एक डीएसपी की कलंक कथा : भाग 2

पूछताछ में पता चला कि नावीद खान, इरफान व आसिफ को सुरक्षित जम्मू पहुंचाने के लिए देविंदर सिंह ने उन से 12 लाख रुपए की रकम ली थी. दरअसल, नावीद बाबू की मां और उस का भाई फिलहाल जम्मू में हैं और वह शायद जवाहर टनल के जरिए सुरक्षित जम्मू जाने और वहां कुछ दिन बिताने के लिए सिंह को पैसे देता था. नावीद ने पुलिस को बताया कि उस का एक दूसरा भाई पंजाब में पढ़ाई करता है.

पैसे ले कर डीएसपी आतंकियों को देता था संरक्षण

देविंदर सिंह ने यह भी कबूल कर लिया कि पिछले साल भी इन आतंकियों को ले कर जम्मू गया था. इसीलिए वे एकदूसरे पर भरोसा करते थे. पिछले साल की घटना के बारे में संभवत: किसी को भनक नहीं लग पाई. मीर नाम का व्यक्ति इस डील में बिचौलिए के तौर पर उन से जुड़ा था. पूछताछ में खुलासा हुआ कि देविंदर सिंह इस से पहले पुलवामा में तैनात था, जहां नावीद और वह एकदूसरे के संपर्क में आए थे.

इसी के बाद से समयसमय पर डीएसपी देविंदर सिंह उसे व उस के साथियों को पैसा ले कर सरंक्षण देने लगा. पुलिस के लिए देविंदर सिंह से जुड़ा यह खुलासा इसलिए चौंकाने वाला था क्योंकि उस के पकड़े जाने से एक सप्ताह पहले ही केंद्रशासित प्रदेश जम्मूकश्मीर के दौरे पर कुछ विदेशी राजदूतों का एक डेलीगेशन आया था. उन्हें रिसीव करने वाले पुलिस अधिकारियों के समूह में देविंदर सिंह भी शामिल था.

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एक डीएसपी के आतंकी कनेक्शन की भनक जैसे ही मीडिया को लगी तो पूरे देश में हंगामा मच गया. आईबी, रा और एनआईए के अधिकारी उस से अलगअलग पूछताछ करने में जुट गए. देविंदर सिंह की अब तक की तमाम नियुक्तियों और उस के गुडवर्क की फाइलों से धूल हटा कर उन्हें  दोबारा खंगाला जाने लगा तो देविंदर सिंह का संसद हमले में आतंकी अफजल गुरु से भी कनेक्शन सामने आया.

जांच एजेंसियों को यह भी पता चला कि एक अजीब संयोग रहा कि जहांजहां भी देविंदर सिंह की नियुक्ति रही थी, उन तमाम जगहों पर कोई न कोई बड़ा आतंकी हमला जरूर हुआ था.

जांच एजेंसियों ने पूछताछ के साथ जब देविंदर सिंह की कुंडली खंगालनी शुरू की तो उस के काले अतीत की तमाम परतें उधड़ती चली गईं.

नौकरी के शुरुआती दौर में ही आ गया था शक के दायरे में

देविंदर सिंह रैना मूलरूप से आतंकवादियों के गढ़ के रूप में विख्यात पुलवामा जिले के त्राल कस्बे का रहने वाला है. देविंदर सिंह 1990 में जम्मूकश्मीर पुलिस में सबइंस्पेक्टर के रूप में भरती हुआ था. नौकरी के शुरुआती दौर में ही देविंदर व एक अन्य एसआई के खिलाफ अंदरूनी जांच हुई थी. उन्होंने एक व्यक्ति को भारी मात्रा में अफीम के साथ गिरफ्तार किया था, लेकिन उस मादक पदार्थ तस्कर को पैसे ले कर छोड़ दिया गया.

इस के बाद उन्होेंने बरामद हुई अफीम को भी बेच दिया और मोटा पैसा कमाया. इस मामले का कुछ समय बाद खुलासा हुआ तो जांच शुरू हुई और देविंदर सिंह को नौकरी से बर्खास्त करने का फैसला लिया गया, लेकिन इसी बीच आईजी स्तर के एक अधिकारी ने मानवीय आधार का वास्ता  दे कर इस फैसले को रुकवा कर मामले को रफादफा कराया था. लेकिन देविंदर और दूसरे एसआई का वहां से ट्रांसफर कर दिया गया.

लेकिन देविंदर सिंह की हरकतें नहीं रुकीं. 1997 में बडगाम में तैनाती के दौरान भी फिरौती मांगे जाने की शिकायत हुई थी, जिस पर उसे पुलिस लाइन में भेज दिया गया था.

इस के बाद उस की तैनाती स्पैशल औपरेशन ग्रुप यानी एसओजी  में हुई. वहां से कुछ महीनों बाद देविंदर सिंह का तबादला ट्रैफिक पुलिस में कर दिया गया था. इस के बाद देविंदर सिंह 2003 में कोसोवो गए शांति मिशन दल का भी हिस्सा बना. वापस आने के बाद वह आतंकवाद निरोधी दस्ते में शामिल हो गया.

यहीं पर आतंक से जुड़े दहशतगर्दों से उस की जानपहचान हो गई और वह उन्हें संरक्षण देने के लिए पैसा कमाने लगा. 2015 में तत्कालीन डीजीपी के. राजेंद्रा ने उस की तैनाती शोपियां तथा पुलवामा जिला मुख्यालय में की. पुलवामा में गड़बड़ी की शिकायत पर तत्कालीन डीजीपी डा. एस.पी. वैद ने अगस्त, 2018 में उसे एंटी हाइजैकिंग स्क्वायड में भेज दिया. हांलाकि इस की जांच भी हुई थी.

तेजी से मिले प्रमोशन

आतंकवाद निरोधी दस्ते में तैनाती के समय उसे आतंकियों के खिलाफ काररवाई करने के लिए पुलिस मेडल से सम्मानित किया गया था. इसी दौरान उसे तेजी से प्रमोशन मिले और वह डीएसपी पद तक जा पहुंचा. पुलवामा हमले के वक्त वह वहां का डीएसपी था. वर्तमान में वह श्रीनगर एयरपोर्ट सुरक्षा इंचार्ज के तौर पर काम कर रहा था.

रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके देविंदर सिंह की उम्र इस वक्त 57 साल की है. उस की एक संपत्ति श्रीनगर में दूसरी जम्मू में है. इस का परिवार त्राल कस्बे में रहता है और यहां उस का सेब का बागान है.

देविंदर के मातापिता दिल्ली में उस के भाई के पास रहते हैं. देविंदर सिंह की पत्नी शिक्षक है और इस के 3 बच्चे हैं. 2 बेटियां बांग्लादेश में डाक्टरी पढ़ रही हैं, जबकि बेटा स्कूल जाता है.

देविंदर 10 जनवरी, 2020 को बादामी बाग में इंदिरा नगर स्थित अपने आवास में नावीद व उस के दोनों साथियों को ले कर आया. यहां से वह 11 जनवरी की सुबह अपनी कार में उन्हें बैठा कर जम्मू के लिए रवाना हुआ. देविंदर सिंह का इंदिरा नगर में जो नया आलीशान बंगला बन रहा है, उस का निर्माण कार्य 2017 से चल रहा है.

यह घर श्रीनगर के सब से सुरक्षित और वीआईपी इलाके में है क्योंकि बंगला एकदम कश्मीर में भारतीय सेना के 15वीं कोर के मुख्यालय से सटा है. इसलिए किसी को शक भी नहीं होता था कि यहां एक पुलिस अधिकारी के घर में आतंकवादियों की पनाहगाह है. देविंदर सिंह खुद व उस का परिवार इन दिनों कुछ ही दूरी पर एक रिश्तेदार के घर को किराए पर ले कर रह रहा था.

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पूछताछ में जो खुलासा हुआ है, उस के मुताबिक डीएसपी देविंदर सिंह लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों की आंखों में धूल झोंकता रहा. इस के खिलाफ कई बार जांच हुई, लेकिन हालात ऐसे रहे कि वह हर बार बच गया. लेकिन देविंदर सिंह इस बार जब श्रीनगर से आतंकियों को ले कर चला तो उस का गुडलक खत्म हो चुका था और वह कानून के शिकंजे में फंस गया.

किसी और की जांच करने के दौरान आ गया पुलिस रडार पर

दरअसल देविंदर सिंह के कानून के शिकंजे में फंसने की कहानी भी काफी रोचक है. वह 2 महीने से पुलिस के रडार पर था. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी को तब अंजाम दिया, जब वह आतंकवादियों के साथ खुद मौजूद था. हुआ यूं था कि शोपियां के डीएसपी संदीप चौधरी के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम कुछ आतंकवादियों के फोन ट्रैक कर रही थी. तभी एक ऐसा नंबर ट्रेस हुआ जो देविंदर सिंह का था.

इस काल में मौजूद सनसनीखेज जानकारियां जब संदीप चौधरी ने सीनियर पुलिस अफसरों को दीं, तो सब चौंक गए. इस के बाद से ही 57 साल के डीएसपी देविंदर सिंह की हर हरकत पर विशेष निगाह रखी जाने लगी. उन की हर काल रिकौर्ड की जाने लगी. आईजी विजय कुमार ने दक्षिण कश्मीर रेंज के डीआईजी अतुल कुमार को देविंदर सिंह को रंगेहाथ पकड़ने के चलाए गए औपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी.

अतुल कुमार ने एक पूरी टीम को इस काम पर लगा दिया. उस के फोन ट्रैक किए जाने लगे. 10 जनवरी को देविंदर सिंह ने जब हिज्बुल के जिला कमांडर नावीद बाबू से बात की तो पुलिस की टीमें एक्टिव हो गईं. उन्हें  पूरे प्लान की जानकारी हो गई. पुलिस की टीम को पता था कि पूरी रात दोनों आतंकवादी  डीएसपी देविंदर सिंह के घर में ही शरण लिए हुए हैं, लेकिन पुलिस टीम उसे ऐसी जगह पकड़ना चाहती थी जहां सार्वजनिक जगह हो.

पुलिस ने योजनाबद्ध तरीके से किया गिरफ्तार

अगले दिन यानी 11 जनवरी को देविंदर सिंह जैसे ही उन्हें अपनी कार से श्रीनगर से ले कर जम्मू के लिए रवाना हुआ तो कुलगाम के मीर बाजार इलाके में उसे घेर लिया गया. सादे लिबास में कुलगाम पुलिस की 2 टीमें लगातार देविंदर की गाड़ी का पीछा कर रही थीं, जो उच्चाधिकारियों को पलपल की जानकारी दे रही थीं. देविंदर से पूछताछ में पता चला कि आतंकी नावीद बाबू को श्रीनगर से जम्मू ले जाने के लिए उस ने ड्यूटी से छुट्टी ले रखी थी.

फिलहाल हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर नावीद बाबू के साथ गिरफ्तार डीएसपी देविंदर सिंह को जम्मूकश्मीर सरकार ने निलंबित कर दिया है. उसे दिया गया वीरता पदक भी वापस ले लिया गया है. कुलगाम पुलिस ने देविंदर सिंह व उस के 3 अन्य साथियों के खिलाफ अपराध संख्या 5/2020 पर आर्म्स एक्ट की धारा 7/25, विस्फोटक अधिनियम की धारा 3/4 और गैरकानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम की धारा 18, 19, 20, 39, 29 के तहत मुकदमा पंजीकृत किया है, जिस की जांच नैशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी यानी एनआईए को सौंप दी गई है.

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अब तक मामले की जांच कर रही सुरक्षा एजेंसियों ने डीएसपी के बैंक खाते और अन्य संपत्तियों की जांच भी शुरू कर दी है, जिस से यह खुलासा हुआ है कि देविंदर सिंह कुछ विदेशी एजेंसियों के संपर्क में था. उस के खातों में विदेशों से कुछ रकम जमा हुई है. माना जा रहा कि डीएसपी कश्मीर पुलिस की वरदी में आईएसआई एजेंट के रूप में डबल एजेंट का रोल निभा रहा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

एक डीएसपी की कलंक कथा : भाग 1

कश्मीर के किसी भी हिस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों की भारी संख्या  में मौजूदगी वैसे तो कोई नई बात नहीं है. लेकिन दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में 11 जनवरी, 2020 की सुबह से ही पुलिस की गहमागहमी अन्य  दिनों से कुछ ज्यादा ही थी. जगहजगह बैरीकेड लगे थे, जहां सीआरपीएफ के जवानों के साथ स्थानीय पुलिस की मौजूदगी बता रही थी कि पुलिस किसी खास शख्स की तलाश में है.

जिले में हर बैरीकेड पर तमाम वाहनों की सघनता से जांच हो रही थी. हर आनेजाने वाले वाहन और उस में सवार लोगों की पहचान के साथ तलाशी ली जा रही थी. हर नाके पर जम्मूकश्मीर पुलिस का कोई न कोई बड़ा अफसर मौजूद था.

करीब सवा 1 बजे का वक्त था, जब काजीकुंड के पास मीर बाजार में तेजी से आ रही एक सफेद रंग की आई-10 कार को सुरक्षा बलों ने रुकने पर मजबूर कर दिया. दरअसल, सुरक्षा बलों ने बैरीकेड कुछ इस तरह लगा रखा था कि तेजी से दौड़ रही कार के ड्राइवर को न चाहते हुए भी कार रोकनी पड़ी.

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‘‘सर, क्या बात है बड़ी तेजी से गाड़ी चला रहे थे, कोई गड़बड़ है क्या?’’ ड्राइविंग सीट के समीप पहुंचे एक सुरक्षाकर्मी ने पूछा.

‘‘कोई गड़बड़ नहीं है डियर, डिपार्टमेंट का आदमी हूं जरा जल्दी  में था, यहां इतना बड़ा नाका… कोई खास बात है क्या?’’ ड्राइविंग सीट पर बैठे सिख ने थोड़ा रूआब झाड़ते हुए कहा.

‘‘डिपार्टमेंट के आदमी हैं तो आप को पता ही होगा कि कश्मीर में कुछ खास न भी हो तो भी इतनी सिक्युरिटी जरूरी है.’’ सरदारजी से मुखातिब हुए जम्मूकश्मीर पुलिस के उस अधिकारी ने कहा और बोला,  ‘‘आप जरा नीचे आइए, गाड़ी की तलाशी लेनी है और गाड़ी में ये तीनों जनाब कौन हैं?’’

‘‘आप को सीनियर से बात करने की तमीज नहीं है क्या… मैं ने बताया ना कि डिपार्टमेंट का आदमी हूं, ये है मेरा कार्ड डिप्टी एसपी फ्राम एंटी हाइजैकिंग स्क्वायड.’’ नाके पर खड़े पुलिस अफसर ने जब गाड़ी चला रहे सरदारजी की गाड़ी की तलाशी लेने की बात की तो वे भड़क गए और मजबूरी में उन्हें अपना परिचय देना पड़ा और विश्वास दिलाने के लिए पुलिस विभाग का अपना परिचय पत्र भी दिखाया.

सरदारजी की गाड़ी रुकवाने वाले कश्मीर पुलिस के अफसर से वाकई ओहदे में बड़े अफसर निकले, लिहाजा उस ने कार्ड देखने के बाद एक कदम पीछे हटते हुए जोरदार सैल्यूट मारा, ‘‘सौरी सर, लेकिन आप को थोडा कष्ट होगा. ऊपर से और्डर है कि हर गाड़ी की तलाशी लेनी है.’’

पूरा सम्मान देने के बावजूद उस बावर्दी अफसर ने जब गाड़ी की तलाशी लेने की जिद की तो सरदारजी का पारा हाई हो गया. वे ड्राइविंग सीट छोड़ कर बाहर निकल आए और चिल्लाते हुए पूछा, ‘‘कौन है वो ऊपर वाला जिस ने ये और्डर दिया है? आप लोगों को डिपार्टमेंट का भी लिहाज नहीं है.’’

‘‘हम ने दिया है ये और्डर, आप को कोई ऐतराज है.’’ चंद कदम की दूरी पर कुछ सुरक्षाकर्मियों के साथ बातचीत कर रहे दक्षिण कश्मीर के डीआईजी अतुल कुमार गोयल ने सरदारजी को अपने स्टाफ से बहस और ऊंची आवाज में बात करते देखा तो उन्होंने वहां पहुंचते ही कहा.

सामने खड़े अधिकारी की वरदी पर लगे सितारे देख कर खुद को डीएसपी बताने वाले सरदारजी अचानक सकपका गए और बोले ‘‘नो.. सर, नो.. सर.’’ कहते हुए उन्होंने डीआईजी साहब को जोरदार सैल्यूट मारा.

‘‘कहां पोस्टिंग है आप की?’’ डीआईजी अतुल गोयल ने पूछा तो खुद को डीएसपी बताने वाले सरदार ने बताया कि उस का नाम देविंदर सिंह है और वह श्रीनगर में इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर जम्मूकश्मीर पुलिस के एंटी हाईजैकिंग स्क्वायड में डीएसपी है. डीएसपी देविंदर सिंह ने बताया कि इस समय वह छुट्टी पर है और अपनी पहचान वाले दोस्तों  के साथ जम्मू  जा रहे थे. डीएसपी देविंदर सिंह की गाड़ी के अगले शीशे पर जम्मूकश्मीर पुलिस अफसरों को मिलने वाला स्टीकर भी लगा था.

‘‘सौरी डीएसपी, हमें गाड़ी की तलाशी लेनी है.’’ डीआईजी अतुल ने पूरा परिचय जानने के बाद भी जब देविंदर सिंह से कहा तो देविंदर सिंह बोला, ‘‘सर, मैं एक औपरेशन पर हूं आप ये सब कर के मेरा सारा खेल खराब कर दोगे.’’

जब तक डीएसपी देविंदर सिंह डीआईजी अतुल गोयल से ये सब बात कर ही रहे थे कि तभी वहां तेजी से 2 बड़ी प्राइवेट गाडि़यां आ कर रुकीं, जिन में से एक के बाद एक सादे लिबास में हथियारबंद कई लोग उतरे और उन्होंने डीएसपी देविंदर सिंह की गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया.

गाड़ी में से उतरे एक शख्स ने डीआईजी अतुल गोयल को सैल्यूट किया और फिर उन के पास जा कर कान में धीमे से कुछ फुसफुसाया. जिस के बाद अचानक डीआईजी अतुल गोयल के तेवर कड़क हो गए, ‘‘बाहर निकालो सब को.’’

डीएसपी की कार में मिले आतंकी

डीआईजी का इतना बोलना था कि बिजली की गति से सुरक्षाकर्मियों ने डीएसपी देविंदर सिंह की गाड़ी में सवार तीनों लोगों को तेजी से खिड़की खोल कर बाहर निकाल लिया. उन के चेहरे पर ढके गर्म मफलर व सिर पर पहनी टोपियां हटवाईं तो वहां खड़े हर सुरक्षाकर्मी तथा पुलिस वालों के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं.

क्योंकि उन में सें एक शख्स का चेहरा काफी हद तक नावीद बाबू से मिलताजुलता था. नावीद बाबू कोई ऐरागैरा शख्स नहीं था, बल्कि प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का कश्मीर का कमांडर था. कई संगीन हत्याकांडों और आतंकवादी घटनाओं में पुलिस को उस की तलाश थी और उस की गिरफ्तारी पर सुरक्षा एजेंसियों ने 20 लाख रुपए का ईनाम भी घोषित किया हुआ था.

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गाड़ी की तलाशी ली गई तो उस में से एक हैंडग्रेनेड, एक एके 47 राइफल भी मिली. देविंदर सिंह की गाड़ी में बैठे तीनों लोगों से उन की पहचान से जुड़े दस्तावेज मांगे गए, तो उन की पहचान सैय्यद नवीद अहमद उर्फ नावीद बाबू, उन के सहयोगी आसिफ राथेर और इरफान के रूप में हुई.

‘‘तुम एक आतंकवादी को अपनी गाड़ी में साथ ले कर घूम रहे हो. शर्म नहीं आती… आखिर तुम्हारे इरादे क्या हैं? किस गेम को खेल रहे हो तुम?’’ नावीद अहमद को पहचानते ही डीआईजी अतुल गोयल का पारा चढ़ गया. उन्होंने उसी समय डीएसपी देविंदर सिंह को एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया.

डीआईजी अतुल कुमार के इशारे पर डीएसपी देविंदर सिंह और उस के साथ कार में मौजूद तीनों लोगों की तलाशी लेने के बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया. पुलिस ने उन की गाड़ी भी कब्जे में ले ली. सभी को कुलगाम की मीर बाजार कोतवाली में ले जाया गया.

थाने में लाते ही डीएसपी देविंदर सिंह समेत हिरासत में लिए गए तीनों लोगों से पूछताछ शुरू हो गई. कई घंटे की पूछताछ के बाद जो सनसनीखेज खुलासा हुआ, उस ने सभी के पांव के नीचे से जमीन जैसे खिसका दी. किसी को पता भी नहीं था कि जम्मूकश्मीर पुलिस की आस्तीन में एक ऐसा सांप पल रहा है, जो आतंकवादियों से मिला हुआ है.

डीआईजी अतुल गोयल ने देविंदर सिंह और उस के साथ गाड़ी में साथ मौजूद दोनों आतंकवादियों से हुई पूछताछ की जानकारी तत्काल कश्मीर जोन के आईजी विजय कुमार को दी. जिन्होंने तत्काल जम्मूकश्मीर के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह को इस की सूचना दी. डीजीपी के निर्देश पर पुलिस की एक टीम ने श्रीनगर के बादामी बाग इलाके के इंदिरानगर में रहने वाले डीएसपी देविंदर सिंह के निर्माणाधीन बंगले पर छापा मारा.

देविंदर सिंह के घर से मिले हथियार और नकदी

वहां से 2 एके 47 राइफलें और 2 पिस्तौलों के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए . इस से साफ हो गया कि देविंदर सिंह का आतंकवादियों के साथ न सिर्फ गठजोड़ है बल्कि वह उन्हें  पनाह देने का काम भी करता है.

तलाशी में सेना की 15वीं कोर का पूरा नक्शा, साढ़े 7 लाख रुपए नकद भी बरामद किए गए . देविंदर सिंह के निमार्णाधीन मकान की तलाशी में जो दस्तावेज बरामद किए गए, उस से आतंकवादियों के उस के यहां पनाह लेने के पर्याप्त सबूत थे.

इधर कुलगाम पुलिस को अब तक हुई पूछताछ में पता चल चुका था कि देविंदर सिंह के साथ कार में जो 3 लोग सवार थे, उन में से एक नावीद अहमद शाह उर्फ नावीद बाबू दक्षिणी कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के सब से वांछित कमांडरों में से एक था. पुलिस को काफी समय से उस की तलाश थी. खासतौर से 2018 में सेब बागानों में काम करने वाले गैरकश्मीरी लोगों की हत्या में उस का नाम आने के बाद से पुलिस व सुरक्षाबल सरगर्मी से उस की तलाश में जुटे थे और इसी मामले में उस पर 20 लाख का ईनाम घोषित किया गया था.

बताया जाता है कि नावीद अहमद उर्फ नावीद बाबू पहले जम्मूकश्मीर पुलिस में कांस्टेबल था, लेकिन 2017 में वह पुलिस के 4 हथियार ले कर भाग गया था और जा कर हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया था.

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देविंदर सिंह के साथ मौजूद दूसरा आतंकी आसिफ भी आतंक के काम से जुड़ा था. उसे लोगों को फरजी कागजातों के आधार पर पाकिस्तान ले जाने में महारत हासिल थी. आसिफ को दस्तावेज तैयार करने थे, जिस के जरिए वह कानूनी तरीके से पाकिस्तान जाने की तैयारी में था. जबकि तीसरे शख्स का नाम इरफान अहमद था, जो हिज्बुल का कश्मीर में ग्राउंड वर्कर और पेशे से वकील था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

भोजपुरी फिल्मों की इस जोड़ी पर जान छिड़कते थे फैंस, दोनों को पति-पत्नी मानने लगे थे लोग

भोजपुरी इंडस्ट्री की जानी मानी जोड़ी पाखी हेगड़े (Pakhi Hegde) और दिनेश लाल यादव (Dinesh Lal Yadav) उर्फ निरहुआ (Nirhua) दर्शकों की इतनी फेवरेट हुआ करती थी कि जिस फिल्म में ये दोनों कलाकार होते थे वो फिल्म अपने आप में ही सुपरहिट हो जाती थीं. पाखी हेगड़े (Pakhi Hegde) और निरहुआ (Nirhua) की ऑन स्क्रीन कैमिस्ट्री (On Screen Chemistry) इतनी जबरदस्त थी कि दर्शक इन दोनों को असलीयत में पति पत्नी समझने लगे थे.

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पाखी हेगड़े (Pakhi Hegde) और दिनेश लाल यादव (Dinesh Lal Yadav) उर्फ निरहुआ ने भोजपुरी इंडस्ट्री को इतनी सुपरहिट फिल्में दी हैं कि सभी लोग इस जोड़ी के दीवाने हो गए थे. एक समय पर हर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर की जुबान पर बस दो ही नाम हुआ करते थे और और वो दो नाम थे पाखी हेगड़े और दिनेश लाल यादव.

पाखी हेगड़े के फिल्मी करियर की बात करें तो पाखी हेगड़े (Pakhi Hegde) ने अब तक 50 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है. पाखी ने अपने एक्टिंग करियर की शुरूआत दूरदर्शन (Doordarshan) के सीरियल ‘मैं बनूंगी मिस इंडिया’ (Main Banungi Miss India) से की थी. इतना ही नहीं बल्कि पाखी हेगड़े (Pakhi Hegde) ने बौलीवुड इंडस्ट्री के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के साथ भी फिल्म ‘गंगा देवी’ (Ganga Devi) में काम किया है.

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एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा ने शेयर किया अपना लेटेस्ट Bikini फोटोशूट, देख कर फैंस के उड़े होश

बौलीवुड इंडस्ट्री की जानी मानी एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा (Anushka Sharma) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने की वजह से वे अपने फैंस के साथ काफी कनेक्टिड रहती हैं और अपने से जुड़ी हर अप्डेट फैंस के साथ जल्द से जल्द शेयर करती रहती हैं. अनुष्का शर्मा (Anushka Sharma) आए दिन अपनी हॉट और ग्लैमरस फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं जिसे उनके फैंस काफी प्यार देते हैं.

 

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इसी कड़ी में एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा (Anushka Sharma) एक बार फिर अपने कछ ऐसी फोटोज शेयर की हैं जिसने उनके फैंस की रातों की नींदे तक उड़ा दी हैं. हाल ही में अनुष्का ने अपना लेटेस्ट फोटोशूट इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसमें वे बेहद खूबसूरत दिखाई दे रही हैं. इन फोटोज को देख फैंस उनकी इस कदर तारीफ करने में जुटे हुए हैं कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे.

 

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For shore! 🌊 @vogueindia @anaitashroffadajania

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इन फोटोज के साथ अनुष्का शर्मा (Anushka Sharma) ने एक खूबसूरत सा कैप्शन भी लिखा है कि, “The cool breeze , the steady waves , some sand on my skin , the sun on back and salty hair . It was a good day.” ना सिर्फ फैंस बल्कि मौनी रॉय (Mouni Roy), उर्वशी रौटेला (Urvashi Rautela), विराट कोहली (Virat Kohli) समेत कई बड़े सेलिब्रिटीज भी अनुष्का की तारीफों के कमेंट्स कर रहे हैं.

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साल 2008 में बौलीवुड इंडस्ट्री के बादशाद शाहरुख खान (Shahrukh Khan) के साथ फिल्म ‘रब ने बना दी जोड़ी’ (Rab Ne Bana Di Jodi) ने अपनी एक्टिंग करियर की शुरूआत करने वाली एक्टेस अनुष्का शर्मा (Anushka Sharma) आज लाखों दिलों की जान बन चुकी हैं. फिल्म ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के बाद से अनुष्का एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में कर दर्शकों की फेवरेट बनती गईं.

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श्वेता तिवारी की बेटी पलक ने इंस्टाग्राम पर शेयर की ग्लैमरस वीडियो, फैंस के आए ऐसे रिएक्शंस

ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) की बेटी पलक तिवारी (Palak Tiwari) आए दिन अपने ग्लैमरस फोटोज और वीडियो के चलते सोशल मिडिया पर सुर्खियों में बनी रहती हैं. इस कड़ी में पलक तिवारी फिर से अपने एक Video के चलते सुर्खियों में छाई हुई हैं. उन्होंने मारक अदा में अपने चमकती आंखों वाली एक वीडियो अपने इंस्टाग्राम (Instagram) अकाउंट पर शेयर किया है जो काफी वायरल हो रहा है. इस वीडियो पर उनके फैन्स का रिएक्शन भी सामने आया है.

 

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Mango glaze

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उनके इस वीडियो पर अंकित नाम के एक यूजर नें लिखा है ‘ड्रीम गर्ल’ (Dream Girl). अनिल नाम के यूजर नें लिखा ‘हमेशा की तरह खूबसूरत’ (Looking Beautiful As Always). वहीं एक यूजर नें लिखा चौका देने वाला (Stunning). सोशल मीडिया पर पलक तिवारी (Palak Tiwari) के इस वीडियो पर मिल रहे रिएक्शन को देख कर उनके प्रति फैन्स की दीवानगी का पता चल रहा है.

 

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Shoutout to everyone’s favourite flower bed sheet

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इस वीडियो के पहले भी पलक तिवारी (Palak Tiwari) नें अपने ग्लैमरस बेड पिक्स शेयर किये जो तस्वीरों के एक शेप में हैं. यह तस्वीरें इंस्टाग्राम पर शेयर किये जाने के बाद से काफी वायरल हो रही हैं. इन फोटोज में पलक ब्लैक कलर की टी-शर्ट और पैंट पहनी दिखाई दे रही हैं. इंस्टाग्राम पर शेयर किये गए इस फोटो के साथ पलक तिवारी ने  कैप्शन में लिखा “हर किसी की पसंदीदा फूलों की चादर पर” (Shoutout to Everyone’s Favourite Flower Bed Sheet). पलक के इन तस्वीरों पर भी उनके फैन्स की ढेर सारी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही हैं.

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पलक तिवारी के दिलकश अंदाज वाली इन तस्वीरों को देख कर कोई भी उनकी तारीफ किये बिना नहीं रह सकता है. लॉक डाउन के दौरान से ही पलक ने अपनी हॉट और सेक्सी तस्वीरों को खूब शेयर किया जिन्हें देख किसी के भी दिल की धड़कन बढ़ सकती है.

 

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Random (no makeup edition) Also very accurate of my mood recently

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पलक तिवारी (Palak Tiwari) ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) के पहले पति की बेटी है. इसके बाद श्वेता तिवारी ने अभिनव कोहली (Abhinav Kohli) से शादी की थी. लेकिन यह रिश्ता भी ज्यादा दिनों तक नहीं चला और अपने बेटे रेयांश के साथ पति से अलग रहने लगी हैं. इस मामले में श्वेता और उनकी बेटी पलक ने पुलिस में अभिनव के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत भी दर्ज कराई थी.

 

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दबंगों के वर्चस्व की लड़ाई : भाग 1

4 नवंबर, 2019 की सुबह से ही अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (स्पैशल न्यायाधीश) बद्री विशाल पांडेय की अदालत के बाहर भारी गहमागहमी थी. अदालत परिसर पुलिस छावनी में बदल गया था. लग रहा था कि कोई बड़ा फैसला होने वाला है.

यही सच भी था. 23 साल पहले 13 अगस्त, 1996 को शाम 7 बजे सिविल लाइंस थानाक्षेत्र के पैलेस सिनेमा हाल और कौफी शौप के बीच समाजवादी पार्टी के झूंसी विधानसभा के बाहुबली विधायक जवाहर यादव उर्फ पंडित, उन के चालक गुलाब यादव और राहगीर कमल कुमार दीक्षित की एके-47 से गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.

इस घटना में पंकज कुमार श्रीवास्तव व कल्लन यादव भी घायल हुए थे. कल्लन यादव की मृत्यु गवाही शुरू होने से पहले ही हो गई थी.

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बाहुबली विधायक जवाहर यादव के बड़े भाई और चश्मदीद गवाह सुलाकी यादव ने थाना सिविल लाइंस में मंझनपुर (तब इलाहाबाद लेकिन अब कौशांबी) के रहने वाले करवरिया बंधुओं रामचंद्र मिश्र, श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला, कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया और सूर्यभान करवरिया के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

इंसपेक्टर आत्माराम दुबे ने यह मुकदमा धारा 147, 148, 149, 302, 307, 34 भादंवि व क्रिमिनल ला (संशोधन) एक्ट के तहत दर्ज किया था. न्यायाधीश बद्री विशाल पांडेय इसी केस का फैसला सुनाने वाले थे.

हत्या के बाद आरोपी कपिलमुनि करवरिया बसपा से फूलपुर के सांसद, उदयभान करवरिया भाजपा से बारा विधानसभा से विधायक और सूर्यभान करवरिया एमएलसी चुने जा चुके थे, इसलिए यह मामला हाईप्रोफाइल बन गया था.

बहरहाल, अदालत सुबह से छावनी में तब्दील थी. सुरक्षा के लिहाज से अदालत परिसर को 2 सैक्टरों में बांट दिया गया था. सभी गेटों पर पीएसी का कड़ा पहरा था. यहां तक कि वादियों को भी गहन जांचपड़ताल के बाद ही परिसर में आने दिया गया.

उधर दंगा नियंत्रण वाहनों और आंसू गैस गन ले कर जवान मुस्तैद थे. कर्नलगंज के साथसाथ अतरसुइया, मुट्ठीगंज, जार्जटाउन, खुल्दाबाद, दारागंज समेत यमुनापार व गंगापार के भी कई थानों की फोर्स को अदालत परिसर में लगा दिया गया था. कचहरी के मुख्य गेट पर रस्सा बांध कर बैरिकेडिंग कर दी गई थी. एसपी (सिटी) बृजेश कुमार और सीओ (बेरहना) रत्नेश सिंह गेट पर मोर्चा संभाले थे. सीओ (कर्नलगंज) सत्येंद्र प्रसाद तिवारी एडीजे-5 के कोर्ट के आसपास और इनर सेक्टर की कमान संभाल रहे थे.

प्रयागराज के नैनी जेल में बंद करवरिया बंधुओं कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूर्यभान करवरिया और उन के रिश्तेदार रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू अपराह्न पौने 2 बजे अदालत परिसर में लाए गए.

आरोपियों के परिसर में पहुंचते ही उन के समर्थकों की भारी भीड़ जमा हो गई थी. अभियुक्तों को अदालत कक्ष में ले जाना पुलिस के लिए मुश्किल हो रहा था. जैसेतैसे एसपी (सिटी) बृजेश कुमार और सीओ रत्नेश सिंह ने चारों आरोपियों को पुलिस घेरे में ले कर एडीजे-5 के कक्ष तक पहुंचाया.

फैसला सुनाए जाने से पहले 31 अक्तूबर, 2019 को अभियोजन पक्ष के सरकारी वकील लल्लन सिंह यादव और बचावपक्ष के वकील ताराचंद गुप्ता के बीच तीखी बहस हुई थी.

आखिरी बहस के दौरान सरकारी वकील लल्लन सिंह यादव ने कहा था, ‘‘योर औनर, यह एक रेयरेस्ट औफ रेयर केस है. करवरिया बंधुओं को फांसी की सजा दी जाए. इस घटना में एके-47 जैसे स्वचालित असलहे का इस्तेमाल कर के भरे बाजार में घटना को अंजाम दिया गया, जिस में 3 लोग मारे गए. मरने वालों में एक राहगीर भी शामिल था. घटना से पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई थी. लोग भयभीत हुए और बाजार बंद हो गए थे.’’

बचावपक्ष के अधिवक्ता ताराचंद गुप्ता ने इस बात का विरोध करते हुए कहा, ‘‘सर, यह रेयरेस्ट औफ रेयर का मामला नहीं है. अभियुक्तों का यह पहला अपराध है. अभियुक्तों का इस से पहले का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है. किस के हाथ में कौन सा असलहा था, इस का जिक्र प्राथमिकी में नहीं है. यह बात अदालत में 23 साल बाद पहली बार बताई गई, इसलिए उदारता बरतते हुए आरोपियों को कम से कम सजा दी जाए.’’

इस घटना में प्रयुक्त सफेद रंग की मारुति वैन को ले कर दोनों पक्षों के बीच बहस हुई. बचावपक्ष के अधिवक्ता ने अभियुक्तों के बचाव में दलील पेश की, ‘‘जिस मारुति वैन संख्या यूपी70-8070 से हमलावरों का आना बताया जा रहा है, उस वैन का इस घटना में इस्तेमाल ही नहीं हुआ. उस समय यह मारुति वैन सुरेंद्र सिंह के पिता के अंतिम संस्कार में शामिल लोग ले गए थे. फिर वह वैन घटनास्थल पर कैसे हो सकती है?’’

बाद में अभियोजन पक्ष के सरकारी अधिवक्ता लल्लन सिंह यादव ने अन्य गवाहों के साथ बहस की. बचावपक्ष की ओर से पेश किए गवाह छेदी सिंह से जब सरकारी वकील यादव ने मारुति वैन की बरामदगी को ले कर पूछताछ की तो उस का बयान विरोधाभासी निकला. गवाहों का कहना था कि घटना के समय वैन रसूलाबाद घाट गई थी. मगर इस का कोई साक्ष्य नहीं दिया गया. जबकि घटना के कुछ ही देर बाद दर्ज कराई गई एफआईआर में मारुति वैन का नंबर यूपी70-8070 दर्ज किया गया था.

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बहरहाल, बचावपक्ष के अधिवक्ता चारों आरोपियों को बचा पाने में असफल रहे. अपने मुवक्किलों को बचाने के लिए उन्होंने 156 गवाह पेश किए थे, जबकि सरकारी वकील ने अदालत के सामने 18 गवाह पेश किए थे. दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की बहस पूरी होने के बाद जज ने 4 नवंबर, 2019 को इस केस का फैसला सुनाने की तारीख तय कर दी थी. यह मामला क्या था और कैसे इतना चर्चित हुआ, जानने के लिए हमें 23 साल पीछे जाना होगा.

जवाहर यादव का किस्सा कोताह

32 वर्षीय जवाहर यादव उर्फ पंडित मूलत: उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर के गांव खैरपाड़ा, थाना बक्शा के रहने वाले थे. उन के पिता भुल्लन यादव अपने तीनों बेटों सुलाकी यादव, जवाहर यादव और मदन यादव को ले कर इलाहाबाद आ गए और मजदूरी कर के परिवार का पालनपोषण करते थे. भुल्लन के तीनों बच्चे काफी छोटे थे.

किशोरावस्था में पहुंचते ही जवाहर यादव इलाहाबाद के नैनी थाना क्षेत्र के अरैल निवासी नामचीन अपराधी और शराब कारोबारी गुलाब मेहरा के संपर्क में आ गए. उन दिनों गुलाब मेहरा की नैनी में तूती बोलती थी. शराब कारोबार के साथसाथ वह गंगा बालू का धंधा भी करते थे.

आगे चल कर जवाहर यादव गुलाब मेहरा का सारा कारोबार देखने लगे. गुलाब मेहरा के ऊपर हत्या, बलात्कार, शराब तस्करी आदि के कई मुकदमे चल रहे थे. कई मामलों में गुलाब को सजा भी हो चुकी थी. उन्हीं दिनों गुलाब मेहरा की हत्या हो गई. गुलाब मेहरा के कत्ल के बाद जवाहर यादव जरायम की दुनिया में आगे बढ़ते गए.

अब तक जवाहर यादव शराब और बालू का कारोबार अकेले देखते थे. बाद के दिनों में उन के बड़े भाई सुलाकी यादव और साला रामलोचन यादव उन के साथ आ गए. भाई और साले के आ जाने से जवाहर यादव का धंधा और ज्यादा जम गया. जल्द ही जवाहर यादव गांव में दबंग युवकों में शुमार हो गए. उन्होंने आसपास के लोगों से मेलजोल बढ़ाया और शराब के धंधे में और तेजी से जुट गए. उस समय झूंसी में गंगा बालू के ठेकों में करवरिया बंधुओं और उन के लोगों का साम्राज्य स्थापित था. बालू के ठेकों को ले कर जवाहर यादव और करवरिया बंधुओं के बीच दुश्मनी हो गई.

शराब के धंधे से की गई अकूत काली कमाई और नौजवानों की टोली से जवाहर यादव बाहुबली बन गए. इसी दम पर जवाहर यादव ने बालू के ठेकों में हाथ डालना शुरू कर दिया. दोनों परिवारों में अनबन की खूनी लकीरों की शुरुआत यहीं से हुई थी. जवाहर यादव ने धीरेधीरे बालू के ठेकों में वर्चस्व जमाना शुरू कर दिया.

1989 के आम चुनावों से पहले जवाहर यादव ने किसी के माध्यम से समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद जवाहर यादव  की पौ बारह हो गई.

धीरेधीरे वह इलाहाबाद में मुलायम सिंह यादव के करीबी लोगों में शुमार हो गए. जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो जवाहर यादव ने राजनीति में जाने की ठान ली. धीरेधीरे उन्होंने झूंसी में अपनी सियासी जमीन तैयार की और 1991 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन कुछ वोटों से हार का मुंह देखना पड़ा.

जवाहर यादव को चुनाव में भले ही हार का मुंह देखना पड़ा था, लेकिन खुद का सियासी रसूख स्थापित करने में वह नहीं चूके. रसूख बढ़ते ही बालू के ठेकों में उन का दखल और बढ़ गया. बालू के ठेकों को ले कर करवरिया बंधुओं और जवाहर यादव के बीच दुश्मनी और गाढ़ी होती गई.

जवाहर यादव उर्फ पंडित की किस्मत के सितारे बुलंदियों पर थे. सन 1993 में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी का प्रदेश में गठबंधन हुआ तो जवाहर यादव पहली बार झूंसी विधानसभा से विधायक चुने गए.

सत्ता की चाबी हाथ आई तो जवाहर यादव का सियासी रसूख तेजी से बढ़ने लगा. बताया जाता है कि उस समय इलाहाबाद की समाजवादी पार्टी की राजनीति जवाहर यादव के इर्दगिर्द ही घूमती थी.

जैसेजैसे विधायक जवाहर यादव का सियासी कद बढ़ा, वैसेवैसे करवरिया बंधुओं की परेशानियां बढ़ती गईं. जवाहर यादव को टक्कर देने के लिए करवरिया बंधुओं ने भी कमर कस ली थी. अब जवाहर यादव और करवरिया बंधुओं की दुश्मनी खुल कर सामने आ गई थी. दुश्मनी की वजह से आखिरकार जवाहर यादव को अपनी जान गंवानी पड़ी.

13 अगस्त, 1996 को जवाहर यादव अपने छोटे भाई सुलाकी और ड्राइवर गुलाब के साथ सिविल लाइंस में एक सभा करने जा रहे थे. उस वक्त शाम के 7 बज रहे थे. जवाहर ने पत्नी को फोन कर के कहा कि पूजा कर लो, मुझे आने में थोड़ी देर होगी.

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जैसे ही विधायक की गाड़ी सिविल लाइंस स्थित पैलेस सिनेमा हाल और कौफीहाउस के बीच पहुंची, तभी एक सफेद रंग की मारुति वैन और एक सफेद रंग की कार आड़ीतिरछी जवाहर यादव के वाहन के सामने आ कर खड़ी हो गईं. जवाहर यादव जब तक कुछ समझ पाते, तब तक बदमाशों ने एके-47 राइफल से गोलियां बरसा दीं.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

दबंगों के वर्चस्व की लड़ाई

Dr Ak Jain: क्या करें जब पुरुषों में घटने लगे बच्चा पैदा करने की ताकत

बेऔलाद जोड़ों की तादाद में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है क्योंकि नामर्दी के चलते मर्द अपनी पत्नी को पेट से करने में नाकाम होते हैं. वैसे, अगर गर्भनिरोधक उपाय आजमाए बगैर एक साल तक हमबिस्तरी करने पर भी जब बच्चा नहीं ठहरता है तो इसे शुक्राणुओं की समस्या के चलते नामर्दी मान लिया जाता है.

आमतौर पर इस तरह की समस्या  कमजोर शुक्राणु के चलते होती है जबकि बच्चा ठहरने के लिए शुक्राणु

की ही जरूरत पड़ती है. ऐसे मामलों में औरतों की फैलोपियन ट्यूब तक शुक्राणु पहुंच ही नहीं पाते हैं और कई कोशिशों के बावजूद औरत पेट से होने में नाकाम रहती है.

इस समस्या के लिए कई बातें जिम्मेदार होती हैं. खास वजह धूम्रपान और ज्यादा मात्रा में शराब का सेवन करना है. ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि गठीला बदन बनाने के लिए लड़के कम उम्र से ही स्टेरौयड और दूसरी दवाओं का सेवन करने लग जाते हैं. इस वजह से बाद की उम्र में उन्हें इस समस्या का सामना करना पड़ जाता है. बहुत ज्यादा कसरत और डायटिंग के लिए भूखे रहने जैसी आदतें भी इस की खास वजहें हैं.

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नौजवानों में तेजी से बढ़ते तनाव और डिप्रैशन के साथसाथ प्रदूषण और गलत लाइफस्टाइल के चलते एनीमिया की समस्या भी मर्दों में नामर्दी की वजह बनती है. इनफर्टिलिटी से जुड़े सब से बुरे हालात तब पैदा होते हैं जब मर्द के वीर्य में शुक्राणु नहीं बन पाते हैं. इस को एजूस्पर्मिया कहा जाता है. तकरीबन एक फीसदी मर्द आबादी भारत में इसी समस्या से पीडि़त है.

हमारे शरीर को रोज थोड़ी मात्रा में कसरत की जरूरत होती है, भले ही वह किसी भी रूप में क्यों न हो. इस से हमारे शारीरिक विकास को बढ़ावा मिलता है.

अगर आप भी ऐसी ही किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो संपर्क करिए लखनऊ के डॉक्टर ए. के. जैन से जो पिछले 40 सालों से इन समस्याओं का इलाज कर रहे हैं.

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हालांकि कसरत के कई अच्छे पहलू भी हैं. मगर इस के कुछ बुरे पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है जिन की तरफ कम ही लोगों का ध्यान जाता है. मसलन, औरतों का ज्यादा कसरत करना बांझपन की वजह भी बन सकता है. वैसे, कसरत करने के कुछ फायदे इस तरह से हैं:

दिल बने मजबूत : हमारे दिल की हालत सीधेतौर पर इस बात से जुड़ी होती है कि हम शारीरिक रूप से कितना काम करते हैं. जो लोग रोजाना शारीरिक रूप से ज्यादा ऐक्टिव नहीं रहते हैं, दिल से जुड़ी सब से ज्यादा बीमारियां भी उन्हीं लोगों को होती हैं खासतौर से उन लोगों के मुकाबले जो रोजाना कसरत करते हैं.

अच्छी नींद आना : यह साबित हो चुका है कि जो लोग रोजाना कसरत करते हैं, उन्हें रात को नींद भी अच्छी आती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कसरत करने की वजह से हमारे शरीर की सरकेडियन रिदम मजबूत होती है जो दिन में आप को ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करती है और जिस की वजह से रात में आप को अच्छी नींद आती है.

शारीरिक ताकत में बढ़ोतरी : हम में से कई लोगों के मन में कसरत को ले कर कई तरह की गलतफहमियां होती हैं, जैसे कसरत हमारे शरीर की सारी ताकत को सोख लेती है और फिर आप पूरे दिन कुछ नहीं कर पाते हैं. मगर असल में होता इस का बिलकुल उलटा है. इस की वजह से आप दिनभर ऐक्टिव रहते हैं, क्योंकि कसरत करने के दौरान हमारे शरीर से कुछ खास तरह के हार्मोंस रिलीज होते हैं, जो हमें दिनभर ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करते हैं.

आत्मविश्वास को मिले बढ़ावा : नियमित रूप से कसरत कर के अपने शरीर को उस परफैक्ट शेप में ला सकते हैं जो आप हमेशा से चाहते हैं. इस से आप के आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होती है.

रोजाना कसरत करने के कई सारे फायदे हैं इसलिए फिजिकल ऐक्टिविटी को नजरअंदाज करने का तो मतलब ही नहीं बनता, लेकिन बहुत ज्यादा कसरत करने का हमारे शरीर पर बुरा असर भी पड़ सकता है खासतौर से आप की फर्टिलिटी कम होती है, फिर चाहे वह कोई औरत हो या मर्द.

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ऐसा कहा जाता है कि बहुत ज्यादा अच्छाई भी बुरी साबित हो सकती है. अकसर औरतों में एक खास तरह के हालात पैदा हो जाते हैं जिन्हें एमेनोरिया कहते हैं. ऐसी हालत तब पैदा होती है, जब एक सामान्य औरत को लगातार 3 महीने से ज्यादा वक्त तक सही तरीके से माहवारी नहीं हो पाती है.

कई औरतों में ऐसी हालत इस वजह से पैदा होती है क्योंकि वे शरीर को नियमित रूप से ताकत देने के लिए जरूरी कैलोरी देने वाली चीजों का सेवन किए बिना ही जिम में नियमित रूप से किसी खास तरह की कसरत के 3 से 4 सैशन करती हैं.

शरीर में कैलोरी की कमी का सीधा असर न केवल फर्टिलिटी पर पड़ता है, बल्कि औरतों की सेक्स इच्छा पर भी बुरा असर पड़ता है. साथ ही मोटापा भी इस में एक अहम रोल निभाता है क्योंकि ज्यादातर मोटी औरतें वजन घटाने के लिए कई बार काफी मुश्किल कसरतें भी करती हैं. इस वजह से भी उन की फर्टिलिटी पर बुरा असर पड़ता है.

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इनफर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहे जोड़े शारीरिक और मानसिक तनाव की हालत में पहुंच जाते हैं. अकसर देखा गया है कि ऐसे मामलों में या तो शुक्राणु की मात्रा कम होती है या स्पर्म की ऐक्टिविटी बहुत कम रहती है. लिहाजा ऐसे शुक्राणु औरत के अंडाणु को गर्भाधान करने में नाकाम रहते हैं.

वैसे अब इनफर्टिलिटी से नजात पाने के लिए कई उपयोगी इलाज मुहैया हैं. ओलिगोस्पर्मिया में स्पर्म की तादाद बहुत कम पाई जाती है और एजूस्पर्मिया में तो वीर्य के नमूने में स्पर्म होता ही नहीं है. एजूस्पर्मिया में मर्द के स्खलित वीर्य से स्पर्म नहीं निकलता है जिसे जीरो स्पर्म काउंट कहा जाता है. इस का पता वीर्य की जांच के बाद ही लग पाता है.

कुछ मामलों में जांच के दौरान तो स्पर्म नजर आता है लेकिन कुछ रुकावट होने के चलते वीर्य के जरीए यह स्खलित नहीं हो पाता है. स्पर्म न पनपने की एक और वजह है वैरिकोसिल. इस का इलाज सर्जरी से ही मुमकिन है.

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कुछ समय पहले तक पिता बनने के लिए या तो दाता के स्पर्म का इस्तेमाल करना पड़ता था या किसी बच्चे को गोद लेना पड़ता था, लेकिन अब चिकित्सा विज्ञान में स्टेम सैल्स टैक्नोलौजी की तरक्की ने लैबोरेटरी में स्पर्म बनाना मुमकिन कर दिया है.

लैबोरेटरी में  मरीज के स्टेम सैल्स का इस्तेमाल करते हुए स्पर्म को बनाया जाता है, फिर इसे विट्रो फर्टिलाइजेशन तरीके से औरत पार्टनर के अंडाशय में डाल कर अंडाणु में फर्टिलाइज किया जाता है. इस तरीके से वह औरत पेट से हो सकती है.

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दबंगों के वर्चस्व की लड़ाई : भाग 2

इस हमले में विधायक जवाहर यादव उर्फ पंडित, ड्राइवर गुलाब यादव और राहगीर कमल कुमार दीक्षित की मौके पर ही मौत हो गई थी. इस के अलावा राहगीर पंकज कुमार श्रीवास्तव और कल्लन यादव को भी गंभीर चोटें आईं. बाद में पंकज की मौत हो गई थी. इस केस की गवाही शुरू हाने से पहले ही कल्लन यादव की मृत्यु भी हो गई थी.

नामजद लिखाई रिपोर्ट

एकमात्र जीवित बचे और घटना के चश्मदीद गवाह विधायक के भाई सुलाकी यादव ने थाना सिविल लाइंस में इस वारदात की नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. नामजद लोगों के नाम थे कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूरजभान करवरिया, श्यामनारायण करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी. यह केस भादंसं की धारा 147, 148, 149, 302, 307 और 7 सीएल एक्ट के तहत दर्ज किया था.

विधायक जवाहर यादव की हत्या की खबर सुन कर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव खुद उन के घर पहुंचे और परिवार के लोगों को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया. बाद में उन्होंने उन की पत्नी विजमा यादव को फूलपुर विधानसभा से टिकट दिया और वह जीत कर विधायक बन गईं.

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जवाहर यादव की मौत के बाद उन की सियासी विरासत उन की पत्नी विजमा को मिली. अब तक सिर्फ घर संभाल रहीं विजमा ने पति की विरासत को बखूबी संभाला और फूलपुर से 2 बार लगातार विधायक बनीं. कहानी आगे बढ़ाने से पहले करवरिया बंधुओं के बारे में भी जान लें—

57 वर्षीय कपिलमुनि करवरिया मूलरूप से कौशांबी जिले के चकनारा के रहने वाले हैं. तब तक जिला कौशांबी नहीं बना था और यह इलाका इलाहाबाद जिले में आता था. करवरिया प्रयागराज के थाना अतरसुइया के मोहल्ला कल्याणी देवी में रहते थे. करवरिया बंधु दोआबा की गलियों से निकल कर सियासतदां बने थे.

इन के बाबा जगतनारायण करवरिया ने समाज में रुतबा पाने के लिए 1962 में पहली बार सिराथू विधानसभा सीट (तब इलाहाबाद) से चुनाव लड़ा था. हालांकि वह चुनाव हार गए. बाद में उन की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई.

जगतनारायण करवरिया के 2 बेटे थे श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला और वशिष्ठ मुनि करवरिया उर्फ भुक्खल महाराज. पिता उन के बड़े बेटे श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला महाराज ने पिता की हत्या को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया.

श्याम नारायण ने सियासी कदम बढ़ाते हुए मंझनपुर विकास खंड से ब्लौक प्रमुख का चुनाव लड़ा. लेकिन चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा.

इस के बाद भी श्याम नारायण करवरिया ने कई चुनाव लड़े. हर चुनाव में उन्होंने हार का सामना किया. बावजूद इस के वह हताश नहीं हुए. छोटे बेटे वशिष्ठ नारायण उर्फ भुक्खल महाराज ने अपनी किस्मत प्रयागराज से आजमाई और चुनावी मैदान में उतर गए. वह वशिष्ठ मुनि के नाम से कम और भुक्खल महाराज के नाम से ज्यादा मशहूर थे. बड़े भाई श्याम नारायण के मुकाबले भुक्खल महाराज ज्यादा गरम मिजाज थे. सियासत के साथसाथ आपराधिक दुनिया में भी उन की अच्छी पैठ थी. कौशांबी से इलाहाबाद तक भुक्खल महाराज के नाम की तूती बोलती थी. इसी दौरान वह इलाहाबाद दक्षिणी से विधानसभा चुनाव लडे़ और हार गए.

भुक्खल महाराज का मंझला बेटा उदयभान करवरिया दोनों भाइयों से अलग मिजाज का था. मिलनसार होने की वजह से समाज पर उस की अच्छी पकड़ थी. उस में जमीनी नेताओं के गुण थे, इसलिए जनता के बीच उस का कारवां बढ़ता गया.

वर्चस्व की लड़ाई

डिस्ट्रिक्ट कोऔपरेटिव बैंक का चुनाव था. उदयभान ने चुनाव में हाथ डाल दिया. जिले के कद्दावर नेता और पूर्व डिस्ट्रिक्ट कोऔपरेटिव बैंक के अध्यक्ष शिवसागर सिंह को पराजित कर के वह अध्यक्ष बन गए. उदयभान करवरिया अपने परिवार में पहले जनता के सिरमौर बने थे.

कपिलमुनि करवरिया ने साल 2000 में जिला पंचायत के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा तो जिला पंचायत अध्यक्ष की कुरसी उन की झोली में आ गिरी.

इलाहाबाद के राजनीतिक गलियारों में करवरिया बंधुओं की तूती बोलने लगी. दोआबा की गलियों से ले कर इलाहाबाद तक उन की हनक थी. उदयभान करवरिया ने इस का फायदा उठाते हुए भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और सन 2002 में बारा विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर विधायक बन गए.

इसी बीच विधायक उदयभान के छोटे भाई सूर्यभान करवरिया भी ताल ठोंक कर राजनीति के अखाड़े में कूद पड़े. उन्होंने समाजवादी पार्टी के बाहुबली कहे जाने वाले कद्दावर नेता हरिमोहन यादव को हरा कर सन 2005 में मंझनपुर ब्लौक प्रमुख की सीट छीन ली.

बाद में ब्लौक प्रमुख सूर्यभान करवरिया ने बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया. उस वक्त विधानसभा चुनाव होने वाले थे. सूर्यभान ने विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई, लेकिन हार का सामना करना पड़ा.

जिला पंचायत अध्यक्ष और बड़े भाई कपिलमुनि करवरिया को सूरजभान ने बसपा की सदस्यता दिलाई. करवरिया बंधुओं की सियासी ताकत को देखते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने सन 2009 में बतौर ईनाम कपिलमुनि करवरिया को फूलपुर सीट से चुनाव लड़ाया. भुक्कल महाराज ने फूलपुर सीट जीत कर अपना दबदबा कायम रखा.

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किसी की मजाल नहीं थी कि करवरिया बंधुओं से आंख से आंख मिला सके. इसी राजनैतिक कवच का फायदा यह मिला कि विधायक जवाहर यादव हत्याकांड में नामजद आरोपी होने के बावजूद उन की गिरफ्तारी नहीं हुई.

बहरहाल, विधायक जवाहर यादव हत्याकांड की शुरुआती जांच सिविल लाइंस पुलिस ने की थी. घटना के एक हफ्ते बाद यानी 20 अगस्त, 1996 को भाजपा सांसद डा. मुरली मनोहर जोशी ने विवेचना बदलने के लिए पत्र लिखा.

जिस के बाद 28 अगस्त को इस केस की विवेचना सीबीसीआईडी इलाहाबाद को स्थानांतरित कर दी गई. वहां 3 साल तक विवेचना की फाइल धूल फांकती रही. अंतत: 12 फरवरी, 1999 को विवेचना इलाहाबाद सीबीसीआईडी से ले कर सीबीसीआईडी वाराणसी को सौंप दी गई. वहां भी जांच ठंडे बस्ते में पड़ी रही.

सवा 3 साल बाद वाराणसी से लखनऊ सीबीसीआईडी को यह केस स्थानांतरित कर दिया गया. 25 नवंबर, 2003 को सीबीसीआईडी लखनऊ ने पहली प्रोग्रेस रिपोर्ट अदालत में दाखिल की. 20 जनवरी, 2004 को लखनऊ सीबीसीआईडी ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. आरोप पत्र में कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूरजभान करवरिया, श्याम नारायण करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू का नाम दर्ज किया गया था.

आरोप पत्र दाखिल होने के बाद करवरिया बंधु गिरफ्तारी पर रोक के लिए हाईकोर्ट की शरण में गए. 16 अगस्त, 2005 को हाईकोर्ट ने कपिलमुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी के खिलाफ मुकदमे पर रोक लगा दी. फलस्वरूप तीनों गिरफ्तारी से बच गए. आरोप पत्र प्रस्तुत होने के बाद काफी दिनों तक इस मुकदमे की काररवाई स्पैशल सीजेएम के न्यायालय में विचाराधीन रही.

पहली जनवरी, 2015 को उदयभान करवरिया ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. करवरिया बंधुओं को हाईकोर्ट से मिला 8 अप्रैल, 2015 तक का स्टे आर्डर समाप्त हो गया.

20 दिनों बाद यानी 28 अप्रैल, 2015 को कपिलमुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से सभी को जेल भेज दिए गया. इस दौरान श्याम नारायण करवरिया का देहांत हो चुका था.

जवाहर की पत्नी को आना पड़ा सामने

19 अक्तूबर, 2015 से विधायक जवाहर यादव हत्याकांड की गवाही शुरू हुई. नवंबर, 2018 में उत्तर प्रदेश की कमान योगी आदित्यनाथ के हाथों में आई. हत्यारोपी और पूर्व विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया (भाजपा) ने केस की सुनवाई में हस्तक्षेप किया. चूंकि मुकदमा राज्य बनाम आरोपीगण था, इसलिए योगी सरकार ने इस मुकदमे को जनहित में वापस लेने का पत्र न्यायालय में दिया.

जैसे ही यह बात जवाहर यादव की पत्नी पूर्व विधायक विजमा यादव को पता लगी तो उन्होंने योगी सरकार के इस पत्र को चुनौती दी. इस के अलावा अपर सेशन जज रमेशचंद्र ने यह कहते हुए सरकार के पक्ष को खारिज कर दिया था कि तिहरे हत्याकांड में सुनवाई खत्म होने के समय केस वापस लिया जाना ठीक नहीं है.

सरकार ने निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी. हाईकोर्ट ने भी अपर सेशन जज द्वारा दिए गए आदेश को बरकरार रखा और मामले की शीघ्र सुनवाई के आदेश दिए. इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान जेल जाने के बाद करवरिया बंधुओं की जमानत अरजी सभी न्यायालयों से खारिज हो गई थी.

साल 2015 से मामले की सुनवाई लगातार जारी रही. तब से करवरिया बंधु जेल में बंद हैं. पहली जुलाई, 2017 को जवाहर यादव उर्फ पंडित हत्याकांड में करवरिया बंधुओं के पक्ष में गवाही के लिए कोर्ट ने केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र को तलब किया था.

आखिर आ ही गई फैसले की घड़ी

31 अगस्त, 2019 को अदालत में इस बहुचर्चित केस की सुनवाई पूरी हुई और जज ने फैसला सुरक्षित रख लिया. न्यायाधीश बद्री विशाल पांडेय को 4 नवंबर, 2019 को करवरिया बंधुओं समेत जेल में बंद चारों आरोपियों को धारा 147, 148, 149, 302, 307, 34 भादंसं व 7 सीएल एक्ट के तहत फैसला सुनाना था.

फैसला सुनने के लिए अभियुक्तों की तरफ से उन के तमाम शुभचिंतक कोर्ट परिसर में मौजूद थे. करीब शाम 4 बजे न्यायाधीश बद्री विशाल पांडेय ने फैसला सुनाया. अपने फैसले में उन्होंने कहा कि कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की बहस सुनी.

बचाव पक्ष के वकील अपने मुवक्किलों को बचा पाने में विफल रहे हैं. जबकि अभियोजन पक्ष के वकील चारों अभियुक्तों का दोष सिद्ध करने में सफल रहे.

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अभियुक्तगण कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूर्यभान करवरिया एवं रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू में से सभी अभियुक्तों को धारा 302, 149 भादंवि के तहत दोषी पाते हुए अदालत आजीवन कारावास एवं एकएक लाख रुपए के अर्थदंड की सजा सुनाती है. अर्थदंड अदा न करने पर प्रत्येक अभियुक्त को 2-2 साल का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा.

अदालत ने अभियुक्तगण कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूर्यभान करवरिया और रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू में से प्रत्येक को आईपीसी की धारा 307, 149 के अपराध में दोषी पाते हुए 10-10 साल के कठोर कारावास एवं 50-50 हजार रुपए का जुरमाना देने की सजा सुनाई. जुरमाना अदा न करने पर प्रत्येक दोषी को 1-1 साल की अतिरिक्त सजा भुगतने के आदेश दिए.

अदालत ने अभियुक्तगण कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया, सूर्यभान करवरिया एवं रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू में से प्रत्येक अभियुक्त को भादंसं की धारा 147 में दोषी सिद्ध होने पर 2-2 साल की कठोर सजा एवं 10-10 हजार रुपए का जुरमाना अदा करने की सजा सुनाई. फैसले में जुरमाना अदा न करने पर प्रत्येक अभियुक्त को 3-3 महीने के अतिरिक्त कारावास की सजा का प्रावधान था.

अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद करवरिया बंधुओं ने फैसले पर सवाल उठाए और कहा कि अदालत ने मैरिट के बजाए प्रोफाइल पर फैसला दिया है. वे लोग इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे और वहां उन्हें इंसाफ जरूर मिलेगा.

– कथा पीड़ित परिवार के बयानों और दस्तावेजों पर आधारित

सुसाइड को लेकर भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी का नया खुलासा, हैरान हो जाएंगे फैंस

पिछले कुछ दिनों से भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं और इस बार उनके सुर्खियों में बनने का कारण उनकी कोई फिल्म या कोई फोटोशूट नहीं बल्कि उनका डिप्रेशन (Depression) है. जी हां एक्ट्रेस रानी चटर्जी ने पिछले दिनों अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर किया था जिसमें उन्होनें बताया था कि धनंजय सिंह (Dhananjay Singh) नाम के एक व्यक्ति की वजह से वे काफी परेशान हैं और वे सुसाइड करना चाहती हैं.

 

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@mumbaipolice 🙏🙏🙏😭😭😭😭😭 give up

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उन्होनें अपने पोस्ट में बताया था कि धनंजय सिंह द्वारा लगातार ट्रोलिंग और मानसिक उत्पीड़न का शिकार हो कर वे परेशान हो चुकी हैं और इस बीच अगर वे कोई उल्टा कदम उठाती हैं तो इजका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ धनंजय सिंह होगा. अपने उस पोस्ट में रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) ने मुंबई पुलिस से मदद मांगी थी और लगता है मुंबई पुलिस ने उनकी बातों को गंभीरता से लेकर उस व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करनी शुरू कर दी है.

 

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🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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इस बात का खुलासा खुद रानी चटर्जी ने ही किया और एक पोस्ट शेयर कर लिखा कि,- “#MumbaiPolice #thankyousomuch #FIR #darz I Will Fight.” हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) ने बताया कि “मुझे खाने का मन नहीं करता था,  मैं इस बारे में सोच सोच कर रात भर जागती थी.”  इसके बाद जब रानी से पूछा गया कि इसके अलावा आपकी लाइफ में और कोई स्ट्रेस तो नहीं है तो इसके जवाब में एक्ट्रेस ने कहा कि, “उस इंसान के परेशान करने के अलावा मेरी जिंदगी में कोई और स्ट्रेस नहीं है”.

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How is my retro tshirt??? 💛🖤💛🖤 #fashion #lovers

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इसके आगे बात करते हुए रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) ने बताया कि, “मेरे जीवन में इसके अलावा कोई और टेंशन और स्ट्रेस नहीं है. मैंने सब कुछ छोड़ दिया था और किसी भी चीज के बारे में परेशान नहीं थी. मैंने खुद से कहा कि जो भी होगा, मैं उसे सहन कर लूंगी. लेकिन बस बहुत हुआ. मैं निराश थी. मैं खुद को मारने के तरीकों को ढूंढ रही थी. मैंने पंखे और जमीन के बीच की दूरी नाप ली थी.”  आत्महत्या करने पर रानी ने कहा, “अगर हर दिन आपको मोटी, बदसूरत, काली, बुड्ढी कहा जाता है, तो कब तक चुप रहेंगी. एक दिन तो रियेक्ट करेंगी ही ना.”

 

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🖤🖤🖤🖤It makes to post #blackcat

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