Romantic Story: आखिरी टैलीग्राम – क्या शादी के बाद तनु अपने प्रेमी से मिल पाई

Romantic Story: प्लेन से मुंबई से दिल्ली तक के सफर में थकान जैसा तो कुछ नहीं था पर मां के ‘थोड़ा आराम कर ले,’ कहने पर मैं फ्रैश हो कर मां के ही बैडरूम में आ कर लेट गई. भैयाभाभी औफिस में थे. मां घर की मेड श्यामा को किचन में कुछ निर्देश दे रही थीं. कल पिताजी की बरसी है. हर साल मैं मां की इच्छानुसार उन के पास जरूर आती हूं. मैं 5 साल की ही थी जब पिताजी की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. भैया उस समय 10 साल के थे. मां टीचर थीं. अब रिटायर हो चुकी हैं. 25 सालों के अपने वैवाहिक जीवन में मैं सुरभि और सार्थक के जन्म के समय ही नहीं आ पाई हूं पर बाकी समय हर साल आती रही हूं. विपिन मेरे सकुशल पहुंचने की खबर ले चुके थे. बच्चों से भी बात हो चुकी थी.

मैं चुपचाप लेटी कल होने वाले हवन, भैयाभाभी और अपने इकलौते भतीजे यश के बारे में सोच ही रही थी कि तभी मां की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, ‘‘ले तनु, कुछ खा ले.’’ पीछेपीछे श्यामा मुसकराती हुई ट्रे ले कर हाजिर हुई.

मैं ने कहा, ‘‘मां, इतना सब?’’ ‘‘अरे, सफर से आई है, घर के काम निबटाने में पता नहीं कुछ खा कर चली होगी या नहीं.’’

मैं हंस पड़ी, ‘‘मांएं ऐसी ही होती हैं, मैं जानती हूं मां. अच्छाभला नाश्ता कर के निकली थी और प्लेन में कौफी भी पी थी.’’ मां ने एक परांठा और दही प्लेट में रख कर मुझे पकड़ा दिया, साथ में हलवा.

मायके आते ही एक मैच्योर स्त्री भी चंचल तरुणी में बदल जाती है. अत: मैं ने भी ठुनकते हुए कहा, ‘‘नहीं, मैं इतना नहीं खाऊंगी और हलवा तो बिलकुल भी नहीं.’’ मां ने प्यार भरे स्वर में कहा, ‘‘यह डाइटिंग मुंबई में ही करना, मेरे सामने नहीं चलेगी. खा ले मेरी बिटिया.’’

‘‘अच्छा ठीक है, अपना नाश्ता भी ले आओ आप.’’

‘‘हां, मैं लाती हूं,’’ कह कर श्यामा चली गई. हम दोनों ने साथ नाश्ता किया. भैयाभाभी रात तक ही आने वाले थे. मैं ने कहा, ‘‘कल के लिए कुछ सामान लाना है क्या?’’

‘‘नहीं, संडे को ही अनिल ने सारी तैयारी कर ली थी. तू थोड़ा आराम कर. मैं जरा श्यामा से कुछ काम करवा लूं.’’

दोपहर तक यश भी आ कर मुझ से लिपट गया. मेरे इस इकलौते भतीजे को मुझ से बहुत लगाव है. मेरे मायके में गिनेचुने लोग ही तो हैं. सब से मुधर स्वभाव के कारण घर में एक स्नेहपूर्ण माहौल रहता है. जब आती हूं अच्छा लगता है. 3 बजे तक का टाइम कब कट गया पता ही नहीं चला. यश कोचिंग चला गया तो मैं भी मां के पास ही लेट गई. मां दोपहर में थोड़ा सोती हैं. मुझे नींद नहीं आई तो मैं उठ कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर बैठ कर एक पत्रिका के पन्ने पलटने लगी. इतने में डोरबैल बजी. मैं ने ही दरवाजा खोला, श्यामा पास में ही रहती है. वह दोपहर में घर चली जाती है. शाम को फिर आ जाती है.

पोस्टमैन था. टैलीग्राम था. मैं ने उलटापलटा. टैलीग्राम मेरे नाम था. प्रेषक के नाम पर नजर पड़ते ही मुझे हैरत का एक तेज झटका लगा. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठीं. अनिरुद्ध. मैं टैलीग्राम ले कर सोफे पर धंस गई. हमेशा की तरह कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया था अनिरुद्ध ने, ‘‘तुम इस समय यहीं होगी, जानता हूं. अगर ठीक समझो तो संपर्क करना.’’

पता नहीं कैसे मेरी आंखें मिश्रित भावों की नमी से भरती चली गई थीं. ओह अनिरुद्ध. तुम्हें आज 25 साल बाद भी याद है मेरे पिताजी की बरसी. और यह टैलीग्राम. 3 दिन बाद 164 साल पुरानी टैलीग्राम सेवा बंद होने वाली है. अनिरुद्ध के पास यही एक रास्ता था आखिरी बार मुझ तक पहुंचने का. मेरा मोबाइल नंबर उस के पास है नहीं, न मेरा मुंबई का पता है उस के पास. तब यहां उन दिनों घर में भी फोन नहीं था. बस यही आखिरी तरीका उसे सूझा होगा. उसे यह हमेशा से पता था कि पिताजी की बरसी पर मैं कहीं भी रहूं, मां और भैया के पास जरूर आऊंगी और उस की यह कोशिश मेरे दिल के कोनेकोने को उस की मीठी सी याद से भरती जा रही थी. अनिरुद्ध… मेरा पहला प्यार एक सुगंधित पुष्प की तरह ही तो था. एक पूरा कालखंड ही बीत गया अनिरुद्ध से मिले. वयसंधि पर खड़ी थी तब मैं जब पहली बार मन में प्यार की कोंपल फूटी थी. यह वही नाम था जिस की आवाज कानों में उतरने के साथ ही जेठ की दोपहर में वसंत का एहसास कराने लगती. तब लगता था यदि परम आनंद कहीं है तो बस उन पलो में सिमटा हुआ जो हमारे एकांत के हमसफर होते, पर कालेज के दिनों में ऐसे पल हम दोनों को मुश्किल से ही मिलते थे. होते भी तो संकोच, संस्कार और डर में लिपटे हुए कि कहीं कोई

देख न ले. नौकरी मिलते ही उस पर घर में विवाह का दबाव बना तो उस ने मेरे बारे में अपने परिवार को बताया. फिर वही हुआ जिस का डर था. उस के अतिपुरातनपंथी परिवार में हंगामा खड़ा हो गया और फिर प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुजुर्गों के आदेश के आगे मुंह सिला खड़ा रह गया था. प्यार क्या योजना बना कर जातिधर्म परख कर किया जाता है या किया जा सकता है? और बस हम दोनों ने ही एकदूसरे को भविष्य की शुभकामनाएं दे कर भरे मन से विदा ले ली थी. यही समझा लिया था मन को कि प्यार में पाना जरूरी भी नहीं, पृथ्वीआकाश कहां मिलते हैं भला. सच्चा प्यार तो शरीर से ऊपर मन से जुड़ता है. बस, हम जुदा भर हुए थे.

उस की विरह में मेरी आंखों से बहे अनगिनत आंसू बाबुल के घर से विदाई के आंसुओं में गिन लिए गए थे. मैं इस अध्याय को वहीं समाप्त समझ पति के घर आ गई थी. लेकिन आज उसी बंद अध्याय के पन्ने फिर से खुलने के लिए मेरे सम्मुख फड़फड़ा रहे थे. टैलीग्राम पर उस का पता लिखा हुआ था, वह यहीं दिल्ली में ही है. क्या उस से मिल लूं? देखूं तो कैसा है? उस के परिवार से भी मिल लूं. पर यह मुलाकात हमारे शांतसुखी वैवाहिक जीवन में हलचल तो नहीं मचा देगी? दिल उस से मिलने के लिए उकसा रहा था, दिमाग कह रहा था पीछे मुड़ कर देखना ठीक नहीं रहेगा. मन तो हो रहा था, देखूंमिलूं उस से, 25 साल बाद कैसा लगता होगा. पूछूं ये साल कैसे रहे, क्याक्या किया, अपने बारे में भी बताऊं. फिर अचानक पता नहीं क्या मन में आया मैं चुपचाप स्टोररूम में चली गई. वहां काफी नीचे दबा अपना एक बौक्स उठाया. मेरा यह बौक्स सालों से यहीं पड़ा है. इसे कभी किसी ने नहीं छेड़ा. मैं ने बौक्स खोला, उस में एक और डब्बा था.

सामने अनिरुद्ध के कुछ पुराने पीले पड़ चुके, भावनाओं की स्याही में लिपटे खतों का 1-1 पन्ना पुरानी यादों को आंखों के सामने एक खूबसूरत तसवीर की तरह ला रहा था. न जाने कितनी भावनाओं का लेखाजोखा इन खतों में था. मुझे अचानक महसूस हुआ आजकल के प्रेमियों के लिए तो मोबाइल ने कई विकल्प खोल दिए हैं. फेसबुक ने तो अपनों को छोड़ कर अनजान रिश्तों को जोड़ दिया है.

सारा सामान अपनी गोद में फैलाए मैं अनगिनत यादों की गिरफ्त में बैठी थी जहां कुछ भी बनावटी नहीं होता था. शब्दों का जादू और भावों का सम्मोहन लिए ये खत मन में उतर जाते थे. हर शब्द में लिखने वाले की मौजूदगी महसूस होती थी. अनिरुद्ध ने एक पेपर पर लिखा था, ‘‘खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार. जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.’’

मेरे होंठों पर एक मुसकराहट आ गई. आजकल के बच्चे इन शब्दों की गहराई नहीं समझ पाएंगे. वे तो अपने प्रिय को मनाने के लिए सिर्फ एक आई लव यू स्माइली का सहारा ले कर बात कर लेते हैं. अनिरुद्ध खत में न कभी अपना नाम लिखता था न मेरा, इसी वजह से मैं इन्हें संभाल कर रख सकी थी. अनिरुद्ध की दी हुई कई चीजें मेरे सामने पड़ी थीं. उस का दिया हुआ एक पैन, उस का पीला पड़ चुका एक सफेद रूमाल जो उस ने मुझे बारिश में भीगे हुए चेहरे को साफ करने के लिए दिया था. मुझे दिए गए उस के लिखे क्लास के कुछ नोट्स, कई बार तो वह ऐसे ही कोई कागज पकड़ा देता था जिस पर कोई बहुत ही सुंदर शेर लिखा होता था.

स्टोररूम के ठंडेठंडे फर्श पर बैठ कर मैं उस के खत उलटपुलट रही थी और अब यह अंतिम टैलीग्राम. बहुत सी मीठी, अच्छी, मधुर यादों से भरे रिश्ते की मिठास से भरा, मैं इसे हमेशा संभाल कर रखूंगी पर कहां रख पाऊंगी भला, किसी ने देख लिया तो क्या समझा पाऊंगी कुछ? नहीं. फिर वैसे भी मेरे वर्तमान में अतीत के इस अध्याय की न जरूरत है, न जगह. फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आया कि मैं ने अंतिम टैलीग्राम को आखिरी बार भरी आंखों से निहार कर उस के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. मुझे उसे कहीं रखने की जरूरत नहीं है. मेरे मन में इस टैलीग्राम में बसी भावनाओं की खुशबू जो बस गई है. अब इसी खुशबू में भीगी फिरती रहूंगी जीवन भर. वह मुझे भूला नहीं है, मेरे लिए यह एहसास कोई ग्लानि नहीं है, प्यार है, खुशी है.

Family Story: लक्ष्मण रेखा – मिसेज राजीव कैसे बन गई धैर्य का प्रतिबिंब

Family Story: मेहमानों की भीड़ से घर खचाखच भर गया था. एक तो शहर के प्रसिद्ध डाक्टर, उस पर आखिरी बेटे का ब्याह. दोनों तरफ के मेहमानों की भीड़ लगी हुई थी. इतना बड़ा घर होते हुए भी वह मेहमानों को अपने में समा नहीं पा रहा था. कुछ रिश्ते दूर के होते हुए भी या कुछ लोग बिना रिश्ते के भी बहुत पास के, अपने से लगने लगते हैं और कुछ नजदीकी रिश्ते के लोग भी पराए, बेगाने से लगते हैं, सच ही तो है. रिश्तों में क्या धरा है? महत्त्व तो इस बात का है कि अपने व्यक्तित्व द्वारा कौन किस को कितना आकृष्ट करता है.

तभी तो डाक्टर राजीव के लिए शुभदा उन की कितनी अपनी बन गई थी. क्या लगती है शुभदा उन की? कुछ भी तो नहीं. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी डाक्टर राजीव सहज ही मिलने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. उन की आंखों में न जाने ऐसा कौन सा चुंबकीय आकर्षण है जो देखने वालों की नजरों को बांध सा देता है. अपने समय के लेडीकिलर रहे हैं डाक्टर राजीव. बेहद खुशमिजाज. जो भी युवती उन्हें देखती, वह उन जैसा ही पति पाने की लालसा करने लगती. डाक्टर राजीव दूल्हा बन जब ब्याहने गए थे, तब सभी लोग दुलहन से ईर्ष्या कर उठे थे. क्या मिला है उन्हें ऐसा सजीला गुलाब सा दूल्हा. गुलाब अपने साथ कांटे भी लिए हुए है, यह कुछ सालों बाद पता चला था. अपनी सुगंध बिखेरता गुलाब अनायास कितने ही भौंरों को भी आमंत्रित कर बैठता है. शुभदा भी डाक्टर राजीव के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उन की तरफ खिंची चली आई थी.

बौद्धिक स्तर पर आरंभ हुई उन की मित्रता दिनप्रतिदिन घनिष्ठ होती गई थी और फिर धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के लिए अपरिहार्य बन गए थे. मिसेज राजीव पति के बौद्धिक स्तर पर कहीं भी तो नहीं टिकती थीं. बहुत सीधे, सरल स्वभाव की उषा बौद्धिक स्तर पर पति को न पकड़ पातीं, यों उन का गठा बदन उम्र को झुठलाता गौरवर्ण, उज्ज्वल ललाट पर सिंदूरी गोल बड़ी बिंदी की दीप्ति ने बढ़ती अवस्था की पदचाप को भी अनसुना कर दिया था. गहरी काली आंखें, सीधे पल्ले की साड़ी और गहरे काले केश, वे भारतीयता की प्रतिमूर्ति लगती थीं. बहुत पढ़ीलिखी न होने पर भी आगंतुक सहज ही बातचीत से उन की शिक्षा का परिचय नहीं पा सकता था. समझदार, सुघड़, सलीकेदार और आदर्श गृहिणी. आदर्श पत्नी व आदर्श मां की वे सचमुच साकार मूर्ति थीं. उन से मिलते ही दिल में उन के प्रति अनायास ही आकर्षण, अपनत्व जाग उठता, आश्चर्य होता था यह देख कर कि किस आकर्षण से डाक्टर राजीव शुभदा की तरफ झुके. मांसल, थुलथुला शरीर, उम्र को जबरन पीछे ढकेलता सौंदर्य, रंगेकटे केश, नुची भौंहें, निरंतर सौंदर्य प्रसाधनों का अभ्यस्त चेहरा. असंयम की स्याही से स्याह बना चेहरा सच्चरित्र, संयमी मिसेज राजीव के चेहरे के सम्मुख कहीं भी तो नहीं टिकता था.

एक ही उम्र के माइलस्टोन को थामे खड़ी दोनों महिलाओं के चेहरों में बड़ा अंतर था. कहते हैं सौंदर्य तो देखने वालों की आंखों में होता है. प्रेमिका को अकसर ही गिफ्ट में दिए गए महंगेमहंगे आइटम्स ने भी प्रतिरोध में मिसेज राजीव की जबान नहीं खुलवाई. प्रेमी ने प्रेमिका के भविष्य की पूरी व्यवस्था कर दी थी. प्रेमिका के समर्पण के बदले में प्रेमी ने करोड़ों रुपए की कीमत का एक घर बनवा कर उसे भेंट किया था. शाहजहां की मलिका तो मरने के बाद ही ताजमहल पा सकी थी, पर शुभदा तो उस से आगे रही. प्रेमी ने प्रेमिका को उस के जीतेजी ही ताजमहल भेंट कर दिया था. शहरभर में इस की चर्चा हुई थी. लेकिन डाक्टर राजीव के सधे, कुशल हाथों ने मर्ज को पकड़ने में कभी भूल नहीं की थी. उस पर निर्धनों का मुफ्त इलाज उन्हें प्रतिष्ठा के सिंहासन से कभी नीचे न खींच सका था.

जिंदगी को जीती हुई भी जिंदगी से निर्लिप्त थीं मिसेज राजीव. जरूरत से भी कम बोलने वाली. बरात रवाना हो चुकी थी. यों तो बरात में औरतें भी गई थीं पर वहां भी शुभदा की उपस्थिति स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य भी थी. मिसेज राजीव ने ‘घर अकेला नहीं छोड़ना चाहिए’ कह कर खुद ही शुभदा का मार्ग प्रशस्त कर दिया था. मां मिसेज राजीव की दूर की बहन लगती हैं. बड़े आग्रह से पत्र लिख उन्होंने हमें विवाह में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था. सालों से बिछुड़ी बहन इस बहाने उन से मिलने को उत्सुक हो उठी थी.

बरात के साथ न जा कर मिसेज राजीव ने उस स्थिति की पुनरावृत्ति से बचना चाहा था जिस में पड़ कर उन्हें उस दिन अपनी नियति का परिचय प्राप्त हो गया था. डाक्टर राजीव काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. डाक्टरों के अनुसार उन का एक छोटा सा औपरेशन करना जरूरी था. औपरेशन का नाम सुनते ही लोगों का दिल दहल उठता है.

परिणामस्वरूप ससुराल से भी रिश्तेदार उन्हें देखने आए थे. अस्पताल में शुभदा की उपस्थिति, उस पर उसे बीमार की तीमारदारी करती देख ताईजी के तनबदन में आग लग गई थी. वे चाह कर भी खुद को रोक न सकी थीं. ‘कौन होती हो तुम राजीव को दवा पिलाने वाली? पता नहीं क्याक्या कर के दिनबदिन इसे दीवाना बनाती जा रही है. इस की बीवी अभी मरी नहीं है,’ ताईजी के कर्कश स्वर ने सहसा ही सब का ध्यान आकर्षित कर लिया था.

अपराधिनी सी सिर झुकाए शुभदा प्रेमी के आश्वासन की प्रतीक्षा में दो पल खड़ी रह सूटकेस उठा कर चलने लगी थी कि प्रेमी के आंसुओं ने उस का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था. उषा पूरे दृश्य की साक्षी बन कर पति की आंखों की मौन प्रार्थना पढ़ वहां से हट गई थी. पत्नी के जीवित रहते प्रेमिका की उपस्थिति, सबकुछ कितना साफ खुला हुआ. कैसी नारी है प्रेमिका? दूसरी नारी का घर उजाड़ने को उद्यत. कैसे सब सहती है पत्नी? परनारी का नाम भी पति के मुख से पत्नी को सहन नहीं हो पाता. सौत चाहे मिट्टी की हो या सगी बहन, कौन पत्नी सह सकी है?

पिता का आचरण बेटों को अनजान?े ही राह दिखा गया था. मझले बेटे के कदम भी बहकने लगे थे. न जाने किस लड़की के चक्कर में फंस गया था कि चतुर शुभदा ने बिगड़ती बात को बना लिया. न जाने किन जासूसों के बूते उस ने अपने प्रेमी के सम्मान को डूबने से बचा लिया. लड़के की प्रेमिका को दूसरे शहर ‘पैक’ करा के बेटे के पैरों में विवाह की बेडि़यां पहना दीं. सभी ने कल्पना की थी बापबेटे के बीच एक जबरदस्त हंगामा होने की, पर पता नहीं कैसा प्रभुत्व था पिता का कि बेटा विवाह के लिए चुपचाप तैयार हो गया. ‘ईर्ष्या और तनावों की जिंदगी में क्यों घुट रही हो?’ मां ने उषा को कुरेदा था.

एकदम चुप रहने वाली मिसेज राजीव उस दिन परत दर परत प्याज की तरह खुलती चली गई थीं. मां भी बरात के साथ नहीं गई थीं. घर में 2 नौकरों और उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. इतने लंबे अंतराल में इतना कुछ घटित हो गया, मां को कुछ लिखा भी नहीं. मातृविहीन सौतेली मां के अनुशासन में बंधी उषा पतिगृह में भी बंदी बन कर रह गई थी. मां ने उषा की दुखती रग पर हाथ धर दिया था. वर्षों से मन ही मन घुटती मिसेज राजीव ने मां का स्नेहपूर्ण स्पर्श पा कर मन में दबी आग को उगल दिया था. ‘मैं ने यह सब कैसे सहा, कैसे बताऊं? पति पत्नी को मारता है तो शारीरिक चोट ही देता है, जिसे कुछ समय बाद पत्नी भूल भी जाती है पर मन की चोट तो सदैव हरी रहती है. ये घाव नासूर बनते जाते हैं, जो कभी नहीं भरते.

‘पत्नीसुलभ अधिकारों को पाने के लिए विद्रोह तो मैं ने भी करना चाहा था पर निर्ममता से दुत्कार दी गई. जब सभी राहें बंद हों तो कोई क्या कर सकता है? ‘ऊपर से बहुत शांत दिखती हूं न? ज्वालामुखी भी तो ऊपर से शांत दिखता है, लेकिन अपने अंदर वह जाने क्याक्या भरे रहता है. कलह से कुछ बनता नहीं. डरती हूं कि कहीं पति को ही न खो बैठूं. आज वे उसे ब्याह कर मेरी छाती पर ला बिठाएं या खुद ही उस के पास जा कर रहने लगें तो उस स्थिति में मैं क्या कर लूंगी?

‘अब तो उस स्थिति में पहुंच गई हूं जहां मुझे कुछ भी खटकता नहीं. प्रतिदिन बस यही मनाया करती हूं कि मुझे सबकुछ सहने की अपारशक्ति मिले. कुदरत ने जिंदगी में सबकुछ दिया है, यह कांटा भी सही. ‘नारी को जिंदगी में क्या चाहिए? एक घर, पति और बच्चे. मुझे भी यह सभीकुछ मिला है. समय तो उस का खराब है जिसे कुदरत कुछ देती हुई कंजूसी कर गई. न अपना घर, न पति और न ही बच्चे. सिर्फ एक अदद प्रेमी.’

उषा कुछ रुक कर धीमे स्वर में बोली, ‘दीदी, कृष्ण की भी तो प्रेमिका थी राधा. मैं अपने कृष्ण की रुक्मिणी ही बनी रहूं, इसी में संतुष्ट हूं.’ ‘लोग कहते हैं, तलाक ले लो. क्या यह इतना सहज है? पुरुषनिर्मित समाज में सब नियम भी तो पुरुषों की सुविधा के लिए ही होते हैं. पति को सबकुछ मानो, उन्हें सम्मान दो. मायके से स्त्री की डोली उठती है तो पति के घर से अर्थी. हमारे संस्कार तो पति की मृत्यु के साथ ही सती होना सिखाते हैं. गिरते हुए घर को हथौड़े की चोट से गिरा कर उस घर के लोगों को बेघर नहीं कर दिया जाता, बल्कि मरम्मत से उस घर को मजबूत बना उस में रहने वालों को भटकने से बचा लिया जाता है.

‘तनाव और घुटन से 2 ही स्थितियों में छुटकारा पाया जा सकता है या तो उस स्थिति से अपने को अलग करो या उस स्थिति को अपने से काट कर. दोनों ही स्थितियां इतनी सहज नहीं. समाज द्वारा खींची गई लक्ष्मणरेखा को पार कर सकना मेरे वश की बात नहीं.’

मिसेज राजीव के उद्गार उन की समझदारी के परिचायक थे. कौन कहेगा, वे कम पढ़ीलिखी हैं? शिक्षा की पहचान क्या डिगरियां ही हैं?

बरात वापस आ गई थी. घर में एक और नए सदस्य का आगमन हुआ था. बेटे की बहू वास्तव में बड़ी प्यारी लग रही थी. बहू के स्वागत में उषा के दिल की खुशी उमड़ी पड़ रही थी. रस्म के मुताबिक द्वार पर ही बहूबेटे का स्वागत करना होता है. बहू बड़ों के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद पाती है. सभी बड़ों के पैर छू आशीष द्वार से अंदर आने को हुआ कि किसी ने व्यंग्य से चुटकी ली, ‘‘अरे भई, इन के भी तो पैर छुओ. ये भी घर की बड़ी हैं.’’ शुभदा स्वयं हंसती हुई आ खड़ी हुई. आशीष के चेहरे की हर नस गुस्से में तन गई. नया जवान खून कहीं स्थिति को अप्रिय ही न बना दे, बेटे के चेहरे के भाव पढ़ते हुए मिसेज राजीव ने आशीष के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटा, आगे बढ़ कर चरणस्पर्श करो.’’

काम की व्यस्तता व नई बहू के आगमन की खुशी में सभी यह बात भूल गए पर आशीष के दिल में कांटा पड़ गया, मां की रातों की नींद छीनने वाली इस नारी के प्रति उस के दिल में जरा भी स्थान नहीं था. शाम को घर में पार्टी थी. रंगबिरंगी रोशनियों से फूल वाले पौधों और फलदार व सजावटी पेड़ों से आच्छादित लौन और भी आकर्षक लग रहा था. शुभदा डाक्टर राजीव के साथ छाया सी लगी हर काम में सहयोग दे रही थी. आमंत्रित अतिथियों की लिस्ट, पार्टी का मीनू सभीकुछ तो उस के परामर्श से बना था.

शहनाई का मधुर स्वर वातावरण को मोहक बना रहा था. शहर के मान्य व प्रतिष्ठित लोगों से लौन खचाखच भर गया था. नईनेवली बहू संगमरमर की तराशी मूर्ति सी आकर्षक लग रही थी, देखने वालों की नजरें उस के चेहरे से हटने का नाम ही नहीं लेती थीं. एक स्वर से दूल्हादुलहन व पार्टी की प्रशंसा की जा रही थी. साथ ही, दबे स्वरों में हर व्यक्ति शुभदा का भी जिक्र छेड़ बैठता. ‘‘यही हैं न शुभदा, नीली शिफौन की साड़ी में?’’ डाक्टर राजीव के बगल में आ खड़ी हुई शुभदा को देखते ही किसी ने पूछा.

‘‘डाक्टर राजीव ने क्या देखा इन में? मिसेज राजीव को देखो न, इस उम्र में भी कितनी प्यारी लगती हैं.’’ ‘‘तुम ने सुना नहीं, दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज?’’

‘‘शुभदा ने शादी नहीं की?’’ ‘‘शादी की होती तो अपने पति की बगल में खड़ी होती, डाक्टर राजीव के पास क्या कर रही होती?’’ किसी ने चुटकी ली, ‘‘मजे हैं डाक्टर साहब के, घर में पत्नी का और बाहर प्रेमिका का सुख.’’

घर के लोग चर्चा का विषय बनें, अच्छा नहीं लगता. ऐसे ही एक दिन आशीष घर आ कर मां पर बड़ा बिगड़ा था. पिता के कारण ही उस दिन मित्रों ने उस का उपहास किया था. ‘‘मां, तुम तो घर में बैठी रहती हो, बाहर हमें जलील होना पड़ता है. तुम यह सब क्यों सहती हो? क्यों नहीं बगावत कर देतीं? सबकुछ जानते हुए भी लोग पूछते हैं, ‘‘शुभदा तुम्हारी बूआ है? मन करता है सब का मुंह नोच लूं. अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा. तुम यहां नहीं रहोगी.’’

मां निशब्द बैठी मन की पीड़ा, अपनी बेबसी को आंखों की राह बहे जाने दे रही थी. बच्चे दुख पाते हैं तो मां पर उबल पड़ते हैं. वह किस पर उबले? नियति तो उस की जिंदगी में पगपग पर मुंह चिढ़ा रही थी. बेटी साधना डिलीवरी के लिए आई हुई थी. उस के पति ने लेने आने को लिखा तो उस ने घर में शुभदा की उपस्थित को देख, कुछ रुक कर आने को लिख दिया था. ससुराल में मायका चर्चा का विषय बने, यह कोईर् लड़की नहीं चाहती. उसी स्थिति से बचने का वह हर प्रयत्न कर रही थी. पर इतनी लंबी अवधि के विरह से तपता पति अपनी पत्नी को विदा कराने आ ही पहुंचा.

शुभदा का स्थान घर में क्या है, यह उस से छिपा न रह सका. स्थिति को भांप कर ही चतुर विवेक ने विदा होते समय सास और ससुर के साथसाथ शुभदा के भी चरण स्पर्श कर लिए. पत्नी गुस्से से तमतमाती हुई कार में जा बैठी और जब विवेक आया तो एकदम गोली दागती हुई बोली, ‘‘तुम ने उस के पैर क्यों छुए?’’ पति ने हंसते हुए चुटकी ली, ‘‘अरे, वह भी मेरी सास है.’’

साधना रास्तेभर गुमसुम रही. बहुत दिनों बाद सुना था आशीष ने मां को अपने साथ चलने के लिए बहुत मनाया था पर वह किसी भी तरह जाने को राजी नहीं हुई. लक्ष्मणरेखा उन्हें उसी घर से बांधे रही.

आंतरिक साहस के अभाव में ही मिसेज राजीव उसी घर से पति के साथ बंधी हैं. रातभर छटपटाती हैं, कुढ़ती हैं, फिर भी प्रेमिका को सह रही हैं सुबहशाम की दो रोटियों और रात के आश्रय के लिए. वे डरपोक हैं. समाज से डरती हैं, संस्कारों से डरती हैं, इसीलिए उन्होंने जिंदगी से समझौता कर लिया है. सुना था, इतनी असीम सहनशक्ति व धैर्य केवल पृथ्वी के पास ही है पर मेरे सामने तो मिसेज राजीव असीम सहनशीलता का साक्षात प्रमाण है.

Romantic Story: थोड़ी सी जमीन, सारा आसमान

Romantic Story: फरहा 5 सालों के बाद अपने शहर आ रही थी. प्लेन से बाहर निकलते ही उस ने एक लंबी सांस ली मानों बीते 5 सालों को इस एक सांस में जी लेगी. हवाईअड्डा पूरी तरह बदला दिख रहा था. बाहर निकल उस ने टैक्सी की और पुश्तैनी घर की तरफ चलने को कहा, जो हिंदपीढ़ी महल्ले में था.

5 सालों में शहर ने काफी तरक्की कर ली, यह देख फरहा खुश हो रही थी. रास्ते में कुछ मौल्स और मल्टीप्लैक्स भी दिखे. सड़कें पहले से साफ और चौड़ी दिख रही थीं. जींस और आधुनिक पाश्चात्य कपड़ों में लड़कियों को देख उसे सुखद अनुभूति होने लगी. कितना बदल गया है उस का शहर. उसे रोमांच हो आया.

रेहान सो चुका था. फरहा ने भी पीठ सीट पर टिका टांगों को थोड़ा फैला दिया. लंबी हवाईयात्रा की थकावट महसूस हो रही थी. आज सुबह ही सिडनी, आस्ट्रेलिया से वह अपने बेटे के साथ दिल्ली पहुंची थी. आना भी जरूरी था. 1 हफ्ते पहले ही अब्बू रिटायर हो कर अपने घर लौटे थे. अब सब कुछ एक नए सिरे से शुरू करना था. भले शहर अपना था पर लोग तो वही थे. इसी से फरहा कुछ दिनों के लिए अम्मांअब्बू के पास रहने चली आई थी ताकि घरगृहस्थी को नए सिरे से जमाने में उन की मदद कर सके.

तभी टैक्सी वाले ने जोर से ब्रेक लगाए तो उस की तंद्रा भंग हुई. उस ने देखा कि टैक्सी हिंदपीढ़ी महल्ले में प्रवेश कर चुकी है. बुरी तरह से टूटीफूटी सड़कों पर अब टैक्सी हिचकोले खा रही थी. उस ने खिड़की के शीशे को नीचे किया. एक अजीब सी बू टैक्सी के अंदर पसरने लगी. किसी तरह अपनी उबकाई को रोकते हुए उस ने झट से शीशा चढ़ा दिया. शहर की तरक्की ने अभी इस महल्ले को छुआ भी नहीं है. सड़कें और संकरी लग रही थीं. इन सालों में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए छोटेछोटे घरों ने भूलभुलैया बना दिया था महल्ले को. उस के अब्बा का दोमंजिला मकान अलबत्ता सब से अलग दिख रहा था.

अब्बा और अम्मां बाहर ही खड़े थे.

‘‘तुम ने अपना फोन अभी बंद कर रखा है. राकेश तब से परेशान है कि तुम पहुंची या नहीं?’’ मिलते ही अब्बू ने पहले अपने दामाद की ही बातें कीं.

अचानक महसूस हुआ कि बंद खिड़कियों की दरारों से कई जोड़ी आंखें झांकने लगी हैं.

फ्रैश हो कर फरहा आराम से हाथ में चाय का कप पकड़े घर का, महल्ले का और रिश्तेदारों का मुआयना करने लगी.

एक 22-23 साल की लड़की सलमा फुरती से सारे काम निबटा रही थी.

‘‘कैसा लग रहा है अब्बू अपने घर में आ कर? अम्मां पहले से कमजोर दिख रही हैं. पिछले साल सिडनी आई थीं तो बेहतर थीं,’’ फरहा ने पूछा.

एक लंबी सांस लेते हुए अब्बू ने कहा, ‘‘कुछ भी नहीं बदला यहां. पर हां घर में बच्चे न जाने कितने बढ़ गए हैं… लोफर कुछ ज्यादा दिखने लगे हैं गलियों में. लड़कियां आज भी उन्हीं बेडि़यों में कैद हैं, जिन में उन की मांएं या नानियां जकड़ी रही होंगी. तुम्हारी शादी की बात अलबत्ता लोग अब शायद भूल चले हैं.’’

फरहा ने कमरे में झांका. नानीनाती आपस में व्यस्त दिखे.

‘‘अब्बू, मुझे लग रहा था न जाने रिश्तेदार और महल्ले वाले आप से कैसा व्यवहार करें. मुझे फिक्र हो रही थी आप की, इसलिए मैं चली आई. अगले हफ्ते राकेश भी आ रहे हैं.’’

फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘फूफी के क्या हाल हैं?’’ और फिर फरहा अब्बू के पास आ कर बैठ गई.

‘‘अब छोड़ो भी बेटा. जो बीत गई सो बात गई. जाओ आराम करो. सफर में थक गई होगी,’’ कह अब्बू उठने लगे.

फरहा जा कर अम्मां के पास लेट गई. बीच में नन्हा रेहान नींद में मुसकरा रहा था.

पर आज नींद आ रही थी. कमरे में चारों तरफ जैसे यादों के फूल और शूल उग आए हों… जहां मीठी यादें दिल को सहलाने लगीं, वहीं कड़वी यादें शूल बन नसनस को बेचैन करने लगीं…

अब्बा सरकारी नौकरी में उच्च पद पर थे. हर कुछ सालों में तबादला निश्चित था. काफी छोटी उम्र से ही फरहा को होस्टल में रख दिया गया था ताकि उस की पढ़ाई निर्बाध चले. अम्मां हमेशा बीमार रहती थीं पर अब्बूअम्मां में मुहब्बत गहरी थी. अब्बू उस वक्त पटना में तैनात थे. उन्हीं दिनों फूफी उन के पास गई थी. अब्बू का रुतबा और इज्जत देख उस के दिल पर सांप लोट गया और फिर फूफी ने शुरू किया अब्बू के दूसरे निकाह का जिक्र, अपनी किसी रिश्ते की ननद के संग. अम्मां की बीमारी का हवाला दे पूरे परिवार ने तब खूब अपनापन दिखा, रजामंदी के लिए दबाव डाला था. अब्बू ने बड़ी मुश्किल से इन जिक्रों से पिंड छुड़ाया था. भला पढ़ालिखा आदमी ऐसा सोच भी कैसे सकता है. ये सारी बातें अम्मां ने फरहा को बड़ी होने पर बताई थीं. उसे फूफी और घर वालों से नफरत हो गई थी कि कैसे वे उस के वालिद और वालिदा का घर उजाड़ने को उतारू थे.

फरहा के घर का माहौल उस के रिश्तेदारों की तुलना में बहुत भिन्न था. उस के अब्बू की सोच प्रगतिशील थी. वह अकेली संतान थी और उस के अब्बू उस के उच्च तालीम के जबरदस्त हिमायती थे. उस से छोटी उस की चचेरी और मौसेरी बहनों का निकाह उस से पहले हो गया था. जब भी कोई पारिवारिक आयोजन होता उस के निकाह के चर्चे ही केंद्र में होते. यह तो अब्बू की ही जिद थी कि उसे इंजीरियरिंग के बाद नौकरी नहीं करने दी, बल्कि मैनेजमैंट की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया.

जब वह इंजीनियरिंग के फाइनल वर्ष में था तो फूफी फिर घर आई थी. आते ही अम्मां से फरहा की बढ़ती उम्र का जिक्र शुरू कर दिया, ‘‘भाभी जान, मैं कहे देती हूं कि फरहा की उम्र इतनी हो गई है कि अब जानपहचान में उस के लायक कोई कुंआरा लड़का नहीं मिलेगा. भाईजान की तो अक्ल ही मारी गई है… भला लड़कियों को इतनी तालीम की क्या जरूरत है? असल मकसद उन की शादी है. अब देखो मेरा बेटा फीरोज कितना खूबसूरत और गोराचिट्टा है. जब से दुबई गया है खूब कमा भी रहा है… दोनों की जोड़ी खूब जमेगी.’’

बेचारी अम्मा रिश्तेदारों की बातों से पहले ही हलकान रहती थीं, फूफी की बातों ने उन के रक्तचाप को और बढ़ा दिया. वह तो अब्बूजी ने जब सुना तो फूफी को खूब खरीखटी सुनाई.

‘‘क्यों रजिया तुम ने क्या मैरिज ब्यूरो खोल रखा है… कभी मेरी तो कभी मेरी बेटी की चिंता करती रहती हो? इतनी चिंता अपने बड़े लाड़ले की की होती तो उसे 10वीं फेल हो दुबई में पैट्रोल पंप पर नौकरी नहीं करनी पड़ती. फरहा की तालीम अभी अधूरी है. मेरी प्राथमिकता उस की शादी नहीं तालीम है.’’

फूफी उस के बाद रुक नहीं पाई थी. हफ्तों रहने की सोच कर आने वाली फूफी शाम की ही बस से लौट गई.

सोचतेसोचते फरहा को कब नींद आ गई उसे पता नहीं चला.

सुबह रेहान की आवाज से उस की नींद खुली.

‘‘फरहा बाजी आप उठ गईं? चाय लाऊं?’’ मुसकराती सलमा ने पूछा.

चाय का कप पकड़े सलमा उस के पास ही बैठ गई. फरहा ने महसूस किया कि वह उसे बड़े ध्यान से देख रही है.

‘‘बाजी, अब तो आप सिंदूर लगाने लगी होंगी और बिंदिया भी? क्या आप अभी भी रोजे रखती हैं? क्या आप ने अपने नाम को भी बदल लिया है?’’

सलमा की इन बातों पर फरहा हंस पड़ी. बोली, ‘‘नहीं, मैं तो बिलकुल वैसी ही हूं जैसी थी. वही करती हूं जो बचपन से करती आ रही… तुम्हें ऐसा क्यों लगा?’’

‘‘जी, कल मैं जब काम कर लौटी तो महल्ले में सब पूछ रहे थे… आप ने काफिर से शादी की है?’’ सलमा ने मासूमियत से पूछा.

फरहा के अब्बू ने फूफी को तो लौटा दिया था. पर विवाद थमा नहीं था. आए दिन उस की तालीम बढ़ती उम्र और निकाह पर चर्चा होने लगी. धीरेधीरे अब्बू ने अपने पुश्तैनी घर आना कम कर दिया. फरहा अपनी मैनेजमैंट की पढ़ाई के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ कालेज के लिए चुनी गई. अब्बू के चेहरे का सुकून ही उस का सब से बड़ा पारितोषिक था. कालेज में यों ही काफी कम लड़कियां थीं पर मुसलिम लड़की वह अकेली थी अपने बैच में. फरहा काफी होनहार थी. कालेज में बहुत सारी गतिविधियां होती रहती थीं और वह सब में काफी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती. सब उस के कायल थे.

इसी दौरान राकेश के साथ उसे कई प्रोजैक्ट पर काम करने को मिला. उस की बुद्धिमानी और शालीनता धीरेधीरे फरहा को आकर्षित करने लगी. संयोग से दोनों साथ ही समर इंटर्नशिप के लिए एक ही कंपनी के लिए चुने गए. नए शहर में उन 2 महीनों में दिल की बातें जबान पर आ ही गईं. दुनिया इतनी हसीं कभी न थी.

इंटर्नशिप के बाद फरहा 1 हफ्ते के लिए अब्बूअम्मां से मिलने दिल्ली चली गई. अब्बू की पोस्टिंग उस वक्त वहीं थी. अब्बू काफी खुश दिख रहे थे.

‘‘फरहा कुछ महीनों में तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो जाएगी. मेरे मित्र रहमान अपने सुपुत्र के लिए तुम्हारा हाथ मांग रहे हैं. मुझे तो उन का बेटा और परिवार सब बहुत ही पसंद है. पर मैं ने कह रखा है कि फैसला मेरी बेटी ही लेगी.’’

उस एक पल में फरहा की नसनस में तूफान सा गुजर गया. फिर खुद को संयत करते हुए उस ने कहा, ‘‘आप जो फैसला लेंगे वह सही होगा अब्बूजी.’’

‘‘शाबाश बेटा, तुम ने मेरी लाज रख ली. सब कहते थे कि इतना पढ़लिख कर तुम भला मेरी बात क्यों मानोगी. मैं जानता था कि मेरी बेटी मुझ से अलग नहीं है. मैं कल ही रहमान को परिवार के साथ खाने पर बुलाता हूं.’’

सपना देखना अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि नींद खुल गई. फरहा रात भर रोती रही.

बहते अश्कों ने बहुत सारे संशय सुलझा लिए. राकेश और वह नदी के 2 किनारे हैं. फरहा ने सोचा कि यह तो अच्छा हुआ कि उस ने अब्बूजी को अपनी भावनाओं के बारे में नहीं बताया. वैसे ही वे घरसमाज से लड़ मुझे उच्च तालीम दिला रहे हैं. अगर मैं ने एक हिंदू काफिर से ब्याह की बात भी की, तो शायद आने वाले वक्त में अपनी बेटीबहन को मेरी मिसाल दे उन से शिक्षा का हक भी छीना जाए. उसे सिर्फ अपने लिए नहीं सोचना चाहिए… फरहा मन को समझाने लगी.

दूसरे दिन ही रहमान साहब अपने सुपुत्र और बीबी के साथ तशरीफ ले आए. ऐसा लग रहा था मानो सिर्फ औपचारिकता ही पूरी हो रही है. सारी बातें पहले से तय थीं.

‘‘समीना, आज मुझे लग रहा है कि मैं ने फरहा के प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियों को लगभग पूरा कर लिया है… आज मैं बेहद खुश हूं. निकाह फरहा की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही करेंगे. तभी सारे रिश्तेदारों को बताएंगे,’’ अब्बू अम्मां से कह रहे थे.

2 दिन बाद फरहा अपने कालेज अहमदाबाद लौट गई. लग रहा था राकेश मिले तो उस के कंधे पर सिर रख खूब रोए. पर राकेश सामने पड़ा तो वह भी बेहद उदास और उलझा हुआ सा दिखा. फरहा अपना गम भुला राकेश के उतरे चेहरे के लिए परेशान हो गई.

‘‘फरहा, मैं ने घर पर तुम्हारे बारे में बात की. पर तुम्हारा नाम सुनते ही घर में बवाल मच गया. मैं ने भी कह दिया है कि मैं तुम्हें छोड़ किसी और से शादी कर ही नहीं सकता.

इस बार सब से लड़ कर आया हूं,’’ राकेश ने कहा तो फरहा ने भी कहा कि उस की हालत भी बकरीद पर हलाल होने वाले बकरे से बेहतर नहीं.

वक्त गुजरा. फरहा और राकेश दोनों की नौकरी दिल्ली में ही लगी. दोनों अब तक मान चले थे कि एक हिंदू लड़का और मुसलिम लड़की की शादी मुकम्मल हो ही नहीं सकती.

फरहा के निकाह की तारीख कुछ महीनों बाद की ही थी. एक दिन फरहा अपने अब्बू और अम्मां के साथ कार से गुड़गांव की तरफ जा रही थी कि सामने से आते एक बेकाबू ट्रक ने जोर से टक्कर मार दी. तीनों को गंभीर चोटें आईं. बेहोश होने से पहले फरहा ने राकेश को फोन कर दिया था.

अब्बू और अम्मां को तो हलकी चोटें आईं पर फरहा के चेहरे पर काफी चोटें आई थीं. नाक और ठुड्डी की तो हड्डी ही टूट गई थी. पूरे चेहरे पर पट्टियां थीं.

रहमान साहब और उन का परिवार भी आया हौस्पिटल उसे देखने. सब बेहद अफसोस जाहिर कर रहे थे. उस के होने वाले शौहर ने जब सब के सामने ही डाक्टर से पूछा कि क्या फरहा पहले की तरफ ठीक हो जाएगी तो डाक्टर ने कहा कि इस की उम्मीद बहुत कम है कि वह पहले वाला चेहरा वापस पा सकेगी. हां, शरीर का बाकी हिस्सा बिलकुल स्वस्थ हो जाएगा… प्लास्टिक सर्जरी के बाद कुछ बदलावों के साथ वह एक नया चेहरा पा सकेगी, जिस में बहुत वक्त लगेगा.

वह दिन और आज का दिन रहमान परिवार फिर मिलने भी नहीं आया, अलबत्ता निकाह तोड़ने की खबर जरूर फोन पर दे दी.

दुख की घड़ी में उन का यों रिश्ता तोड़ देना बेहद पीड़ादायक था. अब्बू अम्मां उतना दुर्घटना से आहत नहीं हुए थे, जितना उन के व्यवहार से हुए. यह तो अच्छा था कि किसी रिश्तेदार को खबर नहीं हुई थी वरना और भद्द होती. फिलहाल, सवाल फरहा के ठीक होने का था. इस बीच राकेश उन का संबल बना रहा. हौस्पिटल, घर, औफिस और फरहा के अब्बू अम्मां सब को संभालता. वह उन के घर का एक सदस्य सा हो गया.

उस दिन अब्बू ने हौस्पिटल के कमरे के बाहर सुना, ‘‘फरहा प्लीज रो मत. तुम्हारी पट्टियां कल खुल जाएंगी. मैं हूं न. मैं तुम्हारे लिए जमीन आसमान एक कर दूंगा. जल्द ही तुम औफिस जाने लगोगी.’’

‘‘अब मुझ से कौन शादी करेगा?’’ यह फरहा की आवाज थी.

‘‘बंदा सालों से इंतजार कर रहा है. अब तो मां भी हार कर बोलने लगी हैं कि कुंआरा रहने से बेहतर है जिस से मन हो कर लो शादी… पट्टियां खुलने दो… एक दिन मां को ले कर आता हूं.’’

राह के कांटे धीरेधीरे दूर होते गए. राकेश के घर वाले इतनी होनहार और उच्च शिक्षित बहू पा कर निहाल थे. उस के गुणों ने उस के दुर्घटनाग्रस्त चेहरे के ऐब को ढक दिया था. पहले से तय निकाह की तारीख पर ही दोनों की कोर्ट मैरिज हुई और फिर हुआ एक भव्य रिसैप्शन समारोह, जिस में दोनों तरफ के रिश्तेदारों को बुलाया गया. दोनों ही तरफ से लोग न के ही बराबर शामिल हुए. हां, दोस्त कुलीग सब शामिल हुए. कुछ ही दिनों के बाद राकेश की कंपनी ने उसे सिडनी भेज दिया. दोनों वहीं चले गए और खूब तरक्की करने लगे.

फरहा की शादी के बाद अब्बू एक बार अपने शहर, अपने घर गए थे. महल्ले के लोगों ने उन की खूब खबर ली. कुछ बुजुर्ग लोगों ने उन्हें डांटा भी. रात में उन के घर पर पथराव भी किया. किसी तरह पुलिस बुला अब्बू और अम्मां घर से निकल पाए थे.

‘‘अब्बूजी, आप किस से बातें कर रहे थे?’’ फरहा ने पूछा.

‘‘अरे, तुम्हारी फूफी जान थी. बेचारी आती रहती है मुझ से मदद लेने. बेटे तो उस के सारे नालायक हैं. कोई जेल में तो कोई लापता. बेचारी के भूखों मरने वाले दिन आ गए हैं,’’ अब्बूजी ने कहा.

‘‘फरहा उस रात हमारे घर पर इसी ने पथराव करवाया था… अपने लायक बेटों से. हम ने तुम्हारी शादी इस के बेटे से जो नहीं कराई थी. सारे महल्ले वालों को भी इस ने ही उकसाया था. बहुत साजिश की इस ने हिंदू लड़के से तुम्हारी शादी करने के हमारे फैसले के खिलाफ,’’ अम्मा ने हंसते हुए कहा.

‘‘यह जो सलमा है न. इस वर्ष वह 10वीं कक्षा की परीक्षा दे रही है. वह भी तुम्हारी तरह तालीमयाफ्ता होने की चाहत रखती है.’’

‘‘सिर्फ मैं ही क्यों महल्ले की हर लड़की आप के जैसी बनना चाहती है,’’ यह सलमा थी, ‘‘काश, सब के अब्बू आप के अब्बू जितने समझदार होते,’’ कह सलमा फरहा के गले लग गई.

Social Media Lifestyle: इन्फ्लुएंसर्स औफ द मंथ

Social Media Lifestyle: फैशन, न्यूज, अपडेट्स, टैकक्नोलौजी, हैल्थ, साइंस, एजुकेशनल पोस्ट्स और दुनियाभर का कंटैंट सोशल मीडिया प्लेटफौर्म इंस्टाग्राम पर देखने को मिलता है. इंस्टाग्राम पर कंटैंट क्रिएट करने वाले क्रिएटर्स अपनी बीट पर आएदिन नए और इनोवेटिव वीडियोज शेयर करते हैं, जिस की बदौलत बड़ी संख्या में लोग उन्हें फौलो करने लगते हैं. ऐसे ही कुछ क्रिएटर्स का जिक्र यहां कर रहे हैं जो इस महीने काफी चर्चा में रहे.

प्रखर गुप्ता (प्रखर के प्रवचन)

प्रखर अपने रियल और अनफिल्टर पौडकास्ट के लिए काफी फेमस हो चुका है. उस के पौडकास्ट ट्रैंडी और सीरियस टौपिक पर बेस्ड होते हैं. प्रखर सद्गुरु, समय रैना और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल समेत कई पौपुलर लोगों के साथ पौडकास्ट कर चुका है.

काव्या कर्नाटक (केके क्रिएट)

काव्या सोशल मीडिया पर किसी विशेष जगह की जियोग्राफी, हिस्ट्री और कल्चर के बारे में कंटैंट पेश करती है. उस के रिसर्च कंटैंट में राजस्थान के जलसंकट से ले कर भारत के सब से बड़े कोयला उत्पादक जिले झारखंड के धनबाद तक कई विषय शामिल हैं. काव्या के कंटैंट में औथेंटिसिटी के चलते लाखों लोग उसे फौलो कर रहे हैं.

अंकुर अगरवाल (अंकुर अगरवाल वाइंस)

अंकुर इंस्टाग्राम पर शार्ट फौर्मेट में फनी रिलेटेबल कंटैंट बना कर पोस्ट करता है. वह आसपास मौजूद लोगों को केंद्र में रख कर उन पर वीडियो बनाता है, जैसे हलवाई, मिस्त्री, टैंट वाला आदि. कमैंट सैक्शन में उस की वीडियो देखने वाले लोग बताते हैं कि वह अंकुर की वीडियो से काफी रिलेट करता है.

राज शमानी

राज शमानी भारत के टौप पौडकास्टर्स में से एक है. वह फिगरिंग आउट नाम का पौडकास्ट चलाता है, जिस में वह ऐक्टर्स से ले कर टौप एंटरप्रेन्योर्स से बातचीत करता है. उस के कंटैंट को हजारों लोग कंज्यूम करते हैं.

वेदिका खत्री (वेद्स की बातें)

वेदिका एक कौर्पोरेट एंप्लौइ है. वह अपने इंस्टाग्राम पर फनी और रिलेटेबल कंटैंट परोसती है. उस की हर वीडियो पर लाखों में व्यूज आते हैं.

रेवंत हिमात्सिंगका (फूड फार्मर)

रेवंत हिमात्सिंगका, जिसे फूडफार्मर के नाम से बेहतर जाना जाता है, अपनी वीडियोज में पैक्ड फूड की झूठी एड को औडियंस के साथ साझा करता है. उस के हैल्थ रिलेटेड कंटैंट को बड़ी संख्या में लोग देखते हैं.

शमिता यादव (द रैंटिंग गोला)

शमिता यादव उर्फ रैंटिंग गोला, प्रो-गर्वनमैंट को निशाना बना कर बेधड़क वीडियोज शेयर करने के लिए काफी फेमस है. कुनाल कामरा केस के बाद शमिता अपने और भी तीखे तेवर के साथ कंटैंट परोसने लगी है. फैंस को उस का यह अंदाज काफी पसंद आ रहा है.

कहीं सोशल मीडिया पर ही न रह जाएं Avneet Kaur

Avneet Kaur: अवनीत कौर हीरोइन, डांसर और एक मौडल है. इन्होंने टैलीविजन और फिल्मों में अपनी पहचान बनाई है. अवनीत 13 अक्तूबर, 2001 को पंजाब के जालंधर शहर में जन्मीं. इन्होंने मात्र 8 वर्ष की आयु में ही अपने कैरियर की शुरुआत ‘डांस इंडिया डांस लिटिल मास्टर्स’ में एक प्रतियोगी के रूप में की थी. बाद में इन्होंने ‘डांस के सुपरस्टार’ में भी भाग लिया. इन्होंने ‘मेरी मां’ में झिलमिल की भूमिका निभाने के साथ अभिनय की दुनिया में कदम रखा. इस के बाद ‘सावित्री’ में युवा राजकुमारी दमयंती और ‘एक मुट्ठी आसमान’ में युवा पाखी की भूमिका निभाई.

इन्होंने 2014 में फिल्म ‘मर्दानी’ में मीरा की भूमिका से फिल्मी कैरियर की शुरुआत की. इस के अलावा अवनीत ‘चंद्र नंदिनी’ में चारूमती और ‘अलादीन नाम तो सुना होगा’  में राजकुमारी यास्मीन की भूमिकाओं के लिए जानी जाती हैं.

24 वर्ष की अवनीत ने बौलीवुड मूवी ‘मर्दानी’ के अलावा ‘करीबकरीब सिंगल’ और ‘एकता’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है. वे अपनी लास्ट फिल्म ‘टीकू वेड्स शेरू’ में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ नजर आईं, जिस में दोनों की जोड़ी को खूब ट्रोल किया गया था.

सितंबर 2024 में अवनीत कौर ने क्रिकेटर शुभमन गिल को उन के जन्मदिन पर इंस्टाग्राम स्टोरी के माध्यम से बधाई दी थी, जिस से उन के अफेयर की अफवाहे उड़ीं. हालांकि, दोनों में से किसी ने भी इन अफवाहों की पुष्टि नहीं की है.

अवनीत कौर एक सफल मौडल भी हैं और उन्होंने कई विज्ञापनों व फोटो शूट्स में हिस्सा लिया है. उन की ग्लैमरस तसवीरें सोशल मीडिया पर अकसर वायरल होती हैं.

इंस्टाग्राम पर ये काफी ऐक्टिव हैं और रैग्यूलर अपनी फोटोज व वीडियोज शेयर कररती हैं. इन के इंस्टाग्राम पर लाखों फौलोअर्स हैं जो इन की हर पोस्ट का बेसब्री से इंतजार करते हैं. हाल ही में इन्होंने लंदन में अपनी छुट्टियों की तसवीरें शेयर कीं जिन में वे ब्लैक ड्रैस में स्टाइलिश पोज देती नजर आईं.

इस के अलावा अवनीत ने मिनी स्कर्ट में अपने टोंड लेग्स फ्लौंट करते हुए कुछ फोटोज पोस्ट की हैं जो उन के फैंस को बेहद पसंद आई हैं. एक अन्य पोस्ट में उन्होंने ग्रीन कलर की शौर्ट ड्रैस और एनिमल प्रिंट बूट्स में अपनी फोटोज शेयर की हैं, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं.

अवनीत के ये इंस्टाग्राम पोस्ट्स न केवल उन के फैशन सैंस को प्रदर्शित करते हैं बल्कि उन के फैंस के साथ उन के जुड़ाव को भी शो करते हैं, जो उन की हर पोस्ट पर कमैंट करते हैं.

अवनीत कौर के कैरियर की प्रोग्रैस और टैलेंट तारीफ के काबिल है लेकिन कुछ क्रिटिक मानते हैं कि उन की अभिनय क्षमता में और सुधार की गुंजाइश है. उन के एक्सप्रेशंस और डायलौग डिलीवरी में गहराई की कमी देखी जाती है. उन के द्वारा किए गए कुछ टीवी शोज और फिल्मों की स्क्रिप्ट मजबूत नहीं रहीं, जिस से उन का कैरियर ग्राफ उतना तेजी से नहीं बढ़ा जितना उन के साथ काम करने वाले कोस्टार्स के.

इस के अलावा उन की सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रियता को कुछ लोग नार्सिसिज्म के रूप में देखते हैं. वे सोशल मीडिया पर अधिकतर अपनी बोल्ड और ग्लैमरस फोटोज शेयर करती हैं जिस से कई बार यह लगता है कि वे अपनी ऐक्टिंग से ज्यादा लुक्स पर फोकस कर रही हैं.

इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफौर्म्स पर जरूरत से ज्यादा ऐक्टिव रहने से उन की इमेज एक सीरियस ऐक्ट्रैस के बजाय एक सोशल मीडिया स्टार के रूप में बन रह गई है. वे काफी समय से फिल्मों से दूर हैं और सोशल मीडिया पर ही नजर आ रही हैं. इसे उन के ऐक्ट्रैस से इन्फ़्लुएंसर बनने के ग्राफ के तौर पर देखा जा सकता है.

हालांकि अवनीत कौर मेहनती हैं लेकिन अगर वे अपनी ऐक्टिंग स्किल को इंम्प्रूव करें, उसी पर ध्यान दें और प्रोजैक्ट्स को सोचसमझ कर चुनें तो एक बेहतर स्टार के रूप में उभर सकती हैं.

Family Problem: मेरा छोटा भाई गलत संगत में जा रहा है, उसे कैसे रोकूं?

Family Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 29 साल की लड़की हूं और मिर्जापुर में रहती हूं. मेरे मांबाप का देहांत पिछले साल एक कार एक्सीडैंट में हो गया था जिस के बाद मैं ने अपने छोटे भाई को एक मां की तरह प्यार देने की कोशिश की है. मेरा भाई 22 साल का है और उसे ऐसा लगने लगा है कि मांबाप के बाद अब उसे आजादी मिल गई है. मैं ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन धीरेधीरे उसने मेरी बात सुनना ही बंद कर दिया है. मैं ने अपने भाई के लिए अभी तक शादी नहीं की, क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि अगर मैं इस घर से चली गई तो उस की देखभाल करने के लिए कोई नहीं होगा और वह और भी ज्यादा बिगड़ जाएगा. मैं बहुत ही मुश्किल से एक जौब कर के घर चला पाती हूं, लेकिन मैं जब औफिस जाती हूं, तो पीछे से मेरा भाई अपने दोस्तों को घर पर बुला कर ऐयाशी करने लगता है. हाल ही में मुझे पता चला है कि उस ने शराब और सिगरेट पीना भी शुरू कर दिया है. मैं उसे सुधारने के लिए क्या करूं?

जवाब –

आप की बातों से लग रहा है कि आप अपने भाई को ले कर काफी चिंतित हैं और एक बड़ी बहन होने का फर्ज आप बहुत ही अच्छे ढंग से निभा रही हैं. सब से पहले को आप अपने भाई को अपने घर के हालात समझाइए और उसे एहसास कराइए कि आप बहुत ही मुश्किल से घर के खर्चे संभाल रही हैं और ऐसे में अगर उसे नशा करने की आदत लग जाएगी, तो घरखर्च चलाना भी मुश्किल हो जाएगा.

अगर फिर भी आप का भाई आप की बात नहीं सुनता है, तो आप उस के नशेड़ी दोस्तों को धमकाइए कि वे आप के घर न आया करें और न ही आप के भाई को घर पर बुलाया करें. आप अपने भाई के दोस्तों को पुलिस की धमकी भी दे सकती हैं, क्योंकि अगर अनजान लड़कों को आप के घर पर आने की आदत लग गई, तो वे आप के साथ भी कुछ गलत कर सकते हैं.

लास्ट औप्शन आप के पास यह बचता है कि अगर उस के दोस्त भी आप की बात नहीं सुनते हैं तो एक बार आप उन के घर जा कर उन की शिकायत उन के मातापिता से करें. अगर जरूरत पड़े तो आप पुलिस का सहारा भी ले सकती हैं, क्योंकि ऐसी चीजें अगर शुरुआत में ही रोक दी जाएं, तो बेहतर रहता है, नहीं तो कल को आप को भी नुकसान हो सकता है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें.

Misha Agrawal Suicide: फौलोवर्स न बटोर पाने की हताशा

Misha Agrawal Suicide: “मेरी छोटी बहन ने आसपास ही अपनी पूरी दुनिया बसा ली थी. उस का एक मिलियन फौलोअर्स पूरा करने का सपना था, लेकिन उस के फौलोअर्स की संख्या कम होने लगी थी. वह उस समय परेशान हो गई थी और खुद को बेकार समझने लगी थी. वह हद से ज्यादा डिप्रैशन में थी और कहती थी कि मेरे फौलोअर्स कम हो गए, तो मैं फिर क्या करूंगी. वह फौलोअर्स की दुनिया में इतनी खो गई कि उस ने अपनी जान ले ली और हमारा परिवार टूट गया.”

ये लाइनें सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मिशा अग्रवाल के परिवार की हैं जिस ने हाल ही में चंद फौलोअर्स के लिए अपने जान की कीमत लगा दी और 30 अप्रैल को सुसाइड कर लिया.

एक जानीपहचानी इन्फ्लुएंसर, मिशा अग्रवाल ने खुदकुशी कर ली. महज 23 साल की उम्र में, जब जिंदगी के सपने बुनने की उम्र होती है, मिशा ने अपनी जान ले ली. उस की बहन के मुताबिक, मिशा पिछले कुछ हफ्तों से बहुत परेशान थी, वजह? उस के इंस्टाग्राम फौलोअर्स कम हो रहे थे. पोस्ट पर पहले जितने लाइक्स नहीं आते थे. वह खुद को बेकार समझने लगी थी.

मिशा की कहानी सिर्फ एक इन्फ्लुएंसर की कहानी नहीं है. ये उस खतरनाक जाल की कहानी है, जिस में आज का युवा फंस रहा है. सोशल मीडिया ने हमें एक ऐसी दुनिया में धकेल दिया है, जहां हमारी कीमत हमारी पोस्ट के लाइक्स, कमेंट्स और फौलोअर्स की संख्या से तय होती है.

अब यह सुन कर कोई कह सकता है “अरे, फौलोअर्स ही तो थे” या “इस में जान देने की क्या बात थी?” लेकिन शायद हम उस दुनिया को नहीं समझते जिस में आज का युवा जी रहा है. सोशल मीडिया पर पहचान बनाना, वहां की दुनिया में “कूल” दिखना और हर रोज कुछ नया, बेहतर, सुंदर दिखाना ये सब आज एक तरह से फुल टाइम जौब और आत्मसम्मान दोनों बन गया है.

मिशा अग्रवाल की तरह कई इन्फ्लुएंसर्स के लिए फौलोअर्स की संख्या सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि उन की पूरी जिंदगी का मकसद बन जाती है. उन की बहन ने बताया कि मिशा ने अपने फोन के वालपेपर पर “1 मिलियन सून, कीप गोइंग” लिख रखा था, जो दिखाता है कि वो इस लक्ष्य के लिए कितनी दीवानी थी.

सोशल मीडिया की चमक और उस का प्रैशर

जब सोशल मीडिया की शुरुआत हुई थी, तब ये बस एक मजेदार जरिया था दोस्तों से जुड़ने का. लेकिन धीरेधीरे ये एक ऐसी दुनिया बन गई, जहां हर किसी को खुद को साबित करना होता है अपने कपड़ों से, घूमने की जगहों से, खाना, पार्टियां, रिलेशनशिप. हर चीज एक ‘कंटैंट’ बन चुकी है. लोग अब वैसा नहीं जीते जैसे उन्हें जीना है, बल्कि वैसा जीते हैं जैसा दिखाना है. एक फोटो में मुसकराते हुए इंसान के पीछे कितनी उदासी छुपी है, ये कोई नहीं देखता.

किसी पोस्ट पर आज 1000 लाइक्स आ जाएं तो दिल कहता है थोड़ा और थोड़ा और. टैक्निक्ली देखा जाए तो 1000 लाइक्स भी कुछ कम नहीं इस का यह मतलब हुआ कि हजार लोगों ने आप की फोटो को लाइक किया लेकिन सोशल मीडिया की इस भ्रामक दुनिया में मिलियन से नीचे कोई बात नहीं करता.

मिलियन लाइक्स का मतलब हुआ आप को अच्छा रिस्पांस मिल रहा है. लोग आप के कंटैंट को पसंद कर रहे हैं. इस से क्रिएटर को डोपामाइन बूस्ट मिलता है. इस का मतलब लगभग सभी ने अपनी खुशी का रिमोट सोशल मीडिया को थमाया हुआ है. अगर लाइक्स मिले तो खुश नहीं तो पूरा दिन खराब. ये हम सब के साथ होता है. लोग सोशल मीडिया को ही अपना कैरियर बना लेते हैं, उन के लिए ये सिर्फ मूड की बात नहीं, बल्कि पहचान की बात हो जाती है.

क्रिएटर बर्नआउट

बहुत से कंटेंट क्रिएटर्स रोजाना 3-4 पोस्ट, स्टोरीज, वीडियो अपलोड करते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर मैं ने एक दिन कुछ नहीं डाला, तो मेरे फौलोअर्स कम हो जाएंगे. क्रिएटर बर्नआउट एक असली समस्या है. 2021 में यूट्यूब ने अपने इंटरनल सर्वे में पाया कि “60% से ज्यादा कंटेंट क्रिएटर्स ने माना कि वे लगातार काम कर के थक चुके हैं, लेकिन रुक नहीं सकते.”

क्रिएटर्स बताते हैं कि लाइक्स और फौलोअर्स की होड़ में वे मैंटली फ्रसट्रैट हो जाते हैं पर क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया को ही फुल टाइम इनकम सोर्स बनाया हुआ है इसलिए अब वे पीछे जाने की हिम्मत नहीं करते. ये वाकई सोसायटी में एक गंभीर समस्या बन चुकी है.

मिशा भी उन्हीं में से एक थी. जिस ने सोशल मीडिया को अपनी दुनिया बना लिया और जब रीच गिरने लगी तो उस ने सुसाइड करना ही इस का सौल्यूशन समझा. इसी तरह बहुत से इन्फ्लुएंसर्स के लिए लाइक्स, कमेंट्स और फौलोअर्स ही सब कुछ बन जाते हैं. अगर बढ़े तो वो खुद को सफल समझते हैं. घटे तो लगता है कि शायद मैं अब अच्छा नहीं रहा, लोग मुझे भूल रहे हैं.

क्यों घटती है फौलोअर्स की संख्या

जब फौलोअर्स घटने लगते हैं, तो वे खुद को दोष देने लगते हैं. सोचते हैं कि मेरी वैल्यू ही खत्म हो गई. अगर आप एक ही तरह का कंटैंट बारबार डाल रहे हैं तो औडियंस की दिलचस्पी कम हो सकती है.

लेकिन फौलोअर्स की संख्या घटने की वजह सिर्फ टैक्निकल नहीं होती. रील्स और शौर्ट्स के चलते आज कोई एक चीज ही ट्रैंड पर नहीं रहती न दो दिन से ज्यादा चल पाती है. हर रोज या कहें कि हर घंटे कोई नया ट्रैंड चल पड़ता है. इसलिए औडियंस के पास हर फीड पर कुछ न कुछ रीलनुमा कचरा आता रहता है. इंस्टाग्राम खोलते ही लोग कुछ नया और अलग देखने की चाह रखते हैं. इंस्टाग्राम के पूर्व इंजीनियर गिलौम चैसलट का कहना है कि, “एल्गोरिदम वो नहीं दिखाते जो सच है, वो दिखाते हैं जो सब से ज्यादा ध्यान खींचे. यानी जो आज है वो एल्गोरिदम बदलते ही कल गायब हो सकता है. इसलिए पूरी पहचान को केवल सोशल मीडिया पर टिकाना, रेत पर घर बनाने जैसा है.

इस के अलावा, आज हर कोई कंटेंट क्रिएटर बन घूम रहा है. किसी एक भी विडियो पर अच्छे व्यूज आ गए तो वे फुल टाइम इसी काम में जुट जाते हैं. नए इन्फ्लुएंसर्स की वजह से पुराने वाले पीछे रह जाते हैं. ये एक ऐसी रेस है, जिस में हर वक्त आगे रहना नामुमकिन है. फिर भी, लोग इस रेस को अपनी जिंदगी का आधार बना लेते हैं.

इसे एक रियल उदाहरण की मदद से आसानी से समझा जा सकता है. टिकटौक से फेमस हुए फैजू, जन्नत जुबैर, रियाज अली, अरिश्फा खान आदि ये कभी एक समय पर पूरे इंटरनेट पर राज कर रहे थे. इन का अच्छाखासा फैनबेस था, बच्चेबच्चे की जुबान पर इन का नाम रटा हुआ था. लेकिन आज की डेट में ये क्रिएटर्स कहीं नहीं दिखाई पड़ते. यानी किसी दिन चमकता तारा बना इंफ्लुएंसर किसी भी पल जमीन पर टूट कर गिर सकता है.

वर्चुअल दुनिया से दोस्ती है टौक्सिक

मिशा की इंस्टाग्राम प्रोफाइल आज भी देखो तो उस में एक परफैक्ट जिंदगी दिखती है. वह ज्यादातर सर्कास्टिक वीडियोज बनाती थी और लोगों को हंसाती थी. लेकिन खुद उस के दिल में क्या चल रहा था, ये कोई नहीं जानता था. अफसोस की बात है कि आज की युवा पीढ़ी अपने आप को सिर्फ एक स्क्रीन पर मिले लाइक्स से मापने लगी है. डोपामाइन हिट मिलने से उन्हें खुशी मिलती है लेकिन दिक्कत तब होती है जब यह एक लत बन जाए. हारवर्ड मैडिकल स्कूल की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘सोशल मीडिया पर बारबार नौटिफिकेशन चेक करना वैसा ही असर डालता है जैसा ड्रग्स या जुए की लत.’

जब आप एक पोस्ट, स्टोरी या रील कुछ भी सोशल मीडिा पर साझा करते हैं तो 24 घंटे के भीतप कम से कम 1000 हजार बार उसे चैक करते रहते हैं कि देखें अब कितने लाइक्स मिले, किस ने क्या कमेंट किया. इसलिए जुए और शराब की लत की लिस्ट में इसे भी शामिल करना गलत नहीं होगा.

बात अकेली मिशा की नहीं है. युवा शोर्टकट पैसा कमाना चाहता है. फेमस होना चाहता है. इस के लिए वह सोशल मीडिया पर कुछ भी कर रहा है. और जब वह फेमस हो जाता है तो इस बात के लिए तैयार ही नहीं है कि उस की पोपुलेरिटी में गिरावट भी आ सकती है. सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर की उम्र किसी औफिस में काम करे वर्कर जितनी नहीं है. इन्फ्लुएंसर 4-5 महीने में रिटायर हो जाता है. अगर उसे लंबे समय तक बने रहना है तो खुद को ट्रेंड के साथ अपडेट करना पड़ता है, जिस में 99 प्रतिशत इन्फ्लुएंसर नाकामयाब साबित होते हैं. ऐसे में वे मिशा जैसी स्थिति में भी आ जाते हैं. मिशा की कहानी हमें एक आईना दिखा गई. ये सोचने का वक्त है कि क्या हम भी उस नकली दुनिया में जी रहे हैं जहां हम खुद को दूसरों की नजरों से देखते हैं?

सोशल मीडिया से कैसे निपटें?

डिजिटल डिटौक्स – हर हफ्ते कुछ दिन ऐसा रखें जब आप सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रहें. असल दोस्तों से मिलिए, असल बातें कीजिए.

रियल जिंदगी बनाइए: कैमरे के लिए नहीं, खुद के लिए जिएं. हर चीज को पोस्ट करने की जरूरत नहीं.
शेयर करने से न कतराएं: अगर आप अकेला महसूस कर रहे हैं, तो किसी दोस्त, परिवार या प्रोफैशनल से बात कीजिए. मदद मांगना कमजोरी नहीं है.

फिल्टर की दुनिया से बाहर आएं: हर चीज सुंदर दिखाने की जरूरत नहीं होती. परफैक्ट दिखने का प्रेशर सब से बड़ा झूठ है.

हेट कमेंट्स से बचिए: आप के एक ताने से किसी की जान जा सकती है.

Family Story: झुनझुना – आखिर क्यों रिना को गुस्सा नहीं आता था

Family Story: आत्मनिर्भर बनने के भाषण ने नेताओं जैसे गुणों वाले मेरे घर के 3 तेज बुद्धि वालों को और सयाना बना दिया. भाषण का असर किसी पर हुआ हो या न, इन 3 सयानों के चेहरों की चमक देखने वाली थी.

मैं चुप रही. कोरोना टाइम में चौबीसों घंटे सब को झेलझेल कर इन की नसनस पहचानने लगी हूं. रातदिन देख रही हूं सब को. सरकार सा हो गया है घर मेरा. करनाधरना कम, शोर ज्यादा.

मुझे अपना अस्तित्व किसी मूर्ख, गरीब जनता जैसा लगता है. एक जरूरी काम बताती हूं, तो ये दस जगह ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं. कोशिश रहती है कि कोई जिम्मेदारी इन के ऊपर न आए. कोरोनाकाल में आजकल हाउसहैल्प नहीं है, तो इन सयानों को घर के कामों में कम से कम ही हाथ बंटाना पड़े.

मयंक कहने लगे, “रीना, वैसे सब काम मैनेज हो ही रहा है न, तो अब तुम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो गई हो. अब तो तुम्हें आशाबाई की भी जरूरत नहीं लगती न, प्राउड औफ़ यू, डिअर.”

मैं फुंफकारी, ”उस के बिना हालत खराब है मेरी. चुपचाप काम किए जा रही हूं, तो इस का मतलब यह नहीं कि बहुत अच्छा लग रहा है. तुम तीनों तो किसी काम को हाथ तक नहीं लगाना चाहते. पता नहीं कैसे इतने सौलिड बहाने देते हो कि चुप ही हो जाती हूं.‘’

मलय को अचानक कुछ याद आया, ”मौम, आप को पता है कि विपिन की मौम घर पर ही पिज़्ज़ा बेस बना लेती हैं. कल इंस्टाग्राम पर विपिन ने पिक डाली, तो मैं ने उस से पूछा था कि सब शौप्स तो बंद हैं, तुम्हें पिज़्ज़ा बेस कहां से मिल गया? मौम, उस ने गर्व से बताया कि उस की मम्मी को पिज़्ज़ा बेस घर पर बनाना आता है.”

मैं ने उसे घूरा तो उस ने टौपिक बदलने में ही अपनी भलाई समझी. पर, उस ने मेरी दुखती रग तो छू ही दी थी. सो, मैं शुरू हो गई, ”तुम लोग हाथ मत बंटाना, बस, मुझे यह बता दिया करो कि और घरों में क्याक्या बन रहा है. मलय, उस से यह पूछा कि उन के घर में भी कोई घर के कामों में हैल्प कर रहा है या नहीं? बस, मां को ही आत्मनिर्भर बनाना है सब को?”

मौली कम सयानी थोड़े ही है, एक कुशल नेता की तरह मीठे स्वर में मौके की नजाकत देख कर कहा, ”मलय, मौम कितना काम कर रही हैं आजकल, देखते हो न. अब ऐसे में उन से पिज़्ज़ा बेस भी बनाने की ज़िद न करो. मेरे भाई, मौम जो बनाती हैं, ख़ुशीख़ुशी खा लो. उन के हाथ में तो इतना स्वाद है, जो भी बनाती हैं, अच्छा ही होता है. मौम, आप को जिस चीज में मेहनत कम लगे, वही बनाया करो. हम तो वर्क फ्रौम होम में फंस कर आप की हैल्प नहीं कर पाते. लव यू, मौम,” ‘कहतेकहते उस ने मेरे गाल चूम लिए. और मैं एक गरीब जनता की तरह फिर सब के झांसे में आ कर, सब भूल दुगने जोश से काम करने लगी.

मौली ने एक झुनझुना पकड़ा ही दिया था. लौकडाउन शुरू होने पर मेरे मूर्ख बनने की जो प्रक्रिया शुरू हुई, वह ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही. मैं बारबार इन सयानी बातों में फंसती हूं. तीनों ने मुझे काफी समझाया. एक भाषण काफी नहीं था आत्मनिर्भर बनने का, 3 और सुने.

मयंक उन में से हैं जो ऐसे भाषण को काफी गंभीरता से लेते हैं. जो कह दिया गया, बस, वही करेंगे. बुद्धि गई तेल लेने. कई बार सोचती हूं, इतना ध्यान अगर अपने पिताजी के भाषणों पर दिया होता, तो पता नहीं आज क्या बन गए होते. सेल्स की नौकरी में कमाखा तो अभी भी रहे हैं, पर पिताजी के भाषण तो बेकार गए न.

उन्हें तो मयंक को डाक्टर बनाना था. आज लगता है अगर टीवी पर भाषण में सुनते कि डाक्टर बनना है तो मेहनत शायद कर लेते, पर पिताजी की बात में टीवी के भाषण जैसा दम थोड़े ही था. मयंक अकसर कहते हैं, ‘मुझ पर ऐसे भाषणों का असर कहां होता है. मुझे तो रोज बढ़ती महंगाई में खींचतान कर घर का बजट देखना पड़ता है.’ मैं समझ गई कि मुझे आत्मनिर्भर बनाने के लिए तीनों एड़ीचोटी का जोर लगा देंगे.

मुझे कोई शौक नहीं आत्मनिर्भर बनने का. नहीं हो रहा है मुझ से अब अकेले घर का काम. मुझे आशाबाई भी चाहिए, इन लोगों की हैल्प भी चाहिए. घर में रहरह कर सब का हर समय कोई न कोई शौक जागा करता है जिसे पूरा मुझे करना होता है. एक दिन मलय ने कहा, मौम, चलो, घर की सैटिंग कुछ चेंज करते हैं, एक चीज एक तरह से देखदेख कर बोर हो गए.”

मैं ने कहा, ‘हां, क्यों नहीं. चलो, झाड़ू ले आओ. सामान इधरउधर हटेगा, तो नीचे की सफाई भी हो जाएगी, वरना सामान रोज तो हटता नहीं है.”

फौरन एक नेता की तरह पलटी मार दी महाशय ने, ”मौम, इस से तो आप का काम और बढ़ जाएगा. छोड़ो, फिर कभी करते हैं.”

”नहींनहीं, काम क्या बढ़ना, तुम हैल्प करवा रहे हो न!”

”मौम, कुछ काम याद आ गया अचानक, लैपटौप पर बैठना पड़ेगा, फिर कभी करते हैं. सैटिंग इतनी भी बुरी नहीं है.”

मौली को एक दिन कहा, ”आज तुम डिनर बना लेना. पता नहीं, मन नहीं हो रहा है कुकिंग का, बोर हो गई रातदिन खाना बनाबना कर.”

मौली ने अपनी मनमोहक मुसकान से कहा, “हां, मौम, बना लूंगी.” फिर उस ने मेरी कमर में बांहें डालीं और मेरे साथ ही लेट गई और बोली, ”लाओ मौम, आप की कमर दबा दूं?”

मैं झट से उलटी हो गई, ”हां, दबा दो.” यह मौका छोड़ दूं, इतनी भी मूर्ख नहीं हूं मैं. ऐसे दिन बारबार तो आते नहीं कि कोई कहे, आओ, कमर दबा दूं. कुछ ही सैकंड्स बीते होंगें, मैं सुखलोक में पहुंची ही थी कि मौली का मधुर स्वर सुनाई दिया, “मौम, जब आप को ठीक लगे, एक शार्ट कट मारोगी?”

”क्या, फिर से बोलो, बेटा?”

”किसी दिन सिर्फ मटर पुलाव बनाओगी? रायता मैं बना लूंगी. बहुत दिन हो गए, मलय तो आप को बनाने नहीं देता, पूरा खाना चाहिए होता है उसे तो.‘’

”हां, ठीक है, बना दूंगी”

बेटी इतने प्यार से अपना कामधाम छोड़ कर मेरे साथ लेटी थी, मैं तो वारीवारी जा रही थी उस पर मन ही मन. थोड़ी देर बाद वह अपने रूम में चली गई. उस की फ्रैंड का फोन था, जातेजाते बोली, “टेक रैस्ट, मौम.”

थोड़ी देर बाद मैं ने यों ही लेटेलेटे मौली को सरप्राइज देने का मन बना लिया, कि मैं आज ही मटरपुलाव बना लूंगी उस की पसंद का, खुश हो जाएगी वह. और मैं ने डिनर में सचमुच खुद ही सब बना लिया. बीचबीच में मौली आ कर हैल्प औफर करती रही, मैं मना करती रही थी.

डिनर टेबल पर सब को हंसतेमुसकराते देख मुझे अचानक याद आया कि अरे, आज तो मेरा कुकिंग का मूड ही नहीं था. मौली पर जिम्मेदारी सौंपी थी डिनर की. और मैं ही उस के लिए मटरपुलाव, रायता और मलय के लिए स्टफ्ड परांठे बनाने में जुट गई. ओह, मूर्ख जनता फिर ठगी गई. मुझे मीठीमीठी बातों में फिर फंसा लिया गया. मुझे गुस्सा आ गया, कहा, ”मैं तुम लोगों से बहुत नाराज हूं, कोई मेरी हैल्प नहीं करता. बस, सब से डायलौग मरवा लो. मर जाऊंगी काम करतेकरते, तुम लोग, बस, लाइफ एंजौय करो.”

मयंक ने मुझे रोमांटिक नजरों से देखते हुए कहा, ”मेरी रीनू, हम लोगों से गुस्सा हो ही नहीं सकती. अभी तो यह टैस्टी पुलाव खाने दो. एक बार औफिस में कपिल पुलाव लाया था, इतना बेकार था, सारे चावल के दाने चिपके हुए थे. और एक आज तुम्हारा बनाया हुआ पुलाव, देखो, कैसे खिलाखिला है एकएक दाना. वाह, खाना बनाना कोई तुम से सीखे. सच बताऊं, जो भी बनाती हो, शानदार होता है. वाह, ऐक्सीलैंट.”

मैं, हूं तो एक नारी ही न, तारीफ़ सुन कर सब भूल गई. दिल किया, अपनी जान निसार कर दूं सब पर. इतराते हुए पूछ बैठी, “कल क्या खाओगे, क्या बनाऊं?”

मलय ने मौका नहीं छोड़ा, फरमाइश सब से पहले की, ”मौम,छोलेभठूरे.”

”ओके, बनाऊंगी.”

फिर मौली कह बैठी, ”मौम, मेरी हैल्प तो नहीं चाहिए होगी न? कल मेरी कई वर्कशौप्स हैं दिनभर.”

मेरा मुंह उतरा, तो एक सयाने ने संभाल लिया, मलय ने कहा, ”मैँ करवा सकता हूं हैल्प, पर लंचटाइम में, तब तक आप मेरी हैल्प का वेट कर पाओगी, मौम?”

मैं ने थोड़ा झींकते हुए कहा, “मुझे किसी से कोई उम्मीद ही नहीं है कि मुझे हैल्प मिलेगी. यह कोरोना टाइम मेरी जान ले कर ही रहेगा. कोरोना से भले ही बच जाऊं, ये काम मुझे मार डालेंगे. बस, तुम लोग सुबह लैपटौप खोल लिया करो, बीचबीच में सोशल मीडिया पर घूम लिया करो, दोस्तों से बातें कर लिया करो. बस, यही करते हो और यही करते रहो तुम लोग.”

इतने में दूसरे सयाने ने माहौल में बातों की जादू की छड़ी घुमाने की कोशिश की. मयंक बोले, ”तुम बहुत दिन से नई वाशिंग मशीन लेने के लिए कह रही थीं न, आजकल सेल चल रही है. मैं ने देख ली है. चलो, तुम्हें दिखाता हूं. आओ, लैपटौप लाता हूं.” यह कह कर मयंक उठे. बच्चे भी नौटंकी करने लगे, बोले, मौम, देखो, पापा कितना ध्यान रखते हैं, आप के लिए नई वाशिंग मशीन आ रही है.”

मैँ क्या कहती, मुझे तो ऐसे ही घुमा दिया जाता है जैसे कि आजकल जनता किसी भी बात पर अपना हक़ जताने की कोशिश करे और उसे कोई झुनझुना हर बार पकड़ा दिया जाए. मैँ आजकल इन्हीं झुनझुनों में घूमती रहती हूं. वाशिंग मशीन का और्डर दे दिया गया.

आजकल कहीं बाहर तो निकल ही नहीं रहे हैं, तो सबकुछ औनलाइन ही तो आ रहा है. बस, काम करते रहो, कहीं आनाजाना नहीं. मेरे फ़्रस्ट्रेशन की कोई सीमा नहीं है आजकल. कब आशाबाई आएगी, कब मैँ चैन की सांस लूंगी. गुस्सा तब और बढ़ जाता है जब मैँ कहती हूं कि आशाबाई को बुला लेते हैं, तीनों एकसुर में कहते हैं, कि अरे, बिलकुल सेफ नहीं है उसे बुलाना. तुम हमें बताओ, किस काम में उस की हैल्प चाहिए.

मैँ जब हैल्प के लिए बताती हूं तो सब गायब हो जाते हैं. यह है आजकल मेरी हालत. तभी मैं खुद को मूर्ख जनता की तरह पाती हूं. जैसे ही आवाज उठाती हूं, झुनझुने पकड़ा दिए जाते हैं मुझे. तीनो ऐसे सयाने हैं कि घर के काम नहीं करने, बस, मौली तो मुंह बिसूर कर कहती है, “मौम, कहां आदत है, इतने काम…”

काम न करने पड़ें, इस के लिए सारे पैतरे आजमाए जा रहे हैं. वाशिंग मशीन आ गई. सब को लगा कि मैँ अब कुछ दिन तो उस में लगी रहूंगी, खुश रहूंगी. पर कितने दिन… काम थोड़े ही कम हो गए मेरे. एक रात को मैं ने अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, ”कल सुबह उठते ही मुझे तुम तीनों से जरूरी बात करनी है.”

मेरे स्वर की गंभीरता पर तीनों चौंके, क्या हुआ? अभी बता दो.”

”परेशान हो चुकी हूं, सुबह ही बात करेंगे. मैँ कोई नौकर थोड़े ही हूं कि दिनरात, बस, काम ही करती रहूं,” कह कर मैँ पैर पटकते हुए सोने चली गई. अभी 10 ही बजे थे, पर आज मैँ बहुत थक गई थी.

मुझे आहट मिली कि तीनों एक रूम में ही बैठ गए हैं. मैं ने सोच लिया था कि कल मैँ तीनों को कोई काम न करने पर बुरी तरह डांटूंगी, लड़ूंगी, चिल्लाऊंगी. हद होती है कामचोरी की. और मैँ फिर जल्दी सो भी गई. सुबह उठी, तो भी मुझे रात का अपना गुस्सा और शिकायतें याद थीं. बैड पर लेटेलेटे सोचा कि आज बताती हूं सब को, कोई हैल्प नहीं करेगा तो मैं अकेले भी नहीं करने वाली सारे काम. हद होती है, सैल्फिश लोग.

तीनों अभी सोये हुए थे. मैं ने जैसे ही लिविंगरूम में पैर रखा, मेरी नजर कौर्नर की शैल्फ पर रखी अपनी मां की फोटो पर पड़ी. मेरी आंखें चमक उठीं. पास में जा कर फोटो को निहारती रह गई. ओह, किस ने रखी यह मेरी प्यारी मां की इतनी सुंदर फोटो यहां पर. मैं फोटो देखती रही. यह इन लोगों ने लगाई है रात में. लेकिन यह फोटो तो मेरी अलमारी में रहती है. ये बेचारे वहां से कैसे निकाल कर लाए होंगे कि आहट से मेरी आंख भी न खुली.

मैं ने फ्रेश हो कर अपनी मां को फोन मिला दिया और बताया कि रात को उन की फोटो कैसे तीनों ने मुझे सरप्राइज देने के लिए लगा दी है. मां को बहुत ख़ुशी हुई, तीनों को खूब प्यार व आशीर्वाद कहती रहीं. मैं सब भूल, अब, मां से इन तीनों की तारीफ़ क्यों किए जा रही थी, मुझे एहसास ही नहीं हुआ. मैं चाय पी ही रही थी कि तीनों उठे. मैं ने उन्हें थैंक्स कहा. वे मुसकराते हुए फ्रेश हो कर अपने काम में बिजी हो गए.

ब्रेकफास्ट मैं ने उन तीनों की पसंद का ही बनाया. जिस में मुझे एक्स्ट्रा टाइम लगा तो मुझे फिर अपने पर गुस्सा आने लगा. मेरा ध्यान फिर इस बात पर गया कि फिर मुझे रात में नाराज देख कर मां की फोटो का एक झुनझुना पकड़ा दिया गया है. अभी बताती हूं सब को, चालाक लोग…कैसे मेरा गुस्सा शांत किया, कितने तेज हैं सब. बताती हूं अभी. मैं ने सीरियस आवाज़ में कहा, ”आओ सब, जरा बात करनी है मुझे.”

तीनों ने आते हुए एकदूसरे को देख कर इशारे किए. मेरी आंखों से छिपा न रहा. फिर मौली और मलय को मैं ने मयंक को कुछ इशारा करते हुए देखा. मुझे पता है कि मेरे गुस्से से बचते हैं तीनों. वैसे तो मुझे जल्दी गुस्सा नहीं आता, पर, जब आता है तो मैं काफी मूड खराब करती हूं. हम चारों बैठ गए. मैं ने रूखी आवाज में कहा, “सब सामने ही रखा है, खुद ले लो. मेहमान तो हो नहीं कोई, कि परोसपरोस कर सब की प्लेट लगाऊं. और मुझे, तुम लोगों से यह कहना है कि अब से…”

मयंक ने मेरी बात पूरी नहीं होने दी, बहुत भावुक हो कर बोला, ”नहीं, पहले मुझे बोलने दो, रीनू. हम तीनों ने सोचा है कि हम हर बार कुछ भी खाने से पहले इतनी मेहनत कर के हमें खिलाने वाले को, तुम्हे, थैंक्स कहा करेंगे, थैंक्यू, रीनू, कितना करती हो तुम हम सबके लिए. बिना किसी की हैल्प के, इतने काम करना आसान नहीं है. वी लव यू, रीनू.”

”थैंक्यू मौम.”

बच्चों ने भी इतने प्यार से कहा कि मैं रोतेरोते रुकी. मन में आया, मैं ही ओवररिऐक्ट तो नहीं कर रही थी. बेचारे खाने से पहले मुझे थैंक्स बोल रहे हैं. किस के घर में यह सब होता है. ओह, कितने प्यारे हैं तीनों. देखते ही देखते मैं उन सब को प्यार से हर चीज सर्व कर रही थी. मेरी जबान से शहद टपक रही थी. मुझे फिर लच्छेदार बातों का एक झुनझुना पकड़ा दिया गया था, इस का एहसास मुझे बाद में फिर हुआ. मूर्ख जनता सी मैं एक बार फिर ठगी गई थी.

Family Story: पूर्णाहूति – क्यों सुरेखा घर छोड़ना चाहती थी?

Family Story, लेखिका- वंदना तिवारी

सुरेखा जल्दीजल्दी सूटकेस में सामान रखने में व्यस्त थी. समय और आवश्यकता के अनुसार चुनी गईं कुछ साङियां, ब्लाउज के सैट्स, सूट के साथ मैचिंग दुपट्टे. 2-3 चूड़ियों के सैट्स, कुछ रूमालें और रोजमर्रा की जरूरत की ऐसी चीजें जिन की उपस्थिति जीवन में अनिवार्य होती हैं, धीरेधीरे संभाल कर रख रही थी.

इन में भी सब से अधिक संभाल कर रखे गए उस के सारे सर्टिफिकैट्स, मार्कशीट्स और नौकरी के लिए आया कौल लेटर भी था.

इन व्यस्तताओं के बीच उस ने कई बार मणि की ओर बेपरवाही से देखा और फिर व्यस्त हो गई. सोफे पर स्थिर बैठा मणि उसे एकटक ऐसे देख रहा था मानों बहुत कुछ कहना चाह रहा हो, लेकिन उस के शब्द किसी अथाह सागर में डूबते जा रहे हों.

उधर सुरेखा थी कि उस की ओर स्थिर हो कर ताक भी नहीं रही थी मानों जताना चाह रही हो कि तुम ने मुझे कब सुना था, जो आज मैं तुम्हारी भावनाओं को समेट लूं?

जब मैं तुम्हें अपने पास रोकना चाहती थी, तब तुम हाथ छुड़ा कर चले जाते थे. जब मैं तुम से कुछ कहने का प्रयास करती, तब तुम ध्यान नहीं देते थे क्योंकि तुम्हारे अनुसार मैं बेमतलब की बातें ही तो करती थी. फिर एक अहंकारी पुरुष मेरी बातों में क्यों दिलचस्पी ले पाता?

ओह, मैं ने क्याक्या कहना चाहा था तुम से मणि. क्या एक पति का इतना भी कर्तव्य न था कि वह अर्धांगिनी कही जाने वाली अपनी पत्नी के मनोभावों को समझना तो दूर, सुन भी न सके?

मुझे आज भी याद है मणि, जब मैं ब्याह कर प्रथम दिवस तुम्हारे घर आई थी. ससुराल में पदार्पण करने के बाद नई दुलहन को देखने वालों के उत्साह ने मुझे क्षण भर भी आराम करने नहीं दिया था. हां, तुम ने आते ही सो कर अपनी थकान उतार ली थी, लेकिन मैं भारी बनारसी साड़ी के बोझ तले दुलहन बनी बैठी रही.

रात में जब सब सो गए तब मैं आधी रात कमरे में अकेली बैठी इंतजार करती रही थी. मेरे मन में कितने भाव आजा रहे थे. मैं चाहती थी कि अपने मन के सारे द्वार खोल दूं और तुम एक प्रेमाकुल भ्रमर के समान मेरे मन के कोष में बंद सारे भाव पढ़ लो. सारी नींद, सारी थकान भुला कर मैं तुम से रात भर बातें करती रहूं.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तुम ने आते ही कमरे के कपाट क्या बंद किए मेरे मन के द्वार पर मानो ताला लगा दिया. तुम ने आते ही मुझे जकङ लिया था और फिर ज्योंज्यों चूङियोंगहनों का बोझ कम होता गया त्योंत्यों मेरे व्याकुल हृदय का भार और बढ़ता चला गया. उस के बाद तो सपने, कल्पनाएं, भावनाएं न जाने क्याक्या मेरे भीतर ही भीतर टूटता रहा. मेरा तो जैसे संपूर्ण अस्तित्व अस्तव्यस्त हो गया, जिसे मैं आज तक नहीं समेट पाई.

मिलन की प्रथम रात्रि की मधुर बेला में तुम्हारे द्वारा पूछा गया वह क्रूर प्रश्न क्या मैं कभी भूल पाऊंगी मणि? तुम्हारे निर्दय शब्द आज भी मेरे मन को विचलित कर देते हैं.

तुम ने मेरी वर्जिनिटी पर सवाल उठाया था,”क्या इस के पहले तुम्हारा किसी से…?”

छिः मैं कैसे बोलूं तुम्हारे वे घृणित शब्द? मैं अवाक सी तुम्हें देखती रह गई थी.

तब तुम ने और दृढ़ता से कहा था,’’आजकल कालेज में पढ़ने वाले लड़केलड़कियों के लिए यह सामान्य सी बात है. मैं बुरा नहीं मानूंगा.‘‘

चरित्र पर उछाले गए उन छीटों से मैं आज भी स्वयं को कलुषित सा महसूस करती हूं मणि.

सुरेखा के सारे घाव हरे हो उठे थे. उस की डबडबाई आंखों से कुछ बूंदें छलक पड़ीं. तभी मणि ने उस का हाथ पकड़ लिया,’’रो रही हो? फिर क्यों जा रही हो? मुझे पता है तुम मेरे बिना नहीं रह पाओगी.”

“चलो आज तुम्हें मेरा रोना तो दिखाई दिया. पर उस के पीछे का कारण तुम आज भी नहीं समझ पाए,” कहते हुए सुरेखा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया और फिर व्यस्त हो गई.

तुम समझ भी कैसे सकते थे, मणि क्योंकि तुम ने तो मुझे कभी पत्नी का स्थान दिया ही नहीं. तुम्हारे लिए तो मैं मात्र एक उपभोग की वस्तु ही थी. इस के अतिरिक्त तो तुम ने मेरे अस्तित्व को किसी अन्य रूप में स्वीकारा ही नहीं. मैं ने बहुत चाहा था कि तुम्हारे साथ मैं कुछ क्षण शांति से बिता पाती. कुछ तुम अपने मन की कहते कुछ मैं कहती. मनुष्य एकदूसरे के भावों को तो तभी समझ सकता है जब वह उसे सुने और समझे. धरती तभी नम होती है जब जल की बूंदें उसे सिंचित करती हैं. जल के स्नेहिल स्पर्श से ही भाव पूरित हो धरा में प्रेममयी बीज अंकुरित होते हैं, अन्यथा कोई कितना ही उस पर हल चलाता रहे सब बेकार है.

ऐसा नहीं कि तुम मुझे नहीं चाहते थे. जब तुम्हें एक स्त्री की आवश्यकता होती थी तब तुम मेरे पास ही आते थे. अपनी लालसा को तृप्त कर फिर मुझे अकेली छोड़ कर चले जाते थे. मेरे हृदय तक पहुंचने का प्रयास तो तुम ने कभी किया ही नहीं और मैं थी कि अब तक दरवाजे की ओर ही निहारती रह गई.

कई बार तो मैं तुम्हारे हाथ कस कर पकड़ लेती थी. तुम से अनुनयविनय करती कि कुछ क्षण मेरे निकट बैठ कर उस प्रेम को महसूस कर लेने दो जो मेरे हृदय को तुम्हारे साथ जोड़ सके. मगर तुम्हें मेरी भावनाओं से क्या मतलब था?

मेरे लिए प्रेम एक अमूर्त भाव था, एक ऐसी डोर जो 2 प्राणों को जनमजनम के लिए बांध लेते हैं. मगर तुम्हारे लिए प्रेम की परिभाषा कुछ और ही थी, तभी तो तुम निर्दयीभाव से मेरा हाथ छुड़ा कर चले जाया करते थे.

“आखिर तुम्हें किस बात ही कमी है यहां? क्या तुम्हें वास्तव में नौकरी की आवश्यकता है? वह भी इतनी दूर जा कर? अकेली रह पाओगी?”

मणि के शब्दों ने सुरेखा की तंद्रा तोड़ी थी. वह कुछ क्षणों के लिए मणि की ओर देखती रही, बिना कुछ कहे एकटक. सुरेखा मानों उन्हीं शब्दों की डोर थामे हुए कहीं डूबी चली जा रही थी.

यह तुम्हारे लिए मात्र एक नौकरी होगी, मणि. मेरे लिए तो तुम्हारे कारागार से मुक्त हो कर स्वच्छंद हवा में सांस लेने का एक माध्यम है. अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान को कुचल कर तुम्हारी दी हुई सुखसुविधाओं का भोग अब मेरे लिए सहन कर पाना असंभव हो गया है.

मैं कैसे भूल सकती हूं वह काला दिन जब तुम ने मेरी भावनाओं को खंडखंड कर डाला था.

मैं वह पल कैसे भूल सकती हूं, मणि? मेरा अपराध मात्र इतना था कि जब तुम मेरी कोई बात सुननेसमझने को तैयार न थे मैं ने अपनी भावनाओं को तुम तक पहुंचाने के लिए पत्र को माध्यम बनाया था. अपने भाव के मोती शब्दों की डोर में पिरो कर तुम्हें सौंप दिया था. यही मेरी भूल थी. सोचा था इसे पढ़ कर ही कदाचित किसी सीमा तक तुम मुझे समझ पाओगे. मगर नहीं, तुम तो पूरी तरह संवेदनाशून्य थे. इसीलिए तो तुम ने उस पत्र में लिखे 1-1 शब्द को सब के सामने बोल कर मेरा मजाक उड़ाया था.

घर में गूंजते ठहाकों से मेरा हृदय चीत्कार कर उठा था. उस दिन मैं टूट कर ऐसी बिखरी कि आजतक मैं स्वयं को समेटने का प्रयास ही कर रही हूं.

शायद राख के ढेर में कहीं एक चिनगारी शेष थी. बस, मन में एक निश्चय किया था,‘अब मुक्ति चाहिए…’ और इस के लिए मुझे स्वयं को स्थापित करना ही होगा.

एक नारी का हृदय जितना कोमल और विनम्र होता है, तिरस्कार और अपमान उसे उतना ही निष्ठुर और कठोर भी बना देता है.

मणि ने अपना अंतिम प्रयास किया. उस ने सुरेखा को कस कर भींच लिया,‘‘सोच लो, बस एक बार, मेरे लिए… इतना आसान नहीं होगा यह सब.’’

“आसान तो कुछ भी नहीं होता. अपने मातापिता और परिजनों को छोड़ कर किसी अजनबी को पति मान कर उस के साथ चल पड़ना कौन सा आसान होता है?’’ सुरेखा ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से मणि की ओर देखा था.

जीवन के एक नए सफर पर चल पड़ने की दृढ़ता उस के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.

‘‘तो तुम नहीं मानोगी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘नहीं रुकोगी?’’

‘‘नहीं.”

“एक बार फिर सोच लो.’’

‘‘नहीं.”

सुरेखा ने अपने वैवाहिक जीवन की यज्ञवेदी में आज तक जितनी आहूतियां दी थीं, आज उस की पूर्णाहुति देने का समय था. सुरेखा इस के लिए पूरी तरह तैयार थी.

मणि के बाहुपाश से छूटते ही उस ने सूटकेस उठाया और दृढ़ता के साथ बाहर निकल गई.

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