कृति सैनन का प्रेमिका धर्म या एंडोर्समेंट धर्म

भौतिकवाद के इस युग में हर जगह मिश्रण व घालमेल ही नजर आ रहा है. सामाजिक रिश्तों में भी यह घालमेल कम नही है.

बौलीवुड से जुड़े लोगों ने तो रिश्तों के साथ अपने काम का इस तरह मिश्रण कर रखा है कि कहीं समझ में नही आता कि वह रिश्ते निभा रहे हैं या अपने प्रोफेशनल धर्म का पालन कर रहे हैं.

आंतरिक वस्त्रों के एक ब्रांड ‘जैकी’ कोट इंडोर्स करने के लिए पाप अप म्यूजियम पहुंचने के बाद फिल्म अभिनेत्री कृति सैनन ने जिस तेज दिमाग के साथ सोशल मीडिया ‘‘इंस्टाग्राम’’ पर एक तस्वीर पोस्ट की है, उसमें यह साफ नजर आता है कि उन्होने अपने द्वारा इंडोर्स किए गए आंतरिक वस्त्रो के ब्रांड जैकी के साथ ही अपने तथाकथित प्रेमी सुशांत सिंह राजपूत की संजय पूरण सिंह चैहान के निर्देशन में निर्माणाधीन फिल्म ‘‘चंदा मामा दूर के’’ का भी प्रचार किया है, जिस फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत एक अंतरिक्ष यात्री के किरदार में नजर आएंगे.

ज्ञातव्य है कि सुशांत सिंह राजपूत अपनी इस फिल्म के किरदार के साथ न्याय करने के लिए ट्रेनिंग लेने अमरीका स्थित ‘‘नासा’’ गए थे. और ‘इंस्टाग्राम’ की अपनी पोस्ट में कृति सैनन ने लिखा है- ‘‘यस्टर्डे एट जैकी इंडियास पापअप म्यूजियम एट हाईस्ट्रीट फोनिक्स! इट इज अमेजिंग हाउ ए ब्रांड वेंट फ्राम मेंकिंग साक्स टू इंवेंटिंग ब्रीफ्स, टू डेवलपिंग अंडरविअर फार नासा. ग्रेट गोइंग गायज, देअर इज वनली वन..’’

A post shared by Kriti (@kritisanon) on

अब सवाल यह है कि इस इंस्टाग्राम पोस्ट से कृति सैनन खुद के द्वारा इंडोर्स किए गए ‘जैकी’ब्रांड को प्रमोट कर रही हैं या उसकी आड़ में अपने तथा कथित प्रेमी सुशांत सिंह राजपूत की उस फिल्म का अपराक्ष रूप से प्रचार करते हुए सुशांत को अपनी याद दिला रही हैं…क्योंकि फिलहाल ‘‘चंदामामा दूर के’’ की शूटिंग शुरू नहीं हुई है, पर सुशांत सिंह राजपूत कृति सैनन से दूर यानी कि मुंबई से दूर उत्तराखण्ड में अपनी दूसरी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं.

वैलेंटाइंस डे पर ‘फिफ्टी शेड्स फ्रीड’ में दिखेगा हैरान कर देने वाला इश्क

इराटिक सीरीज ‘फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे’ सीरीज की तीसरी और आखिरी फिल्म ’फिफ्टी शेड्स फ्रीड’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. इसमें क्रिश्चियन और एनस्तेशिया की जिंदगी की झलक के साथ डार्क फैक्टर भी नजर आ रहे हैं.

ट्रेलर हाटनेस और बोल्डनेस के मामले में निराश नहीं करता है. इसकी शुरुआत शादी के साथ होती है और उसके बाद दोनों हनीमून पर नजर आते हैं, लेकिन आखिर में किडनैपिंग पर जाकर टीजर खत्म होता है. इश्क और अंतरंग पलों के अलावा फिल्म में बहुत कुछ ऐसा है जो आपको हैरान करेगा.

‘फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे’ सीरीज की दूसरी फिल्म ‘फिफ्टी शेड्स डार्कर’ इसी साल रिलीज हुई थी जबकि फिफ्टी शेड्स आफ फ्रीड 2018 में वैलेंटाइंस डे पर रिलीज होगी.

फिफ्टी शेड्स डार्कर पिछली फिल्म फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे से भी ज्यादा सेंशुअस थी. एना (डेकौटा जानसन) और क्रिश्चियन (जेमी डारनैन) के रोमांस के साथ शुरू हुई फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे से अलग इस फिल्म में तीन का तड़का नजर आया. फिफ्टी शेड्स डार्कर एक ऐसी फिल्म का सीक्वल थी जिसे सेंसर बोर्ड ने भारत में बैन कर दिया था.

फिल्म के पहले पार्ट ने बाक्स आफिस पर 57 करोड़ डालर कमाए थे जबकि दूसरे पार्ट ने लगभग 38 करोड़ रु. कमाए.

क्या है फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे

फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे इराटिक ड्रामा सीरीज की पहली फिल्म थी, जो 2015 में रिलीज हुई थी. इस सीरीज की सारी फिल्में ब्रिटिश लेखिका ई.एल. जेम्स के उपन्यासों पर आधारित है. बेशक इस किताब में सेक्स के किसी भी रूप को दिखाया गया हो लेकिन इसकी लेखिका ने इसकी कामयाबी का राज बताते हुए कहा था, ‘औरतों को एक अच्छी प्रेम कहानी पसंद आती है और ‘फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे’ इसी तरह की ही प्रेम कहानी है.

आइए जानते हैं कहानी है क्या?

कहानी कालेज स्टुडेंट एनस्तेशिया और बिजनेसमैन क्रिश्चियन के बारे में है. एनस्तेशिया एक शर्माई और घबराई-सी सीधी-सादी लड़की है. वह बिजनेस टायकून क्रिश्चियन ग्रे से इत्तेफाक से मिलती है. वह उसे अच्छा लगता है लेकिन कहां अर्श और कहां फर्श सोचकर एना आगे बढ़ जाती है, लेकिन क्रिश्चियन का दिल एना पर आ जाता है. दोनों करीब आते हैं. एना को क्रिश्चियन अच्छा लगता है. वह उसे पसंद करने लगती है. दोनों अपने अपने कदम आगे बढ़ाते हैं.

क्रिश्चियन एना के साथ सेक्स करता है. सेक्स बिल्कुल किसी आम प्रेमी युगल जैसा, लेकिन क्रिश्चियन की दुनिया तो बिल्कुल अलग है, उसमें चमड़े के हंटर, रस्सियां, हथकड़ियां और सेक्स के दौरान अपने साथी को पीड़ा देने की भावनाएं कूट-कूट कर भरी हैं. क्रिश्चियन एना को सब सच-सच बता देता है. अपना रेड रूम दिखाता है, जो इस तरह के सेक्स टायज से भरा है. फिर क्रिश्चियन द्वारा बनाए गये एक कान्ट्रेक्ट पर एना को उसकी इस दुनिया में कदम रखने से पहले साइन करना होता है.

एना बीडीएसएम (बान्डेज और डिसिप्लिन सैडिज्म और मैसोचिज्म यानी बंधन और अनुशासन, दर्द और मजा) से जुड़ी जानकारी जुटाती है. फिर कान्ट्रेक्ट की कुछ शर्तें वह मंजूर करती है और क्रिश्चियन की दर्द से चरम सुख हासिल करने की दुनिया में घुस जाती है. पहला एनकाउंटर स्पैंकिंग का होता है. उसके बाद रेडरूम में उग्र सेक्स होता है. फिर एक दिन एना क्रिश्चियन से कहती है कि वह उसे सजा दे क्योंकि वह इस कान्ट्रेक्ट की हदों को देखना चाहती है. क्रिश्चियन बेल्ट के साथ एना के नितंबों पर वार करता है और उसके बाद दोनों के बीच दूरियां बढ़ जाती है.

छैमार गैंग : शादी के लिए 6 हत्याएं

कुप्रथाएं अपराधी भी बनाती हैं. लखनऊ पुलिस ने एक ऐसे लुटेरे गैंग का परदाफाश किया है, जिस के सदस्य शादी करने से पहले 6 हत्याएं करते हैं. पंजाब के इस गैंग को इस वजह से ही ‘छैमार गैंग’ के नाम से जाना जाता है. यह गैंग लूट के दौरान विरोध करने पर हत्या करता है. यह गैंग केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में भी डकैती डालता है.

लखनऊ पुलिस ने पंजाब से आए इस गिरोह के 4 सदस्यों को एसटीएफ के सहयोग से मडियांव थाना इलाके में पकड़ा. इन के पास से 2 तमंचे, चाकू, नकदी और जेवर मिले.

3 साल पहले इस गैंग ने जौनपुर के शाहगंज इलाके में डाका डाला था. जौनपुर पुलिस ने इन के 2 सदस्यों पर 2-2 हजार रुपए का इनाम भी ऐलान कर रखा था.

लखनऊ के ट्रांस गोमती इलाके के एएसपी दुर्गेश कुमार ने बताया कि रात को पुलिस को यह सूचना मिली थी कि पंजाब के ‘छैमार गैंग’ के कुछ सदस्य डकैत घैला पुल के पास मौजूद हैं.

एसटीएफ के एसआई विनय कुमार और मडियांव इलाके के इंस्पैक्टर नागेश मिश्रा ने पुलिस बल के साथ इन की घेराबंदी की. पुलिस को देख कर इन डकैतों ने फायरिंग कर दी, पर जवाबी फायरिंग में ये लोग भागने लगे.

इसी दौरान पुलिस ने इस गिरोह के 4 बदमाशों को पकड़ लिया. इन की पहचान कदीम उर्फ पहलवान, अली उर्फ हनीफ, मुन्ना उर्फ बग्गा और सलमान उर्फ अजीम के रूप में हुई. इन के पास से जौनपुर में हुई लूट का सामान भी बरामद किया गया.

दरअसल, ये लोग ‘छैमार गैंग’ के सदस्य थे. ‘छैमार गैंग’ पंजाब के बदमाशों द्वारा तैयार किया गया गैंग है. ये लोग लोकल अपराधियों को अपने साथ रेकी के लिए रखते हैं और उस घर की तलाश करते हैं, जहां पर इन्हें डाका डालना होता है.

इस के बाद का काम ‘छैमार गैंग’ का होता था. लोकल अपराधी कत्ल करने में पीछे हट जाते थे, इसलिए ‘छैमार गैंग’ के क्रूर सदस्य कत्ल को अंजाम देते थे. ये अपना ठिकाना बदलते रहते थे, जिस से इन की शिनाख्त नहीं हो पाती थी.

6 कत्ल करने के बाद ये डकैत शादी कर अपना घर बसा लेते थे. लूट के पैसे से ये अपना काम चलाते थे.

आज भी बहुत से लोग हत्या जैसे अपराध को बाहुबल से जोड़ कर देखते हैं, जिस वजह से ऐसी प्रथाएं भी चलती हैं. अपराधी खुद का दामन बचाने के लिए ऐसी प्रथाओं का हवाला देते हैं.

ये लोग अपने नाम और गैंग का नाम बदल कर आपराधिक वारदातों को अंजाम देते हैं.

पोस्टर ब्वायज : दिशाहीन और बोर फिल्म

श्रेयस तलपड़े द्वारा निर्मित व उनके अभिनय से सजी 2014 की मराठी भाषा की फिल्म ‘‘पोस्टर ब्वायज’’ का श्रेयस तलपड़े बतौर निर्देशक व अभिनेता हिंदी रीमेक ‘‘पोस्टर ब्वायज’’ लेकर आए हैं, जो कि दिशा हीन पटकथा पर बनी अस्सी के दशक के पुराने चुटकुलों से भरपूर अति बोरियत वाली फिल्म है.

फिल्म की कहानी हरियाणा के एक गांव की है. सरकार की गलती के चलते इस गांव के तीन पुरुषों स्कूल शिक्षक विनय शर्मा (बाबी देओल), रिकवरी एजेंट कम गली का गुंडा अर्जुन सिंह (श्रेयष तलपड़े) और पूर्व सैन्य अधिकारी जागवार चौधरी (सनी देओल) की तस्वीरें नसबंदी से जुड़े एक पोस्टर पर छप जाती हैं, जिस पर लिखा हुआ है कि हमने नसबंदी करवा ली.

इससे इन तीनों की जिंदगी में परेशानियों का दौर शुरू हो जाता है. गांव के लोग इनकी मर्दांनगी पर सवाल उठाने लगते हैं. जागवार चौधरी अपनी पत्नी सुनीता (सोनाली कुलकर्णी) के सहयोग से अपनी बहन की शादी तय करने में लगे हुए हैं. पर इस पोस्टर के बाद उनकी बहन की शादी होना मुश्किल हो जाता है. जबकि विनय शर्मा का हर दिन पत्नी से झगड़ा होने लगता है. वह अपना घर छोड़कर मायके जाने की बात करती है. जबकि अर्जुन सिंह की खुद की शादी में समस्या आ जाती है. तब यह तीनों सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर देते हैं.

मराठी फिल्म की पटकथा का हिंदी में रूपांतरण करने व उसे हरियाणा में स्थापित करते करते पटकथा लेखक इस तरह की गलतियां कर बैठे हैं कि पूरी फिल्म ही दिशाहीन हो गई है. नसबंदी के पोस्टर पर अपनी तस्वीर देखकर पुरुष को जो शर्मिंदगी होनी चाहिए और उससे जो हास्य उभरना चाहिए, वह कहीं उभरकर नहीं आता. कमजोर प्लाट व पटकथा के चलते एक हास्य फिल्म बनते बनते रह गयी. फिल्म में सारे जोक्स व चुटकुले 80 के दशक के हैं, जिन्हे सुनकर हंसी नहीं आती. सनी देओल की पुरानी फिल्मों के कुछ संवाद उठाकर इस फिल्म में ठूंसे गए हैं. फिल्म का संगीत भी कमजोर है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो एक भी कलाकार अपनी परफार्मेंस से प्रभावित नहीं कर पाता. सनी साउंड प्रा.लिमिटेड, श्रेयस तलपड़े व दीप्ति तलपड़े निर्मित व श्रेयस तलपड़े निर्देशित फिल्म ‘‘पोस्टर ब्यायज’’ के पटकथा लेखक पारितोष पेंटर व बंटी राठौड़, संगीतकार तनिष्क बागची, कैमरामैन निगम बोमजान तथा कलाकार हैं- सनी देओल, बाबी देओल, श्रेयस तलपड़े, सोनाली कुलकर्णी व अन्य.

डैडी : अर्जुन रामपाल का दमदार अभिनय

मुंबई के डौन से राजनेता बने अरुण गवली के जीवन पर फिल्मकार आशिम अहलूवलिया की फिल्म ‘डैडी’ में अर्जुन रामपाल के दमदार अभिनय के अलावा कुछ नहीं है.

यह कहानी है मुंबई के वर्ली इलाके की दगड़ी चौल में रहने वाले एक गरीब मिल मजदूर के बेटे अरुण गवली की, जो कि गैंगस्टर की राह पकड़कर खुद को गैंगस्टर के रूप में इस कदर स्थपित करता है कि लोग उससे डरने लगते हैं और फिर वह राजनीति में कूद कर चुनाव लड़ता है. उसके निर्वाचन क्षेत्र के लोग उससे डरते हैं. वह उसे चुनाव जिताने में कमी नहीं रखते.

फिल्मकार ने ‘सत्यकथा’ बयां करने के दावे के साथ फिल्म में डैडी यानी कि अरुण गवली को कठोर, निर्दयी, ठंडे खूनी की बजाय अनिच्छा से गैंगस्टर बने इंसान के रूप में पेश किया है, जो कि एक पारिवारिक इंसान है. वह दोस्तों का दोस्त है और अपने परिवार, अपनी पत्नी व बेटियों से बहुत प्यार करता है. उसकी आपराधिक गतिविधियां अपने दोस्तों के प्रति निष्ठा से संतुलित है. अर्थात अब तक लोगों के दिमाग में अरुण गवली की जो छवि रही है, उससे यह कहानी मेल नहीं खाती.

फिल्मकार ने उन्हें एक गैंगस्टर की बनिस्पत एक पारिवारिक इंसान के रूप में पेश करने का ज्यादा प्रयास किया है. इसके बावजूद फिल्म में मार धाड़ व खून खराबा सहित सभी आम मसाला फिल्मों के फार्मूले हैं. परिणामतः कहानी का मजा किरकिरा हो जाता है. फिल्मकार एक अपराधिक प्रवृत्ति के इंसान की अतीत के कुछ घटनाक्रमों व अतीत की कहानी को रोचक तरीके से पेश कर भी अपनी फिल्म को मनोरंजक व रोचक बनाते रहे हैं, पर इस आधार पर भी आशिम अहलूवालिया बुरी तरह से विफल रहे. घटिया कहानी और नाटकीय संवादों से युक्त इस फिल्म में ऐसा कुछ भी रोचक नहीं है, जिसकी वजह से दर्शक फिल्म को देखना चाहे.

गैंगस्टर की कहानी होने के बावजूद फिल्मकार ने अरुण गवली के कृत्यों को सही ठहराने का असफल प्रयास किया गया है. फिल्म में एक संवाद है, जहां एक पात्र एक पुलिस अफसर से कहता है, ‘‘यदि आप एक चौल में पैदा होते और वह यानी कि अरुण गवली एक पुलिस अफसर के घर तो आप गुंडा और वह पुलिस अफसर होता.’’

यदि हम कहानी की सत्यता को नजरंदाज कर फिल्म पर गौर करें, तो यह फिल्म महज डैडी उर्फ अरुण गवली का किरदार निभाने वाले अभिनेता अर्जुन रामपाल के दमदार अभिनय के लिए ही देखी जा सकती है. कई दृश्यों में अर्जुन रामपाल की बौडी लैंगवेज कमाल की है. उन्होंने संवाद अदायगी, भाषा व बौडी लैंगवेज पर काफी मेहनत की है. मुंबई शहर पर शासन करने वाले मकसूद भाई के किरदार में फरहान अख्तर की परफार्मेंस असरदार नहीं है.

कैमरामैन जेसिका ली गने और पंकज कुमार ने कुछ दृश्यों को बड़ी खूबसूरती से अपने कैमरे से पकड़ा है. अर्जुन राम पाल और रूतविज पटेल निर्मित फिल्म ‘डैडी’ के निर्देशक आशिम अहलूवालिया, लेखक आशिम अहलूवालिया व अर्जुन रामपाल, संगीतकार साजिद वाजिद तथा कलाकार हैं- अर्जुन रामपाल, फरहान अख्तर, ऐश्वर्या राजेश, निशिकांत कामत, राजेश श्रृंगारपुरे, श्रृति बापना व अन्य.

मि. कबाड़ी : समय व धन की बर्बादी

फ्रांस के मशहूर लेखक मोलियर द्वारा लिखित नाटक ‘द बोर्जिवा जेंटलमैन’ में एक गरीब इंसान जब अमीर बन जाता है, तब उसकी जिंदगी की जो त्रासदियां होती हैं, उसका चित्रण है. उसी से प्रेरणा लेकर स्व. ओम पुरी की पूर्व पत्नी द्वारा लिखित व निर्देशित फिल्म ‘मि. कबाड़ी’ अपना प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह से नाकामयाब रहती है. भारतीय समाज पर हास्यव्यंग युक्त यह फिल्म अपने मकसद से भटकी हुई नजर आती है.

यह कहानी है कबाड़ी का काम करने वाले कल्लू (अन्नू कपूर) की, जो छोटा सा स्क्रैप डीलर है. उसका जीवन एक दिन रंक से राजा में बदल जाता है. उसके बाद कल्लू मुस्कुराते हुए अपनी प्रेमिका चंदो (सारिका) से शादी करता है. कल्लू अपने दादा की जमीन के टुकड़े का मालिक है. जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं, क्योंकि इस पर राजमार्ग का निर्माण किया गया है. इस जमीन के टुकड़े से मिले धन से कल्लू अमीर हो जाता है, तब वह अपने अतीत को अलविदा कह कर एक नए अध्याय की शुरूआत करता है.

वह अपनी पिछली दोस्त गरीब दुःखी मलिन बस्ती वाले जीवन को हमेशा के लिए मिटाकर एक भव्य जिंदगी जीना चाहता है. इसलिए वह दिल्ली के पौश इलाके में बंगला खरीद कर रहने लगता है. अब तक उसका बेटा चमन स्कूल नहीं जाता था, पर अब वह उसे एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में प्रवेश दिला देता है. मगर बेटा चमन (राजवीर सिंह) पांचवीं से ज्यादा पढ़ नहीं पाता. उसके बाद उनके जीवन की त्रासदियों का सिलसिला शुरू होता है. उसका केवल एक ही सपना है उसकी गिनती एक सफल उद्योगपति के रूप में हो. मगर सम्मानित व्यवसाय चलाने के लिए उसके पास आवश्यक अनुभव या शिक्षा नहीं है. इसलिए वह राज्य के 150 से ज्यादा निजी शौचालयों का मालिक है, कल्लू का बेटा चमन इन शौचालयों को चलाता है और साप्ताहिक पैसा इकट्ठा करता है.

मगर चमन अपने इस पेशे से शर्मिंदा है. कल्लू और चमन सहित पूरा परिवार कहता है कि वह 150 होटलों की श्रृंखला के मालिक हैं पर जब जब चमन की शादी इस आधार पर तय होती है, तब तब सच सामने आ जाता है और चमन की शादी टूट जाती है. कल्लू का सपना समाज के उच्च लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना है, वह अपने बेटे चमन और बेटी मीठी (उल्का गुप्ता) की शादी अमीर परिवार में करने की इच्छा रखता है.

चंदो की मूर्खता के कारण कल्लू और चमन के सपने नीचे आते हैं. कहानी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर तब पहुंचती है, जब चमन, शैली के साथ प्यार में पड़ जाता है. शैली के पिता मि. अरोड़ा (ब्रजेंद्र काला) को कबाड़ियों से नफरत है क्योंकि उनकी बहन कल्लू के साले यानी कि चमन के मामा भूरिया मदारी (विनय पाठक) के साथ भाग गई थी. पर अंत में चमन की शादी होती है. कल्लू को अहसास होता है कि उसे अपने अतीत से नफरत नहीं करनी चाहिए. मि. अरोड़ा की समझ में आता है कि काम छोटा या बड़ा नहीं होता है.

कमजोर व भटकी हुई पटकथा के चलते गरीब इंसान के अमीर बनने की त्रासदी पर बहुत अच्छे हास्य दृश्य रचे जा सकते थे, पर ऐसा नहीं हो पाया. फिल्म की पटकथा का कोई ओर छोर ही नहीं है. दिग्गज अभिनेताओं की मौजूदगी के बावजूद यह फिल्म प्रभावित नहीं करती. विनय पाठक के किरदार को बहुत दबा हुआ दिखाया गया है. सारिका का किरदार महज कैरीकेचर बनकर रह गया है. लेखक व निर्देशक के तौर पर सीमा कपूर ने फिल्म में लव जेहाद, शौचालय सहित बहुत कुछ पिरो दिया है. पर कुछ भी दर्शक के दिमाग तक नहीं पहुंचता. फिल्म मनोरंजक होने की बजाय बोर ही करती है. लेखक व निर्देशक के तौर पर सीमा कपूर निराश करती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो हास्य में माहिर कलाकार अन्नू कपूर ने काफी लाउड अभिनय किया है, जो कि मजा किरकिरा करता है. ऐसा लगता है कि बहन सीमा कपूर के संग रिश्ता निभाने के लिए अन्नू कपूर ने इस फिल्म में काम किया है. सरिका व विनय पाठक बंधक बनाए हुए लगते हैं. ओम पुरी कुछ हद तक प्रभावित करते हैं. इसके अलावा किसी भी कलाकार का अभिनय प्रभावित नहीं करता.

फिल्म में शौचालय के उद्घाटन समारोह में अनूप जलोटा का भजन भी असरदार नहीं है. पर एक शायरी ‘आंखों पर कभी न बांधो पट्टियां, ओ जाने वालों खुले में कभी ना जाओ टट्टियां..’’ से खुले में शौच न जाने की सलाह जरूर दी गयी है. फिल्म का संगीत पक्ष भी अति साधारण है.

कुल मिलाकर ‘मि. कबाड़ी’ ऐसी फिल्म है, जिसके लिए समय व धन बर्बाद करना मूर्खता ही कहलाएगी. ‘अनूप जलोटा फिल्मस’ और ‘ओम छानगानी फिल्मस’ एंड साधना टीवी के बैनर तले बनी फिल्म ‘मि. कबाड़ी’ के निर्माता अनूप जलोटा, सह निर्माता राकेश गुप्ता व ओम छानगानी, लेखक निर्देशक सीमा कपूर तथा कलाकार हैं- स्व. ओम पुरी, अन्नू कपूर, सारिका, विनय पाठक, ब्रजेंद्र काला, उल्का गुप्ता, राजवीर सिंह, कशिश वोरा व अन्य.

औरतों को ताकत देतीं सुरेखा कालेल

महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव जांबुलनी की विज्ञान से 12वीं जमात पास सुरेखा कालेल में उस समय अपना काम करने की भावना जागी, जब खेतीबारी से उन का परिवार भरपेट खाने में नाकाम हो रहा था. पैसा कमाने के लिए वे सब्जियां बेचा करती थीं.

एक बार जब वे सब्जी बेचने बाजार गईं, तो वहां ‘मानदेशी संस्था’ का स्टौल लगा देखा और पता किया कि इस में होता क्या है.

वहां जा कर सब से पहले उन्होंने सेविंग्स अकाउंट खोला. इस के बाद उन्होंने रोजाना कुछ पैसे जमा करने की सलाह पा कर आसपास एक ग्रुप बनाया. देखते ही देखते उन्होंने कुछ ही समय में 10-10 औरतों के 3 ग्रुप बना डाले.

सुरेखा कालेल ने 3 साल तक इस जमा योजना पर काम किया. इस के बाद उन के हुनर को देख कर ‘मानदेशी संस्था’ ने उन्हें 6 दिन की ‘गोट इंसैमिनेशन ट्रेनिंग’ के लिए फौल्टन भेजा.

सुरेखा कालेल ने वहां 25 बकरियों में वीर्य रोपने का काम किया, जिस में से 15 केस कामयाब रहे. इस कामयाबी ने उन के आत्मविश्वास को बढ़ाया और वे इस कारोबार से जुड़ गईं.

सुरेखा कालेल कहती हैं, ‘‘मैं पढ़ीलिखी हूं. ऐसे में सब्जियां बेचना और खेतों में काम करना मुझे पसंद नहीं था. फसल की पैदावार भी इतनी कम होती थी कि पूरा साल भरपेट खाना मिलना मुश्किल था. ऐसे में यह काम मुझे अच्छा लगा.

‘‘यह ‘गोट प्रोजैक्ट’ काफी फायदेमंद था. इस में बकरियां अच्छी और तंदुरुस्त पैदा होती हैं, जिस से दूध तो मिलता ही है, साथ ही इन्हें बेच कर काफी पैसा भी कमाया जा सकता है.’’

सब से पहले सुरेखा कालेल ने सब्सिडी के तहत लोन लिया, जिस से उन्होंने एक बकरा और 10 बकरियां खरीदीं. इस के बाद उन्होंने वीर्य रोपने के तरीके से बकरियों की तादाद बढ़ाई.

सुरेखा कालेल के इस काम को देख कर गांव की कई औरतें आगे आईं, जिस से सुरेखा का काम करना और आसान हो गया.

सुरेखा कालेल इन औरतों को एक महीने की ट्रेनिंग दे कर उन्हें अपना काम करने के लिए बढ़ावा देती हैं. इस ट्रेनिंग में उन्हें 4 तरह के वीर्य के बारे में बताया गया. बोअर, दमास्कस, अल्पाइन क्रौस और उस्मानाबादी. इस के अलावा बकरियों के खानपान, सेहत, रखरखाव वगैरह पर भी जानकारी दी गई.

आज तकरीबन 15 औरतें सुरेखा कालेल के इस प्रोजैक्ट से जुड़ी हैं, जिस में हजारों बकरियों को आर्टिफिशियल इंसैमिनेशन किया गया है. इस से 70 फीसदी तक अच्छा नतीजा मिलता है. ये बकरियां बाकी बकरियों से ज्यादा तंदुरुस्त होती हैं.

बोअर बकरियों का कम दिनों में वजन जल्दी बढ़ता है. 3 महीने में 12 से 15 किलो और 6 महीने में 25 से 30 किलो वजन बढ़ता है.

इसी तरह दमास्कस बकरियां दूध ज्यादा देती हैं. वैसे, अमूमन बकरियां एक से डेढ़ लिटर दूध देती हैं, जबकि दमास्कस बकरियां ढाई से 3 लिटर दूध देती हैं.

अल्पाइन क्रौस बकरियां दूध और मांस दोनों के लिए अच्छी होती हैं, जबकि उस्मानाबादी बकरियां महाराष्ट्र और कर्नाटक में ज्यादा मिलती हैं. इन बकरियों का वजन भी जल्दी बढ़ता है.

सुरेखा कालेल ने 80 हजार रुपए का कर्ज ले कर अपना कारोबार शुरू किया और अभी लाखों रुपए में यह कारोबार फैल चुका है.

सुरेखा कालेल को इस काम में दिक्कतें भी बहुत आईं. वे बताती हैं कि पहले गांव के लोग उन के इस काम का मजाक बनाते थे कि वे औरत हो कर ऐसा काम कैसे करेंगी, पर धीरेधीरे जब उन लोगों ने उन का काम देखा, तो खुद ही उन से जुड़ने लगे.

आजकल सुरेखा कालेल आसपास के 5 गांवों में बकरियों में वीर्य रोपने का काम करती हैं. इंसैमिनेशन के 15 दिन बाद वे उस गांव में जा कर बकरियों की जांच करती हैं. इंसैमिनेशन के बाद बकरी मालिक को उन के खानपान पर ध्यान देने की बात कहती हैं.

‘मानदेशी संस्था’ और ‘नारी संस्था’ बहुत ही कम दाम पर सुरेखा कालेल को ‘गोट सीमेन’ मुहैया कराती हैं. जून, जुलाई और अगस्त महीने में इंसैमिनेशन की मांग ज्यादा बढ़ जाती है. एक महीने में 40 से 45 बकरियों का इंसैमिनेशन होता है.

इंसैमिनेशन 14 महीने में 2 बार करना सही होता है. बकरियां सेहतमंद हैं कि नहीं, इस की जांच वीर्य रोपने से पहले करनी पड़ती है.

सुरेखा कालेल इस काम में और ज्यादा औरतों को जोड़ना चाहती हैं, क्योंकि अभी मांग के मुताबिक ट्रेनिंग पाई औरतें कम हैं. हर बकरी तकरीबन 50 से 60 हजार रुपए में बिकती है.

सुरेखा कालेल ने अब तक तकरीबन एक हजार बकरियों का इंसैमिनेशन किया है, जिस में से अभी 12 बकरियां उन के पास हैं, बाकी बकरियों को उन्होंने बेच दिया है.

आज सुरेखा कालेल के बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं. वे पढ़ाई और खेल दोनों में अच्छा नाम कमा रहे हैं.

इस कारोबार ने सुरेखा कालेल की जिंदगी बदल दी है. वे हर औरत को कुछ न कुछ काम करने की सलाह देती हैं.

वे कहती हैं कि मैं आगे भी और ज्यादा औरतों को ट्रेनिंग देना चाहती हूं, ताकि वे इस कारेबार से जुड़ कर अपना और अपने परिवार का भविष्य बढि़या बना सकें.

जीएसटी का पंडा राज और व्यापारियों की परेशानियां

जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर से आम व्यापारियों की परेशानियां दिखाई दे रही हैं. सरकार का दावा, इस से वस्तुओं पर लगने वाला दोहरातिहरा कर और कर पर कर लगना बंद हो जाएगा व देश में सामान आसानी से इधर से उधर जा सकेगा, निरर्थक साबित हो रहा है.

कुछ चीजों के दामों में चाहे मामूली फर्क आया हो पर ज्यादातर वस्तुओं के दाम वही हैं और बहुतों पर तो ज्यादा कर मांगा जा रहा है.

एक देश का व्यापार उस के जंगलों की तरह अपनेआप उगता है. जंगलों को मनमरजी से उगाएंगे तो न जाने कितनी प्रजातियां मर जाएंगी, जंगल मरुस्थल बन सकते हैं या विषैले.

जीएसटी एक ऐसी ही प्रणाली है, जो थोपी जा रही है.  व्यापार को स्वत: अपनाने की छूट नहीं दी जा रही. इस में लचीलापन नहीं है. जीएसटी काउंसिल भाग्यविधाता बन गई है. वह कुंडलीनिर्धारक सी दिख रही है. आप से कहा जा रहा है कि यह तो आप का भाग्य है, डैस्टिनी है, कर्मों का फल है, और जो है, उसे मान लो. जो कुछ नया तय होगा, वह आम जनता नहीं, सरकार के पंडित देखेंगे और तय करेंगे. और यह जनता के दिए चढ़ावे पर निर्भर करता है कि कहां, क्या छूट दी जाए.

जैसे पंडित, मौलवी और पादरी कोई छूट नहीं देता, वैसे ही काउंसिल में कोई दलील नहीं चलेगी. दाम वही रहेंगे जो बोर्ड पर लिखे हैं. गौदान मरने पर भी करना होगा, मृत्युभोज देना ही होगा. जो चाहे मरजी कर लो, कफन से भी कर वसूला जाएगा.

दाम इसलिए नहीं घट रहे क्योंकि व्यापारी नहीं चाहते कि अगर 4 पैसे बच रहे हैं तो वे ग्राहकों को दे दिए जाएं क्योंकि कल को न जाने रिटर्न भरते समय क्या अड़चन आ जाए, असैस्मैंट कराते समय कितना अतिरिक्त पैसा मांग लिया जाए. उस समय ग्राहक से मांगने तो नहीं जाएंगे.

बौलीवुड के वो हीरो जिन्होंने विलेन के रोल में नाम कमाया

आज कल बौलीवुड में हीरो से ज्यादा विलेन का बोलबाला है. बौलीवुड में कई ऐसे हीरो हैं जिन्होंने हीरोपंती के साथ विलेनगिरी भी की है. लेकिन कइयों को विलेन के किरदार ने अहम पहचान दिलाई तो कई हीरो और विलेन दोनों ही रुप में दर्शकों को भाए. कहते हैं हीरो हो या विलेन अगर दर्शक आपके किरदार से जुड़कर आपसे प्यार या नफरत करने लगे, तब आपके काम की जीत होती है. हिंदी सिनेमा में कई ऐसे विलेन हैं जो अपनी अदाकारी से अमर हो गए. जैसे अमरीश पुरी को ही ले लीजिए. एक नजर डालते हैं बौलीवुड के उन हीरो पर जो विलेन के रुप में मशहूर हुए.

विवेक ओबेराय

इस लिस्ट में सबसे पहले विवेक ओबेराय का नाम आता है. विवेक ने इंडस्ट्री में बतौर हीरो एंट्री की थी लेकिन पौपुलर विलेन के रुप में हुए. अब बौलीवुड में उनका रुतबा काफी बढ़ गया है. तभी तो हिंदी सिनेमा से लेकर तमिल सिनेमा तक उनकी डिमांड है. उन्होंने कृष-3 और तमिल फिल्म विवेगम में खलनायक की भूमिका निभाई.

सैफ अली खान

सैफ अली खान ने फिल्म ओंकारा और कुर्बान में विलेन का किरदार निभाया. फिल्म ओंकारा में लंगडा त्यागी का रोल आज भी लोगों को याद है. सैफ की बेहतरीन एक्टिंग ने इस रोल को जीवंत कर दिया.

अमिताभ बच्चन

सदी के महानायक ने फिल्म ‘आंखें’ और ‘आग’ सहित कुछ और फिल्मों में विलेन का रोल निभाया. बिग बी को हीरो और विलेन दोनों के रोल में खूब पसंद किया जाता है.

संजय दत्त

बौलीवुड के खलनायक के रुप में पौपुलर संजय दत्त ने फिल्म ‘अग्निपथ’, ‘यलगार’, ‘वास्तव’ सहित कुछ और फिल्मों में विलेन का रोल निभाया है. अग्निपथ में खूंखार विलेन ‘कांचा’ बने संजय दत्त को देख लोगों के होश उड़ गए थे. इस रोल के लिए उन्होंने गजब का ट्रांसफोर्मेशन किया था. यह संजय दत्त की जिंदगी के सबसे बेहतरीन रोल में शुमार है.

जौन अब्राहम

फिल्म धूम में जौन ने एक चोर की भूमिका में नजर आये थे, लेकिन अगर देखा जाऐ तो जौन को उनकी असली पहचान इस फिल्म के बाद ही मिली. कहा जाता है कि इस फिल्म के बाद जौन रातों रात सुपरस्टार्स की लिस्ट में शामिल हो गये थे.

अन्ना आंदोलन पार्ट टू का हो गया ऐलान

देश जिन हालातों और माहौल से गुजर रहा है उसे देखते हुए वाकई किसी बड़े आंदोलन की सख्त जरूरत है, जिससे मूर्छित होती जनता को सांस लेने नए और खुलेपन की आक्सीजन मिले. पिछले एक साल से आंदोलन करूंगा, आंदोलन करूंगा  की रट लगाए बैठे गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने इस अदृश्य मांग को समझते दोबारा एक बड़ा आंदोलन करने की हुंकार भर दी है. यह प्रस्तावित आंदोलन भी भ्रष्टाचार के ही खिलाफ होगा. इस बाबत अन्ना ने बाकायदा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखते चेतावनी भी दी है कि 3 साल गुजर जाने के बाद भी न तो लोकपाल और लोकयुक्तों की नियुक्तियां हुई हैं और न ही सरकार किसानों की समस्याओं को दूर करने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर अमल करने कोई पहल कर रही है.

बकौल अन्ना हजारे वे बेहद व्यथित हैं और इसलिए फिर से जन आंदोलन करने को विवश हो रहे हैं. अपनी चिट्ठी में उन्होंने खासतौर से इस बात का जिक्र किया है कि अगस्त 2011 के उनके आंदोलन में दिल्ली के रामलीला मैदान पर देश के कोने कोने से आए लोगों ने शिरकत कर अपना समर्थन दिया था, जिसके चलते तत्कालीन सरकार को लोकायुक्त का कानून 17 और 18 दिसंबर 2013 को क्रमश राज्यसभा और लोकसभा में पारित करने बाध्य होना पड़ा था और बाद में राष्ट्रपति ने भी इस पर दस्तखत किए थे. नरेंद्र मोदी को संबोधित करते अन्ना ने लिखा है कि आपने सत्ता में आने से पहले जनता को भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण का भरोसा दिलाया था लेकिन जिन राज्यों में आपकी पार्टी की सरकारें हैं वहां भी नए कानून के तहत लोकायुक्त नियुक्त नहीं किए गए हैं. क्या हुआ तेरा वादा वो कसम वो इरादा की तर्ज पर मोदी पर तंज कसते हुये अन्ना ने उनकी कथनी और करनी में आते फर्क का भी जिक्र किया है.

इस एलान के और खत के मजमून के अपने दीर्घकालिक माने हैं कि मोदी जी भी पूनम गुप्ता की तरह बेवफा निकले, इसलिए उन्हें भी आंदोलन के जरिये वफा का सबक सिखाया जाएगा और मुमकिन है इस बाबत जगह भी वही हो, लोग भी वही हों, माहौल भी वही हो, लेकिन बाजी अन्ना के हाथों में ही होगी, इसमें शक है क्योंकि तीन साल में देश सचमुच में काफी बदल चुका है और उसकी प्रमुख समस्या भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि तेजी से देश को अपनी गिरफ्त में लेता नव हिंदुत्व या राष्ट्रवाद है, जिस पर अन्ना की नजर नहीं गई है या फिर जानबूझकर उन्होंने सत्ता पर हावी होते पंडावाद को अनदेखा कर दिया है, इसे समझ पाना हाल फिलहाल मुश्किल काम है.

लेकिन यह तय है कि इस बार भी उनके निशाने पर बिना किसी भेदभाव के सरकार और उसके मुखिया हैं. जन शक्ति आंदोलन पार्ट 2 को हालांकि उम्मीद के मुताबिक शुरुआती रेस्पान्स नहीं मिला है, लेकिन अन्ना की जिद और इच्छाशक्ति को हल्के में लेने की भूल मोदी और भाजपा करेंगे ऐसा लग नहीं रहा. 2011 के उनके हाहाकारी आंदोलन से भ्रष्टाचार भले ही खत्म न हुआ हो, लेकिन कांग्रेस जरूर खत्म सी हो गई, जिसे नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार का पर्याय बताते थकते नहीं थे, पर तब सिर्फ भ्रष्टाचार था और अब उसके साथ साथ वंदे मातरम, भारत माता, गौ माता, राष्ट्र गान वगैरह भी हैं, जिन्हें मौजूदा सरकार ने ही एक आंदोलन सा ही बनाकर रख दिया है.

राष्ट्रीय समस्याओं के नए बनते अपार्टमेंट में भ्रष्टाचार टौप फ्लोर पर है, लेकिन ग्राउंड फ्लोर पर धर्म और उसके सहायक तत्वों की पार्किंग है, जिससे होकर गुजरना अन्ना हज़ारे के लिए एक दुश्वारी वाला काम होगा. कमजोर और बिखरे विपक्ष को अन्ना का नया ऐलान राहत देने वाला हो सकता है, जिसमें मुमकिन है दिल्ली की बवाना विधानसभा सीट जीत कर फिर से वापसी कर रहे अपने चेले अरविंद केजरीवाल को वे फिर हीरो बना दें या दो चार और नए नायक पैदा कर दें, परंतु 2011 जैसा जन समर्थन अन्ना हजारे को शायद ही मिले, वजह उनके आंदोलन का पेटर्न और डिजायन वक्त के हिसाब से नहीं बदले हैं.

उन्हे अगर टौप फ्लोर गिराना है तो पहला बुलडोजर ग्राउंड फ्लोर पर चलाना पड़ेगा, जिसके किसी फ्लेट में उनका गांधीवाद भी बंधक पड़ा है. भाजपा की धर्मांधता को अरविंद केजरीवाल भी चुनौती देने की हिम्मत नहीं जुटा पाये थे, संभव नहीं दिख रहा कि अन्ना हजारे भी सच, एक कडवे सच से जूझने का दुसाहस कर पाएंगे. ऐसे में उनका आंदोलन टाइम पास इवैंट बन कर रह जाये तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें