गुड़िया के गैंगरेप और हत्या का दोषी कौन?

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला तो खूबसूरत है ही, लेकिन प्राकृतिक रूप से देखें तो यहां का कोटखाई और भी ज्यादा खूबसूरत है. लाल, हरे सेबों से लदे सेब के बाग यहां की सुंदरता में और भी चारचांद लगा देते हैं. पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहां का जीवन भले ही दुरूह है, लेकिन सेब बागानों की वजह से यह इलाका काफी समृद्ध है, पैसे से भी और संसाधनों से भी. वैसे तो इस क्षेत्र में अपराध कम ही होते हैं, लेकिन 4 जुलाई को यहां जो कुछ हुआ, उस ने पहाड़ों की रानी कही जाने वाली हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला तक को हिला कर रख दिया.

यह कुछ ऐसा ही था, जैसा 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ हुआ था. शिमला से 60 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा कोटखाई को तहसील का दर्जा प्राप्त है. इस तहसील में छोटेछोटे 247 गांव हैं. इन्हीं गांवों में एक गांव है हलाईला. गांव में स्कूली शिक्षा के आगे की पढ़ाई का साधन न होने की वजह से गांव के बच्चे महासू स्कूल में पढ़ने जाते हैं, जो गांव से कई किलोमीटर दूर है.

15 वर्षीया गुडि़या भी इसी स्कूल में 10वीं की छात्रा थी. 4 जुलाई को वह रोजाना की तरह स्कूल गई, लेकिन शाम तक लौट कर नहीं आई.

ऐसे में घर वालों का चिंतित होना स्वाभाविक ही था. उन्होंने गुडि़या की काफी खोजबीन की, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला. मजबूर हो कर उन्होंने थाना कोटखाई में गुडि़या के लापता होने की रिपोर्ट लिखा दी.

गुडि़या की नग्न लाश 6 जुलाई की सुबह हलाईला के जंगल में पड़ी मिली. उस की लाश की हालत बता रही थी कि उस के साथ दरिंदगी करने के बाद उस की हत्या की गई है. तत्काल इस मामले की सूचना पुलिस को दी गई, लेकिन पुलिस को घटनास्थल पर पहुंचने में 4 घंटे लगे. इस बीच घटनास्थल पर सैकड़ों लोग एकत्र हो चुके थे. निस्संदेह यह मामला गैंगरेप के बाद जघन्य तरीके से हत्या करने का था. पुलिस ने केस दर्ज किया और शुरुआती पूछताछ के बाद गुडि़या की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

एक स्कूली छात्रा के साथ दरिंदगी की इस घटना से प्राय: शांत रहने वाली वादी सुलग उठी. निस्संदेह यह घटना दिल दहला देने वाली थी. गुडि़या के गुनहगारों का पकड़ा जाना जरूरी था. गुडि़या के पिता ने रसूखदार लोगों को साथ ले कर पुलिस पर दबाव बनाया. केस पहले ही दर्ज हो चुका था, सो पुलिस ने जांच में सक्रियता दिखानी शुरू की. पुलिस ने 3-4 लड़कों को पकड़ा भी, लेकिन रसूखदार होने की वजह से उन्हें मामूली पूछताछ के बाद छोड़ दिया. दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट पर बतौर संदिग्ध इन लोगों के फोटो वायरल हुए थे, जिस की वजह से पुलिस उन्हें उठा लाई थी.

पुलिस का ढुलमुल रवैया देख कर गुडि़या के परिजनों का पुलिस वालों से विश्वास उठने लगा तो कोटखाई के लोगों में पुलिस के प्रति आक्रोश उभरने लगा.

मामला सुलगते देख 11 जुलाई को कोटखाई पुलिस ने पास ही के गांव के 4 युवकों को हिरासत में लिया और गुडि़या केस में पूछताछ के लिए उन्हें किसी गुप्त स्थान पर ले गई. इस के साथ ही पुलिस क्षेत्र में सक्रिय मोबाइल काल डिटेल्स के डंप डाटा की छानबीन भी कर रही थी. इस बीच पुलिस की एक टीम ने पोशीदगी से उन लोगों की सूची भी तैयार की, जो इस वारदात वाले दिन से ही गांव से बाहर थे.

इस प्रयास में पुलिस को एक ऐसे युवक के बारे में पता चला, जो वारदात वाले दिन से ही भूमिगत था. पूरे गांव में किसी को भी इस बात की खबर नहीं थी कि वह अचानक कहां चला गया. पुलिस ने उस युवक के मोबाइल को ट्रैकिंग पर लगा कर उस की काल डिटेल्स व लोकेशन पर नजर रखनी शुरू कर दी. इस से पुलिस को उस की गतिविधियों पर शक तो हुआ, लेकिन न जाने किस वजह से पुलिस ने उस की ओर से ध्यान हटा लिया.

वैसे पुलिस ने इस केस की अपनी जांच के बारे में अपनी अब तक की प्रगति के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चलने दिया था. फिर भी जैसेतैसे यह बात सामने आ गई कि हिरासत में लिया गया एक आरोपी उस स्कूल के निकटवर्ती गांव का रहने वाला था, जहां गुडि़या पढ़ती थी. यह शख्स गांव में अकेला रहता था और खूब नशा करता था. उस की मां एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थी, जिस वजह से वह खुद का कुछ ज्यादा ही रौबदाब बनाए रखने की कोशिश करता था.

पत्रकारों को पुलिस ने इस केस के संबंध में कुछ बताया था तो केवल इतना कि इस कांड में 4 से अधिक आरोपी हो सकते हैं, साथ ही यह भी कि जंगल में जिस जगह से गुडि़या का शव बरामद हुआ था, वह जगह सड़क से ज्यादा दूर नहीं है. जिस तरीके से गुडि़या का नग्न शव वहां पड़ा मिला था, उस से साफ जाहिर होता है कि उस से दुराचार कर के उस की हत्या कहीं और की गई थी और बाद में शव को वहां ला कर फेंक दिया गया था.

इधर यह सब चल रहा था और उधर मामला हल करने के लिए हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने प्रदेश के डीजीपी सोमेश गोयल को अपने निवास पर बुलाया. उन्होंने डीजीपी से इस मामले को जल्दी से जल्दी हल करने के लिए एक स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम का गठन करने का आदेश दिया, साथ ही मुख्यमंत्री ने पीडि़ता के परिवार को 5 लाख रुपया सहायता राशि देने की घोषणा भी की.

डीजीपी सोमेश गोयल ने उसी दिन आईजी जहूर हैदर जैदी की अगुवाई में एसआईटी गठित कर दी. इस टीम में जिन पुलिस अधिकारियों को शामिल किया गया, वे थे एएसपी (शिमला) भजनदेव नेगी, डीएसपी (ठियोग) मनोज जोशी, डीएसपी रतन नेगी, थानाप्रभारी (ढल्ली थाम) बाबूराम शर्मा, एसआई धर्म सिंह, थानाप्रभारी (छोटा शिमला) राजेंद्र सिंह, थानाप्रभारी (कोटखाई) व एडीशनल थानाप्रभारी (ठियोग) के अलावा आधा दरजन अन्य पुलिसकर्मी.

इस टीम ने युद्धस्तर पर गुडि़या केस की छानबीन करते हुए 84 संदिग्ध लोगों से पूछताछ की. वह भी केवल 52 घंटों में. 28 मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स निकलवा कर उन की भी जांच की गई. यह मामला कोटखाई थाना में धारा 376 एवं 302 के तहत दर्ज किया गया था. अब इस में पोक्सो एक्ट की धारा 4 का भी समावेश कर दिया गया था.

अपनी इस तरह की उपलब्धियों के साथ 13 जुलाई को डीजीपी सोमेश गोयल ने पुलिस मुख्यालय में एक बड़ी प्रैस कौन्फ्रैंस की. उन्होंने पहले तो इस मामले के हल हो जाने की घोषणा करते हुए अपने सभी कनिष्ठ अधिकारियों की पीठ थपथपाई. फिर पत्रकारों को बताया कि उन की पुलिस ने गुडि़या केस को महज 52 घंटों के भीतर सुलझा कर इस कांड में शामिल सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है.

उन नामों का खुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि इस मामले में जिन्हें गिरफ्तार किया गया है, वे हैं—महिंद्रा पिकअप वैन का चालक राजेंद्र सिंह उर्फ राजू, उम्र 32 साल, निवासी गांव हलाईला, उत्तराखंड का रहने वाला 42 वर्षीय सुभाष सिंह बिष्ट, नेपाल निवासी 29 वर्षीय सूरज सिंह, 19 साल का लोकजन उर्फ छोटू और गढ़वाल निवासी 38 वर्षीय दीपक उर्फ दीपू.

संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों से जानकारियां साझा करते हुए डीजीपी ने बताया, ‘‘हालफिलहाल ये सभी अभियुक्त हलाईला ही में रह रहे थे, जबकि राजू मूलरूप से जिला मंडी के गांव जंजैहली का रहने वाला है. एक अन्य अभियुक्त के बारे में बताना रह गया, वह है महासू के नजदीक शराल गांव का रहने वाला 29 वर्षीय आशीष चौहान उर्फ आशु.

‘‘यह एक ब्लाइंड मर्डर केस था. आरोपियों ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दी थीं. यह कोई वारदात नहीं थी, बल्कि अपर्चुनिटी क्राइम था. नशे में धुत्त 5 आरोपियों ने पहले छात्रा के साथ बलात्कार किया, फिर उस की हत्या कर दी. अपराध के दिन लड़की के पास मोबाइल नहीं था. उस दिन इस क्षेत्र में बारिश भी हुई थी. मेरा दावा है कि हमारी एसआईटी ने 5 तरह के वैज्ञानिक सबूत जुटा कर इस केस को पूरी जिम्मेदारी से हल कर लिया है.’’

लेकिन लोगों को पुलिस का यह दावा हजम नहीं हुआ. पुलिस जांच से नाखुश आक्रोशित भीड़ ने पुलिस के ही खिलाफ कमर कस ली. कोटखाई व ठियोग थानों पर पत्थरबाजी करते हुए लोगों ने जम कर हंगामा किया.

14 जुलाई को जब शिमला के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डी.डब्ल्यू. नेगी ठियोग थाना में आए हुए थे, तभी लोगों ने थाने पर हमला कर के न केवल एसएसपी से धक्कामुक्की की, बल्कि एक दारोगा को भी थाने से बाहर खींच कर उस की वर्दी पर लगे स्टार नोच लिए. पुलिसकर्मियों ने बड़ी मुश्किल से अपने एसएसपी को थाने के भीतर पहुंचा कर गेट बंद कर लिया.

इस बीच उग्र भीड़ ने एक एसपी व एक डीएसपी की गाड़ी समेत पुलिस की कई गाडि़यों को तोड़ डाला था. इधर यह सब चल रहा था, उधर शिमला में इस तरह के हंगामे की आशंका के मद्देनजर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, मुख्य सचिव गृह व डीजीपी सहित अन्य कई अधिकारियों की सचिवालय में आपातकालीन बैठक हुई. बैठक के तुरंत बाद सीएम वीरभद्र सिंह ने घोषणा कर दी कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मैं इस केस को सीबीआई के हवाले करने की सिफारिश करता हूं.

सीएम का आदेश होते ही शासन ने इस से संबंधित अधिसूचना जारी कर दी, ताकि किसी को किसी तरह का संशय न रहे.

लेकिन लोगों का कहना था कि इस कांड में संलिप्त रईसजादों को बचाने के लिए पुलिस सारा केस गरीब मजदूरों पर डालने की कोशिश कर रही है. पहले कुछेक रईसजादों को पुलिस ने इस केस में पकड़ा भी था, मगर उन्हें जल्दी ही छोड़ दिया गया था, जिस का जिक्र हम शुरू में कर चुके हैं. नतीजा यह हुआ कि कोटखाई व ठियोग में हुई किरकिरी के बाद शिमला पुलिस बैकफुट पर आ गई. जिन रईसजादों को पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था, पुलिस ने उन्हें फिर से पकड़ लिया.

शिमला के डीडीयू अस्पताल में इन के सीमन एनालिसिस और डीएनए प्रोफाइलिंग के सैंपल लिए गए. मैडिकल करवाने के बाद उन्हें पुलिस मुख्यालय ले जा कर उन से देर रात तक पूछताछ की जाती रही. उन में एक के ऊपर पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज थे. कुछ दिनों पहले ही वह शिमला की जिला अदालत से एक आपराधिक केस में बरी भी हुआ था.

पुलिस जो कर रही थी, लोग उस से पहले ही संतुष्ट नहीं थे. जब एक रईसजादे आशु को गुपचुप तरीके से अदालत पर पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया तो लोग और भी भड़क उठे. 18 जुलाई की सुबह 24 पंचायतों के 4 हजार लोग अपना शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए गुम्मा नामक जगह पर इकट्ठा हुए तो वहां कुछ राजनेता भी पहुंच कर एकदूसरे पर तंज कसने लगे.

इन नेताओं की बेतुकी बयानबाजी से गुस्साए लोगों ने ठियोग-हाईकोटी नेशनल हाईवे पर जाम लगा दिया, जो 7 घंटे चला. इस बीच एक गाड़ी को भी तोड़ दिया गया और मौके पर पहुंचे ठियोग के एसडीएम टशी संडूप को लोगों ने कमरे में बंद कर दिया.

कुछ पत्रकार गुडि़या के पिता से मिलने गए तो मालूम पड़ा कि केस वापस लेने के लिए उन्हें करोड़ों का प्रलोभन दिया जा रहा था, जबकि उन्होंने साफ कह दिया था कि उन्हें पैसा नहीं चाहिए. न सरकार की तरफ से न किसी और से. उन्हें तो अपनी बेटी के लिए इंसाफ चाहिए, केवल इंसाफ.

उसी दिन राज्य सरकार की ओर से प्रदेश हाईकोर्ट में इस केस पर जल्दी सुनवाई करने का आवेदन किया गया, जो स्वीकार कर लिया गया. इस संबंध में महाधिवक्ता ने न्यायालय से आग्रह किया कि सीबीआई को आदेश दिया जाए कि तुरंत शिमला पुलिस से रेकौर्ड ले कर अपनी काररवाई शुरू करे. यह आदेश दे भी दिया गया.

लेकिन उस रात वह हो गया, जिस की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. कोटखाई थाने की हवालात में इस केस के एक अभियुक्त सूरज की हत्या हो गई. पुलिस के अनुसार, दूसरे अभियुक्त राजू ने सूरज का गुप्तांग मसल कर उसे मार डाला था.

जैसे ही इस की खबर लोगों को लगी, भारी भीड़ एकत्र हो कर कोटखाई की ओर बढ़ने लगी. 19 जुलाई की दोपहर सवा 3 बजे इस भीड़ ने कोटखाई थाने को आग लगा दी. थाने की इमारत के साथ वहां रखा रेकौर्ड जल कर राख हो गया. पुलिस के कई वाहन जला दिए गए, साथ ही घोषणा कर दी गई कि 20 जुलाई को शिमला बंद रहेगा.

20 जुलाई को शिमला शहर समेत समूचे राज्य में पूर्ण बंद रहा. गुडि़या को न्याय की मांग को ले कर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे. कई जगह पुलिस वालों पर पत्थरबाजी हुई तो इन प्रदर्शनकारियों द्वारा कई थानों में भी घुसने की कोशिश की गई. मृतक सूरज की पत्नी ममता ने भी पति को इंसाफ दिलाने के लिए कमर कस ली थी.

प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने इस तरह थाने के भीतर हुई हत्या को गंभीरता से लेते हुए इस की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए, साथ ही कोटखाई थाने के थानाप्रभारी समेत 3 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर के एसआईटी के 3 प्रमुख अफसरों आईजी जैड.एच. जैदी, एसएसपी शिमला डी.डब्ल्यू. नेगी और एएसपी भजनदेव नेगी का तबादला कर दिया गया.

पुलिस के माध्यम से इस अपराध की जो मूलकथा मीडिया तक पहुंची, वह इस प्रकार से थी कि 4 जुलाई को गुडि़या के स्कूल से घर जाते समय उसे पिकअप वैन चालक राजेंद्र उर्फ राजू रास्ते में मिला. राजू ने उसे गाड़ी से छोड़ने की बात कही. वह राजू को जानती थी, इसलिए उस की गाड़ी में बैठ गई.

पिकअप वैन में सुभाष बिष्ट, सूरज सिंह, लोकजन और दीपक भी बैठे थे. ये सब शराब के नशे में थे. कुछ आगे जा कर राजू ने वैन रोकी और ये लोग गुडि़या को घसीट कर जंगल में ले गए, जहां उस के कपड़े फाड़ कर इन लोगों ने उस के साथ यौनाचार व दुराचार किया. इस के बाद जब आरोपियों ने गुडि़या को मारने की योजना बनाई तो उस ने जान की भीख मांगते हुए कहा, ‘जो करना है करो, मगर मुझे जान से मत मारो. मैं जीना चाहती हूं. इस घटना के बारे में मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगी.’

लेकिन आरोपियों को उस पर जरा भी तरस नहीं आया. उन्हें अपने फंस जाने का डर था, लिहाजा उन्होंने गुडि़या का गला दबा कर उसे मार डाला.

पुलिस के मुताबिक इस केस की यही कहानी थी और ये 5 लोग ही दोषी थे, अन्य कोई नहीं. इन में सूरज वादामाफ गवाह बनने को तैयार हो गया था, लेकिन उसी की हत्या हो गई.

फिलहाल मीडिया के जरिए लोग रोजाना सवालों के गोले दाग रहे हैं, जिन का कोई पुख्ता जवाब न पुलिस के पास है न ही सरकार के पास. कुछ अहम सवालों की बानगी इस तरह से है:

अस्पताल में जब अभियुक्तों को उन का मैडिकल करवाने ले जाया गया था तो एकदूसरे को गुडि़या का असली हत्यारा बताते हुए वे आपस में लड़ते रहे थे. ऐसे में कस्टडी रिमांड के दौरान उन्हें एक ही हवालात में क्यों रखा गया?

सूरज जब वादामाफ गवाह बनाया जा रहा था तो उसे दूसरे अभियुक्तों से अलग क्यों नहीं रखा गया? केस सीबीआई को भेज दिया गया है, बावजूद इस के पुलिस इन अभियुक्तों का कस्टडी रिमांड बढ़वा कर 18-19 जुलाई की रात में इन्हें किस बात के लिए इंटेरोगेट कर रही थी? सूरज की हत्या कस्टडी रिमांड के दौरान हवालात में हुई तो क्या ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उस की चीखें नहीं सुनीं?

पुलिस के पास इस केस का एक चश्मदीद है, लेकिन अभी तक उस के सीआरपीसी की धारा 164 के अंतर्गत बयान क्यों नहीं दर्ज कराए गए? सूरज ने अपना लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाने की बात कही थी तो पुलिस ने इस संबंध में अदालत में अर्जी क्यों नहीं लगाई थी? जब गुडि़या की नग्न लाश मिली थी तो उस के कपड़े और स्कूल बैग वगैरह कहां से बरामद हुए थे?

हौलीवुड अभिनेत्री गल गैडट का फेक पौर्न वीडियो वायरल

मशहूर हौलीवुड एक्ट्रेस गल गैडट जिन्होंने इस साल वंडर वूमेन फिल्म में काम किया था, उनका एक फर्जी वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा देखा जा रहा है. दरअसल, उनका एक फर्जी पोर्न वीडियो इंटरनेट पर मौजूद है, जो तकनीक के गलत हाथों में जाने का नतीजा है.

मीडिया की बहुत सी रिपोर्ट्स के अनुसार तकनीक की मदद से पोर्न स्टार के चेहरे से गल गैडट के चेहरे को रिप्लेस किया गया है. एक रिपोर्ट के अनुसार वीडियो को दीपफेक्स नाम के यूजर ने बनाया है.

दीपफेक्स ने ओपन सोर्स-मशीन जैसे कि टेंसरफ्लो के जरिए चेहरे को स्वैप (बदला) है. यह एप्लीकेशन गूगल रिसर्चर्स के लिए बिलकुल मुफ्त में उपलब्ध करवाता है. अगर आप इस वीडियो को ध्यान से देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि यह महिला गल नही बल्कि कोई और है.

हालांकि अगर कोई इसे ध्यान से देखता है, तो उसे आसानी से इसमें विकृतियां दिख जाएंगी. जब लड़की अपना सिर हिलाती है तो वहां पर पिक्सल फट जाते हैं.

@justiceleague is out next week 😱! #tbt

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तकनीक का गलत इस्तेमाल आजकल आम हो गया है जिसकी वजह से लोग किसी का भी फेक वीडियो या तस्वीर इंटरनेट पर पोस्ट कर देते हैं. तकनीक के इस्तेमाल से किसी का फेक पोर्न वीडियो बनाना काफी भयावह है.

इससे पता चलता है कि लोग सही दिशा में जाने की बजाए गलत दिशा की ओर बढ़ रहे हैं. जहां एक तरफ एक्ट्रेस के फैंस ने इस वीडियो के सामने आने के बाद अपनी मायूसी जाहिर की है. वहीं एक्ट्रेस ने खुद इसपर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है. यह देखना होगा कि एक्ट्रेस कैसे इसपर प्रतिक्रिया देती हैं.

मीना कुमारी की बायोपिक में नजर आ सकती हैं सनी

पिछले काफी समय से बौलीवुड के गलियारों में बीते जमाने की मशहूर एक्ट्रेस मीना कुमारी की बायोपिक बनाये जाने की चर्चा चल रही है और उनके किरदार के लिए एक्ट्रेस की तलाश जारी हो चुकी है. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक अजय देवगन के साथ दीवाने (2000) और दिलजले (1995) जैसी फिल्मों को डायरेक्ट कर चुके करन राजदान जब विद्या बालन के पास अपनी इस बायोपिक की स्क्रिप्ट को लेकर पहुंचे तो विद्या को स्क्रिप्ट समझ नहीं आई और उन्होंने इस फिल्म को करने से इनकार कर दिया.

विद्या बालन के अलावा करन ने बौलीवुड की टौप एक्ट्रेस रहीं धक धक गर्ल माधुरी दीक्षित को भी यह फिल्म औफर किया था, लेकिन उन्होंने भी यह औफर ठुकरा दिया तो करन इस बायोपिक को लेकर सनी लियोन के पास पहुंचे, जिन्हें यह स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई.

अपने एक इन्टरव्यू के दौरान निर्देशक करन राजदान ने बताया कि जहां एक तरफ इस किरदार के लिए सनी अप्रत्याशित विकल्प हैं वहीं दूसरी तरफ सनी ने इस प्रोजेक्ट के प्रति काफी उत्सुकता दिखाई है. सनी ने मुझसे कहा कि उन्होंने इस फिल्म के बारे में सुना है और वो चाहती हैं कि मैं उन्हें कहानी सुनाऊं. जिसके बाद मैं उनके घर पर उनसे मिला और काफी लंबी कहानी सुनाई.

निर्देशक ने आगे कहा कि मुझे नहीं पता कि सनी लियोन इसके लिए आदर्श विकल्प है या नहीं लेकिन वो इस रोल को करने के लिए बहुत ही ज्यादा उत्सुक हैं. मुझे लगता है कि वो अकेली साहसी एक्ट्रेस हैं जिन्होंने मुझसे कहा कि हम इस फिल्म को कब शुरू कर सकते हैं?

अब जबकि सनी लियोन इस फिल्म को लेकर इतनी उत्साहित हैं और करन राजदान ने भी उनको कहानी सुना दी है इतना ही नहीं अब वह सनी को लेकर मीडिया में काफी सकारात्मक बयान देते भी दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि मीना कुमारी की बायोपिक फिल्म में सनी लियोनी को काम करते हुए देखा जा सकता है.

पीएमएल-एन के लिए ये है नई चुनौती

नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग के पांच और नेताओं के इस्तीफे के बाद पार्टी में टूट की आशंकाएं फिर जन्म लेने लगी हैं. खास बात ये कि इस्तीफे उस अध्यात्मिक नेता को सौंपे गए हैं, एक अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ टिप्पणी करने वाले पंजाब के कानून मंत्री की बर्खास्तगी मांगने के अभियान में जिनकी खास भूमिका रही है. खास यह भी कि सारे इस्तीफे फैसलाबाद में आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान सौंपे गए जहां पीएमएल-एन सरकार के अस्तित्व के लिए बढ़ते खतरों की बढ़-चढ़कर बात की गई. इस बात पर भी जोर दिया गया कि अब किस तरह धार्मिक नेता ही इसे किसी नए अंजाम पर ले जा सकते हैं.

सरकार पर ताजा हमला उस तैयारी का हिस्सा ज्यादा लगता है, जब सरकार को इतना बदनाम कर दिया जाए कि बर्खास्तगी के अलावा कोई विकल्प न रहे. वैसे भी पीएमएल-एन का नवाज जैसे अपने नेता की बर्खास्तगी के बावजूद पार्टी के रूप में बचे रहना महत्वपूर्ण है, वरना अतीत में तो थोड़ी-थोड़ी दुश्वारियों में भी पार्टियों का टूटना या अंतर्कलह का शिकार हो जाना सामान्य बात रही है.

आश्चर्य नहीं कि तमाम दबावों के बावजूद पीएमएल-एन की इस मजबूती को देश के पुख्ता होते लोकतंत्र की निशानी माना जा रहा था. पार्टी नेतृत्व ने भी इसमें कोई कोताही नहीं बरती, लेकिन सारी मजबूती के बावजूद यह भी उतना ही सच है कि पार्टी अब भी तमाम चुनौतियों से जूझ रही है. इधर संयुक्त मोर्चा खड़ाकर इसे शिकस्त देने की कोशिशों में जबर्दस्त इजाफा आया है और अतीत में झांकें तो ऐसे हालात में समान हित के नाम पर नाराज और अलग-थलग पड़ चुके दलों और नेताओं के एक मंच पर आते देर भी नहीं लगती.

पीएमएल-एन इसे समझ रही है और हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है. उसके कुछ खास नेता विपक्षी एकता की संभावनाओं को ध्वस्त करने में लगे हुए हैं. पीएमएल-एन ने राजनीतिक विरोधियों पर इधर जैसी आक्रामकता दिखाई है, उसमें इसे सफलता मिल सकती है,पर बेहतर यही होगा कि पार्टी अपने खिलाफ एक नहीं, कई नए मोर्चे देखने के लिए खुद को तैयार कर ले. दीर्घकालिक राजनीतिक अस्तित्व के लिए यह तैयारी बहुत जरूरी है.

प्राइवेट स्कूलों की तानाशाही का परिणाम

गुरुग्राम, हरियाणा के रयान इंटरनैशनल स्कूल में 7 साल का छात्र प्रद्युम्न सुबह के 7 बज कर 50 मिनट पर स्कूल में दाखिल हुआ और सुबह के ही 8 बजे उस की मौत की खबर आई. मातापिता ने अपना पेट काट कर महंगे पब्लिक स्कूल में प्रद्युम्न को भरती कराया था, लेकिन स्कूल मैनेजमैंट की लापरवाही से उन का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया.

स्कूल मैनेजमैंट द्वारा बच्चे की मौत के लिए बस कंडक्टर को कुसूरवार बताया जाना न तो प्रद्युम्न के परिवार को स्वीकार है और न ही दूसरे बच्चों के मांबाप को. प्राइवेट स्कूलों में इस तरह की वारदातों और सरकार द्वारा कोई कार्यवाही न होने से मांबाप का इस स्कूल के प्रति मोह भंग होना लाजिमी है. दूसरी ओर मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले में कलक्टर द्वारा अपने बच्चे का सरकारी स्कूल में दाखिला कराना एक अनूठी पहल है. दूसरे सरकारी मुलाजिमों, अफसरों द्वारा भी अपने बच्चों का सरकारी स्कूल में दाखिला कराने का सुखद नतीजा है कि टीचर रोज स्कूल आते हैं, पढ़ाई के लैवल में सुधार हुआ है व साफसफाई पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है.

मध्य प्रदेश में शिवपुरी जिले की ‘शाला सिद्धि योजना’ में घोषित ‘चैंपियन स्कूल’ शासकीय प्राथमिक विद्यालय तानपुर में न केवल जिले के दूरदराज के गांवदेहात के बच्चे दाखिला ले रहे हैं बल्कि शिवपुरी शहर के प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे छात्र भी नाम कटवा कर इस स्कूल में आने के लिए कोशिश कर रहे हैं.

ऐसे बच्चों के मांबाप का कहना है कि प्राइवेट स्कूलों के बढ़ते खर्चों और उन के बच्चों के साथ टीचरों के गैरइनसानी बरताव से नाराज हो कर अपने भी बच्चों को वे इस स्कूल में भरती करा रहे हैं.

वे इस स्कूल की पढ़ाईलिखाई, साफसफाई, पीने का साफ पानी, मुफ्त स्कूली किताबें, स्कौलरशिप वगैरह से प्रभावित हो कर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों की तुलना में यहां ज्यादा महफूज महसूस करते हैं.

शिवपुरी शहर का ही एक प्राइवेट स्कूल, जो बच्चों को पढ़ाने के लिए स्टेटस सिंबल बन चुका है, के बड़े नाम और चमकदमक के पीछे की हकीकत यह है कि वहां की एक क्लास में

70 बच्चे पढ़ते हैं. पढ़ाने वाला एक टीचर होमवर्क व क्लासवर्क चैक करने के साथ बच्चों को इम्तिहान में ज्यादातर आने वाले सवाल रटवाने का काम करता है.

मांबाप भी इस बारे में अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन अपने बच्चे को ‘स्टैंडर्ड स्कूल’ में पढ़ाने का मोह उन्हें चुप रहने को मजबूर करता है. जो मांबाप शिकायत करने के लिए स्कूल मैनेजमैंट से नाराजगी जाहिर करते हैं, उन के बच्चों को दिमागी तौर पर कमजोर बताते हुए स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.

मांबाप को बुला कर होमवर्क न करा पाने के चलते बेइज्जत करना इस स्कूल का मानो रिवाज है. बच्चों की हालत न सुधरने पर ट्यूशन का दबाव बना कर मांबाप की जेब पर हमला होता है.

तेलंगाना के हैदराबाद में ड्रैस पहन कर न आने के जुर्म में एक छात्रा को राव हाईस्कूल के टीचरों द्वारा लड़कों के टौयलेट में 5 मिनट तक खड़ा रखा गया था. मांबाप ने स्कूल की डायरी में लिखा था कि ड्रैस धोने के बाद सूखी नहीं है.

डरीसहमी बच्ची ने जब यह बात मातापिता को बताई तो उन्होंने मीडिया के जरीए अपनी बच्ची को ऐसी सजा देने का मामला उठाया.

इरफान खान की फिल्म, ‘हिंदी मीडियम’ में उन प्राइवेट स्कूलों की पोल खोली गई है, जो डोनेशन के नाम पर अमीर तबके के बच्चों को दाखिला देने के लिए नियमों को ताक पर रख देते हैं. दूसरी ओर गरीब बच्चों का दाखिला रोकने के लिए नियम सख्त बना दिए जाते हैं. बच्चों के लिए अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा अधिनियम 2005 में गरीबी रेखा के नीचे के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी कोटा तय है, जिस में इन बच्चों को मुफ्त पढ़ाईलिखाई कराने का कानून है.

इस कानून के तहत अमीर तबके के लोग जुगाड़ व पहुंच से अपने बच्चों को गरीबी रेखा में दिखा कर दाखिला करा लेते हैं.

फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ में दिखाया गया है कि मांबाप, स्कूल मैनेजमैंट व प्रशासनिक अफसरों का गठजोड़ इस काम में बेशर्मी से शामिल होता है.

इस फिल्म में सरकारी स्कूलों की बदहाली को सुधारने की कामयाब कोशिशों को भी दिखाया गया है.  साथ ही यह संदेश भी है कि समाज के सभी तबके के मांबाप अपने बच्चों का विकास दोस्ताना माहौल में करना चाहते हैं, तो वे सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराएं.

लोग प्राइवेट स्कूलों की फीस, डै्रस, बस का किराया, प्रोजैक्ट वर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रम वगैरह पर जो पैसा खर्च करते हैं, अगर यह रकम स्कूल मैनेजमैंट कमेटी के जरीए स्कूलों के बदलाव के लिए दान में दी जाए तो सरकारी स्कूलों के टीचर प्राइवेट स्कूलों के टीचरों की तुलना में अच्छे नतीजे दे सकते हैं.

शिवपुरी जिले के समाजसेवी और पढ़ाई में होशियार गरीब बच्चों को हायर सैकैंडरी व प्रतियोगी इम्तिहानों की मुफ्त शिक्षा दिलाने का इंतजाम करने वाले मधुसूदन चौबे का कहना है, ‘‘प्राइवेट स्कूलों की तानाशाही से तंग मांबाप अब समझ चुके हैं कि ये स्कूल बाजार व्यवस्था को अपना कर फलफूल रहे हैं. बड़ेबड़े बैनरों, अखबारों व टैलीविजन चैनलों पर मौडर्न स्कूलों के मालिक मांबाप को अपने मोहजाल में फांस लेते हैं. धीरेधीरे महंगी स्कूली किताबों, स्कूल ड्रैस, प्रोजैक्ट वर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रम वगैरह के नाम पर बिना जांच किए अनट्रेंड टीचरों की भरती की जाती है, जो अपने मालिकों की इच्छा को पूरा करने के लिए बच्चों को रट्टू तोता बना देते हैं.’’

समाजसेवी सुधीर कुमार शर्मा का मानना है, ‘‘महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का पतन हो रहा है. अपने स्कूल मालिकों की कमाई बढ़ाने के मकसद के लिए कम तनख्वाह पर भरती किए गए टीचर भी अपना मूल काम पढ़ाना छोड़ कर दूसरी नैतिक व अनैतिक बातों से जुड़े पाए जाते हैं. दूसरी ओर सरकारी स्कूल के टीचर ट्रेंड हैं और वे पढ़ाई कराने पर ज्यादा ध्यान देते हैं.’’

शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, तानपुर के प्रिंसिपल सुनील श्रीवास्तव का कहना है, ‘‘मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा केंद्र व स्कूल शिक्षा विभाग सरकारी स्कूलों में अच्छे भवन, ट्रेंड टीचर व टीचिंग इंटरनैशनल के तरीकों जैसी सुविधाओं से बच्चों के ज्यादा दाखिले व इम्तिहान के नतीजों में सुधार करने में कामयाब हुए हैं. यही वजह है कि प्राइवेट स्कूलों की तानाशाही से परेशान बच्चों के मांबाप को सरकारी स्कूलों में उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है.’’

कहां गया नजीब : बेटे की तलाश में भटक रही मां

15 अक्तूबर, 2016 की रात दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से गायब हुए छात्र नजीब अहमद का आज तक कोई अतापता नहीं लग सका है. बेबस मां फातिमा नफीस पिछले कई महीनों से नजीब के साथी छात्रों के सहारे दिल्ली में दरदर की खाक छान रही हैं.

फातिमा नफीस देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से भी गुहार लगा चुकी हैं, लेकिन नतीजा अभी तक ढाक के तीन पात है. राष्ट्रपति को दी गई अपनी अर्जी में फातिमा नफीस ने मामले की जांच सरकारी और राजनीतिक दखल से परे रख कर कराने की मांग की है. उन्होंने जेएनयू प्रशासन, दिल्ली पुलिस और सीबीआई के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं.

फातिमा नफीस का आरोप है कि जब वे मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने संबंधित थाने में गईं, तो पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखने से आनाकानी की. बाद में जब जेएनयू छात्रसंघ और गवाहों ने अपने बयान समेत लिखित शिकायत की, तब जा कर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.

मामले की जांच कर रही सीबीआई ने 14 नवंबर, 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट को सौंपी गई अपनी स्टेटस रिपोर्ट में पुलिसिया जांच पर कई सवाल खड़े किए हैं. सीबीआई ने पुलिस द्वारा 16 नवंबर, 2016 को हिरासत में लिए गए उस आटोरिकशा चालक से भी गहन पूछताछ की, जो कथित रूप से नजीब को जेएनयू से जामिया मिल्लिया इसलामिया ले गया था. आटोरिकशा चालक पुलिस को दिए गए अपने बयान से साफ मुकर गया. उस का कहना था कि उस ने ऐसा पुलिस के दबाव में आ कर बोला था.

गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने इसी साल 16 मई को नजीब अहमद के मामले की जांच अपने हाथ में ली थी. इस से पहले जांच दिल्ली पुलिस के जिम्मे थी, जो कदम दर कदम नाकाम रही.

सीबीआई ने अदालत को बताया कि मामले से जुड़े 9 संदिग्ध छात्रों के मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं, जिन की फौरैंसिक जांच रिपोर्ट आना बाकी है.

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर व जस्टिस आईएस मेहता की 2 सदस्यीय खंडपीठ का मानना था कि जांच के दौरान सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट को ओपन कोर्ट करने की जरूरत महसूस नहीं होती. सीबीआई ने भी नजीब की मां के वकील को स्टेटस रिपोर्ट की कौपी देने से इनकार कर दिया है.

अदालत में सुनवाई के दौरान सीबीआई काउंसिल निखिल गोयल ने बताया कि सभी 9 संदिग्ध छात्रों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स की जांच हो चुकी है,

सिर्फ रिपोर्ट आना बाकी है. इस के बाद सीबीआई ने मांग की है कि मामले की इनचैंबर प्रोसीडिंग की जाए, जिस पर अदालत ने 21 दिसंबर, 2017 की सुनवाई के दौरान विचार करने का अश्वासन दिया है.

वहीं दूसरी तरफ अतिरिक्त मुख्य मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट समर विशाल की अदालत ने सीबीआई की उस अर्जी को विचार के लिए स्वीकार कर लिया है, जिस में आरोपी छात्रों का लाई डिटैक्शन टैस्ट कराने की मांग की गई है.

गौरतलब है कि जेएनयू के माहीमांडवी होस्टल के कमरा नंबर 106 में रहने वाला नजीब अहमद स्कूल औफ बायोटैक्नोलौजी का छात्र था. बताते हैं कि 15 अक्तूबर, 2016 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ समर्थक छात्रों के साथ नजीब का झगड़ा हुआ था और उसी रात वह लाता हो गया.

सूचना पा कर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से आईं मां फातिमा ने इस बात की एफआईआर दिल्ली के वसंतकुंज नौर्थ थाने में दर्ज कराई. 6 नवंबर, 2016 को नजीब की गुमशुदगी को ले कर छात्रों ने उस की मां फातिमा और दूसरे परिवार वालों के साथ विरोधप्रदर्शन किया, तो पुलिस ने फातिमा समेत बड़ी तादाद में छात्रों को हिरासत में ले लिया, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया. साथ ही, ऐलान हुआ कि जो भी शख्स नजीब के मामले में कोई कारगर सुराग देगा, उसे 5 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा.

इसी बीच यूनिवर्सिटी द्वारा बिठाई की गई जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की कि नजीब से हुए झगड़े के लिए अखिल भारतीय विधार्थी परिषद के समर्थक छात्र जिम्मेदार हैं. जेएनयू की सिक्योरिटी और वार्डन ने अपनी लिखित टिप्पणी में कहा कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के समर्थकों ने नजीब को पीटा था. लेकिन आरोप यह है कि यूनिवर्सिटी की जांच समिति की रिपोर्ट साजिशन बदल दी गई.

खुद के हाईटैक होने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस जांच के नाम पर महज खानापूरी करती रही. कभी वह यूनिवर्सिटी की तलाशी लेती तो कभी माहीमांडवी होस्टल की. साथ ही, उस ने यह भी शिगूफा छोड़ा कि नजीब आईएसआईएस में शामिल हो गया है.

जब दबाव बढ़ा, तो नजीब को खोजने के लिए घोषित इनामी रकम 10 लाख रुपए कर दी गई. साल 2017 की शुरुआत में यानी 22 जनवरी, 2017 को पुलिस ने एक नौजवान को नजीब के परिवार से फिरौती मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया. हालांकि कोई सुबूत न होने के चलते उसे बाद में छोड़ दिया गया.

अफसोस की बात यह है कि देश की भरोसेमंद संस्था सीबीआई की जांच प्रक्रिया भी ढीली रही है. 6 महीने से ज्यादा गुजर चुके हैं, लेकिन अभी तक सिर्फ उस की स्टेटस रिपोर्ट ही अदालत के सामने आई है. 7 महीने का समय दिल्ली पुलिस पहले ही बरबाद कर चुकी है.

दरअसल, नजीब की गुमशुदगी सिर्फ सीबीआई और दिल्ली पुलिस प्रशासन की नाक का सवाल नहीं है, बल्कि यह देश की राजधानी से जुड़ा वह मामला है, जिस के चलते केंद्र सरकार की इज्जत भी दांव पर है.

सवाल यह है कि नजीब कहां है, किस हाल में है, किस के कब्जे में है, किस के दबाव में है, जो वह सामने नहीं आ रहा है नेताओं ने भी नजीब मामले में चुप्पी साध रखी है. सिर्फ राज्यसभा सदस्य शरद यादव ने ही सीबीआई दफ्तर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान फातिमा नफीस के आंसू पोंछे, बाकी को सांप सूंघ गया.

हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाइए कि एक मां पिछले कई महीनों से अपने लापता लाड़ले की बाट जोह रही है, जिसे उस ने न जाने कितनी मुसीबतें सह कर पालापोसा, भविष्य बनाने की गरज से अपनी नजरों से दूर कर दिल्ली पढ़ने के लिए भेजा और आज उसी जिगर के टुकड़े को तलाशतेतलाशते उस की आंखें पथराने को हैं. यह तो भला हो नजीब के उन साथी छात्रों का, जिन्होंने फातिमा का हाथ थाम रखा है, वरना हमारी व्यवस्था ने नकारेपन की सारे हदें लांघ रखी हैं.

किसी ने कभी सोचा कि दिल्ली में एक आदमी के रहनेखाने और इधरउधर पैरवी करने में हर महीने कितनी रकम खर्च होती है? एक गरीब परिवार के लिए यह हालत कितनी दुखदायी होती?है, समझना आसान है. लेकिन हमारी व्यवस्था की बागडोर संभालने वाले इस से अनजान बने हुए हैं.

हमारे नेता भले ही हालात की नजाकत को समझें, लेकिन सच यही?है कि नजीब मामले पर देशभर के लोगों की नजर हैं. यही नहीं, उन की आंखों में कई सवाल भी हैं, जिन्हें समझना कोई मुश्किल काम नहीं?है. नजीब की किसी भी हाल में बरामदगी ही इन तमाम सवालों का जवाब है.

सीबीआई को चाहिए कि वह जल्द से जल्द मामले का परदाफाश करे, कुसूरवारों को सजा मिले, जिस से फातिमा नफीस और उन के बेटे के साथ इंसाफ हो सके.

बोल्डनेस का तड़का लगाती दिखी बंदगी कालरा

बिग बौस 11 की इस साल की सबसे कौंट्रोवर्शियल कंटेस्टेंट के तौर पर बंदगी कालरा का नाम सबसे पहले आता है. बंदगी कालरा घर के अंदर कई बार पुनीश के साथ रोमांस करती दिखीं और अपने लवमेंकिग सीन को लेकर काफी चर्चा में रही हैं. दोनों ने बिग बौस के घर में काफी हदें पार की थीं. बंदगी गेम खेलने की जगह केवल लव मेकिंग सीन से ही गेम में बने रहने की कोशिश कर रही थीं. लेकिन ऐसा ज्यादा लम्बे समय तक नहीं चल सका और बंदगी पुनीश से पहले ही घर से बाहर हो गई थीं.

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बंदगी तो घर से बाहर हो गईं लेकिन उनके बाहर होने की वजह से पुनीश बुरी तरह से टूट गए थे. हालांकि अभी उन्हें शिल्पा शिंदे और विकास गुप्ता का साथ मिल गया है और वह उनके सहारे ही अपने आपको बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं. लेकिन बिग बौस-11 में लव बर्ड के तौर पर नजर आई बंदगी कालरा ने शो से बाहर निकलने के बाद से ही अपनी लोकप्रियता का आनंद उठाते हुए ग्लैमर का तड़का लगाना शुरू कर दिया है.

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वैसे बंदगी का अपने ग्लैमरस अंदाज से थोड़ी तो सुर्खियां बटोरना बनता ही है, क्योंकि बिग बौस-11 में आने के बाद से बंदगी आम से खास बन चुकी हैं. यानी कि अब वह भी सेलेब्रिटी बन चुकी हैं और अब ऐसे में ग्लैमर लाइफ तो बनती ही है.

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तो बस ग्लैमरस का छौंक लगाने के लिए उन्होंने हाल ही में अपने सोशल मीडिया पर कई बोल्ड तस्वीरें साझा की हैं. उन्होंने सेलिब्रिटी फोटोग्राफर डब्बू रतनानी के स्टूडियो में अपना यह हौट फोटोशूट करवाया है. इन तस्वीरों में वह बेहद बोल्ड दिखाई दे रही हैं. हौटनेस और ग्लैमर का जलवा बिखेरती उनकी यह तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल भी हो रही हैं.

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इन तस्वीरों में वे बहुत ही खूबसूरत और बोल्ड नजर आ रही हैं. एक तस्वीर में वे बैकलेस हैं, तो एक में काफी हौट लग रही हैं. इसके अलावा, भी उन्होंने अपनी कई तस्वीरें शेयर की हैं.

मैंने अपने जीजा की बहन से कई बार सेक्स किया है, पर अब वह जीजा के डर से मुझ से नफरत करने लगी है. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 23 साल का हूं और जीजा की बहन से प्यार करता हूं. हम दोनों ने कई बार सेक्स भी किया है, पर अब वह जीजा के डर से मुझ से नफरत करने लगी है. घर वाले हमारे प्यार के बारे में जान कर मेरी शादी कहीं और करने पर जोर दे रहे हैं. मैं उस के बगैर नहीं रह सकता. मैं क्या करूं?

जवाब
किसी भी वजह से सही, पर वह लड़की आप से नफरत करने लगी है. लिहाजा, आप को उस का पीछा छोड़ देना चाहिए. जीजा की रजामंदी से बात बन सकती थी, पर जब घर वाले ही साथ नहीं दे रहे, तो कहीं और शादी कर लेने में ही भलाई है.

सरकार, न्यायाधीश, अदालतें

इंदिरा गांधी के युग में कई वर्षों तक उच्च व सर्वोच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्तियां कानून मंत्री ही करते थे और स्वाभाविक है कि इन पर इंदिरा गांधी की मुहर होती थी. धीरेधीरे सुप्रीम कोर्ट ने यह अधिकार अपने हाथों में ले लिया, क्योंकि इन नियुक्तियों में सरकारी पक्ष का समर्थन करने वाले ही ज्यादा जज होते थे. यह बात दूसरी कि पहले के समर्थक नियुक्ति के बाद आमतौर पर स्वतंत्र हो जाते और सरकार के विरुद्ध फैसले लेने से हिचकते नहीं थे.

अब सुप्रीम कोर्ट की खुद की नियुक्तियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी सरकार के इस अधिकार को वापस लेने की चेष्टा पर पानी फेर दिया है. सरकार के समर्थक सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों में कोलेजियम द्वारा की गई नियुक्तियों में दोष निकालने में लग गए हैं. कर्नाटक के एक जज न्यायाधीश जयंत पटेल का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में कर देने के सवाल पर विवाद को ले कर इस सर्कल में खासा हल्ला मच रहा है.

आज जनता को इस विवाद से लंबाचौड़ा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यह खेल दरबारियों की अपनी राजनीति का है और छनछना कर जब फैसलों का असर आम नागरिक तक पहुंचता है तो उसे लगता है कि फैसला तो कहीं के सरकारी अधिकारी का है. वह दोष नेता या अधिकारी को देता है, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट को नहीं.

पर देश की राजनीति को दिशा देने में यह उठापटक बहुत गंभीर है. सर्वोच्च न्यायालय ने जब से नियुक्तियां अपने हाथों में ली हैं, सुप्रीम कोर्ट में सरकार समर्थक जजों की कमी हो गई है और नतीजा है कि प्राइवेसी यानी कि निजता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक स्वतंत्रताओं की एक नई व्याख्या कर डाली है जो कट्टरपंथी सरकार के गले की हड्डी बन गई है.

सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों में अगर नियुक्तियों में जजों के रिश्तेदार, मित्र, पूर्व सहयोगी हों तो भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जजों का काम अरबोंखरबों के टैंडर पास करना नहीं होता. वह अधिकार तो सरकार के पास होता है. जज कितने ही बेईमान हों, उन के पास बहुत सीमित अधिकार होते हैं, वे विवाद में एक का पक्ष ले सकते हैं पर उन्हें बहुत से तर्क देने पड़ते हैं. उच्च न्यायालय तक तो हर जज को डर रहता है कि कहीं ऊपरी अदालत उन की गलत मंशा को भांप न जाए.

सरकार द्वारा जजों की नियुक्तियां किया जाना देश के लिए घातक होगा क्योंकि फिर जज और अदालतें सजावटी बन कर रह जाएंगी, देश में नागरिक स्वतंत्रताएं समाप्त हो जाएंगी. वर्तमान विवाद सरकार बनाम अदालतें हैं जिस में जनता को पर्याप्त जानकारी व रुचि लेनी होगी वरना उस का बहुत नुकसान होगा.

चांद की चाहत में थानेदार

जकिया चौहान 13 जून, 2017 को अपने घर पर ही थी. उस का घर जोधपुर शहर में चौपासनी हाउसिंग बोर्ड सोसाइटी में था. यह सोसाइटी पुलिस थाने से करीब सौ मीटर की दूरी पर है. जकिया जिस मकान में रहती थी, उस के भूतल पर उस का ब्लैक मैजिक कैफे चलता था और पहली मंजिल पर वह रहती थी.

उस दिन शाम के समय उस के पास थानाप्रभारी कमलदान चारण का फोन आया. कमलदान चारण जोधपुर शहर के राजीव गांधी नगर के थानाप्रभारी थे. उन्होंने जकिया से कहा, ‘‘मैं आज शाम को आऊंगा, घर पर ही रहना, एंजौय करेंगे.’’

‘‘साहबजी, यह भी तो बता दो कि कितने बजे आओगे?’’ जकिया ने पूछा.

‘‘यही कोई 8-साढ़े 8 बजे तक आ जाऊंगा.’’ उन्होंने कहा.

‘‘ठीक है साहब, मैं इंतजार करूंगी.’’ कहते हुए जकिया के चेहरे पर कुटिल मुसकान उभर आई. थानाप्रभारी से बात खत्म होने के बाद जकिया ने तुरंत अपने मोबाइल से एक नंबर डायल किया. दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो उस ने कहा, ‘‘सरजी, मैं जकिया बोल रही हूं. उस थानाप्रभारी ने आज रात 8-साढ़े 8 बजे घर आने को कहा है. मुझे बड़ा डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है. तुम बस इतना ध्यान रखना कि वह तुम से किसी बात पर नाराज न होने पाए.’’ दूसरी तरफ से कहा गया.

‘‘ठीक है सरजी.’’ कह कर जकिया ने फोन काट दिया.

इस के बाद जकिया सोच में डूब गई. उस ने गणपत को फोन किया. गणपत उस के ब्लैक मैजिक कैफे में काम करता था. उस समय वह कैफे में ही था, इसलिए 2 मिनट में ही पहली मंजिल पर पहुंच गया.

गणपत के आते ही जकिया ने कहा, ‘‘आज वह आशिक थानेदार आ रहा है. तुम सब चीजों का ध्यान रखना. किसी तरह की कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए.’’

जकिया कमलदान चारण को थानेदार कहती थी. गणपत ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘मैडम, आप पूरी तरह बेफिक्र रहें. कोई गड़बड़ नहीं होगी. सारा काम ठीक तरीके से हो जाएगा.’’

अपनी बात कह कर गणपत कैफे में चला गया. जकिया अपने बैड पर लेट गई. लेटेलेटे वह थानेदार कमलदान चारण से करीब 10 दिनों से चल रही मुलाकातों और बातों के बारे में सोचती रही. फिर उस ने थानेदार द्वारा भेजे गए वाट्सऐप मैसेज को पढ़ा. मैसेज पढ़ कर उस की आंखों में गुस्सा तैर आया. लेकिन उस ने खुद को किसी तरह संयमित किया और उठ कर घर के छोटेमोटे काम निपटाने लगी.

रात करीब पौने 8 बजे गणपत जकिया के कमरे में आया. उस ने उसे सारी बातें समझा कर उसे पहली मंजिल पर ही अन्य कमरे में छिपा दिया. इस के बाद उस ने बैड पर फैला छोटामोटा सामान हटा कर ढंग से रख दिया. बैड की चादर करीने से बिछाई और कुरसी पर बैठ कर आशिक थानाप्रभारी का इंतजार करने लगी.

रात करीब साढ़े 8 बजे थानाप्रभारी कमलदान चारण का फोन आया, ‘‘जकिया डार्लिंग, मैं आ गया हूं.’’

‘‘ठीक है, सीढ़ी वाला गेट खुला हुआ है. आप सीधे पहली मंजिल पर आ जाइए.’’ जकिया ने कहा.

लगभग एक मिनट बाद थानाप्रभारी जकिया के कमरे में दाखिल हुए. आते ही उन्होंने दरवाजे की सिटकनी लगा दी. वह एकदम फ्री मूड में नजर आ रहे थे. उन्होंने टीशर्ट और जींस पहन रखी थी. उन्हें कमरे में रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए जकिया ने कहा,‘‘आइए जनाब, हम आप का ही इंतजार कर रहे थे.’’

‘‘जानम, इंतजार तो हम आप का कर रहे थे.’’ थानेदार ने जकिया की हथेली अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘लेकिन कोई बात नहीं, इंतजार का भी अपना अलग ही मजा है. आखिर आज वह इंतजार खत्म हो जाएगा.’’

चारण ने जकिया का हाथ छोड़ कर कुरसी के बजाय बैड पर बैठते हुए कमरे में चारों ओर पुलिसिया नजरें दौड़ाईं. उस के बाद हंसते हुए कहा, ‘‘भई, इस कमरे में कोई कैमरा वगैरह तो नहीं लगा रखा?’’

‘‘थानेदार साहब, आप भी कैसी बातें करते हैं?’’ जकिया ने अपने चेहरे पर मधुर मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘मैं क्या आप को कोई चालबाज हसीना नजर आती हूं? इस कमरे में न तो कोई कैमरा लगा है और न ही कोई दूसरा आदमी है. यहां केवल आप हैं और मैं हूं.’’

‘‘ये हुई न बात,’’ चारण ने जकिया को अपने पास आने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘जकिया, तुम सचमुच बड़ी समझदार हो.’’

‘‘साहबजी, मुझे इस जमाने ने समझदार बना दिया है, वरना मैं तो कहां दुनियादारी जानती थी.’’ जकिया ने कमलदान चारण को अपनी बातों में उलझाते हुए कहा, ‘‘इसी दुनियादारी के कारण मैं ने अपने पति को छुड़वाने के लिए आप को एक लाख रुपए नकद और एक लाख रुपए का चैक दे दिया था. अरे हां, आज आप मेरा वह एक लाख रुपए का चैक वापस करने वाले थे, उस का क्या हुआ?’’

कमलदान चारण ने जेब से चैक निकाल कर जकिया को दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो, चैक तो मैं ले आया हूं. लेकिन यह चैक दूंगा तभी, जब तुम मुझे खुश कर दोगी.’’

जकिया ने खुद को उस की गिरफ्त से छुड़ाते हुए कहा, ‘‘साहब, ऐसी भी क्या जल्दी है. इतनी गरमी में आए हो, पहले कुछ ठंडा या गरम पी लो. बताओ, क्या लोगे, कोल्ड कौफी या हौट कौफी?’’

‘‘हौट तो तुम हो ही,’’ थानेदार ने जकिया की कमसिन देह को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘तुम कह रही हो तो कोल्ड कौफी पी लेंगे. और हां, तुम्हारे कैफे में तो हुक्का बार भी चलता है. आज किसी अच्छे से फ्लेवर का हुक्का पिला दो तो तुम्हारे साथ का मजा दोगुना हो जाएगा.’’

‘‘साहबजी, हुक्का आप को फिर कभी पिलवा दूंगी.’’ जकिया ने कहा, ‘‘आज तो आप कोल्ड कौफी से ही काम चला लीजिए.’’

कह कर जकिया ने अपने मोबाइल फोन से एक नंबर डायल किया. दूसरी तरफ से फोन रिसीव किया गया तो जकिया ने कहा, ‘‘2 कोल्ड कौफी भेज दो.’’

कमलदान चारण जकिया को अपनी बांहों में लेने को बेचैन था. जकिया उस की बेचैनी को समझ रही थी. उस ने जकिया का हाथ थामा तो उस ने कहा, ‘‘थोड़ा सब्र कीजिए साहब, वेटर कौफी ले कर आता होगा, पहले कौफी तो पी लें.’’

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया तो जकिया ने कहा, ‘‘शायद कौफी ले कर आ गया.’’

जकिया दरवाजा खोलने के लिए उठी. उस ने जैसे ही दरवाजा खोला, 4-5 हट्टेकट्टे आदमी सीधे कमरे में घुस आए. उन में से एक अधेड़ उम्र के आदमी ने बैड पर बैठे थानाप्रभारी कमलदान चारण से कहा, ‘‘हम भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) से हैं.’’

एसीबी की टीम को देख कर कमलदान चारण के मन में छाई सारी उमंगें और रंगीनियां पलभर में गायब हो गईं. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह समझ नहीं पाया कि अचानक यह सब कैसे हो गया?

जकिया ने कहा, ‘‘यही है वह थानेदार, जो मेरी अस्मत लूटने मेरे घर पर आया है.’’

एसीबी की टीम अपने काम में जुट गई. थानाप्रभारी कमलदान चारण की तलाशी में टीम को एक लाख रुपए का वह चैक मिल गया, जो जकिया ने दिया था. टीम ने कमलदान चारण को गिरफ्तार कर लिया. देर रात तक एसीबी की टीम जकिया के घर फर्द बनाने और जब्ती वगैरह की काररवाई में लगी रही.

थानाप्रभारी कमलदान चारण से की गई पूछताछ और एसीबी की जांचपड़ताल में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी.

इसी साल 3 जून को थाना राजीव गांधी नगर के थानाप्रभारी कमलदान चारण ने मुखबिर की सूचना पर पंकज वैष्णव और गणपत बिश्नोई को एक किलोग्राम अफीम ले जाते हुए गिरफ्तार किया था. पंकज वैष्णव जकिया का पति था. वह अफीम ये लोग होंडा सीआरवी कार में रख कर ले जा रहे थे.

थाने ले जा कर दोनों से पूछताछ की गई तो गणपत ने खुद को इंजीनियरिंग का छात्र बताया और छोड़ देने की गुहार लगाई. थानाप्रभारी ने गणपत के घर वालों को थाने बुला लिया. बाद में सौदेबाजी कर के उस ने गणपत को छोड़ दिया.

पंकज वैष्णव ने बताया कि होंडा सीआरवी कार उस की पत्नी जकिया चौहान की है. इस के बाद थानाप्रभारी ने जकिया को थाने बुला लिया. जकिया कमलदान चारण से अपने पति पंकज को छोड़ देने की सिफारिश करने लगी.

कमलदान चारण ने कहा कि उस के पास से एक किलोग्राम अफीम मिली है, इसलिए इसे जेल जाना ही पड़ेगा, साथ ही केस चलने तक कार भी नहीं छोड़ी जाएगी.

जकिया ने पुलिस के एक दलाल से बात की तो उस के कहने पर थानाप्रभारी इस बात पर सहमत हो गए कि कार को मुकदमे में नहीं दिखाएंगे, लेकिन इस के लिए 2 लाख रुपए खर्च करने होंगे. जकिया ने कहा कि उस के पास इतनी रकम नहीं है तो बिचौलिए ने कहा कि थानाप्रभारी इस से कम में नहीं मानेगा. परेशान हो कर जकिया ने किसी तरह एक लाख रुपए का इंतजाम किया. 1 लाख रुपए नकद और एक लाख रुपए का चैक जकिया ने बिचौलिए के जरिए थानाप्रभारी कमलदान चारण को दे दिए.

थानेदार ने वह चैक इस शर्त पर लिया था कि एक लाख रुपए नकद देने के बाद वह उसे वह चैक लौटा देगा. थानाप्रभारी ने पंकज कुमार वैष्णव और गणपत बिश्नोई को कार में एक किलोग्राम अफीम के साथ पकड़ा था. पर रिश्वत में मोटी रकम मिलने के बाद उस ने गणपत और होंडा सीआरवी कार को रिपोर्ट में शामिल नहीं किया था. उस ने 3 जून, 2017 को केवल पंकज कुमार वैष्णव के खिलाफ ही राजीवगांधी नगर थाने में मुकदमा दर्ज कराया.

आमतौर पर एनडीपीएस एक्ट के मामले की जांच एसीपी द्वारा दूसरे थाने के समकक्ष अधिकारी को दी जाती है. लेकिन कमलदान चारण ने एसीपी (प्रतापनगर) स्वाति शर्मा को ऐसी पट्टी पढ़ाई कि उन्होंने इस मामले की जांच राजीव गांधी नगर थाने के ही एसआई को सौंप दी. इस की वजह यह थी कि पहली ही मुलाकात में कमलदान जकिया चौहान की खूबसूरती पर मर मिटा था.

इस के लिए उस ने जकिया से वादा भी किया था कि वह इस मामले में उस के पति को छुड़वाने की हरसंभव कोशिश करेगा. जकिया से बातें करने के लिए उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया था.

कार भले ही छूट गई थी, लेकिन जकिया का पति पंकज जेल में बंद था. जकिया उसे जल्द से जल्द छुड़ाना चाहती थी. परेशानी यह थी कि एनडीपीएस एक्ट के मामले में जल्दी से जमानत नहीं होती. फिर पंकज के पास पुलिस ने एक किलोग्राम अफीम दिखाई थी.

कानून के जानकारों का कहना था कि 250 ग्राम तक अफीम बरामद होने पर सजा का प्रावधान कम है, लेकिन कौमर्शियल क्वालिटी की ज्यादा मात्रा में बरामद अफीम के मामले में 10 से 20 साल तक की सजा का प्रावधान है. इसी कारण जकिया चिंतित थी. वह पंकज की जल्द से जल्द जमानत कराने की कोशिश में जुटी थी. इस के लिए वह कभी कमलदान चारण को फोन करती तो कभी थाने जा कर उस से जमानत में मदद करने की गुहार लगाती.

कमलदान चारण जकिया की इस मजबूरी का फायदा उठाना चाहता था. वह जकिया को हासिल करने की कोशिश करने लगा. उस ने जकिया से यह भी कह दिया कि वह पंकज से बरामद अफीम की मात्रा 200 ग्राम दिखा देगा, जिस से उस की जमानत जल्द हो जाएगी.

पंकज को जेल भेजने के एकदो दिन बाद ही कमलदान चारण जकिया से प्यारमोहब्बत की बातें करने लगा. वह उसे वाट्सऐप पर ‘आई लव यू’ के अलावा तरहतरह के मैसेज भेजने लगा. वह जकिया की खूबसूरती की तारीफें करता और कहता कि पति को छुड़वाने के लिए उसे कुछ तो कंप्रोमाइज करना ही पड़ेगा.

उस की इस तरह की बातों से जकिया समझ गई कि उस की नीयत ठीक नहीं है. उस की बातों से वह डर गई. उस का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ गई. उस का मन तो कर रहा था कि वह उस के सामने जा कर सीधे उस के गाल पर चांटा जड़ दे. पर वह ऐसा नहीं कर सकती थी.

वह कमलदान चारण को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगी. एक तरफ पति की चिंता थी और दूसरी तरफ अस्मत बचाने का संघर्ष. वह चाहती थी कि चारण को ऐसा सबक मिले कि वह जिंदगी भर याद रखे. इस के लिए उस ने अपने कैफे में काम करने वाले सब से विश्वासपात्र गणपत बिश्नोई को कमलदान की गलत नीयत की बात बताई.

गणपत को पता था कि थानाप्रभारी ने उसे अफीम के मामले में छोड़ने के लिए घर वालों से मोटी रकम ली थी. इसलिए वह भी उसे सबक सिखाना चाहता था. उस ने अपने परिचित एसीबी के एक अधिकारी से बात की. उस की सलाह पर जकिया ने 9 जून, 2017 को एसीबी में थानाप्रभारी कमलदान चारण के खिलाफ रिश्वत और अस्मत मांगने की शिकायत कर दी.

एसीबी ने उसी दिन शिकायत का सत्यापन कराया. इस सत्यापन में जकिया और थानाप्रभारी कमलदान चारण की कार में बैठ कर की गई सौदेबाजी की सारी बातें रिकौर्ड की गईं. कमलदान जकिया से कह रहा था, ‘मुझे तुम से दोस्ती और प्यार हो गया है. इसलिए तुम ने जो एक लाख रुपए का चैक दिया है, उसे मैं वापस कर दूंगा.’ जकिया ने ये सारी बातें रिकौर्ड कर ली थीं. इस बातचीत में चारण ने यह भी कहा था कि वह 10 से 12 जून तक गांव जाने की वजह से छुट्टी पर रहेगा. गांव से लौटने पर वह उस के पास एंजौय करने आएगा.

गांव जाने के बाद भी कमलदान चारण जकिया से मोबाइल पर संपर्क में रहा. इस बीच वह वाट्सऐप पर मैसेज भी भेजता रहा. वह 12 जून, 2017 की शाम को जोधपुर लौट आया. जोधपुर लौटने पर उस ने 12 जून की शाम को जकिया को फोन कर के नई सड़क स्थित एक होटल में बुलाया. जकिया ने मां की बीमारी का बहाना बना कर उस दिन उसे टाल दिया.

अगले दिन यानी 13 जून को कमलदान चारण ने जकिया को फोन कर के शाम को उस के घर आने की बात कही तो जकिया ने एसीबी को सूचित कर दिया. एसीबी अधिकारियों ने शाम होते ही जकिया के घर के आसपास डेरा डाल दिया. एसीबी के डीएसपी जगदीश सोनी ने जकिया को पहले ही समझा दिया था कि थानाप्रभारी कमरे में आ कर गलत हरकत करने की कोशिश करने लगे तो वह कोल्ड कौफी मंगाने के बहाने फोन कर देगी. जकिया ने ऐसा ही किया, जिस के बाद एसीबी द्वारा वह गिरफ्तार कर लिया गया.

थानाप्रभारी की गिरफ्तारी से जोधपुर पुलिस की बड़ी बदनामी हुई. जोधपुर पुलिस कमिश्नर अशोक राठौड़ ने इस पूरे मामले की जांच बोरानाड़ा के एसीपी सिमरथाराम को सौंप दी. वहीं पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर डीसीपी (पश्चिम) समीर कुमार सिंह ने थानाप्रभारी कमलदान चारण को 14 जून को निलंबित कर दिया. एसीबी ने उसी दिन शाम को कमलदान चारण को मजिस्ट्रैट के घर पर पेश किया. न्यायाधीश ने चारण को 2 दिनों के रिमांड पर एसीबी को सौंप दिया.

रिमांड के दौरान एसीबी ने एक लाख रुपए के चैक के बारे में पूछताछ की तो कमलदान चारण ने कहा कि उस के पास कोई चैक नहीं था. एक लाख रुपए नकद लेने की बात से भी उस ने इनकार कर दिया. प्यार और दोस्ती के सवाल पर उन्होंने कहा कि वह उस महिला से प्रेम नहीं करता, बल्कि वही उसे फंसा रही थी.

एसीबी ने जब उसे रिकौर्डिंग सुनाई तो उस ने कहा कि यह आवाज उस की नहीं है. कमलदान चारण ने एसीबी को बताया कि जब उन्होंने 3 जून को उस महिला के पति पंकज को अफीम के साथ गिरफ्तार किया था, तब से वह रोजाना थाने आ कर रोती थी. पति के जेल जाने के बाद वह खुद को बेसहारा बता कर बारबार मदद की गुहार लगाती थी. जिस से उसे उस पर तरस आ गया और यही उस की गलती थी.

उस औरत ने आंसुओं की आड़ में उसे हनीट्रैप में फंसाया. वह तो उसे दिलासा दे कर सहारा देने की कोशिश कर रहा था. अफीम वाले मामले में और भी कई लोगों के नाम आने की संभावना है, इसी वजह से उस ने उन के खिलाफ यह साजिश रची.

जोधपुर पुलिस कमिश्नर अशोक राठौड़ ने चारण की गिरफ्तारी को एक सबक बताया. उन्होंने 15 जून को जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट के सभी अधिकारियों व थानाप्रभारियों को एक पत्र लिख कर कहा है कि ईमानदारी व ड्यूटी में कमी बरदाश्त नहीं होगी. पत्र में लिखा गया है कि इस घटना से पुलिस की प्रतिष्ठा पर आंच आई है, लेकिन अच्छी बात यह है कि गंदगी बाहर हो गई.

एसीबी ने रिमांड अवधि पूरी होने पर कमलदान चारण को 16 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने नए सिरे से जांच कर के 19 जून, 2017 की देर रात को गणपत बिश्नोई को अफीम की तस्करी के मामले में लिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उसे 4 दिनों के रिमांड पर लिया. पुलिस ने जकिया की वह कार भी जब्त कर ली है, जिसे छोड़ने के लिए जकिया ने कमलदान चारण को रिश्वत दी थी.

22 जून को पुलिस ने निलंबित थानाप्रभारी कमलदान चारण को भी अफीम तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया है. उसे पहले जेल से प्रोडक्शन वारंट पर लिया गया. थाने में पूछताछ और गिरफ्तार आरोपी गणपत बिश्नोई से क्रौस एग्जामिनेशन के बाद उसे गिरफ्तार किया गया.

कमलदान चारण अफीम तस्करी के उस मामले में गिरफ्तार हुआ, जिस में वह परिवादी था. यानी परिवादी ही आरोपी बन गया. उसे एनडीपीएस एक्ट के सेक्शन 59 के तहत गिरफ्तार किया गया है. यह धारा एन्फोर्समेंट एजेंसियों के लिए बनी हैं. जो अफसर अपनी ड्यूटी भूल कर अवैध गतिविधियों में लिप्त हो जाता है और आरोपियों को बचाने का प्रयास करता है, उसे इस सेक्शन के तहत गिरफ्तार किया जाता है. इस सेक्शन में जमानत मिलने के आसार बहुत कम होते हैं. इस धारा में न्यूनतम सजा 10 साल और अधिकतम 20 साल है. अब बात करें जकिया चौहान की. जकिया जोधपुर की रहने वाली है. वह 29 सितंबर, 2008 को जोधपुर से अचानक गायब हो गई थी.

उसी साल 4 अक्तूबर को उस के अपहरण का मुकदमा दर्ज हुआ था. बाद में वह दिसंबर में लौट आई थी. तब उस ने कहा था कि वह अपनी मरजी से गई थी. उस समय जकिया की एक युवक से दोस्ती की बात सामने आई थी.

बाद में सन 2009 में उस ने जोधपुर के नामी कांट्रैक्टर के बेटे साहिल से निकाह कर लिया था. साहिल से जकिया को एक बेटा हुआ. बेटा इस समय 7 साल का है. कुछ समय बाद साहिल और जकिया में विवाद होने लगा. यह विवाद इतना बढ़ गया कि करीब 7-8 महीने पहले दोनों में तलाक हो गया.

तलाक होने पर साहिल ने जकिया को कुछ रकम दी. जकिया ने उन पैसों से ब्लैक मैजिक कैफे शुरू किया. कहा जाता है कि इस कैफे में हुक्का बार भी चलता है. जोधपुर  में अन्य हुक्का बार पर पुलिस ने कई बार काररवाई की, लेकिन जकिया के हुक्का बार पर कभी काररवाई नहीं हुई.

पंकज वैष्णव मूलरूप से फलौदी का रहने वाला है. जोधपुर के रातनाड़ा में उस का मकान है. वह कपड़े का काम करता था. जकिया से जानपहचान हुई तो दोनों ने विवाह कर लिया. गणपत बिश्नोई फींच के पास रोहिचा का रहने वाला है. वह बीटेक कर रहा है. गणपत जकिया के ब्लैक मैजिक कैफे में काम करता था.

यह बात भी सामने आई है कि गणपत जकिया का दोस्त था और जकिया उसे बचाना चाहती थी. गणपत का पिता ओमाराम बिश्नोई अफीम का धंधा करता था. उस के खिलाफ अफीम तस्करी के 3 मामले दर्ज हैं. गणपत ही अपने गांव से अफीम लाया था.

वह पंकज के साथ कार में सवार हो कर अफीम बेचने जा रहा था. वह जिसे अफीम बेचने जा रहा था, उसी ने मुखबिरी कर दोनों को पकड़वा दिया. वह ग्राहक हिस्ट्रीशीटर था और बाद में चारण का मुखबिर बन गया था.

अफीम तस्करी में पुलिस ने जो कार जब्त की है, जकिया ने वह कार अपने धर्मभाई की बताई थी. पुलिस की जांच में पता चला कि 15 लाख रुपए की यह कार जकिया ने ही खरीदी थी और उस की किस्तें भी वह खुद ही चुका रही थी. साहिल ने इस कार का एक दिन भी उपयोग नहीं किया था. अफीम तस्करी के मामले का पता चलने पर साहिल ने जकिया से इस बात पर झगड़ा भी किया था.

बहरहाल, इस मामले में पूर्व थानाप्रभारी कमलदान चारण, पंकज वैष्णव और गणपत बिश्नोई जेल पहुंच गए हैं.

जहां चारण को यह मामला उलटा पड़ गया, वहीं जकिया ने भी जिस कार को छुड़ाने के लिए एक लाख रुपए की रिश्वत दी, वह कार जब्त हो गई. जकिया का आरोप है कि उस के पति पंकज वैष्णव को पुलिस ने अफीम के झूठे मामले में फंसाया है.

– कथा पुलिस सूत्रों व अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

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