

देश के 7 शहरों में छापे मार कर जिन 5 सामाजिक कार्यकर्ताओं को महाराष्ट्र पुलिस ने भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस की रजामंदी से गिरफ्तार किया है उन का गुनाह बस इतना है कि वे देश के गरीब, कुचले हुए, सताए हुए दलितों, अछूतों, पिछड़ों, शूद्रों के साथ हमदर्दी रखते हैं. मुख्यमंत्री नहीं चाहते कि कोई दलितों की बात करे या गौरक्षकों की तरह दंगा करने वाले भगवा दुपट्टियों की तरह दलितों को अपने हक मांगने के लिए रास्ता भी सुझाए. हमारे समाज में यह बात तो तय है कि जो भी दुख आज ये लोग भोग रहे हैं वह उन के पिछले जन्मों का पाप है.
जो समाज बारबार यही दोहराता है कि जातियां विराट ईश्वररूपी मानव ने बनाई थीं जिस में शूद्र पैर थे और दलित पैरों की धूल या पैरों के नीचे की बदबूदार कीचड़, वह इन के साथ जरा सी भी आदमीयत का सा बरताव करने वाले को हिंदू धर्म का विरोधी मानेगा ही. आजकल जो हिंदू समाज की पुरातन परंपरा का विरोध करता है, वह समाज सुधारक नहीं देशद्रोही बन गया है .जैसे हिटलर के जमाने में जर्मनी और जर्मनी द्वारा काबिज देशों में नाजी पार्टी का विरोध करने वालों को बनाया गया था. माओवादी देश के एक बड़े हिस्से में हिंसा कर रहे हैं और अपना अलग कामकाज चला रहे हैं. यह सरासर गलत है पर इसका हल गोली नहीं, वहां के लोगों को बराबर की जगह देना है.
आज की सरकारें ही नहीं पिछली सरकारें भी इन्हें दबा कर वैसे ही रखना चाहती रही हैं जैसे धर्मग्रंथों के हवाले से दस्युओं और शूद्रों को दबाया गया था. अगर समाज को आगे बढ़ना है, हर आदमी को रोटी, कपड़ा, मकान देना है, देश का नाम ऊंचा करना है, गरीबी के जंजाल से निकलना है तो जरूरी है कि हर हाथ को हर तरह का काम करना आए. रोजगार इतने हों कि किसी को न डंडा उठाने की फुरसत रहे न झंडा. अगर भुखमरी और बेगारी यूंही बनी रहेगी तो ये हाथ उठेंगे ही और उन हाथों के साथ हमदर्दी करने वालों को तानाशाही में बेरहमी से गिरफ्तार किया जाता है. पक्का है जिन सामाजिक नेताओं को पकड़ा गया है उन्होंने क्रूर राजाओं, हूणों, तैमूरों, नादिरशाहों, स्टालिनों, हिटलरों, रूसी केजीबी, कोरियाई किमों का इतिहास खूब पढ़ रखा है. उन्हें मालूम है कि लोकतंत्र की बखिया कैसे उधड़ रही है. इंदिरा गांधी के आपातकाल की तरह देश को बचाने के नाम पर अपनी गद्दी या अपनी पार्टी बचाने का काम कोई नया नहीं है.
हर युग में, हर देश में गरीब, सताए हुए लोगों पर तानाशाहों ने जुल्म किए हैं. हमारे यहां न्याय करने वाले जजों की मिलीभगत के कारण यह अन्याय हो रहा है, अफसोस की बात है. पर देश में जिस तरह जातिवाद के कीटाणु खून में बह रहे हैं, कोई आश्चर्य भी नहीं है की जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा यह फैसला उलट दिया जाएगा पर तब तक पुलिस हाथ आजमा चुकी होगी. सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुँच भी जाये और इन बेगुनाहों को गिरफ्तारी से अगर राहत मिल भी जाए तो भी बेमतलब का मुकदमा चलता ही रहेगा.
हर मुकदमे में पेशी एक दिन की कैद की तरह होती है. जांच करने वाली एक विदेशी संस्था ने पाया है कि भारत में आज भी कम से कम 80 लाख लोग गुलामी जैसी हालत में जी रहे हैं. इस खोजी संस्था के हिसाब से यदि काम छोड़ कर जा न सको, वे काम करने पड़ें जो न करना चाहो, काम की सही कीमत न मिले, मालिक के कहने के हिसाब से ही शादी करनी पड़े और यह सब न करने पर मारपीट, कैद या जोरजबरदस्ती हो तो गुलामी मानी जाती है. सरकार ने तो जैसी उम्मीद थी इस रिपोर्ट को गलत कहा है पर असलियत तो यह है कि देश में गुलामों की गिनती इस से कहीं ज्यादा है. इस देश में दिल्ली जैसे शहर में घरेलू नौकरानियों को गांवों से ला कर घर में लगभग कैद कर के रखा जाता है और उन्हें घंटों काम करना होता है. ठेकेदार ईंटों के भट्ठों पर दूरदराज से मजदूर लाते हैं और उन्हें अपने पास सीजन के दिनों में जबरन रखते हैं. गांवों में काम करने वालों को पहले सूद पर पैसा दिया जाता है और फिर उन्हें जबरन केवल खाने के बदले काम करना पड़ता है. बहुत छोटी फैक्टरियों में तो हालात और भी बुरे होते हैं.
मंदिरों के आगे भीख मांगने वाले पंडों के गुलाम ही होते हैं. गुलामी जंजीरों के सहारे ही हो जरूरी नहीं, अगर हालात ऐसे हों कि किसी को छूट न मिले और मारपीट की धमकियों पर काम करना हो तो उसे गुलामी ही कहा जाएगा. हमारे यहां जाति के नाम पर भयंकर गुलामी है. समाज की एक बहुत बड़ी जमात लोगों को न अपनी मरजी से रहने देती है, न जीने, और न ही काम करने देतीहै. पिछले 50-60 सालों में बदलाव आया है पर फिर भी गरीबी ऐसे हालात पैदा कर देती है जिन में आदमी मजबूर हो कर काम करता है. ठीक वैसे ही जैसे करोड़ों औरतें घरों में बंधन न होने पर भी अपने आदमी के साथ रहती हैं, सोती हैं, मार खाती हैं, बच्चे पालती हैं. वह गुलामी जंजीरों से नहीं होती, घर से बाहर के खतरों की वजह से होती हैं ठीक वैसे ही हालात देश के एक बड़े हिस्से के साथ हैं जो अपनी मरजी से न काम चुन सकते हैं, न छोड़ सकते हैं, न लग सकते हैं. यह गुलामी ही है. हजार दोषों के बावजूद इस में बदलाव बहुत धीमा है.
टेलीविजन की दुनिया में कौमेडी किंग के नाम से मशहूर कपिल शर्मा जल्द ही टीवी पर वापसी कर सकते हैं. खबरें आ रही हैं कि वे अक्टूबर में टीवी पर नए शो के साथ धमाकेदार वापसी करने जा रहे हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ को डायरेक्ट करने वाले भारत कुकरेती इस शो को डायरेक्ट कर सकते हैं.
बताया जा रहा है कि शो पूरी तरह से कौमेडी बेस्ड होगा. कपिल शर्मा काफी लंबे समय से खराब सेहत की वजह से टेलीविजन से दूरी बनाए हुए हैं. लेकिन अब वे वापसी के लिए कमर कस रहे हैं. वे अक्टूबर तक पूरी तरह फिट हो जाएंगे और कौमेडी की दुनिया में दर्शकों को गुदगुदाने के लिए फिर से लौटेंगे. इसके अलावा कपिल शर्मा अपनी फिल्म की रिलीज की तैयारियों में भी लगे हुए हैं. कपिल की सेहत की वजह से इसे भी देरी हो गई थी. फिल्म भी अक्टूबर में रिलीज हो सकती है. फिल्म की शूटिंग पंजाब में की गई है. दर्शकों का चहेता कौमेडी शो ‘द कपिल शर्मा शो’ पिछले साल कपिल शर्मा और कौमेडियन सुनील ग्रोवर के बीच कहा सुनी के बाद औफ एयर हो गया था.
कपिल शर्मा ने इस साल अप्रैल में टीवी पर ‘फैमिल टाइम विद कपिल’ के साथ दर्शकों का दिल जीतने की कोशिश की थी. लेकिन तीन एपिसोड्स के बाद ही ये शो बंद हो गया था. कपिल शर्मा इस शो की शूटिंग नहीं कर पा रहे थे, और उस समय कपिल शर्मा की खराब सेहत की बात सामने आई थी. कई लोगों ने उनके नशे की लत को इसकी वजह बताया था. हालांकि वजह जो भी रही हो लेकिन कपिल शर्मा के फैन्स को शो बंद होने से बहुत झटका लगा था, और उनके चहेते स्टार को लेकर आ रही बातों से भी वे दुखी थे. लेकिन अब उनके लिए ठहाके लगाने का समय आ रहा है.
बौलीवुड अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा एक बार फिर सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स के निशाने पर आ गई हैं. हाल ही में वह अपनी टाइट ब्लू ड्रेस के कारण ट्रोल हुई थीं. लेकिन इस बार परिणीति अपने बालों को लेकर चर्चा में आ गईं. उन्होंने अपने बालों का रंग बदलकर लाल कर लिया है.
परिणीति के इस नए लुक की एक बार फिर लोग सोशल मीडिया पर आलोचना कर रहे हैं और काफी मजाक उड़ा रहे हैं. इसके अलावा लोग उनके इस लुक की तुलना कटरीना कैफ से भी करने लगे क्योंकि एक फिल्म में कैट भी इसी लुक में दिखाई दी थीं. लोगों ने कहा कि जहां कटरीना इस लुक में बहुत खूबसूरत दिख रहीं थीं वहीं परिणीति वैसा जादू नहीं चला सकीं.
इंस्टाग्राम पर शेयर की गई इस तस्वीर पर एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा कि, “आपने ऐसा क्यों किया? आप काले बालों में जायदा बेहतर लगती थी.” वहीं एक यूजर ने लिखा कि, “भयंकर, उम्मीद हैं कि थोड़े समय के लिए ही है.” परिणीति का यह अंदाज कुछ लोगों को इस प्रकार बुरा लगा कि उन्होंने एक्ट्रेस को भूतनी, चुड़ैल और वैम्पायर तक कह दिया.
हालांकि परिणीति के इस लुक के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह कुछ ऐसा नया ट्राइ करना चाहती थीं जो उन्होंने पहले नहीं किया है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एक फिल्म के लिए फिल्म प्रड्यूसर ने भी उन्हें इस लुक का सजेशन दिया था.
बता दें कि परिणीति चोपड़ा की फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ रिलीज के लिए तैयार है जिसमें उनके अपोजिट अर्जुन कपूर दिखाई देंगे. यह फिल्म अक्षय-कटरीना की सुपरहिट फिल्म ‘नमस्ते लंदन’ का सीक्वल है. इसके अलावा परिणीति इस समय सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’ की शूटिंग कर रही हैं.
एक आला अफसर की नाजों पली बीवी देवी ठाकुर ने आज एक बार फिर पति की थाली में जली हुई दालरोटी के साथसाथ रात की बासी सब्जी परोस दी.
अफसर पति ने कहा, ‘‘देवीजी, कुछ तो मेरी अफसरी का खयाल कर के ताजा भोजन खिला दिया होता. जली हुई दालरोटी खाते देख कर क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं अफसर नहीं, बल्कि कोई चपरासी हूं?’’ देवी ठाकुर बोलीं, ‘‘अफसरी का इतना ही रुतबा है, तो घर में काम करने वाले एक चपरासी का इंतजाम क्यों नहीं करते? तुम्हें पता है न कि अफसरों की बीवियां किटी पार्टियों में जाती हैं. क्या तुम नहीं चाहते कि मैं भी उन पार्टियों में जाऊं?’’
‘‘दफ्तर में एकाध दिन में कोई नया चपरासी आ जाएगा. समझ लो, वह तुम्हारा और तुम्हारे घर का सारा काम करेगा, मगर फिलहाल कुछ दिनों तक तो अपने हाथ से ढंग का खाना खिला दो. आखिर मैं पति हूं तुम्हारा,’’ बहुत ही खुशामद वाले अंदाज में अफसर पति ने कहा.
देवी ठाकुर निराले अंदाज में पति से बोलीं, ‘‘तुम्हें पता है, हम बीवियां पति की इज्जत बढ़ाने के लिए दूसरों से कभी पीछे नहीं रहतीं. खाना बनाने जैसा छोटा काम भी तो चपरासियों का ही है.’’
इज्जत बढ़ाने की बात पर अफसर पति पूछ बैठा, ‘‘आप लोग पार्टियों में हमारी इज्जत कैसे बढ़ाती हैं?’’
देवी ठाकुर बोल उठीं, ‘‘चाय के बदले कौफी, पकौड़ों के बदले समोसे, जलेबी के बदले कलाकंद का आर्डर दे कर पार्टियों में हम पतियों की तारीफ करती हैं और सब को बताती फिरती हैं कि मेरे पति बड़े अफसर हैं, जिन में जरा भी कंजूसी नहीं है.
‘‘बड़े अफसरों की बीवियां इतना हक तो रखती ही हैं कि दूसरों को मनचाहा खिलापिला सकें.’’
बीवी के मुंह से अफसरी रुतबे का इतिहास सुन कर मूड खराब होने के डर से जब अफसर पति दफ्तर चले गए, तो देवी ठाकुर किटी पार्टी में जाने के लिए तैयार होने लगीं.
होंठों पर लिपस्टिक और चेहरे पर पाउडर लगा कर वे साड़ी लपेट ही रही थीं कि तभी एक आदमी आया और बोला, ‘‘मैडम, मैं रघुनाथ हूं. अभीअभी दफ्तर में चपरासी बन कर आया हूं. साहब ने जौइन करते ही कहा कि मैं आप की सेवा में रहूं और घर में खानेपीने का अच्छा बंदोबस्त करूं.’’
देवी ठाकुर तो मानो फूली न समाईं. वे खुश हो कर बोलीं, ‘‘ठीक है रघु, मेरे साथ बाजार चलो और सामान खरीद कर साहब के लिए खाना बना कर रखना. मैं भी तब तक किटी पार्टी से आ जाऊंगी.’’
देवी ठाकुर चपरासी पा कर खिले गुलाब की तरह मुसकरा रही थीं. वे रघु को ले कर बाजार गईं और कुछ पैसे दे कर उसे समझा दिया कि क्याक्या लेना है. फिर वे पार्टी के लिए चल पड़ीं.
रघु बोला, ‘‘मैडम, घर की चाबी तो आप के पास है. खाना बनाने के लिए मुझे तो घर वापस जाना पड़ेगा.’’
मैडम यानी देवी ठाकुर ने चौंक कर कहा, ‘‘अरे हां, ठीक कह रहे हो रघु. लो चाबी, मगर खाना अच्छा व सफाई से बनाना. कुछ ऐसा कि तुम्हारे साहब दांतों तले उंगली दबा लें.’’
रघु ने कहा, ‘‘मैडम, आप बेफिक्र रहें. मैं ऐसा खाना बनाऊंगा कि आप दोनों ही हैरान रह जाएंगे.’’
देवी ठाकुर किटी पार्टी में शेखी बघारते हुए बोलीं, ‘‘देखा मेरे प्यारे अफसर पति को. आखिर उन्होंने मुझे चपरासी दे ही दिया. मुझ से इतना प्यार करते हैं कि घर का कोई कामकाज करने ही नहीं देते. इतना खयाल रखते हैं कि दफ्तर के चपरासी को ही मेरी सेवा के लिए भेज दिया.’’
देवी ठाकुर की फूली छाती देख कर उन की सहेलियां मीना, लीना, रीता व गीता कुछ झेंप सी गईं. रीता ने कहा, ‘‘इस खुशी में तो आज चाय हो ही जाए.’’
देवी ठाकुर बोलीं, ‘‘चाय क्यों… मेरी ओर से समोसा, कलाकंद और कौफी की शानदार पार्टी लो.’’
एक बड़ा सा आर्डर दे कर देवी ठाकुर ने अपना सीना ऐसे तान लिया, मानो उन्हें चपरासी नहीं कोई गड़ा हुआ खजाना मिला हो.
पार्टी के बाद शाम को जब देवी ठाकुर घर लौटीं, तो अफसर पति को उदास बैठा देख कर पूछा, ‘‘कहां है रघु, दिखाई नहीं दे रहा है? खाना तो खा लिया होगा आप ने?’’
उन के सवालों पर चकरा कर अफसर पति ने पूछा, ‘‘कौन रघु? कैसा रघु? मुझे किसी रघु का पता नहीं.’’
यह सुन कर देवी ठाकुर का माथा ठनका. झट से कमरे में जा कर उन्होंने तिजोरी देखी. तिजोरी के रुपयों का कहीं अतापता न था. वे रोने लगीं. रघु चकमा दे कर चंपत हो गया था.
वे रोतेरोते बोलीं, ‘‘रघु रुपए ले कर रफूचक्कर हो गया है.’’
‘‘देवी, छोड़ो भी रघु का चक्कर और खाना खा लो. मैं होटल से ले आया हूं,’’ अफसर पति ने टूटे दिल से अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा.
गुवाहाटी, असम से तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ग्वालपाड़ा जिले में एक ब्लौक है बालिजाना और वहीं का एक गांव है रंगसापाड़ा. 88 घरों वाले इस गांव की कुल आबादी महज 5 सौ लोगों की है, लेकिन इन चंद लोगों ने मिल कर जो मिसाल कायम की है, वह आज पूरे असम में किसी विजयगाथा की तरह सुनाई जाती है. दरअसल, रंगसापाड़ा के लोगों ने साफसफाई को आज से 27 साल पहले ही अपना मूलमंत्र बना लिया था. उसी का नतीजा है कि ग्वालपाड़ा जिले को पूरे असम का सब से साफसुथरा गांव होने का खिताब मिला है.
रंगसापाड़ा को यह कामयाबी यों ही नहीं मिली. मेहनतमजदूरी करने वाले इस गांव के लोगों में साफसफाई को ले कर इतनी समझ कैसे आई, उस के लिए हमें 1990 के समय में जाना होगा.
गांव के मुखिया रौबर्टसन मोमिन बताते हैं कि दूसरे गांवों की तरह उन के गांव में भी गंदगी रहती थी, लोग नशे का सेवन करते थे, आपस में लड़ाईझगड़ा भी होता था.
एक दिन गांव वालों ने मिल कर सोचा कि गांव की हालत सुधारने की दिशा में कुछ करना चाहिए. उन्होंने एक बैठक बुलाई और आपसी समझ से कुछ सख्त फैसले लिए गए, जैसे कोई भी खुले में शौच नहीं जाएगा, घर के आगे गंदगी नहीं डालेगा और किसी तरह का नशा नहीं करेगा. ये 3 प्रण गांव वालों ने लिए और इन नियमों को तोड़ने की सजा भी तय की गई.
जरा सोच कर देखो कि आज से 27-28 साल पहले पूरब के सुदूर गांव वालों ने नियम तोड़ने पर क्या जुर्माना तय किया था? पूरे 5001 रुपए का. इतना बड़ा जुर्माना उस जमाने में तो क्या आज भी बहुत भारी लगता है.
रौबर्टसन मोमिन बताते हैं कि जुर्माना ज्यादा इसलिए रखा गया कि कोई इस को भरने के डर से नियम न तोड़े. मगर गांव वालों ने इस स्वच्छता मिशन में पूरा साथ दिया और कभी ऐसी नौबत नहीं आई कि किसी पर जुर्माना लगाना पड़ा हो.
उन्होंने आगे बताया कि साल 2000 में विलेज मैनेजमैंट कमेटी बनाई गई. इस में 10 सदस्य हैं. कमेटी का चुनाव हर साल गांव वाले मिल कर करते हैं और यह कमेटी गांव की साफसफाई, भाईचारे और नशे वगैरह पर नजर रखती है.
गारो आदिवासी समाज के इस गांव में पढ़ाईलिखाई की दर भी सौ फीसदी है. यहां सभी लोग अपनी बेटियों को पढ़ाते हैं. 9वीं जमात में पढ़ने वाली सल्ची मोमिन रोजाना साइकिल से 12 किलोमीटर दूर स्कूल में पढ़ने जाती है. उस के गांव में 8वीं जमात तक ही पढ़ाई का इंतजाम है.
बालिजाना ब्लौक की प्रमुख रत्ना देवी बताती हैं कि पहले यहां लोगों ने घरों में ही कच्चे शौचालय बनाए थे. इस के लिए सभी ने मिल कर श्रमदान किया था. सरकार की तरफ से योजना आने पर अब हर घर में पक्के शौचालय बन गए हैं. जल्द ही गांव को पक्की सड़क से भी जोड़ा जाएगा.
सभी लोग मिल कर हफ्ते में एक दिन पूरे गांव की सफाई करते हैं. पीने के पानी के लिए यहां 7 हैंडपंप भी लगे हैं.

24 अप्रैल, 2017 की दोपहर के यही कोई 1 बजे मुंबई से सटे जिला थाणे के उपनगर दिवां मुंब्रा के जय हनुमान गणेशनगर परिसर की वेलफेयर सोसाइटी के मकान नंबर 2 की रहने वाली मृणाल अपने घर की ओर तेजी से चली जा रही थी. उस समय उसे पता नहीं था कि सिरफिरा अतुल सिंह उस का पीछा करता हुआ आ रहा है. मृणाल का मकान काफी घनी आबादी वाली बस्ती में था, जिस से वह काफी सुरक्षित माना जा सकता था. इस के अलावा घर के बाहर लोहे की मजबूत ग्रिल लगी थी, जिस से घर भी काफी सुरक्षित था. मृणाल जैसे ही लोहे की ग्रिल में लगा दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुई, वैसे ही एकदम से अतुल सिंह भी उस के पीछे अंदर दाखिल हो गया.
मृणाल कुछ कर पाती उस के पहले ही उस ने ग्रिल में लगा दरवाजा अंदर से बंद कर दिया. अचानक अतुल को घर के अदंर देख कर मृणाल घबरा गई. उस की शक्ल देख कर ही उसे उस का इरादा भांपते देर नहीं लगी. सहमी आवाज में उस ने कहा, ‘‘तुम यहां क्यों आए हो?’’
‘‘वही लेने, जो तुम मुझे देना नहीं चाहती. आज मैं फैसला करने आया हूं.’’ अतुल सिंह ने धमकी भरे लहजे में कहा, ‘‘तुम जानती हो कि मैं तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं. लेकिन तुम्हें तो मेरे प्यार की कोई परवाह नहीं है. खूब सोचसमझ कर बताओ, तुम्हें मेरा प्यार स्वीकार है या नहीं?’’
मृणाल न जाने कितनी बार उसे मना कर चुकी थी. इसलिए अतुल की धमकी पर ध्यान न देते हुए उसे अपने घर से निकल जाने को कहा. लेकिन अतुल उस के घर से बाहर जाने को तैयार नहीं था. दोनों में जोरजोर से कहासुनी होने लगी. जिसे सुन कर आसपड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए.
लेकिन ग्रिल का दरवाजा अंदर से बंद था, इसलिए वहां इकट्ठा लोगों में से कोई भी मृणाल की मदद नहीं कर पा रहा था. सभी बाहर से ही दोनों को समझा रहे थे. मृणाल की तो कोई बात ही नहीं थी, अतुल के सिर पर प्यार का ऐसा भूत सवार था कि उस पर किसी की बात का कोई असर नहीं हो रहा था.

हद तो तब हो गई, जब अतुल ने धक्का दे कर मृणाल को जमीन पर गिरा दिया और चीख कर बोला, ‘‘तू खुद को समझती क्या है? मैं बेवकूफ हूं, जो तुझे इतना प्यार करता हूं. आज मैं अपने इस प्यार का किस्सा ही खत्म किए देता हूं. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी… समझी…?’’
इतना कह कर अतुल ने पैंट की जेब में रखा चाकू एवं कटर निकाल लिया. उस के हाथों में खुला चाकू और कटर देख कर मृणाल डर गई और छोड़ देने के लिए गिड़गिड़ाने लगी. अतुल का इरादा भांप कर बाहर खड़े लोग भी सहम गए. डरीसहमी मृणाल ने आखिरी प्रयास करते हुए कहा, ‘‘अतुल, तुम यह ठीक नहीं कर रहे हो. मुझे मार कर तुम भी बच नहीं पाओगे.’’
अतुल तो निर्णय कर के आया था, इसलिए मृणाल की बातों का उस पर कोई असर नहीं हुआ. बाहर खड़े लोग भी अतुल को समझाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन अतुल जो निर्णय कर के आया था, उस पर अटल रहते हुए उस ने पागलों की तरह जमीन पर गिरी पड़ी मृणाल के शरीर पर चाकुओं से वार करना शुरू कर दिया.
मृणाल ने उसे रोकने की कोशिश तो की, लेकिन निहत्थी मृणाल उस के चाकू के वारों को कैसे रोक सकती थी. अतुल मृणाल पर वार पर वार कर रहा था. बाहर खड़े लोग उस से मृणाल को छोड़ देने के लिए अनुनयविनय कर रहे थे. इस के अलावा वे और कुछ कर भी नहीं सकते थे, क्योंकि बाहर लगी लोहे की ग्रिल काफी मजबूत थी.
इतनी जल्दी वह कट भी नहीं सकती थी. इसलिए बाहर खड़े लोग मृणाल की कोई मदद नहीं कर सके. उन्हीं के सामने सिरफिरे अतुल ने मृणाल को तड़पातड़पा कर मार डाला. इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि जिस समय अतुल मृणाल की हत्या कर रहा था, उसी समय मृणाल के पति मंगेश घड़ीगांवकर ने मृणाल के मोबाइल पर फोन किया.
मृणाल तो मर चुकी थी, फोन अतुल ने उठाया. उस की आवाज सुन कर मंगेश घबरा गया. उस ने कहा, ‘‘अतुल, तुम मेरे घर में क्या कर रहे हो?’’
‘‘मुझे जो करना था, वह मैं कर चुका हूं. मैं ने जो किया है, तुम आ कर देख लो. मैं तो जेल जा कर जल्द ही बाहर आ जाऊंगा. लेकिन तुम क्या करोगे?’’ इतना कह कर अतुल ने फोन काट दिया.
अतुल की आधीअधूरी बातें सुन कर मंगेश बुरी तरह घबरा गया. उसे समझते देर नहीं लगी कि मृणाल के साथ कोई अनहोनी हो चुकी है. क्योंकि अतुल की फितरत से वह अच्छी तरह वाकिफ था. उस ने तुरंत कंपनी से छुट्टी ली और घर के लिए चल पड़ा. मंगेश अपने घर पहुंचता, उस के पहले ही उस के घर के बाहर खड़े लोगों में से किसी ने फोन कर के पुलिस को बुला लिया था.
घर पहुंच कर मंगेश ने पत्नी की हालत देखी तो बेहोश हो गया. पड़ोसियों ने किसी तरह उसे संभाला. दिनदहाड़े हुई इस हत्या से पुलिस भी हैरान थी.
सूचना मिलते ही थाना मुंब्रा के थानाप्रभारी रविंद्र तायडे़ एआई मनोहर पाटिल, इंसपेक्टर सदाशिव निकंब, एसआई महानन, सिपाही संतोष राऊत, गणेश देशमुख और राहुल शैलार के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थाने से चलने से पहले उन्होंने इस घटना की सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी.
रविंद्र तायड़े सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे तो वहां इकट्ठा लोग काफी घबराए हुए थे. पुलिस उन्हें हटा कर दरवाजे पर पहुंची तो वहां की स्थिति दिल दहला देने वाली थी. बाहर वाले कमरे में खून ही खून फैला था. उसी खून के बीच एक महिला की लाश पड़ी थी. लाश के पास ही अतुल चुपचाप सिर झुकाए बैठा था.
पुलिस को देखते ही अतुल ने उठ कर दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खुलते ही पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया.
रविंद्र तायडे़ घटनास्थल का निरीक्षण शुरू करने वाले थे कि सीपी परमवीर सिंह, डीसीपी आशुतोष डुबरे, एसीपी रमेश धुमाल भी आ पहुंचे. अधिकारियों के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया.
चूंकि अभियुक्त पकड़ा जा चुका था, इसलिए इस मामले में अधिकारियों को करने के लिए कुछ नहीं था. अधिकारी तुरंत लौट गए. उन के जाने के बाद रविंद्र तायड़े ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर मृणाल की लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. अतुल ने जिस चाकू और कटर से मृणाल की हत्या की थी, वे वहीं पड़े थे. पुलिस ने उन्हें कब्जे में ले लिया.
इस के बाद पुलिस अतुल सिंह एवं मंगेश घड़ीगांवकर को साथ ले कर थाने आ गई और उस की शिकायत पर मृणाल की हत्या का मुकदमा अतुल सिंह के खिलाफ दर्ज कर लिया. इस के बाद उस से पूछताछ शुरू हुई. इस पूछताछ में अतुल सिंह ने मृणाल की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह एकतरफा प्यार में पागल प्रेमी की कहानी थी.
22 साल का अतुल सिंह जिला थाणे के दिवां पूर्व मुंब्रा देवी कालोनी स्थित श्रीकृष्णा सोसाइटी के एक चालनुमा मकान में रहता था. उस के पिता कमलेश सिंह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर के रहने वाले थे. मुंबई में वह एक प्राइवेट कंपनी में सिक्योरिटी सुपरवाइजर थे.
उन के परिवार में पत्नी के अलावा बेटी और बेटा अतुल सिंह था. इस समय वह कालेज में पढ़ रहा था. पढ़ने में वह ठीकठाक था, जिस सोसाइटी में कमलेश सिंह परिवार के साथ रहते थे, उसी में उन के घर के ठीक सामने वाले मकान में मंगेश घड़ीगांवकर अपनी 32 साल की पत्नी मृणाल के साथ रहता था. जिस समय मंगेश पत्नी के साथ वहां रहने आया था, उस समय अतुल काफी छोटा था. तब वह स्कूल में पढ़ रहा था.
मंगेश घड़ीगांवकर बेलापुर, नवी मुंबई स्थित एक प्रतिष्ठित फर्म में नौकरी करता था. उस की पत्नी मृणाल मुंब्रा में एक कंप्यूटर सैंटर में नौकरी करती थी. वह सुबह 9 बजे जाती थी तो दोपहर 12 बजे तक घर आ जाती थी. इस के बाद शाम 5 बजे जाती थी तो 8 बजे रात को वापस आती थी.
34 साल का मंगेश घड़ीगांवकर महाराष्ट्र के सोलापुर का रहने वाला था. सन 2006 में उस ने मृणाल से प्रेम विवाह किया था. मृणाल तन से जितनी खूबसूरत थी, मन से उतनी ही सरल और चंचल थी. स्वस्थ, सुंदर, सौंदर्यमयी मृणाल आधुनिक विचारों वाली थी. किसी से भी बात करने में वह झिझकती नहीं थी. पतिपत्नी का स्वभाव एक जैसा था. शायद इसीलिए सोसाइटी के सभी लोग उन्हें पसंद करते थे.
आमनेसामने रहने की वजह से कमलेश सिंह के परिवार से उन का कुछ ज्यादा ही लगाव था. मृणाल को जब भी समय मिलता था, वह कमलेश सिंह के घर आ जाती थी और सभी से बातें करती थी. यही हाल मंगेश का भी था.
मृणाल अतुल से 10 साल बड़ी थी इसलिए वह उसे छोटा भाई मानती थी. उस से व्यवहार भी उसी तरह करती थी. अतुल भी उस के साथ वैसा ही व्यवहार करता था. लेकिन समय के साथ सब बदल गया. अतुल जैसे ही बड़ा हो कर कालेज की ड्योढी पर पहुंचा, उस पर कालेज का रंगढंग चढ़ने लगा.
उस के दिलोदिमाग पर मृणाल की सुंदरता छाने लगी. वह मन ही मन मृणाल को चाहने लगा. इस बात से अंजान मृणाल उस से पहले की ही तरह मिलती रही. उसी तरह हंसतीमुसकराती और मीठीमीठी बातें करती रही.
मृणाल की बातों और मुसकराहट को अतुल गंभीरता से लेने लगा. वह उसे चाहने लगा. वह अपना प्यार मृणाल पर जाहिर कर पाता, उस के पहले ही मृणाल के उस घर का एग्रीमेंट खत्म हो गया और उसे वह मकान छोड़ कर कहीं और जाना पड़ा.
जनवरी, 2016 में मृणाल वह मकान खाली कर के पति के साथ दिवां पूर्व दातीवली तालाब परिसर के ओमकार दर्शन सोसाइटी में जा कर रहने लगी. इस बात से अतुल काफी दुखी हुआ. कुछ दिनों तक तो वह मृणाल की याद में इधरउधर भटकता रहा, लेकिन जल्दी ही उस ने मृणाल का नया मकान खोज लिया और मंगेश की अनुपस्थिति में उस से मिलने उस के घर आनेजाने लगा.
पुराना पड़ोसी होने के नाते मृणाल अतुल से उसी तरह बातव्यवहार करती रही, जैसे पहले किया करती थी. उसी बीच एक दिन अतुल मृणाल के घर पहुंचा और मौका देख कर उस ने मृणाल से अपने प्यार का इजहार कर दिया. मृणाल के करीब जा कर बिना किसी भूमिका के उस का हाथ अपने हाथ में ले कर उस ने कहा, ‘‘मृणाल, तुम मेरी बात का बुरा मत मानना. मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और तुम से विवाह करना चाहता हूं.’’

अतुल सिंह की ये बातें सुन कर मृणाल सन्न रह गई. अपना हाथ झटके से छुड़ा कर उस ने कहा, ‘‘तुम पागल तो नहीं हो गए हो? मैं तुम्हें अपना छोटा भाई मानती हूं, भाई की तरह प्यार करती हूं और तुम मुझ से यह क्या कह रहे हो? मेरी और तुम्हारी उम्र में कितना अंतर है. मैं शादीशुदा हूं, किसी की पत्नी हूं, हमारी भी कुछ मर्यादाएं हैं. हमारी अपनी एक जिंदगी है, जिस में हम बहुत खुश हैं.’’
‘‘मेरी बात तो सुनो…’’ अतुल सिंह अपनी बात पूरी कर पाता, उस के पहले ही मृणाल ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तुम ने हिम्मत कैसे की मुझ से इस तरह बात करने की और फिर मैं तुम्हारी बात क्यों सुनूं? तुम मुझ से इस तरह की बात करोगे, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था.’’
‘‘मेरी बात मानो मृणाल, मैं तुम्हें बहुत सुखी रखूंगा. तुम्हारे सारे सपने पूरे करूंगा, तुम्हें कभी किसी बात की शिकायत नहीं होने दूंगा.’’
‘‘अब बहुत हो गया अतुल. अच्छा होगा कि तुम चुपचाप यहां से चले जाओ और फिर कभी यहां आना भी मत.’’ इतना कह कर मृणाल ने अतुल को धक्का दे कर घर से बाहर कर दिया.
मृणाल के इस व्यवहार से अतुल काफी दुखी हुआ. वह मृणाल के घर के बाहर तो आ गया, लेकिन जाते हुए उस ने धमकी दी, ‘‘मैं तुम्हे प्यार करता हूं और करता रहूंगा. तुम्हें हर हाल में मेरे प्यार को स्वीकार करना होगा. अगर तुम ने मेरे प्यार को स्वीकार नहीं किया तो परिणाम बहुत बुरा हो सकता है.’’
मृणाल ने उस समय तो अतुल को अपने घर से भगा दिया था, लेकिन वह उस की धमकी से काफी डर गई. शाम को जब मंगेश घर आया तो उस ने सारी बात उसे बता दी. अतुल की इस हरकत के बारे में जान कर मंगेश का खून खौल उठा. उस ने अतुल को फोन कर के अपने घर बुलाया और उसे खूब डांटाफटकारा. इस के बाद माफी मांगने को कहा.
इस पर अतुल और मंगेश में विवाद हो गया तो गुस्से में मंगेश ने अतुल को कई थप्पड़ जड़ दिए, साथ ही चेतावनी दी कि आज के बाद वह उस के घर के आसपास भी दिखाई दिया तो वह उसे पुलिस के हवाले कर देगा.
मंगेश ने अतुल सिंह के साथ जो किया सो तो किया ही, उस के पिता कमलेश सिंह से भी उस की शिकायत कर दी. कमलेश सिंह ने बेटे को आड़े हाथों लिया और मंगेश से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘जाने दो भाईसाहब, अभी यह नादान है. मैं इसे समझा दूंगा. अब यह इस तरह की हरकत कभी नहीं करेगा.’’
पिता के डांटनेफटकारने से कुछ दिनों तक तो अतुल शांत रहा, लेकिन कुछ दिनों बाद वह फिर पुरानी राह पर चल पड़ा. इस बार वह कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो गया था. वह मृणाल को फोन कर के भी परेशान करने लगा था. अलगअलग नंबरों से फोन कर के वह मृणाल से सौरी बोलता और अपने प्यार का इजहार करता.
अतुल की इस हरकत से परेशान हो कर मृणाल ने मंगेश से शिकायत की तो उस ने अतुल की जम कर पिटाई कर दी. उस ने मृणाल का नंबर ही नहीं बदल दिया, बल्कि बिना किसी को बताए घर भी बदल दिया. इस बार वह गणेशनगर में आ कर रहने लगा था.
लेकिन मृणाल के प्यार में पागल अतुल ने जल्दी ही उस का यह मकान भी खोज लिया. अब वह मृणाल से मिलने और उसे फोन करने के मूड में नहीं था. अब वह उस से अपने अपमान का बदला लेना चाहता था. क्योंकि अब उसे पूरा विश्वास हो गया था कि जिस मृणाल के प्यार में वह पागल है, वह उसे कभी नहीं मिल सकती. यही सोच कर उस ने मृणाल के प्रति एक खतरनाक फैसला ले लिया.
फैसला ले कर अतुल ने उसे खत्म करने की जो योजना बनाई, वह उसे साकार करने का मौका तलाशने लगा. आखिर उसे वह मौका 24 अप्रैल, 2017 को तब मिल गया, जब मृणाल कंप्यूटर सैंटर से घर लौट रही थी.
चाकू और कटर का उस ने पहले ही इंतजाम कर लिया था. उस का सोचना था कि अगर मृणाल के दिल में उस के लिए प्यार नहीं है तो उसे जीने का कोई हक नहीं है. यही सोच कर अतुल ने उसे खत्म कर दिया. उस ने उस की हत्या कर मंगेश का बसाबसाया घर उजाड़ दिया. मजे की बात तो यह है कि उस ने जो किया है, उस का उसे जरा भी पश्चाताप नहीं है.
पूछताछ के बाद पुलिस ने अतुल सिंह के खिलाफ मृणाल की हत्या का मुकदमा दर्ज कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. उस ने जो लड़कपन किया, उस से उसे क्या मिला, एक जिंदगी तो गई ही, एक घर बरबाद कर के वह भी जेल चला गया. मांबाप का वह एकलौता बेटा था, वे जिंदगी भर अब उस के लिए तड़पते रहेंगे.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
21 अप्रैल, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना मिसरोद के थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह कुशवाह गश्त से लौट कर क्वार्टर पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि 35-36 साल का एक आदमी उन के सामने आ खड़ा हुआ. उस के सीने से खून रिस रहा था.
ऐसा लग रह था, जैसे उसे चाकू मारे गए हों, पर ठीक से लगे न हों. वहां गहरे घाव के बजाय गहरे खरोंच के निशान थे. उसे देख कर राजबहादुर सिंह को यह आपसी मारपीट का मामला लगा.
उस व्यक्ति ने अपना नाम सौदान सिंह कौरव बताया था. राजबहादुर सिंह ने थाने आने की वजह पूछी तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं कौशलनगर के पास रहता हूं. आज रात 3 बजे 4 लोग मेरे घर में घुस आए और मेरी पत्नी मंगला से जबरदस्ती करने लगे. मैं ने और मेरी पत्नी ने विरोध किया तो उन्होंने हम दोनों की बुरी तरह से पिटाई कर दी. उस मारपीट में मेरी पत्नी को अधिक चोट लगी, जिस से वह बेहोश हो गई है.’’
घायल मंगला की मौत हो सकती थी, इसलिए थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह ने तुरंत एसआई राजकुमार दांगी को कौशलनगर भेजा. वहां पहुंच कर पता चला कि मकान की दूसरी मंजिल पर सौदान सिंह पत्नी मंगला और 2 बच्चों के साथ रहता था. राजकुमार कमरे पर पहुंचे तो देखा सामने पलंग पर मंगला लेटी थी. उन्होंने उसे नजदीक से देखा तो लगा वह मर चुकी है.
उन्होंने इधरउधर देखा तो कमरे की स्थिति देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वहां किसी तरह का झगड़ा या मारपीट हुई थी. संदेह हुआ तो उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह को दे दी.

मामला लूट और दुष्कर्म की कोशिश के साथ हत्या का था, इसलिए राजबहादुर सिंह ने तुरंत यह बात एसपी सिद्धार्थ बुहुगुणा एवं एसडीओपी अतीक अहमद को बताई और खुद सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.
राजबहादुर सिंह ने एक गहरी नजर सौदान सिंह के चेहरे पर डाली तो उन्हें उस के चेहरे पर छाए दुख के बादल बनावटी लगे. उन्हें अब तक की अपनी पुलिस की नौकरी में इतना तो अनुभव हो ही चुका था कि आदमी पत्नी के मरने पर किस तरह दुखी होता है.
उन्होंने सौदान सिंह के शरीर पर लगे चाकू के घावों को ध्यान से देखा तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी बहुत चालाक और मक्कार है. उस के घाव किसी दूसरे द्वारा मारे गए चाकू के नहीं हैं, इन्हें उस ने खुद चाकू मार कर बनाया है. लेकिन उन्होंने उस पर कुछ जाहिर नहीं होने दिया.
उन्होंने मकान का निरीक्षण किया तो 2 कमरों के उस के मकान में बाहर के कमरे में डबलबैड के आकार का लंबाचौड़ा बिस्तर जमीन पर था. इस के अलावा किचन में भी एक बिस्तर जमीन पर ही लगा था. उस की ओर इशारा करते हुए राजबहादुर सिंह ने पूछा, ‘‘इधर कौन सोया था?’’
‘‘साहब, मैं यहीं सोता हूं.’’ सौदान सिंह ने कहा.
‘‘तुम यहां सोए थे तो तुम्हें घटना के बारे में कैसे पता चला?’’
‘‘साहब, बाहर के कमरे में शोर हुआ तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं उठ कर वहां पहुंचा तो देखा 4 युवक मेरी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर रहे थे. वह उन का विरोध कर रही थी. मैं ने मंगला को बचाने की कोशिश की तो उन्होंने चाकू से मेरे ऊपर हमला कर दिया. अपने मकसद में सफल होते न देख उन्होंने मंगला पर भी हमला कर दिया.’’ सौदान ने कहा.
‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.
‘‘साहब, वे तो मेरे मातापिता के पास लटेरी में हैं.’’
सौदान सिंह के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मंगला की हत्या का आरोपी उन के सामने खड़ा है. क्योंकि बच्चे घर में होते तो वह पत्नी की हत्या नहीं कर सकता था. इस के अलावा उस ने जो अलग बिस्तर लगाया था, बच्चों के होने पर माना जाता कि एकांत पाने के लिए लगाया होगा. लेकिन जब बच्चे घर पर नहीं हैं तो अलग बिस्तर लगाने की क्या जरूरत थी?

पड़ोसियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि रात में किसी ने किसी तहर का शोरशराबा या चीखपुकार नहीं सुनी थी. राजबहादुर सिंह ने एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा को सारी जानकारी दी तो उन्होंने सौदान सिंह को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.
राजबहादुर सिंह ने सौदान सिंह के मातापिता तथा मंगला के घर वालों को उस की हत्या की खबर दे दी थी. इस के बाद लाश का बारीकी से निरीक्षण कर घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था.
मंगला की हत्या की खबर पा कर सौदान सिंह का बड़ा भाई गोपाल सिंह तो भोपाल आ गया था, लेकिन मंगला के मायके से कोई नहीं आया था. राजबहादुर सिंह ने एक बार फिर सौदान सिंह से पूछताछ की, लेकिन मंझे हुए खिलाड़ी की तरह उस ने इस बार भी वही सारी बातें दोहरा दीं, जो वह पहले बता चुका था.
राजबहादुर सिंह ने कमरों के निरीक्षण में देखा था कि जिस कमरे में मंगला सोई थी, उस की कुंडी सहीसलामत थी. उसे बाहर से हाथ डाल कर नहीं खोला जा सकता था. सौदान सिंह ने बताया था कि रात को सोते समय बाहर वाला दरवाज अंदर से बंद था. राजबहादुर सिंह ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘रात को सोते समय दरवाजा अंदर से बंद था न?’’
‘‘जी साहब.’’
‘‘दरवाजा अंदर से बंद था तो वे लोग अंदर कैसे आए, क्या तुम ने दरवाजा खोल कर उन्हें अंदर बुलाया था?’’
‘‘नहीं…नहीं साहब, मैं तो अंदर वाले कमरे में सो रहा था.’’ सौदान सिंह ने घबरा कर कहा.
‘‘तो क्या दरवाजा मंगला ने खोला था?’’
‘‘हो सकता है, उसी ने खोला हो?’’ सौदान सिंह के मुंह से यह जवाब सुन कर राजबहादुर सिंह ने कहा, ‘‘इस का मतलब उन चारों को मंगला ने बुलाया था. अगर उन्हें उस ने बुलाया था तो उस ने शोर क्यों मचाया, उस की रजामंदी से चारों चुपचाप अपना काम कर के जा सकते थे.’’
सौदान सिंह थानाप्रभारी की इस बात का जवाब नहीं दे सका तो उन्होंने डांट कर कहा, ‘‘जो सच्चाई है, उसे खुद ही बता दो, वरना पुलिस सच्चाई उगलवाएगी तो तुम्हारी क्या हालत होगी, शायद तुम नहीं जानते. वैसे सच्चाई का पता हम सभी को चल चुका है. लेकिन हम तुम्हारे मुंह से हकीकत सुनना चाहते हैं कि तुम ने अपनी पत्नी की हत्या क्यों और कैसे की है?’’
सौदान सिंह तुरंत राजबहादुर सिंह के पैरों पर गिर कर रोते हुए बोला, ‘‘साहब, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही मंगला की हत्या की है. साहब उस ने मुझे इस तरह मजबूर कर दिया था कि हत्या के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. मैं मर्द हूं साहब, कितनी बेइज्जती सहता. बेइज्जती से तंग आ कर ही मैं ने उस की हत्या की है.’’
इस के बाद सौदान सिंह ने मंगला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—
सौदान सिंह मध्य प्रदेश के जिला विदिशा के थाना लटेरी के गांव सुनखेड़ा का रहने वाला था. प्राइमरी तक पढ़ा सौदान गांव में पिता के सथ कारपेंटर का काम करता था. इस के अलावा खेती की थोड़ी जमीन भी थी. इस तरह कुल मिला कर उस के परिवार की आराम से गुजरबसर हो जाती थी.
सौदान सिंह मातापिता के साथ खुश था. कोई 12 साल पहले उस की शादी भिंड की रहने वाली मंगला के साथ हो गई. पत्नी ने आते ही उस की जिंदगी बदल दी. वह इंटर तक पढ़ी थी. वह थी भी थोड़ी खूबसूरत. इसलिए उस के मित्र उस से जलने लगे थे.
जबकि सौदान उस से शादी कर के पछता रहा था. इस की वजह यह थी कि मंगला स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह आजादी में विश्वास करती थी और ऐश की जिंदगी जीने की शौकीन थी. मंगला को अपनी सुंदरता का अहसास तब हुआ, जब गांव के लड़के उस के घर के चक्कर लगाने लगे. अपनी खूबसूरती का अहसास होते ही वह उन्हें अपनी खूबसूरती की झलक दिखा कर परेशान करने लगी थी. तभी घर वालों ने उस की शादी कर दी थी और इस तरह वह ससुराल आ गई.
ससुराल में मंगला सासससुर के रहते बिना सिर ढके से बाहर नहीं निकल सकती थी. जबकि स्वच्छंदता के लिए घर से बाहर जाना जरूरी था. इस के लिए मंगला ने अपने लिए पति के साथ शहर जाने का रास्ता निकाला.
सौदान सिंह से ज्यादा पढ़ीलिखी और उस से अधिक सुंदर होने की धौंस दे कर मंगला ने कहा, ‘‘मैं इस गांव में तुम्हारे साथ कब तक रह कर अपनी जिंदगी बेकार करूंगी. शहर चलो, गांव में कुछ नहीं रखा है. यहां रह कर हम न अपने लिए और न बच्चों के लिए 2 पैसे बचा पाएंगे. शहर में कमा कर कुछ जमा कर लेंगे.’’
लेकिन सौदान सिंह गांव में रहने वाले अपने मांबाप को छोड़ कर शहर नहीं जाना चाहता था. पर मंगला की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. पत्नी के कहने पर 3 साल पहले सौदान सिंह भोपाल आ गया और कौशलनगर में किराए का मकान ले कर रहने लगा. उस ने टाइल्स लगाने का काम सीखा और इसे ही रोजीरोटी का साधन बना लिया.
सौदान सिंह अपने इस काम से इतना कमा लेता था कि उस की गृहस्थी अच्छे से चल रही थी. उस का सोचना था कि गांव से शहर आ कर मंगला सुधर जाएगी, लेकिन हुआ इस का उलटा. मंगला भोपाल आ कर सुधरने की कौन कहे, शहर आ कर उस की चाहतों ने और भी ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी. उसे यहां कोई कुछ कहने टोकने वाला नहीं था.
2 बच्चों की मां होने के बावजूद उसे जवानी के न याद आ गए थे. एक ही इशारे में वह मनचलों को घायल कर देती थी. वहां भी मंगला ने अपने चाहने वालों की लाइन लगा दी थी. इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं.
सौदान सिंह को जब पत्नी की हरकतों का पता चला तो उस ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी, पर उस पर न पति के समझाने का असर हुआ न डांटनेफटकारने का. क्योंकि वह तो उसे गंवार, जाहिल और मंदबुद्धि ही नहीं समझती थी, बल्कि बातबात में कम पढ़ेलिखे होने का ताना भी मारती थी.
दरअसल, मंगला पति पर हावी हो कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी. लेकिन सौदान सिंह अकसर मंगला को टोकता रहता था. आखिर खीझ कर मंगला ने सौदान सिंह को नीचा दिखाने का निर्णय कर अपने आशिकों को उस के सामने ही घर बुलाने लगी. यही नहीं, उस के सामने वह प्रेमियों के साथ बैडरूम में चली जाती थी.
इतने से भी उसे संतोष नहीं होता था. वह उसी के सामने मोबाइल पर अपने चाहने वालों से अश्लील बातें करती थी. सौदान सिंह मर्द था, पत्नी की इन गिरी हुई हरकतों से उसे गुस्सा तो बहुत आता था, पर बच्चों के बारे में सोच कर उस गुस्से को पी जाता था.

पहले मंगला पति की ही उपेक्षा करती थी, लेन बाद में वह बच्चों की भी उपेक्षा करने लगी थी. वह सुबह ही काम पर चला जाता था. उस के जाने के बाद मंगला आशिकों के साथ घूमने निकल जाती थी. अगर बाहर नहीं जाती तो मोबाइल पर ही घंटों अपने चाहने वालों से बातें करती रहती थी.
ऐसे में मंगला को बच्चों के खानेपीने की भी चिंता नहीं रहती थी. अगर सौदान सिंह कुछ कहता तो वह उस से मारपीट करने पर उतारू हो जाती थी. कई बार तो उस पर हाथ भी उठा दिया था. मंगला को प्रेमियों से मिलने में किसी तरह की परेशानी न हो, इस के लिए उस ने नौकरी कर ली. यह नौकरी उस के एक प्रेमी चंदेश ने लगवाई थी.
चंदेश हीरा कटाई की उस कंपनी में पहले से नौकरी करता था, उसी की सिफारिश पर मंगला को यह नौकरी मिली थी. इसी नौकरी की आड़ में मंगला और चंदेश की रासलीला आसानी से चल रही थी.
नौकरी लग जाने के बाद मंगला सौदान सिंह को और भी ज्यादा जलील करने लगी थी. वह उस से कहती थी कि हीरे की कद्र जौहरी ही करते हैं.
इधर मंगला का एक पुराना प्रेमी अमन भी आने लगा था. वह उस का शादी से पहले का प्रेमी था. शादी से पहले ही उस के मंगला से अवैध संबंध थे. अमन जब भी आता था, उस के घर पर ही रुकता था. मंगला के बारे में जब मोहल्ले की महिलाओं को पता चला तो वे उस के बारे में तरहतरह की बातें करने लगीं.
इस बदनामी से बचने के लिए सौदान सिंह ने मंगला से गांव चलने को कहा तो उस ने उसे धकियाते हुए कहा, ‘‘तुझे गांव जाना हो तो जा, मैं अब यहीं रहूंगी. मुझे अब तेरी जरूरत भी नहीं है.’’
धीरेधीरे मंगला की तानाशाही बढ़ती जा रही थी, जिस से सौदान सिंह काफी परेशान रहने लगा था. वह कईकई दिनों तक उसे अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह जब भी उस के पास जाता, वह डांट कर कहती, ‘‘गंदे, जाहिल, तेरे शरीर से बदबू आती है. तू मेरे पास मत आया कर.’’
सौदान सिंह को दुत्कार कर उस के सामने ही मंगला अपने प्रेमियों से हंसहंस कर अश्लील बातें करने लगी. पत्नी की इन हरकतों से तंग आ कर सौदान सिंह ने प्रण कर लिया कि अब इसे खत्म कर देगा. क्योंकि अगर अब यह उस की नहीं रही तो वह उसे किसी और के लिए भी नहीं छोड़ेगा. यही सोच कर उस ने 5 दिन पहले बच्चों को दादादादी के पास लटेरी पहुंचा दिया.
20 अप्रैल की रात खाना खा कर पतिपत्नी लेट गए. बच्चे घर पर नहीं थे, इसलिए सौदान सिंह ने मंगला से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. लेकिन तभी मंगला के किसी प्रेमी का फोन आ गया. सौदान ने मंगला के हाथ से मोबाइल छीन कर फोन काटना चाहा तो उस ने उसे तमाचा मार दिया.
पतिपत्नी में झगड़ा होने लगा. सौदान सिंह ने गलती स्वीकार करते हुए एक बार फिर उस से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. इस पर मंगला ने कहा, ‘‘अपनी औकात देखी है गंदी नाली के कीड़े. मेरे साथ संबंध बनाने के बारे में तूने सोच कैसे लिया. मैं तुझे अपना शरीर अब कभी नहीं छूने दूंगी.’’
मंगला की इस बात से सौदान सिंह हैरान रह गया. उस ने उसी समय तय कर लिया कि आज ही वह उसे खत्म कर देगा. उस ने लेट कर आंखें मूंद लीं. उस के बगल में लेटी मंगला अपने प्रेमी से फोन पर अश्लील बातें करती रही. करीब 45 मिनट तक मंगला ने फोन पर गंदीगंदी बातें कीं, जिन्हें सौदान सिंह सुनता रहा.
मंगला फोन काट कर सो गई. करीब 3, साढे़ 3 बजे सौदान उठा और पलंग के नीचे छिपा कर रखी लोहे की रौड निकाल कर पूरी ताकत से उस के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में वह बेहोश हो गई. उसी बेहोशी की हालत में मंगला के सीने पर बैठ कर उस ने उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

पुलिस से बचने के लिए सौदान सिंह ने सीने पर चाकू मार कर घाव किए और थाने पहुंच कर पुलिस को लूट और जबरदस्ती की झूठी कहानी सुना दी. अपने बचाव के लिए उस ने दूसरे कमरे में खुद ही बिस्तर बिछाया था.
थानाप्रभारी ने सौदान सिंह की निशानदेही पर वह रौड बरामद कर ली थी, जिस से मंगला की हत्या की गई थी. पूछताछ और सारे साक्ष्य जुटा कर थाना मिसरौद पुलिस ने पत्नी के हत्यारे सौदान सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
बिहार में पटना जिले के नौबतपुर ब्लौक की जमलपुरा ग्राम पंचायत के जमलपुरा गांव में बिचौलियों की खुराफात की वजह से कई मकान आधीअधूरी हालत में हैं. उन की दीवारें तो पक्की बनाई गई हैं, लेकिन छत की जगह फूस डाल दिया गया है.
इस इलाके के ‘विकास मित्र’ रामनाथ राम के मुताबिक, जमलपुरा टोले में तकरीबन 546 महादलित गरीबी की रेखा के नीचे अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं. उन की आमदनी के ज्यादा साधन नहीं हैं. पंचायत समिति के सदस्य अशोक कुमार का कहना है कि इस टोले के लोग गैरमजरूआ जमीन पर रहते हैं. इस का रकबा एक एकड़, 52 डिसमिल है. इस का प्लाट नंबर 527 और खाता नंबर 69 है. अभी तक वासगीत परचा जारी नहीं किया गया है, फिर भी इसी जमीन पर इंदिरा आवास योजना के मकान बनाए जा रहे हैं. इंदिरा आवास योजना के तहत 45 हजार रुपए मिलते हैं और उन में से 7 हजार रुपए डकार लिए जाते हैं.
सरकार ने बढ़ती महंगाई को देखते हुए 5 साल पहले इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनाने वाली रकम तो बढ़ा दी थी, पर इस का फायदा गरीबों के बजाय दलाल उठा रहे हैं.
बड़े पैमाने पर पनप चुके दलालों ने योजना की रकम बढ़ने के बाद अपने कमीशन की रकम भी बढ़ा दी है. नतीजतन, पैसा बढ़ने के बाद भी गरीबों और दलितों को कोई फायदा नहीं हो पा रहा है. इस की वजह से गरीबों को मकान बनवाने में तमाम परेशानियां उठानी पड़ रही हैं. सरकारी रकम में दलालों की बंदरबांट से बहुत से गरीबों के मकान और शौचालय आधेअधूरे रह गए हैं.
कच्चा काम कराने के एवज में 26 फीसदी और पक्का काम कराने पर 22 फीसदी कमीशन देना पड़ता है. मिट्टी संबंधी काम कच्चा काम होता है. इस में मनरेगा के कार्यक्रम परियोजना पदाधिकारी को 10 फीसदी, रोजगार सेवक को 5 फीसदी, इंजीनियर को 5 फीसदी, असिस्टैंट इंजीनियर को 2 फीसदी और कंप्यूटर औपरेटर को एक फीसदी चढ़ावा देना पड़ता है.
पक्का काम कराने में सोलिंग कराने, पुलपुलिया बनाने पर परियोजना पदाधिकारी को 10 फीसदी, रोजगार सेवक को 5 फीसदी, इंजीनियर को 5 फीसदी, असिस्टैंट इंजीनियर को 2 फीसदी कमीशन मिल जाता है.
मनरेगा के कामों की जांच करने गई एनजीओ की टीम को मुखिया जम कर धमकाते भी हैं. बिहार के बांका जिले के चांदन ब्लौक की बड़फेरा तेतरिया ग्राम पंचायत के मुखिया ब्रह्मानंद दास उर्फ रामजी की मनमानी से मनरेगा का मकसद तारतार हो रहा है.
यह मुखिया मनरेगा के तहत काम करवा कर मजदूरों को मजदूरी नहीं देता है. जब मजदूर हल्ला करते हैं, तो कुछ कपड़े और अनाज दे कर उन का मुंह बंद कर देता है. उस ने आज तक मजदूरों को काम के बदले मजदूरी नहीं दी है.
बड़फेरा तेतरिया गांव की मजदूर बड़की मरांडी ने बताया कि उस के पास जौब कार्ड तो है, पर उस के हिसाब से काम नहीं मिलता है. मौखिक रूप से ही काम दिया जाता है. उस के जौब कार्ड का नंबर 333003 है.
बड़की मरांडी आगे बताती है कि 12 दिसंबर, 2010 से ले कर 25 दिसंबर, 2010 तक तिबतिमाली से ले कर अंतुआ काली मंदिर तक सड़क बनाने में मजदूरी का काम मिला था, पर आज तक मजदूरी नहीं मिली. वह और भी मजदूरों के नाम गिनाती है, जिन्हें मजदूरी नहीं दी गई.
कई मजदूरों ने बताया कि उन्होंने कई दफा मुखिया से मजदूरी की मांग की, पर मुखिया पैसे की कमी का बहाना बना कर उन्हें चलता कर देता था.
मुखिया की सीनाजोरी का यह हाल है कि इस बारे में बात करने पर वह सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर देता है. मनरेगा को ले कर ज्यादातर मुखिया की यही दलील होती है कि सरकार पैसा ही नहीं भेज रही है, तो ऐसे में मजदूरों को किस तरह से समय पर मजदूरी दी जा सकती है.
गौरतलब है कि मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूर को एक दिन के काम के बदले में 140 रुपए मजदूरी मिलती है. इस हिसाब से 14 दिनों के काम के बदले एक मजदूर को 1960 रुपए मिलने चाहिए. लेकिन मुखिया ने मजदूरों को मजदूरी की रकम के बजाय घटिया सामान दे कर उन का मुंह बंद कर दिया, जो सरासर गलत है.
सामाजिक कार्यकर्ता आलोक कुमार कहते हैं कि नकद पैसा मिलने से मजदूर अपनी जरूरत के हिसाब से उसे खर्च सकते हैं, पर मजदूरी के बदले घटिया सामान थमा कर मुखिया ने मजदूरों के साथसाथ मनरेगा के नियमों के साथ भी खिलवाड़ किया है. अगर मनरेगा के कामों की सही तरह से जांचपड़ताल की जाए, तो इस जैसे हजारों मुखिया और अफसरों की काली करतूतों का खुलासा हो सकता है.