कंगना रनौत ने खुद के बारें मे किये कई खुलासे

किसी भी मुद्दे पर अपनी बेबाकी से राय रखने वाली कंगना रनौत एक बार फिर से सुर्खियों में है, कंगना रनौत ने इसबार महिलाओं के बारें में अपनी राय रखी हैं. कंगना खुद को रील और रियल लाइफ की आदर्श व खास श्रेणी की अभिनेत्री नहीं मानती हैं. वह अपना जीवन अपनी पसंद के मुताबिक जीती हैं, लेकिन उनका मानना है कि 21वीं सदी में भी महिलाओं को अपनी आवाज उठाने में मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं, अगर कोई महिला महत्वकांक्षी होती है, खुद पैसा कमाना चाहती हैं या किसी पर निर्भर नहीं होना चाहती हैं, तो उसे खलनायिका के रूप में देखा जाता है.

bollywood

उन्होंने आगे कहा, “जो महिलाएं अपनी पसंद से चलती हैं और जो अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं, उन्हें हमेशा विद्रोहियों के रूप में देखा जाता है.

कंगना ने कहा कि मैं बाकि लड़कियों कि तरह नहीं हूं. मैं हमेशा सबसे पहले खुद के बारें में सोचती हूं और खुद को ही प्राथमिकता देती हूं. मेरा जीवन मेरा है और मैं इसे अपने लिए जीना चाहती हूं. मैं उस सिद्धांत पर बिल्कुल भी नहीं चलती, जिसमें कहा जाता है कि लड़कियों को अपने बारे में नहीं सोचना चाहिए और लड़कियां बलिदान देने के लिए बनी हैं.

उन्होंने आगे कहा कि मैं उन महानतम नायिकाओं की श्रेणी में शामिल नहीं हूं जो सबसे महान भारतीय महिला हैं और हर किसी को खुद से पहले रखती हैं और सबसे आखिर में खुद के बारे में सोचती हैं. मैं अपनी क्षमता का उपयोग करना चाहती हूं और खुद को जानना चाहती हूं.

उन्होनें कहा कि अगर समाज में निर्भय होकर और स्वयं के अनुसार जीना है तो महिलाओं को अब सबसे पहले खुद के बारें में सोचना होगा. क्योंकि उनके अच्छे जीवन और सफलता का रास्ता वो खुद ही बना सकती हैं कोई ओर उनके लिए आगे नहीं आने वाला.

रानी पद्मावती पर बनने जा रही है एक और फिल्म ‘मैं हूं पद्मावती’

निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर कई विरोध प्रदर्शन हुए, नाक और सिर काटने तक की धमकियां दी गई थी. फिल्म की रिलीज की तारिख तक टालनी पड़ गई थी यहां तक कि अब तक फिल्म की दूसरी रिलीज डेट भी नहीं आई है और रानी पद्मावती को लेकर एक और फिल्म बनाने की पूरी तैयारी कर ली गई है. जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना अब रानी पद्मावती पर एक और फिल्म शुरू होने जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘मैं हूं पद्मावती’ नाम से बन रही इस फिल्म की शूटिंग जल्द ही शुरू होगी.

खबरों के मुताबिक इस फिल्म को राजस्थान के ही एक लेखक ने लिखा है ताकि इसे उन विवादों का सामना न करना पड़े जो भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ अब तक कर रही है. फिल्म के प्रोड्यूसर अशोक शेखर ने इस फिल्म के बारे में आ रही खबरों की पुष्टि करते हुए कहा है कि इस फिल्म में बिल्कुल नए चेहरों को लिया जाएगा और यह फिल्म हिंदी और राजस्थानी भाषा में रिलीज की जाएगी.

बता दें कि दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर और रणवीर सिंह की प्रमुख भूमिकाओं वाली फिल्म ‘पद्मावती’ को कई राजपूत संगठनों और राजनैतिक पार्टियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है ‘पद्मावती’ का करणी सेना और दूसरे संगठनों ने न केवल जमकर विरोध किया बल्कि संजय लीला भंसाली और दीपिका के नाक-गर्दन तक काटने के फरमान जारी कर दिये.

इस फरमान के खिलाफ बौलीवुड के कई सितारे सामने आते दिखे. खैर पद्मावती को लेकर तो विरोध अब तक जारी है पर देखना ये है कि रानी पद्मावती पर यह दूसरी फिल्म पूरी तरह से बन पाएगी या नहीं और अगर यह बनकर तैयार भी हो जाती है तो विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग इस फिल्म को लेकर अपनी किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे.

फीस वृद्धि पर सरकार की स्कूलों को चेतावनी

सातवें वेतन आयोग की आड़ लेकर दिल्ली के स्कूल अभिभावकों से अधिक फीस नहीं वसूल सकते. दिल्ली सरकार ने इस संबंध में स्कूलों को कड़ी चेतावनी दी है. फीस बढ़ोत्तरी के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शिक्षा विभाग को स्थिति की समीक्षा कर के सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हैं. इसके लिए 7 दिन का समय दिया गया है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई भी स्कूल फीस बढ़ोत्तरी को लेकर किसी भी छात्र को परेशान नहीं कर सकता है. किसी भी मामले यदि पाया जाता है कि स्कूल फीस बढ़ोत्तरी के नाम पर मनमानी कर रहे हैं तो सरकार सख्त कदम उठाने में संकोच नहीं करेगी. मुख्यमंत्री ने शिक्षा विभाग को मामले की जांच कर रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं.

मुख्यमंत्री ने साफ किया है कि यदि यह पाया जाता है कि कोई स्कूल फीस बढ़ोत्तरी में मनमानी कर रहा है तो सख्त कार्रवाई से परहेज नहीं किया जाएगा. आवश्यकता हुई तो सरकार इन स्कूलों ऑडिट भी करा सकती है.

मुख्यमंत्री ने बताया कि मामले में दिल्ली के विभिन्न इलाकों से अभिभावकों की शिकायत उनके पास आई थी. इस शिकायत में कहा गया था कि सातवें वेतन आयोग को लागू करने की आड़ में अभिभवकों से अधिक पैसा वसूला जा रहा है. यह स्थिति रुकनी चाहिए.

इसीलिए पूरे मामले में जांच शिक्षा निदेशालय को दी गई है. इस जांच के रिपोर्ट में सामने आने वाली गड़बड़ी के आधार पर आगे की कार्रवाईकी जाएगी.

‘सरकार एक-एक स्कूल की जांच करेगी’

उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बताया कि मुख्यमंत्री ने फीस मामले की समीक्षा की थी. इस स्थिति का मूल्यांकन किया गया है. अब सरकार एक -एक स्कूल की स्थिति की जांच करेगी. इस रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिया जाएगा. शिक्षा विभाग को कहा गया है किसी भी बच्चे या अभिभावकों को परेशान नहीं करे. उन्होंने कहा कि यदि स्कूल प्रशासन कोई भी ऐसी हरकत में पाया जाता है तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी. सरकार स्कूलों का व्यावसायिक प्रयोग नहीं होने देगी. एक हफ्ते की रिपोर्ट के बाद इस पर आखिरी निर्णय होगा. इसमें किसी भी स्कूल के साथ नरमी नहीं बरती जाएगी. भविष्य में जरूरत पड़ी तो और कड़े नियम बनाए जाएंगे.

फीस पर लगाम लगाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे

फीस वृद्धि को लेकर पहले भी सरकार कई फैसले कर चुकी है. अभिभावकों का कहना है कि इससे स्कूलों पर लगाम लगेगी, लेकिन जब तक इस दिशा में कड़े कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक स्कूल अपनी मनमानी जारी रखेंगे. लक्ष्मी नगर निवासी राहुल शुक्ला बताते हैं कि अगर स्कूलों ने 30 फीसदी तक फीस बढ़ा दी तो उनके सामने बहुत मुश्किल आ जाएगी. क्योंकि इससे उनका घर का बजट बिगड़ जाएगा. और जरूरी खर्चो में कटौती करनी होगी.

समिति के पास शिकायत

गौरतलब है कि बुधवार को निजी स्कूलों में मनमानी फीस वसूलने की जांच के लिए सरकार ने विशेष समिति गठित करने का फैसला किया था.यह समिति अभिभावकों से मिलने वाली शिकायतों की जांच कर उस पर कार्रवाई करेगी. समिति के पास शिकायत करने के लिए पीड़ित अभिभावकों को 100 रुपये का शुल्क जमा कराना होगा. समिति दिल्ली के सभी जिलों में काम करेगी. इसे जस्टिस दुग्गल कमेटी की सिफारिशों पर बनाया गया है. शिकायत समिति को करनी होगी.

अस्पतालों पर भी कड़ाई

दिल्ली सरकार ने बुधवार को निजी अस्पतालों की मनमानी की जांच के लिए एक नौ सदस्यों की कमेटी का गठन किया था. सरकार को ढेरों शिकायतें मिली हैं जिनमें बताया गया है कि निजी अस्पताल व नर्सिग होम मरीजों से इलाज व इलाज में होने वाली वस्तुओं के लिए निर्धारित मानकों से कहीं अधिक फीस वसूल रहे हैं. नौ सदस्यों की कमेटी लोगों को बेहतर व उचित मूल्य पर इलाज उपलब्ध कराएगी.

क्रौसफिट : फिटनैस का नया फंडा

साल 1989 में आई फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया सुपरस्टार सलमान खान दिया था. सलमान खान ने फिल्म इंडस्ट्री को दिया फिट रहने का मंत्र. फिल्म ‘सूर्यवंशी’ में उन के सिक्स पैक ऐब्स ने लोगों को दीवाना बना दिया था.

इस के बाद तो फिल्म हो या टैलीविजन, हर जगह ऐसे मेल कलाकारों की डिमांड ज्यादा बढ़ गई, जिन का बदन गठीला होता था. बड़ा या छोटा परदा ही क्यों, शहरकसबों तक में जिम खुलने लगे थे, जहां नई उम्र के लड़के बौडी बनाने की मानो होड़ सी करने लगे थे.अब समय बदला है तो कसरत करने के तरीके भी बदलने लगे हैं. भारत में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के बढ़ते चलन और खिलाडि़यों की फिटनैस पर नौजवान नजर रखते हैं, उन के अपनाए गए तरीकों से ही वे खुद को फिट बनाए रखना चाहते हैं. इन्हीं तरीकों में से एक है क्रौसफिट तकनीक.

बात साल 2000 की है. अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के सांताक्रूज में ग्रैग ग्लासमैन और लौरेन जेनई ने क्रौसफिट नाम से एक फिटनैस ब्रांड की शुरुआत की थी. इसे ट्रेनिंग करने का मौडर्न वर्जन भी कह सकते हैं.

क्रौसफिट की खासीयत यह है कि इस तकनीक में लोगों को कुदरत से जोड़ कर ट्रेनिंग दी जाती है यानी सभी ऐक्सरसाइज खुले आसमान के नीचे की जाती हैं. साथ ही, लोगों को ‘सेहतमंद खाएं और अच्छा खाएं’ की सलाह दी जाती है. इस के अलावा उन्हें किसी तरह का सप्लीमैंट फूड लेने से भी मना किया जाता है.

क्रौसफिट तरीके से ऐक्सरसाइज करने से लोग कम समय में अपनी बौडी को फिट रख सकते हैं. इस से मसल्स, स्टैमिना, शरीर की अंदरूनी ताकत यानी बौडी पावर को बढ़ाने में अच्छी मदद मिलती?है. चूंकि ये ऐक्सरसाइज खुले आसमान के नीचे कराई जाती हैं, इसलिए लोगों को ताजा हवा और औक्सिजन भरपूर मात्रा में मिलती है.

क्रौसफिट तकनीक में लोगों को कार्डियो, वेट ट्रेनिंग, बौडी बैलैंस के साथ रनिंग और जंपिंग भी सिखाई जाती है. कुछ फिटनैस ऐक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर 30 मिनट तक क्रौसफिट तरीके से ऐक्सरसाइज कर ली जाए, तो इस से 5 सौ कैलोरी आसानी से कम की जा सकती है. क्रौसफिट तकनीक से आदमी तन से ही फिट नहीं रहता है, बल्कि मन से भी हिट रहता है.

इस तरह की कसरत के बारे में फरीदाबाद में ‘फिटकेयर इंडिया’ के कोच और स्टेट लैवल तक मुक्केबाजी मुकाबलों में हिस्सा ले चुके संजय कुमार ने बताया, ‘‘क्रौसफिट वर्कआउट में आमतौर पर हाई लैवल की ऐक्सरसाइज कराई जाती हैं, जो प्रोफैशनल वेटलिफ्टरों, जिमनास्ट या दूसरे खेलों के खिलाडि़यों को ट्रेनिंग देने में काम आती हैं.

‘‘लेकिन इस के भी कई लैवल हो सकते हैं, जिन में नए सीखने वालों को बौडी की ताकत, उम्र वगैरह को ध्यान में रख कर उन्हें कसरत कराई जाती है. जहां तक इस को सीखने की उम्र का सवाल है, तो यह कसरत करने वाले की फिटनैस पर निर्भर करता है. हां, 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चे इस को शुरू कर सकते हैं.

‘‘क्रौसफिट तकनीक से कसरत करने का तरीका जिम में कसरत करने से अलग होता है. इस में महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती है और चूंकि यह खुले मैदान में कराई जाती है, इसलिए कसरत करने वाले को कुदरती औक्सिजन भी मिलती रहती है.’’

क्रौसफिट तकनीक से कसरत करने में खानपान का भी खासा खयाल रखा जाता है. संतुलित भोजन करना बहुत जरूरी होता है, जिस से शरीर को सही ऊर्जा भी मिलती रहे.

मुंबई में ‘आइडियल बौडी फिटनैस’ नाम से जिम चला रही फिटनैस कोच अंजू गुप्ता ने बताया, ‘‘सिर्फ कसरत करने से कुछ नहीं होता. कसरत तो 20 फीसदी काम करती है, जबकि 80 फीसदी खानपान पर निर्भर करता है. सब से पहले तो यह तय करना होता है कि आप का टारगेट क्या है. उसी के मुताबिक खानपान के बारे में बताया जाता है.

‘‘बहुत से लोग पतला होने के लिए या शरीर को छरहरा बनाने के लिए खानापीना छोड़ देते हैं, जो गलत है. हमारे परिवारों में एक दिक्कत यह है कि लोग दिनभर काम करते हैं और रात को जब इकट्ठा होते हैं, तो पूरा परिवार एकसाथ खाना खाता है, जो पूरा मील होता है, जबकि रात के खाने को दिन के खाने के हिसाब से कम करना चाहिए, क्योंकि रात को हम आराम ज्यादा करते हैं.‘‘आमतौर पर बिस्तर पर जाने से 4 घंटे पहले हमें खाना खा लेना चाहिए. उस में भी प्रोटीन की मात्रा सही हो तो बेहतर है. खाने में सलाद का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा हो. दही खाने के बजाय दूध पी लें. दही दिन के खाने में ही लें.

‘‘एक बार में ज्यादा खाने से बेहतर है कि धीरेधीरे थोड़ेथोड़े अंतराल पर कम खाना खाएं. दिन में अगर 3 बार में खाना खाते हैं तो उसी मील को आप 6 बार कर दें.’’

चूंकि क्रौसफिट में कराई जाने वाली कसरतें ज्यादा ताकत मांगती हैं और थोड़ी मुश्किल होती हैं, इसलिए इन्हें शुरू करने से पहले अगर माहिर डाक्टर की सलाह ले ली जाए तो अच्छा होता है. अगर किसी को कोई बड़ी बीमारी है तो उसे उसी तरीके से ट्रेनिंग दी जाती है और खानेपीने का खयाल भी रखा जाता है.

जातीय स्वाभिमान ने बढ़ाई बेकारी

गांवों में बहुत सारे लोगों को जातीय स्वाभिमान के नाम पर उन के पुश्तैनी पेशे से दूर कर दिया गया है. अपने पेशे से दूर हुए लोगोंके लिए रोजगार का कोई दूसरा रास्ता न मिलने से गांवों में बेकारी बढ़ गई है. वहां से रोजगार के लिए शहर आए ये लोग यहां के बढ़ते खर्च और अपनी कमाई के बीच बढ़ते फर्क के चलते गुजरबसर नहीं कर पा रहे हैं.

साल 1990 के बाद से ही देश की राजनीति में जाति और धर्म का दखल तेजी से बढ़ गया. इस के चलते वोट के लिए तरहतरह के लालच राजनीतिक दलों ने जनता को दिए. इन में सब से बड़ा लालच जातीय स्वाभिमान का था.

भारतीय समाज में कई ऐसे पेशे थे, जो जाति से जुड़े थे. कुछ पेशे मजबूरी वाले थे, तो कुछ कारीगरी की मिसाल भी थे.

राजनीतिक दलों ने जातीय स्वाभिमान के नाम पर इन धंधों को छोड़ने के लिए सामाजिक लैवल पर बदलाव शुरू कर दिया. इस से काफी हद तक समाज में बदलाव नजर आने लगा. सामाजिक जागरूकता के चलते ही  ऐसे धंधों से लोग अलग हो गए, जो जाति से जुड़े थे.

जातीय स्वाभिमान के जरीए राजनीतिक दलों ने समाज में चेतना तो जगा दी, पर जो लोग बेरोजगार हो गए, उन के लिए कोई रोजगार मुहैया नहीं कराया. ऐसे में अपने पेशेवर धंधे छोड़ने वाले ये लोग मजदूर बन कर रह गए.

छोटे छोटे वे धंधे, जो कभी गांव में रोजगार का जरीया होते थे, अब दूसरे कारोबारियों के पाले में चले गए. जो लोग अपना धंधा करते थे, वे अब कारोबारियों के यहां ठेके पर काम करने वाले मजदूर बन कर रह गए.

गांवों में रोजगार का एक बड़ा साधन लकड़ी और लोहे का कारोबार था. लकड़ी और लोहे से तैयार होने वाली कई चीजें बना कर बाजार में बेची जाती थीं. यह काम गांव में खास जाति के लोग करते थे. जातीय स्वाभिमान के नाम पर इन लोगों ने गांव में यह काम करना बंद कर दिया.

कारीगर हो गए मजदूर

इस के 2 नुकसान हुए. पहला तो यह कि ये लोग दूसरों के कारखाने में काम करने वाले मजदूर बन कर रह गए. दूसरा, ये लोग अपनी नई पीढ़ी को इस रोजगार की बारीकियां नहीं सिखा पाए. ऐसे में आने वाली पीढ़ी को कोई जानकारी नहीं हो सकी.

अगर इन लोगों के लिए सरकार ने किसी कामधंधे का इंतजाम किया होता तो शायद अपना पेशेवर धंधा छोड़ कर ये लोग नौकरी कर के गुजारा कर सकते थे. ऐसे में ये लोग वापस उसी धंधे में चले गए, वह भी मजदूर बन कर.

ऐसे धंधों की लंबी लिस्ट है, जिन को पहले जातीय स्वाभिमान के रूप में छोड़ दिया गया, फिर उसी धंधे में मजदूर बन कर काम करने को लोग मजबूर हुए. बाल काटने और दाढ़ी बनाने से जुड़ा धंधा भी ऐसा ही है.

इस काम के माहिर लोगों ने गांव में यह काम करना छोड़ दिया. ये लोग रोजगार के लिए शहर आ गए. यहां किसी दूसरी जाति के आदमी ने एक सैलून बनवा दिया. उस में ये लोग काम करने लगे. इन को प्रति ग्राहक के हिसाब से ही पैसा मिलने लगा.

यही हाल बुनकरों, साड़ी कारीगरों, पावरलूम पर काम करने वालों का भी हुआ. इस की वजह से छोटेछोटे शहरों में यह धंधा बंद हो गया. अब यह धंधा बड़ी फैक्टरी में होने लगा. ये कारीगर यहां मजदूर की तरह से दिनरात काम करने लगे.

पहले बुनकार साडि़यां खुद तैयार करते और बेचते थे. अब वे केवल साड़ी तैयार करते हैं. उन को बेच कर मोटा मुनाफा कारोबारी की जेब में जाने लगा है.

विज्ञान के जरीए हुई तरक्की ने भी कारोबारी के लिए तमाम सहूलियतें पैदा कर दीं. मशीनों से काफी काम होने लगा, जिस से हाथों से काम करना बंद होने लगा.

रोजगार का इंतजाम नहीं

कारीगरी में मशीनों के इस्तेमाल ने कुशल कारीगरों को बेरोजगार बनाने का काम किया. कारोबारी ने अपने मुनाफे के हिसाब से कारीगरों का इस्तेमाल करना शुरू किया. मशीनों के इस्तेमाल से धीरेधीरे लोगों के हाथ से रोजगार जाने लगा. अब वे वापस जब अपने गांव की तरफ आने लगे, तो यहां भी हालात बदल चुके थे.

गांवों में होने वाले छोटेछोटे रोजगार बंद हो चुके थे. अब यहां भी फैक्टरी में बना माल ही बिकने लगा था. इस की लागत भी बढ़ चुकी थी.

यह सही है कि जातीयता के नाम पर ऐसे कई बहुत से काम भी होते थे, जो सही नहीं थे. इन से दूर होने के बाद अगर लोगों को सही रोजगार मिल जाता तो शायद यह स्वाभिमान बना रहता.

सरकारों ने भी लोगों के रोजगार के ऊपर ध्यान नहीं दिया. सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन का फायदा केवल कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गया.

गांवों में पढ़ाई का लैवल लगातार नीचे गिरता गया, जिस से शहरी बच्चों और गांव के बच्चों के बीच दूरी बढ़ गई. गांव के बच्चे रोजगार की दौड़ में पिछड़ते चले गए.

गांवों में खेती रोजगार का एक बड़ा जरीया है. जातीय स्वाभिमान के नाम पर पहले खेतों से मजदूर दूर हो गए. ये लोग कामधंधे के लिए अपना गांव छोड़ कर दूरदराज के प्रदेशों में जा कर खेती का काम करने लगे. खेती में मजदूरों की आत्मनिर्भरता को कम करने के लिए अलगअलग तरह की मशीनें आ गईं. इस  वजह से अब मजदूरों की छंटनी वहां भी होने लगी. ऐसे में ये लोग वापस गांव आए तो यहां भी खेतों में मजदूरों की खपत कम हो गई थी.

गांवों में अपनी जमीन न होने के चलते ये लोग अब मजदूरी करने लगे. ऐसे में गांव छोड़ने का भी कोई फायदा नहीं हुआ. यही नहीं, सफाई का काम करने वाले लोगों ने अपने पुश्तैनी काम को जातीय स्वाभिमान के नाम पर छोड़ दिया. अब वे ऐसे ठेकेदारों के बंधुआ मजदूर हो गए हैं, जो इस पेशे को कारोबार बना कर काम करने लगे हैं.

जातीय स्वाभिमान के नाम पर राजनीतिक दलों की सोच केवल वोट लेने तक सिमटी रही है. अगर सरकारों ने रोजगार और नौकरी के मौके बनाए होते तो अपने पुश्तैनी धंधों को छोड़ने वालों को फायदा होता.

सरकार ने कभी ऐसा कोई काम नहीं किया. ऐसे में अपना रोजगार छोड़ कर लोग मजदूर हो गए. अपने पुश्तैनी धंधों से नाखुश लोगों ने नई पीढ़ी को भी उस कारीगरी से दूर रखा. नई पीढ़ी के लिए नौकरियां नहीं थीं. ऐसे में वे केवल मजदूर बन कर रह गई. छोटीबड़ी हर तरह की नौकरियों में लगातार कमी आती जा रही है.

प्राइवेट सैक्टर में जो काम थे, वे भी धीरेधीरे सरकारी नीतियों के चलते बंद होते जा रहे हैं. छोटे कारखानों और कारोबारियों का काम बंद होने से मजदूरी भी बंद हो गई है. खेतों में काम मशीनों से होने लगा. प्राइवेट सैक्टर के प्रभावित होने से बेरोजगारी ज्यादा बढ़ गई है.

नौजवानों में बेरोजगारी

भारत में ऐसे नौजवानों की तादाद तेजी से बढ़ती जा रही है, जो केवल सरकारी नौकरियों की चाह रखते हैं. ऐसे नौजवान पढ़ेलिखे भले ही हों, पर इन में किसी भी तरह की कुशलता नहीं है.

ज्यादातर नौजवान नकल के सहारे पास हुए हैं. ये नौकरियों में होने वाले कंपीटिशन में भी कोई असर नहीं छोड़ पाते हैं. सेना और रेलवे में नौकरियों की कमी होने से बड़ी तादाद में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है.

सरकारी नीतियां ऐसी हैं, जिस से नए उद्योगधंधे पनप नहीं रहे. केंद्र सरकार ने लोगों को ट्रेंड करने का काम शुरू किया. 3 साल में ऐसे ट्रेंड लोगों में से कितनों को रोजगार दिया जा सका है, यह पता नहीं है.

अगर चुनाव में बेरोजगारी एक मुद्दा बन जाए तो किसी भी दल के लिए मुसीबत बन सकती है. यही वजह है कि सभी दल नौजवानों को बेरोजगारी के मुद्दे से दूर रखने के लिए जाति और धर्म के स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया करते हैं. वे कतई नहीं चाहते कि नौजवानों में रोजगार की बात मुद्दा बन सके.

आज हर दल को अपना प्रचार करने के लिए ऐसे नौजवानों की जरूरत है, जो उस के साथ जुड़ कर काम करने लगे.

अगर इन नौजवानों को नौकरी और कामधंधे से जोड़ा गया. तो वे किसी दल के मुफ्त के कार्यकर्ता नहीं बन सकेंगे. रोजगार की कमी में वे नेता के आगेपीछे घूमेंगे और जिंदाबादमुरदाबाद के नारे लगाएंगे. ऐसे में बेरोजगार नौजवान राजनीतिक दलों के ऐसे कार्यकर्ता हैं, जिन को केवल जातिधर्म का लौलीपौप दे कर बहलाया जा सकता है.

फिल्म के बहाने कट्टरपन को हवा

नारी अस्मिता और राजपूती गौरव का बहाना ले कर संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ पर मचाया जा रहा शोर असल में हमारी सोच के कट्टरपन की पूरी पोल खोल रहा है. 21वीं सदी में जीते हुए और एटम बम बनाने या चंद्रयान, मंगलयान भेजने वाला यह देश असल में आज भी 16वीं सदी से आगे नहीं बढ़ पाया है जब सुनीसुनाई बातों पर विश्वास करने में भारत और यूरोप में कोई फर्क नहीं था.

हम ने कहने को तो लोकतंत्र अपना लिया है, जिस में विचारों की स्वतंत्रता को महत्त्व दे दिया है पर असल में हम आज भी पौराणिक युग में ही जी रहे हैं जब औरतों को लगभग सभी समाजों में, उन समाजों में भी जिन से हमारा सीधा संबंध न के बराबर था, दबा कर, गुलामों से भी बदतर तरीके से रखा गया था.

‘पद्मावती’ में ऐसा क्या है, जिस से राजपूत कहे जाने वाले लोग बौखला रहे हैं का पता तो फिल्म के प्रदर्शन के बाद ही चलेगा पर इस में नैतिक, ऐतिहासिक और प्रस्तुतिकरण के बारे में कुछ आपत्तिजनक नहीं है, यह सुप्रीम कोर्ट के रुख से स्पष्ट है.

मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित पुस्तक ‘पद्मावत’ पर आधारित राजस्थानी पृष्ठभूमि की कथा में अगर कुछ बुरा लगने वाला है तो वह यह है कि उस युग में एक पुरुष अपनी पत्नी को बचाने के लिए उस पर सौदा करता था, उसे राजगद्दी बचाने के लिए इस्तेमाल करता था. उस की पत्नी हमलावर के पास जाना चाहती थी या नहीं यह छोडि़ए पर उस युग की औरतें संपत्ति ही थीं यह जरूर कहानी में स्पष्ट है. इस कहानी पर बनी फिल्म यदि उस काल की याद दिलाए तो इस में क्या हरज है खासतौर पर तब जब आज भी जमाना कुछ वैसा ही सा है.

कहने को तो हमारे विश्वविद्यालय लड़कियों से भरे हैं, महिलाएं मंत्री हैं, अफसर हैं, प्रबंधक हैं पर जरा सी परत कुरेदेंगे तो पता चल जाएगा कि औरतें आज भी सौदे की चीज हैं. इसे दर्शाना और पृष्ठभूमि के लिए किसी प्राचीन रचना का इस्तेमाल करना कतई गलत नहीं है. कट्टरपंथियों को यह हक नहीं कि वे इस का विरोध कर समाज में पुराने व सड़ेगले मूल्यों को फिर से स्थापित करने की कोशिश करें.

अगर हम हर जगह शिवाजी, महाराणाप्रताप, देवीदेवताओं की मूर्तियां लगाएंगे कि ये सब हमारे आदर्श हैं, तो हमें यह अवसर भी मिलना चाहिए कि इन आदर्श ऐतिहासिक, पौराणिक या धार्मिक मूर्तियों के पीछे का सच क्या है, बता सकें. असल में इन आदर्शों की गलत बातें समाज भूलता नहीं है और राम का सीता को निकालना, विष्णु का मोहिनी अवतार बनना, शिव का जहर पीना, देवताओं का अमृत छीनना, शिवाजी का जाति विशेष से होना, राजपूतों का मुगलों से समझौता कर लेना न न करते भी उदाहरण देने के काम आता है.

परदा प्रथा, घर के लिए महिलाओं की बलि देना, कन्या भू्रण हत्या, बेटी को घर में बंद रखना आदि उसी कट्टर सोच का हिस्सा हैं जिस में समाज सदियों तक जीता रहा है और आज की नई वैचारिक क्रांति के बावजूद देश भर की औरतों पर जुल्मों की कमी नहीं है. महिला आयोग के पास आने वाली  सैकड़ों शिकायतें यह स्पष्ट करती हैं कि भारतीय समाज में औरतों के साथ मारपीट, बलात्कार, छेड़खानी, संपत्ति में हिस्सा देने में आनाकानी करना अभी भी बंद नहीं हुआ है.

फिल्म ‘पद्मावती’ का विरोध करने वाले लोग वे ही हैं, जो नहीं चाहते कि पौराणिक सोच में कोई परिवर्तन हो, लोग नई चेतना, नए प्रकाश में जिएं.

ये लोग पुरोहित, पंडे, मौलवी, पादरी का तंत्र बनाए रखना चाहते हैं. अब इन्होंने राष्ट्रवाद और देशभक्ति का बहाना भी लेना शुरू कर दिया है और धार्मिक कट्टरता को देश की अस्मिता का नाम देना शुरू कर दिया है. हिंदू समाज बड़ी चतुराई से मुसलिम या ईसाई कट्टरपन की भी रक्षा करने लग गया है ताकि धर्म के हर सुधार को देशभक्ति पर उठाए सवाल के बराबर मान लिया जाए.

न्यूड मौडल के साथ इस एक्ट्रेस ने करवाया हौट फोटोशूट

बौलीवुड इंडस्ट्री हो या फिर छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिक हो, आजकल हर जगह कोई भी एक्ट्रेस अपने ग्लैमरस और हौट अंदाज से सुर्खियां बटोरने में पीछे नहीं रहती.

चाहें वो “एक हजारों में मेरी बहना है” और “जमाई राजा” सिरियल में नजर आने वाली निया शर्मा हो या फिर “विदाई” में नजर आने वाली सारा खान हो या फिर “ये है मोहब्बते” सिरियल में नजर आ चुकी करिश्मा शर्मा हों.

सभी अपनी बोल्ड अदाओं से लोगों के दिलों पर छाने का कोई मौका नहीं छोड़ती. अब इन छोटे पर्दों पर नजर आने वाली बोल्ड अदाकाराओं में एक और नाम जुड़ गया है और वो नाम है “उतरन” में नजर आ चुकी टीना दत्ता का.

फिलहाल उतरन फेम टीना दत्ता कुछ समय से टीवी इंडस्ट्री से दूर हैं. इस बार वह अपने किसी कौंट्रोवर्सी को नहीं बल्कि ग्लैमरस लुक को लेकर चर्चा में है. वैसे तो टीना अक्सर ही फोटोशूट करवाती रहती हैं और अपनी कई तस्वीरें इंस्टाग्राम पर भी शेयर करती रहती हैं. पर हाल ही में ‌टीना ने एक ऐसा फोटोशूट कराया है जिसने सोशल मीडिया पर सनसनी मचा दी है.

A post shared by 💫Tinzi💫 (@dattaatinaa) on

अपने इस फोटोशूट में टीना सारी हदें पार कर कुछ ज्यादा ही बोल्ड होती दिख रही हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि टीना ने एक न्यूड आदमी के साथ ये शूट करवाया है. वह इस न्यूड मौडल के ऊपर बैठी हैं.


उनकी ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही हैं और उनके इस अवतार को देखकर उनके फैंस काफी हैरान हैं. टीना के साथ जो मौडल है उनका नाम अंकित भाटिया है. साल 2018 के कैलेंडर के लिए टीना ने ये फोटोशूट करवाया है. इस बात में कोई शक नहीं कि टीना का ये अवतार चौंकाने वाला है.

A post shared by 💫Tinzi💫 (@dattaatinaa) on

आपको बता दें कि 5 साल की उम्र से टीना टीवी शो में काम कर रही हैं. उनका पहला शो सिस्टर निवेदिता था. टीना ने कई फिल्मों में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट भी काम किया है. टीना ने साल 2005 में फिल्म ‘परिणीता’ में विद्या बालन के बचपन का किरदार और जब वह 16 साल की थी तब रितुपर्णो घोष की फिल्म ‘चोखेर बाली’ में उन्होंने ऐश्वर्या राय के बचपन का किरदार निभाया था. इसके बाद 2008 से 2015 तक वे लगातार कलर्स टीवी के सीरियल “उतरन” की लीड एक्ट्रेस रही हैं. यादगार भूमिका उतरन में टीना ने पहले इच्छा और फिर बाद में मीठी का किरदार निभाया था. इस सीरियल के इन दोनों किरदारों को निभाने पर लोगों ने टीना को काफी पसंद किया था.

A post shared by 💫Tinzi💫 (@dattaatinaa) on

इतने दिनों तक निभाए गए टीना दत्ता के सिंपल किरदारों के आगे उनका ये हौट एंड बोल्ड अंदाज बेहद जुदा है. पर जो भी हो लोगों को टीना को ये अंदाज खूब पसंद आ रहा है.

मोहल्ला सभा तय करेगी शराब की दुकान खुले या नहीं

दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति को मंजूरी दे दी है. इसकी महत्वपूर्ण बात यह है कि शराब की दुकान खुले या नहीं और खुले तो कहां, यह मोहल्ला सभा तय करेगी.

आबकारी विभाग के सूत्रों का कहना है कि शराब की दुकान खुल जाने के बाद सबसे अधिक विरोध जगह को लेकर सामने आते हैं. इस विरोध को दुकान खोलने के बाद नहीं उठाना पड़े, इसके लिए मोहल्ला सभा से भी दुकान के लिए अनुमति लेनी होगी.

इसके बाद भी यदि किसी दुकान के खोलने को लेकर विवाद है और 10 प्रतिशत सदस्य भी इसका विरोध करते हैं, तो इसके लिए आरडब्ल्यूए का पक्ष लिया जाएगा और इनमें 33 फीसदी महिलाएं होना जरूरी है. यदि दो तिहाई लोग दुकान हटाने की सिफारिश करते हैं तो उसे हटा लिया जाएगा.

शराब के दाम नहीं बढ़ेंगे

आने वाले तीन माह तक शराब पुरानी ही दरों पर उपलब्ध रहेगी. इसके लिए दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति को मंजूरी दे दी है. अब इन नीति के तहत ही दिल्ली में शराब की दुकानों के लिए प्रावधान लागू होंगे. यह नीति मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता वाली कैबिनेट में पेश की गई. जिसे सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई है.

1 जनवरी 2018 से लागू होगी नई नीति

इस नीति को दिल्ली में 1 जनवरी 2018 से लागू कर दिया जाएगा. हालांकि यह नीति मार्च के बाद ही आ जानी चाहिए. सरकार ने करीब आठ माह देरी से इस नीति को स्वीकार किया है. आबकारी विभाग के सूत्रों का कहना है कि यह पॉलिसी देरी से आई है लेकिन आगामी वित्त वर्ष की पॉलिसी के लिए सरकार को तय समय से काम करना चाहिए ताकि वक्त पर सभी आदेशों को सख्ती से लागू किया जा सके. आने वाले तीन माह में कोई नई दुकान नहीं

सूत्रों ने बताया कि स्वीकार की गई नीति 31 मार्च तक के लिए लागू होगी. इस नीति के प्रावधान बीते वर्ष की नीति जैसे ही रखे गए हैं और इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किय गया है. वही, दिल्ली सरकार आने वाले तीन माह में भी दिल्ली सरकार की कोई नई दुकान नहीं खोलेगी. इसके अतिरिक्त इन दुकानों के आसपास सक्रिय असामाजिक तत्वों पर भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी. इसके लिए नीति में सख्त प्रावधान किया गया है.

मैनेजर को दुकान की सीधी निगरानी करनी होगी

दुकान के पास हो रही सभी गतिविधियों की सीधी निगरानी मैनेजर के माध्यम से होगी. यदि दुकान के आसपास कोई भी संदिग्ध गतिविधि नजर आती है तो आबकारी विभाग द्वारा तुरंत इस पर कार्रवाई की जाएगी. इसके लिए भी नई नीति में स्पष्ट प्रावधान किया गया है. इस प्रकार की परेशानियां रिहायशी इलाकों के आसपास होने वाली दुकानों में अधिक आती है क्योंकि ये दुकानें प्रमुख मार्गो के आसपास होती है. दिल्ली सरकार ने निर्देश दिया है कि इन मामलों में यदि किसी भी प्रकार की शिकायत आती है तो उस पर तत्काल कड़ी कार्रवाई की जाए.

आतंकी, मानव और धर्म

अमेरिका न जाने क्यों पश्चिम एशिया में क्रूर आतंकी संगठन इसलामिक स्टेट के खिलाफ तोपों, मिसाइलों, ड्रोनों का इस्तेमाल कर रहा है और क्यों इराकी, सीरियाई सैनिकों को मरवा रहा है. अमेरिका को आतंकियों के चंगुल में यमन में 18 महीने कैदी रहे पादरी टौम उजहन्नालिल की सुननी चाहिए जिन्होंने कहा कि क्रूर और हत्यारे आतंकियों ने उन्हें जिंदा रखा.

विधर्मी होते हुए भी अगर उन्हें जिंदा रखा गया, तो पादरी की सोच के अनुसार यह लोगों की प्रार्थनाओं के कारण हुआ जिन्होंने अपहर्ताओं का हृदय परिवर्तन कर दिया. इसी कारण उन्हें शारीरिक कष्ट नहीं दिया गया और न ही रमजान के महीने में भूखा रखा गया. वे अगर छूटे तो ईश्वर के कारण. भारत, अमेरिका, वेटिकन के दूतावासों ने तो कुछ किया ही नहीं उन्हें छुड़ाने में और उन्हें तो केवल ईसा मसीह को धन्यवाद देना है.

इसीलिए औपचारिकता निभाने के लिए वे रोम में पोप के विशाल महल वैटिकन में भी रुके और अपने मूल देश भारत में आ कर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भी मिले. पर उन्होंने शायद उन दोनों से कहा होगा कि आतंकी पागलों से निबटने के लिए पूजापाठ और प्रार्थनाओं की जरूरत है, टैंकों या हवाई जहाजों की नहीं.

महीनों अपहर्ताओं की कारगुजारी देखने के बाद भी कोई मानव स्वभाव को न समझ पाए, यह तभी संभव है जब दिमाग पर धार्मिक परत इतनी मोटी पड़ी हो कि सच व तर्क की बात वह भेद ही न सके. प्रार्थनाओं से काम चलता होता तो दुनिया में कहीं अनाचार, अत्याचार, भूख, बीमारी, अपराध न होता. मारना, लूटना हो सकता है, प्रकृति की देन हो.

समाज ने और सभ्यता ने मार कर खाने को नियंत्रित किया है पर दूसरी ओर धर्म ने दूसरे धर्म के लोगों पर अत्याचार करने का लाइसैंस दे दिया और उस लाइसैंस को पाने के लिए अपने धर्म की हर गलत बात और मान्यता को बिना सवाल उठाए मानने की शर्त लगा दी. इन्हीं मान्यताओं में से ही एक है कि जब कुछ अच्छा हो जाए, तो धन्यवाद धर्म के बजाय ईश्वर को दें, उस व्यक्ति या संस्था को नहीं, जिस ने जीवन सुखद बनाया.

सरप्राइज गिफ्ट : अवैद्य संबंधों के शक में बीवी की हत्या

19 जून, 2017 की शाम मनोज बेहद खुश था. लेकिन उस के दोस्त अनुज को उस की यह बेवजह की खुशी समझ में नहीं आ रही थी. जब रहा न गया तो अनुज ने पूछ ही लिया, ‘‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों हो रहा है, कुछ बताएगा भी या यूं ही बकवास करता रहेगा.’’

‘‘बताऊंगा, पर ऐसे नहीं. पहले मिल कर थोड़ा जश्न मनाते हैं. फिर अपनी खुशी का राज जाहिर करूंगा. ये ले पैसे और औफिसर्स चौइस की बोतल, तले हुए काजू, नमकीन और सिगरेट का पैकेट ले आ. सोच ले, आज मैं तुझे अपनी आजादी की पार्टी दे रहा हूं.’’ कह कर उस ने पर्स से 2 हजार रुपए का नोट निकाल कर अनुज को दे दिया.

अनुज की समझ में तो कुछ नहीं आया, लेकिन उस ने मनोज के हाथों से 2 हजार रुपए का नोट ले कर जेब में रखा और शराब के ठेके की ओर चला गया. कुछ देर बाद वह सारा सामान ले आया तो दोनों कमरे में पीने बैठ गए. मनोज ने 2 पैग बनाए और जाम से जाम टकराने के बाद दोनों शराब पीने लगे. जब मनोज पर नशे का सुरूर चढ़ा तो उस ने कहना शुरू किया, ‘‘अनुज, जानते हो मैं आज इतना खुश क्यों हूं.’’

‘‘जब तक तू बताएगा नहीं, तब तक मैं कैसे जानूंगा कि तेरे मन में किस बात को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’ नशे की झोंक में अनुज उस की ओर देख कर बोला.

‘‘बेटे, आज मैं आजाद हो गया हूं.’’

‘‘पहेलियां न बुझा कर सीधी तरह बता, तेरी इस खुशी का राज क्या है?’’ अनुज ने चौथा पैग पीते हुए उत्सुकता से पूछा.

‘‘मैं ने तेरी भाभी को खुदागंज रवाना कर दिया है. मुझे उस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया है.’’

मनोज की बात सुन कर अनुज को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब उस ने पूरी बात बताई तो उसे लगा कि हो न हो मनोज ने कोमल की हत्या कर दी है. अनुज का सारा नशा काफूर हो गया. थोड़ी देर तक वह मनोज की बात सुनता रहा, फिर पीना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और घर में किसी जरूरी काम का बहाना कर के वहां से चला गया.

बाहर आ कर वह कुछ दोस्तों से मिला और मनोज की बात उन्हें बताई. सब ने उसे यही सलाह दी कि इस बात की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए, क्योंकि बाद में वह भी पुलिसिया लफड़े में फंस सकता है. सोचविचार कर उस ने यह सूचना कंझावला थाने की पुलिस को दे दी.

पति द्वारा किसी औरत की हत्या की सूचना मिलते ही कंझावला थाने की पुलिस हरकत में आ गई. जेजे कालोनी सवदा पहुंच कर पुलिस ने मनोज गुजराती को हिरासत में ले लिया. थाने में जब मनोज से पूछताछ शुरू हुई, तब तक उस का नशा कम हो चुका था. पहले तो उस ने एसआई निखिल को बताया कि शराब के नशे में वह यह सब अपने दोस्त पर रौब जमाने के लिए  कह रहा था. लेकिन निखिल का एक करारा थप्पड़ उस के गले पर पड़ा तो उस के होश ठिकाने आ गए.

उस ने बताया कि वह अपनी पत्नी कोमल की हरकतों से बहुत परेशान था. इसलिए उस ने उसे बोंटा पार्क के जंगल में ले जा कर उस की हत्या कर दी है. बोंटा पार्क दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास है. कंझावला थाने से वह काफी दूर था. तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए अगली सुबह निखिल कांस्टेबल महेश और नरेश को साथ ले कर उत्तरी दिल्ली के मोरिसनगर थाने पहुंचे और वहां की थानाप्रभारी इंसपेक्टर आरती शर्मा को उन के इलाके के बोंटा पार्क में एक लड़की की हत्या किए जाने की सूचना दी.

17 जून, 2017 को कंझावला पुलिस द्वारा मिली इस सूचना को थाना मौरिसनगर के डीडी नंबर 14 ए में दर्ज करवा कर इंसपेक्टर आरती शर्मा ने अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर  वीरेंद्र सिंह को इंसपेक्टर राकेश कुमार, एएसआई बिजेंद्र, हैडकांस्टेबल राजकुमार, सुखवीर, कांस्टेबल श्याम सैनी तथा महिला कांस्टेबल मधु को आरोपी मनोज और कंझावला पुलिस के साथ बोंटा पार्क भेजा.

पुलिस टीम पार्क के गेट नंबर 6 से अंदर दाखिल हुई. अंदर जा कर पुलिस कोमल की लाश की तलाश में जुट गई. मनोज ठीक से उस जगह के बारे में नहीं बता पा रहा था, जहां उस ने अपनी पत्नी कोमल की हत्या कर के उस की लाश छिपाई थी. पुलिस की तलाशी 12 घंटे तक जारी रही, लेकिन कोमल की लाश नहीं मिली. रात घिर आई थी, फिर भी तलाशी चलती रही.

रात के करीब 12 बजे मनोज पुलिस टीम को एक छोटी चट्टान के पास ले कर गया, जहां 22-23 साल की एक लड़की की लाश पड़ी थी. वह गुलाबी रंग का टौप और नीले रंग की जींस पहने थी. लाश की छानबीन करते समय इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने देखा कि उस के दाहिने हाथ पर कोमल गुदा हुआ था.

आरोपी मनोज ने लाश की ओर इशारा कर के बताया कि यह उस की पत्नी कोमल की लाश है, जिसे उस ने कल शाम को धोखे से यहां ला कर उस की हत्या कर दी थी. लाश की फोटोग्राफी कराने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए सब्जीमंडी मोर्चरी भेज दिया गया, साथ ही कोमल के घर वालों को फोन कर के उस की लाश की शिनाख्त के लिए सब्जी मंडी मोर्चरी बुला लिया गया.

17 जून को कोमल की बड़ी बहन गौरी सब्जी मंडी पहुंची,जहां लाश देखने के बाद उस ने उस की पहचान अपनी छोटी बहन और मनोज गुजराती की पत्नी कोमल के रूप में कर दी. कोमल की लाश की शिनाख्त होने के बाद गौरी की तहरीर पर उसी दिन कोमल की हत्या का मामला उस के पति मनोज गुजराती के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया. इस मामले की विवेचना इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह को सौंपी गई. गौरी के बयान तथा मनोज गुजराती के बयानों के बाद 2 साल की लव मैरिज का जो दर्दनाक वाकया सामने आया, वह इस प्रकार था—

कोमल के पिता चमनलाल का परिवार नांगलोई के चंचल पार्क में रहता था. उन के परिवार में पत्नी कमलेश के अलावा 4 बेटियां तथा 2 बेटे थे. इन में कोमल पांचवे नंबर की थी. घर के लोग उसे प्यार से कमली कह कर पुकारते थे. कोमल के बड़े भाई गंगाराम की शादी 8 साल पहले दिव्या से हुई थी. मनोज गुजराती दिव्या का चचेरा भाई था.

मनोज का परिवार कंझावला इलाके के सावदा गांव में रहता था. उस के परिवार में उस के अलावा इस के पिता राजू गुजराती, मां कमलेश तथा एक बहन परवीन थी. घर के बाहरी कमरे में मनोज की परचून की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी, जिस की वजह से मनोज की जेब हमेशा भरी होती थी. वह शौकीनमिजाज युवक था और हमेशा बनठन कर रहता था. चूंकि दोनों के परिवार आपस में रिश्तेदार थे, इसलिए समय समय पर उन का एकदूसरे के यहां आनाजाना लगा रहता था.

2 साल पहले एक दिन मनोज अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने गुरुग्राम के सहारा मौल पहुंचा. वहां उस की नजर एक लड़की पर पड़ी, जो शक्लसूरत से जानीपहचानी लग रही थी. वह कोमल थी. मौडर्न कपड़ों, गहरे मेकअप और फ्लड लाइट की रंगबिरंगी रोशनी में कोमल बहुत ही सुंदर लग रही थी. दरअसल, कोमल वहां एक पब में नौकरी करती थी.

मनोज ने किसी बहाने से कोमल को अपने पास बुलाया तो दोनों ने एकदूसरे को पहचान लिया. बातोंबातों में मनोज ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया और जल्द ही उस के घर चंचल पार्क आने का वादा किया. कोमल ने मनोज की खूब आवभगत की और उसे अपने साथ काम करने वाली कुछ सहेलियों से भी मिलवाया.

कोमल के लटकेझटके देख कर मनोज पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा. इधर कोमल भी मनोज के प्रति आकर्षित हो गई. उस दिन मनोज घर लौटा तो उस के दिलोदिमाग में कोमल की मनमोहिनी सूरत बसी हुई थी. वह जल्दी से जल्दी उसे अपनी बना लेना चाहता था.

उस दिन के बाद दोनों एकदूसरे को फोन कर के अपने दिल की बातें शेयर करने लगे. कोमल मनोज को हमेशा मौल में आने वाले हाईफाई लोगों के बारे में तरहतरह के किस्से सुनाती, जो मनोज को बहुत अच्छे लगते. वह कोमल को प्रभावित करने के लिए उसे महंगे तोहफे देने लगा. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के घर वाले इस सब से कब तक अनजान रह सकते थे. उन्हें भी उन के प्यार की जानकारी हो गई.

मनोज और कोमल के घर वाले यों तो रिश्तेदार थे, लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें यह रिश्ता मंजूर नहीं था. कोमल के पिता चमनलाल को लगता था कि मनोज उन की बेटी को ज्यादा दिनों तक खुश नहीं रख पाएगा. मनोज सावदा गांव में रहता था, जहां के लोगों का रहनसहन पुराने जमाने जैसा था.

उधर मनोज के घर वालों की सोच भी कुछ ऐसी ही थी. जब मनोज और कोमल ने अपनेअपने घरों में अपनी पसंद जाहिर की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. लेकिन प्यार इन बंदिशों को कहां मानता है. वैसे भी दोनों ही अपने पैरों पर खड़े थे. इसलिए 5 जून, 2015 को कोमल ने अपने मम्मीपापा की मर्जी के खिलाफ जा कर तीसहजारी कोर्ट में मनोज से शादी कर ली. शादी के बाद दोनों रघुबीर नगर में किराए का मकान ले कर रहने लगे.

8-10 महीने तो दोनों ने खूब मौजमस्ती की, लेकिन बाद में मनोज को कोमल का सहारा मौल में काम करना बुरा लगने लगा. उस ने कोमल से यह काम छोड़ देने के लिए कहा, पर वह इस के लिए तैयार नहीं थी. उसे मौल में जा कर परफौरमेंस देना और नएनए लोगों से मिल कर हंसनाबोलना अच्छा लगता था. बात आगे बढ़ी तो दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए. पड़ोसियों ने दोनों को समझाया तो कोमल मनोज के घर जेजे कालोनी, सावदा में रहने को तैयार हो गई.

इस के बाद कोमल अपने पति मनोज के साथ सावदा में जा कर रहने लगी. लेकिन घर छोटा होने के कारण उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. मनोज की एक बहन परवीन थी, जिस से उस की कतई नहीं बनती थी. यह देख कर मनोज ने दूसरी जगह किराए पर एक घर ले लिया और दोनों उसी में रहने लगे. कुछ दिनों तक दोनों सुखचैन से रहे. मनोज की जिंदगी में अचानक भूचाल तब आया, जब एक दिन वह कोमल के सूटकेस में रखी उसकी एलबम देख रहा था. एक फोटो में वह एक लड़के के साथ बहुत खुश दिख रही थी.

मनोज ने कोमल को वह फोटो दिखा कर उस लड़के के बारे में पूछा तो कोमल ने बताया कि यह अमित है और उस के साथ सहारा मौल में नौकरी करता था. अमित महज उस का दोस्त है. लेकिन मनोज को कोमल की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उस ने कोमल के जानकारों से अमित के बारे में पूछा तो पता चला कि शादी से पहले अमित कोमल का बौयफ्रैंड था. मनोज को यह जानकारी मिली तो वह परेशान हो गया. कोमल के बारे में यह जानकारी मिलने के बाद मनोज उस से उखड़ाउखड़ा रहने लगा.

कुछ ही दिनों बाद उन के बीच फिर से झगड़े शुरू हो गए. कोमल ने अपने घर में फोन कर के बताया कि मनोज उस से दहेज लाने के लिए दबाव डालता है और मना करने पर उस के साथ मारपिटाई करता है.

एक महीने बाद कोमल मनोज की मारपिटाई से दुखी हो कर अपनी बड़ी बहन किरण के पास रहने के लिए रघुवीरनगर चली गई. मनोज सावदा स्थित अपने घर में अकेला रह गया. एक दिन उसे पता चला कि कोमल फिर से अपने पुराने बौयफ्रैंड अमित से मिलने लगी है. यह जान कर मनोज को चिंता हुई कि कोमल कहीं उस से किनारा न कर ले. यही सोच कर उस ने कोमल के मोबाइल पर बात करने की कोशिश की. कुछ दिन तो कोमल मनोज के फोन को नजरअंदाज करती रही, लेकिन धीरेधीरे दोनों में बातचीत शुरू हो गई.

एक महीना पहले कोमल ने मनोज को बताया कि वह बहन पर बोझ नहीं बनना चाहती, इसलिए उस ने रघुवीरनगर के ही डी ब्लौक में अपने लिए अलग कमरा ले लिया है, जहां रह कर अब वह फिर से जौब पर जाएगी. घर में बैठेबैठे उस का मन नहीं लगता. दूसरे बिना पैसों के जिंदगी भी नहीं चलती. मनोज को उस की यह बात अच्छी नहीं लगी तो उस ने उस के नौकरी करने का विरोध करते हुए वापस घर लौट आने के लिए कहा. इस पर कोमल ने ऐतराज करते हुए मनोज से कहा कि वह उस के साथ गांव में नहीं रहेगी, क्योंकि वह उस के  साथ गालीगलौच करने के साथ मारपीट करता है. ऐसा जीवन वह नहीं जी सकती.

15 जून, 2017 को मनोज अपनी दुकान छोड़ कर कोमल से मिलने उस के घर पहुंचा. मनोज को आया देख कर उस ने उसे और उस के परिवार वालों को बहुत बुराभला कहा. कोमल की बातों से मनोज को लगा कि वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. उसे बहुत गुस्सा आया. घर पहुंच कर वह सोचने लगा कि उस ने कोमल से कोर्टमैरिज की है और वह उस की पत्नी है. अगर वह उस के साथ नहीं रहेगी तो वह भी उसे उस की मनमर्जी से नहीं जीने देगा.

अगले दिन सुबह उस ने एक मोबाइल शौप पर जा कर नया सिम खरीदा और एक मैकेनिक के यहां से क्लच वायर ले आया. उसी सिम से उस ने कोमल से बड़े प्यार से बात की. बातोंबातों में उस ने कोमल को घूमने जाने के लिए राजी कर लिया. उस दिन काफी बारिश हुई थी, जिस से मौसम सुहाना हो गया था.

16 जून को मनोज ने कोमल को फिर फोन कर के मिलने के लिए सीमेंट गोदाम के पास बुलाया. कोमल ने कहा कि वह उस के पास पहुंच जाएगी. 2 बजे मनोज अपनी मोटरसाइकिल से सीमेंट गोदाम के पास पहुंचा तो थोड़ी देर बाद कोमल आ गई. उस ने कोमल को मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बिठाया और रिंगरोड होते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के बोंटा पार्क जा पहुंचा.

पार्क के गेट पर मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह कोमल के साथ अंदर चला गया. कोमल को विश्वास में लेने के लिए वह उस से रोमांटिक बातें कर रहा था. वहां झाडि़यों के पास कई युवा जोड़े प्रेमालाप में मग्न थे. यह देख कर कोमल भी रोमांटिक हो गई. कोमल से प्यारीप्यारी बातें करते हुए मनोज उसे एकांत में ले गया, जहां दोनों एक साफसुथरी चट्टान पर बैठ गए. मनोज ने उसे बांहों में ले कर अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और फिर से ऐसा न करने की कसम खाई तो कोमल खुश हो गई.

जब मनोज को लगा कि मौका एकदम सही है तो उस ने कोमल से कहा, ‘‘तुम अपना मुंह पीछे की तरफ कर लो, मैं तुम्हारे लिए एक सरप्राइज गिफ्ट लाया हूं.’’

कोमल ने खुश हो कर मुंह पीछे की ओर कर लिया. उचित मौका देख कर मनोज ने जेब में रखा क्लच वायर निकाला और कोमल की गर्दन पर लपेट कर कस दिया. कोमल ने मनोज को वायर ढीला करने के लिए कहा, साथ ही बचने के लिए बहुत हाथपैर मारे, जिस की वजह से मनोज के हाथों में खरोंचे भी आ गईं. लेकिन उस ने वायर को ढीला नहीं किया.

कुछ ही पलों में कोमल ने आखिरी हिचकी ली और उस की गर्दन एक ओर लुढ़क गई. कोमल की लाश को परे धकेल कर वह पार्क से बाहर आ गया और अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर घर लौट आया. इस के बाद उस ने अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए अपने दोस्त अनुज के साथ शराब की पार्टी की, जहां कोमल की हत्या का राज उस पर जाहिर कर दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने 17 जून, 2017 को मनोज को तीसहजारी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें