यमला पगला दीवाना फिर से : फूहड़ कौमेडी का समावेश

पता नहीं फिल्मकारों को कब समझ में आएगा कि काठ की हांडी बार बार आग पर नहीं चढ़ती. देओल परिवार की 2011 की सफल हास्य फिल्म ‘‘यमला पगला दीवाना’’ का सिक्वल 2013 में ‘यमला पगला दीवाना 2’ के नाम से आया, तब इसे दर्शकों ने पसंद नहीं किया था. मगर पूरे पांच साल बाद उसका एक और सिक्वल ‘‘यमला पगला दीवना फिर से’’ लेकर आए हैं, जिसे देखकर दर्शक यही कहता है- कहां फंसाओ नाथ.

फिल्म की कहानी के केंद्र में अमृतसर के आयुर्वेदिक वैद्य पूरन सिंह (सनी देओल), उनका भाई काला (बौबी देओल) और किराएदार जयंत परमार (धर्मेंद्र) हैं. जयंत परमार पेशे से वकील हैं और साइड ट्रेक वाले स्कूटर पर सवारी करते रहते हैं. उस वक्त पुरानी फिल्मों के गाने बजते हैं.. वैद्य पूरनसिंह चुप रहते हैं, पर जब कोई उन्हें गुस्सा दिला दे, तो वह उसे छोड़ते नहीं हैं. पूरे शहर में पूरनसिंह की काफी इज्जत है, जबकि 40 साल के अविवाहित काला की कोई इज्जत नहीं है. काला तो कनाडा जाने के सपने देखता रहता है. पूरन सिंह के पास पुश्तैनी ‘‘वज्र कवच’’ नामक दवा है, जिसका तोड़ किसी के पास नही है. यह दवा नपुंसकता व पिंपल दूर करने के साथ ही हर बीमारी का इलाज कर देती है. फिल्म में दावा किया गया है कि अकबर को जब वज्र कवच दवा दी गयी, तभी उनकी संतान हुई. बहरहाल, कई मल्टीनेशनल कंपनियां ‘वज्र कवच’ का फार्मूला लेना चाहती हैं. एक दवा कंपनी के मालिक माफतिया (मोहन कपूर) काला की मदद से पूरन सिंह से बात करता है, पर बात नहीं जमती. माफतिया, पूरनसिंह को धमकी देकर चला जाता है.

उसके बाद पूरनसिंह व उनकी दवाओं पर शोध करने के लिए गुजरात से एक डाक्टर चिकू (कृति खरबंदा) आती हैं. चिकू पर काला लट्टू हो जाते हैं. उधर चिकू चोरी से ‘वज्र कवच’ का फार्मूला चुरा कर वापस चली जाती है. वह यह फार्मूला माफतिया को दे देती है. माफतिया उसे अपनी कंपनी के साथ पेटेंट करवाकर पूरनसिंह को कानूनी नोटिस भेज देते हैं. उसके बाद कहानी पंजाब से गुजरात पहुंच जाती है. फिर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः चिकू अदालत में सच बयां कर देती है.

अति कमजोर कहानी व पटकथा के चलते फिल्म हंसाने की बजाय बोझिल बनाती है. कहानी सुनाने का ढंग भी गड़बड़ है. निर्देशन काफी कमजोर है. परिणामतः सनी देओल और धर्मेंद्र का अभिनय भी कमजोर पड़ जाता है. इतना ही नहीं इस फिल्म की गति काफी धीमी है और बेवजह लंबी खींची गयी है. इसे एडीटिंग टेबल पर ठीक किया जाना चाहिए था. इंटरवल के बाद तो फिल्म काफी सुस्त हो जाती है. फिल्म में ‘वज्र कवच’ दवा का मुद्दा भी हवा में ही नजर आता है. फिल्म के कई दृश्य ‘सब टीवी’ के अति लोकप्रिय हास्य धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की याद दिलाते हैं. यह पूर्णरूपेण एक लोकप्रिय फ्रेंचाइजी को भुनाने का असफल प्रयास है. जबकि सलमान खान, शत्रुघ्न सिंहा, रेखा आदि भी कुछ पलों के लिए इस फिल्म में नजर आते हैं, मगर उनकी उपस्थिति से भी फिल्म अच्छी नहीं होती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म देखकर अहसास होता है कि यह फिल्म बौबी देओल को अभिनय में नए सिरे से स्थापित करने के लिए बनायी गयी है. पर देओल परिवार यह भूल गया कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती. पूरी फिल्म में सबसे अधिक समय तक नजर आने वाले बौबी देओल अपने अभिनय से काफी निराश करते हैं. धर्मेंद को महज कैरीकेचर बनाकर रख दिया गया है. सनी देओल भी प्रभावित नहीं कर पाए. कृति खरबंदा सिर्फ खूबसूरत नजर आयी हैं, मगर अभिनय के स्तर पर काफी निराश करती हैं.

फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावहीन है.

दो घंटे 28 मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण ‘‘सनी साउंड प्रा. लिमिटेड’’ के बैनर तले किया गया है. फिल्म के निर्देशक नवनीत सिंह, पटकथा लेखक धीरज रतन व बंटी राठौड़, संगीतकार विशाल मिश्रा, राजू सिंह, संजीव दर्शन, कैमरामैन जीतन हरमीत सिंह व कलाकार हैं- धर्मेंद्र, सनी देओल, बौबी देओल, कृति खरबंदा, रेखा,सतीश कौशिक, शत्रुघ्न सिंहा, सलमान खान, बिन्नी ढिल्लों, जौनी लीवर, असरानी, शरत सक्सेना, सोनाक्षी सिन्हा, परेश गणात्रा व अन्य.

धार्मिक स्थल, अंधश्रद्धा और अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर में गैरहिंदुओं को भी प्रवेश दिए जाने की सलाह दी है. उस ने ऐसा आदेश नहीं दिया है कि मंदिर के प्रबंधन को यह सलाह माननी जरूरी है. सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को इस पचड़े में पड़ने की जरूरत थी. जगन्नाथपुरी के मंदिर, किसी मसजिद या गुरुद्वारे में भक्तलोग अंधश्रद्धावश ही जाते हैं. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अगर गए थे तो यही सोच कर कि वे पद पा कर अब दलित होने का धब्बा खो चुके होंगे और उन का स्वागत होगा पर सुप्रीम कोर्ट उन के प्रवेश को भी सुनिश्चित नहीं कर पाई.

धर्मनिरपेक्ष राज्य में अंधश्रद्धा के मामलों में न तो सरकारों को पड़ना चाहिए और न अदालतों को. कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी हो, तो बात दूसरी है, वरना उन का दखल हमेशा उलटा पड़ता है. सरकार ने सिख मामलों में एक बार जम कर दखल दिया था जिस का नतीजा निकला कि खालिस्तान आंदोलन खड़ा हो गया. राजीव गांधी ने शाहबानो और राममंदिर के मामलों में दखल दिया. इस का नतीजा यह रहा कि बाबरी मसजिद तोड़ दी गई और भारतीय जनता पार्टी को धर्म पर आधारित सरकार बनाने का रास्ता मिल गया.

जगन्नाथपुरी मंदिर में अन्य धर्मों व नीची जातियों के लोग नहीं जा पाते, तो इस से वे अपनी जेब बचाते ही हैं. दलित अगर वहां जाएंगे तो पाएंगे कुछ नहीं, बल्कि जो उन की जेब में होगा उसे भी वे चढ़ा आएंगे. दूसरे मंदिरों की तरह इस मंदिर में भी चढ़ावे पर जोर है. मंदिर में प्रवेश करते ही पंडे घेर लेते हैं, जो कभी प्रसाद खरीदने के नाम पर तो कभी दर्शन कराने के नाम पर वसूली करते हैं.

हिंदू, उस पर से ऊंची जाति के हों, चढ़ावा न चढ़ाएं तो उन के साथ दलित व गैरहिंदू से भी ज्यादा बुरा बरताव किया जाता है. पंडों की भारी संख्या, जो मंदिर के चारों ओर मंडराती रहती है, इस बात का सुबूत है कि यह मंदिर भक्तों के लिए नहीं, पंडेपुजारियों के लिए है. ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट इस में दूसरों को भी प्रवेश की सलाह दे रहा है तो असल में वह पंडों की जेबें भरने का काम कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट को तो अपीलकर्ता को फटकार लगानी चाहिए कि जहां कुछ मिलना ही नहीं, वहां जाने की जिद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए ही क्यों जा रहे हैं.

पंकज त्रिपाठी और राज कुमार राव का शानदार अभिनय

महत्वाकांक्षी औरत पुरुषों के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, इसी बात को निर्माता दिनेश विजन और निर्देशक अमर कौशिक ने अपनी हौरर कौमेडी फिल्म ‘‘स्त्री’’ में पेश किया है. यूं तो फिल्म की कहानी एक ऐसी भूतनी की है, जो कि लोगों के घरों के दरवाजे पर रात्रि में दस्तक देती है. पुरुष के कपड़े उतरवाकर उसे उठाकर ले जाती है. सैकड़ों वर्षों से हमारे देश की औरतें भूतनी या चुड़ैल के नाम पर प्रताड़ित की जाती रही हैं. पर अंत में यह फिल्म कहती है कि उसे प्यार व इज्जत चाहिए.

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फिल्म की कहानी मध्यप्रदेश के चंदेरी नामक छोटे शहर की है. जहां हर वर्ष मंदिर में चार दिन की पूजा होती है. और हर वर्ष इन चार दिन की हर रात एक ‘स्त्री’ आती है और लोगों के शरीर के कपड़े फेंक कर उन्हे उठा ले जाती है. हर वर्ष लोग अपने घरों की दीवारों पर लिखवाते हैं-‘ओ स्त्री कल आना’. हर किसी का मानना है कि एक भूतनी यह काम करती है. इसी गांव मे एक दर्जी का बेटा और सिलाई में निपुण विकी (राज कुमार राव) अपने दोस्तों बिट्टू (अपराशक्ति खुराना) और जना (अभिषेक बनर्जी) के साथ रहता है.

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विकी खुद को मौर्डन युवक मानता है और वह भूम प्रेत आदि में यकीन नही करता. उधर इसी शहर के ‘रूद्र पुस्तक सेंटर’ के मालिक रूद्र (पंकज त्रिपाठी) खुद को ज्ञानी मानते हैं और भूतनी से बचने के उपाय लोगों को बताते रहते हैं. मंदिर में पूजा शुरू होने से पहले एक लड़की आकर विकी से अपने लिए तीन दिन में लहंगा सिलकर देने के लिए कहती है. उसकी अदा पर विकी मोहित हो उससे प्यार कर बैठते हैं. लड़की रात में मंदिर में पूजा के समय मिलने की बात कह देती है. विकी मंदिर में जाता है. पर लड़की आरती खत्म होने के बाद मंदिर से बाहर विकी से मिलती है.

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उसी रात एक पुरुष को भूतनी /चुड़ैल उठा ले जाती है. उधर रूद्र इन तीनों दोस्तों को चंदेरी पुराण और स्त्री के पीछे की सच्चाई बताता है. उधर लड़की विकी से छिपकली की पूंछ सहित कई तरह को सामान मंगवाती है और विकी को लेकर सुनसान जंगल में जाती है. पर वह अचानक गायब हो जाती है. मगर कुछ देर बाद उसके दोस्त जना को भूतनी उठा ले जाती है. हर दिन शहर के हालात बिगड़ते जाते हैं. उधर वह लड़की विकी के साथ मिलकर उस भूतनी को खत्म करने की बात करती है. कहानी में कई मोड़ आते हैं. अंततः गायब हुए सभी पुरुष वापस आ जाते हैं. चार दिन बाद वह लड़की वापस चली जाती है. बस में उसका असली रूप सामने आ जाता है.

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फिल्म की कहानी व पटकथा ठीक ठाक है. फिल्म डराती नहीं है, मगर हंसाती जरुर है. मगर लेखक व निर्देशक दोनों कई जगह दुविधा में नजर आते हैं कि वह ‘स्त्री’ के माध्यम से अंध श्रद्धा को खत्म करने की बात करें या न करें. फिल्म में कुछ ह्यूमरस संवाद हैं, जो कि दर्शकों को हंसाते हैं. ज्ञानी यानी कि रूद्र के परदे पर आने से ही हंसी के पल पैदा होते हैं.

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जहां तक अभिनय का सवाल है, तो राज कुमार राव व श्रद्धा कपूर दोनों ने जानदार काम किया है. पर फिल्म के असली हीरो बनकर पंकज त्रिपाठी उभरते हैं. इंटरवल के बाद वह अकेले अपने बलबूते पर पूरी फिल्म को लेकर चलते हैं. पंकज त्रिपाठी के उम्दा अभिनय की तारीफ तो करनी ही पड़ेगी. अपराशक्ति खुराना व अभिषेक बनर्जी ठीक हैं.

दो घंटे सात मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘स्त्री’’ का निर्माण दिनेश विजन और राज एंड डीके ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक अमर कौशिक, पटकथा लेखक राज एंड डी के, संवाद लेखक सुमित अरोड़ा, संगीतकार सचिन जिगर, पार्श्व संगीतकार केतन सोधा, कैमरामैन अमलेंदु चैधरी तथा कलाकार हैं – राज कुमार, श्रद्धा कपूर,पंकज त्रिपाठी, अपराशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी, विजय राज और मेहमान कलाकार नोरा फतेही व कृति सैनन.

पोर्न फिल्मों का बाजार बढ़ा है : सनी लियोनी

‘पोर्न स्टार’ सनी लियोनी बौलीवुड में अब काफी नाम कमा चुकी हैं. स्वभाव से हंसमुख सनी लियोनी को शुरुआत में जो भी काम मिला उसे वे खुशी से करती गईं. नतीजतन, आज ज्यादातर सभी फिल्मकार व डायरैक्टर उन्हें अपनी फिल्मों में लेना पसंद करते हैं.

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सनी लियोनी को उन का पोर्न टैग खराब नहीं लगता, क्योंकि उन्होंने जब भी काम किया है, सोचसमझ कर अपनी मरजी से किया है. उन के हिसाब से जो लोग पोर्न फिल्मों को खराब कहते हैं वे ही उन्हें देखना भी पसंद करते हैं. यही वजह है कि पोर्न फिल्मों का बाजार पहले से काफी बढ़ा है.

पेश हैं, सनी लियोनी से हुई बातचीत के खास अंश :

बौलीवुड ने आप की जिंदगी को कैसे संवारा है?

बौलीवुड ने मेरी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है. जब मैं पहली बार केवल 2 हफ्तों के लिए यहां आई थी, तब वापस लौस एंजिल्स चले जाने की बात सोची थी लेकिन आज मैं कई फिल्में कर चुकी हूं.

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मेरे लिए अपनेआप को फिल्म इंडस्ट्री में जमाना आसान काम नहीं था. पुराने दिनों को याद करूं तो हर दिन सुबह उठ कर किसी प्रोफैशनल की तरह होंठों पर स्माइल लिए प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाना, हमेशा खुश रहने की ऐक्टिंग करना, जो भी काम मिले उसी को कर लेना, इसी से मुझे बौलीवुड में जमने का मौका मिलता गया. न तो मैं एक अच्छी अदाकारा हूं और न ही एक अच्छी डांसर. पर मैं ने हर काम में दिनरात मेहनत कर के महारत हासिल की. कोई भी हालात हों हमें पूरी तरह जिंदगी को जीना चाहिए.

बौलीवुड की कौन सी बात आप को पसंद है या नापसंद?

लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं मुझे पता है पर उस का असर मुझ पर नहीं पड़ता. पसंद की बात करें तो मैं फिल्में कर रही हूं, इंडस्ट्री का हिस्सा बन चुकी हूं और यहां बहुत से लोग मेरे फैन हैं जिस की मुझे खुशी है.

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नापसंद की बात कहें तो जो लोग मेरे बारे में भलाबुरा कहते हैं, उस का मुझ पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. इस के अलावा यहां इंडस्ट्री कैसे कारोबार करती है, मेरे लिए इसे जानना आसान नहीं था.

अमेरिका में सब अलग है, पर यहां काम के साथसाथ इमोशन भी होते हैं जिस में मुझे एडजस्ट करना पड़ा क्योंकि बौलीवुड इंडस्ट्री किसी के साथ एडजस्ट नहीं करता. यहां कोई काम समय पर नहीं होता.

आप का ड्रीम प्रोजैक्ट क्या है?

मेरी इच्छा है कि मुझे किसी बड़े बजट की फिल्म में लीड रोल करने का मौका मिले. इस के अलावा मैं पीरियड फिल्में भी करना चाहती हूं जहां मुझे भारत के इतिहास के बारे में जानने का मौका मिलेगा. अगर कोई इंटरैस्टिंग बायोपिक होगी तो मैं जरूर करना पसंद करूंगी.

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आप की प्रोडक्शन कंपनी इन दिनों क्या कर रही है?

जब मैं यहां आई तो पता चला कि यहां कारोबार करने के लिए कंपनी खोलना बहुत जरूरी है. फिर मैं ने ‘सनसिटी मीडिया एंटरटेनमैंट’ के नाम से कंपनी खोली. अगर अच्छी कहानी मिलेगी तो मैं फिल्म बनाऊंगी. मुझे कोई जल्दी नहीं है. थ्रिलर फिल्म बनाने की भी इच्छा है.

आगे कौन सी फिल्म कर रही हैं?

मैं ने अभी अरबाज खान के साथ फिल्म ‘तेरा इंतजार’ की है जो रुपहले परदे पर आ चुकी है. यह एक रोमांटिक थ्रिलर फिल्म है. इस के अलावा मैं कुछ और फिल्में भी करने वाली हूं.

देखिए कैसे शूट होते हैं फिल्मों में सैक्स सीन

वैसे, इस सवाल का जवाब खुद कुछ स्टार्स के बयानों से मिल सकता है. कुछ ऐसे विदेशी कलाकार, जो फिल्मों में सेक्स सीन कर चुके हैं और उनके अनुभव कैसे रहे? डालते हैं एक नजर…मसलन आपने यह कहीं-कभी नहीं सुना होगा कि सैक्स सीन के फिल्मिंग के दौरान कोई भी अभिनेता या अभिनेत्री कंट्रोल से बाहर हुए होंगे या ऐसी कोई स्थिति बनती होगी, पर शायद आप ये बात जानते होंगे कि इस दौरान वे एक्टर्स टेप का इस्तेमाल करते हैं या फिर एक तरह का शॉर्ट पहनावा, जो उनके पैरों से अटैच रहता है.”

ये बात तो आपको बताने की नहीं है कि सेट पर भीड़ के कारण अनकंट्रोल होने की स्थिति नहीं ही बनती. सेट पर कैमरामैन और लाइटिंग के साथ-साथ कई और लोग होते हैं. ऐसे में अनकंट्रोल होने की स्थिति बन पाना मुश्किल होता है.

स्टार्स के इन बयानों में ढूंढ सकते हैं जवाब इस सवाल का जवाब…

अभिनेत्री वनीसा हुड्गेंस ने अपनी फिल्म ‘स्प्रिंग ब्रेकर्स’ में एक सेक्स सीन किया था. इसे लेकर उनका अनुभव बिल्कुल अच्छा नहीं रहा. वे कहती हैं, “यह मेरे लिए बहुत ही सिर खपाऊ था. मैंने अपने एजेंट को साफ कह दिया कि आगे से कभी मैं ऐसे सीन नहीं करूंगी.”

इसके बाद, जर्मनी के 39 साल के एक्टर माइकल फसबेंडर के मुताबिक, “सेक्स सीन कुछ फूहड़ हो सकते हैं. एक एक्टर होने के नाते सबसे पहले आपको यह समझना जरूरी है कि आप एडवांटेज न उठा रहे हों. आपको लड़की को ऐसा महसूस नहीं कराना चाहिए कि आप फ्री फील कर रहे हैं. मैं किसी न किसी बहाने खुद को मूर्ख बनाने की कोशिश करता हूं और हल्के मूड में रहकर ही सीन करता हूं, क्योंकि आप टेक पर टेक नहीं ले सकते.” माइकल ने अपनी फिल्म ‘जेन येरी’ के सेक्स सीन के संदर्भ में यह बात कही.

40 साल के कैनेडियन एक्टर रियान रेनोल्ड्स ने अपनी फिल्म ‘द चेंज अप’ के सीन के बारे में बताया, “फिल्म के सीन में एक्ट्रेस बैठी रहती है और मैं उसका टॉप उतारता हूं. उसकी ब्रा निकालता हूं. उसके चेहरे पर मुस्कराहट है और मैं सीन की हर लाइन भूल गया. सिर्फ इसी फिल्म में नहीं, हर फिल्म में मेरे साथ ऐसा ही हुआ.”

आगे हम आपको बता रहे हैं अमेरिकी एक्ट्रेस शैलेन वुडली के बारे में. उन्होंने एक इंटरव्यू में फिल्म ‘द स्पेक्टाकुलर नाउ’ के सैक्स सीन का जिक्र किया था. उन्होंने बताया, “यह मेरा और एक्टर दोनों का ही फर्स्ट ऑनस्क्रीन सेक्स सीन था. वहां बहुत ही सुरक्षित और सुविधाजनक वातावरण था और मैं माइल्स टेलर के साथ खुश थी. क्योंकि वे बहुत अच्छे इंसान हैं और उन्होंने सीन के दौरान मुझे कोई तकलीफ नहीं होने दी और न्यूट्रल रखा. मुझे ऐसा भी लगता है कि मैंने भी उन्हें कम्फ़र्टेबल और न्यूट्रल रखा. हम सिर्फ इसे नेचुरल रखना चाहते थे.”

अमेरिकी एक्ट्रेस एंजेलिना जोली ने फिल्म ‘लैंड ऑफ ब्लड एंड हनी’ में एक सेक्स सीन डायरेक्ट किया था. वे इस बारे में कहती हैं, “किसी से भी इस तरह का काम करने में आपको थोड़ी दिक्कत होती है, क्योंकि वे रियल लाइफ कपल नहीं हैं. आपको किसी से भी यह कहना अजीब लगता है कि उसे किसी और के साथ कैमरे के सामने न्यूड होना है. हालांकि, एक्टर्स ने मुझे कम्फ़र्टेबल फील कराया. मैं बहुत ज्यादा प्रुडिश होती जा रही थी. मैंने उन्हें (एक्टर्स को) और ज्यादा प्रुडिश होने को कहा और उन्होंने मुझसे कहा कि कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि ये स्टोरी की डिमांड है. वे कम्फर्ट थे और सीन को अपने हिसाब से करना चाहते थे.”

अमेरिकी एक्टर माइकल डगलस ने अपनी फिल्म ‘बिहाइंड द कैंडलाब्रा’ के सीन के बारे में बताया. वे कहते हैं, “सेक्स सीन में सबसे मुश्किल बात यही होती है कि सभी लोग आपको देख रहे होते हैं. मुझे नहीं पता कि आखिरी बार आपने किसी को मारा या किसी का भेजा उड़ाया. लेकिन सभी ने सेक्स किया है. इसलिए सभी जानते हैं कि ऐसे सीन्स को कैसे किया जाना चाहिए.’

जब मेरा हमबिस्तरी का मन होता है, तो पत्नी तैयार नहीं होती. जब वह तैयार हो जाती है, तो मैं ठंडा पड़ जाता हूं. मैं क्या करूं.

सवाल
मैं 26 साल का हूं और मेरी पत्नी 24 साल की है. जब मेरा हमबिस्तरी का मन होता है, तो वह तैयार नहीं होती. जब वह तैयार हो जाती है, तो मैं ठंडा पड़ जाता हूं. मैं क्या करूं?

जवाब
आमतौर पर औरतें देर से गरम होती हैं और देर तक गरम रहती हैं. इस के लिए आप को हड़बड़ी छोड़ कर तसल्ली से काम करना होगा. खुद पर काबू रख कर पहले फोर प्ले कर के उसे गरम करें और उस के बाद ही जिस्मानी संबंध बनाएं. धीरेधीरे आप माहिर हो जाएंगे.

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मिलन की रात, बन जाए बात

अनिल और सुधा की शादी की पहली रात थी. शादी में आए लोगों के जातेजाते रात का 1 बज गया. तब अनिल की बहन को ध्यान आया कि इस नवविवाहित जोड़े को तो अपने कक्ष में भेजो. चूंकि रात काफी बीत चुकी थी, इसलिए अपने कक्ष में पहुंचते ही अनिल आननफानन सहवास करने लगा तो एक हलकी सी चीख के साथ सुधा उस के बाहुपाश से अलग हो गई. बोली कि नहीं, मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकूंगी. मुझे दर्द होता है. बेचारा अनिल मन मसोस कर रह गया. सुधा की दिन पर दिन बीतते चले गए और फिर दर्द की तीव्रता भी बढ़ती चली गई. पहली रात की मिठास कड़वाहट में बदल गई थी. फिर एक दिन जब अनिल ने यह बात अपने दोस्त को बताई तो उस की सलाह पर वह पत्नी के साथ चिकित्सक के पास पहुंचा. तब जा कर दोनों सहवास का आनंद उठाने में कामयाब हो पाए.

वास्तव में सहवास परम आनंद देता है. मगर इस में इस तरह की कोई परेशानी हो जाए तो नौबत तलाक तक की भी आ जाती है.

आइए, जानें कि ऐसी स्थिति आने पर क्या करें:

– पतिपत्नी को चाहिए कि भले प्रथम 1-2 मिलन में दर्द हो, तो भी वे संपर्क बनाना न छोड़ें. कामक्रीड़ा करते रहें ताकि एकदूसरे के प्रति आकर्षण बना रहे और दर्द की बात मन में न बैठे.

– चूंकि यह शारीरिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक समस्या है, अत: मानसिक स्तर पर भी मजबूत बने रहें.

– ऐसे पतिपत्नी को चाहिए कि वे यह सोच कर कि सहवास नहीं करेंगे, प्रतिदिन यौनक्रीड़ा यानी आलिंगन, चुंबन, बाहुपाश में बांधना, सहलाना आदि करते रहें. यौनक्रीड़ा में बहतेबहते उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि वे कब सहवास में सफल हो गए. तब सारा डर जाता रहेगा.

– यदि एकदूसरे के प्रति पूर्ण आकर्षण न हो कर कोई गिलाशिकवा, नफरत, गुस्सा हो तो उसे दिमाग से निकाल देने मात्र से दर्दयुक्त सहवास की समस्या समाप्त हो सकती है.

– यदि पहले कभी बलात्कार हुआ हो या आप के पुरुष साथी (वह पति ही क्यों न हो) ने यदि आप के जननांगों को चोट पहुंचाई हो तब भी ऐसी स्थिति में भी स्त्री को सहवास से भय पैदा हो जाता है. इस स्थिति का यथोचित समाधान आवश्यक है.

दर्दयुक्त सहवास के अन्य कारण पुरुषों में

– अंग में कड़ापन न आने के कारण भी सैक्स नामुमकिन हो जाता है.

– यदि आप अत्यधिक मोटापे से ग्रस्त हैं तब भी यह स्थिति पैदा हो जाती है.

– यौन संपर्क के प्रति नकारात्मक रवैया भी यह स्थिति पैदा कर देता है. इस के अलावा सैक्स के अन्य तरीकों को तवज्जो देना भी इस स्थिति के लिए उत्तरदायी हो सकता है.

– जननांग में कोई जन्मजात कमी.

स्त्रियों में

– यौन संपर्क के वक्त जननांग में स्थित खास प्रकार की ग्रंथियां कुछ लसलसा सा पदार्थ स्रावित करती हैं जो पुरुष के अंग को योनि में प्रवेश कराने में मददगार होता है. कई बार ये ग्रंथियां अपना यह कार्य करना बंद कर देती हैं. फलस्वरूप योनि में कथित सूखापन रहता है, जिस से सहवास में दर्द होता है. अकसर यह स्थिति डर या फिर गैरजिम्मेदाराना तरीके से स्थापित यौन संबंध से उत्पन्न होती है.

– यदि स्त्री को अत्यधिक मोटापा है या पैरों अथवा कूल्हों की हड्डियों का कोई रोग है, तब भी यह स्थिति आ सकती है.

– यदि जन्मजात योनि के ऊपर की झिल्ली (हाईमन) बहुत ज्यादा मोटी या सख्त हो तो भी सहवास के वक्त तकलीफ होती है.

– जिन स्त्रियों की शादी देर से होती है उन में योनि का लचीलापन कमजोर हो जाता है तथा मार्ग भी संकरा हो जाता है, जिस से मिलन के वक्त तकलीफ होती है.

– योनि मार्ग में अगर कोई सर्जरी हुई हो या वहां चोट आदि लगी हो तब भी संभोग के वक्त दर्द होता है.

– ऊपरी सतह पर कुछ व्याधियां भी सहवास को दर्दयुक्त बनाती हैं जैसे बवासीर, खूनी मस्से, पेशाब के मार्ग में संक्रमण, जन्म से ही योनि मार्ग की लंबाई कम होना आदि.

– इसी तरह अंदर की व्याधियां भी इस स्थिति के लिए उत्तरदायी होती हैं जैसे सर्विक्स संक्रमण, ओवरी का संक्रमण, गर्भाशय का क्षय रोग आदि.

 

 

60 के बाद रोमांस का पुनरागमन

75 वर्ष के प्रेमनारायण साहू भोपाल के बागसेवनिया इलाके में रहते हैं और इस उम्र में भी वे खासे फिट हैं. उन की शादी 50 साल पहले कलावती साहू से हुई थी. वैवाहिक जीवन ठीकठाक गुजरा और उन के 3 बेटे हुए जो शादी के बाद सैटल हो गए. भारत हैवी इलैक्ट्रिकल्स लिमिटेड, भोपाल से आर्टिजन के पद से रिटायर होतेहोते उन्होंने भोपाल में ही 3 मकान ले लिए थे जिन की कीमत अब डेढ़ करोड़ रुपए से अधिक है.

प्रेमनारायण ने मेहनत व ईमानदारी से नौकरी की और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां एक आदर्श गृहस्थ की तरह निभाईं. अब से 30 साल पहले कलावती उन्हें तनहा छोड़ कर बेटे के साथ रहने लगीं तो अकेलापन उन्हें काटने को दौड़ने लगा. मगर तनहाई और पारिवारिक अनदेखी के शिकार प्रेमनारायण टूटे या झुके नहीं और न ही उन्होंने ओम जय जगदीश हरे… या जय हनुमान ज्ञान गुण सागर…जैसे धार्मिक भजन सुने बल्कि उन्होंने सुने, न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन… जैसे रोमांटिक गाने.

4 दिसंबर, 2017 को कलावती ने बागसेवनिया थाने में जा कर पति के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई कि उन्होंने दूसरी शादी कर ली है. उन्होंने इस का विरोध किया तो पति ने उन्हें मारपीट कर भगा दिया. बकौल कलावती, उन के पति के नाम 3 मकान हैं जिन में से एक वे अपनी दूसरी कथित पत्नी के नाम कर चुके हैं और दूसरा करने वाले हैं. लिहाजा, रिपोर्ट दर्ज कर उचित कार्यवाही की जाए.

पुलिस वालों के लिए मामला दिलचस्प था और उन लोगों के लिए भी जिन्होंने यह सुना कि एक 75 वर्षीय बुजुर्ग ने अपनी नौकरानी से शादी कर ली है. प्रेमनारायण की कथित नौकरानी सुलोचना (बदला नाम) की उम्र लगभग 60 साल है और 15 साल से वह उन के यहां नौकरी कर रही थी. तभी उन्हें उस से प्यार हो गया और उन्होंने दीनदुनिया की परवा न करते हुए सुलोचना से शादी कर ली.

कलावती ने रिपोर्ट लिखाई तो प्रेमनारायण आगबबूला हो गए. उन्होंने कहा, ‘‘मैं ने कोई दूसरी शादी नहीं की है, पत्नी मुझ पर झूठा आरोप लगा रही है. रही बात मकानों की, तो वे मेरे हैं और यह मेरा हक है कि उन्हें मैं जिसे चाहूं उसे दूं.’’

फसाद या विवाद रोमांस का ज्यादा था या जायदाद का, यह तय कर पाना मुश्किल नहीं, लेकिन एक बात जो पुरजोर तरीके से उजागर हुई वह यह है कि 70 की उम्र के बाद भी रोमांस होना हैरत की बात नहीं है और प्यार हो जाने के बाद आम प्रेमियों की तरह पुरुष किसी की परवा नहीं करता.

दिल तो है दिल…

बढ़ती यानी भजनपूजन और तीर्थयात्रा की उम्र में रोमांस अब कतई हैरत की बात नहीं रह गया है, आएदिन उजागर होते मामले इस सच की पुष्टि करते हैं.

ऐसे मामलों में एक अच्छी और गौरतलब बात यह है कि पुरुष अपने अफेयर को नकारते नहीं हैं. जाहिर है बात दिल की है जो कभी भी किसी पर भी आ सकता है. लंबे वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के बाद ऊब के शिकार हो चले पुरुष अगर अपनी हमउम्र या उम्र में कुछ छोटी महिला से प्यार कर बैठते हैं तो वे कोई गुनाह नहीं करते. तय है कोई खालीपन उन के भीतर समा गया होता है जिसे भरने के लिए कोई महिला आ जाती है, तो वे जवान हो उठते हैं.

यह महिला कोई भी हो सकती है. मसलन, कोई पुरानी परिचित सहकर्मी या बेसहारा जो एक भावनात्मक जरूरत बन जाती है. ऐसे में पारिवारिक व सामाजिक मूल्यों के कोई माने उन के लिए नहीं रह जाते और वे उन बंदिशों से बगावत कर बैठते हैं जिन के कभी खुद हिमायती हुआ करते थे.

नैतिकता की बातें भी इन पुरुषों को बेमानी लगती हैं, खासतौर से विधुरों को, जब संतानें अपना घर बसा कर अलग रहने लगती हैं और दोस्त व नातेरिश्तेदार कहने भर को बचते हैं. ऐसे में कोई आती है और उन का दिल धड़काने लगती है तो उन्हें जिंदगी के माने फिर मिलने लगते हैं और वे सही मानों में जिंदगी फिर से जीने लगते हैं.

दिग्विजय सिंह से ली प्रेरणा

बढ़ती उम्र के अफेयर या रोमांस अब बड़े शहरों के पौश इलाकों तक ही सिमट कर नहीं रह गए हैं, बल्कि ये गांवदेहातों में भी देखने में आने लगे हैं. इन्हें देख कर लगता है कि प्यार में बंधन या वर्जनाएं युवा ही नहीं, बल्कि बुजुर्ग भी तोड़ने लगे हैं.

मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले झाबुआ के परवट गांव के 75 वर्षीय बादू भूरिया अपनी 70 वर्षीया प्रेमिका भूरीबाई मकवाना को ले कर थाने पहुंचे. उन का मकसद था अपने अफेयर की स्वीकारोक्ति जिस से भूरीबाई का पति या ससुराल वाले कोई फसाद खड़ा न करें. बादू और भूरी ने अपने बयान में माना कि वे दोनों प्यार करते हैं और अब साथ रहना चाहते हैं. पुलिस ने बयान दर्ज कर लिए तो दोनों खेतों में जा कर मजदूरी करने लगे.

बयान दर्ज करते मीडियाकर्मियों की चुहलबाजी के दौरान जब बादू से किसी ने इस उम्र में प्यार और शादी के बाबत सवाल किया तो वे बोले, ‘‘जब दिग्विजय सिंह इतने बड़े नेता हो कर बड़ी उम्र में शादी कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते,’’ यानी दिग्विजय सिंह अब रोमांस के मामले में भी लोगों के आदर्श बनने लगे हैं.

साल 2018 की पहली तारीख को जब ये प्रेमी थाने से लौटे तो खासे खुश और बेफ्रिक थे. आदिवासी समुदाय का एक रिवाज यह भी है कि अगर पत्नी अपने पति को छोड़ कर किसी दूसरे के साथ रहना चाहे तो उस के दूसरे पति को पहले वाले पति को वह राशि देनी पड़ती है जो शादी के वक्त पति ने पत्नी को या उस के परिवार वालों को दी थी. गुजरात की रहने वाली भूरीबाई को पहले पति ने सालों पहले 3,500 रुपए दिए थे, जो अब बादू देने को तैयार है.

भूरीबाई की परेशानी पहले पति का शराबी होना थी जो नशे में उस से मारपीट करता था. उस की हरकतों से आजिज आ कर वह मायके आ गई थी. एक साल पहले उस की मुलाकात अपनी ही तरह कपास बीनने वाले बादू से हुई और दोनों में प्यार हो गया जो अब शादी में तबदील होने जा रहा है. भूरीबाई किसी किशोरी की तरह यह बताने से नहीं चूकती कि अगर बादू भी पहले पति की तरह शराब पिएगा तो वह उसे भी छोड़ देगी.

हर्ज क्या

सीनियर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह सार्वजनिक जीवन जीते हुए 70 साल की उम्र के बाद प्यार और शादी कर सकते हैं तो मध्यवर्गीय गृहस्थ प्रेमनारायण साहू को भी पत्नी के चले जाने पर प्यार हो जाना कतई हैरत की बात नहीं. इसी तरह बादू भूरिया को प्यार हो गया तो बात न तो हैरत की है और न ही हर्ज की.

ये तीनों पुरुष अलगअलग परिवेश के हैं, फिर भी दिल और दिल्लगी के मामले में एक हैं. तीनों ने ही दिल की बात सुनी और अपनी प्रेमिका को पत्नी का दर्जा दिया. ऐसे कई मामले अब आएदिन उजागर होने लगे हैं जिन्हें देखसमझ आता है कि इस उम्र में रोमांस हर्ज की बात नहीं, बल्कि युवावस्था की तरह एक जरूरत है.

बदलते समाज के ये नए दस्तूर हैं कि बुजुर्ग बुरी तरह उपेक्षा के शिकार हैं. जिंदगीभर वे बैल की तरह अपनी जिम्मेदारियां ढोते हैं, बुढ़ापे में उन्हें भावनात्मक असुरक्षा घेर लेती है. ऐसे में जहां से विश्वसनीय तरीके से इन्हें सुरक्षा का आश्वासन मिलता है वहां वे टूट जाते हैं या प्यार कर बैठते हैं, बात एक ही है.

इस उम्र में भी प्यार करना इन का हक है. इन से आदर्शों व सामाजिक मूल्यों को निभाने की उम्मीद की जाए तो यह इन के साथ ज्यादती ही है जिन से हर स्तर पर लोग बगावत कर रहे हैं. उक्त तीनों मामले इस के उदाहरण हैं.

सावधानी भी जरूरी

जिस्मी जरूरतें इस उम्र में आ कर खत्म नहीं हो जातीं. आमतौर पर हिंदुस्तानी पत्नियां 60 वर्ष की उम्र के बाद तो दूर बल्कि पहले से ही पति से शारीरिक संबंध बनाना बंद कर देती हैं, जिस से पति खीझने लगते हैं और अपनी इस जरूरत को पूरी करने के लिए वे इधरउधर ताकझांक करने लगते हैं.

दिक्कत तब खड़ी होती है जब वे अपने से काफी छोटी उम्र की लड़कियों की तरफ शारीरिक आकर्षण के चलते झुक जाते हैं. यह बेमेल रिश्ता अकसर युवती के स्वार्थ की देन होता है. भोपाल के शाहपुरा थाने के एक सब इंस्पैक्टर की मानें तो नए भोपाल के पौश इलाकों के अधिकांश बंगलों में बुजुर्ग अकेले ही रहते हैं, उन की संतानें या तो दूसरे शहरों में नौकरी कर रही हैं या फिर विदेशों में बस गई हैं.

इस सब इंस्पैक्टर के मुताबिक, कई बुजुर्ग लड़कियों के चक्कर में फंस जाते हैं जिन की नजर इन के पैसों पर रहती है. चूंकि ऐसे बुजुर्गों के पास पैसों की कमी नहीं होती, इसलिए वे लड़कियों पर पैसा खूब लुटाते हैं, लेकिन बाद में पछताते भी हैं. वजह कई बार लड़कियां ब्लैकमेलिंग करने लगती हैं. यह ब्लैकमेलिंग इमोशनल भी हो सकती है.

इस तरह की लड़कियां नौकरानियां भी होती हैं और सेल्सगर्ल्स भी, जिन के दिल में प्यार नहीं, बल्कि फरेब होता है. दिक्कत यह है कि ठगे जाने के बाद ये बुजुर्ग रिपोर्ट भी नहीं लिखा पाते, क्योंकि समाज में उन की खासी इज्जत जो होती है.

वैसे भी, 70 साल का कोई बूढ़ा 20-21 साल की लड़की से प्यार करे, यह बात गले नहीं उतरती, क्योंकि लड़की किसी बूढ़े से प्यार नहीं कर सकती. उसे प्यार में जो चाहिए होता है वह हमउम्र युवा से ही मिल सकता है. हां, अगर उस का मकसद पैसा ही है तो कहा जा सकता है कि तनहा हो रहे बूढ़े उन के लिए सौफ्ट टारगेट ही होते हैं, प्रेमी नहीं.

यह बात अधिकांश बूढ़े भी समझने लगे हैं, इसलिए वे प्यार वहीं कर पाते हैं जहां उम्र लगभग बराबरी की हो और प्रेमिका का सामाजिक स्तर भी उन की बराबरी का हो. प्यार में जरूरी नहीं कि वे शादी करें ही, बल्कि कई बूढ़े तो पूरे जोशोखरोश से, चोरीछिपे ही सही, रोमांस कर जिंदगी का उत्तरार्ध जिंदादिली से जी रहे हैं.

60 की उम्र के बाद कैसे कायम रखें सैक्स

शादी के बाद जब पतिपत्नी एकसाथ अपने अंतरंग क्षणों में होते हैं तो उस समय उन के बीच जिस्म प्रधान होता है, एकदूसरे को पाने की इच्छा, एकदूसरे में खो जाने की चाहत होती है. उस समय दिल है कि मानता नहीं वाली हालत होती है. वे दोनों दीनदुनिया से बेखबर हो कर, बस, एकदूसरे में आकंठ डूबे रहना चाहते हैं. एकदूसरे के जिस्म के प्रति आकर्षण तो होता ही है, साथ ही होता है समर्पण का भाव. फिर धीरेधीरे जीवन यथार्थ पर आता है.

जीवन में बच्चे आते हैं, जिम्मेदारियां बढ़ने लगती हैं. प्यार व समर्पण धीरेधीरे हवा होने लगता है. ऐसे में अपने प्यार को बचाए रखना दोनों के लिए ही चुनौती होती है. समझदार दंपती इस दौर में भी अपनी भावनाओं को समाप्त नहीं होने देते और सैक्सुअल जीवन का आनंद लेते रहते हैं.

60 वर्ष की उम्र तक आतेआते तो अधिकांश जोड़े घरगृहस्थी में इतना रम जाते हैं कि उन का सैक्सुअल जीवन समाप्तप्राय हो जाता है. वे पारिवारिक जिम्मेदारियों में इस कदर डूब जाते हैं कि अपने सैक्ससुख के बारे में तो उन्हें सोचने का वक्त ही नहीं मिलता. कुछ तो इस उम्र तक दादादादी और नानानानी भी बन जाते हैं और मन में भाव आ जाता है कि अब इस उम्र में क्या सैक्ससुख भोगना.

परंतु जिस तरह पेट की भूख के लिए खाने की जरूरत होती है उसी तरह जिस्म की भूख को शांत करने के लिए सैक्स की जरूरत होती है. कई बार जब दोनों में से किसी की भी घर में संतुष्टि नहीं हो पाती तो वे बाहर का रुख करते हैं.

सैक्स की जरूरत को समझें

आमतौर पर सैक्स के बारे में महिलाएं कुछ शांत जबकि पुरुष कामुक और जिज्ञासु रहते हैं. घरों में महिलाएं उम्र और जिम्मेदारियां बढ़ने के साथसाथ इस ओर से दूर होने लगती हैं और जब पति रोमांस व सैक्स की ख्वाहिश जाहिर करते हैं तो वे कहती हैं, ‘अरे, इस उम्र में आप को जवानी सूझ रही है. अब अपनी तो उम्र निकल गई, बच्चों को खेलनेखाने दो.’

ऐसा व्यवहार कर के आप उन की भावनाओं का मजाक न उड़ाएं बल्कि आप को यह समझना होगा कि यह तो एक तरह की भूख है जिस की पूर्ति पति अपनी पत्नी से ही करेगा. इसलिए इस बात को प्यार से हैंडिल करें और जितना हो सके उन्हें सहयोग करें.

ध्यान रखें कि प्यार और सैक्स में उम्र की कोई डैडलाइन नहीं होती. अच्छा है कि जीवन के इस फेज का आप खुद भी आनंद लें और पति को भी लेने दें. बच्चे यदि बाहर हैं तो भी आजादी से अपनी सैक्सुअल लाइफ को एंजौय करें.

भावनाओं को समझें

शादी के बरसों बाद पतिपत्नी एकदूसरे के जिस्म से परिचित हो चुके हैं, इसलिए अब जिस्म प्रधान नहीं रहता. शादी के शुरुआती दिनों में तो रोटी बनाती पत्नी को भी पति प्यार से खींच कर ले जाता है और पत्नी खुश हो कर खिंची चली जाती है परंतु 60 वर्ष की उम्र में पत्नी को इस तरह खींच कर बैड पर नहीं ले जाया जा सकता.

ऐसे में आप दोनों एकदूसरे की भावनाओं को समझ कर, छोटीछोटी बातों का ध्यान रख कर और प्यारभरी बातों से एकदूसरे के मन में प्यार व समर्पण का भाव जगाएं ताकि सैक्स की इच्छा जाग्रत हो जाए और इस अवस्था में भी एकदूसरे के लिए कुछ करगुजरने का भाव दोनों के मन में रहे.

ध्यान रखें जिस्म कितना ही बूढ़ा हो जाए, मन हमेशा जवान रहना चाहिए. ‘बागबान’ फिल्म में अमिताभ बच्चन हेमा मालिनी से जिस रोमांटिक अंदाज में बातचीत करता है उस से भला किस के मन में एकदूसरे के प्रति प्यार की भावना जाग्रत नहीं होगी.

समय निकालें

चाहे आप संयुक्त परिवार में रहें या एकाकी परिवार में, सैक्स और रोमांस के लिए कब व कैसे समय निकालना है, यह आप को ही तय करना है. 50 वर्षीया अणिमा की बेटी 11वीं में है. वह कहती है, जब भी हम में से किसी का मूड होता है, मेरे पति सुबह से मेरा काम जल्दी करवा देते हैं और फिर उन के औफिस जाने से पूर्व हम अपने लिए वक्त निकालते हैं.

रोमांस के बिना पति के साथ का मजा कैसा? इस अवस्था तक बच्चे भी बड़े हो जाते हैं. इसलिए पतिपत्नी के लिए सैक्सुअल संबंधों को बनाए रखना वास्तव में चुनौती से कम नहीं होता. खुशहाल घरेलू जिंदगी और प्यार की गरमाहट को बनाए रखने के लिए सैक्स के लिए समय निकालना जरूरी है.

खुद पर दें ध्यान

अकसर महिलाएं उम्र का रोना रो कर अपने प्रति लापरवाह हो जाती हैं. बेतरतीब बाल, अस्तव्यस्त वस्त्र, निस्तेज चेहरा लिए रहती हैं. ऐसा लगता है मानो सारे जमाने का दुख उन्हें ही है. इस की अपेक्षा अपने प्रति सचेत हो कर अपनेआप को कुछ समय दे कर व्यवस्थित और स्मार्ट रहें ताकि आप को देख कर वे हमेशा कुछ करगुजरने को तैयार रहें.

संतुलित भाषा का प्रयोग करें

रीना और उस के पति ने बड़ी मुश्किल से बेटे के ट्यूशन जाने के बाद अपने लिए वक्त निकाला. ऐनवक्त पर रीना ने पति से मोबाइल के बारे में पूछा. पति झुंझला कर बोला, ‘‘देख नहीं सकतीं, सामने ही तो पड़ा है.’’ रीना के पति का अच्छाभला मूड खराब हो

गया और बात बनतेबनते रह गई. सो, छोटीछोटी बातों पर ध्यान न दें, एकदूसरे की भावनाओं का ध्यान रखें और कटाक्ष व व्यंग्यात्मक भाषा के स्थान पर एकदूसरे के लिए संतुलित व सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करें.

एकदूसरे से बात करें

सैक्स के बारे में आपस में खुल कर बातचीत करें. पुराने और उबाऊ तरीकों को छोड़ कर नए तरीके ईजाद करें ताकि सैक्स के प्रति आप की जिज्ञासा बनी रहे. आप चाहें तो इस बारे में इंटरनैट का सहारा लें. सैक्स को महज एक खानापूर्ति के स्थान पर एकदूसरे को खुश करने के लिए करें. दूसरी बातों की तरह सैक्स पर भी सहज व स्वाभाविक बातचीत करें. एकदूसरे की तारीफ करें, रोमांटिक बातें करें, एकदूसरे को सैक्स में अपनी पसंदनापसंद बताएं क्योंकि छोटीछोटी बातें ही अकसर टौनिक का काम कर के सैक्सुअल लाइफ के साथसाथ आप की शादीशुदा जिंदगी को भी हैल्दी बनाए रखती हैं.

कुल मिला कर 60 वर्ष की उम्र के बाद भी अपनी सैक्सुअल लाइफ को बचाए रखने के लिए पतिपत्नी दोनों को ही कोशिश करनी चाहिए. हालिया रिसर्च से यह सिद्ध हो चुका है कि 50 वर्ष की उम्र के बाद भी हैल्दी सैक्सुअल लाइफ जीने वाले दंपती अधिक स्वस्थ व सुखद दांपत्य जीवन जीते हैं. सैक्स अपनेआप में एक बहुत अच्छी ऐक्सरसाइज होने के साथसाथ आप के रिश्ते को भी मजबूती प्रदान करता है. सैक्स में उम्र को कभी बाधक न बनाएं और एक हैल्दी सैक्सुअल लाइफ का आनंद उठाएं.

अफसाना एक दीपा का

34 वर्षीय दीपा वर्मा का भरापूरा गदराया बदन किसी भी मर्द की नीयत बिगाड़ने के लिए काफी था. वजह यह कि दीपा की आंखों में पुरुषों के लिए एक आमंत्रण सा होता था. जो पुरुष इस आमंत्रण को समझ स्वीकार कर लेता था, वह फिर उस के हुस्न और अदाओं से खुद को आजाद नहीं कर पाता था.

ऐसा ही कुछ उस से उम्र में 8-10 साल छोटे धर्मेंद्र गहलोत के साथ हुआ था. धर्मेंद्र प्रसिद्ध धर्मनगरी उज्जैन के देवास रोड पर अपनी पत्नी के साथ रहता था. पेशे से मांस व्यापारी इस युवक की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. अब से कोई 3 साल पहले वह दीपा से मिला था तो पहली नजर में ही उस पर फिदा हो गया था.

दीपा को देख कर धर्मेंद्र को यह तो समझ आ गया था कि वह शादीशुदा है. उस के गले में लटका मंगलसूत्र और मांग का सिंदूर उस के शादीशुदा होने की गवाही दे रहे थे.

उज्जैन का फ्रीगंज इलाका रिहायशी भी है और व्यावसायिक भी, इसलिए जो भी पहली दफा उज्जैन जाता है वह महाकाल और दूसरे मंदिरों के नामों के साथसाथ फ्रीगंज नाम के मोहल्ले से भी वाकिफ हो जाता है. शहर के लगभग बीचोंबीच बसे इस इलाके की रौनक देखते ही बनती है.

इसी इलाके में दीपा की साडि़यों पर फाल लगाने और पीको करने की छोटी सी दुकान थी, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. करीब 3 साल पहले एक दिन धर्मेंद्र की पत्नी दीपा को अपनी साड़ी में फाल लगाने और पीको करने के लिए दे आई थी. उसे वहां से साड़ी लाने का टाइम नहीं मिल पा रहा था, इसलिए उस ने साड़ी लाने के लिए अपने पति धर्मेंद्र को भेज दिया. जब धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर पहुंचा तो बेइंतहा खूबसूरत दीपा को देखता ही रह गया.

दीपा में कुछ बात तो थी, जो उसे देख धर्मेंद्र का दिल जोर से धड़कने लगा था. सामान्यत: बातचीत के बाद साड़ी ले कर जब उस ने दीपा को पैसे दिए तो उस की हथेली एक खास अंदाज में दबाने से वह खुद को रोक नहीं पाया.

धर्मेंद्र ने उस की हथेली दबा तो दी थी, लेकिन उसे इस बात का डर भी था कि कहीं दीपा इस बात का बुरा मान कर उसे झिड़क न दे.

दीपा ने इस हरकत पर कोई ऐतराज तो नहीं जताया बल्कि हंसते हुए यह जरूर कह दिया, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में हाथ दबा दिया.’’

इस जवाब से धर्मेंद्र का डर तो दूर हो गया पर दीपा के इस अप्रत्याशित जवाब से वह झेंप सा गया था. उसे यह समझ आ गया था कि अगर थोड़ी सी कोशिश की जाए तो यह खूबसूरत महिला जल्द ही उस के पहलू में आ जाएगी. कहने भर की बात है कि औरतें पहली नजर में मर्द की नीयत ताड़ जाती हैं पर यहां उलटा हुआ था. पहली ही नजर में धर्मेंद्र दीपा की नीयत ताड़ गया था.

धर्मेंद्र आया दीपा की जिंदगी में

दुकान से जातेजाते उस ने दीपा का मोबाइल नंबर ले लिया और उसे भी अपना नंबर दे दिया था. दीपा के हुस्न में खोए धर्मेंद्र को इस वक्त यह समझाने वाला कोई नहीं था कि वह कितनी बड़ी आफत को न्यौता दे रहा है. यही बात दीपा पर भी लागू हो रही थी, जो धर्मेंद्र के आकर्षक चेहरे और गठीले कसरती बदन पर मर मिटी थी.

जल्द ही दोनों के बीच मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. ये बातें निहायत ही रोमांटिक होती थीं. जिस में यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस को बहका और उकसा रहा है. दोनों शादीशुदा और खेलेखाए थे, इसलिए जल्द ही एकदूसरे से इतने खुल गए कि मिलने के लिए बेचैन रहने लगे.

सैक्सी बातें करतेकरते दोनों का सब्र जवाब देने लगा था. लेकिन पहल कौन करे, इस पर दोनों ही संकोच कर रहे थे. धर्मेंद्र ने पहल नहीं की तो एक दिन दीपा ने ही उसे फोन पर आमंत्रण भरा ताना मारा, ‘‘फोन पर ही सब कुछ करते रहोगे या फिर कभी मिलोगे भी.’’

बात अंधा क्या चाहे दो आंखें वाली थी. सो धर्मेंद्र ने मौका न गंवाते हुए कहा, ‘‘आ जाओ, आज ही मिलते हैं महाकाल मंदिर के पास.’’

इस मासूमियत पर दीपा जोर से हंस कर बोली, ‘‘मंदिर में क्या मुझ से भजन करवाना है. एक काम करो, तुम मेरे घर आ जाओ.’’ दीपा ने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि उसे अपने घर का पता भी दे दिया.

अब कहनेसुनने और सोचने को कुछ नहीं बचा था. धर्मेंद्र के तो मानो पर उग आए थे. वह बिना वक्त गंवाए दीपा के घर पहुंच गया, जहां वह सजसंवर कर उस का इंतजार कर रही थी. दरवाजा खुलते ही उस ने दीपा को देखा तो अपने होश खो बैठा. एक निहायत खूबसूरत महिला उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थी. वह भी बगैर किसी मांग या खुदगर्जी के. यह खयाल ही धर्मेंद्र को और मर्द बनाए दे रहा था.

दरवाजा बंद होते ही दोनों एकदूसरे से कुछ इस तरह लिपटे कि लंबे वक्त तक अलग नहीं हुए और जब अलग हुए तो एक अलग दुनिया में थे, जहां भलाबुरा, नैतिकअनैतिक, जायजनाजायज कुछ नहीं होता. होती है तो बस एक जरूरत जो रहरह कर सिर उठाती है.

चोरीछिपे बनाए गए नाजायज संबंधों का लुत्फ ही कुछ अलग होता है, यह बात दीपा और धर्मेंद्र की हालत देख कर समझी जा सकती थी. जब भी दीपा का मन होता, वह धर्मेंद्र को फोन कर के बुला लेती थी.

कुछ महीनों बाद धर्मेंद्र ने दीपा की निजी जिंदगी में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. उसे हैरानी इस बात की थी कि कोई शादीशुदा औरत कैसे अपने पति के होते हुए उस की आंखों में धूल झोंक कर संबंध बना लेती है. इस दौरान धर्मेंद्र ने दीपा पर काफी पैसा लुटाया था.

दीपा का झूठ आया सामने

अपनी निजी जिंदगी से ताल्लुक रखते सवालों पर दीपा ज्यादा दिन खामोश नहीं रह पाई और उस ने आधी सच्ची और आधी झूठी कहानी धर्मेंद्र को यह बताई कि उस के पति का नाम दिलीप शर्मा है, जो नजदीक के गांव में खेती करते हैं और कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं. जाने क्यों धर्मेंद्र को दीपा झूठ बोलती लगी. अब उस के सामने दिक्कत यह थी कि वह अपनी मरजी या जरूरत के मुताबिक दीपा के पास नहीं जा सकता था क्योंकि उस का पति दिलीप कभी भी आ सकता था.

दीपा का बोला हुआ जो झूठ धर्मेंद्र के दिलोदिमाग में खटक रहा था, वह जल्द ही सामने आ गया. पता चला कि दिलीप शर्मा उस का असली पति नहीं है, बल्कि वह दिलीप की रखैल है, जिसे आजकल की भाषा में लिवइन कहा जाता है. यह खुलासा धर्मेंद्र के लिए एक तरह का झटका ही था, लेकिन जल्द ही इस का भी तोड़ निकल आया.

इस दिलचस्प तोड़ या समाधान को समझने के पहले दीपा की गुजरी जिंदगी जानना जरूरी है, जिसे देख कर कहा जा सकता है कि वह एक बदकिस्मत औरत थी. हालांकि इस बदकिस्मती की एक हद तक जिम्मेदार भी वही खुद थी.

उज्जैन के मशहूर काल भैरव मंदिर से हर कोई वाकिफ है क्योंकि वहां शराब का प्रसाद चढ़ता है. काल भैरव जाने वाला एक रास्ता जेल रोड कहलाता है, जहां जेल बनी हुई है. जेल अफसर भी यहां बनी कालोनी में रहते हैं. दीपा इसी जेल रोड की ज्ञान टेकरी के एक मामूली से परिवार में पैदा हुई थी.

कुदरत ने दीपा पर मेहरबान होते हुए उसे गजब की खूबसूरती बख्शी थी. उसे एक ऐसा रंगरूप मिला था, जिसे पाने के लिए तमाम महिलाएं तरसती हैं.

दीपा ने किशोरावस्था में कदम रखा ही था कि उस के दीवाने भंवरों की तरह ज्ञान टेकरी और जेल रोड पर मंडराने लगे थे. खूबसूरत होने के साथसाथ दीपा अल्हड़ भी थे, इसलिए मांबाप और चिंतित रहने लगे थे. दीपा के 2 छोटे भाई भी घर में थे. लड़की मांबाप की इज्जत समझी जाती है. इस से पहले कि बेटी की वजह से मांबाप की इज्जत पर कोई आंच आए, मांबाप उस की शादी के लिए लड़का ढूंढने लगे.

अभी दीपा की उम्र महज 14 साल थी. मांबाप ने उस की शादी के लिए देवास जिले के गांव जलालखेड़ी में एक लड़का देख लिया, जिस का नाम राकेश वर्मा था. बात पक्की हो जाने पर उन्होंने राकेश वर्मा से दीपा की शादी कर दी. वह दीपा से 5 साल बड़ा था.

शादी के बाद राकेश की रातें गुलजार हो उठीं. वह दिनरात पत्नी के खिलते यौवन में डूबा रहता था. आमतौर पर भले ही शादी कम उम्र में हो जाए, फिर भी युवक जिम्मेदारी उठानी सीख जाते हैं. लेकिन राकेश के साथ उलटा हुआ. वह दिनरात बिस्तर पर पड़ा दीपा के जिस्म से खेला करता था.

शुरूशुरू में तो राकेश के घर वालों ने यह सोच कर कुछ नहीं कहा कि अभी बच्चा है, जब घरगृहस्थी के माने समझने लगेगा तो रास्ते पर आ जाएगा. लेकिन जब 5-6 साल गुजर गए और राकेश ने खुद कमानेखाने की कोई पहल नहीं की तो घर वाले उसे टोकने लगे.

सुधरने के बजाय राकेश और बिगड़ता चला गया और जल्द ही उसे शराब की लत लग गई. वह रोज शराब पीने लगा था. घर वालों ने उसे घर से तो नहीं निकाला लेकिन घर में ही रखते हुए उस का बहिष्कार सा कर दिया.

चारों तरफ से हैरानपरेशान राकेश अपनी नाकामी और निकम्मेपन की खीझ दीपा पर उतारने लगा. दीपा के जिस संगमरमरी जिस्म को सहलातेचूमते वह कभी थकता नहीं था, उस पर अब राकेश की पिटाई के निशान बनने लगे. दीपा भी कम हैरानपरेशान नहीं थी, पर उस के पास रोज की इस मारपिटाई से बचने का एक ही रास्ता था मायका, क्योंकि राकेश अब उस पर चरित्रहीनता का आरोप भी लगाने लगा था.

10 साल यानी 24 साल की उम्र तक दीपा पति के पास रही, फिर एक दिन अपने मायके आ गई. जिस से दीपा के मांबाप के सिर पर बोझ और बढ़ गया था. लेकिन थोड़ा सुकून उन्हें उस वक्त मिला, जब दीपा ने फ्रीगंज में साड़ी पर फाल लगाने और पीको करने की दुकान खोल ली.

दुकान चल निकली तो दीपा खुद के खर्चे उठाने लगी. पर जैसे ही लोगों को यह पता चला कि वह पति को छोड़ कर मायके में रह रही है तो फिर उस के दीवाने दुकान और घर के आसपास मंडराने लगे.

दिलीप बन गया पार्टटाइम पति

शुरुआत में उस ने कोशिश की कि वह किसी के चक्कर में न पड़े, लेकिन शरीर की मांग के आगे वह बेबस थी. कई लोगों ने प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष तरीके से उसे प्रपोज किया, लेकिन अब तक दीपा काफी सयानी और समझदार हो चुकी थी.

दीपा को एक ऐसे पुरुष की जरूरत थी, जो शारीरिक के साथसाथ भावनात्मक और आर्थिक सहारा और सुरक्षा भी दे सके. आसपास मंडराते लोगों को देख वह समझ जाती थी कि उन का मकसद क्या है.

इसी ऊहापोह में उलझी दीपा की मुलाकात एक दिन दिलीप शर्मा से हुई तो वह उसे हर तरह उपयुक्त लगा. शादीशुदा दिलीप दीपा की खूबसूरती और अदाओं पर मर मिटा था. उस की पत्नी गांव में रहती थी, इसलिए उज्जैन में किसी महिला से मिलनेजुलने पर उसे कोई अड़ंगा या पाबंदी नहीं थी.

दोनों की मेलमुलाकातें बड़े सधे ढंग से आगे बढ़ीं. दोनों ने एकदूसरे की जरूरतों को समझा और दोनों के बीच मौखिक अनुबंध यह हुआ कि दिलीप दीपा का पूरा खर्च उठाएगा, उसे अलग घर दिलाएगा और ज्यादा से ज्यादा वक्त भी देगा. एवज में दीपा उस के लिए हर तरह से समर्पित रहेगी.

दिलीप ने दीपा को किराए के मकान में शिफ्ट करा कर घरगृहस्थी का सारा सामान जुटा दिया और पार्टटाइम पति की हैसियत से रहने भी लगा. दिलीप के पास पैसों की कमी नहीं थी. वह उन लोगों में से था, जो एक पत्नी गांव में और एक शहर में रखना अफोर्ड कर सकते हैं. दीपा के साथ दूसरा फायदा उसे यह था कि उस से उस की पारिवारिक और सामाजिक जिंदगी और प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आ रही थी.

लिवइन के ये 8 साल अच्छे से कटे, लेकिन जैसा कि आमतौर पर ऐसे मामलों में होता है, इन दोनों के साथ भी हुआ. दिलीप का दिल दीपा से भरने लगा तो उस ने उस के पास आनाजाना कम कर दिया. पर अपने इस वादे पर वह कायम रहा कि जिंदगी भर दीपा का खर्च उठाएगा.

दीपा समझ रही थी कि प्रेमी का मन उस से भर चला है लेकिन अभी पूरी तरह उचटा नहीं है. पर दिक्क्त यह थी कि 14 साल की उम्र से ही सैक्स की आदी हो जाने के कारण वह अकसर रोजाना ही सैक्स चाहती थी, जो दिलीप के लिए संभव नहीं था.

इसी साल जनवरी में दिलीप ने उसे माधवनगर इलाके के वल्लभनगर में किराए के मकान में शिफ्ट कर दिया. मकान मालिक लक्ष्मणदास पमनानी को उस ने यही बताया कि दीपा उस की पत्नी है और वह खेतीबाड़ी के सिलसिले में गांव जाता रहता है. पर पड़ोसियों का माथा उस वक्त ठनका, जब कई अंजान युवक दीपा के पास दिलीप की गैरमौजूदगी में आनेजाने लगे. आजकल बिना वजह कोई किसी के फटे में टांग नहीं अड़ाना चाहता, इसलिए लोगों ने दीपा से कहा कुछ नहीं, बस देखते रहते.

दिलीप को इस बात की भनक थी, इसलिए उस ने दीपा को समझाया कि वह फालतू लोगों का अपने यहां आनाजाना बंद करे. लेकिन दीपा नहीं मानी. दिलीप ने भी उस से कोई जबरदस्ती नहीं की. दिलीप को अब दीपा से ज्यादा अपनी इज्जत की चिंता होने लगी थी.

ये सारी बातें जब धर्मेंद्र को पता चलीं तो वह बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं तिलमिलाया. दिलीप दीपा का पति नहीं है, यह जान कर उसे खुशी ही हुई. हैरतअंगेज तरीके से जल्द ही धर्मेंद्र और दिलीप में दोस्ती हो गई और दोनों दीपा के साथ बैठ कर दारूचिकन की दावत उड़ाने लगे.

अब दीपा 2 आशिकों की हो गई थी, जो उसे ले कर बजाय आपस में झगड़ने के उसे साझा कर रहे थे. पर वह यह नहीं समझ पा रही थी कि दोनों उस के शरीर और जवानी को भोग रहे हैं. दोनों में से कोई उसे प्यार नहीं करता. धर्मेंद्र और दिलीप को सहूलियत यह थी कि दीपा अब किसी एक पर भार नहीं थी.

2 प्रेमियों की रखैल की तरह रह रही दीपा का भी इन से मन भरने लगा तो उस ने और भी आशिकों को घर आने की छूट दे दी. जिस पर दिलीप को तो नहीं पर धर्मेंद्र को जरूर ऐतराज हुआ. यह ऐतराज जायज था या नाजायज, यह तय कर पाना तो मुश्किल है. लेकिन यह एक भयानक हादसे यानी कत्ल की वारदात के रूप में बीती 18 मई को सामने आया तो पूरा उज्जैन दहल सा गया.

दीपा के पड़ोस में रहने वाले जितेंद्र पवार जब 18 मई, 2018 की सुबह करीब 8 बजे छत पर पहुंचे तो यह देख घबरा गए कि बगल में रहने वाली दीपा के घर से धुआं निकल रहा है. किसी अनहोनी की आशंका से घबराए जितेंद्र ने तुरंत पुलिस और दमकल विभाग को फोन कर इस की सूचना दी.

चंद मिनटों बाद ही पुलिस और दमकलकर्मी वल्लभनगर पहुंच गए. दमकलकर्मियों ने जैसेतैसे आग पर काबू पाया. इस के बाद पुलिस अंदर दाखिल हुई.

पुलिस वाले यह देख दहल गए कि रसोई में एक जवान महिला की अर्धनग्न लाश औंधी पड़ी थी. लाश के ऊपर मोटे गद्दों के साथ अधजली दरी भी पड़ी थी. लाश दीपा की ही थी. उस के दोनों हाथों की नसें कटी हुई थीं और गरदन पर धारदार हथियार के निशान भी थे. दीवारों और दरवाजों पर भी खून के निशान थे. साफ दिख रहा था कि मामला बेरहमी से की गई हत्या का है.

बेरहमी से की गई हत्या

माधवनगर थाने के इंचार्ज गगन बादल ने तुरंत इस जघन्य हत्या की खबर एसपी सचिन अतुलकर और एफएसएल अधिकारी डा. प्रीति गायकवाड़ को दी. मामला गंभीर था, इसलिए ये दोनों भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल के मुआयने में दिखा कि पूरा घर अस्तव्यस्त था और बैडरूम का दरवाजा टूटा पड़ा था. सब से अजीब और चौंका देने वाली बात यह थी कि दीपा की लाश के पैरों के बीच एलपीजी सिलेंडर की नली घुसी हुई थी. हत्या की ऐसी वारदात पुलिस वालों ने पहली बार देखी थी. लाश 90 फीसदी जली हुई थी.

तुरंत लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया. 3 डाक्टरों एल.के. तिवारी, अजय दिवाकर और रेखा की टीम ने उस का पोस्टमार्टम कर अपनी रिपोर्ट में कहा कि दीपा को जिंदा जलाया गया है. ऐसा क्यों किया गया, यह हत्यारा ही बता सकता था.

अड़ोसपड़ोस में पूछताछ करने पर पता चला कि मृतका दीपा वर्मा दिलीप की पत्नी थी. सचिन अतुलकर ने जांच के लिए माधवनगर थाने के टीआई गगन बादल के नेतृत्व में टीम गठित कर जांच के आदेश दे दिए. टीम में एसआई बी.एस. मंडलोई, संजय राजपूत, हैडकांस्टेबल सुरेंद्र सिंह के अलावा साइबर सेल की तेजतर्रार इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को शामिल किया गया.

पूछताछ में दिलीप का नाम सामने आया. मकान मालिक ने भी अपने बयान में बताया कि जनवरी में उन्होंने मकान दिलीप को किराए पर दिया था. दीपिका शिंदे ने सब से पहले दिलीप की गरदन पकड़ी तो उस ने अपने और दीपा के संबंधों का सच उगलते हुए खुद के हत्यारे होने या हत्या में लिप्त होने से साफ इनकार कर दिया. दीपा के दोनों भाई बहन की लाश पर आंसू बहाने आए. उन्होंने भी दिलीप पर आरोप लगाया कि वह आए दिन दीपा के साथ मारपीट करता था.

दिलीप ने पुलिस को बताया कि उस की गैरमौजूदगी में कई युवक दीपा से मिलने आते रहते थे. उस के इन प्रेमियों में एक नाम धर्मेंद्र का भी था. जांच करतेकरते शाम हो चली थी. पुलिस टीम आधी रात के करीब धर्मेंद्र के घर पहुंची तो वह घबरा उठा. इंसपेक्टर दीपिका शिंदे ने जब धर्मेंद्र पर नजर डाली तो उस के हाथ पर घाव दिखे. वह तुरंत समझ गईं कि दीपा का हत्यारा उन के सामने खड़ा है.

दीपिका शिंदे ने सीधा सवाल यह दागा, ‘तूने दीपा की हत्या क्यों की?’ तो बजाय इधरउधर की बातें करने या खुद का बचाव करने के उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

अपने बयान में हत्या की वजह का खुलासा करते हुए धर्मेंद्र ने बताया कि उसे दिलीप से कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन उसे दूसरे लड़कों से उस की दोस्ती और शारीरिक संबंध मंजूर नहीं थे.

आखिर प्रेमी से ही मौत मिली दीपा को

हादसे के हफ्ते भर पहले ही धर्मेंद्र की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया था, इसलिए उस के साथ वह सो नहीं सकता था. जिस्म की तलब लगी तो उस ने दीपा को फोन किया. पहले तो दीपा ने मना कर दिया लेकिन उस के बारबार कहने पर वह राजी हो गई.

तय यह हुआ कि रात को एंजौय करने के पहले दोनों पार्टी करेंगे. इस बाबत शाम को धर्मेंद्र और दीपा बाजार गए और रात के जश्न के लिए शराब और चिकन खरीदा. बाजार में घूमने के दौरान ही दीपा के पास किसी का फोन आया था, जिसे उस ने कुछ हिचकते हुए रिसीव किया था.

फोन करतेकरते उस ने कहा था कि आज नहीं क्योंकि उस का पति आया हुआ है. दीपा पर शक तो धर्मेंद्र को पहले से ही था, इसलिए उस ने उस से छिप कर दिलीप को फोन किया तो पता चला कि वह तो गांव में है. इस झूठ पर वह तिलमिला उठा. शक पैदा करने वाली दूसरी बात दीपा का जरूरत से ज्यादा शराब और चिकन खरीदना भी था.

शक में मूड खराब होने पर धर्मेंद्र घर चला गया. इसी शक के मारे उस के तनबदन में आग लग रही थी. दीपा उसे अब बेवफा और बदचलन लगने लगी थी. कुछ सोचते हुए वह दीपा की सच्चाई जानने के लिए आधी रात को उस के घर पहुंच गया.

गया तो वह दीपा के साथ मौजमस्ती करने के इरादे से था लेकिन जब उसे यह पता चला कि उस के पैसे से लाई शराब और गोश्त से दीपा 2 दूसरे लड़कों रवि और मनोहर उर्फ कुक्कू के साथ पार्टी कर चुकी है तो उस का खून खौल उठा.

इस बात पर दोनों में खूब झगड़ा हुआ और फिर धर्मेंद्र ने दीपा की हत्या कर दी. जब इन दोनों का झगड़ा शुरू हुआ था तब कुक्कू बाहर ही छिपा था, लेकिन हत्या के पहले भाग गया था. जिसे पुलिस ने सरकारी गवाह बना लिया. चंद घंटों में ही कातिल को पकड़ लेने पर एसपी सचिन अतुलकर ने पुलिस टीम की पीठ थपथपाई.

दीपा अब इस दुनिया में नहीं है और धर्मेंद्र जेल में है. दिलीप पहले की तरह जिंदगी जी रहा है पर दीपा की मौत कई सवाल छोड़ गई है कि आखिरकार उस की गलती क्या थी? शराबी और निकम्मे पति ने उसे छोड़ दिया था तो दूसरी गलती मांबाप ने कम उम्र में उस की शादी कर के पहले ही कर दी थी.

तनहाई की मारी दीपा एक से दूसरे मर्द की बाहों में झूलती हुई मारी गई तो इस की जिम्मेदार भी वही थी. अगर वह धर्मेंद्र और दूसरे लड़कों के पीछे नहीं भागती तो शायद बच जाती. लेकिन यह चिंता भी उसे सता रही होगी कि दिलीप और धर्मेंद्र कब तक उस का खर्चा उठाएंगे. इसलिए उस ने नए लड़कों से संबंध बनाए, जिन का अंजाम इस तरह सामने आया.

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