महिलाएं दबाव में न छोड़ें नौकरी

नीना बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थी. मातापिता ने उस के सपनों को पंख दिए. उस का सिलैक्शन मैडिकल में हो गया. वहीं उस की मुलाकात समीर से हुई. मैडिकल फाइनल में नीना टौप कर गई. पढ़ाई पूरी करने के बाद घर वालों की रजामंदी से दोनों ने शादी रचाई. नीना की हसरत थी कि वह क्लीनिक खोले. उस में 2-3 साल लग गए. इसी बीच, उस की गोद में रोहन आ गया.

सासससुर का कोई दबाव नहीं था लेकिन इस बात का जिक्र वे हमेशा करते कि बच्चों के सही पालनपोषण के लिए मां का घर पर रहना जरूरी है. 2 वर्ष बाद निधि का जन्म हो गया. नीना कशमकश में थी. बच्चों के लिए समय कम पड़ रहा था. उस ने समीर से बात की. दोनों ने मिल कर निर्णय लिया कि फिलहाल नीना कैरियर से ज्यादा बच्चों पर ध्यान दे. यह ज्यादा सही रहेगा. सासससुर ने न सिर्फ बहू के फैसले का स्वागत किया बल्कि वे सब के सामने बहू के त्याग की प्रशंसा करते.

ऐसा ही कुछ बैंककर्मी विजयलक्ष्मी के साथ हुआ. उस ने और राकेश ने एकसाथ बैंक जौइन किया. दोनों की अरेंज मैरिज थी. बच्चों के जन्म के बाद विजयलक्ष्मी ने फैसला किया कि वह प्रमोशन नहीं लेगी. बच्चों की पढ़ाईलिखाई के लिए किसी एक को स्थायी रहना होगा. भले ही उस ने जौब नहीं छोड़ी लेकिन इस निर्णय के कारण वह कभी आगे नहीं बढ़ सकी. उस के जूनियर बौस होते गए. उस के पति राकेश आज जीएम हैं और वह आज तक उसी टेबल पर कलम घिस रही है.

ये 2 उदाहरण बानगी मात्र हैं. हमारे आसपास ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे, जहां लड़कियों ने शादी के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी के लिए अपनी जौब को तिलांजलि दे दी. ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि वे स्वयं अपनी नौकरी छोड़ती हैं, लेकिन गहराई से विचार करें तो पता चलता है उन पर प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से मानसिक दबाव डाला जाता है कि वे जौब को बाय कह दें. एक ऐसा वातावरण बनाया जाता है कि वे जौब छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं.

जिस जौब को हासिल करने में महिलाएं दिनरात संघर्ष करती हैं, मेहनत करती हैं, उसे एक झटके में छोड़ना भला वे क्यों चाहेंगी? जौब उन का बचपन का सपना होता है, उन की महत्त्वाकांक्षा होती है, कितनी विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए वह इसे हासिल करती हैं. ऐसे में किसी की दिली चाहत होगी कि वह लगीलगाई नौकरी छोड़े या फिर बिना प्रमोशन जिंदगी गुजार दे.

शादी के बाद नौकरी छोड़ने के लिए 3 कारण ज्यादा जिम्मेदार होते हैं, बच्चों की परवरिश, पति के अच्छे कैरियर के लिए उस के जौब की कुर्बानी और ससुराल वालों की नापसंदगी. ये कारण इस कदर लड़कियों पर हावी हो जाते हैं कि उन्हें अपनी नौकरी छोड़ने का निर्णय लेना पड़ता है. यह निर्णय भविष्य में उन पर भारी भी पड़ सकता है. कई बार कुछ ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं कि कैरियर को ठोकर मारने वाली महिलाएं बेबस और लाचार हो जाती हैं. उस समय उन्हें लगता है, काश, जौब न छोड़ी होती.

खुद को कमजोर न पड़ने दें

जौब छोड़ने का निर्णय लेने से पहले खुद से सवाल करें कि क्या जौब छोड़ना जरूरी है? इस बात को गांठ बांध लीजिए कि जौब मिलना आसान नहीं होता. बहुत सारी प्रतियोगिताओं से गुजरते हुए यह प्राप्त होता है और छोड़ने के बाद हासिल नहीं होता. आप पलपल आगे बढ़ती दुनिया से काफी पीछे छूट जाती हैं. आप जौब नहीं छोड़ने की बात पर दृढ़ रहिए. खुद को कमजोर मत पड़ने दीजिए. क्या कोई पुरुष अपने कैरियर का परित्याग सिर्फ इसलिए करता है कि उस की पत्नी आगे बढ़े.

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विजयलक्ष्मी ने सिर्फ बच्चों के लिए प्रमोशन नहीं छोड़ा था. यह बात भी थी कि पति का कैरियर निर्विघ्न आगे बढ़े. उस के लिए विजयलक्ष्मी का त्याग जरूरी हो गया. अब जब पति जीएम हो गए हैं, बच्चे विदेश में बस गए हैं, कहती हैं, पति पर गर्व होता है लेकिन कभीकभी अकेले में लगता है आज मैं भी जीएम होती अगर… विजयलक्ष्मी के अधूरे वाक्य में वह दर्द बिना है जो वे चाह कर भी कभी व्यक्त नहीं कर पातीं. वक्त फिसल गया. पीठ पीछे औफिस में यह चर्चा भी होती.

महिलाओं में इतनी काबिलीयत कहां, देखो इस के पति को, दोनों ने साथसाथ नौकरी शुरू की और आज वह जीएम हैं. विजयलक्ष्मी की काबिलीयत पर धूल जम गई है. त्यागसमर्पण सब हाशिए पर आ गया है. अब उंगली सीधेसीधे उस की योग्यता पर उठती है. फिर उसे हासिल क्या हुआ? समाज महिलाओं को हमेशा कमतर आंकता है, यह तनाव भी महिलाओं को झेलना पड़ता है.

दबाव में निर्णय न लें

हम अपने को चाहे जितना मौडर्न मान लें लेकिन कड़वी सचाई यही है कि आज भी कामकाजी महिलाओं को खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जाता. लड़की और लड़के की नौकरी को एकसमान नहीं समझा जाता. ससुराल वाले बहू की कमाई पर नजर रखते हैं. कई परिवारों में बहू के सारे पैसे भी ले लिए जाते हैं और दूसरी ओर यह भी सुनाया जाता है कि बेटा अच्छाखासा कमा रहा है, तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत है?

कई घर वाले बच्चों की जिम्मेदारी लेने से भी इनकार कर देते हैं, ‘इस उम्र में हम से बच्चे नहीं संभलते. बच्चों की जिम्मेदारी से बचने के लिए नौकरी करती है.’ समाज में यह कहने वाले भी मिल जाएंगे, ‘घर और बच्चों को छोड़ कर नौकरी करने की क्या जरूरत है भला? पति इतने अच्छे ओहदे पर है. घरमकान, बैंकबैलेंस है. सिर्फ अपने शौक के लिए घरपरिवार की तिलांजलि दे रही है.’

एक लड़की जब नौकरी कर रही होती है, उसे ढेर सारे दबाव के बीच काम करना होता है. ऐसे ही किसी कमजोर पल में वह नौकरी छोड़ने का मन बनाती है. लेकिन जौब छोड़ने का निर्णय कभी किसी तरह के दबाव में न लें. आप खुद से विचारें कि क्या जो महिलाएं काम कर रही हैं, वो घरपरिवार के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं? क्या वे अपने घर को अच्छे से मेंटेन नहीं कर पा रही हैं? यदि आप इस पर कुछ विचार करेंगी तो पाएंगी कि कई मामलों में कामकाजी महिलाएं बच्चों की परवरिश और पारिवारिक जिम्मेदारी घरेलू महिलाओं से बेहतर निभा रही होती हैं.

आप के आसपास और पहचान वालों में ऐसी कई कामकाजी महिलाएं मिल जाएंगी. आप उन्हें अपना रोल मौडल चुनें और बेफिक्र हो कर जौब करती रहें.

भविष्य की सोचें

एक झटके में नौकरी छोड़ने का फैसला भविष्य में भारी पड़ सकता है. इस मामले में कुछ बातों को नजरअंदाज करना चाहिए, जैसे घर के लोगों के ताने या बेरुखी, रोकटोक. कुछ बातों को मैनेज करना सीखें, बच्चों के लिए अतिरिक्त ट्यूटर रखें, घर के बड़ेबुजुर्गों को उन के हिसाब से खुश रखने की कोशिश करें ताकि बच्चों की देखभाल होती रहे.

जौब छोड़ने में जल्दीबाजी न करें. यह भी सोचें कि आप के जौब छोड़ने पर घर की आर्थिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा. बच्चे जब छोटे होते हैं, उन की फीस और अन्य खर्चे कम होते हैं. जैसेजैसे वे बड़े होते जाते हैं, खर्च बढ़ता जाता है. सिर्फ एक सदस्य की आमदनी से घर की स्थिति डांवांडोल हो सकती है.

मीता एक प्रकाशन विभाग में काम करती थी. उस को कामकाजी होने के ताने ससुराल वाले देते थे. उस के बच्चों की कोई केयर नहीं करता. कई बार वे स्कूल से आ कर भूखे सो जाते. उस के दोनों बच्चे जब 8-10 साल के थे, उस ने जौब छोड़ दी. अब वे कालेज जाने लगे हैं. मीता अपने होनहार बेटों का दाखिला इंजीनियरिंग और मैडिकल में इसलिए नहीं करा सकी, क्योंकि उस के पास बच्चों की महंगी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे. एक दिन उस के बेटों ने किसी बात पर उलाहना दे दी, ‘‘तुम्हें जौब छोड़ने की क्या जरूरत थी मां, तुम्हें हमारे भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए था.’’

अन्य विकल्पों पर विचार करें

जौब छोड़ना आप की समस्या का समाधान नहीं है. तत्काल आप को किसी परेशानी से छुटकारा मिलता नजर आएगा लेकिन बाद में कईकई समस्याएं सिर उठाने लगेंगी. जैसे हर परिस्थिति का सामना आप डट कर करती हैं, वैसे ही इस का सामना भी मजबूत हो कर करें. पूरी तरह नौकरी छोड़ने से बेहतर है आप उन औप्शंस पर ध्यान दें जिन्हें आप वर्तमान नौकरी छोड़ने के बाद कर सकती हैं.

पूजा शर्मा पटना में बुटीक चलाती हैं. उन की बुटीक की शहर में एक पहचान है. लेकिन 10 साल पहले वे शिक्षिका थीं. पति और ससुराल वाले चाहते थे कि वे घर पर रहें. उन की 3 बेटियां हैं. अभी तीनों बेंगलुरु में पढ़ रही हैं. जब वे छोटी थीं, उन्हीं के स्कूल में वे शिक्षिका थीं.

बेटियों के हिसाब से शेड्यूल तय था. जब वे बड़ी हो गईं, घर में ही पूजा ने अपना बुटीक खोल लिया. शादी के पहले उन की इस में रुचि थी. वे कहती हैं, ‘‘अगर दबाव में आ कर नौकरी छोड़ देती तो शायद ही मैं बुटीक खोल पाती. हो सकता है मैं अपना आत्मविश्वास खो देती. समय बदल गया. अब घर के लोग भी खुश हैं. मुझे भी खुद पर गर्व होता है कि मैं ने कई लोगों को रोजगार दिया है.’’

आत्मनिर्भरता पर गर्व करें

अपने आत्मनिर्भर होने पर पूजा शर्मा की तरह गर्व करें. अपना नजरिया बदलें. यह जरूरी नहीं कि आप बिजनैस वुमन बन कर ही किसी को रोजगार दे सकती हैं, यदि आप एक अदद नौकरी करती हैं, फिर भी कई लोगों को टुकड़ोंटुकड़ों में आत्मनिर्भर बना सकती हैं. घरेलू महिलाएं आमतौर पर बाई रखती हैं लेकिन ज्यादातर कामकाजी महिलाएं बाई के अतिरिक्त बच्चों की देखभाल और खाना बनाने वाली मेड भी रखती हैं. खुद को और घर को मेंटेन करने के लिए धोबी रखना या कपड़ा आयरन करवाना उन की मजबूरी होती है. कामकाजी होने के कारण वे स्वयं सारे खर्च वहन करती हैं. इस पर किसी की ज्यादा बंदिश नहीं होती. आप तभी ऐसा कर सकती हैं जब तक आप जौब में हैं, आत्मनिर्भर हैं. आप कभी इस तरह सोच कर देखिए, दिल को तसल्ली मिलेगी.

सम्मान से समझौता क्यों

जौब कोई भी हो, लोगों की नजर में आप के लिए सम्मान होता है. यदि आप शिक्षिका हैं तो हजारों विद्यार्थी और उन के गार्जियन आप को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. पत्रकार हैं तो समाज के हर तबके में आप का रुतबा होता है. बड़ेबड़े पदाधिकारी भी आप का सम्मान करते हैं. लेखिका हैं तो लोग आप की बातों को वजन देते हैं. इसी तरह वकील, कलाकार, डाक्टर, बैंककर्मी आदि जितने भी पेशे हैं, सब आप को सम्मान दिलाते हैं.

सागरिका को पत्रकारिता से जुड़े 6 महीने ही हुए हैं. वह गर्व से कहती हैं, ‘मुझे कोई मैडम बुलाता है तो बहुत खुशी होती है. लगता है मेरा कोई अपना वजूद है.’ गांठ बांध लीजिए, यह सम्मान आप को आप का काम दिलाता है. नौकरी छोड़ने का मतलब है, आप को अपने सम्मान से समझौता करना होगा. लोग आप की काबिलीयत का सम्मान करते हैं. नौकरी छोड़ने के साथ आप का रुतबा और सम्मान जाता रहेगा.

कामना सिन्हा एक मल्टीनैशनल कंपनी में मार्केटिंग हेड थी. उस ने अंतरजातीय विवाह किया. शुरू के 3-4 साल ठीक रहे. पतिपत्नी की पोस्टिंग अलगअलग जगह पर होती है, वे एडजस्ट कर लेते. बेटी होने के बाद कामिनी ने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया. अब बेटी 8 साल की है. पति के साथ कैरियर शुरू करने वाली कामिनी अब हाउसवाइफ है और पति कैरियर में बहुत ऊंची छलांग लगा चुका है. कामिनी मानती है, ‘वैसे तो मुझे कोई मलाल नहीं लेकिन कभीकभी लगता है मेरा सम्मान कहीं खो गया है.’

याद करें अपना संघर्ष

यदि आप जौब छोड़ने का मन बना रही हैं तो उस संघर्ष को याद कीजिए जिस के कारण आप की रातों की नींद उड़ी थी, दिन का चैन खोया था. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होती है. सारा फोकस पढ़ाई पर होता है. आंखें मींचमींच कर पढ़ना पड़ता है. जब लोग रातों को चैन की नींद सो रहे होते हैं या पार्टी एंजौय कर रहे होते हैं तब अपने विषय के सवालों से घिरी आप जवाब ढूंढ़ रही होती हैं. जौब सिर्फ पढ़ाई से नहीं मिलती है और भी परेशानी साथसाथ चलती है. संघर्ष कई स्तरों पर हो सकता है.

मध्यवर्गीय परिवारों में आज भी रूढि़वादिता है. कुछ लोग बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलवाते हैं लेकिन उसे जौब नहीं करने देते. ऐसे में जौब की परमीशन लेने में लड़कियों को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, वह उन्हें ही पता होता है.

स्वाति एमबीए फाइनल ईयर में थी, तभी उस का कैंपस सेलैक्शन हो गया. यह खुशखबरी ले कर वह घर पहुंची लेकिन कोई ज्यादा खुश नहीं हुआ. पापा ने नौकरी के लिए सीधेसीधे मना कर दिया. उन का मानना था कि अच्छी पढ़ाई अच्छे घर में शादी की गारंटी है. स्वाति अड़ गई.

कालेज के टीचरों ने आ कर उस के पापा को कई स्तरों पर समझाया तब उन्होंने हां की. लेकिन शादी के 2 साल बाद ही स्वाति ने जौब छोड़ दी. वही परंपरावादी कारण, ससुराल वालों के ताने, हमारे पास इतना बैंकबैलेंस है, फिर बहू को काम करने की क्या जरूरत है? जौब छोड़ने के पहले स्वाति ने स्वयं यह नहीं सोचा कि कितनी बाधाएं पार कर उस ने उसे पाया था.

लड़कियों को जौब में जाने से पहले कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है. कभीकभी ऐसा होता है कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती. एकएक पैसे का किसी तरह जुगाड़ कर पढ़ाई पूरी होती है. कभी भाइयों की तुलना में खुद को साबित करना पड़ता है. और भी कितनी तरह के संघर्ष करने पड़ते हैं.

उन का संघर्ष सिर्फ पारिवारिक स्तर पर नहीं होता, जौब शुरू करने के बाद औफिस में भी उन्हें खुद को बेहतर प्रेजैंट करने के लिए कड़ी मेहनत और संघर्ष करना पड़ता है. आश्चर्य है कि नौकरी छोड़ते वक्त इन बातों पर वे गौर नहीं करतीं. यदि वे अपना संघर्ष याद करेंगी तो निश्चितरूप से जौब नहीं छोड़ेंगी.

सब को समझाएं

पहले खुद समझें कि नौकरी छोड़ना न तो आप के हित में है न परिवार के. उस के बाद उन्हें समझाएं जो आप पर जौब छोड़ने के लिए दबाव डाल रहे हैं. आप उन्हें समझाएं कि घर की जिम्मेदारी से भागने के लिए आप जौब नहीं कर रहीं बल्कि आप अपनी जिम्मेदारी और अच्छे से निभा सकें, इसलिए जौब कर रही हैं. घर की आर्थिक मजबूती और बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए नौकरी करना बहुत जरूरी है. इस महंगाई के जमाने में एक आदमी की आमदनी से आगे कई तरह की परेशानियां सिर उठाएंगी.

आज हमारा लाइफस्टाइल बदल चुका है. रहनसहन का स्तर ऊंचा उठ चुका है. आज की पीढ़ी यानी हमारे बच्चे गुजारा करने या समझौता करने के मूड में कतई नहीं हैं, इसलिए जौब करना बेहद जरूरी है. यह भविष्य को सुरक्षित करता है. नौकरी छोड़ने से परिवार में कई मुश्किलें आएंगी. अपनी बात समझाने के लिए उन महिलाओं का जिक्र अवश्य करें जिन के जौब छोड़ने से परिवार में आर्थिक संकट उत्पन्न हुए और कई तरह की परेशानियां आईं.

नौकरी छोड़ना विकल्प नहीं

मधु कौल सैंटर में काम करती थी. ससुराल वालों की नजर में यह अच्छा जौब नहीं था. वे मधु पर नौकरी छोड़ने का दबाव डालने लगे. किसी तरह ढाईतीन साल उस ने नौकरी की. आखिरकार बेटे के जन्म के बाद उसे जौब छोड़नी पड़ी. बाद में उस की 2 बेटियां हुईं. प्राइवेट नौकरी करने वाला पति एक हादसे का शिकार हो गया.

मधु पूरी तरह टूट गई. उसे काम छोड़े 8 साल हो गए थे. कौल सैंटरों में फ्रैशरों की डिमांड थी. अन्य नौकरी के लिए उस के पास कोई ऐक्सपीरियंस नहीं था. उस के साथ कौल सैंटर में काम शुरू करने वाली लड़कियां आज कैरियर के अच्छे मुकाम पर थीं और वह एक मामूली जौब के लिए एडि़यां घिस रही है.

मधु ने अपनी जौब नहीं छोड़ी होती तो आज उसे ये दिन नहीं देखने पड़ते, बच्चे दानेदाने को मुहताज नहीं होते. दयनीय स्थिति से गुजरती मधु उस घड़ी को कोसती है जब उस ने जौब छोड़ने का निर्णय लिया था. उसे अब लगता है, नौकरी छोड़ना विकल्प नहीं था.

आत्मनिर्भर होना आप का गौरव है, आप का आत्मसम्मान है, आप का सुरक्षित भविष्य है. लगीलगाई नौकरी छोड़ना किसी एंगल से बुद्धिमानी का कार्य नहीं है. ऐसा करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होगा.

इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि आप के जौब छोड़ने से परेशानी समाप्त हो जाएगी. समस्याएं नए सिरे से सिर उठाने लगती हैं और उस समय आप के पास अपनी जौब का संबल भी नहीं होता. जिंदगी कठिन होती जाती है. इसलिए खुद भी जौब न छोड़ने का निर्णय लें और दूसरों को जौब में रहने के फायदे और छोड़ने के नुकसान समझाएं.

सपा-बसपा गठबंधन के सियासी मायने

सपा बसपा के गठबंधन से जमीनी स्तर पर भले ही कोई बड़ा सामाजिक बदलाव न हो पर इसके सियासी मायने फलदायक हो सकते हैं. सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस भले ही शामिल ना हो पर इस गठबंधन से मिलने वाले सियासी लाभ में उसका हिस्सा भी होगा. 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस होगी. ऐसे में सरकार बनाने ही हालत में कांग्रेस ही सबसे आगे होगी. सपा-बसपा ही नहीं दूसरे क्षेत्रिय दल भी भारतीय जनता पार्टी की नीतियों से परेशान हैं. ऐसे में वह केन्द्र से भाजपा को हटाने के लिये कांग्रेस के खेमे में खड़े हो सकते हैं.

भाजपा के लिये परेशानी का कारण यह है कि उसका एक बडा वोटबैंक पार्टी से बिदक चुका है. उत्तर प्रदेश में पार्टी 2 साल के अंदर ही सबसे खराब हालत में पहुंच चुकी है. सत्ता में रहते हुए भाजपा एक भी उपचुनाव नहीं जीती है. उत्तर प्रदेश के अलावा हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भाजपा खराब दौर से गुजर रही है. राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार से विपक्षी दलों को ताकत दे दी है. ऐसे में सबसे पार्टी की जीत का सबसे अधिक दारोमदार उत्तर प्रदेश पर ही टिका है.

लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटें काफी महत्वपूर्ण हो जाती हैं. 2014 के चुनाव में 73 सीटें भाजपा और उनके सहयोगी दलों को मिली थी. 7 सीटे सपा और कांग्रेस के खाते में थी. बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनावों में बसपा-सपा के एक होने से सियासी परिणाम बदल सकते हैं. 2014 की जीत में मोदी लहर और कांग्रेस का विरोध भाजपा को सत्ता में लाने का सबसे बड़ा कारण था. नरेन्द्र मोदी ने जनता से जो वादे किये उसे वह पूरा नहीं कर पाए. अपनी कमियों को छिपाने के लिये अपने धर्म के एजेंडे को आगे बढ़ाते गये. पार्टी के नेताओं के स्वभाव में एक अक्खडपन आ गया.

राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार ने बता दिया कि मोदी मैजिक अब पार्टी का जीत दिलाने में सफल नहीं होगा. ऐसे में पार्टी की नीतियों से ही जीत का मार्ग निकलता है. भाजपा जमीनी स्तर पर जातियों के साथ तालमेल कर चलने में तो असफल रही ही, अपने कोर वोटर को भी कोई सुविधा नहीं दे सकी. मध्यमवर्गीय कारोबारी सबसे अधिक परेशान हो रहा है.ऐसे में वह पार्टी से अलग थलग पड़ गया है. इस वजह से ही भाजपा अब सवर्ण आरक्षण के मुद्दे को लेकर आई.

वरिष्ठ पत्राकार शिवसरन सिंह कहते है ‘2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावो में प्रदेश ही जनता ने भाजपा के विकास की नीतियों से प्रभावित होकर भाजपा को वोट देकर बहुमत की सरकार बनाई थी. सरकार बनाने के बाद भाजपा राज में जिस तरह से मंहगाई, बेराजगारी, जीएसटी और नोटबंदी का दबाव आया लोग परेशान हो गये. यह भाजपा के लिये सबसे बड़ा नुकसान का कारण है. जातीय स्तर पर जिस समरसता की उम्मीद भाजपा से प्रदेश की जनता को थी वह पूरी नहीं हुई. ऐसे में जिस तरह से सभी जातियों ने भाजपा का साथ दिया था वह उससे दूर जाने लगी. दलित और पिछड़ी जातियां सपा-बसपा और सवर्ण कांग्रेस का दामन थामने को मजबूर हैं. भाजपा के लिए यह खराब संदेश है.’

हौसले बुलंद रहें सरकार : पत्नी को खुश करने के लिए

आजकल पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा है कि शाम को जब भी मैं औफिस से सहीसलामत घर लौट कर आता हूं तो पत्नी हैरान हो कर पूछती है, ‘आ गए आज भी वापस?’ कई बार तो मुझे उस के पूछने से ऐसा लगता है मानो मुझे शाम को सकुशल घर नहीं आना चाहिए था. उस के हिसाब से लगता है, वह मुझ से ऊब गई हो जैसे. वैसे, एक ही बंदे के साथ कोई 20 साल तक रहे, तो ऊबन, चुभन हो ही जाती है. मुझे भी कई बार होने लगती है.

हर रोज मेरे सकुशल घर आने पर उस में बढ़ती हैरानी को देख सच पूछो तो मैं भी परेशान होने लगा हूं. कई बार इस परेशानी में रात को नींद नहीं आती. अजीबअजीब से सपने आते हैं. कल रात के सपने ने तो मुझे तड़पा ही दिया.

मैं ने सपने में देखा कि जब मैं औफिस से सब्जी ले कर घर आ रहा था तो मेरा एनकाउंटर हो गया है. पुलिस कहानियां बना अपने को शेर साबित कर रही है. मीडिया में मरने के बाद मैं कुलांचे मार रहा हूं. इस देश में आम आदमी मरने के बाद ही कुलांचे मारता है वह भी मीडिया की कृपा से. बहरहाल, मामला आननफानन सरकार के द्वार पहुंचा तो उस ने मामले को सांत्वना देनी चाही. प्रशासन मेरी पत्नी के द्वार सांत्वना देने के बजाय मामला दबाने आ धमका. वह तो मेरे जाने से पहले ही प्रशासन का इंतजार कर रही थी जैसे.

मेरे फेक एनकाउंटर के बाद सरकार और पत्नी के बीच जो बातें हुईं, प्रस्तुत हैं, आने वाले समय में किए जाने वाले फेक एनकाउंटरों में शहीद होने वालों को प्रसन्न करने वाले उन बातों के कुछ अंश :

‘बहनजी, गलती हो गई, हमारे पुलिस वाले से आप के पति का एनकाउंटर हो गया,’ कोई सरकार सा मेरी बीवी के आगे दोनों हाथ जोड़े सांत्वना देने के बदले मेरी मौत की सौदेबाजी करने के पूरे मूड में.

‘कोई बात नहीं सर. पुलिस से बहुधा गलती हो ही जाती है. हमारी पुलिस है ही गलती का पुतला. उन के जाने के बाद ही सही, आप हमारे द्वार आए, हमें तो कुबेर मिल गया. अब हमें उन के एनकाउंटर का तनिक गम नहीं. वैसे भी इस धरती पर जो आया है, उसे किसी न किसी दिन तो जाना ही है. बंदा जाने के बाद भी कुछ दे कर जाए तो बहुत अच्छा लगता है सर.’ आह, मेरी बीवी का दर्द. वारि जाऊं बीवी की मेरे लिए श्रद्धांजलि के प्रति. काश, ऐसी बीवी ब्रह्मचारियों को भी मिले.

‘देखो बहनजी, हम वैसा दूसरा पति तो आप को ला कर दे नहीं सकते पर हम ऐसा करते हैं…’ सरकार ने बीच में अपनी वाणी रोकी तो मेरी बीवी की आर्थिक चेतना जैसे जागृत हुई. उन के जाने के बाद अब तो सरकार मुझे, बस, आप का ही सहारा है,’ पत्नी कुछ तन कर बैठी.

‘तो आप को अपने यहां आप के पति की जगह पर सरकारी नौकरी में लगा देते हैं. आप चाहो तो कल से ही आ जाओ. इस के साथ ही साथ आप को एक सरकारी टू रूम सैट भी हम अभी दे देते हैं. चाबियां निकालो यार. आप के खाते में अपनी गलतीसुधार के लिए जिंदा जनता के पैसों में से 20 लाख रुपए जमा करवा देते  हैं,’ सरकार ने मुसकराते हुए घोषणा की तो पत्नी के कान खड़े हुए.

‘पर सर, उस मामले में तो आप ने उन की पत्नी को पीआरओ बनाया है. वहां भी पति ही गया है. पति तो सारे एक से होते हैं. फिर मेरे साथ मुआवजे को ले कर भेदभाव क्यों? उस के खाते में आप ने 25 लाख रुपए डाले. उस के बच्चों की पढ़ाई के लिए 5-5 लाख रुपए की एफडी बना दी. मेरी आप से इतनी विनती है कि कम से कम पतियों के एनकाउंटर के मामले में हम महिलाओं के साथ भेदभाव तो न कीजिए. चलो, ऐसा करती हूं सास के खाते में डालने वाले पैसे आप की सरकार पर छोड़े. पर…’

‘देखिए बहनजी, आप उन से अपनी तुलना मत कीजिए. कहां राजा भोज, कहां आप का गंगू तेली.’

‘सरकार माफ करना, आप जात पर उतर रहे हैं,’ पत्नी ने सरकार को वैसे ही आंखें दिखाईं जैसे मुझे दिखाती थी तो सरकार सहमी. पत्नी की आंखों से बड़ेबड़े तीसमारखां सहम जाते हैं. ऐसे में भला सरकार की क्या मजाल.

‘जात पर नहीं बहनजी, मैं तो मुहावरे पर उतरा था,’ सरकार को लग गया कि किसी गलत बीवी से पाला पड़ा है. सो, सरकार ने मुहावरे पर स्पष्टीकरण जारी किया.

‘पर फिर भी?’

‘देखिए बहनजी, सरकार को आप भी ब्लैकमेल मत कीजिए. सच पूछो तो, कहां उन की बीवी, कहां आप? वह मामला कुछ अधिक ही पेचीदा हो गया था. मीडिया बीच में आ गया था वरना…’

‘तो आप को क्या लगता है कि मेरे मामले में मीडिया बीच में नहीं आएगा? नहीं आएगा तो मैं ढोल बजाबजा कर सब को बताऊंगी कि मेरे पति को इन की पुलिस ने फ्री में निशाना बना दिया है,’ मेरी पत्नी की धमकी सुन सरकार डरीसहमी.

‘प्लीज, बहनजी, आप जो चाहेंगी हम करेंगे, पर मीडिया को बीच में मत डालिए. यह मसला मेरे, आप के और आप के पति के बीच हुए एनकाउंटर का है. मतलब हम तीनों के बीच का. अब पुलिस से गलती हो गई तो हो गई. सरकारी कर्मचारियों से बहुधा गलती हो ही जाती है. नशे में ही रहते हैं हरदम. पर इस गलती के लिए हम उन की जान भी तो नहीं ले सकते न. पर अब आप को भविष्य में आप के पति से भी अधिक खुश रखने के लिए दिल खोल कर मुआवजा तो दे सकते हैं न. सो दे रहे हैं. वैसे भी बहनजी, आज के इस दौर में क्या रखा है पतिसती में? अब तो कोर्ट ने भी साफ कर दिया है कि…’

‘देखो सर, अपने पति के फेक एनकाउंटर के बदले जितना आप ने पिछली दीदी को दिया है, उतना तो कम से कम लूंगी ही. इधर हर रोज पैट्रोलडीजल के दाम तो सुबह होते ही 4 इंच बढ़े होते हैं, पर अब आप ने गैस के दाम भी बढ़ा दिए. अब हमारे पास दिल जलाने के और बचा ही क्या? ऐसे में आप खुद ही देख लीजिए कि पति का मुआवजा ईमानदारी से दीदी को दिए मुआवजे से अधिक नहीं, तो उतना तो कम से कम बनता ही है.’

‘देखो बहनजी, हम ठहरे ब्रह्मचारी. हमें न पति के रेट पता हैं न पत्नी के. इस झंझट से बचने के लिए ही तो हम ने विवाह नहीं करवाया. तो अच्छा, ऐसा करते हैं, चलो, न मेरी न आप की. जो मेरे सलाहकार आप के पति के एनकाउंटर का तय करेंगे, सो आप को दे दूंगा. मेरा क्या? मेरे लिए तो सब टैक्स देने वालों का है. मैं तो बस बांटनहार हूं. अब पुलिस से गलती हो गई तो भुगतनी भी तो मुझे ही पड़ेगी. पर जो आप सरकार पर थोड़ा रहम करतीं तो…’

बीवी चुप रही.

आखिर, सरकार ने मेरी पत्नी को सांत्वना देते सहर्ष घोषणा की कि सरकार बहनजी के पति के फेक एनकाउंटर के मुआवजे के दुख में शरीक होते हुए उन्हें पुलिस में थानेदार की नौकरी, रहने को थ्री बैडरूम सरकारी आवास, उन के खाते में 25 लाख रुपए, बच्चों की सगाई के लिए 10-10 लाख रुपए और सास के लिए 5 लाख रुपए देने की सहर्ष घोषणा करती है.

सरकार की इस घोषणा के बाद मत पूछो कि पत्नी कितनी खुश. उस वक्त मेरा फेक एनकाउंटर उसे कितना पसंद आया, मत पूछो. उस ने ऊपर वाले को दोनों हाथ जोड़े और कहा, ‘हे ऊपर वाले, मेरे हर पति का ऐसा फेक एनकाउंटर हर जन्म में 4-4 बार हो.’

और मैं पत्नी से भी ज्यादा खुश. उसे इतना प्रसन्न मैं ने उस वक्त पहली बार देखा, तो मन गदगद हो गया. मेरी अंधी आंखें खुशी के आंसुओं से लबालब हो आईं. वाह, अपने एनकाउंटर के बाद ही सही, पत्नी को खुश तो देख सका.

हे जनपोषण को चौबीसों घंटे वचनबद्ध मित्रो, आप ने मेरा फेक एनकाउंटर कर मुझे मृत्यु नहीं, खुशियों भरा नया जीवन प्रदान किया है. आप के हौसले यों ही बुलंद रहें.

कादर खान का वो इंटरव्यू जिसे अमिताभ नहीं देखना चाहेंगे

कुछ ही दिनों पहले देश के जाने माने हास्य कलाकार कादर खान का निधन हुआ. इसके बाद उनके कई पुराने इंटरव्यूज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. इन सब के बीच उनका एक ऐसा इंटरव्यू वायरल हुआ है जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के बारे में एक अहम खुलासा किया था.

ये इंटरव्यू यूट्यूब पर मौजूद है जिसमें कादर खान अपने फिल्मी करियर के बारे में बात कर रहे हैं. बातों बातों में उन्होंने अमिताभ बच्चन का जिक्र किया था. ये बात जगजाहिर है कि अपने करियर के एक हिस्से में अमिताभ बच्चन के साथ उनके संबंध सहज नहीं थे और फिल्‍म शहंशाह से बाहर होने के बाद दोनों से साथ किसी फिल्‍म में काम नहीं किया.

इस इंटरव्‍यू में कादर खान ने बताया है कि कुछ लोग अमिताभ बच्‍चन को सर-सर कहकर बात कर रहे थे. कादर खान ने थोड़ी जिज्ञासा से पूछा कि ये सर कौन है. तभी अमिताभ वहां आए और उन्‍होंने कहा कि ये हैं सर. इस पर कादर खान ने कहा कि ये तो अमित हैं. इसपर कादर खान ने उस इंटरव्‍यू में काफी भावुक होकर कहा कि आप अपने दोस्‍त, अपने भाई को सर कहकर थोड़े न बुलाते हैं.

लेकिन कादर खान का सर न कहना अमिताभ बच्‍चन को इतना बुरा लग गया कि उन्‍होंने कादर खान को फिल्‍म शहंशाह से बाहर करवा दिया. उसके बाद दोनों ने किसी भी फिल्‍म में साथ काम नहीं किया.

उमा और सुषमा की घोषणा

पिछले 5 सालों में उमा भारती और सुषमा स्वराज के मंत्री पद पर रहते हुए भी अपने कार्यालयों या संसद में चाहे कोई विशेष योगदान न रहा हो पर फिर भी 2019 के लोकसभा चुनावों को न लड़ने की उन की खुल्लमखुल्ला घोषणा, वह भी 2018 में 5 राज्यों के चुनावों से पहले, कर देना यह साफ कर देता है कि भाषणबाजी के राज का असर कम हो रहा है.

केंद्र सरकार के पूरे होते कार्यकाल के दौरान देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताली बजाते भाषण लगभग हर रोज सुने. 17 घंटे काम करने वाले कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जितने घंटे भाषणों में लगाते थे, वे कम कर दिए जाएं तो कार्यालय में बैठ कर योजनाओं पर विचार करने के लिए कितने घंटे बचते होंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है.

दूसरे बहुत बोलने वाले अरुण जेटली, जो राज्यसभा में आए, पर 2013 में भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के बदले दूसरे सर्वोच्च स्थान पर बैठे हैं, भी ज्यादा बोलते रहे हैं. वे यह बखान जरूर करते रहे कि भारत दुनिया का सब से तेजी से बढ़ने वाले देशों में से है पर वे यह नहीं बताते थे कि 1,800 डौलर के 7 प्रतिशत और 9,000 डौलर के 6 प्रतिशत में कितना अंतर होता है. भारत की प्रतिव्यक्ति आय 1,800 डौलर है, चीन की 9,000 और अमेरिका की 59,000 डौलर. अगर चीन 6 प्रतिशत से और अमेरिका

3 प्रतिशत से बढ़ रहा है तो भारत हर साल कितना पिछड़ता जाएगा, इस का अंदाजा अगर वित्तमंत्री नहीं लगाते और बताते, तो या तो वे पद के लायक नहीं या फिर झूठ बोलते हैं.

सुषमा स्वराज और उमा भारती ने समझ लिया है कि भाजपा का भविष्य ऐसे ही लोगों के हाथों में रहेगा जो बड़बोले हैं. पिछले 5 सालों में धर्म के व्यापार के अलावा सारे व्यापार ठप हुए हैं. ऐसे माहौल में पार्टी चाहे न छोड़ी जाए, कम से कम चुनावी जद्दोजेहद से तो बचा जाए.

एक व्यक्ति पर केंद्रित भाजपा गांधी परिवार को चाहे कितना कोस ले, कांग्रेस में फिलहाल ज्यादा सक्रिय नेता हैं. फिर दूसरी पार्टियों के तो नेता हैं ही, जिन में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, महबूबा मुफ्ती, लालू प्रसाद यादव शामिल हैं. इस के मद्देनजर ही इन दोनों भाजपाई महिला नेताओं ने सोचा कि क्यों जोखिम लिया जाए

जब पैर फटें

जो पैर पूरे शरीर का वजन ढोते हैं वे ही देखरेख और अनदेखी के सब से ज्यादा शिकार होते हैं. इस अनदेखी का ही नतीजा है पैरों का फटना जिस के बारे में यह कहावत बेवजह चलन में नहीं है कि जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई.

दरअसल, पैरों का फटना एडि़यों का फटना है जो ठंड में ज्यादा फटती हैं और उठनाबैठना, चलनाफिरना तक मुहाल कर देती हैं.

क्यों फटते हैं पैर

जाहिर सी बात है कि सही देखरेख न होने के चलते पैर फटते हैं, लेकिन ऐसी कई और भी वजहें हैं, जिन के चलते पैर ज्यादा फटते हैं. इलाज के लिए इन बातों का जानना बहुत जरूरी है:

* ज्यादातर वक्त नंगे पैर घूमना.

* पैरों की साफसफाई न करना.

* शरीर में चिकनाई और कैल्शियम की कमी होना.

* एडि़यों की त्वचा मोटी होती है इसलिए शरीर में बनने वाला कुदरती तेल उन तक नहीं पहुंच पाता है जिस से एडि़यां खुरदरी हो कर फट जाती हैं.

भोपाल के एक नामी डाक्टर राजीव मदान की मानें तो पैरों की फटी जगह में बहुत तेज दर्द होता है और वक्त रहते इलाज न किया जाए तो खून भी रिसने लगता है. फटे हिस्से में तेज जलन भी होती है.

ऐसे करें देखभाल व इलाज

पैर फटते ही होशियार हो जाना चाहिए, नहीं तो दर्द, जलन और तकलीफ दिनोंदिन बढ़ती जाती हैं. जैसे ही पैर फटें उन की रोजाना सफाई करना जरूरी है. पैरों को सुबह और रात को सोने से पहले कुनकुने पानी में आधा घंटे डुबो कर रखना चाहिए. इस से दरारों में भरा मैल निकलता है और दर्द से राहत मिलती है.

पैर सुखाने के लिए उन्हें मोटे तौलिए या कपड़े से रगड़ना चाहिए.

सूखने के बाद फटे हिस्से में कोई भी तेल या चिकनाई वाली क्रीम लगानी चाहिए. पैरों में हमेशा मोजे पहनने चाहिए और नंगे पैर घूमनाफिरना तो बिलकुल बंद कर देना चाहिए.

अगर ऐसी जगह काम करना है जहां नंगे पैर घूमना हो तो मोजे जरूर पहनें और रोज पैर धोएं.

अगर पैर या एडि़यां ज्यादा फट गई हैं तो एक चम्मच बोरिक पाउडर को 2 चम्मच वैसलीन में मिला कर फटी जगह पर सुबह व रात को लगाना चाहिए. इस से फटी जगह भरने लगती है.

रात को सोते वक्त कुनकुने पानी में थोड़ा सा शैंपू, एक चम्मच सोडा और 4-6 बूंदें डिटौल की डाल कर 10-15 मिनट तक पैर डुबो कर रखने चाहिए.  ये सभी चीजें दवा की किसी भी दुकान में आसानी से मिल जाती हैं.

सोते वक्त पैरों में नारियल या जैतून के तेल से मालिश करने से भी फायदा होता है.

गरम पानी में एक नीबू का रस निचोड़ कर उस में पैर डालने से भी फायदा होता है. इस के अलावा नरम और खूबसूरत पैरों के लिए खुराक में दालें, हरी सब्जियां, दूध, दही वगैरह को शामिल करना चाहिए.

आजकल बाजार में कटेफटे पैरों को ठीक करने के लिए तरहतरह की मलहम मिलती हैं. इन के रोजाना इस्तेमाल से भी आराम मिलता है, लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि पैरों की साफसफाई पर दूसरे अंगों की तरह ध्यान दिया जाए.

पैर शरीर का अहम अंग हैं. इन की देखभाल में कंजूसी या अनदेखी काफी महंगी पड़ जाती है. इन्हें धूल और गंदगी से बचाना चाहिए. औरतों के पैर जल्दी फटते हैं, क्योंकि वे अकसर घर में नंगे पैर रहती हैं.

पैरों की खूबसूरती के अपने अलग माने हैं. फटे पैर भद्दे भी लगते हैं और दर्द भी देते हैं, इसलिए इन की देखभाल  में कोताही न बरतें.

यारियां फिल्म की एक्ट्रेस ने सबके सामने उतार दिए कपड़े, देखें वीडियो

फिल्म यारियां और साउथ की कई सुपर हिट फिल्मों में काम करने वाली एक्ट्रेस रकुल प्रीत सिंह का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. जिसमें वह सबके सामने कपड़े उतारती दिख रही हैं. अचानक यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है और कई लोग इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं.

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मोहब्बत के खूनी अंत की हैरतअंगेज कहानी

मध्य प्रदेश के इंदौर के थाना चंदननगर के रहने वाले 21 साल के सलमान शेख के अचानक लापता हो जाने से उस के घर वाले काफी परेशान थे. वह फैब्रिकेशन का काम करता था. घर से काम के लिए निकला सलमान घर नहीं लौटा तो 9 जनवरी, 2017 को उस के बड़े भाई तौकीर शेख ने थाना चंदननगर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. गुमशुदगी दर्ज कराते समय उस ने अपने घर के सामने रहने वाले रऊफ खान और उस के ड्राइवर सद्दाम पर भाई के गायब करने का शक जाहिर किया था.

रऊफ खान बड़ीबड़ी बिल्डिंगों की मरम्मत एवं रंगाईपोताई का ठेका लेता था. उस के यहां पचासों मजदूर काम करते थे. सलमान भी पहले उस के यहां नौकरी करता था. लेकिन साल भर पहले उस ने सलमान को अपने यहां से नौकरी से निकाल दिया था.

रऊफ खान संपन्न आदमी था. वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका था. उस की पहुंच भी ऊंची थी, इसलिए बिना किसी ठोस सबूत के पुलिस उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी.

पुलिस ने लापता सलमान शेख के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि सलमान की सब से ज्यादा और लंबीलंबी बातें रऊफ की पत्नी शबनम से हुई थीं. रऊफ के नौकरी से निकाल देने के बाद भी उस की शबनम से बातें होती रही थीं. इन बातों से थाना चंदननगर पुलिस को लगा कि शायद इसी वजह से सलमान के घर वाले रऊफ खान पर शक जाहिर कर रहे थे.

उन्होंने सलमान के भाई तौकीर से रऊफ और उस के रिश्तेदारों के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस के कई नजदीकी रिश्तेदार धार जिले के धरमपुरी में रहते हैं. तौकीर की इस बात पर उन्हें 5 दिनों पहले धरमपुरी में मिली लाश की बात याद आ गई.

दरअसल, 10 जनवरी, 2017 को धार जिला के थाना धरमपुरी के थानाप्रभारी के.एस. साहू को फोन द्वारा बेंट संस्थान के जंगल में लाश पड़ी होने की खबर मिली थी. अधिकारियों को सूचना दे कर वह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. वहां एक लाश पड़ी थी, जिस का सिर काफी क्षतविक्षत था. शायद जंगली जानवरों ने उसे नोचखसोट डाला था. उस का गुप्तांग भी कटा हुआ था. लाश की स्थिति देख कर थानाप्रभारी को लगा कि यह हत्या प्रेमप्रसंग में की गई है. क्योंकि प्रेमप्रसंग में अकसर इसी तरह हत्याएं की जाती हैं.

पुलिस ने लाश की शिनाख्त के लिए जब मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट की जेब से एक पर्स मिला, जिस में एक लड़के और लड़की की तसवीर के अलावा हिसाब की एक डायरी और तंबाकू की एक पुडि़या मिली. उस में कुछ ऐसा नहीं था, जिस से मृतक की पहचान हो सकती.

मृतक के गले में तुलसी की एक माला पड़ी थी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि लाश किसी हिंदू की है. लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो के.एस. साहू ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद लाश की शिनाख्त के लिए इस की जानकारी अपने जिले में ही नहीं, आसपास के जिलों में भी दे दी थी. उसी जानकारी के आधार पर थाना चंदननगर के थानाप्रभारी को जब पता चला कि रऊफ की रिश्तेदारी धरमपुरी में है तो उन्हें लगा था कि वह लाश सलमान शेख की हो सकती है.

उन्होंने तत्काल लापता सलमान शेख के घर वालों को थाना धरमपुरी जाने की सलाह दी. तौकीर पिता के साथ थाने पहुंचा तो पता चला कि लाश तो दफना दी गई है. थानाप्रभारी के.एस. साहू ने लाश के सामान को दिखाया तो उन्होंने उस में रखी एक अंगूठी देख कर कहा कि वह लाश सलमान शेख की थी, पर यह तुलसी की माला उन का बेटा क्यों पहनेगा?

के.एस. साहू तुरंत समझ गए कि हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए उसे तुलसी की माला पहना कर उस का गुप्तांग काट दिया था. पुलिस को भ्रमित करने के लिए ही हत्यारों ने जेब में लड़की और लड़के की फोटो भी रखी थी. हत्यारों ने गलती यह की थी कि वे सलमान शेख की अंगूठी निकालना भूल गए थे. अंगूठी से ही उस की लाश की पहचान हो गई थी.

लाश की पहचान होने के बाद अगले दिन उपजिलाधिकारी के आदेश पर सलमान शेख का शव निकलवा कर उस के घर वालों को सौंप दिया गया था. घर वालों ने सलमान की लाश ला कर इंदौर के एक कब्रिस्तान में दफना दिया था. सलमान की लाश मिलने की सूचना पा कर उस के परिचितों और दोस्तों ने थाना चंदननगर में धरना दे कर हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग की थी.

एक ओर जहां मृतक सलमान शेख के घर वालों और परिचितों ने पुलिस पर हत्यारों को गिरफ्तार करने का दबाव बना रखा था, वहीं मुखबिर से मिली जानकारी ने थानाप्रभारी को चौंका दिया था. मुखबिर ने बताया था कि सलमान को आखिरी बार रऊफ खान के ड्राइवर सद्दाम के साथ देखा गया था.

इस के बाद थाना चंदननगर पुलिस ने शबनम और सद्दाम को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन दोनों ही कुछ भी बताने को तैयार नहीं थे. चूंकि पुलिस के पास दोनों के खिलाफ ठोस सबूत थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से थोड़ी सख्ती की और उन्हें काल डिटेल्स दिखाई तो दोनों ने ही असलियत उगल दी.

सद्दाम ने स्वीकार कर लिया कि शबनम भाभी से सलमान शेख के संबंध थे, जिस से नाराज हो कर रऊफ खान ने सलमान की हत्या की योजना बनाई थी. इस योजना में उस के अलावा रऊफ के भतीजे गोलू उर्फ जफर और जावेद भी शामिल थे.

इस के बाद उस ने सलमान शेख की हत्या की जो कहानी सुनाई, उस के अनुसार थाना चंदननगर पुलिस ने जावेद, रऊफ खान, गोलू उर्फ जफर के अलावा थाना धरमपुरी पुलिस की मदद से धरमपुरी के रहने वाले रऊफ के एक रिश्तेदार को भी गिरफ्तार किया था. बाद में इन सब को भी थाना धरमपुरी पुलिस को सौंप दिया गया था, जहां इन सब से की गई पूछताछ में सलमान की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इंदौर के थाना चंदननगर में रहने वाला 21 साल का सलमान अब्दुल लतीफ शेख का बेटा था. उस के घर के सामने ही रऊफ खान का घर था, जो बिल्डिंगों की मरम्मत और पुताई का ठेका लेता था. इस के लिए उस के पास तमाम मजदूर काम करते थे. सलमान पढ़लिख कर कमाने लायक हुआ तो अब्दुल लतीफ शेख के कहने पर रऊफ खान ने उसे भी अपने यहां काम पर रख लिया था.

सलमान रऊफ का पड़ोसी था ही, इसलिए उस का रऊफ के घर पहले से ही आनाजाना था. लेकिन जब वह उस के यहां काम करने लगा तो उस का आनाजाना कुछ ज्यादा ही हो गया. जिस की वजह से रऊफ की पत्नी शबनम से उस की कुछ ज्यादा ही पटने लगी. उन का रिश्ता भी कुछ ऐसा था. सलमान शबनम को भाभी कहता था, इसलिए खुल कर हंसीमजाक होता था.

रऊफ खान का काम बड़ा था, इसलिए उस का दिन भागदौड़ में ही बीत जाता था. चूंकि सलमान पड़ोसी था, इसलिए घर के कामों के लिए वह ज्यादातर उसे ही भेजता था. घर के कामों के साथसाथ सलमान शबनम के छोटेमोटे निजी काम भी कर दिया करता था. शबनम खूबसूरत भी थी और उम्र में भी रऊफ खान से छोटी थी. सलमान उस के हमउम्र था. इसी आनेजाने में ही युवा सलमान की नजरें शबनम के गदराए यौवन पर जम गईं. फिर तो जब भी उसे मौका मिलता, वह शबनम से ऐसा मजाक करता कि वह शरम से लाल हो उठती. औरतों को मर्दों की नजरें पहचानने में देर नहीं लगती. शबनम ने भी सलमान की नजरों से उस का इरादा भांप लिया.

पहले तो शबनम ने उस की नजरों से बचने की कोशिश की, लेकिन खुद से भी कमउम्र के आशिक की दीवानगी ने उसे बचने नहीं दिया, उस की दीवानगी उसे अच्छी लगने लगी तो वह उस के सामने अपने छिपे अंगों को इस तरह दिखाने लगी, जैसे सलमान जो देख रहा है, उस से वह अंजान है.

सलमान ने जो कुछ अब तक नहीं देखा था, शबनम से वह देखने को मिला तो वह ज्यादा से ज्यादा उस के करीब रहने की कोशिश करने लगा. सलमान की चाहत की आग में शबनम कुछ ज्यादा ही पिघलने लगी और धीरेधीरे खुद ही उस की होती चली गई. उस बीच रऊफ खान विधानसभा का चुनाव लड़ रहा था. इसलिए वह चुनाव में इस कदर व्यस्त हो गया कि न उसे काम का खयाल रहा और न पत्नीबच्चों का.

उस ने सभी कर्मचारियों को चुनाव प्रचार में लगा रखा था. ऐसे में उस ने सलमान को घर के कामों की जिम्मेदारी सौंप दी थी. इस बीच उस ने रातदिन शबनम भाभी की सेवा की. उस सेवा के फलस्वरूप एक दिन सलमान ने उसे बांहों में भर लिया. शबनम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम तो बड़े दिलेर निकले, तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. मुझे बांहों में भरते हुए तुम्हें डर नहीं लगा. तुम्हारे भाईजान ने देख लिया तो सीधे सूली पर चढ़ा देंगे.’’

‘‘भाभीजान, मैं ने तुम से मोहब्बत की है. मोहब्बत करने वाले किसी से नहीं डरते.’’

‘‘तुम भाईजान के गुस्से को तो जानते ही हो, एक ही बार में सारा इश्क उतार देंगे.’’

‘‘भाभीजान, क्यों मोहब्बत के मूड को बिगाड़ रही हो.’’

‘‘मैं तो मजाक कर रही थी.’’ शबनम ने कहा और सलमान से लिपट गई. इस के बाद दोनों तभी अलग हुए, जब उन के तनमन की आग ठंडी हो गई. इस के बाद दोनों को जब भी मौका मिलता, तन की आग के दरिया में डूब कर आपस में सुख बांट लेते.

सलमान को अब शबनम की जुदाई पल भर के लिए भी बरदाश्त नहीं होती थी. वह चाहता कि शबनम हमेशा उस की आंखों के सामने रहे. लेकिन यह संभव नहीं था. फिर भी वह हर पल उसी की यादों में खोया रहता और उस से मिलने का मौका ढूंढता रहता. अकसर वह दोपहर में काम छोड़ कर शबनम से मिलने उस के घर पहुंच जाता.

सलमान के इस तरह काम छोड़ कर जाने से रऊफ को उस पर शक हुआ तो उस ने कर्मचारियों से उस के बारे में पूछा. पता चला कि सलमान उस की पत्नी से फोन पर घंटों बातें करता है, अकसर दोपहर में उसी से मिलने भी जाता है. रऊफ ने जब इस बात पर ध्यान दिया तो पता चला कि सलमान और शबनम के बीच कुछ चल रहा है. इस के बाद वह दोनों पर नजर रखने लगा. आखिर एक दिन उस ने सलमान को पत्नी से फोन पर बातें करते पकड़ लिया तो उस ने सलमान की पिटाई कर के काम से निकाल दिया.

सलमान को इस से कोई फर्क नहीं पड़ा. वह रऊफ के घर के ठीक सामने ही रहता था. मौका निकाल कर वह शबनम से मिल ही लेता था. फोन पर उन की बातें होती ही रहती थीं. जब रऊफ को पता चला कि अब भी सलमान और शबनम मिलते हैं तो उसे डर सताने लगा कि अगर शबनम सलमान के साथ भाग गई तो समाज में वह मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा, क्योंकि एक तरह से सलमान उस का नौकर था. उस के पास पैसा था और ऊंची राजनीतिक पहुंच भी. इसलिए उस ने सलमान को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

रऊफ ने सलमान को इंदौर से करीब 150 किलोमीटर दूर ले जा कर धार जिले के धरमपुरी इलाके के जंगल में हत्या करने की योजना बनाई, ताकि पुलिस किसी कीमत पर उस की लाश को न पा सके. अपनी इस योजना में उस ने अपने ड्राइवर सद्दाम, भतीजे गोलू उर्फ जफर और जावेद को शामिल किया.

योजना तो बन गई, लेकिन अब सलमान को धरमपुरी के जंगल तक ले कैसे जाया जाए, इस पर विचार किया गया. वह आसानी से जाने वाला नहीं था. आखिर एक तरकीब निकाली गई और इस काम के लिए ड्राइवर सद्दाम को तैयार किया गया. उस ने सद्दाम से कहा कि वह सलमान को शबनम से मिलाने के बहाने धरमपुरी के जंगल तक ले चले.

योजना के अनुसार, 8 जनवरी, 2017 को सद्दाम सलमान से मिला. सद्दाम ने उस से शबनम से मिलाने की बात कही तो वह फौरन तैयार हो गया. क्योंकि पिछले कई सप्ताह से वह शबनम से मिल नहीं पाया था. सद्दाम सलमान को अपने साथ ले कर चला तो कई लोगों ने सलमान को उस के साथ जाते देख लिया था. धरमपुरी के जंगल में पहुंच कर सलमान ने शबनम के बजाए गोलू, जावेद और रऊफ खान को देखा तो समझ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है.

वह कुछ कहता या भाग पाता, उस से पहले ही सभी ने उसे पकड़ लिया और उस की पिटाई शुरू कर दी. पिटाई करने के बाद उस के गले में रस्सी डाल कर कस दिया तो उस की मौत हो गई. इस के बाद पहचान छिपाने के लिए उस का चेहरा ईंट से कुचल दिया गया. उस के कपड़े उतार कर गुप्तांग काट दिया गया, ताकि उस के धर्म का पता न चल सके.

गले में तुलसी की माला डाल कर उस की पैंट की जेब में एक लड़के और लड़की की फोटो भी डाल दी. उन्होंने पुलिस को गुमराह करने के लिए किया तो बहुत कुछ, लेकिन उन का अपराध छिप न सका और वे पकडे़ गए.

सलमान की हत्या करने के बाद रऊफ ने गोलू और सद्दाम को रात में ही इंदौर भेज दिया था, जबकि खुद जावेद के साथ अपनी बहन के यहां धरमपुरी में रुक गया था, ताकि किसी को शंका न हो. वह अगले दिन इंदौर आ गया और अपने काम में लग गया.

रऊफ और उस के साथियों को पूरा भरोसा था कि पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन पुलिस उन तक पहुंच ही गई. इस तरह उन की उम्मीदों पर पानी फिर गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक शबनम, रऊफ खान, सद्दाम, जावेद और गोलू जेल में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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