकारी अस्पताल या सरकार से पैसा पाने वाले निजी क्षेत्र के अस्पताल व डाक्टर लापरवाह हो जाते हैं. मरीज भी बेमतलब का इलाज कराने चले आते हैं.

आदमी की जान बहुत कीमती है पर इसे बचाने की कीमत भी बहुत है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा सरकार ने इस की भरपाई करने की कोशिश की थी पर अब नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उसे खत्म कर रहे हैं. दुनिया भर के कई देशों में हैल्थ सेवाएं जो सरकारी थीं, धीरेधीरे गैरसरकारी बनाई जा रही हैं, जिस से मरीजों को इलाज कराना महंगा पड़ रहा है. पर इस का उपाय क्या है?

चिकित्सा का खर्च किसी को तो वहन करना ही होगा. मरीज करे तो अच्छा है. रैग्युलेटरी अथौरिटी हो पर रैग्युलेशन के नाम पर शोध का गला न घोट दिया जाए.

कारपोरेट का गैस भरा गुब्बारा हैं नरेंद्र मोदी

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसके पास नरेन्द्र मोदी के अलावा कोई दूसरी सूरत नहीं है. मोदी ऐसे प्रचारित ‘जन नायक’ हैं जो कॉरपोरेट जगत का प्रतिनिधित्व करते हैं. लोकतंत्र के लिये यह जरूरत से ज्यादा बड़ा खतरा हैं कि उसका वजूद आम जनता पर नहीं, राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों की मरजी पर निर्भर है. यह कड़वी सच्चाई उभर कर सामने आ रही है, कि चुनी हुई सरकारें ही लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं. और यह खतरा आपके सामने है. केन्द्र के साथ महत्वपूर्ण राज्यों में भी अब मोदी की सरकार है. 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम को ही दोहराया गया है. केन्द्र सरकार की मजबूती बढ़ा दी गयी है, लोकतंत्र में विपक्ष जिन्दा है, लेकिन मरा-मरा.

चुनाव परिणाम आने और प्रायोजित रुझानों को देखते ही साफ हो गया था, कि क्या होने वाला है? आपसी बहस के दौरान यह कहा गया कि इसमें चौकाने वाली कोई बात नहीं है. यह मोदी सरकार को नोटबंदी का रिटर्न गिफ्ट है. यह ‘गिफ्ट’ आम जनता ने नहीं दिया. हो सकता है, कि उसकी अंगुलियां ईवीएम मशीन पर हो, मगर मोदी सरकार ने पिछले सालों में उद्योग जगत और निजी कम्पनियों के लिये जो किया है, भारतीय अर्थव्यवस्था में जितनी दखल उन्हें दी है और देश को जितना बाजार उन्होंने बनाया है, कांग्रेस ने अपने पूरे कार्यकाल में नहीं किया.

नोटबंदी घोषित तौर पर अपने लक्ष्य में असफल और देश की आम जनता पर गहरी मार है और अघोषित रूप से भारतीय मुद्रा पर, उसके लेन-देन पर, कैशलेस ट्रांजक्शन के लिये पेटीएम जैसी निजी कम्पनियों का सशुल्क अधिकार है. जिसका विज्ञापन नरेन्द्र मोदी करते हैं और बड़ी-बड़ी बातें भी. बहकाने वाले बड़े-बड़े वायदे भी. उग्र राष्ट्रवाद और वित्तीय तानाशाही भी. मोदी कॉरपोरेट का गैस भरा गुब्बारा हैं. जिन्हें केन्द्र की लोकसभा ही नहीं राज्यों की विधानसभायें भी इसलिये सौंपी जा रही हैं कि राज्य सभा पर पर उनका अधिकार हो. कि ‘बबुआ ऐसे ही उड़ो.’ जब तक यह उड़ान है, ओहदा और आसमान है.

मीडिया इस बात का भरपूर प्रचार कर रही है कि मोदी बेजोड़ हैं. ‘वन मैन आर्मी’, ‘वन मैन इण्डस्ट्री’ की तरह उन्हें ‘वन मैन पॉलिटिशियन’ बनाया जा रहा है. संघ और भाजपा इस लाईन पर पहले से बढ़ रही हैं और लगे हाथ ‘जन नायक’ भी बता रही हैं. बनारस में ‘हर हर महादेव’ की तरह भाजपाई ‘हर हर मोदी’ कह रहे हैं, जिसकी दिशा ‘हर हिटलर’ की भी हो सकती है. दुनिया भर में वित्तीय ताकतें लोकतंत्र के कंधे पर ऐसे ही प्रायोजित नायकों को बैठा रही हैं.

बाजार में चुनी हुई सरकारों की गिरेबां पर वित्तीय ताकतों का हाथ है और सरकारें आम लोगों का गिरेबां थाम कर खड़ी हैं. सवा सौ करोड़ का मालिक श्रम और मुद्रा के बाजार में है. चुनावी प्रक्रिया इतनी ‘समझदार’ हो गई है कि आम जनता चाह कर भी अपने हितों की लड़ाई लड़ने वाले जनप्रतिनिधियों को संसद या विधान सभाओं में पहुंचा नहीं सकती. कांग्रेस-यूपीए सरकार के मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था के जिस उदारीकरण की शुरुआत की, मोदी ने उसे ‘ऑक्शन’ के मुकाम तक पहुंचा दिया है.

लोगों ने कहा था सैफ से शादी मत करो : करीना

बॉलीवुड के नवाब खानदान की बहू और सैफ अली खान की पत्नी इन दिनों अपनी बॉलीवुड में दूसरी पारी की तैयारी में लगी हुई है और उनकी इस पारी की शुरुआत जल्द ही उनकी आने वाली फिल्म वीर दी वेडिंग से हो जाएगी. जी हां करीना जल्दी ही रिया कपूर के निर्देशन में बन रही फिल्म वीर दी वेडिंग से बॉलीवुड में कमबैक करने वाली हैं.

आपको बता दे कि बीते एक साल से उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया है, इसका कारण उनका बेबी है जिसे उन्होंने 20 दिसंबर को जन्म दिया है. और अब उनका बेबी 9 महीने का हो चुका है, ऐसे में करीना एक बार फिर अपने काम पर वापस लौट गई हैं.

हाल ही में वे अपने कमबैक को लेकर मीडिया से रूबरू हुई. जहां उन्होंने एक बहुत ही बड़ा खुलासा किया. करीना ने कहा कि जब वे सैफ अली खान से शादी करने का फैसला ले चुकी थी तो बहुत से लोगों ने उन्हें सलाह दी थी कि वे सैफ अली खान से शादी न करे. लेकिन उन्होंने सिर्फ अपने दिल की सुनी. आपको बता दे कि करीना की कमबैक फिल्म वीर दी वैडिंग में उनके साथ में सोनम कपूर और स्वरा भास्कर भी नजर आएंगी.

‘लगातार फिल्मों के दबाव में नहीं फंसना चाहिए’

बॉलीवुड एक्ट्रेस कियारा आडवाणी का कहना है कि किसी भी कलाकार को लगातार फिल्में करने के दबाव में नहीं फंसना चाहिए और इसकी जगह अपने काम की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए. कियारा ने वर्ष 2014 में कॉमेडी फिल्म ‘‘फुगली’’ से अपने करियर की शुरुआत की थी और पिछले साल वह फिल्म ‘‘एमएस धोनी’’ में एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के साथ नजर आई थीं. अब वह अब्बास-मस्तान की निर्देशित फिल्म ‘मशीन’ में नजर आने वाली हैं.

कियारा ने कहा, ‘‘यह सब फिल्म इंडस्ट्री में सही मौका मिलने और कड़ी मेहनत पर निर्भर है. आपको धैर्य रखने की जरूरत होती है क्योंकि काम के पूरा होने में टाइम लगता है, इसलिए आपको तैयार रहना चाहिए और लगातार फिल्में करने के दबाव को अपने उपर हावी नहीं होने देना चाहिए.’’

कियारा ने कहा, ‘‘आपको अपनी प्रतिभा पर भरोसा होना चाहिए क्योंकि अंत में यही आपकी मदद करेगा. व्यक्तिगत तौर पर मैं शिकायत नहीं कर सकती क्योंकि मेरी यात्रा अच्छी रही है. फिल्म ‘‘मशीन’’ में कियारा के साथ फिल्म निर्माता अब्बास के बेटे मुस्तफा बर्मावाला भी होंगे.

स्मार्ट बन जा रे : शहर के स्मार्ट बनने का परिणाम

शहर के स्मार्ट घोषित होने का अलग ही मजा है. रहते थे पहले भी हम उसी शहर में. जीवनशैली भी वही थी पहले अपनी, जो आज है. पर जब से अपने शहर को स्मार्ट यानी स्मार्ट सिटी घोषित कर दिया गया है, दिल झूमझूम कर गा रहा है ‘मैं वही, धड़कन वही न जाने ये क्या हो गया, सबकुछ लागे स्मार्टस्मार्ट सा.’ वह बात अलग है कि हमारे शहर को स्मार्ट घोषित किए जाने के बाद कई लोगों को स्मार्ट शब्द के बारे में अपने ज्ञान पर, शब्दकोश पर, संशय होने लगा है. अब बातबात पर संशय करने वालों की क्या बात की जाए. भाई, शहर स्मार्ट शहरों की सूची में शामिल हो गया है, तो इस का जश्न मनाओ. क्या चीनियों की तरह मुंह फुलाए बैठे हो जो ओलिंपिक गेम्स में इतने मैडल मिलने पर भी खुश नहीं हैं.

हम तो उस देश के वासी हैं जिस देश में अरबों की आबादी पर 2 मैडल मिलने पर भी खुश हो लेते हैं. अगर 2 मैडल भी न मिलें तो भी कोई बात नहीं. कई बार हम शून्य ले कर भी शान से लौटे हैं. आखिर शून्य का आविष्कार हमारे देश में ही तो हुआ था, फिर हम क्यों शून्य पर किसी और का अधिकार होने दें? हमारे ढेर सारे खिलाड़ी खेल आए विदेशों में, सफर कर आए हवाईजहाज से, अतिथि बन आए बड़ेबड़े होटलों के, यही क्या कम है हमारे लिए?

आखिर हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है. और गंगा के मैली होने के बाद भी, उस में और गंदगी जमा होने के बाद भी कोई फर्क पड़ता है हमें भला? गंगा के जल को बोतलबंद कर दो तो वह और भी पवित्र हो जाता है.

गंगा किनारे के शहर को हम स्मार्ट घोषित करवा लेंगे और सभी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी. शहरवासियों को बाढ़ में घिरने में भी स्मार्टस्मार्ट सी फीलिंग आएगी. नाव में महिलाएं बच्चे जनने में स्मार्टनैस का एहसास करेंगी. खामखां लोग सरकार को ड्रेनेज सिस्टम में खामी बता कर और पौलिसी पर रोक न लगाने का दोष देते हैं. यदि ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त कर दिया जाता, यदि पौलिथीन पर रोक लगा दी जाती तो बाढ़ का जो आनंद शहरवासी उठाते हैं वह उठा पाते? सड़क पर नाव चलाने का रोमांच ले पाते? नेतागण सपरिवार हैलिकौप्टर से बाढ़ का जायजा ले पाते?

जब से अपने शहर को स्मार्ट घोषित कर दिया गया है, दिल हर बात में, हर काम में स्मार्टनैस महसूस करता है. सुबह घर से निकलते ही, गड्ढे में पड़ते ही, मन हिचकोले खाने लगता है. सड़कमुक्त गड्ढे और गड्ढेयुक्त सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए भादो मास में भी सावन के झूले झूलने का एहसास होता है-सावन आए या न आए, गाड़ी जब गड्ढे में झूमे, समझो सावन है. सड़कों पर बहते पवित्र नाले का सुगंधित जल में ‘छई छपा छई’ गाने का अलग ही रोमांच होता है.

ट्रैफिक जाम में फंसने पर भी बड़ी स्मार्ट सी फीलिंग होती है. फीलिंग यह होती है कि अपने शहर में गाडि़यां इतनी हैं, गाड़ी वाले इतने हैं तभी तो रोड के चप्पेचप्पे गाडि़यों की फिल्लिंग से जाम हैं. जिन शहरों में, जिन देशों में गाडि़यों की संख्या कम है वहां क्या खाक जाम होगा? बिना मतलब के वे देश सार्वजनिक सेवा उपलब्ध करवा कर जनता को निजी गाड़ी से वंचित करते हैं. अपने यहां देखिए, बैंक हों या दूसरे वित्तप्रदाता, लोगों को निजी गाडि़यों के लिए प्रलोभित कर उन के अन्य खर्च कितना कम कर देते हैं. गाड़ी के मेंटिनैंस, बीमा, पैट्रोल आदि के बाद खर्चे करने के लिए पैसे काफी कम बचते हैं तो फिर खर्च होगा तो भला किस चीज पर?

और फिर अपने शहर की सड़कों के हर डिवाइडर फांद कर पार करने वाले युवा व बुजुर्गों को देख कर लगता है कि इन की स्मार्टनैस को देख कर ही हमारे शहर को स्मार्ट घोषित किया गया है. अब 100-200 मीटर दूर जा कर रोड क्रौस कर फिर सौदोसौ मीटर वापस आने में जो समय जाया होगा, उसे बचाना स्मार्टनैस नहीं तो और क्या है? सीधे डिवाइडर को फांद कर उस पार जाने में जो समय बचेगा, उस का स्मार्ट प्रयोग पानगुमटी पर खड़े हो कर कभी इस को, कभी उस को गरियाने का सदुपयोग हो सकता है कि नहीं?

जब से अपना शहर स्मार्ट घोषित हुआ है, अपन भी स्मार्ट महसूस कर रहे हैं. आप भी यदि अवसादग्रस्त हो तो अपने शहर को स्मार्ट घोषित करवा लो. यह वह क्रीम है जिस के शहर पर लगते ही चंद मिनटों में सभी शहरवासी स्मार्ट हो जाते हैं और फर्क दिखने लगता है.

मेरे घर वाले मेरी बहन की शादी एक लालची व्यक्ति से करने जा रहे हैं. मुझे उन्हें समझाने के लिए क्या करना चाहिए.

सवाल
मेरे घर वाले मेरी बहन की शादी निहायत एक लालची व्यक्ति से करने जा रहे हैं. लड़का इंजीनियर है. उस में कोई ऐब नहीं है पर उस के घर वाले मुंह फाड़फाड़ कर फरमाइशें कर रहे हैं और घर वाले हंसीखुशी उन्हें पूरा कर रहे हैं. मैं ने 1-2 बार एतराज किया तो मांबाप का कहना है कि हमारी बिरादरी में लेनदेन आम है. बाद में वे शिकायत करें कि उन्हें मनमाफिक सामान नहीं मिला, उस से अच्छा है कि पहले ही साफ और स्पष्ट बात कर ली जाए. इस में उन्हें कोई हरज नहीं लगता. वे जो भी कर रहे हैं किसी दबाव में नहीं खुशीखुशी कर रहे हैं. पता नहीं मेरे घर वाले समझ क्यों नहीं रहे?

जवाब
समाज में व्याप्त दहेज की कुप्रथा के लिए लड़के वाले ही नहीं लड़की वाले भी बराबर के कुसूरवार हैं, बल्कि लड़की वाले ज्यादा जिम्मेदार हैं, क्योंकि वे जानबूझ कर वर पक्ष की फरमाइशें पूरी करते हैं. सिर्फ उन के मांगने पर ही नहीं अपितु बिना मांगे भी तिजोरी का मुंह खोल देते हैं और जब भविष्य में उन का लालच बढ़ जाता है और वे मुंह खोल कर मांगते हैं तब दुखी होते हैं. लड़की वालों को लगता है कि दहेज ज्यादा देने से उन की लड़की ससुराल में सुखी रहेगी. आप के घर वाले यदि आप की बात नहीं मान रहे तो आप क्या कर सकते हैं.

अक्षय करते रहे इंतजार, राजेश खन्ना ने मिलने से कर दिया इनकार

करीब 100 से ज्यादा फिल्म कर चुके अक्षय कुमार को बौलीवुड में खिलाड़ी कुमार के नाम से भी जाना जाता है. 90 के दशक में फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले अक्षय को ‘मोहरा’ और ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ जैसी फिल्मों के बाद से एक्शन हीरो कहा जाने लगा था. अक्षय ने जहां फिल्मों में पैर जमाने के लिए कड़ी मेहनत की है. वही अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्हें काफी मशक्कत भी करनी पड़ी थी. क्या आप जानते हैं राजेश खन्ना की एक फिल्म में रोल करने के लिए अक्षय ने कई घंटों इंतजार किया और बाद में उन्हें ये कहकर वहां से निकाल दिया कि राजेश खन्ना तुमसे नहीं मिल सकते.

यह बात उस वक्त की है जब राजेश खन्ना बौलीवुड के सुपरस्टार हुआ करते थे. और अक्षय कुमार अपनी पारी की शुरुआत के लिए प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगा रहे थे. सन् 1990 में आई फिल्म ‘जय शिव शंकर’ का ऐलान राजेश खन्ना कर चुके थे.इस फिल्म में एक रोल के लिए उन्हे एक नए चेहरे की तलाश थी. जब इस बात का पता अक्षय को लगा तो वो भी इस फिल्म में रोल पाने के लिए राजेश खन्ना के औफिस पहुंचे. उस समय राजेश खन्ना फिल्म के लिए बाकी लोगों का स्क्रीन टेस्ट ले रहे थे. अक्षय भी उनसे मिलने के लिए लाइन में बैठ गए. कुछ घंटे इंतजार करने के बाद भी अक्षय का नंबर नहीं आया. आखिर में उन्हें ये कहकर जाने के लिए बोल दिया कि आपसे राजेश खन्ना नहीं मिल सकते. अक्षय कुमार को वहां से खाली हाथ ही लौटना पड़ा था.

उस समय अक्षय ने सपने में भी ये नहीं सोचा होगा कि जिनसे मिलने के लिए भी इतनी दौड़ भाग करनी पड़ती है कभी उनकी बेटी से उनकी शादी होगी. अक्षय कुमार ने राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की बेटी ट्विंकल खन्ना से दो बार सगाई होने के बाद 14 जनवरी 2001 को शादी कर ली.

धर्म के नाम पर पादरियों ने किया यौन दुराचार

धर्म अगर सदाचार सिखाता तो कैथोलिक ईसाई चर्च के मुखिया पोप को पादरियों द्वारा यौन दुराचार किए जाने के उन 2,000 मामलों को सुनना न पड़ता जो लोगों ने दक्षिण अमेरिका और यूरोप से वैटिकन के पलड़े में डाले हुए हैं. हजारों शिकायतें चर्चों में और पड़ी हैं, उन में से कुछ को वर्षों दबाए रखा जाता है तो कुछ पर लेदे कर फैसला किया जाता है. अविवाहित रहने का संकल्प लेने वाले पादरी और अन्य कैथोलिक चर्चों के पुजारियों द्वारा यौन दुराचार किए जाने की लाखों पीडि़ताएं हैं पर ज्यादातर चुप ही रहती हैं क्योंकि पीडि़ताएं समझती हैं कि यह उन के पापों की सजा है.

हिंदू धर्म की तरह ईसाई धर्म में भी पाप और पुण्य की मजेदार कहानियां होती हैं जिन का असल अर्थ यह है कि हर भक्त पापी है. इसलिए वह जम कर पुजारियों की सेवा करे, मन और धन से ही नहीं, तन से भी. धर्म की खासीयत यही रही है कि हर प्रकार के दुराचार के बावजूद यह न केवल पिछले 4,000 वर्षों से किसी न किसी रूप में हर समाज में मौजूद है, बल्कि फलफूल भी रहा है.

मानव समाज की सभ्यता की देन धर्म नहीं है. पर उस सभ्यता का लाभ कुछ जम कर उठा सकें, इस में धर्म की कोशिश सफल रही है. तकरीबन दुनियाभर में यौन दुराचार की पीडि़त औरतें आमतौर पर पादरियों, मुल्लाओं और पंडों के खिलाफ नहीं बोलतीं क्योंकि उन्हें तो धर्म के नाम पर बेपैसे का गुलाम बना रखा गया है. शरीर के माध्यम से वे कुछ राहत पा जाती हैं. चाहे चर्च या मंदिर में रहने वाली हों या घरों में.

औरतों पर धर्म का मानसिक शिकंजा इतना ज्यादा है कि वे यौन संबंधों के बदले जरा सा भी सुख पाने पर अपने को धन्य समझती हैं. आजकल विश्वभर में कैथोलिक व प्रौटैस्टैंटी चर्चों की ही नहीं, अन्य ईसाई संप्रदायों की सताई औरतें एक बड़ी मुसीबत बन गई हैं क्योंकि हर देश में धर्मरहित कानून व्यवस्था भी बन गई है जहां धर्म के कानून के ऊपर न्यायालय हैं, जिन में शिकायतें की जा सकती हैं.

हाल के वर्षों में धर्म की पुनर्स्थापना के नाम पर हर देश में कानूनों को धर्म के नीचे रखने की कोशिश की जा रही है. इसलामिक स्टेट पश्चिम एशिया में चला और वहां नागरिक कानून व्यवस्था को हटा कर खलीफा का कानून लागू कर दिया गया, जिस के तहत धार्मिक फौज को पैसे, औरतें और मनमानी करने के सुख मिलने लगे.

भारत में गौरक्षकों और रोमियो भक्षकों को मिले अनैतिक अधिकार आज सरकार के लिए ऐसे कर्मठ सिपाही मुहैया करा रहे हैं जिन की वजह से सरकार मनमानी कर पा रही है. यही पोपों के युग में सदियों तक होता रहा है. पिछले 200 वर्षों में जो सवाल खड़े करने के अधिकार जनता को मिले हैं उन्हीं का नतीजा है कि पोप को रोम के वैटिकन में सुप्रीम कोर्ट की तरह पूरा एक कार्यालय चर्च के पादरियों के खिलाफ आई दुराचार की शिकायतें सुनने के लिए बनाना पड़ा है.

कट्टर डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी इसलिए चुनाव जीते हैं क्योंकि धार्मिक शक्तियों ने अपने प्राचीन अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए और मेहनत करनी शुरू कर दी है. वे रंग, जाति, नस्ल, भाषा किसी का भी प्रयोग कर भक्तों पर होने वाले खुद के अत्याचारों व अपराधों को दबा कर रखना चाहते हैं.

बाबूमोशाय बंदूकबाज : सेक्स से भरपूर फिल्म

अपराध कथा वाले टीवी सीरियल और फिल्म ‘‘गैंग्स आफ वासेपुर’’ दोनों के मिश्रण का अति घटिया संस्करण है कुशान नंदी की फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’. यथार्थ सिनेमा और एक कांट्रैक्ट किलर की कहानी के नाम पर यह फिल्म महज प्यार, धोखा, राजनीति के कलुषित चेहरे और बदले की एक ऐसी कहानी है जो किसी को भी रास नहीं आ सकती.

फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’ की कहानी उत्तर भारत के एक छोटे कस्बे की है. पैसे के एवज में किसी का कत्ल करना बाबू का पेशा है. बाबू (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) एक राजनेता सुमित्रा (दिव्या दत्ता) के लिए काम करता है. सुमित्रा की जबान पर सदैव गंदी गंदी गालियां रहती हैं. तो दूसरी तरफ उसे फुलवा (बिदिता बाग) से प्यार भी हो गया है. सुमित्रा से पैसे लेकर बाबू एक इंसान की हत्या कर देता है. पर फुलवा के कहने पर बाबू बिना पैसे लिए अन्य दो की हत्या कर देता है. इसके एवज में फुलवा हमेशा के लिए बाबू की हो जाती है, मगर सुमित्रा अपने खास आदमी त्रिलोकी (मुरली शर्मा) के बहकावे में आकर बाबू से संबंध खत्म कर एक दूसरे राजनेता दुबे (अनिल जार्ज) से हाथ मिला लेती है. जबकि दुबे ने बाबू से हाथ मिलाया है.

दुबे, सुमित्रा के तीन खास आदमियों, (जिसमें त्रिलोकी भी शामिल है) को मारने का कांट्रैक्ट बाबू को देता है. बाबू, सुमित्रा को दीदी कहता है,इसलिए वह सुमित्रा को बताने जाता है कि उसे त्रिलोकी की हत्या का कांट्रैक्ट मिला है. यह बात दुबे को पता चल जाती है और दुबे उसी वक्त यास्मीन (श्रृद्धा दास) से बात कर उन तीन के साथ ही बाबू की हत्या का कांट्रैक्ट दे देता है. यास्मीन यह काम अपने प्रेमी बांके बिहारी (जतिन गोस्वामी) से कराती है, जो कि बाबू को अपना गुरू कहता है. अब बाबू और जतिन आमने सामने आ जाते हैं. दोनों के बीच शर्त लगती है कि दोनों में से जो पहले इन तीन को मारेगा, वह इस पेशे में रहेगा, दूसरा इस पेशे से चला जाएगा. हारने पर बांके बिहारी, बाबू को गोली मारकर कहता है कि उसे तो चार की हत्या का कांट्रैक्ट मिला था.

आठ साल बाद जब बाबू पुनः वापस आता है, तो बदले की कहानी शुरू होती है. एक मुकाम पर यह बात उजागर होती है कि बांके बिहारी ने फुलवा से शादी कर ली है और यास्मीन को प्यार में धोखा दे रहा है. जबकि बाबू और फुलवा का एक बेटा भी है. बहरहाल, बदला लेते हुए बाबू,सुमित्रा, दुबे, पुलिस अफसर, बांके बिहारी, फुलवा सभी की हत्या कर देता है. अपने बेटे को लेकर दूसरी जगह रहने चला जाता है, पर एक दिन उसका बेटा ही बाबू को गोली मार देता है.

फिल्म की कहानी व पटकथा जिस तरह से आगे बढ़ती है, वैसे वैसे लगता है कि यह फिल्म नहीं बल्कि सीरियल है, जिसमें लगभ सभी किरदार कई बार मर कर जी उठते हैं. अस्सी के दशक में जिस तरह से खून खराबा, बदले की कहानी व सेक्स से भरपूर ‘सी ग्रेड’ फिल्में बनती थी, उसी की दिलाती है कुशान नंदी की फिल्म ‘‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’’. फिल्म ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है, त्यों त्यों दर्शक फिल्म से खुद को अलग करता जाता है. यह फिल्म अति घटिया कहानी के साथ ही अति घटिया पटकथा की परिचायक है. फिल्मकार ने दर्शक जुटाने के लिए कहानी व पटकथा पर काम करने की बनिस्पत बेवजह का सेक्स परोसने पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दिया है. फिल्म में मनोरंजन व भावनाओं का घोर अभाव है. फिल्म किसी भी स्तर पर किसी की भी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती है. निर्देशक के रूप में कुशान नंदी अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाते.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो पूरी फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपने स्वाभाविक अभिनय के साथ छाए रहते हैं. नवाजुद्दीन सिद्दिकी के सामने जतिन गोस्वामी कहीं नहीं टिकते. दिव्या दत्ता एक अच्छी अदाकारा हैं, यह बात उन्होने पुनः साबित किया है बिदिता बाग के अभिनय की भी तारीफ करनी पड़ेगी. मगर इन कलाकारों को अपने किरदारों को निभाते समय पटकथा से कोई मदद नहीं मिली.

दो घंटे व तीन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ का निर्माण किरण श्राफ, कुशान नंदी, अश्मित कुंडेर हैं. फिल्म के निर्देशक कुषान नंदी, लेखक गालिब असद भोपाली तथा कलाकार हैं- नवाजुद्दीन सिद्दिकी, बिदिता बाग, दिव्या दत्ता, जतिन गोस्वामी, श्रद्धा दास, मुरली शर्मा, अनिल जार्ज, भगवान तिवारी व अन्य.

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