Serial Story- एक तवायफ मां नहीं हो सकती: भाग 1

यह उन दिनों की बात है जब मैं पंजाब के एक छोटे से शहर के एक थाने में तैनात था. एक दिन दोपहर लगभग 3 बजे एक अधेड़ उम्र की औरत थाने में आई, उस के साथ 2 आदमी भी थे. उन्होंने बताया कि एक औरत मर गई है, उन्हें शक है कि उस की हत्या की गई है. पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें संदेह इसलिए है कि देखने से ऐसा लग रहा है जैसे उसे जहर दिया गया हो.

मैं ने देखा मर्द बोल रहे थे लेकिन औरत चुप थी. मैं ने पूछा रिपोर्ट किस की ओर से लिखी जाएगी. उन्होंने औरत की ओर इशारा कर दिया. वे दोनों मर्द उस के पड़ोसी थे. औरत का नाम शादो था और मरने वाली का नाम सरदारी बेगम. मैं ने मरने वाली से उस का संबंध पूछा तो उस ने बताया कि मरने वाली उस की सौतन थी. उस के पति का 9 महीने पहले देहांत हो चुका था. सौतनों के झगड़े होना मामूली बात है. मैं ने भी इसी तरह का केस समझ कर रिपोर्ट लिख ली और उनके घर पहुंच गया.

मैं ने लाश को देखा तो लगा कि मृतका को जहर दिया गया है. मैं ने कागजी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और केस की जांच में लग गया. मैं ने देखा कि घर में एक ओर चीनी की प्लेट में थोड़ा सा हलवा रखा हुआ था, उस में से कुछ हलवा खाया भी गया था.

मैं ने अनुमान लगाया कि मृतका को हलवे में जहर मिला कर खिलाया गया होगा. मैं ने उस हलवे को जाब्ते की काररवाई में शामिल कर के उसे मैडिकल टेस्ट के लिए भेज दिया. मैडिकल रिपोर्ट आने पर ही आगे की काररवाई की जा सकती थी.

शादो से मैं ने पूरी जानकारी ली तो पता लगा कि उस के और सरदारी बेगम के पति का नाम मसूद अहमद था. वह छोटामोटा कारोबार करते थे. सरदारी बेगम अपने पति की दूर की रिश्तेदार भी थी, जबकि शादो की उन से कोई रिश्तेदारी नहीं थी. सरदारी बेगम से मसूद के 2 बेटे और एक बेटी थी. जबकि शादो से कोई संतान नहीं थी. तीनों बच्चों की शादी हो चुकी थी. लड़की अपने घर की थी और दोनों लड़के मांबाप से अलग रहते थे. शादो ने कहा कि उन दोनों को उन की मां के मरने की जानकारी दे दी गई है.

शादो से जो जानकारी मिली, वह संक्षेप में लिख रहा हूं. मसूद अहमद का कारोबार ठीकठाक चल रहा था. उन्होंने शादो से चोरीछिपे शादी कर ली थी और उसे एक अलग मकान में रखा हुआ था. इसी बीच मसूद बीमार पड़ गए. उन की हालत दिनबदिन गिरती जा रही थी. तभी एक दिन उन्होंने सरदारी बेगम से कहा कि उन्होंने चोरी से एक और शादी की हुई है.

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यह सुन कर सरदारी बेगम को दुख तो हुआ लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था. मसूद अहमद ने दूसरी पत्नी शादो को बुला कर उस का हाथ सरदारी बेगम के हाथ में दे कर कहा कि मेरा कोई भरोसा नहीं है कि मैं कितने दिन जिऊंगा. मेरे बाद तुम शादो का खयाल रखना, क्योंकि इस के आगेपीछे कोई नहीं है. मैं तुम्हारी खानदानी शराफत की वजह से इस का हाथ तुम्हें दे रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि तुम इस का खयाल रखोगी.

सरदारी बेगम ने मसूद से वादा किया कि वह शादो का पूरा खयाल रखेगी और उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ेगी. इस के कुछ दिन बाद ही मसूद का देहांत हो गया.

सरदारी बेगम ने शादो को अपने पास बुला कर रख लिया और उस से कहा कि वह उसे सौतन की तरह नहीं, बल्कि अपनी सगी बहन की तरह रखेगी. शादो के इस तरह घर में आ कर रहने से सरदारी के दोनों बेटे खुश नहीं थे. न ही उन्होंने उसे अपनी सौतेली मां माना. उस के आने से घर में रोज झगड़े होने लगे. हालात से तंग आ कर सरदारी बेगम शादो के उस मकान में चली गई, जिस में वह रहा करती थी.

दोनों बेटे इस बात से खुश थे, लेकिन दुनियादारी निभाने के लिए मां से कहते थे कि तुम हमारे पास आ जाओ, लेकिन शादो को साथ नहीं लाना. सरदारी ने कहा कि मैं मरते दम तक अपने पति से किया वादा पूरा करूंगी और शादो का साथ नहीं छोड़ सकती.

महीने-2 महीने में सरदारी बेगम अपने बेटों से मिलने चली जाती थी. बड़ा बेटा मां से खुश नहीं था. वह कहता था कि शादो को छोड़ कर यहां आ जाओ, लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं थी.

बड़े बेटे शरीफ ने बहाने बना कर अपने पिता के कारोबार और बैंक में जमा रकम पर कब्जा कर लिया था. इस से उन दोनों को खानेपीने की तंगी होने लगी. सरदारी बेगम पढ़ीलिखी थी, उस ने घर में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया.

शादो ने एक स्कूल की हेडमिस्ट्रैस से मिल कर अपने लिए स्कूल में छोटेमोटे कामों के लिए नौकरी कर ली. इस तरह उन की आय बढ़ गई और खानेपीने का इंतजाम हो गया. शरीफ अपनी मां से बारबार शादो को छोड़ने के लिए कहा करता था लेकिन वह किसी तरह भी तरह तैयार नहीं होती थी. इस से शरीफ अपनी मां से बहुत नाराज था.

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जिस दिन सरदारी बेगम का देहांत हुआ था, उस दिन शादो स्कूल से अपनी ड्यूटी पूरी कर के घर पहुंची तो देखा सरदारी बेगम मर चुकी हैं. वह रोनेचीखने लगी. मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. उन्होंने लाश को देखा तो मृतका का रंग देख कर उन्हें भी लगा कि उसे जहर दिया गया है या उस ने खुद जहर खा लिया है, इसलिए पुलिस में रिपोर्ट करनी जरूरी है. और इस तरह वे 2 आदमी शादो के साथ रिपोर्ट लिखाने थाने आए थे.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में लिखा था कि मृतका की मौत जहर के कारण हुई है. उस के पेट में जो हलवे की मात्रा निकली, वह हजम नहीं हुई थी, उस में जहर मिला हुआ था. शाम तक हलवे के टेस्ट की रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट में लिखा था कि हलवे में संखिया की मात्रा पाई गई है. संखिया को अंगरेजी में आर्सेनिक कहते हैं. यह इंसान के लिए बहुत खतरनाक होता है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मैडिकल टेस्ट से यह बातसाफ हो गई कि सरदारी बेगम को जहर दे कर मारा गया था. मैं ने शादो से पूछा कि क्या उस दिन घर में हलवा बना था? लेकिन उस ने इस बात से इनकार कर दिया.

कोरोना से जंग में जीते हम: कभी न सोचें, हाय यह क्या हो गया!

“11अप्रैल को मेरी बेटी टिया का 15वां जन्मदिन था. पिछले एक हफ्ते से हम उसे सैलिब्रेट करने की सोच रहे थे, क्योंकि टिया का पिछला जन्मदिन भी लौकडाउन की भेंट चढ़ गया था. हालांकि दिल्ली में कोरोना की दूसरी लहर आ चुकी थी, पर शायद स्वार्थी हो कर हम ने आंखें मूंद ली थीं.

“सब ठीकठाक चल रहा था कि 9 अप्रैल की शाम को मुझे हलका बुखार चढ़ गया. बुखार ज्यादा तेज नहीं था, पर मन के किसी कोने में डर ने दस्तक दी कि कहीं जालिम कोरोना तो नहीं है? इस आशंका की वजह यह भी थी कि मुझे आसानी से बुखार या सर्दीजुकाम नहीं होता. पर मेरा सारा ध्यान रविवार को बेटी के जन्मदिन पर ही था. शनिवार तक बुखार 100-101 डिगरी फौरेनहाइट था. रविवार आया, जन्मदिन मनाया गया और सब खुश थे. पर कोरोना का वार होना अभी बाकी था. जैसे कान में कह रहा हो, ‘हा हा हा, कल आऊंगा मैं…’

“सोमवार की सुबह ठीकठाक रही. दोपहर को मेरा चीकू खाने का मन हुआ. खाया भी, पर अचानक बीच में ही मुझे महसूस हुआ कि उस में से खुशबू नहीं आ रही है. बारबार नाक के पास चीकू ले जाऊं और उसे सूंघने की कोशिश करूं, पर कोई गंध न पता चले.

“इस के बाद तो मैं पूरे घर में भटकती रही कि ऐसा क्या करूं कि किसी भी चीज की गंध का पता चल सके. तब तक मेरे मन में यह आ चुका था कि कुछ तो गड़बड़ है दया… फिर मैं ने अपने हाथ पर परफ्यूम छिड़का और उसे सूंघा. नथुनों में कोई हरकत नहीं हुई.

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“इस के बाद मैं अपने कमरे में 10 मिनट के लिए अकेली बैठी, गहरी लंबी सांसें लीं और कहा, ‘आल इज वैल…’

“खैर, अब तो कोरोना टैस्ट कराना था, जो हुआ भी. घर के 4 सदस्यों में से मेरा ही पौजिटिव नतीजा आया. मेरी रिपोर्ट देखते ही मेरे पति योगेश के चेहरे पर एक अजीब सी मुसकान आई, जैसे वे पूछना चाहते हों कि तुम कैसे लपेटे में आ गई, पर वे बोले, “घबराओ नहीं. आज के हालात में कुछ भी हो सकता है. लेकिन तुम चिंता मत करो मैं सब संभाल लूंगा.

“इसी बीच अच्छा यह हुआ था कि मैं खुद को आइसोलेट कर चुकी थी. फिर मैं ने ठंडे दिमाग से सोचा कि अब शायद मुझे अपने लिए समय मिला है. बस, आराम करो बिना किसी चिंता के. फिर मैं ने मन बनाया कि फोन पर किसी से ज्यादा बात नहीं करूंगी, क्योंकि एक तो सब मेरी सेहत को ले कर चिंता करेंगे और दूसरे फोन पर सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक मैसेज ज्यादा फौरवर्ड हो रहे हैं. लोग कैसे मर रहे हैं, यह तो सब दिखा रहे हैं, पर जो लोग कोरोना से जंग जीत चुके हैं, उन के बारे में ज्यादा बात नहीं हो रही है. उस समय मेरा फोकस खुद पर था बस.

“जहां तक मेरी दिनचर्या की बात है तो वह सामान्य ही थी. लेकिन मैं इस बात का खास खयाल रखती थी कि कोरोना का कोई नया लक्षण तो मेरे अंदर नहीं आया है न. चूंकि एक अकेले कमरे में खुद को अलग रखना था तो उस अकेलपन को दूर करने का विचार किया. इस बीच मैं ने अपनी बेटी की 10वीं की हिंदी और सामाजिक विज्ञान की किताबें पढ़ डालीं.

“अपने अनुभव से बताना चाहूंगी कि ऐसे अकेलेपन में टैलीविजन पर खबरें न देखें, क्योंकि मुझे याद है कि कोरोना के 8वें दिन जब मुझे रात को नींद नहीं आ रही थी, मैं खबरें देखने लगी. साथ ही मुझे यह भी पता चला कि हमारा कोई रिश्तेदार अस्पताल में भरती हो गया है. टैलीविजन पर जिस तरह से कोरोना की खबरें दिखाई जा रही हैं, उन से कोरोना मरीज अपना आत्मविश्वास खो सकते हैं. मेरे साथ उस रात वैसा ही कुछ हुआ. सारी रात नींद नहीं आई.

“दिन बीतते गए. धीरेधीरे मेरी सूंघने की ताकत वापस आ गई और आज मैं ने सेहतमंद हूं. पर इस बीमारी से मुझे एक सीख मिली है कि भले ही यह पूरी दुनिया के लिए एक बुरा समय है, पर अगर आप और आप के घर वाले हौसला नहीं खोते हैं, अपना स्नेह आप को देते हैं, डाक्टर जो कहता है या दवा देता है, उस का पालन करते हुए सेवन करते हैं, तो इस बीमारी से पार पा सकते हैं.

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“मैं आज भी जब उन दिनों को याद करती हूं तो सामने आते हैं मेरे बच्चे जो सुबह होते ही ‘गुड मौर्निंग मम्मा’ कहते थे या मेरे पति योगेश का मेरे लिए चाय बनाना आंखों के सामने आ जाता है. इस से मुझे बड़ी ताकत मिली थी. ये छोटीछोटी बातें भावना के स्तर पर बड़ा काम कर जाती हैं और मरीज का अकेलापन दूर कर देती हैं.

“आखिर में इतना ही कहूंगी कि परेशानियां तो जिंदगी में आती रहेंगी, उन का सामना पूरे हौसले से करें. जीत मिल ही जाएगी.”

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‘कुमकुम’ फेम अनुज सक्सेना को रुपयों की धोखाधड़ी के मामले में किया गया गिरफ्तार

टीवी के फेमस एक्टर अनुज सक्सेना को 141 करोड़ रुपयों की धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है. दरअसल मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने धोखाधड़ी के आरोप में गुरुवार को गिरफ्तार कर लिया है. बता दें कि अनुज सक्सेना के ऊपर कई मामले दर्ज किए गए हैं.

खबर ये आ रही है कि अनुज सक्सेना ने कोर्ट से अपील करते हुए उन्होंने जमानत दिए जाने की मांग की है. दरअसल अनुज ने कहा है कि उनकी कंपनी किट्स और सैनिटाइजर बनाती हैं और कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए उन्हें जमानत दे दी जाए.

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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुज सक्सेना पर चीटिंग, आपराधिक साजिश सहित का आरोपों में मामला दर्ज किया गया है. निवेशकों का दावा है कि अनुज ने उन्हें बेहतर रिटर्न का वादा साल 2012 में निवेश कराया था. यह पैसा उन्हें 2015 में लौटाना था मगर कंपनी ने निवेशकों को न तो कोई जवाब ही नहीं दिया और न ही पैसा.

वर्कफ्रंट की बात करे तो अनुज सक्सेना ने कुमकुम-एक प्यारा सा बंधन, कोरा कागज, कुसुम, , कुछ पल साथ तुम्हारा, सारा आकाश, रिश्तों की डोर जैसे कई हिट टीवी सीरियलों में काम किया है.

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‘ज्योति’ एक्ट्रेस Sneha Wagh के पिता का हुआ निधन, शेयर किया इमोशनल पोस्ट

कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने देश को तबाह कर दिया है. हर रोज लोग इस बीमारी से अपनी जान गंवा रहे हैं.  कोरोना वायरस का कहर टीवी इंडस्ट्री पर भी टूट पड़ा है. अब खबर ये आ रही है कि सीरियल ‘ज्योति’  एक्ट्रेस  स्नेहा वाघ के पिता का इस वायरस के कारण निधन हो गया है.

बताया जा रहा है कि स्नेहा वाघ के पिता को निमोनिया हो गया था. और उनका कोराना रिपोर्ट भी पॉजिटिव पाया गया था. इस वायरस की वजह से स्नेहा वाघ के पिता हालत बिगड़ गई और उनको बचाया नहीं जा सका.

 

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स्नेहा वाघ अपने पिता की निधन से बुरी तरह टूट गई हैं. और उन्होंने एक इमोशनल पोस्ट सोशल मीडिया पर शेयेर किया है. एक्ट्रेस ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि ‘एक महीने तक निमोनिया और कोरोना से लड़ाई लड़ने के बाद मैंने अपने पिता को खो दिया.

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उन्होेंने आगे  लिखा कि मेरा दिल हजारों टुकड़ों में टूट कर बिखर गया है. मेरी जिंदगी का सबसे मजबूत स्तम्भ मेरे साथ नहीं है. मुझे आज से पहले इतना ज्यादा दर्द कभी नहीं हुआ. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी जिंदगी किस हालत से गुजर रही है. अपने परिवार को खोने का गम हर चीज से बढ़कर है.

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स्नेहा वाघ ने दूसरी पोस्ट सोशल मीडिया पर शेयर की. इस पोस्ट में उन्होंने लिखा कि  मेरे प्यारे पापा, आप अपनी बातों से लोगों को हंसाया करते थे, आपकी वजह से हमारा दिन अच्छा जाता था. आप एक अच्छे दिल के इंसान थे. आपने हमेशा मुझे ईमानदारी सिखाई, आप चाहते थे कि मैं एक बेहतर इंसान बनूं.

उन्होंने आगे लिखा कि  ये सोच कर मेरा दिल रो रहा है कि अब आप हमारे बीच नहीं है. आपके जाने के बाद हमारी जिंदगी में खालीपन हो गया है.

Serial Story: काले घोड़े की नाल- भाग 2

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

‘तो क्या मुखियाजी ने अपने भाइयों को इसलिए पालापोसा है, ताकि वे हमारे पतियों को हम से दूर कर के हमें भोग सकें… पर, मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे पति ही अपने बड़े भाई के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते हैं…’ ऐसा सोच कर सीमा को नींद न आ सकी.

रानी के कमरे से सीमा को कुछ आवाज आती महसूस हुई, तो आधी रात को वह उठी और नई बहू रानी के कमरे के बाहर जा कर दरवाजे की ?िर्री में आंख गड़ा दी.

अंदर रानी बेसुध हो कर सो रही थी, जबकि मुखियाजी उस के बिस्तर के पास खड़े हो कर रानी के बदन को किसी भूखे भेडि़ए की तरह घूरे जा रहे थे.

अभी मुखियाजी रानी के सीने की तरफ अपना हाथ बढ़ाने ही जा रहे थे कि उन की हरकत देख कर सीमा को गुस्सा आया और उस ने पास में रखे बरतन नीचे गिरा दिए, जिस की आवाज से  रानी जाग गई और चौंकते हुए पूछ बैठी, ‘‘मुखियाजी आप यहां… इस समय…’’

‘‘हां… बस जरा देखने चला आया था कि तु?ो कोई परेशानी तो नहीं  है,’’ इतना कह कर मुखियाजी बाहर निकल गए.

रानी भी मुखियाजी की नजर और उन के इरादों को अच्छी तरह सम?ा गई थी, पर उस ने अनजान बने रहना ही उचित सम?ा.

‘‘कल तो आप रानी के कमरे में ही रहे… हमें अच्छा नहीं लगा,’’ सीमा ने शिकायती लहजे में कहा, तो मुखियाजी ने बात बनाते हुए कहा, ‘‘दरअसल,

अभी वह नई है… विनय शहर गया है,  तो रातबिरात उस का ध्यान तो रखना  ही है न.’’

एक शाम को मुखियाजी सीधा रानी के कमरे में घुसते चले गए. रानी उन्हें देख कर सिर से पल्ला करने लगी, तो मुखियाजी ने उस के सिर से साड़ी का पल्ला हटाते हुए कहा, ‘‘अरे, हम से शरमाने की जरूरत नहीं है… अब विनय यहां नहीं है, तो उस की जगह हम ही तुम्हारा ध्यान रखेंगे…

‘‘यकीन न हो, तो अपने पिता से पूछ लेना. वे तुम से हमारी हर बात का  पालन करने को ही कहेंगे,’’ मुखियाजी ने रानी की पीठ को सहला दिया था.

मुखियाजी की इस बात पर रानी के पिताजी ने ये कह कर मोहर लगा दी थी, ‘‘बेटी, तुम मुखियाजी की हर बात मानना. उन्हें किसी भी चीज के लिए मना मत करना.’’

एक अजीब संकट में थी रानी. नई बहू रानी ने आज खाना बनाया था. पूरे घर के लोग जब खाना खा चुके, तो घर के नौकरों की बारी आई. घोड़ों की रखवाली करने वाला चंद्रिका भी खाना खाने आया. उस की और रानी की नजरें कई बार टकराईं. हर बार चंद्रिका नजर नीचे ?ाका लेता.

खाना खा चुकने के बाद चंद्रिका सीधा रानी के सामने पहुंचा और बोला, ‘‘बहुत अच्छा खाना बनाया है आप ने… हम कोई उपहार तो दे नहीं सकते, पर यह हमारे काले घोड़े की नाल है… इसे आप घर के दरवाजे पर लगा दीजिए. यह बुरे वक्त और भूतप्रेत से आप की हिफाजत करेगी.’’

‘‘अरे, यह सब भूतप्रेत, घोड़े की नाल वगैरह कोरा अंधविश्वास होता है… मेरा इन पर भरोसा नहीं है,’’ रानी ने कहा, पर उस ने देखा कि उस के ऐसा कहने से चंद्रिका का मुंह उतर गया है.

‘‘अच्छा… यह तो बताओ कि तुम मु?ो घुड़सवारी कब सिखाओगे?’’  रानी ने कहा, तो चंद्रिका बोला, ‘‘जब आप कहें.’’

‘‘ठीक है, 1-2 दिन में मैं अस्तबल आती हूं.’’

घर की छत से अकसर रानी ने चंद्रिका को घोड़ों की मालिश करते देखा था. 6 फुट लंबा शरीर था चंद्रिका का. जब वह अपने कसरती बदन से घोड़ों की मालिश करता, तो वह एकदम अपने काम में तल्लीन हो जाता, मानो पूरी दुनिया में बस यही काम रह गया हो.

2 दिन बाद रानी मुखियाजी के साथ अस्तबल पहुंची. चंद्रिका ने काला घोड़ा एकदम तैयार कर रखा था. मुखियाजी वहीं खड़े हो कर रानी को घोड़े पर सवार हो कर घूमते जाते देख रहे थे. चंद्रिका पैदल ही घोड़े की लगाम थामे हौलहौले चल रहा था.

‘‘तुम ने सवारी के लिए वह सफेद घोड़ी धन्नो क्यों नहीं चुनी?’’

‘‘जी, क्योंकि धन्नो इस समय उम्मीद से है न… ऐसे में हम घोड़ी पर सवार नहीं होते,’’ रानी को चंद्रिका का जवाब दिलचस्प लगा.

‘‘अच्छा… तो वह धन्नो मां बनने वाली है, तो फिर उस के बच्चे का बाप कौन है?’’

‘‘यही तो है… बादल, जिस पर आप बैठी हुई हैं. बहुत प्यार करता है यह अपनी धन्नो से,’’ चंद्रिका ने उत्तर दिया.

‘‘प्यार…?’’ रानी ने एक लंबी सांस छोड़ी थी.

‘‘इस घोड़े को जरा तेज दौड़ाओ… जैसा फिल्मों में दिखाते हैं.’’

‘‘जी, उस के लिए हमें आप के  पीछे बैठना पड़ेगा,’’ चंद्रिका ने शरमाते हुए कहा.

‘‘तो क्या हुआ… आओ, बैठो मेरे पीछे.’’

चंद्रिका शरमाते?ि?ाकते रानी के पीछे बैठ गया और बादल को दौड़ाने के लिए ऐड़ लगाई. बादल सरपट भागने लगा. घोड़े की लगाम चंद्रिका के मजबूत हाथों में थी. चंद्रिका और रानी के जिस्म एकदूसरे से रगड़ खा रहे थे.

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रानी और चंद्रिका दोनों ही रोमांचित हो रहे थे. एक अनकहा, अनदेखा, अनोखा सा कुछ था, जो दोनों के बीच में पनपता जा रहा था.

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‘‘आप के पास उस का जो पता था, वह गलत था. शहर की एक  झोंपड़पट्टी का उस ने जो पता दिया था, वह फर्जी निकला. वह कहीं और रहती थी.

‘‘अब यह बिलकुल आईने की तरफ साफ हो चुका है कि इस अपहरण में उस का ही हाथ है, तभी तो आप के जेवरात और बैंक खाते के बारे में बदमाशों को गहरी जानकारी थी.’’

पुलिस अब अगली कार्यवाही में जुट गई थी. उस ने अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया था.

मिनट घंटों में और घंटे दिन में बदल रहे थे. पुलिस भी पास के जिलों के जंगलपहाड़ों तक में खाक छान रही थी. 2 दिन बीत चुके थे और अभी तक गुडि़या का कोई सुराग, कोई अतापता नहीं था.

शाम के समय वनिता के पास फिर से बदमाशों का फोन आया. वह उलटे उन्हें ही डांटने लगी, ‘‘मैं रुपए ले कर बैठी हूं और तुम यहांवहां घूम रहे हो. मैं शाम को शहर के बौर्डर पर बागडि़या टैक्सटाइल फैक्टरी के पास बने आउट हाउस में अटैची ले कर अपनी एक सहेली के साथ रहूंगी.

‘‘और हां, तुम भी पुलिस को कुछ न बताना और मेरी बेटी को छोड़ कर रुपए ले जाना.’’

‘अरे, पुलिस को कुछ न बताने की बात तो मेरी थी.’

‘‘और, मु झे भी अपनी इज्जत प्यारी है, इसलिए कह रही हूं.’’

शहर के उस एरिया में एक पुराना इंडस्ट्रियल ऐस्टेट था जिस में पुरानी खंडहर उजाड़ फैक्टिरियां थीं. वनिता ने अपनी गाड़ी निकाली और सुमन के साथ अटैची ले कर बैठ गई.

कई एकड़ में फैली उस फैक्टरी में कोई आताजाता नहीं था. उस के ठीक नीचे नाला बह रहा था. वे दोनों वहीं एक दीवार की ओट में बैठ गईं, जहां से चारों तरफ का मंजर दिखता था.

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अचानक उस उजाड़ फैक्टरी की एक बिल्डिंग के अंदर से 2 आदमी बाहर निकले. उन के पीछे नौकरानी भुंगी भी गुडि़या को लिए दिखाई दी.

उन दोनों में से एक के हाथ में पिस्तौल थी. वह पिस्तौल को जेब में रखते हुए बोला, ‘‘अब इस की कोई जरूरत नहीं है,’’ वह अटैची लेने के लिए आगे बढ़ा.

अचानक बिजली की तेजी से वनिता ने उसे अटैची देते वक्त जोरों का धक्का दिया तो वह आदमी अटैची को लिए हुए ही नाले में जा गिरा.

उसे गिरता देख कर दूसरा आदमी एकदम से भाग खड़ा हुआ. सुमन दौड़ कर गुडि़या की ओर लपकी, तो भुंगी उसे छोड़ कर भाग निकली.

वनिता और सुमन ने जल्दी गुडि़या के बंधन खोले. गुडि़या उन से चिपट कर रोने लगी.

‘‘आप ने तो कमाल कर दिया वनिताजी…’’ पुलिस इंस्पैक्टर अजमल उस की तारीफ करने लगा था, ‘‘हमें मालूम पड़ा कि आप इधर आ रही हैं, तो हम ने भी आप का पीछा किया और यहां तक आ पहुंचे.’’

थोड़ी देर में उस घायल मुजरिम के साथ पुलिस आती दिखी जो नाले में जा गिरा था. एक पुलिस वाले के हाथ में अटैची भी थी.

पुलिस इंस्पैक्टर अजमल ने अटैची खोली तो उसे हंसी आ गई. अटैची में पुरानी किताबें, पत्रिकाएं और अखबार भरे थे. उस भारी अटैची को समेट न पाने के चलते ही वह आदमी वनिता के एक धक्के से नाले में लुढ़क गया था.

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‘‘आप के इस साहस से न सिर्फ आप को अपनी बेटी मिली है, बल्कि हमें भी एक खतरनाक मुजरिम मिला है. अब इस के जरीए सारे मुजरिम हवालात में होंगे. मैं आप के इस साहस की तारीफ करता हूं. फिलहाल तो आप अपनी बेटी को ले कर घर जाइए, बाकी औपचारिकताएं बाद में होंगी.’’

‘‘अरे भाई, वनिता के साहस के कायल हम भी हैं…’’ करीम भाई बोला, ‘‘तभी तो औफिस की खास फाइलें इन्हीं के पास आती हैं.’’

‘‘वनिता एक मां भी हैं करीमजी. और एक मां अपनी औलाद के लिए शेर को भी माल दे सकती है…’’ सुमन बोल पड़ी, ‘‘वनिता, अब घर चलो. गुडि़या को सामान्य करते हुए तुम्हें खुद भी सामान्य होना है. आगे का काम पुलिस पूरा कर लेगी.’’

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Crime Story- दुश्मनी भी शिद्दत से निभाई: भाग- 2

पूजा और विजेत के प्यार पर जब पहरा लगा तो दोनों बैचेन हो उठे. कभीकभार मोबाइल पर छिपछिप कर बातचीत कर के वह अपने मन की तसल्ली कर लेते. उन्हें एकदूजे के बगैर रहना नागवार लगने लगा तो आखिरकार काफी सोचविचार करने के बाद दोनों ने निर्णय कर लिया कि प्रेम के पंछी किसी पिंजरे में कैद हो कर ज्यादा दिन नहीं रहेंगे.

दिसंबर, 2020 में सर्दियों की एक रात विजेत अपनी प्रेमिका पूजा को घर से भगा ले गया. दूसरे दिन सुबह देर तक जब पूजा अपने कमरे से बाहर नहीं निकली तो उस की मां ने अंदर जा कर देखा, पूजा अपने बिस्तर पर नहीं थी.

पूरे दिन पूजा का भाई धीरज और उस के पिता उस की तलाश करते रहे. जब उन्हें पूजा की कोई खोजखबर नहीं मिली तो थकहार कर उन्होंने तिलवारा थाने में पूजा के गायब होने की रिपोर्ट करा दी.

पुलिस रिपोर्ट में घर वालों ने यह अंदेशा भी व्यक्त किया कि विजेत पूजा को बहलाफुसला कर ले गया है. पूजा के विजेत के साथ भागने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल गई तो उस के परिवार की बदनामी होने लगी.

मोहल्ले के लोग चटखारे ले कर पूजा और विजेत के प्रेम प्रसंग की चर्चा करने लगे. सब से ज्यादा जिल्लत का सामना पूजा के भाई धीरज को करना पड़ा. बदनामी के डर से उस का घर से निकलना दूभर हो गया.

उधर घर से भाग कर विजेत और पूजा ने जबलपुर के मातेश्वरी मंदिर में जा कर शादी कर ली. विजेत ने जीवन भर पूजा का साथ निभाने का वादा किया. इस के बाद दोनों हनीमून के लिए दिल्ली चले गए.

कुछ दिनों तक दिल्ली और आसपास के इलाकों में मौजमस्ती करने के बाद जबलपुर आ कर विजेत पूजा के साथ गढा के गंगानगर में अपने चाचा के मकान में रहने लगा. कुछ दिन प्यारमोहब्बत का नशा दोनों पर छाया रहा. लेकिन समय गुजरते उन के सामने आर्थिक तंगी के डैने फैल गए.

इस बीच 27 फरवरी, 2021 को पुलिस ने एक दिन विजेत और पूजा को खोज निकाला. तब थाने में घर वालों के सामने पूजा ने लिखित बयान दे कर साफ कह दिया कि उस ने अपनी मरजी से विजेत से शादी की है और वह उसी के साथ रहना चाहती है. पूजा के घर वाले उसे उस के हाल पर छोड़ कर घर वापस आ गए.

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शादी के पहले विजेत ने पूजा को जो सब्जबाग दिखाए थे, वे धीरेधीरे झूठ साबित होने लगे. विजेत के संग 3 महीने में ही पूजा जान चुकी थी कि विजेत रंगीनमिजाज युवक है. उसे यह भी पता चला कि इसी रंगीनमिजाजी की वजह से उस के खिलाफ 2018 में उस के खिलाफ थाने में एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ में पोक्सो ऐक्ट का मामला दर्ज हुआ था.

इस बात को ले कर दोनों के बीच मनमुटाव भी बढ़ने लगा. दोनों के बीच होने वाले झगड़े में नौबत मारपीट तक आ चुकी थी. पूजा के अरमानों का गला घोंटा जा रहा था. जब विजेत आए दिन पूजा के साथ मारपीट करने लगा तो परेशान हो कर 7 मार्च, 2021 को पूजा ने फोन कर के अपने भाई को बुला लिया.

धीरज पहले ही विजेत से खार खाए हुआ था, ऊपर से वह उस की बहन से मारपीट करने लगा तो गुस्से में आगबबूला हो कर वह पूजा को अपने घर शंकराघाट ले आया.

पूजा के मायके आने के बाद विजेत बेचैन रहने लगा. अपने किए पर वह शर्मिंदा था, मगर धीरज के डर से वह उस के घर जा कर पूजा से नहीं मिल पा रहा था. पूजा से मिलने के लिए वह धीरज के घर के आसपास ही चक्कर लगाता रहता था.

11 मार्च, 2021 की सुबह धीरज तिलवारा की ओर जा रहा था. इस दौरान उस ने देखा कि उस का जीजा विजेत उस के घर की ओर जा रहा है. उसे शक हुआ कि विजेत उस के घर जा कर पूजा को फिर से अपने साथ ले जा सकता है. इसलिए वह घर वापस आ गया और छत पर बैठ कर निगरानी करने लगा. इसी दौरान उस ने देखा कि विजेत उस के घर के पीछे की झाडि़यों में खड़ा है. विजेत को वहां देख कर धीरज को गुस्सा आ गया.

उस ने घर से धारदार हंसिया उठाया और विजेत के पीछे दौड़ा. धीरज को देख कर विजेत भागने लगा. विजेत बमुश्किल 500 मीटर ही भाग पाया होगा कि खेतों के बीच मेड़ पर बेरी की झाड़ी के पास गिर गया.

विजेत के जमीन पर गिरते ही धीरज ने उस पर हंसिया से ताबड़तोड़ 15-16 वार कर दिए. कुछ देर तक विजेत छटपटाता रहा. धीरज के सिर पर खून सवार था. उस ने हंसिया से विजेत कश्यप की गरदन धड़ से अलग कर दी.

इतने पर भी जब उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उस ने विजेत के हाथ का एक पंजा काट दिया. दूसरे पंजे को भी उस ने काटने का प्रयास किया, मगर कामयाब नहीं हुआ. इस के बाद विजेत के कटे सिर को ले कर वह अपने घर आया.

घर के एक कोने में कटे सिर को रखते हुए वह घर के अंदर दाखिल हुआ. उस ने अपनी बहन पूजा के पैर छूते हुए हुए कहा, ‘‘बहन मुझे माफ कर देना, विजेत तुझे भगा कर ले गया था, उस अपमान को तो मैं बरदाश्त कर गया. मगर कोई मेरी लाडली बहन के साथ मारपीट करे, यह बरदाश्त नहीं कर सकता. आज मैं ने उस का खेल खत्म कर दिया है.’’पूजा धीरज की बातें सुन कर अवाक रह गई. जैसे ही उस की नजर बाहर की तरफ कोने में रखे कटे सिर पर पड़ी तो उस के मुंह से चीख निकल गई.

करीब जा कर उस ने अपने पति विजेत का कटा हुआ सिर देखा तो जमीन पर सिर पटकने लगी और पल भर में बेहोश हो गई. धीरज ने विजेत के कटे सिर व हंसिया को बोरीनुमा एक थैले में रख लिया और बाइक स्टार्ट कर 7 किलोमीटर दूर तिलवारा थाने पहुंच गया.

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11 मार्च, 2021 को महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जा रहा था. त्यौहार के मद्देनजर तिलवारा थाने के टीआई सतीश पटेल और ज्यादातर स्टाफ मंदिरों के आसपास सुरक्षा के लिए तैनात थे.

दोपहर के समय अचानक एक बाइक सवार युवक हाथ में एक थैला लिए थाने में दाखिल हुआ तो थाने में मौजूद एक पुलिसकर्मी की नजर उस पर पड़ी.

बाइक पर आए युवक के कपड़े खून से सने हुए थे. पुलिसकर्मी ने उसे दूर से देखते ही पूछा, ‘‘कौन हो तुम? यहां किसलिए आए हो?’’

उस युवक ने अपने साथ लाए थैले को जमीन पर रखते हुए कहा, ‘‘साब, मेरा नाम धीरज शुक्ला है. बर्मन मोहल्ले का विजेत कश्यप मेरी बहन को भगा कर ले गया था. आज मैं ने उस का मर्डर कर दिया है. मुझे गिरफ्तार कर लीजिए. इस थैले में उस का सिर और हाथ का पंजा काट कर लाया हूं.’’

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युवक की बात सुन कर थाने में मौजूद पुलिसकर्मी सकते में आ गए. उन्होंने देखा कि थैले में से खून की बूंदें टपक रही थीं. धीरज के हाथ से थैला लेते हुए जब पुलिसकर्मी ने देखा तो वह सकपका गया. तत्काल घटना की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी गई. टीआई सतीश पटेल को जैसे ही मामले की खबर मिली, वह तत्काल थाने आ गए.

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Crime Story- दुश्मनी भी शिद्दत से निभाई: भाग- 1

मध्य प्रदेश की संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर शहर से लगा हुआ एक देहाती इलाका है तिलवारा. नर्मदा नदी की गोद में बसे तिलवारा के बर्मन मोहल्ले में सुरेंद्र कश्यप का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां व एक बेटा विजेत था. 38 साल का विजेत पढ़ाईलिखाई पूरी करने के बाद कोई कामधंधा करने के बजाय फालतू इधरउधर घूमता रहता था.

इस बात को ले कर उस के पिता उसे समझाते रहते कि कुछ कामधंधा देख ले, इधरउधर आवारागर्दी करता रहता है. मगर विजेत पर पिता की नसीहतों का कोई असर नहीं पड़ता था. वह दिन भर दोस्तों के साथ मटरगश्ती करता और देर रात घर लौटता था.

करीब 3 साल पहले की बात है, बेरोजगारी के दिन काट रहे विजेत की मुलाकात एक दिन धीरज शुक्ला उर्फ मिंटू से हुई. रामनगर इलाके के शंकरघाट में रहने वाले धीरज के पिता शिवराम शुक्ला का नाम शराब के अवैध कारोबार से जुड़ा हुआ है. पिता के इस गोरखधंधे में धीरज भी बराबर का साथ दे रहा था.

शिवराम के परिवार में उस की पत्नी, 35 साल का बड़ा बेटा धीरज उर्फ मिंटू, 30 साल का छोटा लड़का लवकेश और 19 साल की बेटी पूजा थी.

विजेत और धीरज के रहवासी इलाकों में कोई खास फासला नहीं था. इस वजह से उन की मुलाकात आए दिन होती रहती थी. विजेत धीरज की लाइफस्टाइल देख कर काफी प्रभावित था. जब विजेत और धीरज में पक्की दोस्ती हो गई तो धीरज ने विजेत को भी अवैध शराब बेचने के धंधे में शामिल कर लिया.

धीरज ने जब विजेत को बताया कि इस कारोबार में खूब पैसा है तो विजेत धीरज के साथ मिल कर जबलपुर के कई इलाकों में शराब की सप्लाई करने लगा. इस से विजेत को रोजगार के साथ अच्छीखासी कमाई होने लगी.

विजेत के पास पैसा आते ही उस का रहनसहन भी बदल गया. विजेत और धीरज का एकदूसरे के घर आनाजाना शुरू हो गया. धीरज के घर वाले भी विजेत से इस तरह घुलमिल गए थे कि धीरज के घर पर न होने पर भी वह उन से घंटों बैठ कर बातचीत करता रहता था.

एक दिन सुबह विजेत धीरज से मिलने उस के घर पहुंच गया. जैसे ही उस ने दरवाजे पर दस्तक दी तो धीरज की बहन पूजा ने दरवाजा खोला. खूबसूरत पूजा शुक्ला को सामने देख कर विजेत देखता ही रह गया. उस समय पूजा की उम्र 16 साल थी. उस की खूबसूरती ने विजेत को पहली नजर में ही उस का दीवाना बना दिया.

पूजा ने अपनी मधुर मुसकान के साथ विजेत से कहा, ‘‘आइए, आप बैठिए. भैया अभी नहा रहे हैं.’’

पूजा की मुसकान ने विजेत पर जैसे जादू सा कर दिया. वह मुसकराता हुआ पूजा के पीछेपीछे कमरे में आ कर सोफे पर बैठ गया. इसी दौरान पूजा उस के लिए चाय बना कर ले आई.

विजेत की नजरें अब पूजा पर ही जमी थीं. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस मोहपाश में बंधा जा रहा है. चाय की चुस्की लेते हुए उस ने पूजा की तरफ जी भर देखा और बोला, ‘‘तुम्हारे हाथों की बनी चाय में जादू है.’’

अपनी तारीफ सुन पूजा ने शरमाते हुए कहा ‘‘ऐसा क्या जादू कर दिया मैं ने?’’

‘‘तुम्हारी खूबसूरती की तरह चाय भी बहुत टेस्टी है,’’ विजेत बोला.

विजेत से अपनी तारीफ सुन पूजा उस से कुछ बोल पाती, इस के पहले ही धीरज बाथरूम से निकल कर कमरे में आ गया. धीरज को आता देख पूजा वहां से चली गई.

उस दिन के बाद से विजेत पूजा का आशिक बन गया. अब वह अकसर धीरज से मिलने के बहाने पूजा के घर आने लगा. पूजा का इस नाजुक उम्र में किसी लड़के के प्रति झुकाव स्वाभाविक था.

विजेत दिखने में हैंडसम था. उस के पहनावे, स्टाइलिश लुक से पूजा भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी. जब भी विजेत घर आता तो पूजा चायपानी के बहाने उस के आगेपीछे घूमने लगती.

पूजा का भाई धीरज इस बात से अंजान था कि उस का दोस्त दोस्ती में विश्वासघात कर के उस की बहन पर बुरी नजर रख रहा है.

विजेत को जब भी मौका मिलता, धीरज की गैरमौजूदगी में पूजा से मिलने पहुंच जाता. पूजा के मम्मीपापा धीरज का दोस्त होने के नाते उसे भी अपने बेटे की तरह समझते थे.

उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि धीरज से भी उम्र में बड़ा उस का दोस्त उन की मासूम बेटी को प्यार के जाल में फंसा रहा है.

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पूजा और विजेत का प्यार आंखों ही आंखों में परवान चढ़ रहा था. सितंबर, 2019 की बात है. पूजा के मम्मीपापा और छोटा भाई लवकेश किसी काम से अपने रिश्तेदार के यहां गए हुए थे.

विजेत को पता था कि पूजा का भाई धीरज काम के सिलसिले में एक पार्टी से मिलने शहर से बाहर गया है. मौका देख कर वह पूजा के घर पहुंच गया. फिर वह उसे अपनी बाइक पर बैठा कर शहर घुमाने ले गया. शहर में घूमने के बाद दोनों ने एक पार्क में बैठ कर जी भर कर बातें कीं.

प्यार मनुहार भरी बातें करते हुए विजेत ने पूजा को अपनी बांहों में भर लिया. जवानी की दहलीज पर कदम रख रही पूजा को पहली बार किसी युवक के साथ इतने नजदीक आने का मौका मिला था.

इश्कमोहब्बत की इस फिसलन भरी राह पर वह अपने आप को संभाल न सकी. पार्क में झाडि़यों की ओट में उस दिन पहली बार दोनों ने प्यार के समंदर की अथाह गहराई में गोता लगाया.

विजेत ने पूजा को किस करते हुए कहा, ‘‘पूजा मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं और तुम से ही शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘मगर विजेत ये काम इतना आसान नहीं है. हम दोनों अलगअलग जाति के हैं, इसलिए दुनिया हमारे प्यार की दुश्मन बन जाएगी. समाज और परिवार हमारी शादी की इजाजत नहीं देगा.’’ पूजा के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं.

‘‘प्यार किसी बंधन में बंध कर नहीं रह सकता पूजा.’’ विजेत ने उसे कस कर गले लगाते हुए कहा.

‘‘विजेत तुम नहीं जानते, धीरज भैया को हमारे प्यार के बारे में पता चल गया तो वे तो मेरी जान ही ले लेंगे.’’ पूजा ने विजेत से अपने आप को छुड़ाते हुए कहा.

‘‘पूजा, दुनिया की कोई भी ताकत मुझे तुम से जुदा नहीं कर सकती.’’ विजेत ने पूजा को सीने से चिपकाते हुए कहा.

प्यार की दुनिया में खोए ये दो प्रेमी अच्छी तरह जानते थे कि प्यार की राह भले ही आसान हो, मगर शादी की राह कांटों की सेज से कम नहीं होगी.

उस दिन खूब मौजमस्ती कर दोनों अपनेअपने घर आ गए.

विजेत का मन पूजा से शादी करने के लिए उतावला था, मगर पूजा अभी 18 साल की नहीं हुई थी. विजेत जानता था कि नाबालिग उम्र में वह पूजा से शादी नहीं कर सकता. ऐसे में इंतजार करने के अलावा उस के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

अगले साल जैसे ही पूजा शुक्ला ने अपने जीवन के 18 साल पूरे किए तो विजेत कश्यप ने हिम्मत कर के पूजा के घरवालों के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया.

विजेत के इस प्रस्ताव से पूजा के घर में हड़कंप मच गया. धीरज का तो खून खौल उठा. उस ने विजेत को भलाबुरा कहते हुए साफतौर पर कह दिया कि ये शादी हरगिज नहीं हो सकती. गांवदेहात के इलाकों में आज भी दूसरी जाति में शादी करना सामाजिक परंपराओं का उल्लंघन माना जाता है.

समाज में बदनामी का डर भी था. उस दिन के बाद से विजेत की धीरज के घर आने पर पाबंदी लगा दी गई और घर वाले पूजा पर सख्त नजर रखने लगे.

अगले भाग में पढ़ें- क्या पूजा और विजेत ने शादी की

Crime Story- दुश्मनी भी शिद्दत से निभाई: भाग- 3

थाने में जब धीरज से पूछताछ की गई तो धीरज ने बताया कि विजेत ने दोस्ती में विश्वासघात कर के मेरी बहन को बहलाफुसला कर शादी की थी. इस अपमान का बदला लेने के लिए मैं ने उस की हत्या कर दी. मैं ठान चुका था कि या तो वो जीवित रहेगा या मैं.

तिलवारा पुलिस ने आरोपी धीरज की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल हंसिया और खून से सने उस के कपड़े आदि जब्त कर लिए. आरोपी की सूचना पर पुलिस जब रामनगर इलाके के एक खेत में पहुंची तो वहां विजेत का धड़ पड़ा हुआ था.

वहां पर विजेत के घर वाले और रिश्तेदारों की भीड़ लगी थी. तिलवारा पुलिस ने लाश का पंचनामा तैयार कर उसे पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

इधर धीरज के घर से जाने के बाद उस की बहन पूजा को जैसे ही होश आया, वह दौड़ कर खेत की तरफ गई. वहां विजेत के बिना सिर के धड़ को देख कर उस के सब्र का बांध टूट गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि शादी के 3 महीने के भीतर ही उस के सारे ख्वाब रेत के महल की तरह ढह गए हैं. शोक से व्याकुल वह अपने घर आई और एक कमरे में जा कर जोरजोर से रोने लगी.

चीखपुकार सुन कर आसपास की महिलाएं घर आ गईं तो पूजा की मां रोरो कर सब को घटना की जानकारी देने लगी.

घंटे दो घंटे के बाद जब पूजा के रोने की आवाज कमरे से आनी बंद हुई तो उस की मां ने कमरे के अंदर जा कर देखा तो उस की चीख निकल गई.

चीख सुन कर पूजा के पिता दौड़ कर आए तो देखा, पूजा पंखे से लटकी हुई थी. पूजा ने अपनी ओढ़नी का फंदा बना कर पंखे से लटक कर फांसी लगा ली थी. पुलिस टीम को जैसे ही पूजा के फांसी लगाने की खबर मिली वह शंकराघाट में धीरज के घर पहुंच गई.

पूजा को पंखे से उतार कर पुलिस जांचपड़ताल में लग गई. पुलिस को शक था कि कहीं धीरज ने विजेत से पहले पूजा की हत्या कर के पंखे से तो नहीं लटका दिया.

फूटाताल में रहने वाले मृतक विजेत के ममेरे भाई और दूसरे रिश्तेदारों ने पुलिस के सामने यह आरोप लगाया कि पूजा ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है.

उन का कहना था कि विजेत की हत्या करने के बाद धीरज ने पूजा को फांसी पर लटका दिया. यह हत्या पूरी योजना बना कर की गई है, ताकि किसी को संदेह न हो. वह नहीं चाहते थे कि पूजा अपने भाई और अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ गवाही दे.
महाशिवरात्रि के धार्मिक उत्सव पर इस तरह की घटना होने से पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया था. जबलपुर रेंज के डीआईजी भगवत सिंह चौहान और एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा पूरी घटना पर नजर रखे हुए थे.

वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर तिलवारा टीआई सतीश पटेल ने दोनों पक्षों को समझा कर पहले दोनों शवों का पोस्टमार्टम कराया, फिर शाम को पुलिस की मौजूदगी में अलगअलग स्थानों पर पूजा और विजेत का अंतिम संस्कार कराया.

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आईजी जबलपुर रेंज की ओर से तिलवारा थाने के टीआई सतीश पटेल की सूझबूझ के लिए पुरस्कृत किया गया. पूजा और विजेत की प्रेम कहानी का दुखद अंत हो चुका था. पुलिस ने धीरज शुक्ला के इकबालिया बयान के आधार पर आईपीसी की धारा 302 के तहत विजेत की हत्या का मुकदमा कायम कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

रक्षा बंधन के दिन पूजा जिस भाई की कलाई पर राखी बांध कर बहन अपनी रक्षा का जिम्मा सौंपती थी, वही भाई उस के प्यार का जानी दुश्मन बन गया. जातपांत की संकुचित विचारों की बेडि़यों में जकड़े भाई ने बहन की मांग का सिंदूर उजाड़ दिया, जिस के चलते बहन को मौत को गले लगाने पर मजबूर होना पड़ा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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