सूखता सागर: करण की शादी को लेकर क्यों उत्साहित थी कविता?

उधर मझली दीदी को अपनी ननद के घर जा कर रिश्ते की बात करनी थी. अत: खाना खा कर कविता चुपचाप अपने कमरे में आ गई.

उधर बच्चे भी उकताने लगे भैया का ड्राइवर कार से स्टेशन तक छोड़ गया था. अटैची, बैग और थैला कुली को दे कर कविता छोटू और बबली के हाथ थाम प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गई. बैंच पर बैठने के बाद कविता सोच में डूब गई कि लो भतीजे करण की शादी भी निबट गई. इतने महीनों से तैयारी चल रही थी, कितना उत्साह था इस शादी में आने का. पूरे 8 वर्ष बाद घर में शादी का समारोह होने जा रहा था. भैया ने तो काफी समय पहले ही सब को बुलावे के पत्र डाल दिए थे, फिर आए दिन फोन पर शादी की तैयारी की चर्चा होती रहती कि दुलहन का लहंगा जयपुर में बन रहा है… ज्वैलरी भी खास और्डर पर बनवाई जा रही है… मेहमानों के ठहरने की भी खास व्यवस्था की जा रही है…

इस में संदेह नहीं कि काफी खर्चा किया होगा भैयाभाभी ने. उन के इकलौते बेटे की शादी जो थी. पर पता नहीं क्यों इतने अच्छे इंतजाम के बावजूद कविता वह उत्साह या उमंग अपने भीतर नहीं पा सकी, जिस की उसे अपेक्षा थी. एक तो चलने के ऐन वक्त पर ही पति अनिमेष को जरूरी काम से रुकना पड़ गया था. वह तो डर रही थी कि पता नहीं भैयाभाभी क्या सोचेंगे कि इतने आग्रह से इतने दिन पहले से बुला रहे थे और दामादजी को ऐन वक्त पर कोई काम आ गया. पूरे रास्ते वह इसी भावना से आशंकित रही थी. मगर कानपुर पहुंचने पर जैसा ठंडा स्वागत हुआ उस से उस की यह धारणा बदल गई.

यहां भी तो स्टेशन पर यही ड्राइवर खड़ा था, उस के नाम की तख्ती लिए हुए. ठीक है भैया व्यस्त होंगे पर कोई और भी तो आ सकता था, लेने. घर पहुंचने पर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वह अकेली ही बच्चों के साथ आई है.

‘‘चलो कविता आ गई, बच्चे ठीक हैं, ऐसा करो श्यामलाल को साथ ले कर अपने कमरे में सामान रखवा लो, वहीं तुम्हारा चायनाश्ता भी पहुंच जाएगा. फिर नहाधो कर तैयार हो कर नीचे डाइनिंगहौल में लंच के लिए आओगी तो सब से मिल लेना,’’ भाभी बोलीं.

थकान तो थी ही सफर की, पर अब कविता का मन भी बुझ चला था. दोनों बड़ी बहनें पहले ही आ चुकी थीं. वे भी अपनेअपने कमरे में थीं. एक बड़े होटल में भैया ने सब के ठहरने का इंतजाम किया था.

थर्मस में चाय और साथ में नाश्ते की प्लेटें रख कर नौकर चला गया. चाय पी कर कुछ देर लेटने का मन हो रहा था पर बच्चों का उत्साह देख कर उन्हें नहला कर तैयार कर दिया. स्वयं भी तैयार हुई.

तभी कमरे में इंटरकौम की घंटी बजने लगी. शायद खाने के लिए सब लोग नीचे पहुंचने लगे थे. बड़ी दीदी और मझली दीदी से वहीं मिलना हुआ.

‘‘अरे कविता, इधर आ… बहुत दिनों बाद मिली है,’’ मझली दीदी ने दूर से ही आवाज दी.

बड़ी दीदी के घुटनों में तकलीफ थी, इसलिए सब उन्हें घेरे बैठे थे. भैया भी 2 मिनट को उधर आए. कुछ देर की औपचारिकता के बाद उन्हें ध्यान आया, ‘‘अरे, अनिमेष कहां है?’’

‘‘आ नहीं पाए भैया, क्या करें ऐन वक्त पर ही…’’

वह कुछ और कहने की भूमिका बना ही रही थी कि भैया ने बीच में ही टोक दिया, ‘‘कोई बात नहीं, तुम आ गईं, बच्चे आ गए… चलो अब बहनों के साथ गपशप करो,’’ कहते हुए भैया आगे बढ़ गए.

बड़ी दीदी के पास अपने घरपरिवार की उलझनें थीं तो मझली दीदी यहां अपनी बेटी के लिए रिश्ता खोज रही थीं.

‘‘दीदी, हम लोग एक ही हौल में रहते तो अच्छा रहता, देर रात तक गपशप करते… अब अपनेअपने कमरे में बंद हैं तो किसी की शक्ल तक नहीं दिखती कि कौनकौन मेहमान आए हैं, कहां ठहरे हैं, कैसे हैं. बस, खाने के समय मिल लो,’’ कविता के मुंह से निकल ही गया.

पर बड़ी दीदी तो अपनी ही उधेड़बुन में थीं. बोलीं, ‘‘मुझे तो अभी बाजार निकलना होगा. दर्द तो है घुटनों में पर किसी का साथ मिल जाता तो हो आती, बहू ने साडि़यां मंगवाई थीं… आज ही समय है. भाभी से ही कहती हूं कि गाड़ी का इंतजाम कर दें…’’

थे, ‘‘ममा, हम किस के साथ खेलें? हमारी उम्र का तो कोई है ही नहीं.’’

‘‘नीचे बगीचे में घूम आओ या फिर टीवी देख लेना.’’

बच्चों को भेज कर कविता लेट तो गई, पर नींद आंखों से कोसों दूर थी. 12 वर्ष पहले उस का स्वयं का विवाह हुआ था. फिर 8 साल पहले चचेरी बहन पिंकी का. अभी तक सारे विवाह अपने पुश्तैनी घर में ही होते रहे थे. घर छोटा था तो क्या हुआ, सारे मेहमान उस में आ जाते. आंगन में ही रात को सब की खाटें बिछ जातीं. दिन भर गहमागहमी रहती. शादी का माहौल दिखता. ढोलक की थाप पर नाचगाना होता. पिंकी के विवाह में जब आशा बूआ नाच रही थीं तो बच्चे हंसहंस कर लोटपोट हो रहे थे.

‘‘हाय दइया ततैयों ने खा लयोरे…’’ कहते हुए वे साड़ी घुटनों तक उठा लेतीं.

सब लोग हा…हा… कर के हंसते. तभी बड़ी ताईजी सब को डांटतीं कि बेटी का ब्याह है कोई नौटंकी नहीं हो रही, समझीं? पर फिर भी सब हंसते रहते और वही माहौल बना रहता. आज मांबाबूजी हैं नहीं, ताईजी भी इतनी बूढ़ी हैं कि कहीं आ जा नहीं सकतीं. बस छोटी बूआ आई हैं, दीदी बता रही थीं. पर वे भी शायद अकेली किसी कमरे में होंगी.

हां, दीदी कह तो रही थीं किसी से कि एक थाली कमरे में भिजवा दो. उस समय तो हलवाइयों की रौनक, मिठाई, नमकीन सब की खुशबू हुआ करती थी शादीब्याह के माहौल में, पर यहां तो बस चुपचाप अपने कमरे में बंद हैं. लग ही नहीं रहा है कि अपने घर की शादी में आए हैं.

शाम को बरात को रवाना होना था, बरात क्या होटल में ठहरे मेहमानों को ही चलना था, पास ही के एक दूसरे होटल में लड़की वाले ठहरे थे, वहीं शादी होनी थी.

पर जब तक कविता तैयार हो कर बच्चों को ले कर नीचे आई तो पता चला कि भैयाभाभी और करण तो पहले ही जा चुके हैं. कुछ लोग अब जा रहे थे, दोनों दीदियां भी नीचे खड़ी थीं.

‘‘अरे दीदी, करण का तिलक भी तो होना था,’’ कविता को याद आया.

‘‘अब रहने दे, सब लोग वहां पहुंच चुके हैं… नीचे ड्राइवर इंतजार कर रहा है,’’ कहते हुए मझली दीदी आगे बढ़ गईं.

ऐसा लग रहा था जैसे किसी दूसरे परिचित की शादी हो, खाने की अलगअलग मेजें लगी थीं, जैसा कि होटलों में होता है. सब लोग मेजों पर पहुंचने लगे.

‘‘फेरों के समय तो अपनी कोई जरूरत है नहीं,’’ बड़ी दीदी कह रही थीं.

‘‘और क्या, मेरी तो वैसे भी रात को देर तक जागने की आदत है नहीं. सुबह फिर जल्दी उठना है, 7 बजे की ट्रेन है, तो 6 बजे तक तो निकलना ही होगा,’’ मझली दीदी बोलीं.

तभी भाभी की छोटी बहन ममता हाथ में ढेर से पैकेट लिए आती दिखी.

‘‘दीदी आप लोग तो कल ही जा रहे हो न तो अपनेअपने गिफ्ट संभालो,’’ कहते हुए उस ने सभी को पैकेट और मिठाई के डब्बे थमा दिए.

‘‘पर मेरी तो ट्रेन सुबह 10 बजे की है, अभी इतनी जल्दी क्या है?’’ कविता के मुंह से निकला.

‘‘वह तो ठीक है पर दीदी जीजाजी को कहां सुबह समय मिल पाएगा, रात भर के थके होंगे. हां, आप अपने नाश्ते के समय लंच का डब्बा जरूर सुबह ले लेना.’’

मझली दीदी ने तो तब तक एक पैकेट के कोने से अंदर झांक भी लिया, ‘‘साड़ी तो बढि़या दी है भाभी ने,’’ वे फुसफुसाईं.

पर कविता चुप थी. अंदर कमरे में आ कर भी उसे देर तक नींद नहीं आई थी. रिश्ते क्या इतनी जल्दी बदल जाते हैं? क्या अब लेनादेना ही शेष रह गया है? प्रश्न ही प्रश्न थे उस के मन में जो अनुत्तरित थे.

सुबह चायनाश्ते के बाद वह तैयार हो कर नीचे उतरी तो भैयाभाभी नीचे ही खड़े थे.

‘‘कविता, तुम्हारा गिफ्ट पैक मिल गया है न… और हां, ड्राइवर नीचे ही है. तुम्हें स्टेशन तक छोड़ देगा. श्याम, गाड़ी में सामान रखवा दो,’’ भैया ने नौकर को आवाज दी.

इस तरह कविता की विदाई भी हो गई. दोनों दीदियां सुबह ही जा चुकी थीं. ड्राइवर को किसी और को भी छोड़ना था, इसलिए कविता को 2 घंटे पहले ही स्टेशन उतार गया.

बैंच पर बैठेबैठे कविता अनमनी सी हो गई थी. अभी भी घोषणा हो रही थी कि ट्रेन और 2 घंटे लेट है.

‘‘लो…’’ उस के मुंह से निकल ही गया.

‘‘ममा, हमें तो भूख लगी है…’’ छोटू की आवाज गूंजी तो उस ने एक पैकेट खोल लिया.

‘‘और कुछ खाना हो तो सामने से ले आऊं, अभी ट्रेन के आने में देर है.’’

‘‘हां ममा, जूस पीना है.’’

‘‘मुझे भी…’’

‘‘ठीक है, अभी लाती हूं.’’

‘बच्चे साथ थे तो मन कुछ बहल गया… अकेली होती तो…’ सोचते हुए कविता आगे बढ़ गई.

ट्रेन में बैठ कर बच्चे तो सो गए पर कविता चुपचाप खिड़की के बाहर देख रही थी… ‘पीछे छूटते वृक्ष, इमारतें… शायद ऐसे ही बहुत कुछ छूटता जाता है…’ सोचते हुए उस ने भी आंखें मूंद लीं.

अजनबी: आखिर कौन था उस दरवाजे के बाहर

‘‘नाहिद जल्दी उठो, कालेज नहीं जाना क्या, 7 बज गए हैं,’’ मां ने चिल्ला कर कहा. ‘‘7 बज गए, आज तो मैं लेट हो जाऊंगी. 9 बजे मेरी क्लास है. मम्मी पहले नहीं उठा सकती थीं आप?’’ नाहिद ने कहा.

‘‘अपना खयाल खुद रखना चाहिए, कब तक मम्मी उठाती रहेंगी. दुनिया की लड़कियां तो सुबह उठ कर काम भी करती हैं और कालेज भी चली जाती हैं. यहां तो 8-8 बजे तक सोने से फुरसत नहीं मिलती,’’ मां ने गुस्से से कहा. ‘‘अच्छा, ठीक है, मैं तैयार हो रही हूं. तब तक नाश्ता बना दो,’’ नाहिद ने कहा.

नाहिद जल्दी से तैयार हो कर आई और नाश्ता कर के जाने के लिए दरवाजा खोलने ही वाली थी कि किसी ने घंटी बजाई. दरवाजे में शीशा लगा था. उस में से देखने पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि लाइट नहीं होने की वजह से अंधेरा हो रहा था. इन का घर जिस बिल्ंि?डग में था वह थी ही कुछ इस किस्म की कि अगर लाइट नहीं हो, तो अंधेरा हो जाता था. लेकिन एक मिनट, नाहिद के घर में तो इन्वर्टर है और उस का कनैक्शन बाहर सीढि़यों पर लगी लाइट से भी है, फिर अंधेरा क्यों है? ‘‘कौन है, कौन,’’ नाहिद ने पूछा. पर बाहर से कोई जवाब नहीं आया.

‘‘कोई नहीं है, ऐसे ही किसी ने घंटी बजा दी होगी,’’ नाहिद ने अपनी मां से कहा. इतने में फिर घंटी बजी, 3 बार लगातार घंटी बजाई गई अब.

?‘‘कौन है? कोई अगर है तो दरवाजे के पास लाइट का बटन है उस को औन कर दो. वरना दरवाजा भी नहीं खुलेगा,’’ नाहिद ने आराम से मगर थोड़ा डरते हुए कहा. बाहर से न किसी ने लाइट खोली न ही अपना नाम बताया. नाहिद की मम्मी ने भी दरवाजा खोलने के लिए मना कर दिया. उन्हें लगा एकदो बार घंटी बजा कर जो भी है चला जाएगा. पर घंटी लगातार बजती रही. फिर नाहिद की मां दरवाजे के पास गई और बोली, ‘‘देखो, जो भी हो चले जाओ और परेशान मत करो, वरना पुलिस को बुला लेंगे.’’

मां के इतना कहते ही बाहर से रोने की सी आवाज आने लगी. मां शीशे से बाहर देख ही रही थी कि लाइट आ गई पर जो बाहर था उस ने पहले ही लाइट बंद कर दी थी. ‘‘अब क्या करें तेरे पापा भी नहीं हैं, फोन किया तो परेशान हो जाएंगे, शहर से बाहर वैसे ही हैं,’’ नाहिद की मां ने कहा. थोड़ी देर बाद घंटी फिर बजी. नाहिद की मां ने शीशे से देखा तो अखबार वाला सीढि़यों से जा रहा था. मां ने जल्दी से खिड़की में जा कर अखबार वाले से पूछा कि अखबार किसे दिया और कौनकौन था. वह थोड़ा डरा हुआ लग रहा था, कहने लगा, ‘‘कोई औरत है, उस ने अखबार ले लिया.’’ इस से पहले कि नाहिद की मां कुछ और कहती वह जल्दी से अपनी साइकिल पर सवार हो कर चला गया.

अब मां ने नाहिद से कहा बालकनी से पड़ोस वाली आंटी को बुलाने के लिए. आंटी ने कहा कि वह तो घर में अकेली है, पति दफ्तर जा चुके हैं पर वह आ रही हैं देखने के लिए कि कौन है. आंटी भी थोड़ा डरती हुई सीढि़यां चढ़ रही थी, पर देखते ही कि कौन खड़ा है, वह हंसने लगी और जोर से बोली, ‘‘देखो तो कितना बड़ा चोर है दरवाजे पर, आप की बेटी है शाजिया.’’ शाजिया नाहिद की बड़ी बहन है. वह सुबह में अपनी ससुराल से घर आई थी अपनी मां और बहन से मिलने. अब दोनों नाहिद और मां की जान में जान आई.

मां ने कहा कि सुबहसुबह सब को परेशान कर दिया, यह अच्छी बात नहीं है.

शाजिया ने कहा कि इस वजह से पता तो चल गया कि कौन कितना बहादुर है. नाहिद ने पूछा, ‘‘वह अखबार वाला क्यों डर गया था?’’ शाजिया बोली, ‘‘अंधेरा था तो मैं ने बिना कुछ बोले अपना हाथ आगे कर दिया अखबार लेने के लिए और वह बेचारा डर गया और आप को जो लग रहा था कि मैं रो रही थी, दरअसल मैं हंस रही थी. अंधेरे के चलते आप को लगा कि कोई औरत रो रही है.’’

फिर हंसते हुए बोली, ‘‘पर इस लाइट का स्विच अंदर होना चाहिए, बाहर से कोई भी बंद कर देगा तो पता ही नहीं चलेगा.’’ शाजिया अभी भी हंस रही थी. आंटी ने बताया कि उन की बिल्ंिडग में तो चोर ही आ गया था रात में. जिन के डबल दरवाजे नहीं थे, मतलब एक लकड़ी का और एक लोहे वाला तो लकड़ी वाले में से सब के पीतल के हैंडल गायब थे.

थोड़ी देर बाद आंटी चाय पी कर जाने लगी, तभी गेट पर देखा उन के दूसरे दरवाजे, जिस में लोहे का गेट नहीं था, से पीतल का हैंडल गायब था. तब आंटी ने कहा, ‘‘जो चोर आया था उस का आप को पता नहीं चला और अपनी बेटी को अजनबी समझ कर डर गईं.’’ सब जोर से हंसने लगे.

मैं एक युवक से प्यार करती हूं और हम शादी करना चाहते हैं लेकिन घरवाले राजी नहीं हैं, क्या करूं?

सवाल
मैं 2 साल से एक युवक से बहुत प्यार करती हूं. वह भी मुझे बहुत चाहता है. हम दोनों शादी करना चाहते हैं, पर दोनों अलग कास्ट के हैं, जिस की वजह से मेरे परिवार वाले उस युवक से मेरी शादी नहीं करेंगे. कई बार मैं ने अपनी फैमिली से दोनों की शादी की बात करनी चाही पर कह नहीं पाई. हम दोनों एकसाथ रहना चाहते हैं. कई बार घर छोड़ने की भी सोची पर घर वालों की बदनामी न हो इसलिए घर नहीं छोड़ पाई. अब आप ही बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

यह अच्छी बात है कि आप अपने परिवार वालों के बारे में अभी भी सोच रही हैं और उन की इज्जत के कारण घर से भाग कर शादी करने का फैसला टाल रही हैं. यह याद रखें कि नए रिश्तों को संवारने के साथसाथ पुराने रिश्ते न बिखरने पाएं. आप परिवार वालों से खुद शादी की बात न करें, बल्कि अपनी बड़ी बहन या परिवार का ऐसा कोई सदस्य जिस के सामने आप खुल कर बात कर सकती हैं, को अपने परिवार वालों से बात करने का माध्यम बनाएं. समस्या का समाधान मुश्किल नहीं होता, लेकिन व्यवहार की जटिलता से समस्या पर समस्या खड़ी होती जाती है. हर किसी की भावना की इज्जत करते हुए शांति से बातचीत के रास्ते खोलें.

आखिर क्या कमी थी- भाग 3 : क्यों विजय की पत्नी ने किया उसका जीना हराम

‘‘जानती थी कि तुम अपने भाई की वकालत करोगे. उसी विजय के सगे हो न. वही तुम्हारा सबकुछ है. मैं तो कल भी आप सब के लिए मुफ्त की नौकरानी थी और आज भी. इस घर में मेरी बस इतनी ही जगह है कि आने वाले को सलाम करूं और जाने वाले से कुछ भी न पूछूं…इस में मैं किसी को कोई दोष नहीं देती क्योंकि मेरा यही हाल होना चाहिए था. ज्यादा शराफत भी इनसान को कहीं का नहीं छोड़ती.’’

अवाक् रह गए थे हम दोनों. शोभा की सूरत तो रोने जैसी हो गई. नीरा भाभी का यह रूप उस ने कहां सोचा था. कभी मेरा मुंह देखती और कभी भाभी का.

‘‘भाभी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मेरी जान निकल जाएगी घबराहट से.’’

‘‘मैं ने भी सोचा था, मेरी जान निकल जाएगी लेकिन निकली कहां है… देखो न मैं जिंदा हूं. रिश्तों की मानमर्यादा का बहुत महत्त्व होता है. इतना तो तुम जानते हो न. सच कहा तुम ने, इनसान विश्वास की डोर के सहारे ही दूरदूर तक उड़ता है. मैं भी उसी डोर के सहारे 15 साल से उड़ रही थी. कितना कर्ज था विजय के सिर पर. सब तुम जानते हो न, तब कैसेकैसे मेहनत कर मैं पैसे बचाती रही. कुछ पैसे जमा हो जाते तो कर्ज की एक किस्त उतर जाती. मैं पाईपाई जोड़ती रही और तुम्हारा दोस्त पाईपाई बाहर लुटाता रहा.

‘‘बोनस मिलता रहा और आफिस के काम के बहाने दोस्तों के साथ बाहर घूमनेफिरने जाता रहा. वह हर साल जाता है. उसे कभी मेरा सूना गला या सूनी कलाइयां नजर नहीं आईं? मेरी कुरबानी को उस ने अपना अधिकार ही मान लिया, क्या यह घर सिर्फ मेरा है?

‘‘मैं किसी शक के बिना पर ऐसा नहीं कह रही हूं. अपने कानों से मैं ने विजय को अग्रवाल के साथ बातें करते सुना है. 3 महीने पहले उसे जो बोनस मिला उस का इस्तेमाल कैसे हुआ था. वही चटखारे लगालगा कर दोनों आपस में बातें कर रहे थे. विजय को लगा था कि मैं घर पर नहीं हूं. अपने भीतर के जानवर को उस ने कबकब, कहांकहां और कैसेकैसे खुश किया, कहो तो एकएक शब्द बोल कर सुनाऊं आप दोनों को? सुनोगे?’’

मुझ में काटो तो खून नहीं रहा. यह तो सच है कि हर साल विजय कुछ दिन के लिए बाहर जाता है. वैसे भी जब से उस की पदोन्नति हुई है, उस का बाहर का काम ज्यादा रहता है. कोई कब कहां जा रहा है और वहां क्या करता है, कोई कैसे जान सकता है?

‘‘तुम्हारे दोस्त के पास पत्नी के लिए एक सूती धोती तक लाने के पैसे कभी नहीं हुए. खुद बाहर से मौजमस्ती कर के आता रहा और मैं आगेपीछे घूमती रही कि बेचारे आफिस के काम से थक कर आए हैं.

‘‘तुम्हीं बताओ मुझ से कहां चूक हुई? कभी कुछ मांगा नहीं, क्या इसी का असर यह हुआ कि मेरी सारी इच्छाएं ही मर गईं. उन की हर इच्छा जागती रही और मेरी इच्छाओं का क्या?’’

रो रही थीं भाभी. तनिक झुकीं फिर आंसू पोंछ हंस दीं.

‘‘अच्छा बेवकूफ बनाया मुझे मेरे पति ने…’’

‘‘आप के इस व्यवहार का बच्चों पर क्या असर होगा, भाभी?’’

‘‘बच्चे सिर्फ मेरे हैं क्या? अब तो जो हो गया सो हो गया. जब बच्चों के पिता ने घर की चौखट लांघी थी तब क्या उस ने सोचा था कि इस का उस

के बच्चों पर क्या असर होगा. जानती हूं, विजय ने ही तुम्हें मेरे पास समझाने के लिए भेजा है क्योंकि अब घर पर उन के पैर दबाने को मैं जो नहीं मिलती उन्हें.’’

क्या उत्तर देता मैं? भाभी कहां गलत हैं? क्या करतीं वे जब उन्होंने अपने पति की रासलीलाएं उसी के मुंह से सुनी होंगी. बुरी तरह ठगा हुआ महसूस किया होगा स्वयं को. रिश्ते को काट कर फेंक न देती तो क्या करतीं. मुझे भी तो ठगा है न विजय ने, इतनी पुरानी दोस्ती में अपने चरित्र का यह रूप तो मुझे कभी दिखाया ही नहीं. अपनी वकालत के लिए भाभी के पास भी भेज दिया. चुपचाप वापस लौट आए हम, लेकिन रात भर सो नहीं पाए. शोभा की नजर मुझ पर यों पड़ रही थी मानो मैं भी कहीं न कहीं भाभी का गुनहगार हूं.

दूसरी सुबह विजय मुझ से मिला. तरस भी आ रहा था मुझे उस पर और क्रोध भी.

‘‘भाभी ने सब से पहले कब तुम पर चीखनाचिल्लाना शुरू किया बता सकते हो, कोई बात हुई थी क्या?’’

‘‘नहीं तो, कोई भी बात नहीं हुई थी.’’

‘‘पिछली बार जब तुम शिमला गए थे तब वहां होटल में क्याक्या किया था, क्या याद है तुम्हें…दिल्ली और उदयपुर का तजरबा भी खासा रंगीन था, याद आया…’’

विजय के चेहरे का उड़ता रंग मुझे सारी सचाई बता गया और उसी पल मुझे लगा भाभी की तरह मैं ने भी विजय को खो दिया.

‘‘भाभी ने तुम्हारी वे सारी बातें सुन ली थीं जब तुम शिमला से वापस आने पर अपने सहयोगी अग्रवाल से बात कर रहे थे. तब तुम्हें यह पता नहीं था कि वे घर में ही हैं.’’

मानो विजय नंगा हो गया. क्या कहे अपनी सफाई में? प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या जरूरत थी.

‘‘अपनी गृहस्थी में तुम ने खुद आग लगाई है. चरित्र तुम्हारा घिनौना है और आरोप भाभी पर लगा रहे हो. क्या तुम्हारी आंखों में जरा सी भी शर्म है? सारी कालोनी में तुम बदनाम हो गए, इस में दोष किस का है?…

‘‘…और कैसे प्रतिक्रिया करे वह औरत जिस के अटूट विश्वास को ही तुम ने चौराहे का मजाक बना दिया. ईमानदार पति तो पत्नी का अभिमान होता है न. तुम ने जो किया उस के बाद वे तुम्हारी परछाईं से दूर न भागें तो क्या करेें. बेचारी अपना लहूलुहान विश्वास ले कर अलग कमरे में क्यों न चली जाएं.’’

‘क्योंभरोसा करें भाभी उस इनसान पर जो खुद को पाकसाफ बताता रहा और भाभी को ही चरित्रहीन कहता रहा. वजह यह बताई कि शायद वही अपनी जरूरतों के लिए कहीं और से जुड़ गई है जिस कारण अब विजय की जरूरत कभी महसूस ही नहीं होती उन्हें.

‘‘तुम्हें आज भी बच्चों के भविष्य की चिंता नहीं है. तकलीफ है तो इस बात की कि अब भाभी ने तुम्हारी जरूरतें पूरी करनी छोड़ दी हैं. मुफ्त की औरत नसीब नहीं होती तुम्हें.’’

‘‘नीरा सबकुछ जान कर भी चुप रह सकती थी. अकेला मैं ही तो ऐसा नहीं हूं जो बाहर से मौजमस्ती कर के लौटता हूं,’’ विजय का उत्तर था.

वास्तव में मुझे उस पर शर्म आई उस पल. क्या यह वही विजय है? सच कहा है बुजुर्गों ने. कोई भी अनैतिकता अपनाने जाओ तो बस एक बार की ही जरा सी झिझक होती है. किसी पर गोली चलाने वाले के हाथ भी बस पहली बार ही कांपते हैं. समझ नहीं पा रहा हूं विजय के संस्कार क्यों और कब भटक गए. वह इतना कमजोर तो कभी नहीं था.

‘‘इतने महंगे शौक क्या उस इनसान को शोभा देते हैं जिस के सिर पर आज तक बहन की शादी का कर्ज है.

‘‘ईमानदार के सामने चरित्रहीनता परोस दोगे तो बेचारा कैसे निगल पाएगा? नहीं पचा सकीं सो उलट दिया उस गरीब ने. सहने की भी एक सीमा होती है, विजय. और मुझे अफसोस हो रहा है कि अपनी करनी पर तुम्हें जरा सी भी आत्म- ग्लानि नहीं है.’’

चुप रहा विजय. अपनी भूल पर शर्म तो नहीं आई उसे लेकिन इस बात की चिंता अवश्य हो रही थी कि लोग क्या कहेंगे. समाज क्या कहेगा, क्योंकि समाज से कट कर रहने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए.

‘‘जवान होते बेटों के पिता हो तुम. यह मत सोचना भाभी अकेली हैं. जरूरत पड़ी तो मैं भी तुम्हारा साथ नहीं दूंगा. जो कर चुके हो सो कर चुके हो, आगे की सोचो, तुम्हारी भूल तुम्हारी है, प्रायश्चित्त भी तुम्हीं को करना है. किसी तरह अपना घर बचाने का प्रयत्न करो, विजय.’’

विजय को समझाबुझा कर किसी तरह मैं चला तो आया लेकिन मेरे प्रयास का क्या प्रभाव होगा, नहीं जानता. आसार भी इस तरह के नहीं लग रहे थे कि जल्दी कोई अच्छी खबर सुनने को मिलेगी.

‘‘भाभी ने कल बच्चों का और अपना एचआईवी टैस्ट कराया है. अभी रिपोर्ट नहीं आई. पता नहीं क्या होगा. दम घुट रहा है मेरा.’’

शाम को रोंआसी सी शोभा ने खबर सुनाई. सकते में आ गया मैं भी. एक इनसान का गलत कदम पूरे परिवार को कैसे मुसीबत में डाल देता है, मैं बड़ी गहराई से महसूस कर रहा था.

कल से शोभा के चेहरे की भावभंगिमा भी विचित्र सी ही है. प्रश्न सा लिए मुझे निहारती हैं उस की बड़ीबड़ी आंखें. भाभी का परिवार सदा से मेरा भी परिवार रहा है. कहीं उसी का दुष्प्रभाव तो नहीं, जो शोभा की आंखों में भी संदेह के बादल मैं साफसाफ पढ़ रहा हूं.

‘‘क्या मैं भी शीना और अपना टैस्ट करवा लूं? क्या मुझे भी इस की जरूरत है?’’

हजारों प्रश्न अपने एक ही प्रश्न में समेटे शोभा ने अपने होंठ खोले. कल रात से ही शोभा भी परेशान सी है. चौंक कर मैं ने उस की ओर देखा.

‘‘क्या मतलब?’’ बड़ी मेहनत करनी पड़ी मुझे यह सवाल पूछने में 10 साल पुराना संबंध क्या किसी ऐेसे प्रश्न का मोहताज हो गया? विजय का परम मित्र हूं न जिस का हरजाना मुझे भी भरना पड़ेगा, विजय के घर में उठने वाला तूफान मेरे भी घर की दीवारें फाड़ कर भीतर चला आया था.

शोभा का चेहरा सफेद पड़ गया मेरा चेहरा देख कर. क्या समझ रही है वह मेरे चुप रहने का मतलब. लपक कर समीप चला आया मैं. यह क्या हो रहा है शोभा को?

‘‘अगर आप भी वैसे ही हैं तो पास मत आइए…’’

‘‘शोभा, यह क्या कह रही हो तुम?’’

‘‘अगर मेरी आंखों पर कोई परदा है तो बता दीजिए…विजय भैया की तरह आधे रास्ते में…’’

‘‘पागल हो गई हो क्या?’’

रो पड़ा था मैं भी. कस कर छाती से भींच लिया शोभा को. माथे पर प्रगाढ़ चुंबन देते हुए समझाने का प्रयास किया.

‘‘शीना की कसम. कहीं कोई परदा नहीं है. जो तुम्हारी आंखों के सामने है वही तुम्हारी पीठ के पीछे भी है.’’

फूटफूट कर रोने लगी शोभा. पास खड़ी शीना भी सहम गई मां की इस हालत पर. इशारे से बच्ची को पास बुलाया. अपने छोटे से परिवार को बांहों में बांध मैं सोचने लगा, ‘आखिर क्या कमी थी विजय को? क्षणिक सुख की चाह में क्यों उस ने पूरे परिवार की खुशी और जान सूली पर चढ़ा दी.’

शीना मेरे गाल चूम रही थी और उस मासूम के चुंबन में भी मैं इस का उत्तर खोज रहा था कि क्या कमी है मुझे जो मैं भटक जाऊं? क्या कमी थी विजय के पास जो वह भटक गया? आखिर क्या कमी थी?

बिग बॉस 16 के घर में कैद होगें शाइनी आहूजा, लग चुके हैं रेप के आरोप

कलर्स टीवी का सबसे चर्चित शो बिग बॉस एक बार फिर से वापसी करने की तैयारी में लगा हुआ है. इस शो के मेकर्स इस शो में आने वाले कंटेस्टेंट को अप्रोच करने में लगे हुए हैं. हाल ही में खबर आई है कि फेमस यूटूबर आशीष चंचलानी ने बिग बॉस में आने के लिए अप्रोच किया है.

बॉलीवुड स्टार शाइनी आहूजा भी बिग बॉस के घर में कैद हो सकते हैं. एक खबर में इस बात का खुलासा हुआ है कि शाइनी आहूजा को लाने के लिए बिग बॉस के घर में बातचीत चल रही है. अगर सब ठीक रहा तो जल्द ही शाइनी आहूजा घर में आएंगे.

 

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गौरतलब है कि शाइनी आहूजा ने टीवी के जरिए अपना कैरियर शुरू किया था. उसके बाद से उन्होंने फिल्म में अपनी जगह बना ली थी. बता दें कि शाइनी आहूजा ने वेलकम, गैंगेस्टर, भूलभूलैया जैसी कई फिल्मों में काम किया है. जिसमें उन्हें काफी ज्यादा पसंद किया गया है.

सालों पहले शाइनी आहूजा की नौकरानी ने उनपर रेप का आरोप लगाया था. जबसे उनके ऊपर रेप का आरोप लगा था उनका कैरियर बर्बाद हो गया था. कुछ वक्त बाद जब शाइनी आहूजा ने फिल्म में काम करने की कोशिश की तो उनका कैरियर पूरी तरह से डूब गया.

 

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एक लंबे समय से शाइनी आहूजा को किसी शो में नहीं देखा गया है. खबर है कि शाइना अहूजा के अलावा बिग बॉस के मेकर्स और भी कई सारे कलाकार को इस शो में लाने वाले हैं. जिसे देखने के लिए फैंस अभी से बेताब हैं. अब देखते हैं कि इस बार इस शो का सबसे चर्चित चेहरा कौन होने वाला है.

अमीषा पटेल ने 46 की उम्र में दिखाया अपना बिकनी अवतार, बोल्डनेस की हदें की पार

90 की सुपर स्टार अमीषा पटेल भले ही इन दिनों फिल्मों में नजर नहीं आती है लेकिन वह सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा एक्टिव रहती है. आए दिन उनके नए-नए पोस्ट आते रहते हैं. जिसे देखना लोग काफी ज्यादा पसंद करते हैं.

हाल ही में सोशल मीडिया पर 45 साल की अमीषा पटेल ने अपनी बोल्ड तस्वीरों को डालकर सभी को हैरान कर दिया है. इस तस्वीर में अमीषा पटेल पहले से भी ज्यादा बोल्ड लुक दे रही हैं. जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

 

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बता दें कि अमीषा पटेल इस तस्वीर में बिकनी पहने हुए नजर आ रही हैं. अमीषा पटेल बिकनी पहनकर किलर पोज दे रही हैं. जिसे फैंस काफी ज्यादा पसंद कर रहे हैं साथ ही लगातार सोशल मीडिया पर मैसेज भी कर रहे हैं. अमीषा पटेल की लुक्स को लेकर.

अमीषा कि इस तस्वीर को देखने के बाद कोई नहीं कह सकता है कि 46 साल की हो गई हैं. उन्हें लोग आज भी उतना ही ज्यादा पसंद करते हैं. जितना पहले किया करते थें. अमीषा पटेल का नया लुक लोगों को खूब पसंद भी आ रहा है. फैंस इनके लुक्स की जमकर तारीफ कर रहे हैं.

अमीषा पटेल इन तस्वीर में चश्मा पहने हुए नजर आ रही हैं जो उनपर काफी ज्यादा जच रहा है.इसके साथ ही अमीषा पटेल की एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें वह लाल रंग का टाइट टॉप पहने नजर आ रही है.

इसके अलावा सोशल मीडिया पर और भी कई सारी फोटोज वायरल हो रही है जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

जब मेरे दोस्त को इन सब बातों का पता चलेगा तो कहीं वह मुझे गलत समझ कर मेरे बारे में उलटासीधा न सोचने लगे?

सवाल

मेरी उम्र 19 वर्ष है. मेरा एक दोस्त है जिस के प्रति मेरे मन में दोस्ती से ज्यादा भी कुछ है. परंतु मुझे यह नहीं पता कि उस के मन में मेरे लिए कुछ है या नहीं. आजकल एक लड़की उस के आगेपीछे घूमने लगी है. मेरा दोस्त भी उसे अच्छाखासा भाव दे रहा है. मुझे तो उन दोनों को देख कर बहुत चिढ़ हो रही थी तो मैं ने उस लड़की से यह कह दिया कि वह मेरा बौयफ्रैंड है और उसे धक्का देते हुए कहा कि उस से दूर रहा कर. अब मुझे डर लग रहा है कि जब मेरे दोस्त को इन सब बातों का पता चलेगा तो कहीं वह मुझे गलत समझ कर मेरे बारे में उलटासीधा न सोचने लगे.

जवाब

आप की सब से बड़ी गलती है उस लड़की को धक्का देना, जबकि आप को यह तक पता नहीं कि वह लड़का आप से प्यार करता है या नहीं. आप ने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि जिस लड़की को आप ने धक्का दिया वह लड़की उस से प्यार करती है या सिर्फ दोस्त है. हो सकता है वह सिर्फ दोस्त हो और आप जिस से प्यार करती हैं वह भी उसे दोस्त मानता हो. अब जब वह यह वाकेआ उसे बताएगी तो वह क्या सोचेगा, पता नहीं, लेकिन इतना तो जरूर सोचेगा कि आप की सोच छोटी है. पहले आप को सारी बातें क्लीयर कर लेनी चाहिए थीं. और जब आप उस से प्यार करती हैं तो इजहार करने में डरती क्यों हैं? अब बेहतर यही होगा कि पहले आप उस लड़की को सौरी बोलिए और अपने दोस्त को ये सारी बातें बताइए. इस से आप का मन भी हलका हो जाएगा और उसे यह भी पता चल जाएगा कि आप उसे प्यार करती हैं. यह उस के ऊपर निर्भर करेगा कि वह आप के बारे में क्या खयाल रखता है.

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मैं शादी के बाद सैक्स को ले कर डरी हुई हूं. क्या महिलाओं में…

सवाल

मेरी उम्र 21 साल है और जल्द ही शादी होने वाली है. मैं शादी के बाद सैक्स को ले कर डरी हुई हूं. क्या महिलाओं में सैक्स संबंधी समस्याएं होती हैं? क्या इन का उपचार संभव है?

जवाब

शादी के बाद सैक्स को ले कर आप नाहक डरी हुई हैं. सैक्स संबंध कुदरती प्रक्रिया है. महिलाओं में भी सैक्स समस्याएं हो सकती हैं जैसे सैक्स संबंध के समय योनि में दर्द, चरमसुख का अभाव, उत्तेजना में कमी आदि. मगर पुरुषों की ही तरह महिलाओं की सैक्स समस्याओं का भी निदान संभव है. आप के लिए बेहतर यही है कि इन सब बातों से डरे बगैर खुद को शादी के लिए तैयार करें

क्या आप का बिल चुका सकती हूं : भाग 3

फिर हम झील में बदलते नजारों में डूबने का अभिनय सा करते रहे.

चुप्पी लंबी हो गई तो मैं ने कहा, ‘‘उस रोज तुम ने मेरी पुकार नहीं सुनी और चले गए…मुझ से बचना चाहा तुम ने…मगर आज क्यों तुम ने मुझे पुकारा?’’

वह मेरे चेहरे को देखता रहा, फिर बोला, ‘‘आप अकेली बैठी थीं. कितनी ही देर से आप के चेहरे पर अकेलेपन की मायूसी देखता रहा, कैसे न पुकारता? पुकारने से बचना और किसी मायूस से बच कर भागना एक ही बात है. कैसी विडंबना है…अब सोच रहा हूं, आप से यह भी नहीं पूछा कि आप करती क्या हैं?’’

मैं यह सोच कर हंसी कि फंस गए बच्चू, इस दुनिया में बहुत कुछ तय नहीं किया जा सकता. अगर किया भी जा सके तो अगले ही पल वह होता है जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

वह चुप रहा. काफी देर के बाद उस ने पूछा, ‘‘घर से निकलते वक्त आप के मन में क्या होता है?’’

‘‘अज्ञात ऐडवैंचर. मैं लगातार घूमती हूं. अपना खुद का तकिया और चादर भी साथ रखती हूं, ताकि देह जहां तक हो, बनी रहे लेकिन जानती हूं कि मेरे हाथ में कल नहीं है.’’

वह मुसकराया, ‘‘इस क्षण मेरे लिए क्या सोचती हैं आप?’’

मैं हंसी, ‘‘इतना तो तय हो ही सकता है कि मैं अपने खाएपिए के अपने हिस्से का हिसाब चुकता करूं…तुम्हें ‘आप’ कह कर तुम से मिला हुआ परिचय तुम्हें लौटाऊं और हम अपनाअपना रास्ता लें.’’

‘‘ऐसा रास्ता है क्या, जिस पर सामने ठिठक जाने वाले लोग मिलते ही नहीं? ऐसा परिचय होता है क्या जिसे समूचा पोंछा जा सके? और अनाम रिश्तों में ‘तुम’ से ‘आप’ हो जाने से क्या होता है?’’

‘‘बातें तो बहुत बड़ीबड़ी कर रहे हो…तुम्हारी उम्र क्या है?’’

‘‘दुनिया से दफा हो जाने तक की तो नहीं जानता, पर अगली 1 जून को 30 का हो रहा हूं.’’

मैं चौंकी, ‘‘तुम तो मुझ से बड़े निकले… लगते तो छोटे हो.’’

‘‘हां, अकसर इसी धोखे में बच्चा ही बना रह जाता हूं बड़ों में…’’

‘‘जैसा दिखते हो वैसा स्वभाव भी है तुम्हारा…इसे चलनेफलने दो.’’

‘‘ऐसा मैं भी सोचता रहा, पर…’’

‘‘पर क्या?’’ मैं बीच में बोल पड़ी, ‘‘यही न कि अगर मेरे जैसी कोई तुम्हें पसंद आए तो तुम ज्यादा बचाव न कर उस पर हक जमा सको.’’

‘‘नहीं…ऐसा तो नहीं, क्योंकि मैं स्वयं नहीं चाहता अपने पर किसी का ऐसा अधिकार…फिर जो भीतरबाहर से सुंदर और बहुत हट कर होते हैं, उन का मेरे जैसे घुमक्कड़ व्यक्ति के लिए सुलभ रहना संभव नहीं है.’’

‘‘अगर तुम्हें पता चले कि राशा कुछ महीने की मेहमान है तो?’’

‘‘मुझे ऐसा मजाक पसंद नहीं.’’

‘‘लेकिन मौत ऐसे मजाक पसंद करती है.’’

‘‘क्या राशा को कुछ हुआ है?’’

‘‘किस को कब क्या नहीं हो सकता? मैं इतना जानती हूं कि अगर अभी राशा को यह पता चल जाए कि तुम मेरे साथ हो तो वह हमें अपने पास बुला लेगी या खुद यहां चली आएगी.’’

‘‘मिलन को बुनती ज्यादातर बातें सच तो होती हैं पर झूठ हो जाने के लिए ही. सच तभी बनता है जब किसी आकस्मिक घटना पर सहसा हम कुछ करने को बेचैन हो उठते हैं. जैसे कि हमारा उस रोज का मिलना और अचानक आज मिलना…आप जिंदगी को वाक्यसूत्रों में नहीं पिरो सकतीं.’’

‘‘ओह…मैं भूल ही गई थी…मुझे जल्दी होटल पहुंचना है…’’ कह कर मैं काउंटर पर बिल देने के लिए जाने लगी तो वह मुझे रोक कर बोला, ‘‘आज का दिन मेरा है. प्लीज, यह बिल भी मुझे चुकाने दीजिए न.’’

‘‘किसी पर अधिकार जताने के मौके हमारे हाथ कितनी खूबसूरती से लग जाते हैं,’’ मेरे मुंह से निकला और हम दोनों हंस पड़े.

वह काउंटर पर जा कर लौटा तो मैं ने उस की तरफ हाथ बढ़ा कर कहा, ‘‘चलती हूं…कभी सहसा संयोग बना तो फिर मिलेंगे…बहुत अच्छे हो तुम…अच्छे यानी जैसे भी हो…’’

उस ने मेरे बढ़े हुए हाथ को देखा… मुसकरा कर हाथ जोड़े और बोला, ‘‘हाथ नहीं मिलाऊंगा.’’

उस ने मेरे लौटते हुए हाथ को अपने हाथ में सहेज लिया और मेरे साथ चल पड़ा. हम आगे तक निकल गए.

‘‘क्या करती हैं आप?’’ बहुत देर बाद मेरा हाथ छोड़ कर उस ने पूछा.

‘‘गलती से साइकिएट्रिस्ट हूं. मनोविद या मनोचिकित्सक कहलाना बहुत आसान है. इस दुनिया में जीने के लिए फलसफे और मन के विज्ञान नहीं, अनाम प्रेम चाहिए…या मजबूरी में कोई मौलिक जुगाड़.’’

वह मेरे होटल तक आया और चुपचाप खड़ा हो गया.

मैं सहसा हंस पड़ी.

वह भी हंसा.

‘‘अब क्या करें?’’ मेरे मुंह से निकला.

‘‘अलविदा और क्या?’’ उस ने हाथ बढ़ाया.

‘‘मैं मन में उस लड़की की तसवीर बनाने की कोशिश करूंगी, जिसे उस रोज मुझे देख कर तुम ने याद किया था…’’ मैं ने उस का हाथ बहुत आहिस्ता से छोड़ते हुए कहा.

‘‘कोई जरूरत नहीं…तिल भर का भी फर्क नहीं है. आप के पास आईना नहीं है क्या?’’ कह कर वह चला गया.

मैं देर तक ठगी सी खड़ी रह गई.

मंजिल पर अ बैठी थी. दूसरे एक विभाग की इंचार्ज डा. सविता मेरे साथ थी. तभी उस की एक सहयोगी आ कर बोली, ‘‘डाक्टर…आप की वह 14 नंबर की मरीज…उसे आज डिस्चार्ज करना है, मगर उस के बिल अभी तक जमा नहीं हुए…आपरेशन के बाद से अब तक 25 हजार की पेमेंट बकाया है.’’

‘‘ओह, इतनी नहीं होनी चाहिए. 30 हजार रुपए तो जमा कर चुके हैं बेचारे. बड़ा नाम सुन कर आए थे इस अस्पताल का…और ये लोग मजबूर मरीजों को लूट रहे हैं. उस का पति क्या कहता है?’’

‘‘कह रहा है कि उस ने अपनी जानपहचान वालों को फोन किए हैं…शायद कुछ उपाय हो जाएगा.’’

‘‘अभी कहां है?’’

‘‘बीवी के लिए फल लेने बाजार गया है…कुछ देर पहले उस से गजल सुन रहा था…’’

‘‘गजल?’’ मैं ने हैरत से पूछा.

‘‘हां…’’ डा. सविता बोली, ‘‘वह लड़की बंद आंखों में लेटेलेटे बहुत प्यारी गजलें गुनगुनाती रहती है. शायद अपने पति की लाचारी को व्यक्त करती है… और क्या तो गजब की किताबें पढ़ती है. चलो, देखते हैं…उस की फाइनल रिपोर्ट भी डा. प्रिया से साइन करानी है…’’

उन दोनों के साथ मैं भी नीचे आ गई. फिर हम सामने की बड़ी इमारत की ओर बढ़ीं और वहां एक अधबने कमरे में पहुंचीं.

देखा, एक युवती बेहद कमजोर हालत में बेड पर पड़ी छत की ओर देख रही है. कमजोरी में भी वह सुंदर लग रही थी. हमें देख कर वह किसी तरह उठ कर बैठने की कोशिश करने लगी.

‘‘लेटी रहो,’’ मैं ने उस के सिरहाने बैठते हुए कहा और पास रखी ‘बुक औफ द हिडन लाइफ’ को हाथ में ले कर पलटने लगी. जीवन और मौत के रिश्ते को अटूट बताने वाली अनोखी किताब.

मैं उस से बतियाने लगी. थकी हुई सांसों के बीच उस ने बताया कि साल भर पहले एक हादसे में उस के घर के सब लोग मारे गए थे और उस के बचपन के एक साथी ने उस से शादी कर ली… ‘‘तभी पता चला कि मेरे अंदर तो भयंकर रोग पल रहा है…अगर मुझे पता होता तो मैं कभी उस से शादी न करती…बेचारा तब से जाने कहांकहां दौड़भाग कर के मेरा इलाज करा रहा है…साल होने को आया…’’

‘‘अब तुम रोग मुक्त हो,’’ मैं ने उस के सिर पर हाथ रखा, ‘‘सब ठीक हो जाएगा.’’

उस ने कातरता से मुझे देखा और आंखें बंद कर लीं. इसी में उस की आंखों में से कुछ बूंदें बाहर निकल आईं और कुछ शब्द भी… ‘‘हां, होता तो सब ठीक ही होगा…पर मुझे अपना जिंदा रहना ठीक नहीं लगता…हालांकि दिमागी तौर पर बिलकुल तंदुरुस्त हूं…जीना भी चाहती हूं…’’

डा. सविता उस की जांच कर के जा चुकी थीं. उसे स्पर्श की एक और तसल्ली दे कर मैं भी उठी. अभी कुछ ही कदम आगे निकली थी कि मेरे कानों में एक गुनगुनाहट पहुंची. देखा, वह आंखें बंद कर के गा रही है :

‘धुआं बना के फिजा में उड़ा दिया मुझ को,

मैं जल रहा था, किसी ने बुझा दिया मुझ को…

खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ लिए,

सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को…’

मैं खड़ी रही. उस की गुनगुनाहट धीमी होती चली गई और फिर उसे नींद आ गई. मुझे वे दिन याद आए जब मां के न रहने पर मैं बहुत अकेली पड़ गई थी और नींद में उतरने के लिए इसी तरह अपने दर्द को लोरी बना लेती थी.

रिसेप्शन पर पहुंची. वहां से अस्पताल के प्रबंध निदेशक को फोन कर के बिल के पेमेंट का जिम्मा लिया और लौट आई.

देखा, उस के सिरहाने बैठा एक युवक सेब काट कर प्लेट में रख रहा है. पुरानी पैंटशर्ट के भीतर एक दुबली काया. सिर पर उलझे हुए बाल. युवती शायद सो रही थी.

मैं धीमे कदमों से उस के निकट पहुंची.

वह युवक कह रहा था, ‘‘अब दोबारा मत कहना कि तुम से शादी कर के मैं बरबाद हो गया. नाउ यू आर ओ.के. …मेरे लिए तुम्हारा ठीक होना ही महत्त्वपूर्ण है…पैसों का इंतजाम नहीं हुआ…बट आई एम ट्राइंग माई बेस्ट…’’ उस की आवाज में पस्ती भी थी और उम्मीद भी.

मैं ने देखा, आंखें बंद किए पड़ी वह युवती उस की बात पर धीरेधीरे सिर हिला रही थी. अचानक मेरा हाथ उस युवक की ओर बढ़ा और उस के कंधे पर चला गया. इसी के साथ मेरे मुंह से निकला :

‘‘कैन आइ पे फौर यू?…आप का बिल चुका सकती हूं मैं?’’

वह चौंक कर पलटा और खड़ा हो गया, ‘‘आप?’’

अब मैं ने उस का चेहरा देखा… ‘‘ओह…शेषांत…तुम?’’

एक तूफान उमड़ा और उस ने हमें अपने में ले लिया.

मेरे कंधे से लगा वह सिसकता रहा और मेरे हाथ उस के सिर और पीठ पर कांपते रहे. मेरी आंखें सामने उस लड़की की आंखों से झरते आनंद को देखती रहीं. पता नहीं, कब से चट्टान हो चुकी मेरी आंखों में से कुछ बाहर आने को मचलने लगा.

‘‘राशा…ये हैं…जोया…’’ शेषांत ने मेरे कंधे से हट कर चश्मा उतारते हुए उस से कहा तो मैं चौंकी, ‘‘राशा?’’

वह लड़की अपनी खुशी को समेटती हुई बोली, ‘‘मेरा नाम राशि है…इन्होंने आप लोगों के बारे में बताया था तो मैं ने जिद की थी कि मुझे राशा ही कहा करें.’’

मैं चुप रही…सोचती रही…‘राशा तो अब नहीं है…पर तुम दोनों ने उसे सहेज लिया…बहुत अच्छे हो तुम दोनों.’

हम तीनों अपनीअपनी आंखें पोंछ रहे थे कि सामने से एक नर्स आई. उस ने हंस कर मेरे हाथ में बिलों के भुगतान की रसीद और राशि के डिस्चार्ज की मंजूरी थमाई और चली गई.

मेरी राशा तो खो गई थी पर उस बिल की रसीद के साथ एक और राशा मिल गई. लगा कि जिंदगी अब इतनी वीरान, अकेली न रहेगी. राशा, शेषांत और मैं…एक पूरा परिवार…

प्यार की तलाश

KKK12 : जब रोहित शेट्टी की एक डांट पर रोने लगी जन्नत जुबैैर, Video

टीवी की मशहूर एक्ट्रेस जन्नत जुबैर इन दिनों रोहित शेट्टी के शो खतरों के खिलाड़ी में धमाल मचाए हुई हैं. शो की खास बात यह है कि इस शो के डॉयरेक्टर रोहित शेट्टी से अच्छी बॉन्डिंग बन गई है.

हाल ही में जन्नत जुबैर ने एक वीडियो शेयर किया है जिसमें वह रोहित शेट्टी के साथ फाइट करते हुए वीडियो शेयर कि हैं जिसे खूब पसंद किया जा रहा है. लेकिन फाइट के दौरान जैसे ही रोहित शेट्टी उनपर हिट करते हैं वह बैठकर रोने लगती हैं.

दूसरी तरफ रोहित शेट्टी जन्नत जुबैर का यह अंदाज देखकर हैरान हो गए. रोहित को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्यों रोने लगी है. दरअसल जुन्नत जुबैर का यह अंदाज लोगों को खूब पसंद आ रहा है. लोग जन्नत जुबैर को खूब पसंद भी करते हैं.

सोशल मीडिया पर यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है. लोग खूब लाइक और कमेंट कर रहे हैं.

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