मानसून स्पेशल: तुरुप का पता – भाग 3

‘‘पर उन इच्छाओं को पूरा करने के क्रम में परिवार को कष्ट होता है तो होता रहे? स्वाति ने तो कनक से साफ कह दिया कि वह विवाह के बाद संयुक्त परिवार में नहीं रहेगी.’’

‘‘तोे कनक ने क्या कहा?’’

‘‘वह तो हतप्रभ रह गया, कुछ सूझा ही नहीं उसे.’’

‘‘क्या कह रही हो, भाभी? उसे साफ शब्दोें में कहना चाहिए था कि वह परिवार का बड़ा बेटा है. परिवार से अलग होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. स्वाति ने तो अपने मन की बात कह दी, कोई दूसरी लड़की विवाह के बाद यह मांग करेगी तो क्या करेगा कनक और क्या करेंगी आप?’’

‘‘क्या कहूं, मुझे तो कुछ सूझ ही नहीं रहा है,’’ विमलाजी की आंखें छलछला आईं, स्वर भर्रा गया.

‘‘इतना असहाय अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है. घरपरिवार आप का है. इसे सजाने व संवारने में अपना जीवन होम कर दिया आप ने. दृढ़ता से कहो कि इस तरह के निर्णय बच्चे नहीं लेते बल्कि आप स्वयं लेती हैं.’’

‘‘मेरे कहने से क्या होगा, दीदी. लड़की यदि झगड़ालू हुई तो हम सब का जीना दूभर कर देगी. कनक तो इसी कारण नौकरी वाली लड़की चाहता है. उसे तो झगड़ा करने का समय ही नहीं मिलेगा.’’

‘‘पर स्वाति तो नौकरी वाली युवतियों से भी अधिक व्यस्त रहती है. राव साहब के रेडीमेड कपड़ों के डिपार्टमैंट में महिला और बाल विभाग स्वाति संभालती है, उस के डिजाइनों को लाखों के आर्डर मिलते हैं.’’

‘‘पर कनक तो कह रहा था कि स्वाति केवल स्नातक है. उसे कहीं नौकरी तक नहीं मिलेगी.’’

‘‘हां, पर फैशन डिजाइनिंग में स्नातक है. इतना बड़ा व्यापार संभालती है तो नौकरी करने का प्रश्न ही कहां उठता है. मुझे लगता है कनक ने उस से कुछ पूछा ही नहीं, बस उस की सुनता रहा.’’

‘‘थोड़ा शर्मीला है कनक, पहली ही मुलाकात में किसी से घुलमिल नहीं पाता,’’ विमलाजी संकुचित स्वर में बोली थीं.

‘‘होता है, भाभी. पहली मुलाकात में ऐसा ही होता है. सहज होने में समय लगता है. मैं तो कहती हूं दोनों को मिलनेजुलने दो. एकदूसरे को समझने दो. आप भी ठोकबजा कर देख लो, सबकुछ समझ में आए तभी अपनी स्वीकृति देना.’’

‘‘आप की बात सच है. मैं कनक से कहूंगी कि स्वाति और वह फिर मिल लें. पर दीदी, सबकुछ कनक के हां कहने पर ही तो निर्भर करता है. तुम तो जानती ही हो, आज के समय में बच्चों पर अपनी राय थोपना असंभव है.’’

‘‘बिलकुल सही बात है पर तुम एक बार राव दंपती से मिल तो लो. उस दिन तुम और कनक अचानक उठ कर चले आए तब वे बहुत आहत हो गए थे.’’

‘‘उस के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं पर कनक अचानक ही उठ कर चल पड़ा तो मुझे उस का साथ देना ही पड़ा.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं है. जो हो गया सो हो गया. जब आप को सुविधा हो बता देना. मैं उसी के अनुसार राव दंपती से आप की भेंट का समय निश्चित कर लूंगी,’’ रमोलाजी ने सुझाव दिया था.

‘‘एक बार कनक से बात कर लूं फिर आप को फोन कर दूंगी.’’

‘‘एक बात कहूं, भाभी? बुरा तो नहीं मानोगी.’’

‘‘कैसी बातें करती हो, दीदी? आप की बात का बुरा मानूंगी? आप ने तो कदमकदम पर मेरा साथ दिया है. वैसे भी बच्चों के विवाह भी तो आप को ही करवाने हैं.’’

‘‘तो सुनो, समय बहुत खराब आ गया है. इसलिए सावधानी से सोचसमझ कर अपने निर्णय स्वयं लेना सीखो. आजकल के युवा अपने पैरों पर खड़े होते ही स्वयं को तीसमारखां समझने लगते हैं. मेरा तो अपने काम के सिलसिले में हर तरह के परिवारों में आनाजाना लगा रहता है. राजतिलकजी का नाम तो आप ने सुना ही होगा?’’

‘‘उन्हें कौन नहीं जानता,’’ विमला के नेत्र विस्फारित हो गए थे.

‘‘उन का इकलौता बेटा सुबोध, हर लड़की में कोई न कोई कमी निकाल देता था. फिर अपनी मरजी से स्वयं से 10 साल बड़ी अपनी अफसर से विवाह कर लिया. लड़की भी पहले की विवाहित थी. 2 बच्चे भी थे. दोनों परिवार बरबाद हो गए. राजतिलकजी का तो दिल ही टूट गया.’’

‘‘सच कह रही हो, दीदी, आजकल की औरतों ने तो हयाशरम बेच ही खाई है,’’ विमलाजी ने हां में हां मिलाई थी.

‘‘सो मत कहो भाभी. सैनी साहब का नाम तो सुना ही होगा आप ने?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘उन के बेटे निखिल ने तो अपने पुरुष मित्र से ही विवाह कर लिया. बेचारे सैनी साहब तो शरम के मारे अपना घर बेच कर चले गए,’’ रमोलाजी ने बात आगे बढ़ाई थी.

‘‘लगता है अब घोर कलियुग आ गया है,’’ विमलाजी ने इतना बोल कर दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया.

‘‘इसीलिए तो कहती हूं, भाभी. सावधान हो जाओ और होशियारी से काम लो. बच्चे आखिर बच्चे हैं…दुनियादारी की बारीकियां वे भला क्या समझें,’’ रमोलाजी विदा लेते हुए बोली थीं.

रमोलाजी चली गई थीं पर विमला को सकते में छोड़ गईं, ‘‘ठीक कहती हैं रमोला. निर्णय तो स्वयं लेंगी. कनक क्या जाने जीवन की पेचीदगियों को.’’

रमोलाजी तुरुप का पत्ता चल गई थीं और जानती थीं कि उन का दांव कभी खाली नहीं जाता.

मानसून स्पेशल: दिखावे की काट – भाग 3

असीम को आखिर छुट्टी मिल ही गई और पिताजी की तेरहवीं पर वह आ गया. उस के कंधे पर सिर रख कर पिताजी की याद में और भैयाभाभी के स्वार्थी पक्ष पर वह देर तक आंसू बहाती रही. अंकिता का बिलकुल मन नहीं था उस घर में रुकने का लेकिन पिताजी की यादों की खातिर वह रुक गई.

तेरहवीं की रस्म पर भैया ने दिल खोल कर खर्च किया. लोग भैया की तारीफें करते नहीं थके कि बेटा हो तो ऐसा. देखो, पिताजी की याद में उन की आत्मा की शांति के लिए कितना कुछ कर रहा है, दानपुण्य, अन्नदान. 2 दिन तक सैकड़ों लोगों का भोजन चलता रहा. लोगों ने छक कर खाया और भैयाभाभी को ढेरों आशीर्वाद दिए. अंकिता, असीम और बूआ तटस्थ रह कर यह तमाशा देखते रहे. वे जानते थे कि यह सब दिखावा है, इस में तनिक भी भावना या श्रद्धा नहीं है.

यह कैसा धर्म है जो व्यक्ति को इनसानियत का पाठ पढ़ाने के बजाय आडंबर और दिखावे का पाठ पढ़ाता है, ढोंग करना सिखाता है.

जीतेजी पिता को दवाइयों और खानेपीने के लिए तरसा दिया और मरने पर कोरे दिखावे के लिए झूठी रस्मों के नाम पर ब्राह्मणों और समाज के लोगों को भोजन करा रहे हैं. सैकड़ों लोगों के भोजन पर हजारों रुपए फूंक कर झूठी वाहवाही लूट रहे हैं जबकि पिताजी कई बार 2 बजे तक एक कप चाय के भरोसे पर भूखे रहते थे. अंकिता जब दोपहर में आती तो उन के लिए फल, दवाइयां और खाना ले कर आती और उन्हें खिलाती.

रात को कई बार भैया व भाभी को अगर शादी या पार्टी में जाना होता था तो भाभी सुबह की 2 रोटियां, एक कटोरी ठंडी दाल के साथ थाली में रख कर चली जातीं. तब पिताजी या तो वही खा लेते या उसे फोन कर देते. तब वह घर से गरम खाना ला कर उन्हें खिलाती.

अंकिता सोच रही थी कि श्राद्ध शब्द का वास्तविक अर्थ होता है, श्रद्धा से किया गया कर्म. लेकिन भैया जैसे कुपुत्रों और लालची पंडितों ने उस के अर्थ का अनर्थ कर डाला है.

जीतेजी पिताजी को भैया ने कभी कपड़े, शौल, स्वेटर के लिए नहीं पूछा. इस के उलट अपने खर्चों और महंगाई का रोना रो कर हर महीने उन की पैंशन हड़प लेते थे, लेकिन उन की तेरहवीं पर भैया ने खुले हाथों से पंडितों को कपड़े, बरतन आदि दान किए. अंकिता को याद है उस की शादी से पहले पिताजी के पलंग की फटी चादर और बदरंग तकिए का कवर. विवाह के बाद जब उस के हाथ में पैसा आया तो सब से पहले उस ने पिताजी के लिए चादरें और तकिए के कवर खरीदे थे.

जीवित पिता पर खर्च करने के लिए भैया के पास पैसा नहीं था, लेकिन मृत पिता के नाम पर आज समाज के सामने दिखावे के लिए अचानक ढेर सारा पैसा कहां से आ गया.

असीम ने 2 दिन बाद के अपने और अंकिता के लिए हवाई जहाज के 2 टिकट बुक करा दिए.

दूसरे दिन भैया ने कुछ कागज अंकिता के आगे रख दिए. दरअसल, पिताजी ने वह घर भैया और उस के नाम पर कर दिया था.

‘‘अब तुम तो असीम के साथ सिंगापुर जा रही हो और वैसे भी असीम का अपना खुद का भी मकान है तो…’’ भैया ने बात आधी छोड़ दी. पर अंकिता उन की मंशा समझ गई. भैया चाहते थे कि वह अपना हिस्सा अपनी इच्छा से उन के नाम कर दे ताकि भविष्य में कोई झंझट न रहे.

‘‘हां भैया, इस घर में आप के साथसाथ आधा हिस्सा मेरा भी है. इन कागजों की एक कापी मैं भी अपने पास रखूंगी ताकि मेरे पिता की यादें मेरे जीवित रहने तक बरकरार रहें,’’ कठोर स्वर में बोल कर अंकिता ने कागज भैया के हाथ से ले कर असीम को दे दिए ताकि उन की कापी करवा सकें, ‘‘और हां भाभी, मां के कंगन पिताजी ने तुम्हें दिए थे अब पिताजी की अंगूठी और चेन आप मुझे दे देना निकाल कर.’’

भैयाभाभी के मुंह लटक गए. दोपहर को असीम और अंकिता ने पिताजी का पलंग, कुरसी, टेबल और कपड़े वापस उन के कमरे में रख लिए. नया गद्दा पलंग पर डलवा दिया. पिताजी के कमरे और उस के साथ लगे अध्ययन कक्ष पर नजर डाल कर अंकिता बूआ से बोली, ‘‘मेरा और आप का मायका हमेशा यही रहेगा बूआ, क्योंकि पिताजी की यादें इसी जगह पर हैं. इस की एक चाबी आप अपने पास रखना. मैं जब भी यहां आऊंगी आप भी आ जाया करना. हम यहीं रहा करेंगे.’’

बूआ ने अंकिता और असीम को सीने से लगा लिया और तीनों पिताजी को याद कर के रो दिए.

मानसून स्पेशल: तुरुप का पता – भाग 1

‘‘क्या हुआ? इस तरह उठ कर क्यों चला आया?’’ कनक को अचानक ही उठ कर बाहर की ओर जाते देख कर विमलाजी हैरानपरेशान सी उस के पीछे चली आई थीं.

‘‘मैं आप के हावभाव देख कर डर गया था. मुझे लगा कि आप कहीं रिश्ते के लिए हां न कर दें इसलिए उठ कर चला आया. मैं ने वहां से हटने में ही अपनी भलाई समझी,’’ कनक ने समझाया.

‘‘हां कहने में बुराई ही क्या है? विवाह योग्य आयु है तुम्हारी. कितना समृद्ध परिवार है. हमारी तो उन से कोई बराबरी ही नहीं है. उन की बेटी स्वाति, रूप की रानी न सही पर बुरी भी नहीं है. लंबी, स्वस्थ और आकर्षक है. और क्या चाहिए तुझे?’’ विमला देवी ने अपना मत प्रकट किया था.

‘‘मां, आप की और मेरी सोच में जमीनआसमान का अंतर है. लड़की सिर्फ स्नातक है. चाह कर भी उसे कहीं नौकरी नहीं मिलेगी.’’

‘‘लो, उसे भला नौकरी करने की क्या जरूरत है? रमोलाजी तो कह रही थीं कि स्वाति के मातापिता बेटी को इतना देंगे कि सात पीढि़यों तक किसी को कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. ऐसे परिवार की लड़की नौकरी क्यों करेगी?’’

‘‘नौकरी करने के लिए योग्यता चाहिए, मां. मुझे तो इस में कोई बुराई भी नहीं लगती. आजकल सभी लड़कियां नौकरी करती हैं. मुझे अमीर बाप की अमीर बेटी नहीं, अपने जैसी शिक्षित, परिश्रमी और ढंग की नौकरी करने वाली पत्नी चाहिए.’’

‘‘अपना भलाबुरा समझो कनक बेटे. तुम क्या चाहते हो? तुम और तुम्हारी पत्नी नौकरी करेगी और मैं जैसे अभी सुबह 5 बजे उठ कर सारा काम करती हूं. तुम सब भाईबहनों के टिफिन पैक करती हूं, तुम्हारे विवाह के बाद भी मुझे यही सब करना पड़ा तो मेरा तो बेटा पैदा करने का सुख ही जाता रहेगा,’’ विमला ने नाराजगी जताई थी.

‘‘वही तो मैं समझा रहा हूं, मां. मेरे विवाह की ऐसी जल्दी क्या है? मुझे तो लड़की वालों का व्यवहार बड़ा ही संदेहास्पद लग रहा है. जरा सोचो, मां, इतना संपन्न परिवार अपनी बेटी का विवाह मुझ जैसे साधारण बैंक अधिकारी से करने को क्यों तैयार है?’’

‘‘तुम स्वयं को साधारण समझते हो पर बैंक मैनेजर की हस्ती क्या होती है इसे वे भलीभांति जानते हैं.’’

‘‘हमारे परिवार के बारे में भी वे अच्छी तरह से जानते होंगे न मां, मेरे 2 छोटे भाई अभी पढ़ रहे हैं. दोनों छोटी बहनें विवाह योग्य हैं.’’

‘‘कहना क्या चाहते हो तुम? इन सब का भार क्या तुम्हारे कंधों पर है? तुम्हारे पापा इस शहर के जानेमाने चिकित्सक थे. तुम्हारे दादाजी भी यहां के मशहूर दंत चिकित्सक थे. इतनी बड़ी कोठी बना कर गए हैं तुम्हारे पूर्वज. बाजार के बीच में बनी दुकानों से इतना किराया आता है कि तुम कुछ न भी करो तो भी हमारा काम चल जाए.’’

‘‘मां, पापा और दादाजी थे, अब नहीं हैं. हमारी असलियत यही है कि 6 लोगों के इस परिवार का मैं अकेला कमाऊ सदस्य हूं.’’

‘‘बड़ा घमंड है अपने कमाऊ होने पर? इसलिए स्वाति के परिवार के सामने तुम ने मेरा अपमान किया. मुझ से बिना कुछ कहे ही तुम्हारे वहां से चले आने से मुझ पर क्या बीती होगी यह कभी नहीं सोचा तुम ने,’’ विमलाजी फफक उठी थीं.

‘‘मां, मैं आप को दुख नहीं पहुंचाना चाहता था पर जरा सोचो, विवाह के बाद कोई मुझे आप से छीन कर अलग कर दे तो क्या आप को अच्छा लगेगा?’’ कनक ने विमलाजी के आंसू पोंछे थे.

‘‘कनक, यह क्या कह रहा है तू?’’ वे चौंक उठी थीं.

‘‘वही, जो मैं वहां से सुन कर आ रहा हूं. आप सब हम दोनों को अकेला छोड़ कर चले गए थे. हम ने अपने भविष्य पर विस्तार से चर्चा की. मेरी और स्वाति की सोच में इतना अंतर है कि आप सोच भी नहीं सकतीं. वह यदि सातवें आसमान पर है तो मैं रसातल में.’’

‘‘ऐसा क्या कहा उस ने?’’

‘‘पूछ रही थी कि सगाई की अंगूठी कहां से खरीदोगे. हाल ही में किसी फिल्मी हीरोइन का विवाह हुआ है. कह रही थी उस की अंगूठी 3 करोड़ की थी. मैं कितने की बनवाऊंगा.’’

‘‘फिर तुम ने क्या कहा?’’

‘‘मैं ने हंस कर बात टाल दी कि बैंक का अफसर हूं. बैंक का मालिक नहीं और बैंक में डकैती डालने का मेरा कोई इरादा नहीं है.’’

कनक के छोटे भाई तनय व विनय और बहनें विभा और आभा खिलखिला कर हंस पड़े थे.

‘‘तुम लोगों को हंसी आ रही है और मेरा चिंता के कारण बुरा हाल है,’’ विमला ने सिर थाम लिया था.

‘‘छोटीछोटी बातों पर चिंता करना छोड़ दो, मां, सदा खुश रहना सीखो, दुख भरे दिन बीते रे भैया…’’ तनय ने अपने हलकेफुलके अंदाज में कहा.

‘‘चिंता तो मेरे जीवन के साथ जुड़ी है बेटे. आज तेरे पापा होते तो ऐसा महत्त्वपूर्ण निर्णय वे ही लेते पर अब तो मुझे ही सोचसमझ कर सब कार्य करना है.’’

‘‘और क्या कहा स्वाति ने, भैया?’’ विभा ने हंसते हुए बात आगे बढ़ाई थी.

‘‘मैं बताती हूं दीदी, विवाह परिधान किस डिजाइनर से बनवाया जाएगा. गहने कहां से और कितने मूल्य के खरीदे जाएंगे. हनीमून के लिए हम कहां जाएंगे. स्विट्जरलैंड या स्वीडन,’’ आभा ने हासपरिहास को आगे बढ़ाया.

‘‘कनक भैया, सावधान हो जाओ. दीवाला निकलने वाला है तुम्हारा. यहां तो उलटी गंगा बह रही है. पहले लड़की वाले दहेज को ले कर परेशान रहते थे. यहां तो शानशौकत वाले विवाह का सारा भार तुम्हारे कंधों पर आ पड़ा है,’’ विनय भी कब पीछे रहने वाला था.

‘‘चुप रहो तुम सब. यह उपहास का विषय नहीं है. हम यहां गंभीर विषय पर विचारविमर्श कर रहे हैं. विभा और आभा तुम्हारी कल से परीक्षाएं हैं, जाओ उस की तैयारी करो. यहां समय व्यर्थ मत गंवाओ. तनय, विनय, तुम लोग भी जाओ, अपना काम करो और हमें कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दो,’’ विमला ने चारों को डपटा.

चारों चुपचाप उठ कर चले गए थे.

‘‘हां, अब बताओ और क्या बातें हुईं तुम दोनों के बीच. पता तो चले कि वह लड़की हमारे साथ हिलमिल पाएगी या नहीं,’’ एकांत पाते ही विमला ने पूछा था.

 

लड़की- द ड्रैगन गर्ल’ रिव्यू: राम गोपाल वर्मा का करिश्मा खत्म

रेटिंग: डेढ़ स्टार

निर्माता: राम गोपाल वर्मा

निर्देशकः राम गोपाल वर्मा

कलाकारः पूजा भालेकर,पार्थ सूरीअभिमन्यू सिंहराजपाल यादव,तियान लोंग शी

अवधिः दो घंटे

 

13 मिनट वीडियो कैसेट की दुकान चलाते चलाते फिल्म निर्देशक बने राम गोपाल वर्मा की अपनी एक अलग पहचान रही है.उन्होने ‘‘सत्या’’,‘रंगीला’,‘शूल’,‘कौन,‘मस्त’,‘जंगल’,‘ कंपनी’,‘भूत’ ,‘रोड’,‘सरकार’,‘सरकार राज’ सहित लगभग अस्सी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं.उन्हे फिल्म शूल’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्ीय पुरस्कार भी मिला.मगर पिछले दस वर्षों में उनकी निर्देशकीय प्रतिभा का धीरे धीरे पतन ही होता रहा है.राम गोपाल वर्मा मार्शल आर्ट के गुरू ब्रूसली को ट्ब्यिूट देने के लिए बनायी गयी अपनी नई फिल्म ‘ लड़कीः द ड्ैगन गर्ल’’ में तो पूरी तरह से हार गए हैं.इस फिल्म में कहानी,पटकथा व निर्देशन सब कुछ कमजोर है.

 

कहानीः

फिल्म की कहानी एक रेस्टारेंट से शुरू होती है.जहां दो तीन लड़कियां छोटे कपड़े पहनकर बैठी हुई हैं.इनमें से एक पूजा (पूजा भालेकर) है,जो कि जीत कंुडो यानी कि जूड़ो कराटे में माहिर है.तो वहीं एक फोटोग्राफर नील (पार्थ सूरी ) भी बैठा हुआ है.कुछ गंुडे किस्म के लड़के उस रेस्टारेंट में आते हैं और लड़कियों के छोटे कपडों को लेकर फब्तियां कसते हैं.नील उन्हे ऐसा करने से मना करते हैं,तो वह लड़के नील की पिटायी कर देते हैं.यह देखकर पूजा उन लड़कों की अच्छे से ढुलाई कर देती है.यहीं से पूजा व नील दोस्त बन जाते हैं.पूजा बताती है कि वह मार्शल आर्ट के गुरू ब्रूसली की बहुत बड़ी फैन है और वह जीत कंुडो सीखती है.नील उसे लेकर चीन जाता है.इधर पूजा को जीत कंुडो सिखाने वाले गुरू(तियान लोंग षी) ,जो कि चीनी हैंकी हत्या हो जाती है और उनकी जमीन पर एक बिल्डर कब्जा कर लेता है.भारत वापस आने पर पूजा अपने गुरू के हत्यारांे से बदला लेनेे का निर्णय लेती है.पता चलता है कि इसके पीछे एम बी (अभिमन्यू सिंह) का हाथ है.जो कि कई तरह के अवैध ध्ंांधे चला रहा है.अब पूजा एमबी के खिलाफ लड़ाई शुरू करती है.अंत में जीत भले ही उसकी होती है,मगर उसे बहुत कुछ खोना पड़ता है.

 

लेखन व निर्देशनः

एक्शन प्रधान फिल्म‘‘लड़की द ड्ैगन गर्ल ’’में मार्शल आर्ट रूपी एक्शन से इतर कुछ भी नही है.फिल्म की कहानी,पटकथा व निर्देशन बहुत कमजोर है.फिल्मकार राम गोपाल वर्मा ने नारी सशक्तिकरणजैसे कई मुद्दे बेवजह व बेतरतीब तरीके से ठूंसे हैं.अन्यथा बिल्डर का दूसरों की जमान पर कब्जा करने की कहानी पर सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं.फिल्म के एक दृश्य में नजर आता है कि एक कमरे में कुछ लड़कियों के हाथ पैर व मंुह बांधकर रखा गया है.नायिका वहां अपना बदला लेने के लिए गंुडो से मारा मारी करती है,मगर उन लड़कियों को छुड़ाने का काम नही करती.खलनायक के अवैध करनामों को भी यह फिल्म ठीक से चित्रित नही करती है.इतना ही नही रामू ने बेवजह क्लायमेक्स में हीरो के अपहरण व उसकी हत्या का भी चिरपरिचित फार्मूला ठॅूंस दिया.नारी पात्रों को पेश करने का उनका अपना अंदाज रहा है.वह नारी को सेक्स’ से परे कभी देख ही नहीं पाए.इस फिल्म में भी उन्होने अपनी नायिका के बदन को ही दिखाने पर ज्यादा जोर दिया है.पूरी फिल्म में नायिका पूजा टू पीस बिकनी या छोटे स्कर्ट में ही नजर आती हैं. वर्तमान समय में हर लड़की /औरत का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व सशक्त होना अनिवार्य है.मगर यह फिल्म इस बाबत कुछ नहीं कहती.राम गोपाल वर्मा तो मार्शल आर्ट और नारी की शारीरिक आत्म निर्भरता की गलियों में भटकते हुए समुद्री बीच पर नारी की कामुकता का ही प्रदर्शन करते नजर आते हैं.वह इस फिल्म से संदेश दे सकते थे कि आत्मरक्षा के लिए हर लड़की का मार्शल आर्ट सीखना चाहिए.मगर ऐसा कुछ नही है.यह फिल्म इस संदेश को भी नहीं दे पाती कि लड़कियां सुरक्षा के मसले पर आत्मनिभर््ार हों.यहां तो नायिका मार्शल आर्ट व अपनी शारीरिक ताकत का उपयोग महज बदला लेने के लिए करती है,जिसमें अंततः वह अपने प्रेमी को खो देती है.इतना ही नही वह हर बार गुंडों की पिटायी करती है और जब गंुडे भागते हंै,तो वह भी कई मिनटों तक उनके पीछे भागती है.यह लेखक व निर्देशक की कमजोरी का परिणाम है.फिल्म के कई दृश्य तो राम गोपाल वर्मा की ही पुरानी फिल्मों की याद दिला देते हैं.

 

अभिनयः

निर्देशक के तौर पर राम गोपाल वर्मा की सबसे बड़ी हार हुई है.वह एक भी कलाकार से अच्छी परफार्मेंस नही करा पाए.फिल्म की नायिका पूजा का किरदार निभाने वाली अदाकारा पूजा भालेकर निजी जिंदगी में मार्शल आर्ट आर्टिस्ट हैं.इसलिए वह एक्शन दृश्यों में कमाल करते हुए नजर आती हैं.मगर अभिनय के मामले में वह शून्य है. नायक नील के किरदार में पार्थ सूरी कहीं से भी प्रभावित नहीं करते.वैसे भी उनके किरदार में करने के लिए उनके हिस्से कुछ खास आया ही नही.बस मार खाना ही उनके हिस्से आया.छोटे किरदार में राज पाल यादव बुरी तरह से निराश करते हैं.अभिमन्यु सिंह का अभिनय भी घटिया है.

कैटरीना कैफ और विक्की कौशल 16 जुलाई को दे सकते हैं गुड न्यूज

बॉलीवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ इन दिनों अपनी प्रेग्नेंसी की खबरों को लेकर सुर्खियां बटोर रही हैं. हाल ही में वह अपने पति विक्की कौशल के साथ नजर आईं थीं.

वहीं एक रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि कैटरीना कैफ अपने 39वें जन्मदिन पर अपनी प्रेग्नेंसी का एलान करेंगी. इस बात की भनक जैसे ही कैटरीना के फैंस को लगी वह उन्हें सोशल मीडिया पर जमकर बधाई देनी शुरू कर दिए हैं.

विक्की कौशल और कैटरीना कैफ इन दिनों मालदीव में अपना बर्थ डे मनाने पहुंचे हैं. जहां पर उनके भाई सनी कौशल अपनी गर्लफ्रेंड के साथ  पहुंचेंगे. बता दें कि कैटरीना कैफ को आखिरी बार करण जौहर के बर्थ डे पार्टी में देखा गया था. जहां पर वह पहुंची थी. उसके बाद से कैटरीना ने 28 जून को अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट डाला था. उसके बाद वह शांत हैं. जिसे जानकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैटरीना इऩ दिनों इस खूबसूरत समय को एंजॉय कर रही हैं.

 

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बता दें कि पिछले साल दिसंबर में कैटरीना कैफ और विक्की कौशल सवाई माधोपुर में शादी के बंधन में बंधे थें. अगर वर्कफ्रंट की बात करें तो वह जल्द ही एक्टर सिंद्धांत चतुर्वेदी और ईशान खट्टर की फिल्म फोन भूत में नजर आने वाली हैं. यह फिल्म अक्टूबर में सिनेमा घर में रिलीज होगी.

इसके अलावा वह फरहान अख्तर की फिल्म जी ले जरा में भी नजर आने वाली हैं. कैटरीना के साथ प्रियंका और आलिया भी लीड रोल में नजर आएंगी. यह फिल्म अगले साल बॉक्स ऑफिस में रिलीज होगी. अभी तक फिल्म के नाम का अनाउंसमेंट नहीं हुआ है.

सुष्मिता सेन और ललित मोदी को लेकर भाई राजीव सेन ने कह दी ये बड़ी बात

इन दिनों आईपीएल के चेयरपर्सन ललित मोदी के साथ रिलेशनशिप को लेकर सुष्मिता सेन चर्चे में हैं. उनकी रिलेशनशिप काफी ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है. इन दोनों की अफेयर की खबरें सुनकर काफी ज्यादा लोग हैरान हैं.

इसी बीच सुष्मिता सेन ने अपने भाई राजीव सेन को इंस्टाग्राम पर अनफॉलो कर दिया है. बता दें कि इंस्टाग्राम पर सुष्मिता केवल 14 लोगों को ही फॉलो करती हैं जिसमें से एक राजीव सेन थें और दूसरे उनकी भाभी चारु असोपा थी.

हालांकि जब उन्होंने अपने भाई राजीव सेन को अनफॉलो किया तो उसके बाद से  वह ललित मोदी को फॉलो कर ली हैं. जब राजीव सेन से इस बात के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं पता है. सबसे पहले मैं अपनी बहन से इस बारे में बात करुंगा फिर आप लोगों को कुछ बता पाउंगा.

मैं अभी इस बारे में कुछ भी कमेंट नहीं कर सकता हूं, बता दें कि आईपीएल के पूर्व फांउडर ने इंस्टाग्राम पर फोटो शेयर करते हुए सुष्मिता सेन को अपना बेटर हॉफ बताया है.

जैसे ही ललित मोदी के फैंस को इस बारे में पता लगा वह लोग ये समझने लगे कि कही सुष्मिता सेन ने इससे शादी तो नहीं कर ली है न. हालांकि इस पोस्ट को देखते हुए ललित मोदी ने रिएक्ट किया कि जल्द हम दोनों एक -दूसरे से शादी करने वाले हैं. खैर कुछ वक्त बाद ही इस बात का भी खुलासा हो जाएगा कि इस बात में कितनी सच्चाई है. क्या वाकई में ये दोनों शादी के बंधन में बंधने वाले हैं.

इससे पहले भी सुष्मिता सेन एक रिलेशनशिप में थी जो लड़का इनसे कम उम्र का था. लेकिन कुछ वक्त बाद ही दोनों का ब्रेकअप हो गया था. सुष्मिता सेन की 2 बेटियां हैं . जिसे वह खूब सारा प्यार देती रहती हैं. आए दिन दोनों के साथ फोटो शेयर करती रहती हैं.

मैं अभी तक कंसीव नहीं कर पाई हूं, कही इसकी वजह पूर्व में ली गई दवाएं तो नहीं हैं?

सवाल

मैं 24 वर्षीय युवती हूं. शादी से पहले मेरे 1-2 बौयफ्रैंड से सैक्स संबंध थे. उस समय मुझे 2 बार गर्भ भी ठहरा था. तब मैं ने दवा खा कर गर्भपात कर लिया. अब मेरी शादी को 3 साल हो चुके हैं मगर मैं अभी तक कंसीव नहीं कर पाई हूं. इस की वजह पूर्व में ली गई दवाएं तो नहीं हैं? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि भविष्य में मैं मां बन पाऊंगी या नहीं?

जवाब

सही खानपान और व्यायाम करें और डाक्टर की सलाह ले कर गर्भधारण में सहायक दवा का सेवन करें. आपकी अभिलाषा जरूर पूरी होगी. और अपने दिमाग में ऐसी बाते ना आने दें.

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एक दोस्त है जिस के प्रति मेरे मन में दोस्ती से ज्यादा…

सवाल

मेरी उम्र 19 वर्ष है. मेरा एक दोस्त है जिस के प्रति मेरे मन में दोस्ती से ज्यादा भी कुछ है. परंतु मुझे यह नहीं पता कि उस के मन में मेरे लिए कुछ है या नहीं. आजकल एक लड़की उस के आगेपीछे घूमने लगी है. मेरा दोस्त भी उसे अच्छाखासा भाव दे रहा है. मुझे तो उन दोनों को देख कर बहुत चिढ़ हो रही थी तो मैं ने उस लड़की से यह कह दिया कि वह मेरा बौयफ्रैंड है और उसे धक्का देते हुए कहा कि उस से दूर रहा कर. अब मुझे डर लग रहा है कि जब मेरे दोस्त को इन सब बातों का पता चलेगा तो कहीं वह मुझे गलत समझ कर मेरे बारे में उलटासीधा न सोचने लगे.

जवाब

आप की सब से बड़ी गलती है उस लड़की को धक्का देना, जबकि आप को यह तक पता नहीं कि वह लड़का आप से प्यार करता है या नहीं. आप ने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि जिस लड़की को आप ने धक्का दिया वह लड़की उस से प्यार करती है या सिर्फ दोस्त है. हो सकता है वह सिर्फ दोस्त हो और आप जिस से प्यार करती हैं वह भी उसे दोस्त मानता हो. अब जब वह यह वाकेआ उसे बताएगी तो वह क्या सोचेगा, पता नहीं, लेकिन इतना तो जरूर सोचेगा कि आप की सोच छोटी है. पहले आप को सारी बातें क्लीयर कर लेनी चाहिए थीं. और जब आप उस से प्यार करती हैं तो इजहार करने में डरती क्यों हैं? अब बेहतर यही होगा कि पहले आप उस लड़की को सौरी बोलिए और अपने दोस्त को ये सारी बातें बताइए. इस से आप का मन भी हलका हो जाएगा और उसे यह भी पता चल जाएगा कि आप उसे प्यार करती हैं. यह उस के ऊपर निर्भर करेगा कि वह आप के बारे में क्या खयाल रखता है.

आईना: रंग बदलती भारतीय जनता पार्टी

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी और दिल्ली के मीडिया प्रमुख नवीन जिंदल की इसी तरह की टिप्पणी से नाराज खाड़ी देश कतर, कुवैत, ईरान और सऊदी अरब व पाकिस्तान के साथसाथ दुनियाभर के कई देशों ने आड़े हाथ लेते हुए भारतीय राजदूतों को तलब किया. इसी दबाव की वजह से भारतीय जनता पार्टी ने नूपुर शर्मा को निलंबित कर दिया, वहीं नवीन जिंदल को निष्कासित कर दिया. भाजपा को लगने लगा था कि हिंदूमुसलिम के बीच आपसी विवाद से ही उस का विकास हुआ है और आगे भी कामयाबी उसी से मिलेगी. इस के पहले विवादित बयान देने वाले लोगों को भाजपा सम्मानित करती रही है.

बहुत लोगों का कद भाजपा में इसलिए बढ़ता रहा कि वे विवादित बयान देने में माहिर थे, पर इन दोनों नेताओं पर भाजपा ने तत्काल क्यों ऐक्शन लिया? यह एक अहम सवाल है. खाड़ी देशों में भारतीय सामान का बहिष्कार किया जाने लगा. इन नेताओं के विवादित बयान की वजह से खाड़ी देशों में काम कर रहे गैरमुसलिम भारतीय प्रवासियों को वापस जाने की भी बात की जाने लगी. भारतीय राजदूतों से उन के देशों में जवाबतलब किया जाने लगा. इन देशों में गुजराती कारोबारियों का लगा पैसा खतरे में पड़ गया है. भाजपा सरकार सबकुछ बरदाश्त कर सकती है,

लेकिन अपने फाइनैंसर के पैसे को खतरे में नहीं डाल सकती. सऊदी अरब, जो तेल भेजता है, उस में से ज्यादातर तेल मुकेश अंबानी की जामनगर रिफाइनरी में प्रोसैस होता है. अडानी ने चावल कंपनी मोहसिन को खरीद लिया था. कोहिनूर राइस ब्रांड को भी खरीद लिया है. महंगा चावल तो बिरयानी बनाने के ही काम आएगा. अडानी ग्रुप पैक्ड फूड कहां ऐक्सपोर्ट करेगा? सब से ज्यादा खपत तो खाड़ी देशों में ही है. सब से ज्यादा निर्यात करने वाले गुजराती लोग ही हैं. हीरा कारोबारी भी अपने बड़ेबड़े दफ्तर मुंबई से उठा कर दुबई में शिफ्ट कर रहे हैं. ये कई वजहें हैं. जिन पूंजीपतियों के इशारे पर सरकार चल रही है, उन्हें किसी भी शर्त पर नाराज नहीं होना चाहिए.

इन्हीं वजहों से भाजपा ने आननफानन ही इन दोनों नेताओं पर कार्यवाही कर दी. अचानक इंटरनैशनल दबाव में ‘छप्पन इंच का सीना’ सिकुड़ कर 6 इंच का हो गया. सारी हेकड़ी निकल गई. भारतीय जनता पार्टी हिंदी, इंगलिश, उर्दू और तमिल हर भाषा के अखबारों में यह घोषणा करने लगी कि भारतीय जनता पार्टी सभी धर्मों की समान रूप से इज्जत करती है. भाजपा की अगुआई वाली सरकारें भी धर्मों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं करती हैं. सरकार की नजर में सब बराबर हैं. अखबारों में इन संदेशों को पढ़ कर लोग हंस रहे हैं और मखौल उड़ा रहे हैं कि इस देश का छोटा बच्चा भी जानता है कि भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है, जो हिंदुत्व का राग अलाप कर अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति नफरत पैदा कर के सत्ता पर काबिज है.

भाजपा द्वारा इन दोनों नेताओं पर की गई कार्यवाही से इसी दल के कई नेता और कार्यकर्ता नाराज हैं. इस के लिए वे पार्टी आलाकमान को दोषी मान रहे हैं. इन नेताओं और कार्यकर्ताओं को जो पढ़ाया गया है, वह वही सीखे हैं. इन्होंने तो दूसरे धर्म वालों से नफरत करना ही सीखा है. आज मजबूरी में उन्हें अचानक अपने स्वार्थ में प्रेम का पाठ पढ़ाएंगे, तो वे उसे स्वीकार नहीं कर पाएंगे. इस मुद्दे पर प्रोफैसर राम अयोध्या सिंह कहते हैं कि नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल के संबंध में भाजपा या मोदी सरकार जो भी स्पष्टीकरण दे और अपनेआप को जितना भी धर्मनिरपेक्ष साबित करने की कोशिश करे, यह तो दिन की तरह साफ है कि संघ, भाजपा और मोदी सरकार अपने विचार, चरित्र, चेहरा, आचरण और राजनीतिक क्रियाकलापों से अंदर और बाहर से सौ फीसदी एक घनघोर सांप्रदायिक राजनीतिक दल और सरकार है.

संघ एक ऐसा सांस्कृतिक संगठन है, जो सबकुछ बंद दरवाजे के भीतर तय करता है और खुले रूप में भाजपा और अपनी सरकारों को करने की छूट भी देता है. अपने जन्म से ले कर अब तक संघ और भाजपा सांप्रदायिक रहे हैं और सांप्रदायिकता ही उन का बीजमंत्र रहा है. आजादी के बाद इस संगठन और इस से जुड़ी इकाइयां सांप्रदायिकता के लिए पूरे देश में जमीन तैयार करती रही हैं. अपनी विचारधारा को कई माध्यमों से लोगों तक ले जाने का काम कर रही हैं. संविधान, लोकतंत्र, तिरंगा और राष्ट्र की महान हस्तियों का अपमान इन का खुला एजेंडा रहा है. मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता और लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा इन के संज्ञान में नहीं है.

हिंदू राष्ट्र, हिंदुत्व और रामराज्य का सपना साकार करने के लिए ये लगातार कोशिश में लगे हुए हैं. वर्तमान संविधान की जगह जो संगठन ‘मनुस्मृति’ और वर्णव्यवस्था की वकालत करता हो, वह भला कैसे और कब से धर्मनिरपेक्ष हो गया? यह इन के गिरगिट की तरह रंग बदलने की असलियत है. शिक्षाविद गालिब साहब का कहना है कि इस देश के लोगों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि कुछ विदेशी मुल्कों द्वारा विरोध करने से उग्र हिंदुत्ववादियों की राष्ट्र विरोधी, संविधान विरोधी और समाज विरोधी कारनामों पर रोक लगाई जा सकती है. इस का निदान तभी संभव है, जब इस देश के लोग लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे.

समस्या: सैनिकों की शहादतों का सिलसिला जारी

एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के लिए शहीद होने वाले कुल जवानों में से तकरीबन 78,000 (एकलौते बेटे) जवान कुंआरे या शादी के तुरंत बाद शहीद हो गए यानी कोई बच्चा होने से पहले ही धरती से विदा हो गए. एक नजरिए से देखा जाए, तो 78,000 परिवार ही खत्म हो गए. कोई सैनिक शहीद होता है, तो दिल्ली में किसी तरह की चर्चा तक नहीं होती. जिस गांव से वह ताल्लुक रखता है, उस गांव व आसपास के गांवों के लोग उस शहीद के अंतिम संस्कार में जुटते हैं और सेना के अफसरों और एसडीएम या डीएम को सलामी देते देखते हैं, तो जोश से लबरेज नजर आते हैं.

मीडिया वाले परिवार के लोगों की बाइट दिखा कर जोश को दोगुना कर देते हैं. सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि उस ने इतनी कम उम्र में देश के लिए कुरबानी दी है या उस के बाप ने कहा कि मुझे गर्व है कि मेरे बेटे ने देश के लिए शहादत दी है, हालांकि उस बाप के असल दर्द को कौन जान सकता है. बाद में शहीदों के परिवारों की देखरेख हम किस तरह से करते हैं, वह जगजाहिर है. शहीद की मां गांव के गवाड़नुक्कड़ पर बैठ कर रोज आनेजाने वाले को बेटे की कहानियां सुनाते हुए आंसू पोंछती रहती है, तो पिता खेतों में दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में इसलिए रातदिन लगा रहता है कि दूसरा बेटा शहीद भाई की फाइलें ले कर अफसरों के दफ्तरों के चक्कर आराम से काट सके. नेताओं और सिविल सोसाइटी के लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर शहीदों की शहादत को ले कर फेंके गए जोशीले शब्दों को देख कर लगता है कि उन में से न जाने कितने दोगले लोग हैं कि एक ट्वीट या पोस्ट के बाद वे जिंदगी का मजा लेने लग जाते हैं. क्या फर्क पड़ता है उन्हें.

अब तो बाकायदा चुनाव भी शहीदों के नाम पर लड़े जा रहे हैं, जबकि शहीदों की शहादत को ले कर ही सवाल खड़े हो रहे हैं. अब कश्मीर कोई राष्ट्रभक्ति के ज्वार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय शर्म का मसला है कि आजादी के इतने सालों बाद भी रोज किसानकमेरों के बच्चों की लाशें तिरंगे में लिपट कर गांवों में पहुंच रही हैं, मगर सत्ता के लिए कश्मीर राष्ट्रवाद का मुद्दा है और हर सरकार कश्मीर को आगे कर के देशभर में गद्दरों को ढूंढ़ती रहती है. नक्सलवाद शुद्ध रूप से भुखमरी और बेकारी का मसला है, मगर सरकारें समाधान ढूंढ़ने के बजाय आदिवासियों को बल प्रयोग द्वारा जल, जंगल, जमीन से खदेड़ कर उन में इजाफा करती जा रही है, तो वहीं दूसरी तरफ अर्धसैनिक बलों की टुकडि़यों में इजाफा करती जाती है. जब हार्डकोर अपराधी, नेता व उद्योगपतियों के नैक्सस के खिलाफ गरीब लोग जंग हार जाते हैं, तो वे नक्सलवाद की राह पकड़ लेते हैं.

आदिवासियों की मौतों पर बिग ब्रेकिंग खबरें जैसे ‘मुठभेड़ में इतने मार गिराए’ आदि चलती हैं, तो देश में मीडिया के जरीए खुशी का माहौल बन जाता है. दूसरी तरफ जवान शहीद होते हैं, तो मामला मातम में बदल दिया जाता है, जबकि दोनों तरफ मारे भारत के नागरिक ही जा रहे हैं. देश की सत्ता में एक ऐसा नैक्सस बन गया है, जो समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने के बजाय यह तय करता है कि कब और किस तरह राष्ट्रवाद को हद पर पहुंचाना है या कम कर के गद्दारों की टोली ढूंढ़ने निकलना है. देश के जवानों की शहादत पर नेता उन के परिवारों से हमदर्दी जताने आते हैं. इस दौरान वे लंबेलंबे भाषण देते हैं और इन्हीं भाषणों में आश्वासन भी दिए जाते हैं, जो कभी पूरे नहीं होते. इन आश्वासनों के भरोसे ये परिवार वाले सरकारी महकमों के चक्कर लगाते रहते हैं.

कारगिल की लड़ाई में शहीद हुए सीकर, राजस्थान के गांव धनेठा के लायंस नायक राम सिंह ने देश के लिए शहादत दी थी. उस समय राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार ने इस फौजी की विधवा पत्नी को भरोसा दिया था कि उन्हें गैस एजेंसी दी जाएगी और बच्चों की पढ़ाई मुफ्त करवाई जाएगी. लेकिन 23 साल बाद भी सरकार और फौजी अफसरों की बेरुखी का शिकार हुई शहीद फौजी की विधवा पत्नी की कहीं सुनवाई नहीं हो रही. सीमा रणवां ने बताया कि जब उस के पति शहीद हुए, तो उस का एक बेटा कर्म सिंह 5 साल का था और दूसरा बेटा डेढ़ साल का कुलदीप सिंह था, जिन की मुफ्त पढ़ाई की बात सरकार ने कही थी, लेकिन उस के बच्चों को स्कूलों में मुफ्त शिक्षा नहीं मिली. आतंकी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान विजय कुमार मौर्य के साथ ही कई रिश्ते भी शहीद हो गए,

कई सपने दम तोड़ गए. बुजुर्ग पिता ने होनहार बेटा खो दिया. पत्नी का सुहाग उजड़ गया. 3 साल की मासूम बच्ची की अभी अपने पापा से पहचान पुख्ता भी नहीं हो सकी थी कि वे दोनों हमेशा के लिए बिछुड़ गए. 2 मासूम भतीजियों की उम्मीदों की डोर भी एक झटके में टूट गई. इन सब की जिम्मेदारी आतंकी हमले में शहीद हुए विजय कुमार पर थी. शहीद विजय कुमार के घर की माली हालत ठीक नहीं है. उन्होंने बैंक से 10 लाख रुपए का कर्जा लिया था. इस से उन्होंने सीकर में जमीन खरीदी और बाकी पैसों से गांव का घर दुरुस्त कराया था. अब परिवार को चिंता है कि यह लोन कैसे चुकता होगा. पिता करतार सिंह गांव में ही बंटाई पर ली हुई जमीन पर खेती करते हैं.

3 भाइयों व एक बहन के बीच विजय कुमार सब से छोटे थे. बड़े भाई अशोक गुजरात में निजी कंपनी में काम करते हैं. बहन की शादी हो चुकी है. साल 2014 में विजय कुमार की शादी हुई. उन की 6 साल की बेटी आराध्या है. विजय कुमार के जाने से इन सभी के सपनों ने दम तोड़ दिया. विजय कुमार की पत्नी लक्ष्मी रोतेरोते सवाल करती हैं, ‘‘आज तक इतने जवान शहीद हुए, क्या हुआ? कुछ भी नहीं. नेता हो या मंत्री, कोई कुछ नहीं करता. बस चार दिन शोर होगा, उस के बाद सब शांत हो जाता है, लेकिन हम पर तो जिंदगीभर गुजरती है.’’ खैर, अगर शहीद परिवार व गांव के लोग अपने लाड़लों की मौत पर सत्ता से सवाल करने लग जाएं, जैसे अमेरिका या यूरोप के लोग करते हैं,

तो इन शहादतों में भारी कमी आ सकती है, मगर भारतीय समाज में वह मानसिक लैवल अभी तक पैदा नहीं हो पाया है. अज्ञानता का फायदा सत्ता उठाती है और मीडिया राष्ट्रवाद के पारे को ऊपरनीचे करने में मददगार है. अपने आसपास के शहीदों के परिवारों के साथ बैठ कर उन का दर्द हलका करते जाइए. निजामों का खून खौले या नहीं, मगर लगातार होती शहादतों पर आम लोगों का खून खौलना चाहिए.

डाक्टर बेटी : शमीम कुर्सी पर बैठे हुए क्या ख्वाब देख रही थी

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