विवाह, विवाद और तलाक और फिर उसके बाद क्या

दिल्ली की एक निम्नमध्यम कालोनी में रह रहे बस ड्राइवर पति ने अपने बच्चों के सामने अपनी पत्नी की इसलिए हत्या कर डाली क्योंकि वह मायके से ससुराल जाने को मना कर रही थी.

10 साल के बेटे के बीचबचाव के बावजूद पति ने पत्नी पर चाकू से वार भी किए और फिर उस पर गैस सिलैंडर मार कर उस की जान ले ली.

पुलिस स्टेशन पहुंच कर भी उस का गुस्सा शांत न हुआ और जेल से बाहर आ कर वह ससुराल वालों व अपने बच्चों को मारने की धमकियां देता रहा.

पतिपत्नी विवाद में इस तरह की घटनाएं आम हैं. जिस पति के हुक्म को मानने में पत्नी को बेहद खुशी मिलती है और जिस पत्नी के चेहरे पर एक मुसकान देखने के लिए पति पहाड़ पर चढ़ जाता है वे पतिपत्नी एकदूसरे की जान के हत्यारे बन जाते हैं, यह नया नहीं है. सभ्यता ने साथ रहना सिखा दिया पर आमतौर पर पतिपत्नी में गंभीर विवाद अकसर होते रहे हैं.

पतिपत्नी में सौहार्द के अभाव का बड़ा कारण यह है कि इस संबंध में एक, अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है. दोनों एकदूसरे के पूरक हैं, यह बात समाज नहीं सिखा पाया है. विवाह को धर्म ने किसी काल्पनिक शक्ति का आदेश दे कर स्थिर करने की कोशिश की  पर उस ने धर्म के बिचौलियों को विवाह पर ज्यादा अधिकार दे दिए, विवाह को सुखद कम बनाया.

जब से तलाक के कानून बने हैं, तब से कम से कम दोनों को अलग होने के अधिकार तो मिल गए हैं. वह पति, जिस ने पत्नी की हत्या कर दी, अगर पत्नी से तलाक ले लिया होता, तो पत्नी पर हक न जता पाता. विवाह करना तो चुटकियों का काम है पर विवाह तोड़ना और तलाक लेना बड़ा महंगा व समय लगने वाला है. इसलाम का 3 तलाक का फार्मूला कुछ अच्छा था लेकिन एकतरफा होने की वजह से बेहद अनैतिक था.

अब जब दुनिया ने स्वीकार कर लिया है कि औरतें सब मामलों में बराबर के अधिकार रखती हैं और वे खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं, तो इस तरह की हिंसा से बचने के लिए तलाक को आसान बनाया जाना चाहिए.

जैसे कहीं भी पंडित, पादरी या काजी के हाथों घंटों में विवाह हो सकते हैं, वैसे ही तलाक भी हो जाएं. विवाद हो तो बच्चों के संरक्षण का हो, संपत्ति के बंटवारे का हो. और पतिपत्नी, तलाक के बाद अपनाअपना जीवन मनमरजी से जी सकें.

ब्याह के साथ झट तलाक कहनेसुनने में चाहे बुरा लगे पर पतिपत्नी अदालतों में जूतेचप्पलें घिसते रहें, इस का कोई अर्थ नहीं है.

चंबल के बीहड़ों की आखिरी दस्यु जोड़ी

राजस्थान से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक फैले चंबल नदी के बीहड़ों में डकैत केदार गुर्जर का काफी आतंक था. उस ने अपनी पत्नी दस्यु सुंदरी पूजा के साथ ऐसा आतंक मचा रखा था कि लोग उन के नाम से कांपते थे. उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में कभी उस की तूती बोलती थी. दोनों धनी लोगों का अपहरण कर मोटी रकम फिरौती में वसूलते थे. इस मामले में दोनों काफी होशियार थे.

वे पकड़ (अपहृत) को जंजीर से बांध कर ताला लगा कर अपने साथ जंगल में रखते थे. फिरौती मिलने के बाद ही वे उसे छोड़ते थे. जब तक पैसा नहीं मिल जाता, तब तक वे पकड़ को मेहमान की तरह रखते थे.

हालांकि अब पहले जैसे खूंखार डकैत नहीं रहे, जो लोगों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून देते थे. एक जमाना था, जब चंबल के बीहड़ में डाकुओं का बोलबाला था. डाकुओं का ऐसा आतंक था कि लोग उन के नाम से कांपते थे. ऐसे तमाम डाकू हुए, जिन की कहानियां आज भी लोग सुनाते हैं. कई महिलाएं भी बीहड़ों में कूद कर डकैत बनीं. इन्हें बाद में दस्यु सुंदरी कहा गया.

लेकिन अब समय बदल गया है. अपराध भले ही पहले से ज्यादा बढ़ गए हैं, लेकिन अपराधों और अपराधियों का ट्रेंड बदल गया है. अब पहले की तरह बंदूकों की नोक पर डकैती की वारदात यदाकदा ही सुनने को मिलती है. डकैतों की पीढ़ी भी अब आखिरी पड़ाव पर है. बात राजस्थान, मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश की करें तो यहां के ज्यादातर डकैत गिरोहों का सफाया हो चुका है. डकैत सरगना जेल पहुंच चुके हैं या मुठभेड़ में अपनी जान गंवा चुके हैं.

समय के साथ अब डकैतों की कार्यप्रणाली बदल चुकी है. पहले की तरह अब डकैत फिल्मी स्टाइल में घोड़ों पर नहीं चलते. चंबल के बीहड़ों में भी अब घोड़ों के टाप नहीं सुनाई देते. वे भी वारदात को अंजाम देने के लिए वाहनों का उपयोग करने लगे हैं.

डकैतों में मुठभेड़ें भी कम होती हैं. डकैत गिरोह खूनखराबा करने के बजाय पैसे पर विश्वास करते हैं. गिरोह के सदस्यों के पास आधुनिक हथियार होते हैं. एक यही बदलाव नहीं आया है. वे रहते भी जंगलों और बीहड़ों में हैं.

राजस्थान से ले कर मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश तक पसरी चंबल की घाटी भी अब अवैध खनन की वजह से सिमटती जा रही है. अपनी ही तरह के सामाजिक भौगोलिक कारणों से क्षेत्र को कुख्यात बनाने वाली वजहों में से एक सब से महत्त्वपूर्ण वजह यहां से बहने वाली चंबल नदी है.

मध्य प्रदेश की विंध्य की पहाडि़यों से निकलने वाली यह नदी राजस्थान के कोटा, धौलपुर आदि इलाकों को पार करते हुए मध्य प्रदेश के भिंड मुरैना इलाकों से बहती हुई उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की ओर चली जाती है. पानी के कटाव से चंबल नदी के किनारेकिनारे सैकड़ों मील तक ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हो गई है. चंबल के ये बीहड़ कई दशकों से डकैतों के अभेद्य ठिकाने रहे हैं.

चंबल से जुड़े इलाकों में अभी भी कुछ डकैतों का आतंक है. राजस्थान के धौलपुर में भी अभी कुछ दस्यु गिरोह सक्रिय हैं. धौलपुर के एसपी राजेश सिंह ने इन दस्युओं के खिलाफ मुहिम चला रखी है, जिस की वजह से अधिकांश दस्यु पकड़े जा चुके हैं. फिर भी डकैतों का खात्मा अभी पूरी तरह से नहीं हो सका है.

एसपी राजेश सिंह 16 अप्रैल को देर रात तक काम कर रहे थे. हालांकि उस दिन वह औफिस से जल्दी ही घर आ गए थे. लेकिन घर आने के बाद भी वह सरकारी कामकाज में उलझे थे. रात 11 बजे के करीब उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी तो उन्होंने स्क्रीन पर नंबर देखा. नंबर खास मुखबिर का था, इसलिए उन्होंने फोन रिसीव कर बिना कोई भूमिका बनाए पूछा, ‘‘बताओ, क्या खबर है?’’

‘‘सर, आज की सूचना धमाकेदार है.’’ दूसरी ओर से मुखबिर ने कहा.

‘‘अच्छा, ऐसी क्या सूचना है?’’ एसपी साहब ने दिलचस्पी लेते हुए पूछा.

‘‘सर, आप चाहें तो आप की कई महीनों की भागदौड़ कामयाब हो सकती है.’’ मुखबिर बोला.

‘‘वो कैसे?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘सर, डकैत केदार गुर्जर आज आप के इलाके में ही घूम रहा है.’’ मुखबिर ने धीमी आवाज में कहा.

केदार का नाम सुन कर एसपी साहब के चेहरे पर चमक आ गई. उन्होंने पूछा, ‘‘कहां है वो?’’

‘‘सर, वह चंदीलपुरा के आसपास जंगल में है. उस की दोस्त पूजा डकैत भी उस के साथ है.’’ मुखबिर ने कहा.

‘‘अगर सूचना पक्की है तो आज वह हमारे हाथों से बच नहीं सकता.’’ एसपी साहब ने कहा.

‘‘सर, सूचना सौ फीसदी सही है. फिर भी आप चाहें तो उस के मोबाइल फोन से उस की लोकेशन पता करा लें.’’ मुखबिर ने एसपी साहब को आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘ओके मैं पता कराता हूं.’’ एसपी साहब ने कहा.

डकैत केदार गुर्जर और दस्यु सुंदरी पूजा के बारे में मिली सूचना महत्त्वपूर्ण थी. राजेश सिंह ने तुरंत एडीशनल एसपी जसवंत सिह बालोत को फोन कर के साइबर सेल द्वारा केदार गुर्जर के मोबाइल फोन की लोकेशन पता कराने को कहा.

एडीशनल एसपी जसवंत सिंह बालोत ने साइबर सेल के माध्यम से डकैत केदार गुर्जर के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगवाया तो पता चला कि वह चंदीलपुरा की घाटी के आसपास है. उन्होंने तुरंत यह सूचना एसपी राजेश सिंह को दे दी.

केदार गुर्जर की लोकेशन का पता चलते ही राजेश सिंह ने एडीशनल एसपी जसवंत सिंह बालोत को तुरंत पुलिस फोर्स के साथ जा कर डकैत केदार को घेरने को कहा. रात को ही अत्याधुनिक हथियारों से लैस एक पुलिस टीम गठित की गई और श्री बालोत के नेतृत्व में वह पुलिस टीम डकैत केदार गुर्जर और दस्यु सुंदरी पूजा की तलाश में निकल गई.

पुलिस टीम जैसे ही चंदीलपुरा की घाटी में बाबू महाराज के मंदिर के पास पहुंची तो डकैतों ने पुलिस की तरफ गोलियां चलानी शुरू कर दीं. पुलिस और डकैतों के बीच रुकरुक कर गोलियां चलती रहीं.

आखिर सवेरा होने से पहले पुलिस टीम डकैत केदार गुर्जर और दस्यु सुंदरी पूजा गुर्जर को जीवित पकड़ने में सफल रही. उन के बाकी साथी अंधेरे में वहां से भाग निकले थे. पुलिस टीम ने दिन चढ़ने पर उन की तलाश में जंगल का चप्पाचप्पा छान मारा, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला.

पुलिस टीम डकैत केदार और पूजा गुर्जर को कड़ी सुरक्षा में धौलपुर ले आई. केदार गुर्जर से एक वनचेस्टर 11, 44 बोर की राइफल, 315 बोर का एक कट्टा और 22 जिंदा कारतूस बरामद हुए थे. दस्यु सुंदरी पूजा गुर्जर के पास से 315 बोर की एक राइफल, 3 जिंदा कारतूस व 3 खाली कारतूस बरामद किए गए थे.

धौलपुर जिले के बसई डांग थाने में केदार और पूजा के खिलाफ भादंवि की धारा 307, 323, 332, 353, 34 और 3/25 आर्म्स एक्ट एवं 11 आरडीए एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया.

डकैत केदार एवं पूजा गुर्जर की गिरफ्तारी से राजस्थान ही नहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस का भी एक बड़ा सिरदर्द खत्म हो गया. केदार गुर्जर के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, अपहरण, डकैती की योजना बनाने, बलात्कार आदि के 29 मामले दर्ज हैं.

वहीं दस्यु सुंदरी पूजा गुर्जर के खिलाफ हत्या के प्रयास एवं डकैती की योजना बनाने के 3 मुकदमे दर्ज हैं. केदार गुर्जर की गिरफ्तारी पर राजस्थान के भरतपुर रेंज के आईजी ने 10 हजार रुपए और उत्तर प्रदेश के आगरा के डीआईजी ने 5 हजार रुपए एवं आगरा के एसएसपी ने 5 हजार रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.

दस्यु केदार एवं पूजा गुर्जर से की गई पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

केदार धौलपुर जिले के बाड़ी थाना के गांव भोलापुरा का रहने वाला था. फेरन सिंह गुर्जर के बेटे केदार को लोग ठेकेदार के नाम से पुकारते थे. डकैतों के बीच भी वह केदार उर्फ ठेकेदार के नाम से ही जाना जाता था. वहीं पूजा मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के कैलारस थाने के गांव डोंगरपुर निवासी बहादुर सिंह गुर्जर की बेटी थी. अब वह केदार गुर्जर उर्फ ठेकेदार की पत्नी है.

माना जा रहा है कि चंबल के बीहड़ों में केदार एवं पूजा के बाद अब कोई ऐसा दस्यु जोड़ा नहीं बचा है, जो डकैती की वारदातों में लिप्त हो. जो डकैत बचे हैं, वे अकेले पुरुष हैं. अगर उन की शादी हुई तो पत्नी गांव में रहती है. चंबल के बीहड़ में अब किसी पुरुष डकैत के साथ कोई महिला दस्यु नहीं है.

यह विडंबना ही है कि केदार और पूजा की 2-2 बार शादी हुई है. केदार की पहली पत्नी से उसे कोई संतान नहीं हुई थी. वहीं पूजा की बचपन में उस समय शादी हो गई थी, जब वह 11-12 साल की थी. अक्तूबर, 2004 में रामबाबू गड़रिया ने भंवरपुरा गांव में कई लोगों को एक कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया था. उन में पूजा का पति भी शामिल था.

पति की मौत के बाद पूजा ने ससुराल छोड़ दी और बीहड़ों में कूद गई. वह केदार गुर्जर के गिरोह में शामिल हो गई थी. कुछ दिनों बाद पूजा ने केदार से शादी कर ली थी. केदार ने ही पूजा को बंदूक चलाना सिखाया. शुरू में गिरोह में पूजा की भूमिका कोई खास नहीं थी, लेकिन सन 2007 के बाद से वह गिरोह के साथ पूरी तरह सक्रिय हो गई थी. वह अपहरण करने एवं वसूली से ले कर डकैती की योजना बनाने और पुलिस मुठभेड़ में केदार का कंधे से कंधा मिला कर साथ देने लगी थी.

करीब 2 साल पहले पुलिस ने पूजा को गिरफ्तार कर लिया था. तब वह लगभग 6 महीने तक धौलपुर की केंद्रीय जेल में बंद रही थी. बाद में जमानत मिलने पर वह वापस बीहड़ों में केदार के पास जा पहुंची थी.

बीहड़ों में पूजा साड़ी बांध कर रहती थी, लेकिन जब वह गिरोह के साथ वारदात करने निकलती थी तो ब्रांडेड जींस, टीशर्ट या शर्ट तथा स्पोर्ट्स शूज पहनती थी.

केदार और पूजा ने राजस्थान के धौलपुर से ले कर उत्तर प्रदेश के आगरा एवं मध्य प्रदेश के मुरैना तक अपना कार्यक्षेत्र बना रखा था. केदार का गिरोह लंबे समय तक बीहड़ों में नहीं रहता था. लेकिन जब बीहड़ों में रहता था तो अपने विश्वस्त लोगों से राशन और सामान मंगवाता था. वह जंगल में ही खाना बनाते और खाते थे. बारिश के मौसम में तिरपाल लगा कर रहते थे. रात हो या दिन, बीहड़ में जहां भी गिरोह रुकता था, वहां 1-2 सदस्य बंदूक ले कर पहरा देते रहते थे.

बीचबीच में केदार एवं पूजा के साथ डकैत गिरोह के सदस्य तीर्थयात्रा पर भी जाते थे. ये लोग विश्वविख्यात पुष्कर मेले और अलवर जिले के भर्तृहरि मेले में कई बार जा चुके हैं. इस बीच ये अपनी वेशभूषा बदल लेते थे. केदार गुर्जर धोतीकुरता और पगड़ी बांध कर ठेठ देहाती बन जाता था तो पूजा जंफर और कुरती पहन कर ठेठ गूजरी बन जाती थी. लेकिन 1-2 हथियार ये अपने साथ रखते थे. बाकी हथियारों को अपने ठिकानों पर जंगल में छिपा देते थे. केदार और पूजा सामान्य ग्रामीण की तरह जयपुर और आगरा के ताजमहल आदि जगहों पर भी घूम चुके हैं.

डकैत केदार की आदत थी कि वह जंगल में जहां खाना खाता था, वहां से 1-2 किलोमीटर दूर जा कर पानी पीता था. रात में भी ये 1-2 बार अपना ठिकाना बदल लेते थे.

इन की गिरफ्तारी से कुछ महीने पहले धौलपुर पुलिस की केदार और पूजा गिरोह से मुठभेड़ हुई थी. उस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने इन के चंगुल से आगरा के एक ठेकेदार देवेंद्र ठाकुर को मुक्त कराया था. देवेंद्र का उत्तर प्रदेश के शमसाबाद से अपहरण किया गया था. वह शमसाबाद के पूर्व विधायक एवं व्यापारी डा. राजेंद्र सिंह का रिश्तेदार था. देवेंद्र ठेकेदारी करता था.

देवेंद्र के अपहरण के बाद केदार और पूजा के गिरोह ने उस के घर वालों से 50 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. बाद में 20 लाख रुपए में सौदा तय हो गया था. देवेंद्र के घर वाले 20 लाख रुपए ले कर आने वाले थे, इसी बीच पुलिस को सूचना मिल गई थी. पुलिस ने डकैतों की घेराबंदी कर ली. दोनों तरफ से गोलियां चलीं. मुठभेड़ के दौरान डकैत देवेंद्र को छोड़ कर भाग निकले थे.

देवेंद्र ने तब पुलिस को बताया था कि शमसाबाद से उस का एक कार में अपहरण किया गया था. रास्ते में उसे इंजेक्शन लगा कर बेहोश कर दिया गया था. जब होश आया तो वह मध्य प्रदेश के जंगलों में था. बाद में डकैत गिरोह उसे साथ ले कर इधरउधर घूमता रहा. गिरोह ने देवेंद्र को जंजीरों से बांध कर रखा था. जंजीर में ताला लगा रहता था.

केदार एवं पूजा की गिरफ्तारी से चंबल के बीहड़ों में आतंक के 2 साए भले ही कम हो गए हैं, लेकिन उन की दहशत अभी भी 3 राज्यों के कई जिलों में है. केदार की उम्र लगभग 60 साल है तो पूजा भी 40-45 साल के आसपास की है. दोनों को इस बात का दुख है कि उन की कोई औलाद नहीं है. 2 बार शादी करने के बाद भी कोई संतान न होने से केदार अब टूट सा गया है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित 

पाकिस्तान की भारत को नई धमकी के मायने

आतंकवादियों को शह देने के अलावा पाकिस्तान की राजनीति का एक और शगल है राजनयिक स्तर पर पटाखे छोड़ना. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी इन दिनों अमेरिका में हैं और वहां लगातार इसी तरह के पटाखे छोड़ रहे हैं. वैसे तो उनकी इस यात्रा का सबसे बड़ा मकसद पाकिस्तान को बाज आने की लगातार धमकियां दे रहे ट्रंप प्रशासन को मनाना है, लेकिन इसमें बहुत कामयाबी नहीं मिल रही, तो वह अपने बयानों से ही कुछ नए धमाके करने में जुट गए हैं.

अब्बासी ने कहा है कि पाकिस्तान ने सीमित असर वाले छोटे परमाणु हथियार तैयार किए हैं, जिनका इस्तेमाल वह भारत की ‘कोल्ड स्टार्ट नीति’ के जवाब में कर सकता है. कोल्ड स्टार्ट नीति भारत द्वारा 2004 में अपनाई गई उस नीति को कहा जाता है, जिसमें भारत ने यह तय किया था कि वह अपनी तरफ से यही कोशिश करेगा कि पाकिस्तान से पूर्ण युद्ध की नौबत न आए. अगर पाकिस्तान किसी मोर्चे पर कोई गड़बड़ी करता है, तो उसका जवाब उसी मोर्चे पर सीमित युद्ध के जरिए दिया जाएगा. लगभग वैसे ही, जैसे कारगिल युद्ध के दौरान हुआ था.

वैसे यहां मुद्दा भारत की रणनीति का नहीं, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की परमाणु हमले की धमकी का है. अब्बासी का बयान यह बताता है कि उनका मुल्क  युद्ध को बढ़ने से रोकने की भारत की तय नीति का जवाब परमाणु हमले से देना चाहता है. एक तरह से देखा जाए, तो इस समय दुनिया में दो ही लोग हैं, जो परमाणु युद्ध की धमकी दे रहे हैं. एक, उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग-उन और दूसरे हैं पाकिस्तान के मौजूदा प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी. लेकिन इसे अब्बासी की बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि उनकी धमकी को पूरी दुनिया में कोई भी उतनी गंभीरता से नहीं ले रहा, जितना कि उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग-उन की धमकी को लिया जा रहा है.

अब्बासी को गंभीरता से न लिए जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वह पाकिस्तान के कामचलाऊ प्रधानमंत्री हैं और इस पद पर वह शायद ज्यादा दिन तक नहीं रहें. नवाज शरीफ को अदालत द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद उन्हें स्थाई व्यवस्था होने तक के लिए पद पर बिठाया गया है. यह भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनका आखिरी विदेश दौरा है. इस दौरे का पूरा फायदा उठाते हुए वह पाकिस्तानी राजनीति में अपने लिए अधिक से अधिक नंबर बटोर लेना चाहते हैं. इसका सबसे आसान तरीका भारत के खिलाफ धमाके करना है, सो वह कर रहे हैं.

हालांकि इस कोशिश में वह उस मकसद से दूर हो सकते हैं, जिसके लिए अमेरिका गए हैं. उन्होंने सीमित क्षमता वाले परमाणु हथियारों पर जो बयान दिया है, वह पाकिस्तान के पिछले किसी भी शासक ने नहीं दिया. न ही पाकिस्तान के किसी फौजी जनरल ने ही ऐसी कोई बात कही है. यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान में अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अब्बासी ने वह बात जगजाहिर कर दी, जिसे पाकिस्तान ने अभी तक छिपाकर रखा था.

दरअसल, यही वह गंभीर मुद्दा है, जिस पर भारत को गौर करना होगा, और इसी के हिसाब से अपनी तैयारियां भी करनी होंगी. और यह समय पूरी दुनिया के लिए भी सचेत होने का है. इस बात को लेकर चिंता सभी जगह रही है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार अगर आतंकवादियों के हाथ पहुंच गए, तो इससे बुरा और कुछ नहीं होगा. सीमित असर वाले छोटे परमाणु हथियारों के मामले में यह खतरा शायद और भी ज्यादा हो सकता है, क्योंकि ये हथियार भारत से युद्ध के लिए ही बनाए जा रहे हैं, इसलिए हमें इससे निपटने की रणनीति तो बनानी ही होगी.

फिल्में जिन्हें देख कर जवानी याद आ जाए

सिनेमा हम आप से उतना ही जुड़ा है जितना जीवन के और रंग, आप को इस का एहसास हो या न हो लेकिन जब प्यार खिलता है तो सारी दुनिया खूबसूरत नजर आती है.

किशोरावस्था में हमें मुहब्बत और अचानक किसी के बहुत अच्छे लगने का एक अच्छा सा एहसास होने लगता है. इस एहसास की दुनिया में ही खो जाने का मन करता है. हम से कई गलतियां भी होती हैं, हमें प्यार की खुशी का भी पता चलता है, हमारा दिल टूटता है और किसी के नकारने का भी पता चलता है.

कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्हें देखने पर आप को किशोरावस्था की यादें ताजा हो जाएंगी, ऐसी यादें जो वक्त के साथ काम के बीच लगभग गायब हो गई थीं. राजकपूर की फिल्म ‘बौबी’ में अल्हड़ जोड़े की प्रेमकहानी जब भी परदे पर आती है तो उसे देख कर हम भी अपने अतीत की गहराइयों में गोते लगाने लगते हैं और जिंदगी के बीत गए पन्नों पर अपनी धुंधलाती प्रेमकहानी की तसवीर खोजने लगते हैं.

अल्हड़ प्रेम का सजीव चित्रण हिंदी सिनेमा में कई बार किया गया है. हंसते खिलखिलाते झरने की तरह हिंदी सिनेमा सामाजिक यथार्थ और मानवीय रिश्तों के आवेग, तपिश, त्रासदी और छिछोरापन सब को अपने में समेटे निरंतर आगे बढ़ता रहा है.

इस प्रबल सिनेमाई झरने ने जन्म दिया है कर्णप्रिय गीतसंगीत को, कालजयी कथाओं व पात्रों की प्रेम में डूबी कहानियों को जो आज के अंधेरे मल्टीप्लैक्स की डिजिटल स्क्रीन पर आ कर कभी आप को आप की जिंदगी के खुशनुमा 17वें साल में ले जाती हैं, कभी लोरियां सुनाती हैं और कभी डरातीहंसाती हैं.

प्रेम का बदलता रूप

पहले की सिनेमाई प्रेम कहानियों में पारिवारिक मूल्यों की प्राथमिकता होती थी ताकि सामान्य दर्शक उसे आसानी से पचा सकें. कुछ फिल्मों की प्रेम कहानियां इतनी लोकप्रिय हुईं कि वे आज भी लोगों के जेहन में बसी हुई हैं. ‘मोहब्बतें’, ‘दिल चाहता है’, ‘कयामत से कयामत तक’, ‘मैं ने प्यार किया’, ‘हम आप के हैं कौन’, ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ ऐसी ही फिल्में हैं. इन्हें देख कर हमें अपनी जवानी का एहसास होता है.

‘मसान’ और ‘सरबजीत’ जैसी फिल्मों से अपने अभिनय की वाहवाही पा चुकीं रिचा चड्ढा का कहना है, ‘‘फिल्मों में प्रेमकहानियों का होना फिल्मों की जान जैसा है. पहले के दौर में प्रेम का प्रदर्शन सिर्फ आंखों की भाषा में होता था. आज फिल्मों में प्रेमप्रदर्शन के माने बदल गए हैं, पर अंदाज वही है.’’

संगीत की पवन में पनपता प्रेम

प्यार की पींगें बढ़ाने में प्रेम से भरे हुए कर्णप्रिय संगीत की अहम भूमिका होती है. श्वेतश्याम से ले कर डौल्बी डिजिटल साउंड वाली शायद ही कोई ऐसी फिल्म बौलीवुड में आई हो जिस में प्रेमभरे संगीत की औक्सीजन न हो. हमारी फिल्मों का किस्सा भी ऐसा है जहां बिना तरानों के कोई फिल्म पूरी नहीं होती.

अगर नायक, नायिका को छेड़ता है तो गा उठता है, ‘अरे लाल दुपट्टे वाली तेरा नाम तो बता…’,अगर नायिका के रूपशृंगार की तारीफ करनी हो तो धीमे स्वर में ‘चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो…’ गुनगुना उठता है. फिल्मों में संगीत का यह खुमार आज से 85 साल पहले बनी फिल्म ‘आलमआरा’ से शुरू हो गया था. तब से ले कर आज तक 8 दशकों के बीत जाने पर भी संगीत का सुरूर कम नहीं हुआ.

फिल्मों में बात अगर प्रेम कहानियों की की जाए तो रोमांटिक फिल्मों में संगीत हमेशा मधुर और ताजगी भरा रहा है. ‘मुझे कुछ कहना है’ (फिल्म बौबी) ‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए’, (फिल्म एकदूजे के लिए), ‘ऐ मेरे हमसफर’ (फिल्म कयामत से कयामत तक) ऐसे गीत हैं जिन्हें सुन कर आज भी हमारा दिल धड़कने लगता है.

‘काला चश्मा जंचता है…’ जैसे हिट गीत देने वाली सिंगर नेहा कक्कड़ का कहना है, ‘‘बिना प्रेमगीतों के तो बौलीवुड फिल्मों की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. गाने दर्शकों को खुद से जोड़ते हैं.’’

फिल्मों के शोमैन कहे जाने वाले राजकपूर की सभी फिल्मों में प्रेम में पगे हुए संगीत की मिठास हमेशा रहती थी. उन्हें संगीत की बहुत अच्छी समझ थी.

फिल्मों में टीनऐज रोमांस

रुपहले परदे पर टीनऐज रोमांस की शुरुआत तो बहुत पहले हो गई थी पर राजकपूर ने अपनी फिल्मों से इसे अच्छी तरह भुनाया. उन की फिल्मों में उन का नेहरू विचारधारा से प्रभावित होना साफ नजर आता था. अपनी अधिकांश फिल्मों के हीरो राजकपूर खुद रहते थे. ‘आग’, ‘श्री 420’, ‘आवारा’, ऐसी ही फिल्में थीं जो नरगिस के साथ उन्होंने कीं.

‘मेरा नाम जोकर’ उन की सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी फिल्म थी जोकि वर्ष 1970 में प्रदर्शित हुई और जिस के निर्माण में 6 वर्षों से भी अधिक समय लगा. ‘मेरा नाम जोकर’ बौक्स औफिस पर हिट फिल्म साबित नहीं हुई जिस से वे काफी मायूस हो गए थे. इस फिल्म को बनाने में उन्होंने काफी ज्यादा पैसा खर्च कर दिया था, जिस से आर के स्टूडियो घाटे में चला गया था.

काफी दिनों तक फिल्म निर्माण से दूर रहने के बाद उन्होंने किशोरावस्था रोमांस के सहारे एक फिल्म बनाने की सोची. उस समय की मशहूर कौमिक आर्ची को देख कर उन्होंने अल्हड़ हीरोइन और किशोर हीरो की कल्पना की. जिस के लिए अपने बेटे ऋषि कपूर और डिंपल कपाडि़या को चुना. राजकपूर का यह फार्मूला काम कर गया और फिल्म ‘बौबी’ ने जबरदस्त कामयाबी हासिल की.

दिल सोलह साला बन जाए

फिल्मी दुनिया के पिटारे में ऐसी कई फिल्में पड़ी हैं जो अनमोल मोती के समान हैं. हर साल अपने साथ कामयाबी के उतारचढ़ाव ले कर आती हैं, जैसे इस बार ‘नीरजा’ से शुरू हुआ सफर आमिर खान की ‘दंगल’ पर जा कर खत्म हुआ. कुछ कामयाब फिल्में ऐसी हैं जिन्हें देख कर आज भी दिल झूम उठता है. बौलीवुड में कालेज और स्कूल की दोस्ती व रोमांस पर भी कई फिल्में बनी हैं. जिन्हें देख कर हमें अपने कालेज की कैंटीन और क्लास में पनपा पहला क्रश याद आ जाता है.

‘जो जीता वही सिकंदर’ स्कूल रोमांस पर बनी इस फिल्म ने आमिर खान को कई लड़कियों के दिलों की धड़कन बना दिया था. इस फिल्म का गाना ‘पहला नशा पहला खुमार…’ आज भी पहले क्रश की याद दिलाता है

‘मोहब्बतें’ फिल्म बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने वाले 3 युवा लड़कों की प्रेमकहानी के बीच शाहरुख जैसे लवगुरु की प्रेमशिक्षा और रोबदार प्रिंसिपल की कैमिस्ट्री पर बनी. इस फिल्म के संवाद बहुत लोकप्रिय हुए थे. इन सब के अलावा ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’, ‘गिप्पी’, ‘तेरे संग’, ‘उड़ान’, ‘कुछकुछ होता है’, ‘3 इडियट’, ‘मैं हूं न’, ‘फुकरे’, ‘जाने तू या जाने न’, ‘2 स्टेट’ आदि कई फिल्में हैं जिन में स्कूल, कालेज की गलियों, क्लास, कैंटीन में पनपते प्रेम को दर्शाया गया है.

निजता के अधिकार पर कोर्ट का अदभुत फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार पर फैसला देते हुए भगवा ब्रिगेड की ज्यादतियों का पूरा ध्यान रखा है, यह स्पष्ट है. जिन शब्दों में उस ने निजता के अधिकार को न केवल मौलिक अधिकार बताया है बल्कि उस को किसी भी संशोधन से कम करने के सरकार, तानाशाही संसद, कट्टरपंथी शासक, पार्टी के अधिकारों से परे रखा है, वे बेहद सख्त और स्पष्ट हैं.

सरकार के प्रधानमंत्री और उन के वित्त मंत्री, जो अपने को सार्वभौमिक मंत्री मानते हैं, आम नागरिक को अपनी कठपुतली मानने लगे हैं और उन के अनुसार, उन महापंडितों के आगे भक्तजनता केवल गुलाम सी है जिसे इसलामी देशों की तरह कायदों में ही रहना पड़ेगा. उन के शब्दों का लहजा और शब्द ऐसे हैं मानो कि वे इस भारत भूमि के शहंशाह हैं.

अटौर्नी जनरल ने तो निजता के अधिकार के मामले पर बहस में यह तक कह डाला था कि नागरिक का अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं है और सरकार ही उस की मालिक है.

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19 ही नहीं, अन्य सभी अनुच्छेद जो मौलिक अधिकारों के संविधान के भाग 3 में हैं, कम नहीं किए जा सकते हैं. इन में निजता महत्त्वपूर्ण है और वह छाई हुई है.

सर्वोच्च न्यायालय की 9 जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि निजता का अधिकार मौलिक है और चाहे ये शब्द संविधान में लिखे न हों, कोई कानून इन का हनन सीमा से ज्यादा नहीं कर सकता.

सरकार की योजना है कि वह हर नागरिक को हर समय अपनी आंखों के सामने रखे और इसीलिए वह बारबार उसे अपना पैननंबर, आधारनंबर, राशनकार्ड, पते का पू्रफ, फोटो, वरिष्ठ अधिकारियों से पहचान आदि बताने के आदेश देती रहती है. कोई कैसे रहता है, क्या पहनता है, क्या खाता है, किस के साथ सोता है, कहां पैसे खर्च करता है, कहां जमा करता है, इन सब का ब्योरा सुरक्षा, आतंकवाद, कर चोरी, व्यवस्था, बेईमानी के नाम पर मांगा जा रहा है और हर रोज सरकार की मांग बढ़ रही है. नोटबंदी और गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स की विवरणियां इस का सुबूत हैं जिन में व्यापारी से सिर्फ शौचालय जाने के अलावा हर चीज की जानकारी मांग ली गई है.

निजता के अधिकार का अर्थ है कि अगर कोई न चाहे तो वह बिना अपना कोई अवसर खोए सरकार को अपने फिंगर प्रिंट, आंखों के पिं्रट या फोटो देने से इनकार कर सकता है. सरकार से विशेष सुविधा चाहता है तो उस पर व्यावहारिक रोक लगती है वरना अतिरिक्त जानकारी नहीं ली जा सकती. पुलिस आप को अखबार निकालने की अनुमति देने के नाम पर दूसरों से जो पूछताछ करती है वह निश्चितरूप से निजता के अधिकार को भंग करती है.

निजता का अधिकार आज के युग में अनिवार्य हो गया है क्योंकि हरेक ने घरघर में कैमरे लगा रखे हैं. सरकार ने रेलवेस्टेशनों, हवाईअड्डों पर कैमरे लगा रखे हैं. कै्रडिट कार्ड, डैबिड कार्ड, इंटरनैट बैंकिंग में निजी जानकारी दी जाती है. इस के बाद सरकार के पास अधिकार हो कि ये सब जानकारियां उस के पास एकत्र हो जाएं, खतरनाक है. यह तो किसी भी विरोधी को कुचलने के लिए काफी है. सरकारी एजेंसियां हर किसी की 2-4 गलतियां तो ढूंढ़ ही लेंगी अगर उन के पास लोगों की पहाड़ सी जानकारी होगी.

यह निर्णय कोई क्रांति लाएगा, इस में संदेह है क्योंकि इस देश की जनता भीरू व अंधविश्वासी है और गुलामी उस के जैविक गुणों में प्रवेश कर चुकी है. उसे बंधे रह कर ही आनंद आता है. वह कुत्ते की तरह है जो अपनी रस्सी, मालिक को पकड़ाता है.

खत्म होती योगी सरकार की हनक

राजस्थान के मौजूदा गवर्नर कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब वे कहते थे कि सरकार की हनक, धमक और इकबाल होनी चाहिए. हनक से कानून का राज कायम होता है, धमक से अपराधी, भ्रष्टाचारी डरता है और इकबाल से जनता में सरकार के प्रति भरोसा जगता है.

कल्याण सिंह के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्री हैं जिन को बहुमत से सरकार चलाने का अवसर मिला है. रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह के समय प्रदेश में भाजपा की बहुमत वाली सरकारें नहीं थीं. ऐसे में उन्हें बहुत सारे मौकों पर सहयोगी दलों की खींचातानी का सामना करना पड़ता था.

योगी सरकार से लोगों को यह उम्मीद जरूर है कि वह अपना हनक, धमक और इकबाल कायम करे. शुरुआती समय में यह प्रभाव नहीं बन पा रहा है. प्रदेश में हत्या, लूट और जातीय हिंसा की बढ़ती घटनाओं ने सरकार के प्रभाव पर सवालिया निशान लगा दिया है.

उत्तर प्रदेश में अपराध हर सरकार के लिए बड़ा मुद्दा रहा है. भाजपा ने कानून के राज के नाम पर विधानसभा का चुनाव लड़ा. मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने अपराध कम करने का पहला वादा किया था. बहुत सारे बदलावों के बाद भी जब योगी सरकार की हनक कायम होती नहीं दिखी तो जनता सड़कों पर उतर कर अपराध के खिलाफ  आवाज बुलंद कर रही है.

जनता में फैलता यह संदेश योगी सरकार के खिलाफ  जा रहा है. इस से योगी की छवि धूमिल हो रही है. राजधानी लखनऊ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी और कृष्ण की नगरी मथुरा सभी अपराध के दर्द से कराह रहे हैं. सीतापुर में सरेआम कारोबारी सहित उस के बेटे और पत्नी की हत्या हो जाती है. वाराणसी में सर्राफा कारोबारी से लूट के बाद पुलिस ने घटना का पर्दाफाश किया पर उस से पीडि़त परिवार संतुष्ट नहीं दिखा.

उठ रही है आवाज

राजधानी लखनऊ में पावर विंग ने तमाम संगठनों और लोगों के साथ मिल कर 1,090 चौराहों पर प्रदर्शन किया. पावर विंग की अध्यक्ष सुमन रावत ने कहा, ‘‘अपराध पर रोक लगनी ही चाहिए. जिस तरह से हत्या, बलात्कार, लूट और चोरी की घटनाओं का खुलासा नहीं हो रहा और घटनाएं बढ़ रही हैं, उस से जनता में योगी सरकार के खिलाफ गलत संदेश जा रहा है.’’

चैतन्य वैलफेयर फाउंडेशन की ओम कुमारी सिंह ने कहा, ‘‘अपराध करने वालों को बिना किसी भेदभाव के कड़ी कानूनी सजा दी जाए.’’ इन प्रदर्शन करने वालों का मानना था कि महिला अपराधों के जिम्मेदारों के खिलाफ त्वरित कार्यवाही की जाए.

अप्रैल माह में प्रधानमंत्री की लोकसभा सीट वाराणसी में सीताराम सर्राफ  के यहां शहर की सब से बड़ी चोरी हुई. इस में 12 किलो सोना चोरी चला गया. पुलिस पर मामले को खोलने का दबाव पड़ने लगा. पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा उन से मात्र 1 किलो सोना ही मिला. सीताराम सर्राफ के परिजन इस खुलासे से संतुष्ट नहीं हैं. वे पुलिस के हर अफसर तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं.

सीताराम सर्राफ  के परिजनों में नूपुर अग्रवाल कहती हैं, ‘‘पुलिस ने जिस तरह से मामले को खोला है, उस पर यकीन करना संभव नहीं है. अगर सही लोग पकडे़ गए होते तो पूरा माल बरामद हो जाता.’’

इधर, पुलिस सीताराम सर्राफ  के परिजनों को ही गलत तहरीर देने की बात कह रही है. पुलिस का मानना है कि सीताराम सर्राफ  के परिजनों ने ज्यादा सोना चोरी होने की बात लिखवाई थी.

पुलिस को अपराध का शिकार हुए परिवार के साथ बहुत ही संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए. पुलिस के व्यवहार से बहुत हद तक सरकार की इमेज बदल सकती है. थाना और तहसील ही सरकार की इमेज को बनाते व बिगाड़ते हैं.

मुसीबत में कारोबारी

सर्राफा दुकानों पर चोरी की यह पहली घटना नहीं है. लखनऊ और मथुरा में भी इस तरह की घटनाएं घट चुकी हैं. सर्राफा कारोबारियों पर हो रहे जानलेवा हमलों, लूट और चोरी की घटनाओं के विरोध में 19 मई को सर्राफा बाजार बंद रहे.

लखनऊ सर्राफा एसोसिएशन के वरिष्ठ महामंत्री प्रदीप कुमार अग्रवाल ने बताया, ‘‘मथुरा में हुई सर्राफा कारोबारी के साथ लूट और हत्या को ले कर पूरे समाज में गुस्सा है.

पुलिस लूट और चोरी की घटनाओं को दबाने का काम कर रही है. इस से अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं.’’

सर्राफा कारोबारी विनोद माहेश्वरी ने कहा, ‘‘सरकार ने प्रदेश में कानून का राज कायम करने की जो बात कही थी, उस में वह असफल हो रही है.’’

सरकार ने पुलिस विभाग में फौरीतौर पर बहुत सारे बदलाव कर दिए हैं. इस के बाद भी पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह नहीं दिख रही. पुलिस विभाग के तमाम अफसर यह समझ नहीं पा रहे कि किस तरह से वे अपनी रणनीति तय करें. प्रशासनिक तौर पर अच्छे जवाबदेह अफसर सरकार के साथ नहीं दिख रहे हैं. यह सही है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मेहनती और ईमानदार व्यवस्था को आगे करना चाहते हैं लेकिन उन को पूरा सहयोग नहीं मिल रहा. भाजपा के अंदर से भी मुख्यमंत्री को पूरा सहयोग नहीं मिल रहा है.

जानकार मानते हैं कि जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री के साथ 2 उपमुख्यमंत्री बना कर कुशल शासन देने की नीति बनाई, वह सफल नहीं हो पा रही है.

योगी आदित्यनाथ कठोर मुख्यमंत्री वाली छवि बनाना चाहते हैं. वे कल्याण सिंह जैसे कुशल मुख्यमंत्री बन सकते हैं. मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को अपनी टीम के साथ बेहतर तालमेल बनाना होगा. वे अब धार्मिक नेताभर नहीं हैं. उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. जिस पर देश ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं.

ऐसे में योगी को अपनी प्रशासनिक क्षमता खुद भी बढ़ानी होगी और अपने मंत्रिमंडल व ब्यूरोक्रेसी में वह भरोसा जगाना होगा जिस से लोग उन के फैसले को जनता के बीच सही तरह से ले जाएं. मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से जानवरों की कत्लगाहों को बंद करने, एंटी रोमियों दस्ता बनाने जैसे विवादित काम शुरू हुए, उन की वजह से सरकार की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खडे़ हुए हैं.

रोहिंग्या शरणार्थी : पहचान की छटपटाहट

म्यांमार की सरकार की तरह कई देशों व राज्यों के संगठन रोहिंग्या शरणार्थियों को अपने क्षेत्र में पनाह देने के खिलाफ खड़े होते रहे हैं.

दुनिया में फैली तमाम समस्याओं में से एक है गृहयुद्ध के बाद हुए पलायन से सामने आई शरणार्थियों की समस्या. इराक, सीरिया सहित कई अफ्रीकी देशों में शरणार्थी समस्या विकाराल रूप ले चुकी है. दया और मानवता की चिरपरिचित नारेबाजी के बाद भी किसी भी देश में घुसने से मनाही कितनी कष्टपूर्ण और क्रूर हो सकती है, इस को अगर समझना है तो रोहिंग्या मुसलमानों को एक नजर देखना होगा. ये वे लोग हैं जो बरसों से उस देश में गैरों का जीवन जीने को मजबूर हैं जहां कभी ये मजदूरी करने के लिए बसाए गए थे.

भारत जैसा देश भी इन को अपने यहां से निकालने की तैयारी कर चुका है. इस अपमान और छटपटाहट में तमाम रोहिंग्या मुसलमान या तो उग्रवाद की ओर मुड़ गए हैं या उन्होंने मुसलिम उग्रवादियों से हाथ मिला लिया है. इस से उन की समस्या कम होने के बजाय कई गुना ज्यादा बढ़ गई. अब दूसरे समुदाय के वे लोग भी इन्हें शक की निगाह से देखने लगे जो इन की मदद या तो कर रहे हैं या फिर करना चाहते हैं.

रोहिंग्या हैं कौन

लोगों के जेहन में यह बात उठना लाजिमी है कि आखिर ये रोहिंग्या हैं कौन, जिन की मदद करने से अब भारत भी मुंह फेर रहा है. शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित म्यांमार, जो बर्मा के नाम से जाना जाता था, की आंग सांग सू की भी रोहिंग्या की बात करना नहीं चाहतीं. एक विदेशी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में रोहिंग्या का सवाल आते ही वे इंटरव्यू छोड़ कर चली गईं. यानी, अगर सू भी सत्ता में हों, तो भी रोहिंग्या मुसलमानों का कुछ भी भला होने वाला नहीं है.

म्यांमार की सरकार का कहना है (और यह सच भी है) कि रोहिंग्या म्यांमार के मूल निवासी न हो कर बंगलादेश (तब का बंगाल) से आए शरणार्थी भर हैं. आज ये लोग ज्यादातर म्यांमार के रेखाइन (जिसे अराकान भी कहा जाता है) प्रांत में रहते हैं. वहां इन की भिड़ंत लगातार उन बौद्ध लोगों से होती रहती है जो वहां के मूल निवासी हैं.

अराकान वह जगह है जहां पर सदियों से मुसलमान बसते रहे हैं. इस इलाके पर अंगरेजों का कब्जा होने से पहले यहां पर मुसलमान काफी कम थे. 1869 के करीब जब यहां पर अंगरेज काबिज हुए तो चावल की खेती के लिए बंगाल के मुसलमान मजदूरों को यहां पर लाया गया.

इसी के बाद इस प्रांत में रोहिंग्याओं की आबादी बढ़ने लगी. साथ ही, बढ़ा स्थानीय बौद्ध लोगों से इन का टकराव. कई बार जब टकराव ने दंगे का रूप लिया तो पुलिस प्रशासन ने मूल निवासियों का ही साथ दिया. वैसे, एक समय अराकान का राजा बंगाल के नवाब के अधीन था. नवाब से आजादी मिलने के बाद भी यहां के बौद्ध राजा ने मुसलमानों को उच्च पदों पर नियुक्त करना जारी रखा. 17वीं शताब्दी में यहां पर मुसलिम आबादी तेजी से बढ़ी, जो बंगाल से ला कर यहां बसाए गए थे.

मुस्लिमों का आनाजाना

1785 में अराकान में सत्ता परिवर्तन हुआ और कोनवाऊंग वंश ने यहां पर कब्जा कर लिया, तो 35,000 से ज्यादा मुसलमान चित्तगांग इलाके में चले गए जो उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था. इस के बाद अराकान में मुसलिम आबादी काफी कम हो गई.

मामला जब कुछ शांत हुआ तो चित्तगांग से मुसलिम फिर अराकान आ कर बसे. इसी के साथ सांप्रदायिक उन्माद को फिर से हवा मिलने लगी. ब्रिटिश सरकार ने बंगाल प्रैसिडैंसी में अराकान को भी समाहित कर लिया. इस के बाद बंगाल से मजदूर यहां खेतों में काम करने के लिए आने लगे. 1911 तक यहां की मुसलिम आबादी 2 लाख तक पहुंच गई. तत्कालीन बर्मा चूंकि ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए मूल निवासी चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते थे.

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापान की सेना यहां पर आ गई और ब्रिटिश सेना को हटना पड़ा. ब्रिटिश राज की सरपरस्ती में जी रहे रोहिंग्या लोग अनाथ सा महसूस करने लगे. यही वह दौर था जब रोहिंग्या पर अत्याचार का नया दौर शुरू हुआ, जो आज तक जारी है.

हमले पर हमले

ब्रिटिश सरकार ने जो हथियार रोहिंग्या को जापानियों से लड़ने के लिए दिए थे उन्हीं के बल पर रोहिंग्या लोगों ने मूल निवासियों पर हमले किए. तभी से दोनों के बीच दुश्मनी और बढ़ गई.

दंगों से बचने के लिए तमाम आंग्ल बर्मी, भारतीय बर्मी और ब्रिटिश भारत भाग आए. इन के बर्मा से भाग आने पर वहां पर सस्ते मजदूरों की कमी हो गई. इसलिए रोहिंग्या को फिर से वहां पर लाया गया. ये आने को राजी नहीं थे, इसलिए रोहिंग्या और ब्रिटिश का एक संगठन बना ताकि ये जापानियों से लड़ सकें. इस संगठन का नाम था ‘वी फोर्स’. पर यह फोर्स बौद्धों से ही भिड़ गई. बौद्धों के मठ उजाड़े और इन्हीं रोहिंग्याओं ने बौद्धों पर इतने अत्याचार किए कि पहले से ही दोनों के बीच की रही खाई और चौड़ी हो गई.

1940 में पाकिस्तान मूवमैंट के दौरान नफरत का दूसरा दौर सामने आया. इन रोहिंग्या लोगों ने पूर्वी पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी जताई और चाहा कि बर्मा के इलाकों, जहां पर रोहिंग्या की अबादी ज्यादा है, को पाकिस्तान में मिला लिया जाए. जल्द ही इन लोगों ने यहां पर अलगाववादी आंदोलन शुरू कर दिया और चाहा कि अराकान में ही अलग मुसलिम देश बन जाए. यह बात बर्मा की सरकार को कतई पसंद नहीं आई. पर रोहिंग्या आग में घी डालने का काम करते ही रहे.

रोहिंग्याओं का दमन

1962 में बर्मा के सैनिक शासन ने रोहिंग्या का जम कर दमन शुरू कर दिया. इसी दमन के चलते हजारों रोहिंग्या यहां से निकल भागे और दिल्ली से ले कर थाईलैंड, मलयेशिया व यूरोप तक में बस गए.

1971 में जब बंगलादेश मुक्ति आंदोलन चला तो लाखों की संख्या में बंगलादेशी भारत और अन्य पड़ोसी मुल्कों में निकल भागे. लाखों की संख्या में बंगलादेशी बर्मा भी गए. बर्मा की सरकार ने इन का जम कर दमन शुरू कर दिया. इस से घबरा कर लाखों बंगलादेशी फिर से बंगलादेश आ गए. बंगलादेश के विरोध और संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव की वजह से बर्मा ने, न चाहते हुए भी, इन को अराकान में बसा दिया. यह जरूर था कि सभी को विदेशी घोषित कर दिया गया.

वोट का अधिकार

आज म्यांमार यानी बर्मा में रोहिंग्या लोगों की आबादी करीब 14 लाख है. इन पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं, जैसे जबरदस्ती गर्भपात करवाना, 2 बच्चों की सीमा निर्धारित करना, आनेजाने पर तमाम प्रतिबंध आदि. पुलिस के अत्याचार और आए दिन होने वाले समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्कार यहां आम बात है.

सैनिक शासन ने सख्ती में कुछ ढिलाई बरतते हुए इन को ‘सफेद कार्ड’ भी दिए जो इन को वोट देने का अधिकार भी देता था पर स्थानीय बौद्ध लोगों के जबरदस्त विरोध के बाद सरकार ने ‘सफेद कार्ड’ समाप्त कर दिए. आज ये वोट नहीं दे सकते.

भारत इस समस्या पर काफी सावधानी से नजर रखे हुए है. भारत म्यांमार के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है. चीन पर कुछ अंकुश रखने के लिए भी यह दोस्ती जरूरी है. भारत ने इसीलिए म्यांमार के सैनिक शासन का कभी जम कर विरोध नहीं किया. इस के बदले म्यांमार की सरकार ने भी भारत की मदद की है, जैसे 2015 में नगा विद्रोहियों द्वारा भारतीय सुरक्षाबलों पर हमले के बाद इन विद्रोहियों पर म्यांमार की सीमा में घुस कर कार्यवाही की गई पर म्यांमार सरकार चुप्पी साधे रही. भारत म्यांमार के इस विश्वास को रोहिंग्या का साथ दे कर खोना नहीं चाहता.

आतंक की ओर कदम

रोहिंग्या बंगलादेश की सीमा पार कर दिल्ली से ले कर कश्मीर तक में  आ गए हैं. अकेले कश्मीर में ही करीब 10 हजार रोहिंग्या हैं. भारत सरकार इन को यहां से हटाने का मन बना चुकी है. इस के पीछे भी म्यांमार भारत संबंध ही है.

उधर, रोहिंग्या में से कुछ का आतंकवाद की ओर मुड़ना भी रोहिंग्या समुदाय पर नई मुसीबत ले कर आया है. सालभर पहले भारत में बौद्धों के स्थल बोधगया में हुई बम विस्फोट की घटना भी रोहिंग्या आतंकवाद से जोड़ कर देखी जाती रही है. हर मुसलिम आतंकी संगठन रोहिंग्या के प्रति हमदर्दी रखता है. रोहिंग्या शरणार्थियों का हाल ही में बना संगठन ‘हराकाह अल याकीन’ ने रोहिंग्या पर शक की निगाहें और कड़ी कर दी हैं. सऊदी अरब में याकीन का मुख्यालय है. इस संगठन से जुड़े रोहिंग्या को आधुनिकतम हथियारों और गुरिल्ला तकनीक से लैस किया जाता है. ये लोग भारत ही नहीं, म्यांमार में भी आतंकवाद फैलाने को पूरी तरह से तैयार हैं.

म्यांमार की सरकार ने इन की तरफ से अपना मुंह फेर कर इन को गुस्से से भर दिया है. यह जरूर है कि रोहिंग्या के इस कदम से वह अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाएं भी इन से दूर चली जाएंगी जिन की मदद पर रोहिंग्या आज म्यांमार में दो रोटी पा रहे हैं. इस के बाद भी रोहिंग्या में से कई युवा, आतंकी संगठन अल याकीन को ही बेहतर विकल्प मानने लगे हैं. कई रोहिंग्या तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की आतंकी ट्रेनिंग तक ले रहे हैं. ट्रेनिंग दे रहे संगठनों की सांठगांठ पाकिस्तान के आतंकी संगठनों तक से है, इसलिए भारत की रोहिंग्या के प्रति जो हमदर्दी थी, वह भी समाप्ति के कगार पर है.

उधर, बंगलादेश (जहां के कभी रोहिंग्या मूल निवासी थे) की रुचि भी म्यांमार में है, न कि रोहिंग्या में. जब कुछ माह पहले म्यांमार के विदेश मंत्री अबुल हसन महमूद अली बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से मिले तो दोनों ने आपसी संबंधों और व्यापार बढ़ाने पर जम कर बातचीत की. दोनों सेनाओं के बीच वार्त्ता जारी रखने के साथ सीमा से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने पर भी बात हुई. इस मौके पर शेख हसीना ने म्यांमार के विदेश मंत्री को आश्वस्त किया कि वे अपनी भूमि पर आतंकियों को पनपने नहीं देंगी. इस से साफ है कि रोहिंग्या आतंकी बंगलादेश की भूमि से म्यांमार पर हमला नहीं कर सकेंगे.

रोहिंग्या को खतरा आशीन वीराथू जैसे आतंकी भिक्षुओं से भी है जो अपने को बर्मा का ओसामा बिन लादेन कहता है. बौद्ध भिक्षु होने के बावजूद विराथू पूरी तरह से आतंकी चोला ओढ़े है. वीराथू श्रीलंका तक में भाषण कर रोहिंग्या के खिलाफ जहर उगल कर आया है. उस ने यहां तक कह दिया है कि रोहिंग्या बौद्धों को मुसलमान बनाने पर आमादा हैं. रोहिंग्या द्वारा फैलाए जा रहे आतंक को भी उस ने खूब बढ़ाचढ़ा कर पेश किया है. इस से रोहिंग्या समस्या कहीं ज्यादा बढ़ गई है.

अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भले ही रोहिंग्या को सब से ज्यादा सताए गए शरणार्थी कहा हो, पर इन के दुख को कम करने की कोई सूरत कहीं नजर नहीं आती. हां, आतंक से जुड़ कर रोहिंग्या अपनी स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं.

आजादी का प्रयोग करें मगर समझदारी से

लड़कियां आमतौर पर अब नहीं चाहतीं कि उन्हें मोरैलिटी का उपदेश दिया जाए या टोकाटाकी की जाए. लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं जो दर्शाते हैं कि लड़कियों को अपनी इज्जत नहीं, तो कम से कम हाथपैर बचाने के लिए सही हिफाजत करनी व रखनी चाहिए. दिल्ली के बेगमपुरा इलाके में एक रैस्तरां में शैफ का काम कर रही लड़की ने अपने को कुछ ज्यादा बोल्ड समझ लिया और नतीजा हुआ कि उसे 4-मंजिली बिल्डिंग से धक्का दे दिया गया.

लगता है वह लड़की कुछ ज्यादा घुलीमिली थी और तभी उस ने अपने 2 लड़के मित्रों और एक सहेली के साथ एक ही मोटरसाइकिल पर एक मौल में जाने का प्रोग्राम बना लिया. एक मोटरसाइकिल पर 4 में से जब वे लड़कियां हों तो उन की दशा क्या होगी, समझा जा सकता है. पर, यदि वह खुश थी तो साफ है कि उस की रजामंदी थी.

जब पुलिस वालों ने रोक कर 4 के एकसाथ चलने पर मोटरसाइकिल जब्त कर ली तो चारों ने एक आटोरिक्शा लिया. इस के बाद रास्ते में 2 को आटो में छोड़ कर एक लड़के  के साथ लड़की एक बन रहे मकान की चौथी मंजिल पर चली गई, जहां कोई मौजूद न था. वहां जो हुआ उसे छोडि़ए, पर थोड़ी देर में बिना कपड़ों के उसे चौथी मंजिल से धक्का दे दिया गया. तारों से उलझती हुई वह लहूलुहान हो कर सड़क पर आ गिरी.

अपने शरीर पर हर लड़की का अपना अधिकार है. समाज को या दूसरों को बोलने का हक नहीं है. सैक्स करना भी उस का अपना फैसला है. यदि वह 3 के बीच चिपक कर उमसभरी गरमी में एक ही मोटरसाइकिल पर बैठी थी तो आनंद पाने की अपेक्षा उसे थी ही. अगर वह चौथी मंजिल तक अपने मित्र के साथ गई तो कोई जबरदस्ती तो नहीं थी. यह उस का हक है कि वह क्या करे.

पर ऐसे मामलों में दूसरों को यह बताने का अधिकार है कि सार्वजनिक स्थानों पर वह न करें जो खतरनाक भी हो सकता है और दुखदायी भी. सैक्स का आनंद लेना भी हो तो सही जगह चुनें. बनते मकान को किसी भी काम के लिए चुनना गलत है.\

बात नैतिकता की नहीं, व्यावहारिकता की है, जीवन के भविष्य की है, ब्लैकमेल होने के अंदेशे की है और हाथपैर तुड़वाने की है. लड़की का कहना कि वह सिर्फ बातें करने के लिए लड़के के साथ गई थी या उस की मां से मिलने गई थी तो बनते मकान की 4 मंजिलें चढ़ना आसान तो नहीं है. वह भी रात के 10 बजे.

आजादी का हक हर लड़की को है पर उसे अपनी आजादी को सूझबूझ कर इस्तेमाल करना तो सीखना ही होगा. सामाजिक वर्जनाओं और दकियानूसीपन को छोड़ भी दें तो भी दरिंदों के हाथ में अपनी आजादी का समर्पण करने का समर्थन नहीं किया जा सकता. इस लड़की का, चौथी मंजिल से गिरी या गिराए जाने के बाद, अब क्या होगा, इस बारे में अभी नहीं कहा जा सकता पर सदमा तो रहेगा और जिस आजादी की वह सोच रही थी, वह महीनोंसालों गायब हो सकती है, शारीरिक कारणों से और पुलिस केस बनने से.

मीना कुमारी : एक अधूरी दास्तां

हर कोई मीना कुमारी को मुसलिम समझता है, मगर हकीकत यह है कि मीना कुमारी का संबंध एक बंगाली ब्राह्मण परिवार से था. अभिनेत्री मीना कुमारी की मां प्रभावती का संबंध बंगाली ब्राह्मण परिवार के साथ साथ रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार से भी था.

प्रभावती का परिवार पश्चिम बंगाल में बोलपुर रेलवे स्टेशन के पास रहा करता था. प्रभावती वहीं से जुड़े शांति निकेतन कैंपस में नृत्य व ड्रामा से जुड़ी थीं. इसी ग्रुप से जुड़े तबलची अली बख्श से प्रभावती को इश्क हो गया था और उन से निकाह करने के बाद वे इकबाल बेगम बन गईं.

विवाह के बाद बोलपुर में रहना उन के लिए मुनासिब न था. इसलिए वे दोनों मुंबई चले आए थे. मुंबई के एक अस्पताल में इकबाल बेगम ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिसे पहले अली बख्श ने कूड़ेदान में फेंक दिया था. फिर उसे उठा कर ले आए थे. वह बच्ची महजबी थी, जो बड़ी हो कर मशहूर अदाकारा मीना कुमारी बनी.

मीना कुमारी की मां प्रभावती और रांची निवासी हरिहर प्रसाद के बीच भी कोई संबंध था. पर यह किस तरह का संबंध था, यह आज तक राज बना हुआ है. मगर हरिहर प्रसाद ने 1935 में मीना कुमारी की मां प्रभावती को रांची (मौजा मोहराबाद) में 3 एकड़ 60 डैसिमल (खाता नंबर 133, प्लौट नंबर 62) रकबा जमीन दी थी. प्रभावती के कहने पर यह जमीन अली बख्श के नाम लिखी गई थी. 1971 में मीना कुमारी ने एक वकील के माध्यम से हरिहर प्रसाद की बेटी के बेटे और रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. रतन प्रकाश के पास 20 हजार रुपए भेजे थे कि वे इस जमीन के चारों तरफ दीवार खड़ी करा दें.

एक दौर वह भी आया था जब फिल्मनगरी और अपने अभिनय जीवन से ऊब कर मीना कुमारी ने रांची की इसी जमीन पर रहने का मन बनाया था. पर उन का विचार कैसे बदला, यह आज तक रहस्य है. मगर सच यह है कि डा. रतन प्रकाश अकसर अपनी पढ़ाई अथवा मकान के नाम पर मुंबई आ कर मीना कुमारी से पैसे ले जाते थे. इस बात को डा. रतन प्रकाश ने अपनी स्वयंलिखित पुस्तक में स्वीकार भी किया है.

लोग मीना कुमारी को ट्रैजिडी क्वीन मानते हैं. लोगों को मीना कुमारी की शराब की लत व कई पुरुषों के  साथ अफेयर की बात पता है. पर किसी को भी इस की वजह पता नहीं है. किसी ने उन के दर्द को नहीं जाना. निजी जीवन की तमाम समस्याओं ने उन्हें ऐसा बनाया था. जिन समस्याओं से मीना कुमारी अपनी निजी जिंदगी में जूझ रही थीं उन समस्याओं से आज की भारतीय नारी भी जूझ रही है.

मीना कुमारी के पास सुंदरता, धन, मानसम्मान, शोहरत सबकुछ थी. उन के प्रशंसकों की कमी नहीं थी. लेकिन उन की कोख सूनी थी. उन्हें अपने पति, निर्देशक कमाल अमरोही से अपेक्षित प्यार नहीं मिला. मीना कुमारी, कमाल अमरोही की तीसरी पत्नी थीं और कहा जाता है कि कमाल खुद भी नहीं चाहते थे कि मीना कुमारी उन के बेटे की मां बनें.

अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही अपने पिता कमाल अमरोही को विलेन मानने के लिए तैयार नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘‘मुझे पता है कि किसी ने एक नाटक ‘एक तनहा चांद’ में मेरे पिता कमाल अमरोही को मेरी छोटी मम्मी मीना कुमारी की जिंदगी में विलेन की तरह पेश किया है. पर सच यह नहीं है.

‘‘लोग कहते हैं कि मेरे पिता ने उन्हें मां नहीं बनने दिया. यह सच नहीं है. हकीकत यह है कि वे 2 बार गर्भवती हुईं और दोनों बार उन्होंने स्वयं ही गर्भपात करवा लिया था. इसी तरह की कई हकीकतों से लोगों को रूबरू कराने के लिए मैं ने अपनी छोटी मम्मी मीना कुमारी की जिंदगी पर एक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है और अब हम इस पर फिल्म बनाने जा रहे हैं.’’

जब मीना कुमारी जिंदा थीं, तब डा. रतन प्रकाश ने मीना कुमारी के नाम का सहारा ले कर बौलीवुड में बतौर लेखक स्थापित होने का असफल प्रयास किया. डा. रतन प्रकाश लिखित कहानी ‘फिर मिलेंगे’ मीना कुमारी को बहुत पसंद आई थी. वे इस कहानी पर बनने वाली फिल्म में अभिनय भी करना चाहती थीं, पर यह कभी हो ही नहीं पाया. मीना कुमारी की मौत के बाद 1985 में डा. रतन प्रकाश ने इस लंबी कहानी को ‘फिर मिलेंगे’ नामक उपन्यास के रूप में प्रकाशित किया था और उपन्यास के कवर पेज पर मीना कुमारी की ही तस्वीर लगाई थी.

मीना कुमारी ने दिलीप कुमार के साथ ‘कोहिनूर,’ ‘यहूदी’ और ‘आजाद’ सहित कई फिल्मों में अभिनय किया था पर दिलीप कुमार के साथ मीना कुमारी के संबंध कुछ ऐसे थे कि मीना कुमारी ने हमेशा यही कहा कि वे दिलीप कुमार से परिचित ही नहीं हैं.

मीना कुमारी की अभिनेत्री साधना से कभी नहीं बनी. पर जब तक मीना कुमारी जिंदा रहीं, तब तक वे साधना के संबंध में पलपल की खबर रखती थीं. अभिनय के क्षेत्र में सफलता की बुलंदियों को छू रही मीना कुमारी ने एक स्ट्रगल कर रहे निर्देशक कमाल अमरोही के साथ शादी क्यों की? यों तो इस सवाल का सही जवाब मीना कुमारी की मौत के साथ ही दफन हो गया मगर इस सवाल को मीना कुमारी की प्रशंसक और मीना कुमारी के जीवन पर आधारित म्यूजिकल नाटक ‘एक तनहा चांद’ की लेखिका, निर्देशिका व नाटक में मीना कुमारी का किरदार निभाने वाली रूबी एस सैनी ने अपने नाटक में बखूबी उठाया है.

वे कहती हैं, ‘‘नाटक में हम ने इस बात को स्थापित किया है कि एक स्थापित अभिनेत्री का एक स्ट्रगल फिल्मकार कमाल अमरोही से शादी करने का फैसला प्यार पाने का सपना था. मगर कमाल उन्हें अपनी पत्नी के बदले एक सफल हीरोइन के रूप में देखते थे, जो उन्हें सफल निर्देशक बना सकती थी. कहा भी गया कि मीना साहिबान (पाकीजा) नहीं होती, तो कमाल अमरोही इतिहास के पन्नों में नहीं होते.’’

मीना कुमारी ने बतौर अदाकारा फिल्मी दुनिया को बहुतकुछ दिया, पर इंडस्ट्री सहित हर किसी ने उन्हें सिर्फ अपने लाभ के लिए उपयोग किया. मीना कुमारी को उन के अपनों ने ही छोड़ दिया था. मीना कुमारी को शराब की जो लत लगी, उन के परपुरुषों के साथ जो अफेयर थे, वह कहीं न कहीं फिल्मों के प्रति उन का पैशन, प्यार की भूख थी. वे अपना दर्द लोगों से बांटना चाहती थीं. पर लोग उन्हें दर्द पर दर्द देते चले जा रहे थे.

कमाल अमरोही अकसर मीना कुमारी के साथ मारपीट किया करते थे. शायद यही वजह है कि एक जगह मीना कुमारी ने कमाल अमरोही के संबंध में लिखा था, ‘दिल सा जब साथी पाया, बेचैनी भी वह साथ ले आया.’

एक पार्टी में जब पार्टी के और्गेनाइजर ने लोगों से कमाल अमरोही का परिचय यह कह कर कराया कि ये हैं मीना कुमारी के पति और निर्देशक कमाल अमरोही तो कमाल अमरोही को गुस्सा आ गया. कहा जाता है कि उसी दिन घर पहुंचते ही कमाल अमरोही ने गुस्से में मीना कुमारी को चांटा जड़ा था. उस के बाद कमाल अमरोही और मीना कुमारी दोनों एकसाथ किसी पार्टी में नहीं देखे गए.

वहीं, शादी के महज 3 सालों बाद ही 1955 में फिल्म ‘परिणीता’ के लिए मीना कुमारी को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. कमाल अमरोही और मीना कुमारी अगल बगल की कुर्सियों पर बैठे हुए थे. मीना कुमारी स्टेज पर अवार्ड लेने गईं और फिर वापस घर की तरफ रवाना हो गईं. मीना कुमारी अपना सुनहरे रंग का पर्स वहीं कुरसी पर भूल गई थीं, जिसे कमाल अमरोही ने नहीं उठाया, बल्कि अभिनेत्री निम्मी ने पर्स को उठाया और मीना कुमारी को ला कर दिया. तब मीना ने कमाल से पूछा कि आप को मेरा पर्स नजर नहीं आया था? इस पर कमाल अमरोही ने कहा था, ‘‘मैं ने पर्स देखा था, पर उठाया नहीं. आज मैं तुम्हारा पर्स उठाता, तो कल को तुम्हारे जूते उठाता.’’ उस के बाद ही कमाल व मीना कुमारी के संबंध बिगड़ने लगे थे.

इस पर आग में घी का काम किया 1959 में मीना कुमारी के दिए इंटरव्यू ने. इस इंटरव्यू में मीना कुमारी ने कहा था, ‘‘हम किसी इंसान को उस के साथ कुछ समय बिताए बगैर सही मानो में नहीं समझ सकते. यहां ऐसे लोग ज्यादा हैं जो मेरी सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं. इसलिए वे मेरी राहों में कांटे बो रहे हैं.’’

कमाल अमरोही के संदर्भ में मीना कुमारी ने लिखा था-

‘‘तुम क्या करोगे सुन कर मुझ से मेरी कहानी,

बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीकेफीके…’’

इतना ही नहीं, जब 1964 में कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को तलाक दिया, तब मीना ने लिखा था-

‘‘तलाक तो दे रहे हो नजर ए कहर के साथ,

जवानी भी मेरी लौटा दो मेरे मेहर के साथ.’’

कमाल अमरोही से तलाक हो जाने के बाद मीना कुमारी की जिंदगी में सावन कुमार टाक, धर्मेंद्र और गुलजार जैसे लोग भी आए. पर ठहराव भरा रिश्ता उन का किसी के साथ भी कायम नहीं रह सका.

हर तरफ से परेशान मीना कुमारी की रातों की नींद गायब हो गई थी. तब उन के निजी चिकित्सक डा. सई तिमुर्जा ने उन्हें रात में सोने से पहले एक पैग ब्रैंडी दवा की तरह लेने की सलाह दी थी. पर धीरे धीरे मीना कुमारी ने ब्रैंडी की पूरी बोतल पीनी शुरू कर दी थी. उन दिनों चर्चाएं थीं कि धर्मेंद्र भी जानकी कुटीर में मीना कुमारी के साथ बैठ कर पीते थे.

माना जाता है कि कमाल अमरोही से तलाक के बाद मीना कुमारी के रिश्ते कईर् पुरुषों से रहे. मीना कुमारी हर बार उस पुरुष के साथ प्यार में ईमानदार रहीं, मगर वे सभी पुरुष महज उन की शोहरत और उन के धन का फायदा ही उठाते रहे. फिर वह दिन भी आ गया जब मीना कुमारी उस इंसान को खाना, धन, शराब सहित सबकुछ देने को तैयार रहतीं जो उन की कविताएं सुनने को तैयार रहता. गुलजार साहब तो अकसर मीना कुमारी की गजलें, नज्म व कविताएं सुना करते थे.

मीना कुमारी को गजल, नज्म और कविताएं लिखने का शौक था तो वहीं उन्हें कार खरीदने का भी शौक था. उनके पास पहली कार मर्सडीज थी.

मौत को गले लगाने से पहले मीना कुमारी अपनी गजल व नज्म की ढाई सौ डायरियां गीतकार गुलजार के नाम वसीयत कर के गईं. ये सभी डायरियां गुलजार साहब के पास आज भी मौजूद हैं.

मीना कुमारी हमेशा कमाल अमरोही को चंदन के नाम से पुकारा करती थीं, जबकि कमाल अमरोही, मीना कुमारी को मंजू कह कर बुलाते थे.

पर अफसोस मीना कुमारी की जब मौत हुई, उस समय उन के पास अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे तक नहीं थे. इतनी कामयाब व बड़े सितारे का यों तनहा चांद की तरह जाना अखरता है.

रणबीर के साथ होटल में नजर आई माहिरा, पीठ पर दिखा लव बाइट

रणबीर कपूर एक बार फिर से अपनी निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में हैं. आपको बता दें कि इन दिनों इंटरनेट पर रणबीर के साथ माहिरा की कुछ तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं, जिसमें दोनों साथ-साथ सिगरेट पीते नजर आ रहे हैं. इन तस्वीरों को देखकर फिर से एक बार ये कयास लगने शुरू हो गए हैं कि रणबीर और माहिरा के बीच कुछ तो है.

बताया जा रहा है कि ये फोटो न्यूयार्क की हैं, जहां दोनों एक दूसरे के साथ समय बिताते नजर आ रहे हैं. एक तरफ रणबीर इस तस्वीर में संजय दत्त वाले लुक में ही नजर आ रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ माहिरा ने सफेद रंग की बैकलेस शार्ट ड्रेस पहन रखी है, जिसमें वो काफी स्टनिंग लग रही हैं. खास बात ये है कि इस बैकलेस ड्रेस में उनकी पीठ पर लव बाइट जैसा निशान भी दिखाई दे रहा है.

बताते चलें कि जुलाई महीने में रणबीर कपूर संजय दत्त पर बनने वाली बायोपिक की शूटिंग के सिलसिले में न्यूयार्क पहुंचे थे. उस समय माहिरा भी अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में वहीं पर थीं. कहा जा रहा है कि ये तस्वीरें उसी दौरान ली गई थीं.

इससे पहले मार्च 2017 में ग्लोबल टीजर प्राइज के दौरान रणबीर और माहिरा दोनों साथ दिखे थे. तभी से उनकी डेटिंग की खबरें आनी शुरू हो गयी थीं. इस अवार्ड में न सिर्फ दोनों साथ-साथ दिखे थे बल्कि रेड कार्पेट पर एक-दूसरे के साथ पोज देते भी नजर आए थे. दोनों के बीच की केमिस्ट्री को देखकर उसी वक्त से कहा जा रहा है कि दोनों रिलेशनशिप में हैं.

हालांकि दोनों ने ही कहा था कि वो सिंगल हैं और खुश हैं. रणबीर के साथ रिलेशन को लेकर माहिरा ने भी सफाई दी थी कि वो सिर्फ काम के सिलसिले में साथ थे. इसके पीछे कोई और वजह नहीं है.

माहिरा खान का साल 2015 में तलाक हो गया था. उनका एक बेटा है. उन्होंने साल 2011 में ‘बोल’ फिल्म से डेब्यू किया था. पाकिस्तानी टेली शो हमसफर से उन्हें काफी पहचान मिली थी. इसके बाद रईस फिल्म से उन्होंने बौलीवुड डेब्यू किया.

वहीं रणबीर दीपिका पादुकोण और कटरीना कैफ के साथ रिलेशनशिप को लेकर काफी चर्चा में रह चुके हैं. इन दिनों वह संजय दत्त की बायोपिक फिल्म की तैयारी कर रहे हैं.

रईस के प्रमोशन में शामिल नहीं हो सकी थीं माहिरा खान

बता दें कि उरी में होने वाले आतंकी हमले का असर बौलीवुड पर भी पड़ा था. इस हमले में 19 जवानों के शहीद होने की खबर आई थी, जिसके बाद से बौलीवुड में पाकिस्तानी कलाकारों को बैन करने की मांग तेज हो गई थी. जिसके चलते माहिरा खान और फवाद खान जैसे कलाकारों के लिए काफी मुश्किलें पैदा हुई थी. उसी दौरान माहिरा की फिल्म रईस का प्रमोशन चल रहा था, मगर वह इसमें शामिल नहीं हो सकीं. वहीं फवाद खान को अपनी फिल्म ऐ दिल है मुश्किल की रिलीज से पहले ही पाकिस्तान लौटना पड़ा था.

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