अर्शी खान और ज्योति का डांस वीडियो वायरल

कलर्स चैनल के रिएलिटी शो बिग बौस सीजन 11 में कौमनर के रूप में नजर आ चुकीं बिहार की ज्योति कुमारी पिछले कुछ समय से चर्चा में हैं. हाल ही में अपने मेकओवर के लिए सुर्खियों में आने वाली ज्योति अब अपने डांस को लेकर खबरों में आ गई हैं. ज्योति इन दिनों मुंबई में हैं और बिग बौस 11 की कंटेस्टेंट अर्शी खान के साथ मस्ती करती नजर आ रही हैं.

इन दोनों का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में ज्योति अर्शी के साथ शानदार डांस मूव्स करती नजर आ रही हैं. इस वीडियो में ज्योति भी अर्शी की तरह ग्लैमरस डांस मूव्स करने की कोशिश करती दिख रही हैं.

बिग बौस में एंट्री लेने के दौरान ज्योति काफी सीधी-साधी सी नजर आई थीं. इस शो में रहने के दौरान उनकी विकास गुप्ता से अच्छी दोस्ती हो गई थी. वहीं मुंबई आने के बाद से वह विकास की चहेती अर्शी खान के साथ नजर आने लगी हैं.

हाल ही में ज्योति ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है जिसमें वह अर्शी के साथ पंजाबी गाने ‘कुड़ी मैंनू कहदी’ पर डांस करती दिख रही हैं. इस वीडियो की शुरुआत में अर्शी अपनी अदाएं दिखाती नजर आती हैं. इसके बाद फ्रेम में ज्योति भी आती हैं. दोनों एक साथ डांस करने लगती हैं. वीडियो में ज्योति भी अर्शी की तरह ग्लैमरस अंदाज में थिरकने की कोशिश करती नजर आ रही है.

Arshi Khan n Jyoti Haaahaaa Funny dance

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इन दोनों का यह वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है. वीडियो शेयर करते हुए ज्योति ने कैप्शन में लिखा, अर्शी खान और ज्योति…हा हा हा..फनी डांस. इस वीडियो में ये दोनों जमकर मस्ती करती नजर आ रही हैं. शेयर किए गए इस वीडियो को अब तक करीब एक लाख से ज्यादा लाइक मिल चुके हैं. ज्योति शो के खत्म होने के बाद से मुंबई में हैं.

वह हाल ही में बिग बौस कंटेस्टेंट के साथ पार्टी करती भी नजर आई थीं. ज्योति ने बिग बौस में एंट्री लेने के दौरान कहा था कि वह एक एक्ट्रेस बनना चाहती हैं. हाल ही में उन्होंने अपना मेकओवर करवाया है. मेकओवर के बाद से उनका लुक काफी बदला हुआ सा नजर आ रहा है.

योगी ब्रैंड से हिंदुत्व को मिलती धार

अब गुजरात गौरव यात्रा से ले कर केरल की जनरक्षा यात्रा तक योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व के ब्रैंड के रूप में भाजपा द्वारा पेश किया जा रहा है. इन राज्यों के चुनावों में सफलता मिली तो 2019 के लोकसभा चुनावों में योगी का बड़े पैमाने पर प्रयोग होगा. हिंदुत्व के हिट होने से रोजगार और विकास की बातें कम होंगी. नोटबंदी और जीएसटी के कुप्रभावों पर चर्चा नहीं हो सकेगी. पार्टी को आशा है

कि हिंदुत्व के मुद्दे के बहाने यशवंत सिन्हा जैसे अपनी पार्टी के विरोधी नेताओं की आवाज को दबाया जा सकता है. योगी को हिंदुत्व के ब्रैंड के रूप में प्रयोग कर के भाजपा ने संकेत दे दिया है कि आने वाले चुनाव  वह धर्म के आधार पर ही लड़ना चाहती है. धर्म की लकड़ी की कड़ाही बारबार आग पर चढ़ाई जा सकती है, यह धर्मों का इतिहास स्पष्ट करता है.

गुजरात से ले कर केरल तक भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धर्म का ब्रैंड एंबैसडर बना कर चुनाव प्रचार में उतार रही है. वह योगी ब्रैंड के सहारे केरल में अपनी जड़ें जमाने के प्रयास में है. भाजपा पहली बार उत्तर प्रदेश के किसी नेता को इतनी प्रमुखता से हिंदी राज्यों के बाहर चुनावप्रचार में उतार रही है. इस की सब से खास वजह योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व वाली छवि और उन का भगवा पहनावा है.

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योगी आदित्यनाथ के पक्ष में एक बड़ी बात यह भी है कि गुजरात और केरल दोनों जगहों में उत्तर प्रदेश के लोगों की संख्या काफी है. योगी आदित्यनाथ का भगवा पहनावा हिंदुत्व की कट्टर छवि पेश कर देता है, जिस के बाद भाजपा को किसी और तरह के मुद्दे को उठाने की जरूरत नहीं रह जाती है. अयोध्या आने वाले पर्यटकों में बड़ी संख्या गुजरात और केरल के लोगों की रहती है. यह बात शायद भाजपा के जेहन में नहीं है कि उन दोनों राज्यों में उत्तर प्रदेश से वे लोग गए जो गांवों की गरीबी और जाति व धार्मिक अत्याचारों से पीडि़त व बेहद गरीब थे.

भाजपा ने योगी को चुनाव में स्टारप्रचारक के रूप में प्रयोग करने की रणनीति बना ली है. इस के साथ ही अयोध्या के विकास और वहां पर राम की मूर्ति लगाने की योजना पर भी काम तेज कर दिया गया है.

केरल से अधिक भाजपा के लिए गुजरात महत्त्वपूर्ण है. केंद्र सरकार के 2 बड़े फैसले नोटबंदी और जीएसटी वहां के विधानसभा चुनाव पर असर डाल सकते हैं. गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का राज्य है. गुजरात में भाजपा के बैकफुट पर जाने का प्रभाव सीधे शाह-मोदी की लोकप्रियता पर पड़ेगा. भाजपा अब सरकार में आने के बाद सीधेतौर पर हिंदुत्व की बात नहीं करना चाहती. ऐसे में योगी आदित्यनाथ ऐसा चेहरा है जो बिना कहे हिंदुत्व के मुद्दे को उभार सकते हैं. यही वजह है कि भाजपा योगी को चुनावी तारणहार मान कर उन का चुनावप्रचार में उपयोग कर रही है.

गुजरात में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से है. गुजरात में भाजपा की सरकार है, ऐसे में वहां सत्ताविरोधी मतों का मुकाबला उसे करना है.

हिंदू जनसंख्या बनेगी मुद्दा

केरल में कम्यूनिस्ट पार्टी की सरकार है. वहां भाजपा घटती हिंदू आबादी को मुद्दा बना रही है. ऐसे में योगी आदित्यनाथ सब से मुफीद चेहरा बन सकते हैं. भाजपा ने केरल में योगी आदित्यनाथ की अगुआई में जनरक्षा यात्रा की शुरुआत की. केरल में योगी को सामने ला कर भाजपा यह बताना चाहती है कि धर्म ही नहीं, हिंदुत्व की रक्षा और केरल में हिंदुओं की घटती संख्या को रोकने के लिए योगी जैसे लोगों की जरूरत है. अयोध्या, योगी और हिंदुत्व को पेश कर भाजपा चुनावी समीकरण को धर्म पर केंद्रित रखना चाहती है. केरल में तिरुअनंतपुरम के एक छद्म संस्थान, सैंटर फौर डैवलपमैंट स्टडीज की रिपोर्ट के आधार पर भाजपा  भ्रम फैला रही है कि मुसलिम आबादी 2030 तक 33 फीसदी और 2035 तक 35 फीसदी बढ़ जाएगी. 1961 में केरल में हिंदुओं की आबादी 61 फीसदी थी. 2011 की जनगणना में यह घट कर 54 फीसदी रह गई है. 1961 में जो मुसलिम आबादी 17 फीसदी थी वह 2011 में 27 फीसदी हो गई है. ये आंकड़े प्रमाणिक नहीं हैं पर भाजपा अपने सोशल मीडिया प्रचारतंत्र के जरिए इन आंकड़ों पर जोरशोर से भ्रम फैला रही है.

सैंसस आंकड़ों के अनुसार, हिंदुओं की वृद्धि 2001-11 के दौरान यदि 16.76 प्रतिशत से गिर कर 18.92 प्रतिशत हुई है तो मुसलिम वृद्धि एकाएक  1991-2001 में 29.52 प्रतिशत से गिर कर 24.60 प्रतिशत हो गई है. यदि मुसलिम जनसंख्या में वृद्धि इसी तरह घटती रही, जिस की संभावना बहुत अधिक है, तो यह मामला सिर्फ हौआ दिखाने का रह जाएगा कि मुसलिम हिंदुओं से ज्यादा हो जाएंगे.

गुजरात में अयोध्या की छवि

भाजपा इस तर्क को आगे बढ़ा रही है कि केरल में धर्मांतरण बड़े पैमाने पर हो रहा है. इस के कारण हिंदुओं की संख्या में कमी हो रही है. धर्मांतरण को भाजपा ने पिछले चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाया था. उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी धर्मांतरण और लव जिहाद जैसे मुद्दों ने प्रदेश में हिंदुत्व की लहर को तेज किया था. धर्मांतरण की बात करते हुए भाजपा इस पर चुप्पी साध जाती है कि जो भी धर्मपरिवर्तन कर रहे हैं क्या वे हिंदू जाति व्यवस्था के सताए हुए नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार से स्पष्ट है कि भाजपा असल सत्य को छिपा रही है. अब केरल में भाजपा इस मुद्दे को ले कर चुनाव जीतना चाहती है. केरल में अभी तक कांग्रेस और वामदलों के बीच सत्ता की लड़ाई चलती थी.

इस बार भाजपा ने इस मुद्दे को उठा कर चुनावी लड़ाई को त्रिकोणात्मक बना दिया है. वामदल और कांग्रेस इस मसले पर चुप हैं क्योंकि इन दोनों के नेता उसी तरह के हैं जिस से भाजपा के कट्टर चेहरे आए हैं. भाजपा यहां मुखर हो कर अपनी बात को कह रही है. ऐसे में योगी सब से प्रभावी चेहरा बन गए हैं. इस कारण भाजपा योगी को उत्तर प्रदेश से बाहर ले कर जा रही है.

गुजरात के विधानसभा चुनावों में अयोध्या एक प्रमुख मुद्दा रहता है. गुजरात के दंगों की आग अयोध्या से जुड़ी थी. गोधरा कांड में कारसेवकों पर हुआ हमला और उस के बाद वहां भड़की हिंसा आज भी लोगों के दिलोदिमाग पर हावी है. रोजगार और विकास जैसे मुद्दों को पीछे ढकेलने के लिए हिंदुत्व को उभारना ही सब से जरूरी हो जाता है. हिंदुत्व के उभरने से नोटबंदी और जीएसटी के प्रभावों पर चर्चा गौण हो जाती है. योगी आदित्यनाथ के सहारे भाजपा अपने हिंदुत्व के ब्रैंड को हिट करना चाहती है. जिस से चुनाव में दूसरे मुद्दे चर्चा में न आ सकें.

केरल और गुजरात में योगी की लोकप्रियता का अंदाजा भाजपा को है. योगी भले ही केरल की मलयालम और गुजराती बोली में अपनी बात न कह सकें पर वे अपने पहनावे से वहां के लोगों को हिंदुत्व का आभास कराने में पूरी तरह से सफल हो रहे हैं. केरल में भाजपा के स्थानीय नेता हिंदी बोल लेते हैं. वे इस काम में योगी के सब से बड़े मददगार बनेंगे. गुजरात में केरल से अधिक हिंदी बोली के लोग हैं. गुजरात के ज्यादातर शहरों में उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से के लोग ज्यादा हैं, जहां से योगी आते हैं. ऐसे में पूर्वी उत्तर प्रदेश से गुजरात आए लोग बड़ी संख्या में योगी को सुनने आ सकते हैं जो चुनावी माहौल को बेहतर बनाने का काम करेंगे.

केरल और गुजरात के चुनावों में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन से योगी का कद देश की राजनीति में बड़ा होगा. जिस का प्रयोग भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में बखूबी कर सकेगी.

विरोध के स्वर

योगी के बहाने भाजपा केवल पार्टी के बाहर ही मैदान मारने की तैयारी में नहीं है. वह पार्टी के अंदर उठ रहे विरोध के स्वर को भी दबाने में सफल हो रही है. यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे पार्टी के पुराने खेवनहारों के उभरते विरोध के स्वर को भाजपा हाशिए पर डालने के लिए नई पीढ़ी के नेताओं को उभारना चाहती है, जो शाह और मोदी के विरोध की बात मन में भी न ला सकें. हिंदुत्व के ब्रैंड के रूप में भाजपा के पास योगी जैसा कोई नेता नहीं है. योगी प्रखर वक्ता हैं. हिंदुत्व को ले कर वे कट्टरवादी बयान दे सकते हैं. वे अपनी पोशाक से पूरी तरह मीडिया के बीच आकर्षण का केंद्रबिंदु बने रहते हैं. वे युवा और मेहनती होने के कारण ज्यादा से ज्यादा समय तक काम कर सकते हैं. योगी को मुख्यमंत्री बने हुए अभी 6 माह का ही समय हुआ है, फिलहाल उन की छवि भ्रष्टाचार विरोधी बनी है. विकास को ले कर तमाम तरह की योजनाओं के सहारे योगी की छवि को निखारा जा सकता है.

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राममंदिर नहीं, अब राम की मूर्ति

संविधान भले ही धर्म की राजनीति को गलत माने लेकिन धर्म को राजनीति से अलग कर के नहीं देखा जा सकता. अयोध्या में अब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार राममंदिर के बजाय राम की मूर्ति लगाने की योजना बना रही है. इस को अयोध्या के पर्यटन से जोड़ कर योजना तैयार की जा रही है. पर्यटन विभाग ठेके के आधार पर जनता के करों से वसूले पैसे से अयोध्या में सरयू नदी के किनारे 100 मीटर ऊंची राम की मूर्ति लगाएगी. इस मूर्ति का जो डिजाइन पर्यटन विभाग तैयार कर रहा है वह राम की दूसरी मूर्तियों से अलग होगा. इस मूर्ति में राम को धनुष लिए दिखाया जाएगा. भाजपा के रणनीतिकार अब इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि राम की मूर्ति की ऊंचाई क्या होनी चाहिए. पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि यह मूर्ति भारत में सब से बड़ी होनी चाहिए.

देश में सब से ऊंची मूर्तियों में अभी तक सरदार पटेल की बनने वाली मूर्ति थी. इस की ऊंचाई 182 मीटर रखी जानी है. इस के साथ महाराष्ट्र में 210 मीटर ऊंची शिवाजी की मूर्ति लगाई जानी है. इन दोनों का ही भूमिपूजन हो चुका है. राम की मूर्ति को अगर इन से छोटा रखा गया तो इस से राम का अनादर होगा.

2014 के लोकसभा चुनाव में सरदार पटेल की मूर्ति बड़ा मुद्दा था. इस को बनाने के लिए गांवगांव में हर घर से लोहादान मांगा गया था. अभी तक यह मूर्ति बन कर तैयार नहीं हुई है. चीन में बन रही इस मूर्ति को गुजरात सरकार लगा रही है. गुजरात सरकार के बाद महाराष्ट्र सरकार ने शिवाजी की मूर्ति लगाने की पहल शुरू कर दी. इस का भूमिपूजन हो चुका है. इस मूर्ति को दुबई के बुर्ज खलीफा को बनाने वाली कंपनी टर्नर कंस्ट्रक्शन की देखरेख में माइकल ग्रेब्स ऐंड एसोसिएशन साइनआर्ट ग्रुप बना रहे हैं. टर्नर कंपनी व माइकल ग्रेब्स अमेरिका की हैं. इस की ढलाई का काम टीक्जू आर्ट फाइंड्री, नानचुंग, चीन को दिया गया है.

गुजरात और महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश की सरकार ने राम की मूर्ति को लगाने की शुरुआत कर दी है. सरयू नदी के किनारे बनने वाली इस मूर्ति को राममंदिर से दूर रखा गया है. पर्यटन विभाग 100 मीटर ऊंची मूर्ति लगाने का प्रस्ताव बना चुका है. अब मूर्ति की ऊंचाई को ले कर बदलाव की मांग की जा रही है. भाजपा 2019 के चुनाव से पहले राम की मूर्ति को लगवा देना चाहती है. पर्यटन विभाग नई अयोध्या तैयार करना चाहता है. जिस से पर्यटक ज्यादा से ज्यादा अयोध्या आ सकें.

अयोध्या के संत इसे राममंदिर से जोड़ कर देखने को तैयार नहीं हैं कि राममंदिर और राम की मूर्ति अलगअलग मुद्दा हैं. दोनों को आपस में जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. अयोध्या में राममंदिर का महत्त्व गर्भगृह से जुड़ा है. उस से अलग कहीं भी राममंदिर बनाना या राम की मूर्ति लगाने को धार्मिक भावनाओं को पूरा नहीं करेगा. भाजपा इस तरह के कामों से लोगों का ध्यान राममंदिर से हटा नहीं सकती है. अयोध्या का विकास हो पर राममंदिर को दरकिनार कर के ऐसा कोई विकास भक्तों के गले से नीचे नहीं उतरेगा.

क्या चांदनी को रोक पाएंगे आदित्यनाथ

हजारों लोग आगरा पहुंच चुके हैं और हजारों रास्ते में हैं. ये लोग ताजमहल पर शरद पूर्णिमा की बरसती चांदनी का लुत्फ उठाएंगे. इस संगमरमरी ऐतिहासिक इमारत पर आज की चांदनी की छटा अद्भुत होती है, इतनी और ऐसी कि प्रकृतिप्रेमी सुधबुध खो बैठते हैं. इन में से कइयों को नहीं मालूम होगा कि अब ताजमहल उत्तर प्रदेश का पर्यटन स्थल नहीं रहा है, वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कभी दरभंगा बिहार की एक रैली में कहा था कि ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है.

योगी ने जो कहा था वह कर भी दिखाया. इस साल उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा जारी 32 पृष्ठीय बुकलेट में से आगरा का ताजमहल गायब है.

यह महज खबर नहीं है, बल्कि खबरदार कर देने वाली एक धमक भी है कि इतिहास दोबारा लिखा जा रहा है. अब उत्तर प्रदेश में दर्शनीय कुछ है तो वह गोरखपुर स्थित गोरखधाम मंदिर है, जिस के महंत आज  सीएम की कुरसी पर विराजमान हैं. मथुरा, बनारस और चित्रकूट भी प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं, क्योंकि इन धार्मिक स्थलों में हिंदू देवीदेवता विराजते हैं. यही नई भारतीय संस्कृति है, जिस की इबारत बीते 3 सालों से आरएसएस के इशारे पर लिखी जा रही है.

शरद पूर्णिमा के ठीक 2 दिनों पहले जब यह बुकलैट जारी हुई तो सरकारपरस्त मीडिया खामोश रही. मीडिया बात का बतंगड़ बनाने में माहिर है, लेकिन इतिहास को तोड़ेमरोड़े जाने पर भी खामोश है.

उदाहरण कई हैं जो बताते हैं कि इतिहास का पुनर्लेखन हो रहा है. इस से खुश हो रहे 15-20 फीसदी लोग महंगाई की बात नहीं करते. इस श्रेष्ठी वर्ग को एहसास है कि एक बार वर्णव्यवस्था वाला दौर वापस भर आ जाए, फिर तो क्या मुसलमान, क्या दलित और क्या पिछड़े, सब के सब पहले की तरह हमारी पालकी ढोते नजर आएंगे. दशहरे पर इन दिनों की सब से बड़ी अदालत ने नागपुर के रेशम बाग से कहा, गौरक्षकों को घबराने की जरूरत नहीं, नरेंद्र मोदी अच्छा काम कर रहे हैं, कुछ कमियां हैं, किसानों और गरीबों के लिए भी उन्हें कुछ करना चाहिए. बात लोगों को समझ आ गई कि सुप्रीम कोर्ट तो यों ही कहता रहता है कि सरकार गौरक्षकों की हिंसा को काबू करे.

यह वर्ग शरद पूर्णिमा नहीं मनाता, न ही ताजमहल देखने को आगरा जाता है. यह वर्ग प्यार नहीं करता, सैक्स भर करता है, इसलिए यह मुख्यधारा नहीं है. इसे अपने उद्घार के लिए मंदिरों की जरूरत है, यह बात योगी से बेहतर कौन समझ सकता है. इसलिए उन्होंने गरीबों की मोहब्बत का मजाक उड़ाते ताजमहल को ही पर्यटन के नक्शे से गायब कर दिया. भारतीय संस्कृति शहंशाहों की नहीं, बल्कि राजनों, आर्यों और तातों के अलावा ऋषिमुनियों की है, इसलिए अगर ऐतिहासिक नजरिए से ताजमहल को ताजमहल साबित नहीं किया जा सकता, तो कोई बात नहीं, उसे धीरेधीरे खंडहर में तबदील हो जाने दो.

बोलने वालों के मुंह बंद करने की कला भी खूब फलफूल रही है. यह बनी रहे, इस के लिए मोदी और योगी जरूरी हैं. वे ही हिंदू राष्ट्र बनाएंगे और इस बाबत थोड़ी सी महंगाईबेरोजगारी बढ़ती है तो वह तो बरदाश्त करनी पड़ेगी. यह बात वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कुछ यो कही थी कि अगर विकास चाहिए तो उस की कीमत तो देनी पड़ेगी.

हर्ज क्या अगर टीचर्स साफ करें टौयलेट?

छोटा सा लेकिन दिलचस्प और एक सबक सिखाता वाकेआ मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ग्यारसपुर ब्लौक के गांव पिपरिया जागीर का है. 20 अगस्त को एक व्हाट्सऐप ग्रुप पर शिक्षक गेंदा सिंह मालवे की कुछ तसवीरें वायरल हुईं जिन में वे टौयलेट की साफसफाई करते नजर आ रहे थे.

विवाद साफसफाई और उस की अहमियत को ले कर नहीं, बल्कि इस बात पर हुआ कि ये तसवीरें जानबूझ कर वायरल की गई थीं. गेंदा सिंह मालवे का आरोप था कि उन पर हैदरगढ़ की क्लस्टर प्रभारी राधा यादव ने अपने दौरे के दौरान टौयलेट साफ करने का दबाव बनाया और फिर टौयलेट साफ करते उन की तसवीरें जानबूझ कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डालीं जिस से वे बेइज्जत महसूस कर रहे हैं. इस बात की शिकायत उन्होंने कलैक्टर, विदिशा और अजाक थाने में की.

इस आरोप के जवाब में राधा यादव ने कहा कि जब वे दौरे पर गईं थीं तो स्कूलटीचर टौयलेट साफ कर रहे थे. उन्होंने उन के फोटो खींचे ताकि अन्य लोगों को संदेश दिया जाए कि शिक्षक भी साफसफाई करते हैं. स्वच्छता अभियान का संदेश देने के लिए उन्होंने फोटो जन शिक्षा केंद्र के व्हाट्सऐप ग्रुप पर साझा किए थे. उन का इरादा किसी को बेइज्जत करने का नहीं था और जातिगत तौर पर अपमान के आरोप झूठे हैं.

स्कूलों में आएदिन ऐसे विवाद आम हैं पर इस झगड़े से एक सार यह निकल कर आया कि अगर टीचर्स टौयलेट्स की साफसफाई खुद करते एक मिसाल पेश करें तो हर्ज की क्या बात. उलटे, इस बात का तो स्वागत किया जाना चाहिए और उस में जातपांत की बात तो होनी ही नहीं चाहिए. विदिशा के विवाद में किस की मंशा क्या थी, इस बात की कोई अहमियत नहीं. अहमियत इस बात की है कि स्कूलों को साफ रखा जाना बेहद जरूरी है.

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साफसफाई सिखाएं

साफसफाई की अहमियत कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही लेकिन इस में एक बड़ी दिक्कत यह है कि यह मान लिया गया है कि टौयलेट आदि की सफाई का काम छोटी कही जाने वाली खास जाति के लोग ही करें तो बेहतर है, क्योंकि पीढि़यों से उन का पेशा यही है.

धर्म से आई यह बात स्कूली किताबों में नहीं, बल्कि घरों में ही पढ़ाई जाती है, जिसे बच्चे पूरी जिंदगी ढोते रहते हैं. सरकारी स्कूलों में जातपांत इतना आम है कि सवर्ण बच्चे मध्याह्न भोजन भी छोटी जाति के शिक्षकों से लेना अपनी तौहीन समझते हैं. ऐसे में कोई शिक्षक खुद को जातिगत रूप से बेइज्जत महसूस करे तो इस में उस की क्या गलती.

पढ़ाई से इतर भी स्कूलों में बच्चे काफीकुछ सीखते हैं. अब किसी भी तबके के मातापिता के पास इतना वक्त नहीं है कि वे अपने बच्चों को साफसफाई के बारे में एक हद से ज्यादा बता या सिखा पाएं. ऐसे में यह जिम्मेदारी शिक्षकों को दी जाए तो बात बन सकती है.

इस में शक नहीं कि देशभर के सरकारी स्कूल बेतहाशा गंदगी के शिकार हैं. वजह, इस काम की जिम्मेदारी सफाई कमियों पर डाल रखी गई है, जो न आएं या काम से जी चुराएं तो बच्चों को भारी गंदगी के बीच रहना व पढ़ना पड़ता है.  शिक्षक की तरह साफसफाई में उन की भी कोई दिलचस्पी या रोल नहीं रहता.

जब शिक्षकों को साफसफाई करने में तौहीन लगती हो तो उन को रोल मौडल मानने वाले बच्चों से क्या खा कर उम्मीद रखी जाए कि वे साफसफाई करने को छोटा और शर्म वाला काम नहीं समझेंगे. राजनति से हट कर देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान एक अच्छी शुरुआत है. यहां यह बात गौरतलब है कि यह अच्छी मुहिम अनजाने में जातिवाद की शिकार हो चली है.

विदिशा के एक मामूली स्कूली विवाद का इस बात से गहरा नाता है कि साफसफाई के लिए हम तक छोटी जाति वालों के मुहताज हैं. शौक या प्रचार के लिए सड़कों पर झाड़ू लगाना एक अलग बात है पर संजीदगी से स्वच्छता के प्रति जागरूक होना या करना एक अलग मुद्दा है जिस में सरकार नाकाम साबित हो रही है.

किसी व्हाट्सऐप ग्रुप  पर टीचर्स द्वारा टौयलेट साफ करने की तसवीरें वायरल हों, यह कतई शर्म या बेइज्जती की बात नहीं. एतराज की बात यह है कि यह टीचर छोटी जाति का ही क्यों है, सवर्ण क्यों नहीं. यानी सभी जातियों और वर्ग के शिक्षक अगर अपने स्कूलों के टौयलेट की सफाई की जिम्मेदारी लें तो बच्चों में साफसफाई का जज्बा आते देर नहीं लगेगी.

हिचकिचाहट क्यों

देशभर के सरकारी स्कूलों के शिक्षक आएदिन इस बात पर धरनेप्रदर्शन और हड़तालें कर हल्ला मचाते रहते हैं कि उन से पढ़ाई के अलावा कोई काम न लिया जाए. इस से बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है और वे पढ़ाने के लिए वक्त नहीं निकाल पाते हैं.

बात एक हद तक सही है लेकिन यह स्कूल की साफसफाई पर लागू नहीं होती और न ही होनी चाहिए. स्कूलों की साफसफाई की जिम्मेदारी शिक्षक अगर लें तो सरकारी स्कूल भी प्राइवेट स्कूलों की तरह चमचमाते नजर आएंगे.

जाहिर है इस के लिए यह हिचक, झिझक, शर्म या पूर्वाग्रह उन्हें छोड़ना पड़ेगा कि हम क्या कोई भंगी हैं, मेहतर हैं जो साफसफाई करें, हमारा काम तो पढ़ाना है.

जबकि शिक्षकों का काम महज पढ़ाना ही नहीं, बल्कि बच्चों में अच्छी आदतें डालना भी होता है. साफसफाई इन में अहम है. अगर टीचर तय कर लें कि टौयलेट की सफाई के साथसाथ स्कूलों में झाड़ूबुहारी का काम भी वे करेंगे तो कोई वजह नहीं कि स्वच्छ भारत अभियान परवान न चढ़े. इस काम में छात्रों को भी, समूह बना कर, वे शामिल करें तो बात सोने पे सुहागा वाली होगी.

साफसफाई में ज्यादा वक्त नहीं लगता है. अगर एक पीरियड अलग से इस के लिए रखा जाए तो बच्चे और शिक्षक दोनों गंदगी से नजात पा सकते हैं और वे सफाई के बाबत किसी के मुहताज भी नहीं रहेंगे. इस के लिए इकलौती जरूरत दृढ़ इच्छाशक्ति और शर्म छोड़ने की है.

जब टीचर्स झाड़ू लगाएंगे या टौयलेट साफ करते नजर आएंगे, तो छात्र खुदबखुद उन का साथ देंगे. पर इस के लिए पहल तो टीचर्स को ही करनी पड़ेगी. बच्चों से पहले उन्हें खुद को समझना होगा कि स्कूल हम सब का है और यह शिक्षा का घर है. उस की साफसफाई हम खुद करें तो छोटे नहीं हो जाएंगे. उलटे, हम में गैरत और स्वावलंबन की भावना आएगी.

जब स्कूलों से बच्चे साफसफाई का सबक खुद यह काम कर के सीखेंगे तो तय है कि आगे चल कर उन्हें इस की अहमियत समझ आएगी और वे भी इस में हिचकेंगे नहीं. साफसफाई का काम एकदूसरे पर थोपने की बीमारी की वजह से ही पूरा देश गंदा और बदबूदार हो गया है. हर स्कूल में राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी की तसवीर टंगी रहती है पर यह कोई याद नहीं रखता कि वे साफसफाई करने में हिचकते नहीं थे और एक वक्त तो वे अपना मैला भी खुद साफ करने लगे थे.

उस दिन किसी स्वच्छ भारत अभियान की जरूरत नहीं रह जाएगी जिस दिन स्कूलों के टीचर टौयलेट साफ करते अपने फोटो खुद सोशल मीडिया पर फख्र से शेयर करेंगे. यह बिलाशक बड़े पैमाने पर प्रेरणा देने वाला काम होगा और इस के लिए किसी सरकारी हुक्म या हिदायत की नहीं, बल्कि खुद को एक प्रतिज्ञा करने की जरूरत है कि मेरा स्कूल, मैं साफ रखूंगा और जरूरत पड़ी तो टौयलेट भी साफ करूंगा.

सरकार को चाहिए कि वह ऐसी पहल करने वाले शिक्षकों को पुरस्कार व विशेष वेतनवृद्धि दे कर उन्हें प्रोत्साहित व सम्मानित करे. अगर हम अपने घर की तरह ही देश के हर कोने, गली, नाली की साफसफाई के लिए दूसरों पर निर्भर होने के बजाय स्वयं करना शुरू कर देंगे तो यह भावी पीढ़ी को भी प्रेरणा देगा और गंदगी से फैलने वाली बीमारियों से नजात मिलेगी.

कामवाली बाइयों के नखरे इस तरह संभालें

हमारे देश के महानगर हों या नगर, अधिकांश स्त्री को घर में काम करने वाली बाइयों से वास्ता पड़ता ही है. ज्यादातर स्त्रियां औफिस, बिजनैस, किसी कला या फिर पारिवारिक व्यस्तताओं में इतनी डूबी होती हैं कि उन के पास रोजमर्रा की घरेलू साफसफाई करने के लिए न तो ऊर्जा बचती है, न ही समय. ऐसे में घर के कामों में मदद के लिए कामवाली बाइयां उपयुक्त हैं. मगर ये बाइयां अपनी मालकिनों को परेशान करने की कला में भी कम निपुण नहीं होतीं.

यहां हम कामवालियों के नएपुराने फरमानों और उन के नखरों से उत्पन्न होने वाली दैनिक जीवन की परेशानियों की बात कर रहे हैं, जिन्हें झेलने के लिए घर की महिलाएं ही रह जाती हैं. यों कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कामवाली औरतों को संभालना आज एक कठिन मोरचे पर खुद के आत्मसमर्पण करने जैसा है.

नमिता सुबह 5 बजे उठती है. दोनों बच्चों को स्कूल भेजना, पति का औफिस और फिर खुद जौब के लिए निकलना. सुबह 9 बजे तक अफरातफरी के बीच सिंक में रात के बरतनों का ढेर, सफाई के बाट जोहते बासी कपड़े, झाड़ूपोंछा को तरसते फर्श, और तो और, इन सब के बीच एकएक बरतन धो कर नाश्ते के इंतजाम में लगी नमिता को परेशान करती घड़ी की बेरहम रफ्तार और घरवालों की एकएक काम के लिए नमिता के नाम की चीखपुकार. तब भी नमिता को अपना आपा सही रखना है क्योंकि घर में सासससुर हैं जो नमिता के बाहर जाने के बाद बहू द्वारा पकाए गए खाने पर निर्भर रहेंगे.

इस बीच, बाई का आना और उस के कामों की मीनमेख निकालती सास की बाई से खिटपिट हो जाना, बाई का नमिता को काम छोड़ने की धमकी देना आदि नमिता की जिंदगी के रोजमर्रे का कैलेंडर है. कई बार दैनिक जीवन की उलझनों में बाई द्वारा पैदा की गई असुविधाएं इतनी बढ़ जाती हैं कि औरों की तरह नमिता भी अपनी क्षमता से बाहर जा कर भी घरेलू काम स्वयं ही कर लेना पसंद करती है. रोजरोज बाई से किसी न किसी मुद्दे पर बहस कौन करे?

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सच, अगर बाइयों की दी हुई उलझनें कम हो जाएं तो एक महिला की जिंदगी से घर की आधी उलझनें यों ही दूर हो जाएं. क्या ऐसा संभव है? बिलकुल.

यहां कुछ मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर गौर करते हुए कामवाली को संभालने के ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं जिन से इस व्यावसायिक रिश्ते में आत्मीयता की खुशबू छिड़क कर काफी हद तक उलझनों से मुक्ति पाई जा सकेगी.

  • पहले खुद को समझ लें :  स्त्रियों के लिए रिश्तों को संभालना बड़ी बात नहीं. शादी के बाद अनुभवहीन अवस्था में जब वह ससुराल आती है तब तो उसे बहुत ही महत्त्वपूर्ण और गहरे रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाना होता है जो कई मानों में जटिल और लेनदेन पर आधारित होते हैं.

अपनी कामवाली के साथ भी एक रिश्ता समय के साथ गढ़ा ही जाता है चाहे उसे क्यों न व्यावसायिक रिश्ते का ही नाम दें. अगर थोड़ी समझदारी दिखा लें तो कामवाली बाई को भी सटीक सांचे में आसानी से बिठा सकते हैं, इतनी कूवत तो आप में है ही.

  • दिल को बोलने दें :  कोई भी रिश्ता चाहे वह जानवर के साथ ही क्यों न हो, जरा सी मानवीयता दिखाना दोनों को करीब ला देता है. घर में काम करने आई दीदी चाहे अनपढ़, गरीब, नासमझ ही हो, पर दुख में सहानुभूति, विपत्ति में साथ पाने की इच्छा हमआप की तरह ही उस के दिल में भी होती है. आप की ओर से उस के प्रति पहल ऐसी हो कि उसे सहज ही विश्वास रहे कि जरूरत के वक्त आप उस के दुखदर्द को समझेंगी.
  • समझा दें कि समझ रही हैं :  जब शादी के बाद नई बहू घर में आती है तो जिस घर में वहां के बड़े आगे बढ़ कर बहू को अपनाते हैं, उसे सहारा देते हैं, उस घर में नई बहू अपनेआप ही ससुराल वालों का खयाल रखने लगती है. यही बात आप की नई आगंतुक कामवाली के साथ भी लागू होती है. यह सामान्य मानवीय मनोविज्ञान है.

बाई के काम पर लगते ही बात कुछ यों न करें, ‘‘हमारे घर में ऐसे ही काम करना पड़ेगा, हमें यही समय जमता है, हमें ये पसंद नहीं और बातबात पर पैसे और छुट्टी नहीं मांगना आदि. ऐसे फरमानों से स्वाभाविक है कि उस के मन में आप के घर में काम करने को ले कर असुरक्षा की भावना पैदा होगी. बहुत जरूरत हो तो भले ही वह काम पर लग जाए लेकिन आप के प्रति उस का नजरिया नकारात्मक ही रहेगा. आप पहले उस के मन की बात जान लें, फिर यों कहें- हमें यह समय सही रहता है. इस वक्त आओगी तो तुम्हें यह सुविधा होगी और मुझे यह. तब तक आप उस की सुविधाअसुविधा पहले जान चुकी होंगी तो आप को बीच का रास्ता निकालने में आसानी होगी.

  • रूखे अंदाज को मोड़ लें नरमी में:  बाइयों की गोष्ठी में अकसर यह तय रहता है कि वे काम करने जाएं तो व्यावसायिकता से पेश आएं और मालकिनों को ज्यादा छूट न दें. इस से दूसरी बाइयों को परेशानी हो सकती है. अगर इन्हें अपने सांचे में ढालना है तो हमें इन से नरमी से पेश आना होगा. मान लें, आप की नई बाई काम शुरू करने से पहले आप से इस तरह की बातों से शुरुआत करती है-मैं फलांफलां काम नहीं करती, मुझे येये सुविधाएं चाहिए, फलाना मिसेज के यहां येये सुविधाएं दी जाती हैं, बोलने की जरूरत नहीं पड़ती. आप को उस की इन बातों से चिढ़ होनी लाजिमी है. मगर आप चिढ़ें न, समझ लें यह उस के साथ आप का व्यावसायिक रिश्ता है. वह काम तो करना चाहती है लेकिन अपने अधिकारों को ले कर सतर्क है. आप का सामान्य सा नरम आश्वासन उसे सुरक्षित भावना से भर देगा और वह निश्ंिचत हो कर आप के घर में काम करेगी. उस से इन शब्दों में कहें कि तुम्हें खुद ही समझ आ जाएगा कि मेरे पास काम करने में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी.
  • बाई का बारबार पैसे मांगना :  आप ने काम से पहले रकम और लेनदेन की बात तय कर ली. मगर कई ऐसी भी बाइयां होती हैं जो आप की उदारता व कोमलता के फायदे उठाने की कोशिश में रहती हैं. उन से निबटना उलझनभरा काम है. बातबात पर बाई को काम से निकालना उचित नहीं, क्योंकि हर बाई में कोई न कोई ऐब आप को मिल ही जाएगा. तो क्यों न हम खुद ही सुधरें, मसलन उस के अनचाहे पैसे मांगते वक्त आप उसे कोई और्डर मत सुनाइए. उस की मानसिकता को सहते हुए और अपने अनुशासन को उसे हजम कराते हुए आगे बढि़ए. उसे इस तरह मना न करें-तुम्हें तो बस बहाने चाहिए पैसे मांगने के. एक तो नागा, ऊपर से आएदिन पैसे मांगना. निसंदेह जानिए आप के ये बोल उस के अहं को ललकार देंगे और बदले में आप को हो सकता है उस से काम छोड़ने की धमकी ही मिले. उसे यों समझाएं कि बात उसे चुभे बिना ही वह आप की बातों से सहमत हो जाए. यह ऐसे संभव है, कहें-पैसों की जरूरत तो हमेशा ही रहती है, लेकिन बारबार मांगने से हमारा भी बजट गड़बड़ हो जाता है. हम तुम्हें न दे पाएं तो हमें भी बुरा लगता है. जब बहुत दिक्कतहो, तभी बताना.

ऐसी बातों से उस की आप के साथ समझ विकसित होगी, और वह भी आप की असुविधाओं को स्वीकार करना सीखेगी. हां, ध्यान रखें आप की खुशी और त्योहार में उसे अवश्य ही खास गिफ्ट दें, पैसे दें, उस के या उस के घरवालों की बीमारी के इलाज में जितना संभव हो, मदद की भावना रखें, इस तरह उस का पैसे मांगना खुदबखुद ही कम हो जाएगा.

  • घर में जब कोई सामान न मिले:  अकसर ऐसा होता है कि घर में सामानों को रख हम भूल जाते हैं, या उन्हें हम कहीं छोड़ आते हैं और हमें याद नहीं रहता. सामान ढूंढ़ने के क्रम में हमारा सौ प्रतिशत शक, बल्कि पूरा यकीन ही बाई के सामान पर हाथ साफ करने को ले कर होता है. महिलाएं घुमाफिरा कर बाई से इस चोरी के बारे में पूछती हैं. वे अपने बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों को सामान के गुम हो जाने की बात को सुना कर अनजाने व्यक्ति को कोसती रहती हैं, जैसे जिस ने लिया होगा उसे कभी चैन नहीं पड़ेगा, मुझे सब पता है कौन ले सकता है.

एक तो बिना किसी के दोषी साबित हुए उस के सम्मान के साथ खिलवाड़ अनैतिक भी है और कानूनीतौर पर जुर्माने के काबिल भी. दूसरे, बाई को इतना भी मूर्ख न समझें कि आप के कहे का मतलब वह नहीं समझ रही होगी. ऐसे में अगर वह आप को बिना बताए काम छोड़ दे तो आप का शक यकीन में बदल जाना सही नहीं है कि हो न हो, सामान उसी ने चुराए होंगे. आत्मसम्मान बोध गरीबी में नष्ट नहीं होता और समृद्धि में नहीं पनपता. यह तो जन्मजात है.

फिर भी कहीं ऐसा हुआ हो कि सामान या पैसे उसी ने लिए हों तो भी अपनी सभ्यता न छोड़ें. एक सभ्य इंसान ही दूसरे असभ्य को सभ्य बना सकता है. आप को कौशलपूर्ण बातचीत अपनानी होगी. उसे संबोधित कर यों कहें-तुम ने मेरा यह सामान देखा है? यह पिता या पति या बेटी (किसी का भी नाम ले कर कहें) का दिया तोहफा था. याद जुड़ी है, देखा होगा तो दे देना या ढूंढ़ देना. पैसे का शक हो तो कहें-कहीं पैसे जमा करवाने थे, बहुत दिक्कत आ जाएगी, पैसे जरा ढूंढ़ देना. इस तरह उस में कुछ अच्छी बातें जगा कर आप सामान पा सकती हैं. हां, अगर आप को ऐसी बाई से छुटकारा चाहिए तो कुछ बहाने बना कर उसे काम से हटा दीजिए. उस पर चोरी का इलजाम लगा कर मत निकालिए. इस से बाहर जा कर बदले की भावना से वह आप को बदनाम कर सकती है और आप को दूसरी बाई ढूंढ़ने में मुश्किलें हो सकती हैं.

सर्वोपरि है आप का नजरिया, आप अपनी कीमती चीजों से लगाव जरूर रखिए मगर दांत से दबा कर नहीं. इंसानियत को ज्यादा महत्त्व दें, आप की सोहबत का असर आप की बाई पर भी होगा, निसंदेह.

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि घर में काम करने वाली बाई जरूरतों के महासागर में जीती हैं. उन के सामने सामानों और पैसों की नुमाइश से बचें. जितना हो सके, उसे सामान कपड़े, खानेपीने की अच्छी चीजें देती रहें. इस से उस में कृतज्ञता बनी रहेगी.

  • जल्दीबाजी में काम निबटाने वाली:  कुछ बाइयों को साफसफाई में आलस रहता है और किसी तरह काम निबटा कर निकल जाने की जल्दी रहती है. इन के कामों की शिकायतें आप को कोई फल नहीं देगा. उलटे, बाई आप पर खीझ जरूर जाएगी. तो क्या करें?

एक आसान उपाय यह हो सकता है कि उस के साथ काम में आप भी कभीकभी हाथ बंटाएं और अपनी मनचाही जगहों की सफाई करवा लीजिए. अगर आप उस के काम के वक्त फ्री नहीं हैं तो आप छुट्टी के दिन बाई के साथ मिल कर साफसफाई कर लें.

और हां, आलसी बाई को पहले दिन से काम के बारे में बता कर न रखें, वह निश्चित गायब रहेगी. जिस दिन आप अपनी बाई से अतिरिक्त काम करवाने वाली हैं उस दिन रोज के काम थोड़े कम रखिए और यथासंभव दैनिक काम पहले से इस तरह समेट लीजिए कि आप के घर का अतिरिक्त काम भी उस का अतिरिक्त समय खपाए बिना ही हो जाए. साथ ही, ईनाम के तौर पर उस दिन छोटामोटा ही सही, कुछ न कुछ तोहफे में उसे जरूर दें. प्रोत्साहन से अगली बार आप को सुविधा होगी.

  • अधिक छुट्टी करने वाली:  यह आम परेशानी, खास बन जाती है, इसलिए काम पर रखने से पहले छुट्टी की बात अवश्य कर लें. महीने में अधिकतम छुट्टी की सीमा तय करने के बाद बिन बताए उस के छुट्टी पर पैसे काटने का जिक्र जरूर करें. हां, उस के और उस के घर वालों की बीमारी व जरूरतों को आप को समझना भी होगा, तभी आप के साथ वह भी ईमानदार रह पाएगी.
  • इधरउधर की बातें करने वाली:  एक सभ्य स्त्री होने के नाते आप को बाई की इधरउधर बातें फैलाने की आदत निश्चित ही बुरी लगेगी. आप चिढ़ कर उसे धमकाती हैं, वह आप की बातें नमकमिर्च लगा कर बाहर कहती है. आखिकार, आप उसे काम से निकाल देती हैं. यह एक भंवर जैसा हो जाता है आप के लिए.

आप यह करें- उस से उम्मीद न करें कि उसे सभ्य नागरिक होने के तरीके पता होंगे. इतनी समझ की आशा उचित नहीं. और जब आप किसी से उम्मीद ही नहीं करतीं तो गुस्सा भी कम आता है. अब आप जब स्वयं उस की समझ की सीमा को स्वीकार कर चुकीं तो उसे इस तरह समझा सकती हैं-हमारी एक पहचान की बाई थी. उस की बुरी आदत थी. एक घर की बात दूसरे घर में कहने की. बाद में जब दोनों घर वालों में लड़ाई हो गई तो बेकार में वह बाई भी घसीटी गई और आखिर दोनों घरों से वह काम से हाथ धो बैठी. बदनामी हुई, सो अलग. क्या जरूरत है इस तरह की बातें फैलाने की- है कि नहीं? हमारे घर की बात कोई बाहर करे तो हम तो नहीं सहेंगे. इतना काफी होगा उस के समझने के लिए कि आप उसे ऐसा न करने की चेतावनी दे रही हैं.

साथ ही, आप भी उस के सामने फोन आदि पर किसी की शिकायतों का पिटारा खोल कर न बैठें. आप का अनुशासित रहना, उस का आप के सामने या आप के बारे में फूहड़ बनने से रोकेगा.

तो, व्यावहारिक रिश्ते में भर लें यों आत्मीयता की गरमाहट और बाइयों के नखरे को संभालने में आप हो जाएं पारंगत.

आरती कीजै टीचर लला की

अपने गांव के स्कूल के टीचरजी की पता नहीं किस दुश्मन ने शिकायत कर दी कि इन दिनों वे बरगद के पेड़ के नीचे बच्चों को बैठा कर अपनेआप कुरसी पर स्कूल की प्रार्थना के बाद से स्कूल छूटने तक ऊंघते रहते हैं. बच्चों को ही उन्हें झकझोरते हुए बताना पड़ता है, ‘टीचरजी, स्कूल की छुट्टी का समय हो गया है.’

बच्चों का शोर सुन कर टीचरजी कुरसी पर पसरे हुए जागते हैं, तो बच्चे कहते हैं, ‘टीचरजी जाग गए, भागो…’

मैं ने टीचरजी के विरोधी टोले से कई बार कहा भी, ‘‘अरे, इतनी भयंकर गरमी पड़ रही है. आग बुझाने के लिए आग पर पानी भी डालो, तो वह भी घी का काम करे. गरमी के दिन हैं, टीचरजी सोते हैं, तो सोने दो. गरमी के दिन होते ही सोने के दिन हैं, क्या जनता के क्या सरकार के.

‘‘पता नहीं, गांव वाले हाथ धो कर टीचरजी और पटवारी के पीछे क्यों पड़े रहते हैं? यह तो टीचरजी की शराफत है कि वे कम से कम बच्चों की क्लास में तो जा रहे हैं. बरगद के पेड़ के नीचे बच्चे ज्ञान नहीं तो आत्मज्ञान तो पा रहे हैं. क्या पता, कल इन बुद्धुओं में से कोई बुद्ध ही निकल आए.’’

पर टीचरजी के विरोधी नहीं माने, तो नहीं माने. कल फिर जब टीचरजी रोज की तरह कुरसी पर दिनदहाड़े सो रहे थे कि जांच अफसर तभी बाजू चढ़ाए स्कूल में आ धमके. तो साहब, विरोधियों का सीना फूल कर छप्पन हुआ कि टीचरजी तो रंगे हाथों पकड़े गए.

जांच अफसर आए, तो उन्होंने कुरसी पर सोए टीचरजी को जगाया. वे नहीं जागे, तो क्लास के मौनीटर से पास रखे घड़े से पानी का जग मंगवाया और टीचरजी के चेहरे पर छिड़कवाया, तब कहीं जा कर टीचरजी जागे. देखा तो सामने यमदूत से जांच अफसर. पर टीचरजी ठहरे ठूंठ. वे टस से मस न हुए.

जिले से आए जांच अफसर ने उन्हें डांटते हुए कहा, ‘‘हद है, जरा तो शर्म करो. पूरी पगार नहीं, तो कम से कम कुछ पैसा तो इन बच्चों पर खर्च करो.

‘‘अगर आप ऐसे ही अपना स्कूल चलाएंगे, तो ये बच्चे जहां पैदा हुए हैं, बूढ़े हो कर भी वहीं के वहीं रह जाएंगे. ऐसे में ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ का नारा फेल हो जाएगा.’’

टीचरजी पहले तो सब चुपचाप सुनते रहे, जब बात हद से आगे बढ़ गई, तो वे विनम्र हो कर बोले, ‘‘साहब, गुस्ताखी माफ. दरअसल, मैं इन बच्चों को कुंभकरण के बारे में पढ़ा रहा था. कुंभकरण कैसे सोता था, बस यही इन बच्चों को सो कर दिखा रहा था.

‘‘अब इस गांव में कोई सोने वाला न मिला, तो बच्चों को खुद ही कुरसी पर सो कर बता रहा था कि कुंभकरण इस तरह 6 महीने सोया रहता था, पर आप ने मुझे हफ्तेभर बाद ही जगा दिया.

‘‘अब बच्चे कैसे जानेंगे कि महीने में कितने दिन होते हैं? उन्हें तो लगेगा कि एक दिन का एक महीना होता है.’’

इतना कह कर टीचरजी मुसकराते हुए अपने विरोधी टोले को देखने लगे. जांच अफसर ने टीचरजी की पीठ थपथपाते हुए गांव वालों से कहा, ‘‘हे गांव वालो, तुम धन्य हो, जो तुम ने ऐसा होनहार टीचर पाया.

‘‘इन्होंने किताब में लिखे को सही माने में सच कर दिखाया. महीने में 30 दिन ही होते हैं, आप बच्चों को शान से बताइए. जब तक कुंभकरण की नींद पूरी नहीं होती, तब तक बच्चों के हित में आप भी इस सिस्टम की तरह सो जाइए.

‘‘हमारी सरकार भी सोती ही रहती है. प्रशासन भी सोता रहता है. यहां तक कि अकसर सांसद और विधायक भी होहल्ले के बीच सो रहे होते हैं.

‘‘टीचरजी, हम अभी आप का नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नौमिनेट करते हैं. अच्छा तो हम चलते हैं.’’

तो सब मिल कर बोलो, ‘आरती कीजै टीचर लला की, स्टूडैंट्स दलन, फेंकू कला की…’

एकतरफा निर्णय से कानून भी कठघरे में होगा

सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाहों को ले कर एक मामले में कहा है कि चाहे बाल विवाह मानव अधिकारों के खिलाफ हों और कितने ही घृणित हों, जिस संख्या में ये देश में हो रहे हैं इन का अपराधीकरण नहीं करा जाना चाहिए. यह ठीक है. देश में हर काम को अपराध घोषित करने की परंपरा सी चालू हो गई है.

पहले जियो और जीने दो का जो सिद्धांत कानून बनाने वाले दिमाग में रखते थे अब धर्मों के अनुयायी बन गए हैं कि जो भी कुछ करोगे, पाप करोगे और प्रायश्चित्त करोगे ही.

सुप्रीम कोर्ट के पास मामला गया था कि क्या सहमति से 15 व 17 वर्ष के लड़कीलड़के के यौन संबंध जायज हैं? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, सहमति हो अथवा न हो, अपराध घोषित करा है. 15 से 18 साल की विवाहित लड़की से पति के यौन संबंध अब तक अपराध नहीं थे.

पर असल बात तो यह है कि लड़कियों के यौन संबंध 13-14 साल की उम्र से सहमति से शुरू हो जाते हैं और इस कदर होते हैं कि अगर सभी को कानूनी दायरे में लाया गया तो अदालतों में सैकड़ों लड़के अपराधी बने दिखेंगे और सैकड़ों लड़कियां पीडि़ता के रूप में गवाह. यह नकारना कि 17-18 वर्ष की लड़कियों में यौन संबंध अपवाद हैं गलत होगा.

ये संबंध गलत हैं, इस में शक नहीं है पर इन्हें सामान्य अपराधों की गिनती में डालना भी सही नहीं होगा. हमउम्र नाबालिगों के यौन संबंधों को अपराध मान लिया गया तो दोनों के ऊपर जीवन भर का धब्बा लग जाएगा. लड़के को बालगृह की यातनाओं को भुगतने के लिए भेजना होगा और उस का कैरियर चौपट हो जाएगा तो लड़की पर धब्बा लग जाएगा कि वह चालू है. उस की भी पढ़ाईलिखाई चौपट हो जाएगी.

अगर नाबालिग स्कूली यौन संबंध सहमति से हों तो बहुत सावधानी से हैंडल होने चाहिए. हमारी पुलिस और अदालतें इस तरह की नाजुक स्थिति को संभालने लायक नहीं हैं. पुलिस ऐसे मामले में मातापिताओं को लूटने में लग जाती है और अदालतें तारीख पर तारीख डालने में. दोनों की सहज प्राकृतिक क्रिया उन्हें एक अंधेरे कुएं में डाल देती है.

यह भयावह स्थिति आज दिखती नहीं है, क्योंकि अपराध होते हुए भी कोई कानून का दरवाजा नहीं खटखटाता और मामला दबा कर रखा जाता है. लड़कों को डांटडपट दिया जाता है और लड़कियों को घरों में बंद कर दिया जाता है. अगर पुलिस को भनक लगने लगे और जैसा सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि सहमति से नाबालिगों के बीच बना यौन संबंध बलात्कार है, जिस में दोषी केवल लड़का है तो हर चौथा घर लपेटे में आ जाए तो बड़ी बात नहीं.

इस तरह के संवेदनशील पर प्राकृतिक मामलों को सुप्रीम कोर्ट, दूसरी अदालतें और पुलिस खाप पंचायतों की तरह सुलझाने की कोशिश कर रही हैं कि हर मामले में बिना अगरमगर सुने अपराधी घोषित कर दिया जाए और सजा दे दी जाए. पुलिस की कैद खाप पंचायतों की सजा से भी बदतर होती है.

बंदगी की खुली किस्मत, मिला ये बड़ा औफर

रिएलिटी शो ‘बिग बौस’ की पहचान इसका हिस्सा बनने वाले कंटेस्टेंट की किस्मत खोलने के लिए है. इस शो के धमाकेदार सीजन 11 के खत्म होने पर कुछ ऐसा ही ट्रेंड देखने को मिल रहा है. बिग बौस 11 को खत्म हुए ज्यादा वक्त नहीं बीता है लेकिन इस शो के कंटेस्टेंट की किस्मत बदलनी शुरू हो गई.

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बिग बौस खत्म होते ही जहां अर्शी को ‘बाहुबली’ प्रभास के साथ काम करने का मौका मिल गया है तो वहीं बंदगी की किस्मत भी खुल गई हैं. खबरों की मानें तो अर्शी खान के बाद बंदगी कालरा के हाथ भी एक बड़ा औफर लगा है. बंदगी ने एक फिल्म साइन कर दी है और जल्द ही उसकी शूटिंग शुरू होने जा रही हैं.

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बंदगी ने इस बात का खुलासा करते हुए कहा, ‘मुझे एक फिल्म औफर हुई है. इस फिल्म में मैं एक स्टैबलिश एक्टर के साथ काम करने जा रही हूं. फिल्म में अपने किरदार को लेकर मैं इससे ज्यादा जानकारी नहीं दे सकती. इस फिल्म को लेकर मैं काफी उत्साहित हूं.’

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इंटीमेट सीन के बारे में बंदगी ने कहा, ‘यह निर्भर करता है कि फिल्म की डिमांड क्या है. एक लिमिट तक तो ठीक है यानी कि जितना सेंसर बोर्ड इजाजत दें.

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बता दें कि बिग बौस के घर में बंदगी कालरा ने कौमनर के तौर पर एंट्री ली थी. एंट्री करने लेने के साथ ही बंदगी कालरा ने कहा था कि वह कौमनर्स की सेलिब्रिटी हैं. इस शो के शुरुआत में ही पुनीश शर्मा के साथ बढ़ती नजदीकियों के चलते बंदगी काफी चर्चा में आ गई थीं. बौस सीजन 11 के दौरान पुनीश और बंदगी ने एक दूसरे के साथ रिलेशनशिप की बात भी कबूली थी. शो खत्म होने के बाद भी अक्सर यह दोनों पार्टियां करते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करते रहते हैं.

रणबीर से ब्रेकअप के बाद मैं अकेली पड़ गई थी : दीपिका

बौलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण अपनी फिल्म पद्मावत को लेकर सुर्खियों में बनी हुई हैं. इस फिल्म में दीपिका ने अपनी दमदार एक्टिंग के दम पर सबको प्रभावित किया है. फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान रणवीर सिंह का हाथ थाम कर पहुंचने वाली दीपिका ने एक इंटरव्यू के दौरान अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दौर का खुलासा किया.

दीपिका रणवीर सिंह से पहले एक्टर रणबीर कपूर के साथ रिलेशनशिप में थीं, लेकिन कुछ साल एक दूसरे को डेट करने के बाद ये दोनों अलग हो गएं. इस ब्रेकअप का असर दीपिका पर काफी समय तक रहा. दीपिका ने एक इंटरव्यू के दौरान इस बात का भी खुलासा किया कि उन्होंने खुद को ब्रेकअप के साइड इफेक्ट्स से बचाने के लिए क्या-क्या किया.

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दीपिका और रणबीर कपूर एक साथ बचना ऐ हसीनों, तमाशा और ये जवानी है दीवानी जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं. ये दोनों ब्रेकअप के बाद भी कई बार एक दूसरे के साथ समय बिताते नजर आते रहे हैं. दीपिका ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि, ‘उनके लिए इस ब्रेकअप से निकलना आसान नहीं था.

वह एक सीरियस रिलेशनशिप में थीं और ब्रेकअप के बाद उन्हें सब बिखरा हुआ सा लगने लगा था. उन्हें लगा कि अचानक ये क्या हो गया’. दीपिका ने यहां ये भी बताया कि वह ब्रेकअप की वजह से डिप्रेशन में भी चली गई थीं.

वहीं जब शो के होस्ट ने उनके पूछा कि वह कैसे इस सब से बाहर निकली तो उन्होंने कहा, ‘मैं बहुत जल्दी किसी के साथ घुलती मिलती नहीं हूं. मैं घंटों लोगों को देखती रहती हूं. ब्रेकअप के बाद मैंने खुद को अकेलेपन से बचाने के लिए सिर्फ खुद को बिजी कर लिया. मैं लगातार काम करती रहती थी. मैंने खुद को काम में पूरी तरह डुबो लिया था जिससे मुझे शहर में अकेलापन ना लगे’.

इस दौरान उन्होंने ये भी कहा कि, ‘अब वह और रणबीर कपूर एक अच्छे दोस्त हैं इसी वजह से दोनों एक साथ काम भी कर पाते हैं’. बता दें दीपिका पिछले कुछ सालों से एक्टर रणवीर सिंह के साथ रिलेशनशिप में हैं. पिछले कुछ समय से इन दोनों की शादी को लेकर भी खबरें तेज हो गई हैं. हालांकि अभी तक इन दोनों ने अपने रिलेशनशिप को लेकर कुछ साफ नहीं कहा है.

अच्छा काम लोग पसंद करते हैं : ललित शौकीन

अपने शौक को जीना ही जिंदगी है. यह बात ललित शौकीन से बेहतर कौन जान सकता है. दिल्ली देहात के गांव दिचाऊं कलां में पैदा हुए ललित शौकीन के पिता महावीर सिंह दिल्ली पुलिस में एएसआई और मां प्रेमलता हाउस वाइफ हैं.

छठी जमात तक नजफगढ़ के सरकारी स्कूल में पढ़े ललित शौकीन ने बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कालेज से फिजिक्स में ग्रेजुएशन की. उन्हें स्कौलरशिप मिली तो अमेरिका से पीएचडी करने का बुलावा आ गया. साल 2008 में वहां गए. फिर फुलटाइम साइंटिस्ट की नौकरी की.

लेकिन ललित शौकीन के इरादे कुछ और ही थे. वे बचपन में कविताएं लिखा करते थे, लिहाजा उन का लेखन की ओर रुझान था. उन्होंने कला के क्षेत्र में हाथ आजमाने की सोची और एक कैमरा खरीदा. उस कैमरे की कीमत तकरीबन 3 लाख रुपए थी जिस को ले कर उन की मां बड़ी नाराज हुईं और उन्हें कोस दिया.

ललित शौकीन ने उसी कोसने को ले कर 2-4 मिनट का एक वीडियो ‘मौम, मी ऐंड डीएसएलआर’ बना दिया. उस के बाद तो उन के वीडियो यूट्यूब पर धूम मचाने लगे.

ललित शौकीन की उपलब्धियों पर हरियाणा सरकार ने इस साल ‘हरियाणा प्रवासी दिवस’ के मौके पर उन्हें गुड़गांव में ‘हरियाणा गौरव सम्मान’ भी दिया. पेश हैं, हरियाणवी हास्य को ग्लोबल बनाने वाले ललित शौकीन से की गई बातचीत के खास अंश:

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आप पेशे से वैज्ञानिक हैं, फिर आप को इस तरह के छोटे हास्य वीडियो बनाने का विचार कैसे आया?

मैं ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कालेज से बीएससी और एमएससी की थी. इस के बाद मुझे और मेरी गर्लफ्रैंड नेहा, जो मेरे ही साथ पढ़ती थीं, को अमेरिका की यूनिवर्सिटी सैंट्रल फ्लोरिडा से स्कौलरशिप मिल गई. यह साल 2008 की बात है. 4 साल के बाद मेरी पीएचडी हुई. फिर मुझे न्यूयौर्क में नौकरी मिल गई.

कालेज टाइम तक मेरा रुझान केवल पढ़ाई में था. ऐक्टिंग के बारे में तो कभी सोचा नहीं था. मैं कभी स्टेज पर भी नहीं चढ़ा था. लेकिन मुझे फिल्म मेकिंग का शौक था. उसी शौक को पूरा करने के लिए मैं ने एक कैमरा खरीदा था. वह कैमरा 3 लाख रुपए का था. मां को बताया तो उन का डायलौग था कि अब तू पीएचडी कर के शादियों में फोटो खींचेगा  वह बड़ा मजाकिया वाकिआ था. मैं ने उस का वीडियो बनाया जिस में मां को भी शामिल कर लिया. यह जुलाई, 2015 की बात है.

उस वीडियो में हमारी बोली में हरियाणवी लहजा था. मुझे लगा कि हरियाणवी में ऐसे वीडियो बनाने का आइडिया भी अच्छा है. तब तक किसी ने हरियाणवी भाषा में इस तरह अपनी फैमिली को ले कर मजाकिया वीडियो नहीं बनाए थे. उस वीडियो को यूट्यूब पर काफी पसंद किया गया.

एक वीडियो को बनाने में कितना समय लग सकता है?

पहले हम कोई आइडिया सोचते हैं. मेरे ज्यादातर आइडिया खुद के होते हैं. जो घटनाएं मेरे साथ हुई होती हैं, उन पर ही ज्यादा फोकस करता हूं. जैसे मेरे परिवार की कोई बात, स्कूल या कालेज के वक्त के वाकिए वगैरह. इन्हीं चीजों से हमारे दर्शक खुद को अच्छी तरह जोड़ पाते हैं.

आप के अब तक कितने वीडियो वायरल हो चुके हैं?

हमारे 130 वीडियो आ चुके हैं. हमारे यूट्यूब पर 10 लाख सब्सक्राइबर हो गए हैं. जब से भारत में इंटरनैट की क्रांति आई है, तब से हमारे दर्शक भी बहुत तेजी से बढ़े हैं.

आप के किस तरह के वीडियो को दर्शकों ने ज्यादा पसंद किया है?

मेरे स्कूल टाइम कोे ले कर बनाए गए वीडियो को बहुत पसंद किया गया है. एक वीडियो थी ‘पनिशमैंट इन स्कूल : बौयज वर्सेस गर्ल्स’ जो बहुत चली थी. ऐसे वीडियो बच्चों को बहुत पसंद आते हैं. बड़ों को भी अपने स्कूली दिन याद आ जाते हैं.

आप के वीडियो लोगों की तारीफ पाएं, इस के लिए कौमेडी कितनी कारगर साबित हुई?

बहुत कारगर साबित हुई है. अपने वीडियो में मैं ने अभी तक सिर्फ कौमेडी ही की है.

आप के वीडियो में हरियाणवी भाषा का पुट रहता है, क्या इस से आप के दर्शक सीमित नहीं रह जाते हैं?

दर्शकों के सीमित रहने का रिस्क तो रहता है. लेकिन मैं हरियाणवी को हिंदीअंगरेजी के साथ मिक्स करने की कोशिश करता हूं. हरियाणवी के मुश्किल शब्दों को अपनाने से बचता हूं.

भोजपुरी और पंजाबी भाषा में बनी फिल्मों ने दर्शकों में अपनी जड़ें जमा ली हैं, लेकिन हरियाणवी भाषा में न के बराबर फिल्में बनती हैं. आप इस की क्या वजह मानते हैं, जबकि हिंदी फिल्म ‘सुलतान’ और ‘दंगल’ ने इसी भाषा का इस्तेमाल कर के शानदार कामयाबी पाई है.

फिल्मों में परोसी गई सामग्री सब से ज्यादा अहम होती है. मैं ने तो ऐसी कोई हरियाणवी फिल्म देखी ही नहीं जिस के बारे में कहा जा सके कि कितनी बढि़या फिल्म है. ‘सुलतान’ और ‘दंगल’ तो बौलीवुड की फिल्में हैं. उन्हें हम हरियाणवी नहीं कह सकते. हां, ऐसी फिल्मों को देख कर यह हौसला तो बढ़ा ही है कि आप हरियाणवी में भी अच्छी फिल्में बना सकते हैं. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि आप उस फिल्म में दर्शकों के सामने परोस क्या रहे हैं. जीजासाली की बेहूदा कौमेडी नहीं चलेगी. कोई अच्छा काम करेगा तो बिलकुल चलेगा.

क्या आप भी बड़े परदे के लिए फिल्म बनाना चाहते हैं?

अभी थोड़ा समय लगेगा. मैं कुछ कहानियों पर काम कर रहा हूं. अभी तो मैं इसी काम पर फोकस कर रहा हूं. हां, हमारी फिल्म कौमेडी पर बनी फैमिली फिल्म होगी.

आप कलाकारों का चयन कैसे करते हैं?

जब मैं कोई कहानी लिखता हूं तो किरदार मेरे जेहन में होता है. उसी हिसाब से कलाकारों को चुनता हूं. जब हम अमेरिका में वीडियो बनाते थे तो वहां सीमित लोग थे. यहां भारत में थोड़ी आजादी मिल गई  है. यहां लोकेशन बढ़ जाती है. खेतखलिहान आ जाते हैं. कलाकार भी ज्यादा हो जाते हैं.

आप के वीडियो पर किया गया कोई बैस्ट कमैंट?

कमैंट तो हर तरह के आते हैं. तारीफ के भी होते हैं. कैंसर की बीमारी से जूझ रहे हमारे दर्शकों के बड़े इमोशनल मैसेज आते हैं. एक बार एक बच्चे ने कहा था कि मेरी दादी को कैंसर है जो लास्ट स्टेज पर है. वे सिर्फ आप के वीडियो देख कर हंसती हैं वरना सारा दिन उदास रहती हैं. ऐसे मैसेज से हमें भी लगता है कि हम समाज को कुछ अच्छा दे रहे हैं.

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