


इस साल जनवरी में चंडीगढ़ में शराब के एक ठेके व बार का उद्घाटन हुआ. बार के मालिक ने इस मौके पर पूजापाठ कराने के लिए धर्मगुरु बुला लिए. वे अपने धर्मग्रंथ समेत आए व पाठ कर के अपनी दानदक्षिणा ले कर चले गए. तभी किसी ने धर्मस्थान के प्रबंधकों को खबर दे दी कि पवित्र ग्रंथ शराबखाने में रखा है जो उन के धर्म की बेइज्जती है. बस, फिर क्या था, वहां बवाल मच गया. बहुत देर बाद माफी मांगने पर मामला शांत हुआ.
धर्म के दुकानदार शराबियों के साथ होने से भी परहेज नहीं करते. वे बुराई में भी हिस्सेदारी निभाने के लिए धार्मिक कर्मकांड के जरीए मदद कर रहे हैं. ऐसी धार्मिकता किस काम की जो बुराई का साथ दे? दरअसल, धर्म की किताबों में देवताओं द्वारा सुरापान करने का जिक्र भरा पड़ा है. काली व भैरव वगैरह के मंदिरों में शराब का भोग लगता है. प्रसाद में दारू बांटी जाती है, इसलिए चंडीगढ़ की घटना पहली या अकेली नहीं है. जहांतहां अकसर ऐसा होता रहता है. बरेली में भी अंगरेजी शराब की दुकान के उद्घाटन पर पूजापाठ हुआ था.
सच की खिलाफत धर्म की दुकानदारी करने वाले पंडेपुरोहित नहीं देखते कि वे किस के बुलावे पर कहां और क्या करने जा रहे हैं. उन्हें सिर्फ अपनी दानदक्षिणा झटक कर जेब गरम करने से मतलब होता है.
धर्म के दुकानदार सत्य व अहिंसा की दुहाई तो देते हैं, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए. उन की बुनियाद तो गढ़े हुए भगवान के झूठ पर टिकी रहती है. अपने मतलब के लिए तो वे हिंसा करने से भी बाज नहीं आते हैं, इसलिए आएदिन बहुत सी चौंकाने वाली घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनी रहती हैं. सदियों से धर्म के दुकानदारों को अपनी पोल खुलने का खतरा बराबर
बना रहता है. वे यह भी जानते हैं कि अगर भोलीभाली जनता ने जागरूक हो कर अपने दिमाग के खिड़कीदरवाजे खोल लिए तो उन की दुकानदारी बंद
हो जाएगी इसलिए वे जनता को जगाने वालों को हमेशा अपना दुश्मन समझते हैं.
अधर्मी बता कर वे लोगों को भड़काते हैं. साथ ही, उन के गुरगे अंधविश्वासों की पोल खोलने वालों पर जानलेवा हमले करते रहते हैं. मामला लाखों का नहीं अरबों का है. सारे धर्म दुनियाभर में एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं. हिंसा के साथ
आसाराम केस में 6 गवाह जान गंवा चुके हैं. धर्म की खिलाफत में 5 फरवरी, 2015 को कोल्हापुर, महाराष्ट्र के गोविंद पंसारे की हत्या हुई थी. गोविंद पंसारे के हत्यारोपी की हिट लिस्ट में एक नाम मराठी पत्रकार निखिल वागले का भी था. उस ने साल 2011 में अंधविश्वास उन्मूलन बिल पर एक टैलीविजन शो किया था, जिस में तर्क से झुंझला कर एक कट्टरपंथी प्रोग्राम के बीच से उठ कर चला गया था. तब से इस पत्रकार को धमकियां मिल रही थीं. धर्म के नाम पर मौत के घाट उतारना नई बात नहीं है. यूरोप में गैलीलियो, कौपरनिकस और ब्रूनी जैसे महान वैज्ञानिकों की हत्याएं हुईं, क्योंकि उन की खरीखरी, सच्ची बातें धर्म के दुकानदारों के गले नहीं उतरती थीं.
इसलामिक कट्टरपंथी सामूहिक नरसंहार करते हैं ताकि लोग दहशत में रहें व मजहब के नाम पर फैलाए गए उन के झूठ से परदा हटाने की हिम्मत न करें. सच का साथ देने वाले बहुत से लोग हमारे देश में अब तक अपनी जान गंवा चुके हैं. महाराष्ट्र के मशहूर लेखक डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर अपनी कलम से 30 बरसों तक धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ लड़े. उन्होंने मराठी भाषा में अंधविश्वास उन्मूलन पर किताब लिखी.
डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर ने अंधश्रद्धा उन्मूलन समिति बनाई थी. इस समिति के जरीए उन्होंने लोगों को जागरूक करने के लिए बड़ा ही जबरदस्त व कामयाब आंदोलन चलाया था. इस वजह से धर्म के दुकानदारों को उन से खतरा पैदा हो गया था, इसलिए 20 अगस्त, 2013 को गोली मार कर उन की हत्या कर दी गई.
जुल्म की इंतिहा गुरमीत रामरहीम अपनी खिलाफत करने वालों को मरवा कर, जमीन में गड़वा कर ऊपर से पेड़ लगवा देता था. जाहिर है, धर्म के दुकानदार बेहद जालिम होते हैं. वे चाहते हैं कि लोग उन की तसवीर का सिर्फ एक ही रुख देखें. बहस न करें. उन का कहा व उन के नियम मानें. सच बोलने पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले दर्ज करा दिए जाते हैं.
लोग सिर्फ उतना ही देखते हैं जितना धर्म के दुकानदार खुद उन्हें दिखाते हैं. उस से आगे जा कर सोचने व बोलने वाले को बुरा व नास्तिक बता दिया जाता है. ऐसी बहुत सी तरकीबें चालाक लोगों ने अपने हक में ईजाद कर रखी हैं ताकि धर्म की अफीम पी कर लोगों का दिमाग कुंद रहे, वे उन के चंगुल में फंसे रहें. धर्म के दुकानदार दिनरात लोगों को लूट कर अकूत धनदौलत इकट्ठी करने में लगे रहते हैं. बेहिसाब चढ़ावे को हथियाने, हड़पने, गद्दी के वारिस बनने के लिए लड़तेझगड़ते हैं. मुकदमेबाजी व खूनखराबा करते हैं. साथ ही, अपनी खिलाफत करने वालों को खत्म करने
के लिए वे मरनेमारने तक को तैयार रहते हैं.
ईश निंदा के कानून अब मर से गए हैं, लेकिन फिर भी धर्म के दलालों को शिकायत करने से तो कोई नहीं रोक सकता. एक शिकायत के बाद अदालतों में पेशियों का लंबा सिलसिला चलता है. बहुत से पाखंडी पुलिस तक से मुकाबला करने के लिए गोली, बारूद, बम व असलहा वगैरह रखते हैं. रामपाल व रामरहीम के आश्रम में भारी तादाद में हथियारों का जखीरा निकला था. बहुत सी धार्मिक जगहों व अखाड़ों वगैरह में लाठी, डंडे, तीर, तलवार, बरछी, भाले वगैरह रखे जाते हैं.
यह बात दीगर है कि सब देखसुन कर भी लोगों की आंखें नहीं खुलती हैं. वे धर्म की आड़ में तिजारत करने वालों के झांसे में आ ही जाते हैं. लड़ाई दीए और तूफान की
हमारे देश में धर्म व अंधविश्वासों का साथ चोलीदामन की तरह है. इन के बीच फर्क की लकीर अब बेहद महीन व धुंधली सी हो गई है. अंधभक्ति के खिलाफ बोलना भी सामूहिक जुर्म करने वालों के खिलाफ जैसा जोखिम भरा काम है. हमारे देश में पढ़ेलिखे लोग भी तकदीर संवारने के लिए अंगूठी पहन लेते हैं. मंगलयान छोड़ने से पहले इसरो के आला अफसर तिरुपति मंदिर जा कर कामयाबी के लिए प्रार्थना करते हैं. डाक्टर, इंजीनियर तरक्की के लिए वास्तु के नाम पर फेरबदल करा लेते हैं. दुखों से छुटकारा पाने के लिए औरतें बाबाओं के पास चली जाती हैं, वहां चढ़ावा चढ़ाती हैं और उन के झांसे में आ कर आबरू तक गंवा देती हैं.
जमीन के भीतर हजारों टन सोना दबा होने का सपना आया सुन कर जहां पुरातत्त्व के सरकारी महकमे खुदाई करने पहुंच जाते हैं, उस देश में तर्क के साथ वैज्ञानिक बातें करना बेमानी लगता है. जहां गुरु व भगवान की सेवा के नाम पर नौजवान व कमसिन लड़कियों को डेरों व आश्रमों में सौंप दिया जाता है, वहां सच्ची बात कहना मुश्किल व हिम्मत का काम है. बाजार में खरीदारों को अपनी तरफ लुभाने के लिए दुकानदार विंडो ड्रैसिंग जैसे तमाम उपाय करते हैं. अपना माल बेचने के लिए अच्छेअच्छे नमूने शोकेस में सजा कर दिखाते हैं. इसी तरह धर्म के दुकानदार भी अच्छी बातों का ढोल भक्तों को ललचाने, बहकाने व भरमाने के लिए बजाते हैं. असल में तो बुरे कामों से परहेज वे खुद भी नहीं करते, तभी तो आसाराम, रामरहीम, रामपाल व फलाहारी जैसे बहुत से जेल की हवा खा रहे हैं.
पुराने जमाने में तालीम की कमी में लोग कुदरती आपदाओं, हादसों व बीमारियों के बारे में नहीं जान पाते थे इसलिए बस्ती के किसी सयाने के पास चले जाते थे. वह भी अंधों में काना राजा की तरह होता था. अपना रोब व असर बनाए रखने के लिए वह उन्हें देवीदेवता या भूतप्रेत की वजह से यह सब होना बता देता था. साथ ही, राख, तावीज या कोई धागा वगैरह दे देता था. यह गोरखधंधा आज भी जारी है.
यह है उपाय केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी महकमे में विज्ञान व तकनीक के संचार की एक परिषद है. यह विज्ञान मेलों, विज्ञान दिवस, बाल विज्ञान कांग्रेस, पुरस्कार व नुमाइश वगैरह से जागरूकता लाने के काम करती है. इस के कामकाज में अंधविश्वासों को दूर करना भी शामिल है. यह बात अलग है कि ज्यादातर लोग इस के बारे में नहीं जानते हैं.
विज्ञान व तकनीक में तरक्की को ले कर भले ही कर्नाटक अगड़े राज्यों में हो, लेकिन वहां अंधविश्वासों का अंधेरा आज भी कम घना नहीं है. मसलन, देवदासी प्रथा पर विवाद होते रहते हैं. मदे स्नान कुरीति के तहत ब्राह्मणों के खाने के बाद बची पत्तलों
पर पिछड़े इसलिए लोटते हैं कि ऐसा करने से उन की बीमारियां ठीक हो जाएंगी. नरबलि देने वालों को फांसी देने और जादूटोना व तंत्रमंत्र वगैरह को अपराध घोषित करने के लिए साल 2013 के दौरान महाराष्ट्र व कर्नाटक में अंधविश्वास उन्मूलन के बिल आए थे ताकि धर्म की आड़ में ऊलजुलूल बातों पर आंखें मूंद कर भरोसा करने वाले शोषण के शिकार न हों, क्योंकि यह बात मानवाधिकारों के खिलाफ है.
दुनिया के कई देशों में भूतप्रेत, डायनचुड़ैल वगैरह के नाम पर औरतों व बच्चों के साथ बहुत ही वहशियाना हरकतें की जाती हैं इसलिए इस मसले को हल करने की गरज से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 दिसंबर, 2017 को जिनेवा में अंधविश्वास के चलते प्रताड़ना व मानवाधिकार के मुद्दे पर एक बैठक की थी. उस बैठक में अंधविश्वास रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाने की मांग उठी थी.
हमारे संविधान में मूल कर्तव्यों के तहत लिखा गया है कि सभी नागरिकों को वैज्ञानिक नजरिए को बढ़ावा देना चाहिए इसलिए हम सब का फर्ज भी यही है कि बेखौफ हो कर सच व तर्क का साथ दें. सभी बातों को विज्ञान की कसौटी पर कसें और धर्म के दुकानदारों का भंडाफोड़ करें, पर ये बातें सिर्फ किताबी हैं. पुलिस अफसर हो, जज या मजिस्ट्रेट, धार्मिक सवाल उठाने पर अगर शिकायत हो तो मामला दर्ज कर ही लेता है.
धर्म की दुकानदारी कर रहे मक्कार अभी भी मजे से अपना धंधा चला रहे हैं. उन का राजपाट अभी तो कहीं नहीं जाता दिख रहा है.
पोटली में गहने रखो, 2 घंटे में दोगुने हो जाएंगे, इस फरेब का अरसे से कम पढ़ीलिखी महिलाएं शिकार होती रही हैं. अब कंप्यूटरसैवी और खुद को बहुत होशियार समझने वाले, जमाने पर पकड़ रखने का दावा करने वाले भी फरेबियों के शिकार हो रहे हैं. आप के पैसों को जल्द ही 2-3 गुना करने वाले मिल ही जाते हैं. रिपल कौइन खरीद कर बिटकौइन की तरह फायदा कमाने का लालच देने वाली एक वैबसाइट ने 200 लोगों के 100 करोड़ रुपए ठग लिए.
नवंबर 2017 में शुरू हुई वैबसाइट पर इस इंटरनैशनल कौइन का व्यापार शुरू हुआ और लोगों ने टैस्ट करने के लिए शुरुआत में अपनी छोटी रकमों को निवेश किया. बदले में अच्छा रिटर्न मिलने पर लोग धड़ाधड़ पैसा लगाने लगे और कुछ ने तो 50 से 80 लाख रुपए तक लगा दिए.
जैसा स्वाभाविक है, शुरू में कुछ लोगों को फायदा हुआ पर बाद में अचानक वैबसाइट बंद हो गई और कर्ताधर्ता गायब हो गए. अनुमान है कि लोगों को 100 करोड़ रुपए की चपत तो लग ही गई. यह रकम शायद काली नहीं थी यानी ब्लैक मनी नहीं थी क्योंकि बैंक द्वारा ट्रांजैक्शंस बाकायदा अकाउंट नंबर दे कर किए गए.
तुरंत पैसा कमाने की पौंजी स्कीमें दुनियाभर में चलती रहती हैं. शुरू में कुछ को मोटा कमाने का लालच दिया जाता है और फिर जमा हो रहे पैसों से कुछ को मोटा लाभ भी दे दिया जाता है. वहीं, कुछ को टरका दिया जाता है. कुछ हालात में यह व्यापार वर्षों चल जाता है. इस से हवाई जहाज, अखबार, होटल, स्कूल तक बना लिए जाते हैं. ऐसी स्कीमों में कुछ का काला कुछ का सफेद धन लगता है. उन में से कुछ को फायदा दे दिया जाता है और बहुतों को लूट लिया जाता है.
इस मामले में कानून, पुलिस और अदालतें कुछ ज्यादा नहीं कर सकतीं. सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के सुब्रत राय को डेढ़ साल तक बंद रखा पर न पैसे मिले और न रहस्य खुला कि किनकिन का पैसा गायब हुआ. पैसा आया जोकि कमाया नहीं गया, यह मालूम होते हुए भी अपराध साबित न हो सका.
देशभर में ऐसा व्यापार जम कर चल रहा है, क्योंकि यहां तो धारणा ही यह है कि पैसा मेहनत से नहीं, पूजापाठ से बनता है. यहां बौलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन और सब से बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी तक मंदिरों की यात्राएं विधिवत, नियमित करते हैं. लोगों को यह लगता नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि लक्ष्मी तो पूजा से प्राप्त होती है. रिपल कौइन में पैसा लगाना और गंवाना इसी का ही नतीजा है. देश में भविष्य में कुछ बदलेगा और लोग इन धांधलियों से सबक सीखेंगे, यह भूल जाइए.
साल 2013 में कांग्रेसी राज में शुरू की गई अंतर्जातीय विवाह की स्कीम में दूल्हे या दुलहन में से अगर एक दलित है तो ढाई लाख रुपए मिल सकते हैं पर 2014-15 में सिर्फ 5 जोड़ों को यह रकम मिली थी. 2015-16 में 74 जोड़ों को मंजूर की गई थी. कितनों को मिली यह साफ नहीं है क्योंकि इस संस्था की भी लापरवाही वैसी ही है जैसी ‘दलित ऐक्ट’ के मामलों में सजा देने वाली अदालतों की.
दूसरी तरफ जस्टिस अरुण मिश्रा और एमएम शांतनागौदार ने 20 साल काम करने के बाद जाति को जन्म से तय हो जाने का फैसला दे कर तय कर दिया कि न देश से जाति बदली है न आम लोगों का रुख (देखें सरस सलिल जून (प्रथम) 2018 अंक की गहरी पैठ).
देश में कई सर्वों से यही पता चल रहा है कि 95 फीसदी लोग अपनी ही जाति में शादी कर रहे हैं. दलितों की सवर्णों में तो शादी न के बराबर है. इक्कादुक्का शादियां दलितों और पिछड़ों में हो रही हैं. पिछड़े सवर्ण समाज के लिए वे शूद्र ही हैं जो रामायण में केवट और शंबूक हैं और महाभारत में एकलव्य.
फैमिली शादी डौट कौम के पहले ही पेज पर जो फार्म है उस में आयु, भाषा के बाद जाति ही है.
मुजफ्फरपुर पुलिस ने 2 लड़कों को एक दलित लड़के की पिटाई 2 साल तक करने पर गिरफ्तार किया. उस का वीडियो वायरल हो गया था.
उस का दोष था कि उस के नंबर अच्छे आए थे. वेदों की रक्षा करने वाले ब्राह्मण को ईश्वर का मुख बताया गया है और शूद्र (जो दलित नहीं) ईश्वर की सेवा करने वाले पैर. दलित तो पांचवीं जाति हैं जो जाति बाहर हैं और हाल ही में उन्हें जबरन मन मार कर सहना पड़ रहा है. यह मानसिकता हर रोज फैलाई जा रही है. बारबार दोहराई जा रही है. हर पंडे की किताब में यही लिखा है.
हिंदू समाज की जिस सोच को निशाने पर ले कर ब्राह्मणों ने फूट डालो और राज करो नीति के सहारे देश पर 2000 साल राज किया, आजादी के बाद भी वह सोच नहीं बदली है.
साल 1955 में ‘प्रोटैक्शन औफ सिविल राइट्स’ कानून बना कर छुआछूत को गैरकानूनी बताया गया पर हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते गए. देश में छुआछूत और जातीय भेदभाव बढ़ता गया. ऐसे में 1989 में नया कानून बनाना पड़ा. इस का नाम ‘अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम’ रखा गया. इस कानून में खास बात यह थी कि मुकदमा कायम होने के साथ ही गिरफ्तारी का प्रावधान था. इस कानून को ही ‘दलित ऐक्ट’ के नाम से जाना जाता है.
‘दलित ऐक्ट’ लागू होने के 29 साल बाद भी इस कानून से दलितों को सताना रुक नहीं सका है. सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना है कि इस कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है. अगर केंद्र सरकार दलित ऐक्ट में संशोधन करना चाहे तो कर सकती है जिस से मुकदमा कायम होते ही गिरफ्तारी का प्रावधान फिर से शुरू हो सके.
पर कड़े कानून किसी भी समस्या का हल नहीं होते हैं. इस से उन का गलत इस्तेमाल बढ़ता है. मुकदमेबाजी बढ़ती है. आपस में नफरत और दूरियां बढ़ती हैं. दहेज कानून, आतंकवाद कानून, महिला हिंसा कानून वगैरह इस के जीतेजागते उदाहरण हैं.
‘दलित ऐक्ट’ के बहाने
वोट बैंक की राजनीति के चलते हर मुद्दे का हल सख्त कानून बना कर किया जाता है. कानून बनाते समय इस के गलत इस्तेमाल पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. ऐसे कानून को लचीला बना कर विरोधी दल वोट बैंक की रोटियां सेंकने लगते हैं.
‘दलित ऐक्ट’ में सब से बड़ा विरोध मुकदमा कायम होते ही गिरफ्तारी का है. साल 1998 में जब उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा की 6-6 महीने की सरकार बनी थी तब के मुख्यमंत्री काल में तमाम लोगों को मुकदमा कायम होते ही जेल भेज दिया गया था.
मायावती के सरकार से हटने के बाद जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो इस को लचीला बनाया गया. 2007 में जब मायावती बहुमत की सरकार के साथ मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने कैबिनेट में प्रस्ताव ला कर मुकदमा कायम होने के बाद गिरफ्तारी के मसले को खत्म कर दिया.
2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ी तादाद में दलित वोट भी मिले. भाजपा ने दलितों की अगुआई करने वाले कई दलों को अपने साथ मिलाया. इन में अपना दल, लोक जनशक्ति पार्टी, आरपीआई खास थीं. इन तीनों के ही नेता अनुप्रिया पटेल, राम विलास पासवान और रामदास अठावले केंद्र सरकार में मंत्री हैं.
केंद्र सरकार में मंत्री रहने के बाद अब एक बार फिर इन को दलितों की याद आई है. इन के लिए एक बार फिर से ‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन का बहाना बन रहा है. अब केंद्र सरकार सहयोगी दलों के दबाव का बहाना बना कर ‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन कर रही है.
भाजपा की परेशानी यह है कि अगर लोकसभा चुनाव में सपाबसपा का गठबंधन हो गया तो उस की करारी हार तय है. ऐसे में ‘दलित ऐक्ट’ के बहाने भाजपा दलितों को पार्टी के साथ जोड़ना चाहती है.
दरअसल, लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीटें एससी और 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. इन 131 सीटों के अलावा कई ऐसी सीटें हैं जहां दलित वोट जीत के लिए जरूरी हो जाते हैं.
लोकसभा के साथ ही साथ देशभर की विधानसभा सीटों में 607 सीटें एससी और 554 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. सभी दलों को यह लगता है कि ऐसे मुद्दों को उठा कर जीत हासिल की जा सकती है.
आबादी की बात की जाए तो देश में तकरीबन 25 करोड़ दलित हैं. ये कुल आबादी का तकरीबन 24 फीसदी हैं. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में इन की आबादी ज्यादा है. लिहाजा, चुनावी गणित के हिसाब से दलितों का साथ जरूरी है.
इमेज सुधारने की कोशिश
भारतीय जनता पार्टी के राज में ‘दलित ऐक्ट’ से जुड़ी वारदातें पूरे देश में बढ़ीं. गुजरात में दलितों को सताने की घटनाएं पूरे देश में देखीसुनी गईं.
महाराष्ट्र का कोरेगांव भी दलितों को सताने का गवाह बना. उत्तर प्रदेश में हालात सब से खराब नजर आने लगे.
कासगंज के बसई गांव के रहने संजय जाटव की शादी निजामपुर गांव की शीतल के साथ तय हुई. संजय ने सोचा था कि वह अपनी शादी में घोड़ी पर चढ़ेगा. उस के गांव में अभी तक किसी दलित ने घोड़ी पर चढ़ कर शादी नहीं की थी. इस की वजह यह थी कि यहां के ठाकुर बिरादरी के लोग नहीं चाहते थे कि दलित घोड़ी पर चढ़ें.
इन लोगों के विरोध को देखते हुए संजय जाटव ने दिल्ली की अदालत में गुहार लगाई. अदालत ने प्रशासन को आदेश दिया कि वह सुरक्षा दे कर घोड़ी पर दलित संजय की बरात निकलवाए.
कासगंज जिला प्रशासन ने 37 लोगों से निजी मुचलका भरवाया. तकरीबन 300 सुरक्षाकर्मियों की देखरेख में दलित संजय की घोड़ी पर बरात निकल सकी.
जिस दिन गांव में बरात निकली, वहां के ठाकुर परिवार अपने घरों में ताला बंद कर गांव से बाहर चले गए थे.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 58 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के वारासगवर इलाके के सथनी गांव में 22 फरवरी को 19 साल की मोनी नामक लड़की को जिंदा जलाने की घटना घट गई.
एक दिन मोनी साइकिल से अपने गांव से बाजार की तरफ जा रही थी. इतने में कुछ लड़के आए और साइकिल से उसे गिरा कर खेतों में खींच लिया और इस के बाद पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी.
जान बचाने के लिए मोनी सड़क की ओर भागी पर उस की मदद करने वाला कोई नहीं था. बदमाश आग लगा कर भाग गए. मोनी जल कर मर गई. पुलिस ने 2 दिन बाद विकास नामक एक लड़के को पकड़ कर जेल भेज दिया. विकास पर आरोप है कि उस की मोनी से दोस्ती थी. दोस्ती में दरार पड़ी तो उस ने यह कांड कर दिया.
उन्नाव की घटना से कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश की शिक्षा नगरी कहे जाने वाले इलाहाबाद शहर में एक दलित नौजवान को रैस्टोरैंट में पीटपीट कर मार डाला गया था. मारपीट की वजह छोटी सी थी. इन दोनों घटनाओं में लोगों ने सरेआम किसी अकेले को मारा था.
पूरे देश में दलितों को सताने की घटनाओं के विरोध में 2 अप्रैल, 2018 को दलित संगठनों ने भारत बंद कराया था. इस दौरान हिंसक झड़पों में 12 लोगों की मौत हो गई. इस से भाजपा पर दलित को सताने का आरोप लगा.
सुप्रीम कोर्ट की ‘दलित ऐक्ट’ में सुधार की बात के विरोध में इस बंद का आयोजन किया गया था. भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट में फैसला देने वाले जस्टिस एके गोयल को एनजीटी का अध्यक्ष बना दिया. इस बात को ले कर दलित समर्थक नाखुश थे. भाजपा को सहयोग देने वाले दल भी यह सोच रहे थे कि 2014 वाली कामयाबी 2019 के लोकसभा चुनावों में नहीं मिलेगी. ऐसे में चुनाव से पहले ‘दलित ऐक्ट’ को मुद्दा न बना दिया जाए. ‘दलित ऐक्ट’ में सुधार कर भाजपा दलितों की हमदर्द बनने का दिखावा कर रही है.
समाज में दबंगई करने वाले लोग सरकार बदलने के साथ खुद को सरकार के एजेंडे में फिट कर लेते हैं. बसपा के राज में वे दलितों के हमदर्द बन जाते हैं, तो अखिलेश राज में वे समाजवाद का चोला ओढ़ लेते हैं. योगी राज में हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर यह चोला बदल चुके हैं.
हिंदू रक्षा के नाम पर दबंग और गुंडे सक्रिय हो गए हैं. वे भगवा गमछाधारी बन गए हैं. अब इन को किसी पार्टी के झंडे की जरूरत नहीं रह गई है.
ऐसे दबंग भीड़ जुटाने में भी आगे हो जाते हैं. जहां अच्छे काम में 5 लोग एकसाथ नहीं खड़े होते, वहां ये लोग हत्या जैसे बड़े अपराध करने पर भी बहुत से लोगों को तैयार कर लेते हैं.
उन्नाव और इलाहाबाद की दोनों ही घटनाओं में दबंग का साथ देने वाले दूसरे लोग भी थे. कासगंज में हुए दंगे में भी ऐसे ही दबंग शामिल थे. इन को कानून की परवाह नहीं होती. कासगंज में धारा 144 लागू होने के बाद भी ‘तिरंगा यात्रा’ निकालने की इजाजत लेने की जरूरत नहीं समझी गई.
असल में कानून का उल्लघंन एक छूत की बीमारी की तरह है. एक को कानून तोड़ते देख दूसरा भी कानून तोड़ कर मजे लेना चाहता है. एक कानून को तोड़ कर बच जाता है तो दूसरे को भी लगता है कि कानून बेकार है. देश में अगर कानून का राज होता, तो लोगों में कानून का डर होता तो ऐसी घटनाएं नहीं होतीं.
गौरक्षा और धर्म के नाम पर कानून तोड़ने वाले जब बचने लगे तो दूसरे दबंगों का भी मनोबल बढ़ने लगा. जाति की खाई लगातार गहरी होती जा रही है. ऐसे में जब लोगों को यह लगता है कि सामने वाला उस से नीची जाति का है तो वह और भी ज्यादा हिंसक हो कर उस को पीटने लगता है.
धर्म की आड़ में प्रवचनों के द्वारा लोगों कोे यह लगातार बताया जा रहा है कि समाज में अलगअलग खेमे भगवान की देन हैं. पिछले जन्मों में किए गए पापों का फल हैं.
गुमराह न हों दलित
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर दलितों को अपने साथ मिला लिया था, जिस की वजह से आरक्षित सीटों में से तकरीबन 50 फीसदी सीटें भाजपा को मिल गई थीं. देश के तमाम बड़े दलित नेता भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और अब वे भाजपा के साथ हैं.
दलित तादाद में ज्यादा हैं. उन के पास वोट हैं. ऐसे में नेता उन को साथ रख कर वोट लेने तक उन के साथ रहते हैं. बाद में वे उन की मूल समस्याओं पर चुप हो जाते हैं. दलित अपने से ऊंची जातियों से मेलजोल नहीं रख पाते हैं.
दलित घटनाओं के पीछे की सामाजिक सोच बताती है कि देश और समाज कितना भी बदल जाए पर दलितों को वैसा ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों से रहते आए हैं. आज भी भेदभाव बना हुआ है. ऐसे में यह स्वाभाविक बात है कि केवल कानून बना लेने से दलितों का भला नहीं होने वाला.
दलितों को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि उन को मंदिर में पूजापाठ का हक मिल गया है. आरक्षण के नाम पर दलितों का सारा फायदा अगड़े दलित ले रहे हैं.
ऐसे में यह जरूरी है कि आरक्षण का सही फायदा दलितों तक पहुंचाने का इंतजाम हो. जब तक हर दलित माली तौर पर मजबूत नहीं होगा तब तक उस में बराबरी का भाव नहीं आएगा. कमजोर दलित पढ़ाईलिखाई के अलावा सेहत और रहनसहन से भी पिछड़ता रहेगा.
‘दलित ऐक्ट’ के नाम पर दलितों को बरगलाने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला. कानून बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उस का गलत इस्तेमाल न किया जा सके. कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों को भी वही सजा मिले जो कानून तोड़ने वाले के लिए तय होती है.
राजस्थान के एक जज शर्माजी ने कहा था कि मोर सारी जिंदगी ब्रह्मचारी रहता है. वह रोता है तो उस के आंसू मोरनी पी लेती है और पेट से हो जाती है इसलिए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया है. भारत सरकार द्वारा अब गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देना चाहिए और उसे मारने वाले को ताउम्र कैद की सजा देनी चाहिए.
हम सब लोग शर्माजी की खिल्ली उड़ा रहे हैं. लेकिन क्या हम सभी लोग शर्माजी जैसे ही दंतकथाओंअंधविश्वासों को जानकारी मान कर नहीं जी रहे हैं?
मैं इंगलैंड में पढ़ेलिखे जयपुर के एक बड़े अस्पताल में प्रैक्टिस करने वाले एक ऐसे डाक्टर को जानता हूं जो सच में मानता है कि उस का बेटा गुरुओं के आशीर्वाद से ही पैदा हुआ है. कुछ सालों पहले तक मैं भी मानता था कि मंगलवार को व्रत रखने से मेरे सभी काम बन जाएंगे. इतना ही नहीं, जब बच्चा ज्यादा रोता है तो ज्यादातर घरों में उस की नजर उतारी जाती है.
हम मोर वाली कहानी पर ही यकीन नहीं करते बल्कि नाग की मणि, छींकने पर काम बिगड़ जाना, बिल्ली का रास्ता काट जाना, स्वर्गनरक, पूजानमाज वगैरह पर भी यकीन रखते हैं.
अब मैं खुद को अपने आसपास अकेला पाता हूं. कुछ महीने पहले जब मेरी मां की मौत हुई तो मैं ने घोषणा की थी कि कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं होगा. मां के शव को मैडिकल कालेज को दान दिया जाएगा तो मेरी बड़ी बहन ने कहा कि बिना अंतिम संस्कार के आत्मा की मुक्ति कैसे होगी?
मैं ने कहा कि आत्मा और रूह कुछ नहीं होती. दरअसल, आप खुद कुछ भी नहीं सोचते. आप सोच की परंपरा की अगली कड़ी बन जाते हैं और हजारों सालों तक समाज एक ही ढर्रे पर चलता रहता है.
औरतों के हकों के बारे में, दूसरे धर्म वालों के बारे में, जाति के बारे में जैसे आप के पिताजी सोचते हैं, वैसे ही आप भी सोचने लगते हैं इसलिए धर्म के बारे में, संस्कृति के बारे में, मान्यताओं के बारे में आप कुछ नया नहीं सोच पाते हैं.
इस का नतीजा यह होता है कि सारी दुनिया उसी पुरानी सोच में फंसी रह जाती है. आप के कपड़े बदल जाते हैं, मकान बनाने का तरीका बदल जाता है, गाड़ी बदल जाती है, लेकिन सोच नहीं बदलती. आप अपने हालात के लिए किस्मत को, अपने पुराने कर्मों को या ईश्वर को जिम्मेदार मानते रहते हैं.
राजस्थान के जस्टिस शर्मा भी तो भारतीय समाज की नुमाइंदगी करते हैं. अगर कोई इनसान समाज से अलग तरह से सोचने की कोशिश करता है तो उसे गालियां व बेइज्जती मिलती है इसलिए भी डर के मारे लोग समाज की सोच से अलग नहीं सोच पाते हैं.
समाज में इज्जत वाला बन कर रहने के लिए भी हम आसपास के समाज जैसा बन कर रहते हैं.
जो इनसान ईश्वर या अल्लाह की महानता के बड़ेबड़े दावे करता है उसे समाज में बड़ी इज्जत भी मिलती है. लेकिन जो कहता है कि इनसान की बदहाली के लिए समाज की व्यवस्था जिम्मेदार है और इस समाज को अच्छा बनाने का काम भी इनसान को ही करना पड़ेगा तो वह गाली खाता है इसलिए राजस्थान के जज शर्माजी का मजाक उड़ाने से पहले अपनी हालत पर भी नजर डाल लीजिए एक बार, क्योंकि आप सब के भीतर भी एक शर्माजी बैठा हुआ है.
राजस्थान के चूरू जिले में एक अनूठा गांव है, जहां एक भी मंदिर नहीं है. इस गांव के लोग किसी धार्मिक कर्मकांड में विश्वास ही नहीं करते हैं. हैरत की बात तो यह है कि यहां मरने वालों की अस्थियों को बहते पानी में बहाया नहीं जाता है.
यह है चूरू जिले की तारानगर तहसील का गांव ‘लांबा की ढाणी’. यहां के लोग सिर्फ काम करने में यकीन करते हैं. इसी के दम पर आज यहां के लोग पढ़ाईलिखाई, चिकित्सा व कारोबार के क्षेत्र में कामयाबी हासिल कर अपने गांव को देशभर में नई पहचान दे रहे हैं.
सब से बड़ी बात तो यह है कि तकरीबन 105 घरों की आबादी वाले इस गांव में तकरीबन 100 घर जाटों के हैं, 5 घर नायकों के और तकरीबन 10 घर मेघवाल समाज के हैं.
यहां के लोगों ने नैशनल लैवल पर भी अपनी पहचान बनाई है. गांव लांबा की ढाणी से तकरीबन 25-30 नौजवान सेना में, इतने ही पुलिस में, 20 के आसपास रेलवे में और तकरीबन 25 से ज्यादा लोग चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर नाम कमा रहे हैं. इस ढाणी के 5 नौजवानों ने खेलों में नैशनल लैवल पर पदक हासिल किए हैं, वहीं 2 नौजवान खेल कोच भी हैं.
आप को जान कर सुखद हैरानी होगी कि गांव के 2 लोग इंटैलीजैंस ब्यूरो में अफसर हैं वहीं तकरीबन 2 प्रोफैसर, 7 वकील और 35 अध्यापक हैं.
गांव के रहने वाले 80 साल के वकील बीरबल सिंह लांबा ने बताया कि गांव में तकरीबन 65 साल पहले यहां के रहने वालों ने सामूहिक रूप से तय किया कि गांव में किसी की मौत पर उस का दाह संस्कार तो किया जाएगा, लेकिन अस्थियों को नदी में बहाया नहीं जाएगा. यहां दाह संस्कार के बाद बची हुई अस्थियों को गांव वाले फिर से जला कर राख में बदल देते हैं.
खेती प्रधान गांव
यह गांव पूरी तरह से खेती प्रधान है. यहां के गांव प्रधान ने बताया कि लोगों को मंदिर जैसी संस्था में शुरू से ही विश्वास नहीं था. दूसरी वजह थी, लोगों का सुबह से शाम तक मेहनत के कामों में ही लगे रहना.
बहरहाल, यहां के लोग नास्तिक भी नहीं हैं, लेकिन धार्मिक अंधता जैसी चीज यहां दिखाई नहीं देती. मंदिर के नाम पर गांव के प्रधान कहते हैं कि ग्रामवासी कहा करते थे कि ‘मरण री फुरसत कोने, थे राम के नाम री बातां करो हो’ (यहां मरने की भी फुरसत नहीं है और आप राम नाम की बात कर रहे हो).
गांव के एक और बाशिंदे और जिला खेल अधिकारी ईश्वर सिंह लांबा का कहना है कि गांव के लोग अंधविश्वास से कोसों दूर हैं. इसी वजह से वे अपनी कोशिशों के बूते प्रशासनिक सेवा, वकालत, चिकित्सा, सेना और खेलों में गांव का नाम रोशन कर रहे हैं.
पंजाबी फिल्मों की सुपरहिट अदाकारा नीरू बाजवा किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं. मार्च में रिलीज हुई उनकी फिल्म ‘लौंग लाची’ एक बार फिर सुर्खियों में हैं. वजह है इसका टाइटल ट्रैक जिसे अब तक 300 मिलियन (30 करोड़) से ज्यादा बार देखा जा चुका है. ऐसी कामयाबी बेहद कम पंजाबी नंबर्स को हासिल होती है. इसकी खुशी नीरू बाजवा ने इंस्टाग्राम पर जाहिर की है. उन्होंने यूट्यूब का स्क्रीनशाट साझा कर लिखा कि ‘लौंग लाची’ गाने ने 300 मिलियन का आंकड़ा पार कर लिया है. बता दें, ‘लौंग लाची’ गाने में नीरू शरारा पहन थिरकती दिखाई दी. वह फिल्म के हीरो अंबरदीप के साथ मदमस्त होकर डांस कर रही हैं.
फिल्म ‘लौंग लाची’ में नीरू बाजवा ने शानदार एक्टिंग की थी और उनका साथ अंबरदीप सिंह ने दिया था. नीरू फिल्म की प्रोड्यूसर थी, जबकि अंबरदीप ने इसका निर्देशन किया था. ‘लौंग लाची’ की कहानी एक पति-पत्नी की है जो फैसला करते हैं कि वे अजनबी की तरह रहेंगे, और पति उसका नए सिरे से दिल जीतेगा. बता दें, ‘लौंग लाची’ गाने को मन्नत नूर ने गाया है. म्यूजिक गुरमीत सिंह का है जबकि लिरिक्स हरमनजीत ने लिखी है.
बता दें कि नीरू बाजवा ने अपने करियर की शुरुआत 1998 में देव आनंद की फिल्म ‘मैं सोलह बरस की’ के साथ की थी. नीरू बाजवा ने इसके बाद पंजाबी फिल्मों में भी हाथ आजमाया. नीरू बाजवा ने टीवी पर भी अपने जलवे दिखाए हैं, और 2003 में ‘हरी मिर्ची लाल मिर्ची’ सीरियल में दिखी थीं, फिर वे ‘अस्तित्व…एक प्रेम कहानी’ में आईं और फिर ‘गन्स ऐंड रोजेज’ जैसी सीरियल्स में भी दिखीं.
कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में पुरस्कृत फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ में मनोज बाजपेयी, नीरज कबि, शहाना गोस्वामी के साथ एक प्रतिभाशाली बाल कलाकार ओम सिंह ने भी अभिनय किया है, जिन्हें इसी फिल्म के लिए चार सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार के पुरस्कार मिल चुके हैं.
बाल कलाकार ओम सिंह ने फिल्म ‘‘गली गुलियां’’ में इदरीस नाम के एक मुस्लिम बालक का किरदार निभाया है, जिसमें बालक के पिता उन्हें पीटते रहते हैं. मजेदार बात यह है कि इदरीस के किरदार के लिए फिल्म के निर्देशक दीपेश जैन ने एक दो नहीं बल्कि 2500 बालकों का औडीशन लेने के बाद ओम सिंह को चुना था. निर्देशक दीपेश जैन को ओम सिंह दिल्ली के एनजीओ ‘‘सलाम बालक ट्रस्ट’’ में मिला था. बाल शोषण का शिकार ओम सिंह को ‘‘सलाम बालक ट्रस्ट’’ में शरण मिली थी. रोज रोज की हिंसा से घबराकर ओम सिंह अपने घर से भागा था. इसलिए ओम सिंह से कई बार बात करने के बाद दीपेश जैन को उनकी फिल्म की कहानी के लिए कुछ आवश्यक जानकारियां भी मिली. फिल्म के लेखक व निर्देशक दीपेश जैन ने अपनी फिल्म में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बारे में भी लिखा है, जहां पर घर से भागने के बाद ओम सिंह ने कई रातें बितायी थी.
फिल्म के निर्देशक दीपेश जैन और अभिनेता मनोज बाजपेयी के अनुसार इस फिल्म में इदरीस का किरदार निभाते हुए ओम सिंह ने अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों को ही परदे पर साकार किया है.
दिल्ली सरकार के आठ विभागों से संबंधित 40 सेवाएं 10 सितंबर से लोगों को घर बैठे उपलब्ध होंगी. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को यह जानकारी दी. मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि इन सेवाओं को घर बैठे उपलब्ध कराने के लिए सरकार की तैयारियां पूरी हो गईं हैं. इनमें शादी प्रमाण पत्र, ओबीसी प्रमाणपत्र समेत जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जैसी जरूरी सेवाएं शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि आम जनता को इसके लिए नाममात्र शुल्क देना होगा. संभावना जताई जा रही है कि यह फीस करीब 50 रुपये के आसपास होगी. जल्द ही इस पर सरकार फैसला लेगी. वहीं, मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा कि सरकार का मानना है कि इससे एक तरफ सुविधाजनक तरीके से जनता को सेवा उपलब्ध हो सकेगी, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार को कम करने में भी मदद मिलेगी.
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संबंधित एजेंसी को छह सप्ताह का समय दिया जाएगा ताकि वह अपना पूरा मॉडल विकसित कर सके. शुरुआत में इस योजना में सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली 40 योजनाओं को शामिल किया जा रहा है. इसके बाद इसमें 60 सेवाओं को और शामिल करने की योजना है.
दिल्लीवालों को सिर्फ कॉलसेंटर पर सूचना देनी होगी
सरकार के आठ विभागों से संबंधित इन 40 सेवाओं के लिए जनता को सिर्फ कॉल सेंटर पर संबंधित कार्य की सूचना देनी होगी. साथ ही, उन्हें अपने कार्य से संबंधित जानकारी व घर पर मिलने का समय बताना होगा. इसके बाद संबंधित कर्मचारी उनके घर जाएगा. वहीं पर संबंधित कार्य के कागजात स्कैन करेगा और प्रमाणपत्र उपलब्ध कराएगा. एक अनुमान के मुताबिक इससे करीब 25 लाख लोगों को लाभ मिलेगा.
सालाना 25 लाख लोग इन सेवाओं को इस्तेमाल करते हैं
दिल्ली सरकार ने एक अध्ययन किया है जिसके मुताबिक, एक साल में औसतन 25 लाख लोग इन 40 सेवाओं का प्रयोग करते हैं. इसमें सबसे अधिक ओबीसी प्रमाणपत्र बनवाया जाता है. इस साल अब तक 1.67 लाख ये प्रमाण पत्र बनवाए गए हैं. इसके अतरक्ति 38000 लोगों ने डोमिसाइल बनवाए हैं. इसी प्रकार, अन्य प्रमाणपत्रों के आंकड़ों के लिए भी सरकार ने अध्ययन किया है.
काम ऐसे होगा
इस सेवा को लागू करने के लिए सरकार निजी एजेंसी (मोबाइल सहायक) की मदद लेगी. एजेंसी के माध्यम से जनता से प्रमाण पत्र, फोटो, आवेदन, बायोमीट्रिक जैसे दस्तावेज लिए जाएंगे. इसके बाद निर्धारित फीस लेकर घर पर ही प्रमाण पत्र उपलब्ध करा दिए जाएंगे.