सत्यकथा: कातिल ही बन गया हत्या का चश्मदीद गवाह

20 जनवरी, 2022 की सुबह के करीब 7 बज रहे थे. कभी न सोने वाले शहर मुंबई के भिवंडी इलाके में सुबहसुबह लोग अपने घरों से काम के लिए निकले थे. कुछ पैदल तो कुछ आटोरिक्शा में, कुछ अपनी गाडि़यों में, हर कोई अपने काम पर पहुंचने के लिए भाग रहा था.

ऐसे ही पैदल काम पर जा रहा एक शख्स जोकि भिवंडी के रुपाला ब्रिज के नीचे से होते हुए सड़क के दूसरी ओर जा रहा था, उसे ब्रिज के नीचे झाडि़यों के पास एक बड़ी सी सफेद रंग की बोरी दिखाई दी. उस बोरी का मुंह ऊपर से बंधा हुआ था.

यह देख उस शख्स के कदम धीमे हो गए और वह रुक गया. उस ने बोरे पर नजर डाली तो देखा उस बोरी के अंदर से खून निकला था, जिस से वहां आसपास की जमीन भी लाल हो गई थी. यह देख उस शख्स के माथे पर पसीना आ गया. उसे यही लग रहा था कि जरूर इस बोरी में किसी की लाश है.

यह देख उस ने आसपास चलते हुए लोगों को बुला कर ब्रिज के नीचे बोरे में लाश पड़ी होने के बारे में बताया. इस के बाद उस युवक ने पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर के इस बारे में सूचना दी.

सूचना मिलते ही भिवंडी के निजामपुरा थानाप्रभारी नरेश पवार के नेतृत्व में पुलिस की टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. जिस शख्स ने फोन कर पुलिस को इस बारे में सूचना दी थी, पुलिस ने उस से पूछताछ की.

उस शख्स ने थानाप्रभारी नरेश पवार को जो कुछ उस ने देखा था, वह सब बयान कर दिया.

पुलिस ने जब वह बोरी खोली तो अंदर खून से लथपथ एक व्यक्ति की लाश निकली. उस के सिर, गरदन, सीने, चेहरे लगभग हर जगह पर जख्म के काफी गहरे निशान थे.

लाश की पहचान वहां जमा भीड़ नहीं कर पाई. लाश के कपड़ों में से सिर्फ डाक्टर की एक परची और एक हैडफोन मिला, जिसे पुलिस ने सबूत के तौर पर अपने पास रख लिया. लेकिन उस की जेब में कहीं कोई पहचानपत्र, पैसे या और कोई चीज नहीं बरामद हुई.

थानाप्रभारी नरेश पवार की मुश्किलें और भी बढ़ गईं. थानाप्रभारी बारबार डैडबौडी को देख रहे थे कि किसी तरह से लाश की पहचान हो जाए तो मामला सुलझाने में मदद मिले. व्यक्ति के कपड़ों से डाक्टर की जो परची मिली थी, वह पुलिस के लिए एक बड़ी लीड थी.

पुलिस टीम ने सबूत जुटाने के लिए आसपास के इलाकों की अच्छी तरह से छानबीन की, लेकिन उन्हें किसी तरह के कोई और ठोस सबूत नहीं मिले. लेकिन जब थानाप्रभारी नरेश पवार ने व्यक्ति की कमीज को बहुत ध्यान से देखा तो उन का दिमाग अचानक से घूम गया.

दरअसल, व्यक्ति ने लाल रंग की शर्ट पहनी हुई थी, जिस में सुनहरे रंग के छोटेछोटे धब्बे पूरी शर्ट पर मौजूद थे. यह देख उन्हें अचानक से याद आया कि ऐसे सुनहरे रंग के छोटे धब्बे अकसर मोतियों की फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों के कपड़ों पर दिखाई पड़ते हैं.

थानाप्रभारी ने इस मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस की 3 टीमों का गठन कर दिया.

भिवंडी के एसपी प्रशांत धोले ने एक टीम को डाक्टर के पास पूछताछ करने के लिए भेजा, दूसरी टीम को उन्होंने आसपास के सभी मोतियों की फैक्ट्री में पूछताछ के लिए भेजा और तीसरी टीम को आसपास के सभी पुलिस थानों में किसी के गुमशुदा होने का पता लगाने के लिए भेजा.

हत्या के इस मामले की छानबीन करने के लिए पहली टीम शव की कमीज की जेब से बरामद हुई डाक्टर की मुड़ीतुड़ी, खून से भीगी हुई परची की मदद से एक डाक्टर के पते पर पहुंची.

इस डाक्टर की दुकान भिवंडी के खोनी गांव में अब्दुल्लाह मसजिद के पास थी. यह कोई बहुत बड़ा डाक्टर नहीं था, बल्कि वह बीएससी पास डाक्टर था, जोकि मरीजों को छोटेमोटे मर्ज की दवा दे दिया करता था.

पुलिस ने जब डाक्टर को परची दिखाते हुए यह पूछा कि क्या वह इस मरीज को जानता है जोकि 2 दिन पहले ही उस के पास से दवा ले कर गया था तो जवाब में डाक्टर ने कहा कि वह दिन भर करीब 100 मरीजों को देखता है. कौन, कब, किस चीज के लिए आया, वह इस की पहचान नहीं कर सकता.

टीम को डाक्टर से कुछ ठोस काम का सुराग नहीं मिला. लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने एक और तरीका आजमाया. उन्होंने उस डाक्टर की दुकान के पास जितने भी फार्मेसी (दवाई) की दुकानें थीं, उन सभी से पूछताछ की. लेकिन अफसोस कहीं से भी कुछ भी काम नहीं आया.

एक तरफ जहां पहली टीम डाक्टर के पते पर मृत व्यक्ति की पहचान के लिए पहुंची थी तो वहीं दूसरी टीम निजामपुरा इलाके में जितने भी पर्ल वर्कशौप (मोतियों की फैक्ट्री) थीं, उन सभी में पूछताछ के लिए पहुंची.

दूसरी टीम ने एकएक कर सभी फैक्ट्री मालिकों से उन के मजदूरों के बारे में पूछा कि क्या उन की फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों में से कोई था, जो 2 दिन से बिना बताए छुट्टी पर रहा हो.

निजामपुरा इलाके में काफी बड़ी संख्या में पर्ल वर्कशौप (फैक्ट्री) थीं, जिन्हें एक दिन में कवर कर पाना संभव नहीं था. ऐसी स्थिति में दूसरी टीम को भी कुछ खास लीड नहीं मिली.

पुलिस की पहली और दूसरी टीम को अपनेअपने टास्क दिए हुए थे तो तीसरी टीम भी अपना टास्क पूरा करने के लिए मैदान में उतरी हुई थी. तीसरी टीम का काम आसपास के सभी इलाकों के पुलिस थानों में लापता लोगों की सूची तैयार करना और उन के बारे में पता लगाना था.

इस काम को करने के लिए सब से पहले आसपास के इलाकों के थानों में पहले ही फोन कर जरूरी सूचना दे दी गई.

कुछ देर बाद आसपास के पुलिस थानों से तीसरी टीम को जो कुछ जानकारियां हासिल हुईं, वह उन की मांगी हुई जानकारियों से मेल नहीं खा रही थीं.

इस में जरूरी यह भी था कि हो सकता है कि हत्या को अंजाम एक दिन में ही दिया गया हो तो यह संभव है कि व्यक्ति के शव का पता लगाने के लिए अभी तक उस के घरपरिवार वाले पुलिस थाने में उस की गुमशुदगी के लिए न पहुंचे हों.

ऐसे में पुलिस के पास इंतजार करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता बचा नहीं था.

पुलिस द्वारा बनाई गई तीनों टीमों के हाथ कोई ठोस सबूत या सुराग नहीं मिल पाया, जिस के दम पर आगे की छानबीन की जा सके.

20 जनवरी, 2022 की शाम तक मकतूल (कत्ल किए गए व्यक्ति) की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी, लेकिन उस की पहचान अभी तक पुलिस की टीम नहीं कर पाई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार व्यक्ति के सिर पर गहरी चोट और ज्यादा खून बह जाने की वजह से उस की मौत हुई थी. लेकिन सिर्फ पोस्टमार्टम रिपोर्ट को ले कर केस सुलझाना आसान नहीं था.

इस केस का अगला चैप्टर अगले दिन 21 जनवरी, 2022 को उस समय खुला, जब एक व्यक्ति, जिस का नाम मोहम्मद सलमान था, वह शाम को निजामपुरा थाने में पहुंचा. थानाप्रभारी को उस ने खुद को उस व्यक्ति की हत्या का चश्मदीद गवाह बताया. यह सुन कर थानाप्रभारी और केस में जुड़े अन्य पुलिसकर्मी दंग रह गए.

इतनी मशक्कत करने के बाद आखिरकार पुलिस के हाथों ऐसा बिंदु मिल गया था, जिसे आधार बना कर वे हत्यारों को पकड़ सकते थे. और यह अहम गवाह खुद चल कर पुलिस थाने में आया था.

एक पल के लिए पुलिस को सलमान पर शक तो हो रहा था, लेकिन इस मामले में सिवाए उस के और कोई भी जरूरी तथ्य मौजूद नहीं था.

उस ने पुलिस को बताया कि हत्या के समय वह मौकाएवारदात से मात्र 50 मीटर की दूरी पर था और उस व्यक्ति की हत्या होते हुए अपनी आंखों से देखी थी.

उस ने बताया कि जिस की हत्या हुई थी, उस की शक्ल वह नहीं देख पाया था. लेकिन उस ने हत्यारों को देखा था. उस ने पुलिस को इस मामले के बारे में सब कुछ बताने की बात कही.

लिहाजा निजामपुरा पुलिस की टीम सलमान को अपने साथ मौकाएवारदात पर ले गई और सलमान ने बारीबारी से जो कुछ अपनी आंखों से देखा था, वह सब बताया. उस ने हत्या की उस घटना को बारीकी से बयान किया.

पुलिस ने जब उस से पूछा कि क्या वह हत्यारों की पहचान कर सकता है तो उस ने कहा कि अगर कोई उन्हें उस के सामने ले कर आए तो वह उन की पहचान कर सकता है.

ऐसे में पुलिस ने भिवंडी के आर्ट कालेज से एक छात्र को हत्यारे का स्केच बनाने के लिए बुलाया. अगले दिन 22 जनवरी की सुबह 10 बजे तक सलमान के कहे अनुसार स्केच आर्टिस्ट ने हत्यारे का स्केच बना कर तैयार कर दिया.

उस स्केच की कौपी निजामपुरा पुलिस थाने के जरिए आसपास के सभी थानों में भेजी गई ताकि उस शक्ल का कोई व्यक्ति यदि पुलिस के रेकौर्ड में पहले से मौजूद हो तो उसे जल्द ही पकड़ लिया जाए.

लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ. सलमान ने जिस व्यक्ति का स्केच बनवाया था, वह पुलिस रेकौर्ड में कहीं पर भी पाया नहीं गया.

अभी पुलिस इस मामले की तह तक पहुंचने से काफी दूर थी कि निजामपुरा पुलिस थाने के पास शांतिनगर पुलिस थाने से एक खबर आई.

खबर यह थी कि एक महिला, जिस का नाम नजमा बानो (बदला हुआ नाम) था, वह थाने में अपने 45 वर्षीय पति की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराने पहुंची थी.

थानाप्रभारी ने बिना समय गंवाए तुरंत 2 पुलिसकर्मियों की एक टीम को उस महिला को निजामपुरा थाने ले कर आने को कहा. नजमा बानो से पूछताछ में पता चला कि उस का पति अरमान शेर अली 2 दिन से घर पर नहीं आया है. उस ने बताया कि इस से पहले उस ने कभी भी ऐसा नहीं किया.

उस ने बताया कि वह काम के अलावा जहां कहीं भी जाते थे, तो उसे अपने साथ ले कर जाते थे या फिर बता कर जाते थे. वह कभी भी घर से कहीं रात गुजारने के लिए नहीं गए.

अभी थाने में नजमा बानो से पूछताछ चल ही रही थी कि मामले की तह तक जाने के लिए जिन 3 टीमों का गठन किया गया था, उस में से दूसरी टीम को भी अहम लीड हाथ लगी.

दूसरी टीम इलाके में पर्ल वर्कशौप पर छानबीन कर रही थी तो पता चला कि एक फैक्ट्री में 45 वर्षीय एक मजदूर, जोकि पिछले 7-8 सालों से काम कर रहा था, वह पिछले 3 दिनों से काम पर नहीं आया था.

टीम ने थानाप्रभारी को सूचना दी कि उस मजदूर का नाम अरमान शेर अली शाह था और वह 3 दिनों से छुट्टी पर था, वह भी बिना बताए.

इस मामले की कडि़यां एकएक कर के जुड़ती जा रही थीं. ऐसे में नजमा को अरमान शेर अली शाह की पहचान के लिए उस मृत व्यक्ति के फोटो दिखाए.

नजमा ने तो उसे पहचानने से इनकार कर दिया. लेकिन नजमा के बेटे शारिक शाह ने शव की पहचान अपने पिता शेर अली शाह के रूप में कर ली.

शव का चेहरा देख उस की पहचान कर पाना मुमकिन नहीं था, लेकिन शारिक ने पुलिस को बताया कि उस के पिता की गरदन के पास एक बर्थ मार्क था, जोकि शव की गरदन पर भी था. ऐसे में दोनों मांबेटे को पतिपिता के खोने के दुख में बहुत गहरा सदमा लगा.

22 जनवरी, 2022 की शाम तक पुलिस की टीम को कुछ ऐसा हाथ लगा, जिस से मामला साफ हो गया.

मोहम्मद सलमान, जिस ने खुद को इस मामले का एकमात्र चश्मदीद गवाह करार दिया था, असलियत में सारे मामले की जड़ वही था.

दरअसल, सलमान पर पुलिस को पहले दिन से ही शक था, जिसे दूर करने के लिए थानाप्रभारी नरेश पवार ने अंदर ही अंदर एक और टीम को तैनात किया था जिस का काम सलमान के दावों की सच्चाई जानना था.

सलमान की गुप्त छानबीन में उस की काल डिटेल्स खंगाली गई तो पता चला कि जिस रात उस ने हत्या होते हुए देखने का दावा किया, उस रात को उस ने शेर अली शाह को कई फोन किए थे.

सिर्फ यही नहीं, पुलिस ने जब सलमान के पिछले ट्रैक रेकौर्ड को देखा तो पता चला कि जिस परोल रोड पर रुपाला ब्रिज के नीचे हत्या होने की बात कही, दरअसल उस रोड पर वह इस से पहले कभी गया ही नहीं था.

सलमान के रेकौर्ड पुलिस के सामने कई सवाल उठा रहे थे. ऐसे में पुलिस ने सलमान को हिरासत में लिया और उस से सख्ती से पूछताछ की.

वह पुलिस के सवालों के आगे ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया. उस ने पुलिस के सामने जब सच्चाई बयान की तो सभी सुनने वालों के होश उड़ गए.

सलमान ने बताया कि जिस पर्ल वर्कशौप में शेर अली शाह काम करता था, वहीं पर करीब 2 साल पहले 30 वर्षीय तसलीम अली अंसारी काम करने के लिए आया था. जहां पर उन दोनों की दोस्ती हुई. समय बीता तो दोनों की दोस्ती गहरी होती गई.

दोनों ने एकदूसरे के घर पर आनाजाना शुरू कर दिया. लेकिन इसी दौरान तसलीम और शेर अली शाह की पत्नी नजमा बानो के बीच जानपहचान बढ़ती गई.

शेर अली जब घर पर नहीं होता था, उस समय तसलीम उस के घर पर आताजाता था. लेकिन दोनों के बीच बन रहे इस नए रिश्ते की डोर ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रही. शेर अली को जल्द ही उस की पत्नी और तसलीम के बीच पनप रहे रिश्ते की खबर लग गई.

तभी से उन की दोस्ती में दरार पैदा हो गई और शेर अली ने तसलीम को धमकी देते हुए अपने घर न आने की हिदायत दी. लेकिन शेर अली के रोकने से उन दोनों के बीच रिश्ते खत्म नहीं हुए.

नजमा के लिए तसलीम का प्यार परवान चढ़ता जा रहा था. वह नजमा के लिए कुछ भी करने को तैयार था. लेकिन वहीं दूसरी ओर शेर अली ने नजमा पर पाबंदियां बढ़ा दीं. वह जहां कहीं भी जाता, नजमा को अपने साथ ले कर जाने लगा. यहां तक कि शेर अली काम पर भी नजमा को साथ ले कर जाने लगा.

यह बात तसलीम को बहुत खलने लगी. वह नजमा के साथ अपनी पूरी जिंदगी गुजारना चाहता था, लेकिन शेर अली द्वारा नजमा पर पाबंदियों से वह बेहद परेशान रहने लगा.

इसी से छुटकारा पाने के लिए और नजमा को अपने साथ उत्तर प्रदेश अपने गांव भगा ले जाने के लिए उस ने शेर अली को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस ने सलमान जोकि शेर अली को जानता था, उस के जरिए 19 जनवरी, 2022 की रात को शेर अली को फोन करवाया.

सलमान ने शेर अली से बात कर कहा कि तसलीम उस के जीवन से हमेशा के लिए निकल जाएगा, बस एक बार वो उस से मिलना चाहता है. आखिरी बार मिलने के लिए शेर अली सलमान की बात मान गया और उस रात साढ़े 10 बजे रुपाला ब्रिज के नीचे पहुंच गया.

शेर अली के रुपाला ब्रिज के पास पहुंचते ही तसलीम, सलमान और उन के साथ एक और युवक चंदबाबू अंसारी तीनों ने मिल कर शेर अली पर हमला कर दिया.

वे अपने साथ लोहे की रौड ले कर आए थे, जिस से उन्होंने शेर अली के सिर, गरदन और चेहरे पर जोरदार वार किए.

सिर पर चोट और ज्यादा खून बह जाने की वजह से शेर अली की मौत हो गई. जिस के बाद वह शेर अली की लाश को प्लास्टिक की सफेद रंग की बोरी में डाल कर वहां से भाग निकले.

सलमान को पुलिस के पास जा कर हत्या का चश्मदीद बनने का प्लान भी तसलीम ने ही दिया था. वह पुलिस की तफ्तीश को भटकाना चाहता था.

उसे यकीन था कि कुछ ही दिनों में यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा, जिस के बाद कोई उन के पीछे नहीं पड़ेगा. लेकिन अफसोस उन का यह प्लान असफल रहा.

सलमान के सच उगलने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. साथ ही 48 घंटों के भीतर ही सलमान की निशानदेही पर बाकी दोनों आरोपियों को भिवंडी में एक कालोनी से गिरफ्तार कर लिया.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पहचान – भाग 4 : मां की मौत के बाद क्या था अजीम का हाल

असम के ग्रामीण इलाकों में बाढ़ का प्रकोप कुछ कम हुआ तो एनआरसी यानी नैशनल रजिस्टर औफ सिटीजन्स का प्रकरण फिर शुरू हुआ.

राबिया का परिवार अपना घरबार, जमीन खो कर जड़ से कट चुका था. अभी के हालात में दो जून की रोटी और अमन से जीने की हसरत इतनी माने रखती थी कि अम्मी और राबिया फिर से उसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहती थीं.

इधर, नीरद चाहता था कि एनआरसी की दूसरी लिस्ट में उन का नाम आ जाए. अभी नीरद इसी मामले में बात कर अपने घर की सीढि़यों से ऊपर चढ़ा ही था, और बाहर तक उसे छोड़ने आई राबिया अपने घर की तरफ मुड़ी ही थी, कि शाम के धुंधलके वाले सन्नाटे में कोई राबिया का मुंह झटके से अपने हाथों में दबा, तेजी से पीछे जंगल की ओर घसीट ले गया. वह इतनी फुरती में था कि राबिया को संभलने का मौका न मिला.

राबिया के घर के पीछे घनी अंधेरी झाडि़यों में ले जा कर उस ने राबिया को जमीन पर पटक दिया और उस के सीने पर बैठ गया. उस के चेहरे के पास अपना चेहरा ले जा कर अपना मोबाइल औन कर के उस ने अपना चेहरा दिखाया और शैतानी स्वर में पूछा, ‘‘पहचाना?’’

राबिया घृणा और भय से सिहर उठी. उस ने अपना चेहरा राबिया के चेहरे के और करीब ला कर फुसफुसा कर कहा, ‘‘जो सोचा भी नहीं जा सकता वह कभीकभी हो जाता है. अब तुम्हारे सामने 3 विकल्प हैं. पहला, तुम रोज रात को इसी जगह मेरी हसरतें पूरी करो चाहे नीरद से रिश्ता रखो. दूसरा, अपने परिवार को ले कर चुपचाप यहां से चली जाओ, किसी से बिना कुछ कहे, नीरद से भी नहीं. अंतिम विकल्प, मुझ से बगावत करो, इसी घर में रहो, नीरद को फांसो और अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो.

‘‘वैसे, अंजाम भी सुन ही लो. 3 जिंदगियां खतरे में होंगी. नीरद, अजीम और तुम्हारी अम्मी की. हां, तुम्हें आंच नहीं आने दूंगा जानेमन. तुम तो मेरी हसरतों की आग में घी का काम करोगी.’’

सन्नाटे पर चोट सी पड़ती उस की खूंखार आवाज से बर्फ सी ठंडी पड़ चुकी राबिया दहल गई थी. उस के शरीर को अश्लील तरीके से छूता हुआ वह परे हट बैठा और अपनी कठोर हथेली में उस के गालों को भींच कर बोला, ‘‘देखा, मैं कितना शानदार इंसान हूं. मैं तुम्हें आसानी से हासिल कर सकता था, लेकिन मैं चाहता हूं तुम खुद को खुद ही मुझे सौंपो. जैसे सौंपोगी नीरद को. उफ, वह क्या मंजर होगा. तुम मेरी आगोश में होगी- और वह पल, नीरद के साथ धोखा… कयामत आएगी उस पर.

‘‘लगेहाथ यह भी बता दूं, नीरद की शादी तय हो गई है, खानदानी लड़की से, सरकारी लिस्ट वाली.’’

राबिया बेहोशी सी हालत में घर पहुंची तो यथासंभव खुद को संभाले रही और नीरद के साथ बाहर चले जाने का बहाना बना दिया. लड़की जात ही ऐसी होती है, ड्रामेबाज. कभी मां से, कभी प्रेमी, पति, भाई या पिता से झूठ बोलती ही रहती है. अपना दर्द छिपाती है, डर छिपाती है ताकि अपने निश्चित रहें, शांत और खुश रहें.

सुबह हुई तो राबिया को फिर शाम का डर सताने लगा. इतने में नीरद आ गया. उस का व्यवहार उखड़ा सा था. आते ही वह कह पड़ा, चलो, अब और नहीं रुकूंगा. रजिस्ट्री मैरिज के लिए आज ही आवेदन दे दूंगा.’’

राबिया सकते में थी. ‘‘इतनी जल्दी? सब मानेंगे कैसे?’’ फिर रजिस्ट्री होगी कैसे? वह तो सब की नजर में घुसपैठिया है.

कागज का टुकड़ा जाने कब कहां किस बाढ़ में बह गया. वे तो बेगाने ही हो गए. नीरद ने अम्मी के पांव छू लिए. कहा, ‘‘अम्मी, आप बस आशीर्वाद दे दो, बाकी मैं संभाल लूंगा. रात को घर में मां और भाई ने खूब हंगामा किया.

‘‘मां ने मेरी शादी एक नामी खानदानी परिवार में तय कर रखी है. मोटी रकम देंगे वे. मुझे कल रात यह बात पता चली. मेरे पिता की मृत्यु के बाद से मैं ही घर की जिम्मेदारी उठा रहा हूं. पिता की पैंशन से मां मनमाना खर्च करती हैं और 32 साल के मेरे निकम्मे बड़े भाई को दे देती हैं. बड़ा भाई पहली शादी से तलाक ले कर आवारागर्दी करता है. पार्टी से जुड़ा है और पार्टी फंड के नाम पर उगाही कर के जेब गरम करता है. अब इन दोनों का मेरी निजी जिंदगी में दखल मैं कतई बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

राबिया के दिल में तूफान उठा. वह अपने साथ हुए उस भयानक हादसे को जेहन में रोक कर न रख सकी. आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, ‘‘नीरद,’’ कहते हुए उस की हिचकियां बंध गईं. अम्मी अजीम को ले कर बाहर चली गईं.

नीरद पास आ गया था. उस की आंखों में बेइंतहा प्रेम और हाथों में अगाध विश्वास का स्पर्श था. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ है, राबी? बताओ मुझे. शायद कहीं मेरा अंदेशा तो सही नहीं? तुम ही बताओ राबी?’’

‘‘तुम्हारा बड़ा भाई,’’ सिर झुकाए हुए आंसुओं की धार में राबिया के सारे मलाल बाहर निकल आए. नीरद को गुस्से में होश न रहा, चिल्ला कर पूछा, ‘‘क्या कर दिया कमजर्फ ने?’’

राबिया सकते में आ गई. नीरद के हाथ पकड़ कर विनती के स्वर में कहा, ‘‘कुछ कर नहीं पाया, मगर जंगल में खींच कर ले गया था मुझे.’’ बाकी बातें सुनते ही नीरद आपे से बाहर हो गया, कहा, ‘‘चलो थाने, रिपोर्ट लिखाएंगे.’’

‘‘आप के परिवार की इज्जत?’’

‘‘तुम्हारे दुख से बड़ी नहीं. क्या तुम ने उस का चेहरा देखा था? उस ने जैसा तुम्हें धमकाया था, वैसा वाकई कर दिखाया?’’

‘‘साफसाफ देखा मैं ने उसे. वह खुद चाहता था कि मैं उसे पहचानूं, खौफ खाऊं.’’

नीरद उन तीनों को ले कर थाने तो गया लेकिन वहां उन की नागरिकता के प्रश्न पर उन्हें जलील ही होना पड़ा. पुलिस वालों ने कहा, ‘‘तब तो पहले एनआरसी में नाम दर्ज करवाओ, फिर यहां आओ. जब हमारे यहां के नागरिक हो ही नहीं, तो हमें क्या वास्ता?’’

न्याय, अन्याय और सुखदुख की मीमांसा अब इंसानियत के हाथों में नहीं थी. बाध्य हो कर नीरद ने अपने कद्दावर दोस्त माणिक का सहारा लिया. वह एक सामाजिक संस्था का मुखिया था और समाज व राजनीतिक जीवन में उस की गहरी पैठ थी.

उस ने उन लोगों को शरण भी दी और देखभाल का जिम्मा भी लिया. नीरद भी कुछ दिन माणिक के घर से औफिस आनाजाना करता रहा.

इस बीच, नीरद ने अपने बड़े भाई की हरकतों का उस की ही पार्टी के राज्य हाईकमान से शिकायत की और उसे काबू में रखने का इशारा करते हुए उन की पार्टी की बदनामी का जिक्र किया. हाईकमान को बात समझ आ गई. उसी शाम जब वह फिर राबिया को तहसनहस करने के मंसूबे बांध उस के खाली घर के पास बिना कुछ जाने मंडरा रहा था. पार्र्टी हाईकमान के गुर्गों ने राबिया के घर के पीछे की झाडि़यों में ले जा कर उस की सारी हसरतें पूरी कर दीं. साथ ही, हाईकमान का आदेश भी सुना दिया, ‘पार्टी बदनाम हुई तो वह जिंदा नहीं बचेगा.’

इधर, यह कहानी यहां रुक तो गई, लेकिन नीरद की जिंदगी की नई कहानी कैसे शुरू हो? रजिस्ट्री तो तब होगी जब राबिया खुद को असम की लड़की साबित कर पाएगी.

पर क्या नीरद का प्रेम इन बातों का मुहताज है? जब उस ने धर्मजाति नहीं देखी तो अब नागरिकता पर अपने प्रेम की बलि चढ़ा दे?

प्रेम तो मासूम तितली सा नादान, दूसरों के दर्द, दूसरों की खुशी का वाहक  है जैसे परागकणों को तितलियां ले जाती हैं एक से दूसरे फूलों में.

नीरद ने अपना तबादला दिसपुर कर देने की अर्जी लगाई. भले ही वहां काम ज्यादा हो, लेकिन राबिया को नजदीक पाने के लिए वह कुछ ज्यादा भी मेहनत कर लेगा.

सच कहते हैं, भला मानुष कभी अकेला नहीं पड़ता. चार दुश्मन अगर उस के हों भी, सौ दोस्त भी उस के हर सुखदुख में साथ होते हैं. नीरद भी ऐसा ही था. ज्यादातर वह लोगों से मदद लेता कम था, देता अधिक था. औफिस के सारे स्टाफ वाले उस की अच्छाई के कायल थे. इसलिए कानून भले ही अड़ंगा था, मगर इंसानों ने इंसानियत का तकाजा अपने कंधों पर संभाल लिया था. नीरद और राबिया के प्यार की मासूमियत को सभी दिल से महसूस कर रहे थे और औफिस में फाइलें आगे बढ़ाते हुए उस के दिसपुर स्थानांतरण की राह प्रशस्त कर दी थी.

दिसपुर पहुंच कर नीरद और नीरद की राबी ने गुवाहाटी और दिसपुर के कुछ लोगों के सामने एकदूसरे को अपना बना लिया.

देश अभी भी बड़ी अफरातफरी में था. इंसानों पर जाति, धर्म और नागरिकता के टैग लगाने की बड़ी रेलमपेल लगी थी. इधर, नीरद और राबी ने दुनिया की रीत पर लिख दी अपने प्यार की पहचान. इंसान की सब से बड़ी पहचान राबी और उस के परिवार को मिल गई थी.

शादी से पहले मेरा मासिकचक्र संतुलित था तो क्या विवाह के बाद इसमें असंतुलन आना सामान्य है?

सवाल
मैं 24 साल की नवविवाहित युवती हूं. विवाह हुए अभी 5 महीने ही बीते हैं. मैं जब से अपने पति के घर में आई हूं मेरे पीरियड्स कभी जल्दी तो कभी देर से आ रहे हैं. विवाह से पहले मासिकचक्र  बिलकुल संतुलित था. क्या विवाह के बाद मासिकचक्र में असंतुलन आना सामान्य बात है?

जवाब
अनेक नवविवाहिताएं विवाह के बाद इस परेशानी से गुजरती हैं. महीना समय से नहीं होता और दिनों में घटबढ़ होने के साथसाथ मासिकस्राव की मात्रा भी घटबढ़ सकती है. यह शारीरिक फेरबदल ससुराल के नए सामाजिक परिवेश और उस में उपजी मानसिक उथलपुथल से संबंध रखता है.

नया घर, नए लोग, नई परिस्थितियां सभी शरीर की हारमोनल प्रणाली पर गहरी छाप डालते हैं, जिस से मासिकचक्र का संतुलन बना कर रखने वाली धुरी का बैलेंस बिगड़ जाता है. पर इस में घबराने की कोई बात नहीं.

समय के साथ जैसेजैसे आप अपने को नए घर के अनुसार ढाल लेंगी, मासिकचक्र की धुरी भी अपने सामान्य संतुलन में लौट आएगी.

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अनियमित हो रहे पीरियड्स तो करें ये घरेलू उपाय

महिलाओं में असमय पीरियड्य की समस्या एक समान्य बात है. पीरियड्स में कभी कभी अनियमितता आम है पर जब ये परेशानी हमेशा होने लगे तो आपको सचेत हो जाना चाहिए. कई महिलाओं में पीरियड्स में 15 से 20 दिनों की देरी हो जाती है. अगर महिलाओं को इतने दिनों तक पीरियड्स ना आएं तो उन्हें कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. इसमें बदन दर्द,पीठ में दर्द,बालों का झड़ना, घबराहट प्रमुख परेशानियां हैं.

इस दौरान आपको बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है ये सब हार्मोन परिवर्तन होने की वजह से होता है. इस खबर में हम बताएंगे कि मासिक धर्म या पीरियड की होने वाली परेशानियों का घरेलू उपचार आप कैसे कर सकती हैं. इन नुस्खों से आपके पीरियड की समस्या दूर हो जाएगी.

जीरा

पीरियड्स से होने वाली परेशानियों में जीरा काफी कारगर होता है. इसके अलावा उस दौरान होने वाले दर्द में भी काफी राहत देता है. इससे आपको आयरन मिलता है जो महिलाओं में पीरियड्स के दौरान कम हो जाता है. एक चम्‍मच जीरे में साथ 1 चम्‍मच शहद का सेवन हर रोज करें.

बादाम

रात को 2 छुआरे और 4 बादाम को पानी में भिगो कर रख दें. सुबह इनके साथ थोड़ा सी मिश्री के साथ इन्हें पीस लें और मक्खन के साथ इसका सेवन करें. मासिक धर्म से जुडी समस्याएं दूर हो जाएंगी.

अदरक

पीरियड्स को नियमित करने के लिए अदरक बेहद लाभकारी है. इससे पीरियड्स में होने वाले दर्द में भी काफी आराम मिलता है. इसके लिए आप आधा चम्मच अदरक को पीस लें और 1 कप पानी में सात मिनट तक उबालें. अब इसमें थोड़ी शक्कर डालें और खाना खाने के बाद इसे दिन में 3 बार पिएं. ऐसा कम से कम 1 महीने तक करे.

कच्‍चा पपीता

पीरियड्स की परेशानी में कच्चा पपिता काफी कारगर होता है. इसमें ढेर सारा पोषण, एंटीऔक्‍सीडेंट और बीमारी को ठीक करने वाले गुण होते हैं. कच्‍चे पपीते का सेवन मासिक धर्म से जुड़ी हर समस्‍याएं ठीक हो सकती हैं.

अपारदर्शी सच- भाग 1: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

रात के 11 बज चुके थे. तनुजा की आंखें नींद और इंतजार से बोझिल हो रही थीं. बच्चे सो चुके थे. मम्मीजी और मनीष लिविंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. तनुजा का मन हो रहा था कि मनीष को आवाज दे कर बुला ले, लेकिन मम्मी की उपस्थिति के लिहाज के चलते उसे ठीक नहीं लगा. पानी पीने के लिए किचन में जाते हुए उस ने मनीष को देखा पर उन का ध्यान नहीं गया. पानी पी कर भी अतृप्त सी वह वापस कमरे में आ गई.

बिस्तर पर बैठ कर उस ने एक नजर कमरे पर डाली. उस ने और मनीष ने एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल रख कर इस कमरे को सजाया था.

हलके नीले रंग की दीवारों में से एक पर खूबसूरत पहाड़ी, नदी से गिरते झरने और पेड़ों की पृष्ठभूमि से सजी पूरी दीवार के आकार का वालपेपर. खिड़कियों पर दीवारों से तालमेल बिठाते नैट के परदे, फर्श से छत तक की अलमारियां, तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधनों से भरी अंडाकार कांच की ड्रैसिंगटेबल, बिस्तर पर साटन की रौयल ब्लू चादर और टेबल पर सजा महकते रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता. उसे लगा, सभी मनीष का इंतजार कर रहे हैं.

तनुजा की आंख खुली, तब दिन चढ़ आया था. उस का इंतजार अभी भी बदन में कसमसा रहा था. मनीष दोनों हाथ बांधे बगल में खर्राटे ले कर सो रहे थे. उस का मन हुआ, उन दोनों बांहों को खुद ही खोल कर उन में समा जाए और कसमसाते इंतजार को मंजिल तक पहुंचा दे. लेकिन घड़ी ने इस की इजाजत नहीं दी. फुरफुराते एहसासों को जूड़े में लपेटते वह बाथरूम चली गई.

बेटे ऋषि व बेटी अनु की तैयारी करते, सब का नाश्ताटिफिन तैयार करते, भागतेदौड़ते खुद की औफिस की तैयारी करते हुए भी रहरह कर एहसास कसमसाते रहे. उस ने आंखें बंद कर जज्बातों को जज्ब करने की कोशिश की, तभी सासुमां किचन में आ गईं. वह सकपका गई. उस ने झटके से आंखें खोल लीं और खुद को व्यस्त दिखाने के लिए पास पड़ा चाकू उठा लिया पर सब्जी तो कट चुकी थी, फिर उस ने करछुल उठा लिया और उसे खाली कड़ाही में चलाने लगी. सासुमां ने चश्मे की ओट से उसे ध्यान से देखा.

कड़ाही उस के हाथ से छूट गई और फर्श पर चक्कर काटती खाली कड़ाही जैसे उस के जलते एहसास उस के जेहन में घूमने लगे और वह चाह कर भी उन्हें थाम नहीं पाई.

एक कोमल स्पर्श उस के कंधों पर हुआ. 2 अनुभवी आंखों में उस के लिए संवेदना थी. वह शर्मिंदा हुई उन आंखों से, खुद को नियंत्रित न कर पाने से, अपने यों बिखर जाने से. उस ने होंठ दबा कर अपनी रुलाई रोकी और तेजी से अपने कमरे में चली गई.

बहुत कोशिश करने के बावजूद उस की रुलाई नहीं रुकी, बाथरूम में शायद जी भर रो सके. जातेजाते उस की नजर घड़ी पर पड़ी. समय उस के हाथ में न था रोने का. तैयार होतेहोते तनुजा ने सोते हुए मनीष को देखा. उस की बेचैनी से बेखबर मनीष गहरी नींद में थे.

तैयार हो कर उस ने खुद को शीशे में निहारा और खुद पर ही मुग्ध हो गई. कौन कह सकता है कि वह कालेज में पढ़ने वाले बच्चों की मां है? कसी हुई देह, गोल चेहरे पर छोटी मगर तीखी नाक, लंबी पतली गरदन, सुडौल कमर के गिर्द लिपटी साड़ी से झांकते बल. इक्कादुक्का झांकते सफेद बालों को फैशनेबल अंदाज में हाईलाइट करवा कर करीने से छिपा लिया है उस ने. सब से बढ़ कर है जीवन के इस पड़ाव का आनंद लेती, जीवन के हिलोरों को महसूस करते मन की अंगड़ाइयों को जाहिर करती उस की खूबसूरत आंखें. अब बच्चे बड़े हो कर अपने जीवन की दिशा तय कर चुके हैं और मनीष अपने कैरियर की बुलंदियों पर हैं. वह खुद भी एक मुकाम हासिल कर चुकी है. भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति है जो उस के चेहरे, आंखों, चालढाल से छलकती है.

मनीष उठ चुके थे. रात के अधूरे इंतजार के आक्रोश को परे धकेल एक मीठी सी मुसकान के साथ उस ने गुडमौर्निंग कहा. मनीष ने एक मोहक नजर उस पर डाली और उठ कर उसे बांहों में भर लिया. रीढ़ में फुरफुरी सी दौड़ गई. कसमसाती इच्छाएं मजबूत बांहों का सहारा पा कर कुलबुलाने लगीं. मनीष की आंखों में झांकते हुए तपते होंठों को उस के होंठों के पास ले जाते शरारत से उस ने पूछा, ‘‘इरादा क्या है?’’ मनीष जैसे चौंक गए, पकड़ ढीली हुई, उस के माथे पर चुंबन अंकित करते, घड़ी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक ही है, तुम्हारे औफिस का टाइम हो गया है, तुम निकल जाना.’’ और वे बाथरूम की तरफ बढ़ गए.

जलते होंठों की तपन को ठंडा करने के लिए आंसू छलक पड़े तनुजा के. कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रही उपेक्षित, अवांछित. फिर मन की खिन्नता को परे धकेल, चेहरे पर पाउडर की एक और परत चढ़ा, लिपस्टिक की रगड़ से होंठों को धिक्कार कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

पहचान – भाग 3 : मां की मौत के बाद क्या था अजीम का हाल

नीरद की मां का इस तरह बोल कर निकल जाना अम्मी को काफी मायूस कर गया. अब चोरों की तरह अपनी ही नजरों से खुद को छिपाना भारी हो गया था. हमेशा बस यही डर कि किसी को पता न लग जाए कि वे सरकारी लिस्ट के बाहर के लोग हैं. जाने कितनी पुश्तों से इस माटी में रचेबसे अब अचानक खुद को घुसपैठिए सा महसूस करने लगे हैं. जैसे धरती पर बोझ. जैसे चोरी की जिंदगी छिपाए नहीं छिप रही.

भरोसा उन्हें इस अनजान धरती पर भले ही नीरद का था, लेकिन काम के सिलसिले में वह भी तो अकसर शहर से बाहर ही रहता. इस घटना को अभी 4-5 दिन बीते होंगे. नीरद अभी भी शहर से बाहर ही था और दूसरे दिन आने वाला था. राबिया ने शाम को अपनी रसोई की खिड़की से एक साया सा देखा. वह साया एक पल को खिड़की के सामने रुक कर तुरंत हट गया.

उस रात थोड़ा डर कर भी वह शांत रह गई, किसी से कुछ नहीं कहा. नीरद दूसरे दिन घर वापस आया और उन से मिला भी, लेकिन बात आईगईर् हो गई. नीरद 3 दिनों बाद फिर शहर से बाहर गया. शाम को रसोई की खिड़की के बाहर राबिया ने फिर एक आकृति देखी. एक पल रुक कर वह आकृति सामने से हट गई. राबिया दौड़ कर बाहर गई. कोई नहीं था. राबिया पसोपेश में थी. अम्मी खामख्वाह परेशान हो जाएंगी. यह सोच कर वह बात को दबा गई.

हां, राबिया को इन सब से छुट्टी नहीं मिली. खिड़की, एक आकृति, इन सब का डर और फिर बाहर झपटना और कुछ न देख पाना. राबिया मानसिक रूप से लगातार टूट रही थी.

अगले हफ्ते नीरद वापस आया तो उसे सारी बातें बताने की सोच कर भी वह डर कर पहले चुप रह गई.

दरअसल, राबिया का डर लाजिमी था. एक तो नीरद ने उन दोनों के आपसी रिश्ते पर अब तक बात नहीं की थी, दूसरे, अम्मी और अजीम की जिंदगी राबिया की किसी गलती की वजह से अधर में न लटक जाए. दरअसल, राबिया तो अब तक नीरद की चुप्पी देख खुद के एहसासों को भी खत्म कर लेने का जिगर पैदा कर चुकी थी.

खिड़की पर रोजरोज किसी का दिखना कोई छोड़ा जाने वाला मसला नहीं लगा राबिया को और उस ने हिम्मत कर ही ली कि नीरद को सारी बातें बताई जाएं.

नीरद समझदार था. उसे अंदेशा हुआ कि हो न हो कोई राबिया के लिए ही आता हो. गिद्दों की नजर पड़ने में देर ही कहां लगती है. एक परिवार को वह खुद के भरोसे उन की जमीन से उखाड़ लाया है. क्या वह राबिया के लिए कोई जिम्मेदारी महसूस करता है? क्या यह सिर्फ जिम्मेदारी ही है?

अजीम बाहर खेल रहा था, और अम्मी टेलर की दुकान से अभी तक नहीं लौटी थीं. नीरद को यह सही वक्त लगा. उस ने राबिया से कहा, ‘‘राबिया, मैं तुम से एक बात पूछना चाहता हूं.’’

राबिया की धड़कनें धनसिरी के उफानों से भी तेज चलने लगीं. आशानिराशा के बीच डोलती उस की आंखों की पुतलियां भरसक स्थिर होने की कोशिश में लगीं नीरद की आंखों से जा टकराईं.

नीरद ने कहा, ‘‘राबिया, तुम्हारा नाम मुझे लंबा लगता है, मैं तुम्हें ‘राबी’ कह कर बुलाना चाहता हूं. इजाजत है?’’

‘‘है, है, सबकुछ के लिए इजाजत है.’’

राबिया का दिल खुशी के मारे मन ही मन बल्लियों उछल पड़ा. मगर शर्मीली राबिया बर्फ की मूरत बनी एक ही जगह शांत खड़ी रही और जमीन की ओर देखती स्वीकृति में बस सिर ही हिला सकी.

नीरद ने धीरे से पूछा, ‘‘तुम्हारी पसंद में कोई लड़का है जिस से तुम शादी कर सको? मुझे बता दो, यहां मैं ही तुम सब का अपना हूं?’’

‘इस की बातें किसी पराए की तरह चुभती हैं. कभी इस ने मेरे मन को टटोलने की कोशिश नहीं की. जबकि मैं न जाने इसे कब से अपना सबकुछ…’ राबिया आक्रोश पर काबू नहीं रख सकी और नीरद के सामने अपनेआप को जैसे पूरा खोल कर रख दिया अचानक, ‘‘चूल्हे में जाए

तुम्हारा अपनापन. आठों पहर दिल में कुढ़ती हूं, आंखों का पानी अब तेजाब बन गया है. अब सब्र नहीं मुझ में.’’

नीरद नजदीक आ कर उस की दोनों बांहें पकड़ उस की आंखों की गहरी झील में उतरता रहा. कितनी सीपियां यहां मोती छिपाए पड़ी हैं. वह कितना बेवकूफ था जो झिझकता ही रह गया.

राबिया प्रेम समर्पण और लज्जा से थरथरा उठी. धीरेधीरे वह नीरद के बलिष्ठ बाजुओं के घेरे में खुद को समर्पित कर उस के सीने से जा लगी.

नीरद ने उस पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए पूछा, ‘‘शादी करोगी मुझ से?’’

‘‘पर कैसे? तुम कर पाओगे? मेरा तो कोई नहीं, लेकिन तुम्हारा परिवार और समाज?’’

‘‘तुम प्यार करती हो न मुझ से?’’

‘‘क्या अब और भी कुछ कहना पड़ेगा मुझे?’’

‘‘फिर तुम मेरी हो चुकी, राबी. कोईर् इस सच को अब झुठला नहीं सकता.’’

नीरद के मन की हूर अब नीरद के लिए सच बन कर जमीन पर उतर चुकी थी. लेकिन इस सच को परिवार और समाज की जड़बुद्धि को कुबूल करवाना कोई हंसीखेल नहीं था.

अनोखी लव स्टोरी: जर्मन दुल्हन का बिहारी दूल्हा

बिहार के नवादा जिले में नरहट प्रखंड के रहने वाले सत्येंद्र कुमार 3 साल पहले स्वीडन में डाक्टरी की पढ़ाई करने गए थे. स्वीडन में शोध के दौरान लारिसा बेल्ज से उन की भेंट हुई. सत्येंद्र मैडिकल कालेज में स्किन कैंसर पर रिसर्च कर रहे थे. वहीं जर्मनी की डा. लारिसा बेल्ज भी थीं. उन के रिसर्च का टौपिक प्रोस्टेट कैंसर था.

दोनों का एक ही लक्ष्य था. कैंसर के फैलने की दर का पता लगाना. ताकि उस के अनुरूप मरीज के उपचार के लिए प्रभावकारी दवाएं दी जा सकें.

इसे ले कर दोनों के बीच डिसकशन होने होने लगी थी. कई बार जब उन का डिसकशन बोझिल हो जाता था, तब वे इधरउधर की बातें करने लगते थे. इसी सिलसिले में एक रोज सत्येंद्र ने कहा, ‘‘स्किन कैंसर जानलेवा नहीं है, इस का इलाज तो लोग हमारे यहां राजगीर के नेचुरल गर्म कुंड और झरने में स्नान कर के कर लेते हैं.’’

‘‘हाऊ इट?’’ लारिसा की आंखें आश्चर्य से फैल गईं. वह जानना चाहती थी कि आखिर वह कैसे हो सकता है. इस पर सत्येंद्र ने लोगों के उस पर बने विश्वास के बारे में बताया.

‘‘रिसर्च बताते हैं कि उस पानी में गंधक की मात्रा घुली होती है, इसलिए उन से निकलने वाला पानी लगातार गर्म रहता है. जो सीधे स्किन पर मैडिसिन की तरह असर डालता है. राजगीर में ऐसे कुल 17 गर्म झरने हैं. उस में स्नान करने के लिए लोग हजारों किलोमीटर की यात्रा कर आते हैं. सर्दियों में तो वहां पैर रखने की भी जगह नहीं होती.’’

लारिसा सत्येंद्र की बातें ध्यान से सुन रही थी. फिर बोली, ‘‘तब तो तुम्हें वहीं रिसर्च करनी चाहिए थी.’’

‘‘यह मजाक की बात नहीं है. इस का पता लगाना ही पड़ेगा कि कैंसर के मालीक्यूल किस तरह से फैलते हैं?’’ सत्येंद्र ने कहा.

‘‘…और मेरे वाले कैंसर का इंडिया में कैसे इलाज करते हैं?’’ लारिसा फिर मजाकिया लहजे में बोली.

सत्येंद्र ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया, ‘‘कम से कम तुम्हारी तरह तो नहीं.’’

‘‘तुम बहुत फनी बातें करते हो,’’ लारिसा बोली.

‘‘सीरियस बात तो यह है कि वहां इस के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं,’’ सत्येंद्र बोला.

‘‘लगता है मुझे वहां होना चाहिए,’’ लारिसा ने कहा.

‘‘जरूर, वहां तुम्हारा रिसर्च बहुत अच्छा होगा,’’ सत्येंद्र ने कहा.

‘‘तुम मुझे ले चलोगे अपने साथ?’’ लारिसा ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, 3 महीने बाद मैं अपना रिसर्च पेपर तैयार कर लूंगा, फिर प्रोग्राम बनाते हैं.’’

‘‘मैं इंडिया घूमना चाहती हूं. तुम्हारा बिहार भी देखना चाहती हूं. तुम्हारे मुंह से उस की बहुत तारीफ सुनी है, पढ़ा है. वहां मैडिसिन पर रिसर्च का इतिहास रहा है,’’ लारिसा बोली.

‘‘तुम ने बिलकुल सही सुना है. इन दिनों एक बात और सुनी जा रही है उस का भी तुम्हें कुछ पता है?’’ सत्येंद्र की यह बात सुन कर लारिसा अचानक चौंक पड़ी.

‘‘वह क्या?’’

‘‘चाइना में किसी तेजी से फैलने वाले वायरस का पता चला है.’’

‘‘डोंट वरी. हम यहां सेफ हैं,’’ लारिसा बोली.

ये बातें अक्तूबर 2019 की हैं. चाइना में सक्रिय हुए इस फ्लू प्रभाव वाले वायरस की छिटपुट खबरें आ रही थीं. हालांकि, लारिसा और सत्येंद्र अपना फोकस रिसर्च और करिअर पर बनाए हुए थे.

जब फुरसत में होते, तब वे इधरउधर की बातें करते हुए मन बहलाव कर लेते थे. एकदूसरे के कल्चर के बारे में भी जानने को उत्सुक रहते.

बातोंबातों में उन्होंने अपने परिवार के बारे में भी बातें शेयर की थीं. पकवानों और खानपान को जाना. पर्वत्यौहार पर चर्चा की. देश के बारे में जाना. देशदुनिया की राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चा की.

लारिसा सत्येंद्र की बातों से काफी प्रभावित हो गई थी. कारण वह उस के रिसर्च में काफी मदद कर रहा था. उस की भावना को भी समझने लगा था. यहां तक कि उस की कौफी पीने तक की जरूरतों को भी समझ चुका था.

जब कभी सत्येंद्र लारिसा को कौफी पीने या कहीं घूमने की बातें कहता था, तब उसे आश्चर्य होता था कि वह उस के मन में आई इच्छा को बगैर बताए समझ कैसे लेता है. एक बार उस ने पूछ लिया, ‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि मुझे अब कौफी पीनी चाहिए?’’

इस पर सत्येंद्र हंसता हुआ कहता, ‘‘यही तो हम इंडियंस की खासियत है.’’

यह सुन कर लारिसा उसे एकटक से निहारने लगती थी.

एक बार सत्येंद्र ने उस से कह भी दिया, ‘‘ऐसे मत देखो, यह दिल की भाषा है.’’

‘‘सही कह रहे हो. लगता है दिमाग और दिल दोनों में तुम्हारी जगह बन गई है.’’

सत्येंद्र का परदेस में तो लारिसा का अपने ही देश में मातापिता से सैकड़ों किलोमीटर दूर मैडिकल कालेज के हौस्टल में समय बीत रहा था. वे एकदूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह समझ चुके थे. रिसर्च के सिलसिले में लारिसा सत्येंद्र से सलाहमशविरा लिया करती थी, जबकि सत्येंद्र जर्मनी के बारे में जानने को इच्छुक रहता था.

देखते ही देखते 5 महीने कब निकल गए, उन्हें पता ही नहीं चला. मार्च 2020   की बात है. एक दिन सत्येंद्र लारिसा के पास आया और बोला, ‘‘हमें इंडिया जाना होगा. कोरोना वायरस काफी तेजी से फैल रहा है. तुम्हें भी हौस्टल छोड़ कर अपने घर चले जाना चाहिए.’’

‘‘क्या बात करते हो?’’ लारिसा आश्चर्य से बोली.

‘‘मैं सही कह रहा हूं. डब्लूएचओ ने चेतावनी दी है,’’ सत्येंद्र ने कहा.

सत्येंद्र लारिसा को गले लगा उदास मन से अपने हौस्टल के कमरे में आ कर सामान पैक करने लगा.

मार्च के अंतिम सप्ताह में सत्येंद्र दिल्ली आ गया. तब तक लौकडाउन लग चुका था. बड़ी मुश्किल से लिफ्ट ले कर नवादा स्थित अपने घर पहुंचा. उसे नहीं पता था कि लौकडाउन महीनों तक रहेगा.

साल 2020 का आधा साल निकल गया. इस बीच लारिसा से वीडियो काल पर बातें होती रहीं. दानों जल्द मिलने के लिए एकदूसरे को तसल्ली देते रहे. फिर भी उन का मिलना नहीं हो पा रहा था.

समय बीतने के साथसाथ उन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. पूरा एक साल बीत गया, लेकिन कोरोना की वजह से पैदा हुआ लौकडाउन और अनलौकसे उन के मिलने में बाधाएं बनी रहीं. तब तक उन के बीच 3 साल पहले अंकुरित प्रेम का बीज पूरी तरह से एक पौधा बन चुका था.

बिहार के डाक्टर को दिल दे चुकी लारिसा के मन में खलबली मची हुई थी. वह भारत आने को बेचैन थी. इधर सत्येंद्र कुमार ने बेरोटा निवासी अपने मातापिता  विष्णुदेव महतो और श्यामा देवी से साफसाफ कह दिया था वह अपनी पसंद की लड़की से ही शादी करेगा. वह पिछले 2 सालों में आने वाले शादी के लिए हर प्रस्ताव को ठुकरा चुका था.

उन के पसंद की दुलहन कोई और नहीं, बल्कि जर्मनी की डा. लारिसा बेल्ज ही थी. जैसे ही अंतरराष्ट्रीय फ्लाइटों का आवागमन शुरू हुआ, लारिसा सात समंदर पार कर फरवरी, 2022 माह के अंतिम सप्ताह में इंडिया आ गई.

कहते हैं न कि प्यार की कोई भाषा नहीं होती और न ही कोई सरहद उसे रोक सकती है. वह तो जातपात और धर्म से ऊपर होती है. लारिसा के साथ भी वैसा ही हुआ. वह अपने प्रेमी के साथ शादी के लिए इंडिया आ चुकी थी. राजगीर के होटल में ठहरी थी. वहीं शादी की तैयारी की गई थी.

वह शुभ दिन भी आ गया. इसी साल मार्च माह की 4 तारीख को होटल में हिंदू रीतिरिवाज से लारिसा को न केवल हल्दी का उबटन लगाया गया, बल्कि सारे रस्मोरिवाज पूरे कर वर पूजन तक के आयोजन किए गए. सिंदूर दान के बाद लारिसा बेल्ज सुहागन बन गई.

यह शादी क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई. लारिसा को शादी का विधिविधान अच्छा लग रहा था. वह बहुत खुश थी और सत्येंद्र के परिवार से मिलजुल रही थी. उन से जी भर कर बातें करना चाहती थी, लेकिन वह हिंदी नहीं जानती थी. केवल हावभाव से ही कुछ बातें समझ रही थी.

हालांकि उन्हें नवादा जिले में हिंदी की क्षेत्रीय भाषा मगही को समझने में थोड़ी मुश्किल आई, जिस का समाधान सत्येंद्र ने ही निकाल दिया. वह उस का अंगरेजी में अनुवाद कर देते थे.

शादी के बाद बेरौटा गांव में 5 मार्च, 2022 को एक रिसैप्शन का आयोजन किया गया था. वहां सगेसंबंधियों ने पहुंच कर देसी दूल्हे के साथ विदेशी दुलहन को आशीर्वाद दिया.

सभी विदेशी लड़की को शादी के जोड़े में एक झलक देखने के लिए बेताब थे. जैसे ही शादी के जोड़े में लोगों ने लारिसा को देखा, सभी खुश हो कर तालियां बजाने लगे.

लारिसा से शादी करने के बाद सत्येंद्र ही नहीं, बल्कि उन के पिता, मां, भाई और दूसरे रिश्तेदार बेहद खुश थे कि घर में एक नहीं बल्कि 2-2 डाक्टर हो गए.

लारिसा अपनी शादी के लिए स्पैशल वीजा ले कर इंडिया आई थी. उस के मातापिता को वीजा नहीं मिल पाया था. इस कारण वे शादी में शामिल नहीं हो पाए थे.

लारिसा बेल्ज ने अपने मातापिता से फोन पर शादी की खुशी जाहिर करते हुए कहा,

‘‘यहां लाइफ एंजौय कर रही हूं. यहां के लोग बहुत अच्छे हैं. यहां के कल्चर और जर्मनी के कल्चर में बहुत अंतर है. लेकिन, प्यार बड़ी चीज है. मैं अच्छे से भाषा नहीं समझ सकती, बस कुछ शब्द समझ पाती हूं.’’

लारिसा कथा लिखे जाने तक हिंदी में केवल नमस्ते बोलना सीख पाई थी.

जो मेहमान आते थे और उसे आशीर्वाद देते थे, उन को हाथ जोड़ कर नमस्ते बोलती थी. बताते हैं कि लारिसा के मातापिता ने स्वीडन में उन्हें एक घर दिया है, जहां दोनों चाहें तो आगे की जिंदगी गुजार सकते हैं.

लारिसा ने इस से पहले भारतीय व्यंजनों का नाम भर सुना था. रिसैप्शन के मौके पर जब उन का आनंद उठाया तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा.

अफजल इमाम मुन्ना

अपारदर्शी सच- भाग 3: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

निशा उस की अच्छी सहेली थी. उस से तनुजा की कशमकश छिपी न रह सकी. तनुजा को दिल का बोझ हलका करने को एक साथी तो मिला जिस से सहानुभूति के रूप में फौरीतौर पर राहत मिल जाती थी. निशा उसे समझाती तो थी पर क्या वह समझना चाहती है, वह खुद भी नहीं समझ पाती थी. उस ने कई बार इशारे में उसे विकल्प तलाशने को कहा तो कई बार इस के खतरे से आगाह भी किया. कई बार तनुजा की जरूरत की अहमितयत बताई तो कई बार समाज, संस्कार के महत्त्व को भी समझाया. तनुजा की बेचैनी ने उस के मन में भी हलचल मचाई और उस ने खुद ही खोजबीन कर के कुछ रास्ते सुझाए.

धड़कते दिल और डगमगाते कदमों से तनुजा ने उस होटल की लौबी में प्रवेश किया था. साड़ी के पल्लू को कस कर लपेटे वह खुद को छिपाना चाह रही थी पर कितनी कामयाब थी, नहीं जानती. रिसैप्शन पर बड़ी मुश्किल से रूम नंबर बता पाई थी. कितनी मुश्किल से अपने दिल को समझा कर वह खुद को यहां तक ले कर आई थी. खुद को लाख मनाने और समझाने पर भी एक व्यक्ति के रूप में खुद को देख पाना एक स्त्री के लिए कितना कठिन होता है, यह जान रही थी.

अपनी इच्छाओं को एक दायरे से बाहर जा कर पूरा करना कितना मुश्किल होता है, लिफ्ट से कमरे तक जाते यही विचार उस के दिमाग को मथ रहे थे. कमरे की घंटी बजा कर दरवाजा खुलने तक 30 सैकंड में 30 बार उस ने भाग जाना चाहा. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. दरवाजा खुला, उस ने एक बार आसपास देखा और कमरे के अंदर हो गई. एक अनजबी आवाज में अपना नाम सुनना भी बड़ा अजीब था. फुरफुराते एहसास उस की रीढ़ को झुनझुना रहे थे. बावजूद इस के, सामने देख पाना मुश्किल था. वह कमरे में रखे एक सोफे पर बैठ गई, उसे अपने दिमाग में मनीष का चेहरा दिखाई देने लगा.

क्या वह ठीक कर रही? इस में गलत क्या है? आखिर मैं भी एक इंसान हूं. अपनी इच्छाएं, अपनी जरूरतें पूरी करने का हक है मुझे. मनीष को पता चला तो?

कैसे पता चलेगा, शहर के इस दूसरे कोने में घरऔफिस से दसियों किलोमीटर दूर कुछ हुआ है, इस की भनक तक इतनी दूर नहीं लगेगी. इस के बाद क्या वह खुद से नजरें मिला पाएगी? यह सब सोच कर उस की रीढ़ की वह सनसनाहट ठंडी पड़ गई, उठ कर भाग जाने का मन हुआ. वह इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती. मनीष, मम्मी, बच्चे, जानपहचान वाले, रिश्तेदार सब की नजरों में वह नहीं गिर सकती.

वेटर 2 कौफी रख गया. कौफी की भाप के उस पार 2 आंखें उसे देख रही थीं. उन आंखों की कामुकता में उस के एहसास फिर फुरफुराने लगे. उस ने अपने चेहरे से हो कर गरदन, वक्ष पर घूमती उन निगाहों को महसूस किया. उस के हाथ पर एक स्पर्श उस के सर्वांग को थरथरा गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. वह स्पर्श ऊपर और ऊपर चढ़ते बाहों से हो कर गरदन के खुले भाग पर मचलने लगा. उस की अतृप्त कामनाएं सिर उठाने लगीं. अब वह सिर्फ एक स्त्री थी हर दायरे से परे, खुद की कैद से दूर, अपनी जरूरतों को समझने वाली, उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखने वाली.

सहीगलत की परिभाषाओं से परे अपनी आदिम इच्छाओं को पूरा करने को तत्पर वह दुनिया के अंतिम कोने तक जा सकने को तैयार, उस में डूब जाने को बेचैन. तभी वह स्पर्श हट गया, अतृप्त खालीपन के झटके से उस ने आंखें खोल दीं. आवाज आई, ‘कौफी पीजिए.’

कामुकता से मुसकराती 2 आंखें देख उसे एक तीव्र वितृष्णा हुई खुद से, खुद के कमजोर होने से और उन 2 आंखों से. होटल के उस कमरे में अकेले उस अपरिचित के साथ यह क्या करने जा रही थी वह? वह झटके से उठी और कमरे से बाहर निकल गई. लगभग दौड़ते हुए वह होटल से बाहर आई और सामने से आती टैक्सी को हाथ दे कर उस में बैठ गई. तनुजा बुरी तरह हांफ रही थी. वह उस रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

दोनों ओर स्थितियां चरम पर थीं. दोनों ही अंदर से टूटने लगे थे. ऐसे ही जिए जाने की कल्पना भयावह थी. उस रात तनुजा की सिसकियां सुन मनीष ने उसे सीने से लगा लिया. उस का गला रुंध गया, आंसू बह निकले. ‘‘मैं तुम्हारा दोषी हूं तनु, मेरे कारण…’’

तनु ने उस के होंठों पर अपनी हथेली रख दी, ‘‘ऐसा मत कहो, लेकिन मैं करूं क्या? बहुत कोशिश करती हूं लेकिन बरदाश्त नहीं कर पाती.’’

‘‘मैं तुम्हारी बेचैनी समझता हूं, तनु,’’ मनीष ने करवट ले कर तनुजा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया, ‘‘तुम चाहो तो किसी और के साथ…’’ बाकी के शब्द एक बड़ी हिचकी में घुल गए.

वह बात जो अब तक विचारों में तनुजा को उकसाती थी और जिसे हकीकत में करने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाई थी, वह मनीष के मुंह से निकल कर वितृष्णा पैदा कर गई.

तनुजा का मन घिना गया. उस ने खुद ऐसा कैसे सोचा, इस बात से ही नफरत हुई. मनीष उस से इतना प्यार करते हैं, उस की खुशी के लिए इतनी बड़ी बात सोच सकते हैं, कह सकते हैं लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी? क्या ऐसा करना ठीक होगा? नहीं, कतई नहीं. उस ने दृढ़ता से खुद से कहा.

जो सच अब तक संकोच और शर्मिंदगी का आवरण ओढ़े अपारदर्शी बन कर उन के बीच खड़ा था, आज वह आवरण फेंक उन के बीच था और दोनों उस के आरपार एकदूसरे की आंखों में देख रहे थे. अब समाधान उन के सामने था. वे उस के बारे में बात कर सकते थे. उन्होंने देर तक एकदूसरे से बातें कीं और अरसे बाद एकदूसरे की बांहों में सो गए एक नई सुबह मेें उठने के लिए.

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पहचान – भाग 2 : मां की मौत के बाद क्या था अजीम का हाल

उस ने राबिया से कहा, ‘‘अभी मैं तुम्हें यहां से सामान दे दूं तो नैशनल रजिस्टर में नाम दर्ज का अलग ही बखेड़ा खड़ा होगा. तुम्हारे परिवार का नाम छूटा है इस पहचान रजिस्टर में.’’

‘‘क्या करें, हम भी उन 40 लाख समय के मारों में शामिल हैं, जिन के सरकारी रजिस्टर में नागरिक की हैसियत से नाम दर्ज नहीं हैं. अब्बा नहीं हैं. जिंदगी जीने के लाले पड़े हुए हैं. नाम दर्ज करवाने के झमेले कैसे उठाएं?’’

‘‘ठीक है, तुम लोग पास ही के सरकारी स्कूल में बने शरणार्थी शिविरों में रह रहे हो न. मैं काम खत्म कर के 6 बजे तक सामान सहित वहां पहुंच जाऊंगा. तुम फिक्र न करो, मैं जरूर आऊंगा?’’

शिविर में आ कर राबिया की आंखें घड़ी पर और दिल दरवाजे पर अटका रहा. 2 कंबल, चादर और खानेपीने के सामान के साथ नीरद राबिया के पास पहुंच चुका था.

अम्मी तो धन्यवाद करते बिछबिछ जाती थीं. राबिया ने बस एक बार नीरद की आंखों में देखा. नीरद ने भी नजरें मिलाईं. क्या कुछ अनकहा सा एकदूसरे के दिल में समाया, यह तो वही जानें, बस, इतना ही कह सकते हैं कि धनसिरी की इस बाढ़ ने भविष्य के गर्भ में एक अपठित महाकाव्य का बीज ला कर रोप दिया था.

शरणार्थी शिविर में रोज का खाना तो दिया जाता था लेकिन नैशनल रजिस्टर औफ सिटिजन्स में जिन का नाम नहीं था, बिना किसी तकरार के वे भेदभाव के शिकार तो थे ही, इस मामले में आवाज उठाने की गुंजाइश भी नहीं थी क्योंकि स्थानीय लोगों की मानसिकता के अनुरूप ही था यह सबकुछ.

बात जब गलतसही की होती है, तब यह सुविधाअसुविधा और इंसानियत पर भी रहनी चाहिए. लेकिन सच यह है कि लोगों की तकलीफों को करीब से देखने के लिए हमेशा एक अतिरिक्त आंख चाहिए होती है.

बेबसी, अफरातफरी, इतिहास की खूनी यादें, बदले की झुलसाती आग, अपनेपरायों का तिकड़मी खेल और भविष्य की भूखी चिंता. राबिया के पास इंतजार के सिवा और कुछ न था.

नीरद जबजब आ जाता, राबिया, अजीम और उन की अम्मी की सांसें बड़ी तसल्ली से चलने लगतीं, वरना वही खौफ, वही बेचैनी.

राबिया नीरद से काफीकुछ कहना चाहती, लेकिन मौन रह जाती. हां, जितना वह मौन रहती उस का अंतर मुखर हो जाता. वह रातरातभर करवटें लेती. भीड़ और चीखपुकार के बीच भी मन के अंदर एक खाली जगह पैदा हो गई थी उस के. राबि?या के मन की उस खाली जगह में एक हरा घास का मैदान होता, शाम की सुहानी हवा और पेड़ के नीचे बैठा नीरद. नीरद की गोद में सिर रखी हुई राबिया. नीरद कुछ दूर पर बहती धनसिरी को देखता हुआ राबिया को न जाने प्रेम की कितनी ही बातें बता रहा है. वह नदी, हां, धनसिरी ही है. लेकिन कोई शोर नहीं, बदला नहीं, लड़ाई और भेदभाव नहीं. सब को पोषित करने वाली अपनी धनसिरी. अपनी माटी, अपना नीरद.

आज शाम को किराए के अपने मकान में लौटते वक्त आदतानुसार नीरद आया. नीरद के यहां आते अब महीनेभर से ऊपर होने को था.

राबिया एक  कागज का टुकड़ा झट से नीरद को पकड़ा उस की नजरों से ओझल हो गई.

अपनी साइकिल पर बैठे नीरद ने कागज के टुकड़े को खोला. असमिया में लिखा था, ‘‘मैं असम की लड़की, तुम असम के लड़के. हम दोनों को ही जब अपनी माटी से इतना प्यार है तो मैं क्या तुम से अलग हूं? अगर नहीं, तो एक बार मुझ से बात करो.’’

नीरद के दिल में कुछ अजीब सा हुआ. थोड़ा सा पहचाना, थोड़ा अनजाना. उस ने कागज के पीछे लिखा, ‘‘मैं तुम्हारी अम्मी से कल बात करूंगा?’’ राबिया को चिट्ठी पकड़ा कर वह निकल गया.

चिट्ठी का लिखा मजमून पढ़ राबिया के पांवों तले जमीन खिसक गई. ‘‘पता नहीं ऐसा क्यों लिखा उस ने? कहीं शादीशुदा तो नहीं? मैं मुसलिम, कहीं इस वजह से वह गुस्सा तो नहीं हो गया? क्या मैं ने खुद को असमिया कहा तो बुरा मान गया वह? फिर जो भी थोड़ाबहुत सहारा था, छिन गया तो?’’

राबिया का दिल बुरी तरह बैठ गया. बारबार खुद को लानत भेज कर भी जब उस के दिल पर ठंडक नहीं पड़ी तो अम्मी के पास पहुंची. उन्हें भरसक मनाने का प्रयास किया कि वे तीनों यहां से चल दें. जो भी हो वह नीरद को अम्मी से बात करने से रोकना चाहती थी.

अम्मी बेटी की खुद्दारी भी समझती थीं और दुनियाजहान में अपने हालात भी, कहा, ‘‘बेटी, बाढ़ से सारे रास्ते कटे पड़े हैं. कोई ठौर नहीं, खाना नहीं, फिर जिल्लत जितनी यहां है, उस से कई गुना बाहर होगी. जान के लाले भी पड़ सकते हैं. नन्हे अजीम को खतरा हो सकता है. तू चिंता न कर, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शाम को कुछ रसद के साथ नीरद हाजिर हुआ और सामान राबिया को पकड़ा कर अम्मी के पास जा बैठा. अम्मी का हाथ अपने हाथों में ले कर उस ने कहा, ‘‘राबिया की वजह से आप से और अजीम से जुड़ा. अब मैं सचमुच यह चाहता हूं कि आप तीनों मेरे साथ गुवाहाटी चलें. जब मेरा यहां का काम खत्म हो जाए तब मैं आप सब से हमेशा के लिए बिछुड़ना नहीं चाहता. गुवाहाटी में मैं राबिया को एक एनजीओ संस्था में नौकरी दिलवा दूंगा. अजीम का दाखिला भी स्कूल में हो जाएगा. आप सिलाई वगैरह का कोई काम देख लेना. और रहने की चिंता बिलकुल न करिए. वहां हमारा अपना घर है. आप को किसी चीज की कोई चिंता न होने दूंगा.’’

राबिया की तो जैसे रुकी हुई सांस अचानक चल पड़ी थी. बारिश में लथपथ हवा जैसे वसंत की मीठी बयार बन गई थी. अम्मी ने नीरद के गालों को अपनी हथेलियों में भर कर कहा, ‘‘बेटा, जैसा कहोगे, हम वैसा ही करेंगे. अब तुम्हें हम सब अपना ही नहीं, बल्कि जिगर का टुकड़ा भी मानते हैं.’’

अजीम यहां से जाने की बात सुन नीरद की पीठ पर लद कर नीरद को दुलारने लगा. नीरद ने राबिया की ओर देखा. राबिया मारे खुशी के बाहर दौड़ गई. वह अपनी खुशी की इस इंतहा को सब पर जाहिर कर शर्मसार नहीं होना चाहती थी जैसे.

महीनेभर बाद वे गुवाहाटी आ गए थे. नीरद के दोमंजिला मकान से लगी खाली जगह में एक छोटा सा आउटहाउस किस्म का था, शायद माली आदि के लिए. छत पर ऐसबेस्टस था. लेकिन छोटा सा 2 कमरे वाला हवादार मकान था. बरामदे के एक छोर पर रसोई के लिए जगह घेर दी गई थी. वहां खिड़की थी तो रोशनी की भी सहूलियत थी. पीछे छोटा सा स्नानघर आदि था. एक अदद सूखी जमीन पैर रखने को, एक छत सिर ढांपने को, बेटी राबिया की एनजीओ में नौकरी, अजीम का सरकारी स्कूल में दाखिला और खुद अम्मी का एक टेलर की दुकान पर सिलाई का काम कर लेना- इस से ज्यादा उन्हें चाहिए भी क्या था.

पर बात यह भी थी कि उन के लिए इतना पाना ही काफी नहीं रहा. नैशनल रजिस्टर औफ सिटिजन्स का सवाल तलवार बन कर सिर पर टंगा था. अगर जी लेना इतना आसान होता तो लोग पीढ़ी दर पीढ़ी एक आशियाने की तलाश में दरबदर क्यों होते? क्यों लोग अपनी कमाई हुई रोटी पर भी अपना हक जताने के लिए सदियों तक लड़ाई में हिस्सेदार होते? नहीं था इतना भी आसान जीना.

अभी 3-4 दिन हुए थे कि नीरद की मां आ पहुंची उन से मिलने. राबिया की मां ने सोचा था कि वे खुद ही उन से मिलने जाएंगी, लेकिन नीरद ने मना कर दिया था. जब तक वे दुआसलाम कर के उन के बैठने के लिए कुरसी लातीं, नीरद की मां ने तोप के गोले की तरह सवाल दागने शुरू किए.

‘‘नीरद ढंग से बताता कुछ नहीं, आप लोग हैं कौन? धर्मजात क्या है आप की? आप की बेटी रोज कहां जाती है? नीरद ने किराया कुछ बताया भी है या नहीं? हम ने यह घर माली के लिए बनवाया था. अब जब तक आप लोग हो, मेरा बगीचा फिर से सही कर देना. वैसे, हो कब तक आप लोग?’’

अम्मी ने हाथ जोड़ दिए, कहा, ‘‘दीदी, नीरद बड़ा अच्छा बच्चा है. बाढ़ में हमारा घरबार सब डूब गया. समय थोड़ा सही हो जाए, चले जाएंगे.’’

सिर से पांव तक राबिया की अम्मी को नीरद की मां ने निहारा और कहा, ‘‘घरवालों के सीने में मूंग दल कर बाहर वालों पर रहमकरम कर रहा है, अच्छा बच्चा तो होगा ही.’’

मेल इनफर्टिलिटी: कारण और इलाज

बांझपन सिर्फ औरतों की ही समस्या नहीं रह गई है, बल्कि तकरीबन 50 फीसदी शादीशुदा जोड़ों में से मर्दों में भी नामर्दी के मामले देखे गए हैं. ऐसा पाया गया है कि हर 3 में से एक मर्द कमोबेश नामर्दी की समस्या से पीड़ित रहता है.

बेऔलाद जोड़ों की तादाद में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है क्योंकि नामर्दी के चलते मर्द अपनी पत्नी को पेट से करने में नाकाम होते हैं. वैसे, अगर गर्भनिरोधक उपाय आजमाए बगैर एक साल तक हमबिस्तरी करने पर भी जब बच्चा नहीं ठहरता है तो इसे शुक्राणुओं की समस्या के चलते नामर्दी मान लिया जाता है.

आमतौर पर इस तरह की समस्या कमजोर शुक्राणु के चलते होती है जबकि बच्चा ठहरने के लिए शुक्राणु की ही जरूरत पड़ती है. ऐसे मामलों में औरतों की फैलोपियन ट्यूब तक शुक्राणु पहुंच ही नहीं पाते हैं और कई कोशिशों के बावजूद औरत पेट से होने में नाकाम रहती है.

इस समस्या के लिए कई बातें जिम्मेदार होती हैं. खास वजह धूम्रपान और ज्यादा मात्रा में शराब का सेवन करना है. ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि गठीला बदन बनाने के लिए लड़के कम उम्र से ही स्टेरौयड और दूसरी दवाओं का सेवन करने लग जाते हैं. इस वजह से बाद की उम्र में उन्हें इस समस्या का सामना करना पड़ जाता है. बहुत ज्यादा कसरत और डायटिंग के लिए भूखे रहने जैसी आदतें भी इस की खास वजहें हैं.

नौजवानों में तेजी से बढ़ते तनाव और डिप्रैशन के साथसाथ प्रदूषण और गलत लाइफस्टाइल के चलते एनीमिया की समस्या भी मर्दों में नामर्दी की वजह बनती है. इनफर्टिलिटी से जुड़े सब से बुरे हालात तब पैदा होते हैं जब मर्द के वीर्य में शुक्राणु नहीं बन पाते हैं. इस को एजूस्पर्मिया कहा जाता है. तकरीबन एक फीसदी मर्द आबादी भारत में इसी समस्या से पीडि़त है.

हमारे शरीर को रोज थोड़ी मात्रा में कसरत की जरूरत होती है, भले ही वह किसी भी रूप में क्यों न हो. इस से हमारे शारीरिक विकास को बढ़ावा मिलता है.

हालांकि कसरत के कई अच्छे पहलू भी हैं. मगर इस के कुछ बुरे पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है जिन की तरफ कम ही लोगों का ध्यान जाता है. मसलन, औरतों का ज्यादा कसरत करना बांझपन की वजह भी बन सकता है. वैसे, कसरत करने के कुछ फायदे इस तरह से हैं:

दिल बने मजबूत :

हमारे दिल की हालत सीधेतौर पर इस बात से जुड़ी होती है कि हम शारीरिक रूप से कितना काम करते हैं. जो लोग रोजाना शारीरिक रूप से ज्यादा ऐक्टिव नहीं रहते हैं, दिल से जुड़ी सब से ज्यादा बीमारियां भी उन्हीं लोगों को होती हैं खासतौर से उन लोगों के मुकाबले जो रोजाना कसरत करते हैं.

अच्छी नींद आना :

यह साबित हो चुका है कि जो लोग रोजाना कसरत करते हैं, उन्हें रात को नींद भी अच्छी आती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कसरत करने की वजह से हमारे शरीर की सरकेडियन रिदम मजबूत होती है जो दिन में आप को ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करती है और जिस की वजह से रात में आप को अच्छी नींद आती है.

शारीरिक ताकत में बढ़ोतरी :

हम में से कई लोगों के मन में कसरत को ले कर कई तरह की गलतफहमियां होती हैं, जैसे कसरत हमारे शरीर की सारी ताकत को सोख लेती है और फिर आप पूरे दिन कुछ नहीं कर पाते हैं. मगर असल में होता इस का बिलकुल उलटा है. इस की वजह से आप दिनभर ऐक्टिव रहते हैं, क्योंकि कसरत करने के दौरान हमारे शरीर से कुछ खास तरह के हार्मोंस रिलीज होते हैं, जो हमें दिनभर ऐक्टिव बनाए रखने में मदद करते हैं.

आत्मविश्वास को मिले बढ़ावा :

नियमित रूप से कसरत कर के अपने शरीर को उस परफैक्ट शेप में ला सकते हैं जो आप हमेशा से चाहते हैं. इस से आप के आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होती है.

रोजाना कसरत करने के कई सारे फायदे हैं इसलिए फिजिकल ऐक्टिविटी को नजरअंदाज करने का तो मतलब ही नहीं बनता, लेकिन बहुत ज्यादा कसरत करने का हमारे शरीर पर बुरा असर भी पड़ सकता है खासतौर से आप की फर्टिलिटी कम होती है, फिर चाहे वह कोई औरत हो या मर्द.

ऐसा कहा जाता है कि बहुत ज्यादा अच्छाई भी बुरी साबित हो सकती है. अकसर औरतों में एक खास तरह के हालात पैदा हो जाते हैं जिन्हें एमेनोरिया कहते हैं. ऐसी हालत तब पैदा होती है, जब एक सामान्य औरत को लगातार 3 महीने से ज्यादा वक्त तक सही तरीके से माहवारी नहीं हो पाती है.

कई औरतों में ऐसी हालत इस वजह से पैदा होती है क्योंकि वे शरीर को नियमित रूप से ताकत देने के लिए जरूरी कैलोरी देने वाली चीजों का सेवन किए बिना ही जिम में नियमित रूप से किसी खास तरह की कसरत के 3 से 4 सैशन करती हैं.

शरीर में कैलोरी की कमी का सीधा असर न केवल फर्टिलिटी पर पड़ता है, बल्कि औरतों की सैक्स इच्छा पर भी बुरा असर पड़ता है. साथ ही मोटापा भी इस में एक अहम रोल निभाता है क्योंकि ज्यादातर मोटी औरतें वजन घटाने के लिए कई बार काफी मुश्किल कसरतें भी करती हैं. इस वजह से भी उन की फर्टिलिटी पर बुरा असर पड़ता है.

इनफर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहे जोड़े शारीरिक और मानसिक तनाव की हालत में पहुंच जाते हैं. अकसर देखा गया है कि ऐसे मामलों में या तो शुक्राणु की मात्रा कम होती है या स्पर्म की ऐक्टिविटी बहुत कम रहती है. लिहाजा ऐसे शुक्राणु औरत के अंडाणु को गर्भाधान करने में नाकाम रहते हैं.

वैसे अब इनफर्टिलिटी से नजात पाने के लिए कई उपयोगी इलाज मुहैया हैं. ओलिगोस्पर्मिया में स्पर्म की तादाद बहुत कम पाई जाती है और एजूस्पर्मिया में तो वीर्य के नमूने में स्पर्म होता ही नहीं है. एजूस्पर्मिया में मर्द के स्खलित वीर्य से स्पर्म नहीं निकलता है जिसे जीरो स्पर्म काउंट कहा जाता है. इस का पता वीर्य की जांच के बाद ही लग पाता है.

कुछ मामलों में जांच के दौरान तो स्पर्म नजर आता है लेकिन कुछ रुकावट होने के चलते वीर्य के जरीए यह स्खलित नहीं हो पाता है. स्पर्म न पनपने की एक और वजह है वैरिकोसिल. इस का इलाज सर्जरी से ही मुमकिन है.

कुछ समय पहले तक पिता बनने के लिए या तो दाता के स्पर्म का इस्तेमाल करना पड़ता था या किसी बच्चे को गोद लेना पड़ता था, लेकिन अब चिकित्सा विज्ञान में स्टेम सैल्स टैक्नोलौजी की तरक्की ने लैबोरेटरी में स्पर्म बनाना मुमकिन कर दिया है.

लैबोरेटरी में  मरीज के स्टेम सैल्स का इस्तेमाल करते हुए स्पर्म को बनाया जाता है, फिर इसे विट्रो फर्टिलाइजेशन तरीके से औरत पार्टनर के अंडाशय में डाल कर अंडाणु में फर्टिलाइज किया जाता है. इस तरीके से वह औरत पेट से हो सकती है.

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