Hindi Social Story : बदली परिपाटी

Hindi Social Story. लगता है रात में जतिन ने फिर बहू पर हाथ उठाया. मुझ से यह बात बरदाश्त नहीं होती. बहू की सूजी आंखें और शरीर पर पड़े नीले निशान देख कर मेरा दिल कराह उठता है. मैं कसमसा उठता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. काश, पूजा होती और अपने बेटे को समझाती पर पूजा को तो मैं ने अपनी ही गलतियों से खो दिया है.

यह सोचतेसोचते मेरे दिमाग की नसें फटने लगी हैं. मैं अपनेआप से भाग जाना चाहता हूं. लेकिन नहीं भाग सकता, क्योंकि नियति द्वारा मेरे लिए सजा तय की गई है कि मैं पछतावे की आग में धीरेधीरे जलूं.

‘‘अंतरा, मैं बाजार की तरफ जा रहा हूं, कुछ मंगाना तो नहीं.’’

‘‘नहीं पापाजी, आप हो आइए.’’ मैं चल पड़ा यह सोच कर कि कुछ देर बाहर निकलने से शायद मेरा मन थोड़ा बहल जाए. लेकिन बाहर निकलते ही मेरा मन अतीत के गलियारों में भटकने लगा…

‘मुझ से जबान लड़ाती है,’ एक भद्दी सी गाली दे कर मैं ने उस पर अपना क्रोध बरसा दिया.

‘आह…प्लीज मत मारो मुझे, मेरे बच्चे को लग जाएगी, दया करो. मैं ने आखिर किया क्या है?’ उस ने झुक कर अपनी पीठ पर मेरा वार सहन करते हुए कहा.

कोख में पल रहे बच्चे पर वह आंच नहीं आने देना चाहती थी. लेकिन मैं कम क्रूर नहीं था. बालों से पकड़ते हुए उसे घसीट कर हौल में ले आया और अपनी बैल्ट निकाल ली. बैल्ट का पहला वार होते ही जोरों की चीख खामोशी में तबदील होती चली गई. वह बेहोश हो चुकी थी.

‘पागल हो गया क्या, अरे, उस के पेट में तेरी औलाद है. अगर उसे कुछ हो गया तो?’ मां किसी बहाने से उसे मेरे गुस्से से बचाना चाहती थीं.

‘कह देना इस से, भाड़े पर लड़कियां लाऊं या बियर बार जाऊं, यह मेरी अम्मा बनने की कोशिश न करे वरना अगली बार जान से मार दूंगा,’ कहते हुए मैं ने 2 साल के नन्हे जतिन को धक्का दिया, जो अपनी मां को मार खाते देख सहमा हुआ सा एक तरफ खड़ा था. फिर गाड़ी उठाई और निकल पड़ा अपनी आवारगी की राह.

उस पूरी रात मैं नशे में चूर रहा. सुबह के 6 बज रहे होंगे कि पापा के एक कौल ने मेरी शराब का सारा नशा उतार दिया. ‘कहां है तू, कब से फोन लगा रहा हूं. पूजा ने फांसी लगा ली है. तुरंत आ.’ जैसेतैसे घर पहुंचा तो हताश पापा सिर पर हाथ धरे अंदर सीढि़यों पर बैठे थे और मां नन्हे जतिन को चुप कराने की बेहिसाब कोशिशें कर रही थीं.

अपने बैडरूम का नजारा देख मेरी सांसें रुक सी गईं. बेजान पूजा पंखे से लटकी हुई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मांपापा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. पूजा ने अपने साथ अपनी कोख में पल रहे मेरे अंश को भी खत्म कर लिया था. पर इतने खौफनाक माहौल में भी मेरा शातिर दिमाग काम कर रहा था. इधरउधर खूब ढूंढ़ने के बाद भी पूजा की लिखी कोई आखिरी चिट्ठी मुझे नहीं मिली.

पुलिस को देने के लिए हम ने एक ही बयान को बारबार दोहराया कि मां की बीमारी के चलते उसे मायके जाने से मना किया तो जिद व गुस्से में आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. वैसे भी मेरी मां का सीधापन पूरी कालोनी में मशहूर था, जिस का फायदा मुझे इस केस में बहुत मिला. कुछ दिन मुझे जरूर लौकअप में रहना पड़ा, लेकिन बाद में सब को देदिला कर इस मामले को खत्म करने में हम ने सफलता पाई, क्योंकि पूजा के मायके में उस की खैरखबर लेने वाला एक शराबी भाई ही था जिसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाने में कोई खास रुचि न थी.

थोड़ी परेशानी से ही सही, लेकिन 8-10 महीने में केस रफादफा हो गया पर मेरे जैसा आशिकमिजाज व्यक्ति ऐसे समय में भी कहां चुप बैठने वाला था. इस बीच मेरी रासलीला मेरे एक दोस्त की बहन लिली से शुरू हो गई. लिली का साथ मुझे खूब भाने लगा, क्योंकि वह भी मेरी तरह बिंदास थी. पूजा की मौत के डेढ़ साल के भीतर ही हम ने शादी कर ली. वह तो शादी के बाद पता चला कि मैं सेर, तो वह सवा सेर है. शादी होते ही उस ने मुझे सीधे अपनी अंटी में ले लिया.

बदतमीजी, आवारगी, बदचलनी आदि गुणों में वह मुझ से कहीं बढ़ कर निकली. मेरी परेशानियों की शुरुआत उसी दिन हो गई जिस दिन मैं ने पूजा समझ कर उस पर पहली बार हाथ उठाया. मेरे उठे हाथ को हवा में ही थाम उस ने ऐसा मरोड़ा कि मेरे मुंह से आह निकल गई. उस के बाद मैं कभी उस पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर पाया.

घर के बाहर बनी पुलिया पर आसपास के आवारा लड़कों के साथ बैठी वह सिगरेट के कश लगाती जबतब कालोनी के लोगों को नजर आती. अपने दोस्तों के साथ कार में बाहर घूमने जाना उस का प्रिय शगल था. रात को वह शराब के नशे में धुत हो घर आती और सो जाती. मैं ने उसे अपने झांसे में लेने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उस ने मेरे वार का ऐसा प्रतिवार किया कि मैं बौखला गया. उस ने साफ शब्दों में मुझे चेतावनी दी कि अगर मैं ने उस से उलझने की कोशिश की तो वह मुझे मरवा देगी या ऐसा फंसाएगी कि मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं उस के गदर से तभी तक बचा रहता जब तक कि उस के कामों में हस्तक्षेप न करता.

तो इस तरह प्रकृति के न्याय के तहत मैं ने जल्द ही वह काटा, जो बोया था. घर की पूरी सत्ता पर मेरी जगह वह काबिज हो चुकी थी. शादी के सालभर बाद ही मुझ पर दबाव बना कर उस ने पापा से हमारे घर को भी अपने नाम करवा लिया. और फिर हमारा मकान बेच कर उस ने पौश कालोनी में एक फ्लैट खरीदा और मुझे व जतिन को अपने साथ ले गई. मेरे मम्मीपापा मेरी बहन यानी अपनी बेटी के घर में रहने को मजबूर थे. यह सब मेरी ही कारगुजारियों की अति थी जो आज सबकुछ मेरे हाथ से मुट्ठी से निकली रेत की भांति फिसल चुका था.

अपना मकान बिकने से हैरानपरेशान पापा इस सदमे को न सह पाने के कारण हार्टअटैक के शिकार हो महीनेभर में ही चल बसे. उन के जाने के बाद मेरी मां बिलकुल अकेली हो गईं. प्रकृति मेरे कर्मों की इतनी जल्दी और ऐसी सजा देगी, मुझे मालूम न था.

नए घर में शिफ्ट होने के बाद भी उस के क्रियाकलाप में कोई खास अंतर नहीं आया. इस बीच 5 साल के हो चुके जतिन को उस ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया. उस के सान्निध्य में पलताबढ़ता जतिन भी उस के नक्शेकदम पर चल पड़ा. पढ़ाईलिखाई से उस का खास वास्ता था नहीं. जैसेतैसे 12वीं कर उस ने छोटामोटा बिजनैस कर लिया और अपनी जिंदगी पूरी तरह से उसी के हवाले कर दी. उन दोनों के सामने मेरी हैसियत वैसे भी कुछ नहीं थी. किसी समय अपनी मनमरजी का मालिक मैं आजकल उन के हाथ की कठपुतली बन, बस, उन के रहमोकरम पर जिंदा था.

इसी रफ्तार से जिंदगी के कुछ और वर्ष बीत गए. इस बीच लिली एक भयानक बीमारी एड्स की चपेट में आ गई और अपनेआप में गुमसुम पड़ी रहने लगी. अब घर की सत्ता मेरे बेटे जतिन के हाथों में आ गई. हालांकि इस बदलाव का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था. हां, जतिन की शादी होने पर उस की पत्नी अंतरा के आने से अलबत्ता मुझे कुछ राहत जरूर हो गई, क्योंकि मेरी बहू भी पूजा जैसी ही एक नेकदिल इंसान थी.

वह लिली की सेवा जीजान से करती और जतिन को खुश करने की पूरी कोशिश भी. पर जिस की रगों में मेरे जैसे गिरे इंसान का लहू बह रहा हो, उसे भला किसी की अच्छाई की कीमत का क्या पता चलता. सालभर पहले लिली ने अपनी आखिरी सांस ली. उस वक्त सच में मन से जैसे एक बोझ उतर गया और मेरा जीवन थोड़ा आसान हो गया.

इस बीच, जतिन के अत्याचार अंतरा के प्रति बढ़ते जा रहे थे. लगभग रोज रात में जतिन उसे पीटता और हर सुबह अपने चेहरे व शरीर की सूजन छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए वह फिर से अपने काम पर लग जाती. कल रात भी जतिन ने उस पर अपना गुस्सा निकाला था.

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ये सब क्यों सहती है, क्यों नहीं वह जतिन को मुंहतोड़ जवाब देती, आखिर उस की क्या मजबूरी है? तमाम बातें मेरे दिमाग में लगातार चलतीं. मेरा मन उस के लिए इसलिए भी परेशान रहता क्योंकि इतना सबकुछ सह कर भी वह मेरा बहुत ध्यान रखती थी. कभीकभी मैं सोच में पड़ जाता कि आखिर औरत एक ही समय में इतनी मजबूत और मजबूर कैसे हो सकती है?

ऐसे वक्त पर मुझे पूजा की बहुत याद आती. अपने 4 वर्षों के वैवाहिक जीवन में मैं ने एक पल भी उसे सुकून का नहीं दिया. शादी की पहली रात जब सजी हुई वह छुईमुई सी मेरे कमरे में दाखिल हुई थी, तो मैं ने पलभर में उसे बिस्तर पर घसीट कर उस के शरीर से खेलते हुए अपनी कामवासना शांत की थी.

काश, उस वक्त उस के रूपसौंदर्य को प्यारभरी नजरों से कुछ देर निहारा होता, तारीफ के दो बोल बोले होते तो वह खुशी से अपना सर्वस्व मुझे सौंप देती. उस घर में आखिर वह मेरे लिए ही तो आई थी. पर मेरे लिए तो प्यार की परिभाषा शारीरिक भूख से ही हो कर गुजरती थी. उस दौरान निकली उस की दर्दभरी चीखों को मैं ने अपनी जीत समझ कर उस का मुंह अपने हाथों से दबा कर अपनी मनमानी की थी. वह रातों में मेरे दिल बहलाने का साधनमात्र थी. और फिर जब वह गर्भवती हुई तो मैं दूसरों के साथ इश्क लड़ाने लगा, क्योंकि वह मुझे वह सुख नहीं दे पा रही थी. वह मेरे लिए बेकार हो चुकी थी. इसलिए मुझे ऐसा करने का हक था, आखिर मैं मर्द जो था. मेरी इस सोच ने मुझे कभी इंसान नहीं बनने दिया.

हे प्रकृति, मुझे थोड़ी सी तो सद्बुद्धि देती. मैं ने उसे चैन से एक सांस न लेने दी. अपनी गंदी हरकतों से सदा उस का दिल दुखाया. उस की जिंदगी को मैं ने वक्त से पहले खत्म कर दिया.

उस दिन उस ने आत्महत्या भी तो मेरे कारण ही की थी, क्योंकि उसे मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया था और उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि इस बारे में मुझ से पूछ बैठी थी. बदले में मैं ने जीभर कर उस की धुनाई की थी. ये सब पुरानी यादें दिमाग में घूमती रहीं और कब मैं घर लौट आया पता ही नहीं चला.

‘‘पापा, जब आप मार्केट गए थे. उस वक्त बूआजी आई थीं. थोड़ी देर बैठीं, फिर आप के लिए यह लिफाफा दे कर चली गईं.’’ बाजार से आते ही अंतरा ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया.

‘‘ठीक है बेटा,’’ मैं ने लिफाफा खोला. उस में एक छोटी सी चिट और करीने से तह किया हुआ एक पन्ना रखा था. चिट पर लिखा था, ‘‘मां के जाने के सालों बाद आज उन की पुरानी संदूकची खोली तो यह खत उस में मिला. तुम्हारे नाम का है, सो तुम्हें देने आई थी.’’ बहन की लिखावट थी. सालों पहले मुझे यह खत किस ने लिखा होगा, यह सोचते हुए कांपते हाथों से मैं ने खत पढ़ना शुरू किया.

‘‘प्रिय मयंक,

‘‘वैसे तो तुम ने मुझे कई बार मारा है, पर मैं हमेशा यह सोच कर सब सहती चली गई कि जैसे भी हो, तुम मेरे तो हो. पर कल जब तुम्हारे इतने सारे नाजायज संबंधों का पता चला तो मेरे धैर्य का बांध टूट गया. हर रात तुम मेरे शरीर से खेलते रहे, हर दिन मुझ पर हाथ उठाते रहे. लेकिन मन में एक संतोष था कि इस दुखभरी जिंदगी में भी एक रिश्ता तो कम से कम मेरे पास है. लेकिन जब पता चला कि यह रिश्ता, रिश्ता न हो कर एक कलंक है, तो इस कलंक के साथ मैं नहीं जी सकती. सोचती थी, कभी तो तुम्हारे दिल में अपने लिए प्यार जगा लूंगी. लेकिन अब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. मायके में भी तो कोई नहीं है, जिसे मेरे जीनेमरने से कोई सरोकार हो. मैं अपनी व्यथा न ही किसी से बांट सकती हूं और न ही उसे सह पा रही हूं. तुम्हीं बताओ फिर कैसे जिऊं. मेरे बाद मेरे बच्चों की दुर्दशा न हो, इसलिए अपनी कोख का अंश अपने साथ लिए जा रही हूं. मासूम जतिन को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुश रहो तुम, कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना. जाने से पहले एक बात तुम से जरूर कहना चाहूंगी. ‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं.’

‘‘तुम्हारी चाहत के इंतजार में पलपल मरती…तुम्हारी पूजा.’’

पूरा पत्र आंसुओं से गीला हो चुका था, जी चाह रहा था कि मैं चिल्लाचिल्ला कर रो पड़ूं. ओह, पूजा माफ कर दे मुझे. मैं इंसान कहलाने के काबिल नहीं, तेरे प्यार के काबिल भला क्या बनूंगा. हे प्रकृति, मेरी पूजा को लौटा दे मुझे, मैं उस के पैर पकड़ कर अपने गुनाहों की माफी तो मांग लूं उस से. लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिडि़या चुग गई खेत.

भावनाओं का ज्वार थमा तो कुछ हलका महसूस हुआ. शायद मां को पूजा का यह सुसाइड लैटर मिला हो और मुझे बचाने की खातिर यह पत्र उन्होंने अपने पास छिपा कर रख लिया हो. यह उन्हीं के प्यार का साया तो था कि इतना घिनौना जुर्म करने के बाद भी मैं बच गया. उन्होंने मुझे कालकोठरी की सजा से तो बचा लिया, परंतु मेरे कर्मों की सजा तो नियति से मुझे मिलनी ही थी और वह किसी भी बहाने से मुझे मिल कर रही.

पर अब सबकुछ भुला कर पूजा की वही पंक्ति मेरे मन में बारबार आ रही थी, ‘‘कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना.’’ अंतरा के मायके में भी तो उस की बुजुर्ग मां के अलावा कोई नहीं है. हो सकता है इसलिए वह भी पूजा की तरह मजबूर हो. पर अब मैं मजबूर नहीं बनूंगा…कुछ सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ. अंतरा को आवाज दी.

‘‘जी पापा,’’ कहते हुए अंतरा मेरे सामने मौजूद थी. बहुत देर तक मैं उसे सबकुछ समझाता रहा और वह आंखें फाड़फाड़ कर मुझे हैरत से देखती रही. शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जतिन का पिता होने के बावजूद मैं उस का दर्द कैसे महसूस कर रहा हूं या उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक मैं यह क्या और क्यों कर रहा हूं, क्योंकि वह मासूम तो मेरी हकीकत से हमेशा अनजान थी.

पास के पुलिसस्टेशन पहुंच कर मैं ने अपनी बहू पर हो रहे अत्याचार की धारा के अंतर्गत बेटे जतिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. मेरे कहने पर अंतरा ने अपने शरीर पर जख्मों के निशान उन्हें दिखाए, जिस से केस पुख्ता हो गया. थोड़ा वक्त लगा, लेकिन हम ने अपना काम कर दिया था. आगे का काम पुलिस करेगी. जतिन को सही राह पर लाने का एक यही तरीका मुझे कारगर लगा, क्योंकि सिर्फ मेरे समझानेभर से बात उस के पल्ले नहीं पड़ेगी. पुलिस, कानून और सजा का खौफ ही अब उसे सही रास्ते पर ला सकता है.

पूजा के चिट्ठी में कहे शब्दों के अनुसार, मैं उसे रिश्तों की इज्जत करना सिखाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा, ताकि फिर कोई पूजा किसी मयंक के अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करने को मजबूर न हो. औटो में वापसी के समय अंतरा के सिर पर मैं ने स्नेह से हाथ फेरा. उस की आंखों में खौफ की जगह अब सुकून नजर आ रहा था. यह देख मैं ने राहत की सांस ली. Hindi Social Story

Hindi Story : शन्नो

Hindi Story. अमीना ने लाइन से लेटे हुए अपने बच्चों की बेमतलब गिनती करनी शुरू कर दी, तो हैरान रह गई.

इन 14 सालों में अमीना ने 7 बच्चों को पैदा कर लिया था. उसे खुद पर तरस आने लगा कि क्या वह मशीन थी? बच्चों का भविष्य क्या था? शायद कुछ भी नहीं था.

अमीना खुद से जिरह करती हुई अपनी 3 साल की बेटी के पास लेटी ही थी, तभी उस का पति अख्तर किराने की दुकान से लौट आया. रात के 10 बजे थे.

अख्तर पेशे से मकान बनाने का मिस्त्री था. सुबह 8 बजे से ले कर शाम 5 बजे तक वह काम करता था. उस के बाद वह महल्ले में ही जमीर अहमद की किराने की दुकान पर बैठा करता था. वह पैसे भी बहुत खर्च कर देता था.

‘‘रुपए कहां हैं?’’ उसे देखते ही अमीना ने कड़वे लहजे में पूछा.

‘‘काहे के रुपए,’’ अख्तर ने मुंह खोला, तो अमीना को तेज बदबू आई. अख्तर ने शराब पी रखी थी.

‘‘तुम ने आज फिर शराब पी है. अब तुम्हारे बच्चों को मैं क्या खिलाऊंगी?’’ अमीना को गुस्सा आ गया था.

‘‘बेशर्म… मैं ने कहा था इतने बच्चे पैदा करने को,’’ अख्तर उसे गालियां देते हुए पीटने लगा.

उन की लड़ाई का शोर सुन कर सभी बच्चे उठ कर रोने लगे.

‘‘जब से तू आई है, तब से मेरी जिंदगी जहन्नुम हो गई है. अब मैं अपनी शन्नो से शादी करूंगा और खुश रहूंगा. तु झे तो…’’ अख्तर कुछ ज्यादा ही नशे की हालत में था, इसलिए उलटे मुंह पलंग पर गिर पड़ा. वह कुछ देर तक बड़बड़ाता रहा, फिर सो गया.

तब खिसिया कर अमीना ने सातों बच्चों को पीटना शुरू कर दिया. शन्नो का नाम सुन कर उस के तनबदन में आग लग जाती थी.

अख्तर का पिछले एक साल से शन्नो से इश्क का चक्कर चल रहा था. शन्नो को ले कर घर में अकसर लड़ाई होती रहती थी. वह आधी से ज्यादा कमाई शन्नो पर खर्च कर देता था. इस वजह से बच्चे एक दिन खाना खाते, तो दूसरे दिन भूखे ही सो जाते थे.

अब अमीना ने तय कर लिया था कि अपने पति की सारी करतूतें बस्ती वालों को बताएगी और अपने ऊपर हो रहे जोरजुल्मों का हिसाब मांगेगी.

अमीना ने बस्ती वालों को सबकुछ बता दिया. वे सभी उस के साथ हो गए. उन्होंने अख्तर की अच्छी पिटाई कर दी थी. कुछ औरतों को शन्नो के घर भी भेज दिया था.

‘‘अच्छेभले घर की है, तु झे शर्म नहीं आई? बोल, तू खिलाएगी अमीना के बच्चों को? ममता का सहारा दे सकेगी?’’ एक औरत ने इतना कहा ही था, बाकी औरतों ने शन्नो के बाल पकड़ कर उसे बुरी तरह पीट दिया.

शन्नो के तो होश ठिकाने आ चुके थे, मगर अख्तर के अभी बाकी थे.

बस्ती वालों ने सोचा कि अब अख्तर की अक्ल ठिकाने आ जाएगी, लेकिन हुआ उलटा. अख्तर ने अमीना के साथ बच्चों को भी घर से निकाल दिया.

अमीना का जिस्म सुन्न पड़ गया. तब उस से कुछ सोचे न बना, तो वह बच्चों को ले कर शन्नो के कदमों में आ पड़ी, ‘‘शन्नो, मु झे बरबाद होने से बचा लो. मैं कहां जाऊंगी? मेरे बच्चों को अनाथ होने से बचा लो. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं,’’ अमीना गिड़गिड़ाने लगी.

‘‘तुम बस्ती वालों को इकट्ठा करो,’’ शन्नो ने कहा और उस के सामने से हट गई. आधे घंटे में तकरीबन सभी बस्ती वाले इकट्ठा हो गए थे.

एक कोने में खड़ी अमीना अपने बच्चों को दाएंबाएं दबोचे खड़ी थी, जैसे कोई उस के बच्चों को छीन कर मार डालेगा.

सामने जीत की मुसकान लिए अख्तर खड़ा था. वह सोचने लगा था कि वह शन्नो को जीत चुका है, लेकिन शन्नो के अगले जुमले पर तमाम बस्ती वालों के होंठों पर चुप्पी लग गई.

‘‘तुम मु झे कितना चाहते हो?’’ शन्नो ने अख्तर से पूछा. ‘‘बहुत ज्यादा,’’ अख्तर बोला.

‘‘मेरे लिए क्या कर सकते हो?’’ ‘‘घर, बीवी, यहां तक कि बच्चों को भी छोड़ सकता हूं,’’ अख्तर ने कहा.

इस पर शन्नो जोर से हंसी, फिर नजरों को तलवार से भी ज्यादा तेज करते हुए बोली, ‘‘तु झ जैसे शैतान से मैं निकाह करूंगी. ऐसे आदमी की तरफ देख कर शन्नो थूके भी नहीं, जो अपनी बीवी और 7-7 बच्चों को किसी के लिए भी छोड़ दे. क्या भरोसा, कल को तू मु झे भी छोड़ दे.’’

‘‘शन्नो,’’ अख्तर ने कहा, तो शन्नो ने पूरी ताकत से अख्तर के मुंह पर अपनी दाईं हथेली जमा दी. उसे दिन में तारे नजर आने लगे. उस की इश्कबाजी उड़नछू हो गई.

शन्नो एक नजर अमीना पर डाल कर चली गई और अगले दिन वह बस्ती से हमेशा के लिए जा रही थी, तब अमीना ने शन्नो की आंखों में आंसू देखे थे, मगर वह कुछ कह नहीं सकी थी. हां, अमीना के लिए उस के मन में बहुत इज्जत जरूर बढ़ गई थी.  Hindi Story

Crime Story : सरप्राइज गिफ्ट -अवैद्य संबंधों के शक में बीवी की हत्या

Crime Story.19 जून, 2017 की शाम मनोज बेहद खुश था. लेकिन उस के दोस्त अनुज को उस की यह बेवजह की खुशी समझ में नहीं आ रही थी. जब रहा न गया तो अनुज ने पूछ ही लिया, ‘‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों हो रहा है, कुछ बताएगा भी या यूं ही बकवास करता रहेगा.’’

‘‘बताऊंगा, पर ऐसे नहीं. पहले मिल कर थोड़ा जश्न मनाते हैं. फिर अपनी खुशी का राज जाहिर करूंगा. ये ले पैसे और औफिसर्स चौइस की बोतल, तले हुए काजू, नमकीन और सिगरेट का पैकेट ले आ. सोच ले, आज मैं तुझे अपनी आजादी की पार्टी दे रहा हूं.’’ कह कर उस ने पर्स से 2 हजार रुपए का नोट निकाल कर अनुज को दे दिया.

अनुज की समझ में तो कुछ नहीं आया, लेकिन उस ने मनोज के हाथों से 2 हजार रुपए का नोट ले कर जेब में रखा और शराब के ठेके की ओर चला गया. कुछ देर बाद वह सारा सामान ले आया तो दोनों कमरे में पीने बैठ गए. मनोज ने 2 पैग बनाए और जाम से जाम टकराने के बाद दोनों शराब पीने लगे. जब मनोज पर नशे का सुरूर चढ़ा तो उस ने कहना शुरू किया, ‘‘अनुज, जानते हो मैं आज इतना खुश क्यों हूं.’’

‘‘जब तक तू बताएगा नहीं, तब तक मैं कैसे जानूंगा कि तेरे मन में किस बात को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’ नशे की झोंक में अनुज उस की ओर देख कर बोला.

Crime Story

‘‘बेटे, आज मैं आजाद हो गया हूं.’’

‘‘पहेलियां न बुझा कर सीधी तरह बता, तेरी इस खुशी का राज क्या है?’’ अनुज ने चौथा पैग पीते हुए उत्सुकता से पूछा.

‘‘मैं ने तेरी भाभी को खुदागंज रवाना कर दिया है. मुझे उस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया है.’’

मनोज की बात सुन कर अनुज को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब उस ने पूरी बात बताई तो उसे लगा कि हो न हो मनोज ने कोमल की हत्या कर दी है. अनुज का सारा नशा काफूर हो गया. थोड़ी देर तक वह मनोज की बात सुनता रहा, फिर पीना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और घर में किसी जरूरी काम का बहाना कर के वहां से चला गया.

बाहर आ कर वह कुछ दोस्तों से मिला और मनोज की बात उन्हें बताई. सब ने उसे यही सलाह दी कि इस बात की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए, क्योंकि बाद में वह भी पुलिसिया लफड़े में फंस सकता है. सोचविचार कर उस ने यह सूचना कंझावला थाने की पुलिस को दे दी.

पति द्वारा किसी औरत की हत्या की सूचना मिलते ही कंझावला थाने की पुलिस हरकत में आ गई. जेजे कालोनी सवदा पहुंच कर पुलिस ने मनोज गुजराती को हिरासत में ले लिया. थाने में जब मनोज से पूछताछ शुरू हुई, तब तक उस का नशा कम हो चुका था. पहले तो उस ने एसआई निखिल को बताया कि शराब के नशे में वह यह सब अपने दोस्त पर रौब जमाने के लिए  कह रहा था. लेकिन निखिल का एक करारा थप्पड़ उस के गले पर पड़ा तो उस के होश ठिकाने आ गए.

उस ने बताया कि वह अपनी पत्नी कोमल की हरकतों से बहुत परेशान था. इसलिए उस ने उसे बोंटा पार्क के जंगल में ले जा कर उस की हत्या कर दी है. बोंटा पार्क दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास है. कंझावला थाने से वह काफी दूर था. तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए अगली सुबह निखिल कांस्टेबल महेश और नरेश को साथ ले कर उत्तरी दिल्ली के मोरिसनगर थाने पहुंचे और वहां की थानाप्रभारी इंसपेक्टर आरती शर्मा को उन के इलाके के बोंटा पार्क में एक लड़की की हत्या किए जाने की सूचना दी.

17 जून, 2017 को कंझावला पुलिस द्वारा मिली इस सूचना को थाना मौरिसनगर के डीडी नंबर 14 ए में दर्ज करवा कर इंसपेक्टर आरती शर्मा ने अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर  वीरेंद्र सिंह को इंसपेक्टर राकेश कुमार, एएसआई बिजेंद्र, हैडकांस्टेबल राजकुमार, सुखवीर, कांस्टेबल श्याम सैनी तथा महिला कांस्टेबल मधु को आरोपी मनोज और कंझावला पुलिस के साथ बोंटा पार्क भेजा.

पुलिस टीम पार्क के गेट नंबर 6 से अंदर दाखिल हुई. अंदर जा कर पुलिस कोमल की लाश की तलाश में जुट गई. मनोज ठीक से उस जगह के बारे में नहीं बता पा रहा था, जहां उस ने अपनी पत्नी कोमल की हत्या कर के उस की लाश छिपाई थी. पुलिस की तलाशी 12 घंटे तक जारी रही, लेकिन कोमल की लाश नहीं मिली. रात घिर आई थी, फिर भी तलाशी चलती रही.

रात के करीब 12 बजे मनोज पुलिस टीम को एक छोटी चट्टान के पास ले कर गया, जहां 22-23 साल की एक लड़की की लाश पड़ी थी. वह गुलाबी रंग का टौप और नीले रंग की जींस पहने थी. लाश की छानबीन करते समय इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने देखा कि उस के दाहिने हाथ पर कोमल गुदा हुआ था.

आरोपी मनोज ने लाश की ओर इशारा कर के बताया कि यह उस की पत्नी कोमल की लाश है, जिसे उस ने कल शाम को धोखे से यहां ला कर उस की हत्या कर दी थी. लाश की फोटोग्राफी कराने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए सब्जीमंडी मोर्चरी भेज दिया गया, साथ ही कोमल के घर वालों को फोन कर के उस की लाश की शिनाख्त के लिए सब्जी मंडी मोर्चरी बुला लिया गया.

17 जून को कोमल की बड़ी बहन गौरी सब्जी मंडी पहुंची,जहां लाश देखने के बाद उस ने उस की पहचान अपनी छोटी बहन और मनोज गुजराती की पत्नी कोमल के रूप में कर दी. कोमल की लाश की शिनाख्त होने के बाद गौरी की तहरीर पर उसी दिन कोमल की हत्या का मामला उस के पति मनोज गुजराती के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया. इस मामले की विवेचना इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह को सौंपी गई. गौरी के बयान तथा मनोज गुजराती के बयानों के बाद 2 साल की लव मैरिज का जो दर्दनाक वाकया सामने आया, वह इस प्रकार था—

कोमल के पिता चमनलाल का परिवार नांगलोई के चंचल पार्क में रहता था. उन के परिवार में पत्नी कमलेश के अलावा 4 बेटियां तथा 2 बेटे थे. इन में कोमल पांचवे नंबर की थी. घर के लोग उसे प्यार से कमली कह कर पुकारते थे. कोमल के बड़े भाई गंगाराम की शादी 8 साल पहले दिव्या से हुई थी. मनोज गुजराती दिव्या का चचेरा भाई था.

मनोज का परिवार कंझावला इलाके के सावदा गांव में रहता था. उस के परिवार में उस के अलावा इस के पिता राजू गुजराती, मां कमलेश तथा एक बहन परवीन थी. घर के बाहरी कमरे में मनोज की परचून की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी, जिस की वजह से मनोज की जेब हमेशा भरी होती थी. वह शौकीनमिजाज युवक था और हमेशा बनठन कर रहता था. चूंकि दोनों के परिवार आपस में रिश्तेदार थे, इसलिए समय समय पर उन का एकदूसरे के यहां आनाजाना लगा रहता था.

2 साल पहले एक दिन मनोज अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने गुरुग्राम के सहारा मौल पहुंचा. वहां उस की नजर एक लड़की पर पड़ी, जो शक्लसूरत से जानीपहचानी लग रही थी. वह कोमल थी. मौडर्न कपड़ों, गहरे मेकअप और फ्लड लाइट की रंगबिरंगी रोशनी में कोमल बहुत ही सुंदर लग रही थी. दरअसल, कोमल वहां एक पब में नौकरी करती थी.

मनोज ने किसी बहाने से कोमल को अपने पास बुलाया तो दोनों ने एकदूसरे को पहचान लिया. बातोंबातों में मनोज ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया और जल्द ही उस के घर चंचल पार्क आने का वादा किया. कोमल ने मनोज की खूब आवभगत की और उसे अपने साथ काम करने वाली कुछ सहेलियों से भी मिलवाया.

कोमल के लटकेझटके देख कर मनोज पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा. इधर कोमल भी मनोज के प्रति आकर्षित हो गई. उस दिन मनोज घर लौटा तो उस के दिलोदिमाग में कोमल की मनमोहिनी सूरत बसी हुई थी. वह जल्दी से जल्दी उसे अपनी बना लेना चाहता था.

उस दिन के बाद दोनों एकदूसरे को फोन कर के अपने दिल की बातें शेयर करने लगे. कोमल मनोज को हमेशा मौल में आने वाले हाईफाई लोगों के बारे में तरहतरह के किस्से सुनाती, जो मनोज को बहुत अच्छे लगते. वह कोमल को प्रभावित करने के लिए उसे महंगे तोहफे देने लगा. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के घर वाले इस सब से कब तक अनजान रह सकते थे. उन्हें भी उन के प्यार की जानकारी हो गई.

मनोज और कोमल के घर वाले यों तो रिश्तेदार थे, लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें यह रिश्ता मंजूर नहीं था. कोमल के पिता चमनलाल को लगता था कि मनोज उन की बेटी को ज्यादा दिनों तक खुश नहीं रख पाएगा. मनोज सावदा गांव में रहता था, जहां के लोगों का रहनसहन पुराने जमाने जैसा था.

उधर मनोज के घर वालों की सोच भी कुछ ऐसी ही थी. जब मनोज और कोमल ने अपनेअपने घरों में अपनी पसंद जाहिर की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. लेकिन प्यार इन बंदिशों को कहां मानता है. वैसे भी दोनों ही अपने पैरों पर खड़े थे. इसलिए 5 जून, 2015 को कोमल ने अपने मम्मीपापा की मर्जी के खिलाफ जा कर तीसहजारी कोर्ट में मनोज से शादी कर ली. शादी के बाद दोनों रघुबीर नगर में किराए का मकान ले कर रहने लगे.

8-10 महीने तो दोनों ने खूब मौजमस्ती की, लेकिन बाद में मनोज को कोमल का सहारा मौल में काम करना बुरा लगने लगा. उस ने कोमल से यह काम छोड़ देने के लिए कहा, पर वह इस के लिए तैयार नहीं थी. उसे मौल में जा कर परफौरमेंस देना और नएनए लोगों से मिल कर हंसनाबोलना अच्छा लगता था. बात आगे बढ़ी तो दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए. पड़ोसियों ने दोनों को समझाया तो कोमल मनोज के घर जेजे कालोनी, सावदा में रहने को तैयार हो गई.

इस के बाद कोमल अपने पति मनोज के साथ सावदा में जा कर रहने लगी. लेकिन घर छोटा होने के कारण उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. मनोज की एक बहन परवीन थी, जिस से उस की कतई नहीं बनती थी. यह देख कर मनोज ने दूसरी जगह किराए पर एक घर ले लिया और दोनों उसी में रहने लगे. कुछ दिनों तक दोनों सुखचैन से रहे. मनोज की जिंदगी में अचानक भूचाल तब आया, जब एक दिन वह कोमल के सूटकेस में रखी उसकी एलबम देख रहा था. एक फोटो में वह एक लड़के के साथ बहुत खुश दिख रही थी.

मनोज ने कोमल को वह फोटो दिखा कर उस लड़के के बारे में पूछा तो कोमल ने बताया कि यह अमित है और उस के साथ सहारा मौल में नौकरी करता था. अमित महज उस का दोस्त है. लेकिन मनोज को कोमल की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उस ने कोमल के जानकारों से अमित के बारे में पूछा तो पता चला कि शादी से पहले अमित कोमल का बौयफ्रैंड था. मनोज को यह जानकारी मिली तो वह परेशान हो गया. कोमल के बारे में यह जानकारी मिलने के बाद मनोज उस से उखड़ाउखड़ा रहने लगा.

कुछ ही दिनों बाद उन के बीच फिर से झगड़े शुरू हो गए. कोमल ने अपने घर में फोन कर के बताया कि मनोज उस से दहेज लाने के लिए दबाव डालता है और मना करने पर उस के साथ मारपिटाई करता है.

एक महीने बाद कोमल मनोज की मारपिटाई से दुखी हो कर अपनी बड़ी बहन किरण के पास रहने के लिए रघुवीरनगर चली गई. मनोज सावदा स्थित अपने घर में अकेला रह गया. एक दिन उसे पता चला कि कोमल फिर से अपने पुराने बौयफ्रैंड अमित से मिलने लगी है. यह जान कर मनोज को चिंता हुई कि कोमल कहीं उस से किनारा न कर ले. यही सोच कर उस ने कोमल के मोबाइल पर बात करने की कोशिश की. कुछ दिन तो कोमल मनोज के फोन को नजरअंदाज करती रही, लेकिन धीरेधीरे दोनों में बातचीत शुरू हो गई.

एक महीना पहले कोमल ने मनोज को बताया कि वह बहन पर बोझ नहीं बनना चाहती, इसलिए उस ने रघुवीरनगर के ही डी ब्लौक में अपने लिए अलग कमरा ले लिया है, जहां रह कर अब वह फिर से जौब पर जाएगी. घर में बैठेबैठे उस का मन नहीं लगता. दूसरे बिना पैसों के जिंदगी भी नहीं चलती. मनोज को उस की यह बात अच्छी नहीं लगी तो उस ने उस के नौकरी करने का विरोध करते हुए वापस घर लौट आने के लिए कहा. इस पर कोमल ने ऐतराज करते हुए मनोज से कहा कि वह उस के साथ गांव में नहीं रहेगी, क्योंकि वह उस के  साथ गालीगलौच करने के साथ मारपीट करता है. ऐसा जीवन वह नहीं जी सकती.

15 जून, 2017 को मनोज अपनी दुकान छोड़ कर कोमल से मिलने उस के घर पहुंचा. मनोज को आया देख कर उस ने उसे और उस के परिवार वालों को बहुत बुराभला कहा. कोमल की बातों से मनोज को लगा कि वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. उसे बहुत गुस्सा आया. घर पहुंच कर वह सोचने लगा कि उस ने कोमल से कोर्टमैरिज की है और वह उस की पत्नी है. अगर वह उस के साथ नहीं रहेगी तो वह भी उसे उस की मनमर्जी से नहीं जीने देगा.

अगले दिन सुबह उस ने एक मोबाइल शौप पर जा कर नया सिम खरीदा और एक मैकेनिक के यहां से क्लच वायर ले आया. उसी सिम से उस ने कोमल से बड़े प्यार से बात की. बातोंबातों में उस ने कोमल को घूमने जाने के लिए राजी कर लिया. उस दिन काफी बारिश हुई थी, जिस से मौसम सुहाना हो गया था.

16 जून को मनोज ने कोमल को फिर फोन कर के मिलने के लिए सीमेंट गोदाम के पास बुलाया. कोमल ने कहा कि वह उस के पास पहुंच जाएगी. 2 बजे मनोज अपनी मोटरसाइकिल से सीमेंट गोदाम के पास पहुंचा तो थोड़ी देर बाद कोमल आ गई. उस ने कोमल को मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बिठाया और रिंगरोड होते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के बोंटा पार्क जा पहुंचा.

पार्क के गेट पर मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह कोमल के साथ अंदर चला गया. कोमल को विश्वास में लेने के लिए वह उस से रोमांटिक बातें कर रहा था. वहां झाडि़यों के पास कई युवा जोड़े प्रेमालाप में मग्न थे. यह देख कर कोमल भी रोमांटिक हो गई. कोमल से प्यारीप्यारी बातें करते हुए मनोज उसे एकांत में ले गया, जहां दोनों एक साफसुथरी चट्टान पर बैठ गए. मनोज ने उसे बांहों में ले कर अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और फिर से ऐसा न करने की कसम खाई तो कोमल खुश हो गई.

जब मनोज को लगा कि मौका एकदम सही है तो उस ने कोमल से कहा, ‘‘तुम अपना मुंह पीछे की तरफ कर लो, मैं तुम्हारे लिए एक सरप्राइज गिफ्ट लाया हूं.’’

कोमल ने खुश हो कर मुंह पीछे की ओर कर लिया. उचित मौका देख कर मनोज ने जेब में रखा क्लच वायर निकाला और कोमल की गर्दन पर लपेट कर कस दिया. कोमल ने मनोज को वायर ढीला करने के लिए कहा, साथ ही बचने के लिए बहुत हाथपैर मारे, जिस की वजह से मनोज के हाथों में खरोंचे भी आ गईं. लेकिन उस ने वायर को ढीला नहीं किया.

कुछ ही पलों में कोमल ने आखिरी हिचकी ली और उस की गर्दन एक ओर लुढ़क गई. कोमल की लाश को परे धकेल कर वह पार्क से बाहर आ गया और अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर घर लौट आया. इस के बाद उस ने अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए अपने दोस्त अनुज के साथ शराब की पार्टी की, जहां कोमल की हत्या का राज उस पर जाहिर कर दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने 17 जून, 2017 को मनोज को तीसहजारी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Crime Story

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2017 में प्रकाशित

Domestic Violence: पिटती औरतें – खामोश समाज

Domestic Violence: ‘डबल इंजन’ की सरकार वाले उत्तर प्रदेश में औरतों की क्या गत बन चुकी है, इस पर एक नजर डालते हैं. मामला नेपाल से सटे सिद्धार्थनगर जिले का है, जहां के लोटन कोतवाली क्षेत्र में एक पति ने हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए लाठीडंडे से बुरी तरह पिटाई कर अपनी पत्नी को अधमरा कर दिया.

उस औरत को इतना मारा गया कि उस का चेहरा काला पड़ गया और एक हाथ टूट गया है. औरत के प्राइवेट पार्ट को भी डंडे से गहरी चोट पहुंचाई गई.

उस औरत को गंभीर हालत में मैडिकल कालेज, गोरखपुर में भरती कराया गया. पीडि़ता के भाई की शिकायत पर पुलिस ने पति के खिलाफ केस दर्ज किया.

पूरा मामला कुछ इस तरह है कि उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के कोल्हुई थाना क्षेत्र के एक गांव की इस औरत की शादी सिद्धार्थनगर जिले के लोटन कोतवाली क्षेत्र के एक गांव में हुई थी.

बताया जा रहा है कि पति आएदिन मारनेपीटने के साथसाथ अपनी पत्नी पर तमाम तरह के जुल्म करता था. इस हैवानियत से तंग आ कर वह औरत अपने मायके चली गई थी, पर 16 नवंबर, 2025 को आपसी सुलहसमझौते के बाद वह अपनी ससुराल वापस आ गई थी, लेकिन आरोप है कि 17 नवंबर, 2025 की रात पति ने उस की लाठीडंडों, जूतों से पिटाई की और थप्पड़ बरसाए.

इसी साल सितंबर महीने की एक घटना है. आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में एक शख्स ने अपनी पत्नी को खंभे से बांध कर न केवल बैल्ट से बुरी तरह पीटा, बल्कि बारबार लातों से भी हमला किया. इस दौरान वह औरत चीखतीचिल्लाती रही, दया की भीख मांगती रही, लेकिन पति उस पर लगातार वार करता रहा.

पुलिस के मुताबिक, आरोपी पति बलराजू तारलुपाडु मंडल में अपनी पहली पत्नी भाग्यम्मा के साथ रहता था, जबकि उस की दूसरी पत्नी भी है. हाल ही में वह अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहने के बाद गांव लौटा था.

बताया गया कि बलराजू किसी बीमरी से जूझ रहा है और उस ने अपनी पहली पत्नी भाग्यमा से इलाज के लिए पैसे लाने को कहा था.

भाग्यम्मा ने पैसे देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह 4 बच्चों की अकेली जिम्मेदारी उठा रही थी. इसी बात से नाराज हो कर बलराजू ने उसे खंभे से बांध दिया और बैल्ट से बुरी तरह पीटा.

पुलिस ने यह भी बताया कि बलराजू को अपनी पत्नी पर किसी गैरमर्द के साथ नाजायज रिश्ता होने का शक था और इसी शक ने उस के गुस्से को और ज्यादा भड़का दिया था.

इस तरह की घटनाएं रोजाना की आम बात हैं. कुछ घटनाओं की खबरें बन जाती हैं, बाकी के बारे चुप्पी साध ली जाती है. यहां सिर्फ पति द्वारा अपनी पत्नी को पीटने की बात नहीं हो रही है, बल्कि औरतों का यह पिटना इतना ज्यादा आम हो गया कि कोई भी ऐरागैरा उन पर हाथ साफ करना अपना बुनियादी हक समझता है.

इसी साल जनवरी महीने का एक वाकिआ है. महाराष्ट्र के नवी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी में चल रही एक बैठक के दौरान 5 लोगों ने 44 साल एक औरत को कथिततौर पर पीट कर घायल कर दिया था.

पुलिस ने बताया कि पीडि़ता ने मीटिंग के दौरान कुछ सवाल उठाए, जो आरोपियों को पसंद नहीं आए. फिर उन्होंने कथिततौर पर उस औरत के साथ गालीगलौज की, उसे जमीन पर धकेल दिया और कई मुक्के मारे.

सवाल उठता है कि औरतों के साथ यह मारपिटाई होती ही क्यों है? इस का सीधा सा जवाब है कि मर्द द्वारा औरत में डर बिठाना और उस पर काबू रखना. ज्यादातर मर्दों के लिए मर्दानगी की यही परिभाषा है.

लेकिन क्या कोई मर्द इतना ज्यादा गुस्सैल हो सकता है कि उस की पत्नी नाश्ते में परोसी गई साबूदाना की खिचड़ी में नमक कम डाल दे, तो वह अपना आपा खो कर उस की हत्या ही कर दे?

जी हां, साल 2022 में मुंबई के निकट ठाणे में एक बैंक क्लर्क निकेश घाघ ने गुस्से में अपनी 40 साल की पत्नी की गला घोंट कर हत्या कर दी, क्योंकि उस ने जो साबूदाना खिचड़ी परोसी थी, वह बहुत नमकीन थी.

एक अदना से बैंक क्लर्क ने अपनी पत्नी को चुटकीभर नमक की कीमत समझा दी. बेहद शर्मनाक. इस से भी ज्यादा शर्म की बात तो यह है कि भारतीय समाज में आज भी गांवदेहात हो या बड़े शहर, औरतों को मर्दों की पिछलग्गू समझा जाता है.

यह छोटी सोच समाज में गहरे तक पैठी हुई है कि औरत को हमेशा मर्द की गुलाम बन कर रहना चाहिए, वह किसी भी तरह का फैसला लेने के काबिल नहीं होती है, उसे अपने मर्द की सेवा करनी चाहिए और उसे उस से कम कमाना चाहिए, और भी न जाने क्याक्या.

अगर गलती से किसी औरत ने इस सोच को चुनौती दी या खुद को मर्द से बेहतर समझा तो पति को पूरा हक है कि वह उसे ‘उस की सही जगह’ दिखा दे, फिर इस के लिए औरत की खाल ही क्यों न उधेड़ दी जाए.

अपना भाग्य मानती औरतें

भारत में औरतों को धर्म के जंजाल में इस कदर उलझा दिया गया है कि उन्हें लगता है कि मर्द से पिटना भी उन के पिछले जन्मों की सजा है. बहुत सी औरतें अपने मायके में इस तरह से पाली जाती हैं कि वे पितृसत्तात्मक नियमों को गांठ बांध लेती हैं, जैसे ससुराल में लड़की की डोली जाती है और अर्थी ही बाहर निकलती है. यहां यह छिपी सोच है कि ससुराल में कुछ भी भूचाल आ जाए, तुम्हें चूं तक नहीं करनी है.

‘घर में जो हो रहा है, उसे घर तक ही रखना है’, ‘अपने बड़ों के सामने जबान नहीं चलानी है’, ‘पति परमेश्वर होता है’, ‘पति अगर पीट दे तो बात का बतंगड़ नहीं बनाना है’, ‘शर्म औरत का गहना है’, और भी न जाने किस तरह की सीख दी जाती हैं कि अनपढ़ से ले कर एक पढ़ीलिखी औरत भी मर्द के ‘पिटाई पुराण’ का हिस्सा बन जाती है, बेवजह.

जब से भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार आई है, तब से धर्म के नाम पर औरतों के सिर पर अंधविश्वास के इतने घड़े लाद दिए गए हैं कि उन्हें अपने पर हुई घरेलू हिंसा का बोझ महसूस ही नहीं होता है.

बहुत सी औरतों को लगता है कि मर्द की सत्ता के बगैर वे इस समाज में नहीं रह सकतीं और तथाकथित धर्मकर्म के बिना इस दुनिया में, फिर मर्द चाहे उन की इसी दुनिया में चमड़ी न उधेड़ दें.

गरीब घरों की वंचित समाज की औरतों की हालत तो और ज्यादा बुरी है. वे शरीर की मजबूत होती हैं, मर्दों जितनी शरीरिक मेहनत करती हैं, बच्चों को अपने दम पर पालती हैं, फिर भी उन के साथ खूब मारपीट की जाती है.

यहां पर उन की और पति की अनपढ़ता, पति का बेरोजगार होना, पति की नशाखोरी, दूसरी औरत का चक्कर जैसी बहुत सी वजहें होती हैं, जो घर में क्लेश लाती हैं.

ऐसी औरतों के पास न तो पैसा होता है और न ही कहीं जाने की हिम्मत. बच्चों को पालपोस कर बड़ा करने की जिम्मेदारी भी इन पर होती है. अगर कहीं पति ने सिर से छत छीन ली, तो पूरा परिवार ही बिखर जाएगा. फिर इन की समाज में कहीं कोई सिक्योरिटी भी नहीं होती है. घर पर जैसा भी है, मर्द का साया तो साथ है न, इस की एवज में उस ने 2-4 लात जमा भी दी तो क्या हुआ, यह सोच भी औरतों को पिटने पर मजबूर करती है.

‘कास्ट मैटर्स’ के लेखक और दलित ऐक्टिविस्ट डाक्टर सूरज येंगडे बीबीसी के माध्यम से कहते हैं, ‘‘दलित औरतें दुनिया में सब से ज्यादा शोषित हैं. वे घर के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर संस्कृति, सामाजिक संरचना और सामाजिक संस्थाओं की भुक्तभोगी हैं. दलित महिलाओं के खिलाफ लगातार होने वाली हिंसा में ये बातें नजर आती हैं.’’

बीबीसी की एक खबर के मुताबिक, ‘इंटरनैशनल दलित सौलिडैरिटी नैटवर्क’ ने दलित औरतों को झेलनी पड़ रही हिंसा को 9 हिस्सों में बांटा था, जिन में से 6 उन की जाति पर आधारित पहचान के चलते होती हैं और 3 जैंडर की पहचान के चलते.

जाति के नाम पर उन्हें यौन हिंसा, गालीगलौज, मारपीट, हमलों का शिकार होना पड़ता है, तो जैंडर के चलते उन्हें कन्या भ्रूण हत्या, जल्दी शादी के चलते बाल यौन अत्याचार और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है.

मर्दों की ओछी सोच

साल 2019 की ‘औक्सफैम इक्ववैलिटी और इनइक्वैलिटी’ की एक रिपोर्ट पर नजर डालते हैं. इस रिपोर्ट में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश के तकरीबन 1,000 परिवारों का सर्वे किया गया था, जिस में यह बात सामने आई थी कि कई घरों के लोगों का ऐसा मानना था कि छोटीछोटी बातों पर औरतों पर हाथ उठाना गलत नहीं है.

यह हाल तो तब था जब रिपोर्ट के मुताबिक यह बात सामने आई थी कि जितनी गृहणियां घर संभालती हैं, अगर उन के कामकाज का हिसाब लगाया जाए, तो ये देश की जीडीपी यानी ग्रोस डोमैस्टिक प्रोडक्ट के 3.1 फीसदी के बराबर होगा.

इस के बावजूद इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि कराए गए सर्वे में शामिल परिवारों में से तकरीबन 53 फीसदी लोगों ने इस बात को माना कि अगर औरतें बच्चों की देखभाल में कोताही करती हैं, तो उन्हें फटकारना जायज है.

औरतों द्वारा खाना न पकाने पर 41 फीसदी लोगों ने उन्हें मारनेपीटने की वकालत की वहीं 42 फीसदी लोगों ने पीने का पानी न भरने और ईंधन न जमा करने पर भी उन की पिटाई करने की बात स्वीकारी.

54 फीसदी लोगों ने माना कि अगर औरत बिना बताए घर से बाहर घूमने जाती है, तो उसे डांटनाफटकारना गलत नहीं है. वहीं कुछ लोगों ने इस के लिए औरतों पर हाथ उठाने की बात को भी स्वीकार किया.

मर्द समाज की यह सोच उसे परिवार से मिली है. अगर कोई नकारा और उद्दंड लड़का है, तो परिवार वाले यह सोच कर उस की शादी करा देते हैं कि बहू अपनेआप संभाल लेगी, पर जरा सोचिए कि जो लड़का अपने गुस्सैल स्वभाव के चलते मांबाप को कुछ नहीं समझता है, गालीगलौज करता है, वह कल की आई लड़की की सुन लेगा?

उधर, लड़की के कान में बचपन से ही फूंक दिया जाता है कि पति जो कहे, तुम सिर झुका कर मान लेना. बैंक क्लर्क निकेश घाघ ने नमक की कमी में अपनी पत्नी का गला घोंट दिया. यह कोई एक पल में घटी घटना नहीं थी. ऐसा पहले भी हुआ होगा. उस ने अपनी पत्नी पर पहले भी खाने की थाली उछाल दी होगी या फिर किसी और बात पर उसे लतिया दिया होगा, पर आसपड़ोस वालों ने इसे ज्यादा सीरियसली नहीं लिया. अगर पत्नी ने यह बात अपने मायके वालों को बताई होगी, तो भी उन्होंने चुप रहने की सलाह दी होगी.

जब लड़की को हर जगह से हताशा हाथ लगती है, तो वह इसे अपनी किस्मत मान लेती है. जिन मांबाप ने उसे इतने लाड़प्यार से पाला हो, वे ही उस की पिटाई पर चुप्पी साध लें, तो फिर वह कहां जाएगी?

इधर, मर्द समाज को यह गुमान होता है कि और मारूंगा, बोल क्या कर लेगी? मेरी गुलाम है, तो नजरें नीची कर के चल. समय पर भोजन और शरीर मेरे सामने परोस दे. बस, यही तेरा काम है, तो फिर औरत के लिए जिंदगी नरक बनने में ज्यादा समय नहीं लगता है.

हरियाणा के जींद जिले के गांव बीबीपुर के पूर्व सरपंच, समाजसेवी और ‘सैल्फी विद डौटर’ मुहिम के संस्थापक सुनील जागलान ने इस मुद्दे पर कहा, ‘‘आज हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि समाज में पुरुष सत्ता का प्रकोप अभी भी है और इस का सीधा असर यह होता है कि घरों में घरेलू हिंसा होती है.

‘‘इस में महिलाओं के साथ शारीरिक मारपिटाई के लाखों केस दर्ज होते हैं, लेकिन इस के 30 गुना केस ऐसे होते हैं, जो पुलिस में दर्ज ही नहीं हो पाते हैं. इस के लिए लगातार संवेदनशीलता के साथ लोगों को जागरूक करने की, कानूनी नियमों को आम घरों तक पहुंचाने की बहुत ज्यादा जरूरत है.’’

‘‘हम ने ‘अहसास का सौफ्टवेयर’ नाम का एक कार्यक्रम शुरू किया है, जिस का मकसद पितृसत्ता के वायरस को खत्म करना है. हम इस मुहिम में शहर और गांवदेहात के क्षेत्रों में पंचायतों के माध्यम से काम कर रहे हैं ‘‘इस समस्या का समाधान तभी हो सकता है, जब हम सब यह समझ लें कि महिलाओं के साथ मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से समाज पतन की ओर जाता है.’’ Domestic Violence

Family Problem: मेरा छोटा भाई पैसों के लिए मम्मी पर हाथ उठाने लगा है

Family Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 20 साल है और मैं बिहार का रहने वाला हूं. हमारे घर में मेरे मांबाप और हम 2 भाई रहते हैं. मेरा भाई मुझसे छोटा है और उसकी उम्र 17 साल है. मेरा भाई ज्यादातक वक्त अपने दोस्तों के साथ ही बिताता है और देर रात घर आता है. हाल ही में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि मेरा भाई अपने दोस्तों के साथ मिलकर नशे करने लगा है. जब हमें यह पता चला तो मम्मी पापा ने उसे पैसे देना बंद कर दिया. ऐसा करने से वे सबके साथ बद्तमीजी करने लगा और यहां तक की मांबाप का लिहाज किए बिना घर में गालियां भी देने लगा. उसकी गालियों से ही पता चल रहा था कि वे किसी गलत संगत में है. जब 2-3 दिन हमने उसे पैसे नहीं दिए तो उसने जो कदम उठाया जो हम कभी सोच भी नहीं सकते थे. वे मम्मी से पैसे छीनने लगा और जब मम्मी ने नहीं दिए तो उसने मम्मी को धक्का तक दे दिया और पैसे छीन के भाग गया. उसके ऐसा करने से मम्मी को चोट तक आ गई लेकिन उसे इस बात का कोई पछतावा नहीं हुआ. मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं क्योंकि उसका ऐसा रूप हमने पहले कभी नहीं देखा था.

जवाब –

आज के समय में अक्सर ऐसा सुनने और देखने को मिल रहा है कि बच्चे अपने ही मांबाप पर हाथ उठाने लगे हैं. जहां एक तरफ अब मांबाप यह सोचते हैं कि बच्चों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए तो ऐसे में अब उल्टा बच्चे ही यह सब कर रहे हैं और समझ नहीं आता आखिर वे ऐसा सीख कहां से रहे हैं.

आपके भाई की बात की जाए तो आपकी बातों से साफ पता चल रहा है कि वे अपने यारों दोस्तों के साथ अय्याशी और नशा करने में इतना डूब चुका है कि उसे सही और गलत की पहचान ही नहीं रही. जब आप सबने उसे पैसा देने से मना किया तो जाहिर है कि वे नशे नहीं कर पा रहा होगा जिसके चलते जब उसे नशा करने की तलब हुआ तो उसने अपनी ही मां की जान जोखिम में डाल कर पैसे ले भागा.

अभी आप उसे कुछ भी समझाएंगे या फिर मारेंगे भी तो उसे कुछ समझ नहीं आएगा. आप किसी डौक्टर या काउंसलर की सलाह लेकर उसकी काउंसलिंग कराएं और जरूरत पड़े तो उसे नशा मुक्ति केंद्र भी भेजें क्योंकि हो सकता है वे नशे में इस कदर डूब चुका है कि वे क्या कर रहा है उसे खुद समझ नहीं आ रहा. आप उसके दोस्तों के मांबाप के पास भी जा सकते हैं और पूछताछ कर सकते हैं क्योंकि जाहिर है कि उसके दोस्तों के मांबाप भी परेशान होंगे.

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Suicide Story: पत्नी से शराब पीने से रोका तो तेजाब पी कर दी जान

Suicide Story: गुस्सा, लालच और हवस, ये 3 ऐसी भावनाएं हैं जो इनसान को उस की असली पहचान से दूर ले जाती हैं. इस के असर में आ कर इनसान सहीगलत की पहचान भूल जाता है और ऐसे फैसले कर बैठता है जो न केवल उस की जिंदगी को, बल्कि उस के अपने और आसपास के लोगों की जिंदगी को भी बरबाद कर देता है. यही बातें इनसान को मौत के मुंह तक पहुंचा देती हैं, तो कभी उसे अपनी ही जान लेने पर मजबूर कर देती हैं.

ऐसा ही कुछ हुआ उधना के मफत नगर में रहने वाले 60 साल के श्यामराव भाई मणिक बोड़से के साथ, जो सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे. उन्होंने तेजाब पी कर अपनी जान दे दी. इस गलत कदम से उन्होंने न सिर्फ अपनी जिंदगी खत्म कर ली, बल्कि अपने परिवार के बारे में भी एक बार नहीं सोचा.

मीडिया खबरों के मुताबिक, खुदकुशी की वजह उन की पत्नी से होने वाला विवाद था. उन की पत्नी अकसर उन्हें शराब पीने पर डांटती थी और इसी बात से परेशान हो कर उन्होंने यह फैसला लिया. श्यामराव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे और लंबे समय से अपने परिवार के साथ उधना में रह रहे थे.

इस घटना से एक बात साफ समझ आती है कि गुस्सा इनसान की सोचनेसमझने की ताकत को छीन लेता है. अगर श्यामराव एक पल के लिए ठहर कर अपने परिवार के बारे में सोचते, तो शायद उन्हें यह कदम उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आखिर इस खुदकुशी करने से उन्हें हासिल क्या हुआ? वे चाहते तो शराब की लत छोड़ कर अपने परिवार के साथ चैन और सुकून से जी सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जान दे कर सबकुछ खत्म कर दिया. सच तो यह है कि अगर कोई इनसान शांत मन से एक बार सोच ले कि उस के जाने के बाद उस की पत्नी और बच्चों पर क्या गुजरेगी, तो शायद वह कभी खुदकुशी करने जैसा कदम नहीं उठाएगा. Suicide Story

सामाजिक अनदेखी की शिकार युवतियां, क्या है इस की जड़ में

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते…’ जैसे जुमले कह कर स्त्री को मानसम्मान का प्रतीक मानने वाले कट्टरपंथी देश में आज स्त्री की पूजा होती है रेप से, एकतरफा प्यार में कैंची द्वारा गोदगोद कर उस की हत्या से, निर्भया की तरह मौत के बाद भी इंसाफ न मिलने से या फिर गुरमेहर की तरह अभिव्यक्ति की आजादी का दमन कर गालियां व रेप की धमकी दे कर. इस के बाद खुद को जगत गुरु कहा जाता है. ये तो चंद मामले हैं जो सर्वविदित हैं जबकि आएदिन सुर्खियों में ऐसे मामले आते हैं जिन का सीधा संबंध नारी से होता है लेकिन पुरुषवादी मानसिकता, कट्टरतावादी धर्म पर चलता समाज उस के छींटे भी नारी पर ही डालता है और कहा जाता है कि ये सब होने की वजह युवतियों का घर से निकलना, छोटे कपड़े पहनना, पुरुषों संग मेलजोल बढ़ाना है.

अगर ये सब बातें ही इन जघन्य अपराधों का कारण हैं तो छोटीछोटी बच्चियों के साथ बलात्कार के इतने सारे मामले क्यों प्रकाश में आते हैं? गांवों में जहां लड़कियां न तो पढ़ रही हैं और न छोटे कपड़े पहन रही हैं, वे क्यों वहां मर्दों की शिकार बनती हैं?

समाज में निरंतर बढ़ते अपराध का कारण भी हमारे धर्म की जड़ों में है जहां जन्म से ही लड़के के जन्म पर खुशी और लड़की होने पर शोक मनाया जाता है. बड़े होने पर दहेज हत्याएं, समाज में दकियानूसी सोच का उन्हें शिकार होना पड़ता है. इन्हीं कारणों के चलते एक और अपराध जन्म लेता है भ्रूण हत्या का.

अगर परीक्षण कर पता चला कि गर्भ में लड़की है तो उसे वहीं मार दिया जाता है. इतने साल बाद भी हम समाज की कुरीतियों को बदल नहीं पाए, दहेज प्रथा, बाल विवाह, लड़कियों को कम शिक्षा दिलाना आदि कुरीतियां आज भी समाज में व्याप्त हैं.

नारी को सदा धर्म में भोग की वस्तु माना गया और उसे पुरुष से कमतर आंका गया है. स्त्री निंदा में भी कसर नहीं छोड़ी गई, लेकिन जब हम समाज में यह भेदभाव देखते हैं तो भी आवाज नहीं उठाते, कारण यह भी है कि आवाज कैसे दबाई जाए सब को पता है.

निर्भया कांड को ही ले लीजिए. इस कांड के बाद पूरे देश में धरनाप्रदर्शन, कैंडिल मार्च हुए, नई समितियां गठित की गईं, नए कानून बने, फास्ट ट्रैक अदालतों का निर्माण हुआ, लेकिन बलात्कारियों के पता होने व पकड़े जाने पर भी क्या हम निर्भया को न्याय दिला पाए?

एक दूसरे मामले में कैंची से गोद कर एक सिरफिरा सरेराह युवती को मार देता है तो क्या हुआ? ताजा मामला गुरमेहर का है. आखिर उस का गुनाह क्या है? सिर्फ यही न कि उस ने अपने मन की बात कही? यही कि कट्टरपंथी एबीवीपी का विरोध किया? उस के खिलाफ उसे गालियां दी गईं और उसे अपमानित किया गया. रेप करवा देंगे जैसी धमकियां मिलीं, क्यों?

रेप, एसिड अटैक, दहेज हत्या जैसी बातों की शिकार युवतियां ही हो रही हैं. न्याय के इतने पैर पसारने, सिक्योरिटी की नई तकनीक, आत्मरक्षा के तरीकों और पुलिस की चौकस निगाह के बावजूद आज ये सब हो रहा है.

हाल ही में एक और मामला प्रकाश में आया है जिस में दिल्ली से सटे ग्रेटरनोएडा के लौयड कालेज के निदेशक ने युवतियों के क्लास में 20 मिनट देर से पहुंचने पर उन्हें गालियां दीं. यहां तक कि जूता उठा कर मारने के लिए उन के पीछे भी दौड़े. भले ही उन के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कार्यवाही की गई और अगले दिन उन का इस्तीफा ले कर तत्काल प्रभाव से उन्हें हटा दिया गया, लेकिन युवतियों का अपमान तो हुआ न.

गुरमेहर कौर का मामला

 गुरमेहर कौर दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कालेज की छात्रा है और बहुत बोल्ड भी. रामजस कालेज में इतिहास विभाग ने 2 दिन का ‘कल्चरर औफ प्रोटैस्ट’ सैमिनार आयोजित किया था, जिस में पिछले साल विवादों में आए जेएनयू के छात्र उमर खालिद और छात्रसंघ के पूर्व सदस्य को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन एबीवीपी के विरोध के चलते कार्यक्रम रद्द करना पड़ा. कार्यक्रम रद्द होते ही दोनों गुटों यानी एबीवीपी और आईसा में तनातनी हो गई, जिस में कईर् छात्र घायल हो गए.

ये सब गुरमेहर से देखा नहीं गया और उस ने इस हिंसा के विरोध में एबीवीपी के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चलाया, जिसे छात्रों का खूब समर्थन मिला, जिस से एबीवीपी बौखला गई. उसे लगा कि लड़की होते हुए उस ने हमारे खिलाफ आवाज उठाने की जुर्रत की, जो उन के लिए खौफ पैदा करने वाली थी.

बदले में एबीवीपी ने साल भर पुराना मुद्दा उछाला और भारतपाकिस्तान शांति के प्रयास के लिए डाले गए गुरमेहर के एक वीडियो, जिस में गुरमेहर ने कहा था, ‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा’ को उभारा गया और गुरमेहर को राष्ट्रविरोधी करार दिया गया. उसे न केवल रेप जैसी धमकी मिली बल्कि भद्दी गालियों का भी सामना करना पड़ा.

गुरमेहर इस से डरी नहीं और उस ने कहा कि जो सच था मैं ने वही कहा, मैं एबीवीपी से नहीं डरती. भले ही मैं इस अभियान से अलग हो रही हूं लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि मैं डर गई, बल्कि मैं किसी भी तरह की हिंसा नहीं चाहती.

विचारों की कैसी स्वतंत्रता

आज हर व्यक्ति को विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन यह कैसी स्वतंत्रता जहां अपनी बात रखने पर बवाल मच जाता है. यह सिर्फ महिलाओं के साथ है पुरुषों के साथ नहीं, क्योंकि जब समाज में पुरुष कुछ गलत कहें या करें तो उस मामले को दबा दिया जाता है, लेकिन अगर महिला कुछ कहे तो यह समाज को बरदाश्त नहीं होता बल्कि उसे शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताडि़त करने की धमकी दे कर चुप कराने की कोशिश की जाती है.

किसी भी महिला के लिए यह धमकी काफी डरावनी होती है, क्योंकि एक बार अगर उस का रेप हो जाए तो समाज उसे हेयदृष्टि से देखता है और यहां तक कि पढ़ीलिखी होने के बाद भी कोई उस से शादी करना पसंद नहीं करता, भले ही उस की कोई गलती न हो.

इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि महिलाओं को आज भी विचारों की स्वतंत्रता नहीं है और अगर कोई बोलने की जुर्रत करती भी है तो उसे भी गुरमेहर की तरह बिना किसी गलती के अपने घर वापस लौटना पड़ता है.

महिलाओं के हिस्से गालियां ही क्यों

बात चाहे बौयफ्रैंड की इच्छापूर्ति की हो या फिर घर में पति की बात मानने की, जहां भी महिला ने किसी बात को मनाने से इनकार किया तो उसे मांबहन की गालियां दे कर अपनी बात को मनवाने की कोशिश की जाती है और अगर फिर भी उस ने इनकार किया तो ब्लैकमेलिंग की धमकी दी जाती है आखिर ऐसा क्यों?

जब रिश्ता आपसी सहमति से बना हो तो उस में जबरदस्ती कैसी? क्या महिलाएं सिर्फ  भोग की वस्तु हैं जब चाहे उन्हें यूज करो और जब मन भर जाए तो निकाल कर फेंक दो? अपनी इस मानसिकता को जब तक पुरुष नहीं बदलेंगे तब तक समाज व देश का भला नहीं हो पाएगा और पलपल पर महिलाओं को अपमानित हो कर अपने पैदा होने पर ही पछताने पर मजबूर होना पड़ेगा.

आवाज को दबाने वाले दबंग

लाठीपत्थर बरसाने वाले, होहल्ला मचाने वाले ज्यादा दबंग हैं. उन में से ज्यादातर किसी धर्म के मानने वाले ही नहीं परम भक्त और उन के सेवक, दुकानदार हैं. वे धर्म के नाम पर रोब झाड़ते हैं और जबरन चंदा वसूली करते हैं. इन के सामने पुलिस भी नतमस्तक हो जाती है.

इन दबंगों को प्रशासन या सरकार का खुला संरक्षण प्राप्त होता है. ये साफ कह देते हैं कि अगर बात बिगड़ती दिखी तो हम पैसों और पावर के दम पर सब संभाल लेंगे, तुम्हें डरने की जरूरत नहीं. ऐसे में इन के हौसले तो और बुलंद होंगे ही.

पुरुष हमेशा प्रत्यक्षदर्शी ही क्यों

 जब पुरुष समाज में खुद का अहम रोल मानते हैं और समझते हैं कि उन के बिना महिला का कोई वजूद नहीं तो अकसर ऐसा देखने में आता है कि जब भी कोई बदतमीजी या फिर रेप वगैरा की घटना होती है या फिर मुसीबत में होेने पर महिला हैल्प मांगती है तो पुरुष क्यों चुप्पी साध लेते हैं. तब क्यों नहीं मर्दानगी दिखाते?

दोषी घूमते हैं आजाद

 आज माहौल ऐसा बन गया है कि जो निर्दोष है वह सजा भुगतता है, लोगों के घटिया कमैंट का शिकार होता है और जो वास्तव में दोषी है वह खुलेआम आजाद घूम कर और खौफ पैदा करता है.

असल में इस का दोष हमारी कानूनव्यवस्था में है, क्योंकि कभी रेप के आरोपी को नाबालिग के नाम पर छोटीमोटी सजा दे कर छोड़ दिया जाता है तो कभी दोषी मोटी रकम चढ़ा कर अफसरों का मुंह बंद करवा कर आजाद घूमता है.

फ्रीडम औफ स्पीच का समर्थन जरूरी

 डीयू में जहां देशविदेश से छात्र पढ़ कर अपना कैरियर संवारते हैं, जहां न पढ़ाई में और न ही किसी और चीज में भेदभाव होता है तो फिर वहां जब महिलाएं सच के खिलाफ आवाज उठाती हैं तो उन का हमेशा विरोध क्यों होता है.

विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ ही है कुछ अप्रिय कहने की स्वतंत्रता, तारीफ करनी हो तो किसी स्वतंत्रता की जरूरत ही नहीं. यह तो सऊदी अरब में भी कर सकते हैं और उत्तर कोरिया में भी, भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है अप्रिय सच बोलना, तथ्यों पर सही बेबाक समीक्षा करना. देशभक्ति के नाम पर धर्मभक्ति को थोपने की कोशिश की जा रही है

और हिंदू या इसलामी झंडे की जगह तिरंगा लहरा कर धर्मभक्ति को राष्ट्रभक्ति कहने की कोशिश भारत, इसलामी देशों और कम्युनिस्ट देशों में जम कर हो रही है.

महिलाओं को तो फ्रीडम औफ स्पीच का अधिकार है ही नहीं. आज भले ही गुरमेहर अभियान से पीछे हट गई है, लेकिन फिर भी उस ने अपनी आवाज बुलंद कर दुनिया को बहुत पावरफुल मैसेज दिया है कि अगर आप सही हैं तो डरें नहीं. अगर इस तरह हर किशोरी, युवती, महिला सोचेगी तो कोई भी नारीशक्ति को कमजोर नहीं कर पाएगा और न ही रेप, मारने जैसी धमकियां दे कर डरा पाएगा.

प्रैगनैंट महिलाओं पर घरेलू हिंसा का ऐसे पड़ता है प्रभाव

मुंबई की 24 साल की मनीषा जब गर्भवती हुई तो कुछ परेशान सी रहने लगी. वह न तो अपनी मनपसंद का खाना बना सकती थी और न ही खा सकती थी, क्योंकि परिवार में सासससुर हमेशा उसे अच्छा खाना बना कर खाने पर ताने देते थे. अगर मनीषा का पति अपने मांबाप से कुछ कहता तो वे उसे भी भलाबुरा कहते.

एक दिन तो इतनी कहासुनी हुई कि सासससुर ने मनीषा को घर से निकल जाने को कह दिया. मनीषा के घर छोड़ने के कदम में उस के पति ने भी उस का साथ दिया और दोनों ने बड़ी मुश्किल से अपनी अलग गृहस्थी जमाई. अब मनीषा को इस बात का डर सताने लगा था कि पता नहीं उस की डिलिवरी ठीक से होगी या नहीं. अपनेआप को काफी संभालने के बाद भी उस की प्रीमैच्योर डिलिवरी हुई. बच्ची ने काफी समय बाद बोलनाचलना सीखा.

नवजात पर बुरा असर

ऐसी कई घटनाएं हैं जहां डिलिवरी के समय या बाद में बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास कम होने पर डाक्टर जब इस की बारीकी से जांच करते हैं तब कई बार घरेलू हिंसा की बात सामने आती है. एक सर्वे में पाया गया कि 5 प्रैगनैंट महिलाओं में से एक महिला घरेलू हिंसा की शिकार अवश्य होती है. इन में से कुछ महिलाएं तो पहले इस बारे में बता देती हैं तो कुछ छिपाती हैं, जिस का पता डिलिवरी के बाद चलता है. यह घरेलू हिंसा ज्यादातर 21 से 35 वर्ष की महिलाओं के साथ होती है और खासकर गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली महिलाओं के साथ और कुछ खास समुदाय और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ.

इस बारे में मुंबई के मल्हार नर्सिंगहोम की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञा, डा. रेखा अंबेगांवकर कहती हैं, ‘‘घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को केवल प्रैगनैंसी के दौरान या बाद में ही नहीं, बल्कि गर्भधारण के पहले से भी अगर उन्हें डोमैस्टिक वायलैंस का सामना करना पड़ता है, तो उस का असर प्रैगनैंसी के बाद भी बच्चे पर होता है. यह अधिकतर उन परिवारों में अधिक होता है जहां पति किसी नशे का आदी हो. निम्नवर्ग में यह अधिक है.

‘‘कई बार महिला नहीं चाहती कि उस का बच्चा ऐसे माहौल में जन्म ले, जहां उसे अच्छी परवरिश न मिले. ऐसे में गर्भधारण के बाद वह जरूरत के अनुसार खानापीना छोड़ देती है. सही समय पर अपना चैकअप नहीं कराती, जिस से बच्चे का विकास गर्भ में कम होता है और प्रीमैच्योर डिलिवरी हो जाती है, जिस से बाद में बच्चे में कई प्रकार की समस्याएं जन्म लेती हैं. मसलन, विकास सही तरह से न होना, बात न कर पाना. देरी से चलना आदि.

‘‘इस के अलावा अगर किसी ने पत्नी के पेट पर जोर से लात मारी हो या धक्का दिया हो तो कई बार प्लैसेंटा अलग हो जाने से भी बच्चा प्रीमैच्योर हो जाता है या फिर गर्भपात होने का डर रहता है.’’

डा. रेखा आगे कहती हैं, ‘‘शारीरिक हिंसा तो बाहर से दिखती है, लेकिन मानसिक यातनाओं को समझना मुश्किल होता है, क्योंकि महिलाएं उसे बताना नहीं चाहतीं. ऐसी कई महिलाएं मेरे पास आती हैं जो ट्रामा में होती हैं कि बच्चा लड़का है या लड़की. ऐसे केसेज को बहुत सावधानी से हैंडल करना पड़ता है.

‘‘शारीरिक यातनाओं की शिकार महिलाएं अधिकतर सरकारी अस्पतालों में दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि वहां गरीब महिलाएं अधिक जाती हैं और उन के घरों में घरेलू हिंसा अधिक होती है.

‘‘थोड़े पढ़ेलिखे परिवारों में मेल चाइल्ड पर लोग अधिक फोकस्ड होते हैं, क्योंकि उन्हें 1 या 2 बच्चे ही चाहिए, उन्हें लड़का अवश्य चाहिए. उन्हें लिंग की जांच कराने के लिए मजबूर किया जाता है, जो वे नहीं कराना चाहतीं. ऐसे में अधिकतर महिलाएं मानसिक रूप से प्रताडि़त होती हैं.’’

हिंसा की शुरुआत

घरेलू हिंसा की शुरुआत पुरुष का पहले अपनी पत्नी को चांटा मारने से होती है. इस के बाद आती है शारीरिक और सैक्सुअल वायलैंस. कई बार घरेलू हिंसा इतनी अधिक होती है कि महिला की जान पर भी बन आती है. इस में अगर महिला कामकाजी है, तो कुछ विरोध करती है, लेकिन ऐसा करने पर परिवार के अन्य लोग और समाज उसे ही दोषी मानता है.

इस बारे में मुंबई के सूर्या हौस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डा. मेहुल दोषी कहते हैं, ‘‘घरेलू हिंसा की वजह से प्रैगनैंट वूमन हमेशा डरी रहती है. इस में चाहे शादी लव मैरिज हो या अरेंज्ड किसी में भी यह समस्या हो सकती है. ऐसी प्रताडि़त महिला का ब्लडप्रैशर सही नहीं होता. वह ऐनीमिक हो जाती है, उसे मधुमेह की बीमारी भी हो सकती है. इस से बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास सही नहीं हो पाता और उस का वजन कम होता है. बच्चा कुपोषण का शिकार होता है. मृत्यु दर भी इन बच्चों की अधिक है.’’

यह हिंसा उन परिवारों में भी अधिक है. जहां पतिपत्नी अकेले रहते हैं. संयुक्त परिवारों में इन की संख्या कम है. इस की वजह के बारे में मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. राजीव आनंद बताते हैं, ‘‘प्रैगनैंसी के बाद महिला को कई सारे शारीरिक और मानसिक दौर से गुजरना पड़ता है. अकेले होने पर इस बदलाव को अपने ऊपर देख कर उन्हें अजीब अनुभव होता है, इस में पति का साथ न मिलने पर वे चिड़चिड़ी हो जाती हैं और पति इसे समझ नहीं पाता, परिणामस्वरूप, कहासुनी, बहस, मारपीट आदि शुरू हो जाती है जबकि संयुक्त परिवारों में सब का साथ मिलने से यह थोड़ा आसान हो जाता है. महिला अपनी समस्या को किसी के साथ शेयर कर सकती है.

बच्चे को जन्म देने के लिए पतिपत्नी दोनों को एकदूसरे के प्रति निष्ठावान होने की आवश्यकता होती है. कुछ दंपतियों में तो शादी के दूसरे साल से ही अनबन शुरू हो जाती है. ऐसे में पत्नी सोचने पर मजबूर हो जाती है कि वह बच्चे को जन्म दे या नहीं.

औडियोलौजिस्ट ऐंड स्पीच थेरैपिस्ट देवांगी दलाल का कहना है, ‘‘बचपन से अगर बच्चा कुपोषण का शिकार है, तो उस की बौडी मूवमैंट भी देर से होती है. अधिकतर ऐसे बच्चे 1 साल के बाद बोलने लगते हैं. इस की वजह उन का गर्भ में सही तरह विकास न होना है.

‘‘घरेलू हिंसा की शिकार अधिकतर महिलाओं के पति अशिक्षित और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे होते हैं, जिन्हें बच्चा इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि उन के लिए बच्चा बोझ है और वे अपनी पत्नी को गर्भपात के लिए मजबूर करते हैं. उन के न मानने पर मारपीट करते हैं. इसे कम करने के लिए महिलाओं का शिक्षित और आत्मनिर्भर होना आवश्यक है.’’

बच्चे की जिम्मेदारी पतिपत्नी दोनों की होती है, लेकिन अगर पति या पारिवारिक माहौल ठीक नहीं है तो निराश न हों, क्योंकि बच्चे की जिम्मेदारी मां की भी है और कुछ सावधानियां बरतने से इस से छुटकारा पाया जा सकता है. डाक्टर रेखा के अनुसार डोमैस्टिक वायलैंस से बचने के उपाय निम्न हैं:

  • सब से पहले पति का व्यवहार ठीक न होने पर परिवार के दूसरे सदस्यों का सहारा लें.
  • अधिक समस्या है, तो मनोरोग चिकित्सक के पास जाएं.
  • नशे या ड्रग के आदी पति से दूर रहें.
  • घरेलू हिंसा को सहें नहीं, बल्कि पुलिस में रिपोर्ट करें.
  • किसी एनजीओ की भी हैल्प ले सकती हैं.

टोनही प्रथा का बन गया “गढ़”

छत्तीसगढ़ की सामाजिक बुराइयों में, सबसे बड़ी चुनौती है यहां की टोनही प्रथा. प्रदेश के गांवों में आज भी अक्सर किसी भी महिला को टोनही कह कर अपमानित करना, उसे नग्न करके गांव में घुमाना और सामूहिक रूप से मार डालना, आम बात है.

आज जब दुनिया विज्ञान और विकास के पथ पर बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है ऐसे में छत्तीसगढ़ की यह वीभत्स सामाजिक बुराई खत्म होने का नाम नहीं ले रही है और ना ही इसके लिए जमीनी स्तर पर प्रयास किया जा रहा है. यही कारण है कि आए दिन महिलाओं के साथ अत्याचार शोषण का यह टोनही प्रथा का खेल  बदस्तूर चल रहा है. इस संदर्भ में जहां सरकार ने एक छोटा सा कानून बना करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है. वही सामाजिक चेतना प्रसारित करने वाले किसी व्यक्ति अथवा संस्था का नाम भी सुनाई नहीं देता. परिणाम यह है कि छत्तीसगढ़ में आए दिन महिलाओं को तंत्र मंत्र करने वाली कह कर प्रताड़ना का दौर बदस्तूर जारी है.

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हाल ही में छत्तीसगढ़ के औद्योगिक नगर कोरबा जिसे एशिया के मानचित्र पर अंकित बताते हुए गर्व किया जाता है में एक मामला चर्चा का विषय बन गया. यहां एक व्यक्ति ने टोनही कह कर एक महिला को खूब प्रताड़ित किया और जब मामला थाने पहुंचा तो पुलिस ने भी मानो हाथ खड़े कर लिए परिणाम स्वरूप उस शख्स को एक तरह से संरक्षण मिल गया. वह पुनः महिला को प्रताड़ित करने लगा. जब मामला सुर्खियों में आया तब पुलिस को होश आया और पुलिस ने उक्त व्यक्ति को ढूंढना शुरू किया. यह एक नजीर हमें बताती है कि किस तरह छत्तीसगढ़ में तंत्र मंत्र के नाम पर महिलाओं के साथ अत्याचार की इंतेहा हो चली है और शासन-प्रशासन कुंभकर्णी नींद में है.

यह है संपूर्ण मामला

अखबारों में  यह समाचार सुर्खियां बना —

“टोनही प्रताड़ना के मामले में फरार आरोपी बैगा राम सजीवन साहू, गिरफ्तार, रिमांड पर जेल दाखिल!”

जिसमें नीचे विस्तृत रूप से बताया गया  सारा संक्षिप्त यह कि-

टोनही प्रताड़ना के मामले में 12 दिनों तक फरारी काट रहे मुख्य बैगा राम सजीवन पिता राम सहाई साहु उम्र 54 वर्ष साकिन फुलसर पुलिस चौकी कोरबी के प्रभारी प्रेमनाथ बघेल के द्वारा लगातार आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। महिला को टोनही कह प्रताड़ित करने के आरोपी राम सजीवन के द्वारा अग्रिम जमानत पाने के लिए लगातार न्यायालय में आवेदन की प्रस्तुत किया गया था लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने आवेदन को खारिज कर दिया था.

तत्पश्चात आरोपी ने थक हार कर दिनांक 8 सितंबर मंगलवार को पुलिस चौकी में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया.

इस संपूर्ण घटनाक्रम को जानकर आप सहज ही अंदाज लगा सकते हैं कि छत्तीसगढ़ शासन पुलिस प्रशासन किस तरह महिलाओं के अत्याचार के संदर्भ में गंभीर है. गांव में कई तरीके से लोग महिलाओं को टोनही कह कर प्रताड़ित करते जाते हैं और पुलिस में शिकायत होने के बाद भी पुलिस ने गिरफ्तार नहीं करती और वह बड़े ही शान के साथ न्यायालय पहुंच जाते हैं यह तो शुक्र है कि न्यायालय में जमानत नहीं मिली अन्यथा यह घटना कहां जाकर पहुंचती आप अंदाजा लगा सकते हैं.

पुलिस इस संपूर्ण घटनाक्रम में यह बताते हुए बड़ा ही फक्र महसूस करती है और संवाददाताओं को बताती है-

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“इस मामले में पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा, के निर्देशन एवं एसडीओपी कटघोरा पंकज पटेल के मार्गदर्शन में विधिवत कार्रवाई करते हुए धारा 294, 506, 34 आईपीसी, 4, 5, 6, टोनही प्रताड़ना अधिनियम 2005 के तहत गिरफ्तार कर रिमांड पर जेल दाखिल कराया गया.”

महिलाओं की यही नियति बनी

यहां यह भी आपको बताते चलें कि कोरबा जिला में इसी तरीके के अन्य  तीन प्रकरणों में भी हीला हवाली करती रही और जब पानी सर से गुजरने लगा तब जाकर पुलिस ने कार्रवाई की दरअसल पुलिस उन्हीं मामलों में दिलचस्पी लेती है जिनमें उनके पैसों का खेल होता है अन्य अन्यथा वह यह सब टालती रहती है. मामला जब सुर्ख़ियों में आता है तब पुलिस कार्रवाई करने पर मजबूर हो जाती है यहां भी यही हुआ.

पूर्व के तीन टोनही प्रताड़ना के मुख्य आरोपियों को दिनांक 28 अगस्त 2020 को गिरफ्तार कर रिमांड पर  जेल दाखिल कराया गया.

इस मामले का तथ्य यह है कि   हरिनाथ साहु पिता बंधु साहु, ने स्थानीय पुलिस चौकी में सूचना दर्ज कराई थी कि उसकी पत्नी को उसके दो सगे भाई एवं भतीजे ने मिलकर   टोनही प्रताड़ना का आरोप लगाकर छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के एक मंदिर में गांव के सरपंच पति एवं एक जनपद सदस्य के कहने पर टोनही होने का सच्चाई जानने एवं देखने के लिए ले जाया गया था. जिसके पश्चात पुलिस के द्वारा  कार्यवाही करते हुए राम लखन, हीरालाल, एवं अजय साहु को गिरफ्तार कर रिमांड पर भेजा गया. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील गणपति पटेल बताते हैं कि यह टोनही प्रथा को रोकने के लिए सरकार द्वारा तो टोनही अधिनियम बनाया गया है मगर इसका परिपालन जिस कठोरता से प्रशासन को कराना  चाहिए नहीं किया जा रहा वहीं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ जी.आर. पंजवानी के अनुसार देखा गया है छत्तीसगढ़ के गांव में रूढ़िवादिता हावी है वहीं दुश्मनी, वैमनस्य निकालने के लिए महिलाओं पर तंत्र मंत्र करके काला जादू फैलाने वाली टोनही का आरोप लगा  दिया जाता है.

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पति की मार को प्यार समझती पत्नियां

एक तरफ औरतों के हालात में सुधार लाने के लिए दुनियाभर में कोशिशें की जा रही हैं, घरेलू हिंसा को पूरी तरह बंद करने के लिए कोशिशें हो रही हैं, इस के बाद भी हमारे देश में आज भी कुछ पत्नियां पति से पिटाई होने को भी प्यार की बात समझती हैं.

समाज पर मर्दवादी सोच की छाप के चलते कुछ औरतें पति से मार को प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं. और तो और वे यह सोचती हैं कि अगर उन के पति उन्हें मारतेपीटते नहीं हैं, तो वे उन से प्यार नहीं करते हैं.

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भले ही शारीरिक हिंसा के दौरान पैर, हाथ समेत शरीर के दूसरे अंगों में फ्रैक्चर हो जाए, लेकिन यह बहुत आम बात है. सब से ज्यादा चिंता की बात यह है कि सरकार इस तरह की हिंसा को बंद करने के लिए कानून भी बना चुकी है और सजा का प्रावधान भी है, लेकिन कुछ औरतों या समाज पर इस का कोई असर नहीं पड़ रहा है.

अभी हाल की ही घटना है. कुछ दिनों के लिए मेरा बिहार में रहना हुआ था. वहां अकसर पड़ोस से शाम के समय एक पड़ोसन के चीखनेचिल्लाने की आवाजें आती थीं. एक बार दिन के समय मेरा अपनी उस पड़ोसन से आमनासामना हो गया और धीरेधीरे बोलचाल भी शुरू हो गई. जल्द ही वह पड़ोसन काफी घुलमिल गई. लेकिन मु झे यह जान कर हैरानी हुई कि आज के समय में भी पढ़ेलिखे लोगों में भी यह सोच हो सकती है.

उस पड़ोसन के मुताबिक, अपने पति से रोज की मारपीट की अब उस को आदत हो गई है. ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब पड़ोसन के पति ने उस की धुनाई न की हो.

उस ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए यह भी बोला, ‘‘मेरे साथ की कुछ जानकार औरतों को तो लातघूंसों और गालियों का प्रसाद मिलता ही रहता है. 7 साल पहले सिर पर भारी कर्ज उठा कर पिता ने मेरी शादी की थी. 5 तरह की मिठाइयां अलग से बनवाई थीं और अपनी बिरादरी के लिए भोज रखा था. दानदहेज भी खूब दिया था.’’

पिछले 7 सालों में पति ने सिर्फ लिया हो, ऐसा नहीं था. उस ने रचना के शरीर पर ढेरों निशान और 2 बेटियों का तोहफा दे दिया था.

मैं ने पूछा ‘‘क्यों बरदाश्त करती हो इतना?’’

उस पड़ोसन ने बड़ा अजीब सा जवाब दिया, ‘‘हमारी मां, दादी, बूआ, मौसी ने हम लड़कियों को बताया था कि उन के पति उन को कैसे पीटते थे. वे उन का प्यार मान कर गृहस्थी चलाती रहीं. पति खुश रहता है तो घर में बिखराव नहीं होता. वही हम कर रहे हैं. ऐसे घर टूट कर नहीं बिखरते.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह तो पागलपन है.’’

पड़ोसन ने अपनी मजबूरी जताते हुए कहा, ‘‘मैं अगर पिटाई की खिलाफत करूंगी, तो मेरा पति मु झे छोड़ देगा.’’

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फख्र समझती हैं

इस सिलसिले में जब एक गैरसरकारी संस्था से बात की गई तो पता चला कि पत्नियों की पिटाई कुछ तबकों में इस कदर स्वीकार की जा चुकी है कि इसे दूर करना बेहद मुश्किल हो जाता है. कोईकोई पति तो जितनी बेरहमी से पिटाई करता है, उस की पत्नी सम झती है कि वह उस से उतना ही ज्यादा प्यार करता है. उन को अपने पति से पिटने में कोई शर्म नहीं आती, बस उन की कोशिश रहती है कि घर की बात घर में रहे.

ये औरतें जब आपस में मिलती हैं, तो इस तरह से दिखाती हैं जैसे उन का पति उन्हें कितना प्यार करता है. उन के पति से ज्यादा बढि़या पति शायद किसी दूसरी औरत का हो, जबकि हकीकत में हर औरत एकदूसरे की कहानी जानती है.

तलाक का खौफ

जानकारों का कहना है कि ऐसी औरतें तलाक से बचने के लिए पति के जोरजुल्म को खुशी से सहती हैं. एक

35 साला औरत ने बताया कि उस का पति घर की छोटी से छोटी बातों में दखल देता है और खिलाफत करने पर उसे बेरहमी से पीटता है. कभीकभार

तो इतनी बुरी तरह से मारता है कि पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है. लेकिन उसे बिलकुल बुरा नहीं लगता.

‘‘जहां प्यार होगा, वहीं तो तकरार होगी,’’ वह औरत हंसते हुए बोलती है. वह अपने पति से बेहद खुश है.

डर है बेबुनियाद

सीमा नाम की एक औरत का तलाक हो चुका है. हालांकि यह सबकुछ इतना आसान भी नहीं था. उस ने बताया, ‘‘मु झे कुछ दिनों तक क्या महीनों तक यही लगा जैसे सबकुछ खत्म हो चुका है. अब मेरी जिंदगी आगे बढ़ ही नहीं सकती. वह खत्म हो गई है, लेकिन आज मेरा खयाल बदल चुका है.

‘‘आज मैं यह कह सकती हूं कि वक्त चाहे अच्छा हो या फिर बुरा, कुछ न कुछ सिखाता ही है. तलाक ने भी बहुतकुछ सिखाया है.

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‘‘तलाक के बाद सब से बड़ी सीख यह मिली है कि किसी एक इनसान के नहीं होने से दुनिया खत्म नहीं हो सकती.’’

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