डोनाल्ड ट्रंप के हथकड़ियों के फैसले पर खामोश हैं Narendra Modi

Narendra Modi : भारत ही क्या सारी दुनिया में यह बात मशहूर है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच गहरे दोस्ताना संबंध हैं. ऐसे संबंध कि वे एकदूसरे का सम्मान करते हैं और नरेंद्र मोदी का तो वे कहना मानते हैं. शायद यही वजह है कि नरेंद्र मोदी जिस तरह काम करते हैं, वैसा ही काम डोनाल्ड ट्रंप भी करते दिखाई दे रहे हैं.

एक और बड़ा उदाहरण सामने है. जैसे नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ते रहे हैं, बहुतकुछ वैसी ही शैली डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपनाई. इस से यह संदेश और भी मजबूत हो गया कि दोनों ही नेताओं में बड़ी अच्छी ट्यूनिंग है और वे एकदूसरे को सम झते हैं, मगर जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही एकदम से भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाया है, वह बताता है कि दोनों के ही संबंध कितने छत्तीसी हैं.

अमेरिका में अवैध प्रवासियों का निर्वासन एक खास मुद्दा बन कर सामने है. एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में तकरीबन 11 मिलियन अवैध प्रवासी रहते हैं, जिन में से ज्यादातर मैक्सिको और दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों से आए हैं. इसी के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद अवैध प्रवासियों के प्रति सख्त नीति अपनाई है.

ट्रंप प्रशासन ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं, जिन में सीमा सुरक्षा को मजबूत करना, अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए डाटाबेस का उपयोग करना और अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए अधिक अधिकारियों की नियुक्ति करना शामिल है.

अब 205 भारतीय नागरिकों को ले कर सी-17 विमान सैन एंटोनियो, टैक्सास से भारत आ गया है, जिस से देश में सकते के हालात हैं. हर बात में प्रतिक्रिया देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर तो मानो खामोश हैं.

दरअसल, अमेरिकी सरकार के इस ऐक्शन का नतीजा यह होगा कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे. लेकिन इस ऐक्शन का विरोध भी हो रहा है, खासकर उन लोगों द्वारा, जो अवैध प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं. उन का मानना है कि अवैध प्रवासी भी इनसान हैं और उन्हें भी सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए.

अमेरिकी सरकार की अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने की कार्यवाही एक जटिल मुद्दा है, जिस में कई पक्ष और विपक्ष हैं, जबकि यह कार्यवाही अवैध प्रवास को रोकने के लिए एक कदम हो सकती है, लेकिन इस का नतीजा यह भी हो सकता है कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे और उन के अधिकारों का उल्लंघन होगा.

भारत की प्रतिक्रिया इस मुद्दे पर मिलीजुली बनी हुई है. एक ओर भारत सरकार ने अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर अमेरिकी सरकार के साथ सहयोग करने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर  विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने यह कह कर इस कदम की आलोचना की है कि यह अवैध प्रवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है.

इस मुद्दे पर आम लोगों की राय भी मिलीजुली है. कुछ लोगों का मानना है कि अवैध प्रवासी भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा हैं, जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि उन्हें इनसानियत के नजरिए से देखा जाना चाहिए और उन्हें वापस भेजने से पहले उन के मामलों की समीक्षा की जानी चाहिए.

ऐसा लगता कि इस मामले में अमेरिका भी चीन के रास्ते पर चल रहा है. दोनों देशों की आव्रजन नीतियां और उन के कार्यान्वयन में काफी फर्क है. अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए सख्त नीतियों का प्रस्ताव किया है, जबकि चीन में आव्रजन नीतियां ज्यादा सख्त और प्रतिबंधात्मक हैं. चीन में अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए विशेष कानून और नियम हैं.

हालांकि, अमेरिका और चीन के माली, राजनीतिक और सामाजिक हालात अलगअलग हैं, जो उन की आव्रजन नीतियों पर असर करती हैं. मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका लोकतंत्र का हिमायती है, मानवाधिकार का प्रहरी माना जाता है और वह ऐसा कदम उठाएगा, यह कोई सोच भी नहीं सकता था.

मगर अब जल्दी ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे मामले में कई कदम उठाने चाहिए. सब से पहले उन्हें अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक सम झौता करना चाहिए, जो भारतीय नागरिकों के हितों की हिफाजत करे.

इस के अलावा भारत सरकार को अवैध प्रवासियों के परिवारों को मदद देनी चाहिए, जो भारत में रहते हैं. सरकार को उन्हें माली मदद, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देनी चाहिए.

सरकार को अवैध प्रवास रोकने के लिए भी कदम उठाने चाहिए. सीमा सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए  और अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग करना चाहिए.

यही नहीं, सरकार को अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना चाहिए. उन्हें लोगों को अवैध प्रवास के खतरों और इस के बुरे नतीजों के बारे में बताना चाहिए. इन कदमों से सरकार अवैध प्रवासियों के मुद्दे का समाधान कर सकती है और भारतीय नागरिकों के हितों की हिफाजत कर सकती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों में पिछले कुछ समय में काफी उतारचढ़ाव देखा गया है. ट्रंप प्रशासन ने यूएसएआईडी को बंद करने की घोषणा की थी, जिस से भारत को मिलने वाली माली मदद पर असर पड़ सकता है.

गहरी पैठ : Donald Trump का तालिबानी राज

Donald Trump : अमेरिका में 20 जनवरी, 2025 से नए प्रैजिडैंट डोनाल्ड ट्रंप वहां पर राज कर रहे हैं और उन का राज एक संवैधानिक, कानून की इज्जत करने वाला नहीं है. उन का राज पहले 2 हफ्तों में ही तालिबानी टाइप का है.

अमेरिका एक तरह की इमर्जैंसी वाले जमाने में पहुंच गया है जिस में इंदिरा गांधी और सोवियत कम्यूनिस्टों जैसे फैसले लिए जा रहे हैं. जो काम डोनाल्ड ट्रंप दुनिया की सब से अच्छी डैमोक्रैसी को तोड़ने में कर रहे हैं, उस से बहुत से डैमोक्रैसी का दंभ भरने वाले सबक सीखेंगे पक्का है.

डोनाल्ड ट्रंप गरीबों को दी जाने वाली बहुत सी सुविधाओं को खत्म कर रहे हैं ताकि अमीरों का टैक्स कम किया जाए. ऐसा ही कुछ हमारे यहां नरेंद्र मोदी के नए बजट में किया गया है जिस में इनकम टैक्स पहले के 7 लाख रुपए के मुकाबले अब 12 लाख रुपए तक जीरो कर दिया गया है.

डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को पैसे देने बंद कर दिए हैं. हमारे यहां कितने ही राज्यों में सरकारी अस्पतालों को पैसा नहीं दिया जा रहा ताकि लोग महंगे और बहुत महंगे प्राइवेट अस्पतालों में जाएं या फिर ओझाओं, वैद्यों के पास जाएं जिन के पास न डिगरियां हैं, न दवाएं और जो अफीम और धतूरे से इलाज करते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप एकएक कर के सरकारी मुफ्त पढ़ाई पर हमला भी कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि सिर्फ अमीर गोरों के बच्चे स्कूलों में जाएं और कमजोर वर्गों खासतौर पर काले और मिक्स गोरे व मूल अमेरिकियों की संतानों के बच्चे पढ़ें ही नहीं. गोरों का महान देश वापस आए ये शब्द ऐसे ही हैं जो हमारे यहां भारत को विश्वगुरु और रूस में व्लादिमीर पुतिन जारों के जमाने के ग्रेट रशिया के लिए कहते थे.

डोनाल्ड ट्रंप से यूरोप के, एशिया के कट्टरपंथियों को खूब सीखने को मिल रहा है कि कैसे गरीबों का खून चूसने वाला राज फिर से लाया जाए जिस में या तो धन्ना सेठ फलेंफूलें या मंदिरों के महंत. भारत इस ओर 10 साल पहले कदम रख चुका है और अब यह काम और तेजी से होगा क्योंकि अब अमेरिका से भारत में लोकतंत्र की हत्या पर सवाल नहीं उठेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप वही कर रहे हैं जो हमारे यहां पंडे, ठाकुर और अमीर सेठ करना चाहते हैं. राज उन का हो, काम शूद्रों का और अछूतों का. ‘एक देश एक चुनाव’ का नारा लगा कर सरकार जनता से वोट का हक छीनने की तैयार कर रही है तो उसे डोनाल्ड ट्रंप का पक्का साथ मिलेगा क्योंकि ट्रंप अपने चुनावी भाषणों में कह चुके हैं कि 2024 के चुनावों में वे जीते तो फिर अमेरिका में चुनाव नहीं होंगे.

भारत, जरमनी, कोरिया, फ्रांस, इटली में वैसी ही ताकतें मजदूरों और गरीबों को धर्म के सहारे बहका कर समझा रही हैं कि राज तो सिर्फ खास गोरों का होना चाहिए, काले भूरों को बाहर निकालो. वैसे ही जैसे हमारे यहां राज खास जातियों का होना चाहिए और बाकियों को पानी में डुबकियां लगा कर खुशी पाने के लिए बहकाया जा रहा है.

दुनिया ने जो आजादी के सपने देखे थे, अब फीके पड़ रहे हैं. अब अमीरों का राज आ रहा है. वे इंटरनैट की जंजीरों से हर गरीब को कंट्रोल करना सीख गए हैं, ठीक वैसे ही जैसे पहले धर्मजाति के नाम पर कंट्रोल किया जाता था.

॥॥॥

सरकारें किस तरह से निकम्मी और बेरहम हो कर अपनी सुविधा के एकतरफा फैसले लेती हैं इस के नमूने इधरउधर लोगों को महसूस होते रहते हैं पर इन को गंभीरता से कम लिया जाता है कि ये छोटे मामले हैं.

बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने 8 फरवरी को अखबारों में हिंदी में एक विज्ञापन छपवाया, जो अंगरेजी के अखबारों में भी क्यों प्रकाशित हुआ पता नहीं, कि ‘अनुसूचित जाति प्रवेशिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना’ व ऐसी ही 2 और योजनाओं के अंतर्गत ‘2023-24 एवं 2022-23 में शैक्षणिक संस्थान स्तर पर लंबित सभी आवेदनों का सत्यापन 15-2-25 से पूर्व करना सुनिश्चित’ किया गया है.

इस संस्कृत के अनजाने शब्दों से भरे इश्तिहार से लगता है कि बिहार राज्य कोई स्कौलरशिप दलित जातियों के छात्रों को देता है पर 2022 से दिया जाना पैंडिंग है. अब 3 साल बाद इसे देने का काम शुरू किया जा रहा है. इसे देने में पहला कदम उठाया जा रहा है. बहुत अच्छी बात है. लगता है कि यह स्कौलरशिप देने की एप्लीकेशनें बहुत पहले मांगी गई थीं वे भी कंप्यूटर पोर्टल पर. ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उसी इश्तिहार में लिखा है कि ‘सभी आवेदनों का सत्यापन दिनांक 15.2.25 से पूर्व पूर्ण करना सुनिश्चित किया गया है. इस के उपरांत सत्यापन हेतु पीएमएस पोर्टल बंद कर दिया जाएगा’.

यह नहीं समझ आता कि जो स्कौलरशिपें सरकारी फाइलों में 2-3 सालों से रोशनी का इंतजार कर रही थीं उन को खोलने की कोशिश में सिर्फ 20 दिन का समय क्यों दिया गया? अगर यह समझा जाए कि स्कौलरशिप पाने वाला हर एससीएसटी युवकयुवती हर रोज इंडियन ऐक्सप्रैस खरीदते हैं और उस के बारीक अक्षरों में छपी सरकारी सूचनाएं पढ़ते हैं तो भई वाकई कमाल की बात है. यह तो स्वर्ग के आ जाने की सी बात होगी कि एससीएसटी के बच्चों ने अखबार हर रोज खरीदना और पढ़ना शुरू कर दिया है.

साफ है कि अफसरों को इस देरी के लिए न कोई दुख है, न उन्हें लगता है कि उन की कोई गलती है. वे अपने निकम्मेपन का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना चाहते हैं और किसी तरह यह स्कौलरशिप जो 2-3 साल से पैंडिंग है अब बहुतों के लिए खत्म ही कर देना चाहते हैं.

इसी सरकारी इश्तिहार में आगे लिखा गया है कि ‘निर्धारित अवधि के पश्चात सत्यापन लंबित रखने वाले शैक्षणिक संस्थानों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही की जाएगी’. यानी आगे भी कहीं कोई रास्ता उन गरीब एससीएसटी के 10वीं, 12वीं के बच्चों के लिए नहीं छोड़ा गया है जो अब 3 साल बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं.

इस सूचना से कहीं नहीं लगता कि बिहार के निदेशक, माध्यमिक शिक्षा को कोई अफसोस है कि यह स्कौलरशिप देने में देरी हुई है. इस सूचना में भी ‘संस्थानों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही’ और ‘जिला शिक्षा पदाधिकारी एवं जिला कार्यक्रम पदाधिकारी सभी आवश्यक कार्यवाही करने के उत्तरदायी होंगे’ जैसे वाक्य हैं.

उन बेचारों के बारे में कोई 2 शब्द नहीं हैं जिन्हें इस योजना में कुछ पैसे मिलने थे. सरकारी फाइलों पर कैसे उन अफसरों की भाषा में नरमी तक नहीं है, अपनी देरी के लिए कोई गिला तक नहीं है. सरकार चाहे केंद्र की हो जो एससीएसटी को हमेशा पिछड़ा और गुलाम देखना चाहती हो या नीतीश कुमार की समाजवादी किस्म की हो जो उन का सहारा ले कर वोट पाती है, एक ही तरह से काम करती है.

तीन बीवियों के बावजूद डोनाल्‍ड ट्रंप ने कई लड़कियों से चलाए चक्‍कर

इन दिनों अमेरिका में चुनाव चल रहे है. इस रेस में डोनाल्ड ट्रंप दिख रहे है. राष्ट्रपति पद के लिए वोटों की गिनती चल रही है. डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए 900 से ज्यादा रैलियों में हिस्सा लिया. कई बार भाषणों से लोगों का दिल जीता. डोनाल्ड ट्रंप की पर्सनल लाइफ में नजर डाले तो वे काफी रसिया मिजाज के है. इन्होंने एक से ज्यादा महिलाओं से संबंध रखें है. इनकी कई गर्लफ्रेंड्स रही है. इतना ही नहीं, इन्होंने बीवीयां भी कई बनाई और सभी से इनकी एक अलग ही लव स्टोरी बनीं है.

डोनाल्ड की पहली पत्नी और प्यार

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने अबतक के जीवन में तीन शादियां की जिनसे उनके पांच बच्चे हैं. उनके बड़े बच्चों के भी बच्चे हैं, यानी मौजूदा समय में ट्रंप परिवार में तीन पीढ़ियां हैं. उनके पहले प्यार की बात करें तो वाइफ का नाम इवाना था. जिनसे उनका मिलना सन 1976 में हुआ. पहली बार वे दोनों किसी होटल मिले. इवाना पहले से शादीशुदा थी. वे काफी खुबसूरत महिला रही. इवाना पूर्व चेकोस्लोसवाकिया में कम्युलनिस्टथ शासन में पली-बढ़ीं थीं. इवाना ने साम्यडवाद को छोड़कर अमेरिका को अपनाया था. डोनाल्ड ट्रंप और इवाना की शादी 14 साल तक चली. डोनाल्ड ट्रंप और इवाना के तीन बच्चेा हुए डोनाल्डक जूनियर, इवांका और एरिक.

ट्रंप का दूसरा प्यार कैसे पहुंचा तलाक तक

इसके बाद ट्रंप की लाइफ में एक और लड़की आई. जो कि पेशे से एक्ट्रेस थी. मार्ला मेपल्स नाम की एक्ट्रेस से ट्रंप का रोमांस दोगुना होने लगा. लेकिन, जब दोनों की फोटो टैबलौयड्स में छपी तो सनसनी फैल गई. मार्ला मेपल्स से इश्क के चलते डोनाल्ड ट्रंप की ही पहली शादी टूट गई थी. इसके बाद ट्रंप ने 1993 में दूसरी शादी रचाई, लेकिन ये शादी भी चार साल तक चली. शादी टूटने की वजह एक सिक्योरिटी गार्ड था. क्योंकि मार्ला मेपल्स को सुरक्षा गार्ड अच्छा लगने लगा था. मार्ला की बेवफाई के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने इस रिश्ते को खत्म करने में कोई देर नहीं लगाई. हालांकि दोनों का कानूनी रूप से तलाक 1999 में हो पाया.

ट्रंप की तीसरी शादी

अपनी पहली दों बीवियों को तलाक दें चुके डोनाल्ड ट्रंप ज्यादा दिनों तक सिंगल नहीं रहे. छह फुट लंबी, छरहरी मेलानिया पेरिस और मिलान के मशहूर फैशन जगत में मौडल के तौर पर धूम मचा रही थीं. उसी दौरान न्यूयोर्क फैशन वीक की एक पार्टी में डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात मेलानिया से हुई. पांच मिनट की बातचीत में ही दोनों में प्यार हो गया. डोनाल्ड ट्रंप ने उनका टेलीफोन नंबर मांग लिया. उस दिन डोनाल्ड ट्रंप ने मेलानिया को एक शानदार मौडलिंग करियर का सपना दिखाया. उस समय डोनाल्ड ट्रंप की कंपनी इवेंट मैनेजमेंट से लेकर रियल एस्टेट में एक बड़ा नाम हुआ करती थी. दोनों में काम के जरिए पहले प्यार हुआ, लेकिन बाद तलाक हो गया है.

गर्लफ्रेड्स की भी रही है लंबी लिस्ट

डोनाल्ड ट्रंप ने यू तीन शादियां की. लेकिन उनके अफेयर्स भी कम नहीं रहे है. गर्लफ्रेंड की लिस्ट छोटी नहीं रही है. ट्रंप हमेशा से ही लड़कियों को लेकर और सुर्खियों में रहे है. पत्नियों के अलावा उन्होंने अपनी कई लव स्टोरी भी बनाई. जिनसे उन्होंने शादी तो नहीं कि लेकिन संबंध बहुत बनाएं है. ट्रंप ने 1995 में मॉडल कायली बैक्स को डेट किया था. इनके बीच कई साल तक दोस्ताना रिश्ते रहे.

ट्रंप की लाइफ में एक मौडल एलिसन जियानिनी भी आईं. दोनों की उम्र में लंबा अंतर रहा. उस समय ट्रंप 50 साल के और एलिसन जियानिनी 27 साल की थीं. साल 2001 में दोनों एक-दूसरे को डेट करने लगे. लेकिन ज्यादा समय ट्रंप ने जियानिनी के साथ भी नहीं बिताया कि. उनकी जिंदगी में रोवेन ब्रेवर लेन नाम की एक मौडल आ गई. ब्रेवर केवल 26 साल की थीं तब वह ट्रंप के साथ रिलेशनशिप में आई. यह रिश्ता काफी कम समय तक चला. लेकिन लड़कियों का सिलसिला यही खत्म नहीं हुआ है.

ट्रंप की लाइफ में फिर से एक मौडल एक्ट्रेस अन्ना निकोल स्मिथ आई जो उनकी गर्लफ्रेंड रही. इतना ही नहीं, आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि अपने समय की मशहूर टेनिस खिलाड़ी अर्जेंटीना की ग्रैबिएला सबातिनी भी ट्रंप की गर्लफ्रेंड रही चुकी हैं. वो ट्रंप पर अपना दिल हार चुकी थी. उनकी यह दोस्ती 1989 में शुरू हुई थी, लेकिन इनकी मुलाकात बेहद छोटी रही. इसके अलावा ट्रंप ने कैंडिस बर्जन नाम की महिला को भी डेट किया. तो कहा जा सकता है कि पत्नियों से ज्यादा लंबी टाइम गर्लफ्रेंड्स को दिया है.

गहरी पैठ

कोरोना को तमाशा मानने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कोविड 19 के शिकार हो गए और अक्तूबर में उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा, जब राष्ट्रपति पद का चुनाव महज 30 दिन दूर रह गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू से ही उसे साधारण फ्लू कहा और चाहा कि अमेरिका काम पर चले चाहे लोगों को बीमारी हो. उन्होंने तब भारत आने का न्योता लिया जब चीन का वुहान शहर बिलकुल बंद था और बाकी शहरों में लौकडाउन था. लाखों की भीड़ को देख कर ट्रंप खूब खुश हुए थे.

अमेरिका में चुनावों में ट्रंप वही कर रहे थे जो उन्होंने मार्च में गुजरात में किया था. हजारों के सामने बिना मास्क के भाषण देना, खुले में घूमना, कोरोना पर जीत की डींग मारना. शायद नरेंद्र मोदी ने उन से सीखा था, जब 24 मार्च को कहा था कि 21 दिनों में कोरोना की लड़ाई जीत ली जाएगी. आज अमेरिका में सब से ज्यादा बीमार हैं, सब से ज्यादा मौतें हुई?हैं और फिर भी भारत के महान नेताओं की तरह वे यही कहते थे कि इस फ्लू को तो किसी भी कीटनाशक दवा से मारा जा सकता है.

ये भी पढ़ें- गहरी पैठ

गोरों की वोटों पर जीत कर आए ट्रंप असल में ठस दिमाग के कट्टर नेता हैं. अमेरिका में बसे ऊंची जातियों के भारतीय भी उन्हें और नरेंद्र मोदी को बराबर सा चाहते हैं. अमेरिका में दलितोंपिछड़ों की तरह कालों और लैटिनों से बुरी तरह व्यवहार किया जाता है. उन्हें जो थोड़ाबहुत मिल जाए वह भी गोरों को सहन नहीं होता. वहां तो गोरे 40-45 फीसदी हैं, पर वे जानते हैं कि भारत की तरह 10 फीसदी खास लोग चतुराई से राज कर सकते हैं. भला हो कोरोना का, जो न जाति देखता है, न धर्म, न रंग, न पैसा और पद. अमित शाह भी बीमार पड़े, दिल्ली के सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया भी और अब डोनाल्ड ट्रंप व उन की बीवी.

आम लोगों में यह बीमारी कितनी फैली है यह सिर्फ नंबरों से पता चलता है, पर यह पक्का है कि मेहनतकश इस बीमारी को आसानी से सह लेते हैं क्योंकि उन्हें पहले से तरहतरह के रोगों से लड़ने की आदत होती है. भारत और अमेरिका दोनों के समाजों में यह महामारी आग की तरह नहीं फैली जैसे पहले हैजा या प्लेग फैलता था. इस वायरस को तो असल में हवाईजहाजों में चलने की आदत है. चीन से यह इटली, ईरान, स्पेन, भारत, अमेरिका हवाईजहाजों से गया जब कोरोना बीमार इधर से उधर जा रहे थे.

डोनाल्ड ट्रंप को भी होप हिक्स से लगा जो उन के साथ हवाई यात्राओं में चुनावी सभाओं में जाने के लिए घूम रही थी. होप कहां से लाई पता नहीं. ट्रंप की पत्नी ने भारतीय नेताओं की तरह विदेशी नागरिकों को देश की मुसीबतों की जड़ बताया था. ट्रंप ने लाखों बच्चों को अपने मातापिता से अलग कर रखा है क्योंकि बच्चे अमेरिकी नागरिक हैं और माईग्रैट यानी घुसपैठिए अवैध हैं. हमारे नेताओं ने तबलीगी जमात वालों को कोरोना का दोषी ठहराया था जबकि बाद में सारी अदालतों ने माना कि कोरोना फैलाने में उन का कोई खास योग नहीं है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी और भाजपा एकजैसी नीतियों वाली हैं. देखें अब क्या कोरोना रिपब्लिकनों से सत्ता छीनता है. 10 नवंबर तक पता चल जाएगा.

ये भी पढ़ें- गहरी पैठ

हाथरस में एक दलित लड़की का रेप और फिर बुरी तरह जख्मी कर मार देना दलितों को सबक सिखाने के लिए जरूरी है. उन की हिम्मत क्यों हुई कि वे ऊंची जाति वालों के खिलाफ मुकदमे करें, एससी ऐक्ट का इस्तेमाल करें. सदियों से सनातन धर्म कह रहा है कि दलित और औरतें, सवर्ण औरतें भी, पाप योनि की देन हैं और उन्हें सजा चाहे भगवान दें या भगवान के बैठाए दूत दें, एक ही बात है.

जिन लोगों ने दलित लड़की का रेप किया वे सामाजिक कानून लागू कर रहे थे. वे मोदी और योगी की तरह के कानून के रखवाले हैं. गलत कानून अगर संविधान ने दिए हैं तो उन्हें ठीक करना तो जरूरी है. यदि दिखावे के लिए कानून को सही नहीं किया जा सकता तो सही कानून के खुद भरती किए सिपाही इस काम को करेंगे.

देश के गांवगांव, गलीगली में यह बात रातदिन फैलाई जा रही है कि हर जने को अपनी ‘औकात’ में रहना चाहिए जो जन्म से तय है, संविधान कुछ भी कहता रहे. कुछ उदारवादी कहते हैं कि सब एक हैं, पर असल यही है कि हिंदू व्यवस्था साफ कहती है कि सब अलग हैं. पिछले जन्मों के कर्मों से बंधे हैं. जब तक पापों के भागियों को अपनी जगह पर नहीं रखा जाएगा देश चल नहीं सकता.

इस बात के हामी सिर्फ ऊंची जाति के लोग ही नहीं हैं. मायावती, उदित राज, रामदास अठावले जैसे सैकड़ों दलित नेता हैं जो पहले दलितों के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर उबलते थे पर अब उन्हें ज्ञान हो गया है कि दलित तो भगवान के बनाए हुए हैं और जिन थोड़े से दलितों ने अपने जपतप से भगवानों के दूतों को खुश कर दिया है, उन का काम है कि विभीषणी करते हुए अपने ही लोगों की मौत, रेप, पिटाई, बेगारी होते देखें और समाज के गुन गाएं. तभी तो योगी सरकार की पुलिस को यह बल मिला. 19 साल की लड़की की मौत को तमाशा बनने से रोकने के लिए आधी रात को उस का दाह संस्कार कर दिया गया. अब उस की राख के बदले कुछ रुपए उस के घर वालों के मुंह पर मारे जाएंगे और बात खत्म.

यह न समझें कि दलितों पर अत्याचार की छूट का असर नहीं पड़ता. देश की 2000 साल की गुलामी के पीछे यही भेदभाव है. करोड़ों लोग अगर मुसलमान बने तो इसलिए कि उन को हिंदू समाज में सांस लेना दूभर हो रहा था. आज दलितों को खरीदना आसान हो रहा है इसलिए उन की बोलती बंद है पर यह खरीदफरोख्त अब ऊंचों के साथ भी हो रही है. सारे देश में आपाधापी मची हुई है. नोटबंदी और जीएसटी उसी का एक रूप हैं. गिरती अर्थव्यवस्था इसी कानून के प्रति अविश्वास की निशानी है.

ये भी पढ़ें- गहरी पैठ

अब गांवों, कसबों, शहरों में समाज और ज्यादा टुकड़ेटुकड़े होगा. हिंदूमुसलिम भेदभाव तो था ही, दलितठाकुर, ठाकुरजाट, जाटकुर्मी न जाने कितने टुकड़े एकदूसरे के खून के प्यासे बनते जाएंगे, कितनों के घरों में सामाजिक विवाद की सजा मासूम बेटियों को मिलेगी. हां, धर्म की जय होगी. मसजिद ढहाने पर भी जयजय. दलित हत्या पर भी जयजय.

फुजूल की ट्रंप सेवा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत की 36 घंटों की यात्रा पर जो तैयारी भारत सरकार ने की थी, वह पागलपन का दौरा ज्यादा थी. डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के चुने हुए राष्ट्रपति जरूर हैं और हो सकता है कि 2020 के चुनावों में एक बार फिर चुन लिए जाएं, पर वे न तो विश्व नेता हैं और न ही अमेरिकी जनता के नेता. वे सिर्फ हेरफेर, रूसी कृपा से, अमेरिकी गोरों की भड़ास पूरी करने वाले सिरफिरे से विशुद्ध व्यवसायी हैं जो राजनीति में घुस गए और जैसे व्यापार चलाते हैं, वैसे ह्वाइट हाउस चला रहे हैं.

उन्हें अमेरिका के सर्वोच्च पद पर बैठे होने के कारण इज्जत पाने का हक है, पर हम अपना दिल और दिमाग बिछा दें, इस की कोई जरूरत नहीं. उन का स्वागत एक आम पदासीन राष्ट्राध्यक्ष की तरह से होना चाहिए था, उन से व्यापार व कूटनीति के समझौते होने चाहिए थे, पर इतना होहल्ला मचाना अपनी कमजोरी दिखाता है.

अमेरिका अब भारत जैसे देश को कुछ दे नहीं सकता. एक समय पब्लिक ला 480 के अंतर्गत अमेरिका ने भारत की भूखी जनता को मुफ्त गेहूं दिया था. आज हमारा अपना भंडार लबालब भरा है. भारत अमेरिका से जो पाता है, वह खरीदता है, मुफ्त नहीं पाता. अमेरिका भारत की विदेश नीति में कोई खास मदद नहीं करता. अमेरिका में लाखों भारतीय मूल के लोग नागरिक हैं या अन्य वर्क वीजाओं के अंतर्गत काम कर रहे हैं, पर यह किसी राष्ट्रपति की कृपा नहीं है, यह अमेरिकियों की जरूरत है.

ये भी पढ़ें- गहरी पैठ

अमेरिका अब दूसरा सब से मजबूत लोकतंत्र होने का लंबाचौड़ा रोब भी मार नहीं सकता, क्योंकि भारत और अमेरिका दोनों जगह नागरिकों की स्वतंत्रताएं आज बेहद खतरे में हैं. अमेरिका की जेलें लाखों कैदियों से लबालब भरी हैं और भारत की जेलें यातनाघर हैं, जहां बिना सजा पाए लोग वर्षों गुजार देते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अमेरिका और भारत दोनों में सरकारी या व्यापारिक ग्रहण लग चुका है.

अमेरिका अब किसी भी माने में दुनिया का सिपाही नहीं है और भारत किसी भी माने में एक आदर्श विकासशील देश नहीं है. ऐसे में भारत की अमेरिकी राष्ट्रपति की चाटुकारिता एक बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है, इसीलिए डोनाल्ड ट्रंप के बारे में जनता में कहीं भी जोश नहीं है. टीवी मीडिया इसे तमाशे के रूप में दिखाता रहा है और सड़कों पर भीड़ भाड़े पर ही आई थी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह क्षणिक यात्रा मात्र एक कौमा है, निरर्थक सा.

बढ़ गई बेकारी

गांवकसबों में बेकारी आज की सरकार के लिए कोई परेशानी की बात नहीं है. पुराणों में बारबार यही दोहराया गया है कि शूद्रों और उन के नीचे जंगलवासियों को कम में रहने की आदत होनी चाहिए और राजा को उन के पास जो भी हो छीन लेना चाहिए. यह हुक्म पुराणों में भरा हुआ है कि राजा जनता से धन एकत्र कर के ब्राह्मणों को दान कर दे.

आज देशभर की सरकारें यही कर रही हैं, चाहे किसी भी पार्टी की क्यों न हों. आरक्षण से जो उम्मीद बनी थी कि सदियों से दबाएकुचले किसान, कारीगर, मजदूर, कलाकार, मदारी, लोहार, बढ़ई, बिना जमीन वाले मजूर अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी पा जाएंगे, अब खत्म होती जा रही है. मनरेगा जैसे प्रोग्राम की भी गरदन मरोड़ दी गई है. स्कूलों में खाना खिलाने में छुआछूत इस कदर फैल गया है कि अब निचले तबकों के बच्चे स्कूल जाने से कतराने लगे हैं.

इन गरीबों को अब मालूम पड़ गया है कि उन का कुछ भला न होगा. अकेले उत्तर प्रदेश में पिछले 2 सालों में 12 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं और वे अब अपने घर वालों पर बोझ बन गए हैं. गरीब घरों में जब एक बेरोजगार और आ जाए तो आमदनी तो कम हो ही जाती है. जो रहनसहन पहले सब का था, वह एक निठल्ले की वजह से और हलका हो जाता है. हर घर में झगड़े शुरू हो गए हैं.

मंदिर, आश्रम, पूजापाठ का जो चसका हाल के सालों में चढ़ा है उस ने गांवकसबों की तसवीर और खराब कर दी है. खाली बैठे लोग मंदिरों से कमाई की खातिर मंदिरों के इर्दगिर्द दुकानें लगा कर बैठ गए हैं. जहां मिलता तो जरा सा है, पर यह भरोसा हो जाता है कि भगवान की कृपा होगी.

सरकार के खजाने में पैसा कम हो रहा है, क्योंकि एक तरफ टैक्स कम मिल रहे हैं, दूसरी तरफ सरकारी फुजूलखर्ची बढ़ रही है. सारे देश में पुलिस पर बेहद खर्च बढ़ रहा है. नागरिक संशोधन कानून से देश में अफरातफरी मची है, जिस के लिए चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात है और कहीं से तो पैसा आएगा ही. कश्मीर में कई लाख सैनिक, अर्धसैनिक और पुलिस वाले हैं. लाखों को नागरिकों पर नजर रखने के लिए लगा दिया गया है. मंदिरों पर सरकार बेतहाशा खर्च कर रही है.

ये भी पढ़ें- बेरोजगारी का आलम

प्रधानमंत्री रोजगार योजना एक छोटा नमूना है जिस में पिछले साल 6 लाख मजदूर काम कर रहे थे, इस साल ढाई लाख रह गए. देशभर में कहीं भी न कुएं खुद रहे हैं, न डैम बन रहे हैं, न नहरें बन रही हैं, न जंगल उगाए जा रहे हैं.

देश में 16-27 साल के बीच के एकचौथाई जवान लड़केलड़कियां बेकार हैं और सरकार को मंदिर बनाने की पड़ी है. जीएसटी की वजह से लाखों छोटे दुकानदारों ने काम बंद कर दिया, क्योंकि उन का काम नकद से चलता था और जीएसटी में यह नहीं हो पाता. इन दुकानों पर काम करने वाले आज बेकार हैं. देश में नए मकान बनने कम हो गए हैं और नए मजूरों के लिए काम खत्म हो गया है.

गाडि़यां कम बिक रही हैं तो पैट्रोल कम बिक रहा है, सड़क के किनारे बनी गाड़ी मरम्मत की दुकानें उजड़ रही हैं. सरकारी विभागों में 22 लाख पद खाली हैं, पर सिवा भरती के विज्ञापन देने के कोई काम नहीं हो रहा.

यह देश के कल की बुरी हालत का एक जरा सा हलका सा निशान है, पर यह पुराणों की बात साबित करता है.

अमेरिकी एयर स्ट्राइक में ईरानी जनरल सुलेमानी की मौत, तेहरान-वाशिंगटन के बीच भयंकर तनाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर किए गए  हवाई हमले में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के विशिष्ट कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी की हुई मौत हो गई. अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद दोनों मुल्कों के बीच तनाव भी भयंकर बढ़ गया है. उधर ट्रंप भी झुकने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं और इधर भी बदले की बात कही जा रही है. अमेरिका ने हमला क्यों किया? इसका जवाब भी बदला ही है. कुछ दिनों पहले ईरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला किया गया था. इससे पहले भी ईरान के अमेरिकी मरीन्स को निशाना बनाया गया था, जिसकी अगुवाई सुलेमानी ही कर रहे थे.

अब सुलेमानी की मौत से भड़के ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैय्यद अली खामेनी ने बदला लेने का संकल्प लिया है. आईआरजीसी ने कहा कि हशद शाबी या इराकी पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (पीएमएफ) के डिप्टी कमांडर अबू महदी अल-मुहांदिस भी सुलेमानी के साथ गुरुवार रात अमेरिकी हमले में मारे गए थे. बगदाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट रोड पर उनके वाहन को निशाना बनाया गया.

तेहरान स्थित प्रेस टीवी के अनुसार, यहां जारी एक बयान में खामेनी ने कहा कि “धरती के सबसे क्रूर लोगों ने’ ‘सम्मानीय’ कमांडर की हत्या की, जिन्होंने दुनिया की बुराइयों और डकैतों के खिलाफ साहसपूर्वक लड़ाई लड़ी.” उन्होंने कहा, “उनके निधन से उनका मिशन नहीं रुकेगा, लेकिन जिन अपराधियों ने गुरुवार रात जनरल सुलेमानी और अन्य शहीदों के खून से अपने हाथ रंगे हैं, उन्हें जरूर एक जबरदस्त बदले की, अंजाम भुगतने की प्रतीक्षा करनी चाहिए.”

ये भी पढ़ें- पौलिटिकल राउंडअप: अब नई दलित पार्टी

खामेनी ने कहा कि जारी लड़ाई और अंतिम जीत की उपलब्धि हत्यारों और अपराधियों की जिंदगी को और दुश्वर बना देगी. सुलेमानी के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के अलावा, खामेनी ने तीन दिनों का शोक भी घोषित किया. सुलेमानी की मौत की खबर की पुष्टि पेंटागन ने भी की है.

समाचार एजेंसी एफे ने पेंटागन के बयान के हवाले से कहा, “अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्देश पर विदेश में रह रहे अमरीकी सैन्यकर्मियों की रक्षा के लिए कासिम सुलेमानी को मारने का कदम उठाया गया है.” पेंटागन ने आगे कहा, “यह हवाई हमला भविष्य में ईरानी हमले की योजनाओं को रोकने के मकसद से किया गया. अमेरिका अपने नागरिकों की रक्षा के लिए, दुनियाभर में भी चाहे वे जहां भी हैं. सभी आवश्यक कार्रवाई करना जारी रखेगा.”

लेकिन एक ट्वीट में, ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने हमले को ‘बेहद खतरनाक और मूर्खतापूर्ण’ हरकत करार दिया और कहा कि वह अपनी इस तरह की हरकत के लिए परिणामों का जिम्मेदार खुद होगा. आईआरजीसी के पूर्व कमांडर मोहसिन रेजाई ने कहा कि ईरान इसका बदला अमेरिका से जरूर लेगा.

ये भी पढ़ें- नेता बांटे रेवड़ी, अपन अपन को देय !

बीबीसी के मुताबिक, सुलेमानी 1998 से ही ईरान के कुद्स फोर्स का नेतृत्व कर रहे थे. आईआरजीसी की यह विशिष्ट इकाई विदेशों में गुप्त अभियानों का संचालन करती है, और यह सीधे देश के सर्वोच्च नेता खामेनी को रिपोर्ट करती है. मंगलवार रात बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर सैकड़ों प्रदर्शनकारियों द्वारा हमला किए जाने के बाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़े तनाव के बीच गुरुवार रात यह हमला हुआ.

16 साल की इस लड़की ने दिया यूएन में भाषण, राष्ट्रपति ट्रंप से लेकर तमाम बड़े नेताओं को सुनाई खरी-खोटी

ग्रेटा ने बड़े तीखे शब्दों से विश्व के कई नेताओं पर इस त्रासदी से निपटने के लिए कुछ नहीं करने का भी आरोप लगाया. आपने हमें फेल कर दिया है. युवा पीढ़ी ये समझती है कि आपने हमसे धोका किया है. हम युवाओं की नजरें आप पर हैं और अगर आप लोगों ने हमें असफल किया तो हम आपको कभी भी माफ नहीं करेंगे.

आपको यहीं पर एक लाइन खींचनी होगी. दुनिया जाग चुकी है और चीजें अब बदल रही हैं..ये चाहे आपको पसंद हो या न हो.’ जानते  हैं ये भाषण किसका है. ये किसी देश के बड़े राजनेता का नहीं है न ही किसी मोटीवेशनल स्पीकर का है बल्कि ये कहना है 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग का. जोकि स्वीडन की पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं.

यूएन में आयोजित क्लाइमेट एक्शन समिट में दुनिया भर के नेताओं को फटकार लगाई. यूएन महासचिव गुतारेस के सामने दी गई ग्रेटा की स्पीच अब वायरल हो रही है और उनके सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है. इस स्पीच के अलावा ग्रेटा थनबर्ग की एक तस्वीर भी वायरल हो रही है. क्लाइमेट एक्शन समिट में पहुंचे ट्रंप के पीछे खड़ी ग्रेटा जिस निगाह से ट्रंप को देख रही हैं वो लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. ग्रेटा की आंखों में नाराजगी साफ नजर आ रही है.

ये भी पढ़ें- ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’: गरीबों के लिए बनी मुसीबत

ग्रेटा ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और इस आंदोलन को ‘Friday for future’ नाम दिया है. ग्रेटा कौन हैं, स्कूल जाने की उम्र में धरती बचाने का जिम्मा उठाने की प्रेरणा कहां से मिली, आइए ये सब जानते हैं.

10वीं क्लास की छात्रा ग्रेटा थनबर्ग का जन्म 2003 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ था. मां मलेना अर्नमैन स्वीडन की मशहूर ओपेरा सिंगर और पिता स्वांते थनबर्ग एक्टर हैं.‘Charity begins at home’ वाली कहावत से प्रभावित ग्रेटा ने पर्यावरण बचाने की शुरुआत अपने घर से की.

इसके लिए उन्होंने सबसे पहले अपने माता पिता को लाइफ स्टाइल बदलने के लिए मनाया. पूरे परिवार ने नॉनवेज खाना छोड़ दिया और जानवरों के अंगों से बनी चीजों का इस्तेमाल बंद कर दिया. कार्बन उत्सर्जन जिन चीजों से होता है उन सब चीजों का इस्तेमाल सीमित कर दिया.

9 सितंबर 2018 को स्वीडन में आम चुनाव होने वाले थे. उससे पहले ही स्वीडन के जंगलों में आग लगी हुई थी और 262 सालों की सबसे भीषण गर्मी पड़ रही थी. ग्रेटा 9वीं क्लास में थीं और फैसला किया कि जब तक चुनाव नहीं निपट जाते, वो स्कूल नहीं जाएंगी.

ये भी पढ़ें- धोनी मामले में बड़ा खुलासा, पीठ दर्द की समस्या के

क्लाइमेट चेंज के खिलाफ ग्रेटा ने 20 अगस्त 2018 यानी आम चुनाव से पहले मोर्चा खोल दिया. सरकार के खिलाफ स्वीडन की संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. तीन हफ्ते तक प्रदर्शन करते हुए ग्रेटा ने पर्चियां बांटीं जिन पर लिखा होता था ‘मैं इसलिए ये कर रही हूं क्योंकि आप अडल्ट लोग मेरे भविष्य से खेल रहे हो.’ उस वक्त भी उनकी एक तस्वीर वायरल हुई थी.

ग्रेटा ने जमीन पर प्रदर्शन करते हुए सोशल मीडिया की ताकत को पहचाना और उसे अपना हथियार बनाया. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर अपने प्रोटेस्ट की तस्वीरें शेयर करके लोगों को इस मुहिम से जोड़ा. उन्हें कम समय में भारी समर्थन मिला.

फरवरी 2019 में ग्रेटा को वैश्विक पहचान तब मिली जब 224 शिक्षाविदों ने उनके समर्थन में एक ओपन लेटर पर साइन किए. पिछले महीने अमेरिका पहुंची ग्रेटा से एक रिपोर्टर ने पूछा कि क्या वो ट्रंप से मिलने वाली हैं? इस पर उन्होंने कहा कि जब ट्रंप मेरी बातों को सुनने वाले नहीं हैं तो उनसे मिलकर मैं अपना समय क्यों बरबाद करूंगी?डॉनल्ड ट्रंप ने ग्रेटा की स्पीच पर रिएक्शन दिया है. ट्वीट करते हुए ट्रंप ने लिखा ‘वह हैप्पी यंग गर्ल नजर आ रही है, जो उज्ज्वल और अद्भुत भविष्य की तलाश में है. देख कर अच्छा लगा.’ इस व्यंग्यात्मक कमेंट पर भी लोगों ने ट्रंप को आड़े हाथों लिया है.

Video Credit – Sky News

ये भी पढ़ें- जेब ढ़ीली कर देगा पान

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें