कुछ इस तरह धरा गया दुर्गेश शर्मा

पिछले 15 सालों से दुर्गेश शर्मा और पटना पुलिस के बीच चूहे बिल्ली का खेल चल रहा था. पिछले दिनों उस की गिरफ्तारी के बाद पटना पुलिस ने जरूर चैन की सांस ली होगी.

22 जुलाई, 2017 को एसटीएफ ने दुर्गेश शर्मा को ‘राजेंद्रनगर न्यू तिनसुकिया ऐक्सप्रैस’ रेलगाड़ी में बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन के पास पकड़ा. उस समय उस की बीवी और बच्चे भी साथ थे.

एसटीएफ ने जब नाम पूछा, तो दुर्गेश ने अपना नाम राजीव शर्मा बताया. उस ने रेलगाड़ी का टिकट भी राजीव शर्मा के नाम से रिजर्व करा रखा था. उस ने राजीव शर्मा के नाम का पैनकार्ड, आधारकार्ड और वोटर आईडी भी एसटीएफ को दिखाया. कुछ देर के लिए एसटीएफ की टीम भी चकरा गई.

टीम को लगा कि कहीं उस ने गलत आदमी पर तो हाथ नहीं डाल दिया, पर एसटीएफ के पास दुर्गेश शर्मा का फोटो था, जिस से उस की पहचान हो सकी.

दुर्गेश शर्मा से पूछताछ के बाद पुलिस को कई सुराग और राज पता चले हैं. उस ने अपने तकरीबन 15 गुरगों के नाम पुलिस को बताए, जिन के दम पर वह रंगदारी वसूलता था.

16 जनवरी, 2016 में उस ने एसके पुरी थाने के राजापुर पुल के पास सोना कारोबारी रविकांत की हत्या कर दी थी.

उस हत्या के बारे में दुर्गेश शर्मा ने कहा कि उस की हत्या गलती से हो गई थी. उस के गुरगे करमू राय ने शराब के नशे में रविकांत की हत्या कर दी थी.

दुर्गेश शर्मा पटना के मैनपुरा, बोरिंग रोड, राजा बाजार, दीघा और पाटलीपुत्र कालौनी जैसे महल्लों के बड़े कारोबारियों से ले कर छोटे दुकानदारों तक से रंगदारी वसूलता था.

दुर्गेश शर्मा पटना हाईकोर्ट से फर्जी तरीके से जमानत भी ले चुका है. साल 2011 में फर्जी जमानत पर फरार होने के बाद दुर्गेश शर्मा ने सिलीगुड़ी को अपना ठिकाना बना लिया था.

पटना में जीतू उपाध्याय दुर्गेश शर्मा का खासमखास गुरगा था और वही पटना में रंगदारी वसूली का काम किया करता था और नैट बैंकिंग के जरीए दुर्गेश शर्मा के खाते में रुपए ट्रांसफर कर देता था.

सिलीगुड़ी के अलावा दुर्गेश उर्फ राहुल उर्फ राजीव ने पुलिस से बचने के लिए पटना के बाहर कई शहरों में अपना ठिकाना बना रखा था. कोलकाता के साल्ट लेक इलाके में भी उस का ठिकाना था. झारखंड के धनबाद शहर में भी उस का मकान था.

असम के तिनसुकिया शहर के सुबोचनी रोड पर सटू दास के मकान में वह किराएदार था. रांची, जमशेदपुर में भी उस के मकान होने का पता चला है.

पटना के बोरिंग रोड इलाके में बन रहे एक मौल में भी दुर्गेश शर्मा की हिस्सेदारी है. साथ ही, पटना के मैनपुरा इलाके और पश्चिमी पटना की कई कीमती जमीनों पर भी वह कब्जा करने की फिराक में था.

दुर्गेश शर्मा शंकर राय की हत्या करने के लिए पटना आया था. उस के बाद उस ने समर्पण करने की सोची थी. दुर्गेश शर्मा और शंकर राय के बीच इलाके के दबदबे को ले कर टकराव चलता रहा है. इस में दोनों गुटों के कई लोग मारे जा चुके हैं.

पटना के कई थानों में उस के खिलाफ 32 मामले दर्ज हैं, जिन में से 20 संगीन हैं. साल 2015 में ठेकेदार संतोष की हत्या के मामले में पुलिस उसे ढूंढ़ रही थी.

तकरीबन 10 साल पहले वह पटना के अपराधी सुलतान मियां का दायां हाथ हुआ करता था. वह सुलतान मियां गैंग का शार्प शूटर था. साल 2008 में उस ने सुलतान मियां से नाता तोड़ कर अपना अलग गैंग बना लिया.

साल 2015 में शंकर राय से सुपारी ले कर दुर्गेश शर्मा ने संतोष की हत्या की थी. काम हो जाने के बाद भी शंकर ने उसे रकम नहीं दी थी. उस हत्या के मामले में शंकर को जेल हो गई थी. उस रकम को ले कर दोनों के बीच तनाव काफी बढ़ चुका था.

पटना नगर निगम चुनाव के समय दुर्गेश शर्मा को पता चला कि शंकर की बीवी पटना नगर निगम के वार्ड नंबर-24 से चुनाव लड़ रही है. दुर्गेश को लगा कि अगर शंकर की बीवी चुनाव जीत गई, तो उस का राजनीतिक कद बढ़ जाएगा और वह उस पर भारी पड़ने लगेगा.

शंकर की हत्या करने का उसे यही बेहतरीन मौका लगा. चुनाव प्रचार के दौरान वह शंकर को आसानी से मार सकता है. दुर्गेश पटना पहुंचा, पर शंकर की हत्या न कर सका.

दुर्गेश शर्मा पहली बार साल 2003 में पुलिस के चंगुल में फंसा था और साल 2006 में वह जमानत पर छूटा था. उस के बाद उस का खौफ इतना बढ़ गया था कि साल 2011 में राज्य सरकार ने उस की गिरफ्तारी पर 50 हजार रुपए का इनाम रखा. उस के बाद भी वह पिछले 6 सालों तक पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहा.

दुर्गेश की बीवी कविता ने पुलिस को बताया कि वह कामाख्या पूजा के लिए जा रही थी कि रास्ते में उस के पति को गिरफ्तार कर लिया गया. पूजा से लौटने के बाद दुर्गेश कोर्ट या पुलिस के सामने सरैंडर करने का मन बना चुका था.

रविकांत की हत्या

16 फरवरी को 45 साला रविकांत पौने 10 बजे अपनी दुकान न्यू सोनाली ज्वैलर्स पहुंचे. दुकान का ताला खुलवाने के बाद साफसफाई की गई. उस के बाद 9 बज कर, 55 मिनट पर रविकांत काउंटर पर बैठ गए. काउंटर पर बैठ कर वे बहीखाता देख रहे थे कि 10 बजे 3 लड़के दुकान में घुसे.

एक लड़के ने रविकांत से कहा कि वे सोने की चेन और 2 लाख रुपए तुरंत निकाल दें, नहीं तो जान से मार देंगे.

रविकांत ने कहा कि बारबार रंगदारी देने की उन की हैसियत नहीं है. लड़के ने फिर धमकाया कि रुपया निकालो, नहीं तो बुरा अंजाम होगा.

इसी बात को ले कर दोनों के बीच बहस होने लगी. तमतमाए लड़के ने 315 बोर के देशी कट्टे से रविकांत के सीने में कई गोलियां दाग दीं. रविकांत वहीं ढेर हो गए.

रविकांत के करीबियों ने बताया कि पिछले 3 महीने से रविकांत से 10 लाख रुपए की रंगदारी मांगी जा रही थी. अपराधी दुर्गेश शर्मा और मुनचुन गोप कई दिनों से रंगदारी मांग रहे थे. जब रविकांत ने इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थता जताई, तो अपराधी सोने के गहनों की मांग करने लगे.

एक बार रविकांत ने 36 ग्राम सोने की चेन का बना कर दी, पर इस के बाद भी रंगदारी की मांग जारी रही. रविकांत ने जब रंगदारी देने से मना किया, तो उन की हत्या कर दी गई.

रविकांत की दिनदहाड़े हत्या में दुर्गेश शर्मा का नाम सामने आने के बाद भी पुलिस उसे दबोच न सकी. पुलिस उस के गुरगों को ही पकड़ सकी.

दुर्गेश शर्मा का करीबी पगला विक्रम उर्फ राजा समेत रंजीत उर्फ भोला, जितेंद्र कुमार और पप्पू कुमार को पकड़ लिया गया. ये लोग दुर्गेश शर्मा के इशारे पर बोरिंग रोड, राजापुर, मैनपुरा, मंदिरी और दानापुर इलाके में कारोबारियों और ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते थे. रविकांत को गोली मारने वाले करमू राय तक पुलिस के हाथ नहीं पहुंच सके.

पगला विक्रम दुर्गेश शर्मा का दाहिना हाथ माना जाता है. मूल रूप से नालंदा का रहने वाला पगला विक्रम रामकृष्णा नगर इलाके में रहता है. राजापुर पुल के पास उस का अड्डा है.

पिछले साल जब पगला विक्रम जेल गया, तो दुर्गेश शर्मा ही उस के घर का खर्च चलाता था. जेल से बाहर आने के बाद पगला विक्रम उस के लिए खुल कर काम करने लगा. दुर्गेश शर्मा की गैरमौजूदगी में वही गिरोह को चलाता था. पिछले साल 12 फरवरी को मैनपुरा के राजकीय मध्य विद्यालय के पास पार्षद रह चुके रंतोष के भाई संतोष की हत्या में भी दुर्गेश शर्मा का नाम आया था. उस के कुछ दिन पहले ही राजापुर पुल के पास मधु सिंह की हत्या में भी उस का नाम उछला था.

छपरा जिले के गरखा थाने के फुलवरिया गांव के रहने वाले दुर्गेश शर्मा ने साल 2000 के आसपास पटना के मैनपुरा इलाके में अपना अड्डा बनाया था. उस के खिलाफ पहला केस 10 अक्तूबर, 2000 को बुद्धा कालोनी थाने में डकैती के लिए दर्ज किया गया था. शुरुआत में उस ने सुलतान मियां के शूटर के रूप में काम किया और सुलतान के गायब होने के बाद उस ने गिरोह की कमान थाम ली थी.

साल 2008 में उस ने आरा में बैंक डकैती की और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. उसे बेऊर जेल में बंद किया गया था, पर वह हाईकोर्ट से फर्जी जमानत और्डर पर बाहर निकला था, उस के बाद वह पुलिस के लिए दूर की कौड़ी हो गया.

दुर्गेश शर्मा पिछले कई सालों से आरा में रह कर अपना गैंग चला रहा था. वह अकसर अपने गिरोह के लोगों से मिलने पटना और आरा के बीच नेउरा स्टेशन पर आता था. आखिरी बार वह फरवरी, 2015 में पटना आया था.

दुर्गेश शर्मा ने कोलकाता में अपना कारोबार फैला रखा है और वह मोबाइल टावर लगाने का काम कर रहा है. राजापुर पुल के पास वह शौपिंग कौंप्लैक्स बना रहा है. उस में संतोष हत्याकांड में नामजद पप्पू, बबलू, गिरीश और गुड्डू सिंह पार्टनर हैं.

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि दुर्गेश शर्मा और उस के गिरोह के लोगों की जायदाद का पता कर उसे जब्त करने की कार्यवाही शुरू की गई है.

बिकिनी फोटो के लिए सोशल मीडिया पर ट्रोल हुई तापसी पन्नू

अभी तक फिल्‍मों में एक्‍शन सीन से लेकर दमदार किरदार निभाने वाली तापसी पन्रू, अपनी आने वाली फिल्‍म ‘जुड़वां 2’ में काफी अलग अंदाज में नजर आने वाली हैं. इस फिल्‍म में तापसी पहली बार बिकिनी पहने नजर आएंगी. तापसी ने अपनी इसी फिल्‍म की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर अपलोड की थी.

लेकिन हमेशा की तरह तापसी को भी ट्विटर पर शेयर किये गये अपने इस फोटो से समस्‍या हुई. उन्‍हें अपने इन फोटो के लिए ट्रोल होना पड़ गया. आमतौर पर सेलिब्रिटीज ट्रोलिंग को इग्नोर कर देते हैं और कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते. तापसी बाकी सेलिब्रीटिज की तरह इस ट्रोलिंग को चुप रहकर सहने वाली नहीं थीं. तापसी ने इन ट्रोलरों की हरकत को नजरअंदाज न करते हुए जबरदस्‍त जवाब दिया है.

दरअसल, हुआ यूं कि हाल ही में तापसी ने बिकनी में कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की थीं. ये उनकी फिल्म ‘जुड़वा 2’ के गाने ‘आ तो सही’ का लुक है. उनके इस फोटो पर कमेंट करने वालो का तांता लग गया. कई लोग उनके बोल्ड लुक को पसंद कर रहे थे तो कुछ ने इस पर निगेटिव कमेंट कर डाले.

ट्विटर पर एक यूजर ने ट्वीट किया, ‘हमारे देश में अभिव्‍यक्ति की आजादी है, तो आप अपने बचे हुए कपड़े भी क्‍यों नहीं उतार देतीं. इसे देखने के बाद तुम्‍हारे भाई को तुम पर बेहद गर्व होगा.’ हालांकि यह ट्वीट अब डिलीट हो गया है. लेकिन तापसी ट्रोलिंग पर चुप नहीं बैठीं और उन्‍होंने इसके जवाब में कहा, ‘सारी, भाई है नहीं, वरना पक्‍का पूछ के बताती. अभी के लिए बहन का आंसर चलेगा???’


वहीं एक दूसरे यूजर ने लिखा, ‘ कम से कम सोशल मीडिया पर तो ऐसी गंदी पिक्‍चर मत अपलोड करो.. आपलोग गंदी-गंदी मूवी बना के देश की यंग पीढ़ी को तो बर्बाद कर ही रही हैं…’ इस पर तापसी ने जवाब दिया, ‘गंदी??? मैं जानती हूं, मुझे अपने शरीर से रेत साफ कर देनी चाहिए थी. मैं अगली बार से इस बात का ध्‍यान रखूंगी.’

आपको बता दें कि पिछले कुछ महीनों में कई हीरोइनों को उनके कपड़ों के लिए ट्रोल किया जा चुका है. जिनमें दीपिका पादुकोण, फातिमा सना शेख, प्रियंका चोपड़ा, जैकलीन फर्नाडीज जैसी एक्‍ट्रेस शामिल हैं. एक तरफ जहां सोहा अली खान को साड़ी पहनने के लिए ट्रोल किया गया तो वहीं दूसरी तरफ माल्‍टा में शूटिंग कर रही फातिमा सना शेख को रमजान के दौरान बिकिनी फोटोशूट के लिए ट्रोल किया गया था. इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री से मिलने पहुंची प्रियंका चोपड़ा को भी उनके ड्रेस के लिए ट्रोल किया गया था.

अधिकार और विश्वास को समझना है जरूरी

सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल में अपने एक फैसले में केरल के डायरैक्टर जनरल औफ पुलिस को 2 साल से पहले मुख्यमंत्री का विश्वास खो जाने के कारण हटाए जाने पर एतराज जताया है और उन्हें फिर से उस पद पर तैनात किए जाने की बात कही है. मुख्यमंत्री का तर्क था कि 2 मामलों में पुलिस की असफलता के कारण जनता में अधिकारी के खिलाफ रोष व असंतुष्टि थी, सो, उसे हटाया जाना प्रशासनिक कारणों से जरूरी था. सरकार का कहना था कि पुलिस अधिकारियों पर मुख्यमंत्री का विश्वास होना जरूरी है और उस विश्वास को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.

पुलिस अधिकारी टी पी सेन कुमार पद से हटाए जाने के बाद पहले प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में गए थे. वहां उन की याचिका रद हो गई तो वे उच्च न्यायालय गए थे जिस की अपील फिर सर्वोच्च न्यायालय में की गई थी. सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि पुलिस की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि पुलिस बिना डरे कानून को लागू करे और वह इस दौरान ज्यादती कर रहे राजनीतिक हुक्मरानों की भी चिंता न करे. यह कुशल प्रशासन के लिए जरूरी है.

जिस देश में पुलिस अधिकारियों को सत्ताधारी राजनेता अपना चाटुकार मानते हैं वहां इस प्रकार का फैसला ठीक है और संतोष देने वाला है. देशभर में नेताओं और पुलिस अधिकारियों के बीच सांठगांठ रहती है. ऊपरी कमाई में नेताओं, अफसरों और पुलिस में चोरचोर मौसेरे भाई सा संबंध रहता है.

नेता लोग पुलिस का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों के खिलाफ भी करते हैं और अपने ही दल में अपनों के खिलाफ भी. नेताओं के चारों ओर जो भीड़ जमा रहती है उस में से आधे लोग तो पुलिस से अपना काम कराने की दुहाई ले कर आते हैं. यदि कोई पुलिस अधिकारी सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हिसाब से न चले, तो मुख्यमंत्री के पास शिकायतों का ढेर लग जाता है.

इन शिकायतों को ही जनता की असंतुष्टि कहा जाता है और सर्वोच्च न्यायालय पुलिस अधिकारियों को राजनीतिज्ञों के कहर से बचाने की कोशिश कर रहा है.

टी पी सेन कुमार के बारे में तो सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दे दिया है पर वह अधिकारी अपना आदर क्या प्रशासन से पा सकेगा, इस में शक है. उसे खरदिमाग ही माना जाएगा और फालतू के कामों में ही लगाया जाएगा.

दूसरा पक्ष, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं देखा है, वह यह है कि पुलिस अधिकारियों के निक्कमेपन, भेदभाव, रिश्वतखोरी, हिंसा, दुर्व्यवहार के खिलाफ जनता, जनप्रतिनिधियों और मातहतों के पास क्या उपाय है? इन बातों को सुबूतों से सिद्ध नहीं किया जा सकता. दरअसल, जो ताकत रखता है उस के खिलाफ मौखिक शिकायत की जा सकती है, लिखित नहीं.

मुख्यमंत्री को ऐसे अधिकारियों के खिलाफ मिली शिकायतों पर बिना जांच किए, बिना कारण बताओ नोटिस दिए, फैसला लेना होगा. उस का अधिकार अगर छीन लिया गया है तो ऐसा फोरम होना चाहिए जहां अपना नाम छिपा कर शिकायतें की जा सकें, हालांकि ऐसा फोरम बनाना तकरीबन असंभव है. यह फोरम जनप्रतिनिधि ही हो सकते हैं और उन के पर कतरने का अर्थ है पुलिस को निरंकुशता का लाइसैंस देना. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाने से पहले परिणामों पर भी विचार किया?

मैं बीवी के ऊपर लेट कर हमबिस्तरी करने पर भी जल्दी पस्त हो जाता हूं. क्या करूं.

सवाल
मैं 22 साल का हूं. फोरप्ले के बाद बीवी के ऊपर लेट कर हमबिस्तरी करने पर भी महज 30 सैकंड में मैं पस्त हो जाता हूं. इस नाकामी पर बीवी के ताने सुन कर खुदकुशी करने का मन करता है. मैं क्या करूं?

जवाब
तजरबे की कमी के चलते ऐसा हो रहा होगा. आप एक बार मामला निबटने के बाद फिर से कोशिश करें, तो दूसरी पारी ज्यादा देर तक टिकेगी और धीरेधीरे आप का हौसला बढ़ जाएगा. अगर फिर भी 30 सैकंड में इजाफा न हो, तो किसी माहिर डाक्टर से इलाज कराएं. नीमहकीमों से कतई न मिलें.

दर्शक फ्रेशलुक देखना पंसद करते हैं : पल्लवी

कामेडी सीरियल ‘भाभी जी घर पर है‘ में अलग अलग तरह के कैरेक्टर निभा रही पल्लवी कोली कभी कल्लों बनती है तो कभी एयर होस्टेस. कभी वह टीका मलखान की प्रेमिका बनती है तो कभी गंवार दिखने वाली लडकी का किरदार निभाती है. पल्लवी को देखने से यह नहीं लगता कि वह दो बच्चों की मां है. उसके अपने कैरियर की शुरूआत भोजपुरी फिल्मों और हिन्दी सीरियलो से कीं. उसको असल पहचान ‘भाभी जी घर पर है’ से मिली आज वह सेलेब्रटी बन चुकी है. इसका पूरा श्रेय वह अपने पति और सास को देती है. पल्लवी कहती है कि ‘मेरी कम उम्र में शादी हो चुकी थी. मुझे बहुत कुछ पता नहीं था. मेरी सास ने मुझे कपडे पहनना फैशन से रहना सिखाया. जब मैं शुटिंग पर रहती हूं तो मेरे बच्चो को उन्होने संभाला.

अपने बचपन के विषय में पल्लवी कहती है ‘मैं कक्षा 10 में थी तब मेरे माता पिता दोनो का एक्सीडेंट हुआ. पढने में मन नहीं लगता था. हमेशा रोती रहती थी. मैं अपने मातापिता की अकेली लडकी थी. उनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं थी. मेरे नाना और मामा ने मुझे बाद में अपने साथ रखा. वह लोग भी मेरी हालत देखकर परेशान थे मुझे पढाई के साथ पेंटिग, सिलाई, कढाई का बहुत शौक था यह सब बंद हो गया था. मेरी हालत देखकर परिवार वालों को लगा कि इसकी शादी कर दो, फिर मेरी शादी हो गई. मुझे सास ने बहुत संभाला वह मेरी दोस्त सी बन गई.

वह कहती हैं मै हमेशा फ्रेश दिखना चाहती हूं खुश रहती हूं. आज के दौर में दर्शक अपने कलाकार को हमेशा फ्रेंश लुक में देखना पसंद करते है. मै वैसी ही दिखना पंसद करती हूं. हर तरह के फैशन के कपडे पहनती हूं, सभी से अचछा व्यवहार करती हूं, मेरे साथी कलाकार इस बात से खुश रहते हैं कि मैं घर से आती हूं, तो टिफिन लेकर आती हूं. मुझे देखकर कई लोगों को यह नहीं लगता कि मैं दो बच्चों की मां हूं. मैने खुद को फिट कर रखा है मुझे कपडो से अधिक कास्मेटिक और सैण्डल का बहुत शौक है. इसके साथ मैं आज भी पेंटिग बनाने का शैाक रखती हूं. समय मिलने पर घर परिवार का पूरा ख्याल रखती हूं. सही मायनों में मेहनत का असर दिखने लगा है. अब कई जगहों पर मुझे स्टार की तरह बुलाया जाता है. मध्य प्रदेश के इंदौर शहर मै गई वहां के लोगों का स्वागत देख कर बहुत अच्छा लगा मुझे घूमने का शौक था, वह अब पूरा हो रहा है. मैं अपने दर्शको की उम्मीदों पर पूरी तरह से खरी उतरना चाहती हूं.

खुलापन प्रचार में मददगार : प्रीना तिवारी

नेपाल में भारत की फिल्में खूब देखी जाती हैं. वहां नेपाली फिल्मों में काम करने वाले बहुत सारे कलाकार अब भोजपुरी फिल्मों में ऐक्टिंग करने लगे हैं. ऐसे में भोजपुरी फिल्मों को नेपाल में अलग बाजार मिलने लगा है. नेपाल के वीरगंज जिले की रहने वाली प्रीना तिवारी नेपाल की राजधानी काठमांडू में रहते हुए अपनी पढ़ाई के साथसाथ ऐक्टिंग भी कर रही हैं. कालेज के समय ही प्रीना तिवारी ने ‘मिस ग्लोबल इंटरनैशनल प्रतियोगिता’ में हिस्सा लिया था और ‘रनरअप’ का खिताब जीता था.

प्रीना तिवारी को मौडलिंग के बजाय ऐक्टिंग में दिलचस्पी थी, इसलिए उन्होंने नेपाली और भोजपुरी फिल्मों में काम को प्राथमिकता दी. ‘शिवचर्चा’, ‘दिलदार सजना’, ‘दुलहन हम ले जाएंगे’, ‘जय मां थावेली’, ‘टीम-4’ और ‘छोरी’ फिल्मों में अपनी अदाकारी दिखाई.

पेश हैं, प्रीना तिवारी के साथ की गई एक लंबी बातचीत के खास अंश:

नेपाली फिल्मों के साथ भोजपुरी फिल्मों का सिलसिला कैसे शुरू किया?

 नेपाल में बनने वाली फिल्मों का बाजार हिंदी और भोजपुरी फिल्मों के मुकाबले छोटा है. मुझे बचपन से ही ऐक्टिंग का शौक रहा है. मैं अपने को ऐक्टिंग के बडे़ कैनवास पर देखना चाहती थी. ऐसे में मेरे लिए जरूरी था कि हिंदी और भोजपुरी फिल्मों की तरफ कदम बढ़ाया जाए. नेपाल में दोनों ही तरह की फिल्में खूब देखी जाती हैं. हमारे दोनों ही देशों की कला और संस्कृति एकजैसी हैं. ऐसे में मुझे यहां काम करने में कोई परेशानी नहीं हुई.

क्या नेपाल में लड़कियों को परिवार वालों की तरफ से फिल्मों में काम करने का समर्थन कम मिलता है?

 नेपाल में अभी भी लड़कियों और औरतों को ले कर पुरानी सोच कायम है. इस के बाद भी बहुत सारे परिवारों में बदलाव हो रहा है. नेपाली फिल्मों में बहुत सारी लड़कियां काम कर रही हैं.

मैं ने जब फिल्मों में काम करने का फैसला किया था, तो थोड़ी परेशानी हुई थी, पर बाद में मेरे परिवार वाले मान गए. अब वे मेरा पूरा साथ देते हैं.

नेपाल से लड़कियों की तस्करी कर के बाहर ले जाने की घटनाएं सामने आती हैं. वहां लड़कियों की क्या हालत है?

 नेपाल में बेरोजगारी की समस्या है. कम पढे़लिखे लोग ज्यादा हैं. गरीबी बहुत है. अगर आबादी के हिसाब से देखें, तो लड़कियों की तादाद ज्यादा है.

ऐसी तमाम वजहें हैं, जिन की वजह से लड़कियां गलत राह पर चल पड़ती हैं. कई बार बाहरी लोग उन की गरीबी का फायदा उठा कर उन्हें सुनहरे सपने दिखा कर बरगलाने का काम भी करते हैं.

नेपाली फिल्मों के मुकाबले भोजपुरी फिल्मों में खुलापन ज्यादा होता है. आप इस अंतर को कैसे देखती हैं?

 भोजपुरी फिल्मों का अलग ही दर्शक वर्ग है. उन दर्शकों तक फिल्म का प्रचार करने के लिए खुलेपन वाले सीन का सहारा लिया जाता है.

मुझे लगता है कि हर तरह के लोग फिल्म देखते हैं. ऐसे में बहुत ज्यादा सैक्सी और बोल्ड फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख पाते. अब भोजपुरी फिल्मों को बनाने वाले भी इस बात को समझ रहे हैं. वे सामाजिक समस्या वाली कहानियों पर फिल्में बना रहे हैं.

आप भारत और नेपाल के रिश्तों को कैसे देखती हैं?

 दोनों ही देश एकदूसरे के पड़ोसी ही नहीं, परिवार जैसे हैं. साथ चलने से दोनों ही देशों की तरक्की होगी.

लोकतंत्र में पक्ष की मजबूरी है विपक्ष

देश के विरोधी दल आंतरिक विवादों में बुरी तरह बिखर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सर्वेसर्वा होते हुए भी गोरखालैंड में लगाई गई आग को बुझाने में व्यस्त हैं. बिहार में नीतीश कुमार आयाराम गयाराम के चक्कर में लालू परिवार पर आर्थिक हेराफेरी के एक और दौर का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. ओडिशा में नवीन पटनायक के बीजू जनता दल में आंतरिक विद्रोह की आवाजें उठ रही हैं.

तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक पार्टी में कोई नेता ही नहीं है पर फिर भी वह सरकार में हैं. केरल व कर्नाटक में गैरभाजपा सरकारें हैं पर उन की उपलब्धियों के समाचार कम हैं, उन के अपने विवादों के ज्यादा हैं.

अन्य राज्यों में भी भारतीय जनता पार्टी के शासन को चुनौती देने वाले विरोधी दल बिखर रहे हैं. गुजरात में विधानसभा चुनावों के पहले ही शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. उत्तर प्रदेश में मायावती बहुजन समाज पार्टी को संभाल नहीं पा रहीं और समाजवादी पार्टी में बापबेटे के बीच घमासान जारी है.

इस सारे का पूरा फायदा भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी उसी तरह उठा रहे हैं जैसे इंदिरा गांधी कांग्रेस का आधिपत्य जमाने के लिए 1984 से पहले उठाती थीं.

विपक्षी पार्टियों की सक्रियता लोकतंत्र में बहुत जरूरी है. असल में वे सरकार का हिस्सा हैं, गाड़ी में ब्रेक का काम करती हैं, उस के बिना सरकार चलेगी ही नहीं. तानाशाही सरकारें वहीं चल पाती हैं जहां सरकार पर किसी और का अंकुश हो चाहे वह सरकार का हिस्सा दिखे. गवर्नैंस में विचारों की विभिन्नता का महत्त्व बहुत ज्यादा है और जो तानाशाह अपने चारों ओर केवल यसमैन जमा कर लेता है वह ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता.

विरोधी दलों का मजबूत होना सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अनिवार्य है क्योंकि विपक्ष के बिना नेता के खिलाफ आतंरिक विद्रोह खड़ा हो सकता है. आज भारतीय जनता पार्टी नियंत्रण में है क्योंकि उस की सरकार पर एक तरफ नागपुर के संघ के अपने ही लोगों का कंट्रोल है तो दूसरी ओर बिखरा सा विपक्ष है. सत्ता पक्ष यदि अंदर और बाहर की टोकाटोकी से मुक्त हो गया तो गलतियों पर गलतियां करेगा. जनता भी त्रस्त रहेगी और सरकार भी लड़खड़ाएगी.

विपक्षी दलों की एकजुटता आज जरूरी है पर जिस तरह का राजनीतिक गठन देश में है, यह संभव नहीं है.  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में विपक्ष का एकसाथ हो जाना अच्छा संकेत है. हालांकि, दोनों पदों पर भारतीय जनता पार्टी अपनी ताकत से कुछ ज्यादा वोट ले गई पर फिर भी, स्थिति संभली सी दिख रही है.

भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथी आज भी, चाह कर भी, पुरातन पौराणिक ब्राह्मणवादी शासन देश पर थोप नहीं पा रहे जबकि रातदिन मंदिरों, प्रवचनों, आश्रमों, मठों, यात्राओं में उस का गुणगान किया जाता है और भक्त आंखमूंद कर उसे आदर्श मानते हैं. विपक्षी एकता हो या न हो, लोकतांत्रिक देश में उस का वजूद बना रहना जरूरी है और विकास व संतुलन के लिए अनिवार्य.

ये है सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार

2014 के आम चुनाव और उसके परिणाम को हमने कौरपोरेट जगत के द्वारा सत्ता के अपहरण के नजरिये से ही देखा है. हम यह मानते रहे हैं कि यह वैधानिक तख्तापलट है, जिसमें वौलस्ट्रीट की निजी कंपनियां, बैंक और देशी कौरपोरेट ने भाजपा को अपना जरिया बनाया. मोदी कौरपोरेट की सूरत हैं और मोदी सरकार कौरपोरेट की सरकार है. जिसके लिये माहौल बनाया गया और आज भी माहौल बनाया जा रहा है. जन समर्थन को ‘चुनावी मार्केटिंग’ से हासिल किया गया है और आने वाला कल इससे अलग नहीं होगा. आम जनता के हाथों से अपने देश की सरकार बनाने का हक, चुनावी पद्धति से छीन लिया गया है. ‘पूंजीवादी लोकतंत्र’ में जनसमर्थक सरकार संभव नहीं. यह राजसत्ता की बाजार से साझेदारी है.

‘एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स‘ ने 17 अगस्त 2017 को कौरपोरेट के द्वारा राजनीतिक दलों को दिये गये चंदे के बारे में एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 4 सालों में कौरपोरेट घरानों ने भाजपा और कांग्रेस सहित 5 राजनीतिक दलों को 956.77 करोड़ रूपये का चंदा दिया है. 2012-13 से 2015-16 में सबसे ज्यादा कौरपोरेट वित्तीय सहयोग भाजपा को मिला है. 2,987 दाताओं ने 705.81 करोड़ रूपये भाजपा को और कांग्रेस को 167 दानदाताओं ने 198.16 करोड़ रूपये दिये हैं. जिस साल 2014 में चुनाव हुआ कॉरपोरेट चंदा उस साल 60 प्रतिशत मिला. 2004-05 से 2011-12 की अवधि में यह राशि 378.89 थी, जो 4 साल में 956.77 करोड़ हो गयी.

भाजपा, कांग्रेस और उनके सहयोगी कौरपोरेट ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की अवहेलना की है, जिसके तहत 20 हजार से ऊपर के चंदे के लिये पैन और पते की अनिवार्यता है. 956.77 करोड़ के चंदे में से 729 करोड़ रूपये का कौरपोरेट चंदा ऐसा है, जिसमें पैन और पते नहीं हैं, इस तरह के 99 प्रतिशत चंदा भाजपा को मिला है.

यह रिपोर्ट अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि मौजूदा सरकार किसकी सरकार है? इस रिपोर्ट से इस बात को समझा जा सकता है, कि मोदी सरकार किसके लिये काम कर रही है और एवज में भाजपा के लिये चंदे की वसूली कैसे की जा रही है? यह खुलासा राजनीतिक भ्रष्टाचार का एक हिस्सा है. जिसमें ‘ले’ और ‘दे’ के अलावा और कुछ नहीं. न देश, न समाज, न आदर्श और ना ही देश की आम जनता, जिसे भरम है कि वह सरकार बनाती है.

नीति आयोग के ‘चैम्पियन्स ऑफ चेंज’ कार्यक्रम में मोदी जी कहते हैं- ‘‘दलाली में नाकाम लोग ही रोजगार का शोर मचा रहे हैं.’’ फिर, जो शोर नहीं मचा रहे हैं, उन्हें हम क्या सफल दलाल समझें? करोड़ों लोगों को काम देने का दावा तो, अब तक झूठा ही प्रमाणित हुआ है. सरकार काम देने की जिम्मेदारी उन निजी कम्पनियों को सौंप कर निश्चिंत होना चाहती है, जिन्होंने भारत के आईटी सेक्टर को भी संकट में डाल दिया है, जिनकी नीति मुनाफा बढ़ाने के लिये आदमी के बिना काम चलाने की मानव श्रम शक्ति को सस्ते में, मशीन, टेक्नोलॉजी और अब ऑटोमेशन उनकी नीति है.

कांग्रेस-यूपीए की मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के आग में जली. मोदी 2014 के चुनवी प्रचार में भ्रष्टाचार के खिलाफ हमलावर रहे. लोगों ने यकीन किया कि वो भ्रष्टाचार मिटा देंगे, यह जाने बिना कि निजी कम्पनियों के रहते भ्रष्टाचार का अंत संभव नहीं, क्योंकि अर्थव्यवस्था में इनकी हिस्सेदारी ही भ्रष्टाचार का आधार है. कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में नोटबंदी और विपक्ष के यहां छापों का आईटम सांग भी है. यह घोषणा भी है, कि भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो गया. यह दावा भी है, कि ‘‘मेरी सरकार पर कोई उंगली नहीं उठा सकता.‘‘ मगर सच वही ढाक के तीन पात हैं.

जरा आप बतायेंगे शाह साहब कि 4 साल में राजनीतिक चंदा तीन गुणा कैसे हो गया? यह वही समय है न, जब आम चुनाव होना था, मोदी को प्रायोजित किया जा रहा था, और भाजपा की सरकार बनी. मोदी की सरकार चल रही है. जो भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रही है. यह वही समय है न जब आप गंगा नहा रहे हैं, तमाम आरोपों से मुक्त होते जा रहे हैं, और विपक्ष को गड़ही में डुबा रहे हैं? यह वही समय है, न जब कौरपोरेट के हित में देश की अर्थव्यवस्था का निजीकरण हो रहा है? देश और आम जनता के हितों पर ताले लगाये जा रहे हैं? चुनावों में भाजपा की जीत हो रही है, पैसा पानी की तरह बह रहा है? यह पैसा कहां से आ रहा है?

जो खुलासा है, वह तो हमारे सामने है, मगर सच उसके पीछे है, कि यह पैसा हमारी जेब से जा रहा है. हमारी पेट से जा रहा है, एक के बदले चार जा रहा है. इतना जा रहा है कि कल को हमारे पास न जेब होगी, न देश होगा, सरकार तो हमारे हाथों से निकल ही चुकी है. अभी सपने और बकवास हैं. जो दिख रहा है, वह मुखड़ा है. सरकार और बाजार की यारी इस सदी का सबसे बड़ा आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार है, जिसके खैरख्वाह मोदी हैं, मोदी सरकार है. कोई भी राजनीतिक दल अलग नहीं है.

भविष्यफल : नहीं संवरता इस से कल

इस देश के लोग काफी तरक्की होने के बावजूद अभी भी इतने अंधविश्वासी हैं कि वे अखबारों, टैलीविजन चैनलों व ज्योतिषियों के बताए हुए भविष्यफल पर यकीन कर के अपना काम करते हैं. इस बारे में एक 30 साला बेरोजगार लड़के से पूछा गया, तो उस ने बताया कि वह अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद पिछले 3 साल से रोजगार की तलाश में परेशान हो चुका है. एक निजी कंपनी में तो उस की नौकरी लगना तकरीबन तय था, मगर टैलीविजन चैनल पर अपने भविष्यफल को देख कर वह उस दिन इंटरव्यू देने के लिए नहीं गया था, क्योंकि उस के भविष्यफल में उस दिन कोई बड़ा हादसा होने का योग बताया गया था.

इस बारे में जब उस ने अपनी मम्मी से सलाह ली, तो उन्होंने भी इंटरव्यू देने जाने से मना करते हुए कहा था कि जब हादसे में तेरी जान ही चली जाएगी, तो तेरी उस नौकरी का क्या करेंगे. उस नौजवान ने निराश हो कर कहा, ‘‘अगर मैं उस दिन टैलीविजन पर अपना भविष्यफल नहीं देखता, तो मुझे उस कंपनी में नौकरी मिल जाती. अब मैं ने अपना भविष्यफल देखना ही बंद कर दिया है.’’

ऐसे ही भविष्यफल के अंधविश्वास में एक 30 साला नौजवान की सही इलाज न मिलने पर मौत हो गई थी. उस नौजवान की अचानक तबीयत खराब हुई, तो उस के मातापिता उसे अस्पताल ले जाने लगे. पर उन के पंडित ने उस दिन का उस का भविष्यफल देखते हुए बताया कि अगर उसे अस्पताल ले जाया जाएगा, तो उस की मौत हो जाएगी, इसलिए उसे घर पर रख कर सुंदरकांड का पाठ कराया जाए.

पंडित की इस सलाह को मान कर उन्होंने उसी समय सुंदरकांड का पाठ कराना शुरू कर दिया. वे आधा पाठ भी नहीं कर पाए थे कि इलाज की कमी में उस नौजवान की मौत हो गई, क्योंकि उसे हार्ट अटैक आया था.

इसी तरह के अंधविश्वास के चलते एक दूसरे शहर में रह कर नौकरी करने वाला बेटा अपने ऐक्सिडैंट के शिकार हुए मातापिता के इलाज के लिए उन के पास समय पर नहीं पहुंच सका था. इस का नतीजा बहुत बुरा हुआ. उसे जब अपने मांबाप के ऐक्सिडैंट होने की सूचना मिली, तो वह वहां जाने की तैयारी करने लगा. पर उस की पत्नी ने उस दिन वहां जाने से रोकते हुए बताया कि उस दिशा में आज दिशाशूल है. अगर आज वे उस दिशा में जाएंगे, तो उन की भी जान को खतरा हो जाएगा. पत्नी के कहने पर उस ने दूसरे दिन जाना तय कर लिया था. दूसरे दिन रात में जब वे दोनों पतिपत्नी वहां पहुंचे, तब तक उन के मां बाप की इलाज की कमी में मौत हो चुकी थी.

दिशाशूल और भविष्यफल के राशिफल कुछ नहीं होते हैं. लोग अपनी राशि के भविष्यफल को देख कर डर कर अपने ऐसे कामों को भी नहीं करते हैं, जिन्हें करना उन के लिए बहुत जरूरी होता है. जैसे किसी की राशिफल में उस दिन हानि का योग होता है, तो उस दिन वह हानि होने के डर से दुखी हो कर कोई काम करता ही नहीं है, क्योंकि वह यह जान लेता है कि उसे आज हानि होगी. वह यह नहीं सोचता है कि उस की राशि का वह ही अकेला शख्स नहीं है. उसे यह भी सोचना चाहिए कि उस की राशि का एक आदमी कोई अपराध करता है, तो उस के उस अपराध के चलते क्या उस की राशि के सभी लोगों को सजा मिलेगी

इसी तरह किसी की राशि में उस दिन लाभ है, तो क्या उस की राशि के सभी लोगों को लाभ मिलेगा. हम सभी लोगों को इन भविष्यफलों के बजाय अपना काम सचाई, ईमानदारी और मेहनत से कर के अपने कर्मफल देखने चाहिए.

ऋषि कपूर ने आखिर क्यों दी धमकी

ऋषि कपूर की फिल्म ‘पटेल की पंजाबी शादी’ जल्द ही रिलीज होने वाली है. इस फिल्म को लेकर ऋषि कपूर काफी उत्साहित हैं. ऋषि कपूर बेबाकी से अपने सवालों के जवाब देने के लिए जाने जाते हैं और उनके पास अपने पिता के जीवन पर बनने वाली फिल्म को लेकर भी जवाब है.

इस सवाल पर कि क्या ऋषि कपूर या उनके परिवार वालों ने इस बारे में गंभीरता से सोचा है कि राज कपूर पर कभी बायोपिक बने, ऋषि कहते हैं “इस टौपिक पर हम कई सालों से बात कर रहे हैं. मुझे इसके लिए किसी ने औफर भी किया था, लेकिन हमारे परिवार को इस बात से आपत्ति रही है.

ऋषि कहते हैं कि वह इस बात से वाकिफ है कि दुनिया राज कपूर बारे में काफी कुछ जानना चाहती है लेकिन हकीकत यही है कि हम तब तक बायोपिक नहीं बनायेंगे जब तक हमारी मां हमारे साथ हैं. अगर किसी ने बनाने की कोशिश की तो हम कड़ी कार्रवाई भी कर सकते हैं. ऋषि कहते हैं कि यह सच है कि राज कपूर की ज़िंदगी के कई किस्से हैं और सभी इससे वाकिफ हैं.

अगर बायोपिक बनेगी तो औनेस्ट बायोपिक ही बननी चाहिए लेकिन हम किसी के भी इमोशन को हर्ट नहीं करना चाहते न ही हम किसी को भी कंट्रोवर्सी करने का मौका देंगे. इसलिए फिलहाल इस बारे में हम अधिक चर्चा नहीं करते हैं.

ऋषि कपूर ने आगे अपनी फिल्म के बारे में बताया कि वह एक जैसे पंजाबी किरदार कर कर के बोर हो चुके थे इसलिए उन्होंने तय किया कि अब कोई फिल्म उनके पास आयेगी तो वह वैसा ही किरदार नहीं करेंगे. “जब फिल्म पटेल की पंजाबी शादी लेकर मेरे पास संजय आये तो मैंने उन्हें बोला कि पहले परेश को हां करवाओ. परेश और मेरी अच्छी जोड़ी होगी और तो ही मैं करूंगा. फिर परेश भी तैयार हो गये.” फिल्म पटेल की पंजाबी शादी 15 सितंबर को रिलीज हो रही है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें