Bihar Elections 2025: नई मतदाता सूची पर उठे सवाल

Bihar Elections 2025: बिहार के चुनावों के लिए तैयार की गई मतदाता सूची में काफी नाम जोड़े गए हैं, काफी हटाए गए हैं. पर लगता है कि अब जो सूची तैयार हुई है वह बहुत गलत नहीं है. अब तो मतदान के दिन पता चलेगा, जब लोग वोट डालने जाएंगे और उन्हें अपना नाम नहीं मिलेगा.

नीतीश कुमार और केंद्र सरकार ने काफी कोशिश की थी कि मतदाता सूचियों में ऐसे बदलाव किए जाएं कि मतदान का फैसला उलटा हो सके. सरकार को मालूम है कि बिहार के लोग अपने हकों के लिए लड़ने वाले नहीं हैं. वे ज्यादातर जमींदारों की गुलामी के आदी रहे हैं और अंगरेजों के आने से पहले भी कभी खड़े नहीं हुए, इसीलिए 1700 के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पैर कोलकाता के सैंटर से उस समय सिर्फ ट्रेड करनेके लिए फैलाने शुरू किए, उन्होंने बिहारी मजदूर और बिहारी सैनिक रखे.

1757 में प्लासी की लड़ाई के बाद अंगरेजों की फौज में 70 फीसदी बिहारी राजपूत और ब्राह्मण हुआ करते थे जिन के बल पर उन्होंने धीरेधीरे पूरे भारत पर कब्जा किया. 1857 के बाद जरूर उन्होंने बिहारी ब्राह्मणों को सेना में रखना कम कर दिया था पर दूसरे गोरे व्यापारी बिहारियों को ही उन की सहने की आदत की वजह से रखते थे.

मौरीशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम में एग्रीमैंट कर के गए भारतीयों में से ज्यादातर यहीं के लोग थे, जिन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा जाता था. जब मुंबई, अहमदाबाद में मिलें लगनी शुरू हुईं तो ढेरों बिहारी गए, क्योंकि वे हुक्म मानने वाले हुआ करते थे.

नीतीश कुमार जो तकरीबन 20 वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री हैं, इसीलिए सत्ता में हैं क्योंकि एक आम बिहारी की तरह वे जो मालिक है उस के साथ हो जाते रहे हैं. लालू प्रसाद यादव ने बिहारियों को हक दिलाने की कोशिश की पर फिर ऊंची जात वालों ने ऐसे फंदे फेंके कि उन्हें अपनी जिंदगी कचहरियों और जेलों में बितानी पड़ी.

मतदाता सूची में से लाखों नाम कट जाते तो वे चूं नहीं करते और इसीलिए ज्ञानेश कुमार जैसे अफसर को चुनाव आयुक्त की तरह लगाया गया जो पूरी तरह सरकार के साथ था.

यह तो राहुल गांधी की न्याय यात्रा और वोट चोरी का इलजाम था कि जो मतदाता सूची अब तैयार हुई है उस पर मोटेतौर पर कोई हंगामा नहीं मच रहा. 14 नवंबर को फैसला चाहे जो भी आए, यह तो दिखता है कि आम बिहारी का वोट का हक पक्का रहेगा. राहुल गांधी ने पूरे देश में वोट की कीमत भी बता दी है और चुनाव आयोग अब कानून की आड़ में खड़ा हो कर कहीं भी वोटों की काटाछांटी नहीं कर सकेगा.

संविधान की खैरियत इसी में है कि लोगों का वोटों का हक जान के जैसा रहे. सरकारें इसे छीनेंगी क्योंकि वे अब नहीं चाहतीं कि डैमोक्रेसी के नाम पर उन पर बंदिशें लगें. अब जो जीतता है वह डोनाल्ड ट्रंप की तरह महामहिम बनना चाहता है जो हर सुबह नए तुगलकी फरमान जारी कर सके. अमेरिका में न सही भारत में लगता है वोट का हक अब छीनना आसान नहीं रह गया है.

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खेलों में हारजीत चलती रहती है पर जिस तरह से भारतपाकिस्तान के 3 मैच एशिया कप में लगभग बराबरी पर खत्म हुए उस से साफ है कि इस मामले में दोनों टीमें एकदूसरे के खिलाफ नहीं, एकदूसरे के साथ लाखों जुआ और सट्टा लगाने वालों के लिए खेल रही थीं. 14 सितंबर को हुए मैच में तो भारत की टीम ढंग से खेली पर 21 सितंबर को केवल डेढ़ ओवर आगे रह कर, फाइनल में केवल 3 बौल आगे रह कर दोनों टीमों ने सट्टेबाजों को करोड़ों नहीं, अरबों का फायदा दिलाया था.

भारत और पाकिस्तान अब सिर्फ क्रिकेट खेलते हैं. वह भी 22 लोगों को खिलाते हैं और बाकी तो जुआ खेलते हैं. इस जुए में कि भारत जीतेगा कि पाकिस्तान जीतेगा, इस बौल में कैच आउट होगा या चौका लगेगा, इस बैट्समैन के 10 रन बनेंगे या 50 पर जबरदस्त शर्तें लगती हैं. लाखों को किक मिलती है जो अच्छे से अच्छे खेल में नहीं मिलती.

टीवी पर मैच देखना भारतीय जनता का सब से बड़ा खेल है. मोबाइल पर रील्स देखने के बाद भारत और पाकिस्तान के युवा कुछ करते हैं तो भारतपाकिस्तान का मैच देखते हैं जो कुंभ की तरह कभीकभार ही होते हैं. एशिया कप के आयोजकों ने सम झ लिया था इसीलिए उन्होंने दोनों को 3-3 बार खिलवाया जो साफ है कि एक स्कीम के हिसाब से हुआ.

सट्टेबाजी हर जगह होती है पर यहां अब खेलों के नाम पर सिर्फ सट्टेबाजी बची है. एथलैटिक्स और कुश्ती में जहां भारतीय खिलाड़ी मैडल ले आते हैं, न दर्शक होते हैं, न मैच फिक्सिंग होती है. सट्टेबाजी का तो सवाल ही नहीं उठता.

इस सट्टेबाजी में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगे हुए थे क्योंकि भारत की टीम के जीतने पर उन्होंने उसे ‘आपरेशन सिंदूर’ से जोड़ते हुए बधाई दे दी. इंटरनैशनल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड असल में वैसे ही भारत सरकार की एक यूनिट है और सारे फैसले भारत को देख कर लिए जाते हैं क्योंकि क्रिकेट में पैसा तो भारत के दर्शक ही देते हैं. टीवी राइट्स अरबों में बिकते हैं क्योंकि विज्ञापन करने वालों को पता है कि भारतीय बदहाल युवा कामधाम छोड़ कर इन्हें जरूर देखेंगे और वहां वे अपना पानमसाला जबरदस्त तरीके से बेचते हैं.

एशिया कप हो, वर्ल्ड कप हो, टी 20 हो, वनडे हो यह तमाशा चलता रहता है क्योंकि यह एक जगह है जहां से पाकिस्तान के बहाने हिंदुस्तान के मुसलमानों को कहने का मौका मिलता है कि दिखा दिया न, तुम्हारी औकात क्या है.

फुटबाल, टैनिस, फील्ड गेम्स, तैराकी, जिमनास्टिक जैसे बीसियों खेलों में भारत व पाकिस्तान की टीमें कहीं नजर नहीं आएंगी. पहले जिस हौकी पर ब्रिटिश इंडिया के समय से कब्जा था वह खेल भी 20-25 साल पहले हाथ से निकल गया क्योंकि वहां फिक्सिंग नहीं होती, सट्टा नहीं लगता. एशिया कप में भारत और पाकिस्तान दोनों की क्रिकेट टीमें जीती हैं, दोनों के खिलाडि़यों ने न जाने कहांकहां कमाया होगा. Bihar Elections 2025

Sex Tips In Hindi: पार्टनर हो कामुक

Sex Tips In Hindi: किसी भी रिलेशनशिप में रजामंदी से फिजिकल होने में कोई बुराई नहीं है और हैल्दी सैक्स रिश्ते को और ज्यादा मजबूत करता है. पर अगर आप का पार्टनर कुछ ज्यादा ही कामुक है यानी उसे हर समय सैक्स की ही सूझती है, तो फिर कभीकभार यह समस्या भी बन जाती है.

काफी समय पहले टैलीविजन पर एक क्राइम शो आया था, जहां एक नौजवान अपनी कामुकता पर कंट्रोल नहीं कर पाता है. वह देह धंधे वालियों के भी पसीने छुड़ा देता है. अपनी कामुकता के चलते वह क्राइम करता है और एक देह धंधे वाली जब पुलिस को बताती है कि एक नौजवान उस के पास आ कर बड़ी देर तक बड़ी बेरहमी से सैक्स करता है, तो पुलिस को सूत्र मिलता है कि हो न हो जो क्राइम हुआ है, वह इसी नौजवान की करतूत है. होता भी यही है.

यह तो एक अपराधी की कामुकता का नमूना है. पर कभीकभार पतिपत्नी और प्रेमीप्रेमिका भी इसी कामुकता के भुक्तभोगी हो जाते हैं. राखी को शादी से पहले नहीं पता था कि उस में कामुकता कूटकूट कर भरी है. सुहागरात पर उस का पति मनोहर भी हैरान रह गया कि किस तरह इस बौराई औरत को संतुष्ट करे.

हालांकि, वह मन ही मन खुश भी हो रहा था कि उसे ऐसी बीवी मिली है, जो बिस्तर पर सिर्फ बिछती नहीं है, बल्कि पूरा मजा लेती है और एक तरह से उस की मर्दानगी को चैलेंज कर के सैक्स लाइफ का लैवल बढ़ा देती है.

पर अगर कोई पार्टनर अपनी कामुकता के चलते हिंसक हो जाता है, तो सैक्स का मजा बिगड़ जाता है.
दिवाकर जब अपनी गलफ्रैंड सीमा के साथ बिस्तर पर होता है, तो अपनी कामुकता को कंट्रोल नहीं कर पाता है.

सीमा को एक ही शिकायत रहती है कि दिवाकर उसे प्यार करने की जगह रौंदने पर उतारू हो जाता है. उसे यहांवहां काटता है, उस के नाजुक अंग को बेहरमी से मसलता है और सैक्स को बड़ा ही पीड़ादायक बना देता है, जबकि दिवाकर के लिए सैक्स का मतलब ही यही है.

तो फिर इस कामुकता पर कंट्रोल कैसे पाया जाए कि दोनों पार्टनर सैक्स सुख को अच्छे से भोग सकें? इन कुछ खास टिप्स को जरूर ध्यान में रखें :

* सब से पहले अपने पार्टनर से खुल कर इस बारे में बात करें. अगर आप के पार्टनर को पता होगा कि आप अपनी कामुकता को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, तो वह कई तरह से इस पर काबू पाने में आप की मदद कर सकती है या कर सकता है.

* अपने कामुक विचारों पर काबू करने की कोशिश करें. अपना ध्यान किसी दूसरी जगह लगाएं और हर समय सैक्स के बारे में सोचने से बचें.

* खुद को खाली न रहने दें. अपने दिनभर के काम को पहले से प्लान कर के रखें. अगर दोनों पार्टनर वर्क फ्रौम होम कर रहे हैं, साथ रहने से कामुकता भड़क सकती है, लिहाजा, औफिस के काम पर ज्यादा फोकस करें. टाइमपास के दूसरे तरीके अपनाएं, जैसे साथ बैठ कर कोई फिल्म देख लें या कोई किताब पढ़ कर उस पर चर्चा करें.

* कामुकता बढ़ाने वाली चीजों से दूर रहें. पोर्न फिल्म न देखें. इस के उलट आप अपनी कसरत पर ध्यान दें. अगर घर पर जिम के उपकरण हैं, तो आप वर्कआउट कर सकते हैं.

* कभीकभार कामुकता इस कदर भारी पड़ जाती है कि बिना प्रोटैक्शन के किया गया सैक्स पार्टनर को प्रैग्नैंट कर सकता है. पर क्या आप परिवार को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं? अगर नहीं, तो ऐसी कामुकता को खुद पर बिलकुल न हावी होने दें.

याद रखिए, रोमांस और प्यार का मतलब सिर्फ सैक्स करना ही नहीं होता है. पार्टनर को और भी बहुत से तरीकों से रि झाया जा सकता है, उस का दिल जीता जा सकता है, तो एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं और कामुकता को दूर भगाएं. Sex Tips In Hindi

Bihar Elections 2025: एससी, एसटी, मुसलिम को नेता नहीं मसीहा चाहिए – पर कैसा?

Bihar Elections 2025, लेखक – शकील प्रेम

बिहार के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों एससी, एसटी और मुसलिम वोटों को जमा करने के लिए हाथपैर मार रही हैं. पर ये समाज जानते हैं कि वे सताए हुए हैं, उन से जम कर भेदभाव होता है, उन्हें कदमकदम पर बेइज्जत किया जाता है, उन के पढ़ने, साथ बैठ कर खाने के हक, रोटीबेटी के संबंध बनाने में हजारों रुकावटें हैं, फिर भी तकरीबन बहुमत में होते हुए भी वे बेबस हैं, बेचारे हैं, गरीब हैं, गंदे घरों में मैला पानी पीते हैं. सिर्फ वोटों के समय उन की पूछ होती है.

एससी व मुसलिम समाज में नेताओं और बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है. नेता तो थोक के भाव में हैं. खुद को मसीहा कहने वाले भी हैं और साहित्य का भी अंबार लगा है, फिर भी यह समाज दलित, गरीब, कमजोर और लाचार बना हुआ है. क्यों?

एससी, एसटी और मुसलिम वर्ग का अगर कोई किसी बड़ी पोस्ट पर पहुंच भी जाए तो उसे या तो मोहरा बन कर रहना होगा वरना उसे बुरी तरह बेइज्जत कर के अलगथलग कर दिया जाएगा.

क्या है असली वजह

दलित समाज, जिसे संवैधानिक तौर पर शैड्यूल कास्ट यानी एससी (अनुसूचित जाति) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, की आबादी तकरीबन 17 फीसदी है. एससी वर्ग को राष्ट्रीय स्तर पर 15 फीसदी संवैधानिक आरक्षण मिला हुआ है. तकरीबन पूरा एससी समाज ही आरक्षण के दायरे में है और यह आरक्षण राजनीति, पढ़ाईलिखाई और सरकारी नौकरियों के लिए दिया गया है. सरकारी शिक्षण संस्थानों जैसे आईआईटी, आईआईएम में एससी वर्ग के लिए 15 फीसदी सीटें आरक्षित हैं.

इस के अलावा स्कौलरशिप, फीस छूट और छात्रावास की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. नौकरियों की बात करें तो केंद्रीय और राज्य सरकार की नौकरियों में 15 फीसदी पद आरक्षित हैं. आर्टिकल 16(4ए) के तहत इन्हें प्रमोशन में भी आरक्षण मिलता है और यह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भी लागू है.

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एससी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित होती हैं. इस आरक्षण के तहत तकरीबन 84 लोकसभा सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं. इन सीटों पर उम्मीदवार एससी वर्ग का होता है, लेकिन वोट सभी मतदाता दे सकते हैं. कुछ और जनरल सीटों पर भी एससी, एसटी, मुसलिम वर्ग के लोग जीत कर आ जाते हैं.

पंचायत स्तर के चुनाव हों या नगरनिगम के चुनाव यहां भी एससी वर्ग के लिए सीटें आरक्षित होती हैं.

ग्रामीण और शहरी विकास योजनाओं में भी आरक्षण के तहत एससी वर्ग को प्राथमिकता दी जाती है.

शिक्षा, राजनीति और नौकरियों में आरक्षण की बदौलत एससी वर्ग के माली और सामाजिक हालात में सुधार हुआ है, लेकिन जातिगत भेदभाव, गरीबी और उत्पीड़न के चलते एससी वर्ग अभी भी हाशिए पर ही है.

पढ़ाईलिखाई, नौकरी और राजनीति में आरक्षण के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में 80 फीसदी से ज्यादा दलित व मुसलिम रहते हैं, जहां वे आज भी भूमिहीन और मजदूर हैं. सन 1991 के उदारीकरण के बाद देश के कुछ दलितों के हालात बेहतर हुए हैं, लेकिन ज्यादातर अभी भी गरीबी रेखा से नीचे ही हैं.

गरीबी सूचकांक 2021 के अनुसार एससी वर्ग में एकतिहाई लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे हैं, वहीं 2023 में हुए बिहार सर्वे में एससी परिवारों में से 43 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं.

कुलमिला कर एससी वर्ग में गरीबी राष्ट्रीय औसत (21 फीसदी) से दोगुनी है. अगर ओबीसी को भी उन के साथ जोड़ लिया जाए, जिन के साथ पुराणों में ब्राह्मणों ने व्यवस्था वहीं कर रखी है जो अब एससीएसटी के साथ होती है, तो गरीब 75-80 फीसदी हो जाएंगे. वर्ण व्यवस्था में उन्हें शूद्र कहा गया है.

राष्ट्रीय साक्षरता दर 80.9 फीसदी है, लेकिन एससी में यह सिर्फ 70 फीसदी के आसपास ही है. एससी लड़कियों में साक्षरता दर मात्र 24.4 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 42.8 फीसदी है. आज भी पैसे की कमी और भेदभाव के चलते प्राइमरी लैवल पर ही 50 फीसदी दलित और मुसलिम बच्चे स्कूल छोड़
देते हैं.

एससी वर्ग के लिए गहरे सवाल

सवाल यह है कि तमाम तरह के संवैधानिक हकों और सरकारी सुविधाओं, अवसरों और प्राथमिकताओं के बावजूद एससी वर्ग मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है, तो कमी किस की है? इस में कोई दो राय नहीं है कि एससी वर्ग के लिए ऊंचे समाज की सोच में सुधार नहीं हुआ है. हर स्तर पर नाइंसाफी, बेईमानी और भेदभाव जारी है, जिस के चलते आज भी इस वर्ग में गरीबी बनी हुई है. लेकिन इस के लिए दूसरों को दोष कब तक दिया जाएगा?

दुनिया के इतिहास में हर जगह कमजोरों को दबाया गया है और आज भी पूरी दुनिया में कमजोरों के साथ अनेक तरह के भेदभाव होते हैं. कहीं कोई मसीहा नहीं आता, बल्कि कमजोरों को खुद से अपनी कमजोरियों को सम झना और उन से जू झ कर निकलना होता है.

मसीहा सिर्फ धर्म के किस्सों में आते हैं. यूरोप के यहूदियों ने सन 150 से ले कर सन 1945 तक हजारों साल तक यूरोप में दमन और उत्पीड़न को झेला, लेकिन उन्होंने दूसरों पर दोष मढ़ने की बजाय खुद की तरक्की के रास्ते तलाशे और आज वे इजरायल में दुनिया की सब से ताकतवर कौम बन कर उभरे हैं.

एससीएसटी के साथ इतिहास में हिंदू राजाओं और बाद में दूसरों के हाथों भी बहुत नाइंसाफी हुई है, जिस की वजह से वे संसाधनों से वंचित रहे, लेकिन सन 1950 में संविधान ने उन्हें मौका दिया. बराबरी का दर्जा दिया, जिस की वजह से इस समाज में मुट्ठीभर नेता पैदा हुए. कुछ बड़े अफसर भी बने. कहींकहीं उद्योगपति भी उभरे, फिर भी ज्यादातर समाज वहीं का वहीं रहा.

आजादी के बाद से देश की संसद में एससी वर्ग के कम से कम 84 सांसद बैठे होते हैं. दलितों की आबादी के अनुपात के हिसाब से संसद में बराबर की नुमाइंदगी होते हुए भी कैसा रोना? राजनीतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद एससी वर्ग कमजोर क्यों है? इस सवाल पर इस वर्ग को सोचविचार जरूर करना चाहिए.

पढ़ाईलिखाई पाने के मौके में इस पूरी आबादी को रिजर्वेशन मिला है. उन के दरवाजे हर सरकारी स्कूल के लिए खुले हैं. इस के बावजूद यह समाज सब से ज्यादा अंगूठाछाप क्यों है? इस समाज के पढ़ेलिखे लोग क्या कर रहे हैं? क्या पढ़ेलिखे और अमीर लोगों की अपने समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? जो आगे बढ़ चुके हैं, वे दूसरों के लिए सीढि़यां क्यों नहीं बना रहे हैं और उन्हें गहरे गड्ढे से निकाल क्यों नहीं रहे हैं? वे क्यों नहीं भेदभाव की खाई पाट पा रहे हैं?

विचार जरूरी है

विचारों से दुनिया बदलती है. विचारों की ताकत से हालात बदले जा सकते हैं, लेकिन एससी वर्ग ने विचारों को अहमियत ही नहीं दी. विचारों का मतलब तक जानने की कोशिश नहीं की. वे व्यक्तिपूजा में लग गए. उन्हें लगा कि ऊंची जातियों की तरह वे भी किसी बुत को पूज कर अपना भाग्य सुधार लेंगे.

विचारों से ही तरक्की होती है, लेकिन तरक्की के विचार जिस समाज में पैदा ही न हों, उस समाज में कितने ही मसीहा जन्म लें, तरक्की नहीं हो सकती.

एससी समाज में डाक्टर भीमराव अंबेडकर पैदा हुए, जिन के नाम पर हजारों संगठन बने. इन संगठनों से निकल कर हजारों नेता पैदा हुए जिन्होंने डाक्टर अंबेडकर की पूजा करवानी शुरू कर दी, लेकिन इन नेताओं ने समाज को स्कूली पढ़ाईलिखाई भी पाने का फायदा नहीं सम झाया. पढ़ाईलिखाई से अच्छी समझ पैदा होती है. सम झ सही हो तो समाज यकीनन तरक्की करता है.

इस वर्ग के कुछ लोग पढ़ेलिखे जरूर, लेकिन वे समाज से कट गए. जो नेता बने उन्होंने अपने फायदे की खातिर समाज का फायदा उठाया और जमीन से इतने ऊपर उठ गए कि समाज से ही गायब हो गए. बाकी का समाज किसी मसीहा के इंतजार में वहीं का वहीं पड़ा है. उलटे वह जुल्म करने वाले ऊंचों की चाटुकारिता ज्यादा जोर से कर रहा है.

कैसा मसीहा चाहिए

मसीहा कोई एक इनसान नहीं होता, बल्कि मसीहा हर वह इनसान होता है जो हालात को बदल देता है. अगर कोई अनपढ़ है, लेकिन उस ने अपने बच्चों को केवल पढ़ायालिखाया ही नहीं, बल्कि सम झदार और होशियार भी बना दिया है, तो वह अपने बच्चों के लिए मसीहा ही है. अगर कोई गरीब है और अपनी मेहनत से संसाधन जुटा लेता है तो वह अपने परिवार के लिए मसीहा ही है. अगर कोई पढ़ालिखा इनसान अपने समाज के बच्चों को पढ़ाता है, हुनरमंद बनाता है तो वह उस समाज के लिए मसीहा ही है.

जिस इनसान को अपने समाज के दर्द से मतलब नहीं, वह पढ़ालिखा होते हुए भी गंवार ही होता है. और जो अनपढ़ होते हुए भी अपने समाज की चिंता करे वही सम झदार कहलाता है. एससी वर्ग में कितने तथाकथित मसीहा आए और गए, लेकिन समाज वहीं का वहीं रहा.

यहूदियों में कोई मसीहा नहीं पैदा हुआ फिर भी वे आज सब से ताकतवर कौम बन कर उभरे हैं. इस की वजह यह है कि यहूदियों ने किसी मसीहा का इंतजार नहीं किया, बल्कि हर यहूदी अपनेआप में मसीहा बना. यहूदियों ने पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झा और बुरे हालात में भी इस से सम झौता नहीं किया.

ब्राह्मण समाज आज सब से अमीर है. क्या ऐसा करने में उस के किसी मसीहा का नाम मालूम है? किसी नेता का क्या योगदान रहा है उन के आज हर जगह सत्ता में रहने का? पारसियों के बीच कितने मसीहा पैदा हुए?

पारसियों को कभी किसी मसीहा की जरूरत ही नहीं पड़ी. हर पारसी अपनेआप में मसीहा है, क्योंकि वह पढ़ालिखा है. जो गरीब है, कमजोर है, उसे ही मसीहा की जरूरत होती है. लेकिन ऐसा कोई मसीहा जो आप के हालात बदल दे, कभी आता ही नहीं.

पढ़ाई से बदलेंगे हालात

डाक्टर भीमराव अंबेडकर बहुत महान थे, इस बात से आज के अनपढ़ एससी को क्या फायदा मिल सकता है? लेकिन डाक्टर अंबेडकर ने किन विकट हालात से जू झ कर पढ़ाईलिखाई हासिल की इस बात को सम झने से एससी वर्ग के हालात बदल सकते हैं. डाक्टर अंबेडकर ने तब मेहनत की जब एससी वर्ग का कोई संघ या पार्टी नहीं थी, कोई रिजर्वेशन भी नहीं था.

पढ़ाईलिखाई अपनेआप में एक बहुत बड़ी ताकत है. जिस समाज ने इस की अहमियत को सम झा वह समाज कभी भी कमजोर नहीं रहा. एससी वर्ग की बदहाली की वजह पढ़ाईलिखाई से उस की दूरी है.

सामाजिक भेदभाव एक समस्या है, रुकावट नहीं. यह बहाना कब तक ढोया जाएगा?

एससी समाज के पढ़ेलिखे लोगों को अपनी जिम्मेदारियां तय करनी होंगी. उन्हें समाज के लिए मसीहा बनना होगा. समाज का एक टीचर चाहे तो अपने समाज से हजारों टीचर पैदा कर सकता है. एक पढ़ालिखा इनसान हजारों अफसर पैदा कर सकता है, लेकिन एससी वर्ग के पढ़ेलिखे लोग कहां सोए हुए हैं?

ऐजूकेशन ही कामयाबी की कुंजी है. एससी वर्ग के प्रति समाज की सोच कैसी भी हो, यह आप को पढ़नेलिखने से नहीं रोक सकती. तमाम विरोधाभासों के बावजूद एससी वर्ग के लिए हायर ऐजूकेशन तक के रास्ते खुले हुए हैं, फिर बहानेबाजी क्यों?

संस्थागत भेदभाव का शिकार हुए रोहित वेमुला हायर ऐजूकेशन में सताए जाने का उदाहरण हैं, तो जज, वैज्ञानिक और तमाम आईएएसआईपीएस के भी उदाहरण हैं, जो दलित समाज से निकले हैं.

याद रखिए कि जो जितना कमजोर होता है, उस के लिए जद्दोजेहद उतनी ही बड़ी होता है. अगर वंचित समाज को अपनी कमजोरियों से बाहर निकलना है, तो उसे अपनी जद्दोजेहद तेज करनी होगी.

पढ़ाईलिखाई का मतलब सिर्फ स्कूलकालेज में पढ़ना नहीं है, बल्कि इस का मतलब है दूसरों की कही या लिखी बात जिंदगीभर पढ़ते रहना, लगातार लिखते रहना है. अपने मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए हर समय जूझना है. एससी, एसटी और मुसलिम धर्म के चक्करों में डाल दिए गए हैं और वे उन्हीं बातों के लिए दूसरों के सिर फोड़ रहे हैं, जिन से उन्हें जंजीरें पहनाई जाती हैं.

अपनी पहचान बनाने के लिए कोई देखादेखी खास रंग का गमछापट्टा पहन रहा है, कोई टोपी लगा रहा है. उन के नेता यही सम झा रहे हैं और खुद अपनी रोटी, मकान, गाड़ी और रुतबे का इंतजाम कर रहे हैं.

मसीहा कोई हाड़मांस का जना नहीं हो सकता. आज तक कभी कोई ऐसा जना नहीं हुआ, जिस ने देश और समाज को बदल डाला हो. गांधी, अंबेडकर, नेहरू मसीहा नहीं थे. तिलक, गोखले, गोलवलकर भी ऊंचों के मसीहा नहीं थे. ऊंचों ने पिछले 50 साल में साइंस का फायदा उठा कर बिना मसीहा के पढ़ कर, समझ कर फायदा उठाया है.

आज बिहार में नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत कुमार एससी, एसटी और मुसलिम वर्ग को जीत कर भी कुछ नहीं दे पाएंगे, क्योंकि इन वर्गों को पानी का गिलास भर कर खुद ही पीना होगा.

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि बुरी दशा से निकलने के लिए समाज बदलो, सरकार का ढांचा बदलो और उस के लिए वर्ग संघर्ष करो. मार्क्सवादी नजरिया मसीहा की जरूरत को सिरे से नकारता है.

कार्ल मार्क्स के मुताबिक, सामाजिक बदलाव किसी एक जने की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रोडक्शन के साधनों, उन की मिल्कियत में बदलाव और वर्ग संघर्ष जैसी जमीनी व धन के रखने के तरीकों से होता है.

किसी राहुल गांधी, तेजस्वी यादव या प्रशांत किशोर के कहने या किसी मां के मंदिर के बनाने से जो गरीब है, कुचला है, वंचित है, बीमार है, भूखा है, अपनी हालत सुधार नहीं सकता, उसे तो पढ़ कर, सम झ कर संघर्ष कर के बढ़ना होगा. समाज की तरक्की के लिए, ‘मसीहा’ की नहीं, बल्कि एक बड़े वर्ग में जागरूकता और क्रांतिकारी सामूहिक कार्रवाई की जरूरत होती है, जो कांवड़ यात्रा में नाचने या बैनर लगाने से नहीं आती.

बिहार चुनाव में वोट देते समय खयाल रहे कि कौन पढ़ने का मौका देगा और कौन हकों और मौकों पर डाका डालने के लिए बैठा है. एससी, एसटी और मुसलिम के लिए मसीहा किताबें हैं, पत्रिकाएं हैं, वे टीवी चैनल हैं जो न तो बिकाऊ हैं और न ही मदारी का खेल खिला रहे हैं. आगे बढ़ना है तो ऐसे अखबार खरीदें जो आप को बेचे नहीं, बल्कि बनाएं.

पश्चिम के एक विचारक हेनरी वार्ड बीचर ने कहा, ‘‘एक अच्छा अखबार या पत्रिका लोगों के लिए अनगिनत लाखों सोने से भी बड़ा खजाना है. आप इस खजाने को लुटने न दें.’’

अमेरिका के शुरुआती सालों में तब के राष्ट्रपति थौमस जैफरसन ने कहा था, ‘‘अगर मु झे यह तय करना होता कि हमें बिना अखबारों, पत्रिकाओं और किताबों के सरकार चाहिए या बिना सरकार के अखबार, पत्रिकाएं, किताबें तो मैं बाद वालों को चुनने में एक पल का भी संकोच नहीं करता.’’

क्या दलित अखबार, पत्रिकाएं पढ़ रहे हैं? आप रील देखने में लगे हैं, पौराणिक कथाओं को दोहराने वाले अखबारों और चैनलों को देखने में लगे हैं या अपनी सम झ का दायरा बढ़ाने वाली बात जानने, सुनने, पढ़ने में, इस का फैसला आप को करना है.

एससी, एसटी और मुसलिम का मसीहा नवंबर में वोटिंग मशीन से नहीं निकलने वाला, बल्कि उस के बारे में तो अंगरेजी लेखक चार्ल्स डिकेंस 150 साल पहले कह गया है कि अखबारों और किताबों को पढ़ने की आदत से एक कौशल का विकास होता है. अखबार, पत्रिकाएं और किताबें पढ़ने की आदत आप को भाषा, लेखन और ताजा जलते मुद्दों पर पूरी गहराई से सही सम झ देती है, जो सरकार को सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करने के लिए जरूरी है और व्यावसायिक तरक्की में मददगार है.

याद रहे कि मसीहा सफेद चोगा पहने गलीगली नहीं घूमते, बल्कि वे आपके दिमाग में, मन में, दिल में पैदा होते हैं.

नहीं निकले काबिल नेता

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति में दलित समाज से कई नेता उभरे लेकिन वे दलितों के फायदे के लिए कोई क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए. आजादी के बाद दलित समाज से जो भी नेता हुए वे आगे चल कर अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर रह गए. ज्यादातर दलित नेताओं ने दलितों के उत्थान के नाम पर दलित वोटों को बेचने का ही काम किया.

यही हाल मुसलिमों का भी रहा. मुसलिम समाज के बीच से नेता तो कई उभरे लेकिन वे किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के दलाल की भूमिका में ही रहे. मुसलिम नेताओं से मुसलिम समाज को कोई फायदा नहीं हुआ. मुसलिमों के फायदे की राजनीति करने की आड़ में इन मुसलिम नेताओं ने अपना और अपनी पार्टी का ही भला किया.

यही वजह है कि आज की राजनीति में दलितों और मुसलिमों का कोई सर्वमान्य नेता नजर नहीं आता. आज की राजनीति में दलितों के बड़े नेताओं में मायावती, चंद्रशेखर रावण, रामदास अठावले, चिराग पासवान, जीतनराम मां झी जैसे लोग ही नजर आते हैं, जिन के लिए विचारधारा की कोई कीमत नहीं रह गई है.

मायावती सिर्फ जाटवों की नेता बन कर रह गई हैं. चिराग पासवान दुसाध जाति के नेता हैं. चंद्रशेखर रावण भी दलितों की कुछ जातियों के नेता हैं और जीतनराम मां झी मुसहर समाज के नेता हैं. इस से ज्यादा इन नेताओं की कोई पहचान नहीं रह गई है.

मेनस्ट्रीम मीडिया के बंद दरवाजे

मीडिया में नुमाइंदगी नहीं होने के चलते दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की असली समस्याएं कभी हाईलाइट ही नहीं हो पातीं. गरीबी, बेरोजगारी का दंश झेलते इन तीनों समाजों का जम कर शोषण होता है, अत्याचार होते हैं, लेकिन इन की यह त्रासदी कभी भी मेनस्ट्रीम मीडिया तक नहीं पहुंच पाती.

मुख्यधारा की मीडिया में दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की भागीदारी बिलकुल जीरो है. ये तीनों वर्ग न्यूजरूम, कवरेज, एंकरिंग और नेतृत्व वाले पदों से कोसों दूर खड़े हैं.

औक्सफैम इंडिया और न्यूजलौन्ड्री की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया में केवल ऊंची जातियों का ऐसा दबदबा है कि ये तकरीबन 86-90 फीसदी पदों पर काबिज हैं. इन तीनों वर्गों का लेखन, रिपोर्टिंग, एंकरिंग में भागीदारी जीरो है. एक भी दलित, मुसलिम या आदिवासी मेन स्ट्रीम के किसी भी मीडिया ग्रुप का हैड नहीं है.

यही वजह है कि इन तबकों से जुड़े मुद्दों को ले कर अंगरेजी अखबारों में 5 फीसदी से कम लेख छपते हैं, तो हिंदी अखबारों में महज 10 फीसदी ही छपते हैं.

मीडिया के 121 प्रमुख पदों में से 106 पदों पर ऊंची जाति के लोग बैठे हैं और यहां एससी, एसटी, ओबीसी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.

एनडीटीवी, आजतक, जी न्यूज आदि में एससी, एसटी एंकर एक भी नहीं है. 972 प्रमुख पत्रिकाओं में से केवल 10 पत्रिकाओं की कवर स्टोरी ही दलित और आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित होती हैं.

यह एससी, एसटी और मुसलिम की अपनी जिम्मेदारी है कि वे इन चैनलों, अखबारों, पत्रिकाओं का त्याग करें और अपने मतलब के मीडिया को सपोर्ट करें.

यह देखने की बात है कि अंगरेजी की किताबें बेचने वाली दुकानें तो खुली हुई हैं, पर हिंदी में जहां एससी, एसटी और मुसलिम के मतलब की किताबें हो सकती हैं, बंद हो चुकी हैं, क्योंकि अत्याचारों का रोना रोने वाले ये वर्ग अपने मुद्दों के बारे में भी जानने की कोशिश नहीं कर रहे.

बिना नायक की वंचित आबादी

भारत में दलितों की आबादी तकरीबन 24 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 17 फीसदी है. आदिवासी समाज कुल आबादी का 9 फीसदी हैं यानी तकरीबन 11 करोड़. वहीं मुसलिमों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी यानी 20 करोड़ के आसपास है.

दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज की हालत तकरीबन एकजैसी ही है. अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को सच मानें तो ज्यादातर मुसलिमों के हालात दलितों से भी बदतर हैं. दलितों, मुसलिमों और आदिवासियों की कुल आबादी को जोड़ दिया जाए तो देश की आबादी में इन तीनों समाजों का अनुपात तकरीबन 40 फीसदी हो जाता है. इस में ईसाई, सिख, बौद्ध और दूसरे अल्पसंख्यक समाजों को भी जोड़ लिया जाए तो यह फीसद 50 के पार पहुंच जाएगा लेकिन विडंबना यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में देश की यह आधी आबादी पूरी तरह सत्ता विहीन नजर आती है.

40 फीसदी आबादी होने के बावजूद मुसलिम, दलित और आदिवासी तो पूरी तरह हाशिए पर हैं. नेता नहीं, मीडिया नहीं, उद्योगपति नहीं, लेखक नहीं और कोई नायक नहीं.

बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय की बातें करने वाले नेताओं का लंबा इतिहास रहा है. बाबू जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर, बाबू जगदेव प्रसाद और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई.

आज की राजनीति की बात करें तो सामाजिक न्याय की बातें तो नीतीश कुमार भी करते हैं, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन के बाद नीतीश कुमार के लिए सामाजिक न्याय पीछे छूट गया है. 2023 के बिहार जाति सर्वे के अनुसार बिहार की कुल आबादी में दलितों की आबादी 20 फीसदी है और पासवान जाति की कुल आबादी बिहार की कुल आबादी का 5.3 फीसदी है. इस तरह अकेले पासवान समाज ही दलितों का तकरीबन 27 फीसदी हैं और बिहार में पासवान वोटों का बड़ा हिस्सा चिराग पासवान को जाता है.

लोजपा के राजग में होने के चलते इस का फायदा सीधे भाजपा को मिलता है. यही वजह है कि पासवान जाति से इतर की तमाम दलित जातियों पर हर नेता की नजर है और वे दलितों को आकर्षित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते, पर उन के साथ हो रही सामाजिक या सरकारी बेईमानी, बेइज्जती, लूट के बारे में सब चुप हैं. यह कोई नेता नहीं करेगा. यह तो इन एससी, एसटी और मुसलिम वर्गों को अपने बलबूते पर, अपनी जागरूकता से कराना होगा. पर क्या पितापुत्र पासवानों ने एससी के इस वर्ग को हाथ पकड़ कर ऊपर खींचने के लिए कुछ किया? वे तो सत्ता में मजे लेने में लगे रहे. Bihar Elections 2025

Superstition Crime: अंधविश्वास की आड़ में हत्या

Superstition Crime, लेखक –  वीरेंद्र कुमार खत्री

पढ़ाईलिखाई के प्रचारप्रसार के बावजूद हमारा समाज आज भी अंधविश्वास जैसी बुराई से उबर नहीं पाया है. इस की आड़ में हत्याएं हो रही हैं.

बिहार के नवादा जिले में एक शर्मनाक घटना घटी. डायन के आरोप में भीड़ ने पहले तो एक पतिपत्नी का मुंडन किया, उन पर चूना लगा कर गांवभर में घुमाया और फिर पेड़ से बांध कर बुरी तरह से मारपीट की, जिस में पति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई.

मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि मुसहरी टोला में मारे गए उस आदमी के पड़ोसी के घर छठीयारी समारोह मनाया जा रहा था, जिस में डीजे बारबार बंद हो रहा था.

लोगों ने इसे जादूटोना कर दिए जाने का आरोप लगा कर पीडि़त पतिपत्नी को घर से बाहर निकाला और मारपीट की.

गौर करें तो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब जादूटोना करने के आरोप में लोगों को मौत की नींद सुलाने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हैं. आएदिन इस तरह की खबरें समाज के सामने आती रहती हैं.

दूसरी घटना यह सामने आई कि एक ओ झा के कहने पर औलाद की चाहत में एक बुजुर्ग का सिर काट कर धड़ को होलिका दहन में जला कर बलि दे दी और सिर को तालाब में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया.

यह घटना बिहार के औरंगाबाद जिले के मदनपुर थाना के जलवन गांव की है. इस साल होली से पहले होलिका दहन की जगह से जो हड्डियां पुलिस ने बरामद कीं, उन की जांच में बुजुर्ग की हड्डियां होने की तसदीक हुई.

इस से पहले झारखंड के गुमला के एक गांव में डायन आरोप लगा कर 4 लोगों की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. खबरों के मुताबिक, गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से पहले बैठक कर उन्हें मार डालने का फैसला लिया और फिर 1-1 कर चारों को घर से निकाल कर लाठीडंडे से पीटपीट कर मार डाला.

पिछले साल झारखंड की राजधानी रांची के निकट एक गांव की 5 औरतों की डायन के शक में हत्या कर दी गई थी. झारखंड में ही एक 80 साल की बूढ़ी औरत को डायन बता उस के भतीजे ने मार दिया था.

हत्यारे का मानना था कि उस के बेटे की बीमारी के लिए वह बूढ़ी औरत ही जिम्मेदार थी.

बिहार और झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की हैवानियत देखने को मिलती रहती है. पिछले साल उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में डायन होने के शक में एक औरत की जीभ काट दी गई.

अंधविश्वास की ज्यादातर निर्मम घटनाएं उन्हीं राज्यों में देखी जा रही हैं जहां तालीम पूरी तरह पहुंच नहीं सकी है. अमूमन इन इलाकों में रहने वाले लोग अभी भी पढ़ाईलिखाई के मामले में पिछड़े हैं. वे अपनी बीमारी की मूल वजह सम झने के बजाय इसे भूतप्रेत और डायन का असर मान रहे हैं. इस का बुरा नतीजा यह है कि डायन की आड़ में घटनाएं घट रही हैं.

आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की ही बात करें तो यहां अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं और उस का सब से ज्यादा खमियाजा औरतों को भुगतना पड़ रहा है.

एक गैरसरकारी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश में तकरीबन हर साल सैकड़ों से ज्यादा औरतों की हत्या डायन के नाम पर होती है. पिछले डेढ़ दशक में देश में डायन के नाम पर तकरीबन 2,000 से भी ज्यादा औरतों की हत्या हो चुकी है.

देखा जाए तो दिल दहलाने वाली ये घटनाएं मामूली नहीं हैं. जहां एक ओर देश में औरतें पंचायतों में अहम सहभागी बन रही हैं, नई बुलंदियों को चूम रही हैं और संसद में भी अपना लोहा मनवा रही हैं, वहीं डायन के नाम पर उन की बेरहमी से हत्या हो रही है. समाज के ठेकेदार डायन के नाम पर उन्हें बिना कपड़ों के घुमा रहे हैं और रेप कर रहे हैं.

समाज में फैली इन कुरीतियों और अंधविश्वासों के खिलाफ जनजागरण चलाने की जरूरत है. साथ ही, इन घटनाओं को अंजाम देने वालों को भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए. समाज में ऐसे लोगों को रहने का हक नहीं है, जो अपना मतलब साधने के लिए अंधविश्वासों को बढ़ावा दे रहे हैं.

देश के लोगों को सम झना होगा कि अंधविश्वास को खत्म करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं है. इसे उखाड़ फेंकने के लिए समाज को भी आगे आना होगा.

उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी, जहां ऐसी घटनाएं बारबार हो रही हैं. उन वजहों को भी तलाशना होगा, जिन के चलते इन घटनाओं को बढ़ावा मिल रहा है.

हसपुरा के समाजसेवी डाक्टर विपिन कुमार का कहना है कि कम पढ़ेलिखे लोग अकसर गंभीर बीमारियों से निबटने के लिए अस्पतालों में जाने के बजाय तांत्रिकों की शरण लेते हैं. तांत्रिक उन के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उन्हें लूटते तो हैं ही, उन्हें अपराध करने के लिए भी उकसाते हैं.

बेहतर होगा कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं पिछड़े और सुविधाहीन क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें. इस से अफवाहों और अप्रिय घटनाओं पर रोक लगेगी और समाज अंधविश्वास से छुटकारा पा लेगा.

सब से जरूरी बात यह है कि ऐसी वारदातों को अंजाम देने वालों को कानून कड़ी से कड़ी सजा दे. Superstition Crime

Best Hindi Kahani: खिल उठी कलियां

Best Hindi Kahani: हवाईजहाज के पहिए से दिल्ली आया काबुल का किशोर अफगानिस्तान से एक 13 साल का किशोर हवाईजहाज के व्हील वैल (हवाईजहाज के पहिए की जगह) में छिप कर काबुल से दिल्ली पहुंच गया. जब उस किशोर से पूछताछ की गई, तो उस ने बताया कि वह अफगानिस्तान का रहने वाला है और गलती से भारत आने वाली फ्लाइट में चढ़ गया था, जबकि उसे ईरान जाना था. काबुल एयरपोर्ट पर वह मुसाफिरों की गाड़ी के पीछेपीछे अंदर घुस गया था और फिर हवाईजहाज के व्हील वैल में छिप गया था. सफर के दौरान पहिए के अंदर जाने के बाद दरवाजा बंद हो गया और वह उसी में चिपका रहा. यह बेवकूफी पर हिम्मत का काम है, क्योंकि जिस ऊंचाई पर हवाईजहाज उड़ता है, वहां बेहद ठंड होती है और औक्सीजन न के बराबर होती है

‘‘आप चाहें मु झ से कुछ भी कहें, लेकिन अब मैं दोबारा किसी कीमत पर काशान से निकाह नहीं करूंगी. उस ने मेरी जिंदगी जहन्नुम बना दी और आप बोल रही हैं कि मैं काशान से निकाह कर के अपनेआप को दोबारा उसी कैदखाने में कैद कर लूं? घुटन होती है मु झे वहां… आप लोग सम झते क्यों नहीं?’’ हिना बारबार अपनी अम्मी को सम झा रही थी, लेकिन वे किसी भी कीमत पर हिना का निकाह दोबारा काशान से ही करवाना चाहती थीं.

‘‘बेटी, तुम क्यों नहीं सम झ रही हो… काशान के अब्बू रफीक मियां ने खुद हमारे यहां आ कर माफी मांगी है. वे चाहते हैं कि तुम दोबारा उन के घर की बहू बनो,’’ हिना की अम्मी अमीना उसे प्यार से सम झाते हुए बोलीं.

‘‘चलिए ठीक है, मैं काशान से दोबारा निकाह करने के लिए तैयार हूं, मगर मैं किसी भी कीमत पर हलाला नहीं करूंगी. क्या बिना हलाला के रफीक मियां मेरा निकाह काशान से करवाएंगे?’’ हिना ने गुस्से से अपनी अम्मी से कहा.

‘‘हिना, तुम अच्छी तरह से जानती हो कि शरीयत में अगर शौहर गुस्से में आ कर अपनी बीवी को तलाक ए बिद्दत दे देता हैं और वह दोबारा उसी लड़की निकाह करना चाहता है, तो उस की बीवी को हलाला जैसी रस्म से गुजरना ही पड़ेगा… और फिर आसिफ तुम्हारा देवर भी लगता है. तुम उसे बचपन से जानती हो.

उस से चुपचाप तुम्हारा निकाह करवा दिया जाएगा और अगले दिन आसिफ तुम्हें तलाक दे देगा और तुम्हारा काशान से दोबारा हो जाएगा,’’ हिना की अम्मी अमीना ने शरीयत का हवाला देते हुए हिना को सम झाया.

‘‘तो क्या शौहर गलती करे और सजा केवल उस की बीवी को ही मिले? क्या औरत की कोई इज्जत और उस का वजूद नहीं होता है? जब जी चाहा अपना लिया और जब जी चाहा जिंदगी से निकाल कर फेंक दिया?’’ हिना रोते हुए बोली.

हिना की बात सुन कर अमीना चुपचाप कमरे से बाहर आ गईं.

हिना को सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. जिस को वह बेइंतहा मुहब्बत करती थी आज उसी के साथ उस का हलाला करवाने की बात की जा रही है. उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह आसिफ को एक बार फिर एक बड़ा जख्म देने की तैयारी कर रही है.

हिना को उस के शौहर काशान ने तलाक दे दिया था और उस के इद्दत के दिन पूरे हो गए थे, इसलिए उस की अम्मी और अब्बू उसे दोबारा काशान से निकाह करने के लिए बोल रहे थे, लेकिन वह किसी कीमत पर काशान से निकाह नहीं करना चाहती थी.

काश, हिना ने उस वक्त आवाज उठाई होती, जब आसिफ से उस की शादी न कर के काशान से करवाने की बात कही गई थी, तो आज उस की जिंदगी खराब नहीं होती.

यह सोचते ही हिना को ऐसा महसूस होने लगा था कि उस के जख्म एक बार फिर हरे हो गए हैं और उन में से टीस उठने लगी है.

कितनी मुहब्बत करते थे वे दोनों. आसिफ हिना के पड़ोस में ही रहता था. बचपन में वह और आसिफ साथ ही खेला करते थे. जब वह पढ़ाई करती थी, तो अकसर आसिफ से सवाल के जवाब पूछने पहुंच जाती थी.

पढ़तेपढ़ाते वे दोनों कब जवानी की दहलीज पर पहुंच गए, उन्हें इस का पता ही नहीं चला… यही नहीं, वे दोनों एकदूसरे से मुहब्बत भी करने लगे थे और यह बात किसी से छिपी हुई नहीं थी. 1-2 बार हिना के अब्बू ने खुद ही कहा था कि वे उस की शादी आसिफ से ही करवाएंगे.

सबकुछ ठीक ही चल रहा था. आसिफ अपने अब्बू के साथ कपड़े की दुकान पर ही बैठता था और साथ ही वह पढ़ाई भी कर रहा था. इसी बीच आसिफ के अब्बू बीमार पड़ गए. उन का काफी इलाज करवाया गया, लेकिन वे बच नहीं पाए.

आसिफ को अपने अब्बू के इलाज में काफी पैसे खर्च करने पड़ गए, जिस की वजह से दुकानदारी गड़बड़ा गई और घर के हालात खराब हो गए.

उस वक्त हिना ने खुद आसिफ का हौसला बढ़ाया था, जिस के चलते आसिफ की हिम्मत नहीं टूटी. उस ने पढ़ाई छोड़ कर दुकान पर बैठना शुरू कर दिया था. बेहतर क्वालिटी का सामान और पढ़ालिखा होने से उस की दुकान फिर चल निकली.

पैसे की कमी देखते हुए हिना ने आसिफ को बैंक से लोन लेने का सु झाव दिया. आसिफ ने भागदौड़ कर के बैंक से दुकान के लिए लोन ले लिया था. उसी से दुकान का काम भी अच्छा चल निकला.

उधर हिना के अब्बू ने उस का रिश्ता ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. हिना को जब इस बात का पता चला, तो उस ने आसिफ से उस के घर पर अपनी अम्मी के जरीए रिश्ता भेजने के लिए बोल दिया.

आसिफ की अम्मी जब रिश्ता ले कर घर आईं, तो हिना बहुत खुश थी और वह आसिफ के साथ शादी के सपनों में खो गई. लेकिन हिना के अब्बू ने साफ मना करते हुए कह दिया, ‘‘हम अपनी बेटी की शादी किसी बड़े घर में करेंगे, जहां पर वह रानी बन कर रहेगी. तुम्हारे घर में तो उसे ढंग का कपड़ा और खाना भी नहीं मिलेगा.’’

हिना के अब्बू की बात सुन कर आसिफ की अम्मी चुपचाप वहां से चली गईं.

उस दिन हिना बहुत रोई थी, लेकिन वह इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि अपने अब्बू से बोल सके कि वह आसिफ से ही शादी करेगी.

हिना को अच्छी तरह से याद है कि जब वह आसिफ से मिली थी, तो आसिफ काफी रोया था और उस को अपनी मुहब्बत की दुहाई दे रहा था, लेकिन वह खामोश रही और चुपचाप घर वापस आ गई थी.

हिना के अब्बू ने पैसे वाला देख कर उस की शादी आसिफ के चाचा रफीक मियां के बेटे काशान से करवा दी थी. रफीक मियां काफी अमीर थे. जमीनजायदाद के अलावा एक कपड़े की दुकान भी थी, जिस पर काशान अपने अब्बू के साथ बैठता था.

हिना की शादी बहुत ही धूमधाम के साथ हुई. सभी को यकीन था कि हिना वहां बहुत सुखी रहेगी. लेकिन शादी के एक महीने बाद से ही हिना और काशान में झगड़े शुरू हो गए. इन झगड़ों की वजह यह भी थी कि हिना पढ़ीलिखी थी और काशान ठीक से दस्तखत भी नहीं कर पाता था. काशान अकसर उस की बेइज्जती कर देता और पिटाई भी. वह हिना को कहीं अकेले बाहर भी नहीं जाने देता था.

काशान औनलाइन सट्टेबाजी किया करता था. यही नहीं, उस ने औनलाइन जुआ भी खेलना शुरू कर दिया था. हिना जब मना करती, तो काशान झगड़ा करना शुरू कर देता.

उधर लगातार जुए और सट्टेबाजी की वजह से दुकान में घाटा हो रहा था, लेकिन सास का कहना था कि जब से हिना के पैर घर में पड़े हैं, तब से नुकसान हो रहा है, जबकि सभी जानते थे कि काशान औनलाइन सट्टे और जुए में सबकुछ बरबाद कर रहा है.

एक दिन झगड़ा ज्यादा बढ़ गया तो सास भी अपने बेटे की तरफदारी करने लगीं और काशान ने हिना को तलाक दे दिया. तलाक की बात सुन कर सभी हैरान रह गए थे. हिना चुपचाप अपने घर आ गई थी. सभी सोच रहे थे कि हिना की जिंदगी खराब हो गई है, लेकिन यह बात हिना जानती थी कि कम से कम उसे इस जहन्नुम से तो छुटकारा मिल गया.

‘‘हिना…’’ तभी किसी की आवाज सुन कर वह यादों के भंवर से निकल कर वापस आ गई. उस ने देखा कि कमरे में उस की सहेली अंजुम खड़ी थी. उस ने अपने गालों पर आए आंसुओं को पोंछते हुए अंजुम को एक ओर बैठने का इशारा किया.

‘‘हिना, तुम क्यों नहीं खाला की बात मान लेती… जिस से तुम मुहब्बत करती थी उसी से तुम्हें हलाला की रस्म अदा करनी पड़ेगी, तो इस में परेशानी किस बात की है…’’ अंजुम उसे सम झाते हुए बोली.

आसिफ का नाम सुनते ही हिना के चेहरे पर अनोखी चमक आ गई थी, लेकिन वह कुछ नहीं बोली. पर फिर उस ने कुछ सोच कर अंजुम के सामने हामी भर ली. उस की ‘हां’ सुन कर अंजुम वहां से चली गई.

दूसरी ओर जब से रफीक चाचा ने आसिफ से हिना के साथ हलाला करने के रस्म अदायगी की बात कही थी, तब से वह काफी उल झन में था, इसलिए वह छत पर बैठा यों ही मोबाइल में फालतू की रील्स देख रहा था.

‘‘आसिफ, नीचे आ कर खाना खा लो,’’ तभी उसे अपनी अम्मी की आवाज सुनाई दी.

आसिफ ने मोबाइल जेब में रखा और छत से नीचे उतर आया. अम्मी ने उस को खाना दे दिया. उस ने हाथमुंह धो कर बेमन से खाना खाया और फिर अपने कमरे में चला गया.

आसिफ को लग रहा था कि हिना की बेइज्जती करने के लिए ही उस का इस्तेमाल किया जा है.

उधर हिना बिना किसी को बताए आसिफ के घर पहुंच गई. उस की अम्मी को ‘सलाम’ कर के वह सीधी आसिफ के कमरे में दाखिल हो गई.

‘‘क्या हो रहा है?’’ हिना ने पूछा.

‘‘तुम…?’’ आसिफ ने हैरान हो कर कहा.

‘‘हां आसिफ, मैं तुम से बात करने आई हूं,’’ सामने पड़े हुए स्टूल पर बैठते हुए हिना बोली.

‘‘क्या बात है?’’ आसिफ ने हिना से पूछा.

आसिफ को देख कर हिना को लग रहा था कि अचानक उस के दिल की धड़कन तेज हो गई थी.

‘‘अभी रफीक मियां तुम्हारे पास आए थे न?’’ हिना बोली.

‘‘हां, वे फिर तुम्हें अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं. वे मानते हैं कि गलती काशान की थी,’’ आसिफ धीरे से बोला.

‘‘अगर गलती काशान की थी, तो सजा मु झे क्यों दी जा रही है?’’ भर्राई हुई आवाज में हिना बोली.

‘‘काशान से दोबारा निकाह के लिए हलाला तो करना ही पड़ेगा,’’ आसिफ बोला.

‘‘मुझे मालूम है कि मेरा निकाह तुम्हारे साथ हो रहा है, इसीलिए अब मैं ने ‘हां’ कर दी है. मैं जानती हूं कि उस के अम्मीअब्बू को तो इस बात का एहसास नहीं हो रहा है कि उन की बहू के साथ उस घर में क्याक्या जुल्म हुए हैं और वह किस तरह जहन्नुम की आग में जल रही थी, क्योंकि उन्हें लगता है कि जिंदगी में पैसा ही सबकुछ है.

‘‘लेकिन तुम तो मु झ से मुहब्बत करते थे… तुम इस बात को कैसे भूल गए? बस, मैं तुम्हें इतना बताने आई हूं कि निकाह के बाद मैं तुम्हारी बीवी बन जाऊंगी. क्या तुम अपनी बीवी को किसी दूसरे के हवाले कर दोगे?’’ रोते हुए हिना बोली.

‘‘लेकिन…’’ हिना की बात से आसिफ के पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई और वह कुछ बोल न सका.

‘‘और हां, अगर हलाला के नाम पर तुम ने मु झे तलाक दे दिया, तब भी मैं उस जहन्नुम में नहीं जाऊंगी. निकाह कुबूल करना या न करना मेरा फैसला होगा.’’

‘‘तब सभी मु झे गलत कहेंगे…’’ आसिफ ने कहा.

‘‘तुम तो पढ़ेलिखे सम झदार हो. क्या लोगों के कहने पर अपनी बीवी को छोड़ दोगे?’’ हिना रोती जा रही थी और बोले जा रही थी. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

उधर हिना को रोते देख कर अनायास ही आसिफ की आंखों से भी आंसू बहने लगे थे. तभी किसी ने हिना के कंधे पर हाथ रखा. हिना ने देखा कि कमरे में उस के अब्बू आ गए थे और उन के साथ ही आसिफ की अम्मी भी खड़ी थीं.

‘‘बेटी, मुझे माफ कर दो. मैं सिर्फ अपनी इज्जत और रुतबे का खयाल कर रहा था. मैं नहीं जानता था कि मेरी बेटी किस दर्द से गुजर रही है. मैं ने तुम दोनों को एक बार अलग कर के गलती की थी, लेकिन अब मैं यह गलती दोबारा नहीं करूंगा. अब तुम सिर्फ आसिफ की ही दुलहन बनोगी,’’ अब्बू ने कहा.

हिना ने देखा कि उस के अब्बू की भी आंखों में आंसू थे. वह उठ कर कर अब्बू के गले लग गई. आज उसे लग रहा था कि एक बार फिर से उस की जिंदगी में बहार आ गई है और कलियां खिलने लगी हैं. Best Hindi Kahani

Hindi Family Story: एक सच यह भी

Hindi Family Story: ‘‘नलिनी…’’ अपने नाम की पुकार के साथ ही नलिनी के हड़बड़ाते कदम ठिठक गए और उस की नजरें पुकार की दिशा में घूम गईं.

‘‘इन लोगों ने मु झे जबरदस्ती पकड़ लिया है. मैं बेकुसूर हूं. मैं ने कुछ नहीं किया. इन्हें सम झाओ…’’

‘‘मैडम, क्या आप इसे पहचानती हैं?’’ एक पुलिस वाले ने नलिनी से पूछा.

अपने पति जतिन की आंखों में सवालिया निशान देख कर नलिनी के चेहरे पर घबराहट दिखने लगी और ‘हां’ में हिलने वाली उस की गरदन कब ‘न’ के अंदाज में इधर से उधर तेजी से हिल उठी, खुद नलिनी को भी पता नहीं चला.

रेहान का चेहरा लटक गया. आंखों में उभरे आशा के दीप अचानक से बुझ गए.

जिस सवाल से नलिनी पूरा दिन बचने की कोशिश करती रही, रात को बिस्तर पर आते ही जतिन ने वही सवाल बंदूक की गोली सा दाग दिया, ‘‘तुम वाकई उस शख्स को नहीं जानती?’’

‘‘किस को?’’ नलिनी ने अनजान बन कर पूछा, लेकिन उस के दिल की गड़गड़ाहट बेकाबू हुए जा रही थी.

‘‘वही जिसे मौल से पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी.’’

‘‘आप मु झ पर शक कर रहे हैं?’’

‘‘नहीं. अगर तुम कह रही हो, तो वाकई तुम उसे नहीं जानती. आओ, अब सो जाते हैं,’’ जतिन हमेशा की तरह नलिनी को अपनी बांहों में ले कर सुलाने लगे, पर नलिनी का दिल रो उठा.

‘कितना प्यार और भरोसा करते हैं जतिन मु झ पर… और मैं उन के भरोसे का यह सिला दे रही हूं… सिर्फ उन का ही नहीं, बल्कि मैं ने रेहान का भी भरोसा तोड़ दिया है. कितनी उम्मीद से उस ने मु झे पुकारा था और मैं ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया…’ गहराती रात के साथ नलिनी के दिल का दर्द बढ़ता जा रहा था. वह जतिन के सीने से लग कर फफक उठी.

‘‘मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप से झूठ बोला था. मैं उस शख्स को जानती हूं,’’ नलिनी बोली.

‘‘मुझे मालूम है,’’ यह कहते हुए जतिन शांत थे.

‘‘क्या? पर कैसे?’’ नलिनी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अरे यार, वकील हूं. पारखी नजर और तेज दिमाग रखता हूं.’’

‘‘फिर भी आप ने कोई सवालजवाब नहीं किया?’’

‘‘तुम्हारे प्यार के आगे सब बातें फालतू हैं. अगर तुम नहीं बताना चाहती, तो मैं कभी भी नहीं पूछूंगा.’’

‘‘लेकिन मैं सबकुछ बताना चाहती हूं. मेरे दिल पर बहुत बड़ा बो झ है. सोचा तो था कि वह किस्सा वहीं दफन हो गया, पर अब आप को बताए बिना मु झे चैन नहीं पड़ेगा.

‘‘आप को तो पता ही है कि शादी से पहले मैं एक डिस्पैंसरी में नौकरी करती थी. लोगों की सम झाइश के लिए मुझे आसपास के कसबों और शहरों का दौरा करना पड़ता था. यह वाकिआ हमारी मंगनी के बाद का है.

‘‘मैं पास के एक शहर का दौरा कर के बस से लौट रही थी. एक कसबानुमा जगह पर बस रुकी. 2-4 मुसाफिर उतरे. उस के बाद ड्राइवर ने चाबी घुमाई, पर बस नहीं चली. खलासी और कुछ दूसरे लोगों ने उतर कर बस को धक्का भी लगाया, पर वह नहीं चली.

‘‘ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए कि बस आगे नहीं जा पाएगी. अब तो सवेरे ही कुछ हो पाएगा. सभी लोग रात गुजारने का बंदोबस्त कर लें.

‘‘मेरे पास सूटकेस ले कर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं था. मैं ने एक आदमी से किसी होटल का पता पूछा, तो उस ने सामने एक लौज की ओर इशारा कर दिया, जहां लुंगी पहने कुछ लोग शराब पीते, बोटियां चबाते नजर आ रहे थे.

‘‘मैं उस ओर जाने की सोचने से ही सिहर उठी थी. हमारी बस का एक मुसाफिर, जो मेरे सामने वाली सीट पर बैठा था और इसी कसबे में उतर गया था, अपने एक दोस्त से बतियाता अभी तक वहीं खड़ा था. उस ने मेरी कशमकश का अंदाजा लगा लिया था. वह मेरे पास आया और अपने घर चलने की कहने लगा.

‘‘उस ने मु झ से कहा, ‘घबराइए नहीं. घर पर मेरे मातापिता हैं, छोटी बहन भी है.’

‘‘मेरे पास दूसरा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उस ने एक आटोरिकशा किया और मैं उस के साथ चल दी.’’
जतिन ने पूछा, ‘‘यह वही नौजवान था, जो आज मौल में मिला था?’’

‘‘हां, वही था. उस का नाम रेहान है. पर उस वक्त तक मु झे मालूम नहीं था कि मैं एक मुसलिम नौजवान के साथ जा रही हूं, वरना उस समय के हिंदूमुसलिम दंगे वाले माहौल में मैं ऐसा खतरा कभी नहीं उठाती.

‘‘जब तंग गलियों से आटोरिकशा गुजरने लगा, तो मु झे अहसास हुआ कि एक अनजान शख्स के साथ आ कर मैं ने कितनी बड़ी गलती कर दी है. इस से अच्छा तो वहीं बसस्टैंड पर ही जागते हुए रात गुजार देती.

इतने लोग थे तो वहां. पर अब क्या हो सकता था…

‘‘एक घर के आगे जा कर आटोरिकशा रुका, तो अंदर से एक लड़की चहकती हुई आई और ‘भाईजान’ कहते हुए उस शख्स से लिपट गई. तब कहीं जा कर मेरी जान में जान आई.

‘‘तब तक उस के मातापिता भी बाहर आ चुके थे. उन्हें देख कर मेरा माथा ठनका. पहली नजर में ही मु झे लग गया कि मैं किसी कट्टर मुसलिम परिवार में आ गई हूं.’’

‘‘लेकिन इस में इतना खौफ खाने की वजह?’’ जतिन ने सवाल किया.

‘‘एक तो यही कि उस समय भी माहौल ठीक नहीं था. दूसरे, अपने दौरों के दौरान मैं ने हमेशा यह महसूस किया कि मुसलिम बहुत कट्टर होते हैं और मेरी परिवार नियोजन की दलीलों पर वे जरा भी कान नहीं देते थे.’’

‘‘ओह…’’ जतिन के मुंह से निकला.

‘‘रेहान की बहन, जिस का नाम सलमा था, उसे चहकते हुए बता रही थी कि अम्मी ने उस की मनपसंद मुर्ग बिरयानी बना रखी है… मु झे तो यह सुन कर ही मितली आने लगी थी. पर उस की अम्मी बहुत सम झदार निकलीं. तब तक रेहान उन्हें मेरे बारे में सबकुछ बता चुका था…

‘‘रेहान की अम्मी बोलीं, ‘इसे अपना ही घर सम झो बेटी.’

‘‘यह बात कह कर उन्होंने मु झे अपना बना लिया था. फिर तो मेरे लाख कहने पर भी वे मेरे लिए ताजा खाना बना कर ही मानी थीं. सब ने मेरे साथ बैठ कर दाल और आलू की सब्जी खाई थी. यह कह कर कि बिरियानी हम कल खा लेंगे, मेहमाननवाजी का मौका कबकब मिलता है.

‘‘उन्होंने मेरा दिल जीत लिया था. सारा खौफ पल में छूमंतर हो गया था. रात को मैं और सलमा एक कमरे में सो गए थे. रेहान ने बैठक में बिस्तर लगा लिया था.

‘‘अनजान माहौल में नींद आते मु झे वक्त लगा था. सच कहूं, तड़के जा कर ही आंख लग पाई थी कि तभी मैं चौंक कर उठ बैठी थी. देखा, रेहान मेरे ऊपर झुका हुआ था.

‘‘मैं चिल्लाने ही वाली थी कि उस ने अपना हाथ मेरे मुंह पर रख दिया और बोला, ‘आप की बस ठीक हो गई है, इसलिए उठाने आया था. बाहर माहौल अभी भी गड़बड़ ही है. हमें चुपचाप निकलना होगा.’

‘‘मैं ‘ओह’ कह कर बुरी तरह झेंप गई थी. उस की अम्मी ने गले लग कर खूब अपनेपन से मु झे विदा किया था. रेहान मु झे छिपताछिपाता बसस्टैंड ले गया.

‘‘बस में बिठा कर वह तब तक मुसकरा कर हाथ हिलाता रहा, जब तक मैं उस की आंखों से ओ झल नहीं हो गई थी. मेरी उस से वही पहली और आखिरी मुलाकात थी.

‘‘पूरी रात किसी अनजान विधर्मी परिवार के साथ गुजारने की यह बात न तो मैं ने अपने परिवार वालों को बताई और न तुम्हें. बेवजह तिल का ताड़ बन जाता. आज भी यही सोच कर मैं ने उसे पहचानने से ही इनकार कर दिया कि पता नहीं तुम इस पहचान का क्या मतलब निकाल लो.’’

‘‘बस, इतना ही भरोसा है अपने प्यार पर? नलिनी, वक्त, इज्जत और एतबार ऐसे परिंदे हैं, जो एक बार उड़ जाएं, तो वापस नहीं आते,’’ जतिन ने कहा.

‘‘तभी तो शर्मिंदा हूं. और अब अपने प्यार पर विश्वास के संबल से ही सबकुछ बताने की हिम्मत कर पाई हूं… कल की घटना याद करती हूं, तो अब भी सहम जाती हूं. बम, आतंकवाद, विस्फोट… क्या रेहान ऐसा कर सकता है?’’

‘‘मैं ने खुद उसे कूड़ेदान में पैकेट रखते देखा था. उस के कूड़ेदान में पैकेट रख कर दूर हटने के थोड़ी देर बाद ही विस्फोट हो गया था,’’ जतिन गंभीर थे.

‘‘ओह, कोई इनसान इतना दोगला भी हो सकता है, मैं ने नहीं सोचा था. अच्छा हुआ, मैं ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. ऐसे आतंकवादी देशद्रोहियों को तो फांसी ही लगनी चाहिए,’’ नलिनी फिर से तैश में आ
गई थी.

‘‘तुम बहुत जल्द फैसले लेती, बदलती रहती हो नलिनी. जिस इनसान से, उस के परिवार से तुम मिल कर आई हो, मेहमाननवाजी देख कर आई हो, उस के बारे में इतनी जल्दी अपनी राय बदल ली?

‘‘जिस तरह कानों सुना हमेशा सच नहीं होता, उसी तरह कई बार आंखों देखा भी सच नहीं होता.

‘‘यह भी तो हो सकता है कि बम कूड़ेदान में पहले से रखा हो. रेहान उस में कूड़ा डालने गया हो और उस की तसवीर सीसीटीवी कैमरे में कैद होते ही विस्फोट हो गया हो…’’

‘‘हां, बिलकुल मुमकिन है. मु झे तो लगता है कि बिलकुल ऐसा ही हुआ है,’’ नलिनी बोली.

‘‘लो, फिर तुम ने इतनी जल्दी राय बदल ली… कभी किसी के बहकावे में मत आओ. अपना दिमाग भी लगाओ. इनसानी संबंधों में सब से बड़ी गलती यह है कि हम आधा सुनते हैं, एकचौथाई सम झते हैं, जीरो सोचते हैं, लेकिन अपनी राय दोगुनी देते हैं.’’

‘‘अच्छा वकील साहब. मैं ने हार मानी. मुझ में आप जैसा तेज दिमाग नहीं है,’’ नलिनी ने जैसे हथियार डाल
दिए थे.

‘‘मेरे साथ जेल चलोगी?’’

‘‘क्यों? हम ने क्या किया है?’’ नलिनी बौखला उठी थी.

‘‘रेहान से मिलने,’’ जतिन की मुसकराहट बरकरार थी.

‘‘ओह. आप तो मु झे डरा ही देते हैं,’’ कह कर नलिनी इतमीनान से जतिन के सीने से लग गई थी. जब जिंदगी नामक स्क्रीन लो बैटरी दिखाती है और कोई चार्जर नहीं मिलता, तब जो पावर बैंक काम आता है, उसे पति कहते हैं.

अगले दिन धड़कते दिल से जतिन का हाथ थामे नलिनी जेल में दाखिल हुई.

रेहान ने नलिनी को देखा, तो मुंह फेर लिया और बोला, ‘‘मैं इन्हें नहीं जानता. इन्हें कह दीजिए कि यहां से चली जाएं.’’

‘‘रेहान, भाई प्लीज, इसे माफ कर दो. यह उस वक्त बहुत घबरा गई थी. मैं जतिन हूं. नलिनी का पति और एक वकील. मुझे सब खुल कर बताओ. शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं,’’ जतिन बोले.

‘‘मैं आतंकवादी कैसे हो सकता हूं साहब? मैं तो खुद अपना पूरा परिवार ऐसे ही एक हादसे में खो बैठा हूं,’’ रेहान बोला.

‘‘क्या? सलमा, अम्मी…’’ नलिनी हैरान थी.

‘‘हां, नलिनी बहन. सलमा, अम्मीअब्बू सब ऐसे ही एक विस्फोट में जान से हाथ धो बैठे थे. मैं तो जीतेजी ही मर चुका था.

‘‘इनसान उन चीजों से कम बीमार होता है, जो वह खाता है, बल्कि उन चीजों से ज्यादा बीमार होता है, जो उसे अंदर ही अंदर खाती हैं.

‘‘सम झ नहीं आता कि बेकुसूर लोगों की जान लेने से इन का कौन सा मकसद पूरा होता है? मुसलिम तो मैं भी हूं, लेकिन मेरा क्या किसी का भी धर्म ऐसा घिनौना काम करने की इजाजत नहीं देता.

‘‘मैं तो अपने डिस्पोजेबल बरतन कूड़ेदान में डालने गया था और काउंटर पर पैसे दे कर निकल ही रहा था कि वह धमाका हो गया.

‘‘मैं तो खुद हैरान था कि यह क्या हुआ कि तभी वहां तैनात पुलिस वालों ने पूछताछ करना शुरू कर दिया और मुझे पकड़ लिया.

‘‘जब तक माजरा समझ आता तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मेरी पहचान ही मेरी दुश्मन बन गई.

‘‘धर्म एक होने से क्या इनसानों का मकसद भी एक हो जाता है? खैर, अब फांसी भी हो जाए तो कोई गम नहीं. मेरी बहन ने तो मु झे गलत नहीं सम झा. मेरे लिए इतना ही काफी है.’’

‘‘जल्दी जागना हमेशा ही फायदेमंद होता है. चाहे वह नींद से हो, अहम से हो या वहम से हो. चिंता मत करो. तुम्हारा केस अब मैं लड़ूंगा. तुम्हारी कही गई बातों पर मुझे भरोसा है. तुम बस अपना मनोबल बनाए रखना,’’ जतिन ने कहा.

नलिनी ने आगे बढ़ कर सलाखें पकड़े खड़े रेहान के हाथों पर अपने हाथ रख दिए थे, जो इस बात का सुबूत थे कि इस जंग में वह भी उस के साथ है. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: प्यार का नशा

Hindi Romantic Story: गीता का ब्याह तो रामशरण से हुआ था, लेकिन वह उसे नहीं चाहती थी. उस का दिल तो अपने पुराने आशिक सुखराम से लगा हुआ था.

शादी के पहले ही संगीता उसे अपना सबकुछ दे बैठी थी. शादी तो घर वालों ने उस की पसंद पूछे बिना ही रामशरण से कर दी थी. उस ने भी घर वालों को अपनी पसंद नहीं बताई थी.

रामशरण चौकीदार था. उस की अकसर नाइट ड्यूटी रहा करती थी. वह सीधासादा आदमी था. रात को 8 बजे टिफिन ले कर घर से निकलता, तो सुबह 8 बजे ही लौटता.

संगीता रात को घर में अकेली रहती. रात को देर तक वह अपने आशिक सुखराम से मोबाइल पर बातें करती थी. वीडियो काल कर के भी अपना हालेदिल बयां करती थी.

आशिक सुखराम संगीता के मायके वाले गांव में रहता था. कभीकभार वह संगीता से मिलने आया करता था.

वह पूरी रात वहीं गुजारता, ऐश करता और सुबह चला जाता.

ऐसा कई महीने तक चलता रहा.

संगीता के पड़ोसियों में सुखराम को ले कर खुसुरफुसुर हुआ करती थी. कोई पूछता, तो संगीता कह देती, ‘‘मेरे सुक्खू भैया हैं, कभीकभार मिलने आ जाते हैं.’’

पड़ोसी इतने नादान नहीं थे. उन्हें शक हो गया था कि चुपचाप रात को आने वाला भैया नहीं, बल्कि सैयां है. कई औरतें इस बारे में खूब रस लेले कर बातें किया करती थीं.

बूढ़ी सुखिया काकी कहती थीं, ‘‘बेचारा रामशरण कमातेकमाते मर रहा है और इधर यह छैलछबीली औरत पराए मर्द के साथ पाप कर रही है. नरक में जाएगी, नरक में. कहे देती हूं कि एक दिन भुगतेगी.

‘‘मैं ने दुनिया देखी है. पराया मर्द किसी का सगा हुआ है क्या… रस ले कर छोड़ देगा. आजकल तो लोग हत्या भी कर देते हैं. कोई बताओ रे, बेचारा रामशरण इस पापलीला से अनजान है अभी तक.’’

जब रामशरण से किसी ने कुछ नहीं बताया, तो एक दिन सुबह सुखिया काकी ने ही हिम्मत दिखाई. उन्होंने काम से लौट रहे रामशरण को अपने घर के पास रोक लिया और पूछा, ‘‘आ गए बेटा…’’

‘‘हां काकी, कैसी हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं बेटा, तुम अपनी सुनाओ. खड़ी कर दो साइकिल, आओ बैठ जाओ थोड़ा सुस्ता लो.’’

रामशरण जा कर सुखिया काकी के घर में बैठ गया.

‘‘कल रात को तुम्हारा साला आया था. तुम से मुलाकात हुई कि नहीं? वह अकसर रात को आता है,’’ सुखिया काकी ने बताया.

‘‘मु झे कुछ नहीं पता काकी. मेरा कोई साला नहीं है. मेरी पत्नी संगीता अपने मातापिता की एकलौती औलाद है. मैं उस से पूछूंगा कि कौन आता है,’’ रामशरण को शक हुआ.

‘‘लेकिन बेटा, मेरा नाम मत लेना. मु झे तो लगता है कि तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है. बुरा मत मानना, लेकिन मुझे तुम्हारी औरत का चालचलन ठीक नहीं लगता.’’

रामशरण घर गया. पहले तो उस के मन में आया कि वह संगीता से पूछे कि कौन आता है, लेकिन बाद में उस ने सोचा कि वह खुद ही पकड़ेगा, पूछताछ करना ठीक नहीं होगा.

उसी दिन रामशरण ने महल्ले के एक लड़के से बात की, ‘‘राजू, मेरे घर की देखभाल किया कर. पता चला है कि कोई आता है.’’

‘‘आप को आज पता चला है, वह तो कई महीने से आ रहा है. चाची कहती हैं कि वह उन का भैया है. अब वह दिखाई पड़ गया, तो आप को फोन करूंगा.

‘‘आप खुद ही पूछ लेना कि वह कौन है. कोई गलत आदमी होगा, तो उस की कुटाई की जाएगी तबीयत से,’’ राजू बोला.

समय गुजरता गया. एक रात रामशरण का फोन बज उठा. उस ने देखा कि राजू का फोन है. उस ने कहा, ‘‘हां, राजू बोल, क्या बात है?’’

‘चाचा, कुछ देर पहले ही वह आदमी आप के घर आया है. आ जाओ जल्दी से.’

‘‘ठीक है बेटा, आता हूं.’’

कुछ देर में रामशरण घर पहुंच गया और उस ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ अंदर से संगीता की आवाज आई.

‘‘मैं हूं, दरवाजा खोलो,’’ रामशरण बोला.

यह सुन कर संगीता घबरा गई.

उस ने सुखराम को जल्दी से पलंग के नीचे छिपाया और फिर जा कर दरवाजा खोला.

‘‘आज रात को ही कैसे आ गए?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘ब्लड प्रैशर की दवा भूल गया था. वही लेने आया हूं.’’

‘‘रुको, मैं ला देती हूं.’’

‘‘नहीं, रहने दो. मैं दवा यहीं खाऊंगा,’’ यह कह कर रामशरण अंदर चला गया.

संगीता दवा और पानी लेने चली गई. इधर रामशरण ने तंबाकू रगड़ना शुरू कर दिया.

‘‘यह क्या? आए हो दवा खाने और तंबाकू खाने लगे. तंबाकू खाते हो, इसीलिए ब्लड प्रैशर बढ़ता है.
फेंको तंबाकू और दवा खाओ,’’ संगीता बोली.

लेकिन रामशरण तंबाकू रगड़ता ही रहा. तंबाकू तेज था. उस ने तंबाकू हथेली पर जोर से ठोंका, तो उस की झार से पलंग के नीचे छिपे सुखराम को खांसी आ गई. अब तो संगीता को काटो तो खून नहीं. वह बुरी तरह घबरा गई.

‘‘कौन हो भाई? कहां छिपे हो? सामने आओ,’’ रामशरण ने कहा.

जब सुखराम नहीं निकला, तो रामशरण ने उसे खींच कर निकाला और पूछा, ‘‘कब से यह खेल चल रहा है?’’

घबराहट के मारे सुखराम कुछ बोल नहीं सका.

‘‘घबराओ नहीं, बोलो… मैं मारपीट नहीं करूंगा भाई,’’ रामशरण बोला.

फिर भी सुखराम कुछ नहीं बोल पाया.

‘‘यह बेचारा नहीं बोल पा रहा है, तो तुम ही बता दो मेरी जान,’’ रामशरण ने संगीता की ओर देख कर कहा.

‘‘पूछ ही रहे हो तो सबकुछ सचसच बता देती हूं. यह मेरा प्रेमी है. मैं इसे ही पसंद करती हूं. इस के बिना जी नहीं सकती,’’ संगीता बोली.

‘‘ठीक है, लेकिन मुझ से शादी क्यों की? मु झे पहले ही बता दिया होता. मैं बिलकुल तुम से शादी न करता. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है.

तुम इस से शादी कर लो,’’ रामशरण ने कहा.

उसी बीच सुखराम भाग खड़ा हुआ.

बाहर राजू डंडा लिए खड़ा था. उस ने सुखराम को पकड़ लिया और पिटाई शुरू कर दी. शोर सुन कर महल्ले के तमाम लोग आ गए वहां. कुछ और लोग भी सुखराम की धुनाई करने लगे.

रामशरण ने बाहर निकल कर उन लोगों को मना किया और कहा, ‘‘इसे जाने दो.’’

राजू ने कहा, ‘‘किस मिट्टी के बने हो चाचा? हमें इसे कूटने दो.’’

‘‘नहीं, जाने दो, मत मारो,’’ रामशरण शांत भाव से बोला.

लोगों ने सुखराम को छोड़ दिया. वह जान बचा कर भागा.

लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. ज्यादातर लोग रामशरण की हंसी उड़ा रहे थे. उसे डरपोक और नामर्द कह रहे थे. उन का कहना था कि पकड़े गए आदमी को खूब कूट कर पुलिस के हवाले करना था.

रामशरण अगले ही दिन संगीता को ले कर उस के मायके गया और उस के मातापिता से सारा हाल कह सुनाया. इतना ही नहीं, उस ने पंचायत बैठा दी और कहा, ‘‘मैं संगीता की शादी सुखराम से करा देना चाहता हूं. इस से मेरी नहीं निभेगी. उसे बुलाया जाए.’’

पता लगाया गया तो सुखराम घर में मिल गया. कुछ लोग उसे पंचायत में खींच लाए.

मुखिया गजाधर काका ने सुखराम से पूछा, ‘‘क्या तुम संगीता से ब्याह करोगे?’’

‘‘मैं क्यों ब्याह करूं… मेरे जैसे इस के कई यार होंगे. बुलाती थी तो चला जाता था. जब यह अपने पति की नहीं हुई, तो मेरी क्या होगी? यह तो मु झ से अपने पति को मरवाने की बात कहती थी. अच्छा हुआ कि मैं हत्या के पाप से बच गया,’’ सुखराम बोला.

सुखराम की यह बात सुन कर पंचायत सन्न रह गई.

रामशरण ने कहा, ‘‘अब मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं तो दोनों की शादी कराने आया था. अब मैं इस औरत को नहीं रख सकता. मेरी कोई गलती हो तो आप लोग बताएं.’’

मुखिया ने कहा, ‘‘तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. यह झूठे प्यारवार का चक्कर ही बहुत खराब है. यह हमारे देश में, समाज में तेजी से बढ़ रहा है. इस के चलते हत्याएं हो रही हैं.

‘‘समाज को जागना होगा, वरना बच्चों की इसी तरह जिंदगी बरबाद होगी. मैं बहुत चिंतित हूं. यह समस्या कैसे दूर होगी? क्या हमारे लड़केलड़कियां इसी तरह नाक कटाएंगे?’’

संगीता बहुत रोईगिड़गिड़ाई, लेकिन रामशरण उसे अपने साथ नहीं ले गया.

संगीता अपने मायके में रह कर मेहनतमजदूरी करने लगी. वह पछता रही थी कि अगर नाजायज प्यार में न पड़ती, तो उस की जिंदगी तबाह न होती. Hindi Romantic Story

Best Hindi Story: बचाने वाला महान

Best Hindi Story: दलित गर्लफ्रैंड को बाइक से 500 मीटर घसीटा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में एक नौजवान ने अपनी प्रेमिका को बाइक से तकरीबन 500 मीटर तक सड़क पर घसीट दिया. इस दौरान वह लड़की चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन आरोपी प्रेमी ने उसे नहीं छोड़ा. घसीटने की वजह लड़की के आधे से ज्यादा कपड़े फट गए. हालांकि, लड़की की आवाज सुन कर कुछ गांव वाले मदद के लिए दौड़े, तो हड़बड़ाहट में आरोपियों की बाइक फिसल कर गिर गई. इस के बाद वे दोनों आरोपी पैदल भाग निकले. लड़का ओबीसी समाज का और लड़की दलित समाज की बताई गई. उन दोनों में इश्कबाजी का मामला था और इसी चक्कर में उन के बीच झगड़ा हो गया था. जाति प्यार पर हावी हो गई थी.

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का म झला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले.

कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा.

बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे सम झा रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो 2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से सम झाना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मु झ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मु झे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उल झी थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुडि़या? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मु झे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मु झे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मु झे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग सम झेंगे कि मु झे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई. Best Hindi Story

Story In Hindi: पुराना खाता

Story In Hindi: मंथन की एक राशन की दुकान थी. यह दुकान महल्ले में ही थी, जिस से अगलबगल के लोग सामान खरीद कर ले जाते थे.

मंथन की यह दुकान बहुत पुरानी थी. उस के दादापरदादा के समय की, जिस में पुरानी काठ की लकडि़यों का फर्नीचर था. हर साल दीवाली पर पेंट होने से दुकान अच्छी कंडीशन में थी.

जब से मंथन ने दुकान संभाली थी, तब से वह ग्राहकों पर खास ध्यान देने लगा था. वह सब ग्राहकों से मुसकरा कर बातें करता था. उस के बात करने के तरीके में एक तरह का अपनापन था. लिहाजा, सबकुछ ठीकठाक चल रहा था.

मंथन के पिताजी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी थी. लिहाजा, ज्यादातर मंथन ही दुकान पर बैठता था. एक दिन की बात है. खुशबू, जो रजत की बहन थी, सामान लेने मंथन की दुकान पर गई.

मंथन की कदकाठी बढि़या और चेहरा बहुत ही खूबसूरत था. गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबी नाक, चौड़ी छाती. टीशर्ट और लोअर में भी वह काफी फब रहा था.

रजत के पिताजी अजय बाबू पहले घर का राशनपानी लेने मंथन के यहां जाते थे, लेकिन इधर अब वे भी बीमार रहने लगे थे. रजत को औफिस के कामों से ही समय नहीं मिल पाता था, तो वह भला राशनपानी कैसे ला पाता.

रजत की नईनई शादी हुई थी, लिहाजा, वे लोग नईनवेली बहू को घर से बाहर भेजना ठीक नहीं सम झते थे. सौदा लाने के लिए अब खुशबू ही मंथन की दुकान पर आनेजाने लगी थी.

उस दिन जब खुशबू ने मंथन को देखा, तो देखती ही रह गई. सामान ले कर वह कब की घर पहुंच चुकी थी, लेकिन उस का मन घर में नहीं लग रहा था. बारबार उस का ध्यान मंथन की पर्सनैलिटी को देख कर री झा जा रहा था.

खुशबू की एक सहेली थी, जो उस के घर के बगल में ही रहती थी. उस का नाम सलोनी था. सलोनी और खुशबू हमउम्र होने के साथसाथ पक्की सहेलियां भी थीं.

खुशबू अपने दिल की सारी बातें सलोनी को और सलोनी अपने दिल की सारी बातें खुशबू को बताती थी. दोनों का दिल एकदूसरे के बिना नहीं लगता था.

उसी दिन शाम को खुशबू ने अपने दिल की बात सलोनी को बताई, ‘‘सलोनी, मैं तु झे एक बात बताना चाहती हूं. पता नहीं यह कहना ठीक रहेगा भी या नहीं. कैसे कहूं, मु झे बहुत शर्म आती है.’’

‘‘अरे, दोस्तों से कैसी शर्म. दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है, जिस में लोग अपने दिल की हर बात बता देते हैं. अब बोल भी दे…’’ सलोनी ढलते सूरज को देखते हुए बोली.

‘‘तुम मंथन को जानती हो…’’

‘‘हां, हमारे महल्ले में राशन की दुकान वाला…’’

‘‘हां, वही,’’ खुशबू बोली.

‘‘अरे यार, उसे कौन नहीं जानता… महल्ले की सब लड़कियां उस पर मरती हैं. वे रीता भाभी हैं न… उन का चक्कर मंथन से सालभर पहले से चल रहा था.

‘‘रीता भाभी के पति को जब रीता और मंथन के अफेयर की खबर सुनाई पड़ी, तो उन्होंने रीता भाभी की जम कर पिटाई कर दी थी और राशन लेने के लिए खुद जाने लगे थे.

‘‘और वह गुडि़या, जो मंथन के किराएदार की बेटी थी, के साथ भी मंथन का चक्कर चल रहा था. मंथन है ही इतना खूबसूरत कि उस पर किसी का भी दिल आ जाए.

‘‘हमारे महल्ले की सब औरतों में चर्चा है कि मंथन को जो भी औरत या लड़की देखती है, तो वह उस की हो कर रह जाती है. सब को लगता है कि मंथन का किसी न किसी से चक्कर चल रहा है.

‘‘मंथन का तो पड़ोस की शालू से भी अफेयर था. पता नहीं क्या हुआ होगा. शालू और मंथन के बारे में तो महल्ले की लड़कियां 2 साल पहले चर्चा कर रही थीं.’’

‘‘यानी मंथन मु झे नहीं मिलेगा,’’ कहते हुए खुशबू का चेहरा उतर गया.

‘‘ऐसा कैसे कह सकती हो,’’ सलोनी ने चुटकी ली.

‘‘अब जब इतने सारे गुण हैं, तो वह मु झ बेशक्ल लड़की को क्यों प्यार करेगा? वह इतना हैंडसम है कि उस को कहने भर की देर है, कोई भी लड़की उस के लिए मरने को तैयार हो जाएगी… मेरी तो किस्मत ही खराब है,’’ खुशबू बोली.

‘‘तू किसी से कमतर क्यों रहने लगी… आज भी जब तू महल्ले से गुजरती है, तो लोगों की आंखें तु झ पर से हट नहीं पातीं. तू कम थोड़ी है. महल्ले के लड़के तो तु झ पर जान छिड़कते हैं. तू एक बार कह कर तो देख, वे तेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं,’’ सलोनी ने कहा.

‘‘देख, मु झ से फालतू की बात मत कर. मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं, जो हर किसी को अपना दिल देती फिरूं. मैं केवल और केवल मंथन की हूं…’’ खुशबू ने कहा.

शाम कब की रात में ढल चुकी थी. खाना खा कर बिस्तर पर लेटी खुशबू छत को ताकती रही. वह लगातार करवटें बदलती रही, लेकिन नींद आंखों से गायब रही. उसे बारबार सलोनी के बताए लड़कियों के नाम याद आ रहे थे. रीता भाभी, गुडि़या, शालू… उन के पासंग में भी नहीं ठहरती थी वह. सांवला रंग, औसत देह, लेकिन उस की छातियां भरीभरी थीं और उस के कूल्हे भारी थे, जो उस के सांवलेपन में भी चार चांद लगाते थे. फिर पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

सुबह खुशबू की नींद देर से खुली. सलोनी कब से आ कर उस के घर पर बैठी थी. कितनी बार आवाज लगाई थी, ‘‘सलोनी, जल्दी करो. जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग कालेज के लिए लेट हो रहे हैं…’’

खुशबू नहाधो कर कालेज के लिए निकली, लेकिन उस का मन कालेज में भी नहीं लगा. किसी तरह कालेज खत्म कर के वह घर लौटी.

अब खुशबू मंथन की दुकान पर किसी न किसी बहाने जाने लगी. जब उसे सामान की लिस्ट थमाई जाती, तो वह जानबू झ कर कुछ सामान लाती और कुछ सामान छोड़ देती.

मंथन भी खुशबू की आंखों की भाषा को बखूबी सम झ रहा था. एक दिन मौका पा कर वह खुशबू से बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ. तुम मु झे देख कर इतना मुसकराती क्यों हो?’’

खुशबू हंसते हुए बोली, ‘‘आप को देख कर कहां मुसकराती हूं. मेरी सूरत ही ऐसी है कि लोगों को मेरा चेहरा मुसकराता हुआ दिखता है. इस में मैं क्या करूं?’’

यह सुन कर मंथन मुसकरा कर रह गया.

एक दिन खुशबू ने 500 रुपए के नोट में छिपा कर एक कागज पर अपना मोबाइल नंबर लिख दिया और घर आ गई, लेकिन उस के दिल में खलबली सी मची हुई थी.

रात को वह सोने के लिए छत पर चली गई और मंथन के फोन का इंतजार करने लगी. रात के तकरीबन 1 बजे उस का मोबाइल वाईब्रेट करने लगा. नया नंबर था. खुशबू का दिल बल्लियों उछलने लगा.

खुशबू ने फोन रिसीव किया. दूसरी तरफ की आवाज को सुनने की गरज से वह धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से मंथन की आवाज आई, ‘अभी तक जाग रही हो?’

‘‘हां,’’ वह धीरे से बोली.

‘अब तो चांदतारे सब सो गए और तुम जाग रही हो. भला किस के इंतजार में?’

‘‘कौन सो गया है और कौन जाग रहा है. मैं तो सदियों से नहीं सोई… तुम्हारा इंतजार कर रही हूं इस छत पर,’’ खुशबू बोली.

‘अच्छा, तो तुम भी छत पर सो रही हो, ताकि मु झ से बातें कर सको. कहो तो आ जाऊं तुम्हारे पास? 2-4 छतों का ही तो फासला है,’ मंथन बोला.

‘‘नहीं, मत आना,’’ खुशबू बोली.

‘वैसे, मैं भी आज छत पर सोया हूं,’ मंथन ने बताया.

इस के बाद मंथन और खुशबू में ढेर सारी बातें हुईं. अब तो यह रोज की बात थी. खुशबू और मंथन छत पर ही सोते थे. सोते क्या थे, सोने का बहाना करते थे और प्रेम की पेंगे भरते थे.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक साल पलक झपकते ही बीत गया. अगले साल खुशबू की रिश्ते की बात चलने लगी, पर वह शादी की बात को टालती रहती थी.

इधर शहर में एक बहुत बड़ा शौपिंग मौल खुल गया था. मंथन से कम दाम पर सामान बेचने वाला. शहर के लोग उधर ही भाग रहे थे.

मंथन के पिता अब चल फिर नहीं पाते थे. परिवार की जिम्मेदारी का सारा बो झ अब मंथन के कंधों पर आ गया था. वह ज्यादा तनाव में रहने लगा था.

एक दिन जब मंथन ने सुबह दुकान खोली थी, तब उस की दुकान में बहुत से ग्राहक सामान लेने आए हुए थे. तभी रजत अपने पापा अजय बाबू के साथ मंथन की दुकान पर पहुंचा और उस ने इशारे से मंथन को बताया, ‘‘जैम की शीशी, होरलिक्स का डब्बा और चौकलेट का पैकेट दे दो.’’

मंथन ने चौकलेट का पैकेट, जैम की शीशी और होरलिक्स का पैसा जोड़ कर बिल बनाया.

परची थमाते हुए मंथन बोला, ‘‘रजत बाबू, 700 रुपए हो गए.’’

रजत ने एमआरपी और चीजों के दाम को मिलाया. दाम ठीकठाक ही लगाए गए थे, लेकिन 1-2 सामान में एमआरपी से 2-3 रुपए ही कम निकले.

रजत ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘मंथन, तुम ने तो एमआरपी पर ही सब सामान के दाम लगा दिए हैं… जबकि मौल में अभी भारी डिस्काउंट चल रहा है. हम वहीं से सब सामान लेंगे. चलिए पापा…’’

रजत के पापा ये सब बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे. वे बोले, ‘‘मौल तो आज खुला है बेटा, इस से पहले मैं और तुम्हारे दादाजी भी इसी दुकान से सामान खरीदते रहे हैं. तब मंथन के दादाजी दुकान चलाते थे. इन लोगों ने खूब साथ दिया है हमारा. यह रिश्ता एक दिन में नहीं बना है, बल्कि इस को बनने में सालोंसाल लगे हैं.’’

‘‘आप की तरह मैं बेवकूफ नहीं हूं पापा, जो इन से महंगे दाम पर सामान खरीदूं. आखिर हम भी पैसा बहुत मेहनत से कमाते हैं. जब और लोग कंपीटिशन कर रहे हैं, तो इन को भी तो दाम कम करना चाहिए. ये लोग पहले की तरह अब ज्यादा पैसे नहीं ले सकते. अब जमाना बदल गया है,’’ रजत ने कहा.

‘‘रजत बेटा, तुम शायद कोरोना के समय को भूल गए हो. उस समय तुम इसी मंथन के यहां से सामान ले जाते थे. और तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि उस समय तुम्हारे बैंक से तुम्हारी सैलरी नहीं आ रही थी. तब भी हम लोगों को घर बैठे सामान आसानी से मिल जाता था.

‘‘और इसी मंथन की दुकान से तुम ने दसियों हजार रुपए का राशन खाया है. उस समय यही मंथन पीछे के दरवाजे से हमें चीजें मुहैया करवाता था.

‘‘उस समय ये बड़ेबड़े मौल न जाने किस बिल में समा गए थे. तब पुलिस के न जाने कितने लाठीडंडे खा कर मंथन सामान इधरउधर से जुगाड़ कर के पूरे महल्ले को देता था.

‘‘फिर भी मैं वहीं से सामान लूंगा. मौल बैस्ट है मेरे लिए,’’ इतना कह कर रजत वहां से चला गया.

बात आईगई हो गई. अजय बाबू और रजत दोनों खुशबू पर शादी के लिए जोर दे रहे थे. 6 महीने और बीत गए. जो अजय बाबू मंथन के परिवार को इतना अच्छा कहते थे, जब उन को पता चला कि मंथन और खुशबू एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो उन के जातिवाद ने सिर उठा लिया.

एक दिन अजय बाबू मंथन की दुकान पर तमतमाए हुए पहुंचे और मंथन को कई झापड़ रसीद कर दिए.
अजय बाबू का शरीर गुस्से से कांप रहा था. वे तमतमाए हुए लहजे में बोले, ‘‘हम ने तुम लोगों को जरा सा मुंह क्या लगा लिया, तुम अपनी औकात से बाहर आ कर हमारे सिर पर चढ़ गए. कहां हम कुलीन ब्राह्मण और कहां तुम बनिया. तुम लोगों को हमेशा अपनी औकात में रहना चाहिए. हमारी बहनबेटियों से खिलवाड़ करते हो… हद में रहा करो, नहीं तो होश ठिकाने लगा दूंगा.’’

दिन बीतते चले गए. कई साल गुजर गए. उम्र निकल जाने के चलते खुशबू के लिए रिश्ते भी अब आने बंद हो गए थे. इधर परिवार और 2 बहनों की शादी की जिम्मेदारी मंथन के कंधों पर थी. वह जैसे बलिदान की वेदी पर झूल गया.

एक दिन अचानक अजय बाबू को लकवा मार गया. अब वे बिस्तर से उठ भी नहीं पाते थे. खुशबू ने पूरे मन से अपने पापा की सेवा की, पर जल्दी ही वे चल बसे.

इतना ही नहीं, एक दिन रजत अपनी कार से औफिस जा रहा था कि तभी उस की कार सामने से आ रही दूसरी कार से टकरा गई और रजत के कार के परखच्चे उड़ गए.

रजत को अस्पताल में भरती करवाया गया. रजत अब महीनों तक बिस्तर से उठ नहीं सकता था. डाक्टर कह रहे थे कि इतने बड़े हादसे में अगर वह बच गया है, तो यही बहुत बड़ी बात है.

रजत की बैंक की प्राइवेट नौकरी थी, जो छूट गई. उस की पत्नी सविता के घर वालों ने कुछ महीनों तक मदद की, उस के बाद उन्होंने भी हाथ खींच लिए.

पूरे 2 साल तक रजत बिस्तर पर रहा. बच्चों की फीस जमा नहीं करवा पाने के चलते स्कूल ने बच्चों के नाम काट दिए. अब रजत के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे.

एक दिन की बात है. घर में राशन खत्म हो गया था और बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. रजत के पापा अगर जिंदा होते, तो जरूर मंथन से कह कर राशन ले आते.

कुछ सोच कर सविता ने सारी बात जा कर मौल वाले दुकानदार को बताई, पर उस दिन सविता के पैरों तले की जमीन खिसक गई, जब मौल वाले ने सामान उधार देने से साफ मना कर दिया. उस ने बहुत सारे ग्राहकों के सामने ही सविता की बेइज्जती भी कर दी. सविता बेइज्जती का घूंट पी कर वहां से चली आई.

घर आ कर सविता ने सारी घटना रजत को बताई. रजत अपनी बेबसी पर दांत पीस कर रह गया था. उस के पैर अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे. कमर की हड्डी भी टूट गई थी. वह लाचार था.

खैर, उड़तेउड़ते यह बात मंथन को पता चली. उस का और अजय बाबू का पुराना संबंध था. इस नाते वह घर का पूरा राशन रजत के यहां देने चला आया.

रजत और सविता दोनों हैरान से मंथन को ताक रहे थे.

मंथन ने रजत को नमस्ते किया और पूछा, ‘‘आप कैसे हैं?’’

रजत को जवाब देते न बना, फिर भी वह मंथन से बोला, ‘‘ठीक हूं. धीरेधीरे रिकवरी हो रही है.’’

‘‘आप के ऐक्सीडैंट के बारे में सुना था, लेकिन दुकान में भीड़भाड़ रहने के चलते आप से मिलने नहीं आ सका. कुछ झिझक भी थी. पता नहीं आप क्या सोचेंगे? वैसे, कुछ दिनों से बच्चों को स्कूल जाते नहीं देखा. वे स्कूल जाते हैं न?’’

‘‘स्कूल तो जाते हैं, लेकिन अब प्राइवेट स्कूल में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल में जाते हैं, लेकिन इधर उन की स्टेशनरी खत्म हो गई है, इसलिए हफ्तेभर से वे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

‘‘हां, इधर मैं भाभी को भी देखता हूं, वे सुबहसुबह शायद बच्चों को पढ़ाने जाती हैं.’’

‘‘हां, बगल में प्राइमरी स्कूल है. वहीं 6-7 हजार रुपए की प्राइवेट नौकरी कर रही है. वहीं बच्चों को पढ़ाने जाती है. बेचारी को मेरे ऐक्सीडैंट के बाद बाहर निकलना पड़ गया. अब क्या करूं… सविता की कमाई तो मेरी दवादारू में ही खर्च हो जाती है.’’

‘‘पढ़ाने या काम करने में कोई बुराई थोड़ी ही है. सविता भाभी तो ज्ञान का दीपक जला रही हैं… आप के परिवार के लिए कुछ राशन ले कर आया हूं. आप मेरे पुराने खाते को फिर से चालू कर दीजिए.’’

‘‘मंथन, मु झे शर्मिंदा मत करो. मैं पहले ही अपनी नजरों में गिर चुका हूं. मैं अपने बरताव पर शर्मिंदा हूं.’’

‘‘मुसीबत के समय ही तो अपने लोग काम आते हैं. अगर कल को मेरे ऊपर कोई मुसीबत आन पड़ी तो आप लोग मेरी मदद करने आएंगे न? आप बच्चों को स्कूल भेजिए. आप स्टेशनरी का सामान मेरी दुकान से मंगवा लीजिएगा. सब्जीभाजी भी भिजवा दूंगा. जब आप ठीक हो जाएंगे, तब मेरा हिसाब कर दीजिएगा.’’

‘‘सब्जी तो आप नहीं बेचते हैं, फिर सब्जी कैसे देंगे?’’ सविता ने पूछा.

‘‘मेरा एक दोस्त आजकल सब्जी बेच रहा है. उस के यहां से खरीद कर मैं आप को भिजवा दूंगा और पैसे हिसाब में लिख दूंगा.

‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. दुकान पर लड़का अकेला है,’’ कह कर मंथन चलने को हुआ.

‘‘दुकान पर चले जाना, लेकिन पहले मेरी बहन खुशबू के हाथ की चाय तो पी लो,’’ रजत बोला.

इस के बाद रजत ने खुशबू को इशारा किया, तो वह किचन में चाय बनाने चली गई. थोड़ी देर बाद गरमागरम चाय आ गई.

चाय खत्म कर मंथन बाहर जाने लगा कि तभी रजत ने टोका, ‘‘बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात चल रही थी. इतना उपकार तो तुम ने मु झ पर दिया है, लेकिन अभी मैं चलनेफिरने में नाकाम हूं. मेरी खुशबू के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी है. मु झे यह भी मालूम है कि तुम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हो. मेरे पिताजी पुराने खयालात के थे, लेकिन अब दुनिया बदल रही है. मु झे भी नए ढंग से सोचना होगा.

‘‘तुम दोनों बेकुसूर होते हुए भी सजा काट रहे हो, इसलिए मेरी तुम से एक गुजारिश है कि तुम मेरी बहन को स्वीकार कर लो. बहुत दुख दिया है मैं ने तुम दोनों को. आज से मु झे तुम मेरी जिम्मेदारियों से मुक्त करो.

‘‘मेरी बहन जहां और जिस के साथ खुश रहेगी, वहीं उस की शादी होनी चाहिए. लेकिन मेरी माली हालत बहुत खराब है. मैं दहेज नहीं दे सकता.’’

‘‘दहेज नहीं दे सकते… मतलब मु झे मुफ्त में आप की बहन से शादी करनी पड़ेगी?’’ मंथन बोला.

खुशबू ने कनखियों से मंथन को ताका. उस को लगा कि अब फिर से वह कुंआरी रह जाएगी. मंथन तो दहेज ले कर ही मानेगा.

तभी मंथन खिलखिला कर हंस पड़ा, ‘‘भाई साहब, आप की बहन को मैं एक जोड़े में विदा करवा कर ले जाऊंगा. अभी मेरी दुकान बहुत बढि़या चल रही है. मैं अपनी दोनों बहनों की शादी कर चुका हूं. हर तरह की जिम्मेदारी का बो झ खत्म हो गया है.

‘‘खुशबू जैसी सम झदार जीवनसाथी पा कर मेरा काम और भी आसान हो गया है. अच्छा, अब मैं चलता हूं. आप लोग शादी की तारीख तय कीजिए.’’

अब रजत, सविता और खुशबू के चेहरे पर खुशी नजर आ रही थी. Story In Hindi

News Story In Hindi: अधूरी बाइक ट्रिप और लद्दाख हिंसा

News Story In Hindi: आज पूरे 3 दिन हो गए थे. विजय, अनामिका, श्रीधर और संजय मनाली में थे. वे चारों 2 बाइक्स पर दिल्ली से मनाली गए थे. सोचा था कि वहां कुछ दिन गुजार कर वे आगे लेहलद्दाख तक बाइक से ही जाएंगे. पर पिछले 2 दिन से पहाड़ों के मौसम ने करवट बदल ली थी. बर्फबारी शुरू हो गई थी. विजय और अनामिका अपने कमरे में बंद थे.

बढ़ती ठंड ने विजय और अनामिका के प्यार की गरमी बढ़ा दी थी. जब रात के 10 बजे वह अपनी नाइटी में बाथरूम से बाहर निकली, तो बिस्तर पर लेटे विजय की जैसे ‘आह’ निकल गई.

अनामिका गजब ढहा रही थी. झीनी नाइटी में उस के नाजुक अंग दिख रहे थे. विजय से रुका नहीं गया और बोला, ‘‘अब इनविटेशन दूं क्या बिस्तर में आने का… पहले ही इतनी सर्दी है और तुम भी इतनी दूर हो.’’

‘‘सब्र का फल हमेशा मीठा होता है. मु झे पता है कि तुम्हारे मन में क्या तिकड़म चल रही है. पर जनाब, याद है न कल हमें बाइक टूर की जानकारी लेनी है. हम दोनों पहली बार बाइक से इतनी दूर लद्दाख जा रहे हैं. अगर आज रात को हम वक्त पर नहीं सोए, तो कल की थकान सफर पर भारी पड़ सकती है,’’ अनामिका ने बड़ी अदा से कहा.

पर विजय कहां मानने वाला था. बिस्तर पर बैठते ही उस ने अनामिका को दबोच लिया और रजाई के अंदर ले गया. अनामिका ने मना नहीं किया और अंदर ही अपनी नाइटी उतार दी. विजय ने उसे अपनी बांहों में भर लिया.

अनामिका बहुत ज्यादा गरम लग रही थी. उस की सांसें तेज चल रही थीं. विजय ने उस के माथे को चूमा और लाइट बंद कर दी. फिर काफी देर तक उन दोनों के बीच प्यार का खेल चला.

अगली सुबह वे चारों नहाधो कर बाइक टूर के औफिस में चले गए. उन के पास बाइक्स थीं, ट्रिप का सारा सामान था, बस कुछ बेसिक बातें जाननी थीं, ताकि ट्रिप में कोई रुकावट न आए.

बाइक टूर आपरेटर ने बताया, ‘‘जून से सितंबर तक के महीने लेहलद्दाख घूमने के लिए सब से अच्छे माने जाते हैं. मोटरसाइकिल सवार खासतौर पर विभिन्न दर्रों से गुजर सकते हैं, जो आमतौर पर इस दौरान खुले रहते हैं.’’

‘‘तो क्या सही बाइक चुनना भी जरूरी होता है?’’ संजय ने सवाल किया.

‘‘देखिए, लेहलद्दाख के सफर के लिए सब से अच्छी बाइक, जिस की सब से ज्यादा सिफारिश की जाती है, वह है 350सीसी इंजन वाली रौयल एनफील्ड. ऐसा नहीं है कि और बाइक अच्छी नहीं हैं, पर यह बाइक हो तो ज्यादा सही रहता है,’’ उस टूर आपरेटर ने बताया.

‘‘हमारे पास यही बाइक्स हैं,’’ अनामिका ने खुश हो कर कहा.

‘‘आप को अपनी बाइक की ऐक्स्ट्रा चाबी साथ रखनी चाहिए. ऐक्स्ट्रा चेन लौक, ऐक्स्ट्रा टायर, स्पेयर क्लच, ऐक्सेलरेटर केबल, चेन लुब्रिकैंट, इंजन औयल, हैडलाइट बल्ब, टायर ट्यूब भी ऐक्स्ट्रा रहेगी, तो सफर में कोई दिक्कत आने पर सुविधा रहेगी.’’

‘‘हमारे पास हैलमैट, घुटने और कोहनी गार्ड, वाटरप्रूफ दस्ताने, जूतों की अच्छी जोड़ी, राइडिंग जैकेट, धूप का चश्मा भी है,’’ विजय ने कहा.

‘‘चूंकि लद्दाख में हवा का दबाव ज्यादा रहता है, तो वहां आप को सिरदर्द, मतली और थकान की शिकायत हो सकती है. लिहाजा, आप ब्रेक लेले कर ही ऊपर जाएं. अगर आप को कोई और समस्या है, तो अपने डाक्टर से जरूर सलाह लें और जरूरी दवाएं अपने पास रखें.

‘‘इतना ही नहीं, लेहलद्दाख बाइक ट्रिप के लिए आप को सभी जरूरी परमिट और दस्तावेज हासिल करने के लिए तैयार रहना होगा, जिन्हें आप को रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न चैकपौइंट्स पर दिखाना होगा. जिला प्रशासन और ग्रीन ट्रिब्यूनल, ऐसी 2 अथौरिटी हैं, जो आप के ट्रिप के लिए जरूरी सभी परमिट जारी करती हैं.

‘‘एक और जरूरी बात, सफर शुरू करने से पहले अपने साथ काफी नकदी रखना जरूरी है, क्योंकि रास्ते में आप को ज्यादा एटीएम नहीं मिलेंगे. कुछ जरूरी स्नैक्स जैसे नूडल्स, चिप्स, प्रोटीन बार भी अपने साथ रख सकते हैं. मेरी सलाह है कि आप अपनी बाइक के लिए तकरीबन 20 लिटर ऐक्स्ट्रा ईंधन जरूर रखें.’’

‘‘और कोई जरूरी टिप?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘आप अपने परिवार वालों को अपनी लोकेशन और सफर के बारे में जानकारी देते रहें,’’ टूर आपरेटर ने बताया.

पूरी जानकारी लेने के बाद वे चारों अपने होटल के नीचे चाय पीने के लिए रुक गए.

‘‘तो क्या विचार है? मौसम तो खराब है, आगे चलें फिर अपने बाइक ट्रिप के लिए?’’ श्रीधर ने पूछा.

इतना सुन कर चाय बनाने वाला लोकल लड़का बोला, ‘‘लद्दाख जा रहे हैं क्या?’’

‘‘हां,’’ विजय ने कहा.

‘‘मेरी मानिए तो अभी मत जाना. एक तो बर्फबारी हो गई है, ऊपर से लद्दाख के हालात ज्यादा सही नहीं हैं. सोनम वांगचुक मामला अब सुप्रीम कोर्ट में चला गया है. इस के बाद ही पता चलेगा कि लद्दाख में आने वाला समय कैसा रहेगा,’’ वह लड़का बोला.

‘‘अरे, यह बात तो हमारे दिमाग से निकल ही गई थी. पिछले कुछ दिनों से हम खबरों से दूर ही रहे हैं. तुम्हें
कुछ जानकारी है क्या इस पूरे मामले की?’’ अनामिका ने उस चाय वाले लड़के से पूछा.

इसी बीच अपनी धुन में खोए हुए श्रीधर ने अपनी बाइक साफ करते हुए अनामिका से पूछा, ‘‘लद्दाख तो एकदम शांत जगह रही है हमेशा से, फिर यह अचानक अशांत एरिया कैसे बन गया है?’’

अनामिका भी किसी गहरी सोच में डूबी हुई लग रही थी. हालांकि उस ने श्रीधर का सवाल सुन लिया था, पर फिर भी कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘क्या हुआ अनामिका? बताओ मुझे कि यह सब चल क्या रहा है?’’ श्रीधर ने अनामिका को जैसे झक झोर कर पूछा.

इसी बीच चाय बनाने वाले लोकल लड़के ने बताया, ‘‘बौस, मामला थोड़ा सियासी ज्यादा है. साल 2019 में भारत सरकार ने जम्मूकश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था. साथ ही, इसे जम्मूकश्मीर और लद्दाख में बांट कर अलगअलग केंद्रशासित प्रदेश बना दिया था.

‘‘लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा मिलने से वहां के लोग उस समय बेहद खुश थे, पर कुछ दिनों बाद ही लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग उठने लगी.’’

‘‘इस के लिए यहां के लोकल लोगों ने क्या किया?’’ श्रीधर ने उस लड़के से सवाल किया.

‘‘इस सिलसिले में यहां के लोग कई बार अनशन पर बैठे. शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया. इस बार भी लेह में मशहूर पर्यावरणविद सोनम वांगचुक और एपैक्स बौडी लेह का अनशन चल रहा था. यह अनशन 35 दिनों तक चलना था.

‘‘इसी चक्कर मे एपैक्स बौडी लेह की युवा शाखाओं ने 24 सितंबर को लेह बंद करने का ऐलान किया था. बंद के दिन अनशन वाली जगह पर बड़ी तादाद में लोग जमा हो गए. बीते 5 सालों में ऐसा पहली बार हुआ, जब प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए.

‘‘लेकिन इस के तुरंत बाद सोनम वांगचुक ने अनशन खत्म कर दिया. पर दिन बाद ही उन्हें नैशनल सिक्योरिटी ऐक्ट (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया.’’

‘‘फिर तो मामला जरूर बिगड़ा होगा. धरने वाली जगह पर तब कैसा माहौल था?’’ श्रीधर ने पूछा.

‘‘अनशन लेह के एक पार्क में हो रहा था. हम 26 सितंबर को इस इलाके में थे. वहां कुरसियां बिखरी पड़ी थीं. मोटरसाइकिलें और स्कूटी उलटी पड़ी दिखीं. बिस्तर और दूसरी चीजें तहसनहस थीं. अनशन की जगह से कुछ ही दूरी पर वे इलाके हैं, जहां हिंसा हुई थी.

‘‘लेहमनाली हाईवे पर दाईं और बाईं तरफ लेह हिल काउंसिल और भारतीय जनता पार्टी का लेह दफ्तर है. दोनों ही इमारतों को प्रदर्शनकारियों ने नुकसान पहुंचाया. भाजपा दफ्तर के कुछ हिस्सों में आग लगाई गई, शीशे तोड़ दिए गए.

‘‘हिंसा के बाद लेह में सिक्योरिटी काफी सख्त कर दी गई. सड़कों और गलीकूचों को कंटीले तारों से बंद किया गया. लोगों के चलनेफिरने पर पाबंदी लगा दी गई.’’

‘‘इस मसले पर शांति से भी तो बातचीत हो सकती थी न?’’ अनामिका बोली.

‘‘लोगों की मांगों के सिलसिले में केंद्र सरकार और एपैक्स बौडी लेह के बीच बीते कई सालों से बातचीत का सिलसिला चल रहा है. कई बार यह बातचीत बंद भी हो चुकी है. इस बार अनशन शुरू होने के बाद केंद्र सरकार फिर से बातचीत शुरू करने के लिए तैयार हो गई थी.

‘‘केंद्र सरकार ने 6 अक्तूबर को एपैक्स बौडी लेह और कारगिल डैमोक्रेटिक अलायंस के साथ बातचीत की तारीख भी तय की थी. हालांकि, अब एपैक्स बौडी लेह ने फिलहाल बातचीत से दूर रहने का फैसला किया है.

‘‘एपैक्स बौडी लेह के कोचेयरपर्सन चेरिंग दोरजे लकरुक का कहना है, ‘सोनम वांगचुक के साथ 7 या 8 लोगों ने अनशन शुरू किया था. उस के बाद बहुत सारे लोग जुड़ते गए. यह सिलसिला चल रहा था. हमारे युवा संगठनों ने 24 सितंबर को बंद का आह्वान किया था.’

‘‘चेरिंग दोरजे लकरुक ने आगे बताया, ‘दूसरे दिन जब बंद होना था, तो उम्मीद से बहुत ज्यादा लोग हमारे अनशन वाली जगह पर आ गए थे. मेरे अंदाजे के मुताबिक तकरीबन 7,500 लोग अनशन की जगह पर आए थे. वे इतनी बड़ी तादाद में थे कि बेकाबू हो गए और किसी की माने बगैर वे बाहर चले गए. शुरू में उन्होंने लेह काउंसिल के दफ्तर पर पथराव करना शुरू किया. युवा काफी भड़क गए थे. वे गोली से डरने वाले नहीं थे.’

‘‘इस के बाद देशभर में इस हिंसा के बाद सियासत का दौर शुरू हो गया,’’ वह लड़का बोला.

‘‘तुम सही कह रहे हो. लद्दाख के वर्तमान हालात और स्थानीय लोगों द्वारा किए जा रहे विरोध पर टिप्पणी करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ये मौजूदा हालात अनएक्सपैक्टेड नहीं थे. लद्दाख में तो यह होना ही था. उन को मक्खी की तरह दूध में से निकाल फेंका.

‘‘उन का इशारा इस ओर था कि लद्दाख के लोगों की मांगों की अनदेखी की जा रही थी, जिस का नतीजा यह विरोध है,’’ संजय ने अपनी राय रखी.

इस पर विजय बोला, ‘‘पर भारत के गृह मंत्रालय की ओर से जारी बयान में इस हिंसा के लिए सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया गया है. गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि सोनम वांगचुक ने उकसाऊ बयानों के जरीए भीड़ को भड़काया और जब हिंसा शुरू हुई तो भूख हड़ताल खत्म कर एंबुलैंस से अपने गांव चले गए. सोनम वांगचुक ने हालात को संभालने की कोई कोशिश नहीं की.’’

अनामिका बोली, ‘‘पर बाकी नेता तो सोनम वांगचुक के हक में खड़े दिखाई दे रहे हैं. जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एक्स पर लिखा, ‘लद्दाख को राज्य का दर्जा देने का वादा भी नहीं किया गया था. 2019 में लद्दाख के लोगों ने केंद्र शासित प्रदेश बनने का जश्न मनाया था और अब ये गुस्से में हैं. खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं. अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जब जम्मूकश्मीर को राज्य का दर्जा देने का वादा पूरा नहीं होता है, तो हम कितने ठगे गए और निराशा महसूस करते हैं. हम तो इस की मांग लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से कर रहे हैं.’

‘‘कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी चुप नहीं रहे. उन्होंने आरोप लगाया कि लद्दाख के लोगों की संस्कृति और परंपराओं पर भाजपा और आरएसएस हमला कर रहे हैं. सोचसम झ कर लद्दाख की संस्कृति, परंपरा और वहां के लोगों की ‘हत्या’ की जा रही है. लोगों की आवाज दबाई जा रही है, इसलिए ही सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर के जेल भेजा गया है.’’

इन चारों को ये बातें अखबारों और मीडिया चैनलों से पता चली थीं.

वह लोकल लड़का बोला, ‘‘एक नौजवान फौजी के मारे जाने पर राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा था, ‘पिता फौजी, बेटा भी फौजी, जिन के खून में देशभक्ति बसी है. फिर भी भाजपा सरकार ने देश के वीर बेटे की गोली मार कर जान ले ली, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लद्दाख और अपने अधिकार के लिए खड़ा था.

‘‘‘पिता की दर्दभरी आंखें बस एक सवाल कर रही हैं, क्या आज देशसेवा का यही सिला है? हमारी मांग है कि लद्दाख में हुई इन हत्याओं की निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी ही चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

‘‘‘मोदीजी, आप ने लद्दाख के लोगों को धोखा दिया है. वे अपना हक मांग रहे हैं, संवाद कीजिए… हिंसा और डर की राजनीति बंद कीजिए.’’’

अनामिका बोली, ‘‘अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट है और सुप्रीम कोर्ट ने सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्द किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने रासुका में की गई हिरासत को चुनौती देते हुए उन की रिहाई की मांग की है.’’

‘‘कुछ भी हो, जब हमारे देश के किसी भी कोने से ऐसी हिंसा की खबरें आती हैं, तो माहौल तो खराब होता है. हम यहां से लद्दाख बाइक से जाने वाले थे, पर पहले वहां हुई हिंसा और तोड़फोड़ के बाद अब मौसम ने भी ऐसी करवट बदली है कि हम पिछले 3 दिन से यहीं फंसे हुए हैं. आगे के रास्ते पर भारी जाम लगने का डर और इस बर्फबारी के बाद यहां लोगों की भीड़ बढ़ती जाएगी,’’ विजय बोला.

‘‘आप की सोच सही है. बाइक ट्रिप के लिए खुले मौसम का होना बहुत जरूरी है. सब से बड़ी बात यह कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लद्दाख की जनता क्या ऐक्शन लेगी या केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन क्या नई नीति बनाएंगे, यह देखना जरूरी होगा. आप फिलहाल तो अपना बाइक ट्रिप टाल दीजिए और मनाली से ही वापस चले जाएं,’’ उस चाय वाले लड़के ने कहा.

उन चारों ने एकदूसरे का मुंह देखा और हामी भरते हुए अपने होटल के अंदर चले गए. News Story In Hindi

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