सत्यकथा: ठग भाभियों की टोली

सुरेशचंद्र रोहरा

‘‘आओआओ, भाभी बहुत दिनों बाद आई हो, आओ.’’ कह कर सरिता

कुर्रे ने सुनीता साहू उर्फ कुमकुम का स्वागत करते हुए ड्राइंग रूम में बैठाया.

‘‘बहन, मैं इधर से गुजर रही थी तुम्हारी याद आ गई. सोचा, तुम्हारा हालचाल ले लूं और हो सके तो तुम्हें भी मालामाल करवा दूं.’’ सुनीता साहू उर्फ  कुमकुम ने बड़े ही मीठे स्वर से सरिता कुर्रे से कहा.

अपने मालामाल होने की बात सुन कर के सरिता कुर्रे चौकन्नी हो गई. उस ने कहा, ‘‘भाभी, क्या बात है कैसे मालामाल करोगी भला बताओ तो!’’

इस पर कुमकुम ने बिंदास हो कर कहा, ‘‘आप को सोना चाहिए क्या, बताओ. असली गोल्ड बहुत ही कम पैसों में?’’

‘‘अच्छा भाभी, भला वो कैसे?’’ सविता कुर्रे ने आश्चर्य व्यक्त किया.

‘‘देखो, मैं तो चाहती हूं कि मेरे जितने भी जानपहचान वाले हैं, वे इस का फायदा उठा लें. मेरे कुछ ऐसे लोगों से संबंध हैं कि हमें बहुत सस्ते में सोना मिल सकता है. कुछ लोग तो मालामाल हो भी गए हैं.’’यह सुन कर सरिता की बांछें खिल गईं. मोहक अदा से उस ने कहा, ‘‘ऐसा है तो बताओ मैं भी सोना ले लूं.’’

‘‘बताऊंगी, बताती हूं थोड़ा चैन की सांस तो ले लेने दो.’’ कह कर कुमकुम सरिता कुर्रे के  यहां ड्राइंगरूम में आराम से पसर कर बैठ गई.

सरिता कुर्रे ने सुनीता साहू उर्फ कुमकुम की अब खूब आवभगत करनी शुरू कर दी. उस के लिए किचन से कुछ मीठा, नमकीन ले आई और पूछा, ‘‘क्या पियोगी चाय या ठंडा?’’

कुमकुम ने सहज भाव से कहा, ‘‘बहन तकलीफ मत करो, जो घर में है चलेगा.’’ और आराम से बैठ कर के मिठाई पर हाथ साफ करने लगी.

चायपानी करने के बाद सुनीता उर्फ कुमकुम ने रहस्यमय स्वर में सरिता कुर्रे से कहा, ‘‘अभी सोने का दाम क्या चल रहा है तुम्हें मालूम है?’’

‘‘हां, कुछकुछ तो पता है लगभग 40 हजार रुपए तोले का रेट हो गया है.’’

‘‘हां, तुम सही कह रही हो. आज के समय में 42 हजार रुपए तोला का मार्केट भाव है. तुम्हें पता है मैं कितने में दिलवा सकती हूं.’’

‘‘बताओ, कितने में मिल जाएगा.’’ उत्सुकतावश सरिता ने कहा.

‘‘अगर मैं आप को 25 से 28 हजार रुपए तोला सोना दिलवा दूं तो बताओ, कैसा रहेगा?’’

यह सुन कर के सरिता कुर्रे खुशी से उछल पड़ी और बोली, ‘‘ऐसा है तो मैं 30 लाख रुपए का सोना ले लूंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम पैसे का इंतजाम करो. मगर हां सुनो, यह बात ज्यादा हल्ला नहीं करने की है. हमें चुपचाप फायदा उठा लेना है.’’

 

यह सुन कर के कुमकुम गंभीर हो गई और सिर हिलाते हुए सहमति से उस ने कहा, ‘‘तुम सही कह रही हो, दीवारों के भी कान होते हैं. मैं ध्यान रखूंगी किसी को भी नहीं बताऊंगी. मगर तुम मुझे जल्द से जल्द सोना दिलवा दो.’’

‘‘हां बहन, सोने में ही इनवैस्ट करना सब से समझदारी का काम है. अब देखो न 5 साल पहले 20 हजार रुपए तोला सोना हुआ करता था. आज इतना महंगा हो गया है और हर साल और भी ज्यादा महंगा होता जाएगा.’’

सरिता कुर्रे सुनीता साहू उर्फ कुमकुम की बातों से सहमत थी. वह महसूस कर रही थी कि सुनीता उस का बहुत भला करने आई है. उस ने फिर भी जिज्ञासावश पूछा, ‘‘भाभी, आखिर तुम मुझे इतना सस्ता सोना कहां से और कैसे दिलओगी.’’

‘‘अब सुनो, मैं बताती हूं तुम से क्या छिपाना. तुम तो मेरी बहन जैसी हो, क्या है कि तुम ने मणप्पुरम गोल्ड का नाम सुना है. यह एक बैंक है, जो लोगों का सोना गिरवी रख कर के उन्हें पैसे लोन देता है. कुछ जरूरत के मारे, बेचारे लोग यहां पैसा लेते हैं, अपना सोना भी गिरवी रख देते हैं और फिर बाद में छुड़ा नहीं पाते. मैं तुम को बताऊं मेरा एक भाई इसी कंपनी में काम करता है. बस जो लोग अपना सोना यहां से नहीं ले पाते, उसे सेटिंग कर के हम सस्ते में ले लेते हैं. अब तुम इस बात को किसी को बताना नहीं, नहीं तो तुम्हारा खेल बिगड़ जाएगा.’’

सविता कुर्रे ने यह बात सुनी तो उसे पूरी तरह विश्वास हो गया कि सुनीता साहू उर्फ कुमकुम की एकएक बात सौ फीसदी सही है.

चलतेचलते कुमकुम ने कहा, ‘‘ तुम  रुपए की व्यवस्था जितनी जल्दी हो सके कर लो. फिर देखना कैसे तुम्हें मैं मालामाल करवा दूंगी.’’

सुनीता उर्फ कुमकुम चली गई. मगर सरिता कुर्रे की तो मानो रातों की नींद उड़ गई. वह रात भर सोचती रही कि किस तरह वह आने वाले समय में सोना खरीद लेगी और मालामाल हो जाएगी. रात भर जागजाग के उस ने अपने सारे बैंक बैलेंस के रुपयों की गिनती लगानी शुरू कर दी.

उस ने जोड़ा तो उस के पास विभिन्न खातों में लगभग 40 लाख रुपए का अमाउंट होने का अंदाजा हो गया. उस ने मन ही मन निर्णय किया कि कल ही 1-2 बैंक से 8-10 लाख  रुपए इकट्ठा कर के कुमकुम को पहली किस्त में दे कर के सोना ले लेगी. उस ने सोचा एक साथ दांव लगाना ठीक नहीं, पहले कम पैसे दे कर के देख लो क्या होता है.

 

सरिता को अपनी होशियारी पर नाज हो आया. वह सोचने लगी कि यही सही रहेगा एक साथ 40 लाख रुपए का सोना लेना और रुपए देना ठीक नहीं रहेगा. कहीं कोई गड़बड़ हो गई तो…

उस ने यह बात अपने पति को भी नहीं बताई और सोचा कि पहले 10 लाख रुपए का सोना मैं अपने हाथ ले लूं फिर पतिदेव को बताऊंगी तो वह भी कितने खुश होंगे.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के गांव खमतराई में सविता कुर्रे अपने परिवार के साथ रहती थी. यहीं पास ही भनपुरी में सुनीता साहू उर्फ कुमकुम हाल ही में उड़ीसा नवापारा से आ कर रहने लगी थी. अपने अच्छे व्यवहार से आसपास के लोगों से हिलमिल कर सब की भाभी बन गई थी.

दूसरे दिन सरिता कुर्रे अपने स्थानीय बैंक पहुंची और वहां से 7 लाख रुपए निकलवा कर के घर आ कर सुनीता साहू को फोन लगाया और उसे बताया, ‘‘भाभी, पैसों का इंतजाम हो गया है. तुम कब आओगी?’’

यह सुन कर सहज भाव से कुमकुम ने कहा, ‘‘मैं अभी तो कहीं व्यस्त हूं. शाम को आती हूं.’’

 

सरिता कुर्रे बहुत बेचैन थी. दोपहर को एक दफा और फोन कर के कुमकुम से बात की और आश्वस्त हो गई कि शाम को 4 बजे कुमकुम आएगी और ठीक शाम को 4 बजे कुमकुम घर पर आ पहुंची तो मानो सरिता कुर्रे की खुशी का ठिकाना नहीं था.

कुमकुम के साथ पूर्णिमा और प्रतिभा गीता महानंदा नामक 2 महिलाएं भी थीं. कुमकुम ने उन का भी सरिता से परिचय कराया और बताया कि ये मेरी सहेलियां हैं और मेरी मदद करती हैं.

तीनों महिलाओं ने सरिता को ऊंचेऊंचे ख्वाब दिखा करके कहा तुम्हारे कितना पैसा है बताओ.

इस पर सरिता ने 7 लाख रुपए ला कर के उन के सामने रख दिया और कहा, ‘‘अभी इतने ही रुपए की व्यवस्था हुई है. मुझे इतने का सोना दिलवा दो.’’

‘‘अच्छी बात है हम तुम्हें कल 7 लाख रुपए का सोना दिलवा देंगी.’’

यह कह कर कुमकुम ने 7 लाख रुपए अपने पास रखे और सरिता कुर्रे को आश्वस्त कर तीनों चली गईं.

यह मार्च, 2019 का महीना था. इस दरमियान सरिता कुर्रे कई दिनों तक सुनीता साहू का इंतजार करती रही. फोन पर बात होती तो वह कहती, ‘‘बहन, मैं अचानक शहर से बाहर चली गई हूं 2 दिन बाद आ रही हूं, तुम बिलकुल चिंता मत करो. यह समझो कि बैंक में पैसा तुम्हारा सुरक्षित है.’’

सरिता कुर्रे को इस तरह बारबार विश्वास दिलाया जाता रहा. इस दरमियान खुद कुमकुम ने सरिता को फोन किया और उसे भरोसा दिलाती रही.

एक दिन अचानक सुनीता साहू उर्फ कुमकुम अनुसइया, पूर्णिमा, प्रतिभा गीता महानंद इन 4 महिलाओं के साथ घर आई और बोली,  ‘‘बहन, तुम तनिक भी चिंता न करो. कहो तो अभी तुम्हें मैं पैसे लौटा दूंगी, बैंक का मामला है, लो तुम खुद बैंक कर्मचारी से बात कर लो.’’

यह सुन कर के सरिता कुर्रे को ढांढस बंधा. कुमकुम ने उसे एक नंबर दिया जोकि मणप्पुरम बैंक के एक अधिकारी शेखर का बताया गया. सरिता कुर्रे ने बात की तो बताया गया कि वह मणप्पुरम गोल्ड लोन बैंक का अधिकारी बोल रहा है. सरिता ने जब सुनीता साहू के बारे में पूछा तो उधर से जवाब मिला, ‘‘हां, हम उस को जानते हैं. उस का हमारे यहां 85 तोला सोना गिरवी रखा हुआ है जो सुरक्षित है.’’

बैंक अधिकारी शेखर से बात करने के बाद सरिता के टूटते मन को ढांढस बंधा. उसे सुकून महसूस हुआ. जब सुनीता ने देखा कि सरिता कुर्रे निश्चिंत हो गई है तो उस ने कहा, ‘‘बहन, देखो मैं तुम्हारे लिए कुछ सोना लाई हूं. इसे अभी रख लो बाकी मैं 82 तोला तुम्हें और जल्दी दे दूंगी. मैं पैसे की व्यवस्था कर रही हूं सारा पैसा दे कर के एक साथ पूरा सोना में बैंक से ले लूंगी.’’

इतना सुनते ही सरिता बोली, ‘‘अब मुझे तुम पर पूरा विश्वास हो गया है. बताओ, तुम्हें कुल कितना पैसा वहां जमा करना है?’’

इस पर सुनीता ने कहा, ‘‘मुझे 14 लाख रुपए और चाहिए इस के बाद मैं सारा गोल्ड मणप्पुरम गोल्ड लोन ब्रांच से छुड़वा लूंगी.’’

सुनीता को सरिता ने आश्वस्त किया, ‘‘ठीक है, ऐसा है तो रुपए का मैं इंतजाम कर देती हूं.’’

दूसरे दिन सरिता कुर्रे ने अपने पति व घर के अन्य लोगों को बताए बगैर बैंक से सारे रुपए निकाले और शाम को जब कुमकुम अपनी महिला मंडली के साथ आई तो 14 लाख रुपए उस के सामने रख दिए गए.

यह देख कर के सुनीता ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘बहन, यह तुम ने बहुत अच्छा किया. अब मैं ये पैसे जमा कर के सारा सोना कल ही बैंक से छुड़वा कर के तुम्हें दे दूंगी.’’ यह कह कर  सुनीता वहां से चली गई.

दूसरे दिन जब सरिता कुर्रे ने फोन किया तो सुनीता ने कहा, ‘‘मैं ने पैसे जमा कर दिए हैं. बस, थोड़ी सी प्रक्रिया बाकी है. जैसे ही गोल्ड हाथ आएगा मैं आ कर के तुम्हें सौंप दूंगी.’’

2-3 दिन ऐसे ही गुजर गए. कोई न कोई बहाना बना कर के सुनीता साहू उसे टाल रही थी. अब सरिता कुर्रे की चिंता बढ़ती चली गई. एक दिन अचानक उस की एक सहेली रमा  ने कहा, ‘‘देखो, कैसेकैसे ठग पैदा हो गए हैं. कवर्धा में सोना दिलाने के नाम पर कुछ महिलाओं ने ठगी की है, मामला पुलिस तक पहुंच गया है.’’

यह सुन कर सरिता कुर्रे पसीनापसीना हो गई और सोचने लगी कि क्या सचमुच ऐसा हुआ है? क्या वह भी कुमकुम के हाथों ठग ली गई है? उस ने रमा से कहा, ‘‘बहन, कुमकुम कैसी महिला है?’’

इस पर हंसते हुए रमा ने कहा, ‘‘सुना है कुमकुम रोज पति बदलती है. अभी चौथे पति के साथ रह रही है. उस का रंगढंग मुझे ठीक नहीं लगता, क्यों क्या बात है?’’

‘‘अब क्या बताऊं, एक दिन कुमकुम आई थी और मुझ से पैसे मांग रही थी कुछ लाख रुपए.’’ सरिता कुर्रे ने बात छिपाते हुए कहा.

‘‘लाखों रुपए! उस की औकात है कुछ लाख रुपए गिनने की?’’  रमा ने व्यंग्यभाव से  कहा, ‘‘देखो, कुमकुम जैसी महिलाओं पर तुम एक पैसे का भी भरोसा नहीं करना.’’

महिला मित्र रमा की बातें सुन कर के सविता कुर्रे की आंखें खुल गईं. उस ने सारी बातें रमा को बताईं और उस से सलाहमशविरा किया.

 

सरिता कुर्रे उसी दोपहर रमा के साथ अचानक सुनीता साहू के घर भनपुरी पहुंच गई. सुनीता घर पर ही थी. सरिता ने कहा, ‘‘कहां है मेरा सोना, कब दोगी, कितने दिन हो गए.’’

यह सुन कर के सुनीता साहू ने उसे अपने पास बैठाया और कहा, ‘‘बहन, मुझे कुछ समय दो.’’

‘‘मैं और कितना समय दूं. मैं कुछ नहीं जानती, मुझे मेरा सोना दो नहीं तो मैं पुलिस में जा रही हूं.’’ सरिता कुर्रे ने साफसाफ चेतावनी देते हुए कहा.

यह सुन कर के सुनीता साहू मुसकराई और बोली, ‘‘यह तुम बहुत बड़ी गलती करोगी, पुलिस भला हमारा क्या कर लेगी.’’

इतने में घर के भीतर से 2-3 पुरुष बाहर आए. ये थे पति मुकेश चौबे, उस के दोस्त सिंधु वैष्णव, बंटी उर्फ शेखर. इन लोगों ने सरिता से बातचीत में साफसाफ कहा, ‘‘तुम पैसे भूल जाओ. क्या सबूत है कि तुम ने पैसे दिए हैं?’’

यह सुन कर सरिता कुर्रे मानो आसमान से जमीन पर आ गिरी. उस ने तड़प कर कहा, ‘‘तुम लोग इस तरीके से झूठ पर उतर आओगे, मैं ने सोचा नहीं था.’’

सरिता ने सुनीता साहू की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम मुझे अगर आज पैसे नहीं दोगी तो ठीक नहीं होगा.’’ और यह कह कर के सरिता रमा के साथ घर से चली गई.

दिन बीतता चला गया, जब उसे लगा कि वह बुरी तरीके से ठग ली गई है तो उस की आंखों के आगे अंधेरा घिर आया.

अगले दिन सरिता कुर्रे सहेली रमा के साथ  थाना खमतराई पहुंची और रिपोर्ट दर्ज कराई. उस ने थानाप्रभारी को बताया कि वह शिवानंद नगर सेक्टर-1 खमतराई रायपुर में रहती है. फरवरी, 2019 में सुनीता उर्फ कुमकुम साहू के साथ अन्य महिलाएं उस के घर आईं तथा उसे सस्ते दाम में सोना देने का प्रस्ताव रखा. कुछ दिन बाद वह सभी दोबारा आईं तथा 85 तोला सोना 28 हजार रुपए प्रति तोला देने की बात की.

इस तरह से उन्होंने उस से सोना दिलाने के नाम पर कुल 22 लाख 70 हजार रुपए ठग लिए.

सोना देने के नाम पर लाखों रुपए की ठगी की घटना को डीआईजी एवं एसएसपी अजय यादव ने गंभीरता से लेते हुए एएसपी (सिटी) लखन पटले, एसपी (सिटी उरला) अक्षय कुमार एवं थानाप्रभारी खमतराई विनीत दुबे को आरोपियों की गिरफ्तारी हेतु आवश्यक दिशानिर्देश दिए.

आरोपियों की गिरफ्तारी में लगी टीम ने आरोपियों की खोजबीन शुरू कर दी. आखिर पुलिस को आरोपी सुनीता साहू उर्फ कुमकुम, पी. अनुसुईया राव, पूर्णिमा साहू, प्रतिभा मिश्रा एवं गीता महानंद को गिरफ्तार करने में सफलता मिल गई. उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ में पता चला कि सुनीता साहू उर्फ कुमकुम उड़ीसा के जिला नवापारा की है. सिर्फ छठवीं कक्षा तक पढ़ी है.

उस की जब पति से नहीं बनी तो उसे छोड़ कर रायपुर आ गई और यहां महेश राव से विवाह कर लिया. कुछ समय बाद जब उस से भी नहीं पटी तो तीसरा पति बनाया और वर्तमान में चौथे पति मुकेश चौबे के साथ वह रह रही थी और उस का जीवन ऐश के साथ बीत रहा था. रोज गहने और कपड़े खरीदती, महंगी शराब पीती थी. अपने गिरोह के पुरुष सदस्य को मणप्पुरम कंपनी का कर्मी बताते हुए उस से मोबाइल फोन पर बात करा दी जाती थी, जिस से शिकार आसानी से इन पर भरोसा कर इन के झांसे में आ जाते थे.

आरोपियों द्वारा जिला कवर्धा में भी इसी तरीके से लोगों को सस्ते दाम में सोना देने का झांसा दे कर लगभग 17 लाख रुपए की ठगी की गई थी. कथा लिखे जाने तक पुलिस द्वारा घटना में शामिल सुनीता साहू उर्फ कुमकुम सहित 5 महिला आरोपियों व उस के चौथे पति मुकेश चौबे सहित एक पुरुष साथी मुश्ताक को गिरफ्तार कर लिया था तथा शेष आरोपियों की पतासाजी कर उन के छिपने के हर संभावित स्थानों में लगातार छापेमारी कर उन की गिरफ्तारी के हरसंभव प्रयास किए जा रहे थे.

महिलाओं के ठग गिरोह की सरगना सुनीता साहू ने रामेश्वर नगर की रहने वाली नरगिस बेगम को अपनी बेटी रानी के एक्सीडेंट की झूठी कहानी सुना कर इमोशनल किया था. सुनीता साहू ने सोना फाइनेंस कंपनी में गिरवी होने की बात कही. बारबार बेटी की इमोशनल कहानी सुन कर नरगिस उस की बात में आ गई और कुमकुम को 2 लाख रुपए दे दिए.

पैसा नहीं मिला तो नरगिस बेगम ने मणप्पुरम गोल्ड लोन बैंक में जा कर गिरवी रखे जेवर के बारे में पता किया तो ठगी के राज से परदा उठ गया. वहां बताया गया कि कुमकुम का कोई जेवर गिरवी था ही नहीं. नरगिस को यह समझते देर नहीं लगी कि कुमकुम ने उसे ठग लिया है.

पुलिस की जांच में सामने आया कि कुमकुम इस के पहले भी जिला कवर्धा में पैसा डबल करने की फरजी स्कीम चला चुकी है. कवर्धा में वह 17 लाख की हेराफेरी कर चुकी है. शातिर कुमकुम हर साल अपना पता बदल लिया करती थी. पुलिस यह भी पता लगा रही है कि 4 शादियां करने के पीछे की असल वजह क्या है, दूसरी तरफ ठग भाभियों के गैंग का शिकार हुई महिलाएं अपने रुपयों के वापस मिलने की आस में हैं.

इसी तरह पुलिस ने जांच में पाया कि आरोपियों द्वारा सोना दिलाने के नाम पर  इंदु सिंह से 2 लाख 77 हजार रुपए, नरगिस साखरे से ढाई लाख रुपए, अनिता वर्मा से साढ़े 5 लाख रुपए, मिसेज चौहान से एक लाख 70 हजार रुपए तथा अन्य लोगों को बैंक में रखे सोना को सस्ते में दिलाने के नाम से कुल 35 लाख 18 हजार रुपए की ठगी की गई थी.

खमतराई पुलिस ने 28 जून, 2021 को आरोपी ठग महिलाओं के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 34 के तहत गिरफ्तार कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां माननीय न्यायालय द्वारा इन ठग महिलाओं को सेंट्रल जेल रायपुर भेज दिया गया.

Satyakatha: Sex Toys का स्वीट सीक्रेट

‘दूसरे देशों में सैक्स टौयज की दुकानें काफी तड़कभड़क वाली होती हैं, लेकिन हम ने अपनी दुकान कोसादा रखा है,’ नीरव मेहता बताते हैं, ‘हमारी दुकान के ग्राहक हमेशा जल्दी में रहते हैं इसलिए हम ने दुकान में कुरसी तक नहीं रखी है. लेकिन हम ने जानबूझ कर इसे आकर्षक या अंधेरे भूमिगत काल कोठरी की तरह नहीं बनाया है. हम ने इसे मैडिकल स्टोर की तरह बनाया और हमारे सभी सर्टिफिकेट दीवार पर टंगे हुए हैं. ऐसा हम ने किसी भी तरह के राजनैतिक विरोध से बचने के लिए किया है.’

यहां बात देश के मशहूर पर्यटन स्थल गोवा की हो रही है, जहां देश की पहली लीगल औनलाइन सैक्स टौयज की दुकान खुली है जिस का नाम है ‘ब्रिक एंड मोर्टार’. इस की लांचिंग बीती 14 फरवरी यानी वैलेंटाइंस डे पर हुई थी.

ऐसा नहीं है कि देश में सैक्स टौयज नहीं बिकते हों, लेकिन अभी वे चोरीछिपे गुमनाम दुकानों से बिक रहे हैं. मानो सैक्स टौय न हुए एके 47 जैसे हथियार हों.

नीरव ने प्रशासन से अनुमति ले कर दुकान खोल कर एक राह देश भर के बेचने वालों को दिखा दी है कि सैक्स टौयज की बढ़ती मांग को वे कानूनी रूप से दुकान खोल कर भी पूरा कर सकते हैं.

भारतीय समाज में सैक्स शिक्षा तो दूर की बात है सैक्स की चर्चा को भी वर्जित माना गया है, पर अब वक्त बदल रहा है, समाज बदल रहा है इसलिए सैक्स टौयज की मांग भी बढ़ रही है.

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लौकडाउन के दौरान जब लोग घरों में कैद थे, तब सैक्स टौयज की मांग हैरतंगेज तरीके से 65 फीसदी तक बढ़ी थी. लोग अपने पार्टनर तक नहीं पहुंच पा रहे थे और सैक्स की तलब जिन्हें सता रही थी, उन्होंने खूब औनलाइन सैक्स टौयज मंगा कर सैक्स को एंजौय किया था.

दैट्स पर्सनल डौट काम की एक विश्लेषण रिपोर्ट में विस्तार से इस का खुलासा किया गया था, जिस में बताया गया था कि सब से ज्यादा सैक्स टौयज महाराष्ट्र के लोग खरीदते हैं.

दूसरा नंबर कर्नाटक और तीसरा तमिलनाडु का है. बड़े शहरों में मुंबई के लोग सब से ज्यादा सैक्स टौय खरीदते हैं दूसरे और तीसरे नंबर पर दिल्ली और बेंगलुरु आते हैं.

इस विश्लेषण की एक चौंका देने वाली बात उत्तर प्रदेश के पुरुषों द्वारा सब से ज्यादा सैक्स टौयज खरीदने की रही. इस सर्वे के मुताबिक महिलाओं की खरीदारी का पसंदीदा वक्त दोपहर 12 से 3 बजे तक और पुरुषों का रात 9 बजे के बाद का है.

सैक्स टौयज सब से ज्यादा 25 से 34 साल के बीच की उम्र के लोग खरीदते हैं, लेकिन इन्हें बेचने वाली वेबसाइट्स पर ज्यादा वक्त गुजारने वाले लोग 18 से 25 साल के बीच की उम्र के हैं. सर्वे के एक दिलचस्प खुलासे के मुताबिक सैक्स प्रोडक्ट्स से 33 फीसदी शादियां टूटने से बची हैं.

दैट्स पर्सनल डौट काम के सीईओ समीर सरैया की मानें तो इन उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि लोग झिझक छोड़ रहे हैं और प्रयोग करने व नए उत्पादों को आजमाने के लिए उत्साहित हैं.

ऐसा भी नहीं है कि बड़ी तादाद में पुरुष ही सैक्स टौयज खरीदते हों बल्कि महिलाएं भी पीछे नहीं हैं. विजयवाड़ा, वड़ोदरा , बेलगाम और जमशेदपुर जैसे शहरों में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा सैक्स टौयज खरीदती हैं. लौकडाउन के दौरान छोटे शहरों में भी सैक्स सुख देने वाले इन खिलौनों की बिक्री बढ़ी थी.

इन शहरों में शिलांग, पानीपत, भटिंडा, हरिद्वार, पणजी, राउरकेला और डिब्रूगढ़ प्रमुखता से शामिल हैं. औनलाइन खरीदारी में 66 फीसदी पुरुष और 34 फीसदी महिलाएं थीं. महिलाओं ने ज्यादातर मसाजर का और्डर दिया तो पुरुषों ने मेल पंप मंगाया.

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इस सर्वे के मुताबिक सैक्स टौय इस्तेमाल करने वाले 86 फीसदी पुरुषों ने पूर्ण संतुष्टि मिलने की बात स्वीकारी. जबकि ऐसी महिलाओं का प्रतिशत 89 था, जिन्होंने सैक्स टौय के इस्तेमाल से संतुष्टि के साथसाथ आर्गेज्म को भी महसूस किया.

पुरुषों को ले कर दिलचस्प बात यह सामने आई कि खुद हस्तमैथुन करने से संतुष्ट पुरुषों की तादाद 54 फीसदी थी, लेकिन जब हस्तमैथुन सैक्स टौय के जरिए किया गया तो 71 फीसदी को संतुष्टि मिली. महिलाओं में तो यह अनुपात हैरतंगेज तरीके से बड़ा पाया गया. बिना सैक्स टौय के हस्तमैथुन करने वाली संतुष्ट महिलाओं की संख्या महज 28 फीसदी थी, लेकिन सैक्स टौय से हस्तमैथुन करने वाली 83 फीसदी महिलाओं ने संतुष्टि मिलना बताया.

सैक्स टौयज का सालाना कारोबार कितना है, इस के ठीकठाक आंकड़े किसी के पास नहीं. लेकिन यह तय है कि यह बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि बड़ी उम्र तक शादी न करने वालों की तादाद बढ़ रही है और कोई भी रेडलाइट इलाकों में जाने और अवैध संबंधों के बाद के खतरे और जोखिम नहीं उठाना चाहता.

अकेले रह कर नौकरी कर रहे युवक युवतियों के लिए भी सैक्स टौय वरदान साबित हो रहे हैं, जिन का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर कभी भी किया जा सकता है यानी अपने सीक्रेट ड्रीम पूरे किए जा सकते हैं, जिस का औसत खर्च 5 हजार रुपए से भी कम है.

काठमांडू के न्यू बाजार में स्थित स्वीट सीक्रेट दुकान सैक्स खिलौनों के लिए मशहूर है. यह दुकान भी रजिस्टर्ड है जिस में खुशबूदार कंडोम से ले कर बड़े आकार की गुडि़या जैसे कोई डेड़ सौ छोटेबड़े प्रोडक्ट मिलते हैं. सैक्स टौय के ज्यादातर आइटम चीन से मंगाए जाते हैं.

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मंजीत पौडेल और प्रवीण ढकाल नाम के युवकों ने इस दुकान को साल 2010 में खोला था. दुकान खूब चली और प्रतिदिन 5 लाख रुपए से भी ज्यादा की बिक्री होती है.

प्रवीन सैक्स टौय की दुकान खोलते वक्त चिंतित थे कि कहीं इस का विरोध न हो, पर यह आशंका फिजूल निकली और दुकान में रोजाना सौ के लगभग ग्राहक आते हैं, जिन में 10 महिलाएं होती हैं. दुकान से एकतिहाई बिक्री औनलाइन होती है.

मंजीत पौडेल के मुताबिक उन के ग्राहकों में ज्यादातर ऐसे होते हैं जिन का पार्टनर काम के सिलसिले में बाहर रहता है. किस उम्र के लोग ज्यादा सैक्स टौय खरीदते हैं, इस सवाल के जबाब में वह कहते हैं, ‘35 की उम्र के लगभग के लोग ज्यादा आते हैं. ये लोग कंडोम, वाइब्रेटर और सैक्स डौल ज्यादा खरीदते हैं. कई लोग तो सैक्स टौय घर में रह रही अकेली पत्नी के लिए खरीदते हैं.

यानी सैक्स टौय का इस्तेमाल युवा दंपति विवाहेतर संबंधों से बचने के लिए भी कर रहे हैं. यह एक सुखद बात सामाजिक लिहाज से है. वैसे भी देखा जाए तो सैक्स टौयज का इस्तेमाल किसी भी लिहाज से नुकसानदेह नहीं होता.

Satyakatha- सूदखोरों के जाल में फंसा डॉक्टर: भाग 1

22अप्रैल, 2021 की शाम लगभग 5 बजे की बात है. मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर शहर की कोतवाली के टीआई उमेश दुबे को सूचना मिली कि नरसिंहपुर-करेली रेलमार्ग पर स्थित टट्टा पुल के पास रेल पटरियों पर एक आदमी की लाश पड़ी है.

सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो रेल पटरियों के बीच में एक आदमी की लाश क्षतविक्षत हालत में पड़ी थी. लग रहा था जैसे उस ने जानबूझ कर आत्महत्या की हो. वह अचानक दुर्घटना का मामला नहीं लग रहा था. उस आदमी का चेहरा पहचानने में नहीं आ रहा था.

पुलिस ने सब से पहले वह शव रेल लाइनों  के बीच से हटवा कर साइड में रखवा दिया ताकि उस लाइन पर ट्रेनों का आवागमन सुचारू रूप से हो सके. इस के बाद उस के कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट की जेब में एक मोबाइल फोन और एक चाबी मिली. तब तक कई लोग वहां इकट्ठे हो चुके थे. पुलिस ने उन से लाश की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका.

पुलिस जांच कर ही रही थी कि तभी किसी ने पुलिस को रेल लाइन के नजदीक  सड़क पर खड़ी एक लावारिस स्कूटी के बारे में जानकारी दी. जांच में वह स्कूटी वहां जमा भीड़ में से किसी की नहीं थी. एक पुलिसकर्मी ने स्कूटी की डिक्की खोली तो उस में शादी का निमंत्रण कार्ड मिला, जिस के आधार पर पता चला कि वह शादी का कार्ड डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के नाम का था.

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कोतवाली पुलिस ने लाश का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए वह जिला अस्पताल भेज दी. इस के बाद भादंवि की धारा 174 (संदिग्ध मृत्यु) का मामला दर्ज कर लिया.

सिद्धार्थ तिगनाथ कोई मामूली इंसान नहीं थे. वह शहर के एक जानेमाने डाक्टर थे. इसलिए पुलिस ने मोबाइल फोन के जरिए डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के घर वालों की सूचना दी. उस समय सिद्धार्थ के पिता डा. दीपक तिगनाथ अपने ही रेवाश्री हौस्पिटल में मरीजों का इलाज कर रहे थे.

जैसे ही उन्हें सिद्धार्थ के रेल से कटने की सूचना मिली, वे अपना होश खो बैठे. आननफानन में अस्पताल का स्टाफ डा. दीपक तिगनाथ और घर वालों को ले कर जिला अस्पताल पहुंच गए.

अस्पताल में सिद्धार्थ का शव देख कर घर वालों का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. सिद्धार्थ की पत्नी अपने 5 साल के बेटे को सीने से चिपकाए बिलख रही थी. घर वालों को यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार सिद्धार्थ ने इस तरह का आत्मघाती कदम क्यों उठा लिया.

डा. सिद्धार्थ तिगनाथ नगर के प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता एवं पेशे से दंत चिकित्सक थे. सोशल मीडिया पर यह खबर पूरे जिले में जब वायरल हुई तो किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि एक हाईप्रोफाइल डाक्टर फैमिली का सदस्य आत्महत्या जैसा कदम उठा सकता है. लौकडाउन के बावजूद देखते ही देखते जिला अस्पताल में डा. तिगनाथ के रिश्तेदार और उन के प्रशंसकों की भीड़ जमा होने लगी.

सिद्धार्थ की एकलौती बहन गार्गी रीवा में थी. दूसरे दिन जब वह नरसिंहपुर पहुंची तो पोस्टमार्टम के बाद सिद्धार्थ का अंतिम संस्कार किया गया. जब 5 साल के बेटे ने डा. सिद्धार्थ की चिता को मुखाग्नि दी तो उपस्थित घर वालों एवं अन्य लोगों की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई.

प्रारंभिक जांच में पुलिस ने डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के कुछ मित्र और परिजनों के बयान दर्ज किए. मामले की तहकीकात के लिए पुलिस ने सिद्धार्थ के पिता डा. दीपक तिगनाथ, मां ज्योति तिगनाथ, पत्नी नेहा के अलावा नरसिंहपुर के सुरेश नेमा, शेख रियाज, प्रसन्न तिगनाथ, घनश्याम पटेल कुंजीलाल गोविंद पटेल के बयान दर्ज किए. इस के बाद पुलिस टीम ने रेलवे स्टेशन नरसिंहपुर के स्टाफ के बयान दर्ज किए. इस से पता चला कि डा. सिद्धार्थ ने ट्रेन से कट कर अपनी जीवनलीला समाप्त की थी. रेलवे स्टाफ ने पुलिस को बताया कि ट्रेन के ड्राइवर के हौर्न बजाने के बाद भी सिद्धार्थ रेल पटरियों से दूर नहीं हुए थे.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर मुख्यालय में  रेवाश्री हौस्पिटल एक बड़ा प्राइवेट हौस्पिटल है, जिस के डायरेक्टर डा. दीपक तिगनाथ हैं.  मैडिसिन में एमडी डिग्रीधारी कार्डियोलौजिस्ट डा. दीपक तिगनाथ पिछले 4 दशकों से पूरे जिले में अपनी चिकित्सा सेवाएं दे रहे हैं. डा. दीपक तिगनाथ के परिवार में एक बेटा सिद्धार्थ और एक बेटी गार्गी है. गार्गी की  रीवा के रहने वाले अजय शुक्ला से शादी हो चुकी है.

डा. दीपक तिगनाथ का बेटा सिद्धार्थ दंत चिकित्सक के रूप में रेवाश्री हौस्पिटल में ही अपने पिता की तरह लोगों का इलाज करते थे. परिवार में डा. सिद्धार्थ की पत्नी नेहा और उन का 5 साल का एक बेटा है.

सिद्धार्थ की शुरुआती शिक्षा रीवा के सैनिक स्कूल में हुई. उन के दादाजी गणित के शिक्षक थे, इसलिए गणित उन का पसंदीदा विषय था. क्रिकेट में भी उन की बेहद दिलचस्पी रहती थी.

स्कूली पढ़ाई के बाद सिद्धार्थ बीडीएस की डिग्री ले कर दंत चिकित्सक बने, उन की इंटर्नशिप देख उन के सीनियर ने उन्हें सफल सर्जन बनने की सलाह दी. पिता भी एक सफल डाक्टर थे, वही सब अच्छे गुण विरासत में उन्हें भी मिले.

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चिकित्सा के साथ राजनीति को वह समाज सेवा का एक सफल माध्यम मानते थे. इसी कारण से वह राजनीति एवं प्रशासनिक की पढ़ाई के लिए पुणे स्थित पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के संस्थान में गए.

इसी संस्थान में पढ़ाई के दौरान ‘चिकित्सा पद्धति एवं उस का क्रियान्वयन कैसा हो’ विषय पर अपनी थीसिस के माध्यम से अपने विचार जब टी.एन. शेषन के सामने रखे तो शेषन डा. सिद्धार्थ से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने कहा था कि राष्ट्र को ऐसे ही परिपक्व और उत्कृष्टता दे सकने वाले तुम्हारे जैसे नौजवानों की जरूरत है.

डा. सिद्धार्थ तिगनाथ एक समय जिले की राजनीति में कांग्रेसी नेता के रूप में सक्रिय रहे थे. सन 2011 में उन्हें प्रदेश के 2 बड़े नेता कमलनाथ और सुरेश पचौरी ने होशंगाबाद लोकसभा क्षेत्र के उपाध्यक्ष की कमान सौंपी थी. लोकसभा क्षेत्र में संगठन की मजबूती के लिए उन्होंने रातदिन काम किया. किसान आंदोलन हो या उन की फसलों का मुआवजा, जहां प्रशासनिक व्यवस्था धराशाई हो जाती थी, वे किसानों को बातचीत के लिए तैयार करते.

किसी कैंसर पेशेंट को क्या सहायता मिल सकती है, वह उसे पूरी मदद अपने माध्यमों से करते. चिलचिलाती गरमी में स्टेशन पर पानी के पाउच बांटते, ऐसी नेतागिरी वह अपने दम पर तन मन धन से करते थे. तिगनाथ फैमिली को पूरे इलाके में उन की दौलत और शोहरत के कारण जाना जाता था. हर किसी के सुखदुख में तिगनाथ फेमिली हमेशा साथ रहती. डा. सिद्धार्थ अपने व्यवहार एवं शैली के चलते थोड़े से समय में ही सब के चहेते बन चुके थे.

कहते हैं कि जीवन में यदि खुशियां हैं तो दुखों के पहाड़ भी हैं. कुछ लोग इन पहाड़ों को काट कर रास्ता बना लेते हैं तो कुछ लोग एक चट्टान के आगे अपनी हार मान कर निराश हो जाते हैं. डा. सिद्धार्थ ने भी 41 साल की उम्र में एक गलत फैसला ले कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली और अपने भरेपूरे परिवार को यादों के सहारे छोड़ गए.

डा. सिद्धार्थ सूदखोरों के बनाए चक्रव्यूह में इस कदर फंस चुके थे कि उस से बच कर  निकलना नामुमकिन था. उन के पिता भी अपनी दौलत बेटे के कर्ज की रकम चुकाने में कुरबान कर चुके थे, फिर भी सूदखोरों का कर्जा जस का तस बना हुआ था.

डा. सिद्धार्थ की सोच थी कि जिले के नौजवानों को रोजगार के उचित अवसर नहीं मिलते. इसलिए उन्होंने सन 2016 में ‘विश्वभावन पालीमर’ नाम की फैक्ट्री की शुरुआत की और बेरोजगार जरूरतमंद नौजवानों को उस में रोजगार दिया.

इसी दौरान उन्होंने ‘रेवाश्री इंस्टीट्यूट औफ पैरामैडिकल साइंसेस’ कालेज की शुरुआत की, जिस में स्थानीय युवकयुवतियों को मैडिकल की पढ़ाई के साथसाथ रोजगार दे कर उन्हें पगार देनी शुरू की थी.

अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए वह पैसे की व्यवस्था में लग गए. 2016 की नोटबंदी से कोई अछूता नहीं बचा था. कारोबार में पैसे की जरूरत ने उन्हें स्थानीय सूदखोरों की तरफ धकेला. इसी दौरान सूदखोर आशीष नेमा से उन का संपर्क हुआ.

अगले भाग में पढ़ें-  डा. सिद्धार्थ को सूदखोरों से मिलवाने का काम किसने किया

Satyakatha: प्रेमी के सिंदूर की चाहत

सौजन्य- सत्यकथा

17मई की शाम करीब साढ़े 5 बजे थे जब दिल्ली में द्वारका सेक्टर 29 से सटे छावला के थाने के टेलीफोन की घंटी बजी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत फाइल समेटते हुए अपना हाथ टेलीफोन का रिसीवर उठाने के लिए आगे बढ़ाया. जैसे ही ड्यूटी औफिसर ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से किसी ने घबराते हुए बोला, ‘‘छावला पुलिस स्टेशन?’’

ड्यूटी औफिसर, ‘‘मैं छावला थाने से बोल रहा हूं. बताइए आप क्या कहना चाहते हैं?’’ ड्यूटी औफिसर ने कहा.

‘‘साहब, निर्मलधाम के पास सड़क किनारे एक आदमी की लाश पड़ी है. मैं यहां से गुजर रहा था तो मैं ने देखा. आप यहां आ कर देख लीजिए.’’

ड्यूटी औफिसर ने फोन के रिसीवर को अपने दांए कंधे और कान के सहारे दबाया, अपने दोनों हाथों को आजाद किया और टेबल पर कहीं पड़े नोट्स वाली डायरी ढूंढने लगे. वह लगातार फोन पर उस राहगीर से वारदात की घटना के बारे में पूछ रहे थे और डायरी ढूंढ रहे थे. टेबल पर बिखरे सारे सामान को उलटने पुलटने के बाद जब डायरी नहीं मिली तो एक फाइल के पीछे ही उन्होंने वारदात की जगह समेत बाकी जरूरी जानकारियां लिख डालीं. ड्यूटी औफिसर ने उस राहगीर को वारदात की जगह से कहीं भी हिलने से मना कर दिया और फोन काट दिया.

ये सारी जानकारी ड्यूटी औफिसर ने उस समय थाने में मौजूद थानाप्रभारी राजवीर राणा को दी. राजवीर राणा बिना किसी देरी के थाने में मौजूद स्टाफ को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

वहां पहुंचते ही पुलिस की टीम ने उस सुनसान सी सड़क के एक किनारे पर एक बाइक खड़ी देखी. बाइक के बिलकुल बगल में खून से लथपथ एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. लाश को देखते ही वहां मौजूद पुलिस टीम चौकन्नी हो गई और सबूत जमा करने के मकसद से घटनास्थल के इर्दगिर्द फैल गई.

थानाप्रभारी राजवीर राणा जब लाश का मुआयना करने के लिए बौडी के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उस के बदन पर किसी धारदार हथियार से कई वार किए गए थे. जो साफ दिखाई दे रहे थे. उन्होंने लाश के अगलबगल नजर घुमाई तो एक मोबाइल फोन वहीं पास में पड़ा था, जो कि संभवत: मरने वाले शख्स का रहा होगा.

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रात होने को थी. मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने बिना किसी देरी के बाइक और मोबाइल जब्त कर लिया और लाश की काररवाई आगे बढ़ाने के लिए क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम के आने का इंतजार करने लगे.

उस सड़क से पैदल आने जाने वाले लोगों ने पुलिस और वहां मौजूद लाश को देख कर घटनास्थल पर जमावड़ा लगा दिया. सब टकटकी लगाए पुलिस को अपना काम करते देख आपस में फुसफुसाहट करने लगे.

जब वहां मौजूद पुलिस ने आसपास के मूकदर्शक बने लोगों से लाश की पहचान करने के लिए पूछताछ की तो कुछ लोगों ने लाश की शिनाख्त करते हुए कहा कि इस का नाम अशोक कुमार है और यह पेशे से टैक्सी ड्राईवर है.

तब तक मौके पर क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम भी आ पहुंची. टीम ने अपना काम शुरू किया. उन्होंने सब से पहले लाश की फोटोग्राफी की. उन्होंने सबूत के तौर पर घटनास्थल से खून लगी मिट्टी के नमूने इकट्ठा कर लिए. यह सब काम कर लेने के बाद थानाप्रभारी राजवीर राणा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मौर्चरी भेज दिया.

सारे काम निपटा लेने के बाद पुलिस की टीम थाने लौट आई तथा इस केस के संबंध में काम आगे बढ़ाने लगी. पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया और जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी राजवीर राणा ने स्वयं संभाली.

केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए थानाप्रभारी राणा ने सब से पहले घटनास्थल से बरामद किए गए मोबाइल फोन को निकलवाया. यह फोन टूटा नहीं था. सिर्फ बैटरी चार्जिंग खत्म होने की वजह से बंद हो गया था.

उस की काल डिटेल्स निकलवाई और देखा कि आखिरी बार एक नंबर से अशोक कुमार को कई बार काल की गई थी. इस के कुछ देर बाद ही अशोक कुमार की हत्या हो गई थी.

शक की सूई अब इसी आखिरी नंबर पर आ कर रुक गई थी. राजवीर राणा ने अपने फोन से इस नंबर को डायल किया तो दूसरी तरफ से किसी महिला की आवाज आई. थानाप्रभारी ने पहले अपना परिचय दिया और उस के बाद उस महिला से अशोक कुमार के रिश्ते के बारे में पूछा.

महिला ने अपना नाम शीतल और खुद को अशोक कुमार की बेटी बताया. राजवीर ने फोन पर बड़े दु:ख के साथ शीतल को बताया कि उस के पिता सड़क दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो चुके हैं, यह जानने के बाद शीतल उसी समय ही बिलखने लगी. उन्होंने उस से उस की मां के बारे में पूछा तो शीतल ने अपनी मां राजबाला से उन की बात करा दी.

थानाप्रभारी ने राजबाला को अशोक की मौत की खबर देते हुए उन से शीघ्र ही थाने पहुंचने को कहा 2-3 घंटे बाद जब राजबाला थाने पहुंची तो वह राजवीर राणा को देखते ही फफकफफक कर रोने लगी.

अपने पति की हत्या की खबर सुन कर वह आहत थी. राजवीर राणा ने राजबाला को हौसला रखने को कहा और उस से उस के पति से किसी से साथ दुश्मनी होने के बारे में पूछा. राजबाला ने रोते हुए कहा कि अशोक की किसी के साथ भी कोई दुश्मनी नहीं थी.

राजबाला से बात करते समय थानाप्रभारी राजवीर राणा को उस की बातों से ऐसा नहीं लग रहा था कि उसे पति की मौत का दुख है. बेशक राजबाला राजवीर राणा के सामने रो रही थी और दुखी दिखाई दे रही थी. लेकिन राजवीर को राजबाला पर शक हो चुका था.

राजबाला के आंसू घडि़याली लग रहे थे. दाल में कहीं तो कुछ काला जरुर था, जिस का पता लगाना जल्द से जल्द जरुरी था. आखिर एक व्यक्ति का कत्ल जो हुआ था.

राजबाला से पूछताछ खत्म होने पर वह अपने घर के लिए रवाना हो गई और पीछे कई तरह के शक और सवाल छोड़ गई.

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इन सभी शकों को दूर करने के लिए और इस मामले से जुडे़ सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए थानाप्रभारी ने शीतल और राजबाला की काल डिटेल्स मंगवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स को बेहद बारीकी से परखी और उस की जांच की तो वह बेहद हैरान रह गए.

काल डिटेल्स से उन्हें यह पता लगा कि शीतल जिस समय अशोक को लगातार काल कर रही थी उस के ठीक बाद उस ने एक अन्य नंबर पर काफी देर तक बातचीत की थी. यह सब देख कर पुलिस ने यह अनुमान लगाया कि यदि इस मामले में शीतल को थोडा ढंग से कुरेदा जाए तो शायद इस केस में एक और लीड मिल सकती है. राजवीरने बिना देरी किए फिर से एक बार राजबाला और शीतल को थाने बुला लिया.

उन्होंने इस बार दोनों से अलगअलग पूछताछ की. उन्होंने पहले शीतल से इस घटना के बारे में विस्तार से पूछा. शीतल का बयान लेने के बाद उन्होंने राजबाला से इस मामले में फिर से पूछताछ की. क्रास पूछताछ में दोनों की चोरी पकड़ी गई.

दोनों के बयान एक दूसरे से अलग थे. जब राजवीर राणा ने दोनों को कानून का थोड़ा डर दिखा कर उन पर दबाव बनाया तो शीतल ज्यादा देर टिक नहीं सकी. शीतल ने रोतेबिलखते, अपने हाथ से अपना सिर पीटते हुए अपनी मां राजबाला और उस के प्रेमी वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू के साथ साजिश रच कर अपने पिता की हत्या कराने की बात कबूल कर ली.

यह सब सुनते ही बेटी के सामने राजबाला का चेहरा पीला पड़ गया. उसे जैसे न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रहा था. थाने में शीतल के सामने राजबाला अपनी बेटी को घूरे जा रही थी. वह उसे ऐसे घूर रही थी जैसे मानो अगर उसे मौका मिलता तो वह वहीं पर शीतल का भी कत्ल कर बैठती.

शीतल द्वारा जुर्म कबूल करते ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. फिर राजबाला की निशानदेही पर उस के प्रेमी वीरेंद्र को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

वीरेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने अशोक की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. वीरेंद्र के बताए हुए पते पर जा कर पुलिस टीम ने अशोक कुमार की हत्या में इस्तेमाल किए जाने वाले चाकू और उस की कार बरामद कर ली. तीनों की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में अशोक कुमार की हत्या के पीछे अवैध संबंधों की जो सनसनीखेज दास्तान सामने आई, कुछ इस तरह थी—

अशोक कुमार दिल्ली के नजफगढ़ के नजदीक भरथल गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस का 3 सदस्यों का छोटा परिवार था जिस में अशोक, उस की पत्नी राजबाला और बेटी शीतल ही थी. अशोक की कमाई का जरिया उस की टैक्सी थी. वह बेटी शीतल की शादी जाफरपुर कला के पास इशापुर गांव के रहने वाले हिमांशु से कर चुका था. शीतल अपने पति के साथ बेहद खुश थी. बेटी की शादी के बाद अशोक के सिर पर अब कोई और जिम्मेदारी नहीं थी.

लेकिन पिछले साल कोरोना महामारी की वजह से पूरे देश में लौकडाउन लगा तो ज्यादातर लोगों की तरह अशोक भी अपने घर में कैद हो कर रह गया. उस का काम न के बराबर रह गया. घर पर रहने पर अशोक बहुत ज्यादा परेशान नहीं था.

अशोक को महसूस हुआ कि वैसे भी अपने काम के दौरान वह अकसर अपने घर से बाहर ही रहता है, ऐसे में न जाने कितने अरसे बाद उसे इतने लंबे समय के लिए घर में रहना नसीब हुआ है. अपने काम से हमेशा बाहर रहने वाले व्यक्ति को जब घर में कैद होना पड़ जाए तो जाहिर सी बात है कि वह घर की हर एक चीज को बारीकी से परखता है, गौर करता है.

ऐसे ही लौकडाउन के एक दिन अशोक घर का सामान लेने के लिए गांव में निकला तो दुकानदार से बातचीत के दौरान उस ने जो सुना उस से उस के होश ही उड़ गए.

दुकानदार ने कहा, ‘‘क्या भई अशोक. मजा आ रहा है घर में कैद हो कर?’’

‘‘कैद होना किस को अच्छा लगता है भला. अब समस्या सिर पर बैठी है तो हम बस उसे झेलने को मजबूर हैं. घर में रहने के अलावा और कुछ कर भी तो नहीं सकते.’’ अशोक बोला.

‘‘अब तो तुम्हारी महरिया भी तुम्हारे साथ कैद हो गई होगी. अब तो लोग आ जा भी नहीं सकते तुम्हारे घर. दुकानदार ने जोर देते हुए कहा.’’

‘‘वो घर में कैद हो गई…? क्या मतलब. और घर में लोगों के आने की क्या बात कह रहे हो.’’ अशोक भौंहें चढ़ाते हुए बोला.

दुकानदार ने धीमी, दबी आवाज में कहा, ‘‘अरे वो तो लौकडाउन लग गया तब जा कर तुम्हारी महरिया घर पर रुकने को मजबूर है. नहीं तो तुम्हारे घर से निकलते ही तुम्हारी महरिया आशिकी करने निकल जाती थी.’’

‘‘यह तुम कैसी बातें कर रहे हो. कौन है उस का आशिक?’’ अशोक ने गुस्से से पूछा.

दुकानदार दबी आवाज में बोला, ‘‘अरे ढिल्लू का नाम सुना है न तुम ने? वीरेंद्र का? वही तो है जो शीतल की मां के साथ आशिकी करता फिरता है. यह बात तो पूरे गांव वालों को पता है. चाहे तो पूछ लो.’’

ये सब सुनते ही अशोक के दाएं हाथ में थामी पौलिथिन थैली छूट गई. थैली फटने से चीनी, आटा, दाल और घर का कुछ और सामान नीचे पथरीली सड़क पर गिर कर फैल गया. अशोक को इस बात पर जितना सदमा लगा था उस से कहीं ज्यादा उसे इस बात को सुन कर गुस्सा आ रहा था. लोग उस की पत्नी राजबाला और गांव के बदमाश वीरेंद्र के बारे में उलटी सीधी बातें कर रहे थे.

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दुकानदार से यह सब सुन कर उस ने 2-4 और लोगों से इस बारे में पूछताछ की. हर किसी ने दबी आवाज में अशोक को वही बताया जो कि उस दुकानदार ने बताया था.

दरअसल 43 वर्षीय वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू भरथल का ही निवासी था. वीरेंद्र उस इलाके का नामचीन बदमाश था. दिल्ली के कई थानों में उस के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे. एक तरह से जेल उस का दूसरा घर था.

लोगों के अनुसार जब अशोक घर पर नहीं रहता था तब उस के पीठ पीछे वीरेंद्र राजबाला के साथ गुलछर्रे उड़ाता था. अशोक ने बिना किसी हिचकिचाहट के राजबाला से इस बारे में पूछा.

लेकिन राजबाला ने पति की बात से कन्नी काट ली. उस ने उस की बात से साफ इनकार कर दिया. लेकिन उस दिन के बाद राजबाला अशोक की नजरों का ज्यादा देर तक सामना नहीं कर पाई.

राजबाला के मोबाइल पर जब कभी भी वीरेंद्र का फोन आता तो वह पति से दूर जा कर बात करती, जब अशोक उस से पूछता कि किस का फोन आया था तो वह रिश्तेदार होने का बहाना बनाने लगती. यह सब कुछ देख कर अशोक को यह यकीन जरूर हो गया कि दाल में जरूर कुछ काला है.

अकसर पति के घर पर रहने से पत्नी को खुशी होती है लेकिन अशोक के घर पर होने से राजबाला की खुशियों पर मानो बादल छा गए थे.

राजबाला वीरेंद्र से मिलने के लिए तड़पने लगी. उसे अपने पति से ज्यादा वीरेंद्र पसंद था. वीरेंद्र के साथ मां की आशिकी के किस्से बेटी शीतल से भी नहीं छिपे थे. वह भी उन के रिश्ते के बारे में बखूबी जानती थी और वह भी तो वीरेंद्र से पिता का महत्त्व देती थी.

शीतल वीरेंद्र को पिता अशोक से ज्यादा पसंद करती थी. क्योंकि अशोक जब घर पर नहीं रहता था, उस समय वीरेंद्र राजबाला से मिलने आता तो शीतल के लिए महंगे तोहफे साथ लाता था. दरअसल लौकडाउन की वजह से अशोक अपनी पत्नी राजबाला, बेटी शीतल और वीरेंद्र के लिए गले की हड्डी बन गया था.

लौकडाउन के चलते जेल में बंद वीरेंद्र को भी पैरोल पर छोड़ दिया गया था. एक दिन अशोक की नजरों से बचते बचाते वीरेंद्र राजबाला से मिला. उस दिन राजबाला ने वीरेंद्र पर इस कदर प्यार लुटाया जैसे वीरेंद्र के पर लग गए हों.

शारीरिक सुख भोग लेने के बाद जब राजबाला और वीरेंद्र एकदूसरे से अलग हुए तो उस ने वीरेंद्र्र से कहा कि अगर उस ने उस के पति अशोक को जल्द ठिकाने नहीं लगाया तो वह आत्महत्या कर लेगी.

तब वीरेंद्र ने प्रेमिका से कहा, ‘‘तुम्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं है. मैं उसे ही निपटा दूंगा.’’

इस के बाद राजबाला और वीरेंद्र ने योजना बनाई. इस योजना में उन्होंने शीतल को शामिल कर लिया. शीतल इस काम के लिए खुशी से तैयार हो गई.

17 मई, 2021 को शीतल ने अपने पिता अशोक को मिलने के लिए निर्मलधाम बुलाया. अशोक अपनी बाइक से निर्मलधाम के रास्ते में ही था. शीतल पलपल पिता को काल कर उस से खबर लेती रही. जब अशोक निर्मलधाम के नजदीक पहुंचा तो शीतल ने वीरेंद्र को काल कर यह बात बता दी.

वीरेंद्र अपनी हुंडई कार से वहां पहुंच गया और अशोक को सड़क किनारे रोक कर चाकू से गोद दिया. अशोक की लाश को वहीं छोड़ कर वीरेंद्र्र वहां से फरार हो गया.

काम हो जाने पर वीरेंद्र्र ने राजबाला और शीतल को इस बात की जानकारी फोन कर के दी.

राजबाला, शीतल और वीरेंद्र्र तीनों अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे थे लेकिन पुलिस ने अपनी सूझबूझ के साथ 12 घंटे के अंदर ही अशोक कुमार हत्याकांड का परदाफाश कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी राजवीर राणा कर रहे थे.

Satyakatha- खुद बेच डाला अपना चिराग

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- शाहनवाज

मांकी ममता ही ऐसी होती है कि वह अपने नवजात को अकसर सीने से लगाए रहती है. और तो और रात को जब वह सो जाती है तो बगल में सोए अपने बच्चे को बारबार छू कर देखती है कि कहीं उस के कपड़े गीले तो नहीं हो गए. पूजा देवी भी अपने 6 दिन के नवजात की इसी तरह देखभाल कर रही थी.

15 जून, 2021 की रात के करीब 11 बज रहे थे. पूजा नींद में ही टटोल कर यह देख रही थी कि कहीं उस के बच्चे ने सूसू तो नहीं कर दी. कमरे की लाइट बंद थी, इसलिए जब उस ने अपनी बाईं ओर हाथ बढ़ाया तो उस का हाथ सीधा सीमेंट के फर्श पर पड़ा. पूजा ने सोचा कि शायद वह बच्चे को गलत जगह देख रही है. उस ने उसी समय अपने दाईं ओर हाथ बढ़ाया तो उस का बच्चा उधर भी नहीं था.

पूजा की नींद अब भाग चुकी थी. वह उठ कर बैठ गई. उस ने इधरउधर देखा लेकिन उसे उस का बच्चा नहीं मिला तो वह घबरा गई. तभी उस ने पास में लेटे पति गोविंद को भी जगा दिया.

पूजा ने फटाफट उठ कर कमरे की लाइट जलाई. कमरे में रोशनी होने के बाद पूजा को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. क्योंकि उस का बच्चा कमरे में नहीं था. बच्चा गायब होने पर गोविंद भी घबरा गया.

पूजा ने डबडबाई आंखों से अपने पति गोविंद की ओर देखा और बिना कुछ देखे कमरे से बाहर निकलते हुए जोरजोर से मुन्ना…मुन्ना चीखती हुई निकल गई. देखते ही देखते उस मकान में रहने वाले अन्य किराएदार जो अपनेअपने कमरों में आराम कर रहे थे, बाहर निकल आए और सब गोविंद से पूछने लगे, ‘‘क्या हुआ है?’’

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पूजा ने रोते हुए और जोर से चीखते हुए सब को बताया कि उस का मुन्ना नहीं मिल रहा है. किराएदार गोविंद और पूजा की बढ़ती बेचैनी को कम करने के लिए खुद उन के साथ सब के कमरों में घुसघुस कर चेक करने लगे. कुछ देर में हर किसी का कमरा खंगालने के बाद जब मुन्ना नहीं मिला तो पूजा फूटफूट कर रोने लगी और उस का नाम ले कर जोरजोर से चीखनेचिल्लाने लगी. गोविंद भी अपनी पत्नी का सिर अपने कंधे पर रख कर रोने लगा.

कुछ ही देर में यह बात आया नगर की पूरी गली में फैल गई कि पूजा का 6 दिन का बच्चा चोरी हो गया है. गोविंद और पूजा की यह हालत देख कर किसी ने उन्हें सुझाया कि उन्हें जल्द ही पुलिस को इस बारे में बताना चाहिए.

गोविंद ने उन की बात मानते हुए तुरंत 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को इस बारे में बताया. कुछ देर में पुलिस आया नगर में स्थित गोविंद के कमरे पर पहुंच गई. जिस के बाद गोविंद और पूजा ने पुलिस को पूरा घटनाक्रम बताया.
दक्षिणी दिल्ली में स्थित आया नगर फतेहपुर बेरी थाने के अंतर्गत आता है. इसलिए मामला थाने में दर्ज हो गया और पुलिस इस के बाद मामले की जांच में जुट गई.

बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले गोविंद कुमार को दिल्ली में आए बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ था. वह 2014 में ही दिल्ली में आया था और मजदूरी करता था. जब जहां पर, जैसा भी काम मिल जाए, उसी के आसपास किराए पर कमरा ले कर रहने लगता था.

गोविंद की शादी 2017 में हुई थी. शादी के साल भर बाद वह अपनी पत्नी पूजा को अपने साथ दिल्ली ले आया था. उन का एक ढाई साल का बेटा
भी था.

गोविंद एक दिहाड़ी मजदूर था. जिस से उस के घर में हमेशा पैसों की किल्लत रहती थी. ऊपर से बीते साल कोरोना की वजह से लगे लौकडाउन ने तो उस के परिवार की मानो कमर ही तोड़ दी थी.

जब लौकडाउन लगा था, उस समय गोविंद और उस का परिवार दिल्ली से सटे हरियाणा के सिकंदरपुर में एक किराए के कमरे में फंस गया था. उस की आर्थिक हालत उन दिनों बेहद खराब हो गई थी.

इस से पहले उस की पत्नी पूजा उसे कई बार गांव में ही बस जाने के लिए कहा करती थी. लेकिन गोविंद पूजा की बात को नकार देता था और कहता था कि अगर गांव चले जाएंगे तो थोड़ाबहुत जितना भी पैसा यहां अपने बच्चे के लिए बचा पा रहे हैं, वह भी नहीं बचा पाएंगे. यह सुन कर पूजा पति को कुछ कह नहीं पाती थी, क्योंकि गोविंद की इस बात में कहीं न कहीं सच्चाई थी.

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मुजफ्फरपुर में गोविंद के गांव में भी उस की संपत्ति बहुत अधिक नहीं थी. खेती लायक जितनी जमीन थी, उस पर गोविंद के बड़े और छोटे भाई मिल कर खेती करते थे.

इधर गोविंद और पूजा के 6 दिन के बच्चे को ढूंढने की जिम्मेदारी थानाप्रभारी कुलदीप सिंह ने एएसआई बरमेश्वर को सौंप दी. एएसआई बरमेश्वर ने अपनी शुरुआती जांच में पाया कि जिस दिन गोविंद और पूजा ने अपने बच्चे के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी, ठीक उसी दिन गोविंद और उस का परिवार दिल्ली के आया नगर में शिफ्ट हुआ था.

इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए पुलिस टीम ने गोविंद से पूछा कि कहीं उस की किसी से दुश्मनी तो नहीं है या फिर इस अपहरण के पीछे उसे किसी पर शक तो नहीं.

गोविंद ने पुलिस के इस सवाल का जवाब थोड़े नाटकीय अंदाज में घुमाफिरा कर दिया. उस ने कहा, ‘‘साहब, हम तो इस मकान में आज ही रहने के लिए आए थे. इस के पहले हम सिकंदरपुर में किराए पर रहते थे तो मेरे दोस्त हरिपाल सिंह ने मेरे परिवार को अपने घर चले आने के लिए कहा. क्योंकि पहले जहां रहते थे, वहां जगह बहुत छोटी थी. मुश्किल से हम 4 लोग जमीन पर सो पाते थे.’’
‘‘साहब, मुझे लगता है कि हरिपाल ने ही हमारे बच्चे का अपहरण किया है.’’ पूजा ने रोते हुए गोविंद की बात बीच में काटते हुए कहा. इस के बाद पुलिस टीम ने अन्य किराएदारों से हरिपाल सिंह के बारे में पूछताछ की.

हरिपाल सिंह हरियाणा के गुड़गांव में प्लंबर का ठेकेदार था और वह गोविंद को जानता था. दरअसल, हरिपाल गोविंद को दिहाड़ी मजदूरी के लिए अकसर बुला लिया करता था. पिछले 4-5 सालों से हरिपाल और गोविंद एकदूसरे को जानते थे और इस बीच वे दोस्त भी बन गए थे.

जब पूजा ने हरिपाल पर शक होने की बात कही तो पुलिस ने सब से पहले मकान मालिक हरिपाल को ढूंढने के लिए अपने सभी मुखबिरों को अलर्ट कर दिया. इस के बाद हरिपाल के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज इकट्ठी की गई और उन्हें एकएक कर बारीकी से देखा गया.

थाने में टैक्निकल टीम और अन्य जांच टीम की मदद से पुलिस ने यह पता लगा लिया कि हरिपाल आया नगर के ई-ब्लौक में कहीं मौजूद है.

यह सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी कुलदीप सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम ने आया नगर के ई-ब्लौक में, जिस मकान में हरिपाल के मौजूद होने का शक था, वहां एकाएक रेड डाली. हरिपाल सिंह उसी मकान में मिल गया. उसे हिरासत में ले कर टीम थाने लौट आई.

थाने में उस से बच्चे के बारे में पूछा. जिस के जवाब में हरिपाल ने कुछ ऐसा कहा, जिस के बारे में पुलिस ने बिलकुल भी नहीं सोचा था. हरिपाल ने डरते हुए पुलिस को बताया, ‘‘साहब, जिस बच्चे के अपहरण की बात आप लोग कर रहे हैं, उस का अपहरण नहीं हुआ. बल्कि गोविंद और पूजा की मंजूरी से ही उसे बेचा गया है.’’

यह सुनते ही पुलिस भी चौंक गई कि क्या कोई मांबाप अपना बच्चा बेच भी सकते हैं. गोविंद और पूजा से पूछताछ करने से पहले पुलिस कीपहली प्राथमिकता बच्चे को सहीसलामत बरामद करने की थी.

इसलिए पुलिस ने हरिपाल से पूछताछ जारी रखी. हरिपाल ने बताया, ‘‘साहब, बच्चा मांबाप की सहमति से ही खरीदने वाले दंपति को दिया गया है, जिस के लिए गोविंद और पूजा को 3 लाख 60 हजार रुपए दिए गए थे.’’

उस ने पुलिस को सच बताते हुए अपने दोस्त रमन यादव का नाम बताया, जिस के रिश्तेदार बच्चा खरीदने वाले विद्यानंद यादव और रामपरी देवी हैं. पुलिस ने हरिपाल से रमन यादव के बारे में तफ्तीश की और दिल्ली के संजय कैंप, मोती बाग के रहने वाले रमन को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

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बच्चा खरीदने वाले दंपति विद्यानंद यादव (50) और रामपरी देवी (45) बिहार के मधुबनी जिले के इनरवा गांव के रहने वाले थे. विद्यानंद और रामपरी को शादी के कई सालों बाद भी जब कोई बच्चा नहीं हुआ तो समाज में उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाने लगा था.

पुलिस ने जब रमन यादव को गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की तो उस ने कहा, ‘‘साहब, विद्यानंद मेरा साढ़ू है और वह 50 साल का हो चुका है लेकिन उस की खुद की कोई औलाद नहीं है. गांव के लोग मेरे साढ़ू के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं.

‘‘आसपास के किसी बच्चे के साथ जब कोई घटना हो जाती है या जब बच्चे खेलतेखेलते गिर जाते हैं और चोट लग जाती है तो लोग उस का इलजाम भी विद्यानंद और उस की पत्नी रामपरी पर लगाते हैं. लोग कहते हैं कि उन की बुरी नजर की वजह से गांव में बच्चों के साथ दुर्घटना होती है.

‘‘इतना ही नहीं गांव वाले यह तक कहते हैं कि विद्यानंद और उस की पत्नी गांव में बच्चों को बुरी नजर से देखते हैं. यहां तक कि कई लोग उस से अनायास ही झगड़ा करते हैं. यह सब मुझ से देखा नहीं जाता था.’’

पुलिस ने रमन यादव से पूछा कि अभी इस समय बच्चा कहां हैं तो रमन ने बताया, ‘‘विद्यानंद और रामपरी बच्चे को अपने साथ ले कर गांव के लिए रवाना हो गए हैं. रात को आनंद विहार रेलवे स्टेशन से मधुबनी के लिए निकल चुके हैं.’’

पुलिस की टीम ने जल्द ही बच्चे को सहीसलामत ढूंढने के लिए आनंद विहार से मधुबनी जाने वाली ट्रेन का पता लगाया और ट्रेन की लाइव लोकेशन का पता कर आगे की काररवाई तेजी से की.

पता चला कि ट्रेन कानपुर पहुंचने वाली है. देरी न करते हुए पुलिस की टीम ने रेलवे अधिकारियों से पैसेंजर की लिस्ट मंगवा कर कानपुर सेंट्रल के नजदीकी पुलिस थाने हरबंस मोहाल के थानाप्रभारी सत्यदेव शर्मा को मामले के बारे में सारी जानकारी दी.

सत्यदेव शर्मा ने तत्परता दिखाते हुए कानपुर रेलवे स्टेशन जा कर बताई गई ट्रेन के कोच और सीट नंबर पहुंच गए. एक बुजुर्ग दंपति उस ट्रेन में एसी डिब्बे में सफर कर रहे थे और रामपरी बच्चे को कंबल में लपेट कर उसे अपने हाथों में लिए चुपचाप बैठी थी.

जब पुलिस को आते हुए उस बुजुर्ग ने देखा तो तुरंत ट्रेन में दूसरी ओर जाने का प्रयास किया, लेकिन दूसरी तरफ से भी पुलिस उस की तरफ आ रही थी.
अंत में हार मानते हुए उन्होंने पुलिस के हाथों खुद को सरेंडर कर दिया और थानाप्रभारी की टीम ने आरोपी दंपति को पकड़ कर दिल्ली फतेहपुर बेरी थाने के प्रभारी कुलदीप सिंह को सूचना दे दी. जिस के बाद दिल्ली से एक टीम तुरंत कानपुर के लिए रवाना हो गई और सारी औपचारिकताएं पूरी कर विद्यानंद यादव, उस की पत्नी रामपरी व बच्चे को ले कर दिल्ली लौट आई.

पुलिस ने विद्यानंद ने पूछताछ की तब उस ने अपनी दुखभरी कहानी पुलिस को बताई, वह इस प्रकार थी.

बच्चे की लालसा में बुजुर्ग दंपति विद्यानंद यादव और रामपरी देवी लगातार अपने गांव में लोगों के उपेक्षित व्यवहार से परेशान थे. हालांकि विद्यानंद और रामपरी का परिवार पैसों के मामले में बहुत संपन्न नहीं था. खेती लायक बेहद कम जमीन थी, एक घर था वह भी आधा कच्चा और आधा पक्का. उन्हें बच्चा तो चाहिए था लेकिन लड़का ही.

यह बात उस के साढू रमन यादव को मालूम थी. रमन यादव गुड़गांव में पीओपी का काम किया करता था और वह हरिपाल को जानता था.

रमन और हरिपाल अकसर काम से निकलने के बाद घर जाने से पहले दारू पीते थे. ऐसे ही एक दिन जब रमन और हरिपाल दारू पी रहे थे तो रमन ने उसे अपने साढू विद्यानंद के बारे में बताया.

दारू पीते हुए रमन ने अपनी लड़खड़ाती जुबान में कहा, ‘‘यार, गांव में मेरा एक साढू है विद्यानंद. उस की कोई औलाद नहीं है. बेचारे को गांव में लोग बहुत जलील करते हैं. फालतू का झगड़ा करते हैं.’’

‘‘लेकिन ऐसा क्यों?’’ हरिपाल ने नशे की हालत में रमन से पूछा. ‘‘अरे यार, तुझे बताया तो, औलाद नहीं है बेचारों की. कोई भी कुछ भी बोलता है उन के बारे में. उन के घर के आंगन में लोग थूकते हैं.’’ रमन बोला.

‘‘कुछ करना चाहिए यार. कम से कम मरने से पहले उन्हें औलाद का सुख तो नसीब होना ही चाहिए.’’

हरिपाल अपने ऐसे ही एक दोस्त को जानता था, जिस के घर हालफिलहाल में बच्चा हुआ था. वह था गोविंद. उस ने रमन को नशे की हालत में वादा किया कि वह जरूर उस के साढू विद्यानंद के लिए कुछ करेगा.

8 जून, 2021 को गोविंद के घर में बच्चे की किलकारियां गूंजी थीं. उस के चौथे दिन ही हरिपाल गोविंद से मिला और उस से अपने बच्चे को बेचने के बारे में बात की.

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हरिपाल ने गोविंद के सामने डरसहम कर अपनी बात रखी. उस ने कहा, ‘‘गोविंद देख तेरी हालत के बारे में तुझ से बेहतर अभी कोई नहीं जानता. मुझे मालूम ह कि पिछले साल जब लौकडाउन लगा था तब तेरे परिवार ने किस तरह से गुजारा किया था. ये स्थिति सुधारने का एक उपाय है. अगर तू कहे तो मैं उस के बारे में बताऊंगा.’’

गोविंद ने बिना हिचकिचाए उस से इस के बारे में पूछा, ‘‘हां बताइए न, क्या तरीका है.’’हरिपाल ने अपनी आवाज में आत्मविश्वास पैदा किया और बोला, ‘‘देख, गुस्सा मत करियो. तेरे घर में जो बच्चा अभी पैदा हुआ है, उसे बेच दे. देख मैं जानता हूं कि इस बात से तुझे गुस्सा जरूर आएगा, लेकिन तू भी तो सोच जरा. ऐसे मजदूरी कर के क्या तू अपने परिवार को खुशी दे सकता है? क्या इस बढ़ती महंगाई के जमाने में तू अपनी बीवी समेत अपने दोनों बच्चों को पाल सकता है? मैं एक आदमी को जानता हूं, जो बच्चा खरीदने के लिए तैयार है. अब तू देख, तुझे क्या करना है.’’

हरिपाल के मुंह से यह सब सुन कर बेशक गोविंद के होश जरूर उड़ गए थे, लेकिन उस की बातों को कहीं न कहीं सच और ठीक जरूर मान रहा था. गोविंद हरिपाल को बिना कुछ कहे वहां से निकल गया और घर जा कर उस ने इस बारे में अपनी पत्नी पूजा से ठीक उसी अंदाज में बात की.

पूजा अपने परिवार के मौजूदा हालात को अच्छी तरह से जानती थी. वह गोविंद की बातों से नाराज नहीं हुई, बल्कि उस की इन बातों ने उसे सोच में डाल दिया था. उस रात वह सो भी नहीं पाई, बल्कि जमीन पर लेटे हुए करवट बदलबदल कर पूरी रात सोचती रही.

सुबह हुई तो उस ने गोविंद को बीती रात को हुई बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘हां तो क्या सोचा है तुम ने? क्या ये करना है?’’

गोविंद को एकपल के लिए हैरानी हुई. लेकिन उस ने तुरंत अपनी पत्नी के सवाल का जवाब दिया और बोला, ‘‘देखो, हमारे पास इस के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं नजर आ रहा है. कम से कम जिसे अपना बच्चा देंगे उस को औलाद नसीब होगी, और जो पैसे हमें मिलेंगे उस से हमारा कुछ तो भला हो जाएगा. और हमारा एक सहारा तो है ही.’’ यह कहते हुए गोविंद और पूजा ने बच्चे की कीमत 4 लाख रुपए तय की और दोनों ने एकदूसरे को भरोसे के साथ देखा. यह बात गोविंद ने हरिपाल को मिल कर बताई कि वे दोनों इस काम के लिए तैयार हैं और बच्चे की कीमत उन्होंने 4 लाख रुपए रखी है. हरिपाल ने यह बात रमन को बताई और रमन ने यह बात आगे विद्यानंद तक पहुंचा दी.
विद्यानंद और रामपरी दोनों को बच्चा तो चाहिए था, लेकिन वे 4 लाख रुपए नहीं दे सकते थे. इसी तरह से फोन पर गोविंद और पूजा ने हरिपाल और रमन के जरिए विद्यानंद से बात कर आखिरी कीमत 3 लाख 60 हजार रुपए तय कर दी, जिस में दोनों पार्टी संतुष्ट हो गईं.

कीमत तय होने के बाद विद्यानंद को अब पैसों का जुगाड़ करना था क्योंकि उस के पास इतने पैसे नहीं थे. इस के लिए उस ने अपनी खेती की जमीन में से 3 कट्ठा जमीन तुरंत गांव में किसी खरीददार को 3 लाख रुपए में बेच दी. पैसे मिल जाने के बाद विद्यानंद और रामपरी दोनों हरिपाल और रमन से बात कर दिल्ली पहुंच गए.

बच्चा जिस दिन 6 दिनों का हुआ उस रात को विद्यानंद, रामपरी, गोविंद, पूजा और रमन हरिपाल के घर पर डील करने के लिए आ गए. गोविंद और पूजा ने दिन भर लग के अपना किराए का कमरा भी खाली कर दिया था और वे लोग हरिपाल के घर पर किराए पर शिफ्ट हो गए थे. क्योंकि इस से उन्हें डर था कि यदि पुराने किराएदार बच्चे को नहीं देखेंगे तो शक करेंगे.

विद्यानंद ने गोविंद को 2 लाख रुपए नकद दिए और 40-40 हजार के 4 चैक दिए. हरिपाल और रमन ने मिल कर गोविंद और पूजा से वहीं सहमति पत्र भी लिखवा लिया, जिस में उन्होंने उन के दस्तखत भी करवा लिए.

सारी डीलिंग हो गई तो रमन अपने साढू विद्यानंद, रामपरी और बच्चे को ले कर वहां से रवाना हो गया. रमन विद्यानंद को आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर छोड़ आया और खुद अपने घर चला गया.

उधर गोविंद और पूजा पैसे तथा चैक ले कर अपने कमरे की ओर चल दिए. जब वे अपने कमरे में पहुंच कर पैसे गिन रहे थे और चैक देख रहे थे तो चैक पर तारीख उस दिन के बजाय 18 जून की थी. यह देखते ही गोविंद को झटका लगा और उन दोनों को उस समय ठगा हुआ महसूस हुआ. उन्हें लगा कि एक तो उन्होंने अपना बच्चा भी दे दिया है और वहीं दूसरी ओर उन्हें पैसे भी पूरे नहीं मिले.

फिर अचानक से गोविंद की पत्नी पूजा के अंदर अपने बच्चे को ले कर ममता जाग उठी. एक तो उन्हें पैसे कम मिले थे और वहीं दूसरी तरफ पूजा के
मन में अपने बच्चे को ले कर उपजी चिंता ने उसे अंदर ही अंदर शर्मिंदगी महसूस करवा दी.

अंत में उस से रहा नहीं गया और वह अपने कमरे से निकल कर जोरजोर मुन्नामुन्ना पुकार कर रोने लगी. 100 नंबर पर फोन करने के बाद जब पुलिस आई तो पुलिस को गुमराह किया गया, लेकिन पुलिस की जांच से उन का झूठ जल्द ही उजागर हो गया. और इस मामले के सभी आरोपी पकड़े गए.

इस मामले के मुख्य सभी आरोपी जिस में बच्चे को जन्म देने वाली मां पूजा देवी, उस का पिता गोविंद कुमार, गोविंद का दोस्त हरिपाल सिंह, हरिपाल का दोस्त रमन यादव, रमन यादव का साढू और बच्चे को खरीदने का मुख्य आरोपी विद्यानंद यादव और उस की पत्नी रामपरी सब पुलिस की हिरासत में हैं.

मांबाप के भी जेल चले जाने के बाद पुलिस ने बरामद किए बच्चे को सरिता विहार स्थित शिशु गृह को सौंप दिया. जहां वह महफूज हाथों में है. द्य

Satyakatha- जब इश्क बना जुनून: भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

गांव में रहने वाली पत्नी शाहिदा को रईस शेख अपने साथ मुंबई लिवा लाया था. लेकिन शाहिदा को मुंबई की ऐसी हवा लगी कि उस के पैर बहक गए और वह पड़ोसी युवक अनिकेत मिश्रा उर्फ अमित से जुनूनी इश्क करने लगी. 25मई, 2021 की बात है. मुंबई के दहिसर (पूर्व) इलाके की रहने वाली शाहिदा थाना दहिसर पहुंची. थाने में उस समय सबइंसपेक्टर सिद्धार्थ दुधमल ड्यूटी पर तैनात थे. शाहिदा ने उन से मुलाकात कर कहा, ‘‘साहब, पिछले 4 दिन से मेरे पति रईस शेख गायब हैं. हम ने उन्हें काफी तलाश किया, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. मुझे उन्हें ले कर बहुत घबराहट हो रही है.’’

उस की बात सुनते ही उन्होंने तुरंत सवाल किया, ‘‘अब तक तुम कहां थीं? 4 दिनों से तुम्हारा पति गायब है और तुम्हें आज 5वें दिन रिपोर्ट दर्ज कराने की याद आई है?’’

‘‘साहब, वह 21 मई की शाम को घर से कहीं गए थे. वह अपना मोबाइल घर पर ही छोड़ गए थे. मैं ने सोचा कि कहीं आसपास गए होंगे, कुछ देर में आ जाएंगे. जब वह वापस नहीं आए तो मैं खुद ही उन की तलाश करने में लग गई. मैं ने उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित उन के गांव व रिश्तेदारियों में भी फोन किया. जब उन का कुछ पता नहीं चला तो आज थाने आ गई.’’

2-4 सवाल कर के एसआई सिद्धार्थ दुधमल ने रईस शेख की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने इस बात की जानकारी थाने में ही मौजूद इंसपेक्टर मराठे और असिस्टेंट इंसपेक्टर जगदाले को दी तो उन्होंने भी शाहिदा को बुला कर उस से पूछताछ की.

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इंसपेक्टर मराठे ने उस से पूछा, ‘‘जब वह न गांव गया, न अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार के यहां गया है तो फिर वह गया कहां है?’’

‘‘साहब, यही तो पता नहीं है. अगर यही पता होता तो मैं खुद न उन्हें खोज लेती.’’ रोते हुए शाहिदा ने कहा.

‘‘तुम दोनों के बीच लड़ाईझगड़ा तो नहीं हुआ जिस से वह नाराज हो कर घर से चला गया हो?’’ इस बार असिस्टेंट इंसपेक्टर जगदाले ने पूछा.

शाहिदा ने जवाब दिया, ‘‘नहीं साहब, वह तो वैसे भी सुबह जाते थे तो शाम को देर से घर आते थे. दिन भर के थकेमांदे होते थे, इसलिए जल्दी ही खा कर आराम करने के लिए लेट जाते थे. लड़नेझगड़ने का समय ही नहीं मिलता था.’’

‘‘तुम्हारे पति नौकरी कहां करते थे?’’

‘‘स्टेशन के पास एक कपड़े की दुकान में नौकरी करते थे.’’

‘‘वहां पता किया था? वहां तो उस का किसी से कोई लड़ाईझगड़ा नहीं हुआ था?’’ असिस्टेंट इंसपेक्टर जगदाले ने पूछा.

‘‘साहब, वह दुकान पर भी सब से हिलमिल कर रहते थे. उस दिन वह दुकान पर भी नहीं गए थे.’’ शाहिदा ने कहा, ‘‘मैं ने वहां जा कर पता किया था.’’

‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन है?’’ इंसपेक्टर मराठे ने पूछा.

‘‘यहां तो हम 4 लोग ही रहते थे. हम पतिपत्नी और 2 बच्चे. बाकी और लोग गांव में रहते हैं.’’

‘‘गांव से कोई नहीं आया तुम्हारी मदद के लिए?’’

‘‘साहब, मैं ने फोन कर दिया है. वहां से मेरा देवर आ रहा है. कलपरसों में आ जाएगा.’’ शाहिदा बोली.

‘‘ठीक है, तुम घर जाओ. हम पता करते हैं तुम्हारा पति कहां गया है. तुम घर पर ही रहना.’’ इंसपेक्टर मराठे ने कहा.

शाहिदा के जाने के बाद इंसपेक्टर मराठे ने रईस के अचानक 4 दिन पहले गायब हो जाने की जानकारी थानाप्रभारी एम.एम. मुजावर को दी. डीसीपी विवेक ठाकुर को भी रईस की गुमशुदगी के बारे में बताया गया.

इस के बाद मामले की जांच के लिए थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ शाहिदा के घर जा पहुंचे. टीम ने शाहिदा के घर का बारीकी से निरीक्षण किया. पर उस के घर में उस समय ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया, जिस से पुलिस उस पर पर शक करती.

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काफी कोशिश के बाद भी पुलिस को रईस के बारे में कुछ पता नहीं चल सका. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रईस गया तो कहां गया.

पुलिस ने उस कपड़े की दुकान पर भी जा कर पूछताछ की थी, जहां वह नौकरी करता था. दुकान मालिक से भी उस के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी.

शाहिदा की 6 साल की बिटिया से भी पुलिस ने पूछताछ की थी. वह डरी हुई जरूर लग रही थी, पर उस ने ‘न’ में सिर हिलाते हुए कहा था कि उसे पापा के बारे में कुछ नहीं पता. जब रईस का कोई सुराग नहीं मिला तो थानाप्रभारी एम.एम. मुजावर ने स्टाफ के साथ मीटिंग की. इस मीटिंग में सभी का यही शक था कि रईस अब जिंदा नहीं है.

उसी बीच रईस का भाई गांव से दहिसर आ गया था. वह भी रईस के दोस्तों के साथ मिल कर भाई की तलाश कर रहा था, पर रईस का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. वह थाने के भी लगातार चक्कर लगा रहा था.

उस की तलाश करतेकरते अब तक 10 दिन बीत चुके थे. धीरेधीरे सब निराश होने लगे थे. 11वें दिन शाहिदा किसी काम से बाहर गई हुई थी. रईस का भाई चुपचाप घर में लेटा यही सोच रहा था कि आखिर ऐसी क्या बात हुई जो भाई बिना बताए कहीं चला गया.

तभी उस की भतीजी यानी रईस की बेटी उस के सिरहाने बैठते हुए बोली, ‘‘चाचू, अगर आप मुझे बचा लो तो मैं आप को एक बात बताऊं.’’

‘‘ऐसी क्या बात है बेटा, जिस में बचाने की बात है?’’ रईस के भाई ने उस से कहा.

‘‘मम्मी ने कहा है कि अगर वह बात किसी को बताई तो वह मुझे भी पापा की तरह मार कर जमीन में गाड़ देंगी.’’ बच्ची बोली.

बच्ची की यह बात सुन कर रईस का भाई झटके से उठ कर बैठ गया. उस ने बच्ची की ओर देखा तो वह काफी डरी हुई थी. उस के सिर पर हाथ फेरते हुए रईस के भाई ने कहा, ‘‘मम्मी ने पापा को मार कर गाड़ दिया है क्या?’’

‘‘हां, अमित अंकल के साथ मिल कर पापा को पहले चाकू से मार दिया था. उस के बाद उन की लाश काट कर किचन में गाड़ दी है. मैं ने यह सब देख लिया तो मुझ से कहा कि अगर मैं ने यह सब किसी को बताया तो मुझे भी मार कर पापा की तरह किचन में गाड़ देंगी.’’ बच्ची ने कहा.

बच्ची के मुंह से सच्चाई सुन कर रईस का भाई सन्न रह गया.

उस ने भाभी से कुछ कहनासुनना उचित नहीं समझा. क्योंकि अगर वह शाहिदा से कुछ कहता तो वह फरार हो सकती थी. इसलिए वह भतीजी को साथ ले कर सीधे थाना दहिसर पहुंच गया.

थानाप्रभारी एम.एम. मुजावर थाने में ही थे. उस ने सारी बात उन्हें बताई तो वह तुरंत पुलिस टीम के साथ शाहिदा के घर पहुंच गए. शाहिदा तब तक आ चुकी थी. देवर और बेटी के साथ पुलिस को देख कर उसे समझते देर नहीं लगी कि उस की पोल खुल चुकी है.

पुलिस के सामने मजदूर ने जब किचन के फर्श को ध्यान से देखा तो साफ दिख रहा था कि फर्श की टाइल्स उखाड़ कर फिर से लगाई गई थीं, जो बड़े ही बेतरतीब तरीके से लगी थीं. पुलिस ने उसी जगह को खुदवाना शुरू किया.

जब इस बात की जानकारी मोहल्ले वालों को हुई तो सभी इकट्ठा हो गए. जब लोगों ने सच्चाई जानी तो उन के मन में शाहिदा के प्रति अब तक जो सहानुभूति थी, वह नफरत में बदलने लगी.

शाहिदा के घर के किचन की खुदाई के बाद जो मंजर नजर आया, उसे देख कर वहां जमा लोग ही नहीं, पुलिस तक सहम उठी, जिन का लगभग रोज ही इस तरह की घटनाओं से पाला पड़ता रहता है.

अगले भाग में पढ़ें- शाहिदा में बदलाव क्यों नजर आने लगा

Satyakatha- चाची के प्यार में बना कातिल: भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

14जून, 2021 की सुबह के 5 बजे का वक्त रहा होगा. सचिन उठते ही सब से पहले अपने घेर की तरफ चला गया. सचिन के पिता चंद्रपाल घर के पीछे बने जानवरों के घेर में ही सोते थे. घेर में जाते ही सचिन की निगाह पिता की चारपाई पड़ी, तो उस की जोरदार चीख निकल गई. चंद्रपाल की चारपाई खून से लथपथ पड़ी थी. चंद्रपाल के ऊपर पड़ी चादर तो लहूलुहान थी ही, साथ ही तमाम खून उस की चारपाई के नीचे भी पड़ा था.

सचिन की चीखपुकार सुन कर आसपड़ोस के लोग भी जाग गए थे. देखते ही देखते चंद्रपाल के घेर में लोगों का जमावड़ा लग गया. चारपाई के पास खून से सनी एक ईंट भी पड़ी थी. हालांकि चंद्रपाल की हालत देखते हुए कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस की सांसें अभी भी चल रही होंगी, इस के बावजूद भी सचिन पिता को अस्पताल ले गया. जहां पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था.

इस घटना की जानकारी पुलिस को अस्पताल के द्वारा ही पता चली थी. यह घटना उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा की थी. सूचना पाते ही कुंडा थानाप्रभारी अरविंद चौधरी कुछ कांस्टेबलों को साथ ले कर सीधे काशीपुर एल.डी. भट्ट अस्पताल पहुंचे. सरकारी अस्पताल में ही पुलिस ने मृतक के परिजनों से घटना की जानकारी जुटाई.

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इस के बाद एसआई महेश चंद ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. बाद में पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंच कर खून से सनी ईंट और अन्य सबूत जुटाए.

पुलिस केस की जांच में जुट गई. सचिन ने पुलिस को बताया कि 2 दिन पहले ही उस के पिता के साथ उस की चाची सविता की किसी बात को ले कर तूतूमैंमैं हुई थी. लेकिन उसे उम्मीद है कि उस की चाची इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकती.

यह जानकारी सचिन के लिए मायने नहीं रखती थी

यह जानकारी भले ही सचिन के लिए कोई मायने नहीं रखती थी. लेकिन पुलिस के लिए यह सूत्र अहम मायने रखता था. पुलिस ने सविता को पूछताछ के लिए अपनी हिरासत में ले लिया.

पूछताछ के दौरान सविता ने साफ शब्दों में जबाव दिया कि वह अपने जेठ का खून क्यों करेगी. उस के जेठ तो उस के बच्चों को बहुत ही प्यार करते थे. उसी दौरान चंद्रपाल के छोटे भाई ने बताया कि सविता का चालचलन ठीक नहीं है. वह 2 दिन पहले ही अपने भतीजे मंजीत को ले कर मुरादाबाद भाग गई थी. उसी बात को ले कर चंद्रपाल ने उसे काफी डांटफटकार लगाई थी.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस समझ गई कि माजरा क्या है. इस से पहले मंजीत कहीं भाग पाता, पुलिस ने उसे भी अपनी कस्टडी में ले लिया और दोनों को थाने ले आई. थाने ला कर दोनों से कड़ी पूछताछ हुई.

पुलिस ने इस मामले में मंजीत से पूछताछ की

पुलिस ने मंजीत से इस मामले में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस रात तो वह फैक्ट्री में काम करने गया हुआ था. ऐसे में वह अपने ताऊ की हत्या कैसे कर सकता है.

इस सच्चाई को जानने के लिए पुलिस की एक टीम उस फैक्ट्री में भी गई. वहां पर सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो सचमुच मंजीत की एंट्री वहां दर्ज थी. उपस्थिति वाले रजिस्टर पर उस के हस्ताक्षर भी मौजूद थे. यह सब देख कर पुलिस की जांच पर पानी फिर गया.

पुलिस ने इस बारे में सविता के पति रामपाल से पूछताछ की. रामपाल ने बताया कि वह सारे दिन मेहनतमजदूरी कर इतना थक जाता है कि सोने के बाद उसे होशोहवास नहीं रहता.

उसी जांचपड़ताल के दौरान पुलिस की नजर रामपाल के दरवाजे पर पड़ी. जिस पर खून की अंगुलियों के निशान साफ नजर आ रहे थे. फिर पूरे घर की तलाशी ली गई. तभी पुलिस को बाथरूम में खून से सना एक कपड़ा भी मिला, जिस से खून साफ किया गया था.

यह सब तथ्य जुटाने के बाद पुलिस ने मंजीत और सविता से अलगअलग पूछताछ की. जिस के दौरान थानाप्रभारी ने सविता से सीधा प्रश्न किया, ‘‘हमें तुम्हारी सारी सच्चाई पता चल गई है. हमें बाथरूम में वह कपड़ा भी मिल गया, जिस से खून साफ किया गया था. यह बात तो पक्की है कि चंद्रपाल की हत्या में तुम्हारा पूरा हाथ है. तुम्हारे लिए यही सही है कि सीधेसीधे सब कुछ बता दो. तुम ने चंद्रपाल की हत्या क्यों की.’’

पुलिस पूछताछ में सविता ज्यादा देर तक नहीं टिक पाई. उस ने बता दिया कि उस ने ही भतीजे के साथ मिल कर अपने जेठ की हत्या की है. सविता के बाद पुलिस ने मंजीत को अलग ले जा कर कहा कि तुम्हारी प्रेमिका चाची ने हमें सब कुछ बता दिया है. लेकिन हम तुम से केवल इतना जानना चाहते हैं कि तुम ने फैक्ट्री में ड्यूटी करते हुए भी किस तरह से चंद्रपाल की हत्या की?

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मंजीत भी कच्चा खिलाड़ी था. उस ने भी पुलिस को सब कुछ साफसाफ बताते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया था. इस केस के खुलने के बाद जो चाचीभतीजे की प्रेम कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

यह मामला उत्तराखंड के जिला ऊधमसिंह नगर के कुंडा थाना से उत्तर दिशा में लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित गांव टीले का है. बहुत पहले गांव मैरकपुर पाकवाड़ा, मुरादाबाद निवासी सुमेर सिंह रोजीरोटी की तलाश में यहां आए और यहीं के हो कर रह गए.

सुमेर सिंह के 4 बेटे थे, जिन में चंद्रपाल सब से बड़ा, उस के बाद विक्रम तथा रामपाल सब से छोटा था. समय के साथ तीनों की शादियां भी हो गईं. शादी होते ही सभी भाइयों ने अपनी गृहस्थी संभाल ली और अलगअलग मकान बना कर रहने लगे थे.

अब से 5 साल पहले चंद्रपाल का चचेरा भाई करन अपने परिवार से मिलने आया था. करन ने यहां का रहनसहन देखा तो वह भी यहीं का दीवाना हो गया.

करन के परिवार से संबंध रखने के कारण चंद्रपाल ने उसे रहने के लिए अपने ही घर में शरण दी थी.

रामपाल की शादी काशीपुर के टांडा उज्जैन से हुई थी. रामपाल शुरू से ही सीधेसरल स्वभाव का था. जबकि रामपाल की बीवी शहर की रहने वाली और तेजतर्रार थी. शादी के बाद गांव का रहनसहन उसे पसंद नहीं था.

एक साल उस ने जैसेतैसे उस के साथ काटा और फिर उस ने रामपाल से संबंध विच्छेद कर लिया. उस समय तक उस की बीवी के कोई औलाद पैदा नहीं हुई थी. रामपाल की बीवी उसे छोड़ कर चली गई तो रामपाल उदास रहने लगा.

इस के बाद भाइयों ने फिर से रामपाल की शादी मुरादाबाद जिले के टांडा स्वार के मानपुर की रहने वाली सविता से करा दी. सविता के साथ दूसरी शादी हो जाने से रामपाल खुश रहने लगा था.

रामपाल सुबह ही मेहनतमजदूरी करने के लिए घर से निकल जाता, फिर देर शाम ही घर पहुंच पाता था. गुजरते समय के साथ सविता 2 बच्चों की मां भी बन गई. हालांकि सविता पहले से ही देखनेभालने में सुंदर थी, लेकिन 2 बच्चों को जन्म देने के बाद तो उस की देह और भी चमक उठी थी.

रामपाल के मकान के सामने ही करन सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस वक्त करन का बड़ा बेटा मंजीत जवानी के दौर से गुजर रहा था. मंजीत आवारा किस्म का था. हर समय वह अपनी चाची सविता के पास ही पड़ा रहता था.

उस के साथ रहने से सविता को एक सब से बड़ा फायदा था कि वह उस के बच्चों को संभालने में उस की मदद करता था. सविता को जब कभी भी अपने घर का कामकाज निपटाना होता था तो वह अपने बच्चों को मंजीत के पास ही छोड़़ देती थी.

कुसगंति से मंजीत के मन में गंदगी पनपनी शुरू हुई तो चाची के प्रति उस की सोच भी बदल गई थी.

हालांकि सविता उसे अपने भतीजे के रूप में ही देखती आ रही थी. लेकिन जैसे ही मंजीत का बदलता नजरिया देख कर सविता के मन में भी उथलपुथल पैदा हो गई. उसे अब पति रामपाल का शरीर कुछ थकाथका सा महसूस होने लगा था.

कई बार सविता बच्चों को मंजीत को सौंप कर उसी के सामने नहाने लगती थी, जिसे आंख चुरा कर देखने में मंजीत की आंखों को बहुत ही सुख मिलता था.

सविता नहाने के बाद अपने तन को तौलिए से ढंक कर कमरे में जाती तो मंजीत की हवस भरी निगाहें उस के शरीर का पीछा करती रहती थीं. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि सविता कमरे में तौलिए से अपने तन का पानी पोंछ रही थी, उसी दौरान उस के हाथ से तौलिया छूटा और नीचे गिर गया.

सविता ने बड़ी ही फुरती से तौलिया उठाने की कोशिश की तो सामने दरवाजे के सामने ही मंजीत खड़ा देख रहा था.

‘‘अरे मंजीत, तुम यहां? तुम ने कुछ देखा तो नहीं?’’

‘‘नहींनहीं चाची, मैं ने कुछ नहीं देखा.’’

मंजीत की बात सुनते ही सविता मुसकराई, ‘बुद्धू कहीं का, पूरा सीन हो गया, लेकिन ये कुछ समझने को तैयार ही नहीं.’

अगले भाग में पढ़ें- उस दिन दोनों के बीच चाचीभतीजे के रिश्ते तारतार हुए

Satyakatha- चाची के प्यार में बना कातिल: भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

12 जून, 2021 को दोनों ने घर से भागने का पूरा प्लान तैयार किया और काशीपुर से ट्रेन पकड़ कर घर वालों की चोरीछिपे मुरादाबाद जा पहुंचे. मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही दोनों जीआरपी की निगाहों में संदिग्ध के रूप में चढ़ गए.

जीआरपी ने उन से पूछताछ की तो मंजीत ने साफसाफ बता दिया कि वह उस की चाची है. हम दोनों किसी बीमार रिश्तेदार को देखने के लिए आए हुए हैं. लेकिन पुलिस को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ तो उन्होंने परिवार वालों से बात कराने को कहा.

तब मंजीत ने अपनी बुआ की नातिन से जीआरपी वालों की बात करा दी. जिस के बाद पुलिस वालों ने उन्हें सीधे घर जाने की हिदायत देते हुए छोड़ दिया.

रेलवे पुलिस से छूटने के बाद भी मंजीत बुरी तरह से घबराया हुआ था. उसे पता था कि इस वक्त देश बुरे हालात से गुजर रहा है. घर से जाने के बाद न तो उन्हें कहीं भी इतनी आसानी से नौकरी ही मिलने वाली है और न ही उस के बाद उस के घर वाले उसे शरण देने वाले हैं.

यह सब मन में विचार उठते ही सविता ने मंजीत के सामने एक प्रश्न किया, ‘‘मंजीत, मैं तेरी खातिर अपना घरबार, बच्चों तक को छोड़ आई. लेकिन तेरे अंदर इतनी भी हिम्मत नहीं कि तू अपने ताऊ को सबक सिखा सके. उस ने ही हम दोनों का जीना हराम कर रखा है. अगर वह न हो तो हमें घर से भागने की जरूरत भी नहीं होती.’’

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सविता की बात मंजीत के दिल को छू गई

सविता की बात मंजीत के दिल को छू गई, ‘‘चाची, तुम अब बिलकुल भी चिंता मत करो. मैं घर वापस जाते ही उस ताऊ का ऐसा इलाज करूंगा कि वह कुछ कहने लायक भी नहीं रहेगा.’’

सविता को विश्वास में ले कर मंजीत अपने घर वापस चला गया. घर जाने के बाद वही सब कुछ हुआ, जिस की उम्मीद थी. दोनों के घर पहुंचते ही परिवार वालों ने उन्हें उलटासीधा कहा. चंद्रपाल ने सविता को घर तक में नहीं जाने दिया था. जिस के कारण मंजीत ने उसी रात अपने ताऊ को मौत की नींद सुलाने का प्रण कर लिया था.

14 जून, 2021 की शाम को मंजीत अपने काम पर चला गया. लेकिन फैक्ट्री में काम करते वक्त भी उस की निगाहों के सामने उस के ताऊ की सूरत ही घूमती रही. उसी वक्त मशीनों में कोई तकनीकी खराबी आ गई, जिस के कारण मशीन बंद करनी पड़ी.

मंजीत को लगा कि वक्त उस का साथ दे रहा है. उस ने तभी सविता को फोन मिलाया और आधे घंटे बाद ताऊ के घेर के पास मिलने को कहा. मंजीत की बात सुनते ही सविता के हाथपांव थरथर कांपने लगे थे.

उसे लगा कि आज वह जो काम करने जा रही है वह ठीक से हो पाएगा भी या नहीं. उस की चारपाई के पास ही पति रामपाल खर्राटे मार कर सो रहा था. रामपाल को सोते देख उस ने किसी तरह से हिम्मत जुटाई और धीरे से घर का दरवाजा खोल कर दबे पांव चंद्रपाल के घेर की तरफ बढ़ गई.

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मंजीत किसी तरह से फैक्ट्री की पिछली दीवार फांद कर बाहर आया और सीधे अपने ताऊ चंद्रपाल के घेर में पहुंचा. उस वक्त सभी लोग गहरी नींद में सोए हुए थे. सविता मंजीत के पहुंचने से पहले ही वहां पहुंच चुकी थी.

घेर में पहुंचते ही मंजीत ने घेर में जल रहे बल्ब को उतार दिया, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके. चंद्रपाल भी सारे दिन मेहनतमजदूरी कर के थक जाता था. उसी थकान को उतारने के लिए वह अकसर ही रात में शराब पी कर ही सोता था. जिस वक्त मंजीत और सविता उस के पास पहुंचे, वह गहरी नींद में सोया हुआ था.

मुंह बंद होने के कारण चंद्रपाल की चीख तक न निकल सकी

चंद्रपाल को सोते देख मंजीत ने सविता को उस का मुंह बंद करने का इशारा किया, फिर उस ने अपने हाथ में थामी ईंट से लगातार कई वार कर डाले. मुंह बंद होने के कारण चंद्रपाल की चीख तक न निकल सकी.

थोड़ी देर तड़पने के बाद उस की सांसें थम गईं. इस के बावजूद भी मंजीत बेरहमी दिखाते हुए उस के चेहरे व सिर पर कई वार ईंट से प्रहार किया. जब चंद्रपाल का शरीर पूरी तरह से शांत हो गया तो दोनों वहां से चले गए.

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सविता के हाथों पर खून लगा हुआ था, जो उस के घर के दरवाजे पर भी लग गया था. घर पहुंच कर सविता ने एक कपड़े से हाथों का खून पोंछा. वह कपड़ा उस ने बाथरूम में डाल दिया था, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया था.

ताऊ को  मौत की नींद सुला कर मंजीत सीधा फैक्ट्री में पहुंच गया, जिस के बाद उस ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की. लेकिन पुलिस के आगे उस की सारी होशियारी धरी की धरी रह गई.

चंद्रपाल के बेटे सचिन की तरफ से भादंवि की धारा 302 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने इस मामले में दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया था.

Satyakatha- चाची के प्यार में बना कातिल: भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

एक दिन मंजीत जुलाई महीने में अपनी सविता चाची के घर पहुंचा. उस के परिवार वाले खेतों पर काम करने गए हुए थे. सविता के बच्चे सोए पड़े थे. सविता बच्चों के पास ही सोई हुई थी. उस समय नींद की आगोश में उस के अंगवस्त्र अस्तव्यस्त हो चुके थे.

मंजीत ने अपनी चाची को इस हाल में सोते देखा तो उस के तनमन के तार झनझनाने लगे. उसी समय सविता की आंखें खुलीं तो उस ने सामने मंजीत को बैठे देखा. वह पहल करते हुए बोली, ‘‘मंजीत तू कब आया? तेरे आने का तो मुझे पता ही नही चला.’’

‘‘बस चाची, यूं समझो कि अभीअभी आया था. घर पर नींद नहीं आ रही थी तो सोचा चाची के पास थोड़ा वक्त काट आऊं. लेकिन यहां आ कर देखा तो आप गहरी नींद में सोई पड़ी थीं.’’

‘‘अरे नहीं, आजकल मुझे गहरी नींद कहां आ रही है. मेरी कमर में दर्द है. उसी से परेशान रहती हूं. कई बार तेरे चाचा से तेल की मालिश करने को कहती हूं, लेकिन उन के पास टाइम ही नहीं है.’’

‘‘कोई बात नहीं, चाचा के पास टाइम नहीं है तो मैं तो हर वक्त खाली ही रहता हूं. अगर आप कहें तो मैं ही आप की मालिश कर देता हूं.’’

सविता का निशाना बिलकुल सही लक्ष्य भेदने को तैयार था. मंजीत की बात सुनते ही सविता उठ खड़ी हुई. उस ने घर का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया. फिर उस ने तेल की शीशी उस के हाथ में थमा दी और कंधे पर मालिश करने को कहा.

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मंजीत ने हाथ में तेल ले कर सविता के कंधों से मालिश शुरू की तो उस के हाथ धीरेधीरे कंधे से नीचे फिसलने लगे. सविता को भी उन्हीं पलों का इंतजार था. सविता की बीमारी का इलाज होना शुरू हुआ तो वह इतनी मदहोश हो गई कि उस ने अपनी ब्रा के हुक खोल दिए और सीने के बल चारपाई पर लेट गई.

धीरेधीरे मंजीत का धैर्य जबाव दे चुका था

धीरेधीरे मंजीत का धैर्य जबाव दे चुका था. दोनों की रगों में खून गर्म हो कर दौड़ने लगा था. अंत में वह पल भी आ गया कि दोनों ही कामवासना की आग से गुजर गए.

मंजीत ने उस दिन जिंदगी में पहली बार किसी औरत के शरीर का सुख पाया था. वहीं सविता भी बहुत खुश थी. उस दिन दोनों के बीच चाचीभतीजे के रिश्ते तारतार हुए तो यह सिलसिला अनवरत चलता गया.

दोनों के बीच लगभग 3 साल से अनैतिक रिश्ते चले आ रहे थे. लेकिन जब दोनों के बीच नजदीकियां ज्यादा ही बढ़ गईं तो उन की प्रेम कहानी की चर्चा पूरे गांव में फैल गई.

इस बात की जानकारी परिवार तक पहुंची तो चंद्रपाल ने करन से वह मकान खाली करा लिया. करन ने गांव के पास ही थोड़ी सी जमीन खरीद रखी थी, वह उसी में बच्चों को ले कर झोपड़ी डाल कर रहने लगा.

इस बात को ले कर पंचायत हुई. पंचायत में सविता को भी बुलाया गया था. भरी पंचायत में सविता ने अपने ही जेठ पर उसे बदनाम करने का आरोप लगाया था.

बातों ही बातों में चंद्रपाल सविता पर गर्म पड़ा तो

बातों ही बातों में चंद्रपाल सविता पर गर्म पड़ा तो करन ने उसे मारने के लिए घर से कुल्हाड़ी तक निकाल ली थी. जिस के बाद से चंद्रपाल उस से डर कर रहता था. उस के बाद उस ने न तो कभी मंजीत को ही टोका और न ही सविता को.

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उस के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच फिर से खिचड़ी पकने लगी थी. चंद्रपाल ने कई बार रामपाल को टोका कि तेरी बीवी जो कर रही है वह ठीक नहीं है. उसे थोड़ा समझा कर रख. इन दोनों के कारण पूरे गांव में उन के परिवार की बदनामी होती है. लेकिन रामपाल तो अपनी बीवी से इतना दब कर रहता था कि उसे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं कर पाता था.

मंजीत और सविता के बीच जो कुछ चल रहा था, रामपाल भी जानता था. लेकिन वह मजबूर था. उस के बाद तो सविता रामपाल पर इस कदर हावी हो चुकी थी कि उस के सामने ही मंजीत को अपने घर पर बुला लेती थी.

इस बार देश में फिर से लौकडाउन लगा तो दोनों ही एकदूसरे से मिलने के लिए परेशान रहने लगे थे. उस दौरान दोनों के बीच जो भी बात होती थी, वह मोबाइल पर ही होती थी. लेकिन दोनों ही एकदूसरे की चाहत में बुरी तरह से परेशान थे.

जब मंजीत की जुदाई सविता से सहन नहीं हो पाई तो उस ने उस के सामने एक प्रश्न रखा. अगर तुम मुझे दिल से प्यार करते हो तो दुनिया की चिंता क्यों करते हो. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं. लेकिन यह जुदाई अब मुझ से सहन नहीं

होती. मैं तुम्हारे लिए यह घर छोड़ने को तैयार हूं.

लेकिन मंजीत हमेशा उस की हिम्मत तोड़ देता था. अगर हम दोनों घर से भाग कर शादी कर भी लें तो तुम्हारे बच्चों का क्या होगा? फिर उस के बाद तो हम समाज में मुंह दिखाने लायक भी नही रहेंगे. मंजीत इस वक्त काशीपुर की एक पेपर मिल में काम करता था.

काम करते हुए उस ने कुछ पैसे भी इकट्ठा कर लिए थे. उस ने सोचा उन पैसों के सहारे वह सविता के साथ बाहर कुछ दिन ठीक से काट लेगा. सविता ने भी काफी समय से रामपाल की चोरी से कुछ पैसे इकट्ठा किए थे.

अगले भाग में पढ़ें- थोड़ी देर तड़पने के बाद उस की सांसें गईं थम

Satyakatha- जब इश्क बना जुनून: भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

इस की वजह यह थी कि किचन में फर्श से करीब 3 फुट नीचे रईस की अंगुलियां नजर आ गई थीं. सचमुच दृश्य खौफनाक था. अंगुलियां बता रही थीं कि यहां किसी इंसान की लाश दफनाई गई है.

अंगुलियां दिखाई दीं तो खुदाई कर रहे मजदूर बड़ी ही सावधानीपूर्वक खुदाई करने लगे. थोड़ी ही देर में उस गड्ढे से 4 अलगअलग टुकड़ों में एक लाश बरामद हुई, जो उसी घर के 10 दिनों से गायब रईस शेख की थी.

11 घंटे की मेहनत करने के बाद पुलिस ने रईस की लाश किचन से बाहर निकाली. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाश बरामद होने की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी घटनास्थल पर आ गए. सभी ने घटनास्थल का निरीक्षण कर थानाप्रभारी को जरूरी निर्देश दिए और वापस चले गए.

लाश के टुकड़ों को एक पौलीथिन में पैक कर के घटनास्थल की काररवाई पूरी की गई और  उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

शाहिदा से पूछताछ में रईस के इस हाल में पहुंचने की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी—

रईस शेख उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा का रहने वाला था. करीब 9 साल पहले सन 2012 में उस की शादी शाहिदा से हुई थी. करीब 6 साल बाद उन के घर एक बेटी हुई. उस के बाद एक बेटा हुआ. 2 बच्चे होने के बाद उन का भरापूरा परिवार हो गया था, जिस से उन की खुशी और बढ़ गई थी.

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बच्चे होने से खर्च बढ़ गया था. यहां उन की इतनी आमदनी नहीं थी कि वे अपने बच्चों का भविष्य संवार सकते. इसलिए रईस ने कहीं बाहर जाने की बात की तो शाहिदा ने खुशीखुशी स्वीकृति दे दी. रईस ने मुंबई में रहने वाले अपने कुछ दोस्तों से बात की तो उन्होंने उसे मुंबई बुला लिया, जहां दहिसर में स्टेशन के पास एक कपड़े की दुकान में उसे सेल्समैन की नौकरी मिल गई.

नौकरी मिल गई तो रईस ने रहने के लिए दहिसर (पूर्व) स्थित खान कंपाउंड में एक मकान किराए पर ले लिया और गोंडा जा कर पत्नी और बच्चों को मुंबई ले आया. पत्नी और बच्चों के साथ जिंदगी की गाड़ी बढि़या चल रही थी.

दुकान से रईस को इतना वेतन मिल जाता था कि उस का खर्च आराम से चल रहा था. उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हो रही थी.

रईस अपनी बीवी और बच्चों से बहुत प्यार करता था. उन्हीं के लिए वह घरपरिवार छोड़ कर इतनी दूर आया था. शाहिदा भी रईस को बहुत प्यार करती थी. पर मुंबई आने के कुछ दिनों बाद शाहिदा में बदलाव नजर आने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह किसी और से प्यार करने लगी थी.

पतिपत्नी के बीच कोई तीसरा आ गया था. वह कोई और नहीं, अनिकेत मिश्रा उर्फ अमित था. इस की वजह यह थी कि दोनों ही उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे.

एक दिन अमित सार्वजनिक नल पर पानी भर रहा था, तभी डिब्बे ले कर शाहिदा भी पानी के लिए पहुंची. उस ने गोद में बेटे को ले रखा था. बेटा उस समय जोरजोर से रो रहा था.

अब शाहिदा बेटे को संभाले या पानी के डिब्बे ले जाए. शाहिदा बहुत ही असमंजस में थी. बेटा उसे छोड़ ही नहीं रहा था. उसे परेशान देख कर अमित ने कहा, ‘‘भाभीजी आप बेटे को संभालिए, मैं आप के पानी के डिब्बे पहुंचाए देता हूं.’’

‘‘आप क्यों परेशान होंगे. रहने दीजिए, मैं बेटे को चुप करा कर उठा ले जाऊगी.’’ शाहिदा ने कहा.

‘‘क्यों, मैं पहुंचा दूंगा तो आप को बुरा लगेगा क्या? ऐसा तो नहीं कि आप मेरा छुआ पानी न पीना चाहती हों?’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. मैं नहीं चाहती कि आप मेरे लिए परेशान हों.’’

‘‘भाभीजी, आज आप परेशान हैं तो मैं आप के काम आ रहा हूं, कल मुझे कोई परेशानी होगी तो आप मेरे काम आ जाना. अच्छा आप चलें. मैं डिब्बे ले कर चल रहा हूं.’’ दोनों हाथों में एकएक डिब्बा उठाते हुए अमित ने कहा.

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अमित पानी के डिब्बे ले कर शाहिदा के घर पहुंचा तो औपचारिकता निभाते हुए उस ने कहा, ‘‘बैठिए, मैं चाय बनाने जा रही हूं. आप चाय पी कर जाइए.’’

‘‘फिर कभी पी लेंगे. आज रहने दीजिए.’’

‘‘आज क्यों नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं आप मेरे हाथ की चाय नहीं पीना चाहते हों?’’

‘‘अब तो पी कर ही जाऊंगा. पर थोड़ा जल्दी कीजिएगा. अभी घर के सारे काम करने हैं, नहाना है, खाना बनाना है.’’

‘‘आप अकेले ही रहते हैं क्या?’’ शाहिदा ने पूछा.

‘‘जी, मम्मीपापा गांव में रहते हैं. मैं यहां अकेला ही रहता हूं.’’

‘‘और वाइफ?’’

‘‘अभी शादी ही नहीं हुई है तो वाइफ कहां से आएगी.’’ हंसते हुए अमित ने कहा.

शाहिदा चाय बना कर लाई. दोनों बैठ कर चाय पीते हुए एकदूसरे के बारे में पूछते रहे. चाय खत्म कर के अमित जाने लगा तो शाहिदा ने कहा, ‘‘जब भी चाय पीने का मन हो, बिना संकोच आ जाना. इसे अपना ही घर समझना.’’

सिर हिलाते हुए अमित चला गया.

अमित अभी गबरू जवान था. स्मार्ट भी था. कोई भी लड़की उसे पसंद कर सकती थी. इस के बाद अमित जबतब शाहिदा के घर आनेजाने लगा. धीरेधीरे यह आनाजाना बढ़ता गया. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे से खुलते गए और उन में हंसीमजाक भी होने लगा.

एक दिन हंसीहंसी में ही जब शाहिदा ने कहा कि इसे अपना ही घर समझना तो अमित ने मजाक करते हुए कहा, ‘‘घर को तो अपना समझ रहा हूं. पर आप को क्या समझूं?’’

अमित की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराते हुए शाहिदा ने कहा, ‘‘मुझे भी अपनी ही समझो. पर इस के लिए दम चाहिए, जो तुम में नहीं है.’’

‘‘दम तो बहुत है भाभी, पर थोड़ा संकोच हो रहा था. अब आज की बात से वह भी खत्म हो गया.’’ इतना कह कर अमित ने शाहिदा को बांहों में भर लिया.

अगले भाग में पढ़ें- शाहिदा और अमित क्याें घबरा गए

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