पुलवामा आतंकी हमला मुहब्बत के दिन मौत की हैवानियत

14 फरवरी, 2019. वैलेंटाइन डे. मतलब इश्क का दिन. जब पूरी दुनिया में प्यार में लिपटे गुलाब फिजाओं में तैर रहे थे, उसी दिन ‘धरती की जन्नत’ कहा जाने वाला खुशरंग कश्मीर लहू के लाल रंग में नहला दिया गया. वहीं के एक खूबसूरत नौजवान आदिल अहमद डार ने डर को ही अपना कफन बना कर जिहाद के नाम पर ऐसी बेवकूफी कर दी जिस ने उस के साथसाथ कई और घरों के चिराग समय से पहले ही बुझा दिए.

ये चिराग देहाती मिट्टी के बने थे और बहुत गरीब घरों की दहलीज से निकल कर देश की सरहद तक पहुंचे थे. इन्होंने अपनी इच्छा से देशसेवा को चुना था और कड़ी मेहनत से अपने बदन को इस कदर लोहा बनाया था कि दुश्मन की एकाध गोली भी उन का कुछ न बिगाड़ सके.

ये जवान सोशल मीडिया के नकली शूरवीर नहीं थे, बल्कि देश के उस बहुजन समाज की नुमाइंदगी करते थे जो खेतीकिसानी और मजदूरी करते हुए भी अपने दिल में देशप्रेम को सब से ऊपर रखता है.

वीरवार, 14 फरवरी, 2019 को ठंड में जकड़े जम्मूकश्मीर के पुलवामा जिले में एक फिदायीन हमले में सीआरपीएफ के ऐसे ही 40 से ज्यादा कर्मठ जवान शहीद हो गए. सरकारी अफसरों के मुताबिक, आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के एक आतंकवादी आदिल अहमद डार ने विस्फोटकों से लदी एक गाड़ी से सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही एक बस को टक्कर मार दी, जिस से यह दिल दहलाने वाला कांड हुआ.

दरअसल, सैंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के 2,500 से ज्यादा जवान 78 गाडि़यों के काफिले में जा रहे थे कि जम्मूकश्मीर हाईवे पर श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर अवंतिपोरा इलाके में लाटूमोड पर इस काफिले पर घात लगा कर हमला किया गया.

यह धमाका इतना जबरदस्त था कि बस के परखच्चे उड़ गए. उस में बैठे जवानों का क्या हुआ होगा, यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सीआरपीएफ के महानिदेशक आरआर भटनागर ने बाद में इस हमले के बारे में बताया, ‘‘यह एक विशाल काफिला था और तकरीबन 2,500 सैन्यकर्मी अलगअलग गाडि़यों में जा रहे थे. धमाका करने के बाद इस काफिले पर कुछ गोलियां भी चलाई गईं.’’

जानकारी के मुताबिक, यह काफिला जम्मू से सुबह के साढ़े 3 बजे चला था और माना जा रहा था कि इसे शाम होने तक श्रीनगर पहुंचना था. काफिले में घाटी लौट रहे सैन्यकर्मियों की तादाद ज्यादा थी, क्योंकि हाईवे पर पिछले 2-3 दिन से खराब मौसम और दूसरी कई प्रशासनिक वजहों से कोई आवाजाही नहीं हो रही थी.

सड़क पर रास्ते की जांच के लिए एक दल को तैनात किया गया था और काफिले में आतंक निरोधक बख्तरबंद गाडि़यां मौजूद थीं. इस हमले में निशाना बनी बस सीआरपीएफ की 76वीं बटालियन की थी और उस में 39 सैन्यकर्मी सवार थे.

जैसे ही यह खबर आग की तरह देशभर में फैली, सोशल मीडिया पर मानो भूचाल सा आ गया. हो भी क्यों न, पिछले कई सालों से कश्मीर पर हो रही बेवजह की राजनीति का खमियाजा मारे गए जवानों ने जो भुगता था.

बहुत से लोगों ने भारतीय सरकार से पाकिस्तान को सबक सिखाने की गुहार लगाई. किसी ने आतंकियों का सिर काट कर लाने की बात कही तो ज्यादातर लोगों ने इस वारदात का जिम्मेदार इसलाम धर्म को ही ठहरा दिया.

विपक्षी दलों ने इस घटना पर कोई ज्यादा राजनीति नहीं खेली. कांग्रेस ने सरकार को आड़े हाथ जरूर लिया कि मोदी राज में यह 5 साल में 17वां बड़ा आतंकी हमला है, पर साथ ही यह भी साफ कर दिया कि वह देश की सुरक्षा से जुड़े इस मसले पर पूरी तरह से सरकार के साथ है.

इस पूरे मामले को गौर से देखने पर यह सवाल उठता है कि हमारी सेना और खुफिया तंत्र से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई कि एक सिरफिरा नौजवान 300 किलो विस्फोटक से भरी एक गाड़ी लाया और उसे जवानों से भरी बस से भिड़ा दिया?

सेना के एक सीनियर अफसर की मानें तो पहले जब सुरक्षा बलों का काफिला चलता था तो बीच में सिविल गाडि़यों को नहीं आने देते थे. लेकिन पिछले कुछ समय से घाटी में हालात थोड़े ठीक हुए थे इसलिए ऐसे काफिलों के आगेपीछे सिविल गाडि़यां चलने लगी थीं. यह लापरवाही ही कही जाएगी जो अब खतरनाक रूप में सामने आई है.

वैसे, आतंकियों ने जिस तरह से इस हमले को अंजाम दिया है, वैसा अकसर अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है. इस हमले में जैश ए मोहम्मद नाम के आतंकी संगठन के ‘अफजल गुरु स्क्वाड’ का नाम सामने आया है. इस दस्ते का नारा है ‘मारो और मर जाओ’. इस का फिदायीन दस्ता बड़ा घातक माना जाता है.

आदिल अहमद डार भी एक ऐसा ही फिदायीन था जो जन्नत के चक्कर में आग का गोला बन कर दूसरों पर कहर की आतिशी बारिश कर गया.

पुलवामा के ही काकपुरा के गुंडीबाग का रहने वाला यह नौजवान एक वीडियो में जो बोला वह जहर ही था जो उस के मन में भर दिया गया था. उस ने कहा, ‘जब तक यह वीडियो आप के सामने आएगा मैं जन्नत में पहुंच चुका हूंगा.’

अब यह ऐसी कौन सी जन्नत है जो धरती के स्वर्ग से भी प्यारी है? वहां गए जिहादियों को ऐसी कौन सी सहूलियतें मिलती हैं जो वे धरती पर पसरी कुदरत की बहार को भी फीका समझने लगते हैं?

सच तो यह है कि कश्मीर 2 देशों के बीच फंसी वही धरती है जहां सेना के साए के बावजूद आतंकवाद का दायरा बढ़ता जा रहा है. साल 1986 के चुनाव में वहां हुई धांधलियों के बाद चरमपंथियों ने अपने पैर पसारने शुरू किए थे.

शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद वहां किसी ऊंचे कद के नेता की घोर कमी हो गई थी. जो लोकल नेता उभरे, वे कट्टर इसलामी सोच से भरे थे. उन्हें छिपेतौर पर पाकिस्तान की शह मिलती थी.

अपने थोड़े से फायदे और भारतीय खुफिया तंत्र के पूरी तरह फेल हो जाने का ही नतीजा था कि आने वाले चंद सालों में कश्मीर अपनों की ही लगाई आग में झुलसने लगा.

इस का सीधा असर कश्मीर की जनता पर पड़ा. वे लोग हर लिहाज से पिछड़ते चले गए. वे यह भी नहीं समझ पा रहे थे कि किस का पक्ष लें. उन का अपनी ही जन्नत से मोह भंग होने लगा. जो रहनुमा लगते थे वे आतंकी संगठन से ज्यादा कुछ नहीं निकले. भारतीय नेताओं ने भी जुमलेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं दिया, इसलिए कश्मीर की जनता को भारतीय सेना अपनी दुश्मन लगी.

14 फरवरी को सीआरपीएफ पर हुआ हमला इसी की कड़ी था. सवाल उठता है कि आतंकियों ने यह जो इतना ज्यादा विस्फोटक इकट्ठा किया वह कहीं से तो आया होगा? अगर वह पाकिस्तान से नहीं लाया गया तो और भी खतरनाक बात है कि ऐसे सामान आसानी से आतंकियों को मिल जाते हैं. फिर तो 2-4 लोग कहीं योजना बनाएं, कोई गाड़ी चुराएं और बना दें किसी को भी मानव बम.

भारतीय खुफिया तंत्र की मानें तो पहले ये मानव बम पाकिस्तान से मंगाए जाते थे, पर अब कश्मीर के लोकल लड़के ही यह काम करने लगे हैं. जैश ए मोहम्मद में ही अब कश्मीरी लड़कों की भरती की जाने लगी है. अगर ये मरते हैं तो कश्मीर में इन के जनाजों में भीड़ जुटती है. सोशल मीडिया पर इन को शहीद बताया जाता है. अब इस ताजा हमले ने कश्मीर को और सुलगा दिया है.

पाकिस्तान पर निशाना

इस आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को कोसना शुरू कर दिया है और उसे सबक सिखाने के लिए दुनियाभर से अपने हक में माहौल बनाना शुरू कर दिया है. अपनी धरती से आतंकी गतिविधियों को चलाने की पाकिस्तान की चाल को उजागर करने के लिए भारत ने दुनिया के कई बड़े देशों से बात की है. लेकिन एक कड़वी हकीकत तो यह भी है कि पाकिस्तान खुद आतंकी हमलों की मार झेल रहा है. वहां के आतंकी संगठनों ने उस की नाक में दम कर रखा है.

वैसे भी पाकिस्तान के साथ सीधी लड़ाई या सर्जिकल स्ट्राइक करने से इस समस्या का हल नहीं होगा. युद्ध में तो सीधेसीधे दोनों देशों का बड़ा नुकसान होगा. दोनों देश कई साल पीछे चले जाएंगे. जब से चीन ने पाकिस्तान को माली मदद देना शुरू किया है, वह किसी कीमत पर नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान कमजोर हो.

चीन ने इस हमले की घोर निंदा तो की है, पर मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादियों की लिस्ट में डालने की भारत की अपील का समर्थन करने से मना कर दिया है.

इस सब के उलट हमें इस बात पर ज्यादा गंभीरता से विचार करना चाहिए कि भारत ने पिछले तकरीबन 30 साल से कश्मीर में इतनी भारी तादाद में सेना और दूसरे सुरक्षा बलों को तैनात किया हुआ है तो क्या उस से हम आतंकवाद पर कंट्रोल कर सके हैं?

अभी हाल ही में भाजपा और पीडीपी ने मिल कर वहां सरकार बनाई थी, लेकिन वे दोनों भी वहां के लोगों में नई उम्मीद जगाने में नाकाम रहीं. अगर भाजपा पीडीपी को उस के मनमुताबिक राज करने देने का मौका देती तो पता तो चल जाता कि वहां की जनता का मिजाज क्या है. अगर भाजपा की सरकार केंद्र में मुसलिम राष्ट्रपति दे सकती है तो क्या उसे अब किसी कश्मीरी मुसलिम चेहरे को कश्मीर का राज्यपाल नहीं बना देना चाहिए था? क्या जरूरत थी उत्तर प्रदेश के एक नेता पर मेहरबान होने की?

आंख के बदले आंख किसी समस्या का हल नहीं है. कश्मीर पर भी यह बात लागू होती है. हमें ठंडे दिमाग से यह सोचना होगा कि ऐसी क्या वजहें हैं जो कश्मीर के नौजवान हिंसा के इस रास्ते पर चल रहे हैं? क्या वहां की जनता हमेशा के लिए इसी तरह संगीनों के साए में जीती रहेगी? क्या वहां के मासूम बच्चे नहीं चाहते होंगे कि उन के कंधे पर भी किताबों से भरा बस्ता हो और वे बेखौफ हो कर स्कूल में पढ़ने जाएं.

अगर रेतीले राजस्थान के कोटा में ऐजूकेशन हब बन सकता है तो हरेभरे कश्मीर में क्यों नहीं?

फिल्मी अंधभक्तों की बढ़ती फौज

जनवरी, 2019 में एक वीडियो ट्विटर पर तैर रहा था, जिस में कथित तौर पर तमिल सुपरस्टार अजीत के चाहने वाले रजनीकांत की फिल्म ‘पेट्टा’ के पोस्टर जला रहे थे. चूंकि रजनीकांत और अजीत की फिल्म ‘पेट्टा’ और ‘विश्वासम’ एक ही दिन रिलीज हुई थीं, इसलिए दोनों फिल्मी सितारों के चाहने वाले आपस में भिड़े हुए थे.

दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों और नेताओं को ले कर उन के चाहने वाले किस हद तक अंधभक्ति के शिकार हैं, इस के नमूने जबतब कलाकारों दिख जाते हैं. कोई फैन क्लब वाला उन के मंदिर बनवा देता है तो कोई उन्हें शिवलिंग की तरह दूध से नहला देता है.

रजनीकांत, कमल हासन से ले कर पवन कल्याण, चिरंजीवी तक ऐसे कई कलाकार हैं जिन के बाकायदा फैन क्लब बने हुए हैं और कई कलाकारों की तरफ से उन्हें पैसा भी मिलता है. लिहाजा, ये क्लब वाले इस तरह के अंधभक्तों की फौज खड़ी कर देते हैं जो खुद को एक खास ऐक्टर या नेता का फैन बता कर लड़नेमरने पर उतारू हो जाते हैं.

कमल हासन ने रजनीकांत को कुछ कह दिया तो उन के फैन पहुंच जाते हैं कमल हासन के घर तोड़फोड़ करने.

कुछ साल पहले जब एक दक्षिण भारतीय ऐक्टर चंद्रशेखर ने राजनीति में उतरे अपने प्रतिद्वंद्वी ऐक्टर के खिलाफ कुछ बोल दिया था तो उस ऐक्टर के चाहने वालों ने चंद्रशेखर पर भरी सभा में पत्थरों की बारिश कर दी थी. वे बेचारे चोटिल हो गए थे, लेकिन चाहने वालों पर कौन सा केस दर्ज होता.

खुद को ही जला दिया

हालिया मामला तो और भी दहला देने वाला है. कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार यश से मिलने की जिद में एक लड़के ने खुद को आग लगा ली.

हुआ यों कि यश को जन्मदिन की बधाई देने के लिए जब उन का एक फैन रविशंकर अपने दोस्तों के साथ उन के घर पहुंचा तब उसे वहां ऐंट्री करने से मना कर दिया गया. नाराजगी में रविशंकर ने ऐक्टर के घर के सामने खुद को आग लगा ली. उसे यश के जन्मदिन पर उन से मिलने की धुन थी.

चूंकि कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के इस ऐक्टर ने ‘केजीएफ’ फिल्म के बाद से शाहरुख खान की फिल्म ‘जीरो’ को मात दे कर अपने फैन बढ़ा लिए हैं, लिहाजा उन के घर के बाहर ऐसे चाहने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है. अब सब से मिलना तो किसी भी ऐक्टर के लिए मुमकिन नहीं है. बहरहाल, किसी तरह रविशंकर को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अगले दिन उस ने दम तोड़ दिया. 26 साल के इस लड़के ने अपनी जान सिर्फ शौक लिए दे दी. हैरानी इस बात की है कि इस बात से उस के मातापिता भी वाकिफ थे.

मातापिता के मुताबिक, रविशंकर हर साल यश से मिलने जाता था. पिछले साल वह हमें भी उन के घर ले गया था. इस साल हम ने उसे जाने से मना किया था, लेकिन वह चला गया. पता नहीं, रवि को पैट्रोल कहां से मिला.

हालांकि इस घटना के बाद यश रविशंकर से मिलने के लिए अस्पताल पहुंचे. लेकिन उन्होंने इस बात पर काफी गुस्सा भी जताया.

उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस तरह के प्रशंसकों को नहीं चाहता हूं. यह फैंटेसी या प्यार नहीं है. इस से मुझे खुशी नहीं मिलती?है. मैं इस तरह से किसी और को देखने नहीं आऊंगा. यह उन प्रशंसकों को गलत संदेश देगा जो सोचते हैं कि अगर वे ऐसा काम करेंगे तो मैं उन से मिलने आऊंगा.’’

इस में कुसूर भक्त का है या देवता बन चुके फिल्म कलाकारों का? वजह कोई भी हो, किसी फैन का इस तरह का रवैया अपनाना चिंता की बात है. पढ़ाई के प्रैशर से ले कर लड़की के दिल तोड़ने तक सुसाइड की कोशिशें वैसे ही नौजवानों की जानें ले रही हैं, उस पर फिल्मी सितारों के प्रति ऐसी दीवानगी भी कम गंभीर मसला नहीं है.

कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि इस में कलाकारों का क्या कुसूर है? लेकिन कहीं न कहीं इस फैनबाजी को कलाकार ही बढ़ावा देते हैं.

अपनी फिल्मों में मसीहा की इमेज बनाने से ले कर फैन क्लब को रजिस्टर कराना हो या उन के उत्सवों में शिरकत करने जैसी बातें फैंस को अलगअलग गुटों में बांध देती हैं, कुछकुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह, जो अपने नेता की तर्ज पर अभिनेताओं का झंडा (पोस्टर) ले कर चलते हैं.

इन की फिल्मों के रिलीज के समय पूरा थिएटर इन फैंस क्लब की मुट्ठी में होता है. चलती फिल्म को बीच में ही रोक कर ढोलनगाड़ों का जश्न जैसा पागलपन भी यहीं दिखता है. टिकटों की कालाबाजारी भी होती है और असुरक्षा का माहौल अलग से बनता है.

अभी हिंदी बैल्ट में यह संक्रमण ज्यादा नहीं फैला है लेकिन कुछकुछ लक्षण जरूर दिखने लगे हैं.

मसलन, सलमान खान और अक्षय कुमार के पोस्टरों पर रिलीज के समय मालाबाजी होने लगी है. जान देने या लेने जैसी बातें सोशल मीडिया अकाउंट पर दिख जाती हैं जहां फैंस आपस में भिड़ जाते हैं और कलाकारों को गरियाने लगते हैं.

महामानव जैसे किरदार दरअसल, रीजनल सिनेमा ने कभी भी देशी मुद्दों को नहीं छोड़ा. वहां के हीरो अभी भी लुंगी डांस करते हैं और ‘रंगस्थलम’, ‘काला’, ‘पेट्टा’, ‘शिवाजी’, ‘नायकन’, ‘मारी’, ‘सरकार’ जैसी फिल्में वहीं के गांव, किसान और इलाकाई राजनीति की बात करती हैं. लिहाजा, ऐसी फिल्मों के हीरो जननायक महामानव बन जाते हैं.

एमजी रामचंद्रन, राम्या, जानकी रामचंद्रन, सीएन अन्नादुराई, एनटी रामाराव, एमके करुणानिधि, पवन कल्याण, जयललिता, चंद्रशेखर, विजय कांत, चिरंजीवी, बालकृष्ण, हरिकृष्ण, जयाप्रदा वगैरह नाम फिल्मी बैकग्राउंड से थे.

एनटीआर ने बतौर अभिनेता अपनी नायक छवि का इस्तेमाल तेलुगु गर्व के मुद्दे पर आधारित अपनी तेलुगुदेशम पार्टी को बनाने में बखूबी किया. बाद में वे मुख्यमंत्री बने.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके वाईएस राजशेखर रेड्डी की बायोपिक, बालकृष्ण की कथानायुडू, नेताअभिनेता चिरंजीवी का सईरा नरसिम्हा रेड्डी से फ्रीडम फाइटर उय्यलावाड़ा नरसिम्हा रेड्डी की जिंदगी को परदे पर उतारना, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रह चुकी जे. जयललिता की बायोपिक ‘आयरन लेडी’ का बनाना, सब उसी फैनबाजी के कंधे पर सवार हो कर यहां तक पहुंचे हैं.

फिल्में कोरी कल्पनाओं पर आधारित होती हैं. लेकिन इन में काम करने वाले कलाकार सामाजिक सरोकार की आड़ में रिएलिस्टिक सिनेमा को दरकिनार कर लार्जर दैन लाइफ किरदार रचते हैं, जो राजा भी होता है और रंक भी, बिलकुल देवता सरीखा बन कर जनता की आवाज उठाता है और अवाम उस किरदार को असल का समझने लगती है.

कई बार अभिनेता इस पागलपन का फायदा उठा कर सियासत में उतर जाते हैं और सिनेमाघर के टिकटों को बैलेट बौक्स तक खींच ले आते हैं. लेकिन इस सब फैनबाजी में उन का क्या, जो जोश में आ कर खुद को जीतेजी मार रहे हैं.

दरअसल, देश के डीएनए में ही व्यक्ति पूजा और गुलामी के बीज हैं. हम किसी को थोड़ा सा पसंद कर लें तो उसे अवतार मान बैठते हैं.

जाहिर है, इस का फायदा सदियों से भारत में सत्ता में बैठे लोग उठा रहे हैं और शायद आगे भी उठाते रहेंगे.

दो जून की रोटी

एक पुराना प्रचलित चुटकुला है जिसे अकसर लोग आपस मेंकहतेसुनते रहते हैं :

2 गधे चरागाह में चर रहे थे. चरतेचरते 1 गधे ने दूसरे को एक चुटकुला सुनाया, पर दूसरा गधा चुटकुला सुन कर भी शांत रहा, उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जाहिर की. तब चुटकुला सुनाने वाले गधे को झेंपने के अलावा कोई चारा नहीं रहा और सांझ होने पर दोनों गधे अपनेअपने निवास को चले गए.

अगले दिन दोनों गधे चरने के लिए फिर उसी चरागाह में आए तो चुटकुला सुनने वाला गधा बहुत जोर से हंसने लगा. उसे इस तरह हंसता देख कर दूसरे गधे ने हंसने का कारण जानना चाहा, तो उत्तर मिला कि कल जो चुटकुला उस ने सुना था, उसी पर हंस रहा है.

पहले गधे ने आश्चर्य से कहा कि चुटकुला तो कल सुनाया था, आज क्यों हंस रहे हो. इस पर दूसरे गधे से उत्तर मिला कि उस का अर्थ आज समझ में आया है.

अब हंसने की बारी चुटकुला सुनाने वाले की थी. उस ने जोर का ठहाका लगाते हुए कहा, ‘‘वाह, चुटकुला कल सुना था, हंस अब रहे हो. वास्तव में तुम रहोगे गधे के गधे ही. कल की बात आज समझ में आई है.’’

मेरे विचार से यह कथा मात्र एक चुटकुला नहीं है. इस में तो गहन रहस्य और ज्ञान छिपा है. वास्तविकता यह है कि बहुत सारी बातें ऐसी होती हैं जिन का अर्थ तब समझ में नहीं आता जब कही जाती हैं. बहुत सी घटनाओं का अर्थ घटना के घटित होते समय जाहिर नहीं होता. बहुत सी बातों का अर्थ बाद में समझ में आता है. कभीकभी तो ऐसी बातों एवं घटनाओं का अर्थ समझने में वर्षों का वक्त लग जाता है. पर किसी भी बात के अर्थ को समझने में व्यक्ति विशेष की बुद्धि का भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान होता है. यदि व्यक्ति बुद्धिमान है तो बात का अर्थ समझने में विलंब नहीं होता, परंतु यदि व्यक्ति की बुद्धि कुछ मंद है तो अर्थ समझने में देर होती ही है. अल्पबुद्धि होने के कारण ही शायद यह चुटकुला गधों के बारे में प्रचलित है.

बचपन में घटित एक घटना को समझने में मुझे भी वर्षों का समय लग गया था. शायद बालमन में तब इतनी समझ नहीं थी कि इस बात का अर्थ पल्ले पड़ सके या गधों की तरह बुद्धि अल्प होने के कारण अर्थ समझ में नहीं आया था. जो भी कहें पर यह घटना लगभग 40 साल पुरानी है.

मेरे श्रद्धेय पिताजी का मुख्य व्यवसाय खेती था, लेकिन जमीन पर्याप्त न होने के कारण वह खेती मजदूरों से कराते थे और खुद सिंचाई विभाग में छोटीमोटी ठेकेदारी का कार्य करते थे. यह कहना अधिक उपयुक्त और तर्कसंगत होगा कि खेती तो मजदूरों के भरोसे थी और पिताजी का अधिक ध्यान ठेकेदारी पर रहता था.

गांव में खेल व मनोरंजन का कोई साधन नहीं था, अत: कक्षा 8 पास करने के बाद मेरा ध्यान खेती की ओर आकर्षित हुआ और मैं कभीकभी अपने खेतों पर मजदूरों का काम देखने के लिए जाने लगा. तब हमारे खेतों पर 3 मजदूर भाई, जिन के नाम ज्योति, मोल्हू व राजपाल थे, कार्य करते थे. वे मुंह अंधेरे, बिना कुछ खाएपीए हलबैल ले कर खेत पर चले जाते थे. वह खेत पर काम करते और दोपहर को उन की मां भोजन ले कर खेत पर जाती. तब काम से कुछ समय निकाल कर वे दोपहर का भोजन पेड़ की छांव में बैठ कर करते थे.

संयोगवश कभीकभी उन के खाने के समय पर मैं भी खेत पर होता था व उन का खाना देखने का अवसर मिलता था. मैं ने उन के खाने में कभी दाल या सब्जी नहीं देखी. उन के खाने में अकसर नमक मिली हुई मोटे अनाज की रोटी होती थी व उस के साथ अचार और प्याज. उन की मां कुल मिला कर 6 रोटी लाती थी व तीनों भाइयों को 2-2 रोटी दे देती थी, जिन्हें खा कर वे पानी पीते और फिर अपने काम में लग जाते.

खाने के बीच अकसर उन की मां बातें करती रहती कि आज तो घर में सेर भर ही अनाज था, उसी को पीस कर रोटी बनाई है. जिन में से घर पर औरतें व बच्चे भी खाते थे. उन्हीं में से वह तीनों भाइयों के लिए भी लाती थीं. तब मैं उन की बातें सुनता अवश्य था पर अर्थ कुछ नहीं निकाल पाता था. मुझे यह बात सामान्य लगती थी. मुझे लगता था कि उन्होंने भरपेट भोजन कर लिया है. बालपन में इस का कुछ और अर्थ निकालना संभव भी नहीं था.

उन दिनों एक परंपरा और थी कि त्योहार यानी होलीदीवाली पर मजदूरों को किसान अपने घर पर भोजन कराते थे. उसी परंपरा के तहत ज्योति, मोल्हू व राजपाल भी त्योहार के अवसर पर हमारे घर भोजन करते थे.

चूंकि मेरा उन तीनों से ही बहुत अच्छा संवाद था इसलिए उन को अकसर मैं ही भोजन कराता था. मुझे उन को भोजन कराने में बहुत आनंद आता था. उस भोजन में रोटी, चावल, दाल, सब्जी, कुछ मीठा होता था तो वह तीनों भाई भरपेट भोजन करते थे व कुछ बचा कर अपने घर भी ले जाते थे ताकि परिवार की महिलाएं व बच्चे भी उसे चख सकें.

उन को कईकई रोटी व चावल खाता देख कर कभीकभी मेरी मां कह उठतीं कि अपने घर में तो ये केवल 2 रोटी खाते हैं और हमारे घर आते ही ये इतना खाना खाते हैं. तब मुझे अपनी मां की बात सच लगती थी क्योंकि मैं उन को खेत पर केवल 2 रोटी ही खाते देखता था. मैं यह समझने में सफल नहीं रहता कि ऐसा क्यों है, यह अपने घर केवल 2 रोटी खा कर पेट भर लेते हैं व हमारे घर पर इतना खाना क्यों खाते हैं.

इन्हीं सब को देखतेभुगतते मैं खुद यौवन की दहलीज पर आ गया. पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर में वकालत करने लगा. कुछ समय उपरांत न्यायिक सेवा में प्रवेश कर के शहरशहर तबादले की मार झेलता घूमता रहा व जीवन का चक्र गांव से शहर की तरफ परिवर्तित हो गया. खेती व खेतिहर मजदूर ज्योति, मोल्हू, राजपाल व अन्य कई मजदूर, जो कभी न कभी हमारी खेती में सहायक रहे थे, काफी पीछे छूट गए. मैं एक नई दुनिया में मस्त हो गया, जो बहुत सम्मानजनक व चमकीली थी. पर यदाकदा मुझे बचपन की बातें याद आती रहती थीं. गांव में जाने पर कभीकभार उन से भेंट भी हो जाती थी, पुरानी यादें ताजा हो जाती थीं.

कुछ ही दिन पहले न जाने क्या सोचतेसोचते मुझे उपरोक्त घटनाक्रम याद आ गया और जब मैं ने अपने वयस्क एवं परिपक्व मन से उन सब कडि़यों को जोड़ा तो वास्तविकता यह प्रकट हुई कि ज्योति, मोल्हू और राजपाल, ये 3 ही मजदूर गांव में नहीं थे बल्कि गांव में और भी बहुत मजदूर थे जिन का यही हाल था. शायद यही कारण था कि हमारे घर पर भोजन के समय उन्हें पेट भरने का अवसर मिलता था. अत: वह अपने घर की अपेक्षा हमारे घर पर अधिक भोजन करते थे. उस समय मुझे उन के अधिक खाने का कारण समझ में नहीं आया था. मुझे इस बात को समझने में लगभग 4 दशक का समय लग गया कि अनाज की कमी के कारण वे मजदूर रोज ही आधे पेट रहते थे और मुझे खेतिहर मजदूरों की उस समय की स्थिति का आभास हुआ कि तब ज्योति, मोल्हू व राजपाल जैसे श्रमिक दो जून की रोटी के लिए कितना काम करते थे व तब भी आधा पेट भोजन ही कर पाते थे.

इतने के लिए भी रूखासूखा खा कर उलटासीधा फटेपुराने कपड़ों से तन ढक कर हर मौसम में उन्हें खेती का कार्य करना पड़ता था. उन के लिए काम का कोई समय नहीं था, वह मुंहअंधेरे काम पर आते थे व देर रात को काम से लौटते थे.

मुझे जब भी अवकाश मिलता, मैं गांव जाता और उन तीनों श्रमिकों से अकसर भेंट होती, पर उन की हालत जस की तस रही. वे आधा पेट भोजन कर के ही जीवन व्यतीत करते रहे और इस दुनिया से विदा हो गए.

जीवन में उन्हें कभी दो जून की भरपेट रोटी मयस्सर नहीं हो पाई. ऐसे वे अकेले श्रमिक नहीं थे, न जाने कितने श्रमिक आधा पेट भोजन करतेकरते इस दुनिया से चले गए. अब भी, जब मैं सोचता हूं कि कितना कठिन होता है जीवन भर आधापेट भोजन कर के जीवन व्यतीत करना, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मैं ऊपर से नीचे तक सिहर जाता हूं.

गांव से मेरा नाता समाप्त नहीं हुआ है. वही खेत हैं, वही खेती, पर वक्त ने सबकुछ बदल दिया है. अब तो खेतीहर श्रमिकों की स्थिति में आश्चर्य रूप से परिवर्तन हुआ है. ज्योति, मोल्हू व राजपाल के बच्चों के घर पक्के हो गए हैं. बच्चों को नए कामधंधे मिल गए हैं. अब गांव में आधा बदन ढके अर्थात शरीर पर मात्र लंगोटी डाले श्रमिक बिरले ही मिलते हैं.

समाज में समानता की ध्वनि सुनाई पड़ती है, जो प्रगति का परिचायक है पर साथ ही साथ किसानों के समक्ष समस्या भी हो गई है. अब खेती कार्य के लिए मजदूरों का मिलना लगभग असंभव हो गया है. पर वक्त कभी एक जैसा नहीं रहता, वह तो हर पल करवट बदलता रहता है. मैं तो पूर्ण आशान्वित हूं कि भविष्य वास्तविक रूप से उज्ज्वल होगा.

अंधभक्ति से काम नहीं चलेगा

कश्मीर में 40 अर्धसैनिकों की दुखद मृत्यु के बदले आतंकवादियों और उन्हें शह देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ जिस तरह की भाषा का उपयोग एक वर्ग कर रहा है, वह स्पष्ट करता है कि जिस महान संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, धैर्य, सदाचार, सत्यवचन का बखान हम हर पल करते हैं, वह कम से कम इस वर्ग में तो नहीं है, जो असल में संस्कृति का स्वयंभू ठेकेदार बना हुआ है.

न केवल पाकिस्तानी सरकार, बल्कि प्रधानमंत्री, पाकिस्तान में खुलेआम घूमते आतंकवादियों के नेताओं को मांबहन की गालियां ट्विटर, व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दी जा रही हैं, हर उस भारतीय को भी दी जा रही हैं जो भावनाओं की जगह सोचीसमझी नीति अपनाने की वकालत कर रहा है. यह कट्टर वर्ग न केवल आतंकवादियों के खिलाफ आग उगल रहा है, आतंकवादियों के लपेटे में हर कश्मीरी को भी ले रहा है और लड़कियों तक को नहीं छोड़ रहा.

केवल यह सुझाव देने पर कि पाकिस्तान या आतंकवादियों से समझौतों से भी शांति लाई जा सकती है, यह कट्टर वर्ग उग्र हो उठता है. यह वर्ग भूल रहा है कि इसकी इस कट्टरता के बावजूद इस के पुरखे मुट्ठीभर यूनानियों, हूणों, पार्शियों, मुसलमानों, अफगानों, मुगलों, फ्रैंच, ब्रिटिश, डच से हारते रहे हैं. भारत का इतिहास इन हारों से भरा हुआ है, क्योंकि हम बोलने और गाली देने में तो दक्ष हैं पर कुछ करने में निकम्मे.

आज मोबाइल की सुविधा के कारण कुछ शब्दों में गाली देना इतना आसान हो गया है जितना अपने घर के सामने खड़े हो कर गुजरते राहगीर को देना. ताकत तो वह होती है जब संख्या में कम होते हुए भी हमला करने वालों को हराया जा सके.

मांबहनों की भद्दी गालियां असल में चरित्र की सही पहचान करा रही हैं, हमारा बल नहीं दिखा रहीं. मोबाइल के पीछे छिप कर वार करना पेड़ या शिखंडी के पीछे से तीर मारने की तरह है. पर जो समाज उसे सही और दैविक मानता हो, उस से और क्या अपेक्षा की जा सकती है?

जहां जरूरत है कि पूरा देश आतंकवादियों के हौसले पस्त करे, वे जहां पनप रहे हैं, जहां प्रशिक्षण ले रहे हैं, वहां उन्हें रोकें, उन्हें देश में घुसने न दें. अगर होम ग्रोथ यानी अपने ही देश की पैदावार हों तो या तो उन्हें पकड़ लें या समझा कर राह पर ला सकें.

आतंकवाद बहुत गंभीर समस्या है और हमें उसे रोकने में बहुत चतुराई की जरूरत होगी. अंधभक्ति और गालियों से काम नहीं चलेगा चाहे वह किसी धर्म के प्रति हो या व्यक्ति विशेष के प्रति.

सोहित विजय सोनी के लिए सिर मुंड़ाना रिस्क नहीं

‘तू मेरा हीरो’, ‘जीजा जी छत पे हैं’, ‘भाभी जी घर पर है’ जैसे हास्य सीरियलों में अभिनय करने के बाद अभिनेता सोहित विजय सोनी को जब सीरियल ’तेनालीराम’ में मणी के किरदार को निभाने का आफर मिला, तो सोहित विजय सोनी पहेल दुविधा में थे कि क्या करें. क्योंकि इस किरदार के लिए उन्हे सिर मुंड़ाना था, जिसे वह रिस्क मानकर चल रहे थे. मगर एक कलाकार होने की वजह से उन्होने इस रिस्क को उठाकर मणी का किरदार निभाया. और पिछले डेढ़ वर्ष के दौरान मणी के किरदार ने उन्हे जबरदस्त शोहरत दिलायी.

खुद सोहित विजय सोनी ने कहा- ‘रिस्क तो था, मगर किरदार की मांग को देखते हुए मैंने बिना हिचक अपना सिर मुंडाया और पिछले डेढ़ वर्ष से मैं सिर मुंडाकर इस किरदार को निभा रहा हूं. इसने मुझे एक नई पहचान और शोहरत दिलायी. मैं तो इस सीरियल के निर्माता अभिमन्यु सिंह का आभारी हूं कि उन्होने मुझे मणी का किरदार निभाने का अवसर दिया. पहले एक नाई आकर मेरे बाल निकालता था,पर अब मैं स्वयं अपने हाथ से ही सेट पर अपने सिर के बाल निकाल लेता हूं.’

बच्चों पर जानलेवा गुस्सा

उत्तर प्रदेश के जनपद संत कबीर नगर के खलीलाबाद कोतवाली इलाके की रहने वाली चंचल की हत्या उस के ही बाप विजय कुमार ने इसलिए कर दी, क्योंकि वह अपने बाप से स्कूल की 800 रुपए फीस जमा करने की जिद कर बैठी. पिता को बेटी की यह बात नागवार लगी और उस ने गुस्से में आ कर बेटी का गला दबा दिया.

चंचल मौके पर बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ी. इस के बाद विजय कुमार ने बस्ती जनपद में अपनी ससुराल चित्राखोर में अपने साले अमरनाथ पांडेय को फोन कर के इस वारदात की जानकारी दी.

अमरनाथ अपने ड्राइवर गोपाल और बहनोई रविचंद्र को ले कर विजय के घर पहुंचा और वहां बेहोश पड़ी चंचल उर्फ कालिंदी को 30 नवंबर, 2018 की रात तकरीबन 10 बजे बोरे में भर कर उसे बस्ती जिले के लालगंज थाना क्षेत्र में ले गया और कुआनों नदी पर बने बानपुर पुल से नीचे फेंक दिया.

इस वारदात के दूसरे दिन 1 दिसंबर, 2018 की सुबह जब गांव वालों ने एक लड़की की लाश को नदी में तैरते देखा तो उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दी.

मौके पर पहुंची पुलिस ने लाश को नदी से निकलवा कर शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन शिनाख्त नहीं हो सकी.

लालगंज के थाना प्रभारी राजेश मिश्र ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर जब तफतीश शुरू की तो चित्राखोर से चंचल की शिनाख्त हो गई.

पुलिस के लिए केस कुछ आसान होता दिखा और उस ने तफतीश की सूई चंचल के परिवार पर फोकस कर के जांच शुरू की तो बाप विजय कुमार पर शक हुआ.

जब पुलिस ने कड़ाई से पूछताछ की तो विजय कुमार ने चंचल की हत्या किए जाने की बात कबूल ली. इस के बाद इस हत्या में शामिल उस के साले अमरनाथ पांडेय और लाश को ठिकाने लगाने में इस्तेमाल की गई कार को बरामद कर लिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से एक बात और सामने आई कि चंचल को जब नदी में फेंका गया था तब वह जिंदा थी.

इस वारदात से एक बात साफ हो गई है कि कई बार मांबाप अपने बच्चों की जिद के चलते अपना आपा खो बैठते हैं, फिर इस का गुस्सा बच्चों पर उतारने लगते हैं. इस गुस्से के चलते बच्चों को जिस्मानी और दिमागी जोरजुल्म का शिकार होना पड़ता है.

कई बार तो मांबाप के गुस्से का शिकार हो कर बच्चे या तो अपंग हो जाते हैं या फिर उन की मौत भी हो जाती है. इस के बाद मांबाप के पास पछताने के सिवा कोई चारा नहीं रहता है.

नाजायज रिश्तों का गुस्सा

मांबाप द्वारा अपने मासूम बच्चों के ऊपर जुर्म करने की एक बड़ी वजह है नाजायज रिश्ता, क्योंकि बच्चों के चलते कई बार नाजायज रिश्तों का राज खुल जाने का डर मांबाप को होता है.

बस्ती के जिले के कप्तानगंज थाना क्षेत्र के गांव दयलापुर में नाजायज रिश्तों में रोड़ा बन रही 3 साल की मासूम सृष्टि को उस की ही मां सीमा ने गला दबा कर मार डाला था. बेटी की हत्या करने के बाद वह लाश को आंचल में छिपा कर गांव के सिवान में ले गई और भूसे के ढेर में छिपा दिया.

कप्तानगंज के तबके थानाध्यक्ष रोहित प्रसाद ने इस कांड को उजागर किया था और बताया था कि सृष्टि की मां सीमा ने ही उस की हत्या की थी.

सीमा ने पुलिस को बताया कि बैसोलिया के रहने वाले मंजीत पाठक से उस का नाजायज रिश्ता था. सृष्टि ने उन्हें संबंध बनाते हुए देख लिया था.

3 साल की मासूम सृष्टि अपने पिता को घर में दिन के वक्त किसी के आने की बात बताया करती थी इसलिए सीमा भड़क गई और डंडे से उसे पीटने लगी.

मंजीत पाठक मौके से खिसक गया था. लेकिन गुस्से से भरी सीमा अब सृष्टि को हमेशा के लिए अपने रास्ते से हटाने की ठान चुकी थी. लिहाजा, उस ने मासूम सृष्टि का गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

अगर मांबाप में से कोई भी अपनी सैक्स की भूख नाजायज रिश्तों से मिटा रहा है तो इस का असर बच्चों पर न आने दें. अगर कभी ऐसा हो जाता है कि बच्चा अपने मांबाप के नाजायज रिश्तों के बारे में जान जाए तो कोशिश करें कि जिस के साथ ऐसा रिश्ता है, उस से दूरी बना लें.

अगर बच्चा आप के रिश्ते की बात किसी को बता भी दे तो भी आप बच्चे के ऊपर जुर्म करने से बचें, क्योंकि इस बदनामी को तो शायद आप भूल भी जाएंगे, लेकिन अपने नाजायज रिश्तों को छुपाने के चलते बच्चे से किए गए अपराध में न केवल उस से हाथ धो बैठेंगे, बल्कि जिंदगीभर के लिए सलाखों के पीछे भी पहुंच जाएंगे.

झल्लाहट पर रखें काबू

कई बार तो मांबाप काम के बोझ, नाकामी, औफिस की टैंशन वगैरह के चलते परेशान होते हैं. ऐसी हालत में बच्चे जब मांबाप से प्यार से भी बात करते हैं तो उन्हें अनायास ही मांबाप के गुस्से का शिकार होना पड़ता है. कभीकभी यह गुस्सा बच्चे को पीटने तक पहुंच जाता है. इस गुस्से के चलते ही अकसर मासूमों की जान तक चली जाती है.

सामाजिक कार्यकर्ता विशाल पांडेय का कहना है, ‘‘हर मांबाप की यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के पालनपोषण को ले कर सजग रहें. ऐसा देखा गया है कि कई बार लोगों का खुद पर काबू नहीं रहता है जिस के चलते वे अपनी नाकामी और झल्लाहट अपने बच्चों के ऊपर उतारने लगते हैं.

‘‘बच्चे अपने मांबाप का विरोध करने की हालत में नहीं होते हैं और उन पर आसानी से जुर्म किया जा सकता है. इस से बचाव के लिए हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम अपने घर और काम करने की जगह की चिंता को एकदूसरे से अलग रखें. हम अपने काम की या दूसरी चिंता घर में न लाएं. अगर परेशान भी हैं तो भी बच्चों से प्यार से बात करें, उन की बातें सुनें और जरूरी होने पर उन की मदद करें.’’

खर्च पर लगाएं लगाम

अकसर हम दूसरों की नकल कर के अपनी कमाई से ज्यादा खर्च बढ़ा लेते हैं. इस के चलते हम दिनोंदिन कर्ज के बोझ से दबने लगते हैं. फिर समय से बच्चों की फीस न भर पाना, रसोई की जरूरतों के साथसाथ बच्चों की जरूरतों को पूरा न कर पाना आम बात हो जाती है.

जब आप का बच्चा दूसरे बच्चों को अच्छा खातेपहनते देखता है तो वह भी उसी तरह रहनेखाने की जिद करने लगता है, इसलिए शुरुआती दौर से अपने बच्चों का पालनपोषण अपनी माली हालत को देखते हुए ही करें, नहीं तो आगे चल कर जैसेजैसे बच्चे की जरूरतें बढ़ेंगी तो उस की मांगें भी बढ़ती जाएंगी.

ऐसे में बारबार बच्चे द्वारा कहे जाने के बावजूद बच्चों की जरूरतें पूरी न कर पाने के चलते आप में गुस्सा और झल्लाहट बढ़ने लगती है, जो धीरेधीरे बच्चों के ऊपर जुर्म के रूप में सामने आने लगती है.

इस बात से बचें

सामाजिक कार्यकर्ता अनीता देव का कहना है, ‘‘कई बार हम बच्चों के लाड़प्यार में उन की गैरजरूरी ख्वाहिशों को पूरा करने लगते हैं. इस वजह से बच्चों में जिद की आदत बढ़ती जाती है. कई बार बच्चे ऐसी जिद भी कर बैठते हैं जिसे पूरा करना आप के बस का काम नहीं होता है.

‘‘ऐसे में बात तब ज्यादा बिगड़ती है जब बच्चे अकसर गैरजरूरी चीजों के लिए जिद करने लगते हैं और अगर मांबाप की कमाई अच्छी नहीं है तो वे इस का गुस्सा बच्चों पर उतारने लगते हैं.’’

नशे से रहें दूर

सामाजिक कार्यकर्ता अरुणिमा का कहना है, ‘‘नशे में इनसान अकसर होशोहवास खो बैठता है. उस में अच्छेबुरे का फर्क करने की समझ नहीं रहती है. नशे के आदी लोगों की माली हालत तेजी से बिगड़ने लगती है जिस की वजह से वे बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते हैं.

‘‘अगर कभी बच्चा मांबाप से अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कहता भी है, तो उसे पूरा न कर पाने की झल्लाहट में वे बच्चे को मारनेपीटने लगते हैं.

‘‘नशे में इनसान यह भी नहीं सोचता है कि बच्चे को गंभीर चोट भी लग सकती है. ऐसे में बच्चा अपंगता या मौत का भी शिकार हो सकता है.

‘‘ऐसे हालात से बचने का केवल एक ही उपाय है कि बच्चों की खातिर नशे से दूरी बनाएं और नशे के ऊपर होने वाले बेजा खर्च को बच्चों की पढ़ाईलिखाई के साथसाथ पालनेपोसने पर लगाएं.’’

परिवार को रखें छोटा

सामाजिक कार्यकर्ता अनीता देव के मुताबिक, ज्यादा बच्चे पैदा कर लेना समझदारी का काम नहीं माना जा सकता है. समझदारी का काम यह है कि छोटा परिवार रखते हुए बच्चे का सही से लालनपालन किया जाए और उन की अच्छी पढ़ाई पर ध्यान दिया जाए.

बच्चे को गुस्से का शिकार होने से बचाने के लिए मांबाप का यह फर्ज है कि वे बच्चे को अच्छा माहौल दें. उन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करें.

अगर आप की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं है तो कोशिश करें कि आप कोई भी आमदनी बढ़ाने वाले रोजगार अपनाएं. इस से आप के बच्चों के भविष्य और आप के बुढ़ापे के लिए अच्छा रहेगा.

शराबी दामाद का खूनी खेल

पत्नी की हत्या कर के फरार हो जाने वाले राजू की तलाश में एटा पुलिस दरदर भटक रही थी. उसके हर ठिकाने पर उस की तलाश कर ली गई थी, पर उस का कहीं पता नहीं चल सका. मामले की विवेचना सीओ (सिटी) कर रहे थे. जब जांच में कोई प्रगति नहीं हुई तो उन्होंने 11 मार्च, 2017 को राजू के खिलाफ कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था.

इस के बाद पुलिस ने राजू के घर वालों पर दबाव डाला तो 25 मई, 2017 को राजू ने एटा की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे रिमांड पर ले कर पूछताछ की तो उस ने अपनी पत्नी ज्योति की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला एटा के कासगंज मार्ग पर असरौली नाम का एक गांव बसा है. मुकेश अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. जबकि मूलरूप से वह थाना जसरथपुर के गांव उजारपुरा का रहने वाला था. लेकिन कामधंधे की वजह से एटा आया तो यहीं का हो कर रह गया था.

उस ने असरौली में अपना मकान बना लिया था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां और 2 बेटे थे. मुकेश मजदूरी करता था तो उस की पत्नी नन्हीं वहीं एक कोल्ड स्टोरेज में काम करती थी. दोनों की कमाई से उन का गुजारा हो जाता था. अब तक उस ने अपनी 2 बेटियों की शादी कर दी थी.

इस के बाद ज्योति शादी लायक हुई तो मांबाप को उस की शादी की चिंता हुई. मुकेश उस के लिए लड़का तलाशने लगा. उस की तलाश धौलपुर जिले के गांव खूबपुरा में खत्म हुई. यहीं का रहने वाला राजू ज्योति के लिए सही लगा तो उन्होंने उस की शादी उस से कर दी.

ज्योति भले ही गरीब परिवार की थी, लेकिन उस के मन में भी तमाम सपने थे. उसे उम्मीद थी कि पति के यहां उस के सपने पूरे हो जाएंगे. जब वह ससुराल गई तो पता चला कि ससुराल में दादी का हुक्म चलता है. वही सब को इधर से उधर नचाती थीं.

राजू आगरा के किसी कोल्ड स्टोरेज में काम करता था. वह कईकई दिनों बाद घर आता था. जब भी घर आता था, शराब की बोतल ले कर आता. जब तक यहां रहता, दिन भर घर के बाहर ही रहता. ज्योति को बहुत जल्दी पता चल गया कि राजू न केवल दारूबाज है, बल्कि चरित्रहीन भी है. गांव की ही एक औरत से उस के नाजायज संबंध हैं.

शादी के 4 दिनों बाद ही ज्योति को गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी मिल गई. वह अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभा भी रही थी, लेकिन दादी नत्थो की चिकचिक उसे चैन नहीं लेने देती थी. घर पर राजू होता तब भी, न होता तब भी, वह उसे छोटीछोटी बातों पर डांटती रहती, जिस से वह परेशान रहती.

एक दिन जब राजू शराब पी कर आया तो ज्योति ने उसे समझाया. यह बात दादी ने सुन ली तो गुस्से में बोली, ‘‘तेरा बाप तो इसे शराब ला कर देता नहीं. अपनी कमाई से पीता है. इस में तुझे क्या परेशानी है?’’

‘‘दादी, शराब पीना अच्छी बात नहीं. फिर मुझे बदबू भी आती है.’’ ज्योति ने कहा.

ज्योति की यह बात राजू को इसलिए बुरी लगी, क्योंकि उस ने दादी की बात का जवाब दिया था. उस ने ज्योति के बाल पकड़े और घसीटता हुआ कमरे में ले गया. इस के बाद उस ने उस की जम कर पिटाई की. अभी शादी को एक महीना भी नहीं हुआ था कि पति ने उस पर हाथ उठा दिया था.

उस दिन के बाद राजू शराब पी कर किसी न किसी बात पर उस की पिटाई करने लगा. ज्योति को लगा कि अगर राजू के साथ जीवन बिताना है तो उसे अपनी जुबान बंद रखनी होगी. लेकिन दादी को घर की शांति पसंद नहीं थी. वह बुझी राख में भी चिंगारी लगाए रहती थी.

ज्योति को लगा कि राजू को सुधारने के लिए उसे ही कुछ करना होगा. वह रक्षाबंधन का इंतजार कर रही थी, क्योंकि उस के पिता ने उसे फोन किया था कि वह उसे रक्षाबंधन पर लेने आएंगे. रक्षाबंधन से एक दिन पहले मुकेश ज्योति की ससुराल पहुंचा और उसे लिवा लाया.

ज्योति को उदास देख एक दिन उस की मां ने उदासी की वजह पूछी तो उस ने बताया कि राजू अच्छा आदमी नहीं है. वह शराब पीता है और उस के साथ मारपीट करता है, इसलिए अब वह उस के साथ रहना नहीं चाहती.

बेटी की बात सुन कर नन्ही परेशान हो उठी. शाम को मुकेश लौटा तो उस ने सारी बात उसे बताई. बेटी के साथ ज्यादती की बात सुन कर मुकेश भड़क उठा. मुकेश ने कहा कि हम ने तो कभी बेटी को डांटा तक नहीं और वह उसे पीटता है. उस ने ज्योति को समझाया कि उसे चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह राजू को सुधार देगा.

रक्षाबंधन के बाद राजू ने मुकेश को फोन किया कि वह ज्योति को पहुंचा जाएं, पर मुकेश ने उसे कोई जवाब नहीं दिया. राजू की समझ में नहीं आ रहा था कि ससुर को यह क्या हो गया.

अगली बार जब उस ने फोन किया तो मुकेश ने कहा कि उस ने अपनी बेटी की शादी उस से की है तो इस का मतलब यह नहीं है कि वह उस की पिटाई करे. यदि उसे घरेलू हिंसा के इलजाम में जेल भिजवा दिया तो उसे पत्नी और होने वाले बच्चे को गुजाराभत्ता देना पड़ेगा.

ससुर की बात से राजू डर गया. वह कोर्टकचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता था. बीवी से मारपीट करना वह अपना अधिकार समझता था, पर अब पांसा पूरी तरह पलट गया था. आखिर राजू ने भी तय किया कि वह उस का दामाद है, झुकेगा नहीं.

एक बार किसी तरह से वह ज्योति को अपने घर ले आए, तब बापबेटी को सबक सिखाएगा. अब उसे सही वक्त का इंतजार था. कुछ दिनों बाद जब करवाचौथ का त्यौहार आने वाला था, तो एक हफ्ता पहले वह अपनी ससुराल गया.

राजू घर का दामाद था. अत: दामाद की तरह ही उस की खातिरदारी की गई. पर जब उस ने कहा कि वह ज्योति को लिवाने आया है तो मुकेश और नन्हीं ने साफ कह दिया, ‘‘हमारी बेटी पेट से है. ऐसी हालत में वह तुम्हारी और तुम्हारी दादी के जुल्म बरदाश्त नहीं कर सकती. इसलिए हम उसे अभी नहीं भेजेंगे.’’

‘‘लेकिन मैं कह रहा हूं कि अब कोई मारपीट नहीं होगी.’’ राजू ने कहा.

मुकेश और नन्ही तय कर चुके थे कि वे ज्योति को ससुराल नहीं भेजेंगे. 6 दिन तक राजू खुशामदें करता रहा, लेकिन बात नहीं बनी. राजू को गुस्सा आ गया. उस ने मन ही मन एक भयानक फैसला ले लिया.

18 अक्तूबर, 2017 को उस ने सास से कहा, ‘‘ठीक है, आप लोग जो करना चाहो करो, मैं घर जा रहा हूं.’’

इस पर नन्ही ने कहा, ‘‘एक शर्त पर ज्योति तुम्हारे साथ जा सकती है. तुम यहीं कमरा ले कर रहो.’’  ‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता.’’ राजू ने कहा और चल दिया. तब सास ने उसे 500 रुपए दिए और विदा कर दिया.

राजू अपने अपमान से बौखलाया हुआ था. पिछले 6 दिनों से उस की सास नन्ही अपने काम पर भी नहीं गई थी, जिस से वह पत्नी ज्योति से खुल कर नहीं मिल सका था.

2 दिन पहले राजू ने अपने साढ़ू बनवारी से कहा था कि अगर ससुर ने ज्योति को विदा नहीं किया तो वह ज्योति को ही गोली मार देगा. बनवारी ने सोचा कि राजू गुस्से में कह रहा होगा, पर राजू के सिर पर तो खून सवार था.

राजू के जाने के बाद नन्ही काम पर जाने को तैयारी करने लगी. लेकिन ज्योति का मन घबरा रहा था. उसे लग रहा था कि राजू चला तो गया है, पर कहीं लौट न आए. उस ने मां से कहा, ‘‘मम्मी, आज काम पर मत जाओ.’’

नन्ही ने कहा, ‘‘सब ठीक होगा, तू चिंता मत कर. ध्यान से रहना.’’

नन्ही काम पर चली गई. ज्योति काम खत्म कर के आराम करने के लिए लेट गई. तभी राजू आ गया. राजू को देख कर ज्योति घबरा गई. राजू ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘अब तुझे मेरे साथ चलना ही होगा.’’

लेकिन ज्योति उस के साथ जाने को तैयार नहीं थी. उस ने कहा कि वह मर जाएगी, लेकिन उस के साथ नहीं जाएगी.

‘‘तो फिर मर जा..’’ कह कर राजू ने वहीं पड़ी ईंट उठाई और ज्योति के सिर पर दे मारी. ज्योति जमीन पर गिर पड़ी. राजू पर खून सवार था. उस ने ज्योति के हाथपैर रस्सी से बांधे और फिर उस का गला घोंट दिया. उस ने गुस्से में पत्नी की हत्या तो कर दी पर अब उसे पुलिस का डर सता रहा था. वह लाश को छिपाना चाहता था. उस ने इधरउधर देखा तो उसे टीन का बक्सा दिखा.

उस ने किसी तरह से बक्से में ज्योति की लाश को ठूंसा. इस के बाद उस ने फर्श का खून पोंछा और वहां से भाग खड़ा हुआ. शाम को ज्योति की मां नन्ही घर आई तो उसे घर में ज्योति दिखाई नहीं दी. वह सोचने लगी कि इस तरह घर खुला छोड़ कर वह कहां चली गई. कहीं राजू तो उसे जबरदस्ती नहीं ले गया. उस ने जब ज्योति की चप्पलें और बैग कमरे में देखा तो सोचने लगी कि यदि राजू के साथ वह जाती तो ये चीजें थोड़े ही छोड़ जाती.

रात भर घर के सभी लोग इसी बात की चिंता करते रहे कि ज्योति गई तो गई कहां. नन्ही ने कहा, ‘‘मुझे तो लग रहा है, जरूर राजू उसे जबरदस्ती ले गया होगा.’’

उस ने बड़े दामाद बनवारी को फोन लगा कर कहा कि वह पता लगा कर बताए कि क्या राजू ज्योति को अपने साथ ले गया है.

कुछ देर बाद बनवारी ने बताया कि राजू अपने घर नहीं पहुंचा है. इस के बाद तो नन्ही और घर वालों की चिंता और बढ़ गई. जैसेतैसे रात बीती और सुबह हुई. कोई नहीं जानता था कि उस के घर के लोगों के लिए ये सुबह कितनी भयावह होगी.  मुकेश ने पत्नी से कहा कि वह उस के कपड़े निकाल दे. वह थाने जा कर रिपोर्ट लिखा कर आएगा. नन्ही ने पति के कपड़े निकालने के लिए जैसे ही बक्सा खोला तो अवाक रह गई. बक्से में खून से लथपथ ज्योति की लाश रखी हुई थी. नन्ही ने चिल्ला कर पति को आवाज दी और बोली, ‘‘मार दिया उस जालिम ने मेरी बेटी को.’’

मुकेश ने बक्से में बेटी की लाश देखी तो वह भी चीखने लगा. तभी पड़ोसी भी वहां आ गए. जब उन्हें पता चला कि राजू ज्योति को मार कर चला गया है तो उन्होंने तुरंत पुलिस को फोन कर के खबर दे दी.

कुछ ही देर में थानाप्रभारी कोतवाली देहात आदित्य कुमार यादव मय फोर्स के आ गए. खबर पा कर सीओ (सिटी) निवेश कटियार भी वहां पहुंच गए. पुलिस ने लाश को बक्से में से निकाल कर निरीक्षण किया तो मृतका के शरीर पर चोट के गहरे निशान थे. गले पर भी निशान मिले.

पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने जब मृतका के मांबाप से बात की तो उन्होंने ज्योति के पति राजू पर ही अपना शक जताया. पुलिस ने राजू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

पुलिस राजू की तलाश में लग गई. उस के घर और नजदीकी रिश्तेदारों के यहां दबिश डाली गई. वह आगरा के जिस कोल्ड स्टोरेज में नौकरी करता था, वहां भी पुलिस पहुंची पर वह कहीं नहीं मिला. उधर अभियुक्त की गिरफ्तारी की मांग के लिए मुकेश और नन्ही पुलिस अधिकारियों के पास चक्कर काटते रहे, जिस से थाना पुलिस के ऊपर दबाव बढ़ता जा रहा था. पर थानाप्रभारी को आरोपी राजू के बारे में कहीं से कोई क्लू तक नहीं मिल पा रहा था.

कुछ दिनों बाद एसपी ने जांच सीओ (सिटी) के पास ट्रांसफर कर दी. सीओ ने जांच में पाया कि राजू ही अपनी पत्नी का हत्यारा है. गवाह और सबूत उस के खिलाफ थे. इस के अलावा उस का पुलिस से बचते फिरना भी उसे गुनहगार बता रहा था. उन्होंने भी अपने स्तर से उसे संभावित स्थानों पर तलाशा. वह नहीं मिला तो उन्होंने 11 मार्च, 2017 को राजू के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर कोर्ट में दाखिल कर दी.

चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी उसे तलाश करने की उन की कवायद जारी रही. पुलिस को यही लग रहा था कि राजू किसी न किसी तरह अपने घर वालों के संपर्क में है. इसलिए पुलिस ने उस के घर वालों पर दबाव बढ़ाया. इस का नतीजा यह निकला कि राजू ने 22 मई, 2017 को एटा की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जिस के बाद पुलिस ने उसे रिमांड पर ले लिया.

राजू से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया. राजू ने अदालत के सामने कबूल कर लिया कि उसी ने अपनी पत्नी ज्योति की हत्या की थी. उस ने कहा कि उस की हत्या करने का उस का कोई इरादा नहीं था, पर हालात ऐसे हो गए थे कि उस के हाथों पत्नी का खून हो गया.

राजू ने उस की हत्या चाहे किसी भी वजह से की थी, पर उस ने उस से पहले यह भी नहीं सोचा कि ऐसा करने से उसी का परिवार उजड़ेगा. पत्नी के साथसाथ वह उस के गर्भ में पल रहे बच्चे का भी हत्यारा हो गया. उस अजन्मे बच्चे का क्या कसूर था?

अब ज्योति के मांबाप को इस बात का पछतावा हो रहा है कि उन्होंने छानबीन किए बिना ही बेटी का हाथ एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में दे दिया, जो दारूबाज था.

नन्ही की भी थोड़ी लापरवाही यह रही कि वह भी अपनी जिद पर अड़ी रही. जब दामाद लेने आया था तो कम से कम वह दामाद को समझाने के लिए दोनों तरफ के कुछ रिश्तेदारों को इकट्ठा कर लेती. हो सकता था कि राजू उन में से किसी की बात मान जाता. जिद में हमेशा बात बिगड़ती ही है. बहरहाल, अपने हाथों से अपने घर की बरबादी करने वाला राजू जेल में है. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी.

अमेजन प्राइम पर आने वाली है अक्षय की ये वेब सिरीज

नकल करने और अंधी दौड़ दौड़ने के लिए मशहूर बौलीवुड में इन दिनों हर फिल्मकार और कलाकार डिजिटल प्लेटफार्म पर कदम रखने को बेताब नजर आ रहा है. हर किसी को डिजिटल प्लेटफार्म पर वेब सीरीज या लघु फिल्म आदि का हिस्सा बनकर खुद को पूरे विश्व तक पहुंचाने की हड़बड़ी है. सैफ अली खान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, अर्जुन रामपाल, राधिक आप्टे, इमरान खान जैसे तमाम कलाकार वेब सीरीज में नजर आ चुके हैं. अब अक्षय कुमार भी वेब सीरीज ‘‘द एंड’’ में अभिनय करने वाले हैं, जो कि डिजिटल प्लेटफार्म ‘‘अमेजान प्राइम वीडियो’’ पर प्रसारित होगी. इसमें अक्षय कुमार की बतौर कलाकार जो पहचान है, उसी के अनुरूप एक्शन व नाटकीयता के साथ रोमांच का तड़का होगा.

इस वेब सीरीज की चर्चा करते हुए खुद अक्षय कुमार कहते हैं- ‘‘यह रोचक व फन कहानी होगी. मानवीय कहानी होते हुए भी पूरी तरह से काल्पनिक कहानी है. इसमें एकशन की बहुतायत होगी, इससे अधिक अभी इसके बारे में बताना उचित नहीं होगा. मैं अपने करियर में सदैव कुछ न कुछ नया करने का प्रयास करता आया हूं. मैं नई कहानी पेश करने के अलावा अपनी फिल्मों के माध्यम से नई प्रतिभाओं को भी सामने लाने का काम करता रहा हूं. मैं इस वेब सीरीज के लिए विक्रम और उनकी टीम के साथ गंभीरता के साथ काम कर रहा हूं. मैं पूरे विश्व के सामने इस कहानी के ले जाने के लिए बेसब्र हूं. डिजिटल मीडिया मुझे सदैव उत्साहित करता रहा है. मैं डिजिटल पर इस वेब सीरीज के माध्यम से कुछ असाधारण पेश करते हुए युवा पीढ़ी के साथ जुड़ना चाहता हूं. सच कहू तो मेरे बेटे आरव ने मुझसे डिजिटल प्लेटफार्म से जुड़ने के लिए कहा. नई युवा पीढ़ी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है.’’

‘‘अमेजान इंडिया’के कंटेट निदेशक विजय सुब्रमणियम ने अक्षय कुमार के साथ जुड़ने की चर्चा करते हुए कहा-‘‘आप अक्षय कुमार पर कोई ईमेज चस्पा नही कर सकते. ‘खतरों के खिलाड़ी’,‘मोहरा’,‘ओह माई गाड’, ‘ट्वायलेट एक प्रेम कथा’सहित कई अलग अलग तरह की फिल्में उन्होंने की है.’’

वेब सीरीज ‘‘द एंड’’ का निर्माण ‘‘अमेजान प्राइम वीडियो’ के साथ ‘‘अबुंदंतिया इंटरटेनमेंट’’ कर रहा है. जो कि इससे पहले ‘अमेजान’ के लिए ही वेब सीरीज ‘‘ब्रीथ’’ का निर्माण किया था, जिसमें अमित साध व आर महादेवन ने अभिनय किया था.अब इसके दूसरे सीजन में अभिषेक बच्चन होंगे.

वेब सीरीज ‘‘द एंड’’के एक नहीं कई सीजन होंगे. यह वेब सीरीज एक्शन के चरम को परदे पर पेश करेगी. निर्माताओं का दावा है कि ऐसा एकशन अब तक किसी ने भी देखा नहीं है.

बिल्डर ही बदनाम क्यों

अपना घर चाहे सिर्फ 500 फुट का हो, हर साल, सालदरसाल सपना बनता जा रहा है. देशभर में बनते मकानों को देख कर गृहिणियां सोचती हैं कि किसी दिन उन का भी अपना एक मकान होगा पर लगता है कि यह सपना उसी तरह का वादा है जैसे पंडितजी कहते हैं कि 21 बृहस्पतिबार को व्रत रखो, अच्छा पति अपनेआप मिल जाएगा.

जिद्दी सरकार, लालची बैंक, अस्थिर बाजार, बेईमान बिल्डर, ढुलमुल ग्राहक और अदालतों में देरी के कारण जो नुकसान हो रहा है वह औरतों के सपनों का है. जिन्होंने येन केन प्रकारेण मकान हथिया लिए वे तो खुश हैं पर बाकी मनमसोस रहे हैं. लाखों लोगों ने तो अपनी जमापूंजी भी लगा रखी है और महीनों बैंक को कर्ज व मूल भी देते हैं पर उन्हें मकान नहीं मिला है. देश के 11,000 बिल्डरों पर किए गए एक सर्वे से पता चला है कि 7,77,183 करोड़ रुपए के अधूरे मकान पड़े हैं जो कहीं पैसे की वजह से, कहीं बिल्डरों का दिवाला निकलने के, तो कहीं सरकारी नियमों के कारण पूरे बन कर बिक नहीं सके हैं.

इन बिल्डरों ने बैंकों के 4 लाख करोड़ रुपए देने हैं और इतने ही ग्राहकों के भी दबा कर बैठे हैं. दिल्ली के पास आम्रपाली गु्रप के हजारों मकान सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डरों से ले कर नैशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कौरपोरेशन को दे दिए हैं पर इस सरकारी कंपनी का अपना रिकौर्ड खराब है. इस में भयंकर नुकसान और भ्रष्टाचार होता है. इस के ग्राहकों को अपना पैसा या मकान मिलेगा, यह भूल जाएं.

जो लोग पहले छोटे मकानों में रह कर पैसा बचा कर अपना बड़ा और अच्छा मकान बनाने की सोचते थे उन्होंने पैसा खर्चना शुरू कर दिया है और मकानों की मांग कम हो गई है. मुंबई में मकानों के दाम सालभर में 7% तक गिर गए हैं.

अपना मकान होना सपना ही नहीं, घर को सुरक्षा भी देता है. यह शान की नहीं, काम की बात है. बच्चों को अपने मकान में परमानैंट दोस्त मिलते हैं, कल को शादी करने में लाभ रहता है. अपने मकान पर पढ़ाई के लिए लोन मिल जाता है, किराए के मकान पर नहीं. अपना मकान दिलवाना सरकार का काम तो नहीं पर रोक तो न लगाए. अगर बिल्डर कुछ बेईमानी करते हैं, नियमों की अवहेलना कर के ज्यादा बना लेते हैं तो क्या हरज है? देश में नियमों से कौन चल रहा है? न सुप्रीम कोर्ट, न सीबीआई, न प्रधानमंत्री का कार्यालय, न राष्ट्रपति भवन. कोई भी ढंग का है? तो फिर बिल्डर ही क्यों बदनाम हों? जबकि उन का असर हर औरत, हर घर, हर बच्चे पर पड़ता है.

बाप बेटे की एक बीवी

उस दिन, 2018 की 18 तारीख थी. थानाप्रभारी सीआई पुष्पेंद्र सिंह अपने औफिस में बैठे थे. उन्होंने महिला कांस्टेबल सावित्री को बुला कर हवालात में बंद हत्यारोपी पूजा को लाने को कहा.

23-24 वर्षीय सांवले रंग की पूजा छरहरे बदन और आकर्षक नैननक्श की महिला थी. एक दिन पहले ही 2 पुरुषों के साथ पूजा के खिलाफ भादंवि की धारा 302 (हत्या) 201 और 34 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था.

थानाप्रभारी पुष्पेंद्र खुद इस केस की जांच कर रहे थे. पूजा आ गई तो उन्होंने उस से पूछताछ शुरू करते हुए पूछा, ‘‘पूजा, तू ने अपने पति कालूराम को क्यों मारा?’’

‘‘हां, यह सच है कि मैं ने अपने पति को मारा है.’’ संक्षिप्त सा उत्तर दिया पूजा ने.

‘‘हत्या के इस मामले में तेरे साथ और कौनकौन थे?’’ सीआई ने अगला सवाल किया.

‘‘साहब, इस काम में कौर सिंह और उस के बेटे संदीप कुमार ने मेरा साथ दिया था.’’

‘‘पूजा, ये बापबेटे न तो तेरी जाति के हैं न रिश्तेदार, फिर भी इन लोगों ने इस जघन्य अपराध में तेरा साथ दिया. आखिर क्यों?’’ इस पर पूजा चुप्पी साध गई.

‘‘साहब, ये दोनों बापबेटे मुझे चाहते हैं. पिछले कुछ दिनों से मैं बापबेटे की पत्नी बन कर रह रही थी. मेरा पति कालूराम हमारी राह का कांटा बन रहा था. इसलिए हम तीनों ने मिल कर उस की हस्ती ही मिटा दी.’’ पूजा के मुंह से यह सुन कर पुष्पेंद्र सिंह हतप्रभ रह गए. क्योंकि भाईभाई की एक पत्नी तो संभव है, पर बापबेटे की नहीं.

 

अपनी सालों की सर्विस में पुष्पेंद्र सिंह सैकड़ों आपराधिक मामलों से रूबरू हुए थे. पर इस मामले ने जैसे उन के अंतरमन को झकझोर दिया था. भोलीभाली सूरत वाली अनपढ़ पूजा ग्रामीण युवती थी. लेकिन उस के भोले चेहरे के पीछे का डरावना सच यह था कि उस ने अपने शारीरिक सुख की चाह में न केवल अपने भोलेभाले पति का कत्ल किया, बल्कि अपने भविष्य को भी अंधकारमय बना लिया था.

पूछताछ के बाद सीआई पुष्पेंद्र सिंह ने पूजा, कौर सिंह और उस के बेटे संदीप को नौहर के एसीजेएम की अदालत में पेश कर के उन का रिमांड मांगा. अदालत ने तीनों हत्यारोपियों का 3 दिन का पुलिस रिमांड दे दिया. रिमांड अवधि में पूछताछ के बाद जो कहानी निकल कर सामने आई, वह कुछ इस तरह थी—

राजस्थानके जिला हनुमानगढ़ की एक तहसील है टिब्बी. इसी तहसील के गांव कमरानी में रहता था हंसराज. सन 2012 में उस की 2 बेटियों पूजा व मंजू की शादी सीमावर्ती जिला चुरू के गांव बांय निवासी धन्नाराम के 2 बेटों कालूराम व दीपक के साथ हुई थी.

दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ मेहनतमजदूरी कर के अमनचैन से जिंदगी गुजार रहे थे. शुरू में सब ठीक था, लेकिन बाद में पूजा को ससुराल की बंदिशें और सास की रोकटोक अखरने लगी.

वह चाहती थी कि पति के साथ कहीं अलग रहे. उस की यह जिद बढ़ने लगी तो घर में झगड़ा होने लगा. पूजा की वृद्ध सास ने समझदारी दिखाते हुए कालूराम को कहीं दूसरी जगह रहने को कह दिया. तब तक पूजा एक बेटी की मां बन चुकी थी. पूजा की चाहत पर सन 2014 में कालूराम पत्नी व बेटी को ले कर अपनी ससुराल कमरानी में रहने लगा.

कमरानी में कालूराम मेहनतमजदूरी कर के अपने छोटे से परिवार का पेट पालने लगा. हाड़तोड़ मेहनत की वजह से कालू का शरीर कमजोर होने लगा था. शारीरिक क्षमता बनाए रखने की लालसा में उस ने अपने साथियों की सलाह पर नशा करना शुरू कर दिया. कोई अन्य पदार्थ नहीं मिलता तो वह मैडिकल स्टोर पर मिलने वाली गोलियां खा कर काम चला लेता था. वैसे भी अफीमपोस्त की बनिस्बत ऐसी गोलियां आसानी से मिल जाती हैं.

पूजा के घर के पास ही मजहबी सिख काका सिंह का मकान था. काका सिंह ने हनुमानगढ़ निवासी कौर सिंह की बेटी से प्रेमविवाह किया था. कौर सिंह का बेटा संदीप 15-20 दिन में अपनी बहन से मिलने कमरानी आता रहता था. संदीप जब भी अपनी बहन से मिलने आता तो 2-3 दिन रुक कर जाता था.

उस दिन संदीप कमरानी पहुंचा तो उस की बहन की पड़ोसन पूजा भी वहीं बैठी थी. संदीप की बहन ने अपने भाई संदीप से पूजा का परिचय करवा दिया. संयोग से पूजा ने कुछ देर पहले ही स्नान किया था. भीगे बालों से उस का भीगा वक्षस्थल व मादक यौवन युवा संदीप को इतना भाया कि वह उस का दीवाना बन गया. एकांत पा कर उस ने पूजा के सौंदर्य की तारीफ भी कर डाली. साथ ही कहा भी, ‘‘भाभी, आप से तो जानपहचान हो ही गई, अब भैया से भी मिलवा दो.’’

संदीप के मुसकान भरे आग्रह ने पूजा के अंतरमन में हिलोरे पैदा कर दी थीं. संदीप भी पूजा को भा गया था. उस ने कहा, ‘‘क्यों नहीं, कल आप के भैया काम पर नहीं जाएंगे, वह पूरा दिन घर में ही रहेंगे. जब मन करे आ जाना.’’

अगले दिन दोपहर बाद संदीप अपनी बहन को बाजार जाने का कह कर पूजा के घर जा पहुंचा. पूजा आंगन में खड़ी थी. वह उसे देखते ही बोला, ‘‘लो भाभी, हम आ गए हैं.’’

जवाब में पूजा ने अंगड़ाई लेते हुए कहा, ‘‘आओ देवर जी, आप का स्वागत है.’’

अपनी बात कह कर पूजा कमरे में चली गई. संदीप भी उस के पीछेपीछे कमरे में चला गया.

उस दिन पूजा और संदीप में काफी देर बातें हुईं. इन बातों से संदीप समझ गया कि पूजा अपने पति से संतुष्ट नहीं है. इस के पीछे एक वजह यह भी रही कि बीते दिन पूजा ने उस से कहा था कि उस का पति दिन भर घर पर रहेगा, जबकि वह घर पर नहीं था. इस से संदीप उस की मंशा को भांप गया. इसलिए उस ने पूजा से उसी तरह की बातें कीं. पूजा उस की बातों का रस लेती रही. नतीजा यह निकला कि 2 दिन में ही पूजा और संदीप के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

उस दिन सांझ ढले कालूराम काम से लौटा. घर आते ही उस ने अपनी नशे की खुराक ली और खाना खा कर बिस्तर पर पसर गया. कुछ ही देर में उसे नींद आ गई. हालांकि पूजा व उस की मां ने कालूराम को नशाखोरी के बावत समझाया था, पर उस पर कोई असर नहीं हुआ था.

रात घिर आई थी. पूजा व काका सिंह के परिवार के लोग खर्राटें भर रहे थे. पर पूजा व संदीप की आंखों से नींद कोसों दूर थी. लगभग 11 बजे संदीप दबे पांव आ कर पूजा के बाहर वाले कोठे में छुप गया था. संदीप को आया देख पूजा भी कोठे में आ गई. दिन की तरह एक बार फिर दोनों ने शारीरिक खेल खेला. घंटा भर बाद संदीप बहन के घर चला गया.

अगली सुबह संदीप अपने गांव हनुमानगढ़ लौट गया. संदीप के दिलोदिमाग में पूजा बस चुकी थी. हफ्ते 10 दिन बाद कमरानी आने वाला संदीप इस बार तीसरे दिन ही बहन के घर आ गया. वह सीधा पूजा के घर में चला गया. घर पर पूजा की मां व कालूराम मौजूद थे. पूजा ने दोनों को संदीप का परिचय दिया.

कालूराम के कहने पर पूजा ने संदीप के लिए चाय नाश्ते का इंतजाम किया. कालू व पूजा ने संदीप से खाना खा कर जाने को कहा. इस पर वह बोला, ‘‘दोपहर का खाना दीदी के यहां है और रात का आप के यहां.’’ कहते हुए संदीप ने कालू के साथ दोस्ती बढ़ाने का रास्ता बनाना शुरू कर दिया.

सांझ ढलते ही संदीप शराब की बोतल ले कर पूजा के घर आ गया. पूजा भी अपने आशिक की आवभगत में जुट गई. आंगन में कालू व संदीप की महफिल सजी. पूजा ने सलाद बना कर दी. कालू को जैसे लंबे अंतराल के बाद शराब मयस्सर हुई थी. वह पैग पर पैग गटकने लगा. संदीप की भी यही चाहत थी कि कालू नशे में टल्ली हो जाए.

कालू आधी से ज्यादा बोतल पी कर मदहोशी की हालत में पहुंच गया. पूजा ने दोनों के लिए चारपाई पर खाना लगा दिया. पूजा की मां विद्या सो चुकी थी. संदीप की चाहत पर पूजा भी अपने लिए खाने की थाली ले आई. कालू बिना भोजन किए ही चारपाई पर लुढ़क गया. पूजा और संदीप के लिए मनचाहा माहौल बन चुका था.

दोनों आंगन में बने दूसरे कमरे में चले गए. एकांत में दोनों ने जीभर के मौजमस्ती की. अगले दिन भी यही क्रम दोहराया गया. अगली सुबह पूजा काका सिंह के घर गई. एकांत पा कर पूजा ने संदीप से कहा, ‘‘तुम्हारा सरेआम मेरे घर आना मां को अखर रहा है, कुछ पड़ोसी भी अंगुली उठाने लगे हैं.’’

‘‘ऐसीतैसी लोगों की, मैं किसी से भी नहीं डरता. अब मैं तेरे बिना जिंदा नहीं रह सकता. तू चाहे तो मुझ से ब्याह रचा कर मुझे अपना बना ले.’’ संदीप बोला.

‘‘संदीप, ब्याह कर नहीं तू मुझे भगा ले जा और अपनी बना ले. फिर हम दोनों अपनी मर्जी से जिंदगी जी सकेंगे. सच्चाई यह है कि मैं भी तेरे बिना नहीं जी सकती.’’ पूजा ने उदासी भरे लहजे में कहा. उसी वक्त दोनों ने रात को भूसे वाले कोठे में मिलने की योजना भी बना ली.

नियत समय पर दोनों कोठे में पहुंच गए. मिलन के बाद संदीप ने पूजा के बालों में अंगुलियां फिराते हुए कहा, ‘‘देखो पूजा, भागनेभगाने के चक्कर में मुकदमेबाजी या छिपनेछिपाने का भय बना रहेगा. मैं ने एक ऐसी योजना बनाई है, जिस में सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी. बस योजना में तेरा साथ चाहिए.’’ संदीप ने कहा.

पूजा के पूछने पर संदीप ने पूरी योजना उसे समझा दी. योजना सुन कर पूजा खुशी से उछल पड़ी.

अगले दिन से पूजा ने योजना पर अमल करना शुरू कर दिया. शाम के समय कालू मजदूरी से लौट आया. मां रोटियां सेंक रही थीं. कालू आंगन में खाना खाने बैठ गया. उसी वक्त पूजा ने मां से कहा, ‘‘मां, तू इन्हें समझा कि यह काम छोड़ कर किसी जमींदार से 2-4 बीघा जमीन बंटाई पर ले लें. मिलजुल कर खेती कर लेंगे. कम से कम मेहनतमजदूरी तो नहीं करनी पड़ेगी.’’

‘‘यह सब इतना आसान है क्या?’’ कालू ने कहा तो पूजा बोली, ‘‘संदीप की कई बडे़ जमींदारों से जानपहचान है. वह हमें बंटाई पर जमीन दिला देगा. इस बार संदीप आए तो बात कर लेना.’’

पूजा का यह सुझाव कालू और मां को पसंद आ गया. 2 दिन बाद ही संदीप कमरानी आ गया. पूजा उसे अपने घर ले आई. संयोग से उस वक्त कालू व विद्या घर पर ही थे.

‘‘संदीप भाई, सुना है तुम्हारी कई जमींदारों से जानपहचान है. हमें भी थोड़ी सी जमीन बंटाई पर दिलवा दो. संभव है, हमारे भी दिन फिर जाएं.’’ कालू राम ने कहा.

‘‘भैया मेरे पिताजी रावतसर क्षेत्र के चक 2 के एम के बड़े दयालु स्वभाव के किसान सुखदेव सिंह कांबोज के यहां कई वर्षों से बंटाई पर खेती कर रहे हैं. मैं आज ही उन के पास जा रहा हूं. मुझे पूरी उम्मीद है कि वहां आप का काम बन जाएगा.’’ संदीप ने जवाब दिया.

मजहबी सिख कौर सिंह हनुमानगढ़ टाउन में रहता था. उस के 2 ही बच्चे थे, संदीप और एक बेटी जिस ने कमरानी निवासी काका सिंह के साथ प्रेम विवाह कर लिया था. करीब 5 वर्ष पूर्व कौर सिंह की पत्नी की संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी. उस के मायके वालों ने कौर सिंह के खिलाफ दहेज हत्या का केस दर्ज करवा दिया था.

पुलिस ने इस केस में कौर सिंह को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. कालांतर में दोनों पक्षों में राजीनामा हो गया. फलस्वरूप कौर सिंह 12 महीनों बाद जेल से बाहर आ गया. हनुमानगढ़ में अपनी जायदाद बेच कर कौर सिंह रावतसर क्षेत्र में चक 2 केएम के किसान सुखदेव सिंह के यहां ढाणी में रह कर बंटाई पर खेती करने लग गया. जबकि संदीप आवारागर्दी करने के अलावा कोई काम नहीं करता था.

2 दिन बाद संदीप फिर कमरानी लौटा. उस ने पूजा व कालूराम को खुशखबरी दी कि पिताजी के यहां उन दोनों को काम मिल जाएगा. सितंबर 2017 में संदीप, कालूराम व पूजा को ले कर चक 2 केएम कौर सिंह के पास पहुंच गया. इस दौरान संदीप भी नशेड़ीबन गया था.

‘‘पापा ये लोग दीदी के पड़ोसी हैं. कालूराम खेतीबाड़ी के सारे काम जानता है. इन्हें बंटाई पर जमीन दिलवा दो ताकि इन की गुजरबसर हो सके.’’ संदीप ने कहा.

‘‘हां हां क्यों नहीं, वह साइड वाली ढाणी खाली पड़ी है. दोनों उस में डेरा जमा लें. अभी तो सारी जोत बंटाई पर उठा दी गई है. फिर भी मैं कोई न कोई रास्ता निकाल दूंगा. यहां काम की कोई कमी नहीं है. दोनों मियांबीवी 7 सौ रुपए रोजाना आराम से कमा लेंगे.’’ कौर सिंह ने कहा.

अगले दिन से कालू व पूजा ने दिहाड़ी मजदूरी का काम शुरू कर दिया. दोनों ने खाली पड़ी ढाणी में अपना बोरियाबिस्तर जमा लिया था. संदीप पूजा का सान्निध्य पाने की गरज से उन के साथ दिहाड़ी पर काम करने लगा. हाड़तोड़ मेहनत करने से संदीप भी कालू की तरह रोजाना नशे की खुराक लेने लग गया था. खाना खाते ही कालू व संदीप नींद के आगोश में चले जाते थे.

पिछले कुछ दिनों से पूजा पुरुष सुख से वंचित थी. ऐसे में उस की नजर नारी सुख से वंचित कौर सिंह पर पड़ी तो वह उस की ओर आकर्षित होने लगी. उस ने कौर सिंह की अधेड़ उम्र को भी नहीं देखा. कौर सिंह ने पूजा की नजरों को पहचान लिया और वह भी इशारोंइशारों में उस से मन की बात कहने लगा.

आखिर एक रात जब कालू और संदीप सो रहे थे तो पूजा कौर सिंह की ढाणी में पहुंच गई. उसी दिन से दोनों के बीच संबंध बन गए. एक सप्ताह तक कौर सिंह और पूजा का अनैतिक खेल बेरोकटोक जारी रहा. पर एक रात कालू ने पूजा को कौर सिंह के साथ आपत्तिजनक हालत में रंगेहाथों पकड़ लिया. उस दिन कालू ने गुस्से से पूजा की पिटाई कर डाली. साथ ही कौर सिंह को भलाबुरा भी कहा. कभी संदीप की दीवानी पूजा अब कौर सिंह पर फिदा हो गई थी. पूजा ने संदीप से रिश्ता होने की बात भी कौर सिंह को बता दी थी.

कालू को शक हुआ तो उस ने पूजा की निगरानी शुरू कर दी. अब पूजा कौर सिंह या संदीप से एकांत में नहीं मिल पा रही थी. वह मौका तलाश कर कौर सिंह से मिली और उस के सीने पर सिर रख कर रोने लगी.

‘‘मैं तेरे बिनारह नहीं सकती.’’ कहने के साथ ही पूजा सिसकने लगी.

‘‘पूजा, तू घबरा मत, मैं कल ही इस काम का तोड़ निकाल लूंगा.’’ कौर सिंह ने उसे सांत्वना दी. तब तक उन तीनों को वहां आए केवल 20 दिन ही हुए थे.

अगली रात योजना के अनुरूप पूजा ने कालू के खाने में नींद की गोलियों का पाउडर मिला दिया. रात 11 बजे के करीब कौर सिंह कालू की ढाणी में आया. उस ने गहरी नींद में सोए अपने बेटे संदीप को उठाया. पूजा पहले से जाग रही थी. कौर सिंह ने पूजा व संदीप को बेसुध पड़े कालू के हाथपांव पकड़ने को कहा. दोनों ने वैसा ही किया.

कौर सिंह ने पूजा का दुपट्टा ले कर कालू के गले में डाला और जोर से खींच दिया. नशे में ही कालू ने दम तोड़ दिया. तीनों ने ठाणी के पीछे पहले से बनाए गड्ढे में कालू के शव को डाल कर दफना दिया. उस रात पूजा ने बापबेटे दोनों के साथ बीच सैक्स का आनंद उठाया.

कौर सिंह भी पूजा का दीवाना हो चुका था. 5 रोज बाद उस ने संदीप को भी डराधमका कर भगा दिया. अब पूजा पर उस का एकाधिकार हो गया था. दोनों ने 10 रोज मजे से गुजार दिए.

एक दिन पूजा के पास उस की मां विद्या का फोन आया. उस ने मां को बताया कि वह मजे में है. विद्या ने कालू से बात करवाने को कहा तो पूजा ने कहा कि वह काम पर गए हैं. विद्या ने रात को फिर फोन किया तो पूजा ने कहा कि वह एक जरूरी काम से गांव चले गए हैं. कल बात करवा दूंगी.

लेकिन कई दिन तक विद्या की कालू राम से बात नहीं हो सकी. अनहोनी की आशंका के चलते विद्या ने कालू के छोटे भाई दीपक को बुलाया. दीपक कमरानी आ गया. दीपक को बताया गया कि 4 दिन से पूजा का फोन बंद है और कई दिनों से कालू का भी कोई अतापता नहीं है.

सलाह मशविरा कर के दोनों परिवारों ने 12 फरवरी, 2018 को टिब्बी पुलिस थाने में दीपक की ओर से कालू की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. इस मामले की जांच सहायक उप निरीक्षक लेखराम को सौंप दी गई.

शुरुआती जांच पड़ताल में लेखराम को पूजा के अनैतिक संबंधों की जानकारी मिली तो उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लिया. तब तक कौर सिंह को पुलिस की भागदौड़े का पताचल चुका था. वह पूजा को ले कर फरार हो गया था.

कई दिनों तक पुलिस और संदिग्धों के बीच लुकाछिपी का खेल चलता रहा. एक दिन विद्यावती के पास पूजा का फोन आया और उस ने अपनी कुशलक्षेम बताते हुए मायके के हालात के बारे में पूछा. फोन आने की सूचना लेखराम तक पहुंचा दी गई. उस अनजान नंबर को ट्रेस किया गया तो वह नंबर पंजाब के गांव वरियामखेड़े के एक किसान का पाया गया.

पुलिस ने दबिश दी तो पूजा और गौर सिंह वहां से भी भाग निकले. अगले दिन कौर सिंह का बेटा संदीप पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उस ने प्रारंभिक पूछताछ में यह राज उगल दिया कि तीनों ने मिल कर कालू की हत्या कर के उस की लाश ठाणी के पिछवाड़े दबा दी है.

गुमशुदगी का मामला हत्या में तब्दील हो चुका था. वारदात रावतसर क्षेत्र में हुई थी. एएसआई लेखराम की रिपोर्ट पर 17 फरवरी को रावतसर में तीनों के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत अभियोग दर्ज कर लिया गया.

थानाप्रभारी पुष्पेंद्र सिंह ने शेष हत्यारोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी हेतु अमर सिंह प्रहलाद, अविनाश व महिला कांस्टेबल सावित्री की एक टीम गठित की और अपराधियों को ढूंढने लगे. अपराधबोध से ग्रस्त व भागदौड़ से थके कौर सिंह व पूजा लुकछिप कर विद्या के पास पहुंच गए. पुलिस को सूचना मिली तो दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने अगले दिन तीनों को नोहर की अदालत में पेश कर के 3 दिन का पुलिस रिमांड ले लिया. आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने कालू का शव, जो हड्डियों में तब्दील हो चुका था, बरामद कर लिया. हत्या में इस्तेमाल किया गया पूजा का दुपट्टा भी जब्तहो गया. व्यापक पूछताछ के बाद पुलिस ने अदालत के आदेश पर पूजा व उस के दोनों आशिक बापबेटे कौर सिंह और संदीप को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

सैक्स की आंच में अंधी हो कर एक वर्षीय अपनी बच्ची के भविष्य को अंधियारे में धकेलने वाली पूजा ने न केवल अपने पति को परलोक पहुंचाया बल्कि स्वयं के साथसाथ बापबेटे को भी काल कोठरी में पहुंचा दिया.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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