धर्मप्रचार के साइड इफैक्ट्स हैं बड़े खतरनाक

सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ जिसे लोगों ने बेहद दिलचस्पी से देखा. वीडियो में युवती एक समारोह में उभरते युवा धर्मगुरु से सवाल पूछती दिखाई दे रही है. युवती के हावभाव और सवाल दोनों आक्रामक हैं. पहली नजर में देखते ही आभास होता है कि वह धर्म के नाम पर बरबाद होती सामग्री को ले कर व्यथित और आक्रोशित है.

यह वीडियो एक धार्मिक चैनल का हिस्सा है जिस में सिंहासननुमा कुरसी पर बाबा विराजमान हैं और नीचे पांडाल में खासी तादाद में श्रद्धालु बैठे हैं. माइक युवती के हाथ में आता है और वह बाबा से सवाल करती दिखाई दे रही है कि इस साल होली पर एक जगह बहुत बड़ा पेड़ जलाया गया, आखिर क्यों  एक छोटे से पौधे को पेड़ बनने में सालों लग जाते हैं और लोग उसे धर्म के नाम पर कुछ मिनटों में जला डालते हैं. अगर होली जलानी ही है तो कम से कम लकडि़यों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता  आखिर धर्म के नाम पर बरबादी क्यों बाबा इस सवाल पर सकपकाए से दिखते हैं, फिर थोड़ा संभल कर युवती का परिचय पूछते हैं. बाबा को सकपकाता देख युवती की हिम्मत बढ़ती है और वह फिर शिव अभिषेक में बड़े पैमाने पर की जाने वाली दूध की बरबादी पर सवाल दाग देती है.

चूंकि सवालों में दम है इसलिए पांडाल में खामोशी सी छा जाती है. इसी बीच, जादू के जोर से युवती का पिता प्रकट होता है और माइक के जरिए बाबा को बताता है कि यह उस की बेटी है जो धर्म के बारे में ऐसे ऊटपटांग यानी निरर्थक सवाल करती रहती है, इसलिए इसे आप की शरण में लाया हूं. युवती का पिता बाबा को जानबूझ कर बताता लगता है कि उस की बेटी कौन्वैंट स्कूल में पढ़ी है. इस पर बाबा ज्ञानियों की तरह मुसकरा कर कहते हैं कि तभी तो ऐसे सवाल कर रही है.

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युवती की भड़ास निकल जाने के बाद बाबा थोड़ी श्रापनुमा आक्रामक मुद्रा में आ जाता है. वह युवती से मंदिर जाने के नियम पूछता है और उस के जवाबों की बिना पर मौजूद भक्तों को यह जताने में कामयाब रहता है कि यह नई पीढ़ी है ही नास्तिक और अज्ञानी, इसलिए वह ऐसे बेहूदे सवाल पूछती है. बातचीत के दौरान बाबा टूटीफूटी अंगरेजी का भी उपयोग करता नजर आता है और युवती को ‘यार’ संबोधन इस्तेमाल करने पर डपटता भी है. इस से सिद्ध हो जाता है कि युवती पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता से प्रभावित है, इसलिए नास्तिक सी है और हमारे धर्म व संस्कारों से नावाकिफ है.

अव्वल तो इतने से ही लोग मान जाते हैं कि लड़की नादान है पर युवती की जिज्ञासाओं का समाधान होना चाहिए, इसलिए इस डिबेट के क्लाइमैक्स पर सभी की नजरें बाबा पर ठहर जाती हैं. बाबा बताते हैं कि अगर तुम्हारे मांबाप ने जिंदगीभर लाखों रुपए कमाए हैं तो बुढ़ापे में तुम उन के इलाज पर उन के पैसों को खर्च करोगी या फिर गरीबों को दान दे दोगी. अपने जवाब को विस्तार देते बाबा शाश्वत और सनातनी मुद्दे की इस बात पर आ जाता है कि इस सृष्टि में जो भी कुछ है वह सबकुछ शिव का है. वह हम से कुछ मांगता नहीं, पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उस के सबकुछ में से कुछ हम उसे दें और ऐसा कर हम कोई उपकार नहीं करते बल्कि सृष्टि के रचयिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं और पाप की कमाई को पुण्य में तबदील करते हैं.

पांडाल में बैठे भक्त नास्तिक सी युवती को हारते देख तालियां पीटने लगते हैं जो इस बात पर बाबा से सहमत हो जाती है कि अब वह भी शिव अभिषेक करेगी क्योंकि वह उस का महत्त्व नहीं जानती और करने लगेगी तो धीरे धीरे जान जाएगी.

यह वीडियो करोड़ों लोगों ने देखा और बाबा की खोखली तर्कशीलता के कायल हो गए कि क्यों खामखां के सवालों, जिज्ञासाओं और दलीलों में सिर खपाएं, बेहतर तो यही है कि चुपचाप पूरी आस्था से यह मान लें कि सबकुछ ऊपर वाले का है, वही हमें देता है. अब इस में से कुछ पूजापाठ, दानदक्षिणा और चढ़ावे के जरिए उस का उस को लौटा देना कोई गुनाह नहीं, बल्कि पुण्य का काम है. रही बात युवा पीढ़ी की, तो उस के बारे में बाबा ठीक कह रहे हैं कि वह भटकाव का शिकार हैं. वह गंदी फिल्में देखती है, इसलिए उस में धर्म के जरिए सुधार की जरूरत है जो कर्मकांडों से और श्रद्धा, आस्था से आ पाएगा.

मीडिया बना जरिया

मध्य प्रदेश के देवास जिले के एक धार्मिक समारोह का यह वीडियो एक खास मकसद से वायरल किया गया था जिस से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सस्पैंस और दिलचस्प तरीके से धर्म की उक्त बात ‘तेरा, तुझ को अर्पण’ वाली पहुंचाई जा सके जिस से लोग, खासतौर से युवा, मुंह मोड़ रहे हैं. इस का मकसद कर्मकांड, दानदक्षिणा, पूजापाठ और यज्ञहवन का माहौल बनाए रखना है. धर्मभक्त परेश रावल की फिल्म ‘ओह माई गौड’ का उद्देश्य भी धर्म की पोल खोलना नहीं था, धर्म की पोल खोलने वालों को कुछ तर्क दे कर मुंह बंद कराना था. इस फिल्म में ईश्वर की उपस्थिति दर्शा कर पहले दृश्य से ही यह सिद्ध कर दिया गया था कि ईश्वर तो है चाहे जो तर्क दे दो.

सोशल मीडिया किस तरह धर्मप्रचार का अड्डा या केंद्र बन चुका है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. मीडिया व्यावसायिक हो जाए, यह हर्ज की बात नहीं, चिंता की बात मीडिया का धर्म का मुहताज हो जाना है. इस से बड़ी तादाद में लोग गुमराह और अंधविश्वासी हो रहे हैं.

अखबार धर्म संबंधित समाचारों, भविष्यफल और धार्मिक रचनाओं से भरे पड़े हैं तो न्यूज चैनल भी इस बीमारी से अछूते नहीं हैं. कोई दिन ऐसा खाली नहीं जाता जब हिंदीभाषाई चैनल धर्मप्रचार नहीं कर रहे होते. तरस तो तब ज्यादा आता है जब वे धर्म को सनसनी बना कर परोसते हैं कि देखिए, यहां भगवान राम और उन के भाइयों ने शिक्षा ली थी और यह रहा वह पाताललोक, जहां अहिरावण का राज्य था. ये चीजें पूरी शिद्दत से इस तरह से परोसी जाती हैं कि देखने वालों को लगने लगता है कि कुछ न कुछ तो सच इस में है. रामायण में जो लिखा है वह कोई कोरी कल्पना नहीं है.

जबकि, होता कुछ नहीं है. अखबारों का मकसद अपनी प्रसार संख्या और चैनल्स का मकसद अंधभक्तों को आकर्षित करना व सूचना देना होता है. धर्म को शाश्वत बनाए रखने में मीडिया का योगदान बाबाओं से कमतर नहीं, जो बगैर सोचेसमझे बड़े पैमाने पर सामाजिक नुकसान का जिम्मेदार हो चला है जबकि उस की असली जिम्मेदारी सामाजिक जागरूकता लाने की है.

भोपाल में पिछली नवरात्रि के मौके पर एक नामी अखबार ने तो मशहूर राम कथावाचक मुरारी बापू का धार्मिक समारोह, जो हफ्तेभर चला, प्रायोजित कर डाला. शहर के हर चौराहे पर कथावाचक के बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगाए गए. अखबार में रोज विज्ञापन और समारोह के बड़ेबड़े समाचार छापे गए. रामकथा के इस धुआंधार प्रचार का नतीजा ही था जो लाखों लोग इस में शिरकत करने को टूट पड़े. करोड़ों रुपए इस आयोजन पर खर्च हुए. एवज में भक्तों को हासिल हुए वे प्रवचन जो सदियों से गुमराह करने के लिए परोसे जा रहे हैं.

कथा स्थल पर इफरात से धार्मिक साहित्य और सामग्री बिके. लोग, खासतौर से औरतें, प्रवचनों के दौरान नाचते नजर आए. यह नजारा सोचने को विवश कर गया कि आखिर इस माहौल का असर क्या होगा और समाज को किस दिशा की ओर मोड़ा जा रहा है.

खतरनाक असर

देश बहुसंख्य हिंदुओं का है जो कहने को ही धर्मनिरपेक्ष हैं. हिंदुओं में यों तो हर रोज कोई न कोई त्योहार होता है पर हर पखवाड़े एक ऐसा त्योहार भी पड़ता है जिसे धूमधाम से मनाया जाता है.

धर्म की गिरफ्त में आते समाज की हालत यह है कि लोग बगैर सोचेसमझे, बेमकसद झूम रहे हैं और कट्टरवाद बढ़ रहा है. सोशल मीडिया पर काम की और उपयोगी बातें कम होती हैं, रामराम, श्यामश्याम ज्यादा होती हैं.

इधर, बाबाओं ने भी रंग बदलते, अपने आयोजनों और प्रवचनों में नईनई बातें कहनी शुरू कर दी हैं ताकि नयापन दिखे. चालाकी दिखाते साधु, संत, बाबा और प्रवचनकर्ता अब सामाजिक सरोकारों पर जोर देने लगे हैं. मसलन, पर्यावरण के लिए पेड़ लगाओ और उन्हें काटो मत व कन्याभ्रूण की हत्या मत करो यह पाप है वगैरावगैरा. ये गौरक्षा की बात करते हैं उस में देवताओं का वास होने की दुहाई दे कर, पर यह नहीं कहते कि गाय का अपना अलग आर्थिक महत्त्व है, वह दूध देती है और उस का चमड़ा व्यावसायिक उपयोग में लाया जाता है. इसी तरह ये भविष्य के लिए पानी बचाने की बात नहीं कहते, बल्कि नदियों को पूजने के लिए उकसाते हैं ताकि पंडों को पैसा मिलता रहे.

हास्यास्पद बात यह है कि इन्हीं आयोजनों में यज्ञहवन के लिए इफरात से लकडि़यां जलाई जाती हैं. यानी धर्म और उस के दुकानदार कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं करते. उलटे, यह जताने की कोशिश करते हैं कि उन के भी सामाजिक सरोकार हैं और लोग इस की आड़ में भी धर्म से जुड़े रह सकते हैं.

एक पूरी पीढ़ी दिमागीतौर पर एक बार फिर अपाहिज बनाई जा रही है. कोई वीडियो इसीलिए जानबूझ कर एक साजिश के तहत वायरल किया जाता है कि जिस से लोग लकडि़यां फूंकते रहें. अभिषेक के नाम पर दूध बहाते रहें और यह न पूछें कि आखिर यह बरबादी क्योें  रही बात गरीबों की मदद की, तो इस बाबत प्रवचनों में स्पष्ट कर दिया जाता है कि यह सबकुछ माया और मिथ्या है. हर आदमी अपने कर्मों के मुताबिक फल भुगत रहा है. इस ईश्वरीय व्यवस्था में हस्तक्षेप से कोई फायदा नहीं. गरीबों की मदद ऐच्छिक बात है.

भोपाल में मोरारी बापू ने 7 दिनों तक तरहतरह से यही सुनाया कि सबकुछ करो पर धर्म और संस्कारों को मत छोड़ो. लड़कियां पढ़ें, यह हर्ज की बात नहीं पर उन्हें संस्कारों का ध्यान रखना चाहिए. युवा तकनीकी तौर पर शिक्षित हों पर धर्म को न भूलें, वरना भटकाव का शिकार हो जाएंगे. इन की नजर में संस्कार का एक ही मतलब होता है कि पूजापाठ करो, दक्षिणा देते रहो.

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आत्मविश्वास छीनता धर्म

धर्म का प्रचारप्रसार, दरअसल, लोगों से आत्मविश्वास छीन रहा है. रोजमर्राई जीवन में अज्ञात आशंकाएं हावी होती जा रही हैं. लोगों ने मान लिया है कि उन की परेशानियों की वजह उन के कर्म हैं और प्रारब्ध को बदला नहीं सकता. जो लिखा है वह हो कर रहेगा. अब अगर किसी काल्पनिक अनिष्ट से बचना है तो दानदक्षिणा देते रहो और पूजापाठ में लगे रहो.

यह वह दौर है जिस में लोग सब से ज्यादा परेशानियों से जूझ रहे हैं. बेरोजगारी चरम पर है और धर्म के प्रभाव के चलते शिक्षा अपना प्रभाव, महत्त्व व उपयोगिता खो रही है. यदि शिक्षित हो गए तो वह भी ऊपर वाले की मेहरबानी है. आप को रोजगार मिल गया तो यह पूजापाठ और अभिषेकों का फल है. मकान, कार और दूसरी तमाम सुखसुविधाएं धर्म की देन हैं, उन में आप की मेहनत और काबिलीयत का कोई योगदान नहीं.

भेड़चाल चलते लोग कैसे इस सम्मोहन और भ्रम की गिरफ्त में लिए जाते हैं, यह बात कम ही लोग समझ पाते हैं. दरअसल, उन्हें तरहतरह से डराया जाता है. जीवन की नश्वरता और जगत का मिथ्या होना बारबार इतनी और इस तरह से दोहराया जाता है कि लोग अपनी स्वभाविक जिंदगी नहीं जी पा रहे. लोग तर्क नहीं करते, न ही

अब सवाल पूछते हैं कि ऐसा क्यों

और ऐसा क्यों नहीं, बल्कि धर्म के ग्लैमर की गिरफ्त में आ कर खुद को ही अज्ञात आशंकाओं से बचाने में भलाई समझते हैं.

यह बड़ा सस्ता सौदा है कि कमाई का कुछ हिस्सा इस माहौल को बनाए रखने वालों को दान में दे दो और भूल जाओ कि इस के नतीजे क्या निकलेंगे और कैसेकैसे निकल भी रहे हैं. मामूली सी परेशानी को झेलने की ताकत खोते लोग तुरंत मंदिर की तरफ भागते हैं. वहां उन्हें सुरक्षा महसूस होती है. वे परेशानी से लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. इस से होता यह है कि परेशानी ज्यों की त्यों रहती है जबकि उन में डर की मात्रा बढ़ती जाती है.

आत्मविश्वास खोने के मामले में महिलाएं तो पुरुषों से भी एक कदम आगे हैं. बच्चों की स्कूलबस 10 मिनट भी लेट हो जाए तो वे इस की वजहें समझने की कोशिश नहीं करतीं कि ट्रैफिक ज्यादा होगा, बस खराब भी हो सकती है और मुमकिन है किसी वजह से स्कूल से ही बस देर से चली हो. वे तुरंत बगल वाले मंदिर में बैठी मूर्ति को प्रसाद बोल देती हैं और जब कुछ देर बाद बस आती दिखती है तो भगवान को धन्यवाद देते प्रसाद चढ़ा भी देती हैं. यह एक छोटा सा उदाहरण है वरना तो परेशानी के दायरे के मुताबिक प्रसाद और दानदक्षिणा की राशि बढ़ती जाती है.

यह वह दौर है जिस में लड़कियों की शादी के लिए लड़के मन्नतों के जरिए ढूंढ़े जाते हैं. लड़कों की नौकरियों के लिए ब्रैंडेड बाबाओं के चक्कर काटे जाते हैं. बीमारी का इलाज तो डाक्टर से कराया जाता है पर मनाया भगवान को जाता है कि हे प्रभु, पति को जल्द ठीक कर दो, इतने व्रत रखूंगी और उतने का प्रसाद चढ़ाऊंगी.

इसलिए बढ़ रहा कट्टरवाद

इन छोटीमोटी रोजमर्राई बातों का असर बड़े खतरनाक तौर पर बड़े पैमाने पर देखने में आता है. ये अंधविश्वास, कट्टरवाद की जनक भी हैं. जब कहने को और मांगने को कुछ नहीं होता तो लोगों का धार्मिक चोला दूसरे धर्मों की आलोचना में जुट जाता है.

इसलामिक कट्टरवाद बढ़ रहा है, यह अकसर कहा जाता है क्योंकि इस के भी उदाहरण सहज मिल जाते हैं. अंदरूनी तौर पर बड़े पैमाने पर प्रचार यह होता है कि उदार आधुनिक और वैज्ञानिक सोच के दिखने के चक्कर में हिंदू अपने धर्म, संस्कृति, रीतिरिवाजों और पूजापाठ से कटते जा रहे हैं, इसलिए मुसलमान हावी हो रहे हैं, उन की जनसंख्या बढ़ रही है और वे पांचों वक्त की नमाज पढ़ते हैं, इसलिए उन में एकता है.

पूजापाठ और धर्मांधता बढ़ने और बढ़ाए जाने की एक वजह दूसरे धर्मों से इस तरह बैर करना सिखाया जाना भी है कि एक दिन ऐसा आएगा जब तुम अपने ही देश में बेगाने, बेचारे और अल्पसंख्यक हो कर पहले की तरह गुलाम हो जाओगे.

इसलाम, ईसाई या दुनिया का कोई भी दूसरा धर्म इस मानसिकता का अपवाद नहीं है. अमेरिका में हो रही नस्लीय हिंसा इस की जीतीजागती मिसाल है. वहां डोनाल्ड ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद चुनचुन कर एशियाई मूल के लोगों को खदेड़ा जा रहा है, उन की हत्याएं की जा रही हैं. इन में भारतीय भी शामिल हैं. बहुत सपाट लहजे में कहें तो राम, हनुमान या शंकर अमेरिका में भारतीयों की रक्षा कर पाने में असमर्थ हैं. इसी तरह भारत में अफ्रीकी मूल के लोगों को प्रताडि़त किया जा रहा है. दलित और आदिवासी तो यहां के मूल निवासी हो कर भी सामाजिक व धार्मिक प्रताड़ना के शिकार और उपेक्षित हैं.

साबित यह होता है कि चैन कहीं नहीं है. धर्म के नाम पर फसाद हर जगह हो रहे हैं. इस मसले पर कोई किसी से पिछड़ना नहीं चाहता. आत्मविश्वास की कमी लोगों को दुनियाभर में हिंसक बना रही है जिस का जिम्मेदार धर्म ही है जिसे काल मार्क्स ने अफीम का नशा यों ही नहीं कहा था. एक विराम के बाद, प्रचार के जरिए धार्मिक कट्टरवाद फिर सिर उठा रहा है, तो यह दुनियाभर के लिए चिंता की बात है.

पोप, मुल्ले और पंडे बेफिक्र हैं जो इस खेल को धर्मप्रचार व धर्मग्रंथों की आड़ में खेल रहे हैं. उन का मकसद बगैर कुछ करेधरे पैसे बनाना और ऐशोआराम की जिंदगी जीना है. सो, वे तो जी रहे हैं, परेशानी आम लोग उठा रहे हैं जो उन के ग्राहक और मोहरे बने हुए हैं.

आधार कार्ड : अधिकारों पर सरकारी चोट

वैसे तो आधार कार्ड भारत सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला एक पहचानपत्र है पर सरकार ने जिस तरह से आधार कार्ड का प्रयोग हर जगह करना शुरू किया है उस से यह आम नागरिकों के अधिकारों का हनन करता नजर आ रहा है. आधार को ले कर सरकार की यह जबरदस्ती है कि वह बैंक खाते से ले कर राशनकार्ड तक आधार को जोड़ रही है.

सरकार का काम जनता को सहूलियतें देना है. आधार कार्ड के जरिए सरकार जनता के सामने तमाम तरह की मुश्किलें खड़ी करती जा रही है. जनता को यह बताया जा रहा है कि इस से भ्रष्टाचार रुकेगा, जिस से महंगाई कम होगी. आधार कार्ड का सब से अधिक प्रयोग रसोईगैस में किया गया. रसोईगैस के आधार कार्ड से लिंक होने का जनता को क्या लाभ मिला  आधार कार्ड से रसोईगैस के लिंक होने की योजना के बाद अगर रसोईगैस की कालाबाजारी रुक गई होती तो रसोईगैस के दाम कम होने चाहिए थे. रसोईगैस के दामों में किसी भी तरह की कमी नहीं आई है. आज भी गैस सिलैंडर ब्लैक में मिल रहे हैं.

आधार कार्ड पर 12 नंबर की संख्या छपी होती है. जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण जारी करता है. यह संख्या भारत में कहीं भी व्यक्ति की पहचान और पते का प्रमाण होती है. भारत का रहने वाला हर नागरिक इस कार्ड को बनवा सकता है. इस में हर व्यक्ति केवल एक बार ही अपना नामांकन करा सकता है. यह कार्ड सरकार द्वारा बिना पैसे लिए बनाया जाता है.

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कानूनीरूप से आधार कार्ड एक पहचान मात्र है. यह भारत की नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है. इस के बाद भी जिस तरह से आधार कार्ड को ले कर सरकार जनता पर दबाव बना रही है वह उस की मनमरजी थोपने जैसा है. यह नागरिक अधिकारों के हनन जैसा है.

आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं माना जा रहा है. देश में पहचानपत्र के नाम पर मतदाता पहचानपत्र ही मान्य है. मतदाता पहचानपत्र की जगह पर आधार कार्ड को मान्यता देने का काम खतरनाक है. जनता के पास कई तरह के पहचानपत्र हैं. इन में राशनकार्ड, ड्राइविंग लाइसैंस, केंद्र सरकार के कर्मचारी का परिचयपत्र प्रमुख हैं. सरकार आधार कार्ड को पहचानपत्र के ऊपर रख रही है. आधार कार्ड को खास बनाने के लिए सरकार ने उस को रसोईगैस, पैन नंबर, मोबाइल नंबर और बैंक खाता नंबर से जोड़ने का काम किया है. बिना आधार कार्ड के आयकर रिटर्न भी दाखिल नहीं हो रहा है. इस के साथ ही, जमीनजायदाद की खरीदफरोख्त में रजिस्ट्री के समय भी आधार कार्ड जरूरी किया जा रहा है.

जायदाद और बैंक से आधार के जुड़ने से जनता की डोर सरकार के हाथों में चली जा रही है. इस से एक जंजीर सी बन रही है. यह जंजीर जनता के लिए ऐसी हथकड़ी बनती जा रही जिसे वह खुद अपने गले में डालने को मजबूर होती जा रही है. आधार को हर तरह से फूलप्रूफ व्यवस्था बताने वाली सरकार मतदाता पहचानपत्र को मजबूत बनाने का काम नहीं कर रही है. असल में वोट देने के सिस्टम में सरकार कोई सुधार नहीं करना चाहती है. सरकार को पता है कि वोटकार्ड में सुधार से फर्जी वोटिंग रुक सकती है, जो नेताओं के हित में नहीं है. सरकार खुद को जवाबदेही से मुक्त रखना चाहती है. आरटीआई से ले कर राजनीतिक दलों को चंदा देने तक को वह जवाबदेही के दायरे में नहीं लाना चाहती है. जनता से हर पारदर्शिता की बात करने वाले नेता खुद पारदर्शी व्यवस्था पर यकीन नहीं करते.

अपराधियों के घेरे में आधार

यह सच है कि आज के समय में आधार कार्ड आसानी से बिना पैसा खर्च किए बन जाता है. हालत यह है कि अब धोखाधड़ी कर के भी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश की स्पैशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफ ने कानपुर में ऐसे गिरोह को पकड़ा जो आधार कार्ड बनाने वाली संस्था यूआईडीएआई के सर्वर में सेंधमारी कर के आधार कार्ड बनाता था. गिरोह के लोगों ने ऐसा सौफ्टवेयर बना लिया था जो इस काम में मदद करता था. इस की मदद से फर्जी आधार कार्ड धड़ल्ले से बन रहे थे.

यूआईडीएआई के डिप्टी डायरैक्टर ने इस बात की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी. पुलिस को जांच में पता चला कि यह काम कानपुर की विश्व बैंक कालोनी में रहने वाले सौरभ सिंह और उस के साथियों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है.

विश्व बैंक कालोनी कानपुर शहर के बर्रा थाना क्षेत्र में आती है. पुलिस ने 9 सितंबर को सौरभ को पकड़ा तो उस ने अपने पूरे गिरोह का खुलासा किया. जिस के आधार पर पुलिस ने 10 और लोगों को पकड़ा. इन में शुभम सिंह, सत्येंद्र, तुलसीराम, कुलदीप, चमन गुप्ता और गुड्डू गोंड शामिल थे. ये लोग कानपुर, फतेहपुर, मैनपुरी, प्रतापगढ़, हरदोई और आजमगढ़ के रहने वाले थे. ये लोग यूआईडीएआई के बायोमैट्रिक मानकों को बाइपास कर के फर्जी आधार कार्ड बनाने का काम करते थे.

एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश ने बताया कि आधार बनाने वाले गिरोह के सदस्य बायोमैट्रिक डिवाइस से अधिकृत औपरेटर से फिंगर प्रिंट ले लेते थे. उस के बाद बटरपेपर पर लेजर से प्रिंटआउट निकालते थे और कृत्रिम फिंगर प्रिंट निकालते थे.

इस कृत्रिम प्रिंट का उपयोग कर के आधार कार्ड की वैबसाइट पर लौगइन कर के इनरोलमैंट की प्रक्रिया की जाती थी. जब हैकर्स द्वारा क्लोन फिंगर प्रिंट बनाए जाने लगे तो यूआईडीएआई

ने फिंगर प्रिंट के साथ ही साथ आईआरआईएस यानी रेटिना स्कैनर को भी प्रोसैस का हिस्सा बना दिया. तब गिरोह ने इस का भी क्लाइंट एप्लीकेशन बना लिया. जिस से वे फिंगर प्रिंट और आईआरआईएस दोनों को बाईपास कर ने में सफल हो गए. यह सौफ्टवेयर

5-5 हजार रुपए में बेचा जाने लगा. इस तरह एक औपरेटर की आईडी पर कई मशीनें काम करने लगीं. इस गिरोह के पास पुलिस को 11 लैपटौप, 12 मोबाइल, 18 फर्जी आधार कार्ड, 46 फर्जी फिंगर प्रिंट, 2 फिंगर प्रिंट स्कैनर, 2 रेटिना स्कैनर और साथ में आधार कार्ड बनाने वाले दूसरे सामान भी मिले.

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पुलिस को अभी तक यह पता नहीं है कि इस गिरोह ने कितने फर्जी आधार कार्ड बनाए होंगे. आधार कार्ड बनाने वाले फर्जी औपरेटर का पता लगा कर पुलिस ने यूआईडीएआई को जानकारी दे दी है. यूआईडीएआई से मिली जानकारी के अनुसार, पूरे देश में करीब 81 लाख आधार कार्ड निष्क्रिय किए गए हैं.

सरकार जिस आधार कार्ड पर भरोसा कर के देश की हर बीमारी का हल आधार कार्ड में तलाश कर रही है वही आधार कार्ड इतनी बड़ी संख्या में फर्जी निकल रहे हैं. जिस तरह से सरकार ने हर काम में आधार को जोड़ने का काम शुरू किया, उस से बड़ी संख्या में आधार कार्ड का फर्जीवाड़ा होने लगा है. इस की तमाम तरह की खबरें पूरे देश से आ रही हैं. केवल आधार को एकमात्र हल मान कर हर जगह आधार की जरूरत बताई जा रही है, जबकि इस से जनता की गोपनीयता को खतरा पैदा हो रहा है.

गोपनीयता को खतरा

पहले बैंक खाता, पैन कार्ड को आधार से लिंक करने के  बाद अब मोबाइल नंबर को आधार नंबर से लिंक किया जाएगा. सरकार ने फरवरी 2018 तक इस काम को पूरा करने का लक्ष्य रखा है. असल में सरकार जनता को यह बता रही है कि मोबाइल फोन के आधार से लिंक होने से फर्जी मोबाइल नंबर बंद हो जाएंगे, जिस से तमाम तरह के अपराध खत्म हो जाएंगे. आधार कार्ड बैंक खातों और पैन नंबर से लिंक्ड है. साथ में खाताधारकों की व्यक्तिगत जानकारी उस में है. ऐसे में अपराधियों के लिए बैंक के खाते से पैसा निकालने के लिए मोबाइल पर ओटीपी कोड हासिल करना सरल हो जाएगा. जिस से बैंक से पैसा बहुत आराम से निकल जाएगा और खाताधारक को पता ही नहीं चलेगा. यही नहीं, किसी साइबर अपराधी को किसी व्यक्ति का केवल आधार नंबर मिल जाए तो वह उस की पूरी गोपनीय जानकारी हासिल कर सकता है.

जनता को आधार कार्ड के लाभ बताने के लिए सरकार कहती है कि आधार कार्ड जीवनभर की पहचान है, आधार कार्ड को हर सब्सिडी के लिए जरूरी बना दिया गया है. यही नहीं, सरकार द्वारा तमाम तरह के कंपीटिशन के लिए फौर्म भरने से ले कर मार्कशीट तक में इस को जोड़ा जा रहा है. ट्रेन में टिकट में छूट पाने के लिए आधार कार्ड एक सहारा है. अब यह जन्म प्रमाणपत्र से ले कर मृत्यु प्रमाणपत्र तक में जरूरी हो गया है. रिटायर होने वाले कर्मचारियों के लिए पीएफ लेने में यह जरूरी हो गया है.

सरकार ने जिस तरह से आधार कार्ड का महिमामंडन किया है उस से यह उपयोगी कम, सिरदर्द अधिक बन गया है. चूंकि आधार कार्ड भी फर्जी तरह से बनने लगे हैं, इसलिए यह साफ है कि आधार भी उतना सुरक्षित नहीं है जितना सरकार दावा कर रही है. ऐसे में सारी जानकारी एक ही जगह देनी परेशानी का सबब बन सकता है.

सर चीयर्स डौंट फीयर्स

धरती पर धर्म की जडे़ं मजबूती से जमाने का ठेका लिए, मौडर्न संस्कृति की हिफाजत के लिए पैदा हुए तन, मन और अंधभक्तों के धन के बलबूते अनगिनत शोषणों में लीन एक आत्मा कोर्ट से बाइज्जत बरी होने के बाद ब्रह्मलोक में जाने के बजाय यमराज के दरबार में पहुंची तो यमराज उसे देख कर डर गए.

सदियों से किस्मकिस्म की आत्माओं का सामना करते रहने वाले यमराज उस वक्त उस आत्मा का सामना नहीं कर पा रहे थे. उन्हें लग रहा था जैसे वे भीतर ही भीतर डर रहे हैं, कमजोर पड़ रहे हैं. कभी वे उस आत्मा को देख कर घबरा रहे थे तो कभी उस के साथ सच्चा सौदा करने से कतरा रहे थे. पहली बार उन्होंने महसूस किया कि वे कमजोर पड़ते जा रहे हैं.

तब पहली बार बड़ी देर बाद यमराज का कोर्ट चालू हुआ. अनगिनत शोषणों में शामिल वह आत्मा जब सिर गर्व से ऊंचा किए यमदूतों के साथ यमराज के कोर्ट में पेश हुई तो यमराज ने उस के स्वागत में अपना सिर नीचा कर लिया.

यमराज ने पंचकुला में हुए हादसे से सीख लेते हुए वैसे तो यमलोक में फैसला सुनाने से पहले ही सिक्योरिटी के पुख्ता इंतजाम कर रखे थे, पर फिर भी पता नहीं अब की बार उन्हें अपनी व्यवस्था पर यकीन क्यों नही रहा था?

इस से पहले कि आत्मा के कल्याण की कानूनी प्रकिया शुरू होती, डरेडरे से यमराज चित्रगुप्त के कान में फुसफुसाए, ‘‘चित्रगुप्त, क्यों न इस धर्मपरायण आत्मा के केस की सुनवाई की अगली तारीख तय कर दी जाए? पता नहीं क्यों आज मेरे सिर में दर्द हो रहा है.

‘‘मुझे आज पहली बार जज की कुरसी पर बैठे हुए चक्कर से आ रहे हैं. पता नहीं मुझे आज क्यों सारा यमलोक जलने का डर सता रहा है. लग रहा है, जैसे सारा यमलोक जलने को बेचैन हो.’’

‘‘महाराज, इस आत्मा के यमलोक में हुए फैसले के बाद होने वाले दंगों की नाक में नकेल डालने के पुख्ता इंतजाम हो चुके हैं. दूसरे, यहां तो वे मरे हुए लोग हैं जो नीचे मरमर कर जीने के बाद ही पहुंचे हैं. जीतेजी जो अपने लिए नहीं लड़ सके, वे अब यहां आ कर क्या हुड़दंग मचाएंगे सर? आप कोई टैंशन न लें प्लीज.

‘‘आप बेखौफ हो कर अपना फैसला दे कर धर्मराज होने का एक बार फिर सुबूत दीजिए. हम ने कौन सा चुनाव में इस आत्मा केसमर्थकों के वोट लेने हैं या लिए हैं जो इसे सजा देने से हमें डरना है. हमें कौन से तांत्रिक हो कर लोकतांत्रिक चुनाव लड़ने हैं.’’

‘‘नहीं यार, नीचे जो हुआ उसे देख कर मेरे तो जज की कुरसी पर बैठने से पहले ही हाथपैर फूले जा रहे हैं. भूल गए अपने धर्म क्षेत्र में धर्म के रौकस्टार को जब बलात्कार से जुड़ा होने की सजा सुनाई गई थी तो उस के भक्तों ने कानून को धता बताते हुए क्याक्या किया था?’’

‘‘महाराज, वे उन के भक्त नहीं बल्कि समर्थक थे. समर्थक और भक्त में फर्क होता है. समर्थक राजनीति में होते हैं और भक्त भक्ति की फील्ड में. पर अब वहां उलटा हो चला है. सब गड़बड़ वहीं से हो रही है.

‘‘आज राजनीति में समर्थकों की जगह भक्तों ने ले ली है और भक्ति में भक्तों की जगह समर्थकों ने. हाड़मांस का नर जब अपने को नारायण के रूप में पेश करता है तो ऐसा ही होता है प्रभु,’’ चित्रगुप्त यमराज को फैसला देने के लिए उन्हें हिम्मत दिलाते हुए उन के कान में फुसफुसाए तो यमराज ने दोबारा कहा, ‘‘पर ऐसा क्यों हो रहा है चित्रगुप्त?’’

‘‘प्रभु, वहां नैतिकता पर अनैतिकता हावी है. जिस ने अपनी अनैतिकता को छिपाने के लिए चमत्कारी चोला पहना है वही आज समाज में असरदार है.

‘‘नैतिकता का चोला पहन कर माया से दूर रहने वाले सैकड़ों हाथों से माया जोड़ नहीं बल्कि बटोर रहे हैं.

‘‘सरकारें पिछले हादसों से सबक लेने के बजाय एकदूसरे को सबक सिखाने में जुटी हैं. औरतों की हिफाजत के दावे करने वाले यौन शोषण के केसों में चुप्पी साध रहे हैं और समर्थक अपने नकली भगवान को रो रहे हैं.

‘‘नीचे की सरकारें अपना काम करें या न, पर आप अपना काम कीजिए बस. कम से कम हमारी साख तो बची रहे. डरने की कोई बात नहीं है प्रभु. एक इश्तिहार भी कहता है कि डर के आगे जीत है.’’

‘‘एक बार डीजीपी से फिर पूछ लो कि सिक्योरिटी के इंतजाम सच में पूरी तरह चाकचौबंद हैं या…? वाईआरसीएफ के बल तैनात कर दिए गए हैं न?’’ यमराज ने अपनी बात रखी.

‘‘हांहां प्रभु, सब किया जा चुका है. आप बस…’’

‘‘हमारे पुलिस वाले उन के पुलिस वालों की तरह पीछे तो नहीं हटेंगे?’’

‘‘वे आप का नमक खाते हैं सर. नमकहरामी नहीं करेंगे. कीप इट अप.’’

‘‘तो उन के पुलिस वाले क्या खाते हैं?’’ यमराज ने पूछा.

‘‘अब मेरा और दिमाग न खाओ सर. यहां सब ठीक है प्रभु. मुझ पर भरोसा करो. आप डर क्यों रहे हो? इंसाफ कीजिए.

‘‘इस आत्मा के समर्थकों के हुड़दंग पर काबू पाने के लिए आठ लोकों से सशस्त्र बल बुला लिए गए हैं,’’ चित्रगुप्त झल्लाए.

‘‘कोर्ट… शु… कोरट शु … को…’’ इतना कहते हुए यमराज का गला अचानक फिचफिच करने लगा तो चित्रगुप्त ने जेब में हाथ डालने के बाद कुछ गोलियां सी निकाल कर उन के हाथ पर रखते कहा, ‘‘प्रभु, मिक्स की गोली लो, फिचफिच दूर करो.’’

चिकित्सा शिक्षा में सुधार की जरूरत

अमेरिका में अब मैडिकल कालेजों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा हो गई है. अश्वेत, लैटिनो भी बढ़ने लगे हैं. अब तक अमेरिकी चिकित्सा क्षेत्र मेल डौमिनेटेड और व्हाइट डौमिनेटेड था. अब नए कालेज भी खुल रहे हैं और विविधता भी आ रही है जबकि मैडिकल शिक्षा महंगी है और स्टूडैंट लोन के बल पर पढ़ाई की जाती है.

भारत में चिकित्सा शिक्षा लड़खड़ा रही है. पहले जब तक सरकारी थी, पर्याप्त डाक्टर नहीं मिल रहे थे. अब प्राइवेट हो गई है तो पढ़ाने की मंडी की तरह हो गई है, जहां दाखिले से ले कर अंतिम परिणामों तक बोलियां लगती हैं.

दुनिया की नई मांग चिकित्सा सुविधाओं की है. सब से ज्यादा लाभदायक उद्योग चिकित्सा क्षेत्र ही है. समृद्ध देशों में मकानों और नौकरियों की कमी नहीं, अपने बढ़ते बुढ़ापे में देखभाल और दवाओं की कमी खल रही है. महिला डाक्टर ये रोल ज्यादा अच्छी तरह से अदा कर सकती हैं.

भारत का चिकित्सा क्षेत्र अमेरिका की ओर बहुत देखता है और ज्यादातर सफल डाक्टरों के पीछे उन के अमेरिकी अनुभव रहते हैं, जहां नई सोच और नई तकनीकों पर प्रयोग होते रहते हैं. वहां किसी भी तरह का सुखद बदलाव यहां असर डालता ही है और अमेरिकी मैडिकल कालेजों का बदलता रंग भारत की औरतों को भी प्रोत्साहित करेगा.

इंटरनैट के नैट में फंसती औरतें

दुनिया भर में इंटरनैट टैक्नोलौजी का इस्तेमाल कर घरेलू चीजों को घर बैठे पहुंचाना असल में औरतों की शौपिंग की मूलभूत स्वतंत्रता और घूमने के अधिकार पर गहरा आघात है. मगर औरतें हैं कि यह समझ ही नहीं रहीं और न ही सोच पा रही हैं. वे सोच रहीं कि घर बैठे चीजें मिल रही हैं तो उन की आफत टली.

यही आफत तो औरतों का घर से निकलने का एक अनूठा उपाय था, जो पिछले 100 वर्षों में बड़ी मुश्किल से उन्हें मिला हुआ था वरना अनाज या सब्जी मंडी से सामान आदमी लाया करते थे. दूसरा फुटकर सामान फेरी वाले घरघर पहुंचाया करते थे. साडि़यां, जेवर सेठ व्यापारी घर ले जा कर ही दिखाया करते थे. अमेरिका में पिछली सदी में सेल्समैन पीठ पर 100-100  किलोग्राम वजन के संदूक उठा कर घरघर जाते थे और कढ़ाई की गई शौलों से ले कर कांच की मूर्तियां तक बेचा करते थे.

यह अधिकार तो बड़ी मुश्किल से मिला था कि औरतें सजधज कर खुद बाजारों में निकल सकती थीं और नई चीजों को देखने के बहाने अपने नए कपड़ों और जेवरों की नुमाइश भी कर आती थीं. आतेजाते कुल्फी और चाट का मजा भी पता चल जाता था. अब तो हर चीज की होम डिलिवरी है.

यह होम डिलिवरी या औनलाइन शौपिंग वैसी ही है जैसेकि लड़की को 10 फोटो दिखा कर कहा जाए कि इन में से एक को चुन लो, शादी कर लो, बच्चे पैदा करो और पूरी जिंदगी यों ही बंद माहौल में गुजार दो.

औनलाइन शौपिंग सुविधा हो या न हो पर यह औरतों की महत्त्वपूर्ण स्वतंत्रता को छीन रही है.

डर यह है कि भीरु और अदूरदर्शी औरतें औनलाइन शौपिंग न अपना लें और कहीं इतना न अपना लें कि शोरूम और मौल ही बंद हो जाएं और अकेला तरीका औनलाइन शौपिंग रह जाए.

ठीक है, औनलाइन शौपिंग में पैसे बचते हैं पर ये पैसे बचाना भी किस काम का होगा जब बाहर निकलने की जरूरत ही न हो. औनलाइन पर तो सभी जा सकती हैं, इसलिए किसी के पास ऐक्सक्लूसिव सामान न होगा.

सब एक सा पहनेंगी, औनलाइन सस्ता, बिना क्वालिटी परखे सामान बरतेंगी और यदि किसी किट्टी पार्टी में मिली भीं तो वह किट्टी पार्टी औनलाइन बुकिंग पर व्हाट्सऐप संदेशों के जरीए बुक होगी.

खुद की महकती, मदमाती आवाज का इस्तेमाल भी यह मुआ औनलाइन कंप्यूटर या मोबाइल छीन लेगा. कल्पना कीजिए मुंह बंद, नाइटी में सारा दिन कैद, इंटरनैट के नैट में फंसी औरतों की आजादी होगी कहां?

खिलाड़ी और पैसे का जीवन में सामंजस्य

क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ी अगर विदेशी भूमि से भी मैडल ले आएं तो उन के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ता. अन्य खेलों के ज्यादातर खिलाड़ी बहुत गरीब घरों से आते हैं और जैसे ही वे मैडल पाने की उम्र से बाहर हो जाते हैं, उन की थोड़ीबहुत पूछ जो होती थी, खत्म हो जाती है.

क्रिकेट में तो 20-30 खिलाड़ियों को अच्छा पैसा मिल जाता है पर हौकी, फुटबाल, एथलैटिक्स, कुश्ती, मुक्केबाजी आदि खेलों के पदक प्राप्त खिलाड़ी शुरू से ही खेल अफसरों की कृपा के आदी हो जाते हैं. उन्हें हमेशा पिछड़ा समझा जाता है और खेल अफसर केवल इन खिलाड़ियों को अपने पद के लाभ उठाने का माध्यम बनाते हैं. पदक प्राप्त कर चुके खिलाडि़यों के ईंटगारा उठाते या सब्जी बेचते फोटो अकसर छपते रहते हैं पर देश पर इस का कोई असर नहीं पड़ता.

यह तो मूल बात है कि समाज हो, घर हो या देश हो, पैसा तो काम करने के बाद ही मिलेगा. जब पदक पाया तो जो किया उसे संभाल कर रखा तो ठीक वरना बाद में कोई भाव न देगा, यह स्वाभाविक है. कभी पदक प्राप्त किया था इस बलबूते पर जीवनभर पैंशन पाने की तमन्ना करना ही गलत है. पदक पाने वाला देश या समाज से जीवनभर देखभाल करने की उम्मीद न करे.

असल दिक्कत यह है कि जब खिलाड़ियों को तैयार करा जा रहा होता है तब उन में एक गरूर भर दिया जाता है. उन्हें किसी भी कमाऊ क्षेत्र की योग्यता पाने के लिए तैयार करने की जगह केवल मैडल पाने का मजदूर बना कर रख दिया जाता है. वे न अच्छे श्रमिक रह जाते हैं न अच्छे कारीगर. न अच्छे अफसर और न ही अच्छे प्रशिक्षक. इन सब के लिए पर्याप्त शिक्षा की जरूरत होती है जो इन खिलाडि़यों को नहीं दी जाती.

मैडल पाने के बाद हार पहना कर इन के फोटो खिंचवा कर इन्हें एक तरह से रिटायर कर दिया जाता है और ये पदकों की चमक में जीवन की असलियत भी भूल जाते हैं. अगर ये पिछड़ी या दलित जातियों के हुए तो थोड़ा भी मानसम्मान पदक पाने के 2-3 साल बाद नहीं बचता.

खेलों को भविष्य की संपन्नता की चाबी समझना ही गलत है. एक बार का पदक जीवनभर की गारंटी नहीं बन सकता. इस बारे में हर खिलाड़ी को पहली सफलता के बाद ही समझ लेना चाहिए. ये वे सितारे हैं जिन्हें तभी तक देखा जाता है जब तक चमक रहे हैं. अपनी रोशनी खो बैठने के बाद ये बेकार ही हो जाते हैं.

सिद्धार्थ मल्होत्रा से खफा हैं मनोज तिवारी, कहा दर्ज करवाएंगे FIR

बौलीवुड एक्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा एक बार फिर मुश्किल में फंस चुके हैं. इस बार कोई और नहीं बल्कि मशहूर भोजपुरी एक्टर और दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने सिद्धार्थ के खिलाफ एफआरआई दर्ज कराने की बात कही है. दरअसल, हाल ही में सिद्धार्थ सलमान खान के ‘बिग बौस’ के 11वें सीजन के शो पर अपनी फिल्म ‘अय्यारी’ के प्रमोशन के लिए गए हुए थे. फिल्म के प्रमोशन के दौरान सिद्धार्थ ने भोजपुरी भाषा के लिए कुछ ऐसा कह दिया था, जिससे भोजपुरी सिनेमा में अच्छा खासा रोष देखने को मिल मिला था.

भोजपुरी भाषा की थी तौहीन

दरअसल, इस शो में सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ मनोज बाजपेयी और रकुल प्रीत भी पहुंचे थे. इस दौरान सलमान ने टीम को एक टास्क करने दिया. मनोज ने सिद्धार्थ को भोजपुरी में डायलौग बोलने को कहा था. सिद्धार्थ ने डायलौग तो बोल दिया, लेकिन भोजपुरी भाषा की तौहीन कर दी. उन्होंने कहा, बोलते समय टायलेट की फील आई, लेकिन अच्छा लगा.


मैं वाकई हैरान हूं: मनोज तिवारी

इस मामले में अब मनोज तिवारी ने कहा, ‘मैं बहुत हैरान हुआ हूं. 22 करोड़ लोगों की भाषा के साथ आप इस तरह से मजाक नहीं कर सकते हैं. यह बहुत गलत बात है. अपने देश की भाषा की इज्जत करनी चाहिए.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मैं सोचता था कि सिद्धार्थ एक अच्छा एक्टर हैं, लेकिन उसने मेरा दिल दुखाया है. उनको अपने इस व्यवहार के लिए माफी मांगनी चाहिए. मुझे लगता है कि कल तक उन पर पटना, बनारस, कोलकत्ता और मुंबई में 3 या 4 एफआईआर हो जाएगी.’

सिद्धार्थ ने पहले ही मांग ली थी माफी

वैसे आपको याद दिला दे कि सिद्धार्थ ने भोजपुरी भाषा का मजाक उड़ाने के लिए पहले से ही माफी मांग ली थी, लेकिन लगता है कि मनोज तिवारी फिलहाल उन्हें माफ करने के मूड में नहीं हैं. दरअसल, मनोज तिवारी से पहले इस मामले में एक्ट्रेस नीतू चंद्रा ने सिद्धार्थ को ट्विटर पर जमकर लताड़ा था, जिसके बाद सिद्धार्थ ने अपने इस कमेंट के लिए माफी मांग ली थी.

जिंदगी रोशन करती चांदनी

उत्तर प्रदेश के नोएडा के एक मुसलिम परिवार की 19 साला चांदनी ने यह साबित कर दिया है कि गंदी बस्तियों और रास्ते पर जिंदगी बिताने वालों का भी एक सपना होता है और उसे पूरा करने की जिम्मेदारी भी खुद की ही होती है.

चांदनी की इस कोशिश को रीबौक ने ‘फिट टू फाइट’ के तहत पुरस्कार से नवाजा है जिसे पा कर वह खुश है और आगे और अच्छा करने की कोशिश कर रही है. आज चांदनी ‘वौइस औफ स्लम’ संस्था की अध्यक्ष है और अपना काम बखूबी कर रही है.

चांदनी बताती है, ‘‘मैं 5 साल की उम्र से काम करती आई हूं. मेरी मां कहती हैं कि उस समय मैं अपने पिता के साथ खेलतमाशा करती थी. हमें एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था. उस काम से जो पैसा मिलता था उस से परिवार को भरपेट भोजन मिल जाता था.

‘‘ऐसा करतेकरते हम दिल्ली आ गए. पर मेरे पिता की मौत लकवा मारने से हो गई. उस समय मैं ही घर में बड़ी थी. मेरे 2 छोटे भाईबहन थे.

‘‘फिर मैं ने अट्टा मार्केट और नोएडा में कूड़ा बीनना शुरू कर दिया. नौकरी तो मिल नहीं सकती थी क्योंकि मैं पढ़ीलिखी नहीं थी और मेरी उम्र तब केवल 8 साल थी.

‘‘कूड़ा बीनने के दिनों में पुलिस वालों ने चोरी करने का आरोप लगा कर मुझे एक दिन के लिए जेल में डाल दिया था. फिर मैं ने डर के मारे कूड़ा बीनना छोड़ कर ट्रैफिक सिगनल पर फूल और भुट्टे बेचना शुरू कर दिया.’’

इतनी कम उम्र में चांदनी के लिए परिवार के लिए रोजीरोटी का इंतजाम करना आसान नहीं था. कितना मुश्किल था किसी छोटी लड़की का बाहर जा कर कूड़ा बीनना और उसे बाजार में बेचना.

बीते दिनों को याद करते हुए चांदनी कहती है, ‘‘मैं रात के 3 बजे कूड़ा बीनने जाती थी और इतनी रात को कोई भी इनसान अच्छी नीयत का नहीं होता

था. ऐसे में उन से अपनेआप को बचाना पड़ता था. इस के लिए मैं कूड़ा बीनने वाली बड़ी औरतों के पीछेपीछे जाती थी ताकि ऐेसे लोगों से बच जाऊं.

‘‘जब कूड़ा बीनना बंद किया तो रात को फूल बेचती थी ताकि पब से निकल कर लोग मेरे फूल खरीद लें. उस समय समस्या सर्दी में आती थी, जब तन पर गरम कपड़े नहीं हुआ करते थे. ऐसे में मैं किसी गाड़ी या दीवार के पीछे बैठ कर ठंड से अपनेआप को बचाती थी.

‘‘मेरा एक सपना था कि मैं स्कूल डै्रस पहनूं, अच्छीअच्छी किताबें पढूं. उस एनजीओ के एक संगठन का नाम ‘बढ़ते कदम’ था. मैं उस से जुड़ कर उन के साथ काम और पढ़ाई करने लगी.

‘‘बाद में मैं वहां नैशनल लैवल पर सचिव बनी और उन की एक मैगजीन की एडिटर भी बन गई. इस तरह से मैं सड़क और कामकाजी 10 हजार बच्चों के साथ उन की पढ़ाईलिखाई और उन के हकों पर ट्रेनिंग देती रही.

‘‘इस दौरान मुझे कई उपलब्धियां भी मिलीं. मैं ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग संगठन से मिल कर भी काम किया. जब मेरी उम्र 18 साल से ज्यादा हो गई तब मुझे उस संस्था को छोड़ना पड़ा क्योंकि ऐसी संस्था 18 साल तक के बच्चों के लिए ही काम करती है.

‘‘इस के बाद मैं फिर वापस स्लम और भुट्टे की दुकान पर पहुंच गई लेकिन तब तक मेरी 8वीं जमात की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. फिर मैं ने कई दूसरे बच्चों को भी देखा जो 18 साल का होने के बाद संस्था से निकाले जा चुके हैं और इधरउधर घूम रहे हैं. मैं ने उन सब को मिला कर एक टीम बनाई क्योंकि भले ही वे बच्चे पढ़ेलिखे नहीं थे, पर उन्हें ऐसे गरीब बच्चों को मैन स्ट्रीम से जोड़ना आता था. वे उन की सोच को समझते थे जिस से उन्हें वहां से लाना आसान था. ऐसे में मैं ने 20 लड़के और लड़कियों के साथ मिल कर एक संस्था खोलने का मन बनाया, जिस का नाम ‘वौइस औफ स्लम’ रखा.’’

चांदनी के लिए इस संस्था को खोलना आसान नहीं था. अभी तक वह केवल झुग्गीझोंपडि़यों में जा कर बच्चों को संस्था में लाने का काम करती थी लेकिन खुद की संस्था खोलते ही कई समस्याएं सामने आने लगीं. रजिस्ट्रेशन के काम में जहां सिर्फ 50 रुपए लगे, पर लोगों ने कभी 5 हजार तो कभी 10 हजार रुपए मांगे.

चांदनी ने खुद सब काम किया. पैसे के लिए उस ने फेसबुक का सहारा लिया. अपने दोस्तों को केवल एक रुपए चंदा देने की मांग की. 2 घंटे के अंदर पेटीएम में 25 हजार रुपए आ गए. इस तरीके से उस ने नोएडा में 2 से 3 सैंटर खोले हैं. इन में वह जरूरतमंद बच्चों को ला कर उन के हुनर पर काम करती है.

चांदनी बताती है, ‘‘ऐसे बच्चों की सोच होती है कि वे कुछ नहीं कर सकते इसलिए वे भीख मांगना या कूड़ा बीनने का काम कर रहे हैं. पहले उन की सोच को बदलने पर काम किया जाता है, फिर उन्हें पढ़ाईलिखाई और उन के हक को समझाने के बाद काम पर लगाया जाता है.’’

अपने एक अनुभव के बारे में चांदनी बताती है, ‘‘कुछ दिनों पहले नेपाल में 13 साल की लड़की को एक अधेड़ उम्र के आदमी ने शादी कर उसे बहुत सताया. वह एक बच्चे की मां भी बन चुकी थी. ऐसे में किसी तरह वह भाग कर मेरे पास आई. मैं ने उस की मदद की, उसे उस के परिवार से मिलवाया और जिन लोगों ने उस के साथ गलत किया उन्हें जेल की सजा दिलवाई.’’

अभी चांदनी 10वीं जमात की पढ़ाई कर रही है. इस काम में उसे सब से मुश्किल लगता है स्लम के बच्चों और उन के मातापिता की सोच को बदलना. वे अपने बच्चों को संस्था में भेजना नहीं चाहते. उन के हिसाब से जितने हाथ उतनी कमाई से रोजीरोटी चलती है लेकिन चांदनी को पता है कि उन्हें कैसे यहां तक लाना है क्योंकि वह खुद भी इन्हीं हालात से गुजर चुकी है.

चांदनी कहती है, ‘‘यह सही है कि उन्हें अच्छी जिंदगी पता नहीं इसलिए मैं उन्हें आईना ही दिखाने की कोशिश करती हूं जिस से उन के मन बदलते हैं. इस के लिए हम ऐसी जगहों पर ले जाते हैं जहां वे कभी भी नहीं जा सकते. वहां उन्हें अच्छा भोजन खिलाते हैं, कई कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं. इस से  वे मेरे पास आ जाते हैं.

‘‘कई बार तो बच्चे कुछ दिन पढ़ने के बाद ही स्कूल आना बंद कर देते हैं. ऐसे बच्चों से मिल कर उन की समस्या और उस का हल भी उन से ही जानने की कोशिश की जाती है जिस से उन में अपनी समस्या खुद हल करने की कूवत हो. अभी तक तकरीबन एक हजार बच्चे मेरे साथ जुड़ चुके हैं और आगे एक लाख बच्चों को मेन स्ट्रीम में लाने की कोशिश है.

‘‘इस के अलावा मैं पूरे देश के झुग्गीझोंपड़ी के बच्चों को अच्छी जिंदगी देने की इच्छा रखती हूं. मुझे कभी भी तनाव या दुख होता है तो मैं इन्हीं बच्चों के साथ समय बिता लेती हूं.’’

चांदनी आगे कहती है, ‘‘हमारे परिवार में 18 साल का होने पर शादी कर दी जाती है. मैं अपने परिवार की पहली लड़की हूं जो पढ़ रही है. मैं ने अभी तक शादी नहीं की और एनजीओ चलाती है. मैं बहुत मेहनत कर के यहां तक पहुंची हूं और अब आगे जो करना है उसे जरूर करूंगी.’’

सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल : सुविधा या लूट

देश में इन दिनों मध्यम व उच्च श्रेणी के निजी नर्सिंग होम व निजी अस्पतालों से ले कर बहुआयामी विशेषता रखने वाले मल्टी स्पैशलिटी हौस्पिटल्स की बाढ़ सी आई हुई है. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र व गुजरात जैसे आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों से ले कर ओडिशा, बिहार व बंगाल जैसे कम संपन्न राज्यों तक में भी ऐसे बहुसुविधा उपलब्ध करवाने वाले अस्पतालों को संचालित होते देखा जा सकता है.

हजारों करोड़ रुपए की लागत से शुरू किए जाने वाले इन अस्पतालों को संचालित करने वाला व्यक्ति या इस से संबंधित ग्रुप कोई साधारण व्यक्ति या ग्रुप नहीं होता. निश्चित रूप से ऐसे अस्पताल न केवल धनाढ्य लोगों द्वारा खोले जाते हैं बल्कि इन के रसूख भी काफी ऊपर तक होते हैं. इतना ही नहीं, बड़े से बड़े राजनेताओं व अफसरशाही से जुड़े लोगों का इलाज करतेकरते साधारण अथवा मध्यम या उच्चमध्यम श्रेणी के मरीजों की परवा करना या न करना ऐसे अस्पतालों के लिए कोई माने नहीं रखता.

नामीगिरामी बड़े अस्पतालों में फोर्टिस, मैक्स, अपोलो, कोलंबिया एशिया रेफरल हौस्पिटल, नोवा स्पैशलिटी हौस्पिटल, ग्लोबल हैल्थ सिटी, बीजीएस ग्लोबल हौस्पिटल, सर गंगाराम हौस्पिटल आदि शामिल हैं. यहां एक ही छत के नीचे किसी भी मरीज के हर किस्म की बीमारी की जांचपड़ताल, उस से संबंधित हर किस्म के मैडिकल टैस्ट व हर प्रकार के औपरेशन की सुविधा उपलब्ध रहती है.

पांचसितारा होटल्स जैसी सुविधाएं प्रदान करने वाले अस्पतालों का खर्च उठा पाना साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है. ऐसे अस्पतालों में छोटा औपरेशन अथवा मध्यम श्रेणी की बीमारी का इलाज भी लाखों रुपए में हो पाता है.

इस में शक नहीं कि देश में लाखों संपन्न मरीज ऐसे हैं जो इन या इनजैसे दूसरे बड़े अस्पतालों से अपना इलाज करवा कर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं. परंतु यदि हमें यह पता चले कि इतने विशाल भवन, वृहद आकार व प्रकार वाले इन्हीं पांचसितारा सरीखे अस्पतालों में मरीजों के साथ खुलेआम लूट नहीं, बल्कि डकैती की जा रही है तो यह उन अस्पतालों के लिए किसी कलंक से कम नहीं है.

आज यदि ऐसे कई बड़े अस्पतालों की वैबसाइट खोल कर देखें या इन अस्पतालों के भुक्तभोगी मरीजों द्वारा साझा किए गए उन के अनुभवों पर नजर डालें तो ऐसे अस्पतालों की वास्तविकता तथा इन विशाल गगनचुंबी इमारतों के पीछे का भयानक सच पढ़ने को मिल जाएगा.

बेशक, कुछ रिव्यू लिखने वालों ने इन अस्पतालों की सक्रियता व उन के स्टाफ के बरताव की तारीफ भी लिखी है. परंतु प्रश्न यह है कि लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद यदि एक भी मरीज या उस के तीमारदार अस्पताल के प्रति कोई नकारात्मक विचार ले कर जाते हैं तो आखिर ऐसा क्यों?

इलाज के नाम पर लूट

पिछले दिनों मनीश गोयल नामक नवयुवक ने दिल्ली के शालीमार बाग स्थित एक हौस्पिटल के अपने अनुभव को सोशल मीडिया पर एक वीडियो द्वारा साझा किया. उस ने बताया कि उस के मरीज को एक बाईपास सर्जरी के बाद 19 जून को डिस्चार्ज किया जाना था. अस्पताल से उस औपरेशन का पैकेज बाईपास सर्जरी की फीस के साथ 2 लाख 2 हजार रुपए में तय हुआ था. मरीज अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो पा रहा था तथा उस के परिजन अस्पताल के इलाज से संतुष्ट नहीं थे और मरीज को अन्यत्र स्थानांतरित करना चाह रहे थे. यह जान कर अस्पताल ने 5 लाख 61 हजार रुपए का बिल मरीज के तीमारदारों को दे दिया. किसी कारणवश 19 जून के बाद मरीज ने अपना इलाज इसी अस्पताल में एक सप्ताह और कराया. अब एक सप्ताह के बाद हौस्पिटल ने मरीज को नया बिल 11 लाख 37 हजार रुपए का पेश कर दिया.

मनीश गोयल के अनुसार, नेफरो के डाक्टर की डेली विजिट के नाम पर बिल में पैसे मांगे गए जबकि डाक्टर 3 दिनों में केवल एक बार आते हैं. परंतु अस्पताल ने उन के विजिट के पैसे 1 दिन में 2 बार विजिट की दर से लगाए हैं. इसी प्रकार 1 और डाक्टर, जिन्होंने मरीज की बाईपास सर्जरी की थी, 4 दिनों से छुट्टी पर थे फिर भी उन के नाम पर प्रतिदिन विजिट के पैसे बिल में मांगे जा रहे थे. इतना ही नहीं, इन सब के अतिरिक्त अस्पताल ने एक सप्ताह में 5 लाख 25 हजार रुपए मूल्य की दवाइयों का बिल भी अलग से लगा दिया. इन सब के बावजूद, मरीज का कहना है कि उसे अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ भी नहीं मिल सका.

उपरोक्त घटना इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त है कि इस प्रकार के अस्पताल मरीजों के इलाज के लिए तो कम, मरीजों को लूटने व उन्हें कंगाल करने की नीयत से ज्यादा खोले गए हैं. कुछ मरीजों ने इसी अस्पताल के बारे में अपना तजरबा साझा करते हुए यहां तक लिखा है कि यहां कैंसर के मरीज को गलत दवाइयां दी गईं तथा उन का गलत इलाज किया गया. एक मरीज ने लिखा कि अस्पताल वालों का वास्तविक मकसद पैसा कमाना है. कुछ मरीजों ने इन अस्पतालों में भारी भीड़ और उस भीड़ के चलते होने वाली असुविधाओं का भी उल्लेख किया है.

दीपेश अरोड़ा नामक एक भुक्तभोगी ने अपने रिव्यू में एक अन्य सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल के बारे में लिखा कि उस के परिवार का एक प्रिय सदस्य अस्पताल में गलत इलाज किए जाने की वजह से मर गया. अस्पताल में सफेद यूनिफौर्म में कातिलों की टीम मौजूद है. जबकि राजेश सिंह जैसे किसी व्यक्ति के अनुभव के अनुसार, उसी अस्पताल के एक डाक्टर की देखभाल तथा उन की निगरानी करने का तरीका काबिलेतारीफ है.

दरअसल, भारत में बड़े अस्पतालों की बढ़ती संख्या का समाचार इन दिनों न केवल समूचे दक्षिण एशियाई देशों में, बल्कि अफ्रीका तथा यूरोपीय देशों में भी फैल चुका है. स्वयं इन अस्पतालों के प्रचारतंत्र इन की अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि करने में सक्रिय रहते हैं.

पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश तथा अरब देशों के तमाम संपन्न मरीज भारत की ओर खिंचे चले आते हैं. और ये अस्पताल इन्हीं बेबस मरीजों की मजबूरी का नाजायज फायदा उठा कर उन से मनचाहे पैसे वसूलते रहते हैं.

धीरेधीरे उन की यही आदत प्रवृत्ति में शामिल हो जाती है और इस का शिकार लगभग प्रत्येक दूसरे मरीज को होना पड़ता है. ऐसे अस्पतालों पर तथा इन के द्वारा की जा रही लूट व डकैती पर सख्त नजर रखने की जरूरत है.

यामी गौतम ने दिखाया अपना किलर फिगर

बौलीवुड की खूबसूरत अभिनेत्रियों में शुमार यामी गौतम इन दिनों अपने हौट अवतार को लेकर काभी सुर्खियों में हैं. यामी गौतम को लेकर लोगों की दीवानगी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. 29 साल की यामी ने बौलीवुड की दुनिया में अपना एक खास मुकाम हासिल कर लिया है. यामी ने अपने करियर की शुरुआत टीवी इंडस्ट्री से की थी.

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हाल ही में यामी एक प्रतिष्ठित हिंदी के मैगजीन के कवर पेज पर काफी हौट और बोल्ड अंदाज में नजर आई हैं. जी हां, यामी ने कुछ समय पहले काफी हौट फोटोशूट कराया था. इस फोटोशूट में वो लैस-ब्रैलेट के साथ ब्लू जैकेट पहने हुए नजर आ रही हैं. यामी की लैस-ब्रैलेट का स्टाइल अलिया अल रुफिया ने स्टाइल किया है जबकि उनका ब्लू कोर्ट मार्क्‍स एंड स्पेन्सर द्वारा किये गए डिजाइन का एक नमूना है. इसके अलावा नम्रता सोनी ने यामी का परफेक्ट मेकअप किया है, जिसने इस फोटो शूट में उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिए हैं.

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मैगजीन के कवर पर यामी का दिया गया ये सिंपल सा पोज कई हौट हिरोईनों को टक्कर दे रहा है. यह पोज यामी का अब तक का सबसे हौट और सेक्सी पोज माना जा रहा है. बटा दें कि इस फोटोशूट में यामी की तस्वीर फोटोग्राफर प्रसाद नाइक ने खींची हैं. इन तस्वीरों में यामी का किलर फिगर फैंस को मदहोश कर देने वाला है.

बता दें कि यामी गौतम जल्द ही शाहिद कपूर और श्रद्धा कपूर के साथ फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ में नजर आएंगी. टीवी से अपने एक्टिंग की शुरुआत करने वाली यामी गौतम का पहला टीवी सीरियल ‘चांद के पार चलो’ था. इसके बाद यामी ने ‘राजकुमार आर्यन’ और ‘ये प्यार ना होगा कम’ में काम किया. अपनी खूबसूरती और एक्टिंग के दम पर यामी इन सीरियल्स की वजह से लोगों के दिलों पर राज करने लगीं और आज भी करती हैं.

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टीवी के जरिए उन्होंने इतनी लोकप्रियता हासिल कर ली कि फिल्ममेकर्स की ध्यान उनपर पड़ने लगी. हालांकि, बौलीवुड में यामी गौतम की शुरूआत कुछ खास नहीं रही और उनकी फिल्में कुछ खास कमाल ना कर सकीं. उनकी शुरुआती फिल्में “एक्शन जैक्सन”, “सनम रे” और “जुनूनियत” बौक्स औफिस पर चल न सकीं. इसी बीच उन्हें ऋतिक रोशन के साथ फिल्म ‘काबिल’ में काम करने का मौका मिला. इस फिल्म के जरिए यामी रातों-रात स्टार बन गई. उनको फिल्मों में सबसे बड़ी सफलता “विक्की डोनर” से लगी. उन्होंने फिल्म में कमाल का काम किया और सभी ने उनकी सराहना की.

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