अंधविश्वास : पंडों की गिरफ्त में देहात

6 फरवरी, 2018 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के गांव गूजरीपुरा में आसपास के तकरीबन 2 दर्जन गांवों के पंच मौजूद थे. खास बात यह थी कि वे सभी कुशवाहा जाति के थे.

मुद्दा बड़ा अजीब था. पिछले साल 28 दिसंबर को शिवनंदन कुशवाहा नाम के एक नौजवान के हाथों एक ठेकेदार महेश शर्मा की हत्या हो गई थी. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. पर इधर आफत उस के घर वालों पर आ पड़ी थी.

शिवनंदन कुशवाहा के मामले में कहा यह गया कि अब शिवनंदन के घर वालों को समाज में रहने और सामाजिक जलसों में शिरकत करने का हक नहीं. लिहाजा, उन का हुक्कापानी बंद कर दिया जाए. मानो कत्ल शिवनंदन ने नहीं बल्कि पूरे घर ने किया हो. 6 फरवरी के जमावड़े में इसी बात का हल निकाला गया कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

ऐसे धुले पाप

शिवनंदन के पिता नकटूराम और मां गोमतीबाई को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उन का क्या कुसूर है. यही हालत उन के दूसरे बेटे बालकिशन की थी. वह भी अपने मांबाप की तरह इस बात से डर रहा था कि पंच कोई सख्त फैसला न सुना दें.

दिनभर की कवायद के बाद आखिरकार पंचों ने एकमत हो कर फैसला दिया कि नकटूराम और गोमतीबाई को गंगा स्नान कर रामायण का पाठ करना पड़ेगा. यह कोई तुक की बात नहीं थी इसलिए दबी आवाज में ही सही बालकिशन ने एतराज जताना चाहा लेकिन पंचों के सिर पर तो पंडा बन कर फैसला सुनाने का भूत सवार था इसलिए उन्होंने एक न सुनी. आखिरकार बूढे़ पतिपत्नी ने गंगा स्नान किया और रामायण भी पढ़ी, तब कहीं जा कर उन का पिंड छूटा.

यह पूछने वाला और बताने वाला कोई नहीं था कि अगर बेटे ने हत्या की है तो पूरे घर वाले कैसे अशुद्ध हो गए और गंगा स्नान और रामायण के पाठ से वापस कैसे शुद्ध हो गए? सच तो यह है कि वे अशुद्ध हुए ही नहीं थे, फिर शुद्धि का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. दिलचस्प बात यह भी है कि मुकदमा चल रहा था और अदालती फैसला नहीं आया था.

यह था असली मकसद

गांवदेहातों में असल राज कानून का नहीं बल्कि धर्म और पंडों का चलता है, यह इस मामले से एक बार फिर उजागर हुआ. पंचायतें गांवों की तरक्की के लिए सड़कों और अस्पतालों के लिए बैठें तो बात समझ आती है लेकिन पंचायतें अदालत में चल रहे किसी मुकदमे पर बेगुनाह लोगों को पापी कहते हुए मुजरिम करार देने बैठें तो शक होना कुदरती बात है.

असल ड्रामा धर्म का धंधा बनाए रखने का है जिस से गांवों का माहौल बदले नहीं और पंडों का दबदबा कायम रहे. गंगा नहाने और रामायण पढ़ने से शुद्धि आती है, यह बात पिछड़ी कही जाने वाली कुशवाहा जाति को कैसे मालूम?

इस पर कुशवाहा समाज के एक पढ़ेलिखे और सरकारी मुलाजिम रह चुके जीएस सूर्यवंशी का कहना है कि इस के पीछे साजिश पंडों की ही नजर आती है. गांवदेहातों से धर्म का धंधा फैलाने के लिए ही यह नया टोटका रचा गया है.

मुमकिन है, कल को यह रिवाज बन जाए कि अगर किसी पिछड़े दलित ने कोई जुर्म किया है तो उस के घर वालों से भोज भी कराया जाने लगे. ऐसा अभी भी होता है कि पाप मुक्ति के लिए पूजापाठ और भोज के जलसे कराए जाते हैं नहीं तो नकटूराम जैसे बेगुनाहों को समाज और गांव से निकालने की धमकी दी जाती है जिस से वे घबरा उठते हैं.

गांवों में अगर इस तरह के धार्मिक पाखंडों से ही इंसाफ होना है तो कानून और अदालतों की कोई जरूरत नहीं रह जाती. इस से बेहतर तो यह होता कि शिवनंदन को ही 10-20 बार गंगा नहाने और रामायण पढ़ने के लिए कहा जाता जिस से बेचारा जेल जाने से बच जाता और उस का जुर्म भी माफ हो जाता.

कुशवाहा समाज पीढि़यों से दबंगों के खेतों में सागभाजी उगाता रहा है. आजादी के 70 साल बाद इस जाति के कुछ नौजवान पढ़ाईलिखाई कर के नौकरियों में आ रहे हैं. कहने भर के मेहनताने पर दबंगों की मजदूरी करती रही इस जाति में जागरूकता उम्मीद के मुताबिक नहीं आ पा रही है तो गूजरीपुरा जैसे गांवों के ये मामले इस की बड़ी वजह हैं जिस की मार एक कुशवाहा ही नहीं बल्कि तमाम पिछड़ी जातियों पर बराबरी से पड़ रही है.

दलितों को पाप मुक्ति के नाम पर कभी गंगा स्नान और रामायण पढ़ने की सजा नहीं दी जाती क्योंकि उन्हें तो यह हक ही धर्म ने नहीं दिए हैं और अब जिन्हें दिए जा रहे हैं, उन से कीमत भी वसूली जा रही है.

अंधविश्वासों के गुलाम

ज्यादातर गांवों में बिजली पहुंच गई है, सड़कें बन गई हैं, पर जागरूकता किसी कोने से नहीं आ रही तो इस की वजह गांवदेहातों में पसरे तरहतरह के अंधविश्वास हैं जिन्हें पंडेपुजारी और बढ़ाते रहते हैं.

गांव वालों का दिमागी दिवालियापन और पिछड़ापन इसी बात से समझा जा सकता है कि वे गेहूं की उन्नत किस्म बोते हैं लेकिन उस की बोआई का मुहूर्त पूछने पंडित के पास भागते हैं और इस बाबत उसे दक्षिणा भी देते हैं.

शादीब्याह और तेरहवीं में तो पंडों की हाजिरी जरूरी होती ही है लेकिन हैरानी तब होती है जब ये लोग गाय के गुम जाने पर उसे ढूंढ़ते नहीं बल्कि पंडे, तांत्रिक या गुनिया के पास जाते हैं. उस के बताए मुताबिक मवेशी मिल जाए तो उस की पूछपरख बढ़ जाती है नहीं तो किस्मत को कोस कर लोग चुप रह जाते हैं.

इस में चित और पट दोनों पंडों की होती है और हर मामले में रहती है. ये चालाक लोग जो गांवों के पिछड़ेपन के असली गुनाहगार हैं, झाड़फूंक के जरीए और पूजापाठ से बीमारियां ठीक करने का भी दम भरते हैं. भूतप्रेत, पिशाच और ऊपरी बाधा भगाने का काम भी करते हैं जो हकीकत में बड़े पैमाने पर पसरा वहम है. यह वहम भी हर कोई जानता है कि धार्मिक किताबों की देन है.

हर गांव में सालभर कोई न कोई धार्मिक जलसा होता रहता है. रामायण का पाठ तो अब आम बात हो चली है. इस बाबत शहरों की रामायण मंडलियां लाने का ठेका पंडे के पास ही होता है जो तयशुदा दक्षिणा में से अपनी दलाली दोनों तरफ से लेता है.

भागवत कथाएं भी इफरात से होने लगी हैं जिन में भारीभरकम खर्च बैठता है. भागवत कथाएं लोकल पंडा या मंडली नहीं कराती, बल्कि बाहर से नामीगिरामी महाराज बुलाए जाते हैं जिन की फीस भी लाखों रुपए में होती है.

जिस गांव में भागवत कथा होती है वहां आसपास के गांवों के लोग मधुक्खियों की तरह टूट पड़ते हैं और बगैर सोचेसमझे दक्षिणा की शक्ल में पैसा चढ़ा देते हैं. उन्हें लगता है कि भागवत कथा सुनने से उन के पाप धुल जाएंगे और अगले जन्म में उन्हें छोटी जाति में पैदा नहीं होना पड़ेगा.

अब नई चाल मुजरिम के घर वालों को फंसाने की चली जा रही है कि अगर उसे गांव में रहना है तो वह धर्मकर्म करे नहीं तो उसे भगा दिया जाएगा.

इस तरह के फैसलों से फायदा उन पंडों का ही होता है जो पहले ब्रह्म हत्या के बुरे नतीजे गिनाते हैं, फिर उन से बचाने के लिए धार्मिक टोटके बता कर अपनी बादशाहत कायम रखते हैं.

ऐसे फैसलों से गांवों की दशा सुधरने की उम्मीद रखना बेमानी है. गांवों की असली तरक्की तो तभी होगी जब धार्मिक पाखंडों और अंधविश्वासों की जकड़न से लोग आजाद हो पाएंगे. ऐसा हो न जाए, इस बाबत क्याक्या छलप्रपंच रचे जाते हैं, इस के लिए एक गूजरीपुरा से नहीं बल्कि लाखों गांवों से मिसालें मिल जाएंगी.

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर : अक्षय खन्ना का शानदार अभिनय

रेटिंग : डेढ़ स्टार

हम बार बार इस बात को दोहराते आए हैं कि सरकारें बदलने के साथ ही भारतीय सिनेमा भी बदलता रहता है. (दो दिन पहले की फिल्म ‘उरी : सर्जिकल स्ट्राइक’ की समीक्षा पढ़ लें.) और इन दिनों पूरा बौलीवुड मोदीमय नजर आ रहा है. एक दिन पहले ही एक तस्वीर सामने आयी है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फिल्मकार करण जोहर के पूरे कैंप के साथ बैठे नजर आ रहे हैं. फिल्मकार भी इंसान हैं, मगर उसका दायित्व अपने कर्तव्य का सही ढंग से निर्वाह करना होता है. इस कसौटी पर फिल्म ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ के निर्देशक विजय रत्नाकर गुटे खरे नहीं उतरते. उन्होंने इस फिल्म को एक बालक की तरह बनाया है. इस फिल्म से उनकी अयोग्यता ही उभरकर आती है. ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ एक घटिया प्रचार फिल्म के अलावा कुछ नहीं है. इस फिल्म के लेखक व निर्देशक अपने कर्तव्य के निर्वाह में पूर्णरूपेण विफल रहे हैं.

2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे डा. मनमोहन सिंह के करीबी व कुछ वर्षों तक उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब ‘‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ पर आधारित फिल्म ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ में भी तमाम कमियां हैं. फिल्म में डा. मनमोहन सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता अनुपम खेर फिल्म के प्रदर्शन से पहले दावा कर रहे थे कि यह फिल्म पीएमओ के अंदर की कार्यशैली से लोगों को परिचित कराएगी. पर अफसोस ऐसा कुछ नहीं है. पूरी फिल्म देखकर इस बात का अहसास होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह अपने पहले कार्यकाल में संजय बारू और दूसरे कार्यकाल में सोनिया गांधी के के हाथ की कठपुतली बने हुए थे. पूरी फिल्म में उन्हे बिना रीढ़ की हड्डी वाला इंसान ही चित्रित किया गया है.

‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को शुरुआत में ‘सिंह इज किंग’ कहा गया. पर धीरे धीरे उन्हे अति कमजोर, बिना रीढ़ की हड्डी वाला इंसान, एक परिवार को बचाने में जुटे महाभारत के भीष्म पितामह तक बना दिया गया, जिसने गांधी परिवार की भलाई के लिए देश के सवालों के जवाब देने की बजाय चुप्पी साधे रखी. फिल्म में डा. मनमोहन सिंह की इमेज को धूमिल करने वाली बातें ही ज्यादा हैं.

फिल्म की कहानी पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार व करीबी रहे संजय बारू (अक्षय खन्ना) के नजरिए से है. कहानी 2004 के लोकसभा चुनावों में यूपीए की जीत के साथ शुरू होती है. कुछ दलों द्वारा उनके इटली की होने का मुद्दा उठाए जाने के कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (सुजेन बर्नेट) स्वयं प्रधानमंत्री/पीएम बनने का लोभ त्यागकर डा. मनमोहन सिंह (अनुपम खेर) को पीएम पद के लिए चुनती हैं. उसके बाद कहानी में प्रियंका गांधी (अहाना कुमार), राहुल गांधी (अर्जुन माथुर), अजय सिंह (अब्दुल कादिर अमीन), अहमद पटेल (विपिन शर्मा), लालू प्रसाद यादव (विमल वर्मा), लाल कृष्ण अडवाणी (अवतार सैनी), शिवराज पाटिल (अनिल रस्तोगी), पी वी नरसिम्हा राव (अजित सतभाई), पी वी नरसिम्हा राव के बड़े बेटे पी वी रंगा राव (चित्रगुप्त सिन्हा), नटवर सिंह सहित कई किरदार आते हैं.

संजय बारू, जो पीएम के मीडिया सलाहकार हैं, लगातार पीएम की इमेज को मजबूत बनाते जाते हैं. वैसे भी संजय बारू ने मीडिया सलाहकार का पद स्वीकार करते समय ही शर्त रख दी थी कि वह हाई कमान सोनिया गांधी को नहीं, बल्कि सिर्फ पीएम को ही रिपोर्ट करेंगें. इसी के चलते पीएमओ में संजय बारू की ही चलती है, इससे अहमद पटेल सहित कुछ लोग उनके खिलाफ हैं. यानी कि उनके विरोधियों की कमी नहीं है. पर संजय बारू पीएम में काफी बदलाव लाते हैं. वह उनके भाषण लिखते हैं.

उसके बाद पीएम का मीडिया के सामने आत्म विश्वास से लबरेज होकर आना, अमेरिकी राष्ट्रति बुश के साथ न्यूक्लियर डील पर बातचीत, इस सौदे पर लेफ्ट का सरकार से अलग होना, समाजवादी पार्टी का समर्थन देना, पीएम को कटघरे में खड़े किए जाना, पीएम के फैसलों पर हाई कमान का लगातार प्रभाव, पीएम और हाई कमान का टकराव, विरोधियों का सामना जैसे कई दृश्यों के बाद कहानी उस मोड़ तक पहुंचती है, जहां न्यूक्लियर मुद्दे पर पीएम डा. मनमोहन सिंह स्वयं इस्तीफा देने पर आमादा हो जाते हैं. पर राजनीतिक परिस्थितियों के चलते सोनिया उनको इस्तीफा देने से रोक लेती हैं. उसके बाद हालात ऐसे बदलते हैं कि संजय बारू अपना त्यागपत्र देकर सिंगापुर चले जाते हैं, मगर डा. मनमोहन सिंह से उनके संपर्क में बने रहते हैं.

उसके बाद की कहानी बड़ी तेजी से घटित होती है, जिसमें डा. मन मोहन सिंह पूरी तरह से हाई कमान सोनिया व गांधी परिवार के सामने समर्पण भाव में ही नजर आते हैं. अहमद पटेल भी उन पर हावी रहते हैं. फिर आगे की कहानी में उनकी जीत के अन्य पांच साल दिखाए गए हैं, जो एक तरह से यूपीए सरकार के पतन की कहानी के साथ कोयला, 2 जी जैसे घोटाले दिखाए गए हैं. फिल्म में इस बात का चित्रण है कि प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह स्वयं इमानदार रहे, मगर उन्होंने हर तरह के घोटालों को परिवार विशेष के लिए अनदेखा किया. फिल्म उन्हे परिवार को बचाने वाले भीष्म की संज्ञा देती है. पर फिल्म की समाप्ति में 2014 के चुनाव के वक्त की राहुल गांधी व वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाएं दिखायी गयी हैं.

फिल्म के लेखक व निर्देशक दोनों ने बहुत घटिया काम किया है. फिल्म सिनेमाई कला व शिल्प का घोर अभाव है. पटकथा अति कमजोर है. इसे फीचर फिल्म की बजाय ‘डाक्यू ड्रामा’ कहा जाना चाहिए. क्योंकि फिल्म में बीच बीच में कई दृश्य टीवी चैनलों के फुटेज हैं. एडीटिंग के स्तर भी तमाम कमियां है. फिल्म में पूरा जोर गांधी परिवार की सत्ता की लालसा, सोनिया गांधी की अपने बेटे राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की बेसब्री, डा मनमोहन सिंह के कमजोर व्यक्तित्व व संजय बारू के ही इर्द गिर्द है.

डा. मनमोहन सिंह को लेकर अब तक मीडिया में जिस तरह की खबरें आती रही हैं, वही सब कुछ फिल्म का हिस्सा है, जबकि संजय बारू उनके करीबी रहे हैं, तो उम्मीद थी कि डा मनमोहन सिंह की जिंदगी के बारे में कुछ रोचक बातें सामने आएंगी, पर अफसोस ऐसा कुछ नहीं है. फिल्म में इस बात को भी ठीक से नहीं चित्रित किया गया कि अहमद पटेल किस तरह से खुरपैच किया करते थे. कोयला घोटाला, 2 जी घोटाला आदि को बहुत सतही स्तर पर ही उठाया गया है. फिल्म में सभी घोटालों पर कपिल सिब्बल की सफाई देने वाली प्रेस कांफ्रेंस भी मजाक के अलावा कुछ नजर नहीं आती.

कमजोर पटकथा व कमजोर चरित्र चित्रण के चलते एक भी चरित्र उभर नहीं पाया. कई चरित्र तो महज कैरीकेचर बनकर रह गए हैं. फिल्म के अंत में बेवजह ठूंसे गए राहुल गांधी व नरेंद्र मोदी की चुनाव प्रचार की सभाओं के टीवी फुटेज की मौजूदगी लेखकों, निर्देशक व फिल्म निर्माताओं की नीयत पर सवाल उठाते हैं. पूरी फिल्म एक ही कमरे में फिल्मायी गयी नजर आती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो संजय बारू के किरदार में अक्षय खन्ना ने काफी शानदार अभिनय किया है. मगर पटकथा व चरित्र चित्रण की कमजोरी के चलते अनुपम खेर अपने अभिनय में खरे नहीं उतरते, बल्कि कई जगह उनका डा. मनमोहन सिंह का किरदार महज कैरीकेचर बनकर रह गया है. किसी भी किरदार में कोई भी कलाकार खरा नहीं उतरता. फिल्म का पार्श्वसंगीत भी सही नहीं है.

एक घंटे 50 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ का निर्माण सुनील बोहरा व धवल गाड़ा ने किया है. संजय बारू के उपन्यास पर आधारित फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुटे, लेखक विजय रत्नाकर गुटे, मयंक तिवारी, कर्ल दुने व आदित्य सिन्हा, संगीतकार सुदीप रौय व साधु तिवारी, कैमरामैन सचिन कृष्णन तथा कलाकार हैं – अनुपम खेर, अक्षय खन्ना, सुजेन बर्नेट, अहाना कुमार, अर्जुन माथुर, अब्दुल कादिर अमीन, अवतार सैनी, विमल वर्मा, अनिल रस्तोगी, दिव्या सेठ, विपिन शर्मा, अजीत सतभाई, चित्रगुप्त सिन्हा व अन्य.

PM मोदी की बायोपिक के पोस्टर पर उठे सवाल

दो वर्षों से बौलीवुड में चर्चा रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन व कृतित्व को लेकर बायोपिक फिल्म बनने जा रही है. इसी के साथ खबर आयी थी कि इस फिल्म में अभिनेता व सांसद परेश रावल इसमें नरेंद्र मोदी का किरदार निभा रहे हैं. परेश रावल ने 2018 में स्वयं एक मुलाकात में कहा था- ‘‘प्रधानमंत्री के जीवन पर फिल्म बन रही है. जिसमें मैं नरेंद्र मोदी की भूमिका निभा रहा हूं. मैने फिल्म की पटकथा पढ़ी है. पटकथा जिस तरह से लिखी गयी है, उससे मैं बहुत खुश हूं. अब मुझे इस फिल्म में काम करने में मजा आएगा. इसकी शूटिंग सितंबर माह से शुरू होगी. मेरे लिए यह चुनौतीपूर्ण फिल्म होगी. ’’मगर पर्दे के पीछे बहुत कुछ घटा. उसके बाद सितंबर में इस फिल्म की शूटिंग शुरू न हो सकी.

उसके बाद दिसंबर माह में खबर आयी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म बनने जा रही है, जिसमें मोदी का किरदार अभिनेता विवेक ओबेराय निभाने वाले हैं. अब जबकि महाराष्ट् के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने मुंबई में आयोजित एक खास समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’’ का पहला पोस्टर जारी किया, तो पोस्टर देखकर लोगों से अच्छी प्रतिक्रियाएं नहीं आ रही हैं. बौलीवुड का एक तबका जरुर इस पोस्टर और विवेक ओबेराय की तारीफ कर रहा है.

ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’’ में नरेंद्र मोदी का किरदार विवेक ओबेराय निभा रहे हैं, जो कि इससे पहले ‘‘कंपनी’’, ‘‘ओमकारा’’, ‘‘कृष 3’’ जैसी  फिल्मों में खलनायक या माफिया डौन के किरदार सहित कई अन्य तरह के किरदार निभा चुके हैं. फिल्म के निर्देशक उमंग कुमार हैं, जो कि ‘मैरी कौम’ व ‘सरबजीत’ फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं. इस फिल्म का निर्माण संदीप सिंह के साथ मिलकर सुरेश ओबेराय कर रहे हैं. सुरेश ओबेराय, विवेक ओबेराय के पिता हैं और वह राखी गुलजार के साथ ‘श्रृद्धांजली’ सहित तमाम बेहतरीन फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके हैं. जब पिता फिल्म का निर्माता हो, तो स्वाभाविक है कि वह अपने अभिनेता पुत्र को ही मुख्य किरदार निभाने का अवसर देगा. फिल्म के दूसरे निर्माता संदीप सिंह इससे पहले ‘‘सरबजीत’’, ‘‘भूमि’’ फिल्मो का सहनिर्माण कर चुके हैं. संदीप सिंह के खिलाफ मार्च 2018 में मौरीशस में अवयस्क बालक का यौन शोषण का आरोप लगा था, जिसका संदीप सिंह ने खंडन किया था.

बहरहाल, सोमवार, सात जनवरी को जारी फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’’ के पहले पोस्टर में विवेक ओबेराय प्रधानमंत्री मोदी के लुक में खादी का कुर्ता पहने हुए नजर आ रहे हैं. बौलीवुड का एक तबका जहां इसकी तारीफ कर रहा है, वहीं अधिकांश लोग दावा कर रहे हैं कि विवेक ओबेराय बिलकुल फिट नही बेठते.

इसी बीच परेश रावल ने पुनः दावा कर दिया है कि पर्दे पर प्रधानमंत्री मोदी का किरदार उनसे बेहतर कोई नहीं निभा सकता.

सपना के गाने पर पंजाबी सिंगर दीप मनी हुए क्रेजी

अपने डांस और बिंदास अंदाज के कारण सुर्खियों में छाई रहने वाली सपना चौधरी का जादू एक बार और दर्शकों पर चला. आए दिन सपना के वीडियोज इंटरनेट पर वायरल होते रहते हैं. लेकिन इस बार सपना का एक ऐसा वीडियो सामने आया है कि जिसे देखकर कोई भी चौंक सकता है. क्योंकि इस वीडियो में दूसरों को अपने गानों पर नचाने वाले पंजाबी स्टार सिंगर दीप मनी खुद  सपना के गाने पर झूमते नजर आ रहे हैं.

वीडियो में सपना अपने पौपुलर गाने ‘तेरी आंख्या का यो काजल’ गाने पर डांस कर रही हैं. मजेदार बात तो यह है कि इस वीडियो को देखकर आप समझ जाएंगे कि सपना का दिलकश डांस देखकर सिर्फ आम लोग ही क्रेजी नहीं होते बल्कि सेलीब्रिटीज भी सपना के जादू का शिकार हो जाते हैं.

 

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इसलिए एक स्टेज शो में सपना का डांस देखकर पंजाबी सिंगर दीप मनी भी खुद को नहीं रोक पाए और उनके साथ डांस करने लगे. सपना का ये वीडियो उनके फैन क्लब ने शेयर किया है. वहीं दीप भी सपना को देखकर उनके स्टेप्स फौलो करते हैं. देखिए हरियाणवी और पंजाबी स्टार्स का यह जोरदार वीडियो.

बता दें कि सपना की अब सिर्फ स्टेज शोज की मल्लिका ही नहीं हैं, बल्कि वह बीते साल के आखिरी महीने में बौलीवुड में भी एंट्री कर चुकी हैं. सपना की पहली फिल्म का नाम है ‘दोस्ती के साइड इफेक्ट’. सपना के साथ फिल्म में विक्रांत आनंद,  टीवी एक्टर जुबैर खान और एक्ट्रेस अंजू जाधव लीड रोल में हैं. सपना की डेब्यू फिल्म के डायरेक्टर हादी अली हैं.

रिलीज हुआ मणिकर्णिका का पहला गाना

बौलिवुड आदाकारा कंगना रनौत की अदाकारी हर बार लोगों का दिल जीतने में कामयाब होती है. ऐसे में जब कंगना स्वतंत्रता संग्राम सेनानी झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की भूमिका में नजर आने वाली हैं तो उनका हर अंदाज शाही हो गया है.

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कंगना की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के रिलीज में अब बहुत कम ही दिन बाकी हैं. बीेते बुधवार फिल्म का पहला गाना ‘विजयी भव’ रिलीज किया गया. ये गाना, इसके बोल और म्यूजिक तीनों ही शानदार हैं.

इस गाने ‘विजयी भव’ के बोल देशभक्ति की भावना से भरे हुए हैं, जो लोगों में देशभक्ति के भाव पैदा करते हैं. वहीं इसके वीडियो की बात की जाए तो कंगना रनौत इसका सेंटर औफ अट्रेक्शन हैं. जिसमें कंगना एक सशक्त महारानी के रूप में नजर आ रही हैं. वह अपनी महिलाओं की सेना को ट्रेनिंग देती हुई दिख रही हैं.

आपको बता दें कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी बिग बजट फिल्म ‘मणिकर्णिका द क्‍वीन औफ झांसी’ हिंदी और तेलगु भाषा में 25 जनवरी को रिलीज हो रही है. फिल्म में कंगना के अलावा अतुल कुलकर्णी, जिशु सेनगुप्ता, सुरेश ओबेरौय, डैनी और अंकिता लोखंडे भी अहम भूमिकाओं में हैं.

उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक : बेहतरीन युद्ध फिल्म

2016 में कश्मीर के उरी क्षेत्र में हुए आतंकवादी हमले के बाद 29 सितंबर 2016 में पाक स्थित आतंकवादियों व उनके अड्डों को सर्जिकल स्ट्राइक करके नष्ट करने वाले भारतीय सेना के वीर जांबाज सैनिकों को फिल्म ‘‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’’ एक बेहतरीन ट्रिब्यूट है. दर्शकों को उनकी सीट से बांधे रखकर उनके अंदर उत्साह और देशभक्ति का जज्बा भी जगाती है. राजनीतिक स्तर पर भी यह एक बेहतरीन फिल्म है, जिसे कट्टर बौलीवुड फिल्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

2016 के उरी हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा सितंबर 2016 में पाक अधिकृत कश्मीर में की गई सर्जिकल स्ट्राइक के सत्य घटनाक्रम पर आधारित फिल्म ‘‘उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक’’ की कहानी पांच अध्यायों में विभाजित कर सुनाई गयी है. पर कहानी के केंद्र में मेजर विहान शेरगिल (विक्की कौशल)हैं.

प्रथम अध्याय जून 2015 में मेजर विहान के नेतृत्व में मणिपुर क्षेत्र के आतंकवादी अड्डों को खत्म करने की कहानी है, जिसके बाद प्रधानमंत्री (रजित कपूर) व एनएसए प्रमुख गोविंद (परेश रावल) इन वीर जवानों के सम्मान में रात्रि भोज देते हैं और वहां पर अपनी मां (स्वरुप संपत) की अल्माइजर की बीमारी के चलते सेना से अवकाश लेने की बात मेजर विहान शेरगिल करते हैं, तो प्रधानमंत्री सलाह देते है कि वह दिल्ली में ही सेना मुख्ययालय में आ जाएं. इस तरह वह सेना में बने रहते हुए अपनी मां के साथ रह सकेंगे और उनकी मां की देखभाल के लिए सरकार की तरफ से एक नर्स दी जाती है.

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बाद में पता चलता है कि यह नर्स वास्तव में सेना की ही अफसर पल्लवी शर्मा (यामी गौतम) है, जिसे विहान के परिवार की सुरक्षा के मद्देनजर नर्स बनाकर रखा गया था. कहानी आगे बढ़ती है और एक आतंकवादी हमले में मेजर विहान शेरगिल के बहनोई कैप्टन करण कष्यप (मोहित रैना) शहीद हो जाते हैंं. इसके बाद उरी पर सेना के उपर आतंकवादी हमला होता है और 19 भारतीय सैनिक शहीद हो जाते हैं. तब प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री व एनएसए प्रमुख मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करने का निर्णय लेते हैं. इस काम को अंजाम देने का नेतृत्व विहान शेरगिल को मिलता है. मेजर विहान शेरगिल, मणिपुर व आसाम की बटालियन के बीस सदस्यों के अलावा कैप्टन सरताज के साथ मिलकर चार दल बनाते हैं. वह अपने वायुसेना के विमान का पायलट, वायुसेना की ही ऐसी पायलट सीरत कौर (कीर्ति कुल्हारी) को चुनते हैं, जिस पर जांच चल रही है. पर उसे सही अर्थ में अपनी वीरता दिखाने का अवसर नही मिल पाया. अंत में सर्जिकल स्ट्राइक सफलतापूर्वक अंजाम दी जाती है.

‘हाल ए दिल’ (2008), ‘बूंद’ (2009), ‘डैडी कूल ज्वाइन द फन’ (2009), ‘‘आक्रोश’’ (2010) फिल्मों के पटकथा लेखक और ‘तेज’ (2012) फिल्म के संवाद लेखक आदित्य धर की बतौर लेखक व निर्देशक ‘‘उरी :द सर्जिकल स्ट्राइक’’ पहली फिल्म है, मगर फिल्म देखने के बाद इस बात का अहसास नहीं होता कि यह किसी नवोदित निर्देशक की फिल्म है. बल्कि बतौर निर्देशक आदित्य धर ने ‘‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’’ से कई दिग्गज निर्देशकों को भी पीछे छोड़ दिया है. तमाम निर्देशकों को इस फिल्म को देखकर काफी कुछ सीखना चाहिए. बतौर लेखक आदित्य धर ने फिल्म की पटकथा पर थोड़ी और मेहनत की होती, तो यह फिल्म सदैव के लिए एक क्लासिक फिल्म के साथ साथ एक पथप्रदर्शक या अग्रणी सिनेमा के रूप में गिनी जाती. इंटरवल से पहले फिल्म में कुछ बेहतरीन भावनात्मक दृष्य भी हैं. पर इंटरवल के बाद फिल्म की पटकथा पर मेहनत करने की जरुरत महसूस होती है. वास्तविक घटनाक्रम और वास्तविक पात्रों पर आधारित फिल्म के अंतिम हिस्से में कुछ पात्रों को कैरीकेचर बना देना भी खलता है.

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लेखक व निर्देशक इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रवाद की चाशनी में नहीं रंगा. और न ही बेतुके राष्ट्भक्ति के संवाद ही रखे हैं. आदित्य धर की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने अपनी फिल्म में इस बात पर जोर नही दिया कि इस सर्जिकल स्ट्राइक से भारत सरकार को क्या हासिल हुआ, बल्कि उन्होंने देश के वीर सैनिकों के कर्तव्य निर्वाह को प्रमुखता दी.

फिल्म के तमाम दृष्य काफी सुंदर बने हैं. युद्ध पर आधारित फिल्म में जिस तरह से प्राकृतिक सौंदर्य को कैमरे ने कैद किया है, उसके लिए फिल्म के कैमरामैन मितेश मीरचंदानी की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मेजर विहान शेरगिल के किरदार में विक्की कौशल ने काफी शानदार अभिनय किया है. वह पूरी फिल्म को अपने कंधों पर लेकर आगे बढ़ते हैं. वह सैनिक की वर्दी और आम विहान के रूप में बेहतर ढंग से अभिनय कर गए हैं. विक्की कौशल सही मायनों में देशभक्त अधिकारी और सज्जन व्यक्ति के रूप उभरते हैं. वह बेवजह सीना ताने नजर नही आते. एनएसए प्रमुख गोविंद के किरदार में परेश रावल ने भी काफी अच्छा काम किया है, वह परदे पर हूबहू वर्तमान एनएसए प्रमुख अजीत डोभाल ही नजर आते हैं. वहीं 2016 के समय के रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर के किरदार में योगेश सोमन काफी जंचे हैं. कीर्ति कुल्हारी, यामी गौतम, मोहित रैना ने भी ठीक ठाक अभिनय किया है.
गीत संगीत ठीक ठाक है.

दो घंटे 13 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला ने किया है. 2016 कि उरी हमले पर आधारित इस फिल्म के लेखक व निर्देशक आदित्य धर हैं. संगीतकार शाश्वत सचदेव, कैमरामैन मितेश मीरचंदानी तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – विक्की कौशल, परेश रावल, यामी गौतम, कीर्ति कुल्हारी, मोति रैना, इवान रौड्रिग्स, योगेश सुमन, मानसी पारेख, रजित कपूर व अन्य.

रेटिंग : साढ़े तीन स्टार

20 सेकेंड में देखिए अनुपम खेर से ‘मनमोहन सिंह’ का बनना

हाल ही में अनुपम खेर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया है. वीडियो में वो मेकअप से अनुपम से मनमोहन बनते हुए दिखाई दे रहे हैं. अनुपम से मनमोहन बनने में उन्हें 2 घंटे लगते थे. पर इस पूरे वक्त को उन्होंने टाइम लैप्स से बस 20 सेकेंड्स में दिखाया है. अनुपम ने मेकअप आर्टिस्ट अभिलाषा, पगड़ी के लिए जसप्रीत और बाकी टीम का धन्यवाद देते हुए लिखा है कि आपके बिना में ये नहीं कर सकता था.

आपको बता दें कि अनुपम खेर अपनी नई फिल्म ‘दी एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के साथ जल्दी दी बड़े पर्दे पर नजर आने वाले हैं. इस फिल्म में वो देश के पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के किरदार में दिखेंगे. ये फिल्म संजय बारू की किताब दी ‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर आधारित है. इसमें अनुपम खेर के अलावा अक्षय खन्ना भी मुख्य भूमिका में हैं.

रणवीर सिंह ने दीपिका से लिया आशीर्वाद

बौलिवुड एक्टर रणवीर सिंह की फिल्म ‘सिंबा’ ने बौक्स औफिस पर धूम मचाई है. इस फिल्म की सफलता से खुश टीम ने एक सक्सेस पार्टी रखी. इस पार्टी में बौलीवुड के कई बड़े चेहरे भी फिल्म की कास्ट के साथ मस्ती करते नजर आए. फिल्म के लीड एक्टर रणवीर सिंह ने इस पार्टी में जमकर डांस और मस्ती की. इस इवेंट के कई वीडियोज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. रणवीर सिंह की इस पार्टी में उनकी पत्नी और एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण भी पहुंचीं.

 

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सेलिब्रिटी फोटोग्राफर मानव मंगलानी ने अपने इंस्टाग्राम पर इस पार्टी के धमाकेदार वीडियोज शेयर किए हैं, जिसमें रणवीर सिंह, सोनू सूद और रोहित शेट्टी के साथ बौलीवुड सौन्ग पर डांस करते नजर आ रहे हैं. इसके अलावा मानव ने एक और फनी फोटो शेयर की है जिसमें रोहित शेट्टी, रणवीर सिंह और करण जौहर फनी एक्ट में दीपिका पादुकोण से आशीर्वाद लेते नजर आ रहे हैं.

 

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यह फिल्म बौक्स औफिस पर जबरदस्त कमाई कर रही है. ‘सिंबा’ साल 2018 की तीसरी हाइयेस्ट ग्रोसर फिल्म बन गई है. फिल्म ने दो हफ्ते में 190 करोड़ की कमाई की है. इसी के साथ 2018 की टौप 4 ग्रोसर फिल्मों की लिस्ट में रणवीर सिंह की दो फिल्में शामिल हो गई हैं.

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