Politics Update: उपचुनावों में सिंदूर और भाजपा दोनों खारिज

Politics Update: देशभर के 4 राज्यों की 5 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजों का ऐलान जब 23 जून, 2025 को हुआ, तो मीडिया ने इस पर कोई खास कवरेज नहीं दी, क्योंकि इन में भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी, जो केवल एक सीट जीत पाई. इस के उलट आम आदमी पार्टी ने 2 सीटें जीत कर सब को चौंका दिया.

ये चुनाव पहलगाम हमले के बाद हुए थे, इसलिए इस लिहाज से ज्यादा अहम हो गए थे कि वोटर सरकार के ऐक्शन और रोल पर क्या सोचता है. इन्हीं दिनों में ‘आपरेशन सिंदूर’ का भी खासा हल्ला मचा हुआ था.

यह सोचना बेमानी है कि उपचुनाव में सौ फीसदी वोटिंग सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर ही होती है, बल्कि राष्ट्रीय घटनाओं का भी मतदान पर खासा असर पड़ता है, फिर पहलगाम हमला तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा हो कर भारतपाकिस्तान के युद्ध की भी वजह बना था.

इस लिहाज से देखें तो भाजपा की सिंदूर भुनाओ मुहिम को कोई भाव नहीं मिला. उस ने एकलौती गुजरात की कड़ी सीट जीती, लेकिन गुजरात की ही पटेल बाहुल्य विसावदर सीट पर उसे मुंह की खानी पड़ी, जहां आप के उम्मीदवार गोपाल इटालिया ने भाजपा के कीर्ति पटेल को 17,000 से भी ज्यादा वोटों से हराया.

दिलचस्प मुकाबला पंजाब की लुधियाना पश्चिम सीट पर भी देखने को मिला. इस सीट से आप के उम्मीदवार संजीव अरोड़ा ने कांग्रेस के भारत भूषण आशु को 10,000 से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी. भाजपा इस सीट पर तीसरे नंबर पर रही.

जिस तरह लुधियाना के वोटरों ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के कामकाज पर रजामंदी की मोहर लगाई, उसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल की कालीगंज सीट पर भी वोटरों ने तृणमूल कांग्रेस पर पहले से भी ज्यादा भरोसा जता कर भाजपा के मनसूबों पर पानी फेर दिया.

इस सीट से टीएमसी की उम्मीदवार पेशे से इंजीनियर 38 साला अलीफा अहमद ने भाजपा के आशीष घोष
को तकरीबन 50,000 वोटों से पटकनी दी.

यह सीट इस लिहाज से भी अहम थी कि भाजपा ने यहां भी खुल कर हिंदूमुसलिम किया था और सिंदूर को भी भुनाने का माहौल बनाया था. लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की शोहरत इन सब कवायदों पर भारी पड़ी. अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हैं, जिन के मद्देनजर भाजपा खेमे में इस नतीजे और हार के अंतर से मायूसी है.

भाजपा की तरह कांग्रेस को भी इन उपचुनावों में कोई खास कामयाबी नहीं मिली. उस के खाते में एकलौती सीट केरल की नीलांबुर आई, जो उस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से छीनने में कामयाबी हासिल की.

उस के उम्मीदवार पेशे से फिल्मकार आर्यदान शौकत ने भाकपा (एम) के एम. स्वराज को 11,000 वोटों से हराया.

यह नतीजा इस लिहाज से भी अहम है कि नीलांबुर विधानसभा सीट वायनाड लोकसभा सीट के तहत आती है, जहां से प्रियंका गांधी सांसद हैं यानी वोटर ने उन की लोकप्रियता में और इजाफा ही किया है.

अलगअलग मिजाज वाले इन राज्यों के नतीजे यह तो साबित कर गए कि भाजपा अब पिछड़ने लगी है.

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के गृह राज्य में ही एक सीट बड़े मार्जिन से हार जाना मामूली बात नहीं है. दूसरी तरफ से आम आदमी पार्टी ने जता दिया है कि वह दिल्ली गंवाने के बाद भी दौड़ से बाहर नहीं हुई है.

कांग्रेस को संगठन लैवल पर अभी और मेहनत की जरूरत है. गांधी परिवार की शोहरत केरल जैसे कुछ राज्यों में तो काम आ सकती है, पर हिंदी बैल्ट में ऐसा दिख नहीं रहा है. Politics Update

Sara Arjun In Dhurandhar : जवानी की दहलीज पर मिला बड़ा ब्रेक

Sara Arjun In Dhurandhar: तकरीबन साढ़े 18 साल पहले एक डेढ़ साल की बच्ची अपने पिता के कंधे पर सवार हो कर बैंगलुरु के एक शौपिंग मौल में घूम रही थी. वहीं पर एक एड फिल्ममेकर की नजर इस बच्ची पर पड़ी और उस ने इस बच्ची को एक एड फिल्म में ऐक्टिंग करने का औफर दिया. उस के बाद से इस बच्ची ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

6 जुलाई, 2025 को हीरो रणवीर सिंह की ऐक्टिंग से सजी डायरैक्टर आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ का फस्ट लुक टीजर रिलीज हुआ और जितनी चर्चा इस फिल्म से जुड़े कलाकारों रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, संजय दत्त की होनी चाहिए थी, उस से कहीं ज्यादा चर्चा उसी बच्ची की हो रही है, जिस ने अब साढ़े 18 साल बाद हाल ही में 18 जून, 2025 को अपना 20वां जन्मदिन मनाया.

जी हां, हम फिल्म ‘धुरंधर’ में रणवीर सिंह के साथ मेन किरदार निभा रही हीरोइन सारा अर्जुन की बात कर रहे हैं. फिल्म ‘धुरंधर’ के 2 मिनट, 40 सैकंड के टीजर में सारा अर्जुन की महज 4 झलकियां ही हैं, पर वे सभी धांसू हैं.

इस में कोई दोराय नहीं कि सारा अर्जुन बेहतरीन अदाकारा हैं. 18 साल की उम्र से पहले तक उन की गिनती बहुत महंगी बाल कलाकार के रूप में होती रही है. साल 2022 में वे 10 करोड़़ की जायदाद की मालकिन बन चुकी थीं और अब वे अपने से 20 साल बड़े रणवीर सिंह के साथ सिनेमाघरों में धमाल मचाने वाली हैं.

सारा अर्जुन को अदाकारी विरासत में मिली है. उन के पिता राज अर्जुन हिंदी और दक्षिण सिनेमा के जानेमाने व मंजे हुए कलाकार हैं. वे दक्षिण भारत में तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषाओं की कई फिल्मों में ऐक्टिंग कर चुके हैं, जबकि राज अर्जुन साल 2002 में पहली बार अजय देवगन के साथ हिंदी फिल्म ‘कंपनी’ में नजर आए थे.

इस के बाद राज अर्जुन ने साल 2004 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ में अकरम का किरदार निभा कर शोहरत बटोरी थी. उस के बाद वे शाहरुख खान और आमिर खान के साथ भी फिल्में कर चुके हैं.

18 जून, 2005 को जनमी सारा अर्जुन ने महज डेढ़ साल की उम्र में पहली बार एक एड फिल्म के लिए शूटिंग की थी. उस के बाद 6 साल की उम्र तक सारा अर्जुन 100 से ज्यादा ब्रांडों की एड फिल्मों में दिखाई दी थीं.

5 साल की उम्र में सारा अर्जुन एक हिंदी फिल्म ‘404’ के अलावा साल 2013 में 8 साल की उम्र में एकता कपूर की फिल्म ‘एक थी डायन’ में भी नजर आई थीं.

जब सारा अर्जुन 2 साल की थीं, तब दक्षिण भारत के मशहूर डायरैक्टर विजय ने उन के साथ एक एड फिल्म बनाई थी. उस के बाद सारा अर्जुन के परिवार के साथ विजय का संपर्क टूट गया था, लेकिन साल 2011 में विजय ने अपनी तमिल फिल्म ‘देइवा थिरुमगल’ से जोड़ा था. इस में सारा अर्जुन ने हीरो विक्रम की बेटी का किरदार निभाया था.

इस फिल्म के लिए सारा अर्जुन को तमिल बोलना था, तब उन के पिता ने अपने तमिल दोस्त महेश्वरी से मदद मांग कर सारा को फिल्म के लिए तमिल संवाद सीखने में मदद की थी.

इस सब में मजेदार बात यह रही कि बिना अपने पिता को बताए सारा अर्जुन ने तो अपने संवादों के साथ ही फिल्म के हीरो विक्रम के भी तमिल भाषा के संवाद रट लिए थे और शूटिंग के दौरान सारा ने विक्रम की मदद करने की कोशिश की थी.

जब यह फिल्म रिलीज हुई तो हर तरफ सारा की ऐक्टिंग की ही चर्चा हुई थी. उस वक्त वे महज 6 साल की थीं. इस फिल्म को बौक्स औफिस पर अच्छीखासी कामयाबी मिली थी.

सारा अर्जुन अब तक ‘जज्बा’, ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’, सलमान खान के साथ ‘जय हो’,
भूमि पेडनेकर व तापसी पन्नू के के साथ ‘सांड़ की आंख’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी हैं.

साल 2022 में सारा अर्जुन ने मणिरत्नम के डायरैक्शन में 2 भाग में बनी ऐतिहासिक महाकाव्य फिल्म ‘पोन्नियिन सेलवन’ में किशोर नंदिनी का किरदार कर जबरदस्त शोहरत बटोरी थी. उस वक्त वे महज 16 साल की थीं. उन्होंने ऐश्वर्या राय के बचपन का किरदार निभाया था.

अब सारा अर्जुन ने जासूसी ऐक्शन थ्रिलर फिल्म ‘धुरंधर’ में काम किया है. 5 दिसंबर को रिलीज होने वाली इस फिल्म के लेखक और डायरैक्टर आदित्य धर हैं, जो फिल्म ‘उरी’ भी बना चुके हैं.

यह फिल्म एक सच्ची घटना पर बनी है. इस में रणवीर सिंह का किरदार एक जासूस का है, जिस का नाम अब तक उजागर नहीं किया गया है. इस फिल्म में संजय दत्त, अक्षय खन्ना, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन जैसे दिग्गज कलाकार भी दिखाई देंगे. Sara Arjun In Dhurandhar

Murder Story: बाप बना हैवान – बेटी की ही सुपारी देकर करवाई हत्या

Murder Story: ममता का कसूर यह था कि वह दूसरी जाति के युवक सोमबीर से प्यार कर बैठी. इतना ही नहीं, उस ने सोमबीर से कोर्ट में शादी भी कर ली. यह बात ममता के घर वालों को इतनी नागवार लगी कि उन्होंने ऐसा खूनी खेल खेला, जिस में एक पुलिस अधिकारी की भी जान चली गई. इंटरमीडिएट करने के बाद सोमबीर ने आगे की पढ़ाई का इरादा त्याग दिया था. अब वह कोई कामधंधा करना चाहता था. रोहतक के पास स्थित सोमबीर के गांव सिंहपुरा में कई ऐसे युवक थे, जो ऊंची डिग्रियां ले कर नौकरी की तलाश में भटकने के बाद भी बेरोजगार थे. इसी के मद्देनजर सोमबीर ने पहले ही सोच लिया था कि वह नौकरी के चक्कर में पड़ कर अपना खुद का कोई काम शुरू करेगा, जिस में सीधा कमाई का जरिया बन जाए.

सोचविचार कर उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने का फैसला किया. इस काम में तो ज्यादा मेहनतमशक्कत की जरूरत थी और ही ज्यादा भागदौड़ की. हां, एक अदद पूंजी की जरूरत जरूर थी, जो उस ने अपने पिता जयराज की मदद से थोड़े ही दिनों में एकत्र कर ली थी. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग के काम के लिए पास के गांव गद्दीखेड़ा को चुना. सोमबीर ने गद्दीखेड़ा के जाट रामकेश के मकान में किराए का कमरा ले कर अपना औफिस खोल लिया. धीरेधीरे उस का काम चल निकला तो वह उसी मकान में एक दूसरा कमरा ले कर रात में भी वहीं रहने लगा. कुछ ही दिनों में वह मकान मालिक रामकेश के पूरे परिवार के साथ काफी घुलमिल गया.

रामकेश के परिवार में पत्नी सरिता के अलावा 3 बेटियां थीं, जिन में सब से बड़ी ममता थी. ममता जब ढाई साल की थी, तभी उसे रोहतक की श्याम कालोनी में रहने वाली उस की बुआ कृष्णा ने गोद ले लिया था. वह रोहतक में बारहवीं में पढ़ रही थी. पिछले साल ममता रोहतक से अपने जैविक मातापिता के घर गद्दीखेड़ा गई थी. ममता 17 साल की जवान हो चुकी थी. मां सरिता ने बेटी को देखा तो देखती रह गई. ममता ने आगे बढ़ कर मां के पैर छुए तो सरिता निहाल हो गई. ममता अपनी दोनों छोटी बहनों से गले मिली, कुशलक्षेम पूछा. ममता के आने से पूरे घर का माहौल खुशनुमा हो गया. सरिता ने फोन कर के अपनी ननद कृष्णा से कह दिया कि ममता कुछ दिनों यहां रहने के बाद रोहतक लौटेगी, इसलिए वह उसे जल्दी बुलाने के लिए फोन करे.

एक दिन ममता का सामना सोमबीर से हुआ तो वह उसे अपलक देखता रह गया. गोरीचिट्टी, बला की खूबसूरत ममता किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. दरअसल, सोमबीर को यह मालूम नहीं था कि रामकेश अंकल की एक और बड़ी लड़की भी है, जिसे बचपन में ही उस के फूफा ने गोद ले लिया था. ममता ने उसे अपनी ओर टकटकी लगाए देखा और पलभर के लिए उसे तिरछी नजरों से देखते हुए मुसकरा कर घर के अंदर चली गई. ममता और सोमबीर की यह पहली मुलाकात थी, जो कुछ कह कर भी बहुत कुछ कह गई थी. इस के कुछ दिनों बाद जब सोमबीर को ममता से बात करने का मौका मिला तो वह उस की खूबसूरती की तारीफ करने लगा. ममता को जाने क्यों उस की बातें अच्छी लगीं

इसे उम्र का तकाजा कह सकते हैं और पहली नजर का प्यार भी, जिस में आकर्षण की भूमिका बड़ी होती है. बहरहाल, इसी के चलते सोमबीर और ममता ने भी प्यार का इजहार भी किया. प्यार जैसेजैसे दिन गुजरते गए, सोमबीर और ममता एकदूसरे के प्यार में डूबते चले गए. शुरू में तो सरिता और रामकेश ने ममता और सोमबीर के मिलनेजुलने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वे हद से आगे बढ़ने लगे तो उन का माथा ठनका. सरिता ने ममता को समझाया कि सोमबीर अनुसूचित जाति का लड़का है, इसलिए उस से ज्यादा घुलनामिलना ठीक नहीं है. ममता ने मां की बातें एक कान से सुन कर दूसरे से बाहर निकाल दीं

इस के बाद सरिता बेटी पर नजरें रखने लगी. हालांकि ममता और सोमबीर रामकेश और सरिता की नजरों से बच कर मिलते थे, पर उन की अनुभवी आंखों को धोखा देना आसान नहीं था. कई बार किसी किसी ने दोनों को मिलते हुए देख लिया और इस की खबर रामकेश तक पहुंचा दी. पानी सिर से ऊपर जाते देख रामकेश ने सोमबीर को ममता से दूर रहने के लिए कहा. इतना ही नहीं, उसे छोटी जाति का हवाला दे कर खतरनाक परिणाम भुगतने की भी चेतावनी दी. रामकेश की धमकी से परेशान सोमबीर ने ममता से कहा कि दोनों के परिवार वाले उन्हें किसी भी हाल में मिलने नहीं देंगे, इसलिए जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया गया तो उन का एक होना मुश्किल हो जाएगा

सोमबीर की बातें सुन कर ममता उसे विश्वास दिलाते हुए बोली कि वह उस के बिना नहीं जी सकती. इस के बाद दोनों ने एक साथ जीने और मरने की कसमें खाईं. सोमबीर जानता था कि ममता के घर वाले एक तो जाट हैं और दूसरे रसूख वाले दबंग भी, इसलिए उस ने कानून का सहारा ले कर कोर्ट में शादी करने की योजना बनाई. 24 अगस्त, 2017 को ममता मौका पा कर घर से निकली और सोमबीर के पास पहुंच गई. सोमबीर उसे साथ ले कर चंडीगढ़ पहुंचा. वहां दोनों ने पहले आर्यसमाज मंदिर में और फिर कोर्ट में शादी कर ली. ममता के गायब होने की बात जब उस की मां सरिता को पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सरिता और रामकेश ने यह बात रमेश को बताई तो उन्हें ममता की इस हरकत पर बहुत गुस्सा आया. मां कृष्णा भी ममता की इस हरकत से सन्न रह गई. वे लोग रामकेश के घर गए

सोमबीर के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट सब ने विचारविमर्श कर के रोहतक के थाना आर्यनगर में ममता के नाबालिग होने और सोमबीर उस के पिता जयराज के खिलाफ अपनी बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज करवा दिया. गांवों और ग्रामीण समाज में ऐसी बातें देरसबेर किसी किसी तरह पहुंच ही जाती हैं. जिस ने भी इस बारे में सुना वह इस बात को और भी बढ़ाचढ़ा कर बखान करने लगा. जितने मुंह उतनी ही बातें होने लगीं. मामला केवल प्रेम विवाह का नहीं था, बल्कि इस बात का था कि जाट बिरादरी की एक लड़की ने अपने से छोटी जाति के लड़के के साथ शादी रचा ली है. रामकेश और रमेश के परिवार की बिरादरी में थूथू होने लगी. इस सब से गुस्साए रमेश ने ममता की हत्या करने का फैसला कर लिया

रमेश के इस फैसले से ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी सहमत थे. सब से पहले उन्होंने कोर्ट में ममता का स्कूल सर्टिफिकेट दे कर बताया कि ममता अभी नाबालिग है, 17 साल की. इसलिए कोर्ट उस की शादी को रद्द घोषित करे. जब कोर्ट ने इस मामले की छानबीन की तो पता चला ममता की उम्र सचमुच 17 साल ही है. हकीकत जानने के बाद कोर्ट ने सोमबीर और ममता को कोर्ट में पेश होने का सम्मन जारी कर दिया. यह बात जनवरी, 2018 की है. जब दोनों कोर्ट में पेश हुए तो पता चला कि सोमबीर ने फरजी तरीके से ममता की उम्र 18 साल बता कर उस से शादी की थी. कोर्ट को धोखे में रखने के जुर्म में सोमबीर और उस के पिता को जेल और ममता को बालिग होने तक नारी निकेतन भेज दिया गया. ममता के बालिग होने में अभी 17 महीने बाकी थे.

ममता के बालिग हो जाने के बाद 8 अगस्त, 2018 को रोहतक कोर्ट में पेश किया जाना था. उधर करनाल स्थित नारी निकेतन में रह रही ममता की खुशी देखते ही बन रही थी. लोगों ने ममता को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था. वह सब से कह रही थीआज मैं अपने घर चली जाऊंगी.’ सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला ममता को नारी निकेतन से ले कर रोहतक कोर्ट पहुंचे. चूंकि ममता का पति सोमबीर और ससुर जेल में थे, इसलिए सोमबीर की मां सरोज तथा छोटा भाई देवेंद्र कोर्ट पहुंचे थे. सरोज और देवेंद्र काफी डरे हुए थे, जिस की वजह ममता के पिता की ओर से समयसमय पर दी गई जान से मार देने की धमकियां थीं

यहां तक कि ममता ने यह कह कर कई बार अपने दत्तक पिता रमेश से माफ कर देने की गुहार भी लगाई थी कि वह अपनी इस नई जिंदगी से काफी खुश है. लेकिन ममता द्वारा अपने से छोटी जाति के युवक से शादी कर लेने से बुरी तरह आहत रमेश का एक ही रटारटाया जवाब था, ‘ममता को मरना होगा, क्योंकि उस ने सोमबीर से शादी कर के हमें समाज और बिरादरी के आगे हमेशा के लिए नीचे झुका दिया है.’  ममता को जन्म देने वाली मां सरिता और पिता रामकेश भी उस की जान बख्शने को तैयार नहीं थे. रमेश तथा रामकेश भी कोर्ट में मौजूद थे. ढाई बजे कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराने के बाद ममता अपनी सास सरोज, देवर देवेंद्र के साथ लघु सचिवालय के गेट नंबर-2 से बाहर निकल रही थी. साथ में सबइंसपेक्टर नरेंद्र और लेडी हैडकांस्टेबल सुशीला भी थे.

पांचों लोगों ने सड़क के पार पहुंच कर एक दुकान पर जूस पीया. वहां से निकल कर वे आटो पकड़ने के लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि तभी पीछे से आए 2 मोटरसाइकिल सवारों ने ममता को 3 गोलियां मारीं. एसआई नरेंद्र ने हमलावरों को मारने के लिए अपना रिवौल्वर निकालने की कोशिश की, लेकिन वे ऐसा कर पाते इस से पहले ही हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी. वह सड़क पर ही ढेर हो गए. हेडकांस्टेबल सुशीला ने सरोज को बदमाशों की गोलियों से बचाने के लिए नीचे गिरा दिया था. देवेंद्र सड़क से पत्थर उठाने के लिए नीचे झुका तो गोलियां उस के सिर के ऊपर से गुजर गईं. हमलावर उन पर और भी गोलियां चलाना चाहते थे, लेकिन गोलियां खत्म होने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए.

योजना बना कर किया हमला हमलावरों के भाग जाने के बाद हैडकांस्टेबल सुशीला जैसेतैसे घायल ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र को उठा कर पीजीआई रोहतक ले गई. लेकिन दोनों को बचाया नहीं जा सका. घटना के बाद पूरे क्षेत्र में हडंकंप मच गया. हमलावरों को पकड़ने के लिए रोहतक में सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर तलाशी अभियान चला, लेकिन वे भागने में कामयाब रहे. 8 अगस्त को लेडी हेडकांस्टेबल सुनीता के बयान पर ममता और सबइंसपेक्टर नरेंद्र की संदिग्ध हत्यारों के विरुद्ध भादंवि की धारा 333, 353, 196, 307, 302, 34 और 120बी के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू की गई. इस केस की जांच आर्यनगर की थानाप्रभारी सुनीता को सौंपी गई.

रोहतक के एसपी जशनदीप सिंह ने डीएसपी रमेश कुमार को निर्देश दिया कि इस केस से संबंधित सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें. थानाप्रभारी सुनीता ने हमलावरों की तलाश में ममता के पिता रामकेश के गांव गद्दीखेड़ा में दबिश दी. वहां वारदात में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल तो मिल गई पर वहां से कातिल फरार हो चुके थे. रामकेश और सरिता से पूछताछ करने के बाद दोनों को 10 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया. उसी दिन ममता के दत्तक पिता को भी पुलिस उन के घर से गिरफ्तार कर थाना आर्यनगर ले आई. चारों से प्रारंभिक पूछताछ के बाद ममता हत्याकांड के पीछे यह बात निकल कर सामने आई कि उस की हत्या कराने में मुख्य हाथ उस के दत्तक पिता रमेश का हाथ था. उस की हत्या 7 लाख की सुपारी दे कर कराई गई थी, जिस में मुख्य भूमिका ममता के मौसेरे भाई मोहित उर्फ मंगलू ने निभाई थी

मंगलू ने उत्तर प्रदेश के 2 पेशेवर शार्पशूटरों को ममता की हत्या की सुपारी दी थी. दोनों शूटर हत्या के एक दिन पहले गद्दीखेड़ी गांव गए थे. मोहित ने अगले दिन उन के लिए एक बाइक मुहैया करवाई और खुद शूटर्स की कार में बैठा रहाघटना वाले दिन जब ममता अपनी सास के साथ सड़क पर चल रही थी तो उस से कुछ ही दूरी पर खड़े उस के दत्तक पिता ने हत्यारों को ममता की ओर इशारा कर के उसे गोली मारने का इशारा किया. उस का इशारा पाते ही मोटरसाइकिल सवार हत्यारों ने पहले तो ममता पर गोली चलाई, लेकिन जैसे ही उन्होंने सबइंसपेक्टर नरेंद्र को रिवौल्वर निकालते देखा तो उन्हें भी गोली मार दी. इस के बाद सभी गद्दीखेड़ा गांव पहुंचे

वहां खाना खाने के बाद वे अपनी कार से फरार हो गए. पुलिस की जांच में यह तथ्य सामने आया कि ममता के मौसेरे भाई मोहित का मोबाइल फोन गद्दीखेड़ा गांव पहुंचने तक औन था. वहां पहुंचते ही उस का मोबाइल औफ हो गया था. घटना वाले दिन उस की आखिरी लोकेशन गद्दीखेड़ा गांव में ही थी. उधर पोस्टमार्टम के बाद पुलिस की निगरानी में ममता की लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस की लाश को मुखाग्नि उस के ताऊ के लड़के नान्हा ने दी. सबइंसपेक्टर नरेंद्र की लाश को उन के घर वालों के हवाले कर दिया गया, जिन्होंने उन का अंतिम संस्कार पुलिस सम्मान के साथ किया. उस समय कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वहां मौजूद थे. शहीद सबइंसपेक्टर नरेंद्र के परिवार वालों को सरकार की ओर से 60 लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा की गई है

चूंकि नरेंद्र अनुसूचित जाति के थे, इसलिए इस दोहरे हत्याकांड में अब एससी/एसटी एक्ट जोड़ कर आगे की जांच रोहतक के डीएसपी रमेश कुमार करेंगे. ममता का पति सोमबीर और ससुर जयराज अभी भी सुनारिया जेल में बंद हैं. उन्हें अपने घर वालों की हत्या किए जाने की आशंका है. इस हत्याकांड में शामिल अन्य आरोपियों की जोरशोर से तलाश जारी है. Murder Story

Hindi Family Story: किराए की कोख – सुनीता ने कैसे दी ममता को खुशी

Hindi Family Story: पूरे महल्ले में सब से खराब माली हालत महेंद्र की ही थी. इस शहर से कोसों दूर एक गांव से 2 साल पहले ही महेंद्र अपनी बीवी सुनीता और 2 बच्चों के साथ इस जगह आ कर बसा था. वह गरीबी दूर करने के लिए गांव से शहर आया था, लेकिन यहां तो उन का खानापीना भी ठीक से नहीं हो पाता था.

महेंद्र एक फैक्टरी में काम करता था और सुनीता घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करती थी. बड़ा बेटा 5 साल से ऊपर का हो गया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं हो पाया था.

सुनीता काफी सोचती थी कि बच्चे को किसी अगलबगल के छोटे स्कूल में पढ़ने भेजने लगे, लेकिन चाह कर भी न भेज सकती थी. जिस महल्ले में सुनीता रहती थी, उस महल्ले में सब मजदूर और कामगार लोग ही रहते थे. ठीक बगल के मकान में रहने वाली एक औरत के साथ सुनीता का उठनाबैठना था.

जब उस को सुनीता की मजबूरी पता लगी, तो उस ने सुनीता को खुद भी काम करने की सलाह दे डाली. उस ने एक घर में उस के लिए काम भी ढूंढ़ दिया.

सुनीता ने जब यह बात महेंद्र को बताई, तो वह थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन सुनीता का सोचना ठीक था, इसलिए वह कुछ कह नहीं सका. सुनीता उस औरत द्वारा बताए गए घर में काम करने जाने लगी. वह काफी बड़ा घर था. घर में केवल 2 लोग ममता और रमन पतिपत्नी ही थे, जो किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे.

दोनों का स्वभाव सुनीता के प्रति बहुत नरम था. ममता तो आएदिन सुनीता को तनख्वाह के अलावा भी कुछ न कुछ चीजें देती ही रहती थी. रमन और ममता के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में एक भी बच्चा नहीं था.

रविवार के दिन ममता और रमन छुट्टी पर थे. काम खत्म कर सुनीता जाने को हुई, तो ममता ने उसे बुला कर अपने पास बिठा लिया. वह सुनीता से उस के परिवार के बारे में पूछती रही. सुनीता को ममता की बातों में बड़ा अपनापन लगा, तो वह अचानक ही उस से पूछ बैठी, ‘‘जीजी, आप के कोई बच्चा नहीं हुआ क्या?’’

ममता ने मुसकरा कर सुनीता की तरफ देखा और धीरे से बोली, ‘‘नहीं, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’ सुनीता ने ममता की आवाज को भांप लिया था. वह बोली, ‘‘बस जीजी, ऐसे ही पूछ रही थी. घर में कोई बच्चा न हो, तो अच्छा नहीं लगता न. शायद आप को ऐसा महसूस होता हो.’’

ममता की आंखें उसी पर टिक गई थीं. वह भी शायद इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी.

ममता बोली, ‘‘तुम सही कहती हो सुनीता. मैं भी इस बात को ले कर चिंता में रहती हूं, लेकिन कर भी क्या सकती हूं? मैं मां नहीं बन सकती, ऐसा डाक्टर कहते हैं…’’

यह कहतेकहते ममता का गला भर्रा गया था. सुनीता भी आगे कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी थी. उस के पास शायद इस बात का कोई हल नहीं था.

ममता और रमन शादी से पहले एक ही कंपनी में काम करते थे, जहां दोनों में मुहब्बत हुई और उस के बाद दोनों ने शादी कर ली. कई साल तक दोनों ने बच्चा पैदा नहीं होने दिया, लेकिन बाद में ममता मां बनने के काबिल ही न रही. इस बात को ले कर दोनों परेशान थे.

सुनीता को ममता के घर काम करते हुए काफी दिन हो गए थे. ममता का मन जब भी होता, वह सुनीता को अपने पास बिठा कर बातें कर लेती थी. पर अब सुनीता ममता से बच्चा न होने या होने को ले कर कोई बात नहीं करती थी. दिन ऐसे ही गुजर रहे थे. एक दिन ममता ने सुनीता को आवाज दी और उसे साथ ले कर अपने कमरे में पहुंच गई. उस ने सुनीता को अपने पास ही बिठा लिया.

सुनीता अपनी मालकिन ममता के बराबर में बैठने से हिचकती थी, लेकिन ममता ने उसे हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठा ही लिया.

ममता ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, ‘‘सुनीता, तुम से एक काम आ पड़ा है, अगर तुम कर सको तो कहूं?’’

ममता के लिए सुनीता के दिल में बहुत इज्जत थी, भला वह उस के किसी काम के लिए क्यों मना कर देती. वह बोली, ‘‘जीजी, कैसी बात करती हो? आप कहो तो सही, न करूं तो कहना.’’

ममता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘सुनीता, डाक्टर कहता है कि मैं मां तो बन सकती हूं, लेकिन इस के लिए मुझे किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ेगा… अगर तुम चाहो, तो इस काम में मेरी मदद कर सकती हो.’’

ममता की बात सुन कर सुनीता का मुंह खुला का खुला रह गया. उस को यकीन न होता था कि ममता उस से इतने बड़े व्यभिचार के बारे में कह सकती है.

सुनीता साफ मना करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं बेशक गरीब हूं, लेकिन अपने पति के होते किसी मर्द की परछाईं तक को न छुऊंगी. आप इस काम के लिए किसी और को देख लो.’’

ममता हैरत से बोली, ‘‘अरे बावली, तुम से पराया मर्द छूने को कौन कहता है… यह सब वैसा नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो. इस में सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा तुम्हें कोई नहीं छुएगा. यह समझो कि तुम सिर्फ अपनी कोख में बच्चे को पालोगी, जबकि सबकुछ मैं और मेरे पति करेंगे.’’

सुनीता की समझ में कुछ न आया था. सोचा कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी औरत को छुए भी नहीं और वह मां बन जाए.

सुनीता को हैरान देख कर ममता बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रही हो सुनीता? तुम चाहो तो मैं सीधे डाक्टर से भी बात करा सकती हूं. जब तुम पूरी तरह संतुष्ट हो जाओ, तब ही तैयार होना.’’

सुनीता हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं… अगर मैं तैयार हो भी जाऊं, तो मेरे पति इस बात के लिए नहीं मानेंगे.’’

ममता हार नहीं मानना चाहती थी. आखिर उस के मन में न जाने कब से मां बनने की चाहत पल रही थी. वह बोली, ‘‘तुम इस बात की चिंता बिलकुल मत करो. मैं खुद घर आ कर तुम्हारे पति से बात करूंगी और इस काम के लिए तुम्हें इतना पैसा दूंगी कि तुम 2 साल भी काम करोगी, तब भी कमा नहीं पाओगी.’’ सुनीता यह सब तो नहीं चाहती थी, लेकिन ममता से मना करने का मन भी नहीं हो रहा था.

काम से लौटने के बाद सुनीता ने अपने पति से सारी बात कह दी. महेंद्र इस बात को सिरे से खारिज करता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं है इन लोगों की बातों में आने की. कल से काम पर भी मत जाना ऐसे लोगों के यहां. ये अमीर लोग होते ही ऐसे हैं.

‘‘मैं तो पहले ही तुम्हें मना करने वाला था, लेकिन तुम ने जिद की तो कुछ न कह सका.’’

सुनीता को ऐसा नहीं लगता था कि ममता दूसरे अमीर लोगों की तरह है. वह उस के स्वभाव को पहले भी परख चुकी थी. वह बोली, ‘‘नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकती. ऐसी मालकिन मिलना आज के समय में बहुत मुश्किल काम है. आप उन को सब लोगों की लाइन में खड़ा मत करो.’’ महेंद्र कुछ कहता, उस से पहले ही कमरे के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई, फिर दरवाजा बजाया गया.

सुनीता को ममता के आने का एहसास था. उस ने झट से उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने ममता खड़ी थी.

सुनीता के हाथपैर फूल गए, खुशी के मारे मुंह से बात न निकली, वह अभी पागलों की तरह ममता को देख ही रही थी कि ममता मुसकराते हुए बोल पड़ी, ‘‘अंदर नहीं बुलाओगी सुनीता?’’ सुनीता तो जैसे नींद से जागी थी.

वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘हांहां जीजी, आओ…’’ यह कहते हुए वह दरवाजे से एक तरफ हटी और महेंद्र से बोली, ‘‘देखोजी, अपने घर आज कौन आया है… ये जीजी हैं, जिन के घर पर मैं काम करने जाती हूं.’’

महेंद्र ने ममता को पहले कभी देखा तो नहीं था, लेकिन अमीर पहनावे और शक्लसूरत को देख कर उसे समझते देर न लगी. उस ने ममता से दुआसलाम की और उठ कर बाहर चल दिया.

ममता ने उसे जाते देखा, तो बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप कहां चल दिए? क्या मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

महेंद्र यह बात सुन कर हड़बड़ा गया. वह बोला, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो इसलिए जा रहा था कि आप दोनों आराम से बात कर सको.’’

ममता हंसते हुए बोली, ‘‘लेकिन भैया, मैं तो आप से ही बात करने आई हूं. आप भी हमारे साथ बैठो न.’’

महेंद्र न चाहते हुए भी बैठ गया. ममता का इतना मीठा लहजा देख वह उस का मुरीद हो गया था. उस के दिमाग में अमीरों को ले कर जो सोच थी, वह जाती रही.

सुनीता सामने खड़ी ममता को वहीं बिछी एक चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मेरे घर में तो आप को बिठाने के लिए ठीक जगह भी नहीं, आप को आज इस चारपाई पर ही बैठना पड़ेगा.’’

ममता मुसकराते हुए बोली, ‘‘सुनीता, प्यार और आदर से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता, फिर क्या चारपाई और क्या बैड. आज तो मैं तुम्हारे साथ जमीन पर ही बैठूंगी.’’

इतना कह कर ममता जमीन पर पड़ी एक टाट की बोरी पर ही बैठ गई.

सुनीता ने लाख कहा, लेकिन ममता चारपाई पर न बैठी. हार मान कर सुनीता और महेंद्र भी जमीन पर ही बैठ गए. सुनीता ने नजर तिरछी कर महेंद्र को देखा, फिर इशारों में बोली, ‘‘देख लो, तुम कहते थे कि हर अमीर एकजैसा होता है. अब देख लिया.’’

महेंद्र से आदमी पहचानने में गलती हुई थी. तभी ममता अचानक बोल पड़ी, ‘‘सुनीता, क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगी अपने घर की?’’

सुनीता के साथसाथ महेंद्र भी खुश हो गया. एक करोड़पति औरत गरीब के घर आ कर जमीन पर बैठ चाय पिलाने की गुजारिश कर रही थी.

सुनीता तो यह सोच कर चाय न बनाती थी कि ममता उस के घर की चाय पीना नहीं चाहेंगी. जब खुद ममता ने कहा, तो वह खुशी से पागल हो उठी, महेंद्र और सुनीता की इस वक्त ऐसी हालत थी कि ममता इन दोनों से इन की जान भी मांग लेती, तो भी ये लोग मना न करते.

चाय बनी, तो सब लोग चाय पीने लगे. इतने में सुनीता का छोटा बेटा जाग गया. ममता ने उसे देखा तो खुशी से गोद में उठा लिया और उस से बातें करने में मशगूल हो गई.

महेंद्र और सुनीता यह सब देख कर बावले हुए जा रहे थे. उन्हें ममता में एक अमीर औरत की जगह अपने घर की कोई औरत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर बाद ममता ने बच्चे को सुनीता के हाथों में दे दिया और महेंद्र की तरफ देख कर बोली, ‘‘भैया, मैं कुछ बात करने आई थी आप से. वैसे, सुनीता ने आप को सबकुछ बता दिया होगा.

‘‘भैया, मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि सुनीता को सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा कोई और नहीं छुएगा. यह इस तरह होगा, जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है और बच्चे अंडों से निकल कर फिर से कोयल के हो जाते हैं, अगर आप…’’

महेंद्र ममता की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा, ‘‘बहनजी, आप जैसा ठीक समझें वैसा करें. जब सुनीता को आप अपना समझती हैं, तो फिर मुझे किसी बात से कोई डर नहीं. इस का बुरा थोड़े ही न सोचेंगी आप.’’

ममता खुशी से उछल पड़ी. सुनीता महेंद्र को मुंह फाड़े देखे जा रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि महेंद्र इतनी जल्दी हां कह सकता है. लेकिन महेंद्र तो इस वक्त किसी और ही फिजा में घूम रहा था. कोई करोड़पति औरत उस के घर आ कर झोली फैला कर उस से कुछ मांग रही थी, फिर भला वह कैसे मना कर देता.

ममता हाथ जोड़ कर महेंद्र से बोली, ‘‘भैया, मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी,’’ यह कहते हुए ममता ने अपने मिनी बैग से नोटों की एक बड़ी सी गड्डी निकाल कर सुनीता के हाथों में पकड़ा दी और बोली, ‘‘सुनीता, ये पैसे रख लो. अभी और दूंगी. जो इस वक्त मेरे पास थे, वे मैं ले आई.’’

सुनीता ने हाथ में पकड़े नोटों की तरफ देखा और फिर महेंद्र की तरफ देखा. महेंद्र पहले से ही सुनीता के हाथ में रखे नोटों को देख रहा था.

आज से पहले इन दोनों ने कभी इतने रुपए नहीं देखे थे, लेकिन महेंद्र कम से कम ममता से रुपए नहीं लेना चाहता था, वह बोला, ‘‘बहनजी, ये रुपए हम लोग नहीं ले सकते. जब आप हमें इतना मानती हैं, तो ये रुपए किस बात के लिए?’’

ममता ने सधा हुआ जवाब दिया, ‘‘नहीं भैया, ये तो आप को लेने ही पड़ेंगे. भला कोई और यह काम करता, तो वह भी तो रुपए लेता, फिर आप को क्यों न दूं?

‘‘और ये रुपए दे कर मैं कोई एहसान थोड़े ही न कर रही हूं.’’

इस के बाद ममता वहां से चली गई. महेंद्र ने ममता के जाने के बाद रुपए गिने. पूरे एक लाख रुपए थे. महेंद्र और सुनीता दोनों ही आज ममता के अच्छे बरताव से बहुत खुश थे. ऊपर से वे एक लाख रुपए भी दे गईं. ये इतने रुपए थे कि 2 साल तक दोनों काम करते, तो भी इतना पैसा जोड़ न पाते.

दोनों के अंदर आज एक नया जोश था. अब न किसी बात से एतराज था और न किसी बात पर कोई सवाल.

जल्द ही सुनीता को ममता ने डाक्टर के पास ले जा कर सारा काम निबटवा दिया. वह सुनीता के साथ उस के पति महेंद्र को भी ले गई थी, जिस से उस के मन में कोई शक न रहे.

ममता ने अब सुनीता से घर का काम कराना बंद कर दिया था. घर के काम के लिए उस ने एक दूसरी औरत को रख लिया था. सुनीता को खाने के लिए ममता ने मेवा से ले कर हर जरूरी चीज अपने पैसों से ला कर दे दी थी. साथ ही, एक लाख रुपए और भी नकद दे दिए थे.

ममता नियमित रूप से सुनीता को देखने भी आती थी. उस ने महेंद्र और सुनीता से उस के घर चल कर रहने के लिए भी कहा था, लेकिन महेंद्र ने वहां रहने के बजाय अपने घर में ही रहना ठीक समझा.

जिस समय सुनीता अपने पेट में बच्चे को महसूस करने लगी थी, तब से न जाने क्यों उसे वह अपना लगने लगा था. वह उसे सबकुछ जानते हुए भी अपना मान बैठी थी.

जब बच्चा होने को था, तब एक हफ्ता पहले ही सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया गया था. जिस दिन बच्चा हुआ, उस दिन तो ममता सुनीता को छोड़ कर कहीं गई ही न थी. सुनीता को बेटा हुआ था.

ममता ने सुनीता को खुशी से चूम लिया था. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन सुनीता को मन में अजीब सा लग रहा था. उस का मन उस बच्चे को अपना मान रहा था.

अस्पताल से निकलने के बाद ममता ने सुनीता को कुछ दिन अपने पास भी रखा था. उस के बाद उस ने सुनीता को और 50 हजार रुपए भी दिए. सुनीता अपने घर आ गई, लेकिन उस का मन न लगता था. जो बच्चा उस ने अपनी कोख में 9 महीने रखा, आज वह किसी और का हो चुका था. पैसा तो मिला था, लेकिन बच्चा चला गया था.

सुनीता का मन होता था कि बच्चा फिर से उस के पास आ जाए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता था. उस की कोख किसी और के बच्चे के लिए किराए पर जो थी. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: क्षमादान – अदिति और रवि के बीच कैसे पैदा हुई दरार

Hindi Romantic Story: रवि 3 महीने से दीवाली पर बोनस और प्रमोशन की आस लगाए बैठा था. 2 साल की कड़ी मेहनत, कम छुट्टियां और ओवर टाइम से उस ने अपने बौस का दिल जीत लिया था. वह अपने बौस मिस्टर राकेश का फेवरेट एंप्लोई बन चुका था. उस ने सोचा था कि इस बार दीवाली पर एक महीने की लंबी छुट्टी ले कर मम्मीपापा के साथ रहेगा. मम्मी पिछले साल से ही उस की शादी की कोशिश में जुटी थीं.

अपने साथ काम करने वाले मुकेश को कई बार वह अपनी छुट्टियों की प्लानिंग बता चुका था. उस के सारे सहकर्मियों को भरोसा था कि उसे अब की बार दीवाली पर बोनस के साथसाथ प्रमोशन भी मिलेगा. मिस्टर राकेश ने प्रमोशन की लिस्ट में रवि का नाम सब से ऊपर लिखा हुआ था और उसे वे कई बार बता भी चुके थे. हालांकि हैड औफिस से फाइनल लिस्ट आनी बाकी थी.

सप्ताह का पहला दिन था. रवि अपने सहकर्मियों को गुड मौर्निंग कहता हुआ अपने कैबिन में जा रहा था, तभी चपरासी गुड्डू रवि से बोला, ‘‘रवि साहब, आप को बौस ने बुलाया है.’’

‘‘मुझे,’’ रवि के मुंह से अचानक निकला था.

पास के कैबिन में बैठा मुकेश रवि की तरफ ही देख रहा था. उस का सवाल सुन कर वह बताने लगा, ‘‘अरे रवि, तुम्हें पता चला हमारे बौस राकेश साहब की मदर की तबीयत ज्यादा खराब है. इसलिए वे छुट्टी पर चले गए हैं.’’

‘‘अच्छा, कब तक के लिए,’’ रवि के चेहरे पर थोड़ी परेशानी झलक रही थी और सहानुभूति भी. परेशानी खुद की छुट्टी को ले कर थी. वह सोच रहा था कि अगर बौस छुटट्ी पर चले गए हैं तो उस की छुट्टी की कौन मंजूरी देगा और सहानुभूति अपने बौस के लिए थी.

‘‘यार, फिलहाल तो उन्होंने एक हफ्ते की ऐप्लिकेशन दी है, लेकिन कुछ नहीं कह सकते कि वे कब तक लौटेंगे,’’ मुकेश ने बताया.

रवि के चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह अपनी छुट्टियां को ले कर संशय में था. अब जब उस के बौस छुट्टी पर थे, तो उसे पता नहीं ज्यादा दिन की छुट्टी मिल सकेगी या नहीं.

मुकेश ने उस के चेहरे के भावों को भांपते हुए कहा, ‘‘तू फिक्र मत कर, तुझे छुट्टी तो मिल ही जाएगी. 2 साल से लगातार हार्डवर्क जो कर रहा है तू.’’

रवि इस पर मुसकरा दिया. फिर धीमे से बोला, ‘‘फिर यह नया बौस कौन है, जो मुझे बुला रहा है?’’

‘‘कोई नई मैडम राकेश सर की जगह टैंपरेरी अपौइंट हुई हैं. सुना है मुंबई से हैं,’’ मुकेश ने बताया और बोला, ‘‘तू मिल ले जा कर, औफिस का वर्क इंट्रोड्यूस करवाने के लिए बुलवा रही होंगी तुझे.’’

‘‘चल, फिर मैं उन से मिल कर आता हूं,’’ रवि के चेहरे पर अब थोड़ी राहत झलक रही थी.

मुकेश की इस बात से उसे राहत पहुंची थी कि 2 साल से वह हार्डवर्क कर रहा था. कंपनी के पास उस की छुट्टी कैंसिल करने की कोई वजह भी नहीं थी.

ये सब सोचतेसोचते रवि बौस के रूम का दरवाजा खोल कर अंदर चला गया.

‘‘प्लीज, मे आई कम इन मैम,’’ रवि कैबिन के दरवाजे को आधा खोल कर धीरे से बोला.

‘‘कम इन,’’ मैडम किसी फाइल को सिर झुका कर देख रही थीं.

रवि चुपचाप उन की टेबल के सामने जा कर खड़ा हो गया.

मैडम ने अचानक अपना सिर उठाया और शायद ‘सिट डाउन, प्लीज’ कहने ही वाली थीं कि रुक गईं.

रवि भी अपनी जगह बस खड़े का खड़ा ही रह गया. उसे इस बात की बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि वह उसे आज यहां अचानक इस तरह मिलेगी. वह अदिति थी. कालेज की पुरानी दोस्त नहीं, कालेज के दिनों की रवि की एकमात्र दुश्मन. दोनों ने कभी एकदूसरे से कालेज में बात भी नहीं की थी, लेकिन उन का झगड़ा फेसबुक चैटिंग पर पहले हो चुका था.

रवि का कालेज में पहला साल था. वह पढ़ाकू किस्म का लड़का था. उन दिनों वह अदिति की तरफ आकर्षित हो गया था, लेकिन उसे उस से बात करने में न जाने क्यों बहुत ज्यादा झिझक महसूस होती थी. अदिति अच्छी होस्ट होने के साथसाथ कविताएं लिखती और सुनाती भी थी. ऐसी कई बातों ने रवि को प्रभावित कर दिया था. लेकिन रवि चुप रहने वाला लड़का था. वह अदिति से बात करना तो चाहता था, पर कर नहीं पाता था.

2 सैमेस्टर पूरे होने के बाद रवि के कालेज में कुछ दिनों के लिए छुट्टियां हो गई थीं.

तभी एकाएक उसे फेसबुक जैसे माध्यम का साथ मिल गया. उस ने इंटरनैट पर फेसबुक आईडी बना ली और अदिति को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. अदिति ने उसे ऐक्सैप्ट भी कर लिया. अब जैसे रवि को नया आसमान मिल गया था, थोड़ाबहुत जो भी लिख लिया करता था, फेसबुक पर पोस्ट करता, उस के क्लासमेट्स भी अब उसे नोटिस करने लगे थे. फिर वह एकाएक अदिति को अकसर उस की कविताओं की तारीफ लिख कर भेजा करता, उस की तसवीरों पर कमैंट कर दिया करता. बदले में अदिति भी रिप्लाई करती थी.

एक दिन उस ने अदिति की एक तसवीर देखी और उस पर उसे कुछ पंक्तियां लिखने का मन हुआ. उस दिन उस ने कमैंट में अपनी वे पंक्तियां न लिख कर अदिति की उस तसवीर को डाउनलोड कर अपनी टाइमलाइन से उन पंक्तियों के साथ अपलोड कर दिया और अदिति की टाइमलाइन पर वह तसवीर टैग के जरिए भेज दी. यह सब देखते ही अदिति ने रवि को मैसेज किया ‘अपलोड करने से पहले पूछ तो लेते.’

रवि ने रिप्लाई किया, ‘जी, सौरी. आप को बुरा लगा हो तो मैं उस तसवीर को हटा देता हूं.’

रवि फेसबुक का नौसिखिया संचालक था. उसे मालूम नहीं था कि उस फोटो को पूरी तरह से हटाने के लिए उसे डिलीट के औप्शन पर जाना होगा. उस ने सामने दिख रहे ‘रिमूव’ के औप्शन से उस तसवीर को अपने प्रोफाइल से हटा लिया और सोचने लगा कि तसवीर पूरी तरह से हट चुकी है.

थोड़ी देर बाद अदिति का फिर मैसेज आया, ‘फोटो अभी तक हटा क्यों नहीं?’

रवि तो समझ रहा था कि वह हट चुका है, इसलिए रिप्लाई किया, ‘हटा तो दिया है.’

अदिति का इस बार थोड़ा तीखा रिप्लाई आया, ‘अपने मोबाइल अपलोड में देख.’

रवि ‘मोबाइल अपलोड’ नाम की बला को उस समय जानता ही नहीं था. उस ने फिर रिप्लाई किया, ‘कहां?’

‘मोबाइल अपलोड में देख,’ अदिति का रिप्लाई अब सख्त लग रहा था.

‘ओके,’ रवि ने नपातुला जवाब दिया.

उसे हलका सा धक्का लगा था. उसे अदिति के ‘अपने अपलोड में देख’ जैसे शब्दों से ठेस पहुंची थी, क्योंकि अब तक उन दोनों की बातचीत में हर जगह ‘आप देखिए’ जैसे शब्द ही शामिल थे.

रवि ने जैसेतैसे ‘मोबाइल अपलोड’ ढूंढ़ा. अब वह उस तसवीर पर गया, लेकिन वहां भी उसे डिलीट का औप्शन नहीं दिख रहा था.

तब तक अदिति का एक और तीखा रिप्लाई आ चुका था, ‘फोटो अभी तक नहीं हटा.’

फिर एक बार अदिति ने मैसेज किया, ‘मिस्टर, क्या चल रहा है यह सब?’

रवि ने रिप्लाई किया, ‘कुछ टैक्निकल प्रौब्लम आ रही है. साइबर कैफे जा कर जल्दी ही उस मनहूस फोटो को हटाता हूं.’

रवि अब थोड़ा झुंझला सा गया था. उसे अदिति का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा था.

‘मनहूस…’ इस के आगे कुछ अपशब्द थे अदिति के रिप्लाई में.

अब रवि ने सब से पहले साइबर कैफे में एक व्यक्ति से पूछ कर उस फोटो को डिलीट किया. फिर अदिति को मैसेज किया, ‘आप का वह फोटो डिलीट हो चुका है. एक बात कहूंगा कि वह मेरी गलती थी, पर आप को यों ‘तू तड़ाक’ से तो पेश नहीं आना चाहिए.’

अब बात गरमा गई थी. धीरेधीरे रिप्लाई में भयंकर झगड़ा हो गया और फिर रवि जिस एकमात्र लड़की को अपनी क्लास में पसंद करता था, उस की फेसबुक फ्रैंड लिस्ट से बाहर हो चुका था.

आखिर में रवि ने थोड़ा सोचा और एक लंबा सौरी मैसेज भेज दिया लेकिन तब तक वह अदिति की फ्रैंड लिस्ट से बाहर हो चुका था.

छुट्टियों के बाद जब कालेज खुला, तो कालेज में बातें चल रही थीं कि रवि ने अदिति को प्रपोज किया था. रवि ने चुपचाप सब सुन लिया लेकिन इस बारे में कोई रिप्लाई नहीं किया.

वह जैसे अपनी ही नजरों में गिरता जा रहा था. अदिति ने ही शायद कालेज में यह बात फैलाई थी. फेसबुक से हुई एक गलती ने उसे संजीदा छात्रों की फेहरिस्त से बाहर कर दिया था और हर ओर कुछ महीने तक उस की हंसी उड़ाई गई थी.

एक दिन क्लास में उस के पीछे की सीट पर बैठ कर अदिति ने उस के दोस्तों के साथ मिल कर अप्रत्यक्ष रूप से रवि पर कई कटाक्ष कर दिए थे. वह उस की हंसी उड़ा रही थी, पर रवि कुछ नहीं बोला. वह अब तक खुद की ही गलती मान रहा था, लेकिन उस दिन से उस

ने अदिति से नफरत करना शुरू कर दिया था. अब अदिति को भी उस ने अपनी फ्रैंडलिस्ट से हटा दिया था और एकएक कर अदिति के दोस्त भी ब्लौक होते चले गए.

फिर न उस की अदिति से सामने कभी बात हुई और न ही फेसबुक पर, आज इतने साल बाद फिर वह उस के सामने थी और अब उस की बौस थी.

दोनों लगभग 10 मिनट तक स्तब्ध हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. अदिति ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘सिट डाउन, प्लीज.’’

रवि चुपचाप बैठ गया. 5 मिनट तक कैबिन में खामोशी छाई रही. अदिति अभी फिर से अपनी फाइल में उलझ गई थी या शायद नाटक कर रही थी.

फिर नजरें उठा कर बोली, ‘‘रवि, मुझे कल तक इस औफिस की सभी जरूरी फाइलें दे दो.’’

‘‘जी मैम,’’ रवि ने धीमे से कहा. उस की नजरें झुकी हुई थीं.

‘‘ओके, आप जा सकते हैं,’’ अदिति ने कहा, इस बार उस की नजरें भी झुकी हुई थीं.

रवि कैबिन से बाहर आ गया था लेकिन अपने अतीत से नहीं.

उस रात उसे नींद नहीं आ रही थी. गुजरे हुए कल में जो हुआ था उसे तो वह नजरअंदाज कर चुका था, लेकिन अब उस से उस की वर्तमान जिंदगी प्रभावित होती दिख रही थी.

रवि को फिक्र सता रही थी कि उस की छुट्टियां अदिति अस्वीकृत न कर दे. वह लंबे समय से छुट्टियों का इंतजार कर रहा था और अब अदिति के रहते उसे छुट्टी मिलना मुश्किल लगने लगा था. उसे लग रहा था कि अदिति उस से पुरानी दुश्मनी जरूर निकालेगी.

अगले दिन वह परेशान सा औफिस पहुंचा. चपरासी ने पिछले दिन की तरह ही उसे आज फिर बताया कि बौस यानी अदिति ने उसे कैबिन में बुलाया है.

रवि वे जरूरी फाइलें ले कर कैबिन में पहुंचा, जो उसे पिछले दिन अदिति ने छांटने को कही थीं.

‘‘मे आई कम इन मैम,’’ रवि ने औपचारिकता निभाई.

‘‘यसयस,’’ अदिति ने उस की तरफ आज पहली बार मुसकरा कर देखा था. ‘‘वे फाइल्स?’’

‘‘जी मैम, ये रहीं,’’ रवि ने फाइलों का एक ढेर अदिति की टेबल पर रख दिया.

‘‘आप को एक महीने की छुट्टी चाहिए?’’ अदिति तीखी मुसकराहट के साथ कह रही थी.

‘‘जी मैम,’’ रवि सिर नीचे किए हुए था.

‘‘इस वक्त औफिस में राकेशजी नहीं हैं, तो आप को इतनी लंबी छुट्टी

मिलना तो मुश्किल है,’’ अदिति रवि की तरफ अब गंभीरता से देखते हुए कह रही थी.

‘‘ओके, मैम. आप जैसा कहें,’’ रवि ने हलका सा सिर उठा कर कहा.

‘‘रविजी, आप हमारी कंपनी के बैस्ट एंप्लोई हैं,’’ अदिति इतना कहते हुए रुकी और फिर एक कागज हाथ में उठा कर बोली, ‘‘और आप की छुट्टी मैं भी आप से नहीं छीन सकती.’’

अदिति मुसकरा रही थी. अब रवि ने वह कागज अदिति मैम के हाथ से ले लिया और उसे पढ़ कर अब वह भी मुसकरा उठा, ‘‘थैंक्यू मैम,’’ रवि ने खुश होते हुए कहा. रवि की आंखों में कृतज्ञता झलक रही थी.

‘‘इट्स ओके रवि,’’ अदिति अब गंभीर मुद्रा में कह रही थी

कैबिन में कुछ लमहों तक खामोशी छा गई थी. अदिति ने उस खामोशी को तोड़ा, ‘‘रवि, ये ‘इट्स ओके’ तुम्हारे उस 10 साल पहले के सौरी के लिए है, जो तुम ने फेसबुक पर मैसेज किया था.’’

रवि चुपचाप खड़ा हो गया था. फिर कुछ देर बाद बोला, ‘‘दरअसल, वह मेरी नासमझी थी. मैं ने फेसबुक माध्यम को समझने में ही गलती कर दी थी. मुझे नहीं मालूम था कि किसी की तसवीर बिना पूछे अपलोड कर देना गलत है.’’

‘‘आई एम आलसो सौरी,’’ अदिति कह रही थी.

‘‘किसलिए मैम,’’ रवि जैसे अब सारी नफरत भुला चुका था.

‘‘गलती मेरी भी थी. मैं जरूरत से ज्यादा ही तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार कर रही थी. मुझे वह प्रपोज वाली बात भी नहीं उड़ानी चाहिए थी,’’ अदिति की आंखों में भी जैसे कुछ पिघल रहा था, ‘‘मैं ने तुम्हें गलत समझा था.’’

‘‘इट्स ओके मैम,’’ रवि इतना कह कर चुप हो गया था.

अदिति ने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘‘मैं चाहती तो तुम से बदला लेती. तुम्हारी छुट्टियां कैंसिल कर देती. एक बार मैं ने सोचा भी, पर…’’

कुछ देर चुप रहने के बाद अदिति जैसे कोई सटीक बात ढूंढ़ कर बोली, ‘‘कल को हो सकता है तुम मेरी जगह हो और मैं तुम्हारी जगह. इस तरह नफरत से जिंदगी नहीं जी जाती.’’

कुछ देर तक फिर खामोशी छाई रही और अदिति ने फिर कहा, ‘‘उम्मीद है, तुम ने मुझे माफ कर दिया होगा.’’

‘‘औफकोर्स मैम,’’ रवि ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘तो कल से तुम छुट्टी पर हो,’’ अदिति ने मुसकराते हुए रवि से पूछा.

‘‘जी मैम,’’ रवि ने भी हंस कर जवाब दिया.

‘‘ओके, ऐंजौय यौर्स हौलीडेज. तुम जा सकते हो,’’ अदिति इतना कह कर आंख बंद कर अपनी कुरसी पर पीठ टेक कर बैठ गई जैसे कोई भारी बोझ कंधे से उतार दिया हो.

रवि जब बाहर जाने के लिए कैबिन का दरवाजा खोल रहा था, तब मुसकराते हुए अदिति ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रवि, हैप्पी दीवाली.’’

रवि भी मुसकरा दिया और बोला, ‘‘आप को भी, अदिति मैम.’’

इतना कहते हुए रवि मुसकराता हुआ बाहर आ गया. उन दोनों के बीच खड़ी कई साल पुरानी दीवारें अचानक ढह गई थीं. जिंदगी खुशियां बांट कर, उन का कारण बन कर चलती है, नफरतें पाल कर नहीं.

दीवाली के इस अवसर पर क्षमादान के दीपकों की जलती हुई लौ में रवि और अदिति के दिलों में नफरतों से भरे कुछ अंधेरे कोने रोशन हो चुके थे. Hindi Romantic Story

Romantic Story In Hindi: सौदा इश्क का – क्या दीपक और बाती अलग हुए?

Romantic Story In Hindi: रात के 11 बज चुके थे और बाती अपने बैडरूम में चहलकदमी कर रही थी. बैड पर उस का 2 साल का बेटा ऊष्मित सो रहा था. इस तरह से चहलकदमी करते हुए दीपक का इंतजार करना पिछले 6 महीनों से बाती की आदत बन चुका था. उसे पता था कि आजकल दीपक के आने का यही समय है… बाती सोच ही रही थी कि सन्नाटे को चीरती हुई डोरबैल बजी.

“आखिर यह कब तक चलेगा दीपक?” बाती ने कहा, “आज ऊष्मित को अचानक हलका बुखार आ गया था. सोचा कि तुम्हारे साथ जा कर डाक्टर को दिखा दूंगी. इसी वजह से शाम को तकरीबन साढ़े 6 बजे तुम्हें फोन लगाया था, मगर तुम्हारा फोन स्विच औफ आ रहा था.

“तब मैं ने तुम्हारे औफिस फोन लगाया तो पता चला कि तुम तो औफिस से 6 बजे ही निकल गए हो और पिछले दिनों कभी भी 6 बजे से ज्यादा नहीं रुके हो.”

“चलो अच्छा ही हुआ जो तुम्हें पता चल गया. वैसे मैं खुद ही बताने वाला था. अब हम साथ में नहीं रह सकते,” दीपक का जवाब भी नपातुला था.

“साथ में नहीं रह सकते? क्या मतलब है तुम्हारा? क्या कोई दूसरा अफेयर है तुम्हारा?” बाती की आवाज अभी भी संयमित ही थी. शायद दीपक के औफिस से सूचना मिलने के बाद वह समझ गई थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है.

“हां, मेरा ज्योति के साथ कालेज के दिनों से ही अफेयर है. उस की और मेरी सरकारी नौकरी भी एक ही साथ लगी थी. पर दोनों के महकमे अलगअलग थे. उस की पोस्टिंग 400 किलोमीटर दूर शहर में हो गई थी.अभी 8 महीने पहले ही उस का ट्रांसफर यहां हुआ है. कलक्टर औफिस में मीटिंग के दौरान ही उस से मुलाकात हुई थी.

“ज्योति ने अभी तक मेरे इंतजार में शादी नहीं की है. मैं उसे आज भी उतना ही चाहता हूं, जितना 5 साल पहले चाहता था,” दीपक सिर झुकाए बोल रहा था.

“मुझे इसी बात का डर था…” बाती की  आंखों में आंसू थे, मगर आवाज अभी भी कंट्रोल में थी, ”आज कम से कम तुम्हारे साथ नहीं सो सकती. प्लीज, तुम दूसरे बैडरूम में सो जाओ.”

“सौरी बाती, तुम में कोई कमी नहीं है. तुम बहुत ही अच्छी पत्नी और बेहतरीन मां हो. मगर मैं अपने पुराने प्यार को भुला नहीं सकता, वह भी तब जबकि वह मेरे लिए इंतजार कर रही हो.

“अगर मैं उस के साथ न रहूं तो यह मेरी खुदगर्जी होगी. मुझे माफ कर दो बाती,” दीपक पछतावे से भरी आवाज में बोला.

“यह तो मैं भी जानती हूं दीपक कि मुझे उस गुनाह की सजा मिली रही है जो मैं ने किया ही नहीं. लेकिन मैं खुद 21वीं सदी की एक पढ़ीलिखी औरत हूं और इस बात की भी हिमायती हूं कि हर इनसान को उस की पसंद की जिंदगी जीने का हक है. मैं तुम्हारी इस करतूत पर चीखूंगीचिल्लाऊंगी नहीं, पर मैं अपने हकों को छोड़ूंगी भी नहीं.

“मैं अकेली होती तब भी कोई बात नहीं थी, मगर अब मुझ पर ऊष्मित की जवाबदारी भी है,” बाती मजबूती के साथ यकीन भरी आवाज में बोली, “अब मुझे अकेला छोड़ दो और तुम दूसरे बैडरूम में सो जाओ,” यह कहतेकहते बाती की आंखों में आंसू आ गए.

दीपक अपराधियों की तरह सिर झुकाए दूसरे कमरे में चला गया.

“आज मैं तुम्हारा लंच बनाने की हालत में नहीं हूं. शाम को लौटते समय अपने साथ ज्योति को भी लेते आना. मैं इस बारे में तुरंत फैसला करना चाहती हूं,” अगली सुबह बाती ने औफिस जाते हुए दीपक से कहा.

“मेरी भी यही इच्छा है कि तुम दोनों आपस में रजामंदी से कोई फैसला कर लो,” दीपक भी धीमी आवाज में बोला. शायद उसे अपने अपराध  का एहसास हो रहा था.

शाम को दीपक अपने साथ ज्योति को भी ले कर आ गया. ज्योति लंबे व पतले शरीर वाली सांवली मगर आकर्षक नैननक्श की लड़की थी. उस की उम्र तकरीबन दीपक के ही बराबर थी.

“नमस्ते बातीजी, मेरा नाम ज्योति है. इस से ज्यादा मैं अपना परिचय आप के सामने दे नहीं सकती,” ज्योति अपने चेहरे पर एक जबरन ओढ़ी हुई फीकी सी मुसकान के साथ बोली. वैसे, यह सब कहते हुए ज्योति की आवाज कंपकपा रही थी, जो इस बात का सुबूत था कि उसे भी अपने अपराधी होने का एहसास है.

“शायद मैं तो खुद अपना परिचय खो चुकी हूं. पता नहीं मैं अपने आप को बाती दीपक कुमार कहूं या सिर्फ बाती  कहूं,” बाती रूखी आवाज में बोली.

“देखिए बातीजी, जोकुछ हुआ, उस के लिए हम सब सिर्फ समय को ही दोष दे सकते हैं. वैसे मैं अपनी तरफ से चाहती हूं कि हम दोनों एक ही घर में रहे. मैं हम तीनों की जिंदगी को कंट्रोल करने वाली सभी चाबियां आप को सौंपने को तैयार हूं.

“यहां तक कि मेरी और दीपक की जो तनख्वाह आती है उस पर भी सौ फीसदी आप का ही हक रहेगा. आप जैसा चाहेंगी मैं वैसा तालमेल बैठाने को तैयार हूं,” ज्योति की आवाज में मानो पछतावा झलक रहा था.

“एक औरत का सब से बड़ा हक उस का अपना पति ही होता है. मुझे यकीनी तौर पर मालूम है कि तुम मुझे मेरा यह हक देने वाली नहीं हो. रही बात साथ रहने की तो अब मैं अकेली नहीं हूं, मेरी एक जवाबदारी और भी है 2 साल के ऊष्मित के रूप में.

“अगर ऊष्मित बचपन से ही झूठ और नाइंसाफी को अपनी आंखों के सामने फलतेफूलते देखेगा तो उस के बाल मन पर गलत असर पड़ेगा. मेरा सपना है कि मैं उसे एक अच्छा नागरिक बनाऊं. ऐसे माहौल में मैं उसे संस्कारवान बनने की सीख कैसे दे पाऊंगी? बड़ा हो कर क्या वह अपने पिता को माफ कर पाएगा?

“भविष्य में तुम्हारे भी बच्चे होंगे ही. तब हकों की लड़ाई होगी. उस समय मैं खुद शायद कोई एकतरफा फैसला लूं, इसलिए अलग होना ही बेहतर होगा,” बाती ने भविष्य के सवालों के साथ जवाब दिया.

“तब तुम ही बताओ कि इस समस्या का हल कैसे होगा?” दीपक ने पूछा.

“आज जबकि ऊष्मित छोटा है और मेरी माली जरूरतें कम हैं, पर जैसेजैसे ऊष्मित बड़ा होता जाएगा, वैसेवैसे मेरी जरूरतें बढ़ती जाएंगी. मैं चाहती हूं कि इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही कोई फैसला लिया जाए,” बाती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा.

“मैं भी बातीजी की बातों से सहमत हूं. आमतौर पर अदालतों में जो रकम तय की जाती है, वह बहुत कम होती है,” ज्योति बोली.

“ऐसा तो तभी मुमकिम है जब बाती को कोई नौकरी दिलवा दी जाए, जिस से हर साल तनख्वाह में कुछ न कुछ इजाफा होता रहे,” दीपक बोला.

“आज की कंडीशन में ऊष्मित को अकेले छोड़ कर नौकरी करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है. वैसे भी प्राइवेट नौकरी में जाने का समय तो तय होता है, मगर लौटने में कई बार घंटों की देरी हो जाती है. शादी से पहले मैं जिस कंपनी में काम करती थी, उस में कई बार मुझे 12-12 घंटे काम करना होता था,” बाती बोली.

“बातीजी ठीक कह रही हैं. प्राइवेट नौकरी में टैंशन भी बहुत ज्यादा रहती है,” ज्योति बाती की बातों से सहमत होते हुए बोली.

“लेकिन ज्योति, मैं और तुम सरकारी नौकरी में हैं और यह भी जानते हैं कि सरकारी नौकरी मिलना आज की तारीख में एक मुश्किल काम है,” दीपक की आवाज में मजबूरी झलक रही थी.

“मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं. मैं बातीजी के लिए एक निश्चित उपाय चाहती हूं,” ज्योति बोली.

“मतलब? तुम क्या कहना चाहती हो ज्योति?” दीपक ने पूछा.

“दीपक, सही कहूं तो मैं तुम्हें पाने की आस खो चुकी थी. तुम मुझे दोबारा मिले हो. मैं बातीजी की भी शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी भावनाओं का मान रखते हुए तुम्हें मुझे सौंपने का हिम्मत से भरा फैसला लिया.

“अब मेरी बारी है कि मैं उन्हें एक बेहतरीन जिंदगी जीने के लिए रिटर्न गिफ्ट दूं, चाहे इस के लिए मुझे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े…” ज्योति की आवाज में एक मजबूती थी, “पर इस के लिए दीपक तुम्हें एक बार मरना पड़ेगा.”

“मरना पड़ेगा मतलब?” दीपक ने हैरानी से पूछा.

“यहां पर बैठेबैठे और बातीजी से बात करतेकरते मेरे दिमाग में एक योजना आई है. इस से सभी की समस्याएं सुलझ जाएंगी और किसी तरह की कोई दिक्कत भी नहीं आएगी, क्योंकि यह एक हादसा होगा और इस की गवाह एक सरकारी अफसर मतलब मैं खुद होंगी.”

“हादसा? कैसा हादसा? और अगर मैं मर ही जाऊंगा तो तुम्हारे साथ रहेगा कौन?” दीपक का हैरान होना इस बार दोगुना था. वह किसी बेवकूफ की तरह ज्योति की तरफ देखने लगा.

“देखो दीपक, चाहे हम दोनों मानें या न मानें, मगर सामाजिक नजरिए से हमारा रिश्ता गलत है और समाज में इसे आसानी से मंजूरी नहीं मिलेगी. हमें साथ रहने के लिए या तो अपना धर्म बदलना होगा या अपनी पहचान ही बदलनी होगी.

“अगर हम कानूनी झमेलों में पड़ेंगे तो कई साल निकल जाएंगे और तीनों के हाथ में कुछ नहीं आएगा,” ज्योति बोली.

“तो फिर तुम ने क्या सोचा है?” दीपक ने पूछा.

“मैं आज जिस ओहदे पर हूं, उस में मेरे एक इशारे पर मैं किसी भी आदमी को एक नई पहचान दिलवा सकती हूं. मतलब मैं किसी भी आदमी के आधारकार्ड में बदलाव करवा सकती हूं, जिस के आधार पर वह अपनी एक नई पहचान बनवा सकता है,” ज्योति ने अपनी योजना के कुछ अंशों का खुलासा किया.

“मैं अभी भी नहीं समझा,” दीपक एकटक ज्योति को देखते हुए बोला.

“बातीजी की पैसों को ले कर ही समस्या है न? हम उसी का हल कर रहे हैं. मेरी योजना यह है कि तुम और बातीजी अगले रविवार को शहर से दूर जो नहर है उस पर पिकनिक मनाने जाओ. रुकने के लिए उस जगह को चुनो जहां पर पानी का बहाव तेज हो और तुम दोनों के अलावा वहां कोई न हो.

“उसी जगह पर मस्ती करते हुए दीपक का पैर फिसल जाएगा. बहाव तेज होने के चलते दीपक दूर बह जाएगा. इस बात का खास ध्यान रखा जाए कि बातीजी दीपक की मस्ती करने वाली घटना का वीडियो बना लेंगी,” ज्योति ने योजना को समझाया.

“बहते हुए मैं जाऊंगा कहां? मुझे तो तैरना भी नहीं आता,” दीपक परेशान होते हुए बोला.

“इस के बाद इस ड्रामे का दूसरा पार्ट स्टार्ट होगा. यहां आने से पहले मैं जिस जगह पोस्टेड थी वह यहां से 400 किलोमीटर दूर है. वहां का सरकारी बंगला भी मैं ने अभी तक खाली नहीं किया है. तुम तैरना नहीं जानते हो यह बात हमारे लिए प्लस पौइंट होगी.

“15-20 फुट बहने के बाद मेरे बुलाए हुए आदमी तुम्हें बचा लेंगे और तुम्हें अपनी ही गाड़ी से उस सरकारी बंगले पर छोड़ देंगे,” ज्योति ने अपनी योजना का और खुलासा किया.

“मगर वहां पर मुझे बचाने की टीम पहुंचेगी किस के कहने पर?” दीपक ने पूछा.

“वह टीम लोकल नहीं होगी और उसी जगह से आएगी जहां पर मैं पहले पोस्टेड थी. बचाने वाली टीम और गाड़ी का इंतजाम मैं कर दूंगी. मैं खुद भी उस जगह से कुछ दूर मौजूद रहूंगी,” ज्योति योजना पर से परदा हटाते हुए बोली.

“मगर तुम्हारे वहां आने की वजह क्या होगी?” दीपक एक बार फिर हैरान था.

“अरे भई, मैं भी इनसान हूं और अपनी छुट्टी के दिन आउटिंग के लिए तो जा ही सकती हूं न? बस, उस दिन भी अपना मूड चेंज करने के लिए आउटिंग पर आ जाऊंगी और तुम्हारे पानी में बहने के बाद जब बातीजी मदद के लिए चिल्लाएंगी, तब सब से पहले मैं ही वहां पर पहुंचूंगी.

“इस तरह से मैं एक चश्मदीद गवाह का काम भी करूंगी. सरकारी अफसर की गवाही पर कोई भी सवाल नहीं उठाएगा,” ज्योति बोली.

“हांहां, अब मैं तुम्हारी योजना को समझ गया. उधर तुम्हारी गाड़ी और तुम्हारे लोग मुझे ले कर तुम्हारे उस बंगले पर जाएंगे और इधर तुम मुझे मृत घोषित करवा कर मेरी जगह बाती को मेरी जगह नौकरी और मेरे बीमे के पैसे दिलवा दोगी,” दीपक योजना समझते हुए बोला.

“एकदम सही. वहां पर तुम्हारा रहनेखाने का सारा इंतजाम होगा. यहां पर ज्यादा से ज्यादा 6 महीनों में मैं यह काम खत्म कर दूंगी. उस के बाद वापस उसी जगह पर अपना ट्रांसफर करवा लूंगी,” ‘ज्योति बोली.

“लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी मैं रहूंगा तो दीपक ही न? मेरी पहचान अभी तक बदली नहीं है,” दीपक कुछ बेचैन होते हुए बोला.

“अभी मेरी योजना पूरी नहीं हुई है. वहां पहुंचने के बाद तुम्हें घर पर नहीं बैठना है, बल्कि तुम्हें अपना नाम बदलवाने के सिलसिले में एक शपथपत्र बनवा कर कलक्टर औफिस में देना है. इस तरह के शपथपत्र बनवाना कोई मुश्किल काम नहीं है. तुम्हें अपना नाम बदल कर लौ कुमार रखना होगा.

“चूंकि नहर के तेज बहाव में बहने के बाद तुम्हारी लाश नहीं मिली होगी, इसलिए श्मशान घाट पर तुम्हारे नाम की कोई ऐंट्री नहीं होगी. मतलब तुम्हारा आधारकार्ड अलाइव रहेगा और हम उस में बदले हुए नाम का अपडेट आसानी से करवा पाएंगे,” ज्योति ने योजना का खुलासा किया.

“क्या सिर्फ कलक्टर के औफिस में शपथपत्र देने भर से नाम बदल जाता है?” दीपक ने पूछा.

“नहीं, इस की एक प्रक्रिया होती है. सब से पहले इस बारे में किसी नामी अखबार में जाहिर सूचना के जरीए नाम बदलवाने के लिए इश्तिहार छपवाना होता है, जिस में वजह देनी होती है. हम तुम्हारा नया नाम लौ कुमार रखेंगे.

“उस के बाद कलक्टर के औफिस में सभी कागजात के साथ अर्जी देनी होती है. कलक्टर की सिफारिश पर राज्य शासन इसे गजट में छापता है. एक बार गजट में नाम आने के बाद उसी नाम से बाकी कागजात में नाम आसानी से बदलवाया जा सकता है,” ज्योति ने पूरा ब्योरा दिया.

“मगर लौ कुमार नाम कुछ अटपटा नहीं होगा?” दीपक ने पूछा.

“नहीं, यह नाम बहुत सोचसमझ कर रखा गया है. अगर कभी तुम्हारा कोई पुराना जानकार मिल जाता है तो यह सफाई देने में आसानी होगी कि छात्र जीवन में दोस्तों को लौ कुमार बोलने में परेशानी होती थी, इसलिए उन्होंने लौ कुमार का पर्यायवाची दीपक कुमार तुम्हारा नाम रख दिया और वे तुम्हें इसी नाम से बुलाते हैं.

“वैसे बेहतर तो यही होगा कि तुम अपने किसी पुराने जानपहचान वाले से मिलो ही नहीं,” ज्योति की आवाज में चेतावनी और समझाइश दोनों ही थीं.

“यकीनन यह योजना तो काफी अच्छी और आकर्षक है. तुम्हारे कारण से सुरक्षित भी. इस योजना से हम सभी की समस्याएं भी हल हो रही हैं. तुम्हें तो कोई परेशानी नहीं है न बाती?”दीपक ने पूछा.

“मैं एतराज कर के करूंगी भी क्या? मेरे सामने अब सिर्फ ऊष्मित का भविष्य है. मैं यहां साफ कर देना चाहती हूं कि मुझे किसी कानूनी झमेले में मत फंसाना,” बाती की आवाज में रूखापन साफ झलक रहा था.

“वैसे तो मैं और दीपक मिल कर भी यह योजना बना सकते थे, मगर आप की जानकारी में भी सारी बातें रहें इसी वजह से यह योजना आप के सामने बनाई जा रही है, ताकि भविष्य में कोई शक न रहे,” ज्योति ने अपना रुख साफ करते हुए कहा.

“वैसे भी बाती, तुम्हें जोकुछ मिल रहा है वह तुम्हारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा है,” दीपक ज्योति की बातों से सहमत होते हुए बोला.

15 दिनों के बाद अखबारों में इस हादसे का पूरा ब्योरा छपा, साथ ही छपी ज्योति की आंखों देखी गवाही.

तकरीबन 4 महीने के बाद ज्योति की मदद से बाती को दीपक की जगह नौकरी मिल गई और बीमे का पैसा भी. लौ कुमार और ज्योति भी अपनी नई जिंदगी में बिजी हो गए. ज्योति ने लौ कुमार को भी सरकारी मदद से लोन दिलवा कर एक फैक्टरी डलवा दी. Romantic Story In Hindi

Family Story In Hindi: यह सलीब – इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबे व्यक्ति की कहानी

Family Story In Hindi: मैं और बूआ अभी चर्चा कर ही रही थीं कि आज किसी के पास इतना समय कहां है जो एकदूसरे से सुखदुख की बात कर सके. तभी कहीं से यह आवाज कानों में पड़ी-

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,

यहां सब के सर पे सलीब है

कोई दोस्त है न रकीब है

तेरा शहर कितना अजीब है.

यहां किस का चेहरा पढ़ा करूं

यहां कौन इतने करीब है…

‘‘सच ही तो कह रहा है गाने वाला. आज किस के पास इतना समय है, जो किसी का चेहरा पढ़ा जा सके. अपने आप को ही पूरी तरह आज कोई नहीं जानता, अपना ही अंतर्मन क्या है क्या नहीं? हर इनसान हर पल मानो एक सूली पर लटका नजर आता है.’’

मैं ने कहा तो बूआ मेरी तरफ देख कर तनिक मुसकरा दीं.

‘‘सलीब सिर पर उठाने को कहा किस ने? उतार कर एक तरफ रख क्यों नहीं देते और रहा सवाल चेहरा पढ़ने का तो वह भी ज्यादा मुश्किल नहीं है. बस, व्यक्ति में एक ईमानदारी होनी चाहिए.’’

‘‘ईमानदार कौन होना चाहिए? सुनाने वाला या सुनने वाला?’’

‘‘सुनने वाला, सुनाने वाले की पीड़ा को तमाशा न बना दे, उस का दर्द समझे, उस का समाधान करे.’’

अकसर बूआ की बातों से मैं निरुत्तर हो जाती हूं. बड़ी संतुष्ट प्रवृत्ति की हैं मेरी बूआ. जो उन के पास है उस का उन्हें जरा भी अभिमान नहीं और जो नहीं उस का अफसोस भी नहीं है.

‘‘किसी दूसरे की थाली में छप्पन भोग देख कर अपनी थाली की सूखी दालरोटी पर अफसोस मत करो. अगर तुम्हारी थाली में यह भी न होता तो तुम क्या कर लेतीं? अपनी झोंपड़ी का सुख ही परम सुख होता है. पराया महल मात्र मृगतृष्णा है. सुख कहीं बाहर नहीं है…सुख यहीं है तुम्हारे ही भीतर.’’

मुझे कभीकभी यह सब असंभव सा लगता है. ऐसा कैसे हो सकता है कि अपनी किसी सखी या रिश्तेदार महिला के गले में हीरे का हार देख कर उसे अपने गले में देखने की इच्छा न जागे.

एक दिन मेरी भाभी ने ऐसे ही कह दिया कि हीरा आजकल का लेटैस्ट फैशन है तो झट से अपने कुछ टूटेफूटे गहने बेच मैं हीरे के टौप्स खरीद लाई थी और जब तक पहन कर भाभी को दिखा नहीं दिए, हीनभावना से उबर ही नहीं पाई थी. बूआ को सारा किस्सा सुनाया तो पुन: मैं अनुत्तरित रह गई थी.

‘‘आज टूटेफूटे कुछ गहने थे इसलिए बेच कर टौप्स ले लिए…कल अगर कोई हीरों का सैट दिखा कर तुम्हारे स्वाभिमान को चोट पहुंचाएगा तो क्या बेचोगी, शुभा?’’

अवाक् रह गई थी मैं. टौप्स बूआ के हाथ में थे. स्नेहमयी मुसकान थी उन के होंठों पर.

‘‘ऐसा नहीं कह रही मैं कि तुम ने ये टौप्स क्यों लिए? यही तो उम्र है पहननेओढ़ने की. अपनी खुशी के लिए गहने बनाना अच्छी बात है. तुम ने तो टौप्स इसलिए बनाए कि तुम्हारी भाभी ने ऐसा कहा…अपने स्वाभिमान को किसी के पैरों की जूती मत बनाओ, शुभा. हम पर हमारी ही मरजी चलनी चाहिए न कि किसी भी ऐरेगैरे की.

‘‘तुम्हारा अहं इतना हलका क्यों हो गया? हीरे से ही औरत संपूर्ण होती है… यह तुम्हारी भाभी ने यदि कह दिया तो कह दिया. उस ने तुम से यह तो नहीं कहा था कि तुम्हारे पास हीरे नहीं हैं. क्या उस ने तुम्हारी तरफ उंगली कर के कहा था… जरा सोचो?’’

तनिक मुसकरा पड़ी थीं बूआ. मेरा माथा चूम लिया था और मेरे गाल थपक हाथ के टौप्स मेरे कानों में पहना दिए थे.

‘‘बहुत सुंदर लग रहे हैं ये टौप्स तुम्हारे कानों में. मगर भविष्य में ध्यान रहे कि किसी के कहे शब्दों पर पागल होने की जरूरत नहीं है. औरत की संपूर्णता तो उस के चरित्र से, उस के ममतामयी आचरण से होती है.’’

उसी पल मेरे मन से उन हीरों का मोह जाता रहा था. वह भाव कहीं नहीं रहा था कि मेरे पास भी हीरे हैं. अकसर वे नेमतें जिन पर एक आम इनसान इतरा उठता है, बूआ को खुशी का विषय नहीं लगतीं. अकसर बूआ कह देती हैं, ‘‘खुशी कहीं बाहर नहीं होती, खुशी तो यहीं होती है… अपने ही भीतर.

‘‘यही तो सलीब है…और सलीब किसे कहते हैं…अपने दुखों का कारण कभीकभी हम खुद ही होते हैं.’’

सलीब के बारे में खुल कर बूआ से पूछा तो वे समझाने लगीं, ‘‘क्यों अपनी सोच पर हर पल हम सारा संसार लादे रहते हैं…जरा सोचो. अपनी खुशी की खातिर तो हम कुछ भी संजो लें, खरीद लें क्योंकि वे हमारी जरूरतें हैं लेकिन किसी दूसरे को प्रभावित करने के लिए हम अपना सारा बजट ही गड़बड़ कर लें, यह कहां की समझदारी है. एक बहुत बड़ी खुशी पाने के लिए छोटीछोटी सारी खुशियां सूली पर चढ़ा देना क्या उचित लगता है तुम्हें?

‘‘हमें अपनी चादर के अनुसार ही पैर पसारने हैं तो फिर क्यों हमारी खुशी औरों के शब्दों की मुहताज बने.’’

बूआ का चेहरा हर पल दमकता क्यों रहता है? मैं अब समझ पाई थी. बात करने को तो हमारा परिवार कभीकभी बूआ की आलोचना भी करता है. उन का सादगी भरा जीवन आलोचना का विषय होता है. क्यों बूआ ज्यादा तामझाम नहीं करतीं? क्यों फूफाजी और बूआ छोटे से घर में रहते हैं. क्यों गाड़ी नहीं खरीद लेते?

सब से बड़ी बात जो अभीअभी मेरी समझ में आई है, वह यह कि बूआ किसी की मदद करने में या किसी को उपहार देने में कभी कंजूसी नहीं करतीं. पर अपने लिए किसी से सहायता तो नहीं मांगतीं, गाड़ी की जरूरत पड़े तो किराए की गाड़ी उन के दरवाजे पर खड़ी मिलती है, जरूरत पर उन के पास कोई कमी नहीं होती. तो फिर क्यों वे औरों को खुश करने के लिए अपनी सोच बदलें. बूआ के दोनों बच्चे बाहर रहते हैं. साल में कुछ दिनों के लिए वे बूआ के पास आते हैं और कुछ दिन बूआ और फूफाजी उन के पास चले जाते हैं. अपने जीवन को बड़े हलकेफुलके तरीके से जीती हैं बूआ.

एक बार ऐसा हुआ कि बच्चों की छुट्टियां थीं जिस वजह से मैं व्यस्त रही थी. लगभग 10 दिन के बाद फोन किया तो बूआ कुछ उदास सी लगी थीं. उसी शाम मैं उन के घर गई तो पता चला था कि फूफाजी पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. पड़ोसी से नर्सिंगहोम का पता लिया और उसी पड़ोसी से पता चला कि उस को भी कुछ दिनों के बाद ही इस घटना का पता चला था.

‘‘बहुत बहादुर हैं न बूआजी. हमें भी नहीं बुलाया. कम से कम मैं ही आ जाती.’’

रोना आ गया था मुझे. क्या मैं इतनी पराई थी. बचपन से जिस बूआ की गोद में खेली हूं, क्या मुसीबत में मैं उन के काम नहीं आती. क्या मुझ पर इतना सा भी अधिकार नहीं समझतीं बूआ. नाराजगी व्यक्त की थी मैं ने.

‘‘तुम क्या करतीं यहां…गाड़ी बुला ली थी. बाकी सब काम डाक्टर लोगों का था. दवा यहीं पर मिल जाती है. बाहर छोटी सी कैंटीन है, वहां से चाय, कौफी मिल जाती थी. अधिकार समझती हूं तभी तो चाहती हूं तुम अपने बच्चों पर पूरापूरा ध्यान दो. अभी उन के इम्तिहान भी आ गए हैं न.’’

बूआ के इस उत्तर से मेरा रोना बढ़ गया था, ‘‘अपने किस काम के जो वक्त पर काम भी न आएं.’’

फूफाजी मेरी दलीलों पर हंसने लगे थे.

‘‘अरी पगली, काम ही तो नहीं पड़ा न…जिस दिन काम पड़ा तुम ही तो काम आओगी न. तुम्हारा ही तो सहारा है हमें, शुभा. हमारे दोनों बच्चे तो बहुत दूर हैं न बिटिया…हम जानते थे पता चलते ही अपना सारा घर ताक पर रख भागी चली आओगी, इसीलिए तुम्हें नहीं बताया. हलका सा दिल का दौरा ही तो पड़ा था.’’

बूआफूफाजी यों मुसकरा रहे थे मानो कुछ भी नहीं हुआ. मेरा माथा जरा सा तप जाए तो जो बूआ मेरी पीड़ा पर पगला सी जाती हैं वे अपनी पीड़ा पर इतनी चुप हो गईं कि मुझे पता ही न चला. सदा दे कर जिस बूआ को खुशी होती है वही बूआ लेने में पूरापूरा परहेज कर गई थीं. किसी से ज्यादा उम्मीद करना भी दुखी होने का सब से बड़ा कारण है, यह भी बूआ का ही कहना है. किसी आस में जिया जाए, यह भी तो एक सलीब है न जिस पर हम खुद को टांग लेते हैं.

मेरी भाभी भी इसी शहर में हैं, लेकिन उन की आदत में बूआ से मिलना शुमार नहीं होता. उन की अपनी ही दुनिया है जिस में मैं और बूआ कम ही ढल पाते हैं.

‘‘भैया की और हमारी आय लगभग बराबर ही है, उसी आय में भाभी इतनी शानोशौकत कैसे कर लेती हैं जबकि मेरे घर में वह सब नहीं हो पाता. इतना बड़ा घर बना लिया भैया ने और हमारे पास मात्र जमीन का एक टुकड़ा है जिस पर शायद रिटायरमैंट के बाद ही घर बन पाएगा. लगता है हमें ही घर चलाना नहीं आता.’’

एक दिन बूआ से मन की बात कही तो बड़ी गहरी नजर से उन्होंने मुझे देखा था.

‘‘कितना कर्ज है तुम्हारे पति के सिर पर?’’

‘‘एक पैसा भी नहीं. ये कहते हैं कि मुझे सिर पर कर्ज रख कर जीना नहीं आता. रात सोते हैं तो सोने से पहले भी यही सोचते हैं कि किसी का पैसा देना तो नहीं. किसी का 1 रुपया भी देना हो तो इन्हें नींद नहीं आती.’’

‘‘और अपने भाई का हाल भी देख लो. सिर पर 50 लाख का कर्ज है. पत्नी की पूरी सैलरी कर्ज चुकाने में चली जाती है और भाई की दालरोटी और इतने बड़े घर की साजसंभाल में. बच्चों की फीस तक निकालना आजकल उन्हें भारी पड़ रहा है. घर में 3-3 ए.सी. हैं. इन गरमियों में बिजली का बिल 15 हजार रुपए आया था. रात भर तुम्हारा भाई सो नहीं पाता इसी सोच में कि अगर कोई आपातस्थिति आ जाए तो 2 हजार रुपए भी नहीं हाथ में…क्या इसी को तुम शानोशौकत कहती हो जिस में पति की हरेक सांस पर इतना बोझ रहता है और पत्नी समझती ही नहीं.

हीरों के गहने पहने बिना जिस की नाक नहीं बचती, क्या उस औरत को यह समझ में आता है कि उस का पति निरंतर अवसाद में जी रहा है. कल क्या हो जाए, इस का जरा सा भी अंदाजा है तुम्हारी भाभी को?’’

मैं मानो आसमान से नीचे आ गिरी. यह क्या सुना दिया बूआ ने. भैया भी मेरी तरह बूआ के लाड़ले हैं और अवश्य अपना मन कभीकभी खोलते होंगे बूआ के साथ, बूआ ने कभी भैया के घर की बात मुझे नहीं सुनाई थी.

‘‘शुभा, तुम आजाद हवा में सांस लेती हो. किसी का कर्ज नहीं देना तुम्हें. समझ लो तुम संसार की सब से अमीर औरत हो. तुम्हारी जरूरतें इतनी जानलेवा नहीं हैं कि तुम्हारे पति की जान पर बन जाए. ऐसे हीरे औरत के किस काम के कि पति की एकएक सांस शूल बन जाए. तुम्हीं बताओ, क्या तुम भी ऐसा ही जीवन चाहती हो?’’

‘न…’ अस्फुट शब्द कहीं गले में ही खो गए. मैं तो ऐसा जीवन कभी सोच भी नहीं सकती. शायद इसीलिए तब बूआ ने टौप्स लेने पर नाराजगी का इजहार किया था. वे नहीं चाहती थीं कि मैं भी भाभी के पदचिह्नों पर चलूं.

हम हर पल सलीब को सिर पर उठाएउठाए ही क्यों चलते हैं? सलीब उठाते ही क्यों हैं? इसे उतार कर फेंक क्यों नहीं देते?

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Love Crime Story: दिल टूटा तो कैंची उठाई – प्रेम कहानी का खौफनाक अंत

Love Crime Story: जिस ने भी सुना, उस ने मिसरोद का रास्ता पकड़ लिया. कोई सिटी बस से गया तो कोई औटो से. किसी ने टैक्सी ली तो कुछ लोग अपने वाहन से मिसरोज जा पहुंचे. बीती 13 जुलाई की अलसुबह मिसरोद में कोई ऐसी डिस्काउंट सेल नहीं लगी थी, जिस में किसी जहाज के डूब जाने से कपड़ा व्यवसायी या निर्माता को घाटे में आ कर मुफ्त के भाव कपड़े बेचने पड़ रहे हों, बल्कि जो हो रहा था, वह निहायत ही दिलचस्प और अनूठा ड्रामा था, जिसे भोपाल के लोग रूबरू देखने का मौका नहीं चूकना चाहते थे. भोपाल होशंगाबाद रोड पर पड़ने वाला मिसरोद कस्बा अब भोपाल का ही हिस्सा बन गया है. इस इलाके में तेजी से जो रिहायशी कालोनियां विकसित हुई हैं, उन में से एक है फौर्च्यून डिवाइन सिटी.

इस कालोनी में खासे खातेपीते लोग रहते हैं. इन्हीं में से एक हैं बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) से रिटायर हुए एम.पी. श्रीवास्तव. एजीएम जैसे अहम पद से रिटायर्ड एम.पी. श्रीवास्तव ने वक्त रहते फौर्च्यून डिवाइन सिटी में फ्लैट ले लिया था. एम.पी. श्रीवास्तव नौकरी से तो रिटायर हो गए थे, लेकिन जवान हो गई दोनों बेटियां विभा और आभा की शादी की चिंता से मुक्त नहीं हो पाए थे. रिटायरमेंट के बाद उन का अधिकांश समय बेटियों के लिए योग्य वर ढूंढने में गुजर रहा था. साधनसंपन्न घर में सब कुछ था. साथ ही खुशहाल परिवार में 2 होनहार बेटियां और कुशल गृहिणी साबित हुई उन की पत्नी चंद्रा, जिन्हें पति से ज्यादा बेटियों के हाथ पीले होने की चिंता सताती थी.

13 जुलाई को श्रीवास्तवजी के फ्लैट नंबर 503 में जो चहलपहल हुई, उस की उम्मीद श्रीवास्तव दंपति ने सपने में भी नहीं की थी. ऐसी शोहरत जिस से हर शरीफ शहरी बचना चाहता है, कैसी और क्यों थी, पहले उस की वजह जान लेना जरूरी है. इस संभ्रांत संस्कारी कायस्थ परिवार की बड़ी बेटी का नाम विभा है, जिस की उम्र 31 साल है. विभा पढ़ाईलिखाई में तो होशियार है ही, साथ ही उस की पहचान उस के सांवले सौंदर्य की वजह से भी है. एमटेक करने के बाद महत्त्वाकांक्षी विभा ने बजाय नौकरी करने के मुंबई का रास्ता पकड़ लिया था. चाहत थी मौडल बनने की.

विभा महत्त्वाकांक्षी ही नहीं, बल्कि प्रतिभावान भी थी. इसी के चलते करीब 3 साल पहले एक समारोह में कायस्थ समाज ने उसे सम्मानित भी किया था. उसी साल विभा ने एक ब्यूटी कौंटेस्ट में भी हिस्सा लिया था, जिस में वह विजेता रही थी. इस सब से उत्साहित विभा को भी लगने लगा था कि अगर कोशिश की जाए तो उस के लिए सेलिब्रिटी बनना कोई मुश्किल काम नहीं है. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने उसे निराश नहीं किया. उन लोगों ने उसे मुंबई जाने की इजाजत दे दी.

मौडलिंग और फिल्मों में काम करने की सोच लेना तो आसान काम है, लेकिन ग्लैमर की इस दुनिया में अपना मुकाम बनाना हंसीखेल नहीं है. यह बात विभा को मुंबई जा कर समझ आई. लेकिन विभा हिम्मत हारने वालों में से नहीं थी. वह  काम हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष करती रही. बोलचाल की भाषा में कहें तो वह स्ट्रगलर थी.  मुंबई में रोजाना हजारों स्ट्रगलर हाथ में एलबम लिए निर्मातानिर्देशकों और नामी कलाकारों के यहां धक्के खाते हैं. सचमुच दाद देनी होगी ऐसे नवोदित कलाकारों को, जो सुबह उठ कर देर रात तक चलते दौड़ते नहीं थकते. उस वक्त उन के जेहन में उन नामी कलाकारों के संघर्ष की छवि बसी होती है जो कभी उन्हीं की तरह स्ट्रगलर थे.

मीडिया भी ऐसे किस्से खूब बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है. मसलन देखो कल का चाय या फल बेचने वाला या फिर पेशे से कंडक्टर कैसे शोहरत के शिखर पर पहुंच गया और अब अरबों की दौलत का मालिक है. कामयाब होना है तो धक्के तो खाने ही पड़ेंगे, यह बात मुंबई पहुंचने वाला हर स्ट्रगलर जानता है. विभा भी जानती थी. स्ट्रगल के दौरान विभा की मुलाकात रोहित नाम के युवक से हुई जो खुद भी स्ट्रगलर था. मूलत: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का रहने वाला रोहित भी छोटामोटा कलाकार था और किसी बड़े मौके की तलाश में था. विभा और रोहित की जानपहचान पहले दोस्ती में और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई, इस का अहसास दोनों को उस वक्त हुआ, जब रोहित ने विभा पर बेजा हक जमाना शुरू कर दिया.

छोटे शहरों की बनिस्बत मुंबई की दोस्ती और (Love Story) प्यार में फर्क कर पाना बेहद मुश्किल काम है. वजह यह कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई वर्जना नहीं होती. वहां कलाकार की पहचान उस की कामयाबी के पैमाने से होती है, जबकि विभा और रोहित अभी कामयाबी के सब से निचले पायदान पर खड़े थे. कामयाबी की सोचना तो दूर की बात है, अभी उन के कदम जरा भी आगे नहीं बढ़ पाए थे. जमीन पर खड़ेखड़े ही विभा को अहसास हो गया था कि जितना उसे मिलना था, उतना मिल चुका. लिहाजा अब वापस भोपाल लौट जाए और मम्मीपापा जहां कहें, वहां शादी कर ले. वजह यह कि रोहित उस पर शादी के बाबत दबाव बनाने लगा था जो उस से बरदाश्त नहीं हो पा रहा था.

पर वापसी के पहले विभा ने एक आखिरी कोशिश इस सोच के साथ शौर्ट मूवी बना कर की थी कि अगर मूवी चल निकली तो आगे के रास्ते और किस्मत के दरवाजे खुदबखुद खुलते चले जाएंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे जो हुआ वह उस की बनाई रील का रीयल लाइफ में उतर आना था. अपनी बनाई मूवी में विभा ने अपनी पूरी कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और प्रतिभा झोंक दी थी. इस मूवी की प्रोड्यूसर उस की छोटी बहन आभा थी. मूवी के कथानक के आधार पर उस ने उस का नाम फ्रायडे नाइट रखा था. फ्रायडे नाइट की कहानी मसालों से भरपूर थी, जिस की शूटिंग विभा ने अपने ही फ्लैट पर की थी. इस कहानी की मुख्य पात्र भी वही थी, जो एक लड़के से प्यार करने लगती है. लड़का विभा को धोखा दे देता है तो वह तिलमिला उठती है.

इस के पहले वह अपने प्रेमी के सामने रोतीगिड़गिड़ाती है, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता. एक वक्त ऐसा भी आता है, जब विभा की हालत पागलों जैसी हो जाती है और इसी गुस्से में वह एक सख्त फैसला ले लेती है. यह सख्त फैसला होता है अपने बेवफा प्रेमी का कत्ल कर देने का, जिसे वह एक शुक्रवार की रात को अंजाम देती है. विभा को लगा था कि उस की फिल्म बाजार में आते ही हाहाकार मचा देगी और बौलीवुड उसे हाथोंहाथ ले लेगा. अपनी फिल्म को ले कर विभा ने कई चैनलों के चक्कर लगाए, लेकिन उसे किसी ने भाव नहीं दिया. अंतत: उस ने 2 साल पहले इस फिल्म को यूट्यूब पर अपलोड कर दिया. यूट्यूब पर भी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले. फ्रायडे नाइट को देखने वालों की संख्या मुश्किल से 5 अंकों में पहुंच पाई.

13 जुलाई को हजारों लोग विभा के पांचवीं मंजिल स्थित उस फ्लैट की तरफ उत्सुकता से देख रहे थे, जहां कभी फ्रायडे नाइट की शूटिंग हुई थी. इन में कितने ही लोग उस वीडियो को भी देख रहे थे जिसे रोहित ने वायरल किया था. इस वीडियो में रोहित लाल बनियान में नजर आ रहा था और विभा पलंग पर बेहोश पड़ी थी. वीडियो में रोहित गुहार लगाता नजर आ रहा था कि देखो पुलिस और विभा के घर वाले हम बच्चों पर कितना जुल्म ढा रहे हैं. रोहित के मुताबिक वह और विभा दोनों एकदूसरे से प्यार (Love Story) करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन विभा के घर वाले इस के लिए तैयार नहीं थे. आज जब वह विभा से मिलने आया तो उन्होंने पुलिस बुला ली. पुलिस वालों ने दोनों की इतनी पिटाई की कि शरीर के कई हिस्सों से खून बह रहा है. उस ने बहता हुआ खून भी दिखाया.

वीडियो वायरल होने की देर थी कि लोग मुफ्त का तमाशा देखने मिसरोद की तरफ दौड़ पड़े. रोहित का यह कहना गलत नहीं था कि विभा के घर वालों ने पुलिस बुला ली है. पुलिस घटनास्थल पर मौजूद तो थी लेकिन यह सोच कर सकपकाई हुई थी कि इस सिचुएशन से कैसे निपटा जाए. मतलब यह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी विभा की जान भी बच जाए और रोहित को गिरफ्तार भी कर लिया जाए.  दरअसल उस दिन सुबह करीब 7 बजे मिसरोद थाना इंचार्ज एस.के. चौकसे को एम.पी. श्रीवास्तव के फोन पर इत्तला दी थी कि रोहित नाम के एक युवक ने उन के फ्लैट में जबरन घुस कर उन की बड़ी बेटी विभा को फ्लैट के आखिरी कमरे में बंधक बना रखा है. उन्हें यह बात तब पता चली जब वह दूध लेने फ्लैट से बाहर निकले थे.

मामला गंभीर था और संभ्रांत कालोनी से ताल्लुक रखता था, इसलिए 3 सदस्यीय पुलिस टीम जल्द ही फार्च्यून डिवाइन सिटी पहुंच गई. पुलिस दल का नेतृत्व एसआई एस.एस. राजपूत कर रहे थे. उन्होंने सारा मामला समझ कर रोहित को बहलाफुसला कर काबू में करने की कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हुए. सुबहसुबह पुलिस को आया देख कालोनी के लोग विभा के घर के नीचे इकट्ठा हो कर माजरा समझने की कोशिश करने लगे थे. उन्हें इतना ही पता चल पाया कि श्रीवास्तवजी के घर कोई सिरफिरा घुस आया है, जिस ने उन की बड़ी बेटी को बंधक बना लिया है और तरहतरह की धमकियां दे रहा है.

रोहित को इस बात की आशंका थी कि विभा के मातापिता पुलिस को बुलाएंगे इसलिए वह सतर्क था. एम.पी. श्रीवास्तव उन की पत्नी चंद्रा और छोटी बेटी आभा हलकान थीं कि अंदर कमरे में विभा पर रोहित जाने क्याक्या जुल्म ढा रहा होगा. इस डर की वजह रोहित के हाथ में देसी कट्टे का होना था. एसआई राजपूत ने रोहित से बात करने की कोशिश की तो उस ने मोबाइल चार्जर की मांग की. राजपूत से चार्जर लेने के लिए रोहित ने दरवाजा थोड़ा खोला तो उन्होंने हाथ अड़ा कर पूरा दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन रोहित इस स्थिति के लिए तैयार था. उस ने कैंची से राजपूत के हाथ पर हमला कर दिया और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी. चोट से तिलमिलाए एसआई राजपूत ने हाथ वापस खींच लिया तो रोहित ने चार्जर ले कर कमरा फिर से बंद कर लिया.

पुलिस को आया देख विभा की हिम्मत बढ़ी और उस ने रोहित का विरोध किया. इस पर झल्लाए रोहित ने विभा के हाथ और गले पर कैंची से वार कर के उसे घायल कर दिया. खून बहने से विभा बेहोश हो गई तो उस ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और इसी हालत में वीडियो शूट कर वाट्सऐप पर डाल दिया. इस वीडियो के वायरल होते ही भोपाल में हड़कंप मच गया. थोड़ी देर में पुलिस के आला अफसर भी मौके पर पहुंच गए. एसपी (साउथ) राहुल लोढा ने भी रोहित से बातचीत कर के उस की मंशा जाननी चाही. शुरू में तो वह बात करने से कतराता रहा लेकिन खामोश रहने से बात नहीं बन रही थी, इसलिए उस ने जल्द ही अपने दिल की बात जाहिर कर दी कि वह विभा से प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है.

इस दौरान पुलिस ने रोहित के पिता को भी खबर कर दी थी, इसलिए वह अलीगढ़ से भोपाल के लिए निकल गए थे. दरअसल, रोहित की एक शर्त यह भी थी कि वह अपने पिता के आने के बाद ही दरवाजा खोलेगा. यह पुलिस और प्रशासन का इम्तिहान था. वजह अपनी पर उतारू हो आया रोहित विभा को जान से भी मार सकता था. ऐसे में पुलिस वालों ने उस की हर बात मानने में ही भलाई समझी और लगातार उस से बात कर के उसे उलझाए रखा.

रोहित ने दूध मांगा तो वह भी उसे दिया गया, लेकिन वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं था, इसलिए दूध की बोतल छत से रस्सी से लटका कर दी गई. रोहित ने बोतल का दूध लेने से मना कर दिया क्योंकि उसे डर था कि कहीं उस में कोई नशीला या बेहोश कर देने वाला पदार्थ न हो. इस के बाद उस ने हर चीज पैक्ड मांगी जो उसे मुहैया कराई गई. उधर रोहित द्वारा जारी वीडियो में विभा लहूलुहान और बेहोश दिखाई दे रही थी, जिसे देख कर उस के मांबाप और बहन की चिंता बढ़ती जा रही थी. वीडियो में रोहित एसआई एस.एस. राजपूत को भी कोसता नजर आया. दोपहर होतेहोते स्थिति और विकट हो चली थी. रोहित कुछ समझने को तैयार नहीं था और बारबार विभा से शादी करने की रट लगाए जा रहा था. खाना और पानी भी उसे बालकनी से दिया गया था, जो उस की मांग के मुताबिक पैक्ड था.

जब खूब हल्ला मच गया तो शाम के करीब 5 बजे आला पुलिस अधिकारी हाइड्रोलिक मशीन के जरिए 5वीं मंजिल तक पहुंचे और रोहित से बातचीत की. हाइड्रोलिक मशीन पर राहुल लोढ़ा के साथ एसडीएम दिशा नागवंशी और एएसपी रामवीर यादव थे. इन लोगों ने खिड़की से रोहित से बात की और उसे भरोसा दिलाया कि उस की शादी विभा से करवा दी जाएगी, इस में कोई अड़चन इसलिए नहीं है क्योंकि दोनों बालिग हैं और शादी के लिए राजी हैं. राहुल लोढ़ा ने समझदारी से काम लेते हुए रोहित को आश्वस्त किया कि शादी रजिस्टर्ड होगी, क्योंकि एसडीएम भी उन के साथ हैं. चूंकि बंद कमरे में शादी नहीं करवाई जा सकती थी, इसलिए उन्होंने रोहित से बाहर आने के लिए कहा.

रोहित समझ तो रहा था कि यह पुलिस की चाल भी हो सकती है, लेकिन अब तक 12 घंटे गुजर चुके थे और वह थकने लगा था. वह बारबार विभा को धमका रहा था. होश में आ चुकी विभा की समझ में भी आ गया था कि इस सिरफिरे से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि उस की बात मान ली जाए. मेरी नहीं हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा. अगर किसी और से शादी की तो मार डालूंगा, जैसे फिल्मी डायलौग बोलने वाले राहुल को थोड़ी तसल्ली तब हुई, जब विभा ने स्टांप पेपर पर शादी की सहमति दे दी. इधर पुलिस वाले भी कुछ इस तरह से पेश आ रहे थे, मानो बाहर आते ही दोनों की शादी करा देंगे. रोहित को लग रहा था कि वह प्यार की जंग जीत गया है, जमाना उस के सामने झुक गया है.

वह पूरी ठसक से बाहर निकल आया. इस के पहले उस ने कुछ मीडियाकर्मियों से वीडियो कालिंग के जरिए बात की और जीत का निशान अंगरेजी का ‘वी’ अक्षर बनाते हुए खुशी जाहिर की थी.  बाहर आते ही पुलिस ने सिरफिरे आशिक रोहित को गिरफ्तार कर लिया और विभा सहित उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया, क्योंकि दोनों के शरीर से काफी खून बह चुका था. वहां गुस्से में मौजूद महिलाओं ने रोहित की जूतेचप्पलों और लातघूसों से खूब धुनाई की. इलाज के बाद रोहित को हिरासत में ले लिया गया और विभा को घर जाने दिया गया. अस्पताल में विभा ने बताया कि वह रोहित से प्यार नहीं करती, उस ने तो खुद के बचाव के लिए शादी के हलफनामे पर दस्तखत कर दिए थे.

विभा की मां चंद्रा ने खुलासा किया कि एक साल से रोहित विभा के पीछे पड़ा था और उसे तरहतरह से तंग कर रहा था. इसी साल होली के मौके पर 28 मार्च को भी वह उन के घर में घुस आया था, तब भी उस के हाथ में कट्टा था. इस की शिकायत थाने में लिखाई गई थी और पुलिस ने रोहित को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बाद में उसे कोर्ट से जमानत मिल गई थी. इधर मथुरा तक आ गए रोहित के पिता रेशमपाल को जैसे ही ड्रामे के खात्मे की जानकारी मिली, वह वहीं से वापस लौट गए. उन्होंने यह जरूर बताया कि वह रोहित की बेजा हरकतों से आजिज आ चुके हैं. इसीलिए कुछ दिन पहले उन्होंने उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. गांव में प्रधानी के चुनाव के दौरान रोहित द्वारा शराब चुराए जाने की बात भी उन्होंने बताई.

रेशमपाल ने ईमानदारी से यह भी बताया कि रोहित ने कई दफा इस लड़की (विभा) से फोन पर उन की बात कराई थी. यानी लोगों का यह अनुमान गलत नहीं था कि मामला उतना एकतरफा नहीं था, जितना विभा बता रही थी. उस ने भले ही रोहित से प्यार की बात नहीं स्वीकारी, पर यह जरूर कह रही थी कि रोहित का असली चेहरा सामने आने के बाद उस ने उस से दूरियां बनानी शुरू कर दी थीं. जाहिर है माशूका की इसी बेरुखी से रोहित झल्लाया हुआ था. उसे विभा बेवफा नजर आने लगी थी, लेकिन वह उसे दिलोदिमाग से निकाल नहीं पा रहा था. गिरफ्तारी के दूसरे दिन रोहित पुलिस वालों से यह कहता रहा कि उन एसपी साहब को लाओ, जिन्होंने शादी करवाने का वादा किया था.

उस के मुंह से यह सुन कर सभी को उस पर हंसी भी आई और तरस भी. पुलिस वाले इस ड्रामे को थर्सडे नाइट कहते नजर आए, क्योंकि इस की शुरुआत गुरुवार 12 जुलाई से हुई थी.  श्रीवास्तव परिवार अभी सदमे से उबरा नहीं है और न ही लंबे समय तक उबर पाएगा. रोहित ने 12 घंटे जो ड्रामा किया, उस की दहशत उन के सिर चढ़ कर बोल रही है. खुद विभा आशंका जता रही है कि अगर रोहित को जमानत मिली तो वह फिर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा. रोहित के पिता रेशमपाल का भी यही कहना है कि रोहित को जमानत नहीं मिलनी चाहिए. कथा लिखने तक रोहित को जमानत नहीं मिली थी, पर भोपाल के सीनियर वकीलों का कहना है कि कुछ देर से ही सही, उसे जमानत मिल ही जाएगी. इसलिए बदनामी झेल चुके श्रीवास्तव परिवार को संभल कर रहना चाहिए. Love Crime Story

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