हादसों पर सरकारी रवैया क्या कभी बदलेगा

मुंबई के एलफिंस्टन रोड स्टेशन पर मची भगदड़ में जिन 24-25 लोगों की मौतें हुई हैं उन पर सरकार घडि़याली आंसू चाहे बहा ले पर सरकार का रवैया बदलेगा, यह न सोचना. उपहार सिनेमा दिल्ली या इमामी अस्पताल कोलकाता में आग से हुई मौतों के लिए मालिकों को जेल भेजा गया था पर चिंता न करें, उत्तर प्रदेश के अस्पताल में बच्चों की मौतें हों, रेलों की दुर्घटनाओं में लोग मरें या भगदड़ में मौतें हों, हमारे नेता ही नहीं, अफसर और बाबू से ले कर निचले स्तर तक के कर्मचारी भी सुरक्षित हैं.

मुंबई के इस स्टेशन पर ही नहीं, हर स्टेशन पर अचानक कब भारी भीड़ जमा हो जाए और भगदड़ की नौबत आ जाए, कहा नहीं जा सकता. मुंबई की रक्त नलिकाएं लोकल व बाहरी ट्रेनें लाखों यात्रियों को इधर से उधर ले जाती हैं ताकि वे इस गंदे, बदबूदार, विशाल और पैसों से भरे शहर में रोजी कमा सकें.

रेलों को लोकल ट्रेनों से नुकसान होता है और इसलिए यात्रियों की सुविधाओं की ओर सुरक्षा की देखभाल कम ही की जाती है. रेल कर्मचारियों के लिए हर यात्री एक आफत है और उस से सहानुभूति किसी को नहीं है. वह रेलों का याचक है, ग्राहक नहीं.

जिसे सरकार दान में कुछ दे रही है वह भीड़ में कुचल जाए तो सरकार का क्या जाता है, यह मानसिकता रेल अधिकारियों के मन में कूटकूट कर भरी है. बुलेट ट्रेन की कल्पना कर 5,000 रुपए के टिकट बेचने वाले मंत्री प्रधानमंत्री 12 रुपए के टिकट खरीदने वाले की चिंता क्यों करने लगें.

निजी क्षेत्र की टैक्सियों, बसों, आटो पर सरकार आएदिन नियंत्रण लगाती है पर रेलों पर कौन ध्यान देता है? किस परिवहन अधिकारी की हिम्मत है कि रेल का चालान काट दे, रेल को सुरक्षित न मान कर, बंद कर दे? रीजनल ट्रांसपोर्ट औफिसर के दफ्तर के आगे सैकड़ों गाडि़यों, टैक्सियों, आटो की लाइनें परमिटों के लिए लगी रहती हैं पर रेल वालों को कहीं, किसी का प्रमाणपत्र नहीं लेना पड़ता.

ऐसा नहीं है कि परमिट, लाइसैंस होने से काम अच्छा होने लगता है क्योंकि ये सुरक्षा की नजर से नहीं, वसूली की नजर से बनाए गए हैं. रेलों को अगर इसी व्यवस्था के अंतर्गत लाया गया तो सरकार को पता चलेगा कि निजी सैक्टर क्या भुगतता है.

बस में दुर्घटना होने पर बसमालिक, ड्राइवर, कंडक्टर सब को महीनों जेल में सड़ना होता है, बस जब्त हो जाती है, उस पर जंग लग जाता है. रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री पीयूष गोयल ठाठ से एयरकंडीशंड कमरे में बैठ कर बतियाते नजर आ रहे थे. अगर उन के साथ बैठे किसी अफसर के चेहरे पर चिंता व दुख की लकीरें देख लो, तो इनाम मिल सकता है.

रेल दुर्घटना में मरे लोग असल में नियति के कारण मरे हैं. उन का जीवन ही इतना था, यह पहले से लिखा था. उन का भाग्य ऐसा था कि रेल कर्मचारियों की लापरवाही के कारण उन्हें कुचल कर मरना है. जब दोषी भगवान है तो तुच्छ मानव को दंड क्यों दें? रेल कर्मचारी तो अपने निकम्मेपन से भगवान का काम कर रहे हैं.

कभी शिवसेना  में रहे मगर अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सर्वेसर्वा राज ठाकरे ने पहली बार सही बात कही है कि वे मुंबई में नरेंद्र मोदी की बुलेट ट्रेन योजना की एक ईंट भी नहीं रखने देंगे.

पुलिस के सामने काम न आईं शिखा की अदाएं

मुंबई के बारे में कहावत है कि यह शहर कभी नहीं सोता. दिन हो या रात, लोग अपने कामों मे लगे रहते हैं. लोग भी लाखों और काम भी लाखों. लेकिन एक सच यह भी है कि मुंबई दिन के बजाय रात की बांहों में ज्यादा हसीन हो जाती है. इस की वजह यह है कि ज्यादातर फिल्मों, सीरियल्स की शूटिंग तो रात में होती ही है, यहां के होटल, रेस्तरां और पब भी रात को खुले रहते हैं.

इस के अलावा  फिल्मी और टीवी के सितारों तथा बडे़ लोगों की पार्टियां भी रात को ही होती हैं. बड़ीबड़ी पार्टियां हों या शूटिंग, उन में ग्लैमर न हो, ऐसा नहीं हो सकता. मध्यमवर्गीय लोगों के लिए पब हैं, जहां नाचगाने और शराब के साथ ग्लैमर भी होता है. यही वजह है कि मुंबई के लाखोंलाख लोग सुबह नहीं, बल्कि शाम का इंतजार करते हैं.

मुंबई की हर शाम समुद्र की लहरों को चूम कर धीरेधीरे रात की बांहों में सिमटने लगती है और समुद्र ढलती शाम का मृदुरस पी कर जवान होती रात में मादकता भर देता है. 14 मई, 2017 की रात का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस रात मुंबई के एक मशहूर होटल के पब में एक पार्टी चल रही थी. गीतसंगीत ऐसी पार्टियों की जान होता है. ऐसी पार्टियों में फोनोग्राम रिकौर्ड्स पर म्यूजिक प्ले करने वालों को डिस्को जौकी यानी डीजे कहा जाता है. ये लोग संगीत की धड़कन होते हैं.

विभिन्न संगीत उपकरणों माइक्रोफोन, सिंथेसाइजर्स, इक्वलाइजर्स, सिक्वेंसर, कंट्रोलर व इलेक्ट्रौनिक म्यूजिक की-बोर्ड्स व डीजे म्यूजिक सौफ्टवेयर की मदद से ऐसी पार्टियों में गीतसंगीत का ऐसा समां बंध जाता है कि डांस फ्लोर पर युवाओं के हाथपैर ही नहीं, पूरा शरीर थिरकने लगता है. डांस फ्लोर पर हिपहौप, रागे, सनरौक, यूनिक फ्यूजन की आवाजें आती रहती हैं. मुंबई में डीजे अनुबंध के आधार पर अपना प्रोग्राम करते हैं.

मुंबई के होटलरेस्त्रां ने अपने पब में गीतसंगीत की हसीन शाम सजाने के लिए विभिन्न डीजे से अनुबंध किए हैं. मायानगरी में ऐसे डीजे की तादाद सैकड़ों में होगी, लेकिन इन में 20-30 डीजे ही ऐसे हैं, जिन की वजह से होटलरेस्त्रां के पब म्यूजिकल ईवनिंग के नाम पर हसीन और जवान होते हैं. डीजे के इस पेशे में अधिकांश महिलाएं हैं.

डिस्को जौकी की भीड़ में डीजे अदा ने कुछ ही महीनों में अपनी धाक जमा ली थी. वह मुंबई के युवा वर्ग में संगीत की धड़कन के रूप में उभर कर सामने आई थी. अदा अनुबंध के आधार पर अलगअलग होटलों और रेस्त्राओं के पब में प्रोग्राम करती थी. उस के लाइव कंसर्ट में डांस फ्लोर पर युवा झूम उठते थे. पुराने फिल्मी गीतों से ले कर क्लासिकल, रीमिक्स व वेस्टर्न संगीत में डीजे अदा ने महारथ हासिल कर ली थी. उस ने अपनी अदाओं से हजारों फैंस बना लिए थे, जो संगीत से ज्यादा उस के दीवाने थे.

डीजे अदा के कार्यक्रम में अभी कुछ देर बाकी थे, लेकिन डांस फ्लोर पर संगीत व डांस प्रेमी जुटना शुरू हो गए थे. संगीत प्रेमियों की इस भीड़ में जयपुर से आए कुछ युवाओं की टोली भी शामिल थी. जयपुर की इस टोली के युवा डांस फ्लोर पर अलगअलग हिस्सों पर खड़े हो कर आनेजाने वाले पर नजर रखे हुए थे.

इस टोली की महिला सदस्य डांस फ्लोर पर आगे की ओर उस जगह खड़ी थीं, जहां म्यूजिक उपकरण लगे हुए थे. यह टोली भी दूसरे संगीत प्रेमियों की तरह डीजे अदा का इंतजार कर रही थी. हालांकि इस टोली के सदस्यों ने डीजे अदा को ना तो पहले कभी किसी प्रोग्राम में देखा था ना ही कहीं और. इस टोली के सदस्यों के पास डीजे अदा की फोटो मोबाइलों में सेव थी. इसी फोटो के आधार पर वे अदा को पहचान सकते थे.

खैर, इंतजार खत्म हुआ. पब में डीजे के साथी कलाकारों ने अपने उपकरण बजा कर लाइव कंसर्ट की तैयारी शुरू की. इस का मतलब था कि डीजे अदा अब परफौरमेंस देने के लिए फ्लोर पर आने वाली थी. म्यूजिकल ड्रम की तेज आवाजों के बीच हैडफोन लगाए हुए डीजे अदा फ्लोर पर आई और अपना दायां हाथ मिला कर दर्शकों से हैलो कहा. इसी के साथ तेज म्यूजिक बजने लगा और डीजे अदा अपनी अदाओं पर संगीत प्रेमियों के साथ थिरकने लगी. अदा को देख कर जहां कुछ युवा उस की खूबसूरती पर आहें भरने लगे, वहीं संगीत प्रेमी अपनी फरमाइशें करने लगे.

जयपुर की टोली ने अपने मोबाइल में सेव डीजे अदा का फोटो देख कर यह निश्चित कर लिया कि वे सही ठिकाने पर आए हैं. अदा का प्रोग्राम जैसेजैसे आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे डांस फ्लोर पर जयपुर की टोली का शिकंजा कसता चला गया.

करीब डेढ़, दो घंटे बाद जब अदा का प्रोग्राम खत्म हुआ तो उस ने होंठों पर अपनी हथेली ले जा कर हवा में प्यार बिखेरते हुए श्रोताओं को गुडनाइट कहा. जब वह डांस फ्लोर से जाने लगी, तभी जयपुर की टोली ने उसे चारों ओर से घेर लिया. उस टोली में महिलाएं भी थीं.

एकाएक इस तरह कुछ लोगों के घेरे जाने से अदा ने समझा कि वे लोग संभवत: संगीत के रसिया होंगे, जो उस के प्रोग्राम को देख कर खुश हुए होंगे और उसे धन्यवाद कहने आए होंगे या किसी पार्टी में डीजे के लिए बात करने आए होंगे.

अदा की उम्मीद के विपरीत उस टोली में  से एक जवान ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘शिखा…शिखा तिवाड़ी, तुम्हारा खेल खत्म हो गया है.’’

इस के साथ ही उस जवान के साथ खड़ी महिला ने डीजे अदा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘शिखा हम लोग जयपुर के एसओजी (स्पेशल औपरेशन ग्रुप) के लोग हैं. तुम यहां कोई तमाशा खड़ा मत करना, वरना तुम्हारी पोल खुल जाएगी और जो लोग अब तक तुम्हारी अदाओं पर थिरक रहे थे, वे तुम पर थूकेंगे.’’

अदा उर्फ शिखा तिवाड़ी समझ गई कि जिस एसओजी से बचने के लिए वह जयपुर से भाग कर मुंबई आई थी, वह अब उसे छोड़ने वाली नहीं है. उस ने कोई विरोध नहीं किया. वह चुपचाप जयपुर से आई एसओजी टीम के अफसरों के साथ चल दी.

जयपुर की एसओजी टीम ने मुंबई के संबंधित पुलिस अधिकारियों को मामले की जानकारी दी और शिखा को पकड़ कर ले जाने की बात बताई. यह बात इसी साल 14 मई की रात की है.

दरअसल, मई के पहले सप्ताह में राजस्थान की एसओजी के आईजी दिनेश एम.एन को सूचना मिली थी कि दुष्कर्म के झूठे मुकदमे दर्ज कराने की धमकी दे कर लोगों से करोड़ों रुपए ऐंठने वाले हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह की सदस्या शिखा तिवाड़ी उर्फ अंकिता उर्फ डीजे अदा आजकल मुंबई में है. मुंबई में वह बड़े होटलरेस्त्राओं में डिस्को जौकी (डीजे) का काम करते हुए लाइव कंसर्ट देती है.

जयपुर में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह का खुलासा होने के बाद शिखा तिवाड़ी दिसंबर, 2016 में फरार हो गई थी. एसओजी लगातार उस की तलाश कर रही थी. लेकिन उस का कोई पता नहीं चल रहा था. एक दिन एसओजी के आईजी दिनेश एम.एन. को फेसबुक के माध्यम से पता चला कि शिखा तिवाड़ी ने आजकल डीजे अदा के नाम से मुंबई में अपना म्यूजिकल ग्रुप बना रखा है. वह डीजे अदा के नाम से ही मुंबई में रह रही है.

एसओजी को डीजे अदा की ओर से फेसबुक पर पोस्ट की गई उस की लाइव कंसर्ट की फोटो भी मिल गई. इन फोटो से तय हो गया कि शिखा तिवाड़ी ही डीजे अदा है. इस के बाद आईजी ने डीजे अदा की तलाश में जयपुर से अपने तेजतर्रार मातहतों की एक टीम मुंबई भेजी. इस टीम ने कई होटलरेस्त्राओं में पूछताछ के बाद पता लगाया कि डीजे अदा कहांकहां प्रोग्राम करती है. इस के बाद जयपुर से गई एसओजी की टीम ने 14 मई की रात मुंबई से अदा उर्फ शिखा तिवाड़ी को पकड़ लिया.

शिखा तिवाड़ी को एसओजी की टीम जयपुर ले आई. शिखा से की गई पूछताछ और दिसंबर, 2016 में जयपुर में उजागर हुए हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह की जांचपड़ताल के बाद जो कहानी उभर कर सामने आई, वइ इस तरह थी—

दिसंबर 2016 में एसओजी को हत्या के एक मामले में गिरफ्तार आरोपी से पूछताछ में पता चला था कि जयपुर में एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करता है. इस गिरोह में कुछ वकील, पुलिस वाले, प्रौपर्टी व्यवसाई और फर्जी पत्रकार शामिल हैं. यह गिरोह खूबसूरत युवतियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है.

इस गिरोह के लोग पहले रईस लोगों को चिह्नित करते हैं, फिर उन्हें फांसने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से कराते हैं. इस दोस्ती के लिए ये लोग फार्महाउस पर सेलीब्रेशन के नाम पर पार्टियां आयोजित करते हैं. इन छोटी पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर भी चलता है. गिरोह की लड़कियां इन पार्टियों में अपना मोबाइल नंबर दे कर अपने शिकार का नंबर लेती हैं. इस के बाद उन का मुलाकातों का दौर शुरू होता है.

जल्दीजल्दी की कुछ मुलाकातों में ये युवतियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस तरह बांध लेती हैं कि वह उस के साथ हमबिस्तर होने के लिए तड़पने लगते हैं.

शिकार को तड़पा कर ये युवतियां हमबिस्तर होने का कार्यक्रम तय करती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी जाती हैं. रईसों के साथ हमबिस्तर होते समय गिरोह के सदस्य युवती की मदद से या तो गुप्त कैमरे से या मोबाइल से क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं होते तो युवतियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं. इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. सब से पहले युवतियां अपने उस रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करने की धमकी देती हैं.

अधिकांश मामलों में युवतियां पुलिस में शिकायत दे भी देती हैं. इस के बाद फर्जी पत्रकार व वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं. रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-20 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग उस शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर शिकार बने व्यक्ति को सौदा करना पड़ता है.

यह गिरोह खासतौर से जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों व बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल-रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता है. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

ये लोग गिरोह की युवती को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेजते हैं और उसे फंसा लेते हैं. इसी तरह लड़कियों को होटल और रिसौर्ट संचालकों के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है. डाक्टर के पास इलाज कराने के बहाने युवतियों को भेजा जाता था. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर दे देते थे कि दुष्कर्म नहीं हुआ था.

शिखा तिवाड़ी जयपुर में गुरु की गली, सीताराम बाजार, ब्रह्मपुरी के रहने वाले आदित्य प्रकाश तिवाड़ी की बेटी थी. हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह के सदस्य अक्सर डिस्को बार में जाते थे. वहीं शिखा की मुलाकात अक्षत शर्मा से हुई. अक्षत ने शिखा को अपने गिरोह में शामिल कर लिया. इस गिरोह ने जयपुर के वैशालीनगर में मेडिस्पा नाम से हेयर ट्रांसप्लांट क्लीनिक चलाने वाले डा. सुनीत सोनी को अपने शिकार के रूप में चिह्नित किया. योजनाबद्ध तरीके से शिखा तिवाड़ी को हेयर ट्रीटमेंट कराने के बहाने डा. सुनीत सोनी के पास उन के क्लीनिक पर भेजा गया.

अप्रैल, 2016 में 2-4 बार इलाज के नाम  पर आनेजाने के दौरान शिखा ने डा. सोनी को अपने रूप के जाल फांस लिया. एक दिन उस ने डा. सोनी को बताया कि वह डिप्रेशन में आ गई है. शिखा ने डा. सोनी से कहा कि वह पुष्कर जा कर 2-4 दिन घूमना चाहती है, ताकि डिप्रेशन से बाहर आ सके. शिखा ने डाक्टर से कहा कि वह डिप्रेशन की स्थिति में अकेली पुष्कर नहीं जाना चाहती. जबकि साथ जाने के लिए कोई नहीं है. उस ने डा. सोनी पर घूमने के लिए पुष्कर चलने का दबाव डाला.

डा. सोनी जाना तो नहीं चाहते थे, लेकिन अपने डाक्टरी पेशे में पेशेंट की भावनाओं का खयाल रखते हुए वह शिखा के साथ पुष्कर घूमने जाने को तैयार हो गए. डा. सोनी के तैयार हो जाने के बाद शिखा ने गिरोह के सरगना की सलाह पर डा. सुनीत सोनी से पुष्कर के एक रिसौर्ट में कमरा बुक करवा लिया. तय कार्यक्रम के अनुसार, शिखा व डा. सोनी कार से पुष्कर चले गए. डा. सोनी शिखा को पुष्कर के रिसौर्ट में छोड़ कर उसी शाम जयपुर लौट आए. उन के जयपुर लौट जाने से शिखा को अपना मकसद पूरा होता नजर नहीं आया.

शिखा ने डा. सोनी को बारबार फोन कर बताया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मैं डिप्रेशन में हूं. यहां अकेली रहूंगी तो कुछ भी हो सकता है. शिखा ने डाक्टर को इस तरह छोड़ कर चले जाने पर कई तरह के उलाहने भी दिए, साथ ही कहा भी कि अभी पुष्कर आ कर उसे वापस ले चले.

शिखा के उलाहनों से तंग आ कर डा. सोनी उसी रात अपनी गाड़ी ले कर पुष्कर गए. वहां रिसौर्ट के कमरे में ठहरी शिखा ने डा. सोनी पर ऐसा जादू चलाया कि वह रात को उसी के कमरे में ठहर गए. इस के अगले दिन डा. सोनी जयपुर आ गए.

2 दिन बाद अक्षत शर्मा व विजय उर्फ सोनू शर्मा डा. सुनीत सोनी के पास पहुंचे. दोनों ने खुद को मीडियाकर्मी बताया और टीवी चैनलों पर खबर चलाने की धमकी दी. उन्होंने शिखा से उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर एक करोड़ रुपए मांगे. लेकिन डा. सोनी ने उन्हें रुपए देने से इनकार कर दिया. इस पर गिरोह के सरगना वकीलों ने शिखा से डा. सुनीत सोनी के खिलाफ अजमेर जिले के पुष्कर थाने में भादंसं की धारा 376 के अंतर्गत बलात्कार का मुकदमा दर्ज करवा दिया.

पुष्कर थाना पुलिस ने इस मामले में डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद गिरोह ने शिखा से समझौता करने के नाम पर डा. सोनी के पिता व भाई से एक करोड़ रुपए वसूल लिए. रकम लेने के बाद गिरोह के सदस्यों ने अदालत में शिखा के बयान बदलवा दिए. डा. सुनीत सोनी को बलात्कार के इस झूठे मुकदमे में 78 दिनों तक जेल में रहना पड़ा. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के वैशालीनगर थाने में लिखित शिकायत भी दी थी, लेकिन पुलिस  ने उस समय कुछ नहीं किया था.

बाद में जब एसओजी को जयपुर में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह के सक्रिय होने की जानकारी मिली तो इस गिरोह से पीडि़त डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में लिखित शिकायत दी. डा. सोनी की शिकायत पर जांचपड़ताल के बाद एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने उस दिन सब से पहले 2 लोगों को गिरफ्तार किया. गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में ही एसओजी को गिरोह में शामिल युवतियों के बारे में पता चला. इन में शिखा तिवाड़ी के अलावा एनआरआई युवती रवनीत कौर उर्फ रूबी, उत्तराखंड की युवती कल्पना और अजमेर की आकांक्षा आदि के नाम सामने आए.

गिरोह की पकड़धकड़ शुरू होेने पर शिखा तिवाड़ी जयपुर से भाग कर मुंबई चली गई. मुंबई में वह डीजे अदा के नाम से म्यूजिकल ग्रुप बना कर होटल, नाइट क्लब व बार में प्रोग्राम करने लगी. मुंबई पहुंच कर उस ने अपने पुराने मोबाइल नंबर बंद कर दिए थे और फेसबुक आईडी भी बदल ली थी.

मुंबई में वह अपने बौयफ्रैंड के साथ लोखंडवाला बैंक रोड, अंधेरी (वेस्ट) की एक बिल्डिंग में किराए के फ्लैट में रहती थी. मुंबई में रहते हुए उस के बौयफ्रैंड के इवेंट मैनेजर दोस्त ने शिखा से यह कह कर ढाई लाख रुपए ऐंठ लिए थे कि जयपुर में पुलिस अफसरों से उस की सेटिंग है, वह उस का नाम ब्लैकमेलिंग मामले में नहीं आने देगा.

बाद में जब शिखा को पता चला कि उस का नाम एसओजी थाने में दर्ज मुकदमे में है तो उस ने उस इवेंट मैनेजर से संपर्क किया. इस के बाद इवेंट मैनेजर भूमिगत हो गया. हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह ने शिखा तिवाड़ी को डा. सुनीत सोनी को ब्लैकमेल करने के लिए पहले 10 लाख रुपए दिए थे, लेकिन बाद में उस से 5 लाख रुपए वापस ले लिए थे. बाकी रकम गिरोह के सदस्यों ने आपस में बांट ली थी.

गिरोह के पुरुष सदस्यों के अलावा महिला सदस्यों में सब से पहले एसओजी के हाथ कल्पना लगी. इस के बाद एनआरआई युवती रवनीत कौर उर्फ रूबी भी एसओजी की गिरफ्त में आ गई. शिखा तिवाड़ी उर्फ डीजे अदा की मुंबई से हुई गिरफ्तारी के समय तक हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले 4 गिरोहों के 32 अभियुक्तों को एसओजी गिरफ्तार कर चुकी थी. इन में कई वकील, फर्जी पत्रकार, पुलिसकर्मी व बिचौलिए भी शामिल थे.

शिखा के पकड़े जाने के बाद उस से पूछताछ में ब्लैकमेलिंग गिरोह की एक और महिला सदस्य आकांक्षा का पता चला. एसओजी ने 16 मई को अजमेर के क्रिश्चियन गंज, माली मोहल्ला की रहने वाली 25 वर्षीया आकांक्षा को गिरफ्तार कर लिया. एसओजी के एसपी संजय श्रोत्रिय का कहना है कि आकांक्षा ब्लैकमेलिंग की कई वारदातों में शामिल रही है.

आकांक्षा ने जयपुर से एमबीए की पढ़ाई की थी. एमबीए की पढ़ाई के दौरान वह जयपुर में सिरसी रोड पर एक अपार्टमेंट में रहने लगी थी, तभी उस की पहचान अक्षत शर्मा से हुई थी. अक्षत ब्लैकमेलिंग के मामलों में आकांक्षा का भी सहयोग लेता था. अक्षत शर्मा पहले ही गिरफ्तार हो चुका था. अक्षत ने अपने साथियों की मदद से एक सैन्यकर्मी के फ्लैट पर भी कब्जा कर लिया था. करणी विहार में सिरसी रोड पर स्थित एक फ्लैट का सौदा 45 लाख रुपए में हुआ था, लेकिन अक्षत ने केवल 5 लाख रुपए दे कर अपने साथियों की मदद से उस फ्लैट पर कब्जा कर लिया था.

शिखा व आकांक्षा की गिरफ्तारी के बाद एसओजी ने अक्षत के सामने दोनों को बैठा कर पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि अक्षत व आकांक्षा ने करीब 20 लोगों को अपने जाल में फंसा कर ब्लैकमेल किया था. अक्षत ही आकांक्षा का खर्चा उठाता था. अक्षत ने आकांक्षा को एक फ्लैट व कार गिफ्ट की थी. एसओजी थाने में अक्षत के खिलाफ पांचवां मामला सैन्यकर्मी के फ्लैट पर कब्जे का दर्ज किया गया. आकांक्षा भी गिरोह की गिरफ्तारी शुरू होने पर जयपुर छोड़ कर अजमेर चली गई थी.

एसओजी की जांच में सामने आया है कि जयपुर में चल रहे हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोहों ने ढाई साल में 45 लोगों से करीब 20 करोड़ रुपए वसूले थे.

– कथा पुलिस सूत्रों व अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

फिल्मी खेल में हुई जेल

फिल्म हो या कोई टीवी सीरियल, उसे बनाने में सैकड़ों लोगों की मेहनत लगती है. इन में पुरुष भी होते हैं, महिलाएं भी. दोनों में ही अच्छेबुरे लोग होते हैं. चूंकि शोबिज की दुनिया में ग्लैमर की डिमांड पहले नंबर पर होती है, इसलिए उस के प्रति सभी का आकर्षण स्वाभाविक ही है. ग्लैमर की इस दुनिया में तरहतरह के लालच दे कर जहां पुरुष लड़कियों व महिलाओं का लाभ उठाते हैं, वहीं लड़कियां या महिलाएं भी अपनी खूबसूरती को ढाल बना कर पुरुषों का लाभ उठाने में पीछे नहीं रहतीं.

यह अलग बात है कि वे अपने मकसद में कामयाब हो पाती हैं या नहीं. लेकिन यह भी सच है कि कामयाबी के लिए खूबसूरती ही नहीं, टैलेंट भी जरूरी है. जबकि कई लड़कियां अपनी खूबसूरती को ही टैलेंट का पैमाना मान बैठती हैं.

फिल्म इंडस्ट्री और टीवी इंडस्ट्री में तमाम ऐसे मामले हुए हैं, जिन में निर्मातानिर्देशक द्वारा रोल न दिए जाने या वाजिब कारणों की वजह से बीच में निकाल दिए जाने पर लड़कियां यौनशोषण का आरोप लगा देती हैं, ताकि निर्मातानिर्देशक पर दबाव बनाया जा सके. कुछ मामलों में तो बात पुलिस और कोर्टकचहरी तक भी पहुंची. जानेमाने फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था. साफसुथरी छवि वाले शादीशुदा मधुर भंडारकर की फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान है.

‘चांदनी बार’, ‘पेज थ्री’, ‘कारपोरेट’, ‘ट्रैफिक सिगनल’, ‘फैशन’ और ‘दिल तो बच्चा है जी’ जैसी चर्चित फिल्में बना चुके मधुर सामाजिक विद्रूपता वाली अलग तरह की फिल्में बनाने के लिए मशहूर हैं. ‘ट्रैफिक सिगनल’ के लिए तो उन्हें बतौर निर्देशक, लेखक और स्क्रीनप्ले राइटर नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है.

सन 2001 में आई बहुत कम बजट की फिल्म ‘चांदनी बार’ जब सुपरहिट हो गई तो निर्देशक मधुर भंडारकर का नाम रातोंरात नामचीन हस्तियों में शामिल हो गया. जून, 2004 में मधुर भंडारकर निर्देशित फिल्म ‘आन’ रिलीज हो चुकी थी. यह बड़े बजट की फिल्म थी, जिस में अक्षय कुमार, रवीना टंडन, सुनील शेट्टी, शत्रुघ्न सिन्हा, जैकी श्रौफ, परेश रावल, इरफान खान और लारा दत्ता जैसे बड़े स्टार थे. इस फिल्म के रिलीज होने से पहले ही मधुर भंडारकर ने अपनी अगली फिल्म ‘पेज थ्री’ की शूटिंग शुरू कर दी थी, जो कालांतर में एक नया इतिहास रचने वाली थी.

15/16 जुलाई, 2004 की रात को भंडारकर ने ‘पेज थ्री’ की शूटिंग की थी. सुबह घर आ कर वह सो गए थे. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि एक ऐसा विस्फोट होने जा रहा है, जो उन की नींद ही नहीं, चैन तक हराम कर देगा. 16 जुलाई की दोपहर को प्रीति जैन नाम की एक मौडल ने पत्रकारों, खासकर न्यूज चैनलों के रिपोर्टर्स को बुला कर एक प्रैस कौन्फ्रैंस की, जिस में उस ने मधुर भंडारकर पर यौनशोषण, धोखाधड़ी और धमकी देने के आरोप लगाए.

दोपहर के 2 बजे के बुलेटिन में जब यह समाचार चल रहा था, तब मधुर भंडारकर सो रहे थे. टीवी पर समाचार देख कर उन के एक दोस्त ने फोन कर के उन्हें यह बात बताई तो वह हड़बड़ी में उठे. उन्हें यह मामला तब अतिगंभीर लगा, जब उन्होंने अपने मोबाइल पर आई 75 मिस्ड काल्स देखीं.

उधर उसी दिन प्रीति ने थाना वरसोवा जा कर मधुर भंडारकर के खिलाफ बलात्कार, धोखाधड़ी और जान से मारने की धमकी देने के आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने यह मामला भादंवि की धारा 376/506 के अंतर्गत दर्ज कर लिया.

प्रीति का कहना था कि मधुर भंडारकर ने सन 1999 से 2004 के बीच उस के साथ 16 बार यौन संबंध बनाए. प्रमाण के रूप में उस ने पुलिस को अपने मोबाइल से मधुर भंडारकर के मोबाइल पर भेजे गए 14 एसएमएस का ब्यौरा भी दिया. उस ने ये एसएमएस 23 दिसंबर, 2003 से 17 अप्रैल, 2004 के बीच भेजे थे. भंडारकर ने 1-2 मैसेज को छोड़ कर उस के किसी मैसेज का जवाब नहीं दिया था. यह देश का शायद पहला ऐसा मामला था, जिस में एसएमएस को प्रमाण के रूप में पेश किया था.

यहां यह स्पष्ट कर दें कि प्रीति जैन द्वारा भंडारकर को भेजे गए एसएमएस में बात करने के लिए कहने और कुछ मजबूरी तो कुछ धमकी भरे अंदाज में उन की फिल्म में काम मांगने के अलावा कोई खास बात नहीं थी. बहरहाल, प्रीति ने मधुर भंडारकर पर जो आरोप लगाए थे, वे काफी गंभीर थे.

इसी के मद्देनजर मधुर भंडारकर अगले ही दिन अपने मित्र फिल्म निर्मातानिर्देशक अशोक पंडित को साथ ले कर अपने वकीलों श्रीकांत शिवड़े और गिरीश कुलकर्णी से मिले. उन के वकीलों ने मधुर के खिलाफ वरसोवा थाने में दर्ज केस का हवाला दे कर तत्काल अग्रिम जमानत के कागजात तैयार किए और मुख्य दंडाधिकारी आर.आर. वाच्छा की अदालत में अपील लगा दी.

दोनों वकीलों ने अदालत के सामने दलील दी कि मधुर भंडारकर जानेमाने निर्देशक हैं, फिल्मों में काम करने की इच्छुक तमाम लड़कियां उन से मिलने आती हैं. प्रीति जैन भी उन से मिली होगी. मधुर उस के लिए कुछ नहीं कर पाए होंगे, इसलिए उस ने उन पर दबाव बनाने के लिए उन के विरुद्ध झूठा केस दर्ज करा दिया, ताकि वह फिल्म में काम देने को मजबूर हो जाएं.

हालांकि अभियोजन पक्ष के वकील ने अपनी अलग दलील दी, लेकिन न्यायाधीश ने 20 हजार के मुचलके पर मधुर भंडारकर को अग्रिम जमानत दे दी, साथ ही आदेश भी दिया कि वह नियमित वरसोवा थाने जाएं और जांच में पुलिस को सहयोग करें. अदालत ने उन के मुंबई से बाहर जाने पर भी पाबंदी लगा दी.

दरअसल, मधुर भंडारकर को इस मामले में अग्रिम जमानत इतनी आसानी से इसलिए मिल गई थी, क्योंकि प्रीति जैन ने मुकदमा दर्ज कराने और गंभीर आरोप लगाने से पहले मधुर भंडारकर को कानूनी नोटिस भेज कर धमकी दी थी कि अगर वह उसे अपनी फिल्म में नहीं लेते तो वह उन के विरुद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराएगी.

इसी को आधार बना कर मधुर के वकीलों ने अदालत के सामने दलील दी थी कि प्रीति जैन और मधुर के बीच शारीरिक संबंध तो हो सकते हैं, पर यह बलात्कार का मामला कतई नहीं है. क्योंकि स्वतंत्र रूप से रहने वाली किसी लड़की को डराधमका कर 5 सालों तक बलात्कार नहीं किया जा सकता.

यहां थोड़ा प्रीति जैन के बारे में बता देना जरूरी है. 25 वर्षीया प्रीति जैन उस समय मुंबई में यारी रोड, वरसोवा स्थित एक सोसायटी के फ्लैट में अपने सेवानिवृत्त पिता के साथ रह रही थी. दिल्ली निवासी उस के पिता भारतीय विदेश सेवा से रिटायर हुए थे. अपने सेवाकाल में वह इजिप्ट, स्विटजरलैंड, बेल्जियम, पाकिस्तान और यूके में रह चुके थे. प्रीति का जन्म इजिप्ट में हुआ था. उस ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी.

महत्त्वाकांक्षी प्रीति फिल्मों में जाना चाहती थी, इसलिए पिता के साथ मुंबई आ गई थी. मुंबई में एकदो फिल्मों में छोटीमोटी भूमिकाएं करने के साथसाथ उस ने मौडलिंग भी की. फिल्मों में काम करने के सिलसिले में ही वह मधुर भंडारकर से मिली थी.

बहरहाल, प्रीति जैन और मधुर भंडारकर का यह केस जांच के बाद चार्जशीट लग कर अदालत तक पहुंच गया. लंबी सुनवाई के बाद सन 2007 में अदालत ने मधुर भंडारकर को इस मामले में आरोपमुक्त कर दिया. इस के बावजूद प्रीति चुप नहीं बैठी. उस ने अपने आरोपों के साथ अंधेरी स्थित सेशन कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 2 साल की सुनवाई के बाद सन 2009 में सत्र न्यायालय ने मधुर भंडारकर को आरोप मुक्त करने को गलत ठहराया और पुलिस को इस मामले में दोबारा गहनता से जांच करने को कहा, साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि प्रीति जैन ने जो सबूत दिए हैं, उन्हीं के आधार पर मधुर भंडारकर के खिलाफ बलात्कार का केस चलाया जाए.

मधुर भंडारकर ने कोर्ट के आदेश के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट की शरण ली. लेकिन यहां यह मामला उलटा पड़ा. मतलब हाईकोट्र ने सत्र न्यायालय के निर्णय को सही माना. कोई और रास्ता न देख मधुर भंडारकर इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय गए. लंबी अवधि के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने सन 2012 में इस केस के सभी आरोपों को खारिज कर दिया.

यह तो था मधुर और प्रीति के पहले केस का सच. लेकिन इस बीच प्रीति ने एक और विवाद खड़ा कर लिया था, जिस का अलग से मुकदमा चल रहा था, वह भी प्रीति के खिलाफ. दरअसल, मधुर के खिलाफ दर्ज कराए गए केस में मनचाही सफलता न मिलते देख प्रीति जैन ने सन 2005 में मधुर भंडारकर के खिलाफ एक कुचक्र और रचा. यह कुचक्र था मधुर भंडारकर को मरवाने का. इस के लिए उस ने गैंगस्टर अरुण गवली गैंग के बदमाशों को 75 हजार रुपए की सुपारी दी थी.

उस की यह हकीकत भी बड़े नाटकीय अंदाज में सामने आई. हुआ यह कि 3 अगस्त, 2005 को अखिल भारतीय सेना पार्टी के वकील महेंद्र बागवे ने प्रीति जैन के खिलाफ थाना अग्रीपाड़ा में एक प्रकरण दर्ज कराया.

इस प्रकरण के अनुसार, 2 अगस्त, 2005 को प्रीति जैन दगड़ी चाल स्थित अखिल भारतीय सेना के औफिस में गई और वहां मौजूद कार्यकर्ता अनिल तावड़े से नरेश परदेशी के बारे में पूछा. जब वहां मौजूद कार्यकर्ताओं ने बताया कि वहां कोई नरेश परदेशी नहीं है तो उस ने गुस्से में कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है. मैं ने उसे 75 हजार रुपए दिए हैं.’’

दगड़ी चाल में माफिया सरगना, नेता  और अखिल भारतीय सेना पार्टी के संयोजक अरुण गवली का औफिस है. औफिस में मौजूद कार्यकर्ताओं ने प्रीति जैन को बैठा कर विस्तार से सारी बात बताने को कहा तो प्रीति ने बताया कि उस ने नरेश परदेशी को फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर को मरवाने के लिए 75 हजार रुपए की सुपारी दी थी. लेकिन उस ने अभी तक यह काम नहीं किया है. कार्यकताओं ने प्रीति जैन को समझाबुझा कर वापस भेज दिया और अगले दिन वकील महेंद्र बागवे के माध्यम से थाना अग्रीपाड़ा में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मधुर भंडारकर का नाम जुड़ने से यह मामला हाईप्रोफाइल हो गया. पुलिस ने इस केस को प्रीति जैन के खिलाफ भादंवि की धारा 115 (जान से मरवाने की कोशिश), 120बी (अपराध का षडयंत्र रचना) के तहत दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच का काम इंसपेक्टर कृष्णा यमाने को सौंपा गया.

कृष्णा यमाने ने अपनी पुलिस टीम के साथ भायखला के अग्रीपाड़ा इलाके में स्थित बी.जे. मार्ग पर बनी शिवनेरी बिल्डिंग के मकान से नरेश परदेशी को हिरासत में ले लिया. नरेश परदेशी से वहीं पर पूछताछ की गई, साथ ही उस के घर की तलाशी भी ली गई. नतीजतन यह बात साफ हो गई कि वह अखिल भारतीय सेना का सक्रिय सदस्य था. 6 मई, 2005 को उसे अखिल भारतीय सेना की ओर से वर्ली के वार्ड नंबर 58 का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. नरेश परदेशी के घर से एक हथियार भी मिला.

अग्रीपाड़ा थाने में नरेश परदेशी से गहन पूछताछ की गई तो उस ने मान लिया कि प्रीति जैन ने उसे मधुर भंडारकर को मारने के लिए 75 हजार रुपए की सुपारी दी थी. उन पैसों से उस ने कुछ सामान खरीदा था और बाकी खानेपीने में उड़ा दिए थे. उस का बयान दर्ज करने के बाद अग्रीपाड़ा पुलिस ने बिना कोई देर किए उसी दिन शाम को 4 बज कर 45 मिनट पर प्रीति जैन के मोबाइल पर फोन कर के उसे थाने आने को कहा. प्रीति जैन आ गई. उसे हिरासत में ले कर पूछताछ की गई तो उस ने मान लिया कि मधुर भंडारकर को मरवाने के लिए उस ने नरेश परदेशी को 75 हजार रुपए की सुपारी दी थी.

इंसपेक्टर कृष्णा यमाने जानते थे कि यह हाईप्रोफाइल मामला है. इसलिए गहनता से जांच जरूरी है. केस में मुख्य आरोपी प्रीति जैन थी. स्थितियों के हिसाब से उस के फ्लैट की तलाशी जरूरी थी. इसलिए उन्होंने इस संबंध में वरिष्ठ अधिकारियों से बात की. अधिकारियों ने उन्हें प्रीति के फ्लैट की तलाशी लेने की इजाजत दे दी. इस के बाद पुलिस प्रीति को सरकारी जिप्सी में बैठा कर वरसोवा, अंधेरी में यारी रोड स्थित 7 बंगला की गंगाजमुना सोसायटी के उस के फ्लैट पर ले गई.

पुलिस ने उस के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां से एक बुरका, कुछ कैसेट्स, निर्मातानिर्देशक अशोक पंडित की तसवीरें, मधुर भंडारकर केस से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पेपर और प्रीति के हस्तलिखित कुछ दस्तावेज बरामद हुए. उस के फ्लैट से कुछ आपत्तिजनक चीजें भी बरामद हुई थीं. पुलिस ने प्रीति का मोबाइल भी अपने कब्जे में ले लिया. उस में मधुर भंडारकर सहित इस मामले से जुड़े कई लोगों के फोन नंबर थे.

प्रीति को ले कर पुलिस थाना अग्रीपाड़ा लौट आई. उस के सामने फिर नरेश परदेशी से पूछताछ की गई. नरेश परदेशी पुलिस को उनउन जगहों पर ले गया, जहांजहां वह प्रीति से मिला था और जहांजहां वह उसे साथ ले गई थी.

प्रीति जैन से पूछताछ में वरसोवा के उस साइबर कैफे का भी पता चला, जहां बैठ कर वह चैटिंग किया करती थी. पुलिस उस पौइंट ब्राउजिंग साइबर कैफे में गई और जांच के लिए सीपीयू और एक प्रिंटर अपने साथ ले आई. इन दोनों चीजों को जांच के लिए आंध्र प्रदेश की विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया गया.

पुलिस ने प्रीति और नरेश परदेशी को अदालत पर पेश किया, जहां से प्रीति को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया, जबकि नरेश परदेशी को पुलिस ने रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में की गई पूछताछ में उस ने बताया कि मधुर भंडारकर की हत्या के लिए हथियार शिवराम दास ने दिलवाया था. शिवराम दास 7 रास्ता स्थित गोपालनगर झोपड़पट्टी में रहता था. पुलिस ने उस के घर जा कर उसे हिरासत में ले लिया. पूछताछ में शिवराम दास ने बताया कि वह हथियार उस ने और नरेश परदेशी ने सतीश मोहिते को दिया था.

बहरहाल, पुलिस ने सतीश मोहिते को हिरासत में ले कर पूछताछ की. उस ने बताया कि वह हथियार दीपक थेऊर के पास रखा है. पुलिस सतीश मोहिते को ले कर दीपक थेऊर के घर जाने के लिए निकली. दीपक जब वर्ली के दमकल विभाग के पास वाली झुग्गी बस्ती की ओर जा रहा था, तभी पुलिस ने सतीश की निशानदेही पर उसे पकड़ लिया. दीपक की निशानदेही पर पुलिस ने एक देशी कट्टा और 4 कारतूस बरामद किए. पुलिस उन दोनों को थाने ले आई. पूछताछ में दीपक ने भी स्वीकार किया कि वह भी इस साजिश में शामिल था. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया.

नरेश परदेशी के बताने पर पुलिस ने 1 अक्तूबर, 2005 को गुफरान इब्राहीम शेख उर्फ समीर को पकड़ा. गुफरान ने ही लखनऊ के रहने वाले राममिलन नाई से देशी कट्टा खरीद कर नरेश परदेशी को दिया था. गुफरान से पूछताछ के बाद पुलिस ने लखनऊ जा कर राममिलन को भी गिरफ्तार कर लिया.

इस पूरे प्रकरण पर डीसीपी आशुतोष डुंबरे और डीसीपी प्रदीप सावंत बराबर नजर जमाए हुए थे. आरोपियों से कई बार उन के सामने ही पूछताछ की गई थी. वैसे भी सारा काम उन के ही दिशानिर्देश पर हो रहा था. गुफरान शेख से पूछताछ में पता चला कि वे लोग प्रीति जैन और नरेश परदेशी के कहने पर कई दिनों तक मधुर भंडारकर के खार स्थित घर हरिभवन के आसपास छिप कर नजर रख रहे थे.

प्रीति ने नरेश परदेशी को मधुर की 2 कारों के नंबर दिए थे, जिन में एक कार का नंबर एमएच04सीडी 8027 था और दूसरी का एमएच04सीडी 2213. भंडारकर जिस कार से निकलते थे, ये लोग उस का पीछा कर के पता लगाते थे कि वह कहांकहां जाते हैं, किसकिस से मिलते हैं और अपने औफिस कितने बजे पहुंचते हैं. दरअसल, ये सारी जानकारियां एकत्र कर के नरेश परदेशी के लोग कोई ऐसा सौफ्ट टारगेट ढूंढ रहे थे, जहां मधुर भंडारकर को आसानी से गोली मार कर भागा जा सके. लेकिन वे लोग अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके.

बहरहाल, अग्रीपाड़ा पुलिस ने इस मामले की जांच बड़ी गहराई से की. इस केस में पुलिस ने 51 गवाह बनाए. जांच के बाद इंसपेक्टर कृष्णा यमाने ने चार्जशीट तैयार कर के अदालत में पेश कर दी. मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट की कोर्ट में लंबी सुनवाई के बाद यह केस जिला एवं सत्र न्यायाधीश में न्यायाधीश एस.एस. भोसले की अदालत में पहुंचा. वहां भी इस केस की लंबी सुनवाई हुई.

इस बीच केस के सभी अभियुक्त जमानत पर रहे. अंतत: न्यायाधीश एस.एस. भोसले ने 28 अप्रैल, 2017 को अपना फैसला सुनाया. अपने फैसले में उन्होंने मधुर भंडारकर को जान से मारने का षडयंत्र रचने के आरोप में प्रीति जैन और गैंगस्टर अरुण गवली के गुर्गे नरेश परदेशी को 3 साल की सजा सुनाई, साथ ही दोनों पर 10-10 हजार रुपए का जुरमाना भी लगाया गया. जबकि नरेश परदेशी के साथी शिवराम दास को 2 साल की सजा के साथसाथ 10 हजार रुपए जुरमाना भरने की सजा मिली. बाकी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया.

न्यायाधीश ने प्रीति जैन, नरेश परदेशी और शिवराम दास को 15 हजार के मुचलकों पर जमानत दे दी, ताकि वे इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट जा सकें. इस के लिए उन्हें 4 सप्ताह का समय दिया गया.

यह अपनी तरह का अलग मामला है, जिस में अपने आप को पीडि़त बताने वाली महिला दोषी पाई गई. भले ही यह उस से जुड़ा दूसरा मामला था. इस पूरे चक्कर में प्रीति जैन का कैरियर भी चौपट हो गया.

(लेखक : रविंद्र शिवाजी दुपारगुड़े/के. रवि)

पिता की उम्र के हीरो के साथ बोल्ड सीन और अब…

कभी साउथ की सुपरस्टार रहीं नमिता इन दिनों लो-प्रोफाइल कैरेक्टर रोल भी एक्सेप्ट कर रही हैं. खबरों के मुताबिक, नमिता डायरेक्टर पोनारम की अपकमिंग मूवी में शिवा कार्तिकेयन की बहन के किरदार में नजर आएंगी. साउथ की हॉट एक्ट्रेस में शुमार रहीं नमिता (35) ने पिता की उम्र के हीरो सत्यराज (62) के साथ ‘इंग्लिशकरन’ में इतने हॉट सीन दिए कि यह फिल्म लंबे समय तक सुर्खियों में रही. बता दें कि सत्यराज तमिल फिल्मों के पॉपुलर एक्टर हैं और बाहुबली में ‘कटप्पा’ का रोल प्ले कर चुके हैं.

साउथ में नमिता की दीवानगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि त्रिची में एक फैन ने उन्हें किडनैप करने की कोशिश की थी. हालांकि वह ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाया था. जब इस बारे में उससे पूछा गया तो उसका कहना था कि वह नमिता का डाय हार्ड फैन है, इसलिए वो उन्हें अपने साथ ले जाना चाहता था. हालांकि बाद में नमिता के कहने पर पुलिस ने उसे छोड़ दिया था.

साउथ इंडिया में एक्टर-एक्ट्रेस को देवी-देवताओं की तरह पूजा जाता है, ये तो सभी जानते हैं लेकिन साउथ के मंदिर में किसी गुजराती एक्ट्रेस की मूर्ति लगाना वाकई हैरान करने वाला है. सूरत की रहने वाली नमिता वांकावाला उर्फ भैरवी की पहली मूर्ति तमिलनाडु के तिरुनलवेली में स्थित एक मंदिर में लगाई गई थी. अब साउथ में उनके एक नहीं, बल्कि तीन मंदिर हैं.

नमिता का नाम साउथ की सबसे हॉट एक्ट्रेसेस में शुमार है. उनकी फेमस फिल्मों में ‘जगन मोहिनी’ और ‘बिल्ला’ का नाम है. बॉलीवुड में जहां एक्ट्रेस अपने जीरो फिगर को लेकर क्रेजी रहती हैं, वहीं नमिता ने भारी-भरकम शरीर होने के बाद भी साउथ फिल्म इंडस्ट्री में खास मुकाम बनाया है. नमिता 1998 में ‘मिस सूरत’ का खिताब भी अपने नाम कर चुकी हैं. इसके बाद नमिता 2001 में मिस इंडिया कॉम्पिटीशन में रनरअप रह चुकी हैं. यह खिताब एक्ट्रेस सेलिना जेटली ने अपने नाम किया था. नमिता के फैंस की संख्या लाखो में है. एक्टिंग के अलावा नमिता कई सोशल इंस्टिट्यूशंस से भी जुड़ी हुई हैं. वे 2500 से भी अधिक फैंस क्लबों से जुड़ी हुई है.

वीडियो : आपने देखा करिश्मा का ये बोल्ड फोटोशूट

‘पवित्र रिश्ता’ और ‘यह है मोहब्बतें’ में अपने काम से वाहवाही बटोर चुकी करिश्मा शर्मा वेब सीरीज ‘रागिनी एमएमएस रिटर्न्स’ में रागिनी का किरदार निभा रही हैं.

जब से उनके इस किरदार को लेकर घोषणा हुई है, उसके बाद से ही उन्होंने बेहद ही बोल्ड तेवर अपना लिया है.

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उन्होंने हाल ही में अपने ग्लैमरस और हाट अवतार के साथ एक फोटोशूट कराया है. करिश्मा एक के बाद एक अपने इस फोटोशूट की तस्वीरें इंटरनेट पर डाल रही हैं और अपनी हाट अदाओं से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लगातार धूम मचा रही हैं.

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रागिनी एमएमएस सीरीज में सनी लियोन का भी काफी हाट अवतार देखने को मिला था, जिसकी वजह से उन्होंने काफी सूर्खियां बटोरी. सनी लियोन के बाद अब करिश्मा के हाथ यह सीरीज लगी है तो वे भी अपने बोल्डनेस को लेकर कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

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इस बोल्ड फोटो शूट में करिश्मा पूरी तरह से बैकलेस नजर आ रही हैं और उन्होंने झीनी ड्रेस भी पहन रखी हैं. इसका एक वीडियो भी उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया है.

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उनकी वेब सीरीज ‘रागिनी एमएमएस रिटर्न्स’ में एक कालेज की कहानी को दर्शाया जाएगा, जिसमें एक बाद एक खून हो रहे हैं. इस फिल्म में सारी घटनाएं एक एमएमएस सीडी के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है. दिलचस्प बात तो यह है कि इस हारर के ट्रेलर में हारर से ज्यादा सेक्स सीन थे. आपको बता दें कि 23 वर्षीया करिश्मा इससे पहले ‘प्यार का पंचनामा-2’ में भी नजर आ चुकी हैं.

मूर्तियों पर चढ़े रंग पर्यावरण के लिए खतरा

देश में मूर्तिपूजा बड़े पैमाने पर होती है. लोग मूर्ति की पूजा तब तक करते हैं जब तक वह अच्छी और सुंदर दिखती है. मूर्ति के टूटते, बदरंग होते या नई मूर्ति के आते ही पुरानी मूर्ति को पूजाघर से हटा दिया जाता है.

ज्यादातर मूर्तियां मिट्टी और प्लास्टर औफ पेरिस से तैयार की जाती हैं. इन को अलगअलग रंगों से रंग कर खूबसूरत बनाया जाता है. इन रंगों में खतरनाक रसायन मिले होते हैं. ये खतरनाक रसायन पर्यावरण के लिए खतरा बन गए हैं.

कुछ सालों से मिट्टी और प्लास्टर औफ पेरिस के साथ प्लास्टिक से बनी मूर्तियां भी बिकने लगी हैं. इन को कार और दूसरे वाहनों में लटकाया जाता है. ये भी समय के साथ बेकार हो जाती हैं. ऐसे में बेकार और टूटीफूटी मूर्तियों से लोगों का मोह भंग हो जाता है. और इन मूर्तियों को घर से बाहर फेंक दिया जाता है.

यह मामला अंधविश्वास और पाखंड से जुड़ा होता है. पंडों का आदेश है कि इन मूर्तियों का अपमान न किया जाए. इस कारण इन मूर्तियों को नदी के पानी में या फिर किसी पेड़ के नीचे जड़ों के पास रख दिया जाता है.

मूर्तियों पर चढ़े रंग में खतरनाक रसायन मिला होता है. यह पानी में मिल कर इसे पीने वालों को नुकसान पहुंचाता है.

पेड़ के किनारे रखे जाने पर यह रसायन पेड़ की जड़ों में जा कर पेड़ को सुखाने का काम करता है. इस से यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है. आज के समय में कूड़ाकचरा, प्लास्टिक कचरा और ईकचरा को ठिकाने लगाना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में टूटी हुई मूर्तियों को ठिकाने लगाने का काम भी मुश्किल हो गया है. यह बात अदालत तक ने महसूस की है. उस ने टूटी मूर्तियों को नदी के किनारे गड्ढा खोद कर उस में दबाने को कहा है. कई बार तो लोग मूर्तियों को नदी की रेलिंग पर या पुल पर लगी जाली पर लटका कर चले जाते हैं.

आज भी किसी न किसी तरह से लोग नदी में मूर्तियों को फेंकना सब से पुण्य का काम मानते हैं. वे मूर्तियां ही नहीं, पूजन का बाकी सामान भी वहां पर फेंक देते हैं. पुल के करीब कूड़ादान भी रखा जाने लगा है पर इस में मूर्तियां कोई नहीं डालता. लोगों को इस बात का डर बैठाया गया है कि कूड़ेदान में मूर्तियां डालने से उन का अहित होगा. अगर यह डर न बैठाया जाए तो भक्त कैसे अपनी गाढ़ी कमाई मंदिरों में बिना वजह मनमरजी से देंगे.

अंधविश्वास बना परेशानी

देवताओं की मूर्ति को बेकार होने और टूटने के बाद भी किसी भी जगह पर नहीं फेंका जा सकता, मूर्तियों को कूड़ाघर या नाली में नहीं फेंका जा सकता, ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं. इस बात का डर लोगों के मन में बैठा दिया गया है. ऐसे में टूटी मूर्तियों को नदी या पेड़ के पास रख दिया जाता है.

इस मसले पर समाज सुधारक सुधाकर सिंह कहते हैं, ‘‘आज घरों में मूर्तियों की संख्या बढ़ गई है. मूर्तियों के पास देवताओं के फोटो, पेंटिंग्स और कलैंडर बड़ी संख्या में घरों में लगने लगे हैं. हर घर में छोटेबड़े मंदिर होते हैं. इन में 10 से 12 मूर्तियां होती ही हैं. बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक में मूर्तियां, फोटो और कलैंडर लगाए जाने लगे हैं. ऐसे में इन का निबटारा कठिन काम होने लगा है.’’

दीवाली के दिनों में ये मूर्तियां ज्यादा दिखती हैं. दीवाली या किसी त्योहार के मौके पर सफाई के समय मूर्तियों को घर से बाहर निकाला जाता है और उन को बाहर फेंक दिया जाता है. दीवाली में नई मूर्तियों के साथ पूजा करने का प्रावधान है. जब नई मूर्तियां घर में आती हैं तो पुरानी बाहर फेंक दी जाती हैं. ये बेकार मूर्तियां पर्यावरण का बड़ा खतरा बन रही हैं.

पहले ये मूर्तियां नैचुरल कलर से बनाई जाती थीं तो कम प्रभाव डालती थीं. अब ये कैमिकल कलर से बनाई जाती हैं तो ज्यादा प्रभाव डालने लगी हैं. कैमिकल रंग सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं.

इन कारणों से ही अदालत ने मूर्तियों के विसर्जन के लिए नदी के किनारे गड्ढे बनाने को कहा है. इस से भी पर्यावरण के होने वाले नुकसान को रोका नहीं जा सकता है.

प्रदूषण पर नहीं पाबंदी

नदी में फैलते प्रदूषण को रोकने के लिए तमाम तरह के प्रयास और कानून बन रहे हैं. इस के बाद भी नदियों में प्रदूषण कम नहीं हो पा रहा है. केवल मूर्तियां ही नहीं, मंदिर के फूल और दूसरी गंदगी भी फेंक दी जाती है. मंदिरों को नदी के प्रदूषण का जिम्मेदार नहीं माना जाता है जबकि सब से अधिक प्रभाव इन सब का ही पड़ता है.

मंदिरों के किनारे अब हर नदी में आरती का कार्यक्रम होने लगा है. असल में मंदिर के बाद नदियां इस तरह की आरती कमाई का नया जरिया हो गईर् हैं. इन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं है. नदी के किनारे बड़ी संख्या में मंदिर बने होते हैं. यहां पूजापाठ से ही नहीं, भक्तों के स्नान करने से गंदगी फैलती है. इस पर जब तक पाबंदी नहीं लगेगी, नदियां साफ नहीं होंगी.

गंगा जैसी नदी, जिसे साफ करने में करोड़ों रुपए का बजट लगता है, का पानी भी पीने के लायक नहीं रह गया है. भक्त नदी का गंदा पानी पी कर देवीदेवताओं को खुश करने की कोशिश करते हैं. कई बार ऐसे लोग बीमारी का भी शिकार हो जाते हैं. इस के बाद भी वे यह स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन को डर रहता है कि ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं.

नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए उन के किनारे लगने वाली हर गंदगी को रोकना होगा चाहे वह मंदिर की हो या मंदिर के बाहर की. आज के समय में खतरनाक किस्म के कैमिकल का प्रयोग किया जाने लगा है. जो पानी को ज्यादा प्रदूषित करता है. ऐसे में टूटी हुई मूर्तियों को नदी और पेड़ दोनों के किनारे से दूर रखना होगा, तभी पर्यावरण में सुधार हो सकेगा.

करोड़ों का है मूर्तियों का कारोबार

मूर्तियां पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं, इस विषय पर अदालत के आदेश के बाद से बहस भले ही शुरू हो गई हो पर अभी भी इस को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. जरूरत इस बात की है कि इस परेशानी को भी गंभीरता से लिया जाए. लखनऊ जैसे शहर, जहां की आबादी करीब 50 लाख है, के करीब 10 लाख परिवारों में घरों के अंदर छोटे मंदिर हैं. एक घर में करीब 10 से 12 मूर्तियां होती हैं. ऐसे में हर साल 1 करोड़ 20 लाख मूर्तियां नई आती हैं. इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों का निबटारा सरल काम नहीं है. मूर्तियां बनाने में लगा खतरनाक रंग पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है.

पर्यावरण के साथसाथ मूर्तियों का खरीदनाबेचना बड़ा आर्थिक कारोबार है. ऐसे में इस कारोबार से जिन को मुनाफा होता है वे इसे रोकने की राह में सब से बड़ा रोड़ा हैं. वे इस कारोबार को लगातार बढ़ाने में लगे हैं. जिस से पर्यावरण पर खतरा बढ़ता जा रहा है.

एक मूर्ति की कीमत करीब 50 रुपए से ले कर 1 हजार रुपए तक या इस से अधिक भी हो सकती है. ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि 1 करोड़ 20 लाख मूर्तियों पर कितना पैसा खर्च होता होगा. इस के अलावा तमाम तरह की पूजा जैसे दुर्गापूजा, गणेश उत्सव और तमाम तरह के आयोजनों में मूर्तियां पहले लाई जाती हैं, फिर उन को हटाया जाता है. नदियों के किनारे या तालाब में इन को पानी में प्रवाहित किया जाता है.

उम्र के 64वें पड़ाव पर भी बनी मां

मानव जीवन के चक्र में जब कभी कुछ आश्चर्यजनक व सुखद घटित हो जाता है, तब जीवन में इंद्रधनुषी रंग बिखर जाते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ 65 वर्षीय जगदीश प्रसाद मीणा और उन की पत्नी चमेली मीणा के जीवन में. 64 वर्षीय चमेली ने इस उम्र में एक पुत्र को जन्म दिया.

इस सब के बारे में जानने के लिए जब हम राजधानी दिल्ली के शकरपुर इलाके में स्थित उन के निवास पहुंचे, तो जगदीश प्रसाद और चमेली दोनों ही बच्चे को खिला रहे थे. बड़ा प्यारा बच्चा है, पूरी तरह स्वस्थ है.

जगदीश प्रसाद से पूछने पर कि उम्र के इस मोड़ पर बच्चे को पैदा करने का ध्यान कैसे आया, तो वे कहते हैं, ‘‘जीवन का घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा कि हम बहुत ही हताश हो गए. दरअसल, हमारा बेटा 31 वर्ष का था. संदिग्ध परिस्थितियों में उस की अचानक मृत्यु हो गई. हम दुख के सागर में डूबे हुए थे.

‘‘कुछ समय बाद हम दोनों पतिपत्नी ने हिम्मत जुटाई और एक नई सोच को जन्म दिया जो हट कर थी. पहले तो हम ने सोचा कि क्यों न हम सरोगेसी द्वारा एक बच्चे को प्राप्त करें परंतु यह सोच मेरी थी, जिसे पत्नी मान नहीं रही थी. उस का मन था कि वह स्वयं ही इस दिशा में आगे बढ़े. हम इस बाबत कई जगहों गए पर वहां पर सफलता हाथ नहीं लगी. हमारे अंदर लगन थी, हम दोनों ही हिम्मत नहीं हारे. पत्नी चमेली चाहती थी कि अपने बच्चे को वही जन्म देगी.

‘‘फिर हम डा. अनूप गुप्ता से मिले. उन्होंने हम दोनों का चैकअप किया. उन्होंने बताया कि हम दोनों ही बिलकुल फिट हैं. हारमोनल टैस्ट से स्पष्ट हो गया था कि मेरे स्पर्म ठीक थे और पत्नी चमेली भी एकदम फिट थी. वह बच्चे को जन्म दे सकती थी.’’

इस आयु में चमेली को स्वयं गर्भधारण कर के बच्चे को जन्म देना हिम्मत का काम है. कैसा रहा गर्भधारण का दौर? यह पूछे जाने पर जगदीश प्रसाद बताते हैं, ‘‘गर्भधारण के दौरान चमेली को हाइपरटैंशन और डायबिटीज हो गई थी. इस का हर तरह से खयाल मुझे ही रखना था. इसे जरा सी परेशानी न हो, इस का पूरा ध्यान रखता था. मुश्किल तब आती थी जब इस का मीठा खाने का बहुत दिल करता था. अंतत: सब कुछ मैनेज हो गया.’’

बातचीत के दौरान जगदीश प्रसाद की बेटी व नातिन भी आ गईं और वे बच्चे से खेलने लगीं. घर के नजदीक ही रहने से इन की बेटी ललिता व उस की बेटी हर रोज ही आ जाती हैं और बच्चे के लालनपालन में मदद करती हैं.

जगदीश प्रसाद मीणा बीएसएनएल में उच्च पद पर थे. अब रिटायर्ड हैं. वे आगे बताते हैं, ‘‘हमारी बेटियां हैं पर बड़े बेटे के न रहने के बाद अपने स्वयं का बेटा पैदा करने का अरमान हम पतिपत्नी दोनों को था. और हम ने यह अरमान पूरा भी कर लिया और हां, इसीलिए हम ने अपने बेटे का नाम अरमान ही रखा है. इस का पूरा नाम केशव अरमान है.’’

वहीं बैठी चमेली, जोकि हिंदी ज्यादा नहीं बोलतीं, ने राजस्थानी मिश्रित हिंदी में बताया, ‘‘वे एक बार और गर्भधारण कर के एक और बेटा चाहतीं हैं ताकि अरमान के साथ खेलने वाला आ जाए.

जगदीश और चमेली से मुलाकात करने के बाद यह लगा कि यदि हिम्मत हो और विश्वास हो तो बहुतकुछ हासिल किया जा सकता है.

आईवीएफ प्रक्रिया के जानकार डा. अनूप गुप्ता बताते हैं, ‘‘जब दोनों पतिपत्नी हमारे पास आए तो ये सरोगेसी के लिए सोच रहे थे. हम ने चमेली का हारमोनल टैस्ट किया तो पता चला कि वह गर्भधारण करने के लिए पूरी तरह सक्षम है. वह मैडिकली फिट थी. इन के पहले बच्चे भी पूरी तरह ठीक हुए थे. जगदीश प्रसाद भी फिट थे. ऐसे में हम ने कृत्रिम गर्भधारण करवा दिया.’’

आईवीएफ विधि द्वारा कृत्रिम गर्भाधारण में कितना खर्चा आता है, यह पूछे जाने पर उन्होंने बताया, ‘‘आमतौर पर डेढ़ लाख से 2 लाख रुपए तक खर्र्च होता है. थोड़ाबहुत और भी हो सकता है. दरअसल, सब कुछ निर्भर करता है ट्रीटमैंट पर.

इस तरह, आज विज्ञान और तकनीक ने सिर्फ यही नहीं साबित किया है कि जब न चाहें बच्चा न पाएं, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि जब चाहें, बच्चा पाएं.

तमिल राजनीति पर बढ़ता संकट

तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक का संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा. पहले उस में 2 गुट थे. उन के विलय के बाद दिनाकरन का तीसरा गुट उभरा और अब उस ने बगावत कर दी.  सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के 2 धड़े 6 महीने अलग रहने के बाद पिछले दिनों एक हो गए. इस के बाद अब बहुत जल्द केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए सरकार में अन्नाद्रमुक का प्रवेश होने वाला है.

अन्नाद्रमुक के दोनों गुटों के बीच हुए समझौते के तहत पलानीसामी राज्य के मुख्यमंत्री बने रहेंगे. पार्टी में बगावत का झंडा बुलंद करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री, जो जे जयललिता के समय कई बार मुख्यमंत्री रहे थे, ओ पन्नीरसेल्वम को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है. इस के अलावा जयललिता के बाद पार्टी की महासचिव बनी वी के शशिकला को पार्टी के महासचिव पद से हटाने का फैसला भी लिया गया है.

बगावत का झंडा

पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद उन के विश्वासपात्र समझे जाने वाले पन्नीरसेल्वम को तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनाया गया था. लेकिन, पार्टी महासचिव शशिकला से मतभेदों के चलते उन्हें पद से त्यागपत्र देना पड़ा.

शशिकला खुद मुख्यमंत्री बनना चाहती थीं. लेकिन, भ्रष्टाचार के एक मामले में उन के जेल जाने के चलते पलानीसामी नए मुख्यमंत्री बने. इस के बाद पन्नीरसेल्वम ने शशिकला के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया.

पिछले दिनों चेन्नई में जो हुआ उस की भूमिका कई महीने से दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी द्वारा लिखी जा रही थी.

शशिकला को भारतीय जनता पार्टी से बेहद नाराजगी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार उन तक पहुंचने की कोशिश की. केंद्र से भी जितने मंत्री गए, हरेक को शशिकला ने जयललिता से मिलने से रोक दिया. यहां तक कि राज्यपाल तक को जयललिता से भेंट करने का वक्त नहीं दिया गया.

केंद्र के ही निर्देश पर राज्यपाल ने शशिकला के लाख चाहने के बाद भी उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलाई. शशिकला को जब सजा हुई तो उन्होंने अपने भतीजे दिनाकरन को पार्टी का उपमहासचिव बना दिया. तमिलनाडु की राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकार बताते हैं कि उस वक्त मुख्यमंत्री तो पलानीसामी थे लेकिन पार्टी और सरकार दोनों दिनाकरन चलाते थे और किसी के सवाल उठाने पर कहते थे कि जेल से चिनम्मा का हुक्म आया है.

चेन्नई से यह खबर दिल्ली पहुंची. इस के बाद दिनाकरन जाल में फं सते चले गए. उन्हें आर्थिक मामलों में फंसा डाला गया. यहां तक कि उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी.

समर्थकों की लामबंदी

अब जेल में बंद शशिकला को महासचिव पद से हटाने के लिए जल्द कदम उठाए जाएंगे. हालांकि, शशिकला के समर्थक और कार्यकर्ता पार्टी के साथ हैं. उन के भतीजे टीटीवी दिनाकरन का भविष्य भी अनिश्चित है.

इस बीच, जेल में कैद अन्नाद्रमुक नेता वी के शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन के वफादार 19 विधायकों ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानीसामी के खिलाफ  बगावत कर दी. उन्होंने पलानीसामी सरकार को अल्पमत में लाते हुए राज्यपाल से कहा है कि उन्हें अब मुख्यमंत्री पलानीसामी पर विश्वास नहीं. वे अब अपना नया मुख्यमंत्री चुनेंगे. राज्यपाल प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष अमितशाह के आदेश का इंतजार करेंगे. दिनाकरन धड़े ने दावा किया था कि उन के पास 25 अन्नाद्रमुक विधायकों का समर्थन है.

विधानसभा अध्यक्ष को छोड़ कर अन्नाद्रमुक के पास कुल 134 विधायक हैं, जो अब दिनाकरन धड़े के समर्थन के बगैर घट कर केवल 115 रह गए हैं. रामदास ने यह भी दावा किया कि 3 अन्य दलों के विधायकों, जिन्होंने अन्नाद्रमुक के समर्थन में चुनाव लड़ा था, में से 2 ने दिनाकरन धड़े का साथ देने का फैसला किया है. इस लिहाज से अब सरकार के पास केवल 112 विधायक बचे हैं जो कि बहुमत से कम हैं.

राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में अन्नाद्रमुक के पास कुल 134 विधायक हैं. विपक्षी दल द्रमुक के पास 89 सीटें और उन के सहयोगी कांग्रेस की 8 और आईयूएमएल की 1 सीट हैं.

दिनाकरन के समर्थक विधायक थंगा तमिलसेल्वन ने कहा, ‘‘हम अपने समर्थक विधायकों की मदद से नया मुख्यमंत्री लाने की कोशिश शुरू करने जा रहे हैं.’’

कलह का फायदा

अन्नाद्रमुक में मची अंदरूनी कलह का फायदा मुख्य विपक्षी दल द्रमुक उठाने की फिराक में है. अन्नाद्रमुक के 2 धड़ों का मिलन भाजपा के लिए भले अच्छा हो लेकिन तमिल सिनेमा के मेगास्टार रजनीकांत के लिए अच्छी खबर नहीं है. महीनों से उन के सियासत में आने की अटकलें चल रही थीं. पहले

भाजपा रजनीकांत पर ही डोरे डाल रही थी लेकिन जब रजनीकांत ने साफ  संकेत नहीं दिए तो भाजपा ने उन पर भरोसा करना बंद कर अपना रास्ता निकाल लिया.

कमजोर दलील

ऐसा लग रहा है कि जानबूझ कर बहुमत परीक्षण के फैसले को टाला जा रहा है ताकि भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से सत्तारूढ़ दल अपने बागी विधायकों को मना सके. उस से पहले बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग भी अन्ना डीएमके ने की है और स्पीकर ने उन को नोटिस भेजा है.

हो सकता है कि बागी विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया जाए और उस के बाद बहुमत परीक्षण हो. भले विधायक इस फैसले को अदालत में चुनौती दें लेकिन उन की अयोग्यता की अवधि में ही बहुमत परीक्षण करा दिया जाए. तभी इस का फैसला टल रहा है.

चेन्नई में दिनाकरन के समर्थक विधायकों से निबटने के बाद अन्नाद्रमुक के दोनों गुटों को मोदी सरकार में शामिल किया जाएगा. ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं पर ऐसा हुआ नहीं. फिलहाल मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में

9 नए मंत्री बनाए गए हैं. सहयोगी दलों से किसी को भी मंत्री नहीं बनाया गया है. हो सकता है बाद में जब मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा उस में अन्नाद्रमुक को 1 कैबिनेट मंत्री और 2 राज्यमंत्रियों के पद मिल जाएं. पार्टी के नेता जल्दी ही शशिकला और उन के भतीजे दिनाकरन को पार्टी से निकालने का ऐलान कर सकते हैं.

द्रमुक की द्रविड़ नीति का होगा क्या?

जयललिता के निधन, शशिकला के जेल जाने के बाद से विपक्षी द्रमुक की वापसी की संभावनाएं बढ़ी हैं. हालांकि द्रमुक के नेता करुणानिधि काफी बुजुर्ग हो गए हैं और बीमार रहते है. मगर द्रमुक इसलिए आश्वस्त है कि अब अन्नाद्रमुक के पास उसे वोट दिलाने वाली नेता जयललिता नहीं रहीं. और कोई भी नेता अन्नाद्रमुक में ऐसा नहीं है जिस के नाम पर वोट मिलें.

अन्नाद्रमुक के वर्तमान नेताओं में से कोई भी द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष और करुणानिधि के वारिस एम के स्टालिन के टक्कर का नहीं है. अन्नाद्रमुक के सरकार बनाने से जिस तरह लगातार राजनीतिक संकट बना हुआ है उस से भी अन्नाद्रमुक की छवि खराब हुई है. इस से भी द्रमुक का ग्राफ बड़ा है.

पिछले चुनाव में एम के स्टालिन अपनी लोकप्रियता साबित कर चुके हैं. अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच सीटों का अंतर भले ही हो मगर वोट प्रतिशत में सिर्फ 1 प्रतिशत का फर्क है. चुनाव 4 साल बाद होना है, इसलिए इस

अंतर को पाटना मुश्किल नहीं होगा. अन्नाद्रमुक के हलके कामकाज को देखते हुए द्रमुक को अपना भविष्य सुनहरा लग रहा है.

रजनीकांत बनाम कमल हासन

फिल्मस्टार से राजनेता बने, मुख्यमंत्री बने एम जी रामचंद्रन और जयललिता की मृत्यु और लोकप्रिय अभिनेता विजयकांत की राजनीतिक पार्टी के नाकाम होने के बाद लगा था कि अब तमिलनाडु में सुपरस्टारों की राजनीति खत्म हो गई मगर लगता है राज्य की राजनीति में सुपरस्टारों का एक और दौर शुरू होगा. इन दिनों 2 सुपरस्टार राज्य की फिल्मस्टार उन्मुख राजनीति पर नजर गड़ाए हैं.

रजनीकांत राजनीति में आने का अपना इरादा खुल कर जाहिर कर चुके हैं. अब कमल हासन भी राजनीति में कूदना चाहते हैं. दोनों तमिल सिनेमा के दिग्गज और लोकप्रिय अभिनेता हैं. उन का मुकाबला राजनीति को दिलचस्प और सनसनीखेज बनाएगा.

कमल हासन और रजनीकांत  तमिल सिनेमा में एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. यह संभव है कि रजनीकांत की काट के लिए कमल हासन को भी इस क्षेत्र में उतारा जा रहा हो.

कोई दोराय नहीं है कि कमल हसन और रजनीकांत दोनों ही साउथ सिनेमा के मील के 2 पत्थर हैं. दक्षिण भारतीय फिल्मों के लिए कमल हासन को दिए गए सम्मानों की सूची बहुत लंबी है. इन्हें 4 राष्ट्रीय पुरस्कार, 10 दक्षिण भारतीय फिल्मफेयर अवार्ड, 2 फिल्मफेयर अवार्ड, 3 नंदी अवार्ड, 9 तमिलनाडु स्टेट नैशनल अवार्ड प्रदान किए गए हैं. इन सब के अलावा कमल हासन को भारतीय सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान भी दिया गया है.

कमल हासन और रजनीकांत दोनों राजनीति में उतरना चाहते हैं, इसलिए दोनों में अभी से  बयानों के जरिए नोकझोंक शुरू हो गई है. फिल्म अभिनेता कमल हासन ने एक और फिल्म अभिनेता रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश को ले कर यह कह कर विवादास्पद बयान दिया कि जहां कहीं कैमरा नजर आ जाए, वहीं रजनीकांत आप को नजर आ जाएंगे.

उल्लेखनीय है कि रजनीकांत पिछले कुछ समय से अपने प्रशंसकों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं. माना जा रहा है कि अब उन्होंने सक्रिय राजनीति में उतरने का मन बना लिया है. इस मामले को ले कर जहां कई लोगों ने इस की प्रशंसा की है वहीं कुछ लोगों ने इस पर नाराजगी जताई है.

रजनीकांत संकेत दे चुके हैं कि वे सही समय पर राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं. पिछले दिनों तमिलनाडु सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों की बौछार किए जाने से राज्य के मंत्रियों का निशाना बने प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता कमल हासन ने तमिल कविता के जरिए अपने प्रशंसकों को चौंकाने वाले संकेत दिए.

बहरहाल, कमल हासन की इच्छा से अन्नाद्रमुक सरकार के मंत्रियों और बीजेपी के नेताओं की त्योरियों पर बल पड़ गए हैं. राज्य के मंत्रियों की आलोचना का पात्र बने कमल हासन के समर्थन में अन्नाद्रमुक (अम्मा) के उपमहासचिव टीटीवी दिनाकरन ने कहा कि कमल हासन को अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है और मंत्रियों को सम्मानित ढंग से प्रतिक्रिया देनी चाहिए.

कुछ दिनों पहले कमल हासन ने कहा था कि तमिलनाडु में सिस्टम फेल हो चुका है और सभी विभागों में भ्रष्टाचार फैल चुका है. कमल हासन की इस टिप्पणी को ले कर राज्य सरकार के मंत्रियों ने उन की काफी आलोचना की. दूसरी तरफ विपक्षी दल द्रमुक, कांग्रेस, एमडीएमके, वीसीके, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और नाम तमिझर ने कमल हासन का पक्ष लिया और कहा कि कमल हासन की आवाज जनता की आवाज है.

कमल हासन के बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे किसी पार्टी में शामिल होंगे या अपनी अलग पार्टी बनाएंगे. रजनीकांत में भारतीय जनता पार्टी ने काफी दिलचस्पी दिखाई है. दरअसल, भाजपा तमिलनाडु में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है, और इस लक्ष्य को पाने के लिए वह रजनीकांत की लोकप्रियता पर सवारी करना चाहेगी. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा भी कि रजनीकांत भाजपा में शरीक हो सकते हैं.

रजनीकांत राजनीति में कूदने को ले कर अब तक हिचकते रहे हैं, लेकिन केंद्र व राज्य भाजपा के अनेक नेता उन्हें इस के लिए मनाने की कोशिशें कर रहे हैं.

तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास ऐसे नेताओं की कहानियों से भरा पड़ा है जो फिल्मों के जरिए सत्ताशिखर पर पहुंचे, जैसे करुणानिधि, एम जी रामचंद्रन और जयललिता मगर विजयकांत जैसे कई अभिनेताओं को धूल भी चाटनी पड़ी.

रजनीकांत इस जोखिम को बखूबी समझते हैं, और शायद इसीलिए वे फैसला करने से पहले उसे अच्छी तरह से तोल लेना चाहते हैं. उन की दुविधा यह है कि भाजपा इस राज्य में नहीं के बराबर है. करुणानिधि, जयललिता और रामचंद्रन इसलिए सफल हो पाए क्योंकि उन के पीछे द्रविड़ आंदोलन का इतिहास था.

अभी भी राज्य की राजनीति की मुख्यधारा को द्रविड़ पार्टियों ने घेरा हुआ है. द्रविड़ पार्टियां ही सरकार में और विपक्ष में हैं. रजनीकांत को पहले इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा जो आसान काम नहीं है. यह काम फिल्मी बाजीगरी से नहीं हो सकता.

रजनीकांत जिस भाजपा में शामिल हो कर राजनीति करना चाहते हैं उस  भाजपा के लिए तमिलनाडु की राजनीति कांटों की डगर है. तमिलनाडु उस के लिए एक पहेली ही बना हुआ है. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू पूरे देश पर छाया हुआ है, तब भी यह द्रविड़ राज्य एक चुनौती बना हुआ है. इसीलिए भाजपा वहां एक ऐसा चेहरा तलाश रही है. और रजनीकांत इस के लिए सब से उपयुक्त लगते हैं. रजनीकांत एक लोकप्रिय कलाकार हैं. उन की लोकप्रियता का जादू न सिर्फ तमिलनाडु में कायम है, बल्कि पूरे तमिलभाषी समाज में उन की जबरदस्त अपील है.

रजनीकांत उन हस्तियों में से एक थे जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के कदम का स्वागत किया था. साल 2014 के अपने चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी उन से मिलने उन के घर भी गए थे.

1990 के दशक में रजनीकांत की लोकप्रियता जब अपने चरम पर थी तब जयललिता व करुणानिधि जैसे विरोधी उन के मुकाबले में थे. अब जब जयललिता की मौत हो चुकी है और वयोवृद्ध करुणानिधि अपनी खराब सेहत से जूझ रहे हैं, तब राज्य में नेतृत्व का खालीपन सा दिख रहा है. बहुत सारे लोग इसे राज्य की राजनीति में एक अहम मोड़ के तौर पर देख रहे हैं. तमिल राजनीति की फिल्म का मुकाबला तगड़ा होगा और दिलचस्प भी.

शाहरुख खान ने क्यों कर दिया इन दो दिग्गजों के साथ काम करने से मना

पूर्व में शाहरुख खान के साथ ‘परदेस’ फिल्म बना चुके फिल्ममेकर सुभाष घई उन्हें अपनी एक वौर फिल्म में कास्ट करना चाहते थे. इस फिल्म में वह दो बड़े सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार को भी लेना चाहते थे. घई का कहना है कि इस फिल्म के लिए उन्होंने टाइटल भी सोच लिया था और इसका नाम ‘मदरलैंड’ रखना चाहते थे.

घई ने कहा, ‘साल 2003 में, मैं मदरलैंड नाम से फिल्म शुरू करना चाहता था जिसमें दिलीप कुमार साहब, अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान को कास्ट करना चाहता था. इस फिल्म के लिए स्क्रिप्ट भी तैयार थी और तीन गाने भी रिकौर्ड कर लिए गए थे लेकिन अंतिम समय पर शाहरुख खान ने इस फिल्म को इनकार कर दिया.’ उन्होंने बताया, ‘शाहरुख को लग रहा था कि फिल्म में कई सारे कैरक्टर हैं और उस समय वह सोलो हीरो के तौर पर काम करना चाहते थे लेकिन मैं मल्टीस्टारर फिल्म बनाना चाहता था.

यह कहानी ही दिलीप साहब, अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के लिए लिखी गई थी। इस फिल्म में, मैं ऐश्वर्या राय, प्रीति जिंटा और महिमा चौधरी को भी लेना चाहता था लेकिन अफसोस कि यह फिल्म नहीं बन सकी.’

हालाकि फिल्म ‘मदरलैंड’ नहीं बन सकी लेकिन घई और ‘शिखर’ की फिल्म शाहरुख के साथ बनाना चाहते थे. यह फिल्म भी बंद हो गई जिसके बाद घई ने ‘परदेस’ बनाई। उन्होंने बताया, ‘परदेस से पहले मैं शिखर नाम की फिल्म पर काम कर रहा था जिसमें जैकी श्रौफ और शाहरुख खान को कास्ट किया जाना था.

इनके साथ में, मैं किसी नई लड़की को लौन्च करना चाहता था. यह युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित एक लवस्टोरी थी. हमने इसका मुहूर्त भी कर दिया था और एआर रहमान का गाया एक गाना भी रिकौर्ड कर लिया था.’

उन्होंने बताया कि फिल्म ‘ताल’ का मशहूर गाना ‘इश्क बिना क्या जीना यारो’ असल में ‘शिखर’ के लिए रिकॉर्ड किया गया था. उन्होंने कहा, ‘जब मेरी फिल्म त्रिमूर्ति फ्लौप हो गई तो मीडिया में यह कहा जाने लगा कि आखिर 10 हिट फिल्में देने के बाद कोई फ्लौप फिल्म कैसे दे सकता है.

इसलिए अब मुझे काम करना छोड़ देना चाहिए.’ इसके बाद सुभाष घई की टीम में यह वौर फिल्म बनाने के बजाय कोई छोटी फिल्म बनाने पर ध्यान देना शुरू किया. उन्होंने बताया, ‘मेरी टीम ने सोचा ‘शिखर’ बहुत बड़ी फिल्म थी जिसमें भारी-भरकम निवेश किया जाना था. फिर हमने छोटी फिल्म बनाने का निर्णय लिया और ‘परदेस’ बनाई जो केवल 1 साल में बनकर तैयार हो गई.’

दो बहनों का संसार

अप्रैल, 2017 के पहले सप्ताह में पुलिस कमिश्नर दत्तात्रय पड़सलगीकर ने मुंबई के उपनगरीय पुलिस थानों का दौरा किया तो उपनगर कांदिवली पश्चिम के थाना चारकोप में दर्ज भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त मैनेजर प्रकाश गंगाराम वानखेड़े की गुमशुदगी की फाइल पर उन का ध्यान चला गया. उन्होंने उस फाइल का अध्ययन किया तो उन्हें लगा कि इस मामले की जांच ठीक से नहीं की गई है. उन्होंने वह फाइल जौइंट सीपी देवेन भारती को सौंपते हुए उस की जांच ठीक से कराने को कहा.

देवेन भारती को भी इस मामले की जांच में जांच अधिकारियों की लापरवाही दिखाई दी. वह कई सालों तक मुंबई क्राइम ब्रांच सीआईडी के प्रमुख रह चुके थे. उन्हें आपराधिक मामलों के खुलासे का अच्छाखासा अनुभव था. यह मामला एक साल पुराना था और बिना किसी नतीजे पर पहुंचे इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. फाइल का अध्ययन करने पर देवेन भारती को यह मामला संदिग्ध और रहस्यमय लगा तो उन्होंने सहायक अधिकारियों को बुला कर एक मीटिंग की और इस मामले की जांच उन्होंने अपने सब से विश्वस्त अधिकारी एसीपी श्रीरंग नादगौड़ा को सौंप दी.

श्रीरंग नादगौड़ा ने खुद के निर्देशन में थाना मालवणी के थानाप्रभारी दीपक फटांगरे के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर बेले, एएसआई धार्गे, कान्हेरकर, एसआई जगताप, सिपाही उगले आदि को शामिल किया. थानाप्रभारी दीपक फटांगरे भी क्राइम ब्रांच की सीआईडी यूनिट में कई सालों तक काम कर चुके थे. शायद इसीलिए पुलिस अधिकारियों को उन पर पूरा भरोसा था. उन्होंने भी इस मामले को पूरी गंभीरता से लिया. इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर पहले तो उन्होंने फाइल का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद इस मामले की जांच महाराष्ट्र के जिला अहमदनगर की शिवाजी कालोनी की रहने वाली वंदना थोरवे के यहां से शुरू की.

दरअसल, वंदना गुमशुदा भारतीय स्टेट बैंक के मैनेजर प्रकाश वानखेड़े की पत्नी आशा वानखेड़े की बहन थी. आशा ने अपने एक बयान में अहमदनगर की शिवाजी कालोनी का जिक्र किया था. इसी कालोनी में आशा की बहन वंदना रहती थी.

27 अप्रैल, 2016 को कांदिवली के सेक्टर 6 स्थित आकाश गंगाराम हाऊसिंग सोसाइटी की रहने वाली आशा वानखेड़े ने थाना चारकोप में अपने पति प्रकाश वानखेड़े की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराते समय उस ने बताया था कि उस के पति 12 अप्रैल, 2016 को घर से किसी काम से निकले तो अभी तक लौट कर नहीं आए. नौकरी से रिटायर होने के बाद वह इतने दिनों तक कभी बाहर नहीं रहे, इसलिए अब उसे उन की चिंता हो रही है.

प्रकाश वानखेड़े पढ़ेलिखे आदमी थे और अच्छी नौकरी से रिटायर हुए थे. उन की समाज में प्रतिष्ठा था. इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर थाना चारकोप के थानाप्रभारी श्री पाटिल ने तुरंत ड्यूटी पर मौजूद एसआई जगताप से डायरी बनवाई और इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को देने के साथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी. अधिकारियों के निर्देश पर थानाप्रभारी श्री पाटिल ने थाने में मौजूद पुलिस बल को कई टीमों में बांट कर प्रकाश वानखेड़े की तलाश में लगा दिया.

इस मामले में अपहरण जैसी कोई बात नहीं थी. क्योंकि अगर प्रकाश वानखेड़े का अपहरण हुआ होता तो अब तक उन की फिरौती के लिए फोन आ चुके होते. पुलिस का ध्यान दुर्घटना की ओर गया. थाना चारकोप पुलिस ने शहर के सभी थानों को वायरलैस मैसेज भेज कर इस बारे में पता किया. इस के बाद प्रकाश वानखेड़े के फोटो वाले पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवाए. दैनिक अखबारों में भी छपवाया गया. लेकिन इस सब का कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस प्रकाश वानखेड़े के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर उस का अध्ययन कर रही थी कि तभी उन की गुमशुदगी की शिकायत के 2 सप्ताह बाद उन की पत्नी आशा ने थाने आ कर बताया कि उसे पता चला है कि उस के पति प्रकाश वानखेड़े 31 मई, 2016 को अहमदगनर की शिवाजी कालोनी में रहने वाली उस की छोटी बहन वंदना थोरवे के यहां थे. वह उस की बहन वंदना को कुछ पैसे देने गए थे.

चूंकि आशा ने ही इस मामले की शिकायत की थी, इसलिए पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास कर लिया और इस के बाद इस मामले की जांच में सुस्ती आ गई. समय आगे बढ़ता रहा, हालांकि इस बीच जांच टीम ने कई बार आशा वानखेड़े से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस उस से मिल नहीं पाई. इस के बाद लगातार त्यौहार आते रहे, जिस की वजह से पुलिस इस मामले पर ध्यान नहीं दे पाई और एक तरह से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया.

लेकिन अचानक 8 अप्रैल, 2017 को मुंबई के पुलिस कमिश्नर दत्तात्रय पड़सलगीकर की इस फाइल पर नजर पड़ी तो एक बार फिर इस मामले की जांच शुरू हो गई. पुलिस ने गुमशुदा प्रकाश वानखेड़े की पत्नी आशा को थाने बुलाया. लेकिन वह बहाना कर के थाने नहीं आई. ऐसा कई बार हुआ. इस बार पुलिस इस मामले को हल्के में नहीं लेना चाहती थी, इसलिए उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई.

पुलिस ने प्रकाश और आशा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाने के साथसाथ लोकेशन भी निकलवाई तो जो जानकारी मिली, वह चौंकाने वाली थी. आशा ने अपने पति प्रकाश वानखेडे़ के गायब होने की जो तारीख बताई थी, उस के एक दिन पहले यानी 11 अप्रैल, 2016 को दोनों के मोबाइल फोन की लोकेशन एक साथ की मिल रही थी.

पतिपत्नी अहमदनगर की शिवाजी कालोनी में एक साथ थे. आशा की छोटी बहन वंदना थोरवे वहीं रहती थी. अगले दिन यानी 12 अप्रैल, 2016 को वंदना के मोबाइल की लोकेशन चारकोप स्थित आशा के घर की मिली थी.

जबकि पूछताछ में आशा ने पुलिस को स्पष्ट बताया था कि वंदना के पास कोई मोबाइल फोन नहीं है. वह मोबाइल फोन चला ही नहीं पाती. इस के बाद पुलिस ने आशा के फोन से वंदना का नंबर ले कर उसे फोन किया तो उस ने पुलिस से बात ही नहीं की, बल्कि यह भी बताया कि किस दिन प्रकाश वानखेड़े गायब हुए थे. जिस दिन वह गायब हुए थे, उस दिन वह मुंबई में बहन के घर थी. वह बड़ी बहन आशा को उस के घर ले आई थी.

मोबाइल फोन की लोकेशन से पुलिस को वंदना और आशा पर संदेह हुआ. इस के बाद एसीपी श्रीरंग नादगौड़ा के निर्देशन में थानाप्रभारी दीपक फटांगरे ने 12 अप्रैल, 2017 को संदेह के आधार  पर वंदना थोरवे को अहमदनगर स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस उसे गिरफ्तार कर थाना चारकोप ले आई. पुलिस ने उसे भले ही गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. वह जरा भी डरी या घबराई हुई नहीं थी. थाने में पूछताछ शुरू हुई तो वह पुलिस के हर सवाल का जवाब बड़े आत्मविश्वास से देती रही. वह खुद को इस मामले में निर्दोष और अनभिज्ञ बताती रही.

लेकिन पुलिस के पास अब तक काफी सबूत जमा हो चुके थे, इसलिए पुलिस उसे आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी. पुलिस ने उस से सबूतों के आधार पर सवाल पूछने शुरू किए तो वह जवाब देने में गड़बड़ाने लगी. धीरेधीरे पुलिस ने उसे ऐसा फांसा कि अंतत: बचाव का कोई उपाय न देख उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद वंदना ने प्रकाश वानखेड़े की गुमशुदगी का जो रहस्य बताया, वह चौंकाने वाला था. यही नहीं, उस ने अपने पति अशोक थोरवे की भी गुमशुदगी का रहस्य उजागर कर दिया. पता चला कि वह अपने प्रेमी नीलेश पंडित सूपेकर की मदद से बहनोई प्रकाश वानखेड़े की ही नहीं, अपने पति अशोक थोरवे की भी हत्या करा चुकी थी.

वंदना के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने मुंबई से आशा तथा सोलापुर से वंदना के प्रेमी नीलेश पंडित सूपेकर को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में तीनों ने प्रकाश वानखेड़े और अशोक थोरवे की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

आशा और वंदना महाराष्ट्र के जिला संगली की रहने वाली थीं. इन के पिता सहदेव खेतले मुंबई पुलिस में थे. वह सरकारी नौकरी में थे, परिवार छोटा था, इसलिए वह हर तरह से सुखी थे. उन के परिवार में सिर्फ 4 ही लोग थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. उन की पत्नी पार्वती संस्कारी गृहिणी थीं, इसलिए उन्होंने दोनों बेटियों को भी अच्छे संस्कार दिए थे. लेकिन समय के साथ उन के दिए सारे संस्कार दोनों बेटियों ने ताक पर रख दिए.

आशा और वंदना सयानी हुईं तो सहदेव को उन की शादी की चिंता हुई. वह दोनों बेटियों की शादी नौकरी करते हुए कर देना चाहते थे. उन्होंने किया भी ऐसा ही. उन्होंने आशा की शादी प्रकाश वानखेड़े से कर दी. प्रकाश वानखेड़े एसबीआई बैंक में नौकरी करते थे. शादी के बाद वह आशा के साथ मुंबई के उपनगर कांदिवली के चारकोप में रहने लगे थे.

बड़ी बेटी की शादी कर के सहदेव वंदना की भी शादी अहमदनगर की शिवाजी कालोनी के रहने वाले अशोक थोरवे से कर दी. अशोक का अपना कारोबार था. वंदना अपनी बड़ी बहन आशा से कुछ ज्यादा सुंदर और चंचल तो थी ही, महत्वाकांक्षी भी काफी थी. लेकिन तब उस के महत्वाकांक्षा की हत्या सी हो गई, जब उसे उस के मनपसंद का पति नहीं मिला.

वंदना कारोबारी या खेती करने वाले लड़के से शादी नहीं करना चाहती थी. वह भी बड़ी बहन आशा की तरह हैंडसम और अच्छी नौकरी वाला पति चाहती थी. लेकिन पिता ने उस के लिए ऐसा पति ढूंढ दिया था, जैसा वह बिलकुल नहीं चाहती थी. लेकिन शादी के बाद उस ने समझौता कर लिया था.

पर वंदना को तो अभी और परेशान होना था. शादी के कुछ सालों बाद वंदना के पति अशोक की तबीयत खराब रहने लगी. दिखाने पर डाक्टरों ने उसे जो बीमारी बताई, वह काफी गंभीर थी. इस के बाद वंदना का रहासहा धैर्य भी जवाब दे गया. पति के संपर्क में आने के बाद वंदना भी उस बीमारी की शिकार हो गई.

वंदना ने इस के लिए पिता को जिम्मेदार माना. इस के बाद इसी बात को ले कर वह अकसर पिता से लड़ाईझगड़ा करने लगी. बापबेटी का यह झगड़ा तभी खत्म हुआ, जब सहदेव की मौत हो गई. उन की मौत जहर से हुई थी. लेकिन तब यह पता नहीं चला था कि उन्हें जहर दिया गया था या उन्होंने खुद जहर पिया था.

पति की बीमारी की वजह से वंदना की आर्थिक स्थिति धीरेधीरे खराब होती गई, जिस के कारण उसे पति का इलाज कराने में परेशानी होने लगी थी. उस स्थिति में उस की मदद के लिए लोकहितवादी संस्था में काम करने वाला नीलेश पंडित सूपेकर आगे आया. वह भी उसी कालोनी में रहता था, जिस में वंदना रहती थी.

23 साल का नीलेश पंडित काफी स्मार्ट था. वह वंदना की हर तरह से मदद करने लगा. कहा जाता है कि जहां फूस और आग होगी, वहां शोले भड़केंगे ही. इस कहावत को वंदना और नीलेश पंडित ने चरितार्थ कर दिया. वंदना की मदद करतेकरते नीलेश उस के इतने करीब आ गया कि दोनों में मधुर संबंध बन गए.

काफी इलाज के बाद भी अशोक ठीक नहीं हुआ. बीमारी की वजह से वह काफी चिड़चिड़ा हो गया था. वह बातबात में वंदना को भद्दीभद्दी गालियां देता रहता था, जिस से परेशान हो कर वंदना और नीलेश पंडित ने एक खतरनाक फैसला ले लिया.

उन का सोचना था कि उन के इस फैसले से जहां अशोक थोरवे का कष्ट दूर हो जाएगा, वहीं उन्हें भी उस से मुक्ति मिल जाएगी. फिर क्या था, एक दिन अशोक थोरवे सो रहा था, तभी वंदना और नीलेश ने गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए वंदना और नीलेश ने उसे एक प्लास्टिक की बोरी में भर दिया और रात में ही उसे ले जा कर बीड़ जनपद के अंभोरा पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले जंगल में फेंक दिया.

12 नवंबर, 2012 की सुबह थाना अंभोरा पुलिस ने अशोक थोरवे की लाश बरामद की थी. लेकिन काफी कोशिश के बाद भी लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर लाश को लावारिस मान कर अंतिम संस्कार कर दिया.

एक ओर जहां वंदना तरहतरह की परेशानियां झेल रही थी, वहीं आशा का दांपत्यजीवन काफी सुखमय था. उस के दांपत्य में दरार तब आई, जब प्रकाश वानखेड़े वंदना की मदद करने के बहाने उस का शारीरिक शोषण करने लगा. जब इस की जानकारी आशा को हुई तो उसे पति से नफरत सी हो गई. उस ने पति को खूब लताड़ा. इस से पतिपत्नी के बीच तनाव रहने लगा.

इस का नतीजा यह निकला कि पतिपत्नी एकदूसरे से दूर होते गए. इस की एक वजह यह भी थी कि प्रकाश आशा पर चरित्रहीनता का आरोप लगा कर उसे परेशान करने लगा था. सहनशक्ति की भी एक हद होती है. प्रकाश के लगातार परेशान करने से आशा की भी सहनशक्ति जवाब दे गई.

हार कर आशा ने अपनी परेशानी बहन वंदना को बताई तो उस ने कहा कि इस परेशानी से छुटकारा तो मिल जाएगा, लेकिन इस के लिए कुछ पैसे खर्च करने होंगे. वंदना ने उपाय बताया तो आशा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. लेकिन रोजरोज की परेशानी के बारे में सोचा तो आखिर उस ने बहन की बात मान ली. आशा ने सवा 2 लाख रुपए में पति प्रकाश वानखेड़े की जिंदगी का सौदा कर डाला.

अशोक थोरवे की हत्या कर के बच जाने से वंदना और नीलेश पंडित के हौसले बुलंद थे. उन्होंने जिस तरह अशोक की हत्या का राज हजम कर लिया था, सोचा उसी तरह इसे भी हजम कर जाएंगे. 5 साल बीत जाने के बाद भी पुलिस अशोक थोरवे के हत्यारों तक नहीं पहुंच पाई थी. वे उसी तरह प्रकाश वानखेड़े की भी हत्या कर के बच जाना चाहते थे. लेकिन दुर्भाग्य से इस में सफल नहीं हुए. एक साल बाद ही सही, आखिर सभी पकड़े गए.

आशा की सहमति मिलने के बाद वंदना और नीलेश पंडित ने प्रकाश वानखेड़े को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत वंदना ने अपने जीजा प्रकाश और बहन आशा को 10 अप्रैल, 2016 को पूजापाठ के बहाने अपने घर बुलाया. वंदना के बुलाने पर प्रकाश वानखेड़े खुशीखुशी आशा के साथ एक प्राइवेट कार से उस के घर पहुंच गए.

जिस समय वह वंदना के घर पहुंचे थे, उस समय रात के 8 बज रहे थे. घर पहुंचे प्रकाश का वंदना ने अच्छी तरह से स्वागत किया. योजना के अनुसार उन के खाने में नींद की गोलियां मिला दी गईं. जब वह सो गए तो 10-11 बजे आशा ने प्रकाश के पैर पकड़े तो वंदना ने दोनों हाथ. इस के बाद नीलेश ने गला दबा कर उन्हें मार डाला.

प्रकाश वानखेड़े की हत्या कर तीनों ने उन की लाश को बोरी में ठूंस कर भर दिया. इस के बाद नीलेश पंडित ने लाश की बोरी को स्कौर्पियो में रख कर कल्याण अहमदनगर हाईवे रोड पर स्थित जंगल में ले जा कर फेंक दिया. कुछ दिनों बाद अहमदनगर के थाना पारनेर पुलिस को प्रकाश का अस्थिपंजर मिला था.

प्रकाश की लाश ठिकाने लगा कर आशा बहन के साथ अपने घर आ गई. जब कई दिनों तक प्रकाश दिखाई नहीं दिया तो पड़ोसियों में कानाफूसी होने लगी. कुछ लोगों ने आशा से उन के बारे में पूछा भी. आशा भला उन लोगों को क्या बताती. पड़ोसियों की इस पूछताछ से घबरा कर उस ने खुद को बचाने के लिए थाना चारकोप में उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

पुलिस तुरंत तो नहीं, लेकिन साल भर बाद प्रकाश वानखेड़े की गुमशुदगी के रहस्य उजागर कर ही दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने आशा, वंदना और नीलेश पंडित को अहमदनगर के थाना पारनेर पुलिस को सौंप दिया.

वहां तीनों के खिलाफ प्रकाश वानखेड़े, अशोक थोरवे की हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे. थाना पारनेर पुलिस अब आशा और वंदना के पिता की रहस्यमय मौत की जांच कर रही है. पुलिस इस बात का पता लगा रही है कि उन्होंने आत्महत्या की थी या उन्हें जहर दे कर मारा गया था.

– कथा में सहदेव खेलते का नाम काल्पनिक है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

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