काजल राघवानी के इस डांस ने लगाई आग, आप भी देखें

भोजपुरी फिल्म के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव की फिल्म ‘दबंग सरकार’ का एक गाना ‘पागल बनाइबे का’ इन दिनों इंटरनेट पर छाया हुआ है. इस गाने में खेसारीलाल के साथ भोजपुरी एक्ट्रे्स काजल राघवानी नजर आ रही हैं. इस वीडियो को अब तक 4,124,926 बार देखा जा चुका है. बता दें कि ‘दबंग सरकार’ में खेसारीलाल के साथ आकांक्षा अवस्थी और दीपिका त्रिपाठी लीड रोल में हैं. वहीं फिल्म के दो गानों में एक्ट्रेस काजल राघवानी स्पेशल अपीयरेंस देते हुए नजर आ रही हैं.

गौरतलब है कि भोजपुरी फिल्म जगत में इन दोनों की जोड़ी काफी मशहूर है. खेसारीलाल इन दिनों भोजपुरी एक्ट्रेस काजल राघवानी के साथ फिल्म ‘कुली नंबर वन’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. कभी वे बाइक पर काजल को लेकर राइडिंग करते नजर आ रहे हैं, तो कभी वे उनके साथ इश्क फरमाते. मामला लालबाबू पंडित की भोजपुरी फिल्‍म ‘कुली नंबर वन’ का है, जिसकी शूटिंग इन दिनों रांची में जोर-शोर से चल रही है. लालबाबू पंडित की फिल्‍म में इस बार खेसारीलाल यादव और काजल राघवानी साथ नजर आ रहे हैं. इससे पहले लालबाबू पंडित ने अपनी फिल्‍म में नई हिरोईनों को मौका दिया था. मगर इस बार खेसारीलाल यादव के साथ काजल राघवानी की जोड़ी उनकी फिल्‍म में देखने को मिलेगी.

सपना का ये डांस देख झूम उठा बुजुर्ग, देखें वीडियो

सपना चौधरी दर्शकों के मूड को बहुत अच्छे से समझती हैं, यही कारण है कि वो जब भी स्टेज पर आती हैं, लोगों के दिलों पर छा जाती हैं. आलम ये है कि सपना केवल हरियाणा ही नहीं, बल्कि भोजपुरी और पंजाबी सिनेमा की भी चहेती बन चुकी हैं. हाल ही में उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ है. वीडियो में वो हरियाणवी गाने ‘मेरा चांद’ पर ठुमके लगा रही हैं. अपने खास अंदाज से लोगों का दिल जीतने वाली सपना अपने परफौर्मेंस से बूढ़े दर्शकों में भी जोश भर दे रही हैं. इस वीडियो में एक बुजुर्ग को देखा जा सकता है जो अपने हाथ में नोट लिए नाचने में मस्त है.


इस वीडियो को सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है. उनके ठुमके और बुजुर्ग का जोश इस वीडियो को खास बनाता है. आपको बता दें कि ‘बैरी कंगना-2’ नाम की फिल्म में स्पेशल सौंग से सपना ने भोजपुरी सिनेमा में कदम रखा था. इसके अलावा उन्होंने पंजाबी फिल्मों में भी अपना जलवा दिखाया है. सपना के वीडियो सोशल मीडिया और यूट्यूब पर काफी पौपुलर होते हैं.

 

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बताते चलें कि सपना बहुत कम उम्र में ही डांस की सेंसेशन बन गई थी. औरकेस्ट्रा से अपने करियर की शुरुआत करने वाली इस डांसर को काफी लोकप्रियता हासिल हुई. ‘बिग बौस-11’ से उन्हें राष्ट्रीय स्तर की पहचान मिली. सपना का ‘तेरी आंख्या का यो काजल’ गाना काफी पौपुलर है. इस गाने पर डांस कर दीप बरार नाम की एक डांसर दुनियाभर में फेमस हो गई.

यू-ट्यूब पर छा गया रणवीर सिंह का यह अंदाज

बौलीवुड एक्टर रणवीर सिंह ‘सिंबा’ बनकर बड़े पर्दे पर दर्शकों का दिल जीतने आ रहे हैं. इससे पहले फिल्म का टाइटल ट्रैक रिलीज हो गया है. रिलीज होने के कुछ ही देर बाद गाने ने यू-ट्यूब पर धमाकेदार व्यूज बना लिए हैं. ‘आला रे आला’ सिंबा का नया गाना है जिसे देव नेगी और गोल्डी ने आवाज दी है. गाने के बोल शब्बीर अहमद ने लिखे हैं.


इस फिल्‍म का गाना ‘तेरे बिन’ भी एक रोमांटिक नंबर है. दरअसल यह गाना नुसरत फतेह अली खान का है. इससे फिल्‍म से पहले ‘तेरे बिन’ गाना 1999 में आई फिल्‍म ‘कच्‍चे धागे’ में भी सुनाई दे चुका है, जिसमें सारा के पिता सैफ अली खान नजर आए थे.

फिल्म ‘सिंबा’ की बात करें तो रणवीर सिंह और रोहित शेट्टी पहली बार इस फिल्म में साथ काम कर रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि रोहित शेट्टी मसाला फिल्मों के किंग हैं. दर्शक उनकी फिल्मों का इंतजार करते हैं.

रोहित शेट्टी की आखिरी फिल्म ‘गोलमाल अगेन’ थी जो बौक्स औफिस पर सुपरहिट रही थी. तो वहीं रणवीर सिंह की भी पिछली फिल्म ‘पद्मावत’ थी जिसमें अल्लाउद्दीन खिलजी के किरदार में रणवीर सिंह बेहद शानदार लगे थे. उनकी एक्टिंग की भी हर तरफ तारीफ हुई थी. ‘सिंबा’ इस साल 28 दिसंबर को रिलीज हो रही है.

जीरो : फिल्म से दूरी ही भली..

‘तनु वेड्स मनु’, ‘रांझणा’, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ जैसी फिल्मों के सर्जक आनंद एल राय अब शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा और कैटरीना कैफ के साथ फिल्म ‘‘जीरो’’ लेकर आए हैं, मगर इस फिल्म में उनकी अपनी निर्देशन शैली की कोई छाप नजर नहीं आती.

फिल्म ‘‘जीरो’’ की कहानी मेरठ निवासी छोटे कद (चार फुट छह इंच) के यानी बौने इंसान बउआ सिंह (शाहरुख खान) की है, जिससे उनकी मां (शीबा चड्ढा) और उनके पिता (तिग्मांशु धूलिया) दोनों बहुत परेशान रहते हैं. बउआ सिंह अपने पिता के पैसे लोगों में बांटते रहते हैं. बउआ सिंह मशहूर अभिनेत्री बबिता कुमारी (कैटरीना कैफ) की फिल्मों के दीवाने हैं. वह एक नृत्य प्रतियोगिता का फार्म महज इसलिए भरते हैं कि विजेता को बबिता कुमारी के हाथों पुरस्कार मिलना है. 38 साल की उम्र हो गयी है पर बउआ सिंह की शादी नहीं हुई है. शादी के लिए उन्हें कोई लड़की ही नहीं मिल रही है. वह अपनी शादी के लिए लड़की तलाश रहे हैं. इसके लिए वह बार बार अपने दोस्त गुड्डू सिंह (मोहम्मद जीशान अयूब) के साथ इंटरनेट के माध्यम से शादी कराने वाली संस्था के पांडे जी (ब्रजेंद्र काला) के पास बार बार जाते रहते हैं. एक दिन पांडे जी के आफिस में आफिया (अनुष्का शर्मा) की तस्वीर देखकर वह उस पर लट्टू हो जाते हैं.

सेरेब्रल पल्सी की बीमारी से ग्रसित आफिया अमरीका में नासा की वैज्ञानिक है, जिसने मंगल ग्रह पर अंतिरक्ष यान भेजा है और मंगल ग्रह पर दूसरा अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रही है, जिसमें वह एक बंदर यानी कि चिंपांजी या किसी मनुष्य को भेजकर प्रयोग करना चाहती है. वह एक समारोह का हिस्सा बनने व शादी के लिए लड़के की तलाश में पूरे परिवार के साथ भारत आयी हुई है. पांडेजी के कहने पर आफिया व बउआ सिंह की मुलाकात होती है. दोनों में प्यार होता है. फिर उनके बीच सेक्स/शारीरिक संबंध भी बन जाते हैं और शादी की तैयारी शुरू हो जाती है.

तभी बउआ की मुलाकात शराब में धुत बबिता कुमारी से हो जाती है. शराब के नशे में धुत बबिता कुमारी,  बउआ सिंह का चुंबन लेकर चली जाती है. मजेदार बात यह है कि अब बउआ को लगता है कि वह शादी के लिए तैयार नहीं है. मगर पिता के दबाव में बउआ दूल्हा बन बारात लेकर आफिया के यहां पहुंचते हैं, तभी उनका जिगरी दोस्त गुड्डू सिंह बताता है कि नृत्य प्रतियोगिता के लिए बउआ का चयन हो गया है. तब बउआ सिंह, आफिया से मिलकर शादी तोड़कर वहां से भागकर नृत्य प्रतियोगिता का हिस्सा बनने पहुंचते हैं. विजेता बनकर वह बबिता कुमारी से पुरस्कार लेते हैं, फिर वह बबिता कुमारी के दीवाने हो जाते हैं. बबिता कुमारी उनकी बातों से प्रभावित होकर उन्हें अपने साथ रख लेती है, पर एक दिन जब बबिता कुमारी से मिलने पहुंचे उनके प्रेमी (अभय देओल) के खिलाफ बउआ सिंह कुछ कह देते हैं, तो बबिता कुमारी नाराज होकर बउआ सिंह को बेइज्जत कर भगा देती है और तब बउआ सिंह को फिर से आफिया की याद आती है. वह अपने दोस्त गुड्डू सिंह के साथ अमेरीका नासा पहुंचकर आफिया से मिलने का प्रयास करते हैं. बउआ सिंह से नाराज आफिया अब चिंपांजी के बजाय मंगल यान में बउआ सिंह को भेजने का निर्णय लेती है, इसमें उनके प्रेमी (आर माधवन) की भी सहमति है. इस बीच पता चलता है कि आफिया, बउआ सिंह की बेटी की मां बन चुकी है. बहरहाल, मंगल यान के साथ अंतरिक्ष में बउआ सिंह को भेजा जाता है और पंद्रह साल बाद यह अंतरिक्ष यान प्रशांत महासागर में गिरता है.

ऐसा पहली बार हुआ है, जब फिल्म ‘‘जीरो’’ प्रदर्शन से पहले ही शाहरुख खान द्वारा बौने का चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने को लेकर अत्याधिक चर्चा में रही और दर्शकों के मन में इस फिल्म ने काफी उत्सुकता जगायी थी. मगर यह फिल्म दर्शकों के साथ साथ शाहरुख खान के प्रशंसकों को बुरी तरह निराश करती है. वीएफएक्स का बेहतर उपयोग किए जाने के बावजूद फिल्म ‘जीरो’ अपने नाम को ही सार्थक करती है.

पूरी फिल्म में दर्शक बौने इंसान की बजाय शाहरुख खान को उनकी इमेज के अनुरूप देखता रहता है. वह फिल्म में बौने इंसान के दर्द के साथ कहीं नजर नहीं आते. अलबत्ता वह हर दृश्य में खुद को दोहराते हुए ही नजर आते हैं. बालों की स्टाइल व अपने चिरपरिचित मैनेरिजम के साथ कच्छा बनियान पहने हुए शाहरुख खान बार बार अपनी पिछली बुरी तरह से असफल फिल्म ‘‘फैन’’ की ही याद दिलाते हैं.

जिसे ‘जीरो’ में दर्शक बर्दाश्त नहीं कर पाता. मजेदार बात यह है कि वह बौने हैं, मगर गायन या नृत्य करते समय कहीं भी कुछ भी परेशानी या असहजता नहीं होती, जबकि कुछ तो भिन्नता होनी चाहिए थी. पर हर वक्त शाहरुख खान अपनी चिरपरिचित शैली में ही नजर आते हैं. बउआ के किरदार मे शाहरुख खान बौने के रूप में सागर में गोता लगाते हुए बहुत कुछ कर सकते थे, पर वह तो देशभक्त बन कुछ करने का ऐसा प्रयास करते हैं कि वह अविश्वसनीय हो जाता है.

चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में दो लोग (बउआ सिंह और आफिया) घनिष्ठता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं, यह एक महान आधार हो सकता था. मगर इसे भी लेखक व निर्देशक दोनों सही परिप्रेक्ष्य में पेश करने में विफल रहे हैं. हालात यह है कि फिल्म के शुरू होने के दस मिनट बाद ही दर्शक सोचने लगता है कि इस सिरदर्द से कब छुटकारा मिलेगा.

बतौर निर्देशक आनंद एल राय बुरी तरह से मात खा गए हैं. फिल्म की कहानी से लेकर कुछ भी ऐसा नहीं है, जो कि विश्वसनीय लगे. हर दृश्य अविश्वसनीयता से भरा हुआ है. फिल्म में इंटरवल के बाद नासा की ट्रेनिंग का हिस्सा बेवजह लंबा खींचा गया है, जो कि दर्शकों को बोर करने के साथ ही फिल्म को बद से बदतर बनाता है. आनंद एल राय ने एक अच्छे विषय को उठाया, मगर स्टार कलाकार के चक्कर में तहस नहस कर डाला. वह शाहरुख खान को सुपर हीरो बनाने व अंतरिक्ष के चक्कर में ऐसा फंसे कि इंसानी रिश्तों, संवेदनाओं, मानवता आदि सब कुछ भुला बैठे. इतना ही नहीं वह अब तक की अपनी फिल्मों की पहचान यानी कि छोटे शहर, वहां की मिट्टी व छोटे शहरों के परिदृश्य से ऐसा भागे कि फिल्म को डुबा डाला.

फिल्म के निर्माता के तौर पर आनंद एल राय और गौरी खान ने कुछ कंपनियों व प्रोडक्ट के साथ इस फिल्म की ब्रांडिंग कर पैसे जरुर बटोर लिए. इसके अलावा दोनों ने इस फिल्म में अपने संबंधों के आधार पर कई कलाकारों को मेहमान कलाकार के तौर पर जोड़कर फिल्म में चार चांद लगाने का असफल प्रयास किया. पूरी फिल्म देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार ने कहानी, पटकथा, चरित्र चित्रण व निर्देशन आदि पर ध्यान देने की बजाय अन्य चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा.

फिल्म के लेखक हिमांशु शर्मा इस बार बुरी तरह मात खा गए. उन्होंने शीरीरिक रूप से कुछ कमी वाले किरदार तो गढ़ दिए, पर वह यह भूल गए कि इन किरदारों के साथ किस तरह कहानी गढ़ी जाए. किरदारों के बीच कोई आपसी संबंध ही नहीं बन पाता. इतना ही नहीं इस बार हिमांशु शर्मा ने सड़क छाप संवाद लिखे हैं. भारतीय संस्कृति में एक पिता घर के अंदर अपने बेटे को बुरा भला कहता है, मगर वह दूसरों के सामने अपने बेटे को अपमानित नहीं करता है. मगर फिल्म ‘जीरो’ में बउआ सिंह के पिता शादी के समय बउआ सिंह के होने वाले ससुर से कहते हैं – ‘‘इसे अमेरीका ले जाकर घर में रखकर टिकट लगवा कर…’’ अफसोस की बात है कि फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय ने भी इन संवादो को संभालने का प्रयास नहीं किया.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो चार फुट छह इंच के बउआ सिंह के किरदार में कहीं भी शाहरुख खान प्रभावित नहीं करते. सेलेब्रल पल्सी से ग्रसित आफिया के किरदार में अनुष्का शर्मा ने अविश्वसनीय अभिनय किया है. काश इस फिल्म में अभिनय करने से पहले उन्होंने सोनाली बोस निर्देशित फिल्म ‘‘मार्गरीटा विद ए स्ट्रा’’ में कल्कि कोचलीन के अभिनय को देखकर कुछ सीख लेती. कैटरीना कैफ का किरदार बहुत ही छोटा है, उन्हें ऐसी फिल्में करने की जरुरत क्यों पड़ रही है, यह वही जानें. अभय देओल व आर माधवन की प्रतिभा को जाया किया गया है. मोहम्मद जीशान अयूब ने जरुर ठीक ठाक अभिनय किया है.

दो घंटे 44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘जीरो’’ का निर्माण गौरी खान ने ‘रेड चिली इंटरटेनमेंट’ और आनंद एल राय ने ‘कलर येलो प्रोडक्शन’ के बैनर तले किया है. फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय, लेखक हिमांशु शर्मा, संगीतकार अजय तुली, कैमरामैन मनु आनंद तथा कलाकार हैं – शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा, कैटरीना कैफ, अभय देओल, आर माधवन, तिग्मांशु धूलिया, शीबा, ब्रजेंद्र काला, मोहम्मद जीशान अय्यूब के अलावा मेहमान कलाकार काजोल, जुही चावला, सलमान खान, श्रीदेवी, आलिया भट्ट, करिश्मा कपूर, दीपिका पादुकोण, गणेश आचार्य व रेमो डिसूजा.

कर्जमाफी: क्या फटेहाल किसानों को राहत मिलेगी?

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में 3 राज्यों में कांग्रेस ने अपनी पकड़ बना कर यह जता दिया है कि वह दमदार तरीके से वापसी करने को तैयार है. अपने वादों में दम भरने के लिए उसने किसान कर्जमाफी मुद्दे को सब से अहम रखा था.

किसानों का कर्ज तो माफ हुआ ही, साथ ही छत्तीसगढ़ में नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने धान का समर्थन मूल्य बढ़ा कर वाहवाही भी बटोर ली. पर एक बात समझ से परे रही कि किसानों का जो कर्ज माफ हुआ है, वह किसके पैसों से हुआ है? जनता ने जो टैक्स सरकार को अदा किया उन पैसों से या फिर पार्टी फंड से?

सरकार बनने से पहले नेताओं ने किसानों के कर्ज को माफ करने का ऐलान किया था और आननफानन इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया. लेकिन हकीकत कुछ दिनों बाद सामने आएगी कि इस में कितने किसानों का कर्ज माफ हुआ, कितनों का नहीं. क्योंकि इस तरह के कामों में अनेक नए नए नियम सामने आ जाते हैं, जिस के कारण सभी कर्जदारों को इस का सौ फीसदी फायदा नहीं मिलता.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी रैलियों में सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ करने की बात कही थी. सत्ता संभालते ही तीनों राज्यों की सरकारों ने सब से पहला काम किसानों की कर्जमाफी का किया. कहीं किसान आम चुनाव 2019 में बिदक न जाएं इसलिए उन्हें खुश करने के लिए ऐसा किया गया.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी. राजस्थान के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किसानों की कर्जमाफी का ऐलान कर दिया. राज्य सरकार किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज माफ करेगी. इससे सरकारी खजाने पर 18,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

इस पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि हम ने 10 दिन की बात कही थी, लेकिन यह तो 2 ही दिन में कर दिया.

कांग्रेसशासित तीनों राज्यों की कर्जमाफी के ऐलान के बाद असम में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने भी किसानों को कर्जमाफी का तोहफा दिया. इस कर्जमाफी का फायदा 8 लाख किसानों को मिल सकता है, जिससे सरकार पर 600 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

वहीं दूसरी ओर गुजरात सरकार ने भी ग्रामीण इलाकों के बिजली उपभोक्ताओं का बिल माफ करने का ऐलान किया. सरकार किसानों के लोन का 25 फीसदी (अधिकतम 25 हजार रुपए) माफ करेगी. इस योजना का लाभ उन किसानों को मिलेगा, जिन्होंने पीएसयू बैंकों और किसान क्रैडिट कार्ड के जरिए लोन लिया था.

रायपुर में मुख्यमंत्री का पद संभालते ही भूपेश बघेल ने नया छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का संकल्प दोहराते हुए 3 बड़े फैसले लिए. कांग्रेस सरकार की पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों का 6,100 करोड़ रुपए का कर्ज माफ करने के अलावा धान का समर्थन मूल्य 2,500 रुपए प्रति क्विंटल करने का फैसला लिया गया जबकि तीसरा फैसला झीरम घाटी से संबंधित था.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,700 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ा कर 2,500 रुपए कर दिया.

वहीं मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शपथ ग्रहण के थोड़ी देर बाद ही किसानों का कर्ज माफ करने के आदेश पर दस्तखत कर दिया था. इस आदेश के साथ ही किसानों को सरकारी और सहकारी बैकों द्वारा दिया गया 2 लाख रुपए तक का अल्पकालीन फसल कर्ज माफ होगा.

इस फैसले के अलावा सरकार ने कन्या विवाह और निकाह योजना में संशोधन कर अनुदान राशि 28,000  से बढ़ा कर 51,000 रुपए करने का फैसला लिया. इस के साथ ही सरकार ने अब सभी आदिवासी अंचलों में जनजातियों में प्रचलित विवाह प्रथा से होने वाले एकल और सामूहिक विवाह में भी मदद देने का फैसला किया है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पहली फाइल साइन की है, वह है किसानों का 2 लाख रुपए तक का लोन माफ करने की. जैसा उन्होंने वादा किया था.

किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग, मध्य प्रदेश के प्रमुख सचिव के दस्तखत के साथ जारी एक पत्र में लिखा गया है कि 31 मार्च, 2018 के पहले जिन किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज बकाया है, उसे माफ किया जाता है.

बताते चलें कि इस बार मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने कमलनाथ की अगुआई में ही लड़ा था. कमलनाथ को अरुण यादव की जगह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया और उन की अगुआई में ही पार्टी चुनाव में सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी.

कांग्रेस को बहुमत के लिए जरूरी 116 सीटें अपने दम पर तो नहीं मिलीं लेकिन समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीयों के सहयोग से वह राज्य में सरकार बनाने में कामयाब हो गई.

लोकसभा चुनाव भी नजदीक ही है. इसी को ध्यान में रखते हुए असम सरकार ने भी किसानों का कर्ज माफ करने का ऐलान कर दिया है. इस कर्जमाफी का फायदा 8 लाख किसानों को मिलेगा. इससे सरकार पर 600 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इस के अलावा गुजरात सरकार ने भी ग्रामीण इलाकों के बिजली उपभोक्ताओं का बिल माफ करने का ऐलान किया.

वहीं किसानों के लिए एक ब्याज राहत योजना भी होगी, जिस के तहत किसानों को 4 फीसदी ब्याज दर पर लोन दिया जाएगा. इस के अलावा असम सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली पैंशन को 20,000 से बढ़ा कर 21,000 रुपए करने की तैयारी में है.

कांग्रेसशासित राज्यों में हुई किसानों की कर्जमाफी आम आदमी के लिए परेशानी का सबब तो बना ही, क्योंकि इस का बोझ आने वाले समय में आम आदमी पर पड़ेगा. भले ही कर्जमाफी के फैसले से किसानों की कुछ हद तक चिंता कम हुई हो, पर यह टिकाऊ योजना नहीं है. इस से अच्छा होता कि सरकार उन के भले के लिए कोई ऐसी ठोस योजना तैयार करती तो शायद किसान खुशहाल होता.

रिलीज डेट फाइनल होने के बाद बंद हुई अक्षय की फिल्म

अक्षय कुमार की एक फिल्म का निर्माण बंद कर दिया गया है. काफी वक्त पहले नीरज पांडे ने अक्षय के साथ ‘क्रेक’ नाम की फिल्म बनाने की घोषणा की थी. इसकी रिलीज डेट भी तय कर दी गई थी. पर फिल्म की शूटिंग शुरु ना हो सकी.

इस फिल्म के बनने में हो रही देरी से लोगों ने फिल्म के बंद होने के कयास लगाने शुरू कर दिए थे, पर मेकर्स ने कहा था कि कुछ कारणों से फिल्म की शूटिंग शुरू होने में देरी हो रही है और जल्दी ही इस पर काम शुरू होगा. पर इसकी शूटिंग शुरू ना हो सकी.

इन सब के बाद अब खबर आई है कि फिल्म को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है. असल में खुद अक्षय इस फिल्म को नहीं करना चाहते थे. इसके अलावा नीरज पांडे की फिल्म अय्यारी का असफल होना भी फिल्म के बंद होने का कारण बताया गया है.

बताया जा रहा है कि अक्षय फिल्म की स्क्रिप्ट से खुश नहीं थे और उनकी उम्मीद के अनुसार नीरज काम नहीं कर पा रहे थे. इसलिए फिल्म बंद करने का फैसला ले लिया गया.

मिशन छिपकली : कोई पेपर में फेल नहीं हो सकता

45 साल की ढलती उम्र में हमारी जुड़वां संतानें हुई थीं. मुझे नन्हींमुन्नी गुडि़या का मनचाहा उपहार मिला था और वाइफ को उन का दुलारा गुड्डा, लेकिन वाइफ को बिटिया की भी चाहत थी. वे बिटिया को साइंटिस्ट बनाना चाहती थीं. मुझे बेटे के साथ नुक्कड़ पर क्रिकेट खेलने की तमन्ना थी. हम ने महल्ले में मिठाई बंटवाई. अनाथालय के बच्चों के लिए मिठाईनमकीन के पैकेट और कपड़ों के उपहार भिजवाए. हमारी खुशी का ठिकाना न था.

हम ने अपने बच्चों को भरपूर प्यार दिया. उन की सभी इच्छाएं पूरी कीं. कभी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया. मोबाइल, लैपटौप, स्कूटी, बाइक, कार, ब्रैंडेड ड्रैसेज, ट्यूटर सबकुछ उन के पास थे. दोनों अब बड़े हो चुके थे. 9वीं कक्षा की परीक्षा दे चुके थे.

‘‘पापा, एडवांस बुकिंग करानी है,’’ बिटिया ने मुझ से रिक्वैस्ट की.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, ‘संजू’ लगी है. यह फिल्म काफी पसंद की जा रही है,’’ मैं ने बिटिया का हौसला बढ़ाया. मैं खुद फिल्म देखने के मामले में आगे रहता हूं.

‘‘पापा, अगले साल हम दोनों 10वीं बोर्ड की परीक्षा देंगे. परीक्षा में हैल्प के लिए मिशन की बुकिंग चल रही है,’’ बिटिया ने मुझे बताया.

‘‘बोर्ड की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. सेहत पर बुरा असर पड़ता है. सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी में एडवांस बुकिंग कराना सही होगा. अभी औफर चल रहा है,’’ साहबजादे ने मुझे समझाया.

अपनी समझदानी थोड़ी छोटी है. पूरी बात समझ आने में थोड़ी देर लगी. अपनी संतान को 10वीं में नकल करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई स्पैशल चिटों की जरूरत होगी. मुझे इस संबंध में जानकारी कम थी.

‘‘वैज्ञानिक बनाने के लिए अच्छे कालेज में दाखिला दिलाना होगा. 10वीं कक्षा में अच्छे मार्क्स की जरूरत होगी,’’ वाइफ ने चिंता जताई. बच्चों को उन से झिझक नहीं थी. उन को सबकुछ पता था.

औलाद के भविष्य की चिंता मुझे भी थी. वैज्ञानिक बनने के लिए अच्छे कालेज में दाखिले की जरूरत भी थी. अच्छे कालेज में दाखिले के लिए कक्षा 10 में 90 प्रतिशत मार्क्स आने भी जरूरी थे.

परिवार के साथ मैं सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी से मिला. उन से रेट्स और औफर्स की जानकारी ली.

‘‘साइंस के एक पेपर और मैथ्स के लिए 8 हजार रुपए तथा दूसरे पेपरों के लिए 5 हजार रुपए. हमारी एजेंसी प्रीमियर एजेंसी है. एडवांस बुकिंग में 25 प्रतिशत की छूट दी जा रही है. ये रेट केवल प्रश्नोत्तर चिट के लिए हैं. और हां, मिशन छिपकली के लिए डबल रेट से रुपए देने होंगे. इस के अलावा दूसरी सेवाएं तथा कौम्बो औफर भी हैं,’’ प्रीमियर एजेंसी के रिसैप्शन पर तैनात मैडम ने जानकारी दी.

‘‘यह मिशन छिपकली क्या बला है?’’ मैं ने पूछ ही लिया. वैसे कुछकुछ अंदाजा हो रहा था.

पिछले महीने मैं ने पाटलीपुत्र सुसंवाद समाचारपत्र में खबर पढ़ी थी कि ईस्टर्न इंडिया के महानगरों के चिडि़याघरों से बहुत ही खास प्रजाति की कुछ छिपकलियों की चोरी हो गई थी. ये प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर थीं. इस इमारत की दीवार पर कई मानव आकृतियां चिपकी थीं. मैं ने बाद में इस न्यूज को चश्मा लगा कर पढ़ा था.

‘‘मिशन छिपकली के अंतर्गत एजेंसी बहुमंजिली इमारतों में परीक्षार्थियों को स्पैशल चिट उपलब्ध कराती है. पुलिस, केंद्र अधीक्षक, न्यूजपेपर रिपोर्टर सब को मैनेज करना मुश्किल जौब है. मिशन छिपकली के लिए औनजौब ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है. भगदड़ में दुर्घटना भी हो जाती है. परीक्षा केंद्र ग्राउंडफ्लोर पर होने की हालत में भुगतान की गई रकम का 50 प्रतिशत लौटा दिया जाता है. अप्रत्याशित और कठिन परिस्थितियों के लिए 2 साल की वारंटी का प्रावधान रखा गया है,’’ रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मिशन छिपकली के टैरिफ वाउचर्स का बखान किया.

हम ने शहर की दूसरी सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों से भी संपर्क किया. गोल्डन सर्विस एजेंसी में बालिकाओं के लिए फीस में 30 प्रतिशत की छूट का औफर था. लेकिन एजेंसी की बहुमंजिली सर्विस काफी महंगी थी.

बैस्ट सर्विस प्रोवाइडर ने रजिस्टर्ड परीक्षार्थियों के लिए शहरी इलाकों से परीक्षा केंद्रों तक ले जाने के लिए वीडियो सुविधायुक्त फ्री बस का औफर दिया था.

इन सभी एजेंसियों की शाखाएं राज्य के सभी छोटेबड़े शहरों में होने की भी जानकारी मिली. एजेंसीज ने प्रश्नोत्तर के लिए राजधानी व राज्य के दूसरे शहरों के नामीगिरामी स्कूलों के शिक्षकों व खास कोचिंग संस्थानों के विशेषज्ञों से भी अपने जुड़े होने की बात कही.

इस संपर्क मुहिम के दौरान कई दूसरी सर्विसेज की मौजूदगी के बारे में जाननेसमझने का मौका मिला. उन की सेवाओं की जानकारी मिली. कई खुलासे हुए. ये सुविधाएं परीक्षार्थियों, अभिभावकों के व्यापक हित में हैं, इस का भी ज्ञान हुआ.

मुझे इस उद्योग की पूरी जानकारी नहीं थी. मुझे पता नहीं था कि कभी शिक्षा का केंद्र रहे अपने पुराने शहर में कक्षा-10 स्पैशल चिट सप्लाई के धंधे ने बड़े कारोबार का दर्जा हासिल कर लिया है और इस कारोबार से बड़े घराने भी आकर्षित हो रहे हैं.

परीक्षाएं लंबे समय तक चलती हैं. इस दौरान खेलकूद, मूवी, मौजमस्ती, गेम्स, फेसबुक, चैटिंग, यारदोस्तों से गपें और सभी खिलंदड़ी व मनोरंजक गतिविधियां बंद हो जाती हैं. महीनों किताबों, नोट्स में घुसे रहने से बोरियत होती है. टैंशन से सेहत खराब हो जाती है. ऐसे में परीक्षाओं से जुड़ी सर्विसेज एजेंसियां हमारी आम दिनचर्या के साथसाथ ही कैरियर विकल्पों को आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं.

इन सुविधाओं से गुप्तरूप से जुड़े शिक्षकों व सहायक कर्मियों को होने वाली कमाई, उन को कठिन हालात से उबारने में सहायक होती है. राज्य में शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन भुगतान की समस्या हमेशा बनी रहती है. त्योहार के महीनों में भी वेतन भुगतान नहीं हो पाता है. इस तरह सर्विस एजेंसीज उन की वित्तीय समस्याओं का समाधान भी करती हैं.

अभिभावक सर्विस एजेंसीज की बुकिंग के बाद बेफिक्र हो जाते हैं. उन्हें बहुमंजिली इमारतों पर छिपकली बन कर चिपकने से मुक्ति मिल जाती है. अच्छे कालेजों में दाखिले की राह आसान हो जाती है. शिक्षक उत्तरपुस्तिका पर, अपने द्वारा तैयार उत्तर पा कर, मार्क्स लुटाते हैं. एजेंसी विभिन्न कोलेजों व तकनीकी संस्थानों में ऐडमिशन भी दिलवाती है.

‘‘विशिष्ट संस्थानों में ऐडमिशन के लिए आप हमारी एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं,’’ ब्राइट सर्विस एजेंसी की सुंदर रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मुझे बताया.

कई स्रोतों से जानकारी मिली कि सर्विस एजेंसीज अपनी सीक्रेट सर्विस के तहत राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर पर होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रश्नपत्र, उत्तर के साथ उपलब्ध कराती हैं. प्रश्नपत्र लीक कराने के लिए कई वैज्ञानिक राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. एडवांस बुकिंग कराने से पहले ठोकबजा कर पूरी तसल्ली करने की अपनी पुरानी आदत रही है. सो, मैं ने छानबीन की, कई एजेंसियों से जानकारी ली-

‘‘हमारी एजेंसी एक सर्विस एजेंसी है. यह जनसुविधाएं मुहैया कराती है.’’

‘‘अभिभावकों के हितों की सुरक्षा का काम कर रहे हैं. उन के सपने पूरे हों, इस के लिए कोशिश जारी है.’’

‘‘हमारी इंडस्ट्री बेरोजगारों को रोजगार देती है.’’

‘‘लंबे समय तक पूरी रात किताबों से चिपके रहने से गरदन अकड़ जाती है. ओनली बुक्स ऐंड नो प्ले मेक्स पप्पू ए डल बौय इस का हमारे पास कारगर इलाज है.’’

‘‘नाकामी से जूझते हुए बच्चे कई बार गलत फैसले भी ले लेते हैं. हमारी एजेंसी उन्हें कामयाबी दिलाने का काम करती है.’’

अब मुझे पूरी तसल्ली हो चुकी थी. स्पैशल चिट बनाना, बहुमंजिली इमारतों की दीवार से चिपकना मेरे बूते से बाहर की बात थी. लंबी पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा से लंबी जुदाई बच्चों के लिए तकरीबन नामुमकिन था. मिशन छिपकली मुझे जंच रही थी.

अब तो डरना जरूरी है

देश के शहरों में बढ़ता प्रदूषण घरों के लिए बड़ी आफत बन रहा है. बाहर व घर के कामों के बोझ से पहले से ही दबी औरतों को प्रदूषण के कारण पैदा होने वाली बीमारियों व गंद दोनों से जूझना पड़ रहा है.

दिल्ली जैसे शहर में अब कपड़े सुखाना तक मुश्किल हो गया है, क्योंकि चमकती धूप दुर्लभ हो गई है और साल के कुछ दिनों तक ही रह गई है.

इस का मतलब है कि गीले कपड़े सीले रह जाते हैं और बीमारियां व बदबू पैदा करते हैं. घरों के फर्श मैले हो रहे हैं, परदों के रंग फीके पड़ रहे हैं, घरों के बाग मुरझा रहे हैं और फूल हो ही नहीं रहे.

प्रदूषण के कारण अस्पतालों और डाक्टरों के चक्कर लग रहे हैं. जीवन में से हंसी लुप्त हो रही है क्योंकि हर समय उदासी भरी उमस छाई रहती है, जो मानसिक बीमारियों को भी जन्म दे रही है.

छोटे घरों में अब और कठिनाइयां होने लगी हैं क्योंकि बाहर निकल कर साफ हवा में सांस लेना असंभव हो गया है और घर के अंदर धूप न होने की वजह से हर समय एक बदबू सी छाई रहती है.

सरकारें हमेशा की तरह आखिरी समय पर जागती हैं, जब दुश्मन दरवाजे पर आ खड़ा हो. दुनिया के बहुत शहरों ने प्रदूषण का मुकाबला किया है और इस के उदाहरण भी मौजूद हैं.

यह दुनिया में पहली बार नहीं हो रहा है पर हमारी सरकारें तो केवल आज की और अब की चिंता करती हैं. बाबूओं और नेताओं को तो अपना पैसा बनाने और जनता को चूसने की लगी रहती है. उन्हें प्रदूषण जैसी फालतू चीज से कोई मतलब नहीं है.

दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों को प्रदूषण से आजादी दिलाना कोई असंभव काम नहीं है. जरूरत सिर्फ थोड़ी समझदारी की है. जनता पहले लगे नियंत्रणों पर चाहे चूंचूं करे पर उसे जल्दी ही लाभ समझ आ जाता है.

मुंबई के मुकाबले दिल्ली में हौर्न कम बजते हैं तो इसलिए कि यहां के लोगों को समझ आ गई है कि ट्रैफिक है तो हौर्न से तो कम नहीं होगा. छोटे शहरों में हर वाहन पींपीं करता रहता है क्योंकि इस में ईंधन न के बराबर लगता है.

प्रदूषण से बचाने के लिए जो तरीके अपनाए जाएंगे उन का तुरंत फायदा तो उसी को मिलेगा जो अपना रहा है. लोगों ने चूल्हों की जगह गैस इस्तेमाल की और धुंआ कम हो गया. क्या कानून बनाना पड़ा? नहीं, सुविधा जो थी.

अब सरकार का तो इतना काम है कि प्रदूषण से बचने के लिए शहरी इलाकों में से अपने दफ्तर हटा कर वहां बाग बना दे. उस के दफ्तर तो 50-60 मील दूर जा सकते हैं. पर वह तो पेड़ों से भरे इलाकों में सरकारी कर्मचारियों के लिए दड़बेनुमा मकान बनाना चाहती है जहां न कोई पेड़ बचा रहे न नया लग पाए.

सरकार कारखानों को बंद करा रही है पर न छूट दे रही है न सहायता. यदि पैसे नहीं दे सकते तो 5-7 साल के लिए टैक्स ही हटा दे, लोग खुद फैक्ट्री खाली कर देंगे और वहां घर बना देंगे. सरकार सोचती है कि जनता को प्रदूषण की चिंता ही नहीं है.

सड़कों पर वाहन कम करने के लिए सरकार ऊंची बिल्डिंगें बनने दे. उन पर आनाकानी न करे. पर छूट एक हाथ से दे कर दूसरे से न ले. अगर ऊपर घर व नीचे दफ्तर, दुकानें होंगी तो लोग बिना वाहन के रह सकेंगे.

लोग खुद अपने घरों और बच्चों की सेहत के लिए ऐसी जगह रहना चाहेंगे जहां कम प्रदूषण हो. पर जब तक सरकारी सांप, अजगर, सांड खुले फिरते रहेंगे तो भूल जाइए कि कुछ होगा.

प्रियंका से अपना इंट्रोडक्शन सुन, निक हो गए गुलाबी

एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा और हौलीवुड सिंगर निक जोनास की हर तस्वीर और वीडियो उनके फैस तक पहुंच जाती है. इन दोनों ने 2 दिसंबर को शादी की और तब से अब तक इस जोड़े की कई तस्वीरें वायरल हो चुकी हैं. लेकिन बुधवार को हुए मुंबई के रिसेप्शन में कुछ ऐसा हुआ जिसका किसी को अंदाजा ही नहीं होगा.

आइए बता दें आपको, इस रिसेप्शन में प्रियंका चोपड़ा ने जब सभी मेहमानों और रिश्तेदारों के सामने अपने ‘हसबैंड’ का इंट्रोडक्शन दिया तो निक जोनास के गाल गुलाबी हो गए. निक अपने इस परिचय पर ऐसे शरमाए कि कैमरे से भी उनका यह रिएक्शन छिप नहीं सका. यह वीडियो कुछ ही घंटों में इंटरनेट पर छा गया.

 

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इस वीडियो में प्रियंका ने अपने परिवार वालों, दोस्तों और रिश्तेदारों को शुक्रिया अदा किया है. इसके साथ ही प्रियंका इस मौके पर काफी इमोशनल हो गईं और अपने पिता को भी याद किया. इसके बाद बड़े ही रोमांटिक अंदाज में प्रियंका ने अपने पति निक का परिचय भी दिया.

प्रियंका अपने पिता को याद करते समय काफी इमोशनल नजर आईं तो पति निक ने माहौल को हल्का करने और प्रियंका के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए माइक हाथ में ले लिया. निक बड़े मजाकिया अंदाज में कहा, ‘यह मेरा इंडिया में पहला शो है.’ निक की इस अदा पर सारे मेहमान ठहाका लगाकर हंस पड़े.

कुछ इस तरह से रंग बदलता देह व्यापार

सारी जानकारियां भोपाल के थाना निशातपुरा के टीआई मनीष मिश्रा की मेज पर थीं, जो उन्हें मुखबिरों से मिली थीं. इस के लिए उन्होंने अपने मुखबिरों का जाल काफी पहले से फैला रखा था. शहर का किनारा होने की वजह से थाना निशातपुरा में आए दिन हर तरह के अपराध हुआ करते थे, जिस की वजह से यहां के पुलिसकर्मियों की किस्मत में सुकून नाम की चीज नहीं थी. मनीष मिश्रा को जानकारी यह मिली थी कि इलाके की हाउसिंग बोर्ड कालोनी के डुप्लेक्स नंबर 55, जो त्रिवेदी हाइट्स के पीछे था, में धड़ल्ले से देहव्यापार हो रहा है. सूचना चूंकि भरोसेमंद मुखबिर ने दी थी, इसलिए किसी तरह का शक करने की कोई वजह नहीं थी. लेकिन जरूरी यह था कि कालगर्ल्स और ग्राहकों को रंगेहाथों पकड़ा जाए, क्योंकि छापों में पकड़ी गई कालगर्ल्स और ग्राहक अकसर सबूतों के अभाव में छूट जाते हैं, जिस से छिछालेदर पुलिस वालों की होती है.

मनीष मिश्रा ने मुखबिरों से मिली जानकारी सीएसपी लोकेश सिन्हा को दी तो उन्होंने आरोपियों को रंगेहाथों पकड़ने के लिए एक टीम गठित कर दी, जिस में महिला थाने की थानाप्रभारी शिखा बैस को भी शामिल किया. टीम ने छापे की पूरी तैयारी कर के देहव्यापार के धंधे के उस अड्डे पर 10 फरवरी को छापा मारने का निर्णय लिया.

छापा मारने से पहले एक युवा हवलदार रमाकांत (बदला हुआ नाम) को ग्राहक बना कर हाउसिंग बोर्ड कालोनी के डुप्लेक्स नंबर 55 पर भेजा गया. रमाकांत इस बात से काफी रोमांचित और उत्साहित था कि उसे यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी. जबकि सहकर्मी मजाक में कह रहे थे, ‘देख भाई, संभल कर रहना और याद रखना तू फरजी ग्राहक बन कर जा रहा है. सुंदर लड़की देख कर कहीं सचमुच का ग्राहक मत बन जाना.’

बात हंसीमजाक की थी, इसलिए रमाकांत भी मुसकरा दिया था, पर वह मन ही मन रिहर्सल कर रहा था कि ग्राहक कैसे कालगर्ल्स के पास जाते हैं, कैसे सौदेबाजी करते हैं और कैसे माल यानी लड़कियां छांटते हैं.

10 फरवरी की रात जब वह बताए गए अड्डे पर पहुंचा तो नीचे के कमरे में उस की मुलाकात एक उम्रदराज महिला कामिनी (बदला हुआ नाम) और उस के पति सोनू से हुई. नीचे की मंजिल के उस हालनुमा कमरे में पहले से ही कोई 8 युवक लाइन लगाए बैठे थे. ऐसा लग रहा था, जैसे यह आधुनिक कोठा नहीं, बल्कि कोई सैलून है, जहां लोग हजामत बनवाने आए हैं और अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.

कामिनी और सोनू ने रमाकांत से कुछ सवाल पूछे, जिन के जवाब वह पहले से ही रट कर आया था. दोनों को जब विश्वास हो गया कि ग्राहक गड़बड़ नहीं है तो उन्होंने उसे लाइन में बैठने के लिए कह दिया. रमाकांत को असमंजस में देख कर सोनू ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘चिंता की कोई बात नहीं है. तुम्हारा नंबर आधे घंटे में आ जाएगा. अंदर 4 लड़कियां सर्विस दे रही हैं.’’

इतना कह कर सोनू ने पैसे के लिए इशारा किया तो रमाकांत ने पूछा, ‘‘कितने देने होंगे?’’

जवाब में सोनू ने बड़ी बेशरमी से कहा, ‘‘पंजाब से 4 आइटम आए हैं, जो एकदम कड़क और दमदार हैं. नेचुरली करोगे तो 15 सौ रुपए लगेंगे और अननेचुरली करोगे तो ढाई हजार रुपए देने होंगे.’’

‘‘हजार रुपए में बात बनती हो तो बोलो.’’ रमाकांत ने अपनी भूमिका में जान डालते हुए कहा, ‘‘मैं तो नेचुरल करूंगा.’’

‘‘पठानकोट की सवारी 1500 रुपए से एक पैसे कम में नहीं होगी,’’ सोनू ने कहा, ‘‘तुम एक काम करो, उज्जैन की मेहंदी ले लो, हजार रुपए में काम बन जाएगा.’’

इतना कह कर सोनू ने एक लड़की की फोटो रमाकांत को दिखाई. रमाकांत ने सरसरी तौर पर फोटो देख कर कहा, ‘‘मैं तो पठानकोट की ही सवारी करूंगा. ये लो रुपए.’’

कह कर रमाकांत ने जेब से 1500 रुपए निकाल कर सोनू को थमा दिए. इस तरह उस की बुकिंग कनफर्म हो गई. कुरसी पर बैठ कर रमाकांत मौके का जायजा ले रहा था. इंतजार कर रहे लोग कुरसियों और सोफे पर चुपचाप बैठे थे. जाहिर है, वे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. एकदूसरे से खुद को बचाए रखने के लिए वे एकदूसरे की तरफ नजर उठा कर नहीं देख रहे थे.

थोड़ी देर बाद एक युवक कमरे से निकला और सिर झुकाए चुपचाप इस तरह बाहर चला गया, मानो बाहर सब कुछ नश्वर और मिथ्या हो. अंदर से वह सच का साक्षात्कार कर के आ रहा हो. उसे गए 5 मिनट बीते होंगे कि सोनू ने वेटिंग लिस्ट के हिसाब से लाइन में बैठे एक युवक को अंदर जाने का इशारा किया तो वह रौकेट की भांति कमरे की ओर भागा. ऊपर की मंजिल पर भी लड़कियां और ग्राहक हैं, अब तक रमाकांत को इस का अंदाजा हो गया था.

उस माहौल में रमाकांत खुद को सहज महसूस करने लगा तो तयशुदा प्लान के मुताबिक उस ने पुलिस टीम को छापा मारने का इशारा कर दिया. जल्दी ही मनीष मिश्रा और शिखा बैस सहित पूरी टीम मकान में दाखिल हुई तो सोनू, कामिनी और उन का एक साथी एकदम से घबरा गए कि यह क्या हो गया.

अंदर आते ही पुलिस ने कमरे में घुस कर कालगर्ल्स और उन के ग्राहकों को आपत्तिजनक स्थिति में दबोच लिया. उन के पास से शराब की बोतलों के अलावा इस्तेमाल और बिना इस्तेमाल हुए कुछ कंडोम भी जब्त किए गए. इस के बाद सभी को थाने ला कर पूछताछ शुरू कर दी गई.

पूछताछ में पता चला कि 4 में से 3 लड़कियां पंजाब की थीं और एक उज्जैन की, जिस का जिक्र सोनू ने रमाकांत से उज्जैन की मेहंदी कह कर किया था. सभी को कपड़े पहनने का मौका दिया गया. इस बीच तलाशी में पुलिस को 22 हजार रुपए नकद और करीब 2 दर्जन मोबाइल फोन मिले.

पुलिस के लिए कामिनी का चेहरा, नाम और कारनामा नया नहीं था. पहले भी वह कई बार सैक्स रैकेट चलाने के आरोप में पकड़ी जा चुकी थी. कुछ दिनों पहले ही वह जेल से छूटी थी. इस के पहले वह भोपाल के ही कोलार इलाके में देहव्यापार का अड्डा चलाने के आरोप में पकड़ी गई थी. पता चला कि वह मुंबई में भी एक बार पकड़ी गई थी.

सोनू उर्फ विजय प्रताप सिंह उस का पति था. वह भी इस धंधे में शामिल था. छापे में पकड़ा गया इन का साथी शुभम दुबे मिसरोद के शुभालय परिसर का रहने वाला था.

छापे में पकड़े गए 8 ग्राहकों की हालत देखने लायक थी, उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं. थोड़ी देर पहले जो कमरों में बंद हो कर जन्नत की सैर कर रहे थे, अब उन्हें जेल का दरवाजा नजर आ रहा था. पुलिस टीम उन के नामपते दर्ज कर के थाने ले आई.

अलबत्ता पकड़ी गई लड़कियों के चेहरों पर जरा भी शिकन नहीं थी. जाहिर है, इस स्थिति का अच्छाखासा तजुर्बा था. उन्हें पूरा भरोसा था कि पुलिस या उस के इस छापे से उन का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं था. इस धंधे में तो इस तरह होता रहता है. कामिनी मैडम को इस स्थिति से निकलने का अच्छाखासा अनुभव था.

लिखापढ़ी के दौरान ग्राहकों के चेहरों पर उस सर्दी में भी पसीना छलक रहा था. वे पुलिस वालों के सामने छोड़ देने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे. लेकिन अब राहत की कोई गुंजाइश नहीं थी. क्योंकि एक बड़ी प्लानिंग के तहत काफी मेहनत के बाद पुलिस ने इस सैक्स रैकेट का परदाफाश किया था. इस में दिलचस्प बात कालगर्ल्स का पंजाब का होना था.

पूछताछ में जो कहानी सामने आई थी, उस के अनुसार सोनू और शुभम ग्राहकों को मैनेज करने के साथ सौदा तय करते थे. जबकि कामिनी लड़कियों को ग्राहकों के सामने पेश करने के साथ उन का ध्यान रखती थी. लड़कियों को रोजाना 5 हजार रुपए दिए जाते थे. इस मेहनताने के एवज में उन्हें एक दिन में 25 से 30 ग्राहकों को सर्विस देनी पड़ती थी. देखा जाए तो तीनों एक लड़की से रोजाना कमा तो 40-50 हजार रुपए थे, पर उस का बहुत छोटा हिस्सा उन्हें दे रहे थे.

ग्राहकों को लुभाने के लिए कामिनी और सोनू ने वाट्सऐप ग्रुप भी बना रखे थे, जिन पर लड़कियों की फोटो दिखाई जाती थी. ज्यादा पैसे झटकने की गरज से ग्राहकों को लालच दिया जाता था कि ये लड़कियां अननेचुरल सैक्स भी करवाती हैं, पर इस की फीस ज्यादा होती है.

इस छापे की कहानी तो खत्म हो गई, पर छापे में पकड़ी गई 22 साल की सिमरन (बदला हुआ नाम) ने जो बताया, वह छापे से भी ज्यादा दिलचस्प है और देहव्यापार के नए तौरतरीकों को उजागर करता है.

सिमरन पंजाब के जिला जालंधर की कालेज गर्ल थी और वह पैसों के लिए इस धंधे में आई थी. इस के लिए उसे न कोई शरम थी और न पछतावा. उस का अंगअंग सांचे में ढला था. उस का गदराया जिस्म किसी का भी ईमान बिगाड़ने की कूव्वत रखता था.

बहुत कम उम्र में सिमरन सैक्स की खिलाड़ी बन गई थी, जो पुरुषों की कमजोरी पकड़ कर रखती थी. ठीकठाक संख्या तो उसे याद नहीं, पर उस ने पूरे आत्मविश्वास से इतना जरूर बताया कि अब तक वह 5 हजार से भी ज्यादा मर्दों को सर्विस दे चुकी थी.

सिमरन और उस की जैसी लड़कियों की बातों पर गौर करें तो यह जान कर हैरानी होती है कि आजकल कालगर्ल्स दूसरे शहरों और राज्यों में जा कर धंधा करना ज्यादा पसंद करती हैं. इस की वजह यह है कि उन के पहचाने जाने का खतरा और पकड़े जाने का जोखिम कम रहता है. देहव्यापार के धंधे से जुड़े गिरोह एकदूसरे के संपर्क में रहते हैं और जरूरत पड़ने पर लड़कियों की अदलाबदली तक कर लेते हैं.

भोपाल के शौकीन ग्राहक पंजाब या केरल नहीं जा सकते. हां, अगर वे वहां की लड़कियां चाहते हैं तो उन की यह इच्छा पूरी करने के लिए लड़कियां भोपाल ही बुलवा ली जाती हैं. आमतौर पर डेढ़, 2 हजार रुपए दे सकने वाले ग्राहकों को अड्डे पर बुला लिया जाता है.

अगर कोई ग्राहक 15-20 हजार रुपए दे सकता है और विश्वसनीय होता है तो लड़की उस की बताई जगह, जो अकसर कोई महंगा होटल, फार्महाउस या फ्लैट होता है, वहां भेज दी जाती है.

ग्राहक हर तरह के हैं व्यापारी, अफसर, छात्र और नेता भी. इसी तरह कालगर्ल्स बनी लड़कियां भी हर तरह की हैं छात्राएं, बेरोजगार, परित्यक्ता और विधवाएं. कुछ शादीशुदा युवतियां भी देह बेच कर घरगृहस्थी चला रही हैं. सब की अपनी अलगअलग कहानी है.

इन दुलहनों की जिंदगी से एक रात या कुछ घंटे का ताल्लुक रखने वाला एक सच यह भी है कि इन्हें अपने पेशे पर किसी तरह का मलाल, पछतावा या ग्लानि नहीं है. ये पूरी तरह लग्जरी लाइफ जीती हैं. अगर पंजाब से दिल्ली जा कर सर्विस देना है तो ये हवाईजहाज से आतीजाती हैं. वहां के सारे इंतजाम मसलन ठहरने, खानेपीने और ग्राहक ढूंढने की जिम्मेदारी कामिनी और सोनू जैसे गार्जियन की होती है.

धंधा कराने वाले ग्राहक से चाहे जितना पैसा वसूलें, इस पर लड़कियों को कोई ऐतराज नहीं होता, क्योंकि वे अपनी फीस 5 हजार रुपए प्रतिदिन या फिर लाख, डेढ़ लाख रुपए महीना वेतन की तरह लेती हैं. इस अनुबंध के तहत दोनों एकदूसरे के काम में दखल नहीं देते. अगर सौदा यह हुआ है कि सर्विसगर्ल एक दिन में 20 ग्राहक निपटाएगी तो वह ईमानदारी से इस का पालन करती है.

इस से कम ग्राहक आएं तो उसे मिलने वाली फीस में लोकल गार्जियन कोई कटौती नहीं कर सकता और न ही दूसरे दिन 20 से ज्यादा ग्राहकों को सर्विस देने को मजबूर कर सकता है. रहने और खानेपीने का खर्च लोकल गार्जियन ही उठाते हैं. शौपिंग वगैरह के शौक ये लड़कियां, जो आजकल खुद को सर्विस गर्ल्स कहने लगी हैं, खुद उठाती हैं. जबकि शराब और सिगरेट का खर्च ग्राहक उठाता है.

इन सर्विस गर्ल्स की मानें तो ग्राहक सिर्फ 2 तरह के होते हैं. पहले वे, जो आ कर भूखे भेडि़ए की तरह एकदम झपट्टा सा मारते हैं और बगैर कुछ कहेसुने जिस्म को टटोलने लगते हैं. इस तरह के अधिकांश ग्राहक नौसिखिए और मुद्दत से औरत के सुख से वंचित होते हैं. दूसरे तरह के ग्राहकों को जल्दी नहीं होती. वे इत्मीनान से अपनी प्यास पहले शराब से बुझाना पसंद करते हैं, उस के बाद सधे हुए खिलाडि़यों की तरह कुदरती खेल खेलते हैं.

सिमरन जैसी सर्विस गर्ल्स की एक बड़ी दिक्कत नौजवान कस्टमर होते हैं, जो उन के पास शक्तिवर्धक दवाएं खा कर आते हैं. जाहिर है, उन में आत्मविश्वास की कमी होती है और वे लंबा वक्त फारिग होने में लेते हैं. कई नौजवान फिल्मी स्टाइल में टूटा दिल ले कर आते हैं. इस तरह के देवदासों से निपटना सिमरन जैसी लड़कियों के लिए दिक्कत वाला काम होता है, क्योंकि वे चाहते हैं कि सर्विस गर्ल्स इन की कहानी भी सुने.

आजकल अधेड़ ग्राहकों की संख्या भी बढ़ रही है. वे अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं होते और काफी घबराए हुए होते हैं, क्योंकि वे घरगृहस्थी वाले होते हैं. ऐसे लोगों की समाज में इज्जत भी होती है. अकसर ऐसे लोग अपनी सुरक्षा के लिए 3-4 लोगों के साथ अड्डे पर आते हैं या फिर खुद की चुनी जगह पर सर्विस गर्ल्स को मुंहमांगा पैसा दे कर बुलाते हैं.

छापे में पकड़ी गई हर एक सर्विस गर्ल की अपनी एक अलग कहानी होती है, जिसे ये आमतौर पर जल्दी साझा नहीं करतीं. हां, जोर देने पर कुछ हिस्सा कांटछांट कर जरूर बता देती हैं.

एक दिन यानी 7-8 घंटे में 20-25 पुरुषों को सर्विस देना उन के लिए उतना तकलीफदेह नहीं होता, जितना अप्राकृतिक सैक्स की मांग पूरी करने पर होता है. इस आदिम कारोबार में यौन बीमारियों से बचने के लिए कुछ ग्राहक अननेचुरल सैक्स ही चाहते हैं, जो तय है कि उन्हें अपनी पत्नी या प्रेमिका से नहीं मिलता. यह चलन वीडियो फिल्मों से बढ़ा है, जो अब स्मार्टफोन में मौजूद है.

सिमरन देश के लगभग सभी बड़े शहरों में सर्विस दे चुकी है और हर तरह के ग्राहकों और माहौल से उस का पाला पड़ चुका है. मुंबई को अभी भी वह देहव्यापार का सब से बड़ा केंद्र मानती है, जहां यह धंधा झुग्गीझोपडि़यों से ले कर पांचसितारा होटलों तक में चलता है. वहां हर राज्य और क्षेत्र की लड़कियों की मांग और उपलब्धता रहती है.

अकसर यह व्यापार पुलिस की छत्रछाया में चलता है. इस के लिए दलाल या लोकल गार्जियन नजराना भी खूब देते हैं. इस के बाद भी अगर छापा पड़ता है तो इसे उन की बदकिस्मती या फिर ऊपरी दबाव माना जा सकता है. कई बार इस में राजनेता भी शामिल पाए गए हैं.

ज्यादा पैसे उन सर्विस गर्ल्स को मिलते हैं, जो थर्ड ग्रेड की फिल्मों की हीरोइन या टीवी कलाकार होती हैं अथवा जिन्होंने किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में कोई छोटामोटा खिताब जीता होता है. उन्हें ग्राहक के सामने न केवल अलग तरह से पेश किया जाता है, बल्कि फीस के अलावा अन्य खर्चे भी ग्राहक को उठाने पड़ते हैं. इन के ग्राहक भी हाईप्रोफाइल होते हैं. अगर एक बार भरोसा जम जाए तो कस्टमर इन से सीधे संपर्क कर के इन्हें दूसरे शहर भी ले जा सकता है.

कोई भी सर्विस गर्ल अगर सीधे कस्टमर से डील करने लगती है तो इस से नुकसान लोकल गार्जियन यानी दलालों का होता है. इसलिए वे आजकल वेतन भी देने लगे हैं और ज्यादा से ज्यादा पैसा वसूलने के लिए इन्हें किसी भी दिन खाली नहीं छोड़ते. ग्राहक आजकल सोशल मीडिया के जरिए ज्यादा ढूंढे जाते हैं. फेसबुक और वाट्सऐप इस का बड़ा माध्यम है, जिन पर आमतौर पर सर्विस गर्ल्स की फोटो भी होती है और उन का रेट भी लिखा होता है.

कुछ सैक्सी और सुंदर सर्विस गर्ल्स केवल विदेशी ग्राहकों को ही सर्विस देती हैं, पर ऐसा अधिकतर पर्यटनस्थलों पर ही होता है. आगरा, जयपुर, बनारस और खजुराहो में विदेशी पर्यटक ज्यादा आते हैं, जो मुंहमांगे पैसे देते हैं और सुरक्षा कारणों मसलन पुलिस के छापों से बचने के लिए दिन में ही सर्विस लेना पसंद करते हैं.

ये लोग महंगे होटलों में ठहरते हैं, जहां कोई ज्यादा पूछताछ नहीं करता. कुछ ऐसे भी विदेशी पर्यटक होते हैं, जो सर्विस गर्ल्स को हफ्ते भर या इस से भी ज्यादा दिनों के लिए हायर करते हैं.

खूबसूरत सर्विस गर्ल्स केलिए यह पार्टटाइम काम होता है, क्योंकि उन की तगड़ी कमाई होती है. हालांकि कमाई सिमरन जैसी सर्विस गर्ल्स की भी अच्छी होती है लेकिन ये ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा कर रख लेना चाहती हैं, क्योंकि ये जानती हैं कि जैसेजैसे उम्र ढलती जाएगी, वैसेवैसे उन की कीमत भी घटती जाएगी.

घरगृहस्थी बसाना इन सर्विस गर्ल्स का सपना कम ही होता है. हालांकि कई बार भावुक और अकेले रहने वाले ग्राहक शादी की पेशकश भी कर देते हैं, लेकिन बंधन इन सर्विस गर्ल्स को रास नहीं आता. इन का मकसद सिर्फ पैसा कमाना होता है.

भोपाल में पकड़ी गई सिमरन छूटने के बाद पहले वापस अपने घर जालंधर जाएगी. कुछ दिन आराम करने के बाद पंजाब के आसपास ही सर्विस देगी. वह जानती है कि एकाध बार पेशी पर उसे भोपाल भी आना पड़ेगा, क्योंकि आजकल पहचान छिपाना मुश्किल होगया है और कभी भी वारंट तामील हो सकते हैं.

बाकी पेशियां कामिनी और सोनू संभाल लेंगे, जो हवालात में खुद को बेगुनाह बताते हुए अदालत में अपने बचाव की रिहर्सल कर रहे थे. ये लोग पांचवीं बार पकड़े गए हैं, लेकिन बेफिक्र हैं. जाहिर है, इन्हें पता है कि देहव्यापार के आरोप अदालत में साबित कर पाना मुश्किल काम होता है और आरोप साबित हो भी जाएं तो मामूली सजा और जुरमाने के बाद वे छूट कर फिर से इसी धंधे में लग जाएंगे.

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