किसान आन्दोलन : कैसे कट रही दिन और रातें?

लेखक–  रोहित और शाहनवाज

देश की राजधानी दिल्ली में बीते कुछ दिनों से चल रहे किसान आन्दोलन ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खिंचा है. अपनी जायज मांगों को लेकर किसान दिल्ली की तरफ कुच करने पर मजबूर है. वैसे तो हर समय ही आन्दोलन चल रहा है लेकिन इन किसानों ने जब दिल्ली की सड़कों पर अपना घर बना ही लिया है तो वे किस प्रकार से पूरा दिन आन्दोलन कर रहे हैं? आखिर कैसे कट रही है इन किसानों की दिन और राते?

केंद्र सरकार के द्वारा कृषि कानूनों में बदलाव के कारण देश भर के किसानों में आक्रोश साफ दिखाई दे रहा है. आन्दोलन की मौजूदा स्थिति यह है कि पंजाब और हरियाणा के किसान दिल्ली और हरियाणा के सिंघु बार्डर और टिकरी बार्डर पर संगठित हैं, वहीं उत्तर प्रदेश से आए किसान गाजीपुर बार्डर पर संगठित है.

यह आन्दोलन ऐसा नहीं है कि सुबह सुबह अपने घर से निकले, प्रोटेस्ट साईट पर पहुंचे, तख्तियां और बैनर लेकर दो चार नारे लगाए, पुलिस वालों के साथ धक्का मुक्की की और शाम ढली तो अपने घर को रवाना हो लिए. बल्कि आन्दोलन के लिए इतने दूर-दूर से आए इन किसानों के लिए दिल्ली की यही सड़कें अब उनका घर बन चुकी हैं.

दिल्ली-हरियाणा सिंघु बार्डर पर पंजाब और हरियाणा के किसान अपने जिन ट्रक और ट्रैक्टर से सफर कर वे दिल्ली आए थे, अब वहीं वाहन इन किसानों का घर बन चुके हैं. पुलिस वालों के द्वारा इन किसानों को रोकने के लिए जिन सीमेंट के भारी भरकम बैरीकेड का इस्तेमाल किया गया, वह अब इन किसानों के लिए अपना खाना बनाने के लिए चूल्हा बन चूका है.

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ऐसे में किसानों के इस आन्दोलन में लोग चौबीसों घंटे तैनात हैं. यह किसान हर समय तो नारे तो नहीं लगा रहे या फिर पुलिस के साथ मुठभेड़ नहीं हो रही, बल्कि समय के साथ वें अपने प्रोटेस्ट को विराम और अपने शरीर के आराम का भी पूर्णतः ख्याल रख रहे हैं. हमने अलग अलग प्रदर्शन स्थालों पर विजिट कर यह जानने की कोशिश की, कि आन्दोलन के लिए आए ये किसान आखिर किस प्रकार अपने दिन और रातें काट रहे हैं.

हाल ही में बस में सफर करते समय मुझसे आगे बैठे 2 शख्स आपस में दिल्ली में चल रहे किसान आन्दोलन की बात कर रहे थे. एक कहता  कि, “आखिर कोई कैसे इतनी बड़ी संख्या में सड़क पर दिन और रात गुजार सकता है?” दूसरा वाला भी सहमती देते हुए कहता है कि “हां यार जिगरा चाहिए हर समय नारे लगाने का.”

वहीं पहला शख्स दूसरे से कहता कि, “अभी वे किसान अपने घर पर होते तो शायद अपने दिनचर्या वाले कामों में व्यस्त होते. अपने दोस्तों से मिलते, नहाते धोते, समय से खाते पीते, अपने बच्चों के साथ खेलते, खेती में व्यस्त हो जाते. सब कुछ नार्मल चलता लेकिन इस प्रोटेस्ट में आने के बाद वें किस तरह से हर चीज का ध्यान रख पा रहे होंगे ? हर समय आन्दोलन को देना कितना मुश्किल होता होगा. नहीं?”

बस में इन दो शख्सों की बातचीत सुन मेरे दिमाग में भी यह ख्याल आया कि जिन लोगों ने अपने जीवन में कभी किसी आन्दोलन का हिस्सा नहीं बने, जिन्होंने कभी कोई प्रोटेस्ट नहीं किया, जिनकी संख्या संभवतः ज्यादा ही होगी, वैसे लोग किसानों के लगातार आन्दोलन को इन्ही नजरों से देखते होंगे जिस प्रकार ये बात और आपस में सवाल जवाब कर रहे थे.

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प्रोटेस्ट करने आए ये किसान हर समय नारे लगाना या फिर हर समय पुलिस के साथ धक्का मुक्की के मोड पर नहीं रहते. ये बात सही है की इस प्रोटेस्ट में किसानों ने एक मंच ऐसा भी बनाया है जहां पर दिन भर कुछ न कुछ चलता ही रहता है. नारे लगाना, भाषण देना, गीत गाना इत्यादि ज्यादातर समय यह होता ही रहता है. लेकिन क्योंकि प्रोटेस्ट करने आए किसानों की संख्या हजारों में हैं इसीलिए हर समय उस मंच पर लोग बदलते रहते हैं.

और ऐसा नजारा जिन सभी बार्डर पर प्रोटेस्ट हो रहा है, उन सभी में देखा जा सकता है. मंच पर मौजूद होने पर किसान नारे भी लगाते हैं, गाने भी गाते हैं, मीडिया वालों से बातचीत भी करते हैं और भी बहुत कुछ चलता ही रहता है. लेकिन जब वें मंच के आसपास नहीं होते और अपने टेंट में होते हैं तो वें अपने लिए खाना भी बनाते हैं, आराम भी करते हैं, फ़ोन पर अपने परिवार वालों के साथ बातचीत भी करते हैं.

प्रदर्शन के लिए आए किसान पुरे जोर-शोर से अपने साथ 6 महीने तक का राशन बांध कर आए हैं. लेकिन ऐसा नहीं है की हर एक चीज का प्रबंध ये किसान खुद से कर रहे हो. बेशक केंद्र सरकार के द्वारा काले कृषि कानून के लागु होने के बाद किसान सड़कों पर उतरे हो, लेकिन दिल्ली से भी लोग प्रोटेस्ट साईट पर पहुंच कर किसानों की मांगों के समर्थन में उतरे हैं.

गाजीपुर बार्डर हो या फिर टिकरी बार्डर या सिंघु बार्डर हर जगह पर दिल्ली की सिख गुरुद्वारा कमिटी द्वारा लंगर का प्रबंध किया गया है और प्रदर्शनकारियों को कम से खाने पीने की किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है. इसके अलावा किसानों को रात में सोते वक्त ठण्ड न लगे इसके लिए भी आम लोगों और गुरुद्वारा कमिटी के द्वारा किसानों के लिए कम्बल और चादरों का इंतजाम किया गया है.

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कैसे कर रहे हैं किसान अपना टाइम पास?

वैसे तो 24 घंटे काम कोई मशीन या कोई रोबोट भी नहीं कर सकता. कुछ इसी तरह से हर समय किसान भी प्रदर्शन में लीन नहीं हो सकते हैं. गाजीपुर बॉर्डर पर जिस फ्लाईओवर के नीचे किसानों ने प्रोटेस्ट के लिए जगह हासिल की हैं वहां पर हमें किसान कई तरह से आन्दोलन में अपना समय निकालते हुए दिखाई दिए.

हम ने देखा की पुरे प्रदर्शन स्थल पर करीब 7-8 हुक्के दिखाई दिए, और हर हुक्के पर 10-12 लोगों का झुंड बारी बारी से हुक्का खीचने का इंतज़ार कर रहा था. उसी तरह से कुछ लोग जलते कोयले के पास हाथ सकते हुए नजर आए. कुछ अपने हुक्के में जलता हुआ कोयला भरते हुए नजर आए तो कुछ बेफिक्र हो कर यहां वहां घूमते नजर आए.

कुछ लोगों का झुंड हमें ताश खेलता हुआ भी नजर आया तो कुछ ठंड की दोपहर की धूप में सोते हुए नजर आए. कुछ आपस में बात करते हुए दिखाई दिए तो कुछ फोन पर अपने घर परिवार वालों से बात करते दिखाई दिए.

लेकिन ऐसा नहीं है कि उस समय प्रोटेस्ट नहीं हो रहा था. फ्लाईओवर के ऊपर बड़ी संख्या में लोग बैठ कर लोगों का भाषण सुन रहे थे. प्रोटेस्ट में गीत भी गाये जा रहे थे. बड़ी संख्या में उपस्थित पुलिस, फ्लाईओवर के ऊपर तैनात थी. उत्तर प्रदेश की तरफ से दिल्ली आने के लिए आम लोगों की गाड़ियां भी पुल पर खड़ी थी.

कुछ ऐसा ही नजारा टिकरी बार्डर पर भी हमें देखने को मिला. टिकरी बार्डर पर भारी तादाद में जमा थे. 58 साल के गुरविंदर सिंह जी ने वहां पर उपस्थित लोगों के बारे में थोड़ी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि, “इस बार्डर पर करीब 30-35 किलोमीटर आगे तक किसानों का हुजूम मौजूद है. और जैसे जैसे समय बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे लोगों की संख्या में और अधिक इजाफा बढ़ता ही रहा है.”

टिकरी बार्डर पर इतनी बड़ी संख्या में किसान प्रदर्शन के लिए मौजूद है कि वहां का नजारा देखने को ही बनता है. सड़के किसानों के ट्रैक्टर और ट्रक से भरी हैं. हर कुछ मीटर की दूरी पर किसान कुछ न कुछ बांटते हुए दिख ही जाएंगे. ऐसे में वहां पर लोग अपना ज्यादातर समय हमें या तो घूमते हुए नजर आए या फिर लंगर के लिए काम करते नजर आए.

लोग ज्यादातर समय खाने के लिए तैयारियां करते दिखाई दिए. कोई सब्जियां को छिलते हुए  दिखाई दिए, तो कोई उन छिली हुई सब्जियों को काटते हुए. कुछ लोगों का झुंड मिल कर चाय बनाता हुआ दिखाई दिया तो कोई चाय बांटता हुआ.

सिंघु बार्डर पर भी नजारा कुछ अलग नहीं था. कुछ नारे लगाते हुए दिखे तो कुछ घूमते हुए भी दिखे. रात को ढंग से नींद न पूरी होने के कारण लोग अपने ट्रक में और अपने ट्रैक्टर के पीछे सोते हुए दिखे. लोग सड़कों पर ही चटाई बिछा कर सोते हुए भी दिखे.

कुछ कमियों का सामना करने को मजबूर है किसान

इन तीनों बार्डर पर ही किसान किसी न किसी तरह से खुद को व्यस्त रखे हुए है. लेकिन कुछ चीजो की कमी हमें इन तीनों ही जगह पर दिखाई दी. जैसे शौच की व्यवस्था. टिकरी बार्डर और सिंघु बार्डर पर यह समस्या बहुत ज्यादा है. प्रशासन की ओर से प्रदर्शनकारियों के लिए शौच की व्यवस्था एकदम न के बराबर है.

टिकरी बार्डर पर मौजूद गुरविंदर सिंह जी ने हमें बताया की वें पहले दिन से इस प्रदर्शन का हिस्सा बने हुए हैं, लेकिन शौच की कोई किसी तरह की व्यवस्था नहीं हैं. टिकरी बार्डर पर 5 किलोमीटर आगे तक जाने के बाद हमने पाया कि उस 5 किलोमीटर के दायरे में केवल 3 गाड़ी वाले शौचालय हैं. एक गाड़ी में कुल मिला कर 8 शौचालय की व्यवस्था है. यानि की कुल मिला कर 24 शौचालय ही.

इतने हजार लोगों के लिए केवल 24 शौचालय. प्रशासन का बड़ा ही अमानवीय व्यवहार देखने को मिला. इस के साथ ही यदि प्रदर्शनस्थल पर कोई बीमार हो जाए तो उस के एम्बुलेंस की कोई भी व्यवस्था देखने को हमें नहीं मिली.

अभी प्रदर्शन की हालिया स्थिति यह है की सरकार और किसानों की 3 दिसम्बर के दिन बातचीत हुई जिस का कोई परिणाम निकल कर नहीं आया. और सरकार का रवैय्या देख किसानों ने 8 दिसम्बर के दिन भारत बंद का ऐलान किया है, जिस में प्रशासन को उन की मांगों की अनदेखी करने पर दिल्ली के सभी रास्ते बंद करने का भी ऐलान किया है. अब देखना यह है की यह आन्दोलन आने वाले समय में किस तरह से आगे बढ़ता है. अभी तक किसानों के इस रवैय्ये को देख हर किसी को यह समझ लेने की जरुरत है की किसान अपना प्रदर्शन जारी रखेंगे और अपनी मांगों को मनवाए बगैर एक इंच भी अपने कदम खीचने को तैयार नहीं होंगे.

खेसारी लाल यादव ने भोजपुरी अंदाज में कंगना रनौत को मारा ताना,  कहा- ‘ई कंगना के कुछ न बुझाई…’

बौलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangana Ranaut) अपने विवादित बयानों की वजह से हमेशा सुर्खियों में बनी रहती हैं. हाल ही में उन्होंने किसान आंदोलन में पहुंची एक बुजुर्ग महिला को लेकर ट्वीट किया था.

दरअसल किसानों के इस प्रोटेस्ट को लेकर कंगना रनौत ने एक बुजुर्ग महिला की तस्वीर ट्विट कर  शाहीन बाग वाली दादी बिलकिस बानो बता दिया. एक्ट्रेस ने तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि किसानों के नाम पर हर कोई अपनी रोटियां सेक रहा है.

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कंगना रनौत का यह ट्वीट सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ. यूजर्स कंगना रनौत के विरोध में उतर आए हैं. तो वहीं आम जनता के साथ कई बौलीवुड सितारें भी कंगना को ट्रोल करने लगे. इस ट्वीट को देखकर पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh) ने सोशल मीडिया पर कंगना रनौत की जमकर लताड़ लगाई थी. और सितारों भी एक्ट्रेस की इस ट्विट पर नाराजगी जाहिर की थी.

तो इसी बीच भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव ने भी कंगना रनौत पर तंज कसा है. उन्होंने भोजपुरी स्टाइल में कंगना रनौत को लेकर सोशल मीडिया पर ट्विट किया. खेसारी लाल यादव ने लिखा, ‘ए भाई, ई कंगना के कुछ न बुझाई। ना समझ आवे आम, न बुझाये मूली… अ खाली हर बात पे जुबान खूली… किसान लोगिन के आज सबके साथ के जरुरत बा, सब गोटा मिल के बोलीं: जय जवान-जय किसान! बाकी सब के खेसारी के प्रणाम बा.’

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फिर उन्होंने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा, ‘इस समय किसानों को हमारे साथ की जरुरत है, हम सब उनके साथ खड़े हैं. किसानों की मांगें बिल्कुल सही हैं। किसानों के विरोध का तरीका जायज है. मुझे उम्मीद है जल्द ही केंद्र सरकार इनकी मांगें मान लेगी.

रेलवे के निजीकरण से किसान मजदूर के बेटे निराश

22 साल के रंजन का चयन रेलवे में टैक्नीशियन पद के लिए जनवरी में हुआ था. आईटीआई करने के बाद 3 साल की कड़ी मेहनत करने के बाद आए इस रिजल्ट से वह काफी खुश था.

रंजन के पिता साधारण किसान हैं. उन्होंने रोजमर्रा की जरूरी चीजों में कटौती कर के रंजन को पढ़ने के लिए खर्च दिया. रंजन का रिजल्ट आने के बाद परिवार में खुशी का माहौल था. आखिर हो भी क्यों नहीं, परिवार वालों में उम्मीद की किरण जगी थी कि अब घर में खुशियाली आएगी. दोनों बेटियों की शादी अब अच्छे घर में हो जाएगी.

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रंजन की तरह अभिषेक, राहुल और संजय का भी चयन रेलवे में ड्राइवर पद के लिए हुआ. सभी एक ही कमरे में रह कर पटना में तैयारी करते थे. वे सभी किसान मजदूर के बेटे हैं.

बिहार के साधारण किसान मजदूर के बेटों को अगर सब से ज्यादा सरकारी नौकरी मिलती थी तो वह था रेलवे महकमा, जिस में फोर्थ ग्रेड से ले कर रेलवे ड्राइवर, टैक्नीशियन, टीटी और स्टेशन मास्टर पद की नौकरी लगती थी.

रेलवे ने बिहार के किसान मजदूर तबके के मेधावी लड़कों को देशभर में सब से ज्यादा नौकरी दी, जिस से लोगों के हालात में काफी सुधार हुआ.

पर रेलवे के निजीकरण की चर्चा सुनते ही किसान मजदूरों के 3-4 साल से तैयारी कर रहे नौजवानों के होश उड़ गए हैं. वे निराश हो गए हैं. जिन का चयन हो गया है यानी रिजल्ट आ गया है, वे भी उलझन में पड़ गए हैं कि उन्हें जौइन कराया जाएगा या नहीं.

रंजन, जिस का टैक्नीशियन का रिजल्ट आया है, बताता है कि अब कहना मुश्किल है कि हम लोगों का क्या होगा? वह अब किसी प्राइवेट डाक्टर के रह कर कंपाउंडर का काम सीखना चाहता है.

रवींद्र, आलोक, आदिल जैसे दर्जनों छात्रों ने बताया कि वे लोग आईटीआई करने के बाद 3 साल से रेलवे की तैयारी कर रहे थे. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि रेलवे में नौकरी जरूर लग जाएगी. वे लोग आपस मे क्विज करते थे. उस क्विज करने वालों में से 32 लोगों की नौकरी लग गई. रेलवे के नीजिकरण की चर्चा जब से सुनी है, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करेंगे. आखिर में वे लोग भी लुधियाना, सूरत जैसे शहरों की प्राइवेट फैक्टरियों में वही काम करने के लिए मजबूर हो जाएंगे, जो काम अनपढ़ लोग करते हैं. उन के मांबाप तो यही सोंचेंगे कि उन की मेहनत की कमाई अपनी पढ़ाई पर ऐसे ही उड़ा दी. उन को देश के इन हालात के बारे में जानकारी थोड़े है.

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हमारा हक के राष्ट्रीय प्रचारक प्रकाश कुमार ने बताया कि अब दिमाग से हटा दीजिए और भूल जाइए कि अब देश के किसान मजदूरों के बेटों को रेलवे में सरकारी नौकरी मिलेगी. भारतीय रेल जो देश का सब से बड़ा सार्वजनिक उद्यम और सब से बड़ा नियोक्ता था, आज मोदी सरकार उसे खंडखंड कर दिया है और उस का निजीकरण करने का पूरा मैप बन चुका है.

रेलवे की 2 बड़ी परीक्षाएं 2020 में होने वाली थीं. आरआरबीएनटीपीसी एग्जाम, जिस में 35,208 भरतियों के लिए 1.25 करोड़ से ज्यादा औनलाइन आवेदन आए थे. आरआरसी ग्रुप डी एग्जाम में एक लाख से ज्यादा सीटें बताई गई थीं. यह इस एक्जाम के बाद होना था.

रेलवे मंत्रालय ने 109 रूटों पर 151 प्राइवेट ट्रेन चलाने के लिए योजना बनाई है. पूरे देश के रेलवे नैटवर्क को 12 क्लस्टर में बांटा गया है. इन्हीं 12 क्लस्टर में 151 प्राइवेट ट्रेनें चलेंगी. इन ट्रेनों में रेलवे सिर्फ ड्राइवर और गार्ड देगा यानी अब नए पदों की जरूरत ही खत्म कर दी गई है.

लोगों की आंखों में धूल झोंक कर निजीकरण करने पर सरकार तुल गई है. जिस तरह से एयरपोर्ट को एकएक कर अडाणी के हवाले किया जा रहा है, प्राइवेट सैक्टर को अपनी ही ट्रेन रेक तैयार करने की इजाजत दी जाएगी. निजी औपरेटरों को मार्केट के मुताबिक किराया तय करने की इजाजत दी जाएगी. वे इन गाड़ियों को अपनी सुविधा के हिसाब से विभिन्न श्रेणियों की बोगियां लगाने के साथसाथ रूट पर उन के ठहराव वाले स्टेशन का भी चयन कर सकेंगे.

फिलहाल तो मेक इन इंडिया की बात की जा रही है, लेकिन बाद में प्राईवेट आपरेटर जहां से भी चाहेंगे अपनी ट्रेन हासिल कर सकेंगे. रेलवे से ट्रेन खरीदना उन के लिए जरूरी नहीं होगा. यह इन के करार में साफतौर पर लिखा हुआ है. दूसरी सब से बड़ी बात है कि संचालन में निजी ट्रेन को वरीयता मिलने से सामान्य ट्रेनों की लेटलतीफी बेहद बढ़ जाएगी जिस से जनता परेशान होगी और इस का कुसूरवार रेलवे को बना कर और रूट को भी प्राइवेट कर दिया जाएगा.

सभी लोग जानते हैं कि निजी उद्यमियों का मकसद केवल फायदा कमाना होता है और जिन्हें जिस क्षेत्र से फायदा नहीं होता वे वहां काम बंद कर देते हैं. पूरी दुनिया में रेलवे निजीकरण से राष्ट्रीयकरण की ओर लौट रहा है, लेकिन भारत में अडाणी जैसे पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार जुटी हुई है. रेलवे में रोजगार देने की बात तो दूर जिन को रोजगार मिला हुआ है, उन का भी छीना जाएगा. टिकट की कीमत आईआरसीटीसी तय करता है. ट्रेन की सफाई का काम, पैंटीकार का काम, टिकट बिक्री इंटरनैट का काम प्राइवेट तौर पर ही होता है.

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गरीबों को 32,000 करोड़ की सब्सिडी खत्म. सरकार कोई भी ट्रेन आने वाले समय में नहीं चलाएगी. केवल प्राइवेट कंपनी ही ट्रेन चलाएगी. रेल यात्री भाड़ा में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी. रेल कर्मी और सीनियर सिटीजन की छूट खत्म, जैसे तेजस में बच्चों को भी छूट नहीं है.

देशभर में रेलवे में 70 रेल मंडल है. इन में रेल कर्मचारियों के लिए बनी कालोनी की जमीन को फिर से नए निर्माण के नाम पर बिक्री के आदेश हो गए हैं. इस से रेल कर्मचारियों में अब आक्रोश गहराता जा रहा है. इस का रेलवे मजदूर संघ विरोध कर रहा है, लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है. यह साफ हो गया है कि सरकार किसी भी हालत में बड़े बदलाव की तैयारी में है.

कोरोना की वजह बेरोजगार युवा और रेलवे यूनियन के लोग भीड़भाड़ जैसे आंदोलन नहीं कर सकते. कोरोना काल में ही रेलवे का निजीकरण करना सरकार के लिए आसान होगा.

गहरी पैठ

हमारे देश में फालतू बातों पर समय और दम बरबाद करने की पुरानी आदत है. यहां तो बेबात की, तो सिर भी फोड़ लेंगे पर काम की बात के लिए 4 जने जमा नहीं होंगे. बकबक करनी हो, होहल्ला मचाना हो, तो सैकड़ों की तमाशाई भीड़ जमा भी हो जाएगी और अपनाअपना गुट भी बना लेगी. जब देश के सामने चीन की आफत खड़ी है, जब बेकारी हर रोज बढ़ रही है, जब उद्योगधंधे बंद हो रहे हैं, जब कोरोना की बीमारी दुनियाभर के रिकौर्ड बना रही है, हम क्या बोल रहे हैं, सुन रहे हैं? रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह के किस्से, जिस में ऐक्टै्रस कंगना राणावत बेबात में कूद कर हीरोइन बन गई है.

यह आज की बात नहीं है. रामायण काल में राजा दशरथ को राज करने की जगह फालतू में शिकार पर जाने की लगी थी, जब उन्होंने एक अंधे मांबाप के बेटे को तीर से मार डाला. राजा का काम राज करने का था. उस के बाद जंगल में राम ने शूर्पणखा की नाक सिर्फ इसलिए काट ली कि वह प्यार करने का आग्रह बारबार कर रही थी. दोनों का नतीजा बुरा हुआ. श्रवण कुमार के मांबाप के श्राप की वजह से राम को वनवास लेना पड़ा और उस के गम में राजा दशरथ की मौत हो गई.

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महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ में द्रौपदी का दुर्योधन और उस के भाइयों को महल में अंधे के बेटे कहना इतना गंभीर बना कि महाभारत का युद्ध हो गया और कुरु वंश ही खत्म हो गया. गीता का उपदेश चाहे जैसा हो, उस में यह नहीं कहा गया कि फालतू की भीड़ और फालतू की बकबक से समाज और देश नहीं बनते.

आज चीन, कोरोना, उद्योगों, भूख, गरीबी से न लड़ कर हमारी चैनलों की भीड़ एकसुर में कंगना और रिया का अलाप कर रही है. ऐसा लगता है मानो रामायण और महाभारत के पात्र ये एंकर हर रोज सुबह पढ़ते हैं और दिनभर उसे ही दोहराते हैं.

हमारे यहां गांवों में ऐसा हर रोज होता है. हर रोज गांव में लड़ाईझगड़े इसी तरह छोटीछोटी बातों पर होते हैं. घरों में सासबहू और जेठानीदेवरानी से ले कर पड़ोसियों और जातियों के विवाद इसी तरह बेबात में तू ने यह क्यों कहा, वह क्यों कहा पर होते हैं. रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह जो भी कर रहे थे, उस का आम जनता से लेनादेना नहीं है पर चैनल ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारें और यहां तक कि केंद्र सरकार भी इस छोटे से मामले में कूद पड़ी हैं, ताकि बड़े मामलों को भुलाया जा सके.

यहां तक कि बिहार में मुद्दा बनाया जा रहा है कि सुशांत सिंह की हत्या का मामला चुनावों में पहला होगा, राज्य में लूटपाट, गरीबी, बदहाली नहीं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अब बंगाली ब्राह्मण रिया चक्रवर्ती का मामला उठा रही हैं.

किसानों ने इन दिनों देशभर में बड़े आंदोलन किए पर चैनलों ने दिखाए ही नहीं. छात्रों ने बेकारी का मुद्दा उठाया और रात को मशाल जुलूस निकाले पर उन की बात करने की फुरसत नहीं रही. रामायण और महाभारत काल की तरह युद्ध राजाओं के आपसी मतलब के हुए और आम जनता बेकार में पिसी थी. दोनों ही लड़ाइयों के बाद आम जनता को कुछ नहीं मिला. राम को सीता मिली और युधिष्ठिर को राज, पर तब जब सब मर गए. क्या हम इसे दोहराने में लगे हुए हैं?

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अब देश को सीमाओं की चिंता ही नहीं है. देश की सरकार को अब देश में होने वाले भयंकर बड़े झगड़ों, खूनखराबों की फिक्र नहीं है. देश को चिंता है गाय की. गाय है तो जहां है, जान का क्या आतीजाती रहती है. गरीब, किसान, मजदूर, व्यापारी जिएंमरें कोई फर्क नहीं पड़ता, पर गौमाता नहीं मरनी चाहिए, खासतौर पर मुसलमान के हाथों. ब्राह्मण उसे भूखा रख कर मार दें तो कोई बात नहीं क्योंकि उन्हें तो कोई पाप लगता ही नहीं.

एक कानून है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून. इस में बिना जमानत, बिना दलील, बिना वकील किसी को भी महीनों तक जेल में रखा जा सकता है और हर चौकी का मुंशी इसे लागू कर सकता है. थोड़ी सी कागजी घोडि़यां बनानी होती हैं, वे पकड़ कर बंद करे जाने के बाद बनाई जाती रहती हैं.

उत्तर प्रदेश में अप्रैल, 20 से अगस्त, 20 तक 139 लोगों पर यह कानून लागू किया जिन में से 44 को गौहत्या के अपराध का नाम लगा कर पकड़ा गया था. मजे की बात है 4,000 तो गौहत्या कानून में वैसे ही बंद हैं. कुछ को गैंगस्टर ऐक्ट में बंद कर रखा है तो कुछ को गुंडा ऐक्ट में भी. ये सब बंद लोग धन्ना सेठ नहीं हैं. ये आम आदमी हैं. हो सकता है, ज्यादातर मुसलमान यह दलित हों पर गौमांस या दूसरा कोई और मांस खरीदनेबेचने वाले कहीं पकड़े नहीं जाते. अगर कभीकभार चंगुल में आ जाएं तो वे वकील कर के निकल जाते हैं. गरीब ही सड़ते रहते हैं.

यह न समझें कि इस पकड़धकड़ से गायों की मौतों को बंद कर दिया गया है. वे तो पहले की तरह ही मरेंगी. दान में ब्राह्मण तो केवल दूध देने वाली गाय लेगा. जब दूध देना बंद कर देगी तो पहले वही ही बेच देता था. अब खेतों में छोड़ देता है, जहां वे खड़ी फसलों को खाती रहती हैं. उत्तर प्रदेश की ही नहीं दिल्ली तक की सड़कों पर गायों को आराम से मरते देखा जा सकता है.

इस कानून का फायदा भगवा गैंग वाले जम कर उठा रहे हैं. वे किसी भी घर में गौमांस होने का आरोप लगा सकते हैं. पुलिस छापा मारती है, घर वालों को गिरफ्तार करती है और मांस को लैब में भेज देती है. आमतौर पर 3-4 महीने में रिपोर्ट आती है कि मांस तो भैंस का था पर तब तक पुलिस वाले और भगवा गैंग वाले कमाई कर चुके होते हैं.

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इस धांधली के खिलाफ कोई बोल भी नहीं रहा क्योंकि पार्टी सुनेगी नहीं, मीडिया बढ़ाचढ़ा कर दिखाता है और जज खुद तिलकधारी, जनेऊधारी हैं. वे क्यों पुण्य के काम में दखल दें, चाहे गलत क्यों न हो. गाय के नाम पर जो आपाधापी हो रही है वह बहुत कमाई कर रही है. यह मौका भी एक ही पार्टी के पास है जिसे अपने वर्करों को पैसे नहीं देने पड़ते क्योंकि वर्कर इस तरह हफ्तावसूली कर रहे हैं. गौपूजा का मतलब ही यही है कि गौपालकों की पूजा हो, गौ जिएमरे कौन चिंता करता है?

खेती जरूरी या मंदिर

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिस दिन (17 सितंबर) जन्मदिन था, भाजपा के कार्यकर्ता सरकार की उपलब्धियां गिनागिना कर जहां एकदूसरे को मिठाइयां बांट रहे थे, वहीं देश की कई जगहों पर किसानों को मारापीटा जा रहा था.

हरियाणा में किसान सरकार के खिलाफ मोरचा खोले बैठे थे. विरोध का आलम यह था कि इस प्रदर्शन से घबरा कर पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा था, जिस में कई किसानों को गंभीर चोटें आई थीं. पुलिस ने बुजुर्गों तक को नहीं छोड़ा था.

दरअसल, यह विरोध प्रदर्शन हरियाणा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पंजाब के किसान कृषि क्षेत्रों में सुधार के लिए मोदी सरकार के 3 विधेयकों के खिलाफ कर रहे थे, जिस में उन की मांग थी कि इन कानूनों को तत्काल वापस लिया जाए.

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इस विधेयक के विरोध में हरियाणा में किसानों ने जम कर विरोध किया. यहां के प्रदर्शन कर रहे किसानों का मानना था कि जो अध्यादेश किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में बेचने की इजाजत देता है, वह तकरीबन 20-22 लाख किसानों खासकर जाटों के लिए तो एक झटका ही है.

मगर किसानों की आवाज को सरकार दबाना चाहती थी, ताकि इस का असर दूसरे राज्यों में न फैले. इस वजह से प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने लाठियां भांजनी शुरू कर दीं. इस में किसी को गहरी चोटें आईं तो किसी के पैर की हड्डी टूट गई.

हरियाणा के एक किसान अरविंद राणा कहते हैं, “देश का पेट भरण आले किसान, देश की रक्षा करण आले किसान के बेटे, देश के भीतर कानून व्यवस्था बणाण आले सारे किसानों के बेटे, सारे व्यापारी, नेताअभिनेता और सारे अमीर आदमियां की सिक्योरिटी करण आले किसानों के बेटे, वोट दे कर सरकार बणाण आले किसान, देश की नींव किसान… और फिर भी अन्नदाता क लठ मारन का आदेश देते शर्म नहीं आई?”

गुस्सा बेवजह भी नहीं

सरकार के खिलाफ किसानों का गुस्सा बेवजह भी नहीं है, क्योंकि पहले नोटबंदी फिर जीएसटी और फिर कोरोना काल में पूरी तरह फिसड्डी रही सरकार ने एक बार फिर कृषि विधेयक बिल से देश के किसानों को खुश नहीं कर पाई.

किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कौरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इस का नुकसान किसानों को उठाना पड़ेगा.

किसान सौरव कुमार कहते हैं, “देश के किसानों की चिंता जायज है. किसानों को अगर बाजार में अच्छा दाम मिल ही रहा होता तो वे बाहर क्यों जाते? जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी यानी समर्थन मूल्य ₹ नहीं मिलता, उन्हें वे कम दाम पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं.

“पंजाब में होने वाले गेहूं और चावल का सब से बड़ा हिस्सा या तो पैदा ही एफसीआई द्वारा किया जाता है या फिर एफसीआई उसे खरीदता है.”

वहीं प्रदर्शनकारियों को यह डर है कि एफसीआई अब राज्य की मंडियों से खरीद नहीं पाएगा, जिस से ऐजेंटों और आढ़तियों को तकरीबन 2.5 फीसदी के कमीशन का घाटा होगा.

इस का सब से बड़ा नुकसान आने वाले समय में होगा और धीरेधीरे मंडियां खत्म हो जाएंगी. इस से बेरोजगारी भी बढ़ेगी.

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अब पछता रहा हूं

कृषि मामलों के जानकार व खुद किसान रहे आदेश कुमार को मोदी सरकार से कोफ्त है. वे कहते हैं, “मैं ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को वोट किया था, पर अब पछता रहा हूं.

“यह सरकार हर मोरचे पर फेल रही है और किसानों के लिए कभी कुछ नहीं कर पाई. पहले नोटबंदी फिर जीएसटी के बाद सरकार का कृषि का नया कानून देश के किसानों के खिलाफ है.

“अभी पिछले ही साल का एक वाकिआ बताता हूं. पैप्सिको ने भारत में 4 किसानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. कंपनी का आरोप था कि ये किसान आलू की उस किस्‍म की खेती कर रहे थे, जो कि कंपनी द्वारा अपने लेज पोटेटो चिप्‍स के लिए विशेष रूप से रजिस्‍टर्ड है.

“तब किसान संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पैप्सिको का विरोध किया था. पैप्सिको ने नुकसान की भरपाई के लिए हर किसान से 1-1 करोड़ रुपए की मांग भी की.”

मालूम हो कि पैप्सि‍को भारत की सब से बड़ी प्रोसेस ग्रेड आलू की खरीदार है और यह उन पहली कंपनियों में से एक है जो आलू की विशेष संरक्षित किस्‍म को खुद के लिए उगाने के लिए हजारों स्‍थानीय किसानों के साथ काम कर रही है.

तब किसान संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पैप्सिको के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग की थी और अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि भारतीय कृषि कानून के तहत संरक्षित फसल को उगाना और उसे बेचना किसानों का अधिकार है.

किसानों को इसलिए भी डराया और कानूनी रूप से प्रताड़ित किया गया, ताकि किसान डर जाएं और इस फसल की खेती ही न करें.

किसानों ने सरकार को चिट्ठी भी लिखी थी जिस में उन्होंने आरोप लगाए थे कि पैप्सिको ने तथाकथित आरोपी किसानों के पास प्राइवेट जासूसों को संभावित ग्राहक बना कर भेजा, चुपचाप उन के वीडियो बनाए और आलू के सैंपल हासिल किए.

रोजगार जरूरी मंदिर नहीं

आदेश बताते हैं, “असल में सरकार की मंशा ही सही नहीं है. अगर देश में खुशहाली नहीं रहेगी, बेरोजगारी चरम पर होगी, नौकरियां खत्म हो जाएंगी, किसानों की सुनी नहीं जाएगी तो सरकार पर सवालिया निशान लगना वाजिब है.

“हमें न मंदिर चाहिए न मसजिद, पहले बेरोजगारी तो खत्म करो. किसान, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है उन के लिए तो कुछ करो. पहले से मरे किसानों को सरकार और मार रही है.”

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अपने ही खेत में मजदूर

आदेश कहते हैं, “2 राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के प्रावधान पर भी भरम की हालत है. 80-85 फीसदी छोटे किसान एक जिले से दूसरे जिले में नहीं जा पाते, किसी दूसरे राज्य में जाने का तो सवाल ही नहीं उठता. यह बिल बाजार के लिए बना है, किसानों के लिए नहीं.”

“इस प्रावधान से किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर हो जाएगा. काला बाजारी को बढ़ावा मिल सकता है.”

आखिर क्या है इस बिल में

जिन विधेयकों को मंजूरी मिली है उस में कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020 और कृषक कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 शामिल हैं.

कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020 के तहत किसान या फिर व्यापारी अपनी उपज को मंडी के बाहर भी दूसरे जरीयों से आसानी से व्यापार कर सकेंगे.

इस बिल के मुताबिक राज्य की सीमा के अंदर या फिर राज्य से बाहर, देश के किसी भी हिस्से पर किसान अपनी उपज का व्यापार कर सकेंगे. इस के लिए व्यवस्थाएं की जाएंगी. मंडियों के अलावा व्यापार क्षेत्र में फौर्मगेट, वेयर हाउस, कोल्डस्टोरेज, प्रोसैसिंग यूनिटों पर भी बिजनैस करने की आजादी होगी.

मगर असल में भारत में छोटे किसानों की तादाद ज्यादा है, तकरीबन 80-85 फीसदी किसानों के पास 2 हैक्टेयर से कम जमीन है, ऐसे में उन्हें बड़े खरीदारों से बात करने में परेशानी होती आई है. इस के लिए वे या तो बड़े किसान या फिर बिचौलियों पर निर्भर होते थे. अब उन्हें फसल बेचने के लिए खुद पहल करनी होगी और यह पूरी संभावना है कि किसानों को इन प्रकियाओं से गुजरने में हिचक होगी या फिर उन्हें समझ ही नहीं आएगा कि वे फसल कहां और कब बेचें.

खुद भाजपा की वरिष्ठ नेता रहीं सुषमा स्वराज ने साल 2012 में सदन में किसानों की दशा और दिशा पर वर्तमान सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश की थी.

सुषमा स्वराज ने बताया था कि किस तरह किसान अपने ही फसल को नहीं बेच पाते और आश्चर्य तो यह कि देश में पोटैटो चिप्स बनाने वाली कंपनियां देश के किसानों द्वारा तैयार फसल से चिप्स न बना कर विदेशी आयातित आलूओं से चिप्स बना कर बेचती हैं.

राज्य सरकारों की चिंता

किसानों की इन चिंताओं के बीच राज्‍य सरकारों खासकर पंजाब और हरियाणा को इस बात का डर सता रहा है कि अगर निजी खरीदार सीधे किसानों से अनाज खरीदेंगे तो उन्‍हें मंडियों में मिलने वाले टैक्‍स का नुकसान होगा, इसलिए कई राज्यों के सरकार भी इस का विरोध कर रहे हैं. खुद सरकार की सहयोगी रही अकाली शिरोमणि दल भी सरकार के इस फैसले से सहमत नहीं दिखी और पार्टी की वरिष्ठ नेता हरसिमरन कौर बादल ने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने बिल को ले कर सवाल उठाए और अपने ट्वीटर हैंडल पर उन्‍होंने लिखा, ‘अगर ये बिल किसान हितैषी हैं तो समर्थन मूल्य का जिक्र बिल में क्यों नहीं है? बिल में क्यों नहीं लिखा है कि सरकार पूरी तरह से किसानों का संरक्षण करेगी? सरकार ने किसान हितैषी मंडियों का नैटवर्क बढ़ाने की बात बिल में क्यों नहीं लिखी है? सरकार को किसानों की मांगों को सुनना पड़ेगा.’

हालांकि जिस समर्थन मूल्य को ले कर किसानों और विपक्ष को एतराज है सरकार ने उस को पूरी तरह साफ नहीं किया है. दरअसल, किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू है. अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है, ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके.

किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है और इस के तहत अभी 23 फसलों की खरीद की जा रही है. कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय की जाती है.

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आम आदमी पार्टी के नेता नीरज गुप्ता कहते हैं, “जब आप मजदूरी करने जाते हैं तो सरकार द्वारा मिनिमम भत्ता तय किया हुआ होता है.

“इस को इस तरह से समझना होगा कि प्राइवेट नौकरी में अनुभव और योग्यता के आधार पर पे स्केल तय होता है. सरकारी नौकरियों में पे ग्रेड होता है यानी किसी भी काम में कम से कम आप को क्या मिलेगा यह तय है, तो अकेले किसान का क्या कुसूर है कि उस के लिए उस एमएसपी को ही हटाया जा रहा है?

“प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि एमएसपी नहीं हट रहा तो उसे लिखने में क्या गुरेज है? पिछले कुछ दिनों का इतिहास उठा कर देखिए, ओला व उबर जैसी कंपनियों की वजह से कितनी कारें सड़कों पर आ गईं आज वे सब कौड़ियों के दाम बिकने को तैयार हैं. इस बिल से किसान जो कुछ भी कमाता रहा है, वह भी उसे नहीं मिलेगा.”

नोटबंदी जैसा हश्र होगा

किसान परिवार से संबंध रखने वाले संदीप भोनवाल कहते हैं, “सरकार द्वारा किसानों के लिए लाए हुए अध्यादेश ठीक उसी तरह साबित होंगे जिस तरह सरकार ने कुछ साल पहले नोटबंदी कर के देश को किया था. तब सरकार ने कहा था कि इस से देश को फायदा होगा, लेकिन आज तक एक भी फायदा नोटबंदी से देश को नहीं दिखा.

“ठीक उसी तरह जो ये बिल सरकार किसानों के लिए ले कर आई है, आने वाले समय में इस के नतीजे ठीक नोटबंदी की तरह ही घातक होंगे.

“इस बिल की सब से गलत बात यह भी लगी कि कोई भी किसानों का संगठन सरकार ने अपने दायरे में ले कर उस बिल का निर्माण नहीं कराया. अब आप ही समझें कि जो बिल किसानों के लिए बन रहा है अगर उस में किसानों की ही राय  शामिल न हो तो ऐसे बिल का क्या फायदा?”

किसान कुदरत की मार तो जैसेतैसे झेल जाते हैं लेकिन देश की दोहरी आर्थिक नीतियां उन का मनोबल तोड़ कर रख देती हैं.

किसानों द्वारा खुदकुशी

पिछले दिनों राजस्थान के एक किसान सुरेश कुमार ने इसलिए फांसी लगा ली क्योंकि वह कर्ज से फंसा पड़ा था. बीते कुछ साल से उन की फसल अच्छी नहीं हुई थी और जो हुई उस के भी वाजिब दाम नहीं मिल पाए. इस दौरान सुरेश कुमार पर कर्ज  बढ़ता गया.

मध्य प्रदेश के एक किसान संत कुमार सनोडिया ने इसलिए जहर खा कर जान दे दी, क्योंकि बेची गई फसल के एवज में उसे 4 महीने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े, मगर फिर भी पैसे नहीं मिले.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक बीते तकरीबन 20 सालों में देशभर के 3 लाख से ज्यादा किसानों को खुदकुशी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

एनसीआरबी की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि साल 2018 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,349 लोगों ने खुदकुशी कर ली थी. वहीं साल 2017 में यह आंकड़ा 10,655 था.

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के एक सर्वे के मुताबिक देश के आधे से ज्यादा किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं और एक स्टडी के मुताबिक हर तरफ से निराश हो चुके देश के 76 फीसदी किसान खेती छोड़ कर कुछ और करना चाहते हैं.

आर्थिक सर्वे 2018-19 के आंकड़े भी बताते हैं कि साल 2016-17 की तुलना में कृषि की सकल मूल्य वृद्धि (जीवीए) में तकरीबन 54 फीसदी की कमी देखी गई है.

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चौपट अर्थव्यवस्था

रहीसही कसर कोरोना ने पूरी कर दी. कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा तो इस ने 40 साल का रिकौर्ड तोड़ दिया. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. कोरोना काल में पहली तिमाही में देश का सकल घरेलू उत्पादन वृद्धि दर जीरो से 23.9 फीसदी नीचे चली गई है.

इस से बेरोजगारी दर में भी इजाफा हुआ. सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी (सीएमआईई) ने देश में बेरोजगारी पर सर्वे रिपोर्ट जारी किया है. इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 3 मई को खत्म हुए हफ्ते में देश में बेरोजगारी दर बढ़ कर 27.1 फीसदी हो गई है, वहीं अप्रैल, 2020 में देश में बेरोजगारी दर बढ़ कर 23.5 फीसदी पर पहुंच गई थी.

सरकारी उदासीनता की वजह से देश में कई उद्यम बंद हो गए हैं. बेरोजगारी की दर शहरी क्षेत्रों में सब से ज्यादा बढ़ी है.

सीएमआईई ने अंदाजा लगाया गया है कि अप्रैल में दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों और छोटे व्यवसायी सब से ज्यादा बेरोजगार हुए हैं. सर्वे के मुताबिक 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. इन में फेरी वाले, सड़क के किनारे सामान बेचने वाले, निर्माण उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी और कई लोग शामिल हैं.

मगर सरकार को इन सब से कोई चिंता नहीं. लोगों को रोजगार चाहिए, रोटी चाहिए पर भाजपा शासित राज्यों में वहां की सरकारों को इस से कुछ लेनादेना नहीं.

राम की चिंता किसानों की नहीं

भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बेरोजगारी पर भले कुछ ध्यान न दे रही हो, मगर राज्य में मंदिरों व तीर्थस्थलों में जम कर पैसा बहाया जा रहा है.

योगी सरकार की अयोध्या में राम के नाम पर लगभग 135 करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी है. यह रकम उसे केंद्र सरकार देगी.

इस पैसे से योगी सरकार अयोध्या को सजाएगीसंवारेगी. राम और दशरथ के महल और राम की जलसमाधि वाले घाटों पर रौनक बढ़ाया जाएगा.

योगी सरकार उत्तर प्रदेश में रामलीला स्थलों में चारदीवारी निर्माण के लिए 5 करोड़ रुपए भी खर्च करेगी. मगर भगवा रंग में रंगी सरकार से यही उम्मीद भी है, क्योंकि राम के नाम पर राजनीति तेज है और देश के किसानों की हालत भी राम भरोसे से कम नहीं. अब देश के किसानों को थाली और ताली बजाने के सिवा और कोई रास्ता भी तो नहीं दिख रहा.

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