तानाशाही की ओर डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिका में बहस चलने लगी है कि नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तानाशाह और निष्ठुर बनने के कितने आसार हैं और अगर जनता ने अभी चेत कर कुछ नहीं किया तो क्या हो सकता है. अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के इतिहासकार टिमोथी सिंडर का विचार है कि अमेरिका के पास शायद सिर्फ एक वर्ष है जिस में जनता तानाशाही के बढ़ते सैलाब को रोक सकती है.

इतिहास के 20 उदाहरण ले कर टिमोथी सिंडर ने कहा कि लगभग एक वर्ष में हर संभावित तानाशाह अपने पैर जमा लेता है. हिटलर को लगभग एक साल लगा था. हंगरी को ढाई साल लगे थे. पोलैंड का उदाहरण है जब तानाशाह शासक ने एक साल में न्यायालयों को शक्तिहीन कर दिया था.

टिमोथी का कहना है कि पहले लोग मानसिक रूप से संभावित शासक की लच्छेदार बातों में अपना हित देखते हैं और फिर उन्हें लगने लगता है कि दशकों से बनी संस्थाएं उन का हित करने वाले शासक के हाथ रोक रही हैं. उन्हें वे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाले, तानाशाह के शब्दों के अनुसार सुधारों में अड़चन डालने वाले लगने लगती हैं. टिमोथी सिंडर का कहना है कि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जिन में जनता के समर्थन की लहर के बीच से उभरे लोकप्रिय नेता तानाशाही शासकों का लबादा ओढ़ लेते हैं.

रूस के कम्युनिस्ट शासकों के दौरान और आज भी व्लादिमीर पुतिन के समय लोकतंत्र है, बाकायदा चुनाव होते हैं, विपक्षी खड़े होते हैं पर लोगों को पैरों के नीचे महसूस होता है कि तानाशाही की कंपन है और विरोध करने वाले को कुचल दिया जाएगा. हिटलर ने भी ऐसा ही किया था. इस तरह के चुनाव बहुत जल्दी मजाक बन जाते हैं. तानाशाह झूठी लोकप्रियता और उस के माहौल के मिश्रण का इस्तेमाल कर के कानून, अदालतों, मीडिया और विचारकों को इस तरह निष्क्रिय कर देता है कि चुनाव में कोई पर्याप्त ही नहीं बचता.

नवंबर 2016 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में टिमोथी सिंडर ने कहा था कि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जिन में एक शासक किसी आपातस्थिति को पहले पैदा करता है और फिर उस से जनता को बचाने के लिए लोगों के हक छीन लेता है. नाजियों ने एक समय खुद अपनी संसद में आग लगा दी थी और कम्युनिस्टों पर आरोप लगा कर हिटलर की तानाशाही थोप दी थी.

टिमोथी का कहना है कि तानाशाह बन रहा शासक कुछ ऐसे काम करेगा जो जनता के जख्मों पर ठंडक पहुंचाने वाले लगे जैसे ट्रंप का मैक्सिको और अमेरिका के बीच दीवार बनाने का संकल्प या इमीग्रेशन रोकने के आदेश ताकि नौकरियों को देश के गोरे नागरिकों के लिए सुरक्षित किया जा सके. टिमोथी सिंडर के अनुसार मुसलिमों और बाहरी कर्मचारियों पर रोक हिटलर के संसद जलाने जैसा काम है.

दुनिया में लोकतंत्र का बड़ा रक्षक रहे अमेरिका यदि यह एहसास होने लगे कि तानाशाही दबेपांव अमेरिका में आ रही है तो तुर्की, फिलीपींस, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, कजाकिस्तान, ब्राजील जैसे देशों का तो क्या कहना जहां नेताओं को पूजा जाने लगता है और लीबिया इराक की तरह मूर्तियां लगाई जानी शुरू हो जाती हैं. टिमोथी सिंडर की पुस्तक ‘औन टिरैनी : ट्वंटी लैसन्स फ्रौम द ट्वंटीयथ सैंचुरी’ हर भारतीय विचारक को पढ़नी चाहिए, खासतौर पर वे जो किसी व्यक्ति में भविष्य की सुखद कल्पना करते हैं.

कर्मचारी और पूर्व सैनिक तय करेंगे चुनाव की दिशा

हिमाचल प्रदेश में 9 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में हार जीत के समीकरण प्रदेश की राजनीति के धुरी बने दो लाख कर्मचारी और लाखों भूतपूर्व सैनिक और उनके परिजन तय करेंगे.

प्रदेश की राजनीति पर दबदबा रखने वाले कर्मचारी इस समय प्रदेश सरकार से 4-9-14 की मांग कर रहे हैं. हालांकि भाजपा और कांग्रेस दोनों के घोषणापत्र में इस मांग को पूरा करने का वादा किया गया है. लेकिन कर्मचारियों का समर्थन किसे मिल पाएगा, यह देखने वाली बात होगी.

प्रदेश की राजनीति में कर्मचारियों का हमेशा से ही दबदबा रहा है, दोनों ही पार्टियां कर्मचारी वर्ग को मनाने में लगी हैं. प्रदेश कर्मचारियों की राजनीति का इतिहास देखा जाए तो सबसे पहले कर्मचारियों ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार को विरोध का स्वाद चखाया.

1990 में कर्मचारियों की हुई हड़ताल में नो वर्क नो पे लागू करने वाले शांता कुमार को 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के 68 में से केवल 6 विधायक ही भाजपा के चुनकर आए थे. उस चुनाव में खुद मुख्यमंत्री शांता कुमार ने दो जगह से चुनाव लड़ा और दोनों जगह से ही हार गए. उसके बाद से प्रदेश में कर्मचारियों से नाराजगी मोल लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

प्रदेश के कर्मचारियों के अध्यक्ष एसएस जोगटा का कहना है कि जो पार्टी कर्मचारी हितैषी प्रतीत होगी, कर्मचारी उसे ही वोट देंगे. प्रदेश में लाखों भूतपूर्व सैनिक और उनके परिवार वाले हैं. उनका कहना है कि अभी तक वन रेंक वन पेंशन की मांग पूरी नहीं हुई. इंडियन एक्स सर्विसमैन मूवमैंट ओर यूनाइटेड फ्रंट आफ एक्स सर्विसमैन के प्रमुख जनरल सतवीर सिंह ने प्रदेश के भूतपर्व सैनिकों से अपील की कि वे वन रैंक वन पेंशन वादे के अनुसार दिलाए जाने के लिए दबाव बनाएं.

राज्य का जातीय आंकड़ा

2011 जनगणना के अनुसार प्रदेश की कुल आबादी 68.56 लाख है. इसमें 25 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 5.71 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 13.52 प्रतिशत ओबीसी हैं. अन्य 50.72 प्रतिशत समान्य श्रेणी की आबादी हैं.

बाढ़ के दौरान बीमारियों का ऐसे करें मुकाबला

बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों, वहां के रहवासियों के साथ देश की संपदा को भी नुकसान पहुंचता  है. इतना ही नहीं, बाढ़ के चलते जलजनित और वैक्टर संबंधी बीमारियां पनपती भी हैं. इन में मलेरिया, डेंगू, बुखार, हैजा, हैपेटाइटिस ए और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां शामिल हैं.

बाढ़जनित बीमारियां

संक्रामक रोगों का फैलाव और प्रकोप बाढ़ आने के कुछ ही दिनों, सप्ताहों या महीनों के भीतर नजर आने लगता है. बाढ़ के दौरान और इस के बाद सब से आम है जलस्रोतों का प्रदूषण. ऐसे पानी के संपर्क में आने या इसे पीने के कारण जलजनित बीमारियां फैलने लगती हैं. इन में मुख्य हैं- दस्त और लैप्टोस्पायरोसिस. इस के अलावा खड़े पानी में मच्छरों को प्रजनन करने और पनपने का मौका मिलता है. इस प्रकार से वैक्टरजनित रोग फैलते हैं, जैसे कि मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया.

बाढ़ के बाद जो रोग एक महामारी का रूप ले सकता है वह है लैप्टौस्पायरोसिस. चूहों की संख्या में वृद्धि से कीटाणुओं का विस्तार होता है. चूहों के मूत्र में बड़ी मात्रा में लैप्टोस्पाइरा होते हैं जो बाढ़ के पानी में मिल जाते हैं. इस के अलावा, घटते जल स्तर के साथ मच्छरों की वापसी भी हो जाती है.

स्थिति से कैसे निबटें

बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए प्रशासनिक और व्यक्तिगत दोनों स्तर पर काम किया जाना चाहिए. प्रशासनिक स्तर पर जरूरी है कि प्राथमिक स्वास्थ्य की देखभाल और सेवाएं दुरुस्त रहें. स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों को सही प्रकार से प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे किसी भी खतरे की स्थिति में सक्रिय हो कर कारकों की पहचान व आकलन कर सकें और तत्काल उचित कार्यवाही कर सकें.

स्वच्छता और हाथ धोने के सही तरीकों के बारे में जनता को जागरूक किया जाना चाहिए. प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पीडि़तों को रोगों से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल, सफाई की सुविधाएं और जरूरत पड़ने पर शरण लेने के उपयुक्त ठिकाने मुहैया रहें.

बरतें सावधानी

कुछ सावधानियां हैं जिन का लोग खुद भी ध्यान रख सकते हैं, ताकि महामारी के प्रकोप से बचाव हो सके.

– बाढ़ के पानी में चलना नहीं चाहिए क्योंकि उस में मलमूत्र और कचरा मिला होता है.

– त्वचा पर कोई चोट या घाव हो तो उसे बाढ़ के पानी से बचा कर रखना चाहिए, वरना इन्फैक्शन हो सकता है. इस के अलावा ऐसे घावों को स्वच्छ जल से साफ  करें और पट्टी बांध कर रखें.

– यदि आप को बाढ़ के पानी या कीचड़ के संपर्क में आना ही पड़े या इस में डूबी चीजों को छूना पड़े तो साबुन और पानी से अपने हाथ धोने जरूरी हैं. शौचालय जाने के बाद भी हाथ धोएं. गंदे हाथों से भोजन न छुएं.

– जो भी खाद्य सामग्री या दवाइयां बाढ़ के पानी के संपर्क में आई हों, उन्हें फेंक दें, प्रयोग न करें. इन से आप को इन्फैक्शन हो सकता है.

– यदि आप के पास डब्बाबंद भोजन है तो डब्बे को अच्छी तरह से साफ कर के जल्द से जल्द इस सामग्री का प्रयोग कर लें.

– स्थानीय जल आपूर्ति में किसी भी संभावित प्रदूषण के बारे में पता कर लें. प्रयोग करने से पहले उस पानी को उबाल लें.

– वैक्टरजनित बीमारियों से बचने के लिए त्वचा पर मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाएं और सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें. सड़क पर कचरा न फेंकें, यह चूहों को आकर्षित कर सकता है.

दरअसल, प्राकृतिक शक्तियों को रोकना तो संभव नहीं है, लेकिन बाढ़ के रूप में आई प्राकृतिक आपदा के बाद रोगों को फैलने से रोकने के उपाय अवश्य किए जा सकते हैं. इस के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय एजेंसियों को संयुक्त प्रयास करने  की आवश्यकता है. नागरिकों को अपने स्तर पर भी जरूरी उपाय करने चाहिए ताकि वे अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के साथ दूसरे रोगों के होने वाले नुकसान को कम कर सकें.

डौलरों में खेलती अमेरिकन कामवालियां

अमेरिका सहित सारे पश्चिमी देशों में डिग्निटी औफ लेबर यानी श्रम की प्रतिष्ठा है. यहां किसी भी काम को छोटा नहीं माना जाता है. ज्यादातर काम मशीनों द्वारा संपन्न होते हैं. फिर भी कुछ काम ऐसे हैं जिन का हाथों द्वारा श्रम किए बिना संपन्न होना संभव नहीं है. ऐसे काम करने वालों की यहां अच्छी मांग है लेकिन ये महंगे बहुत हैं.

भारत में हमें महरी, धोबी, माली, कुक आदि आसानी से मिल जाते हैं. अमेरिका में ज्यादातर परिवारों में पतिपत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं. भारतीय परिवारों में भी यही स्थिति है. ऐसे लोगों को अपने घर की सफाई के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है. यहां हम कामवाली, जिसे मेड कहते हैं की चर्चा कर रहे हैं.

भारत की तरह रोज कामवाली को बुलाना यहां असंभव है. वर्षों पहले मैं पहली बार अमेरिका आई तो बड़ा अटपटा सा लगता था. बुढ़ापे में भी खाना खुद बनाना होता है. बरतन तो डिशवाशर में धुल कर सुखा दिए जाते हैं, पर मशीन में डालने के पहले उन्हें पानी से हाथों से साफ करना होता है. उसी तरह गंदे कपड़े वाशिंगमशीन में धुल जाते हैं और ड्रायर उन्हें पूरी तरह सुखा देता है. पर साधारण सूती कपड़ों का तो बुरा हाल हो जाता है ड्रायर में. यहां तक कि सिंथैटिक साडि़यों को इतनी बुरी तरह मरोड़ देता है कि उन्हें सीधा कर तह करना बड़ी बात है.

मैं यहां कैलिफोर्निया के सिलिकौन वैली, जो बे एरिया भी कहलाता है, आई थी. दुनिया की मशहूर सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां यहीं स्थित हैं. यहां आने पर मैं ने देखा बड़ीबड़ी गाडि़यों पर बड़ेबड़े अक्षरों में मेड लिखा होता और उस में एक या

2-4 लड़की या औरत होती थीं. उन की कार पर उन के फोन नंबर और ईमेल लिखे होते थे. मैं ने एक का नंबर नोट कर लिया था. मैं ने बेटे से कहा, ‘‘मैं बूढ़ी हो चली हूं, डोमैस्टिक हैल्प तो लेनी ही होगी.’’

बेटे ने कहा, ‘‘मैं उसे बुला कर काम के लिए बोल देता हूं. मगर ध्यान रहे ज्यादा से ज्यादा सप्ताह में एक दिन बुला सकता हूं और यह भी काफी महंगा है. आप खुद देख लेना.’’

बेटे ने आगे बताया, ‘‘यहां कामवालियां शनिवार और रविवार को नहीं आती हैं. वर्किंग डे में मुझे खुद उन से निबटना होगा.’’

अमेरिका में खासकर भारतीय घरों में अकसर कामवालियां आती हैं. कोई सप्ताह में 1 दिन तो कोई 2 सप्ताह मे 1 दिन बुलाता है.

वैसे, यहां धूल न के बराबर होती है, मकड़े के जाले भी बहुत कम पाए जाते हैं. ज्यादातर ऐसे काम मैक्सिको से आए लोग, जो ग्रीनकार्ड धारक हैं या अमेरिकन नागरिक बन चुके हैं, करते हैं. कुछ चीनी या वियतनामी भी यह काम करते हैं. इन से पहले से अपौइंटमैंट लेना होता है.

होती हैं पेशेवर

एक दिन मैं ने एक कामवाली को बुलाया. एक बड़ी गाड़ी में 3 महिलाएं आईं. तीनों मैक्सिकन थीं. उन में से एक जो 25-30 वर्ष के बीच में होगी अंगरेजी जानती थी. वही लीडर होगी. बाकी दोनों कम उम्र की लड़कियां थीं जो सिर्फ स्पैनिश ही समझती थीं. मुझे पूरा काम, जो अंगरेजी जानती थी, उसी को समझाना था. वही आपस में काम का बंटवारा करती थी.

मैं ने उस को पूरा काम बताया. किचन, बैडरूम, लिविंग, ड्राइंगरूम और बाथरूम की सफाई करनी है. साथ में, जितने फ्लोर्स और शीशे के दरवाजे व खिड़कियां हैं, उन की भी सफाई करनी होगी. उन की लीडर ने एक बार पूरा घर घूम कर देखा. घर डुप्लैक्स था, जो करीब 3,000 वर्ग फुट में था. फिर उस ने कहा कि यह काम हम तीनों मिल कर लगभग 3 घंटों में कर लेंगी. चूंकि मेरे यहां पहली बार आई थीं, सफाई का काम भी कुछ ज्यादा था. इस के लिए उन्होंने 250 डौलर्स मांगे. फिर कहा कि अगर प्रति सप्ताह बुलाएंगे तो उन्हें 100 डौलर्स देने होंगे और 2 सप्ताहों पर बुलाने पर 150 डौलर्स लगेंगे. ये कामवाली सफाई के काम आने वाले सभी सामान और उपकरण अपने साथ गाड़ी में ले कर चलती हैं- ब्रश, वैक्यूम क्लीनर और क्लीनिंग लिक्विड्स आदि.

मैं ने थोड़ा तोलमोल कर पहली बार के लिए 230 डौलर्स पर तैयार कर लिया और आगे से 2 सप्ताहों में एक बार आने पर 140 डौलर्स पर. मैं ने इन्हें रुपए में बदल कर देखा तो दंग रह गई.

इस के अतिरिक्त हमें सप्ताह में एक दिन माली को भी बुलाना होता है. यह काम भी ज्यादातर मैक्सिकन ही करते हैं. इस के लिए सप्ताह में 1 दिन, 2 आदमी आते हैं. ये भी बड़ी गाड़ी में सभी उपकरणों के साथ आते हैं और सिर्फ आधे घंटे में आगे के लौन और पीछे के बैकयार्ड की सफाई करते हैं. साथ में, बढ़ी हुई घास और पौधों की जरूरत पड़ने पर कटाईछंटाई करते हैं. इस के लिए ये 40 डौलर्स प्रति सप्ताह लेते हैं. अगर कोईर् बड़ा पेड़ काटना हो या कोई नया पौधा लगाना हो तो उस के लिए अतिरिक्त डौलर्स देने होते हैं.

दरअसल, मैं भारतीय मानसिकता की हूं. भारत में कामवाली से सुबहशाम दोनों वक्त झाड़ू, सफाई, बरतन, कपड़ों की धुलाई वगैरह कई काम कराए जाते हैं. इस के अलावा, भारत में कामवालियों को भुगतान बहुत कम ही किया जाता है. लेकिन अमेरिका में तो वे महीने में अच्छेखासे डौलर कमा लेती हैं.

प्रेम पर राजनीति का वार

भारतीय जनता पार्टी की लव जिहाद मुहिम देश की एकता के लिए खतरा होने के साथ युवाओं के अपने फैसले खुद करने पर धार्मिक अंकुश भी है. बाहर वालों को यह हक कभी नहीं मिल सकता  कि वे किसी लड़के, किसी लड़की को एकदूसरे के प्रेम में डूबने व विवाह के बंधन में बंधने से रोकें सिर्फ इसलिए कि वे अलग अलग धर्मों के हैं.

केरल में भारतीय जनता पार्टी इसे चुनावी मुद्दा बना कर युवाओं के प्राकृतिक हक को छीन रही है. गली में, बस में, ट्रेन में, क्लास में या दफ्तर में जब कोई किसी को चाहने लगे तो वे एकदूसरे की कुंडली थोड़े ही मांगेंगे. हां, पंडे तो चाहेंगे ही कि कोई विवाह उन की मरजी और उन को दानदक्षिणा दिए बिना न हो. पर प्रेम तो शक्ल, व्यवहार और लगाव के कारण होता है, कुंडलियों के आधार पर नहीं.

आजकल भारतीय जनता पार्टी लव जिहाद का नारा मुसलिमों के लिए लगा रही है तो क्या पता, कल हिंदू सिख, हिंदू, बौद्ध और फिर दलित, पिछड़े, पिछड़े ब्राह्मण प्रेमों पर हाथ मारने लगें. वैलेंटाइन डे पर घूम रहे जोड़ों से धर्मरक्षक जब मारपीट करते हैं तो उन का अर्थ यही होता है कि बिना पंडों की मंजूरी के लड़कालड़की हाथ में हाथ डाले क्यों घूम रहे हैं.

गौरक्षकों से विवाहरक्षक बने ये धर्मरक्षक हर तरह के हक अपने हाथ में लेने लगे हैं. लखनऊ में एक देवी, जो खुद को भाजपा की छोटीमोटी नेता बताती हैं, ने भरे बाजार में एक लड़की पर थप्पड़ों की बौछार कर दी कि वह एक अनजान मुसलिम लड़के से क्यों बतिया रही थी और फिर टैलीविजन पर खुद का जम कर गुणगान कर रही थी कि उस ने महान काम किया है. मोहन भागवत ने एक तरह से इन रक्षकों को अभयदान दिया है. गाएं बचें या नहीं, युवाओं के हक जरूर खतरे में हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने केरल उच्च न्यायालय को सही फटकार लगाई है. वहां उच्च न्यायालय ने 24 साला युवती के विवाह की जांच के लिए एक वकील को नियुक्त कर डाला. लव जिहाद को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश में कट्टरपंथियों का न्यायालयों का साथ मिलना बहुत ही दुखद है.

प्रेम विवाह देश की जरूरत हैं ताकि जाति और धर्म की खाइयां दूर हों और रीतिरिवाजों, दहेज, कन्याभू्रण हत्या जैसे मामले खत्म हों. 2017 में 1935 की हिटलरी वापस लाने के लिए की जा रही कोशिश युवाओं के मनमरजी के साथी चुनने के हक को छीनती है. यह हरगिज बरदाश्त नहीं होगा. सारी खुदाई एक तरफ, मनभायी सब तरफ का सिद्धांत अपनाना होगा.

‘इरफान अब तू नाचने गाने का काम करेगा’

इरफान खान बौलीवुड के मंझे हुए एक्टर्स में से एक हैं. इरफान खान ने अभिनय से हर बार अपने फैंस का दिल जीता है. ये इरफान की लगन और कड़ी मेहनत का ही नतीजा है कि उन्होंने ना सिर्फ बौलीवुड बल्कि हौलीवुड में भी पहचान बना ली है.

इरफान खान हौलीवुड इंड्रस्टी में भी काफी मशहूर एक्टर हैं. लेकिन इरफान का ये सफर हमेशा से इतना आसान नहीं था. क्या आप जानते हैं नेशनल स्कूल औफ ड्रामा (N.S.D) में पढ़ने के लिए जाते वक्त उनकी मां ने पूछा था कि क्या अब तू नाचने-गाने का काम करेगा? चलिए बताते हैं आखिर उस वक्त इरफान खान ने मां से क्या कहा था.

दरअसल इरफान खान ऐसे परिवार से हैं जहां फिल्में भी देखने से मना किया जाता था. ये बात हम नहीं बल्कि खुद इरफान खान ने एक टीवी शो ‘इसी का नाम जिंदगी’ में बताई थी. इरफान खान से शो की होस्ट एक्ट्रेस रवीना टंडन थीं.

रवीना ने इरफान से पूछा था कि आप फिल्मों में एक्टिंग तो करते हैं लेकिन हमने आपको कहीं गाना गाते या डांस करते हुए क्यों नहीं देखा. तब मजाकिया अंदाज में इरफान ने कहा कि डायरेक्टर्स ने कभी इतना विश्वास नहीं किया. इसके साथ ही इरफान ने डांस को लेकर अपनी मां के शब्दों को याद किया.

इरफान ने बताया कि जब नेशनल स्कूल औफ ड्रामा के लिए मेरा एडमिशन हो गया था तब मेरी मां ने मेरा हाथ पकड़कर कहा कि क्या अब तू ये नाच-गाने का काम करेगा जिंदगी में? तब मैंने अपनी मां से कहा कि आप प्लीज मुझपर भरोसा रखिए, मैं आपको कभी शर्मिंदा नहीं होने दूंगा और मैं नाचने-गाने के अलावा भी दूसरे काम करूंगा जो आपको अच्छा लगेगा. इरफान खान ने किया भी कुछ वैसा ही.

इरफान खान की दमदार एक्टिंग के कायल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हैं. इरफान हौलीवुड की कई फिल्मों में काम कर चुके हैं जिनमें ‘ए माइटी हार्ट’, ‘स्लमडौग मिलियनेयर’ और ‘द अमेजिंग स्पाइडर मैन’ फिल्में शामिल हैं. उन्‍हें तीन बार फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार और सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता के तौर पर फिल्‍म ‘पान सिंह तोमर’ के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिल चुका है. इरफान खान को पद्मश्री सम्‍मान से भी नवाजा जा चुका है.

सुष्मिता सेन ने टी-शर्ट उठाकर दिखाई बौडी

सुष्मिता सेन बौलीवुड इंडस्ट्री की उन अभिनेत्रियों में शुमार हैं, जिनपर बढ़ती उम्र का कोई भी असर नहीं पड़ा है. बौलीवुड की अदाकारा सुष्मिता 42 की उम्र में भी 20-25 साल की अभिनेत्रियों जितनी ही खूबसूरत, ग्लैमरस और हाट लगती हैं. उन्होंने फिल्मों को भले ही अलविदा क्यों न कह दिया हो, लेकिन आज भी वह अपनी फिटनेस के लिए मशहूर हैं.

सुष्मिता अक्सर ही अपनी फिट बाडी के चलते सुर्खियां बटोरती रहती हैं. लेकिन लगता है सुष्मिता अपनी इतनी फिटनेस से ही खुश होने वाली नहीं हैं तभी तो 42 की उम्र में उनपर 6 पैक ऐब्स बनने का भूत सवार हो गया और काफी हद तक वे इसमें सफल भी रही हैं.

हाल ही में सुष्मिता ने इंस्टाग्राम पर अपनी एक तस्वीर साझा की.

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इस तस्वीर में वह अपने ऐब्स दिखा रही हैं ऐब्स को बेहतर तरीके से दिखाने के लिए उन्होंने अपनी टी-शर्ट ऊपर चढ़ा रखी है. इसे पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि ऐब्स बनने का काम जारी है. सुष्मिता के मुताबिक, उन्होंने अपने 42वें जन्मदिन पर ऐब्स बनने का फैसला लिया था और इसे पूरा करने के लिए लगातार ट्रेनिंग ले रही हैं. तेजी से इंटरनेट पर वायरल हो रहे इस पोस्ट को उनके फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.

जैसे ही उन्होंने अपनी इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, लोगों ने उन्हें अलग-अलग तरह के रिएक्शन देने शुरू कर दिये. किसी ने उनकी तारीफ की, तो कुछ ने शादी के लिए प्रपोजल दे डाला.

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गौरतलब है कि, साल 1994 में सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी थीं, इस टाइटल से पहले सुष्मिता ने ऐश्वर्या राय को मिस इंडिया कान्टेस्ट में हराया था. सुष्मिता ने 1996 की फिल्म ‘दस्तक’ से बौलीवुड में कदम रखा था. उनकी चर्चित फिल्मों में ‘बीवी नंबर 1’, ‘मैंने प्यार क्यों किया’, ‘मैं हूं न’, ‘फिलहाल’, बंगाली फिल्म ‘निर्बाक’ आदि शामिल हैं.

संजीव कुमार की मौत के बाद रिलीज हुईं थी उनकी 10 फिल्में

बौलीवुड एक्टर संजीव कुमार की एक्टिंग के लोग आज भी दीवाने हैं. उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1960 में की थी. बौलीवुड में कई सारी फिल्मों में बेहतरीन अभिनय करने वाले संजीव कुमार का निधन 6 नवंबर 1985 को हुआ था. उनका असली नाम हरीहर जेठालाल जरीवाला था. उन्होंने 22 साल की उम्र में ही बड़े पर्दे पर ओल्ड मैन का किरदार निभाया था. उन्हें 1970 में फिल्म ‘खिलौना’ से पहचान मिली थी.

इसके बाद वह कई फिल्मों में नजर आए. उन्होंने 1973 में हेमा मालिनी को शादी के लिए प्रपोज किया था लेकिन हेमा ने उनके प्रपोजल को ठुकरा दिया था. हेमा के बाद उनका नाम एक्ट्रेस सुलक्षणा पंडित के साथ जुड़ा था लेकिन उन्होंने किसी से भी शादी नहीं की. उनको पहली बार 1976 में हार्ट अटैक आया था. इसके बाद 1985 में मेजर हार्ट अटैक आया जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई. उस वक्त वह केवल 47 साल के थे.

संजीव कुमार ने ‘शोले’ में ‘ठाकुर’ का रोल निभाया था. इसके अलावा वह ‘सीता और गीता’, ‘मनचली’, ‘आप की कसम’ में भी नजर आए थे. संजीव कपूर ने केवल बौलीवुड ही नहीं बल्कि तमिल, तेलुगु, सिंधी, मराठी, पंजाबी और गुजराती फिल्मों में भी काम किया है. वे 2 बार नेशनल अवौर्ड से सम्मानित किए जा चुके संजीव कुमार के जीवन में एक वक्त ऐसा आया जब अमिताभ, धर्मेंद्र जैसे स्टार्स भी इस सोच में पड़ जाते थे कि कहीं संजीव के साथ कोई सीन न करना पड़ जाए.

संजीव कुमार भले ही 1985 में सबको अलविदा कह गए हों लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनकी 10 फिल्में रिलीज हुईं थीं. उनकी आखिरी फिल्म 1993 में रिलीज हुई थी. यह फिल्म ‘प्रोफेसर की पड़ोसन’ थी. भले ही संजीव कुमार का करियर और जीवन छोटा रहा हो लेकिन अपने इस करियर में उन्होंने हर तरह के किरदार निभाए, हीरो से लेकर विलन तक, बड़े आदमी का रोल, या फिर कोई कौमेडी रोल. उन्होंने खुद की एक्टिंग के हर रंग को दिखाया.

क्लीवेज दिखाने पर ट्रोल हुईं अमीषा पटेल

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि बौलीवुड की जानीमानी अदाकारा अमीषा पटेल बहुत ही खूबसूरत हैं और उनका फिगर काफी अच्छा है.

अमीषा कई अवार्ड फंक्शन में तो दिखाई देती हैं लेकिन पिछले काफी समय से वे किसी फिल्म में अपनी अदाओं का जादू बिखेरती हुई नजर नहीं आई हैं. इसके बावजूद अमीषा के अभी कई ऐसे फैंस हैं जो आज भी उनकी अदाओं के कायल हैं.

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ऐसे में अपने फैंस से जुड़े रहने लिए अमीषा समय समय पर सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरत फोटो शेयर करती रहती हैं, जिसकी तारिफ करने से लोग कभी नहीं चुकते. लेकिन इसबार अमीषा को सोशल नेटवर्किंग अकाउंट इंस्टाग्राम पर अपनी कुछ तस्वीरें शेयर करना महंगा पड़ गया.

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जी हां, इस बार अमीषा ने जो फोटो शेयर की है उसमें उनका क्लीवेज साफ दिखाई दे रहा है. जिसकी वजह से इन तस्वीरों पर यूजर्स बहुत ही भद्दे कमेंट कर रहे हैं. आपको बता दें कि अमीषा पटेल इससे पहले भी अपने क्लीवेज को दिखाने को लेकर ट्रोल हो चुकी हैं.

अमीषा बहुत ही अच्छे से जानती हैं कि कैसे वे सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं, इसलिए उन्होंने सुबह के समय अपनी हाट तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं.

When u have a 7 am shoot and have been up by 5 .. already sleepy .. need some caffeine 🙈🙈🙈🙈

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इन तस्वीरों में अमीषा अपने फिट शरीर को दिखा रही हैं. काले रंग के जंपसूट में वह बहुत ही शानदार दिखाई दे रही हैं. अमीषा ने अपनी इस फोटो को इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए लिखा जब आपका सुबह 7 बजे शूट होता है तो आपको 5 बजे ही उठ जाना होता है, पर मुझे बहुत नींद आ रही है, मुझे थोड़ी कैफीन की जरुरत है.

7 am shift .. shoot time .. someone give me some caffeine boost ..🙈🙈

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इसके बाद अमीषा ने अपनी एक और हाट फोटो शेयर करते हुए लिखा सुबह 7 बजे की शिफ्ट, शूट का समय, कोई मुझे जगने के लिए कैफीन दे दो.

अमीषा द्वारा इन तस्वीरों को पोस्ट करने के बाद इस्टाग्राम यूजर्स ने अपनी प्रतिक्रियाएं देते हुए उन्हें ट्रोल करना शुरु कर दिया.

कई यूजर्स ने बहुत ही गंदे कमेंट किए तो कई लोगों ने अमीषा की तारीफ भी की. कई यूजर्स ने अमीषा को ये भी कहा कि आपकी उम्र बहुत हो गई है तो आज के समय की हिरोइनों के साथ खुद को कापी करने की कोशिश ना करने का सुझाव भी दिया. कुछ ने कहा आपकी उम्र हो चली है अब इस तरह का फोटो आपको शोभा नहीं देता.

खैर अमीषा को यूजर्स के इन कमेंट्स का कोई फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने चुपचाप यूजर्स को मुंहतोड़ जवाब देते हुए अपनी कुछ और फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर कीं.

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आपको बता दें कि काफी समय से बिग स्क्रीन से दूर अमीषा पटेल एक बार फिर से पर्दे पर लौंटने की तैयारी कर चुकी हैं. अमीषा बहुत ही जल्द सनी देओल, प्रीति जिंटा के साथ एक्शन कामेडी फिल्म भैयाजी सुपरहिट में अपनी अदाओं को जलवा बिखेरती नजर आने वाली हैं.

खुद को जवान समझता हूं : मिथुन चक्रवर्ती

फिल्म ‘डिस्को डांसर’ से फिल्म इंडस्ट्री में एक नई डांस फौर्म ‘डिस्को और देशी का मेल’  से जवां दिलों पर राज करने वाले सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती निर्माता, सिंगर, सोशल वर्कर, उद्यमी और राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं. उन्होंने फिल्म ‘मृगया’ से अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत की थी. वे पश्चिम बंगाल के एक मशहूर हीरो हैं, जहां वे ‘मिथुन दा’ के नाम से जाने जाते हैं. उन्होंने 350 से ज्यादा फिल्में की हैं, जिन में बंगला, उडि़या, भोजपुरी, तेलुगु और पंजाबी भाषा की फिल्में शामिल हैं. मार्शल आर्ट में ‘ब्लैक बेल्ट’ होने की वजह से उन्होंने ऐक्शन फिल्मों में काफी अच्छा काम किया है. वे हमेशा आगे आने वाले काम पर ज्यादा ध्यान देते हैं, इसलिए हमेशा खुश रहते हैं.

इन दिनों वे सोनी टैलीविजन पर ‘द ड्रामा कंपनी’ में बतौर जज का किरदार निभा रहे हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

आप ने फिल्मों में हर तरह के किरदार निभाए हैं, कभी ऐसा लगा कि अब भी कुछ बाकी है?

कौमेडी मैं ने नहीं की थी, यही छूट गया था. अब मैं कर रहा हूं. कौमेडी में काम करने का मौका नहीं मिला था, लेकिन मेरी इच्छा थी.

एक कलाकार कभी भी अपने काम से संतुष्ट नहीं हो सकता, उसे हर समय नया करने की इच्छा होती है. जब इस शो का औफर आया, तो मैं ने हां कह दी. अभी थोड़ा नर्वस हूं. मेरे साथी कलाकारों ने काफी काम किया है, इसलिए मैं ज्यादा मेहनत कर रहा हूं.

उम्र के इस पड़ाव में टैलीविजन पर काम करने की इच्छा कैसे हुई?

मुझे कभी लगा नहीं कि मेरी उम्र हो गई है. मैं तो अभी भी अपनेआप को नौजवान ही समझता हूं और बहुत सारे काम करने की इच्छा रखता हूं.

टैलीविजन को कभी भी कम नहीं समझना चाहिए. आज मैं जो कुछ भी हूं, इस में टैलीविजन का बहुत बड़ा योगदान है. कई रिऐलिटी शो ने मुझे लोगों के घरघर तक पहुंचाया. ‘जैनरेशन गैप’ को टैलीविजन ने ही कम किया है.

टैलीविजन पर किसी का दिल जीतना आसान नहीं होता. काम के साथसाथ लोग इसे देखते हैं, ऐसे में उन्हें टैलीविजन से जोड़े रखना कलाकारों के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है.

इतने सालों में फिल्म इंडस्ट्री में क्या क्या बदलाव आप पाते हैं? क्या पुराने दिनों को याद करते हैं?

फिल्मों का बनना अब पूरी तरह से बदल चुका है. आज की तकनीक पहले से काफी अलग है. विचारों में भी बदलाव आया है. अभी वन लाइनर का जमाना है. पहले

3 या साढ़े 3 घंटे की फिल्में बनती थीं, अब छोटी फिल्में बनती हैं, क्योंकि किसी के पास बड़ी फिल्म देखने का समय नहीं है. आधे से ज्यादा लोग तो स्मार्टफोन और ह्वाट्सऐप पर लगे हुए हैं. काफी सारा समय लोगों का उस पर ही चला जाता है.

पुराने दिनों को ज्यादा याद नहीं करता, क्योंकि उस में कुछ अच्छे तो कुछ खराब भी थे. ज्यादा याद करूंगा, तो दुखी हो जाऊंगा.

इतने दिनों तक ऐक्टिंग से दूर रहने की वजह क्या रही?

काम न मिलने की वजह से नहीं, बल्कि मुझे जबरन दूर रहना पड़ा, क्योंकि मैं शारीरिक रूप से फिट नहीं था. अभी मुझे शरीर का ध्यान रखते हुए अच्छा काम करना है.

मैं इंडस्ट्री से न तो कहीं गया हूं और न ही इंडस्ट्री ने मुझे छोड़ा है. मुझे औफर मिलते थे, पर मैं काम नहीं कर पाया.

आप अपने फिल्मी सफर को कैसे देखते हैं?

मुझे लगा नहीं था कि मेरी फिल्म ‘डिस्को डांस’ इतनी महशूर हो जाएगी. सभी ने इसे एक डांस फौर्म बना दिया है. मैं ने सोचा नहीं था, यह होगा. प्लान कर के कई बार कुछ नहीं होता, लेकिन एक स्टाइल कभीकभी अच्छी लग जाती है और सब के दिलों में घर कर लेती है. यही मेरे साथ हुआ. उसी से मुझे कामयाबी मिली और मैं यहां तक पहुंच पाया. मैं खुश हूं कि मेरा सफर सही था और आज भी चल रहा है.

आप किस कौमेडियन को सब से ज्यादा देखना पसंद करते हैं?

चार्ली चैपलिन, लारेन ऐंड हार्डी, जानी वाकर, जगदीप, जौनी लीवर वगैरह सभी की कौमेडी मुझे बहुत पसंद है. आज के कौमेडियन में कपिल शर्मा की कौमेडी बहुत अच्छी है. कौमेडी में सही टाइमिंग और सही सैंस का होना बहुत जरूरी है.

क्या टैलीविजन में फिल्मों से ज्यादा समय देना पड़ता है?

मेरे हिसाब से नहीं, फिल्म भी समय से पैकअप नहीं कर पाती. टैलीविजन में तो पहले से ही समय तय होता है और उसी में वह पूरा हो जाता है. मुझे मुश्किल नहीं लगता. कभीकभी लगता है कि समय ज्यादा है, लेकिन मैं अपने काम के प्रति हमेशा ईमानदार रहता हूं.

आप कौन कौन सी फिल्में कर रहे हैं?

मैं फिल्म डायरैक्टर रामगोपाल वर्मा की ‘गहर’, अनिल शर्मा की ‘जीनियस’, अनूप जलोटा की फिल्म ‘साहस’ और एक कन्नड़ फिल्म भी करने वाला हूं.

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