4 साल बाद पर्दे पर दिखेंगी ऐश्वर्या की हमशक्ल स्नेहा उल्लाल

ऐश्वर्या राय की हमशक्ल और सलमान खान की हिरोइन बन फिल्म ‘लकी’ से अपने बौलीवुड करियर की शुरुआत करने वाली स्नेहा उल्लाल एक बार फिर अपनी एक्टिंग पारी की शुरूआत करने जा रही हैं. करीब 4 साल तक फिल्मों से दूर रहने के बाद स्नेहा उल्लाल एक बार फिर से अपनी नई फिल्म को लेकर चर्चा में हैं. खबरें हैं कि स्नेहा टौलीवुड की फिल्म ‘आयुष्मान भव’ से अपने फिल्मी करियर में वापसी कर रही हैं. माना जा रहा है कि इस फिल्म में वह काफी बोल्ड और हौट अंदाज में दिखेंगी.

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स्नेहा ने हाल ही में अपने 30वें जन्मदिन का जश्न मनाया है और इसी मौके पर उन्होंने खुद अपने फैंस के लिए अपनी आने वाली फिल्म ‘आयुष्मान भव’ की पहली झलक शेयर किया है. इस फिल्म के अलावा स्नेहा जल्द ही एक टी-सीरिज के एलबम में भी नजर आएंगी. इस एलबम का टीजर भी उन्होंने अपने जन्मदिन के मौके पर शेयर किया. बता दें कि उनका जन्मदिन 18 दिसम्बर को था.

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साल 2005 में जब सलमान की फिल्म ‘लकी’ आई तो स्नेहा उल्लाल उनकी हिरोईन के रूप पर पर्दे पर नजर आईं और उनके खूब चर्चे भी हुए. हालांकि इस फिल्म से अभिनेत्री कुछ खास कमाल नहीं कर पाईं, लेकिन अपनी शक्ल-ओ-सूरत को लेकर स्नेहा ने खूब सुर्खियां बटोरी. इसके बाद वह साल 2014 में एक तमिल फिल्म में नजर आईं थी. इस तमिल फिल्म के बाद से ही अभिनेत्री लाइम-लाइट से गायब हो गईं. स्नेहा भले ही फिल्मों में नहीं आईं पर अक्सर ही ऐश्वर्या राय की हमशक्ल होने की वजह से उनकी चर्चा होती रही है.

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स्नेहा उल्लाल के फैन्स अक्सर ही उनसे फिल्मों से दुर रहने की वजह को लेकर सवाल करते रहते हैं. कुछ लोगों को लगने लगा था कि अब स्नेहा कभी फिल्मों में नजर नहीं आएंगी पर हाल ही में किये गये उनके पोस्ट से यह साफ हो गया है कि वह फिल्मों की दुनिया में वापसी कर फिल्म इंडस्ट्री में ही अपना करियर बनाने की इच्छा रखती हैं.

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कुछ समय पहले एक अखबार को दिए इंटरव्यू में स्नेहा उल्लाल ने कहा था, ”मैं एक बात साफ कर देना चाहती हूं कि यह ‘वापसी’ नहीं है. वापसी तब होती है जब आप किसी चीज को जानबूझकर छोड़ देती हैं और दोबारा वापसी करने की कोशिश करती हैं. लेकिन मैंने कभी भी इंडस्ट्री को नहीं छोड़ा. मेरे कई फैंस मुझसे पूछ रहे थे कि मैं कहां हूं. मैं चार सालों तक कहां गायब थी. मैं फिल्में क्यों नहीं कर रही थी. तो अपने फैंस कोबता दूं कि मैं अपने हेल्थ प्रौबल्म की वजह से फिल्मों से दूर थी और अब जब सबकुछ ठीक है तो मैं अब एक बार फिर यहां हूं.”

चीन बनाम भारत

डोकलाम प्रसंग के बाद चीन ने अपने इलाके में चौड़ी हाईटैक सड़कें बनानी शुरू कर दी हैं. इस के जवाब में भारत को भी हिमालय के दुर्गम इलाकों में महंगी सड़कें बनानी होंगी, हालांकि उन का कोई व्यावसायिक उपयोग न होगा.

ये सड़कें छोटी नहीं, 4,000 मिलोमीटर लंबी पूर्व से पश्चिम तक की होंगी जिन पर, आमतौर पर, सैनिक वाहन दौड़ेंगे. डोकलाम के बाद यह जरूरी हो गया है कि भारत हर समय हिमालय की सीमा पर भी नजर रखे. हिमालय स्वयं देश की रक्षा करेगा, भारत यह भूल जाए.

हिमालय को भेदना अब नई तकनीक और मशीनों के लिए मुश्किल नहीं है और चीन लगातार अपने क्षेत्र में हिमालय की चोटियों के नीचे से रास्ते निकाल कर भारत की सीमा के पास सैनिक पहुंचा रहा है.

चीन की सीमाएं भारत से कहीं ज्यादा लंबी हैं. सीमा के चारों ओर मित्र ही हों, जरूरी नहीं. वहां की सरकार ने हर तरह की तैयारी कर रखी है और भारत को भी यही करना होगा चाहे यह उसे निरर्थक ही क्यों न लगे.

1962 में जब चीन ने भारत की सीमा पर हमला किया था तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता, उस की चिंता क्या करें. पर, यह महंगा साबित हुआ.

आदर्श स्थिति तो वह होगी जब दोनों देशों में इतना अपनापन व दोस्ती हो कि सीमाएं केवल नक्शों पर हों, जमीनों पर हों तो उन का उपयोग केवल टैक्स के लिए किया जाता हो. अफसोस कि इंटरनैट ने सीमाओं को भेदा जरूर पर सीमाओं को वह तोड़ नहीं पाया. उलटे, दुनियाभर में सीमा विवाद ज्यादा तेज हो गए और दीवारों की बात अमेरिका भी करने लगा. चीन ने एक युग में ग्रेट वौल औफ चाइना बनाई थी. आज सड़कों से दीवारें बन रही हैं, जो सीमा के दोनों तरफ आपस में कहीं मिलती नहीं. उलटे, अलगाव का निशान बनती हैं.

बौलीवुड के ये स्टार करेंगे अपने से आधी उम्र की लड़की से शादी

52 साल की उम्र में भी जवान दिलों की धड़कनें बढ़ा देने वाले मौडल मिलिंद सोमन आपको बहुत जल्द अपनी शादी की खबर दे सकते हैं. जी हां, हाल ही में ‘शेफ’ फिल्म में नजर आए मिलिंद सोमन अपने से 27 साल छोटी गर्लफ्रेंड से जल्द शादी करने जा रहे हैं.

रिपोर्ट्स के अनुसार मिलिंद हाल ही में अंकिता के होमटाउन गुवाहाटी गए और उनके पैरंट्स से मिले. वह अंकिता के घर के सभी सदस्यों से मिले. कहा जा रहा है कि उनकी उम्र में बड़ा अंतर होने की वजह से अंकिता के पैरंट्स इस रिश्ते से खुश नहीं थे लेकिन मिलिंद के अच्छे स्वभाव को देखकर वे बाद में मान गए. अब उम्मीद है कि 2018 में मिलिंद अंकिता से शादी कर लेंगे.

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बता दें कि 26 वर्षीया अंकिता एयर होस्टेस हैं और असम के गुवाहाटी की रहने वाली हैं.

मालूम हो कि हाल ही में अपने जन्मदिन पर मिलिंद नार्वे में 26 साल की अपनी गर्लफ्रेंड अंकिता के साथ छुट्टियां बिताकर लौटे. खास बात यह है कि अंकिता और मिलिंद का ऐज डिफ्रेंस काफी समय से चर्चा में है, और जब मिलिंद ने अंकिता के साथ अपनी एक सेल्फी और कुछ अन्य तस्वीरें इंस्टाग्राम पर डालीं तो वह काफी तेजी से वाइरल होने लगी. काफी लोगों ने मिलिंद को उनके अफेयर को लेकर ट्रोल भी किया.

2006 में मिलिंद ने फिल्‍म ‘वैली आफ फ्लौवर्स’ की अपनी फ्रेंच को-स्‍टार मैलेन जाम्‍पनोई से शादी कर ली थी. इन दोनों का साल 2009 में तलाक हो गया. इसके बाद वह एक्‍टर शहाना गोस्‍वामी को भी डेट कर रहे थे जिनसे उनकी उम्र का अंतर 21 साल था. इस रिश्‍ते में भी मिलिंद 4 साल रहे थे.

मिलिंद ‘बाजीराव मस्तानी’ (2015) में अम्बाजी पंत का रोल प्ले कर चुके हैं. मिलिंद फिलहाल फिटनेस प्रमोटर हैं. 50 साल की उम्र में अल्ट्रामैराथन जीतने के बाद उन्हें ‘आयरनमैन’ का खिताब दिया गया था. मिलिंद सोमन बहुत जल्दी रिएलिटी शो ‘आई कैन, यू कैन’ की मेजबानी करते हुए नजर आएंगे.

जाह्नवी दे रहीं टिप्स कैसे बनाएं एब्स

बौलीवुड के मशहूर फिल्म निर्देशक करण जौहर की फिल्म ‘धड़क’ से अपना बौलीवुड डेब्यू करने जा रहीं श्रीदेवी की बड़ी बेटी जाह्नवी हमेशा अपने ड्रेसिंग सेंस से सभी को इंप्रेस करती रही हैं. बौलीवुड में एंट्री से पहले जाह्नवी सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं और अपनी तस्वीरों और वीडियोज के लिए खूब तारीफें बटोरती रही हैं. इन दिनों वह खुद को फिट बनाए रखने के लिए जिम में भी खूब वक्त बिता रही हैं. हाल ही में जाह्नवी के एक फैन पेज से एक वीडियो शेयर किया गया है जिसमें जाह्ववी अपने ट्रेनर के साथ 5 मिनट में 6 पैक एब्स पाने का तरीका बता रही हैं.

वीडियो को महज 13 घंटे में 2 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं. वह अपने वीडियो में बता रही हैं कि किस तरह आप महज 5 मिनट का डेली वर्कआउट करके 6 पैक ऐब्स पा सकते हैं. जाहिर है आप भी यह सोच रहे होंगे कि यह कैसे संभव है.

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वीडियो में जाह्नवी बताती हैं कि पहले 30 सेकंड तक प्लांक्स करना है और फिर अगले 30 सेंकड तक टीजर (नाव के शेप में रुकना) करना होगा. अगला वर्क आउट है नी एब्स और इसके बाद क्रौस क्रंचेज करना होगा. इस पूरे वीडियो में जाह्नवी और उनके ट्रेनर काफी मस्ती करते हुए दिखाई दे रहे हैं.

जाह्नवी की अपकमिंग फिल्म की बात करें तो उनके साथ फिल्म में शाहिद कपूर के भाई ईशान खट्टर भी नजर आएंगे. ईशान की भी यह बौलीवुड डेब्यू मूवी है जिसे शशांक खेतान बना रहे हैं. फिल्म की रिलीज डेट अभी 6 जुलाई 2018 बताई जा रही है लेकिन इसे पोस्टपोन या प्रीपोन भी किया जा सकता है. बता दें कि जाह्नवी की फिल्म मराठी मूवी सैराट की औफिशियल रीमेक होगी.

अमीषा पटेल को उनकी इस फोटो के लिये एक बार फिर होना पड़ा ट्रोल

बौलीवुड एक्ट्रेस अमीषा पटेल ने वन पीस पार्टी वियर में एक फोटो अपने ट्विटर हैंडल से शेयर की लेकिन ऐसा लगता है कि एक बार फिर से सोशल मीडिया यूजर्स को उनका यह अवतार कुछ खास पसंद नहीं आया, माइक्रोब्लौगिंग साइट ट्विटर पर लोगों ने अमीषा पटेल को ट्रोल करना शुरू कर दिया.

खुले बालों और लाल लिपस्टिक के साथ नजर आ रहीं अमीषा के लिए एक यूजर ने लिखा- दीदी बच्चे डर जाएंगे. एक अन्य यूजर ने खिंचाई करते हुए लिखा- कहो ना प्यार है का दूसरा पार्ट कब आ रहा है? एक यूजर ने लिखा- यह बंदी हर वक्त नशे में रहती हैं.

इस तरह के तमाम ट्वीट्स अमीषा की इस तस्वीर पर किए गए हैं. यह पहली बार नहीं है जब अमीषा पटेल की इस तरह खिंचाई हुई हो. इससे पहले भी उनकी तस्वीरों पर लोग उन्हें ट्रोल करते रहे हैं. सोशल मीडिया सनग्लासेज लगा कर शौवर लेती हुई उनकी एक तस्वीर के लिए उन्हें खूब ट्रोल किया गया था.

असल में उन्होंने इस तस्वीर के कैप्शन में लिखा था कि शौवर लाइक ए टौकस्टार. हालांकि वह शायद लिखना चाहती थीं कि शौवर लाइक अ रौकस्टार. उन्होंने बाद में अपनी यह गलती सुधारते हुए इसे ठीक किया. यह तस्वीर अमीषा के लेटेस्ट फोटोशूट की थी. दूसरे ट्वीट में अमीषा ने लिखा ‘टाइपिंग में गलती टौकस्टार नहीं ‘रौकस्टार’.

पिछले काफी समय वक्त से अमीषा किसी फिल्म में अपनी अदाओं का जादू बिखेरती हुई नजर नहीं आई हैं. इसके बावजूद अमीषा के अभी भी काफी फैन्स हैं जिन्हें वे तंग करने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं. अमीषा ने अपने इंस्टाग्राम पर कुछ वक्त पहले एक तस्वीर शेयर की थी जिसमें उनका क्लीवेज साफ दिखाई दे रहा था. इन तस्वीरों पर यूजर्स बहुत ही भद्दे कमेंट कर रहे हैं. आपको बता दें कि अमीषा पटेल इससे पहले भी अपने क्लीवेज को दिखाने को लेकर ट्रोल हो चुकी हैं.

लालू प्रसाद यादव और उनकी सिक्योरिटी

जनता के सेवकों को इतना डर क्यों लगता है कि वे काली डरावनी ड्रैसों वाले ब्लैककैट कमांडों और बंदूकधारियों से घिरा रहना चाहते हैं. लालू प्रसाद यादव की सिक्योरिटी को जैड प्लस कैटीगरी से घटा कर जैड कैटीगरी कर दिया तो नाराज होने की क्या बात है. इस का मतलब तो यही है न कि लालू प्रसाद यादव की जान के दुश्मन कम हो गए हैं.

सिक्योरिटी कम करने पर लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप यादव का भड़क कर खाल खींचने के बोल बोलना तो खिसियानापन दर्शाता है जो लालू जैसे कद्दावर नेता के लिए धब्बा है. लालू प्रसाद यादव पर ऊंची जातियों ने एक हो कर चौतरफा हमले करे हैं और लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को बिहार में रुकवाने की हिम्मत दिखाने की सजा उन्हें लगातार दी जा रही है.

लालू प्रसाद यादव जेल में नहीं टूटे, सत्ता खो कर नहीं टूटे, रेल मंत्रालय खो कर नहीं टूटे, तो 10-20 सुरक्षा जवानों की कमी से कैसे टूट सकते हैं. लालू यादव ने बिहार के पिछड़ों को बदलने की कोशिश की है और हो सकता है कि आज की पीढ़ी को क्या उन के खासमखासों को अहसास न हो कि लालू यादव पिछड़ों को गड्ढे से खींचने के लिए मजाकमजाक में न जाने क्या कर गए हैं. उन के दुश्मन कम नहीं होने चाहिए क्योंकि उन से पहले बिहार पर ब्राह्मणों, राजपूतों और महाजनों का एकछत्र राज था जो बिहार को परंपराओं के जाल में फंसा कर देश का सब से गरीब राज्य बनाए रख रहे थे. लालू यादव ने बहुत सी जंजीरें तोड़ी हैं तो जिन के हाथों में जंजीरें थीं वे खिसिया सकते हैं पर पहरेदारों के बीच घिरा रहना कोई तमगा नहीं है क्योंकि कभी भी कोई जानलेवा हमले करे तो जैड प्लस सिक्योरिटी भी कुछ नहीं कर सकती.

वैसे तो हर नेता के पास सुरक्षा के नाम पर 2-4 ही लोग होने चाहिए. भारीभरकम फौज देना गलत है. लोगों की जिंदगी ले सकने वाले जज बिना सिक्योरिटी के रहते हैं. अफसर जो अरबों के फाइन लगा सकते हैं बिना सिक्योरिटी के रहते हैं. ज्यादातर मुखर पत्रकार लेखक बिना सिक्योरिटी के रहते हैं. जनता के अपने लालू यादव क्यों नहीं रह सकते  क्यों उन के बेटे को इतना गुस्सा आना चाहिए  टैक्स देने वाली जनता की कीमत पर कोई नेता जनता पर ही काले कपड़े वालों का रोब मारे यह ठीक नहीं.

सरकार ने खीज कर सिक्योरिटी कम की है यह ठीक है पर नाराज होने की जरूरत नहीं है. यह सिक्योरिटी तो हर नेता से छीन लिए जाने की जरूरत है. योगी आदित्यनाथ सहित क्योंकि योगी को तो स्वयं ऊपर वाला बचाएगा उन के भगवा कपड़ों के कारण.

बैन पर बोलीं राखी सावंत, मेरा एड आया तो क्या डर गई सरकार?

बौलीवुड एक्ट्रेस राखी सावंत ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा दिन के वक्त टीवी पर कंडोम के विज्ञापनों पर बैन लगाने की निंदा की है. मालूम हो कि I&B मिनिस्ट्री के आदेशानुसार अब इस तरह के विज्ञापन सिर्फ रात को 10 से सुबह 6 बजे के बीच ही दिखाए जा सकेंगे. यूं तो इस आदेश पर कई तरह की टिप्‍पणियां आई हैं. जहां कुछ लोगों ने इसे सही बताया है वहीं कुछ लोग इस तरह के दिशा-निर्देशों से नाराज हैं लेकिन इन सब के बीच राखी सावंत कंडोम के विज्ञापनों पर लगी रोक से काफी नाराज दिख रही हैं.

राखी सावंत ने सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सरकार ने सनी लियोनी या बिपाशा बसु के कंडोम के विज्ञापन पर तो रोक नहीं लगाई लेकिन जैसे ही उनको पता चला कि राखी का कंडोम आने वाला है तो उन्होंने दिन के वक्त इस तरह के पर बैन ही लगा दिया. राखी ने पूछा- क्या बिना विज्ञापन देखे ही उन्हें इससे परेशानी होने लगी? क्या सरकार मुझसे डरी हुई है? क्या सरकार ऐसे ऐड्स पर बैन लगाकर लोगों को दिन में यौन संबंध बनाने से रोकना चाहती है?

अपने एक इंटरव्‍यू के दौरान राखी ने कहा कि समाज में यौन सुरक्षा और अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए गर्भनिरोध प्रोडक्‍ट से ज्‍यादा टीवी पर कंडोम का विज्ञापन दिखाया जाना चाहिए. इससे लोगों को पता चलेगा कि इसका इस्तेमाल क्यों करना है. इससे लोग एड्स जैसी बीमारियों से बचेंगे. राखी ने आगे कहा कि यदि भारत में कंडोम एड को बैन किया गया तो ऐड्स का खतरा बढ़ेगा और युवा बिना किसी जानकारी के असुरक्षित यौन संबंध बनाएंगे. अब जब तक बच्चे इस तरह के विज्ञापनों को देखेंगे नहीं तो वे कैसे सुरक्षित यौन संबंध बना सकेंगे. मैं समाज के भले के लिए इस कंडोम का विज्ञापन कर रही हूं.

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि अगर सरकार को लगता है कि टीवी के लिहाज से ऐसे विज्ञापन ठीक नहीं हैं तो उन्हें सेंसर कर सकती है या एडिट कर सकती है, पर नहीं वह ऐसा क्यों करेगी भला. सरकार तो चाहती है कि लोगों को ऐड्स हो जाए.

मालूम हो कि राखी ने कुछ दिन पहले ही अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो शेयर किया था जिसमें वह अपने पसंदीदा कंडोम फ्लेवर बताती नजर आ रही थीं. डांसर से एक्ट्रेस बनी राखी यह बात अच्छी तरह जानती हैं कि किस तरह सुर्खियों में बने रहा जा सकता है. हालांकि इस वीडियो को शेयर करते वक्त राखी ने कोई कैप्शन नहीं लिखा है लेकिन वह हाथ में बीबौय ब्रांड का कंडोम के पैकेट थामे नजर जरूर आ रही थी.

सरकारी स्कूलों से हुआ बच्चों का मोह भंग

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक गांव के सरकारी स्कूल की तसवीर कुछ ऐसी है जिस में न तो स्कूल की घंटी बजती है और न ही बच्चों की चहलपहल सुनाई देती है. स्कूल भवन में ताला लटका रहता है. दरअसल, स्कूलों में बदलती नीतियों, सरकारी प्रयोगों और शिक्षकों से कराई जा रही बेगारी की वजहों से सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन शून्य हो गया है.

ग्राम पंचायत धौखेड़ा के तिघरा टोला का प्राथमिक स्कूल 1997 में खोला गया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रत्येक किलोमीटर के दायरे में शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षा गारंटी कानून बनाया था. उस के तहत, गांव के कजरे टोले, जिन में 40 से अधिक बच्चे स्कूल जाने योग्य हैं, में स्कूल खोल कर बच्चों को शिक्षा की सुविधा मुहैया करवाई गई थी. 60 बच्चों के साथ प्रारंभ हुए इस स्कूल में 2 शिक्षकों की नियुक्ति पढ़ाने के लिए की गई.

20 सालों में प्रदेश के शिक्षा विभाग द्वारा औपरेशन ब्लैकबोर्ड, समाख्या, हमारी शाला कैसी हो, शालासिद्घि जैसी दर्जनों योजनाएं ला कर स्कूलों को प्रयोगशाला बनाया गया और शिक्षकों से जनगणना, चुनाव, सर्वे के साथ मध्याह्न भोजन, स्कौलरशिप, साइकिल, गणवेश वितरण जैसी विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की बेगारी करवाई गई. नतीजतन, आज यह सरकारी स्कूल बच्चों को चिढ़ाता नजर आता है. प्रदेश में तिघरा टोला का यह स्कूल अकेला नहीं है, बल्कि रिछावर का नागल टोला, बम्हौरी के माटिया टोला और जमधान टोला जैसे कई स्कूल हैं जो नामांकन में कमी की वजह से बंद होने के कगार पर हैं.

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शिक्षकों से बेगारी

शिक्षकों से दूसरे काम कराए जाने का एक ताजा मामला प्रदेश के सिंगरोली जिले में प्रकाश में आया है. सरकार

द्वारा कराए जा रहे सामूहिक विवाह के आयोजन में बाकायदा कलैक्टर के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी ने 28 शिक्षकों की ड्यूटी पूरी, दाल, सब्जी परोसने में लगा दी. शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत राष्ट्रीय महत्त्व के कार्य, जैसे चुनाव और जनगणना को छोड़ कर, शिक्षकों की सेवाएं गैरशिक्षकीय कार्यों में नहीं ली जा सकतीं.

प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर के लिए कुछ हद तक हमारा समाज भी जिम्मेदार है. आज समाज में अभिभावक मौजूदा दौर को देखते हुए बच्चों को अंगरेजी माध्यम या फिर मिशनरी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं. पर आर्थिक हालत के चलते कुछ अभिभावकों को उन्हें सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है.

शिक्षा के बाजारीकरण ने, राजनीति की तरह शिक्षा को भी 2 धड़ों में बांट दिया है. एक वो जो अंगरेजी के तानेबाने से भरे प्राइवेट स्कूलों के भारीभरकम बस्तों पर खत्म होती है, दूसरी, शिक्षकों, सरकारी तंत्र की नीतियों के दबाव में और निकम्मे आलसी शिक्षकों की वजह से कराह रही है. गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा प्राइवेट स्कूलों के सामने कहीं नहीं टिकती. बच्चों के लिए दोवक्त की रोटी की व्यवस्था में लगे अभिभावक सरकारी प्राथमिक विद्यालयों, सरकार और सरकारी नीतियों के बीच पिस रहे हैं.

मध्य प्रदेश में कुल 1 लाख 23 हजार 51 सरकारी स्कूल हैं, जिन में से 83,969 प्राथमिक, 30,460 माध्यमिक, 4,768 हाई स्कूल एवं 3,854 हायर सैकंडरी स्कूल हैं. सरकार के शिक्षा विभाग के

पोर्टल के अनुसार, वर्ष 2011-12 में जहां प्राथमिक स्कूलों में कक्षा 1 से 5 तक 66 लाख 94 हजार 402 विद्यार्थी पढ़ रहे थे, 5 वर्षों बाद 2016-17 में यही आंकड़ा 43 लाख 44 हजार 410 रह गया है. जाहिर है इन 5 सालों में केवल प्राथमिक स्कूलों में 23 लाख विद्यार्थी सरकारी स्कूलों की बदहाली के कारण अपना रुख निजी स्कूलों की ओर कर चुके हैं.

क्या कहते हैं आंकड़े

आंकड़ों पर नजर डालने से प्रतीत होता है कि नामांकन में इसी दर से कमी आती गई तो आने वाले 5 वर्षों में प्राथमिक स्कूलों का बंद होना तय है. दरअसल, सरकार भी अब प्राथमिक शिक्षा से अपने हाथ खींचने का मन बना चुकी है. यही कारण है कि पिछले 5 सालों से न तो शिक्षकों की भरती की गई और न ही भविष्य में की जाने की उम्मीद दिखाई देती है. सरकारी स्कूलों की दुर्दशा के लिए केवल सरकारी तंत्र ही जिम्मेदार हो, ऐसा नहीं है. काफी हद तक शिक्षकों की लापरवाही भी इस का प्रमुख कारण है. वैसे भी, इन स्कूलों में दलितों व अतिपिछड़ों के बच्चे आते हैं जिन्हें पढ़ाने में ऊंची जातियों के शिक्षकों की कोई रुचि है ही नहीं.

शिक्षा का अधिकार फोरम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश में 98,443 सरकारी प्राथमिक विद्यालय सिर्फ एक शिक्षक की बदौलत चल रहे हैं. अर्थात देश के करीब 12 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में कक्षा 1 से 5वीं तक छात्रों की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ एक शिक्षक पर ही निर्भर है. अब इन आंकड़ों से जाहिर है कि ये शिक्षक विद्यालयों में अलगअलग कक्षा के छात्रों को शिक्षा देने के नाम पर खानापूर्ति करते होंगे. जिस भी दिन शिक्षक की अनुपस्थिति होती होगी उस दिन वह विद्यालय बंद होता होगा.

देश में इस समय लगभग साढ़े 13 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं. परंतु इन में 41 लाख शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं और जो शिक्षक हैं उन में से लगभग साढ़े 8 लाख शिक्षक अप्रशिक्षित हैं. ऐनुअल स्टेट्स औफ एजुकेशन रिपोर्ट 2014 के अनुसार भी भारत में निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 51 फीसदी हो गया है. वर्ष 2010 में यह दर 39 फीसदी थी. रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कक्षा 8वीं के 25 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ भी नहीं पढ़ सकते हैं.

आज शिक्षा अपने समूचे स्वरूप में अराजकताएं, अव्यवस्थाएं, अनैतिकता और कल्पनाहीनता का पर्याय बन गई है. शिक्षा के जरिए अब न उत्पादकता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, न तार्किक शिक्षा व समझदारी का, न दायित्व एवं कर्तव्यबोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना का. आज पोंगापंथी का पाठ सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है. शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबीलंबी बहसें होती हैं. और अंत में उस के लिए जो शिक्षक दोषी है उसे बख्श दिया जाता है. शिक्षक के लिए शिक्षा उत्पादन है पर उस का खरीदार वह छात्र है जो पैसा नहीं दे रहा.

शिक्षा की गुणवत्ता

स्कूलों में शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं. शिक्षक वक्त पर पहुंचते नहीं हैं. शिक्षक वैसा शिक्षण नहीं करते जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की श्रेणी में आता है. आएदिन किसी मुद्दे को ले कर हड़ताल पर चले जाना और स्कूलों की छुट्टी हो जाना आम हो गया है. बच्चे शिक्षा पाने के लिए विद्यालय जाते हैं लेकिन वहां शिक्षक ही नदारद रहते हैं. ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता कहां से आएगी?

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की बात अकसर सुनने में आती है. किंतु सुधार कहीं नजर नहीं आता. अभी कुछ दिनों से शिक्षा विभाग में बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को ले कर मध्य प्रदेश में स्कूल स्तर से ले कर राज्य स्तर तक के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा एक नाटक खेला जा रहा है. जिस में बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता की जांच की जा रही है. टैस्ट लेने के लिए जिले, विकास खंड, संभाग और राज्य स्तर तक के शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी स्कूलों में जा रहे हैं और निरीक्षण कर रहे हैं.

अधिकारीगण शिक्षकों को फटकारनुमा समझाइश देते हैं कि वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करें. यह कैसी विडंबना है कि स्कूलों में शिक्षक पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा स्थापित करने का भारी दबाव तो है मगर उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए तैयार ही नहीं किया गया. सरकार की गलत शिक्षा नीतियों के दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं.

होना क्या चाहिए, हो क्या रहा है

मध्य प्रदेश के 83 हजार 969 सरकारी प्राथमिक स्कूल शैक्षणिक गुणवत्ता में कमी, शिक्षकों के रिक्त पदों पर पदपूर्ति न होने एवं बुनियादी आवश्यकताओं के अभाव और शिक्षकों की लापरवाही, अनुशासनहीनता व बेईमानियों के चलते दम तोड़ते नजर आ रहे हैं. वातानुकूलित कक्षों में बैठे अफसर व अल्पज्ञानी मंत्री सरकारी स्कूलों में नित नए ऊटपटांग प्रयोग कर शिक्षा को रसातल की ओर ले जा रहे हैं. जिला स्तर पर होने वाली समीक्षा बैठकों में भी शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय गैर शिक्षा योजनाओं की समीक्षा का कार्य ही होता है. इन्हीं सब कारणों से प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों के नामांकन में भारी गिरावट दर्ज की गई है.

लड़कियां क्यों छोड़ रही हैं स्कूल

देश की आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी मध्य प्रदेश की गोटेगांव तहसील मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर कोडिया गांव के लिए पक्की सड़क बनवाने में जनप्रतिनिधि नाकाम रहे तो उन्हें आईना दिखाते हुए प्रदेश की मैरिट में आने वाली छात्रा विनीता का जब क्षेत्र के विधायक जालम सिंह पटेल ने सम्मान करना चाहा तो उस ने यह कह कर सम्मान को ठुकरा दिया, ‘‘भले आप मेरा सम्मान न करो पर मेरे गांव की पक्की सड़क बनवा दो…गांव से स्कूल जाने में बहुत परेशानियां होती हैं. कई छात्राएं सड़क न होने की वजह से पढ़ नहीं पातीं. बीमार अस्पताल आतेआते दम तोड़ देता है. बारिश में न खेत नजर आता है न सड़क.’’

छात्रा के जवाब से पानीपानी हुए विधायक जालम सिंह ने छात्रा के हौसले की सराहना करते हुए उसे भरोसा दिलाया कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री से मिल कर उन्हें गांव की सड़क के लिए प्रस्ताव देंगे ताकि ग्राम कोडिया के निवासियों को पक्की सड़क हासिल हो सके.

यह कहानी विकास की डींगे मारने वाले प्रदेश के मंत्री, विधायकों के मुंह पर करारा तमाचा तो है ही, साथ ही, सरकार की लड़कियों की शिक्षा के लिए किए जा रहे तमाम खोखले प्रयासों की पोल भी खोलती है. प्रदेश की सरकार गांवों के सरकारी स्कूलों में कक्षा 6वीं व 9वीं में प्रवेश लेने वाली हर छात्रा

को निशुल्क पाठ्यपुस्तक, साइकिल, स्कौलरशिप देती है. बावजूद इस के, 12वीं कक्षा के बाद 50 फीसदी लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं.

लड़कियों के पढ़ाई बीच में छोड़ने के और भी कई कारण हैं. आज भी ग्रामीण इलाकों में 16 साल के बाद लड़कियों की शादी कर दी जाती है. महिला बाल विकास विभाग नाम का सफेदहाथी चुपचाप बाल विवाह को मूक सहमति दे, अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है.

आज भी प्रदेश के 60 प्रतिशत ग्रामों में हाईस्कूल की सुविधा नहीं है. कक्षा 8वीं पास करने के बाद उन्हें 5 से 10 मिलोमीटर का सफर तय कर हाईस्कूल में दाखिला लेना पड़ता है जो सुरक्षा के लिहाज से हर अभिभावक को सुविधाजनक नहीं लगता.

स्कूलों में लड़कियों के लिए पृथक शौचालय, सैनीटरिंग का अभाव होने के साथ पृथक कन्या हाईस्कूल न होना भी लड़कियों की शिक्षा में बाधक हैं.

बालिका शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे अनेक प्रयत्नों के बावजूद प्रदेश लगातार पिछड़ता जा रहा है. स्टेटस औफ एजुकेशन की 11वीं सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि 29.8 प्रतिशत लड़कियां अभी भी स्कूल नहीं जा रही हैं. यह आंकड़ा राजस्थान, गुजरात, ओडिशा व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के बाद समाविष्ट होता है यानी मध्य प्रदेश इन राज्यों से भी पीछे है.

नए खुलने वाले हाईस्कूल भी बेतरतीब तरीके से खोले गए हैं. जहां ज्यादा आवश्यकता है वहां न खोल कर खानापूर्ति कर ली गई है. अनेक स्कूलों के पास अपना भवन ही नहीं है. वे या तो प्राइमरी, माध्यमिक के भवनों में संचालित हो रहे हैं या पंचायत के भवनों में. पर्याप्त जगह न होने से भी शिक्षणकार्य प्रभावित हो रहा है.

बालिका शिक्षा को बेहतर बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास ज्यादा कारगर साबित नहीं हो रहे हैं. सरकार को चीजें मुफ्त में देने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर देना चाहिए. प्राइवेट स्कूलों में लड़कियां बहुतायत में पढ़ती हैं क्योंकि वहां भले ही फीस अधिक लगती हो पर शिक्षा गुणवत्तापूर्ण मिलती है. निजी स्कूलों में लड़कियों के लिए प्रसाधनगृह के अलावा तमाम वे सुविधाएं उपलब्ध हैं जो उन्हें स्कूल में आवश्यक होती हैं. अभिभावक भी बेटियों को ऐसे स्कूलों में भेजने में संकोच नहीं करते. सो, सरकार द्वारा शिक्षा में किए जा रहे प्रयोगों को बंद कर बेहतर शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए.

सनी लियोनी का विरोध, आत्महत्या करने की दी धमकी

सनी लियोनी की कर्नाटक में होने वाली प्रस्‍तुति को लेकर विरोध और भी तेज होता जा रहा है. कन्नड़ संगठनों के विरोध के मद्देनजर कर्नाटक सरकार ने शुक्रवार को ही यह साफ कर दिया कि सनी लियोनी को राज्य में कहीं भी नर्व वर्ष (New year 2018) की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी.

कर्नाटक रक्षा वेदिके और कुछ अन्य संगठन 31 दिसंबर के प्रस्तावित कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं. इसी विरोध के दौरान कर्नाटक रक्षा वेदिके (केआरवी) के सदस्‍यों का कहना है कि अगर सनी लियोनी कनार्टक में कहीं भी प्रोग्राम में हिस्‍सा लेंगी तो हम सब उसी शाम सामूहिक आत्‍महत्‍या करेंगे.

कर्नाटक रक्षा वेदिके (केआरवी) का आरोप है कि सनी लियोनी को आमंत्रित करना शहर की संस्कृति पर हमला होगा. पिछले एक हफ्ते से कर्नाटक रक्षा वेदिके (केआरवी) के सदस्य शहर में प्रदर्शन कर रहे हैं, रैलियां निकाल रहे हैं और सनी लियोनी के पुतले फूंक रहे हैं.  एक न्‍यूज एजेंसी अनुसार केआरवी के सेक्रेटरी जयदेव प्रसाद ने कहा, ‘अगर वह इस इवेंट में साड़ी पहन कर भारतीय संस्‍कृति के अनुसार यहां आएं तो हमें उनसे कोई समस्‍या नहीं है.

लेकिन अगर वह आधे कपड़े पहनकर आईं, जैसे वह पहनती हैं तो हम इस इवेंट के दौरान ही आत्‍महत्‍या करेंगे. हमने पहले ही इस इवेंट के 70 टिकट खरीद लिए हैं. अगर वह छोटे कपड़ों में दिखीं, तो हम और विरोध करेंगे और अपनी संस्‍कृति को बचाने के लिए वहीं आत्‍महत्‍या कर लेंगे.’

सनी लियोन के नवरात्रि ऐड पर विवाद

इसी साल सितंबर में एक्ट्रेस सनी लियोन पर कल्चरल वैल्यूज को आहत पहुंचाने का आरोप लगा था. गुजरात के कुछ शहरों पर मैनफोर्स की ओर से नवरात्रि की शुभकामना संदेश के होर्डिंग्स लगाए गए थे. इस होर्डिंग्स में सनी लियोन की तस्वीर दिखाई जा रही थी. हालांकि, होर्डिंग में कहीं भी कंडोम शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है. इसमें मैनफोर्स की ब्रांड एम्बेसडर सनी लियोन के साथ मैनफोर्स का लोगो और ‘प्ले, लव और नवरात्रि’ की टैगलाइन दिखी थी.

हादिया के बहाने लव जिहाद

केरल की अखिला का मुसलिम युवक शफीन जहां से प्रेम विवाह और फिर अखिला से धर्म बदल कर हादिया बन जाना हिंदू धर्म के रखवालों को धर्म के नाम पर घरघर में घुस कर पैट्रोल डालने का काम कर गया है. इस प्रेम और विवाह को लव जिहाद का नाम दे कर उन्होंने इतना होहल्ला कर डाला कि केरल उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना पड़ा है कि इन दोनों का क्या किया जाए.

लव जिहाद एक बेहूदी बात है और शादियां केवल पंडेमौलवियों के हाथों अपने धर्म या जाति वालों के साथ ही हो सकती हैं के रिवाजों को कायम रखने के लिए की जा रही हैं. गांवगांव में हल्ला मचाया जा रहा है कि मुसलिम युवक हिंदू लड़कियों को प्रेम के जाल में फंसा कर मुसलमानों की गिनती बढ़ाने में लगे हैं ताकि एक दिन भारत मुसलमानों का देश हो जाए. 2002 के बाद नरेंद्र मोदी खुद चुनाव प्रचार में गुजरात में हिसाब गिनाते घूमे थे कि मुसलिम 5 से 25 हो रहे हैं ताकि उन की गिनती बढ़ जाए और वे सत्ता पर कब्जा कर सकें.

जवानों के दिलों पर राज करने वाला धर्म कोई नहीं होता पर सारे देश में धर्म, जाति, गोत्र को ले कर चौधराहट दिखाने वाले घरघर में घुस कर जांचपरख रहे हैं कि कहीं कोई सैकड़ों साल पुराने रीतिरिवाजों को छोड़ कर शादी तो नहीं कर रहा. अखबार के शादी के विज्ञापन तो जातियों के खानों में बंटे होते ही हैं, इंटरनैट की साइटों पर भी आप को अपनी जाति, धर्म, गोत्र बताना होता है तभी कोई साथी मिलता है.

इस मामले में पूछताछ कर के भी सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से युवाओं के हक को कम किया है. उन्होंने हादिया को पढ़ने की आजादी दी है पर उस पर देखरेख की जो जिम्मेदारी डीन पर डाली है उस से साफ है कि 24 साला हादिया या अखिला अब सरकारी मेहमान है, जेल हो या जेल से बाहर.

यह मामला तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को कब का दरवाजे से बाहर फेंक देना चाहिए था कि जब लड़की बालिग है तो उसे हक है कि वह किस से शादी करे और किस धर्म में रहे. धर्म को मानव इच्छा से ऊपर रखना ही गलत है. यही कट्टरपंथियों को ताकत देता है. यह संदेशा तो चला गया ही कि दूसरे धर्म वाले से प्रेम और शादी करोगे तो हल्ला मचेगा और जब तक पैसा और साधन न हों विवाह टिक न पाएगा.

दोनों अदालतों को तो उन को जेल भेजना चाहिए था जो शादी पर रोकटोक लगा रहे थे. चाहे वह लड़की का पिता अशोकन ही क्यों न हो जो जादूटोने और बहकाने के बहाने लगा रहा था. कट्टरपंथियों को किसी भी तरह की छूट नहीं मिलनी चाहिए, बाल बराबर भी नहीं, कम से कम अदालतों से तो नहीं. जब एक शादी के मामले में श्याम दीवान, कपिल सिब्बल और इंदिरा जयसिंह जैसे भारीभरकम वकीलों की जरूरत पड़े तो यह आजाद भारत की निशानी नहीं है. यह तो सरकार, अदालतों, पुलिस, कट्टरों का साफ दखल है, यह उन की प्रेम पर जीत है. सुप्रीम कोर्ट ने जो किया ठीक है पर उस का गलत संदेश भी जाता है.

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