News Story: एसआईआर चेतावनी और जानकारी

News Story: देशभर में चल रहा एसआईआर यानी स्पैशल इंटैसिव रिविजन अभियान हर नागरिक के लोकतांत्रिक वजूद से जुड़ा सवाल बन चुका है. इस प्रोसैस को हलके में लेना यादेखा जाएगासोच कर टाल देना आने वाले सालों में भारी पड़ सकता है.
 इस कदम का असली इरादा तो सिर्फ सरकार समर्थक लोगों का नाम लिस्ट में रखने का था, पर विरोधी दलों और खासकर राहुल गांधी ने जोरदार बहस छेड़ दी, जिस से चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी की मनचाही लिस्टें नहीं बनवा पाया. अब लगता है कि भाजपा ने लिस्टों के जरीए चुनाव जीतने का इरादा छोड़ दिया है, क्योंकि बिहार में वोटर लिस्टों में बड़ी गड़बड़ी नहीं कर पाने के बावजूद वह भारी बहुमत से जीत गई.
देश के दूसरे राज्यों में एसआईआर में किस का नाम बना रहे या नहीं रहे, इस से भारतीय जनता पार्टी को फर्क नहीं पड़ता. सब से पहले यह साफ सम? लें कि वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब क्या है?
अगर आप का नाम वोटर लिस्ट से कट गया, तो इस का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आप वोट नहीं डाल पाएंगे, बल्कि इस के असर बहुत दूरगामी होंगे.
नाम कटने के बाद
होने वाली मुश्किलें
* आप किसी भी चुनाव में वोटिंग नहीं कर पाएंगे.
* दोबारा नाम जुड़वाने का प्रोसैस लंबा और थकाऊ होगा.
* कई बार महीनों या 1-2 साल तक नाम नहीं जुड़ता.
* सरकारी योजनाओं में पहचान कमजोर पड़ती है.
* राजनीतिक या प्रशासनिक लैवल पर आप कीआवाजजीरो हो जाती है.
* कई जगह वोटर आइडैंटिटी कार्ड पहचान दस्तावेज के रूप में मांगा जाता है.
* स्थानीय निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव सब से बाहर हो सकते हैं.
* यही नहीं, यह भी मुमकिन है कि कल को नौकरी, जमीन खरीदने, किसी चीज का लाइसैंस लेने, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए लिस्ट की कौपी सरकार मांगने लगे.
* सरकारी अफसर रिश्वत लेने का इसे बढि़या तरीका बना सकते हैं.
* भाजपा लिस्ट से बाहर कट्टर हिंदुओं के अलावा सब को विदेशी मान ले. आधारकार्ड के मामले में सरकार ऐसा कर चुकी है.


एसआईआर में सब से खतरनाक गलतफहमी बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि मेरा आधारकार्ड है, कुछ नहीं होगा. यह सब से बड़ी भूल है, क्योंकि आधारकार्ड नागरिकता या वोटर होने का सुबूत नहीं है. एसआईआर में आधारकार्ड केवल सहायक दस्तावेज है, निर्णायक नहीं. अगर बीएलओ या सत्यापन अधिकारी पूछे, तो आप को क्या बताना है :
* सब से पहले यह कहें (साफ और शांत शब्दों में), ‘‘मैं इस पते पर नियमित रूप से रह रहा हूं या रह रही
हूं और मेरा नाम वोटिंग लिस्ट में बना रहना चाहिए.’’
अगर पूछा जाए कि क्या आप का नाम साल 2003 की लिस्ट में शामिल है? तो घबराएं नहीं, यह जवाब दें, ‘‘मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन मैं एसआईआर फार्म भर रहा हूं या भर रही हूं और जरूरी दस्तावेज दे रहा हूं या दे रही हूं.’’ याद रखें कि साल 2003 की लिस्ट में नाम होना या होना अकेला आधार नहीं है, लेकिन फार्म भरना सब से बड़ा जोखिम है.


आप को क्याक्या करना जरूरी है
* एसआईआर फार्म भरना ही सब से जरूरी कदम है, चाहे :
* आप का नाम पहले से वोटर लिस्ट में हो.
* आप सालों से वोट डालते रहे हों.
* आप के मातापिता वोटर रहे हों.
* अगर फार्म नहीं भरा, तो नाम कटने का खतरा बना रहता है.
दस्तावेज के बारे में साफ सम?
अगर अधिकारी दस्तावेज मांगे, तो इन में से जो उपलब्ध है, दें :
* जन्म प्रमाणपत्र.
* स्कूल/शैक्षिक प्रमाणपत्र.
* परिवार रजिस्टर की नकल.
* निवास प्रमाणपत्र.
* पासपोर्ट (अगर हो).
* जाति प्रमाणपत्र
* पुराना वोटर आईडी
एकसाथ सब जरूरी नहीं, लेकिन कम से कम एक मजबूत दस्तावेज
जरूर दें.
अगर अधिकारी आप से सवाल करे, तो कैसे बात करें :
* बहस करें.
* ऊंची आवाज में बात करें.
आप मेरा नाम काट रहे होजैसे आरोप लगाएं.
* शांत, तथ्य से भरपूर और लिखित प्रोसैस पर जोर दें.
याद रखें कि आप का बरताव आप की फाइल पर असर डाल सकता है.
सब से खतरनाक गलती जो लोग कर रहे हैं कि अभी नहीं मिला बीएलओ, बाद में देखेंगे. यहबाद मेंही नाम कटने की वजह बनता है.
अगर घर बंद मिला, आप बाहर थे, फार्म वापस नहीं दिया तो रिकौर्ड में लिखा जा सकता है कि नौट ट्रेसेबल (पता नहीं चल रहा) या फिर इनएक्टिव वोटर (निष्क्रिय मतदाता). और यही शब्द नाम कटने का आधार बन जाता है.


अगर नाम कट गया है तो क्या तुरंत ठीक हो जाएगा? नहीं. वजह :
* दावा या एतराज का प्रोसैस लंबा होता है.
* कई बार अधिकारी उपलब्ध नहीं होते.
* बारबार दफ्तर के चक्कर लग सकते हैं.
* अगला चुनाव निकल सकता है, इसलिए इलाज से बेहतर बचाव ही सम?ादारी है.
एक सीधा और कड़वा सच


लोकतंत्र में आप का वजूद तब तक है जब तक आप का नाम वोटिंग लिस्ट में है. अगर नाम कटा तो आप नागरिक तो रहेंगे, लेकिन फैसला लेने के प्रोसैस से बाहर हो जाएंगे. यह सिर्फ फार्म नहीं, बल्कि आप का अधिकार है.
एसआईआर अभियान को हलके में लेना आत्मघाती है, लोकतांत्रिक माने में. सरकार, आयोग, प्रशासन सब अपनी जगह हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में आप का नाम होने की जिम्मेदारी आखिरकार आप की है.
आज फार्म भरना, दस्तावेज देना और सही जानकारी देना कल की लंबी लड़ाई से आप को बचा सकता है.
वोटर लिस्ट में आप का नाम होना जरूरी है

क्या Bhojpuri Actress Akshara Singh रखने जा रही हैं राजनीती में कदम?

Bhojpuri Actress Akshara Singh: भोजपुरी सिनेमा की जानी मानी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह आज किसी भी पहचान की मोहताज नहीं हैं. अक्षरा ने ना सिर्फ भोजपुरी फिल्में बल्कि कई सुपरहिट म्यूजिक वीडियोज में काम कर कमाल की फैन फौलोइंग हासिल की है. जैसा कि आज सब जानते हैं कि बिहार में चुनावी माहौल काफी गर्माया हुआ है तो ऐसे में एक्ट्रेस अक्षरा सिंह भी सुर्खियों में आ गई हैं.

अक्षरा सिंह ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के साथ एक फोटो शेयर की. इस फोटो के कैप्शन में उन्होंने लिखा – “आज बिहार के केंद्रीय मंत्री माननीय गिरिराज सिंह जी से शिष्टाचार और आशीर्वाद प्राप्त किया,” अक्षरा की इस पोस्ट के सामने आते ही फैंस और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच अनुमान लगाने का दौर शुरू हो गया है कि क्या वे अब राजनीति में कदम रखने की तैयारी कर रही हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े चेहरे राजनीति में एंट्री कर चुके हैं. वहीं दूसरी ओर, भोजपुरी पावर स्टार पवन सिंह और उनकी पत्नी ज्योति सिंह के बीच चल रही विवादित खींचतान के साथ-साथ लोकगायिका मैथिली ठाकुर की हाल ही में विनोद तावड़े और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय से हुई मुलाकातें भी चर्चाओं में हैं. Bhojpuri Actress Akshara Singh

Bihar Elections: बिहार में भाजपा की मुश्किलें

Bihar Elections: हार की राजनीति हमेशा से ही उतारचढ़ाव से भरी रही है. यहां जनता का रुझान किसी एक दल के लिए परमानैंट नहीं रहता, बल्कि काम और हालात को देख कर बदलता रहता है.

मौजूदा हालात में देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी या राजग गठबंधन के लिए जनता का झुकाव उतना नहीं है, जितना कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए है.

नीतीश कुमार की सरकार ने सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतों में सुधार किया, जिस के चलते आम लोग उन्हें ‘काम करने वाला नेता’ मानते हैं. गांवगांव में सड़कें बनीं, बिजली पहुंची और शहरों में अस्पताल व स्कूल की आलीशान इमारतें खड़ी की गईं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इन इमारतों के भीतर सहूलियतों की भारी कमी है.

अस्पतालों में न तो डाक्टर मिलते हैं और न ही दवाएं. स्कूलों में टीचर तो गिनती के हैं, पर पढ़ाई का लैवल गिरा हुआ है. यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे जाना पसंद नहीं करते. ऊपर से भ्रष्टाचार ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है.

नीतीश कुमार खुद भी अब चाह कर कुछ कर पाने की हालत में नहीं दिखते. इस वजह से आने वाला चुनाव उन के लिए भारी हो सकता है.

भाजपा की हालत और राजग की बैसाखी

बिहार में भाजपा की पकड़ उतनी मजबूत नहीं है जितनी वह दूसरे राज्यों में बना चुकी है. उस के पारंपरिक वोटर सवर्ण और वैश्य समुदाय से हैं, जिन की तादाद उतनी ही है, जितनी राजद के यादव वोटरों की. ऐसे में भाजपा को जीत पक्की करने के लिए जद (यू) जैसी पार्टी की बैसाखी चाहिए.

इस प्रदेश में भाजपा लगातार दलितों और पिछड़ों के बीच जगह बनाने की कोशिश करती रही है, लेकिन सांप्रदायिक एजेंडे और ‘हिंदूमुसलिम’ के रटेरटाए नारे उसे कामयाबी दिलाने में नाकाम रहे हैं.

राजग की सभाओं में भी वह जोश और भीड़ नहीं दिखती, जो महागठबंधन की यात्राओं में देखने को मिलती है. महागठबंधन के नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जब जनता के बीच पहुंचते हैं, तो भीड़ अपनेआप उमड़ पड़ती है. ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारे के बाद महागठबंधन को एक नई मजबूती मिली है.

इस के उलट भाजपा की सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी और प्राइवेट स्कूलों को बंद किया जाता है, ‘जीविका दीदीयों’ को बुलाने के लिए प्रशासनिक दबाव बनाया जाता है और आम दर्शकों को भाड़े पर लाया जाता है. यह सब दिखाता है कि भाजपा के पास असली जनाधार की कमी है.

मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति

राजनीति में अकसर देखा जाता है कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए भावनात्मक कार्ड खेला जाता है. हाल ही में बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

एक आदमी ने मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ अपशब्द कहे. यह घटना बहुत गलत थी, लेकिन भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना कर महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे असली सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश से लौटते ही एक कार्यक्रम में आधे घंटे के भाषण में तकरीबन 25 मिनट अपनी मां का जिक्र कर दिया और यह कहा कि ‘मेरी मां का अपमान देश का अपमान है’.

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब भाजपा के कई नेता संसद से ले कर सार्वजनिक मंचों तक विपक्षी नेताओं की माताओं और आम औरतों का अपमान करते रहे हैं, तब प्रधानमंत्री ने कभी इस पर चिंता क्यों नहीं जताई? राजनीति में उन का यही दोहरापन जनता अच्छी तरह समझती है.

बिहार बंद काम न आया

भाजपा ने इस मां का अपमान करने वाले मुद्दे को आधार बना कर बिहार बंद का आह्वान किया. लेकिन बंद को कामयाब बनाने के लिए औरतों और आम जनता को अपमानित किया गया. सड़कों पर बदसुलूकी हुई, जबरन दुकानें बंद कराई गईं. पैसे दे कर भीड़ बुलाने जैसे आरोप लगाए गए.

यह सब लोकतंत्र के मूल्यों और जनता की गरिमा के खिलाफ था. सवाल यह है कि अगर किसी ने गाली दी भी थी, तो उस की गिरफ्तारी हो चुकी थी, फिर भी जनता को परेशान करना किस हद तक सही कहा जा सकता है?

बिहार की राजनीति इस समय एक चौराहे पर खड़ी है. नीतीश कुमार की इमेज अब भी भाजपा की तुलना में थोड़ी अच्छी है, लेकिन भ्रष्टाचार और कामकाज की कमजोरी ने उन के कद को भी कम किया है.

दूसरी ओर भाजपा अपने सांप्रदायिक एजेंडे से आगे नहीं बढ़ पा रही है. यही वजह है कि जनता का भरोसा महागठबंधन की ओर ज्यादा झुकता दिख रहा है.

राजनीति में जनता सिर्फ नारों और भावनाओं से नहीं, बल्कि काम और सहूलियत चाहती है. अगर भाजपा और राजग इसे समझने में नाकाम रहे, तो बिहार में उन की राह और मुश्किल हो जाएगी.

सब से बड़ी बात तो यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी बिहार में अपनी पकड़ खोते नजर आ रहे हैं. स्थानीय भाजपा नेताओं का भी वोटरों पर ज्यादा भरोसा नहीं बन पा रहा है. यह राजग के लिए खतरे की घंटी हो सकती है. Bihar Elections

Bihar Politics: बिहार में रिजर्व्ड सीटें

Bihar Politics: बिहार की राजनीति हमेशा से जातपांत, सामाजिक न्याय और राजनीतिक दलों की खींचतान पर टिकी रही है. चुनाव आते ही विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजे ज्यादातर जातीय समीकरणों और वोट बैंक पर ही तय होते हैं.

खासकर रिजर्व्ड सीटें यानी दलित और आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित 40 विधानसभा सीटें चुनावी राजनीति का असली रणक्षेत्र होती हैं. इन्हीं सीटों पर जीतहार से तय होता है कि सत्ता की चाबी किस गठबंधन के हाथ में जाएगी.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों ने इस बात को साफ कर दिया था कि इन 40 सीटों की अहमियत कितनी खास है. उस चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच रिजर्व्ड सीटों पर बेहद करीबी मुकाबला हुआ था. यही वजह है कि साल 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में दोनों गठबंधन अपनी पूरी ताकत इन सीटों पर झांकने वाले हैं.

जातीय समीकरण की जड़ें

बिहार का राजनीतिक इतिहास सामाजिक न्याय और जातीय समीकरणों की राजनीति से गहराई से जुड़ा है. 70 के दशक के आखिर और 80 के दशक में जब कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने पिछड़ों को रिजर्वेशन दिलाने की पहल की.

इस के बाद लालू प्रसाद यादव की अगुआई में 90 के दशक में ‘माय समीकरण’ (मुसलिमयादव) का नारा जोरदार तरीके से उभरा. इस दौरान दलित और अति पिछड़ा वर्ग भी इस राजनीति से जुड़ने लगे. दूसरी ओर, भाजपा और जद (यू) ने सवर्ण, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई.

आज हालत यह है कि किसी भी चुनाव में यादव और मुसलिम वोटर महागठबंधन की बुनियाद बनते हैं, जबकि अति पिछड़े और सवर्ण वोट बैंक राजग के साथ रहते हैं. दलित और महादलित वोट बैंक को ले कर दोनों गठबंधनों में सब से ज्यादा खींचतान रहती है.

राजनीतिक अहमियत

बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से 40 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए रिजर्व्ड हैं. इन में 38 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व्ड हैं. इतिहास बताता है कि बिहार में सरकार बनाने की कुंजी अकसर इन सीटों से ही निकलती है.

साल 2010 का विधानसभा चुनाव : राजग ने इन सीटों पर भारी कामयाबी पाई थी.

साल 2015 का विधानसभा चुनाव : महागठबंधन (जद (यू), राजद और कांग्रेस) ने इन सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई थी.

साल 2020 का विधानसभा चुनाव : राजग और महागठबंधन के बीच बेहद करीबी मुकाबला हुआ था.

साल 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में इन 40 सीटों पर नतीजे चौंकाने वाले रहे. भाजपा को 11 सीटें मिलीं. जद (यू) को 7 सीटें मिलीं. राजग की सहयोगी वीआईपी पार्टी को 1 सीट. वहीं महागठबंधन में राजद को 9 सीटें. कांग्रेस को 2 सीटें. भाकपा (माले) को 10 सीटें. इस तरह राजग को कुल 19 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन ने 21 सीटों पर कब्जा किया.

बिहार की राजनीति का असली संतुलन पिछड़ों और महादलितों पर टिका है. महादलित में पासवान, मुसहर, मांझ, भुइयां जैसी जातियां आती हैं. नीतीश कुमार ने महादलित को अलग पहचान दे कर योजनाओं का फायदा पहुंचाया.

अति पिछड़ा वर्ग में तकरीबन 110 जातियां इस वर्ग में आती हैं. राजग ने इन्हें संगठित करने में बड़ा रोल निभाया है.

पसमांदा मुसलिम में पिछड़े और दलित मुसलमान. राजद और कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, लेकिन हाल के सालों में भाजपा ने भी इन के बीच पैठ बनाने की कोशिशें शुरू की हैं, पर इस का असर नहीं देखा जा रहा है.

दलित राजनीति की विरासत

रामविलास पासवान का नाम बिहार की दलित राजनीति में दर्ज है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जरीए उन्होंने दलित वोट खासकर पासवान जाति के वोट को अपने तरफ कर लिया.

उन के न रहने के बाद चिराग पासवान ने दलित राजनीति को ‘मौडर्न’ अंदाज देने की कोशिश की है. साल 2020 में लोजपा (रामविलास) ने राजग से अलग हो कर चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा से नजदीकियां बनाए रखीं. चिराग पासवान की पकड़ भी दलितों में पासवान जाति पर ही खास है. दूसरी दलित जातियां इन के साथ नहीं हैं.

राजग की रणनीति

एनडीए (भाजपा, जद (यू) और लोजपा) का टारगेट दलित और अति पिछड़ा वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना है. भाजपा दलित समाज में ‘गांवगांव तक पहुंच’ बनाने पर काम कर रही है. जद (यू) ‘महादलित योजना’ और ‘आरक्षण के विस्तार’ के जरीए समर्थन जुटा रही है.

चिराग पासवान का युवा और आक्रामक तेवर राजग के लिए दलित नौजवानों में आकर्षण पैदा कर सकता है खासकर पासवान जाति तो पूरी मुस्तैदी से इन के साथ है.

महागठबंधन की रणनीति

महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दल) का आधार यादव और मुसलिम वोट बैंक है. लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए इन्हें दलित और अति पिछड़े वोटों की भी जरूरत है.

तेजस्वी यादव की अगुआई में राजद दलितों को ‘समान अवसर’ और ‘नौकरीरोजगार’ का वादा कर रही है.

माकपा (माले) गांवदेहात में दलितमजदूर वर्ग को संगठित कर रही है. कांग्रेस फिर से अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में है.

बिहार विधानसभा की 40 रिजर्व्ड सीटें केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये समाजशास्त्रीय और राजनीतिक संघर्ष की धुरी हैं.

राजग और महागठबंधन दोनों को पता है कि इन सीटों पर मिली कामयाबी ही सरकार बनाने की कुंजी होगी. साल 2025 का चुनाव दलितपिछड़े समाज की आवाज से यह तय करेगा कि बिहार किस दिशा में आगे बढ़ेगा. Bihar Politics

Nitish Kumar को पटकनी देने के लिए भाजपा का चक्रव्यूह

बिहार की राजनीति में इन दिनों काफी हलचल मची हुई है. इस हलचल के कई कारण हैं. सब से बड़ा कारण यह है कि विधानसभा चुनाव समय से पहले हो सकते हैं. तय अवधि के तहत चुनाव नवंबर में होने हैं. लेकिन भाजपा को एक ‘अज्ञात डर’ है कि Nitish Kumar के स्वास्थ्य को देखते हुए तय वक्त पर चुनाव कराने से राजग की जीत में संशय हो सकता है.

भाजपा ने अपने ‘पिछड़े’ चेहरे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं. नीतीश कुमार की पार्टी की ताकत लगातार घटी है. कभी विधानसभा में जनता दल (एकी.) सब से बड़ी पार्टी थी, फिर वह भाजपा से नीचे आ गई थी. पिछले विधानसभा चुनाव में तो जद (एकी.) तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई है. महज 43 विधायकों के बल पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं.

भाजपा को लगता था कि नीतीश कुमार चुनाव से पहले स्वयं मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे पर वे कोई बड़ी डील करने से पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं. इधर उन के बेटे निशांत का चेहरा भी सामने लाया गया है. ऐसे में नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं, मगर भाजपा की मजबूरी है कि अगर केंद्र में सत्ता बनाए रखनी है, तो नीतीश कुमार की जीहुजूरी करनी होगी, नहीं तो फिर लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव तो नीतीश कुमार के लिए बांहें फैला कर खड़े ही हैं.

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने अपनी सोचीसमझी रणनीति के तहत आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बनाया है. भाजपा का जनाधार और बढ़ाने के लिए राज्यपाल तुरुप का पत्ता बन गए हैं.

बिहार की राजनीति में इन दिनों कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. सब से बड़ी अटकल यह है कि भाजपा विधानसभा चुनाव समय से पहले करा सकती है. इस के कई कारण बताए जा रहे हैं.

पहला कारण यह है कि भाजपा को डर है कि नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को देखते हुए तय वक्त पर चुनाव कराने से राजग की जीत में संशय हो सकता है.

दूसरा कारण यह है कि भाजपा अपने ‘पिछड़े’ चेहरे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने को आतुर है.

तीसरा कारण यह है कि नीतीश कुमार की पार्टी की ताकत लगातार घटी है. कभी विधानसभा में जद (एकी.) सब से बड़ी पार्टी थी, फिर वह भाजपा से नीचे आ गई. पिछले विधानसभा चुनाव में तो जद (एकी.) तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई. महज 43 विधायकों के बल पर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं.

चौथा कारण यह है कि भाजपा को भरोसा था कि नीतीश कुमार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे, पर वे इस मूड में नहीं हैं. अब तो उन के बेटे निशांत का चेहरा भी सामने है.

एक कारण यह भी है कि भाजपा ने अपनी सोचीसमझी रणनीति के तहत ही आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बनाया है. राष्ट्रपति शासन की नौबत आई तो राज्यपाल के जरीए भाजपा चुनाव से पहले अपना एजेंडा आगे बढ़ा सकेगी.

इन सभी कारणों के चलते बिहार की राजनीति में इन दिनों काफी हलचल मची हुई है. भारतीय जनता पार्टी के साथ राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार का घातप्रतिघात धीरेधीरे बढ़ता जा रहा है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में क्या होता है.

सियासत : कांग्रेस में रार, होनी चाहिए आर या पार

राजनीति में जब मनमुताबिक हालात नहीं होते हैं तो किसी सियासी दल की हालत उस डूबते जहाज की तरह हो जाती है, जिस के चूहे सब से पहले उसे छोड़ कर समुद्र में छलांग लगाते हैं. पर चूहे अगर कद्दावर हों तो जहाज के कप्तान को काटने से भी गुरेज नहीं करते हैं.

आज अगर सरसरी निगाहों से देखा जाए तो कांग्रेस इसी डूबते जहाज सी हो गई है. देश को अपने कई साल के राज से नई दिशा देने वाली कांग्रेस आज खुद दिशाहीन लग रही है. इतनी ज्यादा कि कोई भी छुटभैया नेता उसे ज्ञान बघार देता है.

हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार को ले कर अब इसी पार्टी में बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं. इस के वरिष्ठ नेता और नामचीन वकील कपिल सिब्बल ने जैसे ही इस के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाए कि पार्टी की भीतरी कलह एक बार फिर सामने आ गई.

पर इसे भितरघात बताते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कपिल सिब्बल को ही निशाने पर ले लिया और साथ ही दूसरे नेता सलमान खुर्शीद ने कपिल सिब्बल को ही ‘डाउटिंग थौमस’ करार दे दिया.

दरअसल, ‘डाउटिंग थौमस’ उस आदमी को कहते हैं जो किसी भी चीज पर यकीन करने से इनकार करता है जब तक कि वह खुद न अनुभव करे या सुबूत न हो. इतना ही नहीं, सलमान खुर्शीद ने एक इंटरव्यू में कपिल सिब्बल को पार्टी छोड़ने तक की सलाह दे दी.

एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में सलमान खुर्शीद ने कपिल सिब्बल की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अगर आप पार्टी में हैं और चीजों को खराब कर रहे हैं तो सब से अच्छा यही है कि आप पार्टी छोड़ दें.

सिब्बल का दुखती रग पर हाथ

सवाल यह है कि कपिल सिब्बल ने ऐसा क्या कहा कि कांग्रेस के दूसरे नेता उन पर हावी हो गए? दरअसल, कपिल सिब्बल ने एक इंगलिश अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में कथित तौर पर कहा था कि ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपनी नियति मान लिया है… बिहार ही नहीं, उपचुनावों के नतीजों से भी ऐसा लग रहा है कि देश के लोग कांग्रेस पार्टी को प्रभावी विकल्प नहीं मान रहे हैं.

अपनी पार्टी को कठघरे में खड़ा करने वाले कपिल सिब्बल अकेले ही नहीं हैं, उन के साथसाथ कांग्रेस महासचिव तारिक अनवर ने भी कथित तौर पर कहा था कि बिहार चुनाव को ले कर पार्टी को आत्मचिंतन करना चाहिए.

एक हिंदी अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में तारिक अनवर ने बिहार विधानसभा चुनाव पर कांग्रेस के प्रदर्शन पर कहा, ‘इस का जायजा लेना होगा कि हम लोगों से कहां चूक हो रही है. यह भी हो सकता है कि लंबे वक्त तक सत्ता में बने रहने से हमारे जो स्टेट लीडर हैं, वे आलसी हो गए हों, काम करने की ताकत न रही हो. इस खुशफहमी से बाहर निकलना होगा कि गांधी परिवार से कोई आएगा और हम जीत जाएंगे. ऐसा नहीं चलने वाला…’

तारिक अनवर की चिंता जायज है, पर यह भी कड़वा सच है कि कांग्रेस आज भी गांधी परिवार के इर्दगिर्द ही सिमटी दिखाई देती है और अगर कोई अपना ही इस परिवार पर उंगली उठाता है, तो उसे ‘डाउटिंग थौमस’ करार दे दिया जाता है.

फिर दिक्कत क्या है

ऐसा नहीं है कि जनता को गांधी परिवार से कोई दुश्मनी है या इस पार्टी में बड़े कद के नेताओं की कमी हो गई है, पर इतना जरूर है कि फिलहाल इस पार्टी का कोई भी पासा सही नहीं पड़ रहा है.

इस की एक खास वजह यह है कि कांग्रेस यह नहीं फैसला कर पा रही है कि वह अपने वोटरों का दिल जीतने के लिए दो नावों की सवारी का करतब कब तक करेगी. दो नावों की सवारी का मतलब है अपनी धर्मनिरपेक्षता पर अडिग रहना या सौफ्ट हिंदुत्व का राग अलापना.

पिछले कुछ साल में भारतीय जनता पार्टी लोगों के दिमाग में यह भरने में कामयाब रही है कि वह इस देश में हिंदुत्व की हिफाजत करने वाली एकलौती पार्टी है और तीन तलाक कानून, धारा 370, राम मंदिर पर लिए गए उस के फैसले ने देश में हिंदूमुसलिम तबके के बीच एक लकीर खींच दी है, जिसे मिटाने में कांग्रेस के हाथपैर फूल रहे हैं. वह अगर मुसलिम समाज के हित की बात करती है तो हिंदू समाज की नाराजगी झेलती है और अगर सौफ्ट हिंदुत्व की तरफ जाती है तो मुसलिमों से दूर हो जाती है.

बिहार में दिखा असर

हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन की मजबूत साथी थी और उसे 70 सीटें भी दी गई थीं, पर वह उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं ला पाई. हाल यह हुआ कि हाथ आया पर मुंह को न लगा. यह महागठबंधन 12 जरूरी सीटों से पिछड़ गया और विपक्ष बन कर रह गया.

बाद में सब से बड़ा सवाल यही उभरा कि क्या कांग्रेस को 70 सीटें दी जानी चाहिए थीं? 70 सीटों में से महज 19 सीटें जीत कर कांग्रेस ने कोई कारनामा नहीं किया था. लिहाजा, उसे ही महागठबंधन की कमजोर कड़ी माना गया.

बिहार में कांग्रेस मुसलिमों को रिझाने में पूरी तरह नाकाम रही. उस ने असद्दुदीन ओवैसी को कम आंका या जानबूझ कर उन्हें नजरअंदाज किया, यह अलग सवाल है, पर खुद अपनी 70 सीटों में से उस ने महज 12 सीटों पर मुसलिम उम्मीदवार उतारे थे. उस ने खुद को तो मुसलिमों की हिमायती बताया पर ओवैसी को भाजपा का एजेंट बताते हुए उस पर खूब वार किए.

उधर, असदुद्दीन ओवैसी के पास खोने को कुछ नहीं था, लिहाजा उन्होंने भी कांग्रेस को यह कहते हुए खूब आड़े हाथ लिया कि अपने को सैकुलर कहने वाले दूसरे दलों को मुसलमानों के वोट तो अच्छे लगते हैं, पर उन की दाढ़ी और टोपी उन्हें पसंद नहीं.

जब बिहार में ओवैसी ने अपने खाते में 5 सीटें कर लीं, तो सियासी गलियारों में यह सुगबुगाहट शुरू हो गई कि क्या मुसलिम समाज का कांग्रेस या तथाकथित सैकुलर दलों से मोह भंग हो रहा है? कहीं ओवैसी में उन्हें अपना रहनुमा तो नहीं दिखाई दे रहा है? और अगर ऐसा है तो पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में कुछ अलग ही रंगत देखने को मिलेगी, जो कांग्रेस जैसे सैकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है.

पर अभी भी कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ा है. कांग्रेस को दूसरे दलों की ताकत के साथसाथ अपनी अंदरूनी कमियों पर भी गंभीरता से सोचना होगा. अगर उसे गांधी परिवार की जरूरत है तो वह इस बात को खुल कर स्वीकार करे, जिस से राहुल गांधी को नई ताकत मिलेगी. बाकी नेताओं को भी आपसी निजी रंजिश भुला कर एकजुट होना होगा. उन्हें अपने नेतृत्व पर सवाल उठाने का पूरा हक है, पर अगर कोई दूसरा मजबूत विकल्प नहीं है तो जो सामने है, उस में वे अपनी आस्था बनाएं और मजबूती के साथ जनता के सामने जाएं. बिल्ली देख कर कबूतर की तरह अपनी आंखें बंद करने से समस्या का हल नहीं होगा. आरपार की ही लड़ाई सही, पूरी ताकत से लड़ें, फिर नतीजा चाहे कुछ भी रहे.

गहरी पैठ

हाथरस, बलरामपुर जैसे बीसियों मामलों में दलित लड़कियों के साथ जो भी हुआ वह शर्मनाक तो है ही दलितों की हताशा और उन के मन की कमजोरी दोनों को दिखाता है. 79 सांसदों और 549 विधायक जिस के दलित हों, वह भारतीय जनता पार्टी की इस बेरुखी से दलितों पर अत्याचार करते देख रही है तो इसलिए कि उसे मालूम है कि दलित आवाज नहीं उठाएंगे.

पिछले 100 सालों में पहले कांग्रेसी नेताओं ने और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने जम कर पौराणिक व्यवस्था को गांवगांव में थोपा. रातदिन पुराणों, रामायण, महाभारत और लोककथाओं को प्रवचनों, कीर्तनों, यात्राओं, किताबों, पत्रिकाओं, फिल्मों व नाटकों से फैलाया गया कि जो व्यवस्था 2000 साल पहले थी वही अच्छी थी और तर्क, तथ्य पर टिकी बराबरी की बातें बेकार हैं.

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जिन लोगों ने पढ़ कर नई सोच अपनाई थी उन्हें भी इस में फायदा नजर आया चाहे वे ऊंची जातियों के पढ़े-लिखे सुधारक हों या दलितों के ही नेता. उन्हें दलितों में कम पैसे में काम करने वालों की एक पूरी बरात दिखी जिसे वे छोड़ना नहीं चाहते थे.

यही नहीं, दलितों के बहाने ऊंची जातियों को अपनी औरतों को भी काबू में रखने का मौका मिल रहा था. जाति बड़ी, देश छोटा की बात को थोपते हुए ऊंची जातियों ने दहेज, कुंडली, कन्या भ्रूण हत्या जम कर अपनी औरतों पर लादी. औरत या लड़की चाहे ऊंची जाति की हो या नीची, मौजमस्ती के लिए है. इस सोच पर टिकी व्यवस्था में सरकार, नेताओं, व्यापारियों, अफसरों, पुलिस से ले कर स्कूलों, दफ्तरों में बेहद धांधली मचाई गई.

हाथरस में 19 साल की लड़की का रेप और उस से बुरी तरह मारपीट एक सबक सिखाना था. यह सबक ऊंची जातियां अपनी औरतों को भी सिखाती हैं, रातदिन. अपनी पढ़ीलिखी औरतों को रातदिन पूजापाठ में उलझाया गया. जो कमाऊ थीं उन का पैसा वैसे ही झटक लिया गया जैसा दलित आदमी औरतों का झटका जाता है. जिन आदमियों को छूना पाप होता है, उन की औरतों, बेटियों के गैंगरेप तक में पुण्य का काम होता है. यह पाठ रोज पढ़ाया जाता है और हाथरस में यही सबक न केवल ब्राह्मण, ठाकुर सिखा रहे हैं, पूरी पुलिस, पूरी सरकार, पूरी पार्टी सिखा रही है.

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दलितों के नेता चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि जिन का उद्धार नहीं हुआ उन्हें तो पाप का फल भोगना होगा. मायावती जैसे नेता तो पहले ही उन्हें छोड़ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी के 79 सांसद और 549 विधायक अपनी बिरादरी से ज्यादा खयाल धर्म की रक्षा के नाम पर पार्टी का कर रहे हैं. दलित लड़कियां तो दलितों के हाथों में भी सुरक्षित नहीं हैं. यह सोच कर इस तरह के बलात्कारों पर जो चुप्पी साध लेते हैं, वही इस आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं.

सरकार की हिम्मत इस तरह बढ़ गई है कि उस ने अपराधियों को बचाने के लिए पीडि़ता के घर वालों पर दबाव डाला और हाथरस के बुलगढ़ी गांव को पुलिस छावनी बना कर विपक्षी दलों और प्रैस व मीडिया को जाने तक नहीं दिया. वे जानते हैं कि जाति शाश्वत है. यह हल्ला 4 दिन में दब जाएगा.

बिहार चुनावों की गुत्थी समझ से परे हो गई है. भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार का साथ भी दे रही है और उसी के दुश्मन चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी से भी मिली हुई है. इस चक्कर में हाल शायद वही होगा जो रामायण और महाभारत के अंत में हुआ. रामायण में अंत में राम के पास न सीता थी, न बच्चे लवकुश, न लक्ष्मण, न भरत. महाभारत में पांडवों के चचेरे भाई मारे भी जा चुके थे और उन के अपने सारे बेटेपोते भी.

लगता है कि हिंदू पौराणिक कथाओं का असर इतना ज्यादा है कि बारबार यही बातें दोहराई जाती हैं और कुछ दिन फुलझड़ी की तरह हिंदू सम्राट का राज चमकता है, फिर धुआं देता बुझ जाता है. बिहार में संभव है, न नीतीश बचें, न चिराग पासवान.

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जो स्थिति अब दिख रही है उस के अनुसार चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार भाजपा की सहयोगी पार्टी सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के सभी उम्मीदवारों के खिलाफ उम्मीदवार खड़ी करेगी. वे कितने वोट काटेंगे पता नहीं, पर चिराग पासवान के पास अगर अभी भी दलित व पासवान वोटरों का समर्थन है तो आश्चर्य की बात होगी, क्योंकि चिराग पासवान जाति के नाम पर वोट ले कर सत्ता में मौज उठाने के आदी हो चुके हैं. हो सकता है कि उन्हें एहसास हो गया हो कि नीतीश कुमार निकम्मेपन के कारण हारेंगे तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ गठबंधन करने में आसानी रहेगी और तब वे भाजपा को 2-4 बातों पर कोस कर अलग हो जाएंगे.

जो भी हो, यह दिख रहा है कि कम से कम नेताओं को तो बिहार की जनता की चिंता नहीं है. बिहार की जनता को अपनी चिंता है, इस के लक्षण दिख नहीं रहे, पर कई बार दबा हुआ गुस्सा वैसे ही निकल पड़ता है जैसे 24 मार्च को लाखों मजदूर दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु से पैदल ही बिहार की ओर निकले थे. वह हल्ला का परिणाम था, चुनावों में गुस्से का दर्शन हो सकता है.

बिहार के मुद्दे अभी तक चुनावी चर्चा में नहीं आए हैं. बिहार में बात तो जाति की ही हो रही है. बिहार की दुर्दशा के लिए यही जिम्मेदार है कि वहां की जनता बेहद उदासीन और भाग्यवादी है. उसे जो है, जैसा है मंजूर है, क्योंकि उसे पट्टी पढ़ा दी गई है कि सबकुछ पूजापाठी तय करते हैं, आम आदमी के हाथ में कुछ नहीं है.

बिहार देश की एक बहुत बड़ी जरूरत है. वहां के मजदूरों ने ही नहीं, वहां के शिक्षितों और ऊंची जाति के नेताओं ने देशभर में अपना नाम कमाया है. बिहार के बिना देश अधूरा है पर बिहार में न गरीब की पूछ है, न पढ़ेलिखे शिक्षित की चाहे वह तिलकधारी हो या घोर नास्तिक व तार्किक. ऐसा राज्य अपने नेताओं के कारण मैलाकुचला पड़ा रहे, यह खेद की बात है और नीतीश कुमार जीतें या हारें कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

बिहार में का बा : लाचारी, बीमारी, बेरोजगारी बा

जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के नाम अपने संदेश में लोगों को कोरोना से बचने के लिए आगाह कर रहे थे, उसी समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार विधानसभा चुनाव के सिलसिले में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उस भीड़ में न मास्क था और न ही आपस में 2 गज की दूरी. इसी साल के मार्च महीने में जब कोरोना की देश में आमद हो रही थी, तब 2,000 लोगों के जमातीय सम्मेलन को कोरोना के फैलने की वजह बता कर बदनाम किया गया था, पर अब बिहार चुनाव में लाखों की भीड़ से भी कोई गुरेज नहीं है.

बिहार चुनाव इस बार बहुत अलग है. नीतीश कुमार अपने 15 साल के सुशासन की जगह पर लालू प्रसाद यादव के 15 साल के कुशासन पर वोट मांग रहे हैं. इस के उलट बिहार के 2 युवा नेताओं चिराग पासवान और तेजस्वी यादव ने बड़ेबड़े दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं.

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बिहार चुनाव में युवाओं की भूमिका अहम है. बिहार में बेरोजगारी सब से बड़ा मुद्दा बन गई है. एक अनजान सी गायिका नेहा सिंह राठौर ने ‘बिहार में का बा’ की ऐसी धुन जगाई है कि भाजपा जैसे बड़े दल को बताना पड़ रहा है कि ‘बिहार में ई बा’ और नीतीश कुमार अपने काम की जगह लालू के राज के नाम पर वोट मांग रहे हैं.

बिहार की चुनावी लड़ाई अगड़ों की सत्ता को मजबूत करने के लिए है. एससी तबके की अगुआई करने वाली लोक जनशक्ति पार्टी को राजग से बाहर कर के सीधे मुकाबले को त्रिकोणात्मक किया गया है, जिस से सत्ता विरोधी मतों को राजदकांग्रेस गठबंधन में जाने से रोका जा सके.

जिस तरह से नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर के पिछड़ों की एकता को तोड़ा गया, अब चिराग पासवान को निशाने पर लिया गया है, जिस से कमजोर पड़े नीतीश कुमार और चिराग पासवान पर मनमाने फैसले थोपे जा सकें.

बिहार चुनाव में अगर भाजपा को पहले से ज्यादा समर्थन मिला, तो वह तालाबंदी जैसे फैसले को भी सही साबित करने की कोशिश करेगी. बिहार को हिंदुत्व का नया गढ़ बनाने का काम भी होगा.

बिहार के चुनाव में जातीय समीकरण सब से ज्यादा हावी होते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. आजादी के पहले से ही यहां जातीयता और राजनीति में चोलीदामन का साथ रहा है. 90 के दशक से पहले यहां की राजनीति पर अगड़ों का कब्जा रहा है.

लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीति की दिशा को बदल दिया था. अगड़ी जातियों ने इस के खिलाफ साजिश कर के कानून व्यवस्था का मामला उठा कर लालू प्रसाद यादव के राज को ‘जंगलराज’ बताया था. उन के सामाजिक न्याय को दरकिनार किया गया था.

पिछड़ी जातियों में फूट डाल कर नीतीश कुमार को समाजवादी सोच से बाहर कर के अगड़ी जातियों के राज को स्थापित करने में इस्तेमाल किया गया था. बिहार की राजनीति के ‘हीरो’ लालू प्रसाद यादव को ‘विलेन’ बना कर पेश किया गया था.

भारतीय जनता पार्टी को लालू प्रसाद यादव से सब से बड़ी दुश्मनी इस वजह से भी है कि उन्होंने भाजपा के अयोध्या विजय को निकले रथ को रोकने का काम किया था. साल 1990 में जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ ले कर भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी निकले, तो उन को बिहार में रोक लिया गया.

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भाजपा को लालू प्रसाद यादव का यह कदम अखर गया था. केंद्र में जब भाजपा की सरकार आई, तो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में उल झाया गया और इस के सहारे उन की राजनीति को खत्म करने का काम किया गया.

लालू प्रसाद यादव के बाद भी बिहार की हालत में कोई सुधार नहीं आया. बिहार में पिछले 15 साल से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इस के बाद भी बिहार बेहाल है.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव का ‘सामाजिक न्याय’ भी बड़ा मुद्दा है. लालू प्रसाद यादव भले ही चुनाव मैदान में नहीं हैं, पर उन का मुद्दा चुनाव में मौजूद है.

नई पीढ़ी का दर्द

तालाबंदी के बाद मजदूरों का पलायन एक दुखभरी दास्तान है. नई पीढ़ी के लोगों को यह दर्द परेशान कर रहा है. नौजवान सवाल कर रहे हैं कि 15 साल तक एक ही नेता के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी बिहार की ऐसी हालत क्यों है? अब उसी नेता को दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए वोट क्यों दिया जाए?

मुंबई आ कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी रोजीरोटी के लिए तिलतिल मरते हैं. अगर उन के प्रदेशों में कामधंधा होता, रोजीरोटी का जुगाड़ होता, तो ये लोग अपने प्रदेश से पलायन क्यों करते?

फिल्म कलाकार मनोज बाजपेयी ने अपने रैप सांग ‘मुंबई में का बा…’ में मजदूरों की हालत को बयां किया है.  5 मिनट का यह गाना इतना मशहूर  हुआ कि अब बिहार चुनाव में वहां की जनता सरकार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’.

दरअसल, बिहार में साल 2005 से ले कर साल 2020 तक पूरे 15 साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहे हैं. केवल एक साल के आसपास जीतनराम मां झी मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ पाए थे, वह भी नीतीश कुमार की इच्छा के मुताबिक.

किसी भी प्रदेश के विकास के लिए 15 साल का समय कम नहीं होता. इस के बाद भी बिहार की जनता नीतीश कुमार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’ यानी बिहार में क्या है?

तालाबंदी के दौरान सब से ज्यादा मजदूर मुंबई से पलायन कर के बिहार आए. 40 लाख मजदूर बिहार आए. इन में से सभी मुंबई से नहीं आए, बल्कि कुछ गुजरात, पंजाब और दिल्ली से भी आए.

ये मजदूर यह सोच कर बिहार वापस आए थे कि अब उन के प्रदेश में रोजगार और सम्मान दोनों मिलेंगे. यहां आ कर मजदूरों को लगा कि यहां की हालत खराब है. रोजगार के लिए वापस दूर प्रदेश ही जाना होगा. बिहार में न तो रोजगार की हालत सुधरी और न ही समाज में मजदूरों को मानसम्मान मिला.

बीते 15 सालों में बिहार की  12 करोड़, 40 लाख आबादी वाली जनता भले ही बदहाल हो, पर नेता अमीर होते गए हैं. बिहार में 40 सांसद और 243 विधायक हैं. इन की आमदनी बढ़ती रही है. पिछले 15 सालों में  85 सांसद करोड़पति हो गए और 468 विधायक करोड़पति हो गए.

मनरेगा के तहत बिहार में औसतन एक मजदूर को 35 दिन का काम मिलता है. अगर इस का औसत निकालें तो हर दिन की आमदनी 17 रुपए रोज की बनती है. राज्य में गरीब परिवारों की तादाद बढ़ती जा रही है.

गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों की तादाद तकरीबन 2 करोड़, 85 लाख है. नीतीश कुमार के 15 सालों में गरीबों की तादाद बढ़ी है और नेताओं की आमदनी बढ़ती जा रही है.

जंगलराज या सामाजिक न्याय

मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीतिक और सामाजिक हालत में आमूलचूल बदलाव हुआ. लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय के पुरोधा बन कर उभरे. उन के योगदान को दबाने का काम किया गया.

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साल 1990 से साल 2020 के  30 सालों में बिहार पर दलितपिछड़ा और मुसलिम गठजोड़ राजनीति पर हावी रहा है. अगड़ी जातियों का मकसद है कि  30 सालों में जो उन की अनदेखी हुई, अब वे मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएं.

भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में अगड़ी जातियां काफीकुछ अपने मकसद में कामयाब भी हो गई हैं. बिहार में भाजपा का युवा शक्ति के 2 नेताओं तेजस्वी यादव और चिराग पासवान से सीधा मुकाबला है.

भाजपा के पास बिहार में कोई चेहरा नहीं है, जिस के बल पर वह सीधा चुनाव में जा सके. सुशील कुमार मोदी भाजपा का पुराना चेहरा हो चुके हैं.

विरोधी मानते हैं कि बिहार में लालू प्रसाद यादव के समय जंगलराज था. जंगलराज का नाम ले कर लोगों को डराया जाता है कि लालू के आने से बिहार में जंगलराज की वापसी हो जाएगी.

राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव कहते हैं, ‘मंडल कमीशन के बाद वंचितों को न्याय और उन को बराबरी की जगह दे कर सामाजिक न्याय दिलाने का काम किया गया था. अब आर्थिक न्याय देने की बारी है.

‘जो लोग जंगलराज का नाम ले कर बिहार की छवि खराब कर रहे हैं, वे बिहार के दुश्मन हैं. इन के द्वारा बिहार की छवि खराब करने से यहां पर निवेश नहीं हो रहा. लोग डर रहे हैं. अब हम आर्थिक न्याय दे कर नए बिहार की स्थापना के लिए काम करेंगे.’

वंचितों के नेता

लालू प्रसाद यादव की राजनीति को हमेशा से जातिवादी और भेदभावपूर्ण बता कर खारिज करने की कोशिश की गई. लालू प्रसाद यादव अकेले नेता नहीं हैं, जिन को वंचितों के हक की आवाज उठाने पर सताया गया हो. नेल्सन मंडेला, भीमराव अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जैसे अनगिनत उदाहरण पूरी दुनिया में भरे पड़े हैं.

लालू प्रसाद यादव सामंतियों के दुष्चक्र के शिकार हुए, जिन की वजह से उन का राजनीतिक कैरियर खत्म करने की कोशिश की गई. इस के बाद भी लालू प्रसाद यादव के योगदान से कोई इनकार नहीं किया जा सकता है.

लालू प्रसाद यादव साल 1990 से साल 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. साल 2004 से साल 2009 तक उन्होंने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार यानी संप्रग सरकार में रेल मंत्री के रूप में काम किया.

बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाला मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो अदालत ने 5 साल के कारावास की सजा सुनाई. चारा घोटाला मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें लोकसभा से अयोग्य ठहराया गया.

लालू प्रसाद यादव मंडल विरोधियों के निशाने पर थे. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि साल 1990 में लालू प्रसाद यादव ने राम रथ यात्रा के दौरान समस्तीपुर में लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया.

मंडल विरोधी भले ही लालू प्रसाद यादव के राज को जंगलराज बताते थे, पर सामाजिक मुद्दे के साथसाथ आर्थिक मोरचे पर भी लालू सरकार की तारीफ होती रही है.

90 के दशक में आर्थिक मोरचे पर विश्व बैंक ने लालू प्रसाद यादव के काम की सराहना की. लालू ने शिक्षा नीति में सुधार के लिए साल 1993 में अंगरेजी भाषा की नीति अपनाई और स्कूल के पाठ्यक्रम में एक भाषा के रूप में अंगरेजी को बढ़ावा दिया.

राजनीतिक रूप से लालू प्रसाद यादव के जनाधार में एमवाई यानी मुसलिम और यादव फैक्टर का बड़ा योगदान है. लालू ने इस से कभी इनकार भी नहीं किया है.

साल 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने. उन के कार्यकाल में ही दशकों से घाटे में चल रही रेल सेवा फिर से फायदे में आई.

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भारत के सभी प्रमुख प्रबंधन संस्थानों के साथसाथ दुनियाभर के बिजनैस स्कूलों में लालू प्रसाद यादव के कुशल प्रबंधन से हुआ भारतीय रेलवे का कायाकल्प एक शोध का विषय बन गया.

अगड़ी जातियों की वापसी

राजनीतिक समीक्षक अरविंद जयतिलक कहते हैं, ‘जनता यह मानती है कि राज्य की कानून व्यवस्था अच्छी रहे. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के विरोधियों ने उन की पहचान को जंगलराज से जोड़ कर प्रचारित किया. उन के प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार के राज को सुशासन कहा गया.

‘इसी मुद्दे पर ही नीतीश कुमार हर बार चुनाव जीतते रहे और 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे. लालू प्रसाद यादव ने जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी और जो आर्थिक सुधारों के लिए काम किया, उस की चर्चा कम हुई.

‘लालू प्रसाद यादव की आलोचना में विरोधी कामयाब रहे. बहुत सारे काम करने के बाद भी लालू यादव को जो स्थान मिलना चाहिए था, नहीं मिला.’

बिहार में तकरीबन 20 फीसदी अगड़ी जातियां हैं. पिछड़ी जातियों में 200 के ऊपर अलगअलग बिरादरी हैं. इन में से बहुत कोशिशों के बाद कुछ जातियां ही मुख्यधारा में शामिल हो पाई हैं. बाकी की हालत जस की तस है. इन में से 10 से 15 फीसदी जातियों को ही राजनीतिक हिस्सेदारी मिली है.

1990 के पहले बिहार की राजनीति में कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार प्रभावी रहे हैं. दलितों की हालत भी बुरी है. बिहार की आबादी का 16 फीसदी दलित हैं. अगड़ी जातियों ने दलितों में खेमेबंदी को बढ़ावा देने का काम किया है.

साल 2005 में भाजपा और जद (यू) ने अगड़ी जातियों को सत्ता में वापस लाने का काम किया. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अब नीतीश कुमार को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रही है.

नितीश के सियासी रंग और बिहार का चुनाव

सबसे अधिक छह बार बिहार के मुख्यमंत्री की शपथ लेने वाले नितीश कुमार भारतीय राजनीति मे सत्ता के लिए सबसे अधिक रंग बदलने वाले चेहरे भी हैं. उनके पास सुशासन का तमगा, केवल मंचों से नैतिकता का पाठ पढ़ाने और आश्वासन देने का हुनर भी है. नितीश जब सफेद मुस्लिम टोपी और हरे गमछे मे होते थे तब भी उनके पास सत्ता थी और केसरिया साफे और गमछे के साथ भी सत्ता है. इससे जाहिर है कि वह देश‌ के ऐसे नेता हैं जो सत्ता के लिए कभी भी रंग बदल सकते हैं. जबकि वह खुद आज भी मंचों से सबसे अधिक नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं.

बहुत पीछे जाने की जरूरत नही है.नितीश ने मुस्लिम वोटर्स को रिझाने के लिए ट्रिपल तलाक़ और जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का विरोध किया था. यहां तक कि तीन तलाक और आर्टिकल 370 के मुद्दे पर वोटिंग के दौरान दोनों सदनों से उनकी पार्टी के सांसद वॉकआउट कर गए थे. बिहार विधान सभा मे एनआरसी और एनपीआर लागू न करने का प्रस्ताव पास करवाने वाले नितीश कुमार की पार्टी ने केंद्र में सीएए का समर्थन किया, राज्यसभा और लोकसभा मे उनके सांसदों ने वोट किया. यहां तक की राज्य सभा मे उनके मुस्लिम सांसदों ने भी वोट किया.

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वहीं साल 2010 के नितीश कुमार सब को याद होंगें, जब वह हर कुछ महीनों में केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के पास बिहार के मदरसों के अनुदान का प्रस्ताव भेजते थे. मनमोहन सरकार उसे बार बार नकार देती थी. केंद्र में सत्ता बदली तो यही नितीश केसरिया साफे में आ गये और अपने पुराने प्रस्ताव को भूल गए. आपको ये भी बता दें कि ये वही नितीश हैं जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी का 10 साल से ज्यादा का सत्ता का साथ छोड़ कर अपने धुर विरोधी लालू यादव का, जिनको वह डेढ़ दशक से ज्यादा समय से कोसते आए थे, हाथ थाम लिया था.

यही नही नितीश उन्हें अल्पसंख्यकों और पिछड़ों का सबसे बड़ा मसीहा बताने लगे और भाजपा को सांप्रदायिक बताने लगे थे. बात यहीं खतम नही होती, फिर वही नितीश थे कि अभी सुहाग की मेहंदी सूखी भी नहीं थी कि पाला बदला भाजपा के बगलगीर हो गये और फिर भाजपा के साथ सरकार बना ली. जो दुनिया के प्रजातंत्र में एक अनूठी अनैतिकता कही जा सकती है? राजनीति में नैतिकता के साथ खिलवाड़ का या जनमत के साथ इतना हास्य शायद इससे पहले नहीं हुआ होगा. वैसे पाला बदलने की घटनाएं पिछले छह सालों मे अब देश के कई राज्यों मे हो चुकी हैं. लेकिन वह नितीश कुमार जैसे नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले लोग नही थे.

बिहार विधानमंडल के पिछले सत्र मे विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने अपना भाषण उर्दू में पढ़ा,क्या ये मुसलमानों को पटाने की कवायद नही थी. जबकि भाजपा विधायकों ने इस पर एतराज भी जताया. उसके बाद ही नितीश कुमार ने अजमेर शरीफ चादर भेजी हजरत ख्वाजा गरीब नवाज के मजार पर चढ़ाने के लिए. जबकि उनका उस्र नही था, पर बिहार मे चुनाव की आहट जरूर थी. बिहार की राजनीति मे 17 प्रतिशत मुसलमान चुनावी नतीजे को प्रभावित करते हैं. लालू के बाद बिहार के मुसलमानों के लिए नितीश कुमार ही पसंदीदा चेहरें हैं.

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सत्ता मे आने के बाद उन्होने इस समुदाय को लेकर तमाम घोषणएं भी की थी. लेकिन सथानीय लागों का कहना हे कि अधीकांश धोष्णओं की जमीनी हकीकत आज भी, मंचों और भाषणों तक सीमित है.अलबत्ता कब्रिस्तानों की धेराबंदी के मामले मे बड़े पैमाने पर काम दिखता है. उर्दू शिक्षकों की बहाली का मामला हो,मदरसा शिक्षकों के वेतन, मदरसों के अनुदान का मामला हो, मुस्लिम नौजवानों के रोजगार का मामला हो, शिक्षा और स्वास्थ्य का मामला हो, मुस्लिम क्षेत्रों के अस्पताल और सरकारी स्कूलों का मामला हो या अल्पसंख्यक लोन का मामला हो, पर जदयू सरकार ने अब तक काम ठोस काम नही किया है.

नितीश कुमार कभी मुसलमानों को लाली पाप देते हैं तो कभी दलितों और पिछड़ों को. दरअसल, बिहार में अब तक राजनीति जाति से संचालित होती रही है, यानी वह जाति के लचीले खोल में समाकर ही आकार लेती रही है. लेकिन नितीश कुमार ने यहां भी एक दांव खेला और जाति समूहों और उन समूहों से बनने वाले समीकरण को साधा. जैसे कि लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय का नारा देकर पिछड़ों और दलितों को गोलबंद कर अपनी राजनीति को परवान चढ़ाया था. वहीं नितीश ने सामाजिक न्याय के साथ विकास का नारा दिया.जातीय न्याय के साथ ही आर्थिक न्याय और लैंगिक न्याय के नारें को भी उन्होने उछाला.

महिलाओं को पंचायती चुनाव में आरक्षण देकर, अतिपिछड़ा और महादलित नाम से नए राजनीतिक समूह का गठन कर वे ऐसा करने में सफल हो सके. वहीं मुस्लिम में अशराफ मुस्लिम के मुकाबले पसमांदा समूह को उभारकर भी वे ऐसा करने में कामयाब रहे. दरअसल बिहार में जाति का समीकाण उतना आसान है भी नहीं.ओबीसी में दस जातियां हैं, बात सिर्फ कोईरी, कुरमी, यादव और बनिया पर होकर रह जाती है. दलितों मे करीब दो दर्जन जातियां हैं. मुस्लिमों में ही 42 जातियां हैं.अतिपिछड़ा समूह में तो जातियों की संख्या 120 के पार है.गौरतलब है कि ये वही बिहार है जहां आजादी से पहले जनेऊ आंदोलन हुआ था, यादवों और कुछ अन्य ग़ैर-ब्राह्मण पिछड़ी जातियों ने जनेऊ पहनना शुरू किया. फिर समय ने करवट बदला तो इसी बिहार मे जेपी आंदोलन के वक़्त संपूर्ण क्रांति के लिए हज़ारों लोगों ने पटना के गांधी मैदान में जनेऊ तोड़े भी थे. यानी बिहार मे जाति का गणीत बेहद जटिल है और हर राजनीतिक दल उसे अपने हिसाब से हल करना चाहता है.

दरअसल  लालू-राबड़ी के 15 साल के काल के बाद नितीश कुमार बिहार के लिए उम्मीदों और अरमानों की गठरी ले कर आए थे. वादों की लम्बी फेहरिस्त के साथ और कुछ अच्छा करेंगे जैसे भरोसे के साथ. अगर लालू के 15 साल और नितीश के 15 सालों की तुलना की जाये तो बिहार मे बदलाव तो दिखता है, लेकिन उनके अधिकांश वादे फाइलों मे कैद रह गये. खासकर दलितों और मुस्लिमों से जुड़े मामलों पर वह उतने खरे नही उतरे जितना इन वर्गों को सपना दिखाया गया था.

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कोरोना वायरस के चलते हुए लाकडाउन के दौरान बिहार के प्रवासी मजदूरों और छात्रों को लेकर जिस तरह से सुशासन बाबू ने रूख अपनाया था, उससे सत्ता के पहले वाले नितीश कुमार के मुकाबाले मुख्यमंत्री नितीश कुमार ही एक अकुशल प्रशासक के तौर पर दिखे थे.बहुत तेज़ी से उनकी लोकप्रियता मे कमी आयी है. बिहार मे उनकी साख को बट्टा बहुत तेज़ी से लग रहा है. आपको याद होगा कि नितीश को लोगों ने लालू प्रसाद यादव से ज्यादा सक्षम प्रशासक माना था. लेकिन आज राज्य में भ्रष्टाचार हर स्तर पर है. कानून व्यवास्था का मजाक हर जगह, हर रोज़ उड़ता है. कहा जाता है कि शराबबंदी ने राज्य में पुलिस के लिए कमाई का एक नया रास्ता खोल दिया है.छह साल पहले केंद्र से बेटी बचाओ का नारा खूब जोर से उछला था, लेकिन बिहार मे अक्सर बेटियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं होती है.

इसके बावजूद खाकी के बड़े ओहदेदार राजनीति की आकांक्षा रखते हैं. आईपीएस अफसर सुनील कुमार और पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय ने खाकी से खादी की तरफ रूख कर भी लिया है. यहां भी वही जाति का खेल दिख रहा है. आपको याद होगा कि सुशांत सिंह राजपूत मामले मे तब डीजीपी रहे गुप्तेश्वर पांडेय ने जिस तरह की टिप्पणीयां की थी, इतने बड़े पद पर रहने के दौरान ऐसी टिप्पणीयां सुनने को नही मिलती हैं. राजनीतिक हलकों मे कहा जा रहा है कि नितीश कुमार ने हाल मे दलितों के साथ कुछ कागजी और कुछ असल की जो दरियादिली दिखायी है, कहीं वो सब भारी न पड़ जाये इसलिए बैलेंस करने के लिए  गुप्तेश्वर पांडेय को सवर्ण कार्ड के तौर पर प्रयोग करेगें. वैसे इन चुनावों मे श्री पांडेय को नितीश ने कहीं से उम्मीदवार नही बनाया है. बिहार मे रोजगार की समस्या सारे पुराने आंकड़ों को पार कर गयी है. याद रहे इन में से कई मुद्दों के खिलाफ ही माहौल बना कर नितीश कुमार बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे. आज वो सब कुछ किसी न किसी रूप मे उनके शासन का अंग है.

बिहार में 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव जीतने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाता महत्वपूर्ण हैं. राज्य में एससी/एसटी वोट करीब 16 प्रतिशत से ज्यादा है. यही वजह है कि सभी पार्टियों और गठबंधन की रणनीती के केंद्र में ये वोटबैंक है. कुमार शुरू से दलितों को किसी न किसी रूप मे रिझातें रहें हैं. ये बात अलग है कि चुनावों से ठीक पहले उन्होने दलितों को रिझाने के लिए एक और दांव खेला, कि अनुसूचित जाति-जनजाति के किसी व्यक्ति की हत्या हो जाने पर उसके परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी.

राजनीतिक हलके मे इसे केवल चुनावी ऐलान माना जा रहा है.क्यों कि घोषण मे पिछली हत्यायों का कोई जिक्र नही है. नितीश ने दलितों को 3 डिसमिल जमीन देने का वादा किया गया था जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है. इसी लिए चिराग पासवान जैसे दलित नेताओं ने कहा है कि सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराधियों में क़ानून का भय हो. जिससे भविष्य में न सिर्फ़ दलितों बल्कि किसी भी वर्ग के लोगों की हत्या न हो सके. बहरहाल बिहार की राजनीति में पिछले 15 दिनों में दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है.जो चुनाव अब तक राजग के लिए काफी आसान लग रहा था जिसमें भाजपा आगे नजर आ रही थी लेकिन अब हालात बिल्कुल बदल चुके हैं.

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राजग ने 180 से अधिक सीटें जीतने की बात करनी बंद कर दी है. इसके अलावा, भाजपा ने नितीश कुमार के शासन का बचाव करना शुरू कर दिया है. हालांकि जब चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत हो रही थी तब पार्टी के कई नेताओं ने इसको नजरअंदाज किया था और मांग की थी कि चुनाव के बाद नितीश की जगह भाजपा के किसी और नेता को लाया जाए. भाजपा को डर सताने लग रहा है कि नितीश तो खुद डूबेंगे ही,उसके साथ-साथ भाजपा को भी नुकसान हो सकता है. इस लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा फिर एक बार सामने किया जा रहा है. नितीश और प्रधानमंत्री की संयुक्त रैलियों और सभाओं की रणनीति बन रही है.देखना है कि आने वाले दिनों मे चुनाव कितना और करवट बदलता है, क्योंकि कई छोटे-छोटे राजनीतिक दल भी अपने अंदाज मे ताल ठोंक रहें हैं.

बिहार चुनाव में नौजवान चेहरों ने संभाली कमान

बिहार चुनाव में इस बार नौजवान चेहरों ने धूम मचा रखी है. राजद के तेजस्वी यादव और लोजपा के चिराग पासवान ने तो वर्तमान सत्ता पक्ष की नींद हराम कर दी है. सोशल मीडिया पर नौजवान तबका इस बार के चुनाव में बहुत ज्यादा जोश में है. उम्मीदवारों के साथ नौजवान कार्यकर्ता ज्यादा दिखाई पड़ रहे हैं.

प्लूरल्स पार्टी से इस बार पुष्पम प्रिया चौधरी नौजवान उम्मीदवार हैं. अखबारों में पहले पेज पर इश्तिहार दे कर वे खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी हैं. दिग्गज नेता अपना भविष्य अपने बच्चों में देखने लगे हैं. अपनी राजनीतिक विरासत अपने बच्चों को सौंपने लगे हैं. अपने बच्चों के मोहपाश में फंसे नेता अपने विचार और धारा दोनों भूल कर अपने बच्चों को सियासी गलियारे में उतार चुके हैं.

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पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव की पूरी राजनीति कांग्रेस के खिलाफ रही. वे समाजवादी नेता के रूप में पूरे देश में चर्चित रहे. वे लोकदल, जनता दल से ले कर जद (यू) तक में रहे और कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करते रहे. लेकिन इस बार उन की बेटी सुभाषिनी कांग्रेस का दामन थाम कर बिहारीगंज से चुनाव मैदान में उतर चुकी हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान  का राजनीति में प्रवेश राजग के रास्ते हुआ. राजग के जरीए लोजपा से 2014 और 2019 में चिराग पासवान जमुई से सांसद बने. इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने उसी राजग के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है. जिस विधानसभा क्षेत्र से जद (यू) के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं, चिराग पासवान वहां से लोजपा के उम्मीदवार खड़े कर चुके हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और फिल्म स्टार शत्रुध्न सिन्हा की राजनीति की शुरुआत भाजपा से हुई थी. वे भाजपा के स्टार प्रचारक रहे थे, लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा. उन की पत्नी पूनम सिन्हा 2019 का लोकसभा चुनाव लखनऊ से समाजवादी पार्टी से लड़ी थीं. इस बार उन के बेटे लव सिन्हा बांकीपुर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

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प्लूरल्स पार्टी की प्रमुख पुष्पम प्रिया चौधरी ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. अपनी पार्टी की वे मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हैं. उन्होंने साफ कहा है कि चुनाव के बाद उन का किसी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगा. उन के पिता विनोद कुमार चौधरी जद (यू) के पूर्व विधानपार्षद रहे हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी 2015 में राजग के साथ रहे. उस के बाद वे महागठबंधन में चले गए. उन के बेटे संतोष कुमार सुमन को राजद ने विधानपार्षद बनाया. इस के बाद वे फिर राजग में शामिल हो गए. इस बार जीतन राम मांझी इमामगंज और उन के दामाद देवेंद्र मांझी मखदूमपुर से चुनाव लड़ रहे हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह पूरी उम्र राजद में रहे. वे राजद का प्रमुख चेहरा थे. अब उन के बेटे सत्यप्रकाश सिंह ने जद (यू) का दामन थाम लिया है. पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह हमेशा जद (यू) में रहे. उन के बड़े बेटे इस बार रालोसपा के टिकट पर जमुई से चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि छोटे बेटे सुमित सिंह चकाई से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतर रहे हैं.

राजनीति की मलाई का स्वाद चख चुके नेता और उन के बच्चे इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि राजनीति से अच्छा किसी भी क्षेत्र में स्कोप नहीं है, इसलिए तो नेता अपने बेटाबेटी को जिस भी दल से जैसे भी टिकट मिले, दिला देते हैं और जैसे भी हो चुनाव जिता कर सत्ता सुख का फायदा जिंदगीभर उठाते हैं.

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यही वजह है कि सिद्धांत और अपनी विचारधारा पर अडिग रहने वाले लोग राजनीति की मुख्यधारा से किनारे होते जा रहे हैं.

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