इतने लाख की साड़ी पहन कहां चली शाहरुख की पत्नी गौरी..?

शाहरुख खान बौलीवुड के बादशाह के नाम से जाने जाते हैं, तो जाहिर है उनके परिवार को भी लोगों से रौयल ट्रीटमेंट मिलता होगा. यही वजह है कि सिर्फ शाहरुख खान ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के  सदस्य अपने स्टाइल और फैशन का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं. खास तौर पर उनकी बैटर हाफ गौरी खान, जो अपने इंटीरियर डिजाइन को लेकर बेहद चर्चित हैं.

हाल ही में वे एक कार्यक्रम में अपने पति शाहरुख के साथ शरीक हुई थीं, जहां उनका स्टाइल लोगों से बिल्कुल हटकर था. उन्होंने लाईट ब्लू रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जिसकी कीमत लाखों में थी. हालांकि उनके लिए ये बड़ी कीमत नहीं है, लेकिन एक आम इंसान के लिए एक बड़ी रकम साबित हो सकती है.

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उन्होंने इस मौके पर मोनीशा जयसिंह की डिज़ाइन की हुई साड़ी पहनी थी, जिसकी कीमत 1,58,440 रुपए थी. वैसे देखा ये जाए तो गौरी के लिए ये रकम बेहद थोड़ी है, लेकिन कहा जाता है कि वे कम खर्च में अच्छे कपड़े खरीदने में विश्वास रखती हैं.

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अखिलेश ने मुलायम को दिया अधिवेशन का न्योता

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव से मुलाकात कर पार्टी के आगरा अधिवेशन में आने का न्यौता दिया है. माना जा रहा है कि मुलायम बेटे की अध्यक्षता में होने जा रहे पार्टी के अधिवेशन में शामिल हो सकते हैं.

तीन रोज पहले सार्वजनिक तौर पर पिता का आशीर्वाद मिलने के बाद अखिलेश मुलायम के आवास पहुंचे. पिता पुत्र के बीच करीब पौन घंटा बातचीत हुई. सूत्रों के मुताबिक अखिलेश ने पार्टी के पांच अक्टूबर को आगरा में होने वाले राष्ट्रीय अधिवेशन में आने को कहा है. मुलायम पार्टी के संरक्षक है. पिछले दिनों में उन्हें सपा के राज्य अधिवेशन में नहीं बुलाया गया था. हालांकि हाल ही में हुई प्रेस कांफ्रेंस में मुलायम ने आगरा अधिवेशन में जाने से इंकार किया था.

मुलायम द्वारा नई पार्टी बनाने से इंकार करने से प्रसन्न अखिलेश ने ट्वीट कर मुलायम सिंह जिंदाबाद सपा जिंदाबाद का नारा दिया था. उत्साहित सपा मुखिया अखिलेश यादव अब नेताजी को अधिवेशन में लाकर पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को सख्त संदेश देना चाहते हैं. अगर मुलायम अधिवेशन में शामिल होते हैं तो यह उनके छोटे भाई शिवपाल के लिए दूसरा बड़ा झटका होगा.

राज्य अधिवेशन में सपा ने मुलायम व शिवपाल दोनों को नहीं बुलाया था. इस कारण भी शिवपाल मुलायम को अपने साथ खड़ा जानकर खुद को मजबूत मान रहे थे. पर लोहिया ट्रस्ट में हुई प्रेस कांफ्रेंस में मुलायम ने अखिलेश की आलोचना की थी लेकिन संदेश साफ दे दिया कि वह उन्हीं के साथ हैं. इसलिए पार्टी बनाने की शिवपाल की मांग को मानने से इंकार कर दिया.

काफी दिन बाद हुई सियासी मुलाकात

इससे पहले अखिलेश व मुलायम की मुलाकात तब हुई थी जब विधानसभा चुनाव में सपा हार गई थी. तब अखिलेश जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट में थे. मुलायम ने वहां पहुंच कर अकेले में काफी देर बात की. चुनाव प्रचार के वक्त जब पार्टी को घोषणा पत्र जारी करना था तब मुलायम नहीं आए लेकिन समारोह के बाद मुलायम अखिलेश की पार्टी दफ्तर में मुलाकात हुई. सूत्र बताते हैं कि पिता पुत्र के रूप में दोनों की मुलाकात इसके अलावा भी होती रहीं हैं.

क्या केवल संरक्षक बने रहेंगे मुलायम?

सपा अधिवेशन में मुलायम क्या केवल संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका चाहते हैं या अध्यक्ष पद भी वापस चाहते हैं. मुलायम वायदे के मुताबिक अध्यक्ष्र पद वापस न करने के कारण कई बार अखिलेश को उलाहना देने चुके हैं. बताया जा रहा कि मुलायम के मान सम्मान के लिए नए फामरूले पर विचार हो सकता है. इसके तहत मुलायम अध्यक्ष बनें और अखिलेश कार्यकारी अध्यक्ष बन कर सारे बड़े फैसले करें. हालांकि इसके लिए पार्टी संविधान में बदलाव करना होगा.

सम्मेलन में तैयार होगी मिशन 2019 की रणनीति

समाजवादी पार्टी अपने राष्ट्रीय सम्मेलन के जरिए अगले लोकसभा चुनाव के लिए खास रणनीति बनाएगी. इसके अलावा देश की सियासी व आर्थिक स्थिति पर प्रस्ताव लाकर केंद्र सरकार को निशाने पर रखा जाएगा. सपा का सम्मेलन 5 अक्टूबर को आगरा में होगा. इसके एक दिन पहले राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होगी.

सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने बताया कि आगरा में सम्मेलन स्थल तार घर का मैदान सदर बाजार कैंट पर प्रतिनिधि सम्मेलन की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं. सम्मेलन में उत्तर प्रदेश सहित 25 राज्यों के लगभग 15 हजार प्रतिनिधि भाग लेंगे. सम्मेलन में नए संविधान के तहत राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर पांच साल के लिए चुनाव होगा.

अखिलेश यादव पांच अक्टूबर को सुबह प्रात: नौ बजे झण्डारोहण करेंगे. इसी दिन आर्थिक राजनीतिक प्रस्ताव पेश होगा जिस पर प्रतिनिधि सम्मेलन में चर्चा होगी. आज की राजनीतिक स्थिति, केन्द्र सरकार की नीतियों तथा राष्ट्र के समक्ष अन्य ज्वलंत समस्याओं पर भी विचार होगा. सम्मेलन में 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी पर भी विचार किया जायेगा. चार अक्टूबर को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होगी. शाम को अखिलेश यादव प्रेस कांफ्रेंस करेंगे.

सैक्स परोसने से फिल्में नहीं चलतीं : सुजीत पुरी

भोजपुरी फिल्मों ने बहुत सारे नौजवानों को ऐक्टिंग में कैरियर बनाने का मौका दिया है. परेशानी वाली बात यह है कि इन फिल्मों पर सैक्सी और फूहड़ होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, जिस से भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को वह मुकाम नहीं मिल सका, जो हिंदी फिल्मों को मिला है.

हिंदी फिल्मों के मशहूर डायरैक्टर फरहान अख्तर, विधु विनोद चोपड़ा, राजकुमार कोहली, संजय खान और गोल्डी बहल के साथ असिस्टैंट डायरैक्टर के तौर पर काम कर चुके सुजीत पुरी को लगा कि उन को भोजपुरी फिल्मों में भी काम करना चाहिए. उन्होंने ‘निरहुआ रिकशावाला’, ‘बेटवा बाहुबली’, ‘मिस्टर तांगावाला’ जैसी सुपरहिट फिल्में बनाईं.

पेश हैं, भोजपुरी फिल्मों को ले कर सुजीत पुरी के साथ की गई बातचीत के खास अंश:

आप का डायरैक्टर से हीरो बनने का सफर कैसे पूरा हुआ?

मैं ने हिंदी फिल्मों में बतौर असिस्टैंट डायरैक्टर शुरुआत की. मुझे वहां काम सीखने का मौका मिला. मैं खुद भोजपुरी बोलने वाला था, तो मैं ने हिंदी के साथ भोजपुरी फिल्मों को बनाया, जिन को दर्शकों ने खूब पसंद किया.

जब मैं ने फिल्म ‘तेरीमेरी आशिकी’ की कहानी सुनी, तो मुझे लगा कि इस फिल्म में मुझे ही बतौर ऐक्टर काम करना चाहिए. इसलिए मैं ने हीरो के रूप में काम करने का फैसला किया.

ऐसा माना जाता है कि भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन को बदन दिखाने के लिए रखा जाता है. सैक्सी सीन को ले कर इन फिल्मों की बुराई होती है. इस बारे में आप का क्या कहना है?

ऐसा बिलकुल नहीं है. मेरी फिल्म ‘तेरीमेरी आशिकी’ हो या इस से पहले बनाई फिल्में, सभी में कहानी को प्राथमिकता दी गई. हीरोइन कोई भी रही हो, उस का बड़ा असरदार रोल रहा. फिल्म ‘तेरीमेरी आशिकी’ के बाद इस की हीरोइन तनुश्री को कई दूसरी फिल्मों में काम मिलने लगा.

भोजपुरी फिल्मों पर सैक्स परोसने जैसे आरोप बेकार की बातें हैं. इस से ज्यादा बोल्ड और सैक्सी सीन तो दूसरी भाषाओं की फिल्मों में होते हैं. मेरा तो यही मानना है कि सैक्सी सीन डालने से फिल्में नहीं चलतीं.

आप ने राजनीति में भी दखल दिया है. आप इतने काम एकसाथ कैसे कर लेते हैं?

मेरे मातापिता का मेरे ऊपर बहुत असर रहा है. मैं हमेशा से समाजसेवा करना चाहता था. मैं ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कहने पर मांझी छपरा से विधानसभा का चुनाव लड़ा था.

जब अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू हुआ, तो मैं उन के साथ अनशन पर बैठा था. वहां मेरी मुलाकात स्मृति ईरानी से हुई. वहां से मुझे भारतीय जनता पार्टी में आने का मौका मिला. अब मैं महराजगंज लोकसभा सीट से साल 2019 के चुनाव की तैयारी कर रहा हूं.

मैं राजनीति में समाजसेवा के लिए आया हूं. जब तक ईमानदारी से कर पाऊंगा मैं समाज की सेवा करूंगा, नहीं तो अपने फिल्मी कैरियर पर ही ध्यान दूंगा.

आप बिहार में हुई शराबबंदी के फैसले को कैसे देखते हैं?

मैं शराबबंदी के पक्ष में हूं. यह एक अच्छा कदम है. शराब बहुत सी बुराइयों की जड़ है. देखने वाली बात यह है कि इस को सरकार कैसे लागू करेगी.

बिहार का बहुत सारा इलाका ऐसा है, जहां पर कच्ची शराब बनती है. अगर उस को बनने से नहीं रोका गया, तो लोग कच्ची, जहरीली शराब का शिकार हो सकते हैं.

दूसरी परेशानी की बात यह है कि यहां शराब की तस्करी ज्यादा होगी. बिहार बौर्डर से लगे उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और नेपाल के रास्ते शराब की तस्करी यहां हो सकती है.

बिहार में शराबबंदी का फैसला करना आसान था, पर इन चुनौतियों से निबटना जरा मुश्किल होगा.

मोक्षप्राप्ति के भ्रमजाल में आप भी तो नहीं फंसे

आशा अपनी दोनों बेटियों गुड्डो और लाडो के साथ खेल में व्यस्त थी. उन की बालसुलभ क्रीड़ाओं को देखदेख कर निहाल हो रही थी. तभी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आ गईं. मुस्कान तिरछी करते हुए बोलीं, ‘‘खूब मस्ती हो रही है मांबेटियों के बीच.’’

‘‘आइए आंटीजी, कहते हुए आशा बेटियों को खेलता छोड़ उन के लिए कुर्सी ले आई.’’

‘‘अब फटाफट एक बेटा और कर ले, ताकि परिवार पूरा हो जाए,’’ आंटी ने अपनापन जताते हुए कहा.

‘‘हम दो, हमारे दो, हमें ये 2 बेटियां ही काफी हैं. हमारा परिवार पूरा हो गया, आंटी. हमें तीसरे बच्चे की चाह नहीं है. आप बताइए क्या लेंगी, चाय या कौफी?’’ आशा ने बात का रुख बदलते हुए कहा.

‘‘अरे, कैसी नासमझी वाली बातें करती हो? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बेटे के हाथों पिंडदान न हो तो मोक्ष नहीं मिलता. जब तक चिता को बेटा मुखाग्नि नहीं देता, आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती.’’

‘‘आंटी, क्या आप ने चिता के बाद की दुनिया देखी है? क्या आप दावे से कह सकती हो कि मरने के बाद क्या होता है?’’ आशा ने प्रश्न किया.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर आप कैसे कह सकती हैं कि बेटा मुखाग्नि नहीं देगा तो आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी? बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिन के कोई संतान ही नहीं होती. या फिर संतान इतनी दूर होती है कि समय पर पहुंच ही नहीं पाती. उन की आत्माएं क्या भटकती रहती हैं?’’ आशा के तर्कों ने आंटी को निरुत्तर कर दिया.

उसे अपने बचपन की एक घटना मालूम थी. उस के चाचा के अपना कोई बेटा नहीं था. जब उन की मृत्यु हुई तो मुखाग्नि देने के लिए पंडितजी ने बेटे की अनिवार्यता बताई. बेटी ने मुखाग्नि देने की बात कही. मगर पंडितजी ने मना कर दिया. वही पुरानी बातें कि ऐसा करने से मृतक को मोक्ष नहीं मिलेगा, उस की आत्मा जन्म जन्मांतर तक भटकती रहेगी आदिआदि. आनन फानन उन की बहन के बेटे को उन का दत्तक पुत्र बना कर अंतिम संस्कार करवाया गया. उस के बाद के क्रिया कर्म भी उसी के हाथों संपन्न करवाए गए. चाची पर गाज तो तब गिरी जब कुछ महीने बाद वह दत्तक पुत्र चाचाजी के पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा मांगने लगा. तब पता चला कि पंडित ने बहन से खूब दक्षिणा बटोरी थी.

आज भी हमारे देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा प्रतिशत मोक्ष के जाल में उलझा हुआ है. मोक्ष यानी आत्मा का जन्म जन्मांतर के बंधन से मुक्त हो कर परमात्मा में विलीन हो जाना.

हर जगह हैं धर्म के धंधेबाज

हिंदू धर्मशास्त्रों में पितरों का उद्घार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई है. गरुड़ पुराण के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि पुत्र के हाथों पिंडदान होने से ही प्राणी मोक्ष को प्राप्त करता है. इस पुराण के अनुसार, मोक्ष से आशय है पितृलोक से स्वर्गगमन और वह पुत्र के हाथों ही संभव है. इस तथ्य में कोई सचाई नहीं है. फिर भी पढ़े लिखे लोग भी बिना विरोध किए सदियों से चली आ रही इन परंपराओं को आंखें भींच निभाते चले आ रहे हैं. दरअसल, इन बातों को रातदिन दोहरा कर पूरे समाज को हिप्नोटाइज कर डराया जा रहा है. यह सारी दुनिया में हो रहा है क्योंकि धर्म के धंधेबाज हर जगह हैं.

पंडों, पादरियों और मौलवियों, जो अपने आप को पृथ्वी पर ईश्वर का दूत मानते हैं, ने मृत्यु के बाद का एक काल्पनिक संसार रच दिया है लोगों के दिलोदिमाग में. अपनेआप को शास्त्रों का ज्ञाता बताने वाले इन दूतों ने हरेक कर्मकांड को धर्म से जोड़ कर यजमानों के आसपास ईश्वर के प्रकोप और अनहोनी का जाल बुन दिया है. इस जाल के तानेबाने इतने सशक्त हैं कि धर्मभीरू जनता के लिए इन्हें तोड़ना आसान नहीं. अगर कोई कोशिश भी करना चाहे तो उसे परलोक का भय दिखा कर डराया जाता है.

हरेक धर्म के अपने धर्मगुरु होते हैं. समाज का एक बड़ा तबका इन का अनुयायी होता है. इन गुरुओं की रोजीरोटी अपने यजमानों के कारण ही चलती है. जब भी यजमान को कोई परेशानी होती है, वह इन गुरुओं की शरण में आता है और गुरुजी तत्काल उस समस्या का कोई समाधान सुझा देते हैं. बदले में वे मोटी दक्षिणा वसूलते हैं. समस्या जितनी बड़ी होगी, समाधान भी उतना ही महंगा होगा.

पिछले दिनों मेरे पड़ोस में रहने वाले एक मित्र का देहांत हो गया. उन का बड़ा बेटा जो कि विदेश में रहता है, अंतिम संस्कार के समय नहीं पहुंच सका. मुखाग्नि छोटे बेटे के हाथों दिलवाई गई. मगर पगड़ी रस्म के समय पंडितजी ने कहा कि बड़े बेटे के रहते छोटे को पगड़ी नहीं पहनाई जाएगी. कुछ अतिरिक्त दक्षिणा ले कर उन्होंने उस का भी तोड़ निकाल दिया. बड़े बेटे की तसवीर को पाटे पर रख कर रस्म पगड़ी संपन्न करवाई गई.

मरने वाले को मोक्ष मिलता है या नहीं, इस का तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण है ही नहीं, मगर क्रियाकर्म करवाने वाले यानी पंडित के जरूर वारे न्यारे हो जाते हैं. अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कोई भी पुत्र कुछ भी करने को तैयार हो जाता है क्योंकि उसे यह समझाया जाता है कि उस पर अपने उन पितरों का ऋण है जो उसे इस दुनिया में लाए थे. यह भी कि यह ऋण उतारना उस की नैतिक जिम्मेदारी है वरना उस के पूर्वजों की अतृप्त आत्माएं भटकती रहेंगी. मगर पुत्र ही क्यों? पुत्री भी तो इन्हीं पूर्वजों द्वारा संसार में लाई गई हैं तो पितृऋण तो उस पर भी होना चाहिए. अपने पूर्वजों के इस ऋण को उतारने के लिए पुत्र पर मानसिक दबाव बनाया जाता है, कई तरह के किस्से गढ़ कर सुनाए जाते हैं और प्राचीन शास्त्रों का हवाला दिया जाता है. कई बार तो इस ऋण को उतारने की कवायद में व्यक्ति सिर से पांव तक कर्जे में डूब जाता है. यानी पूर्वजों का ऋण उतार कर वंशजों को ऋण में डुबो देता है.

पिछले दिनों एक परिचित से मिलना हुआ. पता चला वे अपने पिताजी का श्राद्धकर्म करने के लिए गया जा रहे हैं क्योंकि पंडितजी ने पितृदोष बताया है. मेरे पूछने पर कि उन्हें कैसे पता चला कि ये पितृदोष है, तो वे बोले कि कई दिनों से परिवार में कोई न कोई बीमार हो जाता है. कभी व्यापार में घाटा हो जाता है तो कभी आपस में मनमुटाव. रोजरोज की परेशानियों से निबटने के लिए जब पंडितजी से उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि मेरे चाचाजी, जिन की मृत्यु ऐक्सिडैंट में हुई थी, का क्रियाकर्म उचित ढंग से नहीं हुआ, इसलिए उन की आत्मा को शांति नहीं मिल रही है और हमारे परिवार पर पितृदोष लगा है. अब इस का एकमात्र उपाय गया में उन का श्राद्ध कर्म करना ही है.

मैं ने बहुत समझाया कि अगर कोई बीमार है तो डाक्टर की सलाह लो, न कि पंडितजी की. मगर उन की आंखों पर तो पंडितजी ने धर्म की ऐसी पट्टी बांधी जो 2-3 लाख रुपए खर्च होने पर ही खुली क्योंकि गया में भव्य श्राद्धकर्म करने के बाद भी परिवार और व्यापार की स्थिति में आशातीत सुधार नहीं आया था. तब बात उन की समझ में आई मगर तब तक उन का काफी नुकसान हो चुका था.

हमारी नई वैज्ञानिक पीढ़ी जरूर इन आडंबरों से दूर है मगर यह प्रतिशत भी सिर्फ बड़े शहरों में ही अधिक देखने को मिलता है. छोटे कसबों और गांवों में अभी भी हालात अधिक बदले हुए नजर नहीं आते.

धर्म का डर

राधा की सास की मृत्यु के बाद 12 दिनों तक उन की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पंडितजी ने कई क्रियाएं करवाईं. प्रतिदिन पंडितजी को वे सब पकवान बना कर खिलाए जाते जो उस की सास को बेहद प्रिय थे. क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, यह सारा भोजन पंडितजी के माध्यम से उस की सास तक पहुंच रहा था और ये सारा ज्ञान पंडितजी का ही दिया हुआ था. सास तक क्या पहुंचा, क्या नहीं, मगर 12 दिन पंडितजी ने खूब तर माल उड़ाया और अपनी सेहत बनाई. साथ ही, मोटी दक्षिणा भी वसूली. राधा के परिवार को कितना कर्जा लेना पड़ा, इस से उन्हें कोई सरोकार नहीं.

दरअसल, पूजापाठ से मिलने वाली दान दक्षिणा ही प्राचीनकाल से पंडे पुजारियों के जीवनयापन का साधन रही है. जैसे जैसे लोग पढ़ने  लिखने लगे, उन की सोच भी तार्किक होने लगी. ऐसे में पंडितों मुल्लाओं का धंधा चौपट होने लगा. इसलिए यजमानों को धर्म का डर दिखाना उन के लिए जरूरी हो गया वरना उन की रोजी रोटी पर संकट खड़ा हो जाता. अब इस तरह के कर्मकांड रोज तो होते नहीं, इसलिए जब भी ऐसा मौका आता है ये ईश्वर के दूत सक्रिय हो जाते हैं और अधिक वसूलने की कोशिश करते हैं. अपने यजमानों को मोक्ष का ज्ञान देने वाले ये पंडित खुद गहरे मायाजाल में फंसे हुए हैं और अपने स्वार्थ के लिए ही इन के द्वारा ये भ्रांति और अंधविश्वास फैलाया गया है कि पुत्र ही मातापिता को मृत्यु के बाद मुक्ति प्रदान करता है. और इसी धारणा का नतीजा है आम आदमी की पुत्रचाह की मानसिकता. मोक्षप्राप्ति की लालसा में पुत्र की कामना प्राचीनकाल में जनसंख्या वृद्धि का एक अहम कारण बनी और आधुनिक काल में कन्याभ्रूण हत्या का अलबत्ता तो मृत्यु के बाद मोक्ष की अवधारणा  ही कल्पना मात्र है और इस के लिए भी पुत्र की अनिवार्यता महज पंडोपादरियों द्वारा फैलाया गया भ्रमजाल है. ऐसा कोई काम नहीं जो पुत्र कर सके और पुत्री नहीं. आखिर हैं तो दोनों एक ही माता पिता की संतान.

हमें इन कर्मकांडों और पाखंडों के बजाय तार्किक और वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता है. अंधविश्वास के अंधेरों से बाहर निकल कर तथ्यों की रोशनी में हकीकत देखने और समझने की जरूरत है. हालांकि मस्तिष्क में गहरे तक जड़ जमा चुके इन धार्मिक आडंबरों के जाल से बाहर निकलने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत है क्योंकि हो सकता है समाज का एक धड़ा आप के विरोध में उठा खड़ा हो. मगर सचाई यह भी है कि जब तक हम डरते रहेंगे, ईश्वर के तथाकथित दूत यानी पंडित लोग हमें लूटते रहेंगे. अगर हम तर्क की तलवार ले कर इन का सामना करें तो इन के फैलाए पाखंड के जाल को काट सकेंगे.

लो अब तो वाकई में आ गए अच्छे दिन

जो लोग फ्लैटों में पैसा लगा कर यह सोच रहे थे कि अच्छे दिन आते ही उन के फ्लैटों के दाम बढ़ जाएंगे और उन की मेहनत की कमाई दोगुनाचौगुना फल देगी वे अब घरों को भूल ही जाएं. इस देश में मकानों की बहुतायत इतनी है कि अब उन के दाम औंधे मुंह गिर रहे हैं. यह विकास की नैगेटिव ग्रोथ यानी नीचे गिरने का संकेत है कि बिना खुद की छत वाले अब मकानों के लायक पैसा नहीं बचा पा रहे.

मकानों के सैक्टर को सुधारने के नाम पर रियल स्टेट कानून और रजिस्ट्रेशन भी शुरू किया गया है और नोटबंदी व जीएसटी की भी मार पड़ी है कि इस गेम में अब पैसा ही नहीं लग रहा और जिन का लगा है वह फंस गया है. दिल्ली के निकट कार्यरत जेपी समूह दिवालिया होने के कगार पर है. डीएलएफ व आम्रपाली ग्रुप भी डूबने लगे हैं.

बैंकों ने इस क्षेत्र में उधार देना बंद कर दिया है और जिन्हें दे दिया गया है उन से वसूली चालू हो गई है. इस क्षेत्र में निर्माणाधीन फ्लैटों पर लाखों लोगों ने अपनी जमापूंजी और उधार ले कर पैसा लगाया था. वे सब अब विकास की आंधी में धुल रहे हैं और उन का पैसा गोल हो गया है.

स्टेट बैंक औफ इंडिया के नैशनल बैंकिंग ग्रुप के मैनेजिंग डाइरैक्टर रजनीश कुमार ने साफ कह दिया है कि यह सोचना कि सिर्फ उधार देने वाले बैंक नुकसान उठाएंगे और फ्लैटों में पैसा लगाने वाले आम नागरिकों का पैसा सुरक्षित रहेगा भ्रम है. नुकसान तो दोनों को होगा.

असल में नुकसान केवल घर खरीदारों का होगा, जिन्होंने नारों और विज्ञापनों के झांसे में आ कर निवेश कर दिया था. उन्हें नहीं मालूम था कि सरकार की नीतियां ऐसी कमजोर निकलेंगी कि अर्थव्यवस्था की पहचान रियल स्टेट ही डूबने लगेगा.

यह संभव है कि भवन निर्माताओं ने बेहद मुनाफाखोरी की है पर जिस तरह के जोखिम उन्होंने लिए हैं उस में मुनाफे की अपेक्षा तो होगी ही. आखिर इसीलिए तो बैंकों ने भरभर कर भवन निर्माताओं को भी कर्ज दिया और भवन खरीदारों को भी मासिक आय के अनुसार किश्तों पर चुकाने वाला कर्ज दिया. अगर इस धंधे में मूलभूत कमजोरी होती, तो लाखों लोग आज शानदार फ्लैटों में सुख से न रह रहे होते.

भवन निर्माताओं को सरकारों ने नियमों और अनुमतियों के जंजाल में फांस रखा है और पगपग पर नुक्कड़ के सिपाही से ले कर मुख्यमंत्री तक वसूली करता है. जमीन जनता की, मेहनत जनता की, पैसा जनता का पर सरकार ‘मान न मान मैं तेरा मालिक’ की तर्ज पर हर जगह मालिक बन बैठी है.

अब काले धन को जड़ से हटाने के पागलपन में धन की जड़ें ही खोद दी जा रही हैं. जब किसान बीज ही खाने लगे तो अकाल तो आएगा और भवन निर्माण क्षेत्र में यह आ पहुंचा है. अब भुखमरी होगी मकानों की. मकान होंगे पर खरीदार नहीं. छतें होंगी पर लोग सड़कों पर रहेंगे.

यही वजह है कि हाल ही में प्रकाशित एक सर्वे ने स्पष्ट किया है कि देश की अधिकांश जनता के पास कैदियों से भी कम जगह लायक छत है. जो छतें बन रही थीं वे अच्छे विकास और सुशासन की बाढ़ में ढह रही हैं.

जब राजेश खन्ना के घर से डिंपल को भगाया गया

आज भी राजेश खन्ना की फिल्म ‘सफर’ का वो गाना फैंस को उनकी याद दिला जाता है. ‘जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर ‘ गाने में राजेश खन्ना ने इस तरह दर्शकों के सामने पेश किया कि मानो वो गाना उनके लिए ही बना हो.

1970 में आई फिल्म ‘सफर’ को लोगों ने काफी पसंद किया. उन दिनों राजेश खन्ना का क्रेज कुछ ऐसा था कि उनकी फिल्म जिस दिन रिलीज होती थी उस दिन स्कूल और कौलेज से छात्र-छात्राएं गायब नजर आते थे.

राजेश खन्ना के फैंस में उन दिनों एक नाम डिंपल कपाड़िया का नाम भी शामिल था. डिंपल उस समय महज 11 साल की थी लेकिन वो राजेश खन्ना की फिल्मों की दीवानी थी. वह अक्सर स्कूल बंक करके उनकी फिल्में देखने जाया करती थीं. जब फिल्म रिलीज हुई तो डिंपल राजेश खन्ना की फिल्म देखने पहुंच गई.

फिल्म में राजेश खन्ना का रोल उन्हें इतना पसंद आया कि वो काका से मिलने उनके घर आशीर्वाद पहुंच गई और गार्ड से उनसे मिलने देने को कहा. लेकिन गार्ड ने यह कहते हुए कि राजेश खन्ना घर पर नहीं है डिंपल को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

डिंपल जा ही रही थी कि अचानक उनकी नजर एक कार पर पड़ी. इस कार में अंजू महेन्द्रू सवार थी, उन दिनों राजेश खन्ना और अंजू महेन्द्रू की लव स्टोरी की खबरें हर तरफ फैली हुई थीं. डिंपल को तो ये समझ आ गया कि राजेश खन्ना घर में ही मौजूद हैं. इसके बाद वो एक बार फिर गार्ड के पास पहुंच गई और उन्हें अंदर जाने देने के लिए कहा.

गार्ड के समझाने के बावजूद भी जब डिंपल नहीं मानी तो गार्ड ने पुलिस को बुलाने की धमकी दी. उस दिन के बाद डिंपल कई दिनों तक रोती रही. हालांकि 15 साल की उम्र में डिंपल ने अपने पसंदीदा एक्टर से शादी कर ली. जिस घर से उन्हें धक्के देकर बाहर निकाला गया था, बाद में उसी घर के गार्ड उन्हें सलाम ठोकने लगे.

सांवली सूरत पर आखिर भेदभाव क्यों

ब्रिटेन में एक युगल को गोद लेने का अधिकार खोना पड़ा, क्योंकि वह युगल सिख है और भारतीय मूल का है. वह युगल गोरे बच्चे को गोद लेना चाहता था, लेकिन गोद एजेंसी के अधिकारियों ने सिख युगल से भारत में ही किसी बच्चे को गोद लेने को कहा.

ऐसा नहीं है कि इंटररेशियल गोद लेने पर पाबंदी है. सैकड़ों भारतीय बच्चे गोरे मातापिताओं की गोदों में जा कर यूरोप व अमेरिका में रह रहे हैं और उन की भाषा, व्यवहार, सोच बिलकुल वहां के वातावरण की तरह है, क्योंकि वे बचपन से उसी माहौल में रह रहे हैं.

प्रश्न है कि वह सिख दंपती आखिर क्यों गोरा बच्चा ही गोद लेना चाहता था? अगर उस का कारण अपनी नस्ल सुधारना नहीं है तो क्या है?

हम भारतीय आमतौर पर गोरों की रंगभेद नीति का पुरजोर विरोध करते हैं पर जो भेदभाव हमारे यहां गोरेकाले में है वह शायद अमेरिका में भी नहीं है, जहां काले अफ्रीका से गुलामों की तरह लाए गए थे.

हमारे देश में निम्न जातियों में अधिकांश काले ही हैं और हमारे गोरेपन के पागलपन के पीछे कारण यह है कि काले को नीची जाति का समझा जाता है. अगर ऊंची जातियों में आनुवंशिक कारणों से काले रंग का बच्चा पैदा हो जाए तो उसे जीवन भर हीनभावना से ग्रस्त रहना पड़ता है और यह उस के मानसिक व आर्थिक विकास में आड़े आता है. उसे आमतौर पर साक्षात्कारों में कम अंक मिलते हैं. विवाह के समय तो रंग काफी महत्त्व की बात मानी जाती है.

सांवली सूरत मोहक नहीं होती, ऐसा नहीं है. कुछ समय पहले तक देश की अधिकांश नर्तकी वेश्याओं का रंग काला ही होता था, क्योंकि वे उन जातियों से आती थीं जहां काले रंग वाले ही होते थे. दक्षिण भारत से कितने ही मेधावी विचारक, वैज्ञानिक, लेखक काले थे पर फिर भी उन्हें गोरों के मुकाबले की जगह नहीं मिली.

ब्रिटेन के सिख युगल को एक तरह से सही उत्तर दिया गया कि जो समाज इतना रंगभेदी है, उसे भला गोरे क्यों प्रोत्साहित करें. फिर गोरे खुद भी तो रंगभेद में विश्वास करते हैं. सदियों से साथ रहने के बावजूद वे कालों को अपने में मिलाने को तैयार नहीं हैं.

रणबीर के दिल में बसती हैं एक नहीं कई हसीनाएं

28 सिंतबर, 1982 को जन्मे रणबीर कपूर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत ‘सावरियां’ से की. संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी यह फिल्म बौक्सआफिस पर फ्लाप रही, लेकिन रणबीर और सोनम कपूर के अफेयर की चर्चाओं ने बौलीवुड के इस चाकलेटी ब्वाय को हिट कर दिया.

‘बर्फी’, ‘राकस्टार’, ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘राजनीति’, ‘ऐ दिल है मुश्किल’ जैसी सुपरहिट फिल्में दे चुके रणबीर अपनी प्रोफेशनल लाइफ से कहीं ज्यादा पर्सनल लाइफ को लेकर चर्चा में रहते हैं. खासकर उनकी लव-लाइफ हमेशा सुर्खियों में बनी रहती है.

क्या आप जानते हैं दीपिका पादुकोण और कैटरीना कैफ के साथ रिलेशनशिप में रह चुके रणबीर कपूर का नाम सबसे पहले अवंतिका मलिक से जुड़ा था. अवंतिका मलिक के साथ ही कई और ऐसी हसीनाएं हैं, जिनका नाम रणबीर के साथ जुड़ चुका है.

रणबीर और अवंतिका मलिक

रणबीर कपूर का नाम सबसे पहले अवंतिका मलिक से साथ जुड़ा था. कहा जाता है कि उनके फिल्म में डेब्यू से पहले जब अवंतिका ‘जस्ट मोहब्बत’ में काम कर रही थीं, तब रणबीर उनपर फिदा थे. वो अक्सर उनसे मिलने के लिए शो के सेट पर पहुंच जाया करते थे. दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी, लेकिन बाद में अवंतिका और रणबीर का ब्रेकअप हुआ. आपको बता दें कि अवंतिका मलिक अब इमरान खान (आमिर खान का भांजा) की पत्नी हैं और दोनों की एक बेटी भी है.

रणबीर और सोनम कपूर

रणबीर और सोनम कपूर ने फिल्म सांवरिया (2007) से बौलीवुड में कदम रखा. दोनों के बीच फिल्म की शूटिंग के दौरान नजदीकियां बढ़ीं, कहा जाता है कि ये दोनों अपने रिलेशनशिप के बारे में लोगों को बताना नहीं चाहते थे. हालांकि, बाद में इन दोनों का ब्रेकअप हो गया.

रणबीर और दीपिका पादुकोण

रणबीर की जिन्दगी से जुड़ी इन हसीनाओं की लिस्ट में अगला नाम दीपिका पादुकोण का है. पहली फिल्म बचना ए हसीनों (2008) के सेट पर दोनों करीब आए. दीपिका रणबीर के साथ अपने रिलेशनशिप को लेकर इतनी सीरियस थीं कि उन्होंने अपनी गर्दन पर रणबीर के नाम का टैटू तक गुदवा लिया था. पर फिर किसी कारण दोनों का ब्रेकअप हो गया. जिसके बाद उन्होंने ‘ये जवानी है दीवानी’ और ‘तमाशा’ में साथ काम किया और दोनों ही फिल्में रणबीर के करियर के लिए अहम साबित हुईं.

रणबीर और कैटरीना कैफ

फिल्म ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ से रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ के बीच नजदीकियां बढ़ीं. लेकिन दोनों ने ही अपने रिश्ते को लेकर चुप्पी साध रखी थी पर जब दोनों की बीच पर एक साथ वाली तस्वीरें सबके सामने आईं सामने आईं तब इनके रिलेशनशिप का खुलासा हुआ. इन तस्वीरों के सामने आने के बाद भी दोनों ने अपने रिश्तों को लेकर हमेशा चुप्पी बनाए रखी. बाकि हसीनाओं की तरह कैटरीना के साथ भी 2016 में इनके रिलेशनिप का द एंड हो गया.

रणबीर और माहिरा खान

कैटरीना से अलग होने के बाद रणबीर का नाम अब पाकिस्तानी एक्ट्रेस माहिरा खान के साथ जोड़ा जा रहा है. आपको बता दें कि पिछले हफ्ते न्यूयार्क में दोनों की एक होटल के बाहर स्मोकिंग करते हुए फोटो वायरल हुई थी. जिसके बाद से ही हर कोई इनके रिश्ते का सच जानने के लिए बेकरार है. वैसे लोगों का यही मानना है कि ये दोनों रिलेशन में है, खैर इसके बारे में अब रणबीर और माहिरा ही बता सकते हैं.

भाजपा की तरह मार्केटिंग नहीं कर पाए : राहुल

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने केंद्र और गुजरात की भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा है. उन्होंने कहा, भाजपा की मार्केटिंग अच्छी है. हमारी सरकार ने कई अच्छे काम किए, लेकिन मार्केटिंग अच्छी तरह नहीं कर पाए. हम वहीं मार खा गए.

तीन दिवसीय गुजरात दौरे के दूसरे दिन चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा, मार्केटिंग हमारे डीएनए में नहीं है. सरकार को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा के भाषण अच्छे होते हैं, लेकिन काम नहीं.

पाटीदारों को लुभाने की कोशिश

गुजरात के पाटीदार समुदाय को लुभाने के लिए राहुल ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की विरासत का जिक्र किया और सौराष्ट्र के पाटीदार बहुल इलाकों में चुनाव प्रचार किया. गुजरात में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. पाटीदार समुदाय का एक तबका राज्य की भाजपा सरकार से नाराज बताया जा रहा है. राहुल की यात्रा से ठीक पहले पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने ट्वीट कर उनका स्वागत किया था.

राज्य सरकार को घेरा

राहुल ने राज्य की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि उसने पटेल आरक्षण आंदोलन के दौरान समुदाय के लोगों पर जुल्म किया. राजकोट आने के दौरान ढोल कस्बा पहुंचने पर राहुल ने पाटीदार समुदाय की पहचान पाटीदार टोपी पहनी. राहुल ने कहा, आपने (पटेल समुदाय ने) देश को सरदार पटेल दिया, लेकिन भाजपा सरकार ने आप पर जुल्म किए. पटेलों पर गोलियां चलाई गई. यह कांग्रेस का तरीका नहीं है. हम सभी समुदायों को साथ लेकर आगे बढ़ने में यकीन करते हैं.

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों का विरोध

वहीं कांग्रेस ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की अगुआई में जयपुर में रैली निकाली. करीब चार किलोमीटर लंबे इस प्रदर्शन में कार्यकर्ता तांगा, बैलगाड़ी और ऊंटगाड़ी पर सवार थे.

दौसा से कांग्रेस सासंद सचिन पायलट खुद बैलगाड़ी में बैठकर प्रदर्शन में शामिल हुए. युवक कांग्रेस के दफ्तर से शुरू हुई यह रैली प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पर खत्म हुई. पायलट ने कहा कि यह रैली सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए निकाली गई है. पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती नहीं हुई तो पार्टी पूरे प्रदेश में आंदोलन करेगी.

जब इस अभिनेत्री ने नसीरुद्दीन को कहा ‘बदशक्ल’

बौलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरूद्दीन शाह आज भी बौलीवुड इंडस्ट्री में बड़े बड़े एक्टर को टक्कर देने का दम रखते हैं. नसीरूद्दीन शाह ने इश्किया, राजनीति, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा और बेगम जान जैसी फिल्मों में अपनी एक्टिंग से यह साबित कर दिया कि वह आज भी किसी से कम नहीं हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब नसीरूद्दीन शाह को इंडस्ट्री में काम नहीं मिल रहा था.

ऐसे में उन्होंने सोचा कि कहीं बौलीवुड में आने का उनका फैसला गलत तो नहीं है. लेकिन वह लगातार मेहनत करते रहे और उनकी मेहनत काम आखिरकार काम आ ही गई. नसीरुद्दीन शाह आज सिर्फ भारतीय सिनेमा तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि वह कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में भी नजर आ चुके हैं. नसीरूद्दीन शाह शुरू से ही सिंपल लुक वाले एक्टर रहे हैं. जिस वजह से उन्हें लोगों से तरह तरह के कमेंट भी सुनने को मिले हैं.

बात उस समय की है जब नसीरूद्दीन शाह दिल्ली के एनएसडी में पढ़ाई कर रहे थे. उस समय नसीरूद्दीन को देखकर शबाना आजमी ने कहा था कि मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसी शक्ल वाले लोग एक्टर बनने की हिम्मत कैसे कर लेते हैं. नसीरूद्दीन शाह ने उस समय शबाना की बातों का बुरा नहीं माना और अपना काम करते रहे.

कुछ दिनों बाद शबाना आजमी के साथ उसी नसीरूद्दीन शाह ने अपनी पहली फिल्म निशांत में काम किया. जिसमें शबाना से ज्यादा नसीरूद्दीन की एक्टिंग की तारीफ हुई. फिल्म सुपरहिट रही और नेशनल अवार्ड भी अपने नाम किया. इसके बाद शबाना आजमी ने नसीरूद्दीन शाह के साथ कई और फिल्मों में काम किया. नसीरूद्दीन शाह ने अपने एक्टिंग के दम पर इस बात को साबित कर दिया कि इंसान के अंदर हुनर हो तो कोई भी कमजोरी उसे कामयाब बनने से रोक नहीं सकती.

इस बात का जिक्र खुद नसीरुद्दीन शाह ने एक इंटरव्यू में किया था उस वक्त उनके साथ ओम पुरी भी उस इंटरव्यू में मौजूद थे.  नसीरुद्दीन शाह का नाम फिल्मी जगत में बड़े ही अदब के साथ लिया जाता है. लोग आज भी उनको एक्टिंग का उस्ताद मानते हैं.

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