पश्चिम बंगाल : फर्जी और चिटफंड कंपनियों का केंद्र

कई वर्षों से फर्जी और चिटफंड कंपनियों का केंद्र रहा है पश्चिम बंगाल. दूसरे राज्यों से ज्यादा, चिटफंड कंपनियों ने बंगाल को अपना आशियाना बनाया और परवान चढ़ने के साथसाथ जनता को लूटने का काम किया. पश्चिम बंगाल में फर्जी कंपनियों की शुरुआत वास्तव में वाम मोरचा के शासनकाल में हुई.

वाम मोरचा सरकार के ढीले रवैए के कारण ज्यादातर चिटफंड कंपनियों ने यहां अपना डेरा जमाया और लालच दे कर जनता को लूटने का काम शुरू कर दिया. यहां की जनता को एक के बाद एक सब्जबाग दिखाए गए और उन की जेबें खाली कर दी गईं. ये चिटफंड कंपनियां अभी परवान चढ़ ही रही थीं कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो गया.

चिटफंड कंपनियां पसोपेश में थीं कि नई सरकार के आने से उन का धंधा कहीं मंदा न पड़ जाए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि चिटफंड कंपनियों का धंधा और भी चोखा हो उठा. फिर तो तमाम चिटफंड कंपनियों की पांचों उंगलियां घी में सन गईं.

तृणमूल कांग्रेस की नई सरकार ने उन्हें रोकने के बजाय उन का हौसला बढ़ाया. परिणामस्वरूप चिटफंट कंपनियों का कारोबार इतनी तेजी से बढ़ा, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. दरअसल, सत्तासीन पार्टी के नेताओं और मंत्रियों ने चिटफंड कंपनियों के कार्यक्रमों में धड़ल्ले से जाना शुरू कर दिया. लिहाजा, फर्जी और चिटफंड कंपनियों का सीना इतना चौड़ा हो गया कि पूछिए मत. इन कंपनियों के लोग दिनदूनी रातचौगुनी तरक्की करने लगे. साथ ही, सत्तासीन पार्टी के मंत्रियों और नेताओं को भी भरपूर फायदा होने लगा. पार्टी फंड गुलजार रहने लगा.

उधर प्रदेश की भोलीभाली जनता का विश्वास भी इन कंपनियों पर तेजी से बढ़ने लगा, क्योंकि उन के जनप्रतिनिधि भी चिटफंड कंपनियों के कार्यक्रमों में खुलेआम जाने लगे. यहां तक कि प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्र्जी भी इन कंपनियों के समारोहों में जाने लगीं. इस से जनता का भरोसा और भी दृढ़ हो गया.

बंगाल की जनता को लगने लगा कि जब उन की मुख्यमंत्री तक चिटफंड कंपनियों के साथ हैं, तो उन का पैसा बिलकुल सुरक्षित है. मगर, उन्हें यह नहीं पता था कि ये तमाम चिटफंड कंपनियां उन्हें धोखा दे रहीं हैं. सच तो यह है कि ममता बनर्जी के शासनकाल में बंगाल फर्जी कंपनियों का एक बड़ा केंद्र बन गया.

ममता बनर्जी ने भले ही इन कंपनियों का बहुत ज्यादा फायदा नहीं उठाया हो मगर उन के सिपहसालारों ने तो अति ही कर दी. जांच के बाद अब एक के बाद एक परत उघड़ रही है. कई चेहरे बेनकाब हुए. अभी और चेहरे बेनकाब होने बाकी हैं.

लुट गई जनता

अफसोस की बात यह भी है कि जब तक इन चिटफंड कंपनियों का चेहरा सामने आया, तब तक जनता पूरी तरह लुट चुकी थी. करोड़ों रुपए बाजार से उठा लिए गए थे. लोग करें भी तो क्या करें. चिटफंड कंपनियों के दफ्तरों के बाहर लटके ताले बुरी तरह उन का मुंह चिढ़ा रहे थे. कंपनियों के एजेंट और अधिकारी तक फरार. बंद पड़े दफ्तरों के सामने महज शोरशराबा कर के लौट आने के सिवा और कोई रास्ता भी नहीं बचा था लुटेपिटे लोगों के पास.

पुलिस को रिपोर्ट कर के भी कोई फायदा नहीं और सत्तासीन पार्टी के वे नेता व मंत्री भी ऐसे पल्ला झाड़ने लगे मानो उन कंपनियों से उन का कोई संबंध ही नहीं था.

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का कहना है, ‘‘तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों ने चिटफंड कंपनियों से जम कर फायदा लिया. छोटेछोटे कार्यक्रमों के लिए बड़े डोनेशन लिए गए. ममता सरकार ने

इन कंपनियों को शह दी. इसी का नतीजा है कि आज लोगों के करोड़ों रुपए डूब गए. पाईपाई जोड़ कर लोगों ने हजारोंलाखों रुपए जमा किए लेकिन मिला कुछ भी नहीं.’’

गौरतलब है कि सारदा घोटाले के बाद ममता सरकार ने लोगों को उन के पैसे लौटने का वादा भी किया. मजे की बात तो यह है कि प्रदेश के कुछ हिस्सों में टीएमसी के नेताओं और मंत्रियों ने लोगों में चैक भी बांटे. मगर तकरीबन सारे चैक बाउंस हो गए. इस के बाद भी बेशुमार वादे और दावे किए गए मगर सभी बेकार साबित हुए.

आज भी यहां के लोग उस घड़ी को कोस रहे हैं जब ज्यादा पाने के लालच में उन्होंने अपने जीवन की गाढ़ी कमाई तक चिटफंड कंपनियों को दे दी. आखिर, मिला कुछ भी नहीं.

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, बंगाल में बीसियों चिटफंड कंपनियों ने अपने पैर जमाए और यहां की जनता को खूब सब्जबाग दिखाए. कमाल की बात है कि मां, माटी व मानुष का नारा देने वाली ममता सरकार ने चिटफंड कंपनियों को इतनी शह दे दी कि उन के प्रदेश में मानुष कंगाल हो गए. लोगों ने बेटियों की शादी तक के लिए रखे रुपए चिटफंड कंपनियों में लगा दिए ताकि उन्हें मोटी रकम मिल सके. मगर कंपनियों ने तो उन्हें लूट ही लिया.

टीएमसी के शासन में औद्योगिक विकास की दिशा में कोई सार्थक निवेश तो नहीं हुआ, फर्जी कंपनियां कुकुरमुत्ते की तरह जरूर बढ़ीं. एक दौर था जब इन फर्जी कंपनियों का इतना बोलबाला था कि लोग बैंक और पोस्टऔफिस तक जाना भूल गए थे. याद था तो बस चिटफंड कंपनियों का दफ्तर.

दरअसल, लोगों को इतने ऊंचेऊंचे सपने इन फर्जी कंपनियों ने दिखा दिए कि उन की आंखों पर लालच का मोटा परदा पड़ गया. ऊपर से सत्तासीन पार्टी के नेताओं ने उन के कार्यक्रमों में जाजा कर उन के परदे को और मोटा कर दिया.

मजे की बात तो यह है कि करोड़ोंअरबों रुपए बाजार से उठाने वाली इन कंपनियों के पास आज लौटाने को कुछ भी नहीं है. सरकार के पास लोगों ने लगातार शिकायतें भी कीं लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. बस, जांच चल रही है. आप को बताता चलूं यहां ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी जिंदगीभर की कमाई इन कंपनियों में लगा दी. उन का रुपया मिल पाएगा या नहीं, इस का जवाब किसी के पास नहीं.

हालांकि, विमुद्रीकरण के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से एक टास्क फोर्स का गठन किया गया. टास्क फोर्स ने इन चिटफंड कंपनियों पर लगाम लगाते हुए कार्यवाही शुरू की. टास्क फोर्स के मुताबिक, नवंबर-दिसंबर, 2016 के दौरान ऐसी कंपनियों की ओर से 1,238 करोड़ रुपए बैंकों में जमा हुए हैं. इस में कुछ विशेषज्ञों की मदद ली गई है. लगभग 54 सौ करोड़ रुपए ठिकाने लगाए गए.

इस मामले में ईडी कोलकाता 90 फर्जी कंपनियों की जांचपड़ताल में जुटा हुआ है. इस में टीएमसी के कुछ नेताओं की भी मिलीभगत है. सीबीआई इस मामले को ले कर काफी सक्रिय है और जल्दी ही जांच की कार्यवाही में और भी तीव्रता आने की आशा है. सीबीआई पूर्ण जांच कर के मुकदमा दायर करने वाली है.

बंगाल में 2011 से 2015 के बीच 17 हजार चिटफंड कंपनियों का रजिस्ट्रेशन हुआ. दरअसल, भारत में कुल 15 लाख कंपनियां रजिस्टर्ड हैं, जिन में से लगभग

6 लाख कंपनियां ही नियमित आय का रिटर्न फाइल करती हैं. इन में से लाखों कंपनियां महज कागजों पर ही हैं, जिन्हें फर्जी कंपनी कहा जाता है.

गौरतलब है कि चिटफंड कंपनियों की तरह ही फर्जी कंपनियां भी सब से ज्यादा पश्चिम बंगाल में हैं. इन का इस्तेमाल काली कमाई को सफेद और सफेद को काला करने के लिए किया जाता है. पश्चिम बंगाल में पनप रही फर्जी कंपनियों की चर्चा एसआईटी ने भी की है. एसआईटी की नजर कालेधन पर रहती है. एसआईटी ने इस का खुलासा किया है, मगर इस पर उचित कार्यवाही भी होनी चाहिए. हालांकि, सेबी के रडार पर दर्जनों चिटफंड कंपनियां हैं.

फर्जी कंपनियां बंगाल में ही क्यों

पश्चिम बंगाल, विशेषकर कोलकाता शहर और आसपास के शहरों में चिटफंड से संबंधित काम करने वाले प्रोफैशनल्स और ऐक्सपर्ट्स काफी हैं. दरअसल, पश्चिम बंगाल में व्यापारिक एवं औद्योगिक विकास का ग्राफ बहुत कम हो गया है. यही कारण है कि सीए तथा अकाउंट्स ऐक्सपर्ट्स व प्रोफैशनल्स के पास काम नहीं है और वे काफी सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं.

1 करोड़ रुपए पर 24 प्रतिशत टैक्स देने के हिसाब से 24 लाख रुपए लगते हैं, लेकिन कोलकाता में किसी भी अकाउंट्स कंपनी के औपरेटर को 50 हजार रुपए दीजिए, वह आप के टैक्स के 24 लाख रुपए बचा देता है. एक सर्वेक्षण के अनुसार, कोलकाता में ऐसी हजारों कंपनियां हैं, जिन के लिए 6 हजार से ज्यादा चार्टर्ड अकाउंटैंट्स गैरकानूनी तरीके से काम करते हैं.

अकेले हैं तो क्या गम है

दो दिनों पहले आए एक फोन ने मुझे चौंका दिया. मेरे दूर के एक बुजुर्ग रिश्तेदार का फोन था. उन्होंने कहा, ‘‘एक सरप्राइज पार्टी है कल. होटल अंश में तुम सब चले आना शाम 7 बजे तक और खाना मेरे संग खाना.’’

शाम तक पता चला कि शहर में रहने वाले अन्य रिश्तेदारों के पास भी उन का फोन आया है. अचानक भूलेबिसरे से हमारे ये बुजुर्ग चाचाजी हमारी चर्चा में आ गए. वर्षों पहले चाचीजी का निधन हो चुका था. चाचाजी पैंशन पाते थे और एक सामाजिक संस्थान से जुडे़ थे. पहले तो कई महीने चाचीजी के गम में बीमार ही पड़े रहे थे. बाद में उन के ही एक मित्र ने उन्हें उस संस्थान से जुड़ने को प्रेरित किया. धीरेधीरे वे उस संस्थान के क्रियाकलाप में व्यस्त रहने लगे थे.

नियत समय से कुछ पहले ही मैं होटल पहुंच गई थी, चाचाजी अकेले ही बैठे होटल मैनेजर से कुछ बातें करते दिखे. पता चला उन्होंने खुद ही अपना 80वां जन्मदिन मनाने का फैसला किया और सभी जीवित दोस्तों व रिश्तेदारों को आमंत्रित किया है. यहां तक कि दूसरे शहरों में रहने वाले उन के बच्चे भी मेहमान की ही तरह पहुंचे थे. उन्हें भी भनक नहीं लगने दी थी चाचाजी ने.

मैनेजर ने बताया कि अंकलजी 2-3 महीने से तैयारी कर रहे हैं. कभी कोई सुझाव देते हैं, कभी कोई बदलाव करते हैं.

सच, हम सब ने चाचाजी को बिसरा ही दिया था. पिछले साल मेरे बेटे की शादी में ही उन से मिलना हुआ था. मैं ने पूछा, ‘‘चाचाजी, आप के उस संस्थान में क्या और कैसी गतिविधियां चल रही हैं?’’ तो चाचाजी ने बताया, ‘‘मैं जिस सामाजिक संस्थान से जुड़ा हूं वह बेसहारा और गरीब बुजुर्गों के लिए कार्य करता है. उस से जुड़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि सच में मेरा गम बहुत कम है. दूसरों को देख मुझे महसूस हुआ कि मेरे पास जो मौजूद है वह खुश रहने के लिए काफी है.’’

नियत समय पर पार्टी शुरू हुई. केक पर बड़ा सा 80 लिखा था जिसे उन्होंने काटा. धीमे संगीत पर हम सब के साथ उन्होंने भी थोड़ा कदम मिलाया. उन्हें देख मैं सोच रही थी कि ‘कोई मेरे लिए करे’ की जगह इन्होंने खुद ही अपने लिए सारा आयोजन कर लिया था. दोस्तोंरिश्तेदारों के संग हंसतेबोलते चाचाजी जीवन का कितना बड़ा सबक हमें सिखा रहे थे कि खुद के लिए भी जीना चाहिए. मेहमानों में उन के संस्थान से आए बुजुर्ग भी थे.

जीवनसाथी का साथ

चाचाजी की बड़ी सी मित्रमंडली भी बड़ी कमाल की दिखी, कोई बचपन का मित्र था तो कोई सहकर्मी तो कोई मिल्कबूथ का सुबह का साथी. सभी बेहद खुशमिजाज और जीवन से भरपूर दिखे. जीवन के प्रति उन की सकारात्मकता देख बहुत ही अच्छा लगा. सभी मित्रों को बच्चों की तरह पोज दे, उन का सैल्फी लेते देखना सुखकर था.

बुढ़ापा और तिस पर अकेलापन अकसर लोगों के लिए दुखदायी बन जाता है. जब उम्र की फसल पकने लगती है और उसी समय किसी एक का चले जाना दूजे के लिए बेहद कष्टमय हो जाता है. यही वह समय होता है जब जीवनसाथी या संगिनी की सब से ज्यादा जरूरत है. परंतु मृत्यु पर किस का वश है. कभी न कभी एक को अकेले जीने को विवश होना ही होता है.

मेरी एक सहेली है ताप्ती, बेहद चुस्तदुरुस्त और फुरतीली. घरबाहर के सारे काम करती, पति को दैनिक कार्यों से बिलकुल मुक्त रखती. परंतु पति की असमय मृत्यु से उसे ऐसा सदमा पहुंचा कि उबर ही नहीं पाई. वह कहते हैं न, कि मरने वाले के संग कोई थोड़े चला जाता है पर ताप्ती ने सच में जीतेजी मानो दुनिया छोड़ दी. लोगों से खुद को काट लिया. जीवन के हर रंग से मुंह मोड़ लिया. आज सालों बीत गए हैं पर उस की दुनिया वहीं ठहरी हुई है. उदास, बेजार, बीमार… अफसोस होता है उस जिंदा लाश को देख जिस के बच्चे उस के जीतेजी अनाथ हो गए.

मुझे नेहा की याद आ रही है जो पति के दुनिया से जाने के बाद बदहवास सी हो गई थीं. घर उन्हें मानो काटने को दौड़ने लगा था. फिर एक दिन बेटे के साथ अपने गांव गईं, जहां पहले 2-4 सालों पर ही जाती थीं. इस बार उन्हें वहां की ठहरी हुई जिंदगी सुकूनदायी लगी और जिद कर के वहीं रुक गईं. बेटे ने भी सोचा कि स्थानपरिवर्तन से शायद मां को अच्छा महसूस हो.

अधबना सा घर था और थोड़े खेत. पहले खेत को बटाई पर दिया करती थीं, इस बार उन्होंने मजदूर रख खुद ही धान लगवाया और अधबने घर को पूरा करवाने लगीं. गांव में रहने वाले उन के रिश्तेदार उन की मदद कर दिया करते थे. 2 महीने बीततेबीतते बेटा वापस आने की जिद करने लगा. पर नेहा कभी कहा कि खेतों में दवा का छिड़काव करवाना है तो कभी कहा कि कमरे की छत ढलवानी है. आजकल करते वे 7-8 महने वहां रह गईं.

इस बीच वे इतना व्यस्त रहीं कि पति के गुजरने के बाद की बदहवासी से वे उबर गईं. अब उन्हें एक मकसद मिल गया. हर साल धान लगवाने के मौसम में वे गांव चली जातीं और कुछ महीने वहां रहतीं. कुछ न कुछ निर्माण और रचनात्मक कार्य करवा कर सालभर खाने लायक चावल व अन्य फसल रख, कुछ बेच कर ही वापस लौटतीं. 60 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार आर्थिकरूप से आत्मनिर्भरता व आत्मबल का अनुभव हुआ.

उदासी दूर करें

मेरे ससुरजी बेहद चुस्तदुरुस्त और पेशे से इंजीनियर थे. सासससुर दोनों आराम से अपने शहर में बिना किसी के सहारे रहते थे. फिर जब सास चली गईं 70 की उम्र में, तो ससुरजी को अकेलापन खाने लगा. वे हमारे साथ रहने लगे पर उन की उदासी देखी न जाती थी.

इस बीच, मेरी बेटी आई. वह अपने दादाजी के लिए एक स्मार्टफोन लेती आई, जो उस वक्त नयानया ही निकला था. टैक्निकल आदमी तो वे थे ही, नई तकनीक सीखने की ललक उन्हें व्यस्त रखने लगी. जब तक बेटी रही वह दादाजी को सिखाती रही, कभी जल्दी समझते नहीं तो कभी भूल जाते. पर फिर सीखते और फिर पूछते. फिर तो वे नौजवानों की ही तरह अपने मोबाइल पर व्यस्त रहने लगे.

हम सब की सहायता से उन्होंने न सिर्फ मोबाइल चलाना सीखा बल्कि वे लैपटौप भी चलाने लगे. 74 की उम्र में उन्होंने सोशल नैटवर्किंग, गूगल और डाउनलोडिंग सीख अपने जीवन को काफी रोमांचक व व्यस्त बना लिया था. उन के दोस्त इस उम्र में जहां भजन व पूजापाठ में दिन गुजारते, वे इंटरनैट पर दुनिया में क्या नया हो रहा है, देखतेपढ़ते.

राधिका जब अपने घर एक झबरे पप्पी को ले कर आई थी तो सब से ज्यादा उस की सास ने ही विरोध किया था. परंतु धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के पक्के साथी बन गए. जब सब स्कूल और दफ्तर चले जाते तो राधिका की विधवा सास को टीवी देखने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था. पर उस पशु के आने के बाद न चाहते हुए भी वे उस की देखभाल करने लगीं और वह एक सच्चे मित्र की तरह दिनभर उन के साथ डोलता रहता. उस पप्पी ने उन के अकेलेपन की शून्यता को अपनी मूक उपस्थिति से हर लिया था.

खुशी के बहाने ढूंढ़ें

मुग्धा अपने दादाजी के मरने के बाद अपनी दादीजी को अपने साथ बेंगलुरु लेती गई थी. वहां वह एक पब्लिकेशन हाउस में काम करती थी. वह देखती कि दादी अकसर एक डायरी को सीने से लगाए रहती थीं, कभी झुक कर कुछ लिखती हुई भी दिखतीं.

एक दिन उत्सुकतावश मुग्धा ने उस डायरी के पन्ने को पलटना शुरू किया. डायरी क्या, वह तो दस्तावेज था दादादादी की प्रेमभरी गृहस्थी का, जीवन का. उस में उन के विवाह के शुरुआती दिनों में लिखी प्रेम कविताएं थीं तो सासूमां द्वारा दिए दुख भी गीतों की शक्ल में अश्रु अंकित थे. मुग्धा के पापा के जन्म के समय की ममताभरी रचनाएं थीं… तो आखिर में उस के दादाजी की बीमारी की दौरान उन के मन में उठती भावनाएं और जाने के बाद के विछोह का दर्द भी शब्द बन वहां रचेबसे थे.

मेरे दफ्तर में शेषाद्री साहब थे. ठीक रिटायरमैंट के पहले उन की पत्नी लंबी बीमारी के बाद चल बसीं. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी और दोनों ही विदेश में रहती थीं. रिटायरमैंट के बाद सुना कि उन्होंने अपनी सैक्रेटरी कुंआरी व अधेड़ मरियम से शादी कर ली. बेटियां ऐसे भी कम ही आती थीं, उस के बाद तो आना ही छोड़ दिया.

लोगबाग कहते कि पहले से ही चक्कर था या सैके्रटरी ने पैसे के लालच में फांस लिया. जितनी मुंह उतनी बातें. परंतु दिल का एक कोना खुश होता उन्हें देख, जब वे रोज सुबह मरियम को कार से औफिस छोड़ जाते, शाम को लेने आते.

बाजार में दोनों साथ खरीदारी करते या टहलते दिख जाते तो लोगों को याद आ जाते विधुर महेश्वरजी, जो बेटी के घर के एक कोने में चुपचाप, सिर्फ मृत्यु के इंतजार में मानो दिन काट रहे हों, पड़े रहते हैं. कम से कम उन से तो बेहतर जीवन चुना शेषाद्रीजी ने.

सच, चाचाजी की जन्मदिन पार्टी जीवन के प्रति हर हाल में सकारात्मक रवैया बनाए रखने की प्रेरणा दे गई. कुछ लोग मरने के लिए जीते हैं. वहीं, कुछ लोग मरते दम तक जीते रहते हैं.

कौमेडी को चाहिये ब्यूटी का तड़का

कौमेडी शो केवल कौमेडियन के बल पर हिट नहीं हो सकते. इनको हिट कराने के लिये खूबसूरत हीरोइनों की जरूरत भी होती है. हर कौमेडी शो में यह परंपरा कायम है. टीवी के सास बहू शो में संस्कारी बहू की भूमिका निभाते निभाते थक गई हीरोइनें ऐसे शो में आकर ग्लैमर का तडका लगाकर कामेडी शो को हिट करने में लग जाती है.

कलर्स चैनल पर आने वाले कामेडी शो ‘इंटरटेंमेंट की रात’ में मुबीन सौदागर के साथ खूबसूरत दीपिका कक्कड को भी प्रमुख रूप से शामिल किया गया है. दीपिका टीवी का जाना पहचाना चेहरा है. दीपिका ने ‘ससुराल सिमर का’ में 6 साल मेन लीड किया है.

आज टीवी के बदलते स्वरूप की चर्चा करते दीपिका ने कहा कि अब वीकेंड में लोग सास बहू जैसे शो की जगह पर दूसरे शो देखना चाहते है. कामेडी इनमें सबसे अलग है. कामेडी करना सरल नहीं है. इसमें हर वक्त पूरी एनर्जी की जरूरत होती है. मै पहली बार किसी कामेडी शो में काम कर रही हूं.

अब मुझे समझ आ रहा है कि सास बहू जैसे रोने धोने वाले शो करने की जगह पर कामेडी करना कठिन काम होता है.

विश्वविद्यालयों में छात्रों को भी मिले आजादी

खुद विश्वविद्यालयों की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी  दूसरों की राजनीति को दबाने की भरसक कोशिश कर रही है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को पाकसाफ, शुद्ध, संस्कारी मान कर व उस के गुर्गों की गुंडई को नजरअंदाज कर के कितने ही विश्वविद्यालय प्रबंधक व चांसलर आज वामपंथियों, सधर्मियों, कांग्रेसियों, समाजवादियों की गतिविधियों को राष्ट्रद्रोह करार दे रहे हैं. ज्यादातर चांसलर व वाइस चांसलर अब घोषित तौर पर कट्टर हिंदू संस्कृति के समर्थक हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फरवरी 2016 में अफजल गुरु की फांसी पर विरोध प्रकट करने को हुई एक सभा में जेएनयू छात्र संघ के तब के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के भाषण देने पर विश्वविद्यालय की अनुशासन कमेटी ने उसे 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया था और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया था. 14 अन्य छात्रों को भी दंड दिया गया था.

अब उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय को आदेश दिया है कि वह मामले को फिर से सुने और इस निष्कासन को वापस ले. विश्वविद्यालय के अधिकारी अब जो भी फैसला लेंगे यह पक्का है कि उस में राजनीति तो चलेगी ही.

विश्वविद्यालय राजनीति के गढ़ हैं, यह पक्का है और आज से नहीं, आजादी की लड़ाई से ऐसा हो रहा है. अपनी ही नहीं, समाज और देश की भी सोच रहे पढ़ेलिखे गरम खून के युवा जब एकत्र होते हैं तो वे कुछ करना ही चाहते हैं. अपना कैरियर बनातेबनाते वे देश का उद्धार भी करना चाहते हैं और इस में कोई खराबी नहीं है. खराबी तब होती है जब एक जुझारू वर्ग दूसरे वर्गों को मारपीट कर दुरुस्त करना चाहे, अपनी बात को तर्क से नहीं, डंडे के जोर पर मनवाना चाहे.

संस्कृति के पोषक ही नहीं, वामपंथी, जातिपंथी और भाषापंथी भी इस के शिकार रहे हैं. कितने ही विश्वविद्यालयों में गुटबाजी, राजनीति के साथसाथ मारपीट और धौंस भी चलती है. यह कहींकहीं खराब हालत पैदा भी करती है पर फिर भी युवाओं को देश की बागडोर संभालने की ट्रेनिंग देती है.

विश्वविद्यालयों में केवल किताबी ज्ञान नहीं बांटा जा सकता. उन का भव्य भवनों में चलने, खुले मैदानों में होने की वजह ही यह है कि जिम्मेदारी संभालने से पहले छात्रों को हर सोच, हर वर्ग, हर उदारपंथी, हर कट्टरपंथी से मिलने और जूझने का मौका मिले. इन विश्वविद्यालयों को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय, गवर्नरों, वाइस चांसलरों के माध्यम से आर्मी कैंप बनाने की कोशिश न की जाए, जहां सिर्फ हुक्म चलता है.

विश्वविद्यालय जिंदादिली की जगह हैं और उन्हें खुला छोड़ दें. कन्हैया कुमार को राहत दे कर उच्च न्यायालय ने सही किया है और आशा है कि विश्वविद्यालय के अफसर रंगीन चश्मा उतार कर ही कोई फैसला लेंगे.

‘सत्ता में आए तो जीएसटी में बदलाव होगा’

सूरत में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने व्यापारियों से वादा किया कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो उनकी मांगों को पूरा करने के लिए जीएसटी में बदलाव करेगी.

राहुल ने पाटीदार समुदाय को आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन के दौरान पुलिस के अत्याचार की याद दिलाई. वराछा को पटेल (पाटीदार) समुदाय का गढ़ माना जाता है और यह 2015 के पाटीदार आंदोलन के केंद्रों में से एक रहा था. शहर में राहुल को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग आए थे.

राहुल ने अपने भाषण की शुरूआत पटेल आरक्षण आंदोलनकारियों द्वारा लगाए जाने वाले नारे जय सरदार, जय पाटीदार और जय भवानी का नारा लगाकर की. उन्होंने केंद्र सरकार की नोटबंदी, बेरोजगारी और इस हीरा और व उद्योग के केंद्र शहर में व्यापार में सुगमता के मुद्दे पर आलोचना की.

गुजरात में सच और झूठ की लड़ाई

राहुल गांधी ने शुक्रवार को वलसाड में रैली के दौरान गुजरात विधानसभा चुनाव को सच और झूठ के बीच लड़ाई बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी सच्चाई के साथ है, न कि भाजपा. राहुल ने कहा, यह सच और झूठ के बीच लड़ाई है. एक तरफ गुजरात के लोग हैं, तो दूसरी तरफ पांच-दस उद्योगपति. राहुल ने महाभारत का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय जैसे कौरवों के पास बड़ी सेना थी वैसे ही भाजपा के पास राज्य सरकार, केंद्र सरकार, पुलिस सब है, पर जीत सत्य की ही होगी.

बच्चे को वाहन में घुमाया

राहुल गांधी ने वलसाड में अपने एक रोड शो के दौरान एक स्कूली बच्चे को अपने साथ अपने वाहन में घुमाया. राहुल मछुआरा समाज की महिलाओं से मिले और उनकी समस्याएं भी सुनीं.

दलित नेता मेवाणी राहुल से मिले, आधे घंटे चर्चा

युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने नवसारी जिले के इटवा गांव के एक फार्म हाऊस में कांग्रेस पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की. मेवाणी के अपने संगठन राष्ट्रीय दलित युवा अधिकार मंच के अलावा बनासकांठा दलित संगठन के कुल मिला कर 31 अन्य लोगों के साथ राहुल से इटवा गांव के बीआर फार्म में करीब आधे घंटे की मुलाकात की. मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि गांधी ने दलित मुद्दों पर उनकी 17 मांगों को सुना और इन्हें पार्टी के घोषणा पत्र में जगह देने की बात कही.

47 लाख दलितों में सकारात्मक संदेशगया

मेवाणी ने कहा कि गुजरात में 22 साल से सत्तारूढ़ भाजपा जिन दलित मुद्दों पर बात तक नही कर रही थी उस पर राहुल ने 22 घंटे के भीतर अगर चर्चा की तो इससे 47 लाख दलितों में सकारात्मक संदेश गया है. उन्होंने राहुल को अन्य दलित संगठनों से चर्चा करने के बाद वार्ता की सलाह दी.

सोशल मीडिया पर ट्रोल हुईं गौरी खान

सोशल मीडिया पर आए दिन कोई न कोई सेलेब्स कभी अपनी फोटो तो कभी अपने पोस्ट की वजह से ट्रोल किया जाता है. इस बार ट्रोल्स का शिकार हुई बौलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान की पत्नी गौरी खान, जो अपनी ट्रांसपैरेंट ड्रेस के चलते सोशल मीडिया पर ट्रोल की गईं.

बता दें कि हाल ही में गौरी खान ने अपने पति शाहरुख का जन्मदिन मनाया था. पार्टी सेलेब्रेशन के दौरान गौरी ने एक ऐसी ड्रेस पहनी थी जो कि आंशिक रूप से ट्रांसपैरेंट थी. अपने इसी ड्रेस के साथ उन्होंने एक फोटो सोशल मीडिया पर शेयर की. जिसमें वह काफी हाट दिख रही थीं. इस फोटो को न कि सिर्फ गौरी ने बल्की सीमा खान ने भी अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया था, हालांकि उन्हें अपनी ये फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करना काफी महंगा पड़ गया.

गौरी खान के इस फोटो को शेयर करने के तुरन्त बाद ही ट्रोलर्स ने उन्हें एक के बाद एक कई हेटफुल कमेंट्स करने शुरू कर दिये. कुछ ट्रोलर्स ने उन्हें कपड़े पहनने का तरीका तो कुछ ने उन्हें मान मर्यादा तक की सिख दे डाली. किसी यूजर ने गौरी से पूछा कि आपने यह क्या पहन रखा है तो किसी ने लिखा कि गौरी तू तो इस फोटो में बहुत ही गिरी हुई दिखाई दे रही हो.

तेजस्विनी नाम की एक यूजर ने उनपर कमेंट करते हुए लिखा- गौरी थोड़ी तो मान-मर्यादा रखो, तुम एक सुपरस्टार की पत्नी हो. हम तुम्हारा सम्मान करते हैं, लेकिन इस फोटो में नजर आ रहा तुम्हारा ड्रेसिंग सेंस चीजों को एक निगेटिव वे में ले जा रहा है.

एमएस नाम के एक यूजर ने कमेंट बौक्स में लिखा- तुम्हारा बेटा तकरीबन 20 साल का हो चुका है, मेरे लिए मेरी मां को इस तरह के कपड़े पहने देखना किसी बुरे सपने जैसा होगा.

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एक अन्य यूजर ने लिखा- थर्ड क्लास… गौरी तुम इतने पौपुलर बच्चों की मां हो और तुम्हारा ड्रेसिंग सेंस… ओह यह तो बहुत बुरा है… क्या तुम थोड़ा तमीज के साथ नहीं तैयार हो सकतीं… तुम्हारा ड्रेसिंग सेंस को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे तुम बहुत ही गरीब हो और पूरे कपड़े पहनने के लिए तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं.

कर्म मोक्ष नाम के एक यूजर ने लिखा- मेरा मतलब है कि तुम्हें खुद को एक्सपोज करने की क्या जरूरत है गौरी, हमारे दिलों में तुम्हारे लिए इज्जत है. कृपया अपनी मान मर्यादा मत भूलो.

अपनी गर्लफ्रेंड के साथ लिव इन में रह रहे हैं हिमेश रेशमिया

पिछले कुछ समय पहले हिमेश रेशमिया ने अपनी पत्नी कोमल को तलाक दे दिया था. ऐसी कई खबरें सामने आई थीं जिनमें कहा जा रहा था कि सोनिया कपूर की वजह से एक्टर-सिंगर का तलाक हुआ है. अब पिछले एक हफ्ते से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि म्यूजिक कंपोजर अपनी गर्लफ्रेंड सोनिया कपूर के साथ लिव-इन में रह रहे हैं.

हिमेश से जुड़े एक करीबी सूत्र ने स्पौटब्वौय को बताया कि रेशमिया अपने तलाक से पहले ही सोनिया के साथ रह रहे थे. यहां तक कि उनका बेटा स्वयं सोनिया के काफी करीब है और दोनों के बीच काफी अच्छा रिश्ता है.

सोनिया लाइव शो और अपियरेंस के दौरान भी हिमेश के साथ होती हैं. जिन लोगों को नहीं पता उन्हें बता दें कि हिमेश ने कोमल के साथ अपनी 22 साल की शादी को खत्म कर लिया था. पिछले साल दोनों ने तलाक के लिए अर्जी दाखिल की थी और इस साल जून में कोर्ट ने उन्हें तलाक दे दिया था. बौम्बे हाईकोर्ट ने कोमल और हिमेश को तलाक दे दिया था.

तलाक के बारे में बात करते हुए हिमेश ने कहा- कई बार जिंदगी में आपसी इज्जत और हमारे रिश्ते के प्रति सम्मान बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. मैंने और कोमल ने सौहार्दपूर्ण तरीके से पति और पत्नी के तौर पर कानूनी रूप से अलग होने का निर्णय लिया और इसमें परेशानी की कोई बात नहीं है.

हमारे परिवार और उसके सदस्यों ने इस निर्णय का सम्मान किया और कोमल हमेशा हमारे परिवार का हिस्सा बनी रहेंगी और मैं हमेशा उनके परिवार का हिस्सा रहूंगा.

हिमेश की पत्नी कोमल ने भी तलाक के बारे में बात करते हुए कहा था कि मैं और हिमेश पूरी तरह से एक-दूसरे की इज्जत करते हैं और कानूनी तौर पर अलग होने का निर्णय मिलकर लिया लेकिन हमारे बीच हमेशा आपसी इज्जत बनी रहेगी. मैं उसके परिवार का हिस्सा हूं और वो मेरे परिवार का हिस्सा बने रहेंगे.

आधुनिक तकनीक से तैयार गोबर गैस प्लांट

आज के दौर में किसानों के सामने तमाम समस्याएं हैं. इन में खास समस्या है जमीन की उर्वरा शक्ति का कम होना और ईंधन की दिनबदिन होती कमी. इन दोनों खास समस्याओं का सरल और आसान समाधान है गोबर गैस प्लांट. गोबर में काफी मात्रा में ऊर्जा होती है, जिसे गोबर गैस प्लांट की मदद से गोबर गैस बना कर निकाला जा सकता है. इस प्लांट से बनी हुई गैस से चूल्हा जलाया जा सकता है और इसे रोशनी के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस से कम हार्स पावर का इंजन भी चला सकते हैं. गोबर गैस प्लांट से निकला गोबर (सलरी) पूरी तरह सड़ा होता है. यह एक बढि़या खाद है. इस के इस्तेमाल से जमीन की उपजाऊ ताकत बढ़ती है, दीमक नहीं लगती है और खरपतवार के बीज भी नष्ट हो जाते हैं.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार ने गोबर द्वारा चलने वाले जनता मौडल के बायोगैस प्लांट को सुधार कर ऐसा डिजाइन तैयार किया है, जो ताजे गोबर से चलता है. इस नए डिजाइन के प्लांट का गोबर डालने का पाइप 4 इंच की जगह 12 इंच चौड़ा है, ताकि इस में गोबर बिना पानी के सीधे ही डाला जा सके.

गोबर की निकासी की जगह काफी चौड़ी रखी गई है, जिस से गोबर गैस के दबाव से खुद बाहर आ सके. प्लांट से निकलने वाला गोबर काफी गाढ़ा होता है, जिसे कस्सी की सहायता से खेत में डाला जा सकता है. यह बेहतरीन खाद का काम करता है.

पहले गोबर गैस प्लांट बनाने के बाद उस में गोबर व पानी का घोल (1:1) डाल दिया जाता है. उस के बाद गैस की निकासी का पाइप बंद कर के 10-15 दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है. जब गोबर की निकासी वाली जगह से गोबर आना शुरू हो जाता है, तो प्लांट में ताजा गोबर बिना पानी के प्लांट के आकार के मुताबिक सही मात्रा में हर रोज 1 बार डालना शुरू कर दिया जाता है और गैस को जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सकता है. निकलने वाले गोबर को उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग, मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया यह गोबर गैस प्लांट अपनेआप में तमाम खासीयतों वाला है. यह पुरानी तकनीक से हट कर है. ज्यादा जानकारी के लिए यूनिवर्सिटी के फोन नंबरों 01662-285292, 285499 पर संपर्क कर सकते हैं.

उपयोगिता

* इस प्लांट को लगाने से पैसे की लागत दूसरी डिजाइनों के प्लांटों के मुकाबले कम आती है. इसे घर के आंगन में भी लगा सकते हैं. इस के आसपास की जगह साफसुथरी रहती है और बदबू नहीं आती.

* गोबर गैस प्लांट को लैट्रीन से साथ जोड़ कर भी गैस की मात्रा व खाद की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है.

* सलरी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा गोबर के मुकाबले ज्यादा होती है और इस का इस्तेमाल करने से जमीन की गुणवत्ता बढ़ती है. इस में नीम, आक या धतूरे के पत्ते मिला कर डालने से खेत में कीड़ों व बीमारियों का हमला नहीं होता.

* सर्दियों में मशरूम के बचे हुए अधस्तर को गोबर में मिला कर बायोगैस को बढ़ा सकते हैं.

पटना के खुजली गैंग की कहानी हैरान कर देगी

पटना कोतवाली के अंतर्गत आने वाले एक बड़े बैंक के बाहर 5-6 लड़के इस तरह खड़े थे, मानो किसी का इंतजार कर रहे हों. कुछ देर तक वे आपस में बातें करते रहे. करीब 10 मिनट बाद उन में से 2 लड़के बैंक में दाखिल हो गए तो बाहर खड़े उन के बाकी साथी मेन गेट के पास ही इधरउधर फैल गए. सभी बारबार अपनी घडि़यां देख रहे थे और अपने साथियों से इशारों में कुछ बातें कर रहे थे. कुछ ही देर में एक अधेड़ व्यक्ति बैग लिए बैंक से बाहर निकला तो बैंक में दाखिल हुए दोनों लड़के भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गए. बाहर खड़े उन के साथियों में से एक लड़का उस अधेड़ के पास आया और कोई पता पूछने लगा. अधेड़ उसे पता बताने लगा, तभी उन लड़कों में से एक लड़के ने उस के शरीर पर कोई पाउडर छिड़क दिया. वह अधेड़ पता बताने में मशगूल था, इसलिए उस की कुछ समझ में नहीं आया.

एकदम से उस के शरीर में तेज खुजली होने लगी, जिस से वह बैग जमीन पर रख कर पीठ, गर्दन आदि पर खुजली करने लगा.

उसी बीच उन लड़कों ने अधेड़ को चारों ओर से घेर लिया और उस की जेब से मोबाइल फोन, पर्स, अंगुली से सोने की अंगूठी निकाल ली और जमीन पर रखा बैग ले कर वहीं खड़ी गाड़ी में बैठ कर भाग निकले. अधेड़ चिल्लाया तो लोग उस के पास जमा हो गए.

उस ने सभी को आपबीती बताई तो किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. उस अधेड़ को लूटने वाले लड़कों ने लूट के बाद पटना ही नहीं, बिहार ही छोड़ दिया था. वे दूसरे राज्य में जा कर छिप गए थे. पटना समेत बिहार के अन्य जिलों में पुलिस उन्हें ढूंढ़ती रही, पर किसी का कुछ पता नहीं चला.

पुलिस ने उन की खोज में जहांतहां छापा मारा, उन के पकड़े जाने की कौन कहे, कोई सुराग तक हाथ नहीं लगा.

यह एक खुजली गैंग था, जो इसी तरह लोगों को लूटता था. लूट कर वे बिहार छोड़ कर किसी अन्य राज्य में जा कर छिप जाते थे और पुलिस उन्हें ढूंढती रह जाती थी. महीने, 2 महीने में मामला शांत हो जाता और पुलिस थकहार कर बैठ जाती तो वे लड़के बिहार लौट आते और नए शिकार की तलाश में लग जाते. वे जिस तरह वारदात कर रहे थे, इस से लोग इसे खुजली गैंग कहने लगे थे.

खुजली गैंग के ये लड़के किसी को अपना शिकार बनाने से पहले अच्छी तरह से रेकी करते थे. ये बैंक से रकम या गहने ले कर निकलने वालों को अपना निशाना बनाते थे. गैंग के 2 सदस्य बैंक के अंदर जाते थे तो बाकी लोग बैंक के बाहर इधरउधर फैल जाते थे.

अंदर जाने वाले युवकों की नजरें कैश काउंटर पर जमी रहती थीं. लोगों को शक न हो, इसलिए वे भी कोई पर्ची या विदड्राल ले कर भरते रहते थे. जब वे देखते थे कि कोई मोटी रकम निकाल रहा है तो वे उस के पीछे लग जाते थे.

इसी के साथ वे अपने मोबाइल फोन से बाहर खड़े गैंग के अन्य सदस्य के मोबाइल फोन पर मिस्डकाल कर के शिकार के बाहर आने की जानकारी दे देते थे. मिस्डकाल आते ही बाहर खड़े सदस्य खुजली पाउडर ले कर तैयार हो जाते थे.

शिकार अपनी मोटरसाइकिल या कार के पास पहुंचता था, उन में से एक सदस्य उस के पास जा कर कोई पता पूछता था. वह आदमी पता बताने लगता, तभी गैंग का कोई सदस्य उस के शरीर पर खुजली पाउडर छिड़क देता. आदमी खुजली करते हुए परेशान होने लगता तो गैंग के सभी सदस्य उसे घेर लेते और उसे लूट कर अपनी गाड़ी से भाग खड़े होते.

पटना पुलिस को मुखबिरों से सूचना मिली कि शास्त्रीनगर के एक मकान में कुछ लड़के रह रहे हैं, जिन की गतिविधियां संदिग्ध लग रही हैं. एसएसपी मनु महाराज के निर्देश पर पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पकड़ा तो पता चला कि वे सभी लड़के खुजली गैंग के सदस्य थे. इन्हें कोढ़ा गिरोह भी कहा जाता था.

इस गिरोह ने पटना कोतवाली, शास्त्रीनगर, राजवंशीनगर, पटेलनगर, बेली रोड, बोरिंग रोड, राजाबाजार, दानापुर आदि इलाके में आतंक मचा रखा था.

पटना के थाना शास्त्रीनगर पुलिस ने कोढ़ा गैंग के सरगना अमर कुमार समेत 7 लोगों को लूट की योजना बनाते हुए राजाबाजार की चौधरी गली से पकड़ा था. पूछताछ में पता चला कि अमर कुमार और उस के साथी विशाल कुमार, सिकंदर यादव, कबीर, आयुष, मिथलेश कुमार बिहार के जिला कटिहार के रहने वाले थे.

मुन्ना ग्वाला पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी का रहने वाला था. पुलिस ने गैग के पास से 2 पिस्तौलें, 4 जिंदा कारतूस, लूटी हुई 2 मोटरसाइकिलें, 7 मोबाइल फोन, 2 चाकू, मास्टर चाबी, ताला तोड़ने का सामान और खुजली पाउडर जब्त किया था.

गैंग के सरगना अमर कुमार ने पुलिस को बताया कि वह पटना से लूटी गई मोटरसाइकिल को नंबर बदल कर मुजफ्फरपुर और हाजीपुर में बेच दिया करता था. पटना के एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, खुजली उर्फ कोढ़ा गैंग के सदस्यों की तलाश काफी दिनों से चल रही थी. इस गैंग के सभी सदस्य नएनए अपराधी बने थे, जिस से पुलिस रिकौर्ड में इन का नाम नहीं था, इसलिए पुलिस को इन्हें पकड़ने में परेशानी हो रही थी.

‘रिश्ता लिखेंगे हम नया’ के लिए तैयार हैं तेजस्वी

‘पहरेदार पिया की’ सीरियल से चर्चा में आईं तेजस्वी प्रकाश अब बहुत जल्द एक नये धारावाहिक ‘रिश्ता लिखेंगे हम नया’ में नजर आने वाली हैं. सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर 7 नवम्बर से आनएयर होने वाले इस धारावाहिक में वह दीया का किरदार निभा रही हैं.

इस सीरियल में आने के लिए वह जोर शोर से अपनी पूरी तैयारी में लग गई हैं और खुद को फिट रखने के लिए अपना काफी समय जिम में बिता रही हैं.

अपने वर्कआउट रुटीन के बारे में बताते हुए तेजस्वी का कहना है कि मैं पिछले महीने से फिटनेस को लेकर काफी चिंता में रही हूं और इन दिनों इसपर खासा ध्यान दे रही हूं. रोजाना जिम में दो घंटे की कड़ी मेहनत कर रही हूं. इतनी मेहनत इसलिए कर रही हूं ताकि शरीर का फेट कम हो और मांसपेशी बढ़ने में मदद मिली है.

उन्होंने कहा, “रिश्ता लिखेंगे हम नया की शूटिंग के लिए मुझे कई प्रकार के एक्शन सीक्वेंस जैसे की ऊंट की सवारी, तीरंदाजी करनी है. इन सभी शूट्स के लिए वर्कआउट मददगार हैं.”

बता दें कि धारावाहिक ‘रिश्ता लिखेंगे हम नया’ इस साल के सबसे विवादित सीरियल ‘पहरेदार पिया की’ का दूसरा सीजन है, जिसमें 12 साल के लीप के बाद की कहानी दिखाई जाएगी. नए सीजन में दीया के पति प्रिंस रतन को युवा दिखाया जाएगा और रतन मान सिंह के कैरेक्टर को रोहित सुचांती प्ले करेंगे और दीया उनकी रक्षक बनी नजर आएंगी.

वादे के मुताबिक, रतन मान सिंह को सभी खतरों से बचाने की जिम्मेदारी तेजस्वी के कन्धों पर है. इस शो में इन्हें कई मारधाड़ वाले एक्शन सीक्वेंस करने हैं. जिसके लिए मजबूती, फिटनेस और परफेक्ट शेप की जरूरत है, जिसके लिए वो जमकर वर्कआउट कर रही हैं.

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