Funny Story: अर्थशास्त्री की पहली ससुराली होली

Funny Story: तिवारीजी को होली के एक हफ्ते पहले से ही ससुराल आने का लगातार फोन आ रहा था. बारबार फोन आए भी क्यों न, आखिर टौकटाइम और डाटा फ्री जो है.

तिवारीजी के लिए खुशकिस्मती की बात यह थी कि शादी के बाद उन्हें पहली बार गांवमहल्ले की सालियों और सलहजों के साथ ससुराली होली खेलने का मौका मिल रहा था.

पेशे से शिक्षक तिवारीजी उच्च विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे. शिक्षक और विषय विशेषज्ञ होने के चलते उन का सारा हिसाबकिताब भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह संतुलित होता था. ससुराल जाने में आर्थिक समस्या लोकतांत्रिक मुद्दों की तरह आड़े आ रही थी.

महंगाई और जीएसटी की मार से जब पूरा देश जूझ रहा है, तो भला हमारे तिवारीजी कैसे महफूज रहते. कैशलैस तिवारीजी काफी होपलैस नजर आ रहे थे, क्योंकि फरवरी महीने की तनख्वाह इनकम टैक्स में जा चुकी थी और ऊपर से दुकानदार, धोबी, दूध वाले का बकाया उधार अलग.

तिवारीजी गजब धर्मसंकट में फंसे हुए थे. बड़ी, छोटी, मं?ाली हर साइज की सालियां बारबार फोन कर के न्योता दे रही थीं, साथ ही देशी घी की मिठाई और रंग, गुलाल, पिचकारी लेते आने का इमोशनल दबाव भी बनाया जा रहा था.

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लंदन बसने वाले को अरबों रुपए का सरकारी लोन मिल जाता है, पर ससुराल जाने वाले को 1,000 रुपए का कर्ज मिलना भी काफी मुश्किल है.

काफी मशक्कत के बाद ‘ससुराल से लौटते ही उधार चुका देने’ की शर्त पर एक दोस्त ने उन्हें 1,000 रुपए का उधार दे कर दोस्ती और इनसानियत की दोहरी जिम्मेदारी निभाई.

तिवारीजी मन ही मन सोच रहे थे, ‘सासससुर के पैर लगाई में आशीर्वाद के साथ शगुन के रूप में कुछ न कुछ नकद नारायण तो मिलेगा ही, उसी से उधार चुका दूंगा… कम से कम ससुराल जाने और आने में हुए खर्च में लगी पूंजी तो वसूल हो ही जाएगी’.

उस 1,000 रुपए में से संदेश मिठाई खरीदने के नाम पर तिवारीजी ने 500 रुपए अलग निकाल लिए. 300 रुपए किराया और बाकी बचे 200 रुपए में होली मना कर ससुराल जाने और वापसी की रूपरेखा तैयार कर ली.

‘खाली हाथ बिना संदेश मिठाई के भी कोई ससुराल जाता है भला, वह भी पहली बार, उस पर होली का मौका,’ यह सोच कर तिवारीजी मिठाई की दुकान पर पहुंच गए और मिठाई वाले से मिठाई का मोलभाव करने लगे.

‘‘रसगुल्ला 700, पेड़ा 750, चमचम 650, बरफी 700, काजू कतली 1,200, मुरब्बा 350, रसकदम 850 रुपए प्रति किलो…’’ दुकानदार भी सीडी की तरह बजते हुए अपनी मिठाइयों की कीमत बताने लगा.

तिवारीजी थोड़ा सकुचाते हुए बोले, ‘‘भैया, आप की दुकान में सब से सस्ती मिठाई कौन सी है?’’
हलवाई बोला, ‘‘जलेबी ले लो सरजी… डेढ़ सौ रुपए किलो लगेगी.’’

तिवारीजी उधेड़बुन में पड़ गए कि ‘महज 500 रुपए में क्या लूं? जलेबी तो ससुराल ले जा नहीं सकता… अगर रसगुल्ला भी लेता हूं, तो 3 पाव ही होंगे… काजू कतली आधा किलो भी नहीं आ पाएगी… देशी घी की दूसरी मिठाइयां भी ढाई सौ ग्राम से ज्यादा नहीं आ पाएंगी…’

‘‘क्या पैक कर दूं सर?’’ तिवारीजी मन में गुणाभाग कर ही रहे थे कि हलवाई के सवाल ने उन का सारा कैलकुलेशन बिगाड़ दिया.

‘‘नहीं कुछ… बस यों ही दाम का आइडिया ले रहा था…’’ बोलते हुए तिवारीजी दुकान से बाहर निकल आए.

तिवारीजी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. उन्हें कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि तभी एक फल का ठेला दिखाई दिया. फिर वहां पहुंच कर वे सभी फलों के दाम जानने लगे. अनार 200, नारंगी 80, सेब 240 रुपए किलो थे. ड्राई फ्रूट की कीमत पूछने की तिवारीजी में न ऊर्जा थी और न ही खरीदने की औकात.

काफी मोलभाव के बाद 2 किलो सेब तुलवाए और दुकानदार को 500 रुपए का नोट थमा दिया. दुकानदार ने तय कीमत काट कर 20 रुपए का नोट तिवारीजी को लौटा दिया.

तिवारीजी मन ही मन संतुष्ट थे, ‘चलो, संदेश मिठाई के बदले 2 किलो सेब से थैला भराभरा सा लगेगा… रही बात साली की, तो सेहत के नुकसान का हवाला देते हुए मिठाई और चर्म रोग, प्रदूषण, स्वच्छ भारत का हवाला देते हुए रंग पिचकारी नहीं लेने की बात कह दूंगा.

‘सेब भी अपने बजट में आ गए… और तो और, बीवीसाली के गुलाबी गालों को लालहरा करने के लिए गुलाल के 60 रुपए भी बच गए… अब होगी जानदारशानदार डिजिटल होली.’

ऐसा लग रहा था कि तिवारीजी का अर्थशास्त्र पढ़ना व पढ़ाना आज कामयाब हो गया. वे खुश मन से बसस्टैंड पहुंच कर ससुराल जाने वाली बस में सवार हो गए.

ससुराल में कदम रखते ही तिवारीजी को पता चला कि उन के ससुरजी सुबह ही सासू मां के साथ अपनी ससुराल होली मनाने निकल गए हैं. तिवारीजी को मानो 440 वोल्ट का झटका लग गया. शेयर बाजार की तरह उन का मनोबल और अर्थबल धड़ाम से नीचे गिर गया.

शगुन के रूप में पैसा वापसी का एकमात्र साधन सासससुर के वहां न होने से तिवारीजी के चेहरे का रंग लालपीला पड़ने लगा. दोस्त की उधार वापसी का उन का सारा गणित फेल जो हो चुका था.

तिवारीजी अगला कैलकुलेशन करने के लिए कुछ नया सोचते, इस से पहले एक साली ने उन के हाथ से गिफ्ट झपट लिया और दूसरी साली ने उन के ऊपर रंग का गुब्बारा मार कर ‘हैप्पी होली’ बोल कर उन का ध्यान भंग कर डाला.

Hindi Story: मरियम बनी मरजीना

Hindi Story: आज मरियम ने नहाते समय अपने बालों को अच्छी तरह धोया और बालों को खुला छोड़ने के बाद उस ने आसमानी रंग का सूट पहना. वह आईने में अपना चेहरा निहारने लगी.

सामने से आती हुई रोशनी जब मरियम के चेहरे पर पड़ी, तो उस के चेहरे की चमक और बढ़ गई. अपनी सूरत पर खुद ही फिदा हो गई थी मरियम.

भले ही मरियम की उम्र 30 साल की हो गई थी, मगर वह अब भी दिखने में एकदम जवान, सैक्सी और खूबसूरत थी.

मरियम का लंबा कद, गोरा रंग और तीखी नाक उसे एक अफगानी औरत का सा लुक देते थे. उस की छाती सुडौल और कसावट लिए हुए थी और पतली कमर वाली मरियम जब चलती थी, तो कसबे के लोग उस के उभरे हुए अंगों को आगेपीछे से ताड़ते नजर आते थे.

पर इतना होने के बाद भी मरियम की खूबसूरती भोगने वाला कोई नहीं था. वह रात को तनहा बिस्तर पर लेटती, तो अकेलेपन के चलते उसे देर तक नींद नहीं आती थी. उस का मन चाहता था कि कोई मर्द उसे अपनी बांहों में जकड़ ले और बेतहाशा चूमे, पर उसे करवटों से ही संतोष करना पड़ता था.

मरियम की जिंदगी में यह सुख आया जरूर था, पर ठहर न सका था. दरअसल, मरियम महज 20 साल की थी, तभी उसे पास के ही एक गांव के 30 साल के रईस नाम के लड़के के साथ ब्याह दिया गया था.

रईस सिर्फ नाम से ही रईस था, पैसों के नाम पर उस के पास ज्यादा कुछ न था. वह पास के शहर में मजदूरी करने जाता था, पर कभी भी उस का मन शहर में नहीं लगा. वह कभी दूसरे दिन तो कभी तीसरे दिन गांव वापस आ जाता था.

पहलेपहल तो मरियम ने रईस को दबी जबान में सम?ाने वाले लहजे में कहा कि माना कि उन दोनों का निकाह हुआ है और उसे मरियम से मुहब्बत है, पर शहर से इतनी जल्दी आना ठीक नहीं, क्योंकि आनेजाने में खर्चा होता है, उसे छुट्टी लेनी पड़ती है और फिर शहर के काम और मजदूरी का भी नुकसान होता है. इस के अलावा अम्मीअब्बू भी क्या कहते होंगे कि निकाह के बाद तो रईस एकदम जोरू का गुलाम ही हो गया है.

पर रईस पर मरियम की बातों का कोई असर नहीं होता था. वह मरियम को दोपहर में ही पकड़ लेता था और उस के नाजुक अंगों से तब तक खेलता था, जब तक उस का मन भर नहीं जाता था.

जिस्म की भूख पूरी हो जाने के बाद रईस हाथमुंह धो कर गांव घूमने निकल जाता था और फिर देर रात को ही वापस आता था. अम्मीअब्बू की डांट का तो उस पर कोई असर होता ही नहीं था.

बेचारी भोलीभाली मरियम तो सम?ाती थी कि रईस उस की मुहब्बत के चलते गांव में आता है, पर उसे तो आसपड़ोस की औरतों ने बताया था कि रईस का एक दूसरी औरत से चक्कर चल रहा है, इसलिए मरियम थोड़ा सचेत रहे. मरियम को भला रईस के खिलाफ कही गई बातों पर कब यकीन होने वाला था?

पर, उस दिन जब मरियम रईस की कमीज साफ करने से पहले जेबें टटोल रही थी, तब उसे कागजनुमा टुकड़ा मिला, जो असल में एक औरत की तसवीर थी. अब तो मरियम परेशान हो गई थी.

बड़ी बेशर्मी से रईस ने पूछताछ में कबूल भी कर लिया था कि गांव की एक औरत से उस का नाजायज रिश्ता है और ऐसा कहते हुए रईस के चेहरे पर मर्दाना ऐंठन थी.

रईस ने मरियम से यह भी कहा कि उस का यह रिश्ता कई सालों से है और वह उस औरत को किसी भी हाल में छोड़ नहीं पाएगा.

उस दिन तो मरियम ने यह बात बरदाश्त कर ली थी, पर समय बीतने के साथ रईस अपने नाजायज रिश्ते में कुछ ज्यादा ही बिजी रहने लगा और शहर की मजदूरी भी छोड़ दी. तब मरियम ने अम्मीअब्बू और रईस के सामने एतराज जताया.

रईस अपनी जोरू के इस तरह के विरोध के लिए तैयार नहीं था. उस ने गुस्से में मरियम को खूब मारा और बाद में ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर उसे घर से निकाल दिया.

बेचारी मरियम उस समय पेट से हो चुकी थी. उस ने रईस और उस के अम्मीअब्बू से गुहार भी लगाई, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

अब मरियम के पास मायके वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं था. मरियम के मायके में सिर्फ उस की अम्मी ही थीं. अब्बू की मौत तो पहले ही हो चुकी थी.

एक औरत के लिए उस के मायके के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं. मरियम के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अब अपने मायके में ही रहने लगी थी और समय आने पर उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

घर का खर्चा बढ़ गया था. मरियम की मां सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थीं. मरियम भी उन का हाथ बंटाने लगी. अम्मी ने उसे सिलाई और रेशमी कपड़े पर महीन कढ़ाई के खूब गुर सिखाए. मरियम भी कढ़ाई के काम में खूब मन लगाती थी. रंगीन फूलबूटे तो ऐसा काढ़ती कि देखते ही बनते थे.

कामधाम थोड़ा ठीक चलने लगा तो अचानक ही मरियम की अम्मी का इंतकाल हो गया. बेचारी मरियम और उस का 5 साल का बेटा आदिल अब इस घर में अकेले रह गए थे.

‘‘न जाने कितने इम्तिहान बाकी हैं मेरे,’’ मरियम मन ही मन बुदबुदाती और आंसू ढुलकाती.

वह छोटा बच्चा ही मरियम की जिंदगी की एकमात्र उम्मीद था, जिस के सहारे वह समय काट देती, पर यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था.

धीरेधीरे मरियम की दूसरी शादी के लिए उस पर आसपास के लोगों और उम्रदराज मर्दों का दबाव बनने लगा, पर मरियम ने शादी की हर बात को सिरे से खारिज कर दिया था.

‘‘जब एक बार मेरे मर्द ने मुझ से बेवफाई की है, तो दूसरी बार ऐसा नहीं होगा, इस का क्या भरोसा है?’’ मरियम की आवाज में दर्द झलकता था.

घर का खर्च चलाने के लिए मरियम ने सिलाईकढ़ाई का काम शुरू कर दिया था. वह बाजार से थोक रेट वाली दुकान से कपड़ा खरीद कर लाती और उन पर रंगबिरंगे व सुनहरे धागों से कढ़ाई करती और ऐसा कर के उस ने कई मेजपोश, आईने के कवर और चुनरी तैयार कर ली थीं.

ये सारे सामान अगर बिक जाते, तो मरियम को कुछ पैसे जरूर मिल जाते और आमदनी का एक सिलसिला भी चल निकलता.

इस काम के लिए मरियम कसबे के एक दुकानदार रफीक के पास पहुंची.

रफीक के साथ उस गांव काएक पंडित भी बैठा था, जिसे कसबे के लोग ‘बड़े पंडितजी’ कहते थे.

बड़े पंडितजी थे बड़े एक नंबर के औरतखोर. कसबे की गरीब और जरूरतमंद औरतों को घूरना और नाजायज रिश्ते बनाना उन का पसंदीदा काम था.

रफीक से बड़े पंडितजी की अच्छी बनती थी. उस ने मरियम को बैठाया और उस के आने का सबब पूछने लगा. उस की नजरें बातोंबातों में ही मरियम के जिस्म को टटोलने लगी थीं.

मरियम के उभरे सीने को देख कर रफीक के मुंह में पानी आ गया था और वह मन ही मन मरियम के जिस्म को भोगने के सपने देखने लगा था.

रफीक समझ गया था कि मरियम एक जरूरतमंद औरत है और उसे अपने कब्जे में कर पाना बहुत आसान होगा, इसलिए उस ने मरियम से कहा, ‘‘आप चिंता बिलकुल मत करो. अपना बनाया हुआ सारा सामान हमारी दुकान पर छोड़ जाया करो. हम उसे बेच कर वाजिब दाम दे दिया करेंगे.’’

बड़े पंडितजी भी चुपचाप बैठे हुए मरियम के जिस्म के उतारचढ़ाव का मुआयना कर रहे थे.

रफीक की बात सुन कर मरियम मन ही मन बहुत खुश हो गई थी. उस ने रफीक को शुक्रिया कहा और घर आ कर कढ़ाई का काम और भी तेजी से करने लगी.

कुछ ही दिनों में मरियम ने बाजार से खरीदी हुई एक सादा चुनरी पर कढ़ाई कर के उसे और भी खूबसूरत बना दिया था.

अपना काढ़ा हुआ सामान ले कर मरियम रफीक के पास गई. रफीक मरियम को देख कर फिर से खूब मीठी बातें करने लगा और बातोंबातों में मरियम के जिस्म को छूने की कोशिश भी कर लेता था.

रफीक की ऐसी हरकतों से मरियम परेशान तो महसूस कर रही थी, पर इस समय उस की मजबूरी थी, क्योंकि कसबे में रफीक की ही ऐसी दुकान थी, जो खूब चलती थी और फिर शहर में कई बड़े दुकानदारों से रफीक की अच्छी पहचान थी.

रफीक चाहे तो मरियम का धंधा चुटकियों में पनपा सकता है, ऐसा सोच कर मरियम खामोश थी, पर उस ने अपने जिस्म को समेटते हुए दुपट्टे को अपने जिस्म पर कस कर लपेट लिया था.

रफीक ने मरियम को एक हफ्ते के बाद आने को कहा, पर मरियम को तो यह एक हफ्ता बहुत लग रहा था, इसलिए वह 5वें दिन ही रफीक के पास पहुंच गई थी.

रफीक उस समय अपनी दुकान पर बैठा हुआ कुछ काम कर रहा था. पास ही बड़े पंडितजी भी बैठे हुए मोबाइल में रील देख रहे थे. मरियम को देख कर रफीक खुश हो गया. ऐसा लगा कि आज वह उस का पहले से इंतजार कर रहा था.

रफीक ने मरियम को एक स्टूल पर बिठाया. मरियम ने कुछ कहना चाहा, पर रफीक ने अनसुना कर दिया और दुकान के अंदर चला गया. वापसी में उस के हाथ में चाय के 2 गिलास थे.

‘‘लो, पहले तुम चाय पियो मरियम,’’ रफीक ने चाय आगे बढ़ाई.

पहले तो मरियम थोड़ा हिचकी, पर रफीक के बारबार कहने पर मरियम ने चाय ले ली और छोटेछोटे घूंट भरने लगी.

बड़े पंडितजी मरियम को चाय पीते देख रहे थे. चाय पीने के बाद मरियम बात शुरू करने जा ही रही थी कि उस का सिर भारी होने लगा और आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा.

मरियम अपनेआप पर काबू न रख सकी और बेहोश हो कर एक ओर लुढ़क गई. रफीक को तो इसी पल का इंतजार था. उस ने तुरंत अपनी दुकान का शटर अंदर से बंद कर लिया.

बेहोश मरियम को निहारते हुए रफीक ने मरियम की सलवार का नाड़ा खोल कर एक ओर फेंक दिया और फिर कुरता भी उतार फेंका.

रफीक मरियम के नंगे जिस्म को देख कर पागल हो उठा था. वह कभी मरियम के निढाल जिस्म को अपनी बांहों में कसता, तो कभी मरियम के अंगों पर अपने होंठ रगड़ने लगता.

रफीक पर हवस का भूत बहुत हावी हो चुका था और फिर जल्दी से उस ने अपने भी कपड़े उतार फेंके और फिर मरियम के कोमल जिस्म पर हावी हो गया.

उस दौरान बड़े पंडितजी अपने मोबाइल में यह सारा गंदा काम कैद करते रहे.

रफीक के हटने के बाद बड़े पंडितजी ने भी अपने कपड़े उतार फेंके और मरियम के जिस्म का मजा लेने लगे.

मरियम के साथ कई बार सैक्स करने के बाद उस के नंगे बदन को रफीक अपने मोबाइल में कैद करना नहीं भूला था.

जब मरियम को होश आया, तब रफीक उस के पैरों के पास बैठा हुआ था और अपने मोबाइल पर वही वीडियो देख रहा था. मरियम को सम?ाते देर नहीं लगी कि उस की इज्जत लुट चुकी है.

रफीक और बड़े पंडितजी की निगाहें मरियम को पहले से ही ठीक नहीं लग रही थीं, पर उस की मजबूरी और गरीबी उसे आज इस हाल में ले आई थी कि इन दोनों भेडि़यों ने उस के साथ मुंह काला कर के कहीं का नहीं छोड़ा था.

मरियम ने भारी मन से अपने कपड़े पहने. उस के मन में तूफान सा चल रहा था. उस की आबरू लुट चुकी थी. अब उसे दुनिया में सिर्फ खुदकुशी कर लेने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था. दरिंदों ने इस तरह उस के जिस्म को नोचा था कि उस की हर नस दर्द हो रही थी.

‘पर, अगर मैं मर गई तो मेरे बच्चे का क्या होगा? वह किस के सहारे रहेगा?’ अपने 5 साल के बच्चे आदिल का खयाल आते ही मरियम ने तुरंत अपना फैसला बदल लिया. वह गुस्से में अपने घर पहुंची और बालटी भरभर कर नहाने लगी.

मरियम के मासूम बच्चे को भला क्या पता था कि उस की अम्मी पर क्या गुजरी है.

इस घटना को 3 दिन ही गुजरे थे कि मरियम के पास रफीक आया और अपने मोबाइल की तरफ इशारा कर के उस से आज फिर हमबिस्तर होने की मांग की और ऐसा न करने पर उसे पूरे कसबे में बदनाम कर देने की धमकी दे डाली. साथ ही, उस के धंधे को भी खत्म कर देने की बात कही.

मरियम आंसुओं में डूब गई, क्योंकि अब तो रफीक और बड़े पंडितजी उसे उस की वीडियो का डर दिखा कर न जाने कितने दिनों तक हमबिस्तरी की मांग करते रहेंगे… यह सोच कर वह परेशान हो उठी, पर अगले पल ही उसे उम्मीद की एक किरण दिखाई दी और वह उम्मीद की किरण थी कानून और पुलिस.

मरियम ने कोठरी में ताला लगाया और पुलिस चौकी पहुंच गई. वह पुलिस को आपबीती सुनाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी को गिरफ्तार करने की मांग करने लगी.

पुलिस वालों ने चटकारे ले कर मरियम की कहानी को एक नहीं, बल्कि कई बार सुना, पर रिपोर्ट नहीं लिखी. और तो और, मरियम से यह भी कहा कि वे कैसे भरोसा करें कि उस का रेप हुआ है और मरियम से सुबूत दिखाने को कहा गया.

बेचारी मरियम शर्म से गड़ गई और बिना कुछ कहे वापस आने लगी.

मरियम पुलिस चौकी से बाहर निकली, तो उसे पीछे से किसी ने आवाज दी. वह एक 35 साल का नौजवान था. उस नौजवान ने बताया कि वह इसी कसबे का एक दलित जाति का नौजवान घामू है, जो बचपन से ही फिल्मों में जाना चाहता था और शौक के चलते कसबे में होने वाले ड्रामा और नाटकों में भाग लिया करता था, पर बड़े पंडितजी को यह कतई मंजूर नहीं था कि कोई पिछड़ी जाति का ऊंची जाति के बनाए मंच पर आए और उन के साथ उठेबैठे, इसलिए बड़े पंडितजी ने घामू को बुला कर नाटक में भाग लेने से
मना किया.

पर घामू को तो ऐक्टिंग का शौक था और कसबे के लोग भी उसे पसंद करते थे, इसलिए उस ने ऐक्टिंग को जारी रखा. उस की इस बात से बड़े पंडितजी चिढ़ गए और अपने गुरगों द्वारा घामू की 16 साल की बहन को उठवा लिया, उस के साथ रेप किया और उस की वीडियो बना कर घामू की बहन को ब्लैकमेल करने लगे. बाद में परेशान हो कर घामू की बहन ने नदी में कूद कर अपनी जान दे दी.

मरियम और घामू चलते हुए पुलिस चौकी से काफी दूर निकल आए थे.

मरियम घामू की बात तो सुन रही थी, पर यह सम?ा नहीं पाई थी कि वह उसे यह सब क्यों बता रहा है?

घामू ने मरियम को आगे बताया कि उसे एक ऐसी औरत की तलाश है, जो थोड़ी सी हिम्मत दिखाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी के खिलाफ पुख्ता सुबूत जमा कर सके.

‘‘पर, मुझे तो सिलाईकढ़ाई और खाना बनाने के अलावा कुछ नहीं आता. ऐसे में बदला लेने जैसी बात तो मैं सोच भी नहीं सकती,’’ मरियम ने कहा,

जिस के बदले में घामू ने उसे अपना मोबाइल दिखाते हुए कहा कि मरियम, तुम बिलकुल मत घबराओ. वह उसे सबकुछ सिखा देगा, बस उसे एक नाटक खेलना होगा.

मरियम ने उन खतरनाक और गंदे किरदार वाले लोगों से किसी भी तरह का बदला लेने से इनकार कर दिया, तो घामू ने उस की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा कि तब तो वे लोग उसे जिंदगीभर यों ही परेशान करते रहेंगे और उस के जिस्म से खिलवाड़ भी करते रहेंगे. यह बात मरियम की समझ में आ गई थी, इसलिए उस ने हां में सिर हिला दिया.

2-3 दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा. घामू ने मरियम से कहा, ‘‘देखो मरियम, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि उन के पास तुम्हारी वीडियो और फोटो हैं, इसलिए अब तुम्हें मोबाइल की कुछ तकनीक सीखनी होगी और तुम अब वह करो, जो मैं तुम्हें बताता हूं.’’

घामू ने मरियम को एक प्लान बताया, जिसे सुन कर मरियम की आंखें हैरत से फैलती चली गईं.

उस दिन दोपहर में जब मरियम बाजार से आ रही थी, तब रफीक ने उसे फिर से घेर लिया और आज उस की दुकान पर आ कर शाम को रंगीन बनाने की बात कहने लगा, जिस के बदले में मरियम ने सकुचाते हुए हां कर दी.

शाम को 7 बजे मरियम रफीक की दुकान पर पहुंच गई. रफीक ने मरियम के आते ही दुकान का शटर बंद कर दिया और मरियम को दुकान के अंदर बने एक कमरे में ले गया.

यह कमरा साफसुथरा था. वहां कोने में एक दीवान पड़ा हुआ था, जिस पर बड़े पंडितजी पहले से बैठे थे और शराब पी रहे थे.

रफीक ने मरियम को अपनी बांहों में भरना चाहा, तो वह तुरंत छिटक गई और बोल्ड अंदाज दिखाते हुए बोली कि आज वह उन लोगों को मरजीना वाला डांस दिखाएगी और फिर उन का मूड बनाएगी.

‘यह मरजीना वाला डांस कौन सा होता है भाई?’ वे दोनों एक आवाज में बोले, तो मरियम ने उन्हें बताया कि मरजीना वाला डांस यानी वह डांस, जो ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ नाम की फिल्म में मरजीना करती है.

ऐसा कहने के साथ ही मरियम ने अपना कुरता अपने बदन से अलग कर दिया, पर अंदर वह एक छोटी कुरती पहने हुए थी, जिसे देख कर रफीक और बड़े पंडितजी मूड में आ गए और पागल से होने लगे.

मरियम अपने साथ एक मिनी स्पीकर लाई थी और उस पर ‘महबूबा ओ महबूबा’ वाला गाना बजा दिया और अपनी कमर को सैक्सी अंदाज में लचकाने लगी. बीचबीच में वह किसी साकी की तरह उन दोनों को शराब भी पिला देती थी.

मरियम का सैक्सी डांस देख कर रफीक से रहा नहीं गया और उस ने मरियम को पकड़ लिया और कुछ कहने लगा, पर मरियम ने उसे पहले स्पीकर की ओर इशारा कर के गाना बंद करने को कहा और फिर अपना कुरता पहन कर वापस रफीक के सामने आ कर बैठ गई.

‘‘अब बताओ कि क्या कहना चाह रहे हो?’’ मरियम ने शांत लहजे में पूछा, तो रफीक और बड़े पंडितजी ने मरियम से कहा, ‘‘नाच बहुत हुआ, अब तुम हमारा बिस्तर गरम कर दो.’’

मरियम ने उन से पूछा, ‘‘तुम लोग किसी औरत की गंदी वीडियो क्यों बनाते हो?’’

‘‘अरे, तुम जैसी सैक्सी औरतों और लड़कियों को बेहोश कर के हम पहले तो उन का रेप करते हैं और उस के बाद उन की गंदी वीडियो अपने पास रख लेते हैं, जिस के बल पर हम बारबार उन औरतों का रेप करते हैं,’’ शराब के नशे में बड़े पंडितजी सबकुछ बोले जा रहे थे.

‘‘तो क्या मेरे अलावा और कोई भी आप के जाल में फंस चुकी है,’’ मरियम के इस सवाल के जवाब में रफीक ने कई लड़कियों के नाम गिना दिए.

‘‘लेकिन, सब से ज्यादा मजा उस नाटक करने वाले घामू की बहन के साथ आया था. बहुत कसावट भरी थी वह,’’ बड़े पंडितजी अपनी आंखों को सिकोड़ते हुए बोले.

मरियम अचानक उठी. उस ने अपना स्पीकर भी उठा लिया और उस के पीछे छिपे मोबाइल को उठा कर चल दी.

रफीक और बड़े पंडितजी उसे रोकने लगे, तो मरियम ने गुस्से से घूरते हुए कहा, ‘‘तुम लोगों के खिलाफ सारे सुबूत इस मोबाइल में आ चुके हैं. अब पुलिस ही तुम लोगों से बात करेगी,’’ और इस के बाद मरियम ने अंदर से बंद शटर को खोलने की कोशिश की, पर उस से भारी शटर नहीं खुला.

पर अचानक किसी ने बाहर से हाथ लगाते हुए शटर खोल दिया. वह और कोई नहीं, बल्कि घामू ही था और उस के साथ थी पुलिस और न्यूज चैनल के पत्रकार.

पुलिस ने पूरे हालात का जायजा लिया. मरियम ने रफीक और बड़े पंडितजी पर ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण का आरोप लगाते हुए चोरी से बनाए गए उस वीडियो को मीडिया और पुलिस को सौंप दिया, जिस में वे दोनों शराब के नशे में अपने गलत कामों की शेखी बघार रहे थे.

पुलिस को मीडिया के दबाव में उन दोनों को गिरफ्तार करना पड़ गया था.

घामू और मरियम का बदला पूरा हो गया था. भले ही मरियम के साथ हुए रेप की बात फैल गई थी, पर कम से कम रफीक और बड़े पंडितजी अब किसी और लड़की की जिंदगी तो बरबाद नहीं कर सकेंगे.

कुछ दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा, तो मरियम उसे देख कर सहज भाव से मुसकरा दी और उस का बेटा आदिल घामू के गले लग गया.

घामू ने मरियम से उस की तारीफ करते हुए कहा कि कितनी जल्दी उस ने डांस करना और मोबाइल से चोरी से वीडियो बनाना और दूसरी बातों को सीख लिया, जिस के बदले में मरियम के गोरे गालों पर शर्म की लाली दौड़ गई थी.

मरियम को मुसकराते देख फौरन ही घामू ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया, पर मरियम चुप थी.

घामू मरियम के चेहरे पर छाई खामोशी का मतलब नहीं सम?ा पा रहा था. उस ने बेसब्री से कहा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो मरियम?’’

‘‘पगले इतना भी नहीं जानते कि औरत की खामोशी का मतलब ही उस का इकरार होता है,’’ शरमाते हुए मरियम ने कहा, तो घामू ने भी खुशी से मरियम के माथे को चूम लिया.

ठीक उसी समय आदिल ने मोबाइल से उन दोनों की तसवीर खींच ली.

Hindi Story : डांस बार पर्यटन

Hindi Story : जीवन बीमा निगम में काम करते हुए गुप्ताजी अब रिटायरमैंट के नजदीक थे. एक बेहतरीन मैनेजर के रूप में उन्होंने अपने सेवाकाल के पूरे 34 साल गुजार दिए थे. 2 बेटों की शादी कर अपनी बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी कर वे संतोष के भाव से अपनी नौकरी कर रहे थे. अब तक मशीन की तरह की दिनचर्या में खास रंगों की कमी, जिसे काफी हद तक बोरिंग लाइफ कहा जा सकता है, में ही उन के दिन कट रहे थे. न पर्यटन, न तीर्थाटन, बस किसी तरह उन्होंने इतने साल बिता दिए थे.

पूजापाठी धर्मपत्नी भी बाहर घूमने की इच्छा रखने वाली कभी न रही, तो पत्नी के साथ घर छोड़ कर साथ में कभी न घूमना तय हो पाया, न कभी देवालय दर्शन की योजना पूरी हो पाई.

औफिस के 3-4 नौजवान शिरडी के सांईं बाबा के दर्शन का प्रोग्राम बना रहे थे, तो गुप्ताजी से भी चलने के लिए पूछा गया. पहले तो उन्होंने आदतन मना कर दिया, पर शाम तक विचार करने और पत्नी से मोबाइल पर सलाह करने के बाद साथ चलने की रजामंदी दे दी.

सबकुछ तय होने के बाद 3-4 दिन का कार्यक्रम राजस्थान, गुजरात के रास्ते पड़ने वाली जगहों को बहुत कम समय देते हुए दिल्ली से एक गाड़ी में 5 लोग 2 दिन में शिरडी पहुंच गए.

आस्था का सैलाब भक्तों की भीड़ के साथ दर्शन करने के बाद पूरी तरह शांत हो चुका था. गुप्ताजी अपनेआप को बहुत हलका महसूस कर रहे थे. ऐसा कि जो उन्होंने कई सालों में महसूस नहीं किया था.

एक जगह भोजन करते हुए अब आगे के प्रोग्राम के लिए चर्चा होने लगी, तो गुप्ताजी हैरान हो कर बोले, ‘‘तो यहां से वापस घर लौटने का अभी कोई प्रोग्राम नहीं है न?’’

एक साथी मजाकिया अंदाज में बोला, ‘‘हम ने पुराने पाप तो धो लिए हैं, अब कुछ नए पाप कर लेते हैं.’’

एक जोर का ठहाका लगा और दूसरे साथी ने सु?ाया, ‘‘अब यहां से गोवा चलते हैं. खूब बीयर पिएंगे और बीच पर मस्ती करेंगे.’’

सब ने गुप्ताजी की तरफ देखा, जैसे वे सब तो तय कर ही चुके हैं, अब उन को भी अपनी रजामंदी दे देनी चाहिए.

गुप्ताजी 5 मिनट तक कुछ न बोले, तो एक साथी फिर से बोला, ‘‘क्या बात है गुप्ताजी, मन क्या कह रहा है? हमारे साथ चलिए गोवा. आप की बरसों की थकान वहां मसाज करा कर मिटा देंगे.’’

गुप्ताजी ने पूरा कौर चबाया, फिर धीरे से बोले, ‘‘हमारी जवानी में मनोरंजन के नाम पर सिर्फ सिनेमाघर में मूवी देखना होता था. उन मूवीज में कैबरे और बार में डांस देख कर मन बड़ा खुश हो जाता था. कब से मेरी इच्छा रूबरू ऐसा बार डांस देखने की है.’’

गुप्ताजी की यह बात सुन कर कुछ समय के लिए बाकी लोगों की चुप्पी आंखों ही आंखों में बात करती रही. किसी को भी गुप्ताजी की मनतरंग के ऐसे धमाके की कतई उम्मीद नहीं थी.

एक साथी बोला, ‘‘डांस बार तो मुंबई में थे, जो अब बंद हो चुके हैं. यह कैसे मुमकिन है…’’

सब से पहले एक और नौजवान साथी बोला, ‘‘पहली बार तो गुप्ताजी ने कोई इच्छा जाहिर की है. हम इसे पूरा करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. मेरा एक दोस्त मुंबई के एक होटल में मैनेजर है. उस से बात करता हूं,’’

और उस ने तुरंत मुंबई फोन लगाया, तो छूटते ही सामने से जवाब आया, ‘अब कौन से डांस बार… वे तो कब के बंद हो चुके हैं…’

‘‘भाई, कैसे भी यह इंतजाम करना ही है. कहीं से भी पता करो, पर यह इंतजाम कराओ.’’

‘ठीक है, मैं पता करने की कोशिश करता हूं कि कहीं पर चोरीछिपे चल रहे हैं क्या…’ उधर से आवाज आई.

आधे घंटे बाद ही उस मैनेजर का फोन आया और उन्हें अंधेरी में एक बार का नाम बताते हुए वहां पहुंचने की जरूरी जानकारी दे दी गई.

दिल्ली का दल फटाफट पूरी ऊर्जा के साथ मुंबई पंहुच गया. ट्रैफिक की भीड़भाड़ को देखते हुए गाड़ी को छोड़ अंधेरी तक का सफर लोकल ट्रेन से किया गया.

अंधेरी स्टेशन के बाहर खड़ी टैक्सी को जब बार का नाम ले कर चलने के लिए कहा गया, तो 3 लोगों ने तो मना कर दिया, फिर चौथे टैक्सी वाले की जेब में चुपचाप 500 का नोट डाल कर उस से बार का नाम ले कर छोड़ने को कहा गया.

ड्राइवर बोला, ‘‘मैं चुपचाप थोड़ी दूरी पर छोड़ कर चला आऊंगा. वहां से अपनेआप चले जाना.’’

‘‘क्यों भाई, ऐसा क्या है वहां, जो तुम इतना बिदक रहे हो?’’ एक साथी ने टैक्सी ड्राइवर से पूछा.

‘‘भाई, तुम जगह ही ऐसी जा रहे हो. वहां पहुंचोगे तो पता चल जाएगा,’’ वह टैक्सी ड्राइवर बोला.

इतना सुनते ही सब लोग फुरती से गाड़ी में बैठे और तकरीबन 20 मिनट में टैक्सी ड्राइवर उन्हें बार से कुछ ही दूर उतार कर रफूचक्कर हो गया.

थोड़ी देर के बाद वे लोग उस दबेछिपे डांस बार को खोजने में कामयाब हो गए. आगे से बेकरी की दुकान से एक छोटा सा दरवाजा उन्हें एक बड़े से कमरे में ले आया, जहां उन का सामना 3 लंबेचौड़े बाउंसर से हुआ.

परखने के बाद उन्हें भीतर बने स्टेज के पास रखी गोल मेज के चारों तरफ रखी कुरसियों पर बैठा दिया गया. बीयर भी उन की मांग के मुताबिक परोस दी गई.

10 मिनट तक कोई हलचल नहीं हुई, फिर हिम्मत कर के एक नौजवान साथी बाउंसर से पूछने गया कि डांस कब और कैसे शुरू होगा.

बाउंसर ने पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘वह देखो लड़कियां स्टेज पर आ कर खड़ी हो गई हैं. अब उन में से पसंद कर जिस भी लड़की को टिप दोगे, वह आप की पसंद के गाने पर डांस कर के दिखाएगी.’’

उस साथी ने लौट कर सब को बात बताई और गुप्ताजी की पसंद पूछी, जिन पर बीयर का नशा अब कुछकुछ चढ़ने लगा था. शादी के बाद यह उन का पहला सुरासेवन हो रहा था.

गुप्ताजी ने हौले से अपनी पसंद की लड़की की ओर इशारा किया, तो नौजवान साथी ने दौड़ कर 500 रुपए लड़की को थमाए और 1,000 के छुट्टे 10-20 रुपए के नोट में ले आया और टेबल पर जमा दिए.

‘तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’ गाने पर गुप्ताजी की पसंद वाली लड़की ने 5-6 मिनट तक अपने डांस से उन पांचों का मनोरंजन करने की कोशिश की. नोट भी खूब बरसाए, पर अभी मजा नहीं आया था.

फिर उस नौजवान साथी ने माहौल को गरमाने का भार अपने कंधे पर ले लिया. अपनी पैनी नजर से उस ने एक और लड़की को 500 के 2 नोट दिए और गुप्ताजी की ओर इशारा कर ‘टिपटिप बरसा पानी…’ गाने पर मदमस्त डांस करने को कहा. पैसे की मिठास ने बार डांसर को गाने की पहली बीट से ही जोश में ला दिया.

अपनी घनी जुल्फों को उस लड़की ने पूरी तरह खोल दिया और अगले 10 मिनट में मस्त हो कर वह ऐसे नाचने लगी कि गुप्ताजी भी सबकुछ भुला कर उस के साथ ठुमके लगाने लगे.

सभी लोग मजे ले रहे थे, पर एक साथी उस समूह में ऐसा था, जो सुरापान से परहेज रखता था और अब सब को लौटने के लिए कहने लगा. गुप्ताजी अभी और समय वहां बिताना चाहते थे, पर थोड़ी देर में बिल चुकता कर सब वहां से निकल गए.

गुप्ताजी नशे में चूर बारबार गा रहे थे, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जिंदगी में पहली बार इस तरह का मजा उन्होंने लिया था, जिस ने उन्हें अपनी बरसों से दबी फैंटेसी को पूरा होने से खुद को खुद से भुला दिया था.

वे बारबार अपने सफर के साथियों के गले लग कर बस एक ही लाइन दोहराते, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जैसे उस शाम के लिए वे बारबार धन्यवाद कह रहे हों.

रात की मस्ती होटल पहुंच कर पूरी हो गई. हावी हो रही थकान और नशे के सुरूर ने जल्दी सब को नींद के आगोश में ले लिया. अगली सुबह सब ने एकमत हो कर घर लौटने का फैसला कर लिया.

घर लौटे गुप्ताजी की चुस्ती और फुरती को देख कर घर वाले हैरान थे. सांईं बाबा की कृपा मान कर बाकी घर वाले भी जल्द ही शिरडी दर्शन जाने का विचार करने लग गए थे.

लेकिन असलियत तो गुप्ताजी ही जानते थे, जिन पर अभी तक डांस बार की लड़कियों की खुमारी नहीं
उतरी थी.

Love Crime: इश्क में डूबा शादाब, विवाहिता के इश्क ने ले ली जान!

Love Crime: सुबह के 10 बज रहे थे. बरसात का मौसम होने के कारण उस दिन सुबह से ही उमस भरी गरमी पड़ रही थी. अफजाल उस समय अपने ड्राईंगरूम में बैठा चाय पी रहा था. जैसे ही उस ने चाय का प्याला खाली कर के रखा तो अचानक उस के घर के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी थी.

कौन है?’’ अफजाल ने पूछा

मैं हूं भाईजान, सावेज.’’ बाहर से आवाज आई.

अरे सावेज, तुम? अंदर आ जाओ.’’ यह कहते हुए अफजाल ने दरवाजा खोल दिया था.

इस के बाद सावेज अंदर आ कर अफजाल के पास बैठ गया था. सावेज अफजाल का छोटा भाई था. अफजाल की बीवी मरजीना ने जब सावेज को आया देखा था तो वह उस के लिए चाय बनाने किचन में चली गई थी. इस के बाद अफजाल व सावेज एकदूसरे का हालचाल पूछने लगे थे और आपस में बातें भी करने लगे थे.

अचानक सावेज बोला, ”भाई, तुम ने भाभी मरजीना के बारे में कुछ सुना है?’’

हां सावेज, रिश्तेदारी और मोहल्ले में जो बातें फैल रही हैं, मैं उस से बाकायदा वाकिफ हूं. पड़ोसी कस्बे मंगलौर के रहने वाले शादाब द्वारा समाज व रिश्तेदारी में हमें बदनाम किया जा रहा है, जिस से हम समाज में सिर उठा कर जी न सकें.’’ अफजाल बोला. 

मगर यह बात भी भाभी मरजीना द्वारा ही शुरू की गई थी. भाभी को रील बनाने की और उसे फेसबुक पर लोड करने की आदत थी तथा वह अपनी आदत के चलते पड़ोस के युवक शादाब से दिल लगा बैठी थी. इस के बाद भाभी उस के साथ लिवइन में रहने लगी थी.’’ सावेज बोला.

तेरी भाभी के शादाब के साथ लिवइन में रहने के कारण हमें कस्बा मंगलौर छोडऩा पड़ा था. इसी कारण हमें वहां से 10 किलोमीटर दूर यहां रुड़की में आ कर रहना पड़ रहा है. मैं जानता हूं कि तेरी भाभी पहले रंगीली तबियत की थी, मगर अब तो शादाब हमें लगातार बदनाम करने में लगा है. अब हम कैसे अपनी इज्जत बचाएं?’’ अफजाल बोला.

तुम इस की चिंता मत करो भाईजान, मैं ने इस का रास्ता ढूंढ लिया है. हमें शादाब को जल्दी से जल्दी रास्ते से हटाना पड़ेगा. भाभी मरजीना से कहेंगे कि वह फोन कर के शादाब को अपने घर बुला ले. इस के बाद हम उसे घेर लेंगे. फिर हम तीनों उस की गला दबा कर हत्या कर देंगे. फिर यह मामला खुद ही शांत हो जाएगा.’’ सावेज बोला.

मगर शादाब की हत्या के बाद उस की लाश को हम लोग कहां छिपाएंगे? ”अफजाल ने पूछा.

तुम उस की चिंता मत करो. यह काम मुझ पर छोड़ दो भाईजान. शादाब की लाश को हम बोरे में डाल कर पास में बह रही गंगनहर में रात में ही फेंक देंगे. इस के बाद किसी को भी पता नहीं चलेगा कि शादाब कहां चला गया.’’

कैसे रची मौत की साजिश

सावेज की इस योजना पर अफजाल व मरजीना ने अपनी मुहर लगा दी थी और वे तीनों अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने की फिराक में लग गए थे. शादाब के साथ लिवइन में पहले तो मरजीना रहती थी, मगर मंगलौर में अपनी हो रही बदनामी की वजह से वह रुड़की रेलवे स्टेशन के पास की कालोनी तेलीवाला में अपने पति व देवर के साथ आ कर रहने लगी थी. मरजीना का शौहर बिजली मैकेनिक था.

वह 23 अगस्त, 2024 की सुबह थी. उस वक्त सुबह के 11 बज रहे थे. कोतवाली मंगलौर के कोतवाल शांति कुमार उस वक्त अपने औफिस में बैठे फाइलों पर हस्ताक्षर कर रहे थे. उस वक्त मंगलौर के मोहल्ला मलकपुरा निवासी 55 वर्षीय मुस्तकीम कोतवाल से मिलने पहुंचा था. उस वक्त मुस्तकीम के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और वह घबराया हुआ सा लग रहा था. मुस्तकीम ने कोतवाल को बताया कि उस का 24 वर्षीय बेटा शादाब आसपास के क्षेत्र में फेरी लगाकर कपड़े बेचता है. गत दिवस वह किसी से मिलने के लिए घर से निकला था, मगर आज तक वह वापस घर नहीं लौटा है. उस का मोबाइल नंबर भी स्विचऔफ चल रहा है.

जब कोतवाल शांति कुमार ने मुस्तकीम से पूछा कि शादाब की किसी से दुश्मनी तो नहीं थी तो मुस्तकीम ने बताया कि शादाब का सभी से अच्छा व्यवहार था. मुझे उस के अपहरण की भी आशंका नहीं है. मुझे शक है कि शादाब किसी साजिश का शिकार तो नहीं हो गया. इस के बाद शांति कुमार ने मुस्तकीम को शादाब की गुमशुदगी की तहरीर लिख कर उस का फोटो ले कर कोतवाली आने को कहा था. 

मलकपुरा मोहल्ला एसआई रफत अली के हलके में आता था, अत: शांति कुमार ने शादाब की गुमशुदगी का मामला रफत अली को ही सौंप दिया था. शादाब की गुमशुदगी का मामला हाथ में आते ही रफत अली सक्रिय हो गए. सब से पहले उन्होंने कांस्टेबल मनोज वर्मा व पप्पू कश्यप को मोहल्ला मलकपुरा में भेजा तथा उन से शादाब के बारे में पूरी जानकारी हासिल करने को कहा. इस के बाद रफत अली ने एसपी (देहात) स्वप्न किशोर सिंह से संपर्क कर के उन से इस मामले में उन का निर्देशन मांगा.

स्वप्न किशोर सिंह ने तत्काल गुमशुदा शादाब के मोबाइल की काल डिटेल्स एसओजी से निकलवाने के निर्देश रफत अली को दिए. अगले दिन पुलिस को शादाब की काल डिटेल्स भी मिल गई थी. शादाब के मोबाइल पर आई अंतिम काल पर एसआई रफत अली के शक की सूई अटक गई थी. उधर सिपाही मनोज वर्मा व पप्पू कश्यप ने शादाब के बारे में जो जानकारी हासिल की तो वह चौंकाने वाली थी. पता चला कि शादाब की कई महीनों से मरजीना नामक महिला से दोस्ती थी. मरजीना शादीशुदा थी, लेकिन वह शादाब के साथ लिवइन में रहती थी. शादाब उस पर रुपए उड़ाता था. शादाब के घर वालों ने उसे काफी समझाया, लेकिन वह उस का साथ छोडऩे को तैयार नहीं था.

घर बुला कर क्यों की हत्या

अपने शौहर की बदनामी की वजह से मरजीना ने मंगलौर कस्बा छोड़ दिया था और रुड़की के रेलवे स्टेशन से सटी कालोनी तेलीवाला में आ कर रहने लगी थी. दोनों सिपाहियों ने एसआई रफत अली को बताया कि शादाब के लापता होने में मरजीना का हाथ हो सकता है. यह जानकारी पा कर रफत अली ने मरजीना से पूछताछ करने का विचार बनाया. यह भी पता चला कि शादाब के मोबाइल पर आई अंतिम काल भी मरजीना के ही फोन से की गई थी.

वह 26 अगस्त, 2024 का दिन था. रफत अली ने शादाब के लापता होने के बारे में पूछताछ करने के लिए मरजीना व उस के पति अफजाल को कोतवाली मंगलौर में बुलाया था. शाम को जब मरजीना अपने शौहर अफजाल के साथ कोतवाली पहुंची तो उस समय वहां पर सीओ (मंगलौर) विवेक कुमार भी मौजूद थे. सीओ विवेक कुमार ने शादाब के बारे में मरजीना से पूछताछ की तो मरजीना व अफजाल के चेहरे का रंग सफेद पड़ गया. पहले तो दोनों ने पुलिस को गच्चा देने का प्रयास किया था, मगर वे दोनों सीओ विवेक कुमार के प्रश्नों के जवाब में ही उलझ गए थे. 

अंत में मरजीना ने पुलिस के सामने शादाब की हत्या की बात कुबूल कर ली थी. मरजीना ने पुलिस को बताया कि गत 22 अगस्त, 2024 को मैं ने ही शादाब को फोन कर के अपने घर पर बुलाया था. शादाब द्वारा हमारे परिवार को बदनाम करने के कारण हम उस से बदला लेना चाहते थे. जब शादाब मरजीना के घर पर पहुंचा तो मरजीना और उस के पति अफजाल ने शादाब के हाथ व पैर पकड़ लिए थे. इस के बाद सावेज ने शादाब का गला दबा कर उस की हत्या कर दी थी. रात को 2 बजे तीनों ने शादाब के शव को एक बोरे में डाल लिया. फिर उस बोरे को बाइक पर ले जा कर अफजाल व सावेज ने शव गंगनहर में डाल दिया था.

पुलिस ने मरजीना के ये बयान रिकौर्ड कर लिए थे. इस के बाद सावेज को भी हिरासत में ले लिया गया. सावेज की निशानदेही पर शादाब का मोबाइल फोन व उस की चप्पलें भी बरामद कर ली गईं. अफजाल व सावेज ने मरजीना के दिए बयानों का समर्थन किया था. फिर एसएसपी प्रमेंद्र डोवाल ने मंगलौर कोतवाली पहुंच कर शादाब हत्याकांड का खुलासा कर दिया. इस के बाद पुलिस ने इन तीनों आरोपियों को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया था.

कथा लिखे जाने तक मंगलौर पुलिस व जल पुलिस द्वारा गंगनहर के अथाह जल में शादाब के शव को तलाश किया जा रहा था. मरजीना, अफजाल व सावेज रुड़की जेल में बंद थे. शादाब हत्याकांड की विवेचना थानेदार रफत अली द्वारा की जा रही थी. रफत अली शीघ्र ही आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य जुटा कर चार्जशीट अदालत में भेजे जाने की तैयारी कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Grihshobha Inspire Awards 2025 में प्रेरणादायक महिलाओं को किया सम्मानित

Grihshobha Inspire Awards 2025: नई दिल्ली, 21 मार्च 2025 –गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स 2025 का आयोजन 20 मार्च 2025 को त्रावणकोर पैलेस, नई दिल्ली में किया गया. इस कार्यक्रम में उन असाधारण महिलाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. इस कार्यक्रम में लोक कला, शासन, सार्वजनिक नीति, सामाजिक कार्य, व्यवसाय, विज्ञान, ऑटोमोटिव और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों की प्रभावशाली और उपलब्धि हासिल करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार उन लोगों को दिया गया जिन्होंने जिन्होनें अपने सामने आने वाली सभी मुश्किलों को पार कर एक नई राह बनाई.

इस इवेंट को लाइव देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें – https://www.facebook.com/share/v/15annFyN5g/?mibextid=wwXIfr

इस समारोह में, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शासन में परिवर्तनकारी नेतृत्व के लिए केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सुश्री के.के. शैलजा को पुरूस्कृत किया गया. साथ ही प्रसिद्ध अदाकारा सुश्री शबाना आज़मी को सिनेमा में उनके योगदान और मजबूत एवं मुश्किल किरदारों के प्रदर्शन के लिए मनोरंजन के माध्यम से सशक्तिकरण – आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. डॉ. सौम्या स्वामीनाथन को सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक अनुसंधान में उनके अग्रणी नेतृत्व के लिए नेशन बिल्डर – आइकन पुरस्कार मिला. टाइटन वॉचेस की सीईओ सुश्री सुपर्णा मित्रा को कॉर्पोरेट नेतृत्व में नए स्टैंडर्ड स्थापित करने के लिए बिजनेस लीडरशिप – आइकन पुरूस्कार दिया गया.

अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार विजेताओं में सुश्री मंजरी जरूहर शामिल रहीं, जिन्हें पुलिसिंग में उनके अग्रणी करियर के लिए फियरलेस वारियर – आइकन के रूप में सम्मानित किया गया. ग्रामीण कारीगरों को सशक्त बनाने वाली जमीनी स्तर की नेता सुश्री रूमा देवी को ग्रासरूट्स चेंजमेकर – आइकन पुरस्कार मिला, जबकि सुश्री अमला रुइया को जल संरक्षण में उनके अग्रणी कार्य के लिए ग्रासरूट्स चेंजमेकर – अचीवर के रूप में सम्मानित किया गया. सुश्री विजी वेंकटेश को कैंसर देखभाल में उनके सरहानीय योगदान के लिए न्यू बिगिनिंग- आइकन से सम्मानित किया गया.

बिजनेस इंडस्ट्री में, भारत की पहली कीवी वाइन मैकर सुश्री तागे रीता ताखे को बिजनेस लीडरशिप-अचीवर से सम्मानित किया गया, जबकि मेंस्ट्रुपीडिया की फाउंडर सुश्री अदिति गुप्ता को होमप्रेन्योर-अचीवर से सम्मानित किया गया. सुश्री कृपा अनंथन को ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में चेंजमेकर के रूप में सम्मानित किया गया, और सुश्री किरुबा मुनुसामी को उनकी कानूनी सक्रियता के लिए सोशल इम्पैक्ट-अचीवर से पुरूस्कृत किया गया. डॉ. मेनका गुरुस्वामी और सुश्री अरुंधति काटजू को लैंगिक समानता और LGBTQ समुदाय के अधिकारों के लिए उनकी ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई के लिए संयुक्त रूप से सोशल इम्पैक्ट-चेंजमेकर से सम्मानित किया गया.

लोक कलाओं के संरक्षण में उनके योगदान के लिए, डॉ. रानी झा को फोल्क हेरिटेज-आइकन से सम्मानित किया गया. डॉ. बुशरा अतीक को STEM में उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया.

एंटरनमेंट और डिजिटल इन्फ्लुएंस में, सुश्री तिलोत्तमा शोम और और सुश्री कोंकणा सेन को मनोरंजन के माध्यम से सशक्तिकरण के लिए ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन सम्मानित किया गया. सुश्री लीजा मंगलदास को कंटेंट क्रिएटर -एम्पावरमेंट, सुश्री श्रुति सेठ को कंटेंट क्रिएटर – पेरेंटिंग और डॉ. तनया नरेंद्र को कंटेंट क्रिएटर – हेल्थ में उनकी उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया.

माननीय अतिथि

सभी पुरस्कार आरटीआई कार्यकर्ता सुश्री अरुणा रॉय, वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री इंदिरा जयसिंह, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री शोवना नारायण और महिला अधिकार कार्यकर्ता एवं राजनीतिज्ञ सुश्री सुभाषिनी अली द्वारा प्रदान किए गए. इन विशिष्ट अतिथियों ने अपने प्रेरणादायक शब्दों के साथ विजेताओं की उपलब्धियों के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया.

जूरी पैनल

पुरस्कारों का निर्णय प्रतिष्ठित और सम्मानित महिलाओं के एक प्रतिष्ठित जूरी पैनल द्वारा किया गया, जिसमें लेखिका और फेमिना की पूर्व संपादक सुश्री सत्या सरन, लोकप्रिय अभिनेत्री सुश्री पद्मप्रिया जानकीरमन, चंपक की संपादक सुश्री ऋचा शाह, लर्निंग लिंक्स फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री नूरिया अंसारी, आउटवर्ड बाउंड हिमालय की डायरेक्टर सुश्री दिलशाद मास्टर और कारवां की वेब संपादक सुश्री सुरभि कांगा शामिल थीं.

कार्यक्रम में बोलते हुए, दिल्ली प्रेस के प्रधान संपादक और प्रकाशक श्री परेश नाथ ने कहा: “गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड उन लोगों को श्रद्धांजलि है जो आम धारणाओं को चुनौती देते हैं, और बदलाव लाने के लिए और भविष्य को आकार देने के लिए रचनात्मकता और साहस का उपयोग करते हैं. शोर से अभिभूत दुनिया में, ये पुरस्कार विजेता हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा नेतृत्व उन लोगों के शांत लेकिन परिवर्तनकारी प्रभाव में निहित है जो सत्ता के सामने सच बोलने और ईमानदारी के साथ नेतृत्व करने का साहस करते हैं.”

गृहशोभा के बारे में:

गृहशोभा, जिसे दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित किया जाता है, भारत की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली हिंदी महिला मैगजीन है, जिस के 10 लाख से अधिक रीडर्स हैं. यह मैगजीन 8 भाषाओं (हिंदी, मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलुगु और बंगाली) में प्रकाशित होती है और इस में घरगृहस्थी, फैशन, सौंदर्य, कुकिंग, स्वास्थ्य और रिश्तों पर रोचक लेख शामिल होते हैं. पिछले 45 सालों से गृहशोभा महिलाओं के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बनी हुई है.

दिल्ली प्रेस के बारे में:

दिल्ली प्रेस भारत के सबसे बड़े और विविध पत्रिका प्रकाशनों में से एक है. यह परिवार, राजनीति, सामान्य रुचियों, महिलाओं, बच्चों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी 36 पत्रिकाएं 10 भाषाओं में प्रकाशित करता है. इस की पहुंच पूरे देश में फैली हुई है.

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Murder Story : सगाई तोड़ने का लिया बदला, भरे बाजार उतारा मौत के घाट

Murder Story : 17 अप्रैल, 2023 को रोशनी का डिजिटल मार्केटिंग का पेपर था. वह जालौन जिले के एट कस्बा स्थित रामलखन पटेल डिग्री कालेज में बीए (द्वितीय वर्ष) की छात्रा थी. इसी कालेज में उस की बड़ी बहन शीलम भी पढ़ती थी. वह बीए फाइनल में थी. उस का हिंदी साहित्य का पेपर था. सुबह 8 बजे उन दोनों को उन का भाई श्रीचंद्र अपनी बाइक से कालेज गेट पर छोड़ कर चला गया था.

लगभग साढ़े 10 बजे रोशनी और शीलम परीक्षा दे कर कालेज से निकलीं. हाथों में प्रवेश पत्र थामे दोनों बहनें अपने घर की तरफ चल दीं. चलतेचलते दोनों आपस में बातचीत भी करती जा रही थी. जैसे ही वे कोटरा तिराहे की ओर बढ़ीं, तभी रोशनी एकाएक ठिठक कर रुक गई.

किसी अनचाहे शख्स के अंदेशे में उस ने पलट कर देखा. पीछे एक बजाज पल्सर बाइक सवार को देख कर उस की आंखों में खौफ की छाया तैर गई. क्योंकि वह बाइक पर पीछे की सीट पर बैठे युवक को जानती थी. रोशनी ने तुरंत अपनी बड़ी बहन शीलम का हाथ जोर से पकड़ा और घसीटते हुए कहा, ”जरा तेज कदम बढ़ाओ.’’

शीलम ने रोशनी को खौफजदा पाया तो फौरन पलट कर पीछे देखा. वह भी पूरा मामला समझ गई. इस के बाद दोनों बहनें फुरती से तेजतेज चलने लगीं.

 

चेहरे पर हलकी दाढ़ी और सख्त चेहरे वाला युवक राज उर्फ आतिश था, जो रोशनी का मंगेतर था, पर किसी वजह से उस से सगाई टूट गई थी. राज व उस के साथी को देख कर दोनों बहनों की चाल में लडख़ड़ाहट आ गई थी. आशंका को भांप कर रोशनी ने मोबाइल निकाल कर किसी का नंबर मिलाया.

वह मोबाइल पर बात कर पाती, उस के पहले ही राज बाइक से उतर कर उस के पास पहुंच गया. उस ने मोबाइल वाला हाथ झटकते हुए रोशनी का गला दबोच लिया. गले पर कसते सख्त हाथों की गिरफ्त से छूटने के लिए रोशनी ने जैसे ही हाथ चलाने की कोशिश की, राज ने कमर में खोंसा तमंचा निकाला और रोशनी के सिर पर सटा कर फायर कर दिया.

गोली लगते ही रोशनी चीखी और सड़क पर बिछ गई. उस के सिर से खून की धार बह निकली. कुछ देर छटपटाने के बाद रोशनी ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. बदहवास शीलम ने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन उस के गले से आवाज निकलने के बजाय वह जड़ हो कर रह गई. इसी बीच कुछ लोगों को आते देख कर राज डर गया. हड़बड़ाहट में वह भागा तो उस का तमंचा हाथ से छूट गया. वह बिना तमंचा उठाए ही अपने साथी के साथ बाइक पर सवार हो कर फरार हो गया.

हत्यारे फरार हो गए, तब शीलम जोरजोर से चीखने लगी. उस ने कई लोगों से मदद मांगी, लेकिन सभी ने मुंह फेर लिया. उस के बाद उस ने हिम्मत जुटा कर मोबाइल फोन से अपने घर वालों को जानकारी दी.

सामने हुई हत्या तमाशबीन क्यों रहे लोग

रोशनी की हत्या की खबर सुनने के बाद घर में कोहराम मच गया. कुछ ही देर बाद मृतका के मम्मीपापा, भाई व परिवार के अन्य लोग वहां पहुंच गए और खून से लथपथ रोशनी की लाश देख कर दहाड़ मार कर रोने लगे.

रोशनी की हत्या दिनदहाड़े कस्बे के कोटरा तिराहे के भीड़ भरे बाजार में की गई थी, लेकिन हत्यारों का सामना करने की कोई हिम्मत नहीं जुटा सका था. दुकानदार तो इतने दहशत में आ गए थे कि वे अपनी दुकानों के शटर गिरा कर तमाशबीन बन गए थे.

 

दरअसल, दहशत इसलिए थी कि एक दिन पहले ही कुख्यात माफिया अतीक व उस के भाई की हत्या प्रयागराज में गोली मार कर की गई थी. लोगों के दिमाग में भय था कि इस हत्या का कनेक्शन कहीं उस वारदात से तो नहीं जुड़ा है.

घटनास्थल से एट कोतवाली की दूरी मात्र 200 मीटर थी. कोतवाल अवधेश कुमार सिंह चौहान को वारदात की खबर लगी तो वह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पहुंच गए. पुलिस के पहुंचते ही भीड़ का सैलाब उमड़ पड़ा. कोतवाल अवधेश कुमार सिंह ने मामले की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी, फिर निरीक्षण में जुट गए.

21 वर्षीया रोशनी की हत्या सिर में गोली मार कर की गई थी. शव के पास ही .315 बोर का तमंचा पड़ा था, जिस से उस की हत्या की गई थी. पुलिस ने तमंचे को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया. मृतका का मोबाइल फोन व प्रवेशपत्र भी वहीं पड़ा था. पुलिस ने उसे भी सुरक्षित कर लिया.

अभी यह सब काररवाई चल ही रही थी कि एसपी डा. ईरज राजा, एएसपी असीम चौधरी तथा सीओ (कोंच) शैलेंद्र बाजपेई भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया.

पुलिस अफसरों के आते ही चीखपुकार बढ़ गई. मृतका की मम्मी सुनीता, पापा मानसिंह तथा भाई श्रीचंद्र दहाड़ें मार कर रोने लगे. पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह उन्हें शव से अलग किया, फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. फोरैंसिक टीम ने जांच कर साक्ष्य जुटाए.

घटनास्थल पर मृतका की बहन शीलम मौजूद थी. पुलिस अधिकारियों को उस ने बताया कि उस की बहन रोशनी की हत्या उस के मंगेतर राज उर्फ आतिश ने की है. वह कंदौरा थाने के गांव जमरेही का रहने वाला है. रोशनी और राज आपस में प्रेम करते थे. मम्मीपापा ने दोनों का रिश्ता भी तय कर दिया था.

लेकिन जब रोशनी को पता चला कि राज गुस्से वाला, शक्की व सनकी स्वभाव का है तो रोशनी ने उस से शादी करने से इंकार कर दिया. इस से वह नाराज हो गया और रोशनी को डराने धमकाने लगा. रोशनी नहीं मानी तो आज उस ने गोली मार कर उस की हत्या कर दी. उस के साथी को वह जानती पहचानती नहीं है.

निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस ने मृतका रोशनी के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही मृतका की बड़ी बहन शीलम की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 के तहत राज उर्फ आतिश तथा एक अज्ञात व्यकित के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने ऐसे ढूंढ निकाला आरोपी

एसपी डा. ईरज राजा ने छात्रा रोशनी हत्याकांड को बड़ी गंभीरता से लिया. अत: आरोपियों को पकडऩे के लिए उन्होंने पुलिस की 4 टीमें गठित कीं. एक टीम सीओ (कोंच) शैलेंद्र बाजपेई तथा दूसरी टीम कोतवाल अवधेश कुमार सिंह की अगुवाई में गठित की.

एसओजी तथा सर्विलांस टीम को भी सहयोग के लिए शामिल किया. इन चारों टीमों ने आरोपितों के हरसंभावित ठिकानों, हमीरपुर, कंदौरा, जमरेही, विवार तथा धनपुरा में ताबड़तोड़ दबिशें दीं, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी.

शाम 5 बजे कोतवाल अवधेश कुमार सिंह को मुखबिर के जरिए पता चला कि आरोपी राज एट थाने के गांव सोमई में किसी परिचित के घर छिपा है. इस सूचना पर पुलिस टीम ने सोमई गांव में दबिश डाल कर और उसे दबोच लिया. पुलिस टीम ने उस की बिना नंबर प्लेट वाली बजाज पल्सर बाइक भी बरामद कर ली. पूछताछ के लिए उसे थाना एट लाया गया.

थाने में जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और रोशनी की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. उस ने बताया कि रोशनी उस की प्रेमिका थी. वह उस से शादी करना चाहता था. घर वाले भी राजी हो गए थे, लेकिन रोशनी ने शादी से इंकार कर दिया. उस ने उसे प्यार से भी समझाया और धमकाया भी. लेकिन जब वह नहीं मानी तो उसे मौत की नींद सुला दिया.

”तुम्हारे साथ जो अन्य युवक था, उस से तुम्हारा क्या संबंध है?’’ कोतवाल अवधेश सिंह ने पूछा.

”सर, वह मेरा  ममेरा भाई रोहित उर्फ गोविंदा था. वह हमीरपुर जिले के विवार थाने के गांव धनपुरा का रहने वाला है. हमारे और रोशनी के बारे में उसे सब पता था. हम ने जब उसे प्रेमिका की बेवफाई और उसे सबक सिखाने की बात कही तो वह साथ देने को राजी हो गया.’’

”तुम्हारी बाइक की नंबर प्लेट नहीं है. क्या वह चोरी की है?’’ श्री सिंह ने पूछा.

”नहीं सर, बाइक चोरी की नहीं है. हम ने पहचान छिपाने के लिए नंबर प्लेट जंगल में छिपा दी तथा खून से सने कपड़े चिकासी गांव के पास बेतवा नदी में फेंक दिए थे.’’

चूंकि सबूत के तौर पर खून से सने कपड़े तथा नंबर प्लेट बरामद करना जरूरी था, अत: कोतवाल अवधेश कुमार सिंह ने आरोपी राज की निशानदेही पर कपड़े व प्लेट बरामद करने पुलिस टीम के साथ निकल पड़े. अब तक अंधेरा छा चुका था. राज जब पचखौरा नहर पुलिया के पास पहुंचा तो उस ने पुलिस जीप रुकवा दी.

वह नीचे उतरा और बताया कि यहीं नहर झाडिय़ों में उस ने नंबर प्लेट छिपाई थी. पुलिस के साथ राज झाडिय़ों की तरफ बढ़ा, तभी अचानक उस ने कोतवाल अवधेश कुमार सिंह के हाथ से सरकारी पिस्टल छीन ली और फायर झोंकने की धमकी दे कर भागने लगा. पुलिस टीम ने भी उस की घेराबंदी कर जवाबी काररवाई शुरू कर दी.

राज ने एक फायर किया, तभी पुलिस ने भी गोली चला दी. पुलिस की गोली राज के पैर में लगी, जिस से वह जख्मी हो कर जमीन पर गिर पड़ा. घायल राज को तुरंत जिला अस्पताल में इलाज हेतु भरती कराया गया.

पुलिस की अन्य टीमें दूसरे आरोपी रोहित उर्फ गोविंदा को पकडऩे के लिए अथक प्रयास में जुटी रहीं, लेकिन वह हाथ नहीं आया. पुलिस जांच में एक ऐसे शक्की व सनकी प्रेमी की कहानी सामने आई, जिस ने एक होनहार छात्रा की सांसें छीन लीं और स्वयं का जीवन भी अंधकारमय बना लिया.

मौसी के घर ऐसे बढ़ी प्रेम की बेल

उत्तर प्रदेश का एक जिला है जालौन. इसी जिले के एट थाना अंतर्गत ऐंधा गांव में मानसिंह अहिरवार सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटे हरीश कुमार, श्रीचंद्र और 4 बेटियां रजनी, मोहनी, शीलम तथा रोशनी थी. मानसिंह किसान था.

खेतीबाड़ी से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था. उस का बड़ा बेटा हरीश कुमार उरई में प्राइवेट जौब करता था, जबकि छोटा बेटा श्रीचंद्र खेती के काम में हाथ बंटाता था. 2 बेटियों रजनी व मोहनी के जवान होते ही मानसिंह ने उन का विवाह कर दिया था.

मानसिंह की सब से छोटी बेटी का नाम रोशनी था. वह बहुत चंचल थी. इसलिए वह किसी से भी बातचीत में नहीं झिझकती थी. रोशनी से बड़ी शीलम थी. वह भी बातूनी व हंसमुख थी. दोनों बहनें सुंदर तो थीं ही, पढऩे में भी तेज थी.

दोनों एट कस्बा स्थित रामलखन पटेल महाविद्यालय में पढ़ती थीं और साथसाथ कालेज जाती थीं. कालेज में लड़के लड़कियां साथ पढ़ते थे, लेकिन कभी किसी लड़के की हिम्मत नहीं हुई कि वह इन दोनों बहनों से पंगा ले.

रोशनी की मौसी अनीता, कदौरा थाने के गांव जमरेही में ब्याही थी. वह रोशनी को बहुत चाहती थी. बात उन दिनों की है, जब रोशनी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की थी. मौसी के बुलावे पर वह जमरेही गांव पहुंची. वहां मौसी ने उस की खूब आवभगत की और कुछ दिनों के लिए उसे अपने घर रोक लिया था.

मौसी के घर पर ही एक रोज रोशनी की मुलाकात राज उर्फ आतिश से हुई. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे से प्रभावित हुए. राज उर्फ आतिश, रोशनी की मौसी अनीता का पड़ोसी था और उस की जातिबिरादरी का था.

चूंकि राज का अनीता के घर बेरोकटोक आनाजाना था, इसलिए उस की मुलाकातें बढऩे लगीं. उन मुलाकातों ने दोनों के दिलों में प्रेम के बीज बो दिए. धीरेधीरे दोनों के बीच बातचीत भी होने लगी. खूबसूरत रोशनी जहां राज के दिल में समा गई थी, वहीं स्मार्ट राज से बातचीत करना रोशनी को भी अच्छा लगने लगा था.

एक रोज राज अनीता के घर गया तो वह घर में नहीं दिखी. इस पर राज ने पूछा, ”रोशनी, आंटी नहीं दिख रहीं, क्या वह कहीं गई हैं?’’

”हां, मौसी खेत पर गई हैं. घंटे-2 घंटे बाद ही आएंगी.’’ रोशनी ने जवाब दिया.

रोशनी की बात सुन कर राज मन ही मन खुश हुआ. उसे लगा कि आज उसे अपने दिल की बात कहने का अच्छा मौका मिला है. अत: वह बोला, ”रोशनी आओ, मेरे पास बैठो. मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. लेकिन..?’’

”लेकिन क्या?’’ रोशनी ने आंखें नचा कर पूछा.

”यही कि डर लगता है कि कहीं तुम मेरी बात का बुरा न मान जाओ.’’

”तुम मुझे गाली तो दोगे नहीं, फिर भला मैं बुरा क्यों मान जाऊंगी?’’

”रोशनी, तुम मेरे जीवन को भी रोशनी से भर दो.’’ कहते हुए राज ने रोशनी का हाथ अपने हाथ में ले लिया. फिर बोला, ”रोशनी, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना अब मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है. मैं तुम्हें अपने घर की रोशनी बनाना चाहता हूं.’’

रोशनी कुछ क्षण मौन रही फिर बोली, ”राज, मुझे तुम्हारा प्यार तो कुबूल है, लेकिन शादी का वादा नहीं कर सकती. क्योंकि एक तो मैं अभी पढ़ रही हूं, दूसरे शादी विवाह की बात घर वाले ही तय करेंगे. मैं ऐसा कोई वादा नहीं करना चाहती, जिस के टूटने से तुम्हारे दिल को ठेस लगे.’’

इस के बाद रोशनी और राज का प्यार परवान चढऩे लगा. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया था, अत: उन की बात देरसवेर फोन पर भी होने लगी थी. ज्यादा देर बात करने को मौसी टोकती तो वह कालेज की सहेली से बात करने का बहाना बना देती. कभीकभी मां या बड़ी बहन से बात करने की बात कहती. अनीता उस की बातों पर सहज ही विश्वास कर लेती.

लेकिन अनीता के विश्वास को ठेस तब लगी, जब उस ने एक शाम धुंधलके में राज और रोशनी को आपस में छेड़छाड़ करते देख लिया. दूसरे रोज अनीता ने रोशनी को प्यार से समझाया, ”बेटी, लड़की की इज्जत सफेद चादर की तरह होती है. भूल से भी उस पर दाग लग जाए तो वह दाग जीवन भर नहीं जाता.’’

रोशनी समझ गई कि मौसी को उस पर शक हो गया है. उस ने अपनी सफाई में बहुत कुछ कहा. लेकिन अनीता ने यकीन नहीं किया. उस ने राज को भी फटकार लगाई. इसी के साथ वह दोनों पर निगरानी रखने लगी. लेकिन फिर भी दोनों फोन पर बतिया लेते थे और दिल की लगी बुझा लेते थे.

अनीता नहीं चाहती थी कि उस के घर पर रहते रोशनी कोई गलत कदम उठाए और वह बदनाम हो जाए. अत: उस ने रोशनी को उस के घर ऐंधा भेज दिया. रोशनी प्रेम रोग ले कर घर वापस आई थी. अत: उस का मन न तो पढ़ाई मेंं लगता था और न ही घर के दूसरे काम में.

वह खोईखोई सी रहने लगी थी. बड़ी बहन शीलम ने उस से कई बार पूछा कि वह खोईखोई सी क्यों रहती है? लेकिन रोशनी ने उसे कुछ नहीं बताया. वह बुत ही बनी रही.

बड़ी बहन को ऐसे पता लगा रोशनी के अफेयर का

एक रोज रोशनी बाथरूम में थी, तभी उस के फोन पर काल आई. काल शीलम ने रिसीव की और पूछा, ”आप कौन और किस से बात करनी है?’’

इस पर दूसरी ओर से आवाज आई, ”मैं राज बोल रहा हूं. मुझे रोशनी से बात करनी है. जब वह मौसी के घर जमरेही आई थी, तभी उस से जानपहचान हुई थी.’’

”ठीक है, अभी वह घर पर नहीं है.’’ कह कर शीलम ने काल डिसकनेक्ट कर दी. फिर सोचने लगी कि कहीं रोशनी किसी लड़के के प्यार के चक्कर में तो नहीं पड़ गई. कहीं रोशनी उसी के प्यार में तो नहीं खोई रहती. यदि ऐसा कुछ है तो वह आज भेद खोल कर ही रहेगी.

कुछ देर बाद रोशनी बाथरूम से बाहर आई तो शीलम ने पूछा, ”रोशनी, यह राज कौन है? तू उसे कैसे जानती है?’’

”दीदी, मैं किसी राज को नहीं जानती.’’ रोशनी धीमी आवाज में सफेद झूठ बोल गई.

”देखो रोशनी, अभी कुछ देर पहले जमरेही से राज का फोन आया था. वैसे तो उस ने मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दिया है. लेकिन मैं सच्चाई तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती हूं.’’

रोशनी समझ गई कि उस की आशिकी का भेद खुल गया है. अब सच्चाई बताने में ही भलाई है. अत: वह बोली, ”दीदी, जब हम मौसी के घर गए थे तो वहां हमारी मुलाकात मौसी के पड़ोस में रहने वाले अशोक अहिरवार के बेटे राज उर्फ आतिश से हुई थी. कुछ दिनों बाद ही हमारी मुलाकातें प्यार में बदल गईं और हम दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे. दीदी, राज पढ़ालिखा स्मार्ट युवक है. परिवार की आर्थिक स्थिति भी ठीक है. राज मुझे बेहद प्यार करता है और शादी करना चाहता है.’’

सच्चाई जानने के बाद शीलम ने सारी बात अपनी मम्मी सुनीता तथा पापा मानसिंह को बताई तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उन दोनों ने पहले प्यार से फिर डराधमका कर रोशनी को समझाने की कोशिश की, लेकिन रोशनी नहीं मानी. दोनों भाइयों ने भी रोशनी को समझाया. पर रोशनी ने राज से बातचीत करनी बंद नहीं की. वह कालेज आतेजाते तथा देर रात में राज से बातें करती रहती.

रोशनी की दीवानगी देख कर घर वालों को लगा कि यदि रोशनी पर ज्यादा सख्ती की गई तो कहीं ऐसा न हो कि रोशनी पीठ में इज्जत का छुरा घोंप कर अपने प्रेमी के साथ फुर्र न हो जाए. इसलिए मानसिंह ने अपने परिवार के साथ इस गहन समस्या पर मंथन किया. फिर निर्णय हुआ कि रोशनी की शादी राज के साथ तय कर दी जाए. लेकिन शर्त होगी कि शादी बीए फाइनल करने के बाद ही होगी.

इस के बाद सुनीता अपने पति मानसिंह के साथ अपनी बहन अनीता के घर जमरेही पहुंची. उस ने बहन को राज और रोशनी के प्रेम संबंधों के बारे में बताया और दोनों की शादी तय करने की बात कही. अनीता को दोनों के संबंधों के बारे में पहले से ही पता था सो वह राजी हो गई. अनीता ने कहा कि राज पढ़ालिखा है. संपन्न किसान का बेटा है. सब से बड़ी बात जातबिरादरी का है. अत: रिश्ता हर मायने में सही है.

सब को रिश्ता उचित लगा तो मानसिंह ने अशोक अहिरवार से उन के बेटे राज उर्फ आतिश के रिश्ते की बात चलाई. अशोक भी तैयार हो गया. उस के बाद रोशनी का रिश्ता राज के साथ तय हो गया. शर्त यह रखी गई कि रोशनी जब बीए पास कर लेगी, तब दोनों की शादी होगी. इस शर्त को राज व उस के घर वालों ने मान लिया.

शादी तय हो जाने के बाद राज का रोशनी के घर आनाजाना शुरू हो गया. वह हर सप्ताह बाइक से रोशनी के घर पहुंच जाता, रोशनी उस के साथ घूमने फिरने निकल जाती. फिर शाम को ही वापस आती. इस बीच दोनों खूब हंसते बतियाते, रेस्तरां में खाना खाते और जम कर लुत्फ उठाते. उन पर घर वालों की कोई पाबंदी न थी. अत: उन्हें किसी प्रकार का कोई डर भी न था. इस तरह एक साल बीत गया.

रोशनी अब तक बीए (प्रथम वर्ष) पास कर द्वितीय वर्ष में पढऩे लगी थी. जबकि उस की बड़ी बहन शीलम तृतीय वर्ष में पढ़ रही थी. दोनों बहनें एट कस्बा स्थित रामलखन पटेल महाविद्यालय की छात्रा थीं. वह घर से कालेज साथ ही आतीजाती थीं. रोशनी को फोन पर बतियाने का बहुत शौक था. कालेज से निकलते ही वह बतियाने लगती थी. जबकि शीलम गंभीर थी. उसे फालतू बकवास पसंद न थी.

मंगेतर को ऐसे हुआ रोशनी पर शक

एक रोज राज ने रोशनी को काल की तो उस का नंबर व्यस्त बता रहा था. कई बार कोशिश करने पर भी जब रोशनी से बात नहीं हो पाई तो राज के मन में शक बैठ गया कि रोशनी उस के अलावा किसी और से भी प्यार करती है. जिस से वह घंटों बतियाती है. इसलिए उस का फोन व्यस्त रहता है. उस रोज वह बेहद परेशान रहा और कई तरह के विचार उस के मन में आते रहे.

राज के मन में शक समाया तो वह दूसरे रोज सुबह 11 बजे कालेज गेट पहुंच गया. रोशनी कालेज से निकली तो वह उस का पीछा करने लगा. उस रोज रोशनी कालेज अकेले ही आई थी. कुछ दूर पहुंचने पर रोशनी फोन पर किसी से हंसहंस कर बातें करने लगी. राज का शक यकीन में बदल गया कि रोशनी का कोई और भी यार है.

गुस्से से भरा राज रोशनी के पास जा पहुंचा और मोबाइल छीन कर बोला, ”तुम हंसहंस कर किस से बात कर रही थी. क्या मेरे अलावा कोई और भी दिलवर है?’’

राज को सामने देख कर रोशनी घबरा गई और बोली, ”मैं अपनी सहेली से बात कर रही थी. वह आज कालेज आई नहीं थी. लेकिन तुम यह बहकीबहकी बातें क्यों कर रहे हो?’’

”क्योंकि मुझे सच्चाई पता है. तुम सहेली से नहीं, अपने यार से बात कर रही थी.’’

”लगता है तुम शक्की और सनकी इंसान हो. मुझ पर यकीन नहीं तो मिलने क्यों आते हो. लगता है तुम्हारा प्यार छलावा है. तुम तो प्यार के काबिल ही नहीं हो.’’

उन दोनों के बीच उस दिन जम कर बहस हुई. इस बहस से रोशनी का दिल टूट गया. राज के प्रति उस की जो मोहब्बत थी, वह घायल हो गई. वह सोचने को मजबूर हो गई कि ऐसे शक्की इंसान के साथ वह जीवन कैसे गुजार सकेगी. रोशनी इस बात को ले कर परेशान रहने लगी. जबकि बड़ी बहन शीलम उसे समझाती कि वह चिंता न करे. सब ठीक हो जाएगा.

कहते हैं कि शक की विषबेल बहुत जल्दी पनपती है. राज के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस का शक दिनबदिन बढ़ता ही गया. वह जब भी रोशनी को किसी से फोन पर बात करते देख लेता तो वह बात करने से रोकता, साथ ही उसे डांटता व अपशब्द भी कहता.

रोशनी को यह नागवार गुजरता था. फिर भी उस ने कई बार राज को समझाया भी कि वह अपनी दोस्त सहेलियों से ही बात करती है. लेकिन राज रोशनी की कोई बात सुनने को तैयार न था. कई बार समझाने पर भी जब राज के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया तो रोशनी उस से दूरी बनाने लगी. उस ने उस से मिलना भी कम कर दिया.

राज के दुव्र्यवहार से अब रोशनी चिंतित रहने लगी थी. सुनीता ने बेटी के माथे पर चिंता की लकीरें पढ़ीं तो उस ने एक रोज रोशनी से पूछा, ”बेटी, आजकल तू गुमसुम रहती है. चेहरे से हंसी भी गायब है, खाना भी समय पर नहीं खाती. आखिर बात क्या है?’’

मां की सहानुभूति पा कर रोशनी की आंखों में आंसू आ गए. बोली, ”मां, मैं राज को ले कर चिंतित हूं. वह शक्की इंसान है. फोन पर किसी से बात करते देखता है तो शक करता है. मैं ने उस से दिल लगा कर भूल की है. मैं ऐसे शक्की इंसान से शादी नहीं कर सकती.’’

बेटी के दर्द से सुनीता भी तड़प उठी. उस ने यह बात पति मानसिंह को बताई तो उस का पारा भी चढ़ गया. इस के बाद मानसिंह ने अपनी पत्नी व बेटों से विचारविमर्श किया और शादी तोड़ देने का निश्चय किया. रिश्ता खत्म करने की जानकारी मानसिंह ने अशोक अहिरवार व उस के बेटे राज को भी दे दी.

राज क्यों नहीं चाहता था रोशनी से रिश्ता तोडऩा

रिश्ता टूटने से राज उर्फ आतिश बौखला गया. उस ने रोशनी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उस ने काल रिसीव ही नहीं की. दूसरे रोज राज रोशनी के कालेज पहुंच गया. रोशनी कालेज के बाहर आई तो उस ने पूछा, ”रोशनी, रिश्ता तुम ने तोड़ा है या तुम्हारे घर वालों ने?’’

”मैं ने अपनी व घर वालों की मरजी से खूब सोचसमझ कर रिश्ता तोड़ा है.’’

”क्यों तोड़ा है?’’ राज ने पूछा.

”इसलिए कि तुम शक्की व सनकी इंसान हो. तुम जैसे इंसान के साथ मैं जीवन नहीं बिता सकती.’’

”सोच लो. कहीं तुम्हारा यह फैसला भारी न पड़ जाए.’’ राज ने धमकी दी.

”मैं ने अच्छी तरह सोचसमझ कर ही फैसला लिया है. तुम्हारी धमकी से मैं डरने वाली नही हूं. और हां, आज के बाद मुझ से मिलने कालेज में मत आना.’’

लेकिन रोशनी की बात पर राज ने गौर नहीं किया. वह अकसर कालेज आ जाता और रोशनी को धमकाता कि वह उस से शादी करे. यही नहीं राज रोशनी के मम्मीपापा व भाइयों को भी फोन पर धमकाने लगा था कि रिश्ता तोड़ कर तुम लोगों ने अच्छा नहीं किया. अब भी समय है रिश्ता जोड़ लो. वरना परिणाम अच्छा न होगा.

अप्रैल, 2023 के दूसरे सप्ताह से रोशनी और शीलम की वार्षिक परीक्षा शुरू हो गई थी. दोनों बहनें साथसाथ परीक्षा देने आतीजाती थीं. 14 अप्रैल, 2023 को रोशनी व शीलम पेपर दे कर निकलीं तो कालेज गेट से कुछ दूरी पर राज ने रोशनी को रोक लिया और बोला, ”रोशनी, मैं तुम से आखिरी बार पूछ रहा हूं कि मुझ से रिश्ता जोड़ोगी या नहीं?’’

रोशनी गुस्से से बोली, ”मैं तुम से एक बार नहीं, सौ बार कह चुकी हूं कि तुम जैसे शक्की और सनकी इंसान से मैं शादी हरगिज नहीं करूंगी.’’

”यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ राज ने आंखें तरेर कर पूछा.

”हां, यह मेरा आखिरी फैसला है.’’ रोशनी ने भी आंखें तरेर कर ही जवाब दिया.

”तो तुम मेरा फैसला भी सुन लो, यदि तुम मेरी दुलहन नहीं बनोगी तो मैं तुम्हें किसी और की दुलहन भी नहीं बनने दूंगा.’’ धमकी दे कर राज चला गया.

राज उर्फ आतिश का ममेरा भाई था रोहित उर्फ गोविंदा. वह हमीरपुर जनपद के विवार थाने के गांव धनपुरा का रहने वाला था. राज की रोहित से खूब पटती थी. रोहित को रोशनी और राज के रिश्तों की बात पता थी. प्यार में जख्मी राज रोहित के पास पहुंचा और उसे बताया कि रोशनी ने शादी से इंकार कर दिया है. वह उस को बेवफाई का सबक सिखाना चाहता है. उस की मदद चाहिए.

रोहित मदद को राजी हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर तमंचा व कारतूस का इंतजाम किया और एट आ गए.

17 अप्रैल, 2023 को शीलम और रोशनी अपनाअपना पेपर दे कर कालेज से निकलीं तो बाइक से राज व रोहित ने उन का पीछा करना शुरू किया. शीलम व रोशनी जैसे ही कोटरा तिराहा पहुंचीं, तभी राज व रोहित ने उन्हें घेर लिया. फिर बिना कुछ कहे राज ने रोशनी के सिर में तमंचा सटा कर फायर कर दिया. रोशनी ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

पूछताछ करने के बाद 19 अप्रैल, 2023 को पुलिस ने हत्यारोपी राज उर्फ आतिश को उरई कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. दूसरा आरोपी रोहित उर्फ गोविंदा फरार था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेरी जिस लड़की से शादी होने वाली है उस ने पहले से ही Sex किया हुआ है.

Sex: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 27 वर्षीय लड़का हूं और देहरादून में रहता हूं. मेरे घर वालों ने मेरी शादी तय कर दी है और 3 महीने बाद मेरी शादी है. जब मेरी उस लड़की से बात हुई तब पता चला कि उस का एक बौयफ्रैंड रह चुका है जिस के साथ उस ने सैक्स संबंध भी बनाए हैं. उस लड़की ने मुझे बताया कि अब उस का उस के एक्स बौयफ्रैंड से कोई नाता नहीं है और वह उसे पूरी तरह से भूल चुकी है लेकिन मुझे ऐसा एहसास हुआ कि वह अभी भी उस लड़के के संपर्क में है और शायद उन दोनों के बीच अभी भी कुछ चल रहा है क्योंकि वह मुझ से बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखाती है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या मुझे उस लड़की से शादी करनी चाहिए या अपने घर वालों को सब साफसाफ बता कर शादी के लिए मना कर देना चाहिए?

जवाब –

मैं आप की दुविधा अच्छे से समझ सकता हूं लेकिन अगर उस लड़की का कोई एक्स बौयफ्रैंड था भी जिस के साथ उस के सैक्स संबंध बनाए थे तो इस में कोई गलत बात नहीं है. आज के समय में रिलेशनशिप में आना और फिजिकल होना कोई बड़ी बात नहीं है और आप को तो खुश होना चाहिए कि उस लड़की ने आप से यह बात नहीं छिपाई क्योंकि अगर वह चाहती तो आप से यह बात छिपा भी सकती थी या इस बात से साफ इनकार कर सकती थी.

अगर आप के मन में कोई डाउट है तो आप सीधा उस लड़की से बात कीजिए. अपने घर वालों से बात करने से पहले उस लड़की को प्यार से समझाएं कि अगर उस का अपने एक्स बौयफ्रैंड से कोई रिलेशन है भी तो वह बता सकती है जिस से कि आप दोनों को आगे चल कर कोई दिक्कत न आए.

हो सकता है कि आप को कोई गलतफहमी हुई हो क्योंकि अगर आप को ऐसा लग रहा है कि उस का अपने एक्स बौयफ्रैंड के साथ अफेयर है इसलिए वे आप से बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है तो हो सकता है आप गलत सोच रहे हों क्योंकि अकसर शादी से पहले लड़कियों के दिमाग में कई तरह के खयाल चल रहे होते हैं और उन्हें अपना घर छोड़ने का दुख भी सता रहा होता है. ऐसा में बेहतर रहेगा कि आप किसी और से बात करने से पहले उस लड़की से बात कीजिए और अपने और उस के दोनों के डाउट्स क्लियर कीजिए.

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Short Story: मेरे हिस्से की कोशिश

Short Story : ट्रेन अभी लुधियाना पहुंची नहीं थी और मेरा मन पहले ही घबराने लगा था. वहां मेरा घर है, वही घर जहां जाने को मेरा मन सदा मचलता रहता था. मेरा वह घर जहां मेरा अधिकार आज भी सुरक्षित है, किसी ने मेरा बुरा नहीं किया. जो भी हुआ है मेरी ही इच्छा से हुआ है. जहां सब मुझे बांहें पसारे प्यार से स्वीकार करना चाहते हैं और अब उसी घर में मैं जाने से घबराता हूं. ऐसा लगता है हर तरफ से हंसी की आवाज आती है. शर्म आने लगती है मुझे. ऐसा लगता है मां की नजरें हर तरफ से मुझे घूर रही हैं. मन में उमड़घुमड़ रहे झंझावातों में उलझा मैं अतीत में विचरण करने लगता हूं.

‘वाह बेटा, वाह, तेरे पापा को तो नई पत्नी मिल ही गई, वे मुझे भूल गए, पर क्या तुझे भी मां याद नहीं रही. कितनी आसानी से किसी अजनबी को मां कहने लगा है तू.’

‘ऐसा नहीं है मुन्ना कि तू मेरे पास आता है तो मुझे किसी तरह की तकलीफ होती है. बच्चे, मैं तेरी बूआ हूं. मेरा खून है तू. मेरे भैयाभाभी की निशानी है तू. तू घर नहीं जाएगा तो अपने पिता से और दूर हो जाएगा. बेटा, अपने पापा के बारे में तो सोच. उन के दिल पर क्या बीतती होगी जब तू लुधियाना आ कर भी अपने घर नहीं जाता. दादी की सोच, जो हर पल द्वार ही निहारती रहती हैं कि कब उन का पोता आएगा और…’

‘ये दादी न होतीं तो कितना अच्छा होता न… इतनी लंबी उम्र भी किस काम की. न इंसान मर सकता है और न ही पूरी तरह जी पाता है… हमारे ही साथ ऐसा क्यों हो गया बूआ?’

बूआ की गोद में छिप कर मैं जारजार रो पड़ा था. बुरा लगा होगा न बूआ को, उन की मां को कोस रहा था मैं. पिछले 10 साल से दादी अधरंग से ग्रस्त बिस्तर पर पड़ी हैं और मेरी मां चलतीफिरती, हंसतीखेलती दादी की दिनरात सेवा करतीं. एक दिन सोईं तो फिर उठी ही नहीं. हैरान रह गए थे हम सब. ऐसा कैसे हो सकता है, अभी तो सोई थीं और अभी…

‘अरे, यमराज रास्ता भूल गया. मुझे ले जाना था इसे क्यों ले गया… मेरा कफन चुरा लिया तू ने बेटी. बड़ी ईमानदार थी, फिर मेरे ही साथ बेईमानी कर दी.’

विलाप करकर के दादी थक गई थीं. मांगने से मौत मिल जाती तो दादी कब की इस संसार से जा चुकी होतीं. बस, यही तो नहीं होता न. अपने चाहे से मरा नहीं न जाता. मरने वाला छूट जाता है और जो पीछे रह जाते हैं वे तिलतिल कर मरते हैं क्योंकि अपनी इच्छा से मर तो पाते नहीं और मरने वाले के बिना जीना उन्हें आता ही नहीं.

‘इस होली पर जब आओ तो अपने ही घर जाना अनुज. भैया, मुझ से नाराज हो रहे थे कि मैं ही तुम्हें समझाती नहीं हूं. बेटे, अपने पापा का तो सोच. भाभी गईं, अब तू भी घर न जाएगा तो उन का क्या होगा?’

‘पिताजी का क्या? नई पत्नी और एक पलीपलाई बेटी मिल गई है न उन्हें.’

‘चुप रह, अनुज,’ बूआ बोलीं, ‘ज्यादा बकबक की तो एक दूंगी तेरे मुंह पर. क्या तू ने भैया को इस शादी के लिए नहीं मनाया था? हम सब तो तेरी शादी कर के बहू लाने की सोच रहे थे. तब तू ने ही समझाया था न कि मेरी शादी कर के समस्या हल नहीं होगी. कम उम्र की लड़की कैसे इतनी समस्याओं से जूझ पाएगी, हर पल की मरीज दादी का खानापीना और…’

‘हां, मुझे याद है बूआ, मैं नहीं कहता कि जो हुआ मेरी मरजी से नहीं हुआ. मैं ने ही पापा को मनाया था कि वे मेरी जगह अपनी शादी कर लें. विभा आंटी से भी मैं ने ही बात की थी. लेकिन अब बदले हालात में मैं यह सब सहन नहीं कर पा रहा हूं. घर जाता हूं तो हर कोने में मां की मौजूदगी का एहसास होने से बहुत तकलीफ होती है. जिस घर में मैं इकलौती संतान था अब एक 18-20 साल की लड़की जो मेरी कानूनी बहन है, वही अधिकारसंपन्न दिखाई देती है. दादी को नई बहू मिल गई, पापा को नई पत्नी और उस लड़की को पिता.’

‘यह तो सोचने की बात है न मुन्ना. तुझे भी तो एक बहन मिली है न. विभा को तू मां न कह लेकिन कोई रिश्ता तो उस से बांध ले. जितनी मुश्किल तेरे लिए है इस रिश्ते को स्वीकारने की उतनी ही मुश्किल उन के लिए भी है. वे भी कोशिश कर रहे हैं, तू भी तो कर. उस बच्ची के सिर पर हाथ रखेगा तभी तुझे  बड़प्पन का एहसास होगा. तू क्या समझता है उन दोनों के लिए आसान है एक टूटे घर में आ कर उस की किरचें समेटना, जहां कणकण में सिर्फ तेरी मां बसी हैं. तेरा घर तो वहीं है. उन मांबेटी के बारे में जरा सोच.

‘तुम चैन से दिल्ली में रह कर अगर अपनी नौकरी कर रहे हो तो इसीलिए कि विभा घर संभाल रही है. तुम्हारे पिता का खानापीना देखती है, दादी को संभालती है. क्या वह तुम्हारे घर की नौकरानी है, जिस का मानसम्मान करना तुम्हें भारी लग रहा है.

‘6 महीने हो गए हैं भाभी को मरे और इन 6 महीनों में क्या विभा ने कोई प्रयास नहीं किया तुम्हारे समीप आने का? वह फोन पर बात करना चाहती है तो तुम चुप रहते हो. घर आने को कहती है तो तुम घर नहीं जाते. अब क्या करे वह? उस का दोष क्या है. बोलो?’ बहुत नाराज थीं बूआ. किसी का भी कोई दोष नहीं है. मैं दोष किसे दूं. दोष तो समय का है, जिस ने मेरी मां को छीन लिया.

मैं निश्ंिचत हूं कि मेरे पिता का घर उजड़ कर फिर बस गया है और उस के लिए समूल प्रयास भी मेरा ही था. सब व्यवस्थित हैं. मेरे दोस्त विनय की विधवा चाची हैं विभा आंटी. हम दोनों के ही प्रयास से यह संभव हो पाया है.

मां तो एक ही होती है न, उन्हें मैं मां नहीं मान पा रहा हूं. और वह लड़की अणिमा, जो कल तक मेरे मित्र की चचेरी बहन थी अब मेरी भी बहन है. उम्र भर बहन के लिए मां से झगड़ा करता रहा, बहन का जन्म मां की मौत के बाद होगा, कब सोचा था मैं ने.

लुधियाना आ गया. ऐसा लग रहा था मानो गाड़ी का समूल भार पटरी पर नहीं मेरे मन पर है. एक अपराधबोध का बोझ. क्या सचमुच मैं ने अपनी मां के साथ अन्याय किया है? घर आ गया मैं. कांपते हाथ से मैं ने दरवाजे की घंटी बजा दी. मां की जगह कोई और होगी, इसी भाव से समूल चेतना सुन्न होने लगी.

‘‘आ गया मुन्ना…बेटा, आ जा.’’

दादी का स्वर कानों में पड़ा. दरवाजा खुला था. पापा भी नहीं थे घर पर. दादी अकेली थीं. दादी ने पास बिठा कर प्यार किया और देर तक रोते रहे हम.

‘‘बड़ा निर्मोही है रे मुन्ना. घर की याद नहीं आती.’’

अब क्या उत्तर दूं मैं. चारों तरफ नजर घुमा कर देखा.

‘‘दादी, कहां गए हैं सब. पापा कहां हैं?’’

‘‘अणिमा कहीं चली गई है. विभा और तेरा बाप उसे ढूंढ़ने गए हैं.’’

‘‘कहीं चली गई. क्या मतलब?’’

‘‘इस घर में उस का मन नहीं लगता,’’ दादी बोलीं, ‘‘तू भी तो आता नहीं. यह घर उजड़ गया है मुन्ना. खुशी तो सारी की सारी तेरी मां अपने साथ ले गई. मुझे भी तो मौत नहीं न आती. सभी घुटेघुटे जी रहे हैं. कोई भी तो खुश नहीं है न. इस तरह नहीं जिया जाता मुन्ना.’’

चारों तरफ एक उदासी सी नजर आई मुझे. उठ कर सारा घर देख आया. मेरा कमरा वैसा का वैसा ही था जैसा पहले था. जाहिर था कि इस कमरे में कोई नहीं रहता. पापा को फोन किया.

‘‘पापा, कहां हैं आप? मैं घर आया और आप कहां चले गए?’’

‘‘अणिमा अपने घर चली आई है मुन्ना. वह वापस आना ही नहीं चाहती. विनय भी यहीं है.’’

‘‘पापा, आप घर आइए. मैं वहां पहुंचता हूं. मैं बात करता हूं उस से.’’

घटनाक्रम इतनी जल्दी बदल जाएगा किस ने सोचा था. मैं जो खुद अपने घर आना नहीं चाहता अब अपने से 8 साल छोटी लड़की से पूछने जा रहा हूं कि वह घर क्यों नहीं आती? कैसी विडंबना है न, जिस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है उसी सवाल का जवाब उस से पूछने जा रहा हूं.  जब मैं विनय और अणिमा के पास पहुंचा तब तक पापा घर के लिए निकल चुके थे. विभा आंटी भी पापा के साथ लौट चुकी थीं. अणिमा वहां विनय के साथ थी.

‘‘वह घर मेरा नहीं है विनय भैया. देखा न मेरी मां उस आदमी के साथ चली भी गईं. मेरी चिंता नहीं है उन्हें. अनुज की मां तो उसे मर कर छोड़ गईं, मेरी मां तो मुझे जिंदा ही छोड़ गईं. अब मां मुझे प्यार नहीं करतीं. अनुज घर नहीं आता तो क्या मेरा दोष है? उस के कमरे में मत जाओ, उस की चीजों को मत छेड़ो, मेरा घर कहां है, विनय भैया. घर तो मेरी मां को मिला है न, मुझे नहीं. मेरे अपने पिता का घर है न यह. मैं यहीं रहूंगी अपने घर में. नहीं जाऊंगी वहां.’’

दरवाजे की ओट में बस खड़ा का खड़ा रह गया मैं. इस की पीड़ा मेरी ही तो पीड़ा है न. काटो तो खून नहीं रहा मुझ में. किस शब्दकोष का सहारा ले कर इस लड़की को समझाऊं. गलत तो कहीं नहीं है न यह लड़की. सब को अपनी ही पीड़ा बड़ी लगती है. मैं सोच रहा था मेरा घर कहीं नहीं रहा और यह लड़की अणिमा भी तो सही कह रही है न.

‘‘आसान नहीं है पराए घर में जा कर रहना. वह उन का घर है, मेरा नहीं. मैं यहां रहूं तो अनुज के पापा को क्या समस्या है?’’

‘‘तुम अकेली कैसे रह सकती हो यहां?’’

‘‘क्यों नहीं रह सकती. यह मेरा कमरा है. यह मेरा सामान है.’’

‘‘वह घर भी तुम्हारा ही है, अणिमा.’’

विनय अपनी चचेरी बहन अणिमा को समझा रहा था और वह समझना नहीं चाह रही थी. जैसे किसी और में मां को देखना मेरे लिए मुश्किल है उसी तरह मेरे पिता को अपना पिता बना लेना इस के लिए भी आसान नहीं हो सकता. भारी कदमों से सामने चला आया मैं. कुछ कहतीकहती रुक गई अणिमा. कितनी बदलीबदली सी लग रही है वह. चेहरे की मासूमियत अब कहीं है ही नहीं. हालात इंसान को समय से पहले ही बड़ा बना देते हैं न. उस की सूजीसूजी आंखें बता रही हैं कि वह बहुत देर से रो रही है. मैं घर नहीं आता हूं तो क्या उस का गुस्सा पापा और दादी इस बच्ची पर उतारते हैं? ठीक ही तो किया इस ने जो घर ही छोड़ कर आ गई. इस की जगह मैं होता तो मैं भी यही करता. ‘‘ओह, आ गए तुम भी.’’

दांत पीस कर कहा अणिमा ने. मेरे लिए उस के मन में उमड़ताघुमड़ता जहर जबान पर न आ जाए तो क्या करे.

इस रिश्ते में तो कुछ भी सामान्य नहीं है. इस रिश्ते को बचाने के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. अणिमा मेरी बहन नहीं थी लेकिन इसे अपनी बहन मानना पड़ेगा मुझे. स्नेह दे कर अपना बनाना होगा मुझे. यही मेरी न हो पाई तो विभा आंटी भी मेरी मां कभी नहीं बन सकेंगी. कब तक वे भी इस घर और उस घर में सेतु का काम कर पाएंगी. पास आ कर अणिमा के सिर पर हाथ रखा मैं ने. झरझर बह चली उस की आंखें जैसे पूछ रही हों मुझ से, ‘अब और क्या करूं मैं?’

‘‘मैं राखी पर नहीं आया, वह मेरी भूल थी. अब आया हूं तो क्या तुम यहां छिपी रहोगी. तिलक नहीं लगाओगी मुझे?’’

विनय भीगी आंखों से मुझे देख रहा था, मानो कह रहा हो जहां तक उसे करना था उस ने किया, इस से आगे तो जो करना है मुझे ही करना है.  अणिमा को अपनी छाती से लगा लिया तो नन्ही सी बालिका की तरह जारजार रो पड़ी वह. उस की भावभंगिमा समझ पा रहा था मैं. अपने हिस्से की कोशिश तो वह कर चुकी है. अब बाकी तो मेरे हिस्से की कोशिश है.

‘‘अपने घर चलो, अणिमा. यह घर भी तुम्हारा है, पगली. लेकिन उस घर में हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है. मैं तुम सब से दूर रहा वह मेरी गलती थी. अब आया हूं तो तुम तो दूर मत रहो.  ‘‘मां से सदा बहन मांगा करता था. कुछ खो कर कुछ पाना ही शायद मेरे हिस्से में लिखा था इस तरह. तो इसी तरह ही सही, अणिमा के आंसू पोंछ मैं ने उस का मस्तक चूम लिया. जिस ममत्व से वह मेरे गले लगी थी उस से यह आभास पूर्ण रूप से हो रहा था मुझे कि देर हुई है तो मेरी ही तरफ से हुई है. अणिमा तो शायद पहले ही दिन से मुझे अपना मान चुकी थी.

Short Story : एक दिन का बौयफ्रैंड

Short Story : ‘‘क्या तुम मेरे एक दिन के बौयफ्रैंड बनोगे?’’ उस लड़की के कहे ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे. मैं हक्काबक्का सा उस की तरफ देखने लगा. काली, लंबी जुल्फों और मुसकराते चेहरे के बीच चमकती उस की 2 आंखें मेरे दिल को धड़का गईं. एक अजनबी लड़की के मुंह से इस तरह का प्रस्ताव सुन कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

मैं अच्छे घर का होनहार लड़का हूं. प्यार और शादी को ले कर मेरे विचार बिलकुल स्पष्ट हैं. बहुत पहले एक बार प्यार में पड़ा था पर हमारी लव स्टोरी अधिक दिनों तक नहीं चल सकी. लड़की बेवफा निकली. वह न सिर्फ मुझे, बल्कि दुनिया छोड़ कर गई और मैं अकेला रह गया.

लाख चाह कर भी मैं उसे भुला नहीं सका. सोच लिया था कि अब अरेंज्ड मैरिज करूंगा. घर वाले जिसे पसंद करेंगे, उसे ही अपना जीवनसाथी मान लूंगा.

अगले महीने मेरी सगाई है. लड़की को मैं ने देखा नहीं है पर घर वालों को वह बहुत पसंद आई है. फिलहाल मैं अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने आया हूं. मेरे घर पहुंचते ही सगाई की तैयारियां शुरू हो जाएंगी.

‘‘बोलो न, क्या तुम मेरे साथ..,’’ उस ने फिर अपना सवाल दोहराया.

‘‘मैं तो आप को जानता भी नहीं, फिर कैसे…’’ में उलझन में था.

‘‘जानते नहीं तभी तो एक दिन के लिए बना रही हूं, हमेशा के लिए नहीं,’’ लड़की ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों को नचाया. ‘‘दरअसल,

2-4 महीनों में मेरी शादी हो जाएगी. मेरे घर

वाले बहुत रूढि़वादी हैं. बौयफ्रैंड तो दूर कभी मुझे किसी लड़के से दोस्ती भी नहीं करने दी. मैं ने अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया है. घर

वाले मेरे लिए जिसे ढूंढ़ेंगे उस से आंखें बंद कर शादी कर लूंगी. मगर मेरी सहेलियां कहती हैं कि शादी का मजा तो लव मैरिज में है, किसी को बौयफ्रैंड बना कर जिंदगी ऐंजौय करने में है. मेरी सभी सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं. केवल मेरा ही कोई नहीं है.

‘‘यह भी सच है कि मैं बहुत संवेदनशील लड़की हूं. किसी से प्यार करूंगी तो बहुत गहराई से करूंगी. इसी वजह से इन मामलों में फंसने से डर लगता है. मैं जानती हूं कि मैं तुम्हें आजकल की लड़कियों जैसी बिलकुल नहीं लग रही होऊंगी. बट बिलीव मी, ऐसी ही हूं मैं. फिलहाल मुझे यह महसूस करना है कि बौयफ्रैंड के होने से जिंदगी कैसा रुख बदलती है, कैसा लगता है सब कुछ, बस यही देखना है मुझे. क्या तुम इस में मेरी मदद नहीं कर सकते?’’

‘‘ओके, पर कहीं मेरे मन में तुम्हारे लिए फीलिंग्स आ गईं तो?’’

‘‘तो क्या है, वन नाइट स्टैंड की तरह हमें एक दिन के इस अफेयर को भूल जाना है. यह सोच कर ही मेरे साथ आना. बस एक दिन खूब मस्ती करेंगे, घूमेंगेफिरेंगे. बोलो क्या कहते हो? वैसे भी मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं. मैं ने तुम्हारे ड्राइविंग लाइसैंस में तुम्हारी उम्र देख ली है. यह लो. रास्ते में तुम से गिर गया था. यही लौटाने आई थी. तुम्हें देखा तो लगा कि तुम एक शरीफ लड़के हो. मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे, इसीलिए यह प्रस्ताव रखा है.’’

मैं मुसकराया. एक अजीब सा उत्साह था मेरे मन में. चेहरे पर मुसकराहट की रेखा गहरी होती गई. मैं इनकार नहीं कर सका. तुरंत हामी भरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, परसों सुबह 8 बजे इसी जगह आ जाना. उस दिन मैं पूरी तरह तुम्हारा बौयफ्रैंड हूं.’’

‘‘ओके थैंक्यू,’’ कह कर मुसकराती हुई वह चली गई.

घर आ कर भी मैं सारा समय उस के बारे में सोचता रहा.

2 दिन बाद तय समय पर उसी जगह पहुंचा तो देखा वह बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी.

‘‘हाय डियर,’’ कहते हुए वह करीब आ गई.

‘‘हाय,’’ मैं थोड़ा सकुचाया.

मगर उस लड़की ने झट से मेरा हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘चलो, अब से तुम मेरे बौयफ्रैंड हुए. कोई हिचकिचाहट नहीं, खुल कर मिलो यार.’’

मैं ने खुद को समझाया, बस एक दिन. फिर कहां मैं, कहां यह. फिर हम 2 अजनबियों ने हमसफर बन कर उस एक दिन के खूबसूरत सफर की शुरुआत की. प्रिया नाम था उस का. मैं गाड़ी ड्राइव कर रहा था और वह मेरी बगल में बैठी थी. उस की जुल्फें हौलेहौले उस के कंधों पर लहरा रही थीं. भीनीभीनी सी उस की खुशबू मुझे आगोश में लेने लगी थी. एक अजीब सा एहसास था, जो मेरे जिस्म को महका रहा था. मैं एक गीत गुनगुनाने लगा. वह एकटक मुझे निहारती हुई बोली, ‘‘तुम तो बहुत अच्छा गाते हो.’’

‘‘हां थोड़ाबहुत गा लेता हूं… जब दिल को कोई अच्छा लगता है तो गीत खुद ब खुद होंठों पर आ जाता है.’’

मैं ने डायलौग मारा तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी. दूधिया चांदनी सी छिटक कर उस की हंसी मेरी सांसों को छूने लगी. यह क्या हो रहा है मुझे. मैं मन ही मन सोचने लगा.

तभी उस ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया, ‘‘माई प्रिंस चार्मिंग, हम जा कहां रहे हैं?’’

‘‘जहां तुम कहो. वैसे मैं यहां की सब से रोमांटिक जगह जानता हूं, शायद तुम भी जाना चाहोगी,’’ मेरी आवाज में भी शोखी उतर आई थी.

‘‘श्योर, जहां तुम चाहो ले चलो. मैं ने तुम पर शतप्रतिशत विश्वास किया है.’’

‘‘पर इतने विश्वास की वजह?’’

‘‘किसीकिसी की आंखों में लिखा होता है कि वह शतप्रतिशत विश्वास के योग्य है. तभी तो पूरी दुनिया में एक तुम्हें ही चुना मैं ने अपना बौयफ्रैंड बनाने को.’’

‘‘देखो तुम मुझ से इमोशनली जुड़ने की कोशिश मत करो. बाद में दर्द होगा.’’

‘‘किसे? तुम्हें या मुझे?’’

‘‘शायद दोनों को.’’

‘‘नहीं, मैं प्रैक्टिकल हूं. मैं बस 1 दिन के लिए ही तुम से जुड़ रही हूं, क्योंकि मैं जानती हूं हमारे रिश्ते को सिर्फ इतने समय की ही मंजूरी मिली है.’’

‘‘हां, वह तो है. मैं अपने घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकता.’’

‘‘अरे यार, खिलाफ जाने को किस ने कहा? मैं तो खुद पापा के वचन में बंधी हूं. उन के दोस्त के बेटे से शादी करने वाली हूं. 6-7 महीनों में वह इंडिया आ जाएगा और फिर चट मंगनी पट विवाह. हो सकता है मैं हमेशा के लिए पैरिस चली जाऊं,’’ उस ने सहजता से कहा.

‘‘तो क्या तुम भी ‘कुछकुछ होता है’ मूवी की सिमरन की तरह किसी अजनबी से शादी करने वाली हो, जिसे तुम ने कभी देखा भी नहीं है?’’ कहते हुए मैं ने उस की आंखों में झांका. वह हंसती हुई बोली, ‘‘हां, ऐसा ही कुछ है. पर चिंता न करो. मैं तुम्हें शाहरुख यानी राज की तरह अपनी जिंदगी में नहीं आने दूंगी. शादी तो मैं उसी से करूंगी जिस से पापा चाहते हैं.’’

‘‘तो फिर यह सब क्यों? मेरे इमोशंस के साथ क्यों खेल रही हो?’’

‘‘अरे यार, मैं कहां खेल रही हूं? फर्स्ट मीटिंग में ही मैं ने साफ कह दिया था कि हम केवल 1 दिन के रिश्ते में हैं.’’

‘‘हां वह तो है. ओके बाबा, आई ऐम सौरी. चलो आ गई हमारी मंजिल.’’

‘‘वैरी नाइस. बहुत सुंदर व्यू है,’’ कहते हुए उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

थोड़ा घूमने के बाद वह मेरे पास आती हुई बोली, ‘‘लो अब मुझे अपनी बांहों में भरो जैसे फिल्मों में करते हैं.’’

वह मेरे और करीब आ गई. उस की जुल्फें मेरे कंधों पर लहराने लगीं. लग रहा था जैसे मेरी पुरानी गर्लफ्रैंड बिंदु ही मेरे पास खड़ी है. अजीब सा आकर्षण महसूस होने लगा. मैं अलग हो गया, ‘‘नहीं, यह नहीं होगा मुझ से. किसी गैर लड़की को मैं करीब क्यों आने दूं?’’

‘‘क्यों, तुम्हें डर लग रहा है कि मैं यह वीडियो बना कर वायरल न कर दूं?’’ वह शरारत से खिलखिलाई. मैं ने मुंह बनाया, ‘‘बना लो. मुझे क्या करना है? वैसे भी मैं लड़का हूं. मेरी इज्जत थोड़े ही जा रही है.’’

‘‘वही तो मैं तुम्हें समझा रही हूं. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, तुम तो लड़के हो,’’ वह फिर से मुसकराई, ‘‘वैसे तुम आजकल के लड़कों जैसे बिलकुल नहीं.’’

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‘‘आजकल के लड़कों से क्या मतलब है? सब एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘वही तो बात है. इसीलिए तो तुम्हें चुना है मैं ने, क्योंकि मुझे पता था तुम मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे वरना किसी और लड़के को ऐसा मौका मिलता तो उसे लगता जैसे लौटरी लग गई हो.’’

‘‘तुम मेरे बारे में इतनी श्योर कैसे हो कि वाकई मैं शरीफ ही हूं? तुम कैसे जानती हो कि मैं कैसा हूं और कैसा नहीं हूं?’’

‘‘तुम्हारी आंखों ने सब बता दिया मेरी जान, शराफत आंखों पर लिखी होती है. तुम नहीं जानते?’’

इस लड़की की बातें पलपल मेरे दिल को धड़काने लगी थीं. बहुत अलग सी थी वह. काफी देर तक हम इधरउधर घूमते रहे. बातें करते रहे.

एक बार फिर वह मेरे करीब आती हुई बोली, ‘‘अपनी गर्लफ्रैंड को हग भी नहीं करोगे?’’ वह मेरे सीने से लग गई. लगा जैसे वह पल वहीं ठहर गया हो. कुछ देर तक हम ऐसे ही खड़े रहे. मेरी बढ़ी हुई धड़कनें शायद वह भी महसूस कर रही थी. मैं ने भी उसे आगोश में ले लिया. उस पल को ऐसा लगा जैसे आकाश और धरती एकदूसरे से मिल गए हों. कुछ पल बाद उस ने खुद को अलग किया और दूर जा कर खड़ी हो गई.

‘‘बस, कुछ और हुआ तो हमारे कदम बहक जाएंगे. चलो वापस चलते हैं,’’ वह बोली. मैं अपनेआप को संभालता हुआ बिना कुछ कहे उस के पीछेपीछे चलने लगा. मेरी सांसें रुक रही थीं. गला सूख रहा था. गाड़ी में बैठ कर मैं ने पानी की पूरी बोतल खाली कर दी.

सहसा वह हंस पड़ी, ‘‘जनाब, ऐसा लग रहा था जैसे शराब की बोतल एक बार में ही हलक के नीचे उतार रहे हो.’’

उस के बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि मुझे हंसी आ गई. ‘‘सच, बहुत अच्छी हो तुम. मुझे डर है कहीं तुम से प्यार न हो जाए,’’ मैं ने कहा.

‘‘छोड़ो भी यार. मैं बड़ी हूं तुम से, इस तरह की बातें सोचना भी मत.’’

‘‘मगर मैं क्या करूं? मेरा दिल कुछ और कह रहा है और दिमाग कुछ और.’’

‘‘चलता है. तुम बस आज की सोचो और यह बताओ कि हम लंच कहां करने वाले हैं?’’

‘‘एक बेहतरीन जगह है मेरे दिमाग में. बिंदु के साथ आया था एक बार. चलो वहीं चलते हैं,’’ मैं ने वृंदावन रैस्टोरैंट की तरफ गाड़ी मोड़ते हुए कहा, ‘‘घर के खाने जैसा बढि़या स्वाद होता है यहां के खाने का और अरेंजमैंट देखो तो लगेगा ही नहीं कि रैस्टोरैंट आए हैं. गार्डन में बेंत की टेबलकुरसियां रखी हुई हैं.’’

रैस्टोरैंट पहुंच कर उत्साहित होती हुई प्रिया बोली, ‘‘सच कह रहे थे तुम. वाकई लग रहा है जैसे पार्क में बैठ कर खाना खाने वाले हैं हम… हर तरफ ग्रीनरी. सो नाइस. सजावटी पौधों के बीच बेंत की बनी डिजाइनर टेबलकुरसियों पर स्वादिष्ठ खाना, मन को बहुत सुकून देता होगा.

है न?’’

मैं खामोशी से उस का चेहरा निहारता रहा. लंच के बाद हम 2-1 जगह और गए. जी भर कर मस्ती की. अब तक हम दोनों एकदूसरे से खुल गए थे. बातें करने में भी मजा आ रहा था. दोनों ने ही एकदूसरे की कंपनी बहुत ऐंजौय की थी, एकदूसरे की पसंदनापसंद, घरपरिवार, स्कूलकालेज की कितनी ही बातें हुईं.

थोड़ीबहुत प्यार भरी बातें भी हुईं. धीरेधीरे शाम हो गई और उस के जाने का समय आ गया. मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझ से जुदा हो रही है, हमेशा के लिए.

‘‘कैसे रह पाऊंगा मैं तुम से मिले बिना? नहीं प्रिया, तुम्हें अपना नंबर देना होगा मुझे,’’ मैं ने व्यथित स्वर में कहा.

‘‘आर यू सीरियस?’’

‘‘यस आई ऐम सीरियस,’’ मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे नहीं लगता कि अब मैं तुम्हें भूल सकूंगा. नो प्रिया, आई थिंक आई लाइक यू वैरी मच.’’

‘‘वह डील न भूलो मयंक,’’ प्रिया ने याद दिलाया.

‘‘मगर दोस्त बन कर तो रह सकते हैं न?’’

‘‘नो, मैं कमजोर पड़ गई तो? यह रिस्क मैं नहीं उठा सकती.’’

‘‘तो ठीक है. आई विल मैरी यू,’’ मैं ने जल्दी से कहा. उस से जुदा होने के खयाल से ही मेरी आंखें भर आई थीं. एक दिन में ही जाने कैसा बंधन जोड़ लिया था उस ने कि दिल कर रहा था हमेशा के लिए वह मेरी जिंदगी में आ जाए.

वह मुझ से दूर जाती हुई बोली, ‘‘गुडबाय मयंक, मैं शादी वहीं करूंगी जहां पापा चाहते हैं. तुम्हारा कोई चांस नहीं. भूल जाना मुझे.’’ वह चली गई और मैं पत्थर की मूर्त बना उसे जाते देखता रहा. दिल भर आया था मेरा. ड्राइविंग सीट पर अकेला बैठा अचानक फफकफफक कर रो पड़ा. लगा जैसे एक बार फिर से बिंदु मुझे अकेला छोड़ कर चली गई है. जाना ही था तो फिर जरूरत क्या थी मेरी जिंदगी में आने की. किसी तरह खुद को संभालता हुआ घर लौटा. दिन का चैन, रात की नींद सब लुट चुकी थी. जाने कहां से आई थी वह और कहां चली गई थी? पर एक दिन में मेरी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी. देवदास बन गया था मैं. इधर घर वाले मेरी सगाई की तैयारियों में लगे थे. वे मुझे उस लड़की से मिलवाने ले जाना चाहते थे, जिसे उन्होंने पसंद किया था. पर मैं ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘मैं शादी नहीं करूंगा,’’ मेरा इतना कहना था कि घर में कुहराम मच गया.

‘‘क्यों, कोई और पसंद आ गई?’’ मां ने अलग ले जा कर पूछा.

‘‘हां.’’ मैं ने सीधा जवाब दिया.

‘‘तो ठीक है, उसी से बात करते हैं. पता और फोन नंबर दो.’’

‘‘मेरे पास कुछ नहीं है.’’

‘‘कुछ नहीं, यह कैसा प्यार है?’’ मां ने कहा.

‘‘क्या पता मां, वह क्या चाहती थी? अपना दीवाना बना लिया और अपना कोई अतापता भी नहीं दिया.’’

फिर मैं ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तो वे खामोश रह गईं. 6 माह बीत गए. आखिर घर वालों की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. लड़की वाले हमारे घर आए. मुझे जबरन लड़की के पास भेजा गया. उस कमरे में कोई और नहीं था. लड़की दूसरी तरफ चेहरा किए बैठी थी. मैं बहुत अजीब महसूस कर रहा था.

लड़की की तरफ देखे बगैर मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं आप को किसी भ्रम में नहीं रखना चाहता. दरअसल मैं किसी और से प्यार करने लगा हूं और अब उस के अलावा किसी से शादी का खयाल भी मुझे रास नहीं आ रहा. आई एम सौरी. आप इस रिश्ते के लिए न कह दीजिए.’’

‘‘सच में न कह दूं?’’ लड़की के स्वर मेरे कानों से टकराए तो मैं हैरान रह गया. यह तो प्रिया के स्वर थे. मैं ने लड़की की तरफ देखा तो दिल खुशी से झूम उठा. यह वाकई प्रिया ही थी.

‘‘तुम?’’

‘‘हां मैं, कोई शक?’’ वह मुसकराई.

‘‘पर वह सब क्या था प्रिया?’’

‘‘दरअसल, मैं अरेंज्ड नहीं, लव मैरिज करना चाहती थी. अत: पहले तुम से प्यार का इजहार कराया, फिर इस शादी के लिए रजामंदी दी. बताओ कैसा लगा मेरा सरप्राइज.’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने पल भर भी देर नहीं की कहने में और फिर उसे बांहों में भर लिया.

Hindi Story : चमत्कार – क्या पूरा हो पाया नेहा और मनीष का प्यार

Hindi Story : ड्राइंगरूम में बैठे पापा अखबार पढ़ रहे थे और उन के पास बैठी मम्मी टीवी देख रही थीं. मैं ने जरा ऊंची आवाज में दोनों को बताया, ‘‘आप दोनों से मिलने मनीष 2 घंटे के बाद आ रहा है.’’

‘‘किसलिए?’’ पापा ने आदतन फौरन माथे पर बल डाल लिए.

‘‘शादी की बात करने.’’

‘‘शादी की बात करने वह हमारे यहां क्यों आ रहा है?’’

‘‘क्या बेकार का सवाल पूछ रहे हैं आप?’’ मम्मी ने भी आदतन तीखे लहजे में पापा को झिड़का और फिर उत्तेजित लहजे में मुझ से पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया है?’’

‘‘हां, मम्मी.’’

‘‘गुड…वेरी गुड,’’ मम्मी खुशी से उछल पड़ीं.

‘‘बट आई डोंट लाइक दैट बौय,’’ पापा ने चिढ़े लहजे में अपनी राय जाहिर की तो मम्मी फौरन उन से भिड़ने को तैयार हो गईं.

‘‘मनीष क्यों आप को पसंद नहीं है? क्या कमी है उस में?’’ मम्मी का लहजा फौरन आक्रामक हो उठा.

‘‘हमारी नेहा के सामने उस का व्यक्तित्व कुछ भी नहीं है. जंचता नहीं है वह हमारी बेटी के साथ.’’

‘‘मनीष कंप्यूटर इंजीनियर है. उस के पिताजी आप से कहीं ज्यादा ऊंची पोस्ट पर हैं. वह फ्लैट नहीं बल्कि कोठी में रहता है. मुझे तो वह हर तरह से नेहा के लिए उपयुक्त जीवनसाथी नजर आता है.’’

‘‘तुझे तो वह जंचेगा ही,’’ पापा गुस्से में बोले, ‘‘क्योंकि मैं जो उसे पसंद नहीं कर रहा हूं. मेरे खिलाफ बोलते हुए ही तो तू ने सारी जिंदगी गुजारी है.’’

‘‘पापा, आई लव मनीष. मुझे अपना जीवनसाथी चुनने…’’

मम्मी ने मुझे अपनी बात पूरी नहीं कहने दी और पापा से भिड़ना जारी रखा, ‘‘मैं ने आप के साथ जिंदगी गुजारी नहीं, बल्कि बरबाद की है. रातदिन की कलह, टोकाटाकी और बेइज्जती के सिवा कुछ नहीं मिला है मुझे पिछले 25 साल में.’’

‘‘इनसान जिस लायक होता है उसे वही मिलता है. बुद्धिहीन इनसान को जिंदगी भर जूते ही खाने को मिलेंगे.’’

‘‘आप के पास भी जहरीली जबान ही है, दिमाग नहीं. क्या यह समझदारी का लक्षण है कि बेटी शादी करने की अपनी इच्छा बता रही है और आप क्लेश करने पर उतारू हैं.’’

‘‘मैं अपनी बेटी के लिए मनीष से कहीं ज्यादा बेहतर लड़का ढूंढ़ सकता हूं.’’

‘‘पहली बात तो यह कि आज तक आप ने नेहा के लिए एक भी रिश्ता नहीं ढूंढ़ा है. दूसरी बात कि जब नेहा मनीष से प्रेम करती है तो शादी भी उसी से करेगी या नहीं?’’

‘‘यह प्रेमव्रेम कुछ नहीं होता. जो फैसला बड़े सोचसमझ और ऊंचनीच देख कर करते हैं, वही बेहतर होता है.’’

‘‘प्रेम के ऊपर आप नहीं तो और कौन लेक्चर देगा?’’ मम्मी ने तीखा व्यंग्य किया, ‘‘शादी के बाद भी आप प्रेम के क्षेत्र में रिसर्च जो करते रहे हैं.’’

‘‘मैं किसी भी औरत से हंसूंबोलूं, तो तुझे हमेशा चिढ़ ही हुई है. जिस आदमी की पत्नी लड़झगड़ कर महीने में 15 दिन मायके में पड़ी रहती थी वह अपने मनोरंजन के लिए दूसरी औरतों से दोस्ती करेगा ही.’’

‘‘मेरी गोद में नेहा न आ गई होती तो मैं ने आप से तलाक ले लिया होता,’’ अब मम्मी की आंखों में आंसू छलक आए थे.

‘‘बातबात पर पुलिस बुला कर पति को हथकडि़यां लगवा देने वाली पत्नी को तलाक देने की इच्छा किस इनसान के मन में पैदा नहीं होगी? मैं भी इस नेहा के सुखद भविष्य के कारण ही तुम से बंधा रहा, नहीं तो मैं ने तलाक जरूर…’’

‘‘अब आप दोनों चुप भी हो जाओ,’’ मैं इतनी जोर से चिल्लाई कि मम्मी और पापा जोर से चौंक कर सचमुच खामोश हो गए.

‘‘घर में आप का होने वाला दामाद कुछ ही देर में आ रहा है,’’ मैं ने उन दोनों को सख्त स्वर में चेतावनी दी, ‘‘अगर उसे आप दोनों ने आपस में गंदे ढंग से झगड़ने की हलकी सी झलक भी दिखाई, तो मुझ से बुरा कोई न होगा.’’

‘‘मैं बिलकुल चुप रहूंगी, गुडि़या. तू गुस्सा मत हो और अच्छी तरह से तैयार हो जा,’’ मम्मी एकदम से शांत नजर आने लगी थीं.

‘‘मैं भी बाजार से कुछ खानेपीने का सामान लाने को निकलता हूं,’’ नाखुश नजर आ रहे पापा मम्मी को गुस्से से घूरने के बाद बैडरूम की तरफ चले गए.

अपने कमरे में पहुंचने के बाद मेरी आंखों में आंसू भर आए थे. अपने मातापिता को बचपन से मैं बातबात पर यों ही लड़तेझगड़ते देखती आई हूं. अपनी- अपनी तीखी, कड़वी जबानों से दोनों ही एकदूसरे के दिलों को जख्मी करने का कोई मौका नहीं चूकते हैं.

वे दोनों ही मेरे भविष्य का निर्माण अपनेअपने ढंग से करना चाहते थे. अकसर उन के बीच झड़पें मुझे ले कर ही शुरू होतीं.

मम्मी चाहती थीं कि उन की सुंदर बेटी प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी बने. उन्होंने मुझे सदा अच्छा पहनाया, मुझे डांस और म्यूजिक की ट्रेनिंग दिलवाई. मेरी हर इच्छा को पूरी करने के लिए वे तैयार रहती थीं. वे खुद कमाती थीं, इसलिए मुझ पर पैसा खर्च करने में उन्हें कभी दिक्कत नहीं हुई.

पापा का जोर सदा इस बात पर रहता कि मेरा कैरियर बड़ा शानदार बने. वे मुझे डाक्टर या आई.ए.एस. अफसर बनाना चाहते थे. मेरे स्वास्थ्य की भी उन्हें फिक्र रहती. मैं खूब जूस और दूध पिऊं और नियमित रूप से व्यायाम करूं, ऐसी बातों पर उन का बड़ा जोर रहता.

वैसे सचाई यही है कि मेरी मम्मी के साथ ज्यादा अच्छी पटती रही क्योंकि पापा को खुश करना मेरे खुद के लिए टेंशन का काम बन जाता था. पापा की डांट से बचाने के लिए मम्मी मेरी ढाल हमेशा बन जाती थीं.

मुझे ले कर उन के बीच सैकड़ों बार झगड़ा हुआ होगा. जब एक बार  दोनों का मूड बिगड़ जाता तो अन्य क्षेत्रों में भी उन के बीच टकराव और तकरार का जन्म हो जाता. मम्मी ने 5-6 साल पहले ऐसे ही एक झगड़े में पुलिस बुला ली थी. मुझे वह सारी घटना अच्छी तरह से याद है. उस दिन डर कर मैं खूब रोई थी.

मैं न होती तो वे दोनों कब के अलग हो गए होते, ऐसी धमकियां मैं ने हजारों बार उन दोनों के मुंह से सुनी थीं. अब मनीष से शादी कर मैं सिंगापुर जाने वाली थी. मेरी गैरमौजूदगी में कहीं इन दोनों के बीच कोई अनहोनी न घट जाए, इस सोच के चलते मेरा मन कांपना शुरू हो गया था.

मनीष आया तो मम्मी ने प्यार से उसे गले लगा कर स्वागत किया था. पापा भी जब उस से मुसकरा कर मिले तो मैं ने मन ही मन बड़ी राहत महसूस की थी.

‘‘हम दोनों अगले हफ्ते शादी करना चाहते हैं क्योंकि 15 दिन बाद मुझे सिंगापुर में नई कंपनी जौइन करनी है. अभी शादी नहीं हुई तो मामला साल भर के लिए टल जाएगा,’’ मनीष ने उन्हें यह जानकारी दी, तो मम्मीपापा दोनों के चेहरों पर टेंशन नजर आने लगा था.

‘‘सप्ताह भर का समय तो बड़ा कम है, मनीष. हम सारी तैयारियां कैसे कर पाएंगे?’’ मम्मी चिंतित हो उठीं.

‘‘आंटी, शादी का फंक्शन छोटा ही करना पड़ेगा.’’

‘‘वह क्यों?’’ पापा के माथे में फौरन बल पड़े तो उन्हें शांत रखने को मैं ने उन का हाथ अपने हाथ में ले कर अर्थपूर्ण अंदाज में दबाया.

‘‘सच बात यह है कि मेरे मम्मीपापा इस रिश्ते से बहुत खुश नहीं हैं. मैं ने इसी वजह से कल रात ही उन्हें नेहा से शादी करने की बात तब बताई जब नई कंपनी से मुझे औफर लैटर मिल गया. उन दोनों की नाखुशी के चलते बड़ा फंक्शन करना संभव नहीं है न, अंकल.’’

‘‘मेरी बेटी लाखों में एक है, मनीष. उन्हें तो इस रिश्ते से खुश होना चाहिए.’’

‘‘आई नो, अंकल, पर वे दोनों आप दोनों जितने समझदार नहीं हैं जो अपनी संतान की खुशी को सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानें.’’

मनीष की इस बात को सुन कर मुझे अचानक इतनी जोर से हंसी आई कि मुझे ड्राइंगरूम से उठ कर रसोई में जाना ही उचित लगा था.

उस पूरे सप्ताह खूब भागदौड़ रही. मम्मी व पापा को इस भागदौड़ के दौरान जब भी फुरसत मिलती, वे आपस में जरूर उलझ पड़ते. मैं दोनों पर कई बार गुस्से से चिल्लाई, तो कई बार आंखों से आंसू भी बहाए. जो रिश्तेदार इकट्ठे हुए थे उन्होंने भी बारबार उन्हें लड़ाईझगड़े में ऊर्जा बरबाद न करने को समझाया, पर उन दोनों के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

हम ने फंक्शन ज्यादा बड़ा नहीं किया था, पर हर काम ठीक से पूरा हो गया. मेरी ससुराल में मेरे रंगरूप की खूब तारीफ हुई, तो मेरे सासससुर भी खुश नजर आने लगे थे.

हमारा हनीमून 3 दिन का रहा. मनाली के खुशगवार मौसम में अपने अब तक के जीवन के सब से बेहतरीन, मौजमस्ती भरे 3 दिन मनीष के संग बिता कर हम दिल्ली लौट आए.

वापस आने के 2 दिन बाद ही हम ने हवाईजहाज पकड़ा और सिंगापुर चले आए. अपने मम्मीपापा से विदा लेते हुए मैं रो रही थी.

‘‘आप दोनों एकदूसरे का ध्यान रखना, प्लीज. आप का लड़ाईझगड़ा अब भी चलता रहा, तो मेरा मन परदेस में बहुत दुखी रहेगा.’’

मैं ने बारबार उन से ऐसी विनती जरूर की, पर मन में भारी बेचैनी और चिंता समेटे ही मैं ने मम्मीपापा से विदा ली थी.

शुरुआत के दिनों में दिन में 2-2 बार फोन कर के मैं उन दोनों का हालचाल पूछ लेती.

‘‘हम ठीक हैं. तुम अपना हालचाल बताओ,’’ वे दोनों मुझे परेशान न करने के इरादे से यही जवाब देते, पर मेरा मन उन दोनों को ले कर लगातार चिंतित बना रहता था.

मनीष जब भी मुझे इस कारण उदास देखते, तो बेकार की चिंता न करने की सलाह देते. मैं खुद को बहुत समझाती, पर मन चिंता करना छोड़ ही नहीं पाता था.

बीतते समय के साथ मेरा मम्मीपापा को फोन करना सप्ताह में 1-2 बार का हो गया. मनीष की अपने बौस से ज्यादा अच्छी नहीं पट रही थी. इस कारण मुझे जो टेंशन होता, वही मैं फोन पर अपने मम्मीपापा से ज्यादा बांटता था.

मनीष ने कोशिश कर के अपना तबादला बैंकाक में करा लिया. वहां शिफ्ट होने से पहले उन्होंने 1 सप्ताह की छुट्टी ले ली. लगभग 6 महीने बाद इस कारण हमें इंडिया आने का मौका मिल गया था. सारा कार्यक्रम इतनी जल्दी बना कि अपने आने की सूचना मैं ने मम्मीपापा को न दे कर उन्हें ‘सरप्राइज’ देने का फैसला किया था.

मनीष और मैं एअरपोर्ट से टैक्सी ले कर सीधे पहले मेरे घर पहुंचे. 4 दिन बाद मेरे सासससुर की शादी की 30वीं वर्षगांठ थी, इसलिए पहले 3 दिन मुझे मायके में बिताने की स्वीकृति मनीष ने दे दी थी.

मनीष और मुझे अचानक सामने देख कर मेरे मम्मीपापा भौचक्के रह गए. मम्मी की चाल ने मुझे साफ बता दिया कि उन की कमर में तेज दर्द हो रहा है, पर फिर भी उन्होंने उठ कर मुझे गले से लगाया और खूब प्यार किया.

पापा की छाती से लग कर मैं अचानक ही आंसू बहाने लगी थी. उन को प्रसन्न अंदाज में मुसकराते देख मुझे इतनी राहत और खुशी महसूस हुई कि मेरी रुलाई फूट पड़ी थी.

‘‘आप दोनों को क्या हमारे आने की खबर थी?’’ कुछ संयत हो जाने के बाद मैं ने इधरउधर नजरें घुमाते हुए हैरान स्वर में सवाल किया.

‘‘नहीं तो. क्यों नहीं दी तू ने अपने आने की खबर?’’ मम्मी नकली नाराजगी दिखाते हुए मुसकराईं.

‘‘मुझे आप दोनों को ‘सरप्राइज’ देना था. वैसे पहले यह बताओ कि सारा घर फिर किस खुशी में इतना साफसुथरा… इतना सजाधजा नजर आ रहा है?’’

‘‘घर तो अब ऐसा ही रहता है, नेहा. हां, परदे पिछले महीने बदलवाए थे, सो इस कारण ड्राइंगरूम का रंग ज्यादा निखर आया है.’’

‘‘कमाल है, मम्मी. अपनी कमर दर्द की परेशानी के बावजूद आप इतनी मेहनत…’’

‘‘मेरी प्यारी गुडि़या, यह सारी जगमग तेरी मां की मेहनत का नतीजा नहीं है. आजकल साफसफाई का भूत मेरे सिर पर जरा ज्यादा चढ़ा रहता है,’’ पापा ने छाती चौड़ी कर मजाकिया अंदाज में अपनी तारीफ की तो हम तीनों खिलखिला कर हंस पड़े.

‘‘आप और घर की साफसफाई…आई कांट बिलीव यू, पापा.’’

‘‘अरे, अपनी मम्मी से पूछ ले.’’

मैं मम्मी की तरफ घूमी तो उन्होंने हंस कर कहा, ‘‘मैं ने अब इन्हें गृहकार्यों में अच्छी तरह से ट्रेंड कर दिया है, नेहा. कुछ देर में ये हम सब को देखना कितने स्वादिष्ठ गोभी और मूली के परांठे बना कर खिलाएंगे.’’

‘‘गोभी और मूली के परांठे पापा बनाएंगे?’’ मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘साफसफाई और किचन पापा ने संभाल लिया है, तो घर में आप क्या करती हो?’’ मैं ने आंखें मटकाते हुए मम्मी से सवाल पूछा.

‘‘आजकल जम कर ऐश कर रही हूं,’’ मम्मी ने जब अपने बालों को झटका दे कर बड़ी अदा से पीछे किया तो मैं ने नोट किया कि उन्होंने बाल छोटे करा लिए थे.

‘‘बाल कब कटवाए आप ने? बड़ा सूट कर रहा है आप पर यह नया स्टाइल,’’ मैं ने चारों तरफ घूम कर मम्मी के नए स्टाइल का निरीक्षण किया.

‘‘तेरे पापा को ही मुझे मेम बनाने का शौक चढ़ा और जबरदस्ती मेरे बाल कटवा दिए,’’ मम्मी ने अजीब सी शक्ल बना कर पापा की तरफ बड़े प्यार से देखा था.

‘‘चल, बाल तो मैं ने कटवा दिए, पर ज्यादा सुंदर दिखने को ब्यूटीपार्लर और जिम के चक्कर तो तुम अपनी इच्छा से ही लगा रही हो न,’’ पापा ने यह नई जानकारी दी, तो मैं ने मम्मी की तरफ और ज्यादा ध्यान से देखा.

उन्होंने अपना वजन सचमुच कम कर लिया था और उन के चेहरे पर भी अच्छाखासा नूर नजर आ रहा था.

‘‘आप दोनों 6 महीने में कितना ज्यादा बदल गए हो. मम्मी, आप सचमुच बहुत सुंदर दिख रही हो,’’ मैं ने प्यार से उन का गाल चूम लिया.

‘‘स्वीटहार्ट, तुम बेकार ही सिंगापुर में मम्मीपापा की चिंता करती रहती थीं. ये दोनों बहुत खुश नजर आ रहे हैं,’’ मनीष की इस बात को सुन कर मैं झेंप उठी थी.

‘‘हमारी फिक्र न किया करो तुम दोनों, परदेस में तुम तो हमारी गुडि़या का पूरापूरा ध्यान रखते हो न, मनीष?’’ पापा ने अपने दामाद के कंधे पर हाथ रख दोस्ताना अंदाज में सवाल पूछा.

‘‘रखता तो हूं… पर शायद उतना अच्छी तरह से नहीं जितना आप मम्मी का रखते हैं,’’ मनीष की यह बात सुन कर हम सब फिर से हंस पड़े.

‘‘कैसे हो गया यह चमत्कार,’’ मेरी हंसी थमी, तो मैं ने पापा और मम्मी का हाथ प्यार से पकड़ कर हैरान सी हो यह सवाल मानो खुद से ही पूछा था.

‘‘मुझे कारण पता है,’’ मनीष किसी स्कूली बच्चे की तरह हाथ उठा कर बोले तो हम तीनों बड़े ध्यान से उन का चेहरा ताकने लगे थे.

हमारे ध्यान का केंद्र अच्छी तरह बन जाने के बाद उन्होंने शरारती अंदाज में मुसकरातेशरमाते हुए कहा, ‘‘मेरी समझ से इस घर में दामाद के पैरों का पड़ना शुभ साबित हुआ है.’’

फिर हम चारों के सम्मिलित ठहाके से ड्राइंगरूम गूंज उठा.

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