तो जसमीन रौय को डेट रहे रेहान रौय!

टीवी सीरियल ‘‘गुड्डन  तुमसे न हो पाएगा’’ में पर्व का किरदार निभा रहे अभिनेता रेहान रौय की बंगला अभिनेत्री जसमीन रौय संग डेटिंग की खबरे इन दिनों टीवी इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बनी हुई है. मजेदार बात यह है कि यह दोनों पिछले चार वर्ष से डेटिंग करते आ रहे हैं, पर इनकी डेटिंग का राज अब खुलकर सामने आया है.

rehan roy

जब हमने इस संबंध में रेहान रौय से बात की तो रेहान रौय ने बड़ी साफगोई के संग इस बात को स्वीकार करते हुए कहा- ‘‘यह सच है कि जसमीन के साथ मेरा रोमांस पिछले चार वर्ष से चल रहा है. पर हमने अभी तक शादी को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया है. फिलहाल हम दोनों अपने अपने करियर को ही संवारने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

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वैसे तो कई साल पहले हम और जसमीन उस वक्त दोस्त बने थे, जब हम दोनो कोलकता में एक साथ बंगला टीवी सीरियलो में अभिनय कर रहे थे. पर तब हमारे बीच प्यार का कोई एहसास नहीं था. मगर जब मैं कोलकता छोड़कर मुंबई आया और यहां काम करना शुरू किया, तो मुझे जसमीन की कमी खलने लगी. तभी हम दोनों को एहसास हुआ कि हम दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं. आज हमारे बीच जो रिश्ता है उसकी जड़ तो हमारी अच्छी दोस्ती ही है. वह मुंहफट है, यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती है.’’

जबकि जसमीन रौय ने रेहान संग अपने रिश्ते को कबूल करते हुए कहा- ‘‘रेहान मेरी जिंदगी के अंधेरे में रोशनी बनकर आए. अपने खास दोस्त में प्यार को पाना सबसे बड़ा आशिर्वाद ही है. हम अतीत या भविष्य की सोचने की बजाय अपने वर्तमान को ही सौ प्रतिशत देना चाहते हैं.’’

शूद्र को शूद्र ही रहने दो…उसके पांव न पड़ो

एक गांधी जी थे जिन्हें महात्मा बनने का बड़ा शौक था शौक क्या था लगभग एब था. फिर कल तक जो देश में मोहनदास करमचंद गांधी और विदेश में एमके गांधी कहे जाते थे वे देखते ही देखते राष्ट्रपिता हो गए. आजादी की लड़ाई के चक्कर में वे पूरा हिंदुस्तान घूमे तो दरिद्र नारायनों यानि दलितों की दुर्दशा देख उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया कि गुलामी की असल वजह वर्ण व्यवस्था है सो उन्होंने कहा, रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता राम…

सीधे मर्यादा पुरुषोत्तम से शूद्रों का कनेकशन जोड़ते इस भजन मात्र से छुआछूत की समस्या तो हल नहीं हुई, लेकिन उनके झांसे में आ गए दलित समुदाय ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिए. तब अंग्रेजों को समझ आया कि वे यहां व्यापार करने आए थे जो पूरा हो चुका है सो अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वे चलते बने, पर जाते जाते वे देश को दो टुकड़ों में बांट गए.

कहने को देश आजाद हो गया और कथित दलित प्रेमी गांधी जी को गोली मार दी गई क्योंकि उनका भी काम पूरा हो गया था. जब बंटवारे का हो हल्ला खतम हो गया तो लोगों ने देखा कि कुछ नहीं बदला है, लोकतंत्र की कथित स्थापना के बाद भी राज सवर्णों का ही है क्योंकि वे ब्रह्मा के मुंह और छाती से पैदा हुये हैं लिहाजा राज पाट वही देखेंगे. पेट से पैदा हुये वैश्यों को भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा, वे पूर्ववत खेती किसानी और व्यापार करने के अपने पुश्तैनी धंधे में लग गए और दलित यानि पैर से पैदा हुये शूद्र ने भी आंखे मलते हुये मल ढोने, मरे मवेशी उठाने और झाड़ू बुहारी करने का काम शुरू कर दिया.

गांधी वध क्यों, नाम की पुस्तक में नाथूराम गोडसे जिसकी आजकल पूजा भी की जाने लगी है ने ईमानदारी से बताने की कोशिश की है कि उसने गांधी को क्यों मारा. अगर आप दिमाग खाली कर यह किताब पढ़ेंगे तो निश्चित ही यह कहेंगे कि हिन्दू हितों को मद्देनजर गोडसे ने वही किया जो किसी भी सच्चे हिन्दू को करना चाहिए था. गांधी जी नमाज पढ़ने लगे थे, उन्होंने करोड़ों रुपये पाकिस्तान को दिलवाए थे, जैसी बातें या दलीलें किसी सबूत की मोहताज आज भी नहीं हैं. गोडसे आरएसएस का था या हिंदू महासभा का था इन बातों का न तब कोई खास मतलब था न आज है. मतलब तो बस इतना कि वह गांधी की तरह ही सनकी लेकिन कट्टर हिंदूवादी था, जिसे गांधी का मुस्लिम और दलित प्रेम रास नहीं आया था.

कट्टरवादियों की एक ही खामी या खूबी कुछ भी कह लें यह होती है कि वे धर्म ग्रन्थों से इतर कुछ भी सोचना या समझना नहीं चाहते. देखा जाये तो गांधी दरअसल में दलितों को स्वीकृत तरीके से सवर्णों की पालकी ढोने तैयार कर रहे थे, क्योंकि खुद गांधी वैश्य होने के नाते ब्राह्मणों को पूज्य मानते थे. उनकी आपत्ति बस इतनी भर थी कि दलितों को बिलकुल ही जानवर मत समझो. लेकिन ब्राह्मण समुदाय को धार्मिक निर्देशों में यह मामूली फेरबदल भी स्वीकार्य नहीं था.

दिनांक 24 फरवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सफाईकर्मी महिला के पांव धोकर महानता की तरफ अपना एक कदम और बढ़ा दिया है. यह नोटबंदी से कमतर ऐतिहासिक घटना नहीं है. निश्चित रूप से इसके दूरगामी तो नहीं लेकिन तात्कालिक परिणाम होंगे. इसके लिए पहले यह तय करना जरूरी है कि वाकई मोदी का दिल भी दलितों के लिए गांधी की तरह द्रवित होने लगा है या उन्हें सिर्फ लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उनके वोटों की खातिर एक शूद्र महिला के पांव धोने पड़े. अधिकांश का जबाब या राय यही होगी और है भी कि उन्हें सिर्फ दलित वोटों से और सत्ता से मतलब है और इसके लिए पांव धोना तो बहुत छोटा ड्रामा है, अगर दलितों के पांव धोकर पानी भी पीना पड़े तो सौदा घाटे का नहीं.

घाटे का इसलिए नहीं कि वर्ण व्यवस्था वाला लोकतांत्रिक राज अभी और कायम रखना है. साल 2014 में भाजपा और आरएसएस ने एक बड़ा जोखिम उठाते कामयाब जुआ या दांव मोदी के नाम पर खेला था. यह हिंदूवादी राजनीति का एक बड़ा प्रयोग था कि एक छोटी जाति वाले नेता को बतौर प्रधानमंत्री पेश किया गया था. प्रयोग सफल रहा और सरकार नागपुर से चलती रही. अभी भी कोई शंकराचार्य, महामंडलेश्वर महंत या कोई दूसरा ब्राह्मण किसी सफाईकर्मी महिला के पांव नहीं धो रहा है इस लिहाज या वास्तविकता से नरेंद्र मोदी के इस कृत्य को ढोंग या पाखंड कहना कतई हर्ज की बात नहीं क्योंकि जंग, मोहब्बत और सियासत में सब जायज होता है.

बात या हरकत बिलकुल नई नहीं है, 2014 के बाद से भाजपा और आरएसएस दोनों दलितों को गले लगाने का स्वांग रचते रहे हैं. यह और बात है कि हर बार अलग होने पर दलित को अपनी पीठ पर गरमागरम कुछ बहता महसूस हुआ है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खूब दलितों के घर जाकर उनकी थाली में खाना खाया है, उज्जैन कुंभ में भी उन्होंने दलित संतों के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई थी. लेकिन इससे कोई क्रांति नहीं आ गई. दलित बेचारा दलित ही है, उसके दलितपने का सूचकांक ज्यों का त्यों है उल्टे मोदी राज में दलित अत्याचारों में बढ़ोत्तरी ही हुई है.

इस ड्रामे को दूसरे यानि गांधीवादी नजरिए से देखें तो भी बात गले उतरने वाली नहीं है.  देश का श्रेष्ठिवर्ग शायद ही मोदी के दलित महिला के पांव धोने को साफ सुथरे या प्रगतिवादी नजरिए से देखने की जहमत उठाएगा. तीन हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा के सत्ता से बेदखल होने की एक प्रमुख वजह एटरोसिटी एक्ट पर मोदी सरकार का संसद में झुकना गलत नहीं आंकी जा रही. अब मोदी सरेआम झुके हैं तो कैसे सवर्ण भाजपा को वोट देगा समझना वाकई मुश्किल है.

झुकने के इस मसले को जातिवादी नजरिए से देखने पर एतराज जताने वालों को खबर को गौर से पढ़ना या देखना चाहिए. महिला सफाईकर्मी यानि दलित थी, यही विशेषण बताता है कि मकसद तस्वीर बदलने की नहीं बल्कि हंगामा मचाने भर की थी. किसी को केवट याद आया तो किसी को शबरी वाला प्रसंग याद आया. ऐसे मौकों पर हमारे पास याद करने लायक कुछ और है भी नहीं. एक गांधी थे तो उनके पुतलों पर भी गोलियां चलाई जा रहीं हैं.

नरेंद्र मोदी ऊंची जाति वालों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं या नहीं यह दिलचस्प पहेली लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे बताएंगे, लेकिन नरेंद्र मोदी ऊंची जाति वालों के इशारे पर नाचते थे, यह साबित करने कहीं जाने की जरूरत नहीं. जरूरी यह भी नहीं कि हर बार गांधी गुजरात से ही पैदा हो. वैसे भी अब किसी गांधी की जरूरत को भाजपा खारिज करने लगी है, पर यह देश का आम आदमी तय करेगा कि उसे किसकी जरूरत है. रही बात दलितों की तो वे इन नए नए ड्रामों से आजिज़ आने लगे हैं. कभी उनके यहां खाना खाकर उन्हें मुख्यधारा में होने का धोखा दिया जाता है तो कभी उनके संतों के साथ स्नान करके उन्हें बरगलाया जाता है और अब पांव तक धोये जाने लगे हैं. कल को चरणामृत भी पिया जा सकता है.

इससे हुआ क्या है और होगा क्या यह लुटापिटा दलित समुदाय शायद ही तय कर पाये.

बुआ और भतीजे का गठबंधन

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बाद भी उन पर ऐसे तीर तरक्श नहीं छोड़ रही जैसे राहुल गांधी पर छोड़े जा रहे हैं. जिन्हें पहले जातिवादी और विभाजक कह कह कर गालियां दी जाती थीं उन पर भाजपा की औल फौज चुप है और रातदिन केवल राहुल गांधी और सोनिया गांधी का माखौल उड़ाने की कोशिश ही रही है हालांकि यह कोशिशें अब अपने ही खिसकते समर्थकों को बचाने के लिए हैं. दूसरों को भाजपा में लाने के लिए नहीं.

मायावती और अखिलेश का प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश में है. दलित होने के कारण दूसरे राज्यों में मायावती इक्कीदुक्की विधायकों की या कारपोरेशनों वालों में 5-7 वार्डों में जीत जाती हैं पर बाकि दलितों में कोई गहरी पैठ नहीं बना पाई. अन्य राज्यों में या तो राज्य तक सीमित पार्टी में दलित है या फिर कांग्रेस में.

उत्तर प्रदेश में दम ठोकने वाली समाजवादी पार्टी का भी यही हाल है. मुलायम सिंह ने कभी इसे उत्तर प्रदेश से बाहर नहीं फैलाया और उन का पिछड़ा समर्थन कई राज्यों में कांग्रेस के साथ है तो कई राज्यों में किसी स्थानीय पार्टी के साथ.

उत्तर प्रदेश अकेला राज्य है जहां दलितों व पिछड़ों की पार्टियां और दोनों ने कईकई बार राज भी किया है. कांगे्रस को सत्ता में या उस के करीब भी आए अरसे हो चुका है.

मायावती और अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा न खोलना भाजपा के लिए एक संकट पैदा करेगा क्योंकि 80 सीटों पर मुख्य मुकाबला तो उन्हीं से है और उन्हीं से बाद में मिलना न पड़े. इसलिए उन पर……न जाए यह संभव नहीं है.

यह देश ऐसा है जहां वक्त पर गधे का बाप बनाना बुद्धिमानी मानी जाती है और जहां पौराणिक गाथाओं में दुश्मनों को पटाना या वक्त पर जी हजूरी करना धर्मयुग है. अमृत मंथन में भी यही हुआ या जिस में विष्णु के 2 अवतार बने थे – कश्यप व मोहिनी व तीसरे अवतार शिव ने जहर पीया था अब जब अवतारों ने पहले दुश्मनों साथ काम करने पर और बाद में उन्हें धोखा देने पर मोहर लगा दी हो वहां उन को हजारों साल बाद पूजने वाले कैसे गलत हो सकते हैं.

सत्ता के अमृत मंथन में कब किस की जरूरत पड़ जाए यह नहीं कहा जा सकता इसलिए मायावती और अखिलेश यादव फिलहाल भाजपा की ट्रौल आर्मी को गोलियों से बचे हैं. चुनाव नजदीक आने पर ही पता चलेगा कि मोहिनी अवतार बन कर अमृत का घड़ा धोखे से छीन कर कैसे देवताओं के हाथों में आता है. पुराणों में ब्लूप्रिंट तैयार है.

री गैया पार करो मोरी चुनावी नैया 

वे अब के चुनाव के बहाव में किसी भी तरह अपनी सीट निकालने की फिराक में थे, ताकि इज्जत के साथ देश को खापचा सकें. बिना चुनाव जीते देश को खाने की हिम्मत और हिमाकत करने पर कब्ज होने का कभीकभार डर सा बना रहता है.

रात को जब वे सोए हुए भी जागे से थे तो अचानक सपना आया और उन्हें सुनाई दिया, ‘जो अब के चुनावी तरणी पार करना चाहते हो तो गाय की शरण में जाओ. उस का गोबर अपने बदन पर मलो. उस के मूत्र से नहाओ. अब के चुनाव में जनता का नहीं, गाय का सिक्का जम कर चलेगा. गाय का जिस पर आशीर्वाद होगा, वही सत्ता की लंगड़ी घोड़ी चढ़ेगा. इस बार जो गाय को रिझाने में कामयाब रहेगा, वही देश का भार अपने कंधों पर सहेगा.’

सपने की उस आवाज को सुनते ही वे कच्छेबनियान में ही उठे और निकल पड़े शहर के किसी कूड़े के ढेर के पास गाय ढूंढ़ने. अंधेरे में भी अपना मुंह छिपाते… पता नहीं, किस से. ओह, उन्होंने अभी भी अपने मुंह को छिपाने का रिवाज कायम रखा था.

मजे की बात तो यह रही कि उन को अपने घर के बाहर ही रात को फेंके गए कूड़े के पास गाय मिल गई, पर दिक्कत यह थी कि उस के साथ देश का एक नागरिक भी था, उन के फेंके कूड़े में रोटी ढूंढ़ता हुआ. गाय उसे अपने सींग से हटा रही थी तो वह उसे अपनी जबान से डरा रहा था. अब तो आम आदमी के पास जबान ही बची है डराने के लिए, जिसे कानों से बहरी सत्ता ने कभी का सुनना बंद कर दिया है.

पहले तो वे थोड़ा सहमे कि देश के तथाकथित अव्वल दर्जे के नेता होने के चलते एक उंगली भर के नागरिक ने उन्हें उन के द्वारा रात को खापी कर फेंके गए उन्हीं के कूड़े के पास देख लिया तो…?

पर जब जीत का खयाल आया तो वे हुंकार उठे. एकाएक उन्हें गाय में तैंतीस करोड़ वोटर दिखने लगे… अपने चुनाव क्षेत्र के वोटरों से कई गुना ज्यादा.

वे कूड़े के ढेर के पास चंदन की खुशबू लेते खड़ेखड़े सोचने लगे, ‘इतने वोटरों से तो मैं अकेला ही सरकार भी बना सकता हूं.’

कुछ देर और सोचने के बाद उन्होंने कूड़े के ढेर के पास से उस रोटी ढूंढ़ने वाले को हड़काया, धमकाया, भगाया. जब वह उन के डर से सिर पर पैर रख दूर भाग गया तो उन्होंने बिना इधरउधर देखे, कूड़े की परवाह किए बिना गाय की पूंछ के बदले उस के गंदे खुर पकड़े और हो गए आदतन चरणम् शरणम् गच्छामि.

गाय भी उन से जितना अपने खुर छुड़वाने की कोशिश करती, वे उतनी ही जोर से गाय के खुर पकड़ लेते.

कुछ देर कूड़े के ढेर में ही उन के खुर पकड़ने और गाय के खुर छुड़वाने के बीच काफी जद्दोजेहद हुई. आखिरकार जीत उन की हुई तो उन्हें चुनाव में भी अपनी जीत तय लगी.

वे पूरे बदन पर कूड़ा लगा होने के बाद भी खुश हो उठे. उन का जोश अब दोगुना हो गया था. अब बाजी उन के हाथ में थी.

जब गाय ने जनता की तरह उन के आगे लंगर डाल दिए तो गाय ने उन पर अपनी पूंछ घुमाते हुए पूछा, ‘‘क्या चाहते हो तुम चुनाव के दिनों में मुझ से?’’

‘‘हे गऊ मैया, अब के चुनाव में मैं बस आप का साथ चाहता हूं.’’

‘‘मेरा साथ, बोले तो…?’’

‘‘अगर तुम मुझ से खुश हो जाओ गऊ मैया, तो पार लग जाए मेरी

चुनावी नैया.’’

‘‘मतलब, मैं तुम्हारी नाव को चुनाव के दलदल से पार लगाऊं? न बाबा न. यह हम से न होगा. गांवदेश से ‘छोड़ी गईं’ भला कैसे किसी की नैया पार लगा सकती हैं? हम तो खुद ही अपना आसरा ढूंढ़ने के लिए मजबूर हैं.’’

‘‘हे गऊ मैया, मैं अब के तुम्हारे खुर पकड़ कर चुनावी तरणी पार करना चाहता हूं बस. मैं पिछले 20 सालों से चुनावी तरणी के भंवर में फंसा हूं. मत पूछो, देश सेवा करने को उतावले इस मन के क्या हाल हैं.’’

‘‘पर, आज तक तो मेरी पूंछ मरने

के बाद ही वैतरणी पार कराने में ही मददगार होती रही है. ऐसे में… मुझे शक है कि…’’

‘‘मां, कुछ भी करो. वोटरों के सिर पर बहुत चुनाव लड़ लिया. अब के चुनाव तुम्हारे सिर पर लड़ा जा रहा है, सो…’’ कह कर वे घोर मतलबी गाय के चरणों में लोटपोट हुए.

‘‘कल जो सूअर के सिर पर चुनाव लड़ा गया तो क्या तुम उस के भी खुर पकड़ लोगे? हद है तुम लोगों की भी. जब चुनाव के लिए मुद्दे न बचे तो मुझ लावारिस गाय को ही चुनावी मुद्दा बना लिया. कम से कम हम ढोरों को तो छोड़ देते देश के कर्णधारो.’’

‘‘हे गऊ मैया, यह वक्त बहस करने का नहीं है. जैसेतैसे चुनावी तरणी पार लगाने का है. अब के जो तुम मुझे जिता दोगी तो मैं तुम्हें वचन देता

हूं कि तुम्हारे लिए एक फाइवस्टार तबेला बनवाऊंगा.

‘‘हे गऊ, मैया, अगर तुम मुझे जीत का आशीर्वाद दोगी तो मैं हर गलीमहल्ले से वहां के लोगों को बेदखल कर तुम्हारे लिए आलीशान गौशाला बनवाऊंगा.

‘‘जो तुम मुझे जीत का आशीर्वाद दोगी तो मैं तुम्हें सड़क से उठा कर संसद में ले जाऊंगा.

‘‘तुम मुझे जीत का आशीर्वाद दोगी तो मैं तुम्हें राष्ट्रमाता घोषित करवाऊंगा. तुम मुझे जीत का आशीर्वाद दोगी तो…’’ कहतेकहते उन का गला सूख गया.

यह देख कर अपने मुंह में देश का कचरा जुगालती गाय ने अपने मुंह में की गई जुगाली में से कुछ हिस्सा उन के मुंह में डाला तो वे उस से अपना मुंह गीला कर आगे कहने लायक हुए, ‘‘हे गऊ मैया, जो तुम मुझे अपना आशीर्वाद दोगी तो मैं…’’

तभी गाय ने उन्हें जोर से लात मारी और उन की नींद की खुमारी झट से गायब हो गई. वे इधरउधर ताकते हुए घर के अंदर भागे.

पान मसाला : कम कीमत का जहर

लोग जितनी कीमत का पान मसाला रोज खा जाते हैं उस से कम खर्च में अपने घर की औरतों के लिए माहवारी में इस्तेमाल होने वाले सैनेटरी पैड खरीद सकते हैं.

पान मसाला खाने से सेहत को नुकसान होता है, जबकि सैनेटरी पैड का इस्तेमाल कर के घर की औरतों को अंदरूनी बीमारियों से बचाया जा सकता है. पान मसाले का प्रचार इस के सेवन को बढ़ाने का काम करता है.

दिल्ली प्रैस एक ऐसा प्रकाशन समूह है जो अपनी किसी भी पत्रिका में पान मसाले का प्रचार नहीं करता है. जब देश में तंबाकू मिले पान मसालों का प्रचार धड़ल्ले से होता था, तब भी दिल्ली प्रैस समूह पान मसाले का बिलकुल प्रचार नहीं करता था.

कोर्ट के बहुत सारे फैसले और बैन भी पान मसाले को बिकने से नहीं रोक पाए हैं. इस की सब से बड़ी वजह पान मसाले का होने वाला प्रचार है. सैरोगेट इश्तिहारों के जरीए समाज में इन का धड़ल्ले से प्रचार हो रहा है.

सब से बड़ी बात यह है कि समाज के हीरोहीरोइन समझे जाने वाले चेहरे और समाज को सही राह दिखाने वाला चौथा स्तंभ मीडिया भी इस प्रचार में बराबर का कुसूरवार है.

कानून ने तंबाकू मिले पान मसालों के प्रचार पर रोक लगाई है. अब पान मसाले का प्रचार करने वाले एक जगह छोटा सा ‘तंबाकू रहित’ लिख कर उसी पाउच का प्रचार करते हैं जिस में तंबाकू मिला पान मसाला बेचा जाता है.

कानून से बचने के लिए सैरोगेट इश्तिहार का सहारा केवल पान मसाले के प्रचार में ही नहीं, बल्कि शराब के इश्तिहार में भी दिखता है.

साल 1983 के आसपास की बात है. पान मसाला पाउच के रूप में बिकने के लिए बाजार में उतारा गया था. कम कीमत में लोगों तक पहुंचाने की होड़ में सभी एकदूसरे को पछाड़ने के लिए मैदान में उतर आए थे. उस समय इस की कीमत रिटेल बाजार में 50 पैसे प्रति पाउच से ले कर एक रुपए तक रखी गई थी. इसी कीमत में पान मसाला बनाने वाली कंपनी, छोटीछोटी दुकानों तक पान मसाला पहुंचाने वाले डीलरों और पान की दुकान वालों का फायदा भी शामिल होता है.

इस के अलावा बाजार में अपने सामान को सब से ज्यादा बेचने के लिए प्रचारप्रसार का खर्च भी करना पड़ता है. पान मसाला, सुपारी, कत्था, इलायची, केसर और तंबाकू को मिला कर बनाया जाता है. अगर साल 1983 और साल 2018 में इन सामानों की कीमत को देखा जाए तो यह अब तकरीबन कई गुना बढ़ चुकी है.

सरकार ने शुरुआत में इस कारोबार को हर तरह के टैक्स से भी अलग रखा था. पान मसाला कारोबार की तरक्की देख कर सरकार को लगा कि इस पर टैक्स लगा कर कमाई की जा सकती है.

इस के बाद गुटका और पान मसाला कारोबार पर टैक्स भी लगा दिया गया, पर इस के बाद भी गुटका और पान मसाला बनाने वालों ने इस की कीमत को बढ़ाने का जोखिम नहीं लिया था. उन को लगता था कि अगर गुटका और पान मसाला के दाम बढ़ जाएंगे तो लोग इस को खाना कम कर सकते हैं. कम कीमत के बावजूद भी यह उद्योग दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करता रहा.

आज के समय में सब से कम कीमत का पान मसाला 3 रुपए और सब से ज्यादा कीमत वाला पान मसाला 15 रुपए से ऊपर प्रति पाउच तक हो सकता है.

कम कीमत का राज

देश में पान मसाला और गुटका के 2,500 से ज्यादा ब्रांड बिकते हैं. यह कारोबार अब 500 अरब रुपए से भी ज्यादा का हो गया है.

सवाल उठता है कि जब गुटका और पान मसाला में डाली जाने वाली हर चीज के दाम बढ़ गए हैं तो इस की कीमत कम कैसे रखी जा रही है?

दरअसल, यही बात साबित करती है कि गुटका को सस्ती कीमत का जहर क्यों कहा जाता है. जानकारी के हिसाब से गुटका बनाने में 15 से 30 रुपए किलो मिलने वाली सुपारी और कत्था की जगह पर कम कीमत के गैंबियर का इस्तेमाल किया जाता है.

यह सामान मलयेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड से मंगाया जाता है. इन देशों में सुपारी को इतना खराब माना जाता है कि इस को सड़क बनाने में भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

गैंबियर एक किस्म का पत्थर होता है, जिस का इस्तेमाल चमड़ा उद्योग में चमड़े को रंगने में किया जाता है. गैंबियर चमड़े में खिंचाव पैदा करता है. जो गैंबियर चमड़े में खिंचाव पैदा कर सकता है, वह खाने वाले के मुंह का क्या हाल करता होगा, इस को आसानी से समझा जा सकता है.

इस उद्योग पर सरकार कुछ इस तरह से मेहरबान है कि इस के लिए कोई नियमकानून नहीं बनाया है. गैंबियर से कत्थे के पेस्ट को बनाने का काम भी किया जा रहा है जिस का इस्तेमाल पान की दुकान चलाने वाले भी पान लगाने में करते हैं.

पान मसाले को बनाने का काम कानपुर और गाजियाबाद में गलत तरीके से किया जा रहा है. पनवाड़ी महंगे कत्थे की जगह इस में सस्ते किस्म का कत्था पेस्ट इस्तेमाल करते हैं.

सेहत के लिए जहर

अमेरिका के हौकिंस इंस्टीट्यूट ने कानपुर के रीजनल कैंसर सैंटर और तिरुअनंतपुरम के डाक्टरों द्वारा देश के कुछ प्रीमियम पान मसालों और गुटकों की जांच कराई थी. जांच में इन सभी में कुछ न कुछ कैंसर बढ़ाने वाली वजहें पाई गई थीं. जांच में इन में गैंबियर भी पाया गया.

कैंसर इंस्टीट्यूट के डाक्टरों की रिपोर्ट भी यही कहती है कि गैंबियर ‘बकल म्यूकोसा’ को बढ़ाता है. इस से धीरेधीरे मुंह का खुलना बंद हो जाता है. मुंह के अंदर भूरे और सफेद रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं. इस को खाने वाला ‘सबम्यूकस फाइब्रोसिस’ का शिकार हो जाता है. यही आगे चल कर कैंसर में बदल जाता है.

गैंबियर का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि यह मुंह के अंदर ज्यादा लार बनाता है. खतरनाक बात यह है कि गैंबियर का लंबे समय तक सेवन करने के चलते इस को छोड़ना आसान नहीं होता है.

पान मसाले और गुटके की लत मर्दों और औरतों में खतरनाक ढंग से फैल चुकी है. बच्चे और किशोरों के साथसाथ नौजवान भी इस की चपेट में आ चुके हैं. यही वजह है कि मुंह के कैंसर के मरीजों की तादाद 15 सालों में दोगुनी हो चुकी है. इन में बड़ी तादाद नौजवानों की है.

पान मसाला और गुटका बेचने वाले कई तरह की दूसरी बंदिशों का भी पालन नहीं करते हैं. कत्था पेस्ट तो बिना किसी तरह की जानकारी के बेचा जा रहा है.

कत्था पेस्ट के इन डब्बों और पाउचों पर बनाने वाली कंपनी का नाम, पता और कीमत तक नहीं लिखी रहती है. इस को किस चीज से बनाया गया है, इस में यह भी नहीं लिखा जाता है.

बेफिक्र सरकार

पान मसाला और गुटका कारोबार में तमाम तरह की गड़बडि़यों से सरकार बेफिक्र नजर आती है. पीने के पानी और दूसरी चीजों के लिए तमाम तरह के मानक तय किए गए हैं. सरकार ने गुटका कारोबार के लिए किसी तरह का मानक तय नहीं किया है. इस के चलते इस का कारोबार करने वाले कई तरह का खराब सामान इस में मिला देते हैं.

उत्तर प्रदेश में जब मायावती की सरकार थी, उस समय गुटका और पान मसाला के कारोबार को बंद करने का फैसला किया गया था.

मायावती सरकार अपने फैसले को अमल में लाती, इस के पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ गया था.

इस के बाद दूसरी सरकारों ने गुटका कारोबार पर पाबंदी लगाने के बारे में कोई नियमकानून नहीं बनाया. अगर पान और गुटका बनाने वाले इसी तरह खराब चीजों को इस में मिलाते रहे तो लोगों की जान जाती रहेगी.

पान मसाला के पाउच पर चेतावनी लिखने के बाद भी खाने वालों की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा है. इस की वजह यह है कि गुटका और पान मसालों का प्रचार बहुत ही शानदार तरीके से किया जाता है.

कई इश्तिहारों में तो पान मसाला खाने को शान की बात बताई जाती है. इस को कामयाबी से भी जोड़ा जाता है. वहीं दूसरी ओर मीडिया में इस का प्रचार बहुत होता है. देश में बड़ीबड़ी जगहों पर भी इस का प्रचारप्रसार होता है.

जेब पर भारी कहने के लिए पान मसाला और गुटका की कीमत औसतन 3 रुपए से 5 रुपए प्रति पाउच होती है, पर यह नशा जेब पर भारी पड़ता है. दिनेश नामक एक लड़का बताता है, ‘‘मैं दिन में 25 पाउच गुटका खा जाता हूं. कुछ लोग तो एकसाथ 2-2 पाउच खाते हैं. इस तरह वे दिन में 75 से 100 रुपए के पाउच खा जाते हैं. यानी एक आदमी तकरीबन 100 रुपए का पान मसाला रोज खा जाता है.’’

गुटका खाने वाले गरीब और मिडिल क्लास परिवार के लोग होते हैं. उन के लिए 50 रुपए रोज का गुटका जेब पर भारी पड़ता है. महीने में कम से 1,500 से 3,000 रुपए का गुटका ये लोग खा जाते हैं. बहुत दिन गुटका खाने से बीमारियां भी हो जाती हैं. उन के इलाज में भी काफी रुपए खर्च हो जाते हैं.

अगर किसी को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी हो जाती है तो उस का इलाज कराने के लिए घर और जमीन तक बेचने के हालात बन जाते हैं. इस तरह का नशा करने वाले अपनी सेहत के साथसाथ सामाजिक हालत को भी खराब करते हैं. इस को छोड़ना आसान होता है, केवल यह तय करना होता है कि इस का आदी शख्स इस नशे को छोड़ना चाहता है.

नशे को पूरी तरह से छोड़ने की कोई दवा नहीं होती है. नशा छोड़ने के बाद शरीर में कुछ बदलाव होता?है. शरीर पर इस के बुरे असर को दूर करने के लिए दवा दी जाती है.

पान मसाला से ज्यादा जरूरी है सैनेटरी पैड

‘नई रोशनी’ संस्था को चलाने वाली सोनिया सिंह कम कीमत पर माहवारी में इस्तेमाल होने वाले सैनेटरी पैड तैयार कर के जरूरतमंद औरतों को देती हैं. पान मसाला और सैनेटरी पैड की तुलना को ले कर उन से 3 सवाल :

लोगों को आप कैसे समझाती हैं?

हम ने अपनी संस्था की लड़कियों का एक नाटक तैयार किया है. हम उस को जगहजगह दिखाते हैं. इस के जरीए सैनेटरी पैड की जरूरत को समझाते हैं. इन का इस्तेमाल न करने से किस तरह की बीमारियों का खतरा होता?है, यह बताते हैं.

लोगों पर क्या असर पड़ता है?

पान मसाला एक तरह का नशा होता है. हमारे बताने पर लोग सहमत तो होते हैं, पर यह बात उन को ज्यादा समय तक याद नहीं रहती है. आदमी ही नहीं, बल्कि औरतों को भी यह याद नहीं रहता कि उन के लिए सैनेटरी पैड पान मसाला खाने से ज्यादा जरूरी है.

खर्च की तुलना करें तो कितना फर्क आता है?

पान मसाला खाना वाले लोग कम से कम 50 रुपए से 100 रुपए हर रोज खर्च करते हैं जबकि सैनेटरी पैड में यह खर्च पूरे महीने का होता है. हम यही बात सब को समझाते हैं. बारबार समझाने से इस का अच्छा असर पड़ रहा है.

फिर से इंटरनेट पर छाये पवन सिंह

भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार पवन सिंह और मशहूर एक्टर प्रीति विस्‍वास की जोड़ी फिल्‍म ‘मैंने उनको सजन चुन लिया’ में नजर आने वाली है. बता दें इस फिल्‍म का गाना ‘चुम्मा गगरी भर के दिहा’ यू-ट्यूब चैनल डीआरजे रिकौर्डस भोजपुरी  पर रिलीज किया गया है, जिसे लोग खुब पसंद कर रहे हैं. इस फिल्म में प्रीति विस्‍वास ,आम्रपाली दुबे, काजल, अंजना सिंह भी नजर आएंगी.

फिल्‍म ‘मैंने उनको सजन चुन लिया’ को लेकर पवन सिंह काफी उत्‍साहित हैं और कहते हैं कि डीआरजे रिकौर्डस भोजपुरी  पर फिल्‍म के ट्रेलर को दर्शकों ने खूब प्‍यार दिया है. ट्रेलर की तरह फिल्‍म भी बेहतरीन बनी है और मेरा किरदार इसमें अब तक के सभी किरदार से अलग है. मैंने इस फिल्‍म में अलग–अलग तरीके के एक्‍शन स्‍टंट किए हैं. साउथ से आने वाले एक्‍शन डायरेक्‍टर एस मलेश को धन्‍यवाद कहना चाहूंगा, क्‍योंकि उन्‍होंने मुझसे एक से एक शानदार स्‍टंट करने के लिए प्रेरित किया. जिसकी एक झलक आपको ट्रेलर में मिलेगी, बांकी के लिए आपको फिल्‍म देखनी होगी.

श्रीदेवी की मौत से पहले अमिताभ ने लिखी थी ये बात, हैरान थे लोग

बीते रविवार श्रीदेवी की पहली पुण्यतिथि थी. पिछले साल 24 फरवरी को श्रीदेवी की दुबई में होटल के एक बाथटब में डूब कर मौत हो गई थी. उनकी अचानक मौत की खबर ने सबको चौका दिया. पर इस सब के बीच एक अनोखी और हैरान कर देने वाली चीज हुई. श्रीदेवी की मौत की खबर से कुछ ही देर पहले अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया था कि, न जाने क्यूं, एक अजीब सी घबराहट हो रही है!!  


आपको बता दें कि  फिछले साल 24 फरवरी की सुबह 11:45 पर अमिताभ ने इस ट्वीट को किया. और कुछ ही देर बात श्रीदेवी के मौत की खबर मिली. आपको बता दें कि अमिताभ और श्रीदेवी ने बहुत से फिल्मों में साथ में काम किया था. इनमें खुदा गवाह, आखिरा रास्ता, इंकलाब जैसी फिल्में शामिल हैं.

श्रीदेवी की पहली पुण्यतिथि पर बौतीवुड के कई स्टार्स ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. अपनी मां को याद करते हुए एक्ट्रेस जाह्नवी कपूर ने लिखा कि, मेरा दिल हमेशा भारी रहेगा लेकिन मैं हमेशा मुस्कुराती रहूंगी क्योंकि दिल में तुम हो.

वहीं कोरियोग्राफर फराह खान ने श्रद्धांजलि संदेश में लिखा कि, जब मैं अपने करियर की शुरुआत कर रही थी तो उन्होंने मेरा काफी सपोर्ट किया. उस समय किसी कोरियोग्राफर के लिए श्रीदेवी के गाने या शो में कोरियोग्राफी करना सपना होता था. उन्होंने लिखा कि श्रीदेवी के जैसा न कोई था और न कोई होगा.

डेढ़ सौ करोड़ की मालकिन शुभांगना की मौत की मिस्ट्री

“मैम साहब, दरवाजा खोलिए, मैं आप के लिए चाय लाई हूं.’’ नौकरानी टीला ने शुभांगना के कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए कहा. कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो टीला ने दोबारा दरवाजा खटखटाते हुए कहा, ‘‘मैम साहब, सुबह के 6 बज गए हैं, दरवाजा खोलिए.’’

इस बार भी न तो दरवाजा खुला और न ही कमरे के अंदर से हलचल की कोई आवाज आई. चिंतित हो कर टीला सोचने लगी कि मैम साहब आज उठ क्यों नहीं रही हैं? उस ने दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया. उस ने कमरे के अंदर जो देखा, उसे देख कर हैरान रह गई. शुभांगना कमरे में लगे पंखे से लटक रही थी. उसे इस हालत में देख कर उस की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. थोड़ी देर में होश ठिकाने आए तो उस ने चाय की ट्रे मेज पर रखी और तेजी से सीढि़यां उतरते हुए पहली मंजिल पर पहुंच कर अपने कमरे में सो रहे शुभांगना के 15-16 साल के बेटे मिहिर को झिंझोड़ कर जगाया.

मिहिर आंखें मलते हुए उनींदा सा उठा तो घबराई हुई टीला ने कहा, ‘‘बेटा, मैम साहब को पता नहीं क्या हो गया है? वह अपने कमरे में पंखे से लटकी हुई हैं.’’

टीला की बात सुन कर मिहिर चौंका. वह तेजी से कमरे से निकला और घर में लगी लिफ्ट से दूसरी मंजिल पर मम्मी के कमरे में पहुंचा. टीला भी उस के साथ थी. मिहिर ने मम्मी को पंखे से लटकी देखा तो उस की भी कुछ समझ में नहीं आया. उस ने ‘मम्मीमम्मी’ 2-3 बार आवाज लगाई. मम्मी जीवित होतीं तब तो जवाब देतीं. मिहिर रोने लगा. उसे रोता देख कर टीला भी रोने लगी. उस ने रोतेरोते ही कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं?’’

‘‘मैं पापा और नानाजी को फोन करता हूं.’’ रोते हुए मिहिर ने कहा.

नाना को बताई हकीकत

इस के बाद मिहिर ने रोतेरोते नानाजी प्रेम सुराणा और पापा राजकुमार सावलानी को फोन कर के बताया कि मम्मी अपने कमरे में पंखे से लटकी हुई हैं. घर में कोई बड़ा और समझदार आदमी नहीं था. मिहिर अभी किशोर था, और टीला नौकरानी. उन की समझ में कुछ नहीं आया तो दोनों प्रेम सुराणा और राजकुमार सावलानी के आने का इंतजार करने लगे.

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कुछ ही देर में प्रेम सुराणा बेटी शुभांगना के बंगले पर पहुंच गए. वह लिफ्ट से सीधे दूसरी मंजिल पर स्थित शुभांगना के कमरे में पहुंचे. नाना को देख कर मिहिर उन से लिपट कर जोरजोर से रोते हुए बोला, ‘‘नानाजी, मम्मी को क्या हो गया है?’’

बेटी को पंखे से लटकी और नाती को इस तरह रोते देख कर प्रेम सुराणा को जैसे लकवा मार गया. मुंह से कोई शब्द नहीं निकला. उन की आंखें पथरा सी गईं. पल, दो पल बाद वह थोड़ा संयमित हुए तो उन की आंखों से भी आंसू टपक पडे़े.

यह कैसे और क्या हो गया, यह सब सोचने और समझने का समय प्रेम सुराणा के पास नहीं था. शुभांगना ने जींस और टौप पहन रखी थी, साथ ही वह पूरे गहने भी पहने हुए थी. प्रेम सुराणा ने शुभांगना के कमरे में रखी सैंटर टेबल पर टिके पैरों को पकड़ कर ऊपर उठाया और उस के गले में पड़े चुन्नी के फंदे को निकाला. उन की इस कोशिश में वह नीचे गिर पड़ी. उन्होंने शुभांगना की नब्ज टटोली तो वह शांत थी. लेकिन वह पिता थे, इसलिए उन का मन नहीं माना और वह उसे सवाई मान सिंह अस्पताल ले गए. अस्पताल के डाक्टरों ने प्राथमिक जांच के बाद शुभांगना को मृत घोषित कर दिया. प्रेम सुराणा फफकफफक कर रोने लगे. शुभांगना की मौत स्वाभाविक नहीं थी, इसलिए उन्होंने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी.

इंस्टीट्यूशंस की चेयरपर्सन थीं शुभांगना

यह इसी 26 अगस्त, 2017 की सुबह की बात है. शुभांगना गोखले मार्ग, जयपुर की पौश कालोनी सी स्कीम में बने अपने बंगले में रहती थी. वह राजस्थान के प्रतिष्ठित दीपशिखा एजुकेशन इंस्टीट्यूट समूह के मालिक प्रेम सुराणा की बेटी थी. वह खुद जसोदा देवी कालेजेज एंड इंस्टीट्यूशंस चलाती थी और इन इंस्टीट्यूशंस की चेयरपर्सन भी थी.

सुराणा की सूचना पर थाना अशोक नगर के एसआई कृष्ण कुमार सहयोगियों के साथ शुभांगना के बंगले पर पहुंच गए. पुलिस ने शुभांगना के कमरे से वह चुन्नी जब्त कर ली थी, जिस के फंदे में वह लटकी मिली थी. पुलिस सवाई मान सिंह अस्पताल भी गई, जहां शुभांगना की लाश को कब्जे में ले कर उस का पोस्टमार्टम करवाया. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई.

शुभांगना की मौत जयपुर के अमीर घरानों में चर्चा का विषय बन गई. इस की वजह यह थी कि वह डेढ़, दो सौ करोड़ रुपए की संपत्ति की मालकिन थी. ऐसे में उस की इस तरह हुई मौत पर तरहतरह के सवाल उठने लगे. सब से बड़ा सवाल यह था कि शुभांगना ने फंदा लगा कर खुद जान दी या उसे मार कर इस तरह लटका कर आत्महत्या का रूप दिया गया था. कहानी आगे बढ़ने से पहले शुभांगना के बारे में जान लेना जरूरी है.

प्रेम सुराणा की बेटी शुभांगना शादी से पहले अपना नाम रुचिरा सुराणा लिखती थी. सुराणा परिवार जयपुर की पौश कालोनी बनीपार्क में रहता था. रुचिरा तब 16-17 साल की थी, जब उसे फिल्में देखने और गाने सुनने का शौक लगा. राजकुमार सावलानी बनीपार्क की सिंधी कालोनी में वीडियो लाइब्रेरी चलाता था. यह उस समय की बात है, जब फिल्में या तो थिएटर में या वीसीआर द्वारा देखी जाती थीं. वीसीआर में वीडियो कैसेट लगती थी.

राजकुमार के हाथ लगी स्वर्णमृगी

रुचिरा वीडियो कैसेट्स लेने अकसर राजकुमार की वीडियो लाइब्रेरी जाती रहती थी. धीरेधीरे रुचिरा का राजकुमार के यहां आनाजना बढ़ता गया. राजकुमार भी उस समय 18-19 साल का था. जवानी की दहलीज पर खड़ी रुचिरा की उम्र नाजुक दौर से गुजर रही थी. ऐसे में कब वह पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर फिसल गई, किसी को पता नहीं लगा.

कहा जाता है कि नौवीं तक पढ़ा राजकुमार वीडियो लाइब्रेरी चलाने से पहले अंडे का ठेला लगाता था. लेकिन अपने नाम के अनुसार, वह खूबसूरत था. शायद यही वजह थी कि उम्र के नाजुक दौर से गुजर रही रुचिरा उस के आकर्षण में खिंचती चली गई. रुचिरा नाबालिग थी, लेकिन राजकुमार बालिग था. रुचिरा पैसे वाले बाप की बेटी थी, इसलिए राजकुमार उस से प्रेम की पींगे बढ़ाता गया. उस के मोहपाश में बंधी रुचिरा न अपना भलाबुरा सोच पाई न ऊंचनीच.

कहा जाता है कि राजकुमार ने रुचिरा को मानसिक रूप से इतना इमोशनल बना दिया था कि वह उस के कहने पर अपना सब कुछ गंवाने को तैयार थी. आखिर सारे बंधन तोड़ कर रुचिरा ने घर वालों की मर्जी के खिलाफ जा कर सन 1997 में दिल्ली जा कर आर्यसमाज मंदिर में राजकुमार सावलानी से शादी कर ली. शादी के बाद उस ने नाम बदल कर शुभांगना सावलानी रख लिया.

शुभांगना ने भले ही घर वालों की मर्जी के खिलाफ जा कर दूसरी जाति के अपनी हैसियत से कम वाले राजकुमार से शादी कर ली थी, लेकिन पिता प्रेम सुराणा ने उस का साथ नहीं छोड़ा. वह उसे पहले की तरह ही लाड़प्यार करते रहे. शुभांगना पढ़ीलिखी थी, उसे पिता के व्यवसाय की भी अच्छी समझ थी. इसलिए राजकुमार से शादी के बाद उस ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमाया.

पिता प्रेम सुराणा से जो भी हो सका, मदद की. धीरेधीरे उस ने एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस स्थापित कर लिए. वहीं, राजकुमार ने भी अन्य व्यवसाय कर लिए. दोनों ने मेहनत से पैसा कमाया. धीरेधीरे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी होती चली गई. इस बीच राजकुमार और शुभांगना के 2 बच्चे हुए. पहली बेटी वृद्धि, उस के बाद बेटा मिहिर.

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बढ़ता व्यवसाय

पैसा आया तो राजकुमार ने अपने छोटेमोटे धंधे छोड़ कर इंपोर्टएक्सपोर्ट का काम शुरू कर दिया. अब उस की गिनती बडे़ बिजनैसमैनों में होने लगी. प्रेम सुराणा ने शुभांगना को जयपुर के गोखले मार्ग की पौश कालोनी की सी स्कीम में एक बंगला गिफ्ट कर दिया. शुभांगना और राजकुमार बच्चों के साथ उसी बंगले में रहते थे. बाद में राजकुमार और शुभांगना ने अन्य व्यवसाय के साथ जैसलमेर में एक रिसौर्ट भी शुरू किया, लेकिन फिलहाल वह घाटे में चल रहा है.

शुभांगना और राजकुमार के जसोदा देवी कालेजेज एंड इंस्टीट्यूशंस के तहत जयपुर में 4 पौलिटैक्निक, एक बीएड, एक आईटीआई, बीबीए, बीसीए एवं पीसीडीसीए कालेज चल रहे हैं. इन के अलावा उन्होंने कई बेशकीमती फ्लैट और चलअचल संपत्तियां भी खरीदीं. राजकुमार और शुभांगना की गिनती जयपुर के धनीमानी लोगों में होने लगी थी.

शुभांगना तो बचपन से ही अमीर घर में पलीबढ़ी थी, इसलिए उसे घूमनेफिरने, पार्टियों में जाने आदि के महंगे शौक थे. पैसा आया तो शुभांगना अपने शौक पूरे करने लगी. हाईप्रोफाइल जिंदगी जीने वाली शुभांगना जयपुर में पेज थ्री का जानामाना चेहरा और सोशलाइट थी. रोजाना लाखों रुपए में खेलने वाले राजकुमार को भी महंगे शौक लग गए थे. उसे महंगी कारों का शौक था. उस के पास एक करोड़ रुपए की कीमत की जगुआर एक्सजे, 42 लाख रुपए की औडी ए4, 60 लाख रुपए की लैंड रोवर और 78 लाख की बीएमडब्ल्यू जेड 4 जैसी महंगी कारें थीं. दोनों को अकसर जयपुर में होने वाली हाईप्रोफाइल पार्टियों में देखा जाता था. राजकुमार को भी घूमनेफिरने, महंगे होटलों में एंज्वौय करने, हवाई यात्राएं करने और ऐशोआराम की जिंदगी जीना आ गया था.

राजकुमार और शुभांगना की गृहस्थी बढि़या चल रही थी. सन 2014 में दोनों गोवा घूमने गए, वहीं किसी बात को ले कर दोनों के बीच पहली बार विवाद हुआ. धीरेधीरे यह विवाद बढ़ता गया. शुभांगना ने राजकुमार के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी की. इस के बाद शुभांगना ने तलाक का मुकदमा दायर कर दिया. 8 महीने पहले शुभांगना ने पिता द्वारा गिफ्ट किए गए बंगले पर और सीतापुरा स्थित कालेज में राजकुमार के आने पर रोक लगा दी. इस के बाद वह बंगले में बेटे मिहिर और नौकरानी टीला के साथ रहने लगी.

गोखले मार्ग पर बने जिस बंगले में शुभांगना रहती थी, वह 4 मंजिला है. इस बंगले में 3 ही लोग रहते थे. कोई मेहमान आता था तो वह भूतल पर ठहरता था. पहली मंजिल पर मिहिर रहता था. दूसरी मंजिल पर शुभांगना रहती थी. नौकरानी टीला को रहने के लिए बंगले की तीसरी मंजिल पर जगह दी गई थी. बंगले के अंदर ही ऊपरनीचे आनेजाने के लिए लिफ्ट लगी थी. शुभांगना की बेटी वृद्धि मुंबई में पढ़ रही थी, जबकि बेटा मिहिर मां के साथ रहते हुए जयपुर में ही निजी स्कूल में पढ़ता था.

शुभांगना की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी प्रेम सुराणा को विश्वास नहीं हो रहा था कि बेटी इस तरह आत्महत्या कर सकती है. इसलिए उन्होंने शुभांगना के पति राजकुमार पर हत्या का आरोप लगाते हुए थाना अशोक नगर पुलिस को एक तहरीर दी, जिस में तीन स्तरों पर जांच कराने की बात कही गई थी.

एक- राजकुमार शुभांगना की हत्या कर सकता है. दो- खुद के बजाय किसी अन्य व्यक्ति से हत्या करवा सकता है. तीसरी- शुभांगना को प्रताडि़त कर आत्महत्या के लिए उकसा सकता है.

पुलिस ने प्रेम सुराणा की तहरीर पर राजकुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. शुभांगना के पिता और घर के अन्य लोगों के अनुसार, शुभांगना को या तो हत्या कर के पंखे से लटकाया गया था या बेहोशी की हालत में. उन्होंने इस बारे में तर्क भी दिए.

शुभांगना की मौत पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि 25 अगस्त की रात करीब साढ़े 10 बजे और 26 अगस्त की सुबह 4 बजे आधेआधे घंटे तक उस की राजकुमार से मोबाइल फोन पर बात हुई थी. जबकि दोनों के बीच बातचीत बंद थी और तलाक का मुकदमा चल रहा था. घर वालों का कहना है कि शुभांगना ने अचानक राजकुमार से बात क्यों की? आरोप है कि किसी अन्य व्यक्ति ने शुभांगना के मोबाइल से राजकुमार का नंबर लगाया. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि शुभांगना ने पार्टी वीयर और गहने पहन कर आत्महत्या क्यों की? जबकि शाम को कालेज से घर आते ही वह सामान्य कपड़े पहन लेती थी.

शुभांगना ने सीतापुरा स्थित कालेज और बंगले पर राजकुमार के आने पर रोक लगा रखी थी. इस के बावजूद घटना से पहले एक सप्ताह में वह 2 बार कालेज गया. उस की 25 अगस्त की रात 10 बज कर 6 मिनट पर कालेज आने और 26 अगस्त की सुबह 7:02 बजे बाहर जाने की एंट्री दर्ज है. इस से पहले राजकुमार 22 अगस्त को भी कालेज गया था. सवाल उठ रहा है कि घटना की रात राजकुमार कालेज क्यों गया था?

मीडिया ने केस का रंग बदला

पुलिस ने शुभांगना की मौत को आत्महत्या का सामान्य मामला मानते हुए जांच शुरू की थी. यह हाईप्रोफाइल मामला मीडिया की सुर्खियों में आया तो पुलिस ने गहराई से जांच शुरू की. पुलिस ने शुभांगना का मोबाइल फोन और डायरी जब्त कर ली है. शुभांगना डायरी लिखती थी.

टीला के अनुसार, 25 अगस्त की रात खाना खा कर शुभांगना सो गई थी. 26 अगस्त की सुबह जब वह मैम साहब के लिए चाय ले कर गई तो वह पंखें से लटकी मिलीं. शुभांगना के पड़ोसियों और कालेज स्टाफ से भी पूछताछ की गई है. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी है. शुभांगना के घर के आसपास लगे कैमरों में 25 अगस्त की रात उस के घर कोई आदमी आता दिखाई नहीं दिया. शुभांगना के अपने बंगले पर 2 गार्ड भी रहते थे, पुलिस को उन से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली.

पुलिस ने एक सितंबर को राजकुमार को थाने बुला कर सुबह से रात तक कई दौर में पूछताछ की. वकील की मौजूदगी में हुई इस पूछताछ में राजकुमार ने पुलिस को बताया कि इसी साल जुलाई में शुभांगना से उस का दोबारा संपर्क हुआ था. राजकुमार के परिचितों का कहना है कि कालेज राजकुमार संभालता था. उस के कालेज में जाने से रोक लगाने के बाद कालेज की स्थिति बिगड़ने लगी थी. तब जुलाई में शुभांगना ने उसे फोन किया था.

इस के बाद भी उस ने कई बार संपर्क किया. इस बार कालेज में उम्मीद के मुताबिक बच्चों के प्रवेश नहीं हुए थे. इस की वजह से भी वह मानसिक रूप से परेशान थी. राजकुमार ने शुभांगना को समझाया भी था. राजकुमार के मोबाइल में इस से संबंधित सबूत मौजूद बताए जाते हैं. पुलिस ने राजकुमार के 2 मोबाइल फोन जब्त किए हैं. उन में राजकुमार और शुभांगना की बातों की कुछ कौल रिकौर्डिंग हैं.

आरोपप्रत्यारोप

पता चला है कि घटना से 5-6 दिनों पहले शुभांगना ने अपने जेठ और सास को फोन कर के घर बुलाया था. मां और भाई ने राजकुमार को भी वहां बुलाया था, लेकिन वह नहीं आया.

बाद में शुभांगना उसे अपनी गाड़ी से ले कर आई थी. उस समय शुभांगना ने राजकुमार से कहा था कि पापा को उस के यहां आने का पता नहीं चलना चाहिए. शुभांगना का जयपुर के मनोचिकित्सक से इलाज चलने की भी बात कही जा रही है.

दूसरी ओर प्रेम सुराणा और शुभांगना के वकील अनिल शर्मा ने राजकुमार और उस के घर वालों पर कई तरह के आरोप लगाए हैं. प्रेम सुराणा का कहना है कि राजकुमार के कई लड़कियों, महिला कर्मचारियों और नौकरानी से संबंध थे. शुभांगना को जब इन बातों का पता चला तो उस ने राजकुमार को टोका. तब शराब के नशे में वह शुभांगना से मारपीट करने लगा.

उस ने कालेज में भी लाखों रुपए का घोटाला किया है. वह शुभांगना की जासूसी भी कराता था. उन्होंने राजकुमार पर शुभांगना की हत्या का शक जताते हुए पुलिस अधिकारियों को कुछ दस्तावेजी सबूत भी दिए हैं. इन में मौत से पहले शुभांगना की ओर से अपने वकील को भेजे गए ईमेल और वाट्सएप पर राजकुमार से हुई बातचीत के अंश शामिल हैं.

प्रेम सुराणा का कहना है कि पुलिस इस मामले में ढंग से जांच नहीं कर रही है. शुभांगना की मौत के मामले में 6 सितंबर को वह समाज के कुछ लागों को ले कर जयपुर में राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया से मिले थे. तब गृहमंत्री ने उन्हें न्याय दिलाने की बात कही थी.

विवादास्पद बातें

शुभांगना के वकील अनिल शर्मा का कहना है कि 25 अगस्त की रात को राजकुमार सीतापुरा स्थित कालेज गया था. उस ने कालेज में रुकने के लिए शुभांगना को फोन किया था.

कालेज में लगे सीसीटीवी कैमरों में राजकुमार के आने की फुटेज थी, जो बाद में नष्ट कर दी गई. उन का यह भी कहना है कि राजकुमार ने शुभांगना के मोबाइल में कोई ऐप डाउनलोड कर दिया था, जिस से जब वह मोबाइल पर किसी से बात करती थी तो वह राजकुमार तक पहुंच जाती थी.

वह जब भी कालेज जाता था, तब वहां आया कैश ले जाता था. शुभांगना के फर्जी हस्ताक्षर कर के उस ने कई जगहों से कर्ज भी लिया था. कुछ दिनों पहले उस ने 90 लाख रुपए का एक फ्लैट बेचा था.

जब वह शुभांगना के साथ रहता था, तब उसे काफी परेशान करता था. कई दिनों के लिए उसे कमरे में बंद कर देता था, खाना भी नहीं देता था. मायके वालों से मिलने पर पाबंदी लगा रखी थी. शुभांगना ने ये सारी बातें वकील प्रदीप शर्मा को ईमेल और वाट्सएप पर लिख कर भेजी थीं.

दूसरी ओर राजकुमार सावलानी का कहना है कि शुभांगना ने 23 अगस्त को उसे घर पर बुलाया था. जब वह नहीं गया तो वह खुद उसे लेने आ गई. घर ले जा कर उस ने नाश्ता कराया था और एक मोबाइल फोन गिफ्ट किया था. नए नंबर ले कर फोन चालू किया, जिस पर शुभांगना के मैसेज और फोन आए थे. 25 अगस्त को जब शुभांगना के मातापिता को पता चला कि वह मुझ से बात कर रही है तो उन्होंने उसे काफी डांटाफटकारा.

शुभांगना पहले से ही मानसिक रूप से परेशान थी, वह दबाव में आ गई. 26 अगस्त की सुबह 3 बज कर 41 मिनट पर मेरे मोबाइल पर उस का मैसेज आया. मैसेज में उस ने कहा था कि ‘मुझे माफ कर दो और कालेज व रिसौर्ट चला दो.’ इस के बाद 4 बजे उस का फोन आया तो उस ने 32 मिनट तक बात की.

वह यही कहती रही कि मेरे मातापिता ने तुम्हारे साथ अच्छा नहीं किया. राजू हम दोनों साथ रहना चाहते हैं, लेकिन मेरे मातापिता नहीं चाहते कि हम साथ रहें. इसी वजह से मैं डिप्रेशन में हूं. अब मुझ से काम भी नहीं संभल रहा है. मैं ने कहा कि इस बारे में सुबह बात करेंगे. सब ठीक हो जाएगा.

राजकुमार का कथन

सुबह बेटे ने फोन कर के बुलाया, तब पता चला कि शुभांगना की मौत हो गई है. राजकुमार ने शुभांगना की मौत के लिए प्रेम सुराणा और उन के घर वालों को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि ‘मैं ने लवमैरिज की थी, यह बात प्रेम सुराणा कभी नहीं भुला पाए. इसीलिए मुझे शुभांगना की मौत के मामले में फंसाना चाहते हैं.’

शुभांगना की मौत की जांच में लापरवाही बरतने के आरोप में 7 सितंबर को थाना अशोक नगर के थानाप्रभारी बालाराम को जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लाइनजाहिर कर दिया था. इस के बाद उन्हें जयपुर रेंज में लगा दिया गया. अब उन्हें थानाप्रभारी न लगा कर नौन फील्ड में रखने के निर्देश दिए गए हैं. उन पर आरोप लगा है कि वह शुभांगना की मौत के मामले में न तो घटनास्थल पर गए और ना ही एफएसएल टीम बुलाई. उन्होंने घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी भी नहीं कराई. लाश का पोस्टमार्टम भी मैडिकल बोर्ड से नहीं कराया गया.

कथा लिखे जाने तक यह हाईप्रोफाइल मामला एक मिस्ट्री बना हुआ था. पुलिस शुभांगना की मौत का रहस्य पता लगाने की कोशिश में जुटी हुई थी. डीसीपी योगेश दाधीच के नेतृत्व में जांच चल रही है. बहरहाल अगर किसी ने अपराध किया है तो कानून उसे अवश्य सजा देगा. लेकिन वृद्धि और मिहिर को अब मां का प्यार कभी नहीं मिल पाएगा.

शुभांगना भले ही अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उस की आंखें इस दुनिया को देख रही हैं. क्योंकि पति राजकुमार और पिता प्रेम सुराणा ने उस की आंखें दान कर दी थीं. शुभांगना की आंखें जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में भर्ती 2 लोगों को प्रत्यारोपित कर दी गई थीं.

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