ताईजी: भाग 3- गलत परवरिश

विभा ने जब रिचा से इस विषय पर बात की तो पहले तो वह सकपका गई, फिर बोली, ‘‘रोज ही कोई न कोई समस्या घेरे रहती है, समझ में नहीं आता, कब क्या करूं. पर 6 महीने वाली बात गलत है, मुश्किल से महीनाभर पहले ही तो कपड़ा आया है.’’

‘‘तुम अपने कार्यों को व्यवस्थित कर के किया करो. गृहिणी दफ्तर नहीं जाती, किंतु उस का कार्यक्षेत्र तो सब से अधिक विस्तृत होता है. इस में कहीं अधिक योजना की आवश्यकता होती है, ताकि हर कार्य समय से कुछ पूर्व ही हो जाए और घर के सदस्यों को किसी प्रकार की परेशानी या तनाव गृहिणी के प्रति न रहे.’’विभा ने यह भी देखा था कि हर रोज सुबह नहाने के बाद अलमारी में से कपड़े निकालते समय भी मां और बेटे में अकसर तकरार होती है. उस ने रिचा से इस समस्या को सुलझाने की भी हिदायत दी.एक दिन दोपहर को जब विक्की खेलने की जिद करने लगा तो विभा ने उसे 2 घंटे का गणित का पेपर सैट कर के दे दिया. जब 2 घंटे बाद उस ने विक्की की कौपी जांची तो यह देख कर बहुत प्रसन्न हुई कि विक्की ने 50 में से 50 अंक प्राप्त किए हैं. वह बोली, ‘‘बहुत बढि़या, शाबाश विक्की, पढ़ाई में तो तुम अच्छे हो, तो परीक्षा में इतने कम नंबर क्यों आए?’’

विक्की हंसता हुआ ताईजी से लिपट गया और उन की पप्पी लेता हुआ बोला, ‘‘मुझे अपने साथ ले चलिए, प्लीज ताईजी.’’ विभा उस की मानसिकता देख कर सोच में पड़ गई थी, ‘यह बच्चा अपने मातापिता से दूर क्यों जाना चाहता है? और अपने साथ ले जाना ही क्या इस समस्या का सही निदान है?’

दिन के 12 बजे का समय था. विक्की रिचा के पास जा कर चिल्लाया, ‘‘बड़ी जोर की भूख लगी है. खाना कब दोगी?’’

‘‘क्या खाएगा? मुझे खा ले तू तो, सारा दिन बस ‘भूखभूख’ चिल्लाता रहता है. अभी सुबह तो पेट भर कर नाश्ता किया है, कुछ देर पहले ही फ्रिज में से मिठाई के 3 टुकड़े निकाल कर खा चुका है. मैं सब देख रही थी बच्चू, अब फिर भूखभूख. मुझे भी तो नहानाधोना होता है. चल जा कर पढ़ कुछ देर,’’ रिचा विक्की पर झल्ला पड़ी.

‘‘हमेशा डांटती रहती हो, अब भूख लगी है तो क्या करूं? पैसे दे दो, बाजार से समोसे खा कर आऊंगा.’’

‘‘यह कह न, कि समोसे खाने का मन है,’’ रिचा चिल्लाई, ‘‘देखिए न दीदी, कितना चटोरा हो गया है. पिछली बार जब मां के पास गई थी तो वहां पर छोटी बहन अपने घर से समोसे बना कर लाती थी. यह अकेला ही खाली कर देता था. देखो न, कितना मोटा होता जा रहा है, खाखा कर सांड हो रहा है.’’

‘‘रिचा, अपनी जबान पर लगाम दो. बच्चे के लिए कैसेकैसे शब्द मुंह से निकालती हो. यह यही सब सीखेगा. जो सुनेगा, वही बोलेगा. जो देखेगा, वही करेगा. पढ़ाई की जो बात तुम ने इस से कही है, वह सजा के रूप में कही है. इसे स्वयं ले कर बैठो, रोचक ढंग से पढ़ाई करवाओ. कैसे नहीं पढ़ेगा? दिमाग तो इस का अच्छा है,’’ विभा दबे स्वर में बोली ताकि विक्की उस की बात सुन न सके. पर इतनी देर में विक्की अपने लिए मिक्सी में मीठी लस्सी बना चुका था. वह खुशी से बोला, ‘‘ताईजी, लस्सी पिएंगी?’’ वह गिलास हाथ में लिए खड़ा था.

‘‘नहीं बेटे, मुझे नहीं पीनी है, तुम पी लो.’’

‘‘ले लीजिए न, मैं अपने लिए और बना लूंगा, दही बहुत सारा है अभी.’’

‘‘नहीं विक्की, मेरा मन नहीं है,’’ विभा ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘दीदी, मेरी बहनों के बच्चों के साथ रह कर इसे भी बाजार के छोलेभटूरे, आलू की टिकिया, चाट, समोसे वगैरा खाने की आदत पड़ गई है. उन के बच्चे हर समय ही वीडियो गेम खेलते हैं, अनापशनाप खर्च करते हैं, पर हम तो इतना खर्च नहीं कर सकते. इतना समझाती हूं, पर यह माने तब न. इसी कारण तो अब मैं दिल्ली जाना ही नहीं चाहती.’’ ‘‘बस, शांत हो जाओ. विक्की को चैन से लस्सी पीने दो. उसे समझाने का तुम्हारा तरीका ही गलत है,’’ विभा चिढ़ कर बोली.

‘‘अब आप भी मेरे ही पीछे लग गईं?’’ रिचा फूटफूट कर रोने लगी, ‘‘मेरा बच्चा ही जब मेरा नहीं रहा तो मैं औरों से क्या आशा करूं?’’ विभा ने सोचा, ‘इसी प्रकार तो नासमझ माताएं अपने बच्चों से हाथ धो बैठती हैं. बच्चों का मनोविज्ञान, उन की इच्छाअनिच्छा, उन के आत्मसम्मान व स्वाभिमान के विषय में तो कुछ समझती ही नहीं हैं. बस, अपनी ही हांकती रहती हैं. सोचती यही हैं कि उन के बच्चे को घर के और लोग ही बिगाड़ रहे हैं, जबकि इस कार्य में उन का स्वयं का हाथ भी कुछ कम नहीं होता.’ ‘‘बढ़ता बच्चा है, छुट्टियों के दिनों में कुछ तो खाने का मन करता ही है. कुछ नाश्ते का सामान, जैसे लड्डू, मठरी, चिड़वा वगैरा बना कर रख लो,’’ विभा ने अगले दिन कहा.

‘‘तो क्या मैं उसे खाने को नहीं देती? जब कहता है, तुरंत ताजी चीज बना कर खिलाती हूं.’’

‘‘वह तो ठीक है रिचा, पर हर समय तो गृहिणी का हाथ खाली नहीं होता न, फिर बनाने में भी कुछ देर तो लग ही जाती है. नाश्ता घर में बना रखा हो तो वह स्वयं ही निकाल कर ले सकता है. मैं आज मठरियां बनाए देती हूं.’’

‘‘अभी गैस खाली है नहीं, खाना भी तो बनाना है,’’ रिचा ने बेरुखी से कहा.

‘‘ठीक है, जब कहोगी तभी बना दूंगी,’’ विभा रसोई से खिसक ली. व्यर्थ की बहसबाजी में पड़ना उस ने उचित न समझा. वैसे भी अगले दिन तो उसे अपने घर जाना ही था. कौन कब तक किसी की समस्याओं से जूझ सकता है? पर जब कोई व्यक्ति हठधर्मी पर ही उतर आए और अपनी ही बात पर अड़ा रहे तो उस का क्या किया जा सकता है?

‘बच्चे तो ताजी मिट्टी के बने खिलौने होते हैं, उन पर जैसे नाकनक्शे एक बार बना दो, हमेशा के लिए अंकित हो जाते हैं. संस्कार डालने का कार्य तो केवल मां ही करती है. चंचल प्रकृति के बच्चों को कैसे वश में रखा जा सकता है, यह भी केवल मां ही अधिक समझ सकती है,’ विभा ने सोचा. ‘‘ताईजी, मुझे पत्र लिखोगी न?’’ विक्की ने प्यार से विभा के गले में बांहें डालते हुए पूछा.

‘‘हां, अवश्य,’’ विभा हंस पड़ी.

‘‘वादा?’’ प्रश्नवाचक निगाहों से विक्की ने उन की ओर देखा.

‘‘वादा. पर तुम अब खूब मन लगा कर पढ़ोगे, पहले यह वादा करो.’’

‘‘वादा, ताईजी, आप बहुत अच्छी हैं. अब मैं मन लगा कर पढ़ूंगा.’’

‘‘खूब मन लगा कर पढ़ना, अच्छे नंबर लाना, मां का कहना मानना और अगली छुट्टियों में हमारे घर जरूर आना.’’

‘‘ठीक,’’ विक्की ने आगे बढ़ कर ताईजी की पप्पी ली. आने वाले निकट भविष्य के सुखद, सुनहरे सपनों की दृढ़ता व आत्मविश्वास  उस के नेत्रों में झलकने लगा था. ‘‘मेरे बच्चे, खूब खुश रहो,’’ विभा ने विक्की को गले से लगा लिया. तभी रेलगाड़ी ने सीटी दी. विक्की के पिताजी ने उसे ट्रेन से नीचे उतर आने के लिए आवाज दी.

‘‘ताईजी, आप मत जाइए, प्लीज,’’ विक्की रो पड़ा.

‘‘बाय विक्की,’’ विभा ने हाथ हिलाते हुए कहा. गाड़ी स्टेशन से खिसकने लगी थी. विक्की प्लेटफौर्म पर खड़ा दोनों हाथ ऊपर कर हिला रहा था, ‘‘बाय, ताईजी,  बाय.’’ उस की आंखों से आंसू बह रहे थे.

‘‘विक्की, अपना वादा याद रखना,’’ ताईजी ने जोर से कहा.

‘‘वादा ताईजी,’’ उस ने प्रत्युत्तर दिया. गाड़ी की गति तेज हो गई थी. विभा अपने रूमाल से आंसुओं को पोंछने लगी.

ताईजी: भाग 1- गलत परवरिश

‘‘मां, मेरा टेपरिकौर्डर दे दो न, कब से मांग रहा हूं, देती ही नहीं हो,’’ विक्की ने मचलते हुए कहा.

‘‘मैं ने कह दिया न, टेपरिकौर्डर तुझे हरगिज नहीं दूंगी, बारबार मेरी जान मत खा,’’ रिचा ने लगभग चीखते हुए कहा.

‘‘कैसे नहीं दोगी, वह मेरा है. मैं ले कर ही रहूंगा.’’

‘‘बड़ा आया लेने वाला. देखूंगी, कैसे लेता है,’’ रिचा फिर चिल्लाई.

रिचा का चीखना सुन कर विक्की अपने हाथपैर पटकते हुए जोरजोर से रोने लगा, ‘‘देखो ताईजी, मां मेरा टेपरिकौर्डर नहीं दे रही हैं. आप कुछ बोलो न?’’ वह अनुनयभरे स्वर में बोला.

‘‘रिचा, क्या बात है, क्यों बच्चे को रुला रही हो, टेपरिकौर्डर देती क्यों नहीं?’’

‘‘दीदी, आप बीच में न बोलिए. यह बेहद बिगड़ गया है. जिस चीज की इसे धुन लग जाती है उसे ले कर ही छोड़ता है. देखिए तो, कैसे बात कर रहा है. तमीज तो इसे छू नहीं गई.’’

‘‘पर रिचा, तुम ने बच्चे से वादा किया था तो उसे पूरा करो,’’ जेठानी ने दृढ़तापूर्वक कहा, ‘‘मत रो बच्चे, मैं तुझे टेपरिकौर्डर दिला दूंगी. चुप हो जा अब.’’

‘‘दीदी, अब तो मैं इसे बिलकुल भी देने वाली नहीं हूं. कैसे बदतमीजी से पेश आ रहा है. सच कह रही हूं, आप बीच में न पडि़ए,’’ रिचा बोली.

रिचा की बात सुन कर विभा तत्काल कमरे से बाहर चली गई. विक्की उसी प्रकार रोता, चीखता रहा. दोपहर के खाने से निबट कर देवरानी, जेठानी शयनकक्ष में जा कर लेट गईं. बातोंबातों में विक्की का जिक्र आया तो रिचा कहने लगी, ‘‘दीदी, मैं तो इस लड़के से परेशान हो गई हूं. न किसी का कहना मानता है, न पढ़ता है, हर समय तंग करता रहता है.’’

‘‘कैसी बातें करती हो, रिचा. तुम्हारा एक ही बेटा है, वह भी इतना प्यारा, इतना सुदर्शन, इतना कुशाग्र बुद्धि वाला, तिस पर भी तुम खुश नहीं हो. अब उसे तुम कैसा बनाती हो, कैसे संस्कार प्रदान करती हो, यह तो तुम्हारे ही हाथ में है,’’ विभा ने समझाया.

‘‘क्या मेरे हाथ में है? क्या यहां मैं अकेली ही बसती हूं?’’ रिचा तैश में आ गई, ‘‘मैं जो उसे समझाती हूं, दूसरे उस की काट करते हैं. ऐसे में बच्चा भी उलझ जाता है, क्या करे, क्या न करे. अभी परसों की ही बात है, इन के बौस के बच्चे आए थे. ये उन के लिए रसगुल्ले व नमकीन वगैरा ले कर आए थे. सब को मैं ने प्लेटें लगा कर 2-2 रसगुल्ले व नमकीन और बिस्कुट रख कर दिए. इसे भी उसी तरह प्लेट लगा कर दे दी. मैं रसोईघर में उन के लिए मैंगोशेक बना रही थी कि यह आ कर कहने लगा, ‘मां, मैं रसगुल्ले और खाऊंगा.’

‘‘मैं ने कहा, ‘खा लेना, पर उन के जाने के बाद. अब इतने रसगुल्ले नहीं बचे हैं कि सब को 1-1 और मिल सकें.’ तब विक्की तो मान सा रहा था पर मांजी तुरंत मेरी बात काटते हुए बोलीं, ‘अरी, क्या है? एक ही तो बच्चा है, खाने दो न इसे.’

‘‘अब बोलिए दीदी. यह कोई बात हुई? जब मैं बच्चे को समझा रही हूं सभ्यता की बात, तो वे उसे गलत काम करने के लिए शह दे रही हैं. मैं भी मना तो नहीं कर रही थी न, बस यही तो कह रही थी कि अतिथियों के जाने के बाद और रसगुल्ले खा लेना. बस, इसी तरह कोई न कोई बात हो जाती है. जब मैं इसे ले कर पढ़ाने बैठती हूं, तब भी वे टोकती रहती हैं. बस, दादी की तरफ देखता हुआ वह झट से उठ कर भाग लेता है. लीजिए हो गई पढ़ाई. अब तो पढ़ाई से इतना कतराने लगा है कि क्या बताऊं, किसी समय भी पढ़ना नहीं चाहता.’’

‘‘स्कूल की परीक्षाओं में कैसे नंबर ला रहा है? वहां की प्रोग्रैस रिपोर्ट कैसी है?’’ विभा ने पूछा.

‘‘अरे, बस पूछो मत कि क्या हाल है. अब तो झूठ भी इतना बोलने लगा है कि क्या बताऊं.’’

‘‘जैसे?’’ विभा ने हैरानी दर्शाई.

‘‘पिछली बार कई दिनों तक पूछती रही, ‘बेटे, तुम्हारे यूनिट टैस्ट की कौपियां मिल गई होंगी, दिखाओ तो सही.’ तब बोला, ‘अभी कौपियां नहीं मिली हैं. जब मिलेंगी तो मैं खुद ही आप को दिखा दूंगा.’ जब 15 दिन इसी प्रकार बीत गए तो हार कर एक दिन मैं इस की कक्षा के एक लड़के संजय के घर पहुंची तो पता चला कि कौपियां तो कब की मिल चुकी थीं.

‘‘‘क्यों, विकास ने अपनी कौपियां दिखाई नहीं क्या?’ संजय ने हैरानी से पूछा.

‘‘‘नहीं तो, वह तो कह रहा था कि मैडम ने अभी कौपियां दी ही नहीं हैं,’ मैं ने उसे बताया तो वह जोरजोर से हंसने लगा, ‘विक्की तो इस बार कई विषयों में फेल हो गया है, इसी कारण उस ने आप को कौपियां नहीं दिखाई होंगी.’

‘‘मुझे बहुत क्रोध आया, खुद को अपमानित भी महसूस किया. उस की मां के चेहरे पर व्यंग्यात्मक हंसी देख कर मैं फौरन घर आ गई. ‘‘जब इसे खूब पीटा, तब जा कर इस ने स्वीकार किया कि झूठ बोल रहा था. अब बताइए, मैं क्या कर सकती हूं? यही नहीं, रिपोर्टकार्ड तक इस ने छिपा कर रख दिया था. कई हफ्तों के बाद वाश्ंिग मशीन के नीचे पड़ा मिला. अरे, क्याक्या खुराफातें हैं इस की, आप को क्याक्या बताऊं, यह तो अपनी मासिक रिपोर्टबुक पर अपने पिता के नकली हस्ताक्षर कर के लौटा आता है. अब बोलिए, क्या करेंगी आप ऐसे लड़के के साथ?’’ रिचा गुस्से में बोलती जा रही थी.

‘‘पिछले वर्ष तक तो इस के काफी अच्छे नंबर आ रहे थे, अब अचानक क्या हो गया?’’ विभा ने पूछा.

‘‘इस के पिता तो इस से कभी पढ़ने को कहते नहीं हैं, न ही कभी खुद पढ़ाने के लिए ले कर बैठते हैं. केवल मैं ही कहती हूं तो इसे अब फूटी आंखों नहीं सुहाती. क्या मां हो कर भी इस का भविष्य बिगाड़ दूं, बताओ, दीदी?’’

‘‘पर रिचा, बच्चों को केवल प्यार से ही वश में किया जा सकता है, मार या डांट से नहीं. तुम जितना अधिक उसे मारोगी, डांटोगी, वह उतना ही तुम से दूर होता जाएगा. पढ़ाई से भी इसीलिए दिल चुराता है, तुम पढ़ाती कम हो और डांटती अधिक हो. कल तुम कह रही थीं, ‘अरे, यह तो निकम्मा लड़का है, यह जीवन में कुछ नहीं कर सकता. यह तो जूते पौलिश करेगा सड़क पर बैठ कर…’ ‘‘कहीं ऐसे शब्द भी कहे जाते हैं? तुम ने तो साधारण तौर पर कह दिया, पर बच्चे का कोमल हृदय तो टूट गया न,  बोलो?’’ विभा ने कहा.

‘‘ताईजी, ताईजी, शतरंज खेलेंगी मेरे साथ?’’ अचानक विक्की ने विभा का हाथ पकड़ते हुए पूछा. संभवतया वह इस लज्जाजनक प्रसंग को अब बंद करवाना चाहता था.

‘‘बेटा, मुझे तो शतरंज खेलना नहीं… तुम अपने ताऊजी के साथ खेलते तो हो न?’’

‘‘पर अभी तो वे कहीं गए हैं, आप खेलो न.’’

‘‘पर जब आता ही नहीं तो कैसे खेलूंगी?’’

‘‘अच्छा, तो ताश खेलते हैं.’’

‘‘ले आओ, कुछ देर खेल लेती हूं,’’ विभा ने हंसते हुए विक्की को गुदगुदाया तो वह दौड़ कर ताश की गड्डी ले आया.

‘‘कौन सा खेल खेलोगे, विक्की?’’ विभा ने पूछा.

‘‘रमी खेलें, ताईजी?’’

‘‘ठीक है, पर बांटोगे हर बार तुम ही, मैं नहीं बाटूंगी, मंजूर?’’ विभा ने शर्त रखी. उस की तबीयत ठीक नहीं थी, वह लेटेलेटे ही खेलना चाहती थी.

‘‘मंजूर, आप तकिए के सहारे लेट जाइए,’’ विक्की ने पत्ते बांटे. ताईजी के साथ खेलने में उसे इतना अधिक आनंद आ रहा था कि बस पूछो मत.

‘‘ताश के अलावा तुम और कौनकौन से खेल खेलते हो?’’ विभा ने पूछा.

‘‘बहुत सारे खेल हैं, ताईजी,’’ विक्की खुश होता हुआ बोला, ‘‘लूडो, सांपसीढ़ी, शतरंज, ट्रबल, व्यापार, स्क्रैबल, स्कौटलैंड यार्ड, मकैनो, कार रेस…’’

‘‘अरे, बसबस, इतने सारे खेल हैं तुम्हारे पास? बाप रे, किस के साथ खेलते हो?’’

‘‘किसी के भी नहीं.’’

‘‘अरे, यह क्या बात हुई, फिर खरीदे क्यों हैं?’’

‘‘कुछ मौसी लाई थीं, कुछ बड़ी ताईजी लाई थीं, कुछ जन्मदिन पर आए तो कुछ पिताजी दौरे पर गए थे, तब ले कर आए थे. ताईजी, पड़ोस के रवींद्र के घर खेलने जाता हूं तो मां कहती हैं कि अपने इतने महंगे खेल वहां मत ले जाया करो. जब उन्हें मैं अपने घर पर खेलने के लिए बुलाता हूं तो मां कहती हैं कि कितना हल्ला मचा रखा है, बंद करो खेलवेल, हर समय खेल ही खेल, कभी पढ़ भी लिया करो.’’

‘‘और घर में कौनकौन खेलता है तुम्हारे साथ? मातापिता खेलते हैं कभी?’’ विभा ने पूछा तो वह कुछ देर तक चुपचाप बैठा रहा, फिर ताश बंद कर के उठ कर चला गया.

मनमोहिनी – भाग 2 : एक संगदिल हसीना

अब तो मोहकलाल ने मनमोहिनी का दिल जीतने में पलभर की देरी भी नहीं की. स्कूल में एक नया पद ‘कोऔर्डिनेटर’ बना दिया गया, जिस पर मनमोहिनी का कब्जा हो गया.

अब मनमोहिनी को स्कूल में सभी टीचरों के बीच तालमेल बिठाना था. यह काम उस ने ‘गुटबंदी’ कर के बखूबी किया. जो टीचर पढ़ाने में यकीन करते थे, उन का मनमोहिनी से कभी तालमेल नहीं हुआ, हो भी नहीं सकता था. लेकिन जिन को पढ़ाने में कम और दूसरी बातों में ज्यादा मजा आता था, वे सब मनमोहिनी के खेमे में शामिल हो गए.

मनमोहिनी जब अपने औफिस से निकलती तो अपने बाएं और दाएं2 मैडमों को अपना बौडीगार्ड बना कर चलती. धमक ऐसी कि किसी को कुछ भी कह दे. कोई शिकायतकर्ता मोहकलाल तक पहुंचता तो उसे मोहकलाल की लताड़ और सुननी पड़ती.

इस तरह स्कूल में मनमोहिनी का एकछत्र राज कायम हो गया. या तो वह मोहकलाल के औफिस में मिलती या फिर मोहकलाल उस के औफिस में. अब मोहकलाल को स्कूल में कहीं ढूंढ़ने की जरूरत नहीं थी. सब को पता था कि वे कहां मिल सकते हैं.

धीरेधीरे मोहकलाल का संगीत प्रेम भी सुलगने लगा. प्रेम और संगीत का तो वैसे भी चोलीदामन का साथ है. अब तो स्कूल में आएदिन संगीत सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होने लगे.

ऐसे कार्यक्रमों में मोहकलाल से गाना गाने की डिमांड होती. उन के गाने के बिना ऐसा कोई कार्यक्रम पूरा ही नहीं होता, भले ही टाइम ओवर हो जाए. मोहकलाल अपने गाने से प्रेम रस की बौछार करते और उस से मनमोहिनी को तरबतर कर देते.

लेकिन मनमोहिनी ने कोई कच्ची गोलियों तो खेली नहीं थीं. वह जानती थी कि उस की ‘मन मोहिनी’ माया का असर 3-4 साल से ज्यादा नहीं होता. यहां भी यही हुआ. प्रिंसिपल मोहकलाल उसे छोड़ नहीं पा रहे थे और स्कूल की मैनेजमैंट कमेटी मनमोहिनी को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी. एक साल तो इसी कशमकश में खिंच गया.

मनमोहिनी के लिए ‘चेंज ओवर’ करने के लिए यह काफी समय था.

मनमोहिनी – भाग 1 : एक संगदिल हसीना

मनमोहिनी अपनी ड्रैस से मैच करता हुआ पर्स अपनी बगल में लटका कर और कूल्हे मटका कर जब चलती तो ऐसा लगता जैसे बौलीवुड की कोई हीरोइन सड़क पर रैंप वाक कर रही हो. भले ही मनमोहिनी ने 40 हरेभरे सावनभादों देख लिए हों, लेकिन वह किसी भी सूरत में 30 से ज्यादा की नहीं लगती थी. यह उस की गजब की फिटनैस का जादू था.

मनमोहिनी को होना तो चाहिए था किसी मौडलिंग कंपनी में, लेकिन वह शिक्षा विभाग में आ गई. लेकिन उस ने आपदा में भी अवसर ढूंढ़ लिया, इसलिए अब उसे कोई गम नहीं था. उस के पास अपनी खूबसूरती और लटकेझटकों का भरपूर खजाना था. इन के दम पर वह आत्मविश्वास से लबालब भरी हुई थी.

इस बात का गहरा ज्ञान और अनुभव मनमोहिनी को कालेज लाइफ में ही हो गया था कि औरत ही औरत की कट्टर दुश्मन होती है, इसलिए उस ने कभी भूल कर भी यह गलती नहीं की कि वह अपनी ‘कंचन काया’ को ले कर महिला कालेज की महिला इंटरव्यू मंडली के सामने आए, जो उस के जोबन और लटकेझटकों को देखते ही जलभुन कर खाक हो जाए.

मनमोहिनी तो मर्दों की कमजोरी को बहुत पहले से जानती थी, इसलिए उस ने अपनी खूबसूरती के हंटर और अदाओं के तीर हमेशा मर्दों पर चलाए, क्योंकि वहां कामयाबी का फीसद सौ से कम नहीं था.

जब मनमोहिनी मर्द मंडली या

फिर अकेले मर्द के सामने इंटरव्यू के लिए हाजिर होती तो उस के हावभाव रीतिकाल के महाकवि बिहारी लाल की उस नायिका की तरह होते जो भरे भवन में भी अपने नायक से नैनों से बात कर लेने में माहिर है. बकौल बिहारी लाल :

‘कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात,

भरे भौन में करत है नैननु ही सब बात.’

अब भला कौन बूढ़ा खूसट होगा, जो मनमोहिनी को न चुने या फिर उस के नाम की सिफारिश न करे. बूढ़े से बूढ़ा भी मनमोहिनी के लटकेझटकों पर रीझ जाता था, नौजवान मसखरों की तो बात ही जाने दीजिए, वे तो किस खेत की मूली. इसी के बूते एक बड़े स्कूल में मनमोहिनी को नौकरी मिलने का चांस बन गया.

प्रिंसिपल मोहकलाल मनमोहिनी की खूबसूरती में इंटरव्यू के समय ही गिरफ्तार हो गए थे. मनमोहिनी ने जल्दी ही भांप लिया था कि अब आगे

क्या होने वाला है. वजह, औरतों में भविष्य को सूंघने की ताकत मर्दों के मुकाबले बहुत ज्यादा होती है.

मर्द तो वर्तमान में ही अपनी सुधबुध खो बैठता है और वर्तमान का ही मजा लूटने में रह जाता है. ऐसे मामलों में वह तब जागता है, जब ‘छीछालेदरी का सूरज’ उग चुका होता है. लेकिन औरतें ऐसे मामलों में मर्दों के बजाय एक कदम आगे होती हैं. वे भविष्य को वर्तमान के साथ बांध कर चलती हैं.

मनमोहिनी का पढ़ाईलिखाई से कोई ज्यादा वास्ता तो था नहीं, इसलिए उस ने एक नई जुगत भिड़ाई. 2-4 बार वह किसी न किसी बहाने से मर्दों को लुभाने वाला इत्र लगा कर प्रिंसिपल मोहकलाल के कमरे में गई. अपने पल्लू को ठीक करने के बहाने उस ने मोहकलाल की आंखों समेत दिल तक को बींध कर

रख दिया.

फिर मौका देख कर मनमोहिनी बड़े कमसिन अंदाज में बोली, ‘‘सर, मैं कोऔर्डिनेशन का काम बड़े अच्छे से जानती हूं. अगर आप मुझे यह काम दे

दें, तो मैं आप को अपना हुनर दिखा सकती हूं.’’

जब मनमोहिनी प्रिंसिपल मोहकलाल को यह बात बता रही थी, तो मोहकलाल को न जाने क्यों ऐसा एहसास हुआ, जैसे  मनमोहिनी ने अपनी बाईं आंख झपकाई नहीं, बल्कि उन की तरफ देख कर दबाई हो. मोहकलाल को अपने अंदर झटके के साथ किसी करंट का एहसास हुआ.

आई हेट हर – भाग 1 : मां से नाराजगी

सुबह के 7 बजे थे, गूंज औफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी कि मां के फोन ने उस का मूड खराब कर दिया,”गूंज बिटिया, मुझे माफ कर दो…मेरी हड्डी टूट गई है…”

“बीना को दीजिए फोन…,” गूंज परेशान सा बोली. ‘’बीना क्या हुआ मां को?”

“दीदी, मांजी बाथरूम में गिर कर बेहोश हो गई थीं. मैं ने गार्ड को बुलाया और किशोर अंकल भी आ गए थे. किसी तरह बैड पर लिटा दिया लेकिन वे बहुत जोरजोर से रो रहीं हैं. सब लोग होस्पिटल ले जाने को बोल रहे हैं. शायद फ्रैक्चर हुआ है. किशोर अंकल आप को फोन करने के लिए बोल रहे थे.”

“बीना, मैं डाक्टर को फोन कर देती हूं. वह देख कर जो बताएंगे फिर देखती हूं…’’

गूंज ने अपने फैमिली डाक्टर को फोन किया और औफिस आ गई. उसे मालूम हो गया था कि मां को हिप बोन में फ्रैक्चर हुआ है, इसी वजह से वे परेशान थीं. उसे अब काफी चिंता होने लगी थी.

किशोर अंकल ने ऐंबुलैंस बुला कर उन्हें नर्सिंगहोम में ऐडमिट करवा दिया था. इतनी देर से लगातार फोन से सब से बात करने से काम तो हो गया, लेकिन बीना है कि बारबार फोन कर के कह रही है कि मां बहुत रो रही हैं और एक बार आने को बोल रही हैं.

“गूंज, किस का फोन है जो तुम बारबार फोन कट कर रही हो?’’ पार्थ ने पूछा. पार्थ उस के साथ उसी के औफिस में काम करता है और अच्छा दोस्त है.

एक ही कंपनी में काम करतेकरते दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ गई थी. फिर दोनों कब आपस में अपने सुखदुख साझा करने लगे थे, यह पता ही नहीं लगा था.

गूंज ने अपना लैपटौप बंद किया और सामान समेटती हुई बोली, ‘’मैं रूम पर जा रही हूं.‘’पार्थ ने भी अपना लैपटौप बंद कर बौस के कैबिन में जा कर बताया और दोनों औफिस से निकल पड़े.

“गूंज, चलो न रेस्तरां में 1-1 कप कौफी पीते हैं.”गूंज रोबोट की तरह उदास कदमों के साथ रेस्तरां की ओर चल दी. वह वहां बैठी अवश्य थी पर उस की आंखों से ऐसा स्पष्ट हो रहा था कि उस का शरीर यहां है पर मन कहीं और, मानों वह अपने अंतर्मन से संघर्ष कर रही हो .

पार्थ ने उस का मोबाइल उठा लिया और काल हिस्ट्री से जान लिया था कि उस की मां की कामवाली का फोन, फिर डाक्टर…“क्या हुआ तुम्हारी मम्मी को?’’“वे गिर गईं हैं, हिप बोन में फ्रैक्चर हुआ है. मुझे रोरो कर बुला रही हैं.‘’“तुम्हें जाना चाहिए.‘’

“मुझे तो सबकुछ करना चाहिए, इसलिए कि उन्होंने मुझे पैदा कर के मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया है…इसलिए…उन्होंने मेरे साथ क्या किया है? हमेशा मारनापीटना… प्यारदुलार के लिए मैं सदा तरसती रही…अब आएं उन के भगवान…करें उन की देखभाल….उन के गुरु  महराज… जिन के कारण वे मेरी पिटाई किया करती थीं. आई हेट हर.”

‘’देखो गूंज, तुम्हारा गुस्सा जायज है, होता है… कुछ बातें स्मृति से प्रयास करते रहने से भी नहीं मिट पातीं. लो पानी लो, अपनेआप को शांत करो.”

“पार्थ, मैं मां की सूरत तक नहीं देखना चाहती,‘’ कह कर वह सिसक उठी थी.पार्थ चाहता था कि उस के मन की कटुता आंसू के माध्यम से बाहर निकल जाएं ताकि वह सही निर्णय ले पाए.

वह छोटी सी थी. तब संयुक्त परिवार में रहती थी. घर पर ताईजी का शासन था क्योंकि वह रईस परिवार की बेटी थी. मां सीधीसादी सी समान्य परिवार से थीं.

गूंज दुबलीपतली, सांवली, पढ़ने में कमजोर, सब तरह से उपेक्षित… पापा का किसी के साथ चक्कर था… सब तरह से बेसहारा मां दिन भर घर के कामों में लगी रहतीं. उन का सपना था कि उन की बेटी पढ़लिख कर औफिसर बने पर उसे तो आइसपाइस, कैरमबोर्ड व दूसरे खेलों से ही फुरसत नहीं रहती. वह हर समय ताई के गोलू और चिंटू के पीछेपीछे उन की पूंछ की तरह घूमा करती.

घर में कभी बुआ के बच्चे, तो कभी मौसी के बच्चे तो कभी पड़ोस के साथियों की टोली का जमघट लगा रहता. बस, सब का साथ पा कर वह भी खेलने में लग जाती.

एक ओर पति की उपेक्षा, पैसे की तंगी साथ में घरेलू जिम्मेदारियां. कुछ भी तो मां के मनमाफिक नहीं था. गूंज जिद करती कि मुझे गोलू भैया जैसा ही बैग चाहिए, नाराज हो कर मां उस का कान पकड़ कर लाल कर देतीं. वह सिसक कर रह जाती. एक तरफ बैग न मिल पाने की तड़प, तो दूसरी तरफ कान खींचे जाने का दर्द भरा एहसास और सब से अधिक अपनी बेइज्जती को महसूस कर गूंज  कभी रो पड़ती तो कभी चीखनेचिल्लाने लगती. इस से फिर से उस की पिटाई होती थी. रोनाधोना और भूखे पेट सो जाना उस की नियति थी.

उस उम्र में वह नासमझ अवश्य थी पर पिटाई होने पर अपमान और बेइज्जती को बहुत ज्यादा ही महसूस करती थी.

ट्रस्ट एक कोशिश: भाग 1- क्या हुआ आलोक के साथ

अंगरेजी के शब्द ट्रस्ट का हिंदी में अर्थ है ‘विश्वास’ और इस छोटे से शब्द में कितना कुछ छिपा हुआ है. उफ, कितनी आहत हुई थी, जब अपनों से ही धोखा खाया था.

आलोक मेरे सामने खडे़ थे. मैं अभीअभी रजिस्ट्रार आफिस से सब बंधनों से मुक्त हो कर आई थी.

‘‘नैना, क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?’’

‘‘आलोक, मुझे आप पर पूरा विश्वास है लेकिन हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे.’’

मेरी आंखों के सामने बाऊजी का चेहरा आ रहा था और उन्हें याद करतेकरते वे फिर भर आईं.

मेरी आंखें गंगायमुना की तरह निरंतर बह रही थीं तो मन अतीत की गलियों में भटक रहा था जो भटकतेभटकते एक ऐसे दोराहे पर आ कर खड़ा हो गया जहां से मायके के लिए कोई रास्ता जाता ही नहीं था.

मेरा विवाह कुछ महीने पहले ही हुआ था. शादी के कुछ समय बाद आलोक और मैं सिंगापुर गए हुए थे. आलोक का यह बिजनेस ट्रिप था. हम दोनों काफी समय से सिंगापुर में थे. बाऊजी से फोन पर मेरी बात होती रहती थी. अचानक एक दिन बड़े भैया का होटल में फोन आया, ‘नैना, बाऊजी, नहीं रहे.’

मुझे नहीं पता कब आलोक ने वापसी की टिकटें बुक कराईं और कब हम लोग सिंगापुर से वापस भारत आए.

बरामदे में दरी बिछी हुई थी. बाऊजी की तसवीर पर माला चढ़ी हुई थी. उन के बिना घर कितना सूनासूना लग रहा था. पता लगा कि भाई हरिद्वार उन की अस्थियां प्रवाहित करने गए हुए थे.

‘नैना, तू आ गई बेटी,’ पीछे पलट कर देखा तो वर्मा चाचा खडे़ थे. उन्हें देख मैं फूटफूट कर रो पड़ी.

‘चाचाजी, अचानक बाऊजी कैसे चले गए.’

‘बेटी, वह काफी बीमार थे.’

‘लेकिन मुझे तो किसी ने नहीं बताया. यहां तक कि बाऊजी ने भी नहीं.’

‘शायद वह नहीं चाहते थे कि तुम बीमारी की खबर सुन कर परेशान हो, इसलिए नहीं बताया.’

लेकिन भाइयों ने भी मुझे उन के बीमार होने की खबर देने की जरूरत नहीं समझी थी. मैं पूछना चाहती थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया? लेकिन शब्द थे कि जबान तक आ ही नहीं रहे थे. वर्मा चाचाजी ने बताया कि आखिरी समय तक बाऊजी की आंखें मुझे ही ढूंढ़ रही थीं.

घर वापस आ कर मैं चुपचाप लेटी रही. विश्वास नहीं हो रहा था कि बाऊजी अब इस दुनिया में नहीं रहे.

बाऊजी मेरे लिए सबकुछ थे क्योंकि होश संभालने के बाद से मैं ने उन्हें ही देखा था. बडे़ भाई विजय और अजय दोनों मुझ से उम्र में काफी बडे़ थे. बेहद सरल स्वभाव के बाऊजी डी.ए.वी. स्कूल की एक शाखा में प्रिंसिपल थे और स्कूल से लौटने के बाद का सारा समय वह मेरे साथ बिताते थे.

मां को तो मैं बचपन में ही खो चुकी थी लेकिन बाऊजी ने मां की कमी कभी महसूस नहीं होने दी. वह कहानियां भी लिखा करते थे. उन की उपदेशात्मक कहानियां मुझे आज भी याद हैं. एक बार उन्होंने मुझे कृष्ण की जन्मकथा सुनाई और पूछा कि नैना, बताओ, कृष्ण पर किस का ज्यादा हक है? यशोदा का या देवकी का? मेरे द्वारा यशोदा का नाम लेते ही उन का चेहरा खुशी से खिल उठा था.

उस समय तो नहीं लेकिन कुछ वर्षों के बाद बाऊजी ने एक रहस्य से परदा उठाया था. वह नहीं चाहते थे कि मुझे किसी और से पता चले कि मैं उन की गोद ली हुई बेटी हूं. हां, मैं उन की सगी संतान नहीं थी लेकिन शायद उन्हें अपने प्यार व मुझे दिए हुए संस्कारों पर पूरापूरा विश्वास था. इसीलिए मेरे थोड़ा समझदार होते ही उन्होंने खुद ही मुझे सच से अवगत करा दिया था.

अतिशयोक्ति नहीं होगी, मां हर त्योहार या किसी भी खुशी के मौके पर अनाथाश्रम जाया करती थीं. एक बार उन्होंने आश्रम में एक छोटी सी बच्ची को रोते देखा.

खुद से ही यह सवाल किया था कि क्या कभी उन के प्यार में बनावट या पराएपन का आभास हुआ था? नहीं, कभी नहीं. कितने स्नेह से उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, ‘मेरी बेटी, तुम तो मेरे लिए इस दुनिया का सब से नायाब तोहफा हो. तुम मेरी बेटी हो इसलिए नहीं कि तुम्हें हमारी जरूरत थी बल्कि इसलिए क्योंकि हमें तुम्हारी जरूरत थी. तुम्हारे आने के बाद ही हमारा परिवार पूर्ण हुआ था.’

बाऊजी को सब लोग बाबूजी या लालाजी कह कर पुकारते थे लेकिन मैं अपनी तोतली बोली में उन्हें बचपन में ‘बाऊजी’ कहा करती थी और जब बड़ी हुई तो उन्होंने बाबूजी की जगह बाऊजी ही कह कर पुकारने को कहा. उन्हें मेरा बाऊजी कहना बहुत अच्छा लगता था.

बाऊजी ने बताया था कि मां हर त्योहार या किसी भी खुशी के मौके पर अनाथाश्रम जाया करती थीं. एक बार उन्होंने आश्रम में एक छोटी सी बच्ची को रोते देखा. इतना छोटा बच्चा, आज तक आश्रम में नहीं आया था. रोती हुई वह बच्ची मात्र कुछ हफ्तों की थी और उसे अपनी मां की गोद भी नसीब नहीं हुई थी. पता नहीं किस निर्मोही मां ने अपनी बच्ची का त्याग कर दिया था.

‘पता नहीं क्या सम्मोहन था उस बच्ची की आंखों में कि प्रकाशवती यानी तुम्हारी मां अब हर रोज उस बच्ची को देखने जाने लगीं और किसी दिन न जा पातीं तो बेचैन हो जाती थीं. एक दिन मैं और तुम्हारी मां आश्रम पहुंचे. जैसे ही बच्ची आई उन्होंने उसे उठा लिया. बच्ची उन की गोद से वापस आया के पास जाते ही रोने लगी. यह देख कर मैं चकित था कि इतनी छोटी सी बच्ची को ममता की इतनी सही पहचान.

‘प्रकाशवती अब मुझ पर उस बच्ची को गोद लेने के लिए जोर डालने लगीं. दरअसल, उन्हें बेटी की बहुत चाह थी, जबकि मैं  ‘हम दो हमारे दो’ का प्रण ले चुका था. बच्ची को देखने के बाद उन की बेटी की इच्छा फिर से जागने लगी थी. मैं ने प्रकाशवती को समझाया कि बच्ची बहुत छोटी है. बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम होगा. लेकिन वह टस से मस न हुईं. आखिर मुझे उन की जिद के आगे झुकना ही पड़ा. वैसे एक बात कहूं, बेटी, मन ही मन मैं भी उस बच्ची को चाहने लगा था. बस, वह बच्ची कुछ ही दिनोें में नैना के रूप में हमारी जिंदगी में बहार बन कर मेरे घर आ गई.’

मैं डबडबाई नजरों से बाऊजी को निहारती रही थी.

‘लेकिन ज्यादा खुशी भी कभीकभी रास नहीं आती. तुम अभी 2 साल की भी नहीं हुई थीं कि तुम्हारी मां का निधन हो गया. दोनों बेटे बडे़ थे, खुद को संभाल सकते थे लेकिन जब तुम्हें देखता था तो मन भर आता था.

‘एक बार किसी जानकार ने तुम्हें ‘बेचारी बिन मां की बच्ची’ कह दिया. मुझे बहुत खला था वह शब्द. बस, मैं ने उस दिन से ही फैसला कर लिया था कि प्रकाशवती की बेटी को किसी भी तरह की कमी नहीं होने दूंगा. कोई उसे बेचारी कहे, ऐसी नौबत ही नहीं आने दूंगा. उस के बाद से ही तुम्हारे भविष्य को ले कर बहुत कुछ सोच डाला.’

राजनीति नकाब की – भाग 1

राखी का त्योहार 4 दिनों बाद है पर निहाल बहुत परेशान है. कारण यह है कि पिछले रक्षाबंधन पर निहाल ने अपनी बहन मिनी से वादा किया था कि अगले साल रक्षाबंधन तक वह उस को एक स्मार्टफोन गिफ्ट कर देगा. लेकिन यह तो अब तक होता दिख नहीं रहा था क्योंकि निहाल अभी तक सिर्फ 10 हजार रुपए ही जमा कर पाया था और एक अच्छा स्मार्टफोन कम से कम 20 हजार रुपए में आता है. निहाल एक युवा बेरोजगार था. शहर के एक अच्छे कालेज से परास्नातक होने के बावजूद उसे नौकरी नहीं मिली थी.

निहाल ने बहुत सी प्रतियोगी परीक्षाएं दीं पर इसे उस का बुरा समय कहें या समाज में बढ़ता हुआ बेरोजगारी का दौर, उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिली.

निहाल इंटरव्यू देदे कर थक चुका था और अब उस की हिम्मत भी जवाब दे चुकी थी. इसीलिए उस ने अब हाथपैर मारना भी छोड़ दिया था. अब वह इधरउधर प्राइवेट जौब कर के ही अपना खर्चा चला रहा था.

उस के कालेज के पुराने दोस्त ही उस का एकमात्र सहारा थे जो कभीकभार पैसे से मदद कर देते थे या उसे कोई ऐसा कामचलाऊ काम दिला देते थे जिस से वक्तीतौर पर निहाल को कुछ पैसे मिल जाते और उस का काम चल जाता था.

निहाल का सब से विश्वसनीय दोस्त था देवराज उर्फ भैयाजी. कहने की जरूरत नहीं है कि भैयाजी प्रदेश की राजनीति में हाथपैर मार रहा था.

राजनीति में पैठ बनाने का आसान रास्ता विश्वविद्यालय था और इसीलिए देवराज गैरजरूरी पाठ्यक्रमों में दाखिला ले कर पढ़ाई कर रहा था जिस से होस्टल के कमरे में ही रहते हुए छात्र राजनीति आसानी से करे. चूंकि छात्र नेताओं को बड़े राजनेता अपना एक अच्छा वोटबैंक मानते हैं, इसलिए उन से भी देवराज का अच्छा संपर्क बना हुआ था.

निहाल जब भी किसी तरह की समस्या में घिरा होता तब वह भैयाजी के पास आता था और हर बार भैयाजी उस की सहायता कर देता था. हालांकि, निहाल यह जानता था कि देवराज भले ही उस का पुराना दोस्त है पर उस की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा से निहाल को भी डर लगा रहता था.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं, भैयाजी?’’ दरवाजे पर खड़े निहाल ने हौल में बैठे देवराज से पूछा.

‘‘अरे, निहाल, अरे यार, क्यों शर्मिंदा करते हो, आओआओ, अंदर आओ यार,’’ देवराज ने आगे बढ़ कर निहाल को गले लगा लिया.

‘‘और यह क्या भैयाजीभैयाजी कहते रहते हो. अरे, मैं अपने दुमछल्लों के लिए भैयाजी हूं, तुम्हारे लिए नहीं. तुम तो मु?ो देव ही कहा करो,’’ देवराज उर्फ भैयाजी ने निहाल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘हां, पर नहीं, जब अपना दोस्त आगे बढ़ जाए और आप खुद उस से पीछे रह जाएं तो उस का सम्मान तो करना ही पड़ेगा. है न भैयाजी?’’ इतना कह कर देवराज और निहाल जोर से हंसने लगे.

‘‘आओ बैठ कर चाय पीते हैं, बड़े दिन हो गए तुम्हारे साथ चाय नहीं पी हम ने,’’ देवराज ने निहाल को अंदर ले जाते हुए कहा.

‘‘हां, चाय तो पिऊंगा ही, पर…’’ निहाल हिचकिचा सा गया.

‘‘हांहां, बोलो न क्या बात है. तुम कुछ छिपा रहे हो न मु?ा से?’’ देवराज ने निहाल के संकोच को पढ़ लिया था.

‘‘हां, भैयाजी, वह दरअसल रक्षाबंधन आने वाला है और मैं ने मिनी को स्मार्टफोन देने का वादा किया है. उस के लिए कुछ पैसे कम पड़ रहे हैं,’’ शर्म से गड़ गया था निहाल.

‘‘अमां यार, निहाल, बस, इतनी सी बात, बता भाई कितने पैसे चाहिए तु?ो?’’ देवराज ने माहौल को हलका बनाते हुए कहा.

‘‘वो भैयाजी, मेरे पास 10 हजार रुपए हैं, और जो स्मार्टफोन मिनी को चाहिए वह कम से कम 20 हजार रुपए में आएगा. मैं ने पिछले साल ही उस से वादा किया था कि उसे स्मार्टफोन दिलाऊंगा. तो अगर 10 हजार रुपए मिल जाते तो मेहरबानी…’’ बीच में ही रोक दिया देवराज ने निहाल को, ‘‘कैसी मेहरबानी यार, एक दोस्त ही दोस्त के काम आता है. आज मैं तुम्हारे काम आ रहा हूं और कल को अगर मु?ो जरूरत पड़ जाए तो तुम मेरे काम आना. ये लो 12 हजार रुपए,’’ देवराज ने निहाल के हाथ में पैसे रखते हुए कहा.

‘‘पर भैयाजी, मु?ो तो सिर्फ 10 हजार रुपए ही चाहिए,’’ यह कहते हुए निहाल की आंखों में नमी उतर आई थी.

‘‘अरे भाई, रक्षाबंधन का त्योहार है, मोबाइल के साथसाथ मिठाई की भी तो जरूरत होगी न, बाकी के 2 हजार रुपए मिठाई के लिए हैं. और हां, एक राखी मेरी भी कलाई पर बांधेगी मिनी,’’ देवराज ने निहाल की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.

निहाल ने देवराज का बहुत आभार जताया और यह भरोसा भी दिलाया कि जल्दी से जल्दी वह देवराज के पैसे लौटा देगा, बदले में देवराज सिर्फ मुसकरा दिया.

भैयाजी से पैसे ले कर निहाल सीधा बाजार गया और जो ब्रैंड मिनी ने बताया था उसी ब्रैंड का मोबाइल खरीद लिया.

रक्षाबंधन का दिन भी आ गया. मिनी ने भाई निहाल की कलाई पर राखी बांधी और मिठाई भी खिलाई. निहाल ने एक चमकीली पैकिंग में मोबाइल मिनी की ओर बढ़ा दिया जिसे देख कर मिनी के चेहरे पर चमक बिखर गई.

‘‘ओह, वाओ भैया, आप दुनिया के सब से अच्छे भैया हो. आप मेरी पसंद का ब्रैंड वाला मोबाइल ले आए. अरे भैया, आप ने तो कमाल कर दिया,’’ मोबाइल ले कर ?ामने लगी थी मिनी. भाईबहन का यह प्यार देख कर निहाल की मां और पापा की आंखों में आंसू आ गए. निहाल भी खुशी से मिनी को चहकते हुए देखता रहा.

कौन कहेगा कि कुछ दिनों पहले फ्रौक पहन कर घूमती थी मिनी और आज शहर के विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में स्नातक की पढ़ाई कर रही थी. उस का सपना प्रोफैसर बनने का था जिस के लिए मिनी जीजान से लगी थी और उस से ज्यादा तो निहाल चाहता था कि मिनी पढ़लिख कर प्रोफैसर बन जाए ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके.

निहाल ने पुरुषों द्वारा प्रताडि़त कितनी ही महिलाओं के किस्से सुने थे, इसलिए वह बिलकुल नहीं चाहता था कि मिनी की शादी के बाद वह किसी भी तरह से अपने पति से दब कर रहे. वह नहीं चाहता था कि घर से विश्वविद्यालय जाते समय मिनी को बस की भीड़ में दबना पड़े, इसलिए उस ने एक पुरानी स्कूटी दिला दी थी. निहाल ने बड़े ही प्यार से उस की पिछली नंबर प्लेट पर लिखवा दिया था. ‘मिनी मेल.’ कितना निश्छल और निस्वार्थ था भाईबहन का यह प्यार. निहाल का मोबाइल बजा तो उस ने देखा कि देवराज का फोन था.

‘‘हैल्लो, हां, देव भैयाजी, बताइए इस नाचीज को कैसे याद किया,’’ निहाल ने मोबाइल कान से लगाते हुए कहा.

‘‘अरे, कुछ नहीं बस ऐसे ही. दरअसल, तुम तो जानते ही हो कि मैं ने सिर्फ राजनीति के क्षेत्र में अपने पैर जमाने के लिए ही यहां दाखिला ले रखा है और यहां से निकल कर मु?ो खुल कर राजनीति करनी है और उस के लिए जरूरी है कि मेरा विश्वविद्यालय में खूब नाम हो और उस के लिए मु?ो धरने करना, भूख हड़ताल पर बैठना और छात्रों के रहनुमा के रूप में अपनेआप को प्रदर्शित करना है. यार, इसी सब में लगा हुआ हूं,’’ एक सांस में ही देवराज इतना कुछ बोल गया था.

‘‘हां, तो निहाल, तू ऐसा करना, ठीक 11 बजे विधानसभा के सामने आ जाना. अपने और लोग भी होंगे वहां पर. थोड़ी नारेबाजी, थोड़ी ड्रामेबाजी होगी और एकाध मीडिया वालों को भी इंटरव्यू दे देंगे और बस, खानापीना,’’ आखिरी के शब्द कहते हुए हंसने लगा था देवराज.

‘‘हां बिलकुल, तुम बुलाओ और मैं न आऊं ऐसा तो हो ही नहीं सकता. तुम निश्चिंत रहो, मैं पहुंच जाऊंगा,’’ निहाल ने हामी भर दी.

निहाल समय से पहले ही धरना स्थल पर पहुंच गया था. करीब 100 युवा विद्यार्थी वहां पर अपनी कुछ मांगों को ले कर प्रदर्शन के लिए आए थे. कुछ देर बाद देवराज भी अपने दुमछल्लों से घिरा हुआ एक खुली जीप में आया. देवराज ने सब के बीच खड़े हो कर भाषण दिया. क्या खूब बोला था. यह वह देवराज नहीं था जिस को निहाल जानता था. यह तो एक नए तेवर वाला कोई दूसरा ही देवराज था.

देवराज यहां पर भैयाजी ज्यादा था और उस के भाषण से लगता था कि जैसे देश का कोई बड़ा नेता हो. धरना खत्म हुआ तो देवराज ने सब के बीच से आगे बढ़ कर निहाल कोे गले लगाया और कहा, ‘‘दोस्त, तुम ने मेरे लिए जो समय निकाला उस के लिए तुम्हारा बहुत आभारी हूं. वरना आज की दुनिया में कौन दोस्तों को याद रखता है.’’

‘‘अरे देव, यह तो तुम्हारा बड़प्पन है. मैं तो कुछ भी नहीं,’’ निहाल ने कृतज्ञता से देवराज को देखते हुए कहा. देवराज ने कुरते की जेब में हाथ डाल कर 10 हजार रुपए निकाले और निहाल को पकड़ाते हुए बोला, ’’जानता हूं दोस्त, तुम्हारा समय बहुत कीमती है. मैं उस की पूरी कीमत तो नहीं चुका सकता पर जो थोड़ाबहुत कर सकता हूं, बस, वो ही कर रहा हूं.’’

‘‘य…ये…देवराज, पैसे क्यों दे रहे हो,’’ निहाल चौंक कर बोला.

इस के बदले में देवराज ने निहाल के हाथों को अपने हाथों में ले कर सिर्फ अपनी आंखों के मौन से ही सब कह दिया जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता था.

बदचलनी का ठप्पा – भाग 1 : क्यों भागी परबतिया घर से?

कोलियरी की कोयला खदान में काम करने वाला एक सीधासादा मजदूर था अर्जुन महतो. पिछले से पिछले साल वह अपनी ननिहाल अनूपपुर गया था, तो वहां से पार्वती को ब्याह लाया. कच्चे महुए जैसा रंग और उस पर तीखे नयननक्श, खिलखिला कर हंसती तो उस के मोतियों जैसे दांत देखने वाले को बरबस मोहित कर लेते. वह कितनी खूबसूरत थी, उसे कह कर बताना बड़ा मुश्किल काम था. कोलियरी में जहां चारों ओर कोयले की कालिख ही कालिख बिखरी हो, वहां पार्वती की खूबसूरती उस के लिए एक मुसीबत ही तो थी. लोगों ने तरहतरह की बातें बनाईं.

एक ने कहा, ‘‘अर्जुन के दिन बहुरे हैं, जो इतनी सुंदर बहुरिया पा गया, वरना कौन पूछता उस कंगाल को?’’

एक छोटे दिल वाले ने जलभुन कर यह भी कह दिया, ‘‘ऐसा ही होता है यार, अंधे के हाथ ही बटेर लगती है.’’

उधर अर्जुन इन सब बातों से बेखबर, अपनी पार्वती में मगन था. लाड़ में वह उसे ‘परबतिया’ कह कर पुकारता था. उस की प्यारी परबतिया उस की गृहस्थी जमाने लगी थी.

अर्जुन को भी कोयला खदान की लोडर (गाड़ी में कोयला लादने वाला) की नौकरी में मकसद और जोश दोनों नजर आने लगे थे. कोलियरी के नेताओं के भाषणों में वह अमूमन एक ही घिसीपिटी बात सुनता था कि खदान से ज्यादा से ज्यादा कोयला निकालना है और सरकार के हाथ मजबूत करने हैं, पर अर्जुन भी इन भाषणों को और मजदूरों की तरह पान खा कर थूक देता था.

अर्जुन की सरकार तो उस की परबतिया थी. गोरीचिट्टी और गोलमटोल. धरती के पेट में छिपी कोयला खदान की उस काली दुनिया में जब अर्जुन अपने कंधों पर कोयले से भरी टोकरी लादे टब (एक टन कोयले  की गाड़ी) को भर रहा होता, तब भी  उस के दिल और दिमाग में सिर्फ उस  की परबतिया होती, उस के छोटे से  घर में खाना बना कर उस का इंतजार करती हुई. मेहनत करने से अर्जुन का शरीर लोहा हो गया था. पहली बार जब उस  ने पार्वती को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ा था तो वह मीठेमीठे दर्द से चिहुक उठी थी.

अर्जुन को लगा था कि परबतिया तो कोयले से भरी उस टोकरी से बहुत हलकी है. कहां वह कालाकाला कोयला और कहां हलदी की तरह गोरी फूलों की यह चटकती कली. अर्जुन की बांहों की मजबूती पा कर वह कली खिलने लगी थी. कभीकभी अर्जुन पार्वती को छेड़ता, ‘‘कम खाया कर परबतिया, बहुत मोटी होती जा रही है.’’

पार्वती अर्जुन के चौड़े सीने से सट जाती और अपनी महीन आवाज में फुसफुसाती, ‘‘इतना प्यार क्यों करता है रे मुझ से? तेरा लाड़प्यार ही तो मुझे दूना किए दे रहा है.’’

अर्जुन निहाल हो जाता. उस जैसा एक आम मजदूर इस से बड़ी और किस खुशी की कल्पना कर सकता था. वह सिर्फ नाम का ही तो अर्जुन था, जिस के पास कोयला खदान की खतरनाक नौकरी के सिवा कुछ भी नहीं था. समय बीतता गया. इस बीच कोयला खदान से जुड़े नियमकानूनों में भारी बदलाव आए. कोयला खानों का ‘राष्ट्रीयकरण’ हो गया.

अर्जुन जैसे लोगों को इस ‘राष्ट्रीयकरण’ का अर्थ तो समझ में नहीं आया शुरू में, किंतु थोड़े ही दिन बाद इस का मतलब साफ हो गया. ‘राष्ट्रीयकरण’ के बाद  सभी मजदूर सरकारी मुलाजिम हो गए. और इस तरह मजदूर और कामगार कामचोर और उद्दंड भी हो गए, क्योंकि उन का कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था. अर्जुन जैसे गिनती के मजदूरों पर ही पूरी ईमानदारी और खदान से ज्यादा से ज्यादा कोयला निकालने का जिम्मा आ पड़ा था.

मेहनत ऐसे मजदूरों के खून में थी, क्योंकि कोयला खानों से इन का रिश्ता उतना ही पुराना और मजबूत था, जितना एक खेतिहर का अपनी जमीन और माटी से होता है. धीरेधीरे यहां की कोलियरी में कई मजदूर नेता भी उभरने लगे. पर देवेंद्रजी ने, जिन का इतिहास भी यहां की कोयला खदान जितना ही पुराना है, अपने आगे किसी नए नेता को उभरने नहीं दिया. वे हमेशा से मजदूर के भरोसेमंद आदमी रहे थे और उन की चौपाल हमेशा हरीभरी रहती थी.  किसी मजदूर को घर चाहिए, तो किसी को बिजली. कहीं महल्ले में पानी का इंतजाम करवाना है, तो कहीं मजदूरों के लिए कैंटीन का. कोई रिटायर हो गया है, तो उस का दफ्तर से हिसाबकिताब करवाना है, भविष्य निधि वगैरह के पैसे दिलवाने हैं.

कोई भी काम हो, कैसी भी समस्या हो, देवेंद्रजी बड़ी आसानी से सुलझा देते थे. उन्हें मैनेजरों का पूरा भरोसा हासिल था, इसलिए विरोधी नेता भी उन्हें डिगा नहीं पाते थे.  अचानक इस कोलियरी में एक अजीब घटना हो गई. फैलने को या तो आग फैलती है या अफवाह. पर यह अफवाह नहीं थी, इसीलिए यहां के सभी लोग हैरान थे.

किसी ने कहा, ‘‘भाई, सुना तुम ने… बड़ा गजब हो गया.’’

दूसरे ने पूछा, ‘‘क्या पहाड़ टूट गया एक ही रात में? कल तक तो सबकुछ ठीकठाक था.’’

तीसरे ने कहा, ‘‘वाह भाई, कुछ दीनदुनिया की खबर भी रखा करो यार, खातेकमाते तो सभी हैं.’’

दूसरे ने फिर पूछा, ‘‘पर, हुआ क्या है, कुछ बताओगे भी?’’

‘‘अरे वह परबतिया थी न, दिनदहाड़े जा कर गया प्रसाद के घर बैठ गई,’’ बताने वाले की आवाज में ऐसा जोश था, मानो वह इस घटना के घटने का सालों से इंतजार कर रहा हो.

‘‘कौन परबतिया और कौन गया प्रसाद? यार, साफसाफ बताओ न,’’ पूछने वाले के चेहरे का रंग अजीब हो गया था.

‘‘गजब करते हो यार, धिक्कार है तुम्हारी जिंदगी को. अरे, परबतिया को नहीं जानते?’’ बताने वाले के चेहरे पर धिक्कार के भाव थे,

‘‘क्या उस जैसी  2-4 औरतें हैं यहां? अरे वही अर्जुन महतो की घरवाली. हां, वही पार्वती. कल वह अर्जुन का घर छोड़ गया प्रसाद के घर बैठ गई.’’

‘‘अच्छा, वह परबतिया,’’ उस घटना से अनजान आदमी ने चौंकते हुए  कहा, ‘‘अरे भई, ‘तिरिया चरित्तर’  को कौन समझ सकता है. भाई…बड़ी सतीसावित्री बनती थी.’’

जितने मुंह उतनी बातें. चारों तरफ कानाफूसी. लोग चटकारे लेले कर उस घटना की चर्चा कर रहे थे. बहुत दिनों से यहां कुछ हुआ नहीं था, इसलिए यहां के पान के ठेलों पर महफिलें सूनीसूनी रहने लगी थीं. पुरानी बातों  को ले कर आखिर लोग कब तक जुगाली करते…

इस नई घटना से सभी का जोश फिर लौट आया था. कुछ लोग इस घटना से दहशत और सन्नाटे की चपेट में भी आ गए थे. जब पार्वती जैसी बेदाग औरत ऐसा कर सकती है तो उन की अपनी बीवियों का क्या भरोसा? हर शक्की पति घबराया हुआ था. कहीं उन की बीवियां भी ऐसा कर बैठें तो…?

इस घटना के बाद देवेंद्र की  चौपाल फिर सजी थी ठीक किसी मदारी के तमाशे जैसी. कभी कोई भला आदमी गलती से यहां मर जाता तो अरथी के साथ चलने के लिए लोग  ढूंढ़े नहीं मिलते थे. कहते, ‘‘अरे, कोई मर गया तो मर गया. एक न एक  दिन तो सभी को मरना ही है.’’

भीड़ में आए ज्यादा लोगों को हमदर्दी अर्जुन महतो के साथ थी. बेचारा, बेसहारा अर्जुन. कितनी धोखेबाज होती हैं ये औरतें भी. और यदि खूबसूरत हुई तो मुसीबतें ही मुसीबतें. मनचले कुत्तों की तरह सूंघते फिरते हैं. देवेंद्र की चौपाल में भीड़ बढ़ी, तो पास ही मूंगफली बेचने वाली बुढि़या खुश हो गई थी. केवल वही थी वहां, जिसे सिर्फ अपनी मूंगफलियों की बिक्री की चिंता थी.

उसे न परबतिया से मतलब था, न गया प्रसाद से. घर के बाहर भीड़ का शोरगुल हुआ, तो देवेंद्र घर से बाहर निकल आए.  सभी ने उन को प्रणाम किया. वह वहीं नीम के पेड़ के नीचे कुरसी लगवा कर बैठ गए. देवेंद्रजी ने गहराई से भीड़ का जायजा लिया और परेशानी भरी आवाज में बोले, ‘‘फिर कौन सा बवाल हो गया भाइयो? क्या हमें अब एक दिन का चैन भी नहीं मिलेगा…”

पति परदेस में तो फिर डर काहे का – भाग 1

जिला अलीगढ़ मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना गोंडा क्षेत्र में एक गांव है वींजरी. इस गांव में एक किसान परिवार है अतर सिंह का. उस के परिवार में उस की पत्नी कस्तूरी के अलावा 5 बेटे हैं. इन में सब से छोटा है जयकिंदर. अतर सिंह के तीसरे नंबर के बेटे को छोड़ कर सभी बेटों की शादियां हो चुकी हैं. इस के बावजूद पूरा परिवार आज भी एक ही मकान में संगठित रूप से रहता है. अतर सिंह का सब से छोटा बेटा जयकिंदर आंध्र प्रदेश में रेलवे में नौकरी करता है. डेढ़ साल पहले उस की शादी पुरा स्टेशन, हाथरस निवासी फौजी रमेशचंद्र की बेटी प्रेमलता उर्फ मोना के साथ तय हो गई थी. मोना के पिता के सामने अतर सिंह की कुछ भी हैसियत नहीं थी. यह रिश्ता जयकिंदर की रेलवे में नौकरी लग जाने की वजह से हुआ था.

अतर सिंह ने समझदारी से काम लेते हुए जयकिंदर की शादी से पहले अपने मकान के ऊपरी हिस्से पर एक हालनुमा बड़ा सा कमरा, बरामदा और रसोई बनवा दी थी, ताकि दहेज में मिलने वाला सामान ढंग से रखा जा सके. साथ ही उस में जयकिंदर अपनी पत्नी के साथ रह भी सके. मई 2015 में जयकिंदर और मोना की शादी हुई तो मोना के पिता ने दिल खोल कर दहेज दिया, जिस में घर गृहस्थी का सभी जरूरी सामान था.

मोना जब मायके से विदा हो कर ससुराल आई तो अपने जेठजेठानियों की हालत देख कर परेशान हो उठी. उन की माली हालत ठीक नहीं थी. उस की समझ में नहीं आया कि उस के पिता ने क्या देख कर उस की शादी यहां की. मोना ने अपनी मां को फोन कर के वस्तुस्थिति से अवगत कराया. मां पहले से ही हकीकत जानती थी. इसलिए उस ने मोना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुझे उन सब से क्या लेनादेना. छत पर तेरे लिए अलग मकान बना दिया गया है. तेरा पति भी सरकारी नौकरी में है. तू मौज कर.’’

मोना मां की बात मान गई. उस ने अपने दहेज का सारा सामान ऊपर वाले कमरे में रखवा कर अपना कमरा सजा दिया. उस कमरे को देख कर कोई भी कह सकता था कि वह बड़े बाप की बेटी है. उस के हालनुमा कमरे में टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और गैस वगैरह सब कुछ था. सोफा सेट और डबलबैड भी. शादी के बाद करीब 15 दिन बाद जयकिंदर मोना को अपने घर वालों के भरोसे छोड़ कर नौकरी पर चला गया.

पति के जाने के बाद मोना ने ऊपर वाले कमरे में न केवल अकेले रहना शुरू कर दिया, बल्कि पति के परिवार से भी कोई नाता नहीं रखा. अलबत्ता कभीकभार उस की जेठानी के बच्चे ऊपर खेलने आ जाते तो वह उन से जरूर बोलबतिया लेती थी. वरना उस की अपनी दुनिया खुद तक ही सिमटी थी.

उस की जिंदगी में अगर किसी का दखल था तो वह थी दिव्या. जयकिंदर के बड़े भाई की बेटी दिव्या रात को अपनी चाची मोना के पास सोती थी ताकि रात में उसे डर न लगे. इस के लिए जयकिंदर ही कह कर गया था. देखतेदेखते जयकिंदर और मोना की शादी को एकडेढ़ साल बीत गया. जयकिंदर 10-5 दिन के लिए छुट्टी पर आता और लौट जाता. उस के जाने के बाद मोना को अकेले ही रहना पड़ता था.

मोना को घर की जगह बाजार की चीजें खाने का शौक था. इसी के मद्देनजर उस के पति जयकिंदर ने एकदो बार नौकरी पर जाने से पहले उसे समझा दिया था कि जब उसे किसी चीज की जरूरत हो तो सोनू को बुला कर बाजार से से मंगा लिया करे. सोनू जयकिंदर के पड़ोसी का बेटा था जो किशोरावस्था को पार कर चुका था. वह सालों से जयकिंदर का करीबी दोस्त था. सोनू बिलकुल बराबर वाले मकान में रहता था. मोना को वह भाभी कह कर पुकारता था. मोना ने शादी में सोनू की भूमिका देखी थी. वह तभी समझ गई थी कि वह उस के पति का खास ही होगा.

जयकिंदर के जाने के बाद सोनू जब चाहे मोना के पास चला आता था, नीचे घर की महिलाएं या पुरुष नजर आते तो वह छज्जे से कूद कर आ जाता. दोनों आपस में खूब हंसीमजाक करते थे. मोना तेजतर्रार थी और थोड़ी मुंहफट भी. कई बार वह सोनू से द्विअर्थी शब्दों में भी मजाक कर लेती थी.

एक दिन सोनू जब बाजार से वापस लौटा तो मोना छत पर खड़ी थी. उस ने सोनू को देखते ही आवाज दे कर ऊपर बुला कर पूछा, ‘‘आज सुबह से ही गायब हो? कहां थे?’’

‘‘भाभी, बनियान लेने बाजार गया था.’’ सोनू ने हाथ में थामी बनियान की थैली दिखाते हुए बताया. यह सुन कर मोना बोली, ‘‘अगर गए ही थे तो भाभी से भी पूछ कर जाते कि कुछ मंगाना तो नहीं है.’’

‘‘कल फिर जाऊंगा, बता देना क्या मंगाना है?’’ सोनू ने कहा तो मोना ने पूछा, ‘‘और क्या लाए हो?’’

‘‘बताया तो बनियान लाया हूं.’’ सोनू ने कहा तो मोना बोली, ‘‘मुझे भी बनियान मंगानी है, ला दोगे न?’’

‘‘तुम्हारी बनियान मैं कैसे ला सकता हूं? मुझे नंबर थोड़े ही पता है.’’ सोनू बोला.

‘‘साइज देख कर भी नहीं ला सकते?’’

‘‘बेकार की बातें मत करो, साइज देख कर अंदाजा होता है क्या?’’

‘‘तुम बिलकुल गंवार हो. अंदर आओ साइज दिखाती हूं.’’ कहती हुई मोना कमरे में चली गई. सोनू भी उस के पीछेपीछे कमरे में चला गया.

YRKKH: अबीर की बचपन की फोटो देख रोएगा अभिमन्यु, टूटेगा रूही का दिल

इऩ दिनों ये ऱिश्ता क्या कहलाता है में जबरदस्त ट्वीस्ट देखने को मिल रहा है. शो में हर दिन नए मोड़ आ रहे है जबसे में अभिमन्यु को पता चला है कि अबीर उसका बेटा है वो उसे हर तरह से पाने की पूरी कोशिश कर रहा है साथ ही अबीर का स्पेशल फील करवा रहा है.अब तक एपिसोड़ में दिखाया गया है कि अक्षरा और अभिनव को पता चलता है कि आरोही और अभिमन्यु भी समर कैंप में है, जिसके बाद अक्षु और आरोही वहां से अपना बैग लेकर निकलने के लिए तैयार हो जाती है. हालांकि, सीरियल में अभी एक और ट्विस्ट आना बाकी है.

आपको बता दे, कि हर्षद चौपड़ा और प्रणाली राठौर शो के अपकमिंग एपिसोड में देखने के लिए मिलेगा कि कैंप में एक दूसरे के सामने आने के बाद आरोही और अक्षरा घर जाने के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन अबीर और रूही को हंसते खेलते देखकर वह दोनों रुक जाती हैं. इसके बाद कैंप में नए गेम्स की अनाउंसमेंट हो जाती है, जिसमें रूही और अबीर दोनों ही जीतने के बाद करते हैं. दूसरी तरफ गोयनका हाउस में मुस्कान सबसे शादी पर राय लेती है. हर कोई उसे अपने करियर पर फोकस करने की बात कहता है. वहीं, जब वह कायरव के मुंह से सुनती है कि उसे प्यार और शादी में भरोसा नहीं है, तो मायूस हो जाती है और किसी और लड़के मिलने के लिए हां कर देती है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by 💞Sirat💞 (@abira_kaira05)

सीरियल में आगे देखने के लिए मिलेगा कि अभिमन्यु रूही के साथ मस्ती कर रहा होता है, तभी अबीर को सब स्लो-स्लो कहकर चिढ़ाते हैं. यह बातें सुनकर अभि अपनी रूही को भूलकर वहां से अपने बेटे के पास चला जाता है और यह चीज नन्ही रूही को पसंद नहीं आती। दूसरी तरफ अबीर की समझदारी देखकर हर कोई हैरान रह जाता है. वह सभी बच्चों को बेहद ही प्यार से जवाब देता है, जिससे अभिनव काफी खुश होता है. ये रिश्ता क्या कहलाता है में आगे देखने के लिए मिलेगा कि अभिमन्यु और अभिनव एक टास्क में हिस्सा लेते हैं, तब ही अभि अभिनव से अपने बेटे के बचपन के बारे में पूछता है. इस दौरान अभिनव भी उसे अबीर की बचपन के तस्वीरें दिखाता है, जिसे देखकर वह रोने लगता है. वह अबीर के पहली बार चलने से लेकर बोलने तक की यादों में खो जाता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें