विस्मृत होता अतीत – भाग 2: शादी से पहले क्या हुआ था विभा के साथ

अब मैं ने उसे अपनी फ्रैंड्स लिस्ट में से हटाने का सोच कर जैसे ही माउस पर हाथ रखा कि डोरबैल बजी. मैं ने दरवाजा खोलने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, बाहर से शिवांग की आवाज आई, ‘‘मम्मी जल्दी दरवाजा खोलो, आइसक्रीम पिघल जाएगी.’’

मैं जानती थी कि यदि मैं ने जल्दी दरवाजा नहीं खोला तो उस के शोर से ही आसपास के फ्लैट से लोग निकल आएंगे. मैं जल्दी में नैट बंद करना भूल गई.

राजीव ढेर सारा खाने का सामान ले कर आए थे यानी आज रात खाना बनाने से छुट्टी. राजीव ने चाय की फरमाइश की तो मैं तुरंत बना लाई और चाय की चुसकियों के बीच मुझे याद आया कि मैं नेट बंद करना तो भूल ही गई थी. मेरा फेसबुक अकाउंट खुला पड़ा था और चैटिंग विंडो पर 2-3 मैसेज मेरा इंतजार कर रहे थे. मैं खुद को उन्हें खोलने से रोक नहीं पाई. एक मैसेज किसी कवि प्रदीप की ओर से कवि सम्मेलन में कविता पाठ के लिए था और दूसरा मैसेज कौशल महादेव का था, जिसे पढ़ कर मुझे बेहद झुंझलाहट हुई. उस की गाड़ी एक ही जगह पर अटकी पड़ी थी, ‘आप नाराज हैं क्या…?’, ‘आप चैट क्यों नहीं करतीं…?’, ‘आप ने अपना फोटो क्यों नहीं अपलोड किया…?’ अब तो मुझे लगने लगा कि इसे वाकई अपनी फ्रैंड्स लिस्ट में से हटा देना चाहिए और मैं ने किया भी वही, पर बारबार दिमाग में एक ही सवाल दौड़ रहा था कि मैं ने अपना फोटो अपलोड नहीं किया. क्या यह प्रश्न इतना जरूरी है…?

यह सवाल मेरे अतीत की उस कब्र को खोदने के लिए काफी था जिसे दफन करने में मुझे काफी वक्त लगा था और जिस के कारण मैं मानसिक यातना के दौर से गुजरी थी और मेरे परिवार ने जो सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना सही थी वह मुझे पागल कर देने के लिए काफी थी. अतीत की परतें उधेड़ने से मैं बहुत अपसैट हो गई और चुपचाप बालकनी में आ कर बैठ गई.

थोड़ी देर बाद राजीव मुझे ढूंढ़ते हुए आए और उन्होंने जैसे ही बालकनी की लाइट जलाई तो मुझे कहना पड़ा कि लाइट बंद रहने दो. वे मेरे करीब आए और धीरे से मेरा सिर सहला कर पूछा कि मैं अपसैट क्यों हूं…? तब मैं ने उन्हें पूरी बात बताई तो उन्होंने कहा मैं सब कुछ भूलने की कोशिश करूं. मैं थोड़ी देर अकेले रहना चाहती थी, वे बिना कुछ बोले खामोशी से उठ कर बाहर चले गए और मैं अपने अतीत को अंधेरे में फिर से जीवित होते देखती रही…

उस अंधेरे में मेरी आंखों के आगे वह शाम फिर से रिवाइंड हो गई. कालेज की फेयरवैल पार्टी थी. मैं ने बीएससी फाइनल ईयर का एग्जाम दिया था और कौलेज में वह मेरी आखिरी शाम थी. उस पार्टी में यह तय हुआ था कि लड़के धोतीकुरता या पाजामाकुरता और लड़कियां साड़ी पहन कर आएंगी. वह बेहद यादगार शाम थी पर वह मेरी जिंदगी में अंधेरा ले आएगी, मैं भी कहां जानती थी…? पार्टी में फोटो खींचने का दौर भी चल रहा था. हमारा एक क्लासमेट राहुल कैमरा ले कर आया था. वह हमारी क्लास का पढ़ने में सब से होनहार लड़का था. मेरे लिए सौफ्ट कौर्नर रखता था, यह मैं जानती थी पर वह मेरे लिए दूसरे क्लासमेट जैसा ही था. वह बारबार मेरे मना करने पर भी मेरी सिंगल फोटो खींचने की कोशिश कर रहा था जिस के लिए मैं ने उसे झिड़क दिया. सब के सामने यह बात होने से वह पार्टी से चुपचाप चला गया तो मैं ने चैन की सांस ली, पर मुझे नहीं मालूम था कि दूसरी सुबह मेरी जिंदगी का चैन हर लेने वाली है.

कुछ दिन बाद एक सुबह डाक से लिफाफा मेरे नाम आया. मां मेरे हाथ में उसे थमा कर चली गईं. लिफाफा वजनी था, मैं ने उसे उलटपलट कर देखा तो भेजने वाले का नाम नदारद पाया. खोलने पर उस में से कुछ तसवीरें फर्श पर गिर पड़ीं. उन तसवीरों को जैसे ही फर्श से उठाने के लिए झुकी तो ऐसा लगा कि कोई सांप देख लिया हो. तसवीरों में राहुल मेरे साथ इस तरह के पोज में खड़ा था कि समीपता का एहसास हो रहा था जबकि सचाई यह थी कि राहुल के पास तो क्या दूर खड़े हो कर भी मैं ने कोई तसवीर नहीं खिंचवाई थी.

मुझे रोना आ रहा था. जैसेजैसे मैं उन तसवीरों को देखती जा रही थी मेरा रोना गुस्से और आक्रोश में बदलता जा रहा था. मां ने जब मेरी हालत देखी तो मेरे पास आईं और उन की निगाह जब तसवीरों पर पड़ी तो वे सकते में आ गईं. पहले तो उन्होंने गुस्से में मेरी ओर देखा पर मेरी हालत देख कर वे नर्म पड़ गईं.

घर में जब सब को पता चला तो दादी का रिऐक्शन सब से पहले इस रूप में फूट कर सामने आया, ‘‘और पढ़ाओ लड़कों के साथ, यह तो होना ही था.’’

पापा और भैया कुछ न बोले पर वे बड़े गुस्से में थे. मेरा पूरा शक राहुल पर था, क्योंकि पार्टी वाले दिन मैं ने उसे अपनी फोटो लेने से डांटा था और उसी बात का बदला उस ने लिया था. मैं ने अपने इस शक के बारे में पापा को बताया तो उन्होंने उस से पूछने की ठानी पर वह अपनी इस हरकत से साफ मुकर गया. तब पापा और कोई चारा न देख कर उस के पापा से मिलने की सोच कर भैया के साथ उस के घर गए पर वहां से उन्हें अपमानित हो कर लौटना पड़ा.

इन सब बातों से धीरेधीरे लोगों को यह बात पता चल गई और मेरा घर से निकलना लगभग बंद हो गया. अब पूरा परिवार मानसिक प्रताड़ना से गुजर रहा था. और मैं जो आईएएस बनने का सपना पाले बैठी थी वह पूरा होना तो दूर, मेरी आगे की पढ़ाई करने की भी गुंजाइश शेष नहीं रही थी. मेरा सपना चकनाचूर हो चुका था. पापा को मेरे विवाह की चिंता सताने लगी. वे मेरा जल्दी से जल्दी विवाह कर देना चाहते थे. वे जहां भी बात चलाते मेरे साथ हुई घटना की जानकारी पहले ही पहुंच जाती और फिर बिरादरी में रिश्ता मिलना लगभग नामुमकिन होने लगा था.

ऐसे ही समय पर राजीव के पापा हमारे घर आए. वे 10-12 सालों के बाद पापा से मिलने आए थे और हमारे घर 2-3 दिन ठहरे. घर के तनावपूर्ण माहौल को वे भांप गए पर उन्होंने अधिक पूछना ठीक न समझा. मुझे उन के आने से बेहद अच्छा लगा, क्योंकि घर में कोई मुझ से ठीक से बात तक नहीं करता था. मैं ने अपना अधिकतर समय उन के साथ ही बिताया था, पर उन के जाने की बात सुन कर मैं बेहद उदास हो गई थी. उन्होंने मुझ से पूछना चाहा कि मैं इतनी उदास क्यों रहती हूं, तो मैं उन के प्रश्न को टाल गई. वे इतना तो समझ ही चुके थे कि जरूर कोई बात है और वह भी कुछ गंभीर सी, पर उन्हें यह ठीक नहीं लगा कि इतने सालों के बाद दोस्त के घर आ कर रहूं और उस के घरेलू मामलों में दखल दूं.

उन के व्यवहार से ऐसा लग रहा था कि मानों वे कुछ कहना चाहते हैं पर कहने से झिझक रहे हैं. जब वे हम से बिदा ले रहे थे तो अचानक उन्होंने पापा से कहा कि वे कुछ कहना चाहते हैं तो पापा ने हंस कर कहा कि इतना झिझक क्यों रहे हैं? इस पर उन्होंने राजीव के लिए मेरा हाथ मांग लिया और उन्होंने बताया कि उन का बेटा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सीईओ है. पापा यह बात सुन कर थोड़े संजीदा हो गए. वे एक विजातीय के साथ अपनी बेटी का रिश्ता करने में हिचकिचा रहे थे. उन्हें यह भी पता था कि अपनी जाति में वे मेरे रिश्ते के लिए कितना हाथपांव मार चुके थे पर कोई रिश्ता करने को तैयार नहीं था. ऐसे में यह रिश्ता घर बैठे ही मिल रहा था. पापा ने घर में सब से बात करी तो सब की राय यही थी कि इस रिश्ते के लिए हां कर दी जाए, पर पापा ने इस के पहले मेरी सचाई के बारे में बताना जरूरी समझा.

पूरी बात सुन कर राजीव के पापा हंस पड़े और कहने लगे, ‘‘अरे यार, यह तो आजकल हो ही रहा है. मैं ने तेरी बेटी का हाथ इसलिए मांग लिया कि वह बहुत अच्छी है. मैं तो यह समझ रहा था कि मैं विजातीय हूं इसलिए तू मेरे बेटे से रिश्ता जोड़ने से हिचकिचा रहा है.’’

फिर उन्होंने राजीव को बुला लिया और जल्द ही उन की परिणिता बन कर मैं उन के घर आ गई. मैं अपने अतीत के अंधेरे में ही डूबी रहती यदि राजीव ने आ कर बालकनी की लाइट न जलाई होती.

उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर पूछा, ‘‘अब कैसा लग रहा है?’’

‘‘पहले से बेहतर,’’ मैं ने कहा.

‘‘चलो कहीं घूम कर आते हैं,’’ उन्होंने बड़े इसरार से कहा.

‘‘नहीं, अभी मेरा मन नहीं है, फिर कभी.’’

‘‘तो एक काम करो…’’ इस पर मैं ने उन की तरफ देखा. उन के चेहरे पर शरारत खेल रही थी. मैं समझ गई कि वे अब कुछ न कुछ जरूर कहेंगे.

‘‘अपनी फोटो फेसबुक पर अपलोड करो. लोगों को जान लेने दो कि मेरी बीबी कितनी सुंदर है,’’ वे शरारत भरे स्वर में बोले.

मजा, जो बन गया सजा

न्यू आगरा के रहने वाले रामप्रसाद ने मंजू की शादी कर के यही सोचा था कि वह बेटी से मुक्ति पा गए हैं. लेकिन मंजू को न पति अच्छा लगा था, न उस के घर वाले. यही वजह थी कि एक बेटी पैदा होने के बाद भी वह ससुराल में मन नहीं लगा पाई और एक दिन बेटी को ले कर बाप के घर आ गई.

बेटी ससुराल वालों से लड़ाईझगड़ा कर के हमेशा के लिए मायके आ गई है, यह बात न तो रामप्रसाद को अच्छी लगी थी और न उन की पत्नी को. उन्होंने मंजू को ऊंचनीच समझा कर ससुराल भेजना चाहा तो उस ने साफ कह दिया कि उन्हें उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह कहीं नौकरी कर के अपना और बेटी का गुजारा कर लेगी.

मंजू ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि कोशिश कर के नौकरी कर भी ली. उसे एक कंपनी में चपरासी की नौकरी मिल गई थी. इस के बाद वह निश्चिंत हो गई, क्योंकि उसे वहां से गुजारे लायक वेतन मिल जाता था. रहने के लिए पिता का घर था ही.

मंजू अपनी नौकरी पर औटो से आतीजाती थी. इसी आनेजाने में कभी मंजू की मुलाकात औटोचालक करन शर्मा से हुई तो दोनों में जल्दी ही जानपहचान हो गई.

करन अकसर मंजू को अपने औटो से लाने ले जाने लगा तो धीरेधीरे उन की यह जानपहचान दोस्ती में बदल गई. उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यहां परेशानी यह थी कि दोनों ही शादीशुदा नहीं, बच्चे वाले थे.

मंजू तो खैर पति को छोड़ कर आ गई थी, लेकिन करन शर्मा तो पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था. इस के बावजूद वह मजा लेने के चक्कर में मंजू से प्यार कर बैठा.

करीब 7 साल पहले करन की शादी भावना से हुई थी. उस के 2 बच्चे थे  बेटा ललित और बेटी आयुषि. भावना अपने इस छोटे से परिवार में खुश थी. प्यार करने वाला पति था तो सुंदर से 2 बच्चे. इन्हीं सब की देखभाल में उस का समय बीत जाता था.

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लेकिन अचानक मंजू ने उस के प्यार में सेंध लगा दी थी. मंजू के ही चक्कर में पड़ कर करन देर से घर आने लगा. वह भावना को घर का खर्च भी कम देने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह अपनी कमाई का एक हिस्सा मंजू पर खर्च करने लगा था.

कुछ दिनों तक तो भावना की समझ में ही नहीं आया कि पति में यह बदलाव कैसे आ गया? लेकिन जब उस ने देखा कि करन देर रात तक न जाने किस से फोन पर बातें करता रहता है तो उसे संदेह हुआ. उस ने पूछा भी कि इतनी रात तक वह किस से बातें करता रहता है? करन ने लापरवाही से कह दिया कि उस का एक दोस्त है, उसी से वह बातें करता है.

आखिर बहाना कब तक चलता. भावना को लगा कि पति झूठ बोल रहा है तो उसे डर लगा कि पति कहीं किसी गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है. भावना का डर गलत भी नहीं था.

उधर मंजू के दबाव में करन ने उस से नोटरी के यहां शादी कर ली थी. शादी के बाद मंजू मायके में नहीं रहना चाहती थी, इसलिए करन ने थाना सिकंदरा की राधागली में किराए पर एक कमरा ले लिया और उसी में दोनों पतिपत्नी के रूप में रहने लगे. मंजू की बेटी इच्छा भी उसी के साथ रह रही थी.

मंजू को लगता था कि वह करन को अपने प्यार की डोर में इस तरह से बांध लेगी कि वह अपनी ब्याहता पत्नी को भूल जाएगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि करन 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह मंजू से इस तरह मिल रहा था कि भावना को पता न चले, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे पता चल गया तो घर में तूफान आ जाएगा.

यही वजह थी कि करन रात में मंजू के यहां जाता तो कोई न कोई बहाना बना कर जाता था. लेकिन पति के बदले हावभाव से परेशान हो कर भावना ने उस की शिकायत ससुर से कर दी. राधेश्याम ने बेटे को डांटफटकार कर तरीके से रहने को कहा. भावना ने भी धमकी दी कि अगर वह ढंग से नहीं रहा तो वह बच्चों को छोड़ कर मायके चली जाएगी.

पत्नी की इस धमकी से करन डर गया, क्योंकि अगर पत्नी घर छोड़ कर चली जाती तो वह बच्चों को कैसे संभालता? आखिर पत्नी की धमकी के आगे करन ने सरेंडर कर दिया और मंजू से मिलनाजुलना कम कर दिया. उस के इस व्यवहार से मंजू को लगा कि वह परेशानी में फंस गई है, क्योंकि करन से शादी करने के बाद वह नौकरी भी छोड़ चुकी थी. अब वह पूरी तरह से करन पर ही निर्भर थी. मकान के किराए के अलावा घर के खर्चे की भी चिंता थी.

एक दिन ऐसा भी आया, जब करन का मोबाइल फोन बंद हो गया. मंजू परेशान हो उठी. करन के बिना वह कैसे रह सकती थी? वह मायके भी नहीं जा सकती थी. करन के घर का पता भी उस के पास नहीं था. आखिर औटो वालों की मदद से उस ने करन को खोज निकाला.

मंजू करन के घर पहुंच गई. उस ने करन से साथ चलने को कहा तो भावना भड़क उठी. मंजू को भलाबुरा कहते हुए भावना ने कहा कि करन उसे छोड़ कर कैसे जा सकता है. उस ने उस से ब्याह किया है. उस से उस के 2 बच्चे हैं.

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मंजू और भावना में लड़ाई होने लगी. शोर सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. किसी ने थाना पुलिस को फोन कर दिया. सूचना पा कर थाना सिकंदरा के थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय करन के घर पहुंच गए. वह करन, मंजू और भावना को थाने ले आए.

तीनों की बातें सुन कर ब्रजेश पांडेय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? एक आदमी ने मौजमस्ती के लिए 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया था. करन को न मंजू छोड़ रही थी और न भावना. छोड़ती भी कैसे, दोनों का भविष्य अब उसी पर टिका था. इस परेशानी को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय ने कहा कि करन एक महीने मंजू के साथ रहेगा और एक महीने भावना के साथ. जब तक वह जिस के साथ रहेगा, उस की कमाई पर उसी का हक होगा.

मंजू को यह समझौता कतई मंजूर नहीं था, क्योंकि उस का रिश्ता तो रेत की दीवार की तरह था, जो कभी भी ढह सकती थी. लेकिन भावना इस समझौते पर राजी थी. मंजू ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि एक दिन करन उस के साथ रहेगा और एक दिन भावना के साथ.

हालांकि इस समझौते का कोई कानूनी मूल्य नहीं था, फिर भी ब्रजेश पांडेय ने एक कागज पर लिखवा कर दोनों औरतों और करन के दस्तखत करवा लिए. इस समझौते से जहां मंजू ने राहत की सांस ली, वहीं भावना को मजबूरी में सौतन के लिए अपने पति का बंटवारा करना पड़ा.

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करन ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी होगा, इसलिए अब वह परेशान था. उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उस ने जो गलती की थी, अब उस का खामियाजा तो उसे भोगना ही था.

थानाप्रभारी ने जो समझौता कराया था, करन के घर वालों ने उस का सख्ती से विरोध किया. जब इस समझौते की खबर अखबारों में छपी तो सभी हैरान थे कि एक पुलिस अधिकारी ने ऐसा समझौता कैसे करा दिया? बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो कोई बवाल होता, उस के पहले ही इंसपेक्टर ब्रजेश पांडेय का तबादला कर दिया गया.

कुछ भी हो, मंजू को लग रहा है कि उस की अपनी गृहस्थी बस गई है. करन अब एक दिन उस के साथ रहता है तो अगले दिन भावना के साथ. उस दिन वह जो कमाता है, उसे देता है जिस के साथ रहता है. लेकिन करन का लगाव भावना और अपने बच्चों के प्रति अधिक था, इसलिए अब वह मंजू पर उतना ध्यान नहीं देता, जितना देना चाहिए. इस से आए दिन उस का मंजू से झगड़ा होता रहता है.

करन ने जो गलती की है, अब वह उस का खामियाजा भोग रहा है. उसे भी कहां सुख मिल रहा है. कभी वह मंजू की ओर भागता है तो कभी भावना की ओर. परेशानी की बात तो यह है कि अभी इस समझौते को हुए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, खींचतान शुरू हो गई है. आगे क्या होगा, कौन जानता है.

आखिर एक आदमी की गलती से 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. उस का भी क्या होगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. यह समझौता भी कितने दिनों तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.

Mother’s Day Special- प्रश्नों के घेरे में मां: भाग 2

मैं ने घर का दरवाजा खोल कर चाय का पानी चूल्हे पर रखा ही था कि कालबेल बज उठी.

‘कौन?’ मैं ने पूछा.

‘आंटी, मैं निधि.’

मैं ने दरवाजा खोल दिया. फिर निधि के चेहरे को ध्यान से देखने लगी. उस की सूनी बेजान आंखों को देख कर मैं ने प्यार से पुचकारा और उस के सिर पर हाथ फे रते हुए उसे गोद में उठा लिया. फिर उस के गालों को चूमती हुई बोली, ‘तू क्यों अपनी मम्मीपापा को नाराज करती है?’

‘नहीं तो,’ सहमी सिकुड़ी सी निधि मेरी आंखों में देखते हुए बोली तो मैं ने उसे जमीन पर उतारते हुए कहा, ‘निधि बेटा, सीमा तुम्हारी छोटी बहन है और छोटों को हमेशा प्यार करते हैं.’

‘उस की चिंता मत कीजिए, वह बहुत अक्लमंद और सुंदर है, आंटी,’ और उस की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे.

वातावरण को सहज बनाने के लिए मैं ने आवाज में कोमलता भरते हुए पूछा, ‘यह तुम से किस ने कहा?’

‘मां और पापा दोनों कहते हैं.’

‘गलत कहते हैं,’ मैं ने उस के कान के पास धीरे से कहा तो उस का चेहरा खिल उठा और वह घर में उछलकूद करने लगी.

10वीं की परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो सीमा अपने स्कूल में ही नहीं, पूरे प्रांत में प्रथम आई थी. अरु और शशांक को मैं बधाई देने पहुंची तो देखा, निधि कोने में गुमसुम बैठी है. उस ने 12वीं में 90 प्रतिशत अंक हासिल किए थे पर सीमा की तरह प्रांत में प्रथम नहीं आई थी.

मैं धीरे से उस के पास सरक गई, ‘निधि, तुम तो बहुत बुद्धिमान निकलीं. 90 प्रतिशत अंक हासिल करना कोई आसान बात नहीं है.’

एक तरल मुसकान होंठों पर ला कर निधि बोली, ‘वह तो ठीक है आंटी, पर मैं सीमा की बराबरी तो नहीं कर सकती न?’

मैं सोच रही थी कि काश, इस के मातापिता धन से न सही जबान से ही बेटी की तारीफ कर देते तो इस मासूम का भी दिल रह जाता, उन्हें सोचना चाहिए कि जब अपने हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं हैं तो बच्चे कैसे बराबर हो सकते हैं. हर बच्चे का अपना आई क्यू होता है.

शिक्षक दिवस पर स्कूल में निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. जीतने वाले को नकद पुरस्कार के साथ ट्राफी भी मिलने वाली थी. निधि ने सारी निबंध की पुस्तकें छिपा लीं कि उस का लाभ सीमा को न मिल सके. उस  समय शशांक ने सीमा को दुविधा से उबार लिया और लाइब्रेरी से ढेरों किताबें ले आए.

कुशाग्रता, नम्रता और पिता के मार्गदर्शन में सीमा ने प्रतियोगिता जीत ली. शशांक एक बार फिर बधाई के पात्र बने और निधि को मिली उदासीनता.

उस दिन निधि का उतरा चेहरा देख कर सीमा बोली, ‘दीदी, इस बार इनाम पर मुझ से ज्यादा आप का अधिकार है.’

‘क्यों?’

‘इसलिए कि बचपन से ले कर अब तक मैं ने आप की किताबों को ही पढ़ा है. आप के नोट्स और गाइड्स का इस्तेमाल किया है. मैं तो आप की आभारी हूं,’ सीमा ने विनम्रता से कहा

क्रोध के आवेग में निधि की कनपटियां बजने लगीं. निधि को लगा सीमा ताना मार रही है. बहन के हाथ से ट्राफी छीन कर जैसे ही निधि ने जमीन पर फेंकनी चाही, ट्राफी सीमा के सिर पर लग गई. रक्त की धारा फूट पड़ी. बदहवास मां दौड़ती हुई आईं और रक्त का प्रवाह रोकने के लिए पट्टी बांध दी.

कुछ समय बाद सीमा तो स्वस्थ हो गई पर अरु सहज नहीं हो पाई थीं. निधि का यह रूप उन के लिए सर्वथा नया था. बेटी के स्वभाव ने उन्हें चिंता में डाल दिया था.

अरु इस समस्या को ले कर दुविधा में पड़ गई थीं. मैं ने उन्हें समझाया, ‘2 बच्चों में बराबरी कैसी? हर बच्चे का अपना स्वभाव होता है और फिर यह कहां का न्याय है कि दूसरे बच्चे के आते ही पहले का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जाए? ऐसे में पहला बच्चा आक्रामक हो जाए तो उसे दोष मत दीजिए.’

धीरेधीरे अरु के स्वभाव में परिवर्तन आया. निधि के पास अब वह घंटों बैठी रहती थीं और जानने का भरसक प्रयत्न करतीं कि बेटी किन तर्कहीन सवालों में उलझी हुई है पर समस्याओं के तानोंबानों में उलझी निधि का व्यवहार जरा भी न बदलता था.

निधि के लिए अच्छेअच्छे समृद्ध परिवारों से कई रिश्ते आए पर वह हर बार चुप्पी साधे रही. उस के ही दायरे में बंधे, उस की छोटीछोटी गतिविधियों को देखतेदेखते अरु इतना तो जान ही गई थीं कि बेटी किसी को पसंद करने लगी है और फिर एक दिन जिद कर के जब राहुल को निधि अपने घर बुला कर लाई तो शक सच में बदल गया.

राहुल अच्छे खातेपीते घर का लड़का था पर पढ़ाई को ले कर घर के लोगों का मन नहीं मान रहा था. अरु ने कहा भी कि एम.ए. पास और कंप्यूटर डिग्रीधारी युवक को कोई विशेष योग्यता वाला नहीं माना जा सकता है. क्या कमाएगा क्या खिलाएगा. पर निधि अपनी ही जिद पर अड़ी रही.

अनुशासनप्रिय पिता के सामने बेटी का ऐसा विरोधी रूप सर्वथा नया था. कई दिन ऊहापोह में कटे. अरु व शशांक दोनों समझ रहे थे कि बेटी तर्कहीन बियाबान में खोई हुई है. उलझनों को शायद तौलना ही नहीं चाहती. तब सीमा ने मां को समझाया, ‘दीदी जहां जाना चाहती हैं उन्हें जाने दो, मां. उन की खुशी में ही हमारी खुशी है.’

लेकिन अरु को लगा निधि रेत में महल खड़ा करना चाह रही है. मां को तो हर पहलू से सोचना पड़ता है फिर चाहे अपनी बेटी के बारे में ऐसीवैसी ही बात क्यों न हो.

अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर दहेज और ढेर सारी नसीहतों की पोटली बांध कर बिटिया को मां ने विदा किया तो दुख भी हुआ और आश्चर्य भी. कितना अंतर है दोनों बहनों में, एक जिद्दी तो दूसरी सरल और सौम्य.

अब निधि हर दूसरे दिन मायके आ धमकती. राहुल के पास कोई काम तो था नहीं. अत: वह भी निधि के साथ बना रहता था. हर समय की आवाजाही को देख एक दिन अरु ने निधि को टटोला तो वह ज्वालामुखी के लावे सा फट पड़ी थी.

‘मां, मेरी देवरानियां अमीर घरानों से आई हैं, मायके से उन्हें हर बार अच्छाखासा सामान मिलता है और एक आप लोग हैं कि एक बार दहेज दे कर छुट्टी पा ली. जैसे बेटी से कोई रिश्ता ही न हो. तानेउलाहने तो मुझे सहने पड़ते हैं न?’

अरु के चेहरे पर बेचारगी के भाव तिर आए. मां थीं, दुख तो होना ही था. निधि की बातें सुन कर बुरा तो मुझे भी बहुत लग रहा था पर क्या किया जा सकता था. बचपन की तृष्णा ने उस को बागी बना दिया था. छीन कर हर चीज हासिल करना उस का स्वभाव बन चुका था. काश, शशांक दंपती ने समझा होता कि बचपन ही जीवन का ऐसा स्वर्णिम अध्याय है जब उस के व्यक्तित्व की बुलंद इमारत का निर्माण होता है लेकिन यदि बच्चे को अंकुश के कड़े चाबुक से साध दिया जाए तो उस के अंदर कुंठा, घृणा, ईर्ष्या और लालच जैसी भावनाएं तो जन्म लेंगी ही.

बहन का सुहाग: चंचल रिया की चालाकी

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बयार बदलाव की- भाग 2 : नीला की खुशियों को किसकी नजर लग गई थी

शाम को वह घर पहुंचा तो नीला मम्मीपापा के साथ बातें करने में मशगूल थी. मम्मीपापा भी उस की गृहस्थी देख कर बहुत खुश थे. चारों बैठ कर बातें करने लगे. उन्हें पता ही नहीं चला कि कितना समय गुजर गया. डिनर तो आज बाहर ही कर लेंगे, उस ने सोचा, इसलिए बोला, ‘‘मम्मीपापा चलिए ड्राइव पर चलते हैं, घूम भी लेंगे और खाना भी खा कर आ जाएंगे.’’

चारों तैयार हो कर चले गए. सुबह उस का औफिस था. उस की नींद और दिनों से भी जल्दी खुल गई. उस ने एकदो बार नीला को हौले से उठाने की कोशिश की पर वह इतनी गहरी नींद में थी कि हिलडुल कर फिर सो गई. वह उठ कर मम्मीपापा के कमरे की तरफ चला गया. तभी उस ने देखा कि मम्मी किचन में गैस जलाने की कोशिश कर रही हैं. वह किचन में चला गया.

‘‘क्या कर रही हैं मम्मी?’’ ‘‘चाय बना रही थी बेटा, तू पिएगा चाय?’’ ‘‘हां, पी लूंगा.’’ ‘‘और नीला?’’ ‘‘वह तो अभी…’’ ‘‘सो रही होगी, कोई बात नहीं. जब उठेगी तब पी लेगी. हम तीनों की बना देती हूं,’’ मां के चेहरे से उसे बिलकुल भी नहीं लगा कि उन्हें नीला के देर तक सोने पर कोई आश्चर्य हो रहा है. बातें करतेकरते तीनों ने चाय खत्म की. पर दिल ही दिल में वह अनमयस्क सोच रहा था कि ‘काश, नीला भी उठ जाती.’

औफिस का समय हो रहा था. वह तैयार होने चला गया. वह रोज सुबह अपने कपड़े खुद ही प्रैस करता था. खासकर शर्ट तो रोज ही प्रैस करनी पड़ती थी. मम्मी बाथरूम में थीं. प्रैस की टेबल लौबी में लगी थी. उस ने सोचा जब तक मम्मी बाथरूम से आती हैं तब तक वह शर्ट प्रैस कर लेगा. अभी वह प्रैस कर ही रहा था कि मम्मी बाथरूम से निकल आईं.

‘‘अरे, तू प्रैस कर रहा है बेटा, ला मैं कर देती हूं.’’ ‘‘नहींनहीं मम्मी, मैं कर लूंगा,’’ वह कुछकुछ ?ोंपता हुआ सा बोला. ‘‘नहींनहीं, मैं कर देती हूं. तू तैयार हो जा और नाश्ते में क्या खाएगा?’’ ‘‘मैं तो कौर्नफ्लैक्स और दूध लेता हूं.’’ ‘‘आजकल तो कुछ और नाश्ता कर ले. कौर्नफ्लैक्स और दूध तो रोज ही लेते हो तुम दोनों. जो नीला को भी पसंद हो…’’

‘‘नीला को तो उत्तपम बहुत पसंद है. वहां अलमारी में पड़े हैं पैकेट,’’ उस के मुंह से निकला. ‘‘ठीक है, मैं उत्तपम ही बना देती हूं. मु?ो और तेरे पापा को भी बहुत पसंद है,’’ मम्मी ने हंस कर कहा. उसे लगा मम्मी ने कुछ कहा नहीं पर सोच रही होंगी कि बीवी सो रही है और वह औफिस जाने के लिए चीजों से जू?ा रहा है. पर मम्मी के चेहरे पर उसे ऐसा कोई भाव नजर नहीं आया.

उस ने तृप्ति से नाश्ता किया. तब तक नीला भी उठ गई. अपनी तरफ से तो वह भी रोज से जल्दी उठ गई थी. वह सब को बाय करता हुआ औफिस चला गया. नीला बाथरूम से फ्रैश हो कर आई तो मम्मी ने उसे भी नाश्ता पकड़ा दिया.

वह औफिस में बैठा लंच के बारे में सोच रहा था. पता नहीं घर में क्या बना होगा. उस के मातापिता तो रोज बाहर का भी नहीं खा पाएंगे. उस ने नीला को फोन किया.

‘‘हैलो,’’ नीला की सुरीली व मासूम सी आवाज सुन कर वह सबकुछ  भूल गया. ‘‘लंच में कुछ बनाया भी है या नहीं? नहीं तो बाहर से और्डर कर लो.’’ ‘‘मम्मी ने बढि़या राजमाचावल बनाए हैं और मेरी पसंद की गोभी की सब्जी भी,’’ नीला के स्वर में मां के आने का सा लाड़लापन था. इठलाते हुए बोली, ‘‘आप को भी खाना है तो घर आ जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम ही खाओ. मैं शाम को बचा हुआ खा लूंगा,’’ वह हंसता हुआ बोला, ‘‘चाय तुम अच्छी बनाती हो. कम से कम शाम की बढि़या चाय पिला देना मम्मीपापा को,’’ जवाब में नीला भी बिना सोचेसम?ो हंस दी.

शाम को वह जल्दी घर पहुंच गया. तीनों बैठ कर चाय पी रहे थे. उस के आते ही मम्मीपापा ने नीला की बनाई चाय की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए. वह मन ही मन मुसकरा दिया.’’ ‘‘मम्मी, नीला टमाटर का सूप भी बहुत अच्छा बनाती है. नीला, आज सूप बना कर पिला दो.’’

‘‘हां, आज मैं सूप बना दूंगी, ठीक है मम्मी?’’ ‘‘ठीक है. डिनर में क्या बनाऊं,’’ मम्मी किचन की तरफ जाती हुई बोलीं.

‘‘बाहर घूमने चलेंगे तो खाना खा कर आ जाएंगे,’’ वह बोला.‘‘नहींनहीं, कुछ तैयारी कर देती हूं. फिर घूमने जाएंगे. जब तक हम हैं,  तब तक घर का खा लो,’’ मम्मी बोलीं.

‘‘हां मम्मा,’’ नीला लाड़ से मम्मी के गले में बांहें डालती हुई बोली, ‘‘आज दमआलू बना दो जैसे आप ने चंडीगढ़ में बनाए थे. सारी तैयारी मैं कर देती हूं. आप मु?ो बता दीजिए. बना आप दीजिए.’’

‘‘ठीक है, मैं अपनी गुडि़या की पसंद बनाऊंगी,’’ मम्मी प्यार से नीला की बलैयां लेती हुई बोलीं.

रमन सुखद आश्चर्य से मम्मी को देख रहा था. बदली सिर्फ उस की पीढ़ी ही नहीं है. उस के मातापिता की पीढ़ी ने भी खुद को कितना बदल लिया है.

मम्मी ने आननफानन डिनर की तैयारी की और चारों घूमने चल दिए. बाहर वह देख रहा था. नीला मम्मीपापा से ही चिपकी हुई है. कभी एक का हाथ पकड़ रही है तो कभी दूसरे का. कभीकभी तो उसे लग रहा था कि शायद मांबाप नीला के आए हैं और वह दामाद है.

नीला छोटीछोटी बातों में मम्मीपापा का बहुत ध्यान रख रही थी. घुमाते समय भी एकएक जगह के बारे में उन्हें बता रही थी और उस के मातापिता तो अपनी लाड़ली बहू पर फिदा हुए जा रहे थे.

रोज की यही दिनचर्या बीत रही थी. मम्मी ने किचन का लगभग सारा भार अपने ऊपर ले लिया था. नीला को जो कुछ बनाना आता था, वह भी पूरे मनोयोग से बना कर खिलाने की कोशिश करती. शाम को चारों घूमने निकल जाते. घर आ कर जहां नीला कपड़े बदलने में लग जाती, मम्मी किचन में पहुंच कर डिनर का बचा हुआ कार्य खत्म करतीं और फिर बैठ जातीं. तब तक नीला आती और बढि़या चाय बना कर मम्मीपापा को पिलाती. गजब का सामंजस्य था. कहीं कोई हलचल नहीं. कहीं कुछ गड़बड़ नहीं.

एक दिन उस ने पापा से नाइट क्लब  में जाने की बात कही. उस के मम्मीपापा उच्चशिक्षित थे. सहर्ष तैयार हो गए. वे तैयार होने कमरे में चले गए. वे दोनों भी तैयार होने चले गए. वह तैयार हो कर ड्राइंगरूम में बैठ गया. मम्मीपापा भी बाहर आ कर बैठ गए. थोड़ी देर बाद नीला तैयार हो कर निकली तो रमन सन्न रह गया. नीला ने घुटनों से ऊपर की स्लीवलैस लाल रंग की मिनी पहनी हुई थी.

वह घबरा कर मम्मीपापा के चेहरे देखने लगा. अभी तक की उस की ड्रैसेज को तो वे सहर्ष पचा रहे थे पर… उसे पता होता कि नीला आज क्या पहनने वाली है तो वह उसे मना कर देता. हालांकि नीला जहां जा रही थी वहां के माहौल के अनुरूप ही उस ने ड्रैस पहनी थी.

मम्मीपापा की नजर उस पर पड़ी तो दोनों मुसकरा दिए, ‘‘अरे वाह, नीला, तू तो पहचान में ही नहीं आ रही है. बहुत स्मार्ट लग रही है. किसी फिल्म की हीरोइन लग रही है,’’ पापा बोले.

‘‘हमारी बेटी किसी फिल्म हीरोइन से कम है क्या. जो भी पहनती है उस पर सबकुछ अच्छा लगता है,’’ मम्मी भी हुलस कर बोलीं.

सुन कर वह चारों खाने चित्त हो गया. उस के मम्मीपापा की सोच उस की कल्पना से बहुत आगे व आधुनिक थी. वह अपने दोस्तों के घरों की स्थितियों के बारे में सोचने लगा. जब उन की बीवियों और उन के मातापिताओं का आमनासामना होता है तो इन्हीं छोटीछोटी बातों पर उन की अपने बेटों की आधुनिक मिजाज बीवियों से, जो लाड़ली बेटियां रही हैं, खटपट मची रहती है. उन के मातापिताओं को अपनी बहुओं के देर से उठने से ले कर पहननेओढ़ने के तौरतरीकों, ठीक से खाना खाना न आना, काम करने की आदत न होना आदि तमाम बातों से शिकायतें थीं. और बहुओं को सासससुर की टोकाटाकी वह पहननेओढ़ने के बंधनों से सख्त नफरत थी. जिस में बेचारे बेटे या पति की दुर्दशा हो जाती थी.

बेटा अपनी पत्नी से प्यार करता है. वह उस की अच्छीबुरी आदतों के साथ सम?ाता करना चाहता है पर यह बात मातापिता नहीं सम?ा पाते. उन्हें अपना बेटा बेचारा लगने लगता है. वे नहीं सम?ा पाते कि बहू की बुराई या उसे नापसंद करना बेटे के हृदय को तोड़ देता है, उन के बीच के नाजुक रिश्ते, जो समय के साथ मजबूती पाया है, को कमजोर करता है. खैर, यह उन की समस्या है. उस ने सोचा, वह तो खामखां ही डर रहा था इतने दिनों से. इसलिए अपने मम्मीपापा को खुलेदिल से आने के लिए भी नहीं कह पा रहा था.

वे चारों साथ में खूब मस्ती कर रहे थे. घूमने जाते, हंसतेबोलते. हंसीमजाक से उस का छोटा सा फ्लैट हर समय गुलजार रहता. नीला को भले ही किचन का बहुत अधिक काम नहीं आता था पर उस के प्यार व उस की भावनाओं में मम्मीपापा के प्रति कहीं कमी नहीं थी. बल्कि, उन की उपस्थिति से वह उस से अधिक आनंदित हो रही थी.

धीरेधीरे मम्मीपापा के जाने का दिन करीब आ रहा था. जैसेजैसे उन के जाने का दिन करीब आ रहा था, नीला उदास होती जा रही थी. वह बराबर मम्मीपापा से मीठा ?ागड़ा करने पर तुली हुई थी.

‘‘आप वापस क्यों जा रहे हैं मम्मी, वहां क्या रखा है? आप के बच्चे तो यहां पर हैं. यहीं रहिए न.’’

‘‘फिर आएंगे बेटा. अब तुम आ जाओगे छुट्टी पर. साल में 2 बार तुम आ जाओगे, एक बार हम आ जाएंगे. मिलनाजुलना होता रहेगा,’’ पापा उसे दुलार करते हुए बोले.

‘‘लेकिन आप दोनों यहीं क्यों नहीं रह सकते हमेशा,’’ नीला लगभग रोंआसी सी हो गई.

मम्मी ने उसे सीने से लगा लिया, ‘‘हम यहीं रह गए तो तुम घर किस के पास जाओगे. अगली बार आएंगे तो ज्यादा दिन रहेंगे,’’ फिर उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘बहुत दिन घर भी अकेला नहीं छोड़ा जाता. तू तो हमारी लाखों में एक लाड़ली बेटी है. तेरे साथ तो हमें बहुत अच्छा लगता है.’’ पर नीला की आंखें भर आई थीं. नीला की भरी आंखें देख कर उस का हृदय भी भावुक हो रहा था. ‘‘पापा, थोड़े दिन और रुक जाइए न. मैं फ्लाइट का टिकट आगे बढ़ा देता हूं,’’ रमन बोला.

‘‘नहीं बेटा. इस बार रहने दो, अगली बार आएंगे तो घर का प्रबंध ठीक से कर के आएंगे तब ज्यादा दिन रह लेंगे.’’

मम्मीपापा के जाने का दिन आ गया. उन की शाम की फ्लाइट थी. उस दिन रविवार था. मम्मीपापा के न… न… करतेकरते भी नीला ने उन के लिए ढेर सारे गिफ्ट खरीदवाए थे. सुबह वह काफी जल्दी उठ कर मम्मीपापा के कमरे में चला गया. पापा मौर्निंग वाक पर गए हुए थे. वह मम्मी के पास जा कर बैठ गया.

‘‘मैं तेरे लिए चाय बना कर ले आती हूं,’’ मम्मी उठने का उपक्रम करती  हुई बोलीं.

‘‘नहीं मम्मी, रहने दो. मु?ो रोज चाय पीने की आदत नहीं है. बैठो आप. कल से आप कहां होंगी. इतने दिन तो पता ही नहीं चला. कब एक महीना बीत गया, बहुत अच्छा लगा आप के और पापा के आने से.’’

‘‘हमें भी तो बहुत अच्छा लगा बेटा तुम्हारे पास आने से. कितना ध्यान रखा तुम दोनों ने, कितना घुमाया, कितना खर्च किया हमारे ऊपर, इतनी सारी चीजें भी खरीद लीं.’’

‘‘कुछ नहीं किया मम्मी, फिर मातापिता को खुश करने से आशीर्वाद तो हमें ही मिलेगा.’’

‘‘कितनी प्यारी और मीठी बातें करते हो तुम दोनों,’’ मम्मी खुशी से छलक आई अपनी आंखों को पोंछती हुई बोलीं, ‘‘दिल को छू जाती हैं तुम्हारी बातें, तुम्हारी भावनाएं. खुशनसीब हैं हम कि हमारे ऐसे प्यारे बच्चे हैं. एक महीना बहुत खुशी से बीता.’’

‘‘पर आप पर काम का भार पड़ गया,’’ रमन संकोच से बोला, ‘‘दरअसल, नीला को अभी गृहस्थी का ज्यादा काम नहीं आता. धीरेधीरे सीख रही है. नौकरी करेगी तो जल्दी उठने की आदत भी पड़ जाएगी.’’

‘‘काम कोई माने नहीं रखता बेटा. नीला कोशिश करती है, आलसी नहीं है. उस से जो भी हो पाता है वह पूरा प्रयत्न करती है. कुछ कर न पाना और कुछ करना ही न चाहना, दोनों बातों में फर्क है. मुख्य तो स्वभाव होता है, भावनाओं और विचारों से यदि इंसान अच्छा है तो ये बातें कोई अहमियत नहीं रखतीं. आदतें बदल जाती हैं. काम करना आ जाता है. आजकल एकदो बच्चे होते हैं. बेटियां बहुत लाड़प्यार और संपन्नता में बड़ी होती हैं. उन के जीवन का ध्येय किचन या गृहस्थी का काम सीखना नहीं, बल्कि पढ़ाईलिखाई कर के कैरियर बनाना होता है. इसलिए विवाह होते ही उन से ऐसी उम्मीद करना गलत है.

‘‘नीला बहुत प्यारी लड़की है, उस के हृदय का पूरा प्यार और भावना हम तक पूरी की पूरी पहुंच जाती है. हम तो ऐसी बहू पा कर बहुत खुश हैं,’’ मां उस के चेहरे पर मुसकराती नजर डाल कर बोलीं, ‘‘अभी वह बच्ची है. कल को बच्चे होंगे तो कई बातों में वह खुद ही परिपक्व हो जाएगी.’’

‘‘जी मम्मी, मैं भी यही सोचता हूं.’’

‘‘और बेटा, आजकल लड़की क्या और लड़का क्या, दोनों को ही समानरूप से गृहस्थी संभालनी चाहिए. वरना लड़कियां, खासकर महानगरों में, नौकरियां कैसे करेंगी जहां नौकरों की भी सुविधा नहीं है.’’

‘‘जी मम्मी, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा.’’

थोड़ी देर दोनों चुप रहे, फिर एकाएक रमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, सच बताऊं तो मैं नहीं सोच पा रहा था कि आप नीला की पीढ़ी की लड़कियों के रहनसहन की आदतों व पहननेओढ़ने के तरीकों को इतनी स्वाभाविकता से ले लेंगी, इसलिए…’’ कह कर उस ने नजरें ?ाका लीं.

‘‘इसीलिए हमें आने के लिए नहीं बोल रहा था,’’ मम्मी हंसने लगीं, ‘‘तेरे मातापिता अनपढ़ हैं क्या?’’

‘‘नहीं मम्मी, आप की पीढ़ी तो पढ़ीलिखी है. मेरे सभी दोस्तों के मातापिता उच्चशिक्षित हैं पर पता नहीं क्यों बदलना नहीं चाहते.’’

‘‘बदलाव बहुत जरूरी है बेटा. समय को बहने देना चाहिए. पकड़ कर बैठेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? रिश्ते भी ठहर जाएंगे, दूरियां भी बढ़ेंगी…’’

‘‘यह सम?ा सब में नहीं होती मम्मी,’’ यह बोला ही था कि तभी उस के पापा आ गए. नीला भी आंखें मलतेमलते उठ कर आ गई और मम्मी की गोद में सिर रख कर गुडमुड कर लेट गई. मम्मी हंस कर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं.

मां की उम्मीद- भाग 1 : क्या कामयाब हो पाया गोपाल

जून का महीना खत्म होने वाला था. होस्टल भी तकरीबन खाली था. कहींकहीं कोई इक्कादुक्का छात्र दिख जाता था. ऐसे में होस्टल के कमरे में चारपाई पर गोपाल अकेला लेटा हुआ छत की ओर देखे जा रहा था. उस के चेहरे पर तनाव की रेखाएं साफ दिखाई पड़ रही थीं.

2 महीने पहले गोपाल ने एमए (इकोनौमिक्स) का इम्तिहान दिया था, जिस का नतीजा कभी भी आ सकता था. उसे नतीजे की इतनी चिंता नहीं थी, क्योंकि उसे पता था कि पास तो वह हो ही जाएगा. उसे तो चिंता थी कि उसे कौन सा नंबर हासिल होगा. उस का मकसद था कि उसे यूनिवर्सिटी में पहला नंबर हासिल हो और साथ में मिले गोल्ड मैडल. गोल्ड मैडल के लिए उसे अपने दूसरे सहपाठियों के साथ चल रही कड़ी होड़ का भी पूरापूरा अंदाजा था.

सब से ज्यादा होड़ तो गोपाल को अपने ही कालेज के एक दूसरे सहपाठी विद्या चरण से थी, जो बहुत अमीर परिवार से था और जिस के पास पढ़ाई के पूरे साधन मौजूद थे,

चाहे किताबें हों या अकेला कमरा और घर में नौकरचाकर की सुविधा.

विद्या चरण के मुकाबले उस के पास तो किताबें खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे. वह तो किताबों के लिए कालेज की एकमात्र लाइब्रेरी पर ही पूरी तरह से निर्भर था.

इम्तिहान शुरू होने से तकरीबन 2 महीने पहले की बात थी, जब सभी लैक्चरर बड़ी तेजी से कोर्स पूरा कराने की कोशिश कर रहे थे और तकरीबन रोजाना ही ऐक्स्ट्रा क्लासेज भी हो रही थीं.

कालेज के प्रिंसिपल बहुत अनुशासनप्रिय थे और अध्यापकों और छात्रों यानी सब के ऊपर उन की पैनी नजर रहती थी. कालेज के माहौल में सरगर्मी थी और गोपाल भी पढ़ाई में पूरा ध्यान लगा रहा था. पर गोपाल की तैयारियों को एकाएक बहुत बड़ा झटका लगा था, जब एक दिन अचानक उसे बहुत तेज बुखार चढ़ गया था और सारी पढ़ाई धरी रह गई थी. डाक्टर ने ब्लड टैस्ट कर के बताया था कि टाइफाइड है और बुखार उतरने में कम से कम 21 दिन लगेंगे और ऐसे में वह क्लास में भी नहीं जा सकता है. खानेपीने का ध्यान रखना है, सो अलग.

ज्योंत्यों कर के 3 हफ्ते निकल गए और बुखार भी उतर गया था, पर कमजोरी इतनी ज्यादा थी कि गोपाल खड़ा भी नहीं रह पा रहा था. नहाने गया तो चक्कर खा कर गिर पड़ा था. उस का रूममेट किसी तरह सहारा दे कर उसे कमरे में लाया था.

गोपाल के बाथरूम में चक्कर खा कर गिरने की बात कालेज में तुरंत फैल गई थी. दोपहर का लैक्चर खत्म होने के बाद उस का सब से बड़ा चैलेंजर उस के कमरे में आया और दरवाजे से ही चिल्ला कर बोला, ‘‘अबे भूल जा अब फर्स्ट आने का सपना. खड़ा तो हो नहीं सकता, फर्स्ट कैसे आएगा?

फर्स्ट तो मैं ही आऊंगा.’’

यह खुली चुनौती गोपाल के दिल को स्वीकार नहीं हुई थी और उस ने भी अपनी दुर्बल, पर दृढ़ आवाज में जवाब दे दिया था,

‘‘अरे, जाजा. कुछ भी कर ले, गोल्ड मैडल तो मैं ही ले के रहूंगा.’’

इस के बाद तो गोपाल ने दिनरात एक कर दिया था. पढ़ना, समझना, नोट्स बनाना और उन्हें याद करना… लगता था कि इस के अलावा उस की जिंदगी में और कुछ बाकी नहीं बचा था. जैसे अर्जुन को केवल चिडि़या की आंख दिखती थी,

उसे केवल गोल्ड मैडल दिख रहा था. अब आजकल में ही रिजल्ट आने वाला था. गोपाल की मनोशक्ति जो हमेशा उस के साथ थी, आज उस का साथ छोड़ती लग रही थी.

चारपाई पर लेटेलेटे ही गोपाल को अपनी मां का खयाल आया. गांव के कच्चे घर में अभी क्या कर रही होगी भला? शायद मट्ठा बिलो रही होगी. वह तो कभी खाली नहीं बैठती है. और वही तो उस के पीछे हमेशा चट्टान की तरह खड़ी रही है, चाहे स्कूल हो या कालेज.

4 साल पहले जब गोपाल पढ़ाई करने यहां आना चाहता था, तो घर में सब ने उस का विरोध किया था, पर मां ने साफ कह दिया था, ‘‘यह आगे पढ़ना चाहता है, तो इसे जाने दो. पैसे की फिक्र मत करो. जैसे भी होगा, मैं संभाल लूंगी. मुझे बस एक बात पता है कि मेरा यह सब से छोटा बेटा एक दिन बहुत बड़ा अफसर बनेगा.’’

घर की पैसे की तंगी में इतना बड़ा फैसला लेना बड़ी बात थी, पर मां तो हमेशा बड़े फैसले लेने को मानो तैयार रहती थीं. गांव के मास्टरजी की एक भूल पकड़ लेने पर वे गोपाल को गांव के प्राथमिक विद्यालय से कैसे निकाल लाई थीं.

‘जिस मास्टर को इतना भी नहीं पता, वह बच्चों को क्या पढ़ाएगा,’ कह कर वे गोपाल को शहर के स्कूल में दाखिल करवा कर आ गई थीं और वहां उस के साथ जोकुछ हुआ था, आज भी तसवीर की तरह आंखों के आगे घूम जाता है.

राजकीय माध्यमिक विद्यालय, सहारनपुर में उस दिन बहुत सरगर्मी थी. नए सैशन का पहला दिन जो था. नए दाखिले हो चुके थे और बहुत सारे बच्चे आज पहली बार स्कूल आ रहे थे.

गोपाल भी आज पहली बार इस स्कूल में आया था. आज ही उसे यहां छठी जमात में दाखिला मिला था. शहर के इस स्कूल में उस का भी पहला दिन था. वह कितना डरा हुआ था. सहमा सा, सकुचाया सा, जब वह क्लास में पहुंचा, तो सब बच्चे शोर मचा रहे थे.

जैसे ही गोपाल ने क्लासरूम में कदम रखा, उसे देखते ही क्लास में बैठे सब छात्र एकदम चुप हो गए और उसे देखने लगे थे. उन की आंखों में हैरानी थी और उत्सुकता भी.

गोपाल की उम्र भी कम थी, मुश्किल से 11 साल का होगा. ऊपर से उस की कदकाठी भी छोटी थी. सांवला रंग और सिर पर मशीन से कटे हुए छोटेछोटे बाल, साथ ही सिर पर एक चोटी भी, जिसे उस ने जतन से बांध रखा था.

गोपाल के कानों में चांदी की बालियां थीं, जिन्हे गांव के सुनार काका ने यह कहते हुए प्यार से उसे पहना दिया था, ‘‘बेटा शहर में पढ़ने जा रहा है, मेरी बनाई मुरकियां तो पहन जा.’’

गोपाल के सूती कपड़े वैसे तो साफसुथरे थे, पर पता चल रहा था कि वह महंगे तो बिलकुल भी नहीं थे. उस के बालों के स्टाइल, पट्टू के पाजामे और कान में पड़ी मुरकियों से साफ पता लग रहा था कि वह गांव के किसी गरीब परिवार से आया है.

संभलसंभल कर कदम उठाता हुआ गोपाल धीरे से क्लास में घुसा था और सब से पीछे रखी एक खाली डैस्क पर बैठ गया था. सारे छात्र उसे लगातार घूर रहे थे.

जैसे ही गोपाल ने अपना बैग वहां रखा, एक मोटा सा गोरा लड़का उठा और उस की तरफ इशारा कर के जोर से बोला, ‘‘अरे भाई, किसी को पता है क्या कि यह कौन सा जानवर है?’’

दूसरे कोने से एक लड़के ने जवाब दिया,

‘‘चूहा है, चूहा.’’

पूरी क्लास जोर से हंस पड़ी थी.

अब एक तीसरा बोला, ‘‘अरे नहीं रे, यह तो पिद्दी चूहा है,’’ और सारे बच्चे जोरजोर से हंसने लगे थे. और गोपाल…? वह घबराया सा फर्श की ओर देखे जा रहा था.

अब एक और लड़का, जो शायद सब का नेता था, जोर से बोला, ‘‘अरे ओ चूहे, सामने आ और सब को बता कि तू कौन से बिल से आया है?’’

अब तो गोपाल की हालत और खराब हो गई थी.

‘‘अरे नहीं. कोई नामपता बताने की जरूरत नहीं है. यह तो एक डरा हुआ चूहा है, इस का हमारी क्लास में क्या काम है? चलो, इस की पूंछ पकड़ कर इसे बाहर फेंक देते हैं,’’ किसी ने गोपाल की चोटी की ओर इशारा करते हुए कहा.

तभी 2-3 मोटेतगड़े लड़के उस की चोटी खींचने के इरादे से उस की ओर बढ़ने लगे. क्लास के बाकी सब बच्चे तमाशा देख रहे थे और हंसहंस कर मजे ले रहे थे.

घर का चिराग: भाग 2- क्या बेटे और बेटी का फर्क समझ पाई नीता

‘‘बस, रहने दो. 2-4 औरतों के नौकरी करने से देश का विकास नहीं होता, न समाज का भला होता. नौकरी करने वाली स्त्रियों के घर बिगड़ जाते हैं. वे अपनी संतानों की ठीक से देखभाल नहीं कर पातीं. परिवार, समाज और देश के विकास व उन्नति के लिए लड़कों का सक्षम होना परम आवश्यक है. हमें बेटे की शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए. वही हमारे बुढ़ापे का सहारा है.’’ केशव बाबू ने कटाक्ष किया, ‘‘तभी तो हमारे सुपुत्र पढ़ाई में कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं. 3-3 डिगरियां लिए बैठे हैं और नौकरी हाथ नहीं आ रही है. डिगरी ले कर चाटेगा?’’

‘‘आप तो पता नहीं क्यों बेटे के खिलाफ रहते हैं. देख लेना, एक दिन वही हमारा नाम रोशन करेगा. मुझे तो डर है, बेटी बाहर जा कर हमारी नाक न कटवा दे?’’

‘‘वह तो पता नहीं कब हमारा नाम रोशन करेगा, परंतु तुम्हारी घटिया सोच के चलते मैं बेटी के जीवन को अंधकारमय नहीं बना सकता. बेटे के लिए तुम हमेशा अपनी मनमानी करती रही, परंतु बेटी के संबंध में तुम्हारी एक भी नहीं चलने दूंगा. वह जहां तक पढ़ना चाहेगी, मैं पढ़ाऊंगा,’’ केशव बाबू उत्तेजना में उठ कर खड़े हो गए.

‘‘बेटी के ऊपर पैसा बरबाद कर के एक दिन पछताओगे.’’

‘‘बेटे के ऊपर खर्चा कर के मैं कौन सा सुख भोग रहा हूं.’’ केशव बाबू की बात पर नीता इस तरह चीखनेचिल्लाने लगी, जैसे पति से नहीं, किसी और से कह रही हो, ‘‘अरे देखो तो इस भले आदमी को, कैसी अनहोनी की बातें कर रहा है, बेटे से ज्यादा इस को बेटी की पड़ी है. अपने घर में आग लगा कर कोई हाथ सेंकता है. मैं तो हार गई इस आदमी से. पता नहीं कैसे इतने दिनों तक झेलती रही. देख लेना, यह घर को बरबाद कर के रहेगा.’’ और वह झूठमूठ के आंसू बहाने लगी. ऊंची आवाज में चीखनाचिल्लाना और रोनाधोना, यही उस के सशक्त हथियार थे. ऊंची आवाज से वह अपने पति की आवाज को दबाती थी और आंसुओं से अपनी बात मनवाती थी. आज तक वह अपने इन्हीं 2 हथियारों का अनधिकृत प्रयोग करती आ रही थी. परंतु आज वे दोनों निरर्थक सिद्ध होने वाले थे.

इस बार केशव बाबू नीता की आवाज से थोड़ा दबे, परंतु उस के आंसुओं से पराजित नहीं हुए. उन्होंने ठान लिया कि इस बार नीता की बात नहीं मानेंगे. वे बाहर जाने के लिए मुड़े, तभी उन को नीता के अलावा किसी और की सिसकियों की आवाज सुनाई पड़ी. उन्होंने ध्यान नहीं दिया था, उन की बेटी अनिका वहीं पर खड़ी थी.

वे बेटी के पास गए, ‘‘तुम क्यों रो रही हो, बेटी?’’ उन्होंने पूछा.

अनिका की रुलाई और तेजी से फूट पड़ी. केशव बाबू ने किसी तरह उसे चुप कराया और बाहर के कमरे में ला कर पूछा, ‘‘अब बताओ, तुम्हें क्या दुख है?’’ ‘‘पापा, मेरी वजह से आप के और मम्मी के बीच झगड़ा हुआ, मैं आगे पढ़ाई नहीं करूंगी,’’ उस ने हताश स्वर में कहा. केशव बाबू एक पल के लिए हतप्रभ से खड़े रहे. फिर बेटी के सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘‘बेटा, तुम पढ़ाई करोगी. यह तुम्हारे भविष्य का ही सवाल नहीं है, मेरे आत्मसम्मान का भी सवाल है. तुम समझ रही हो न, तुम्हें कुछ बन कर दिखाना है. तुम्हें कुछ बना कर मैं दिखाना चाहता हूं कि बेटियां किसी से कम नहीं होतीं. बेटे ही नहीं, बेटियां भी मांबाप का नाम रोशन करती हैं.’’ अनिका समझ गई. बहुत पहले ही समझ गई थी. वह एक अच्छेभले, सुसंस्कृत और आर्थिक रूप से संपन्न परिवार में पैदा हुई थी, परंतु इस छोटे से घर में उस की सगी मां की सोच दकियानूसी और पुरातनपंथी थी. जब उस का बचपन जवान होने लगा था, तभी उस की समझ में आ गया था कि मां की नजरों में वह एक बोझ के समान है. उस का बड़ा भाई मां की आंखों का तारा है. हर पल वह पक्षपात का शिकार होती थी. गलती न होने पर भी उसे झिड़कियां, डांट और कभीकभी मार भी पड़ती थी, परंतु दूसरी तरफ भाई की बड़ी से बड़ी गलती पर भी उसे माफ कर दिया जाता था. खानपान, कपड़ेलत्ते में भी भाई को वरीयता दी जाती थी. मां की हठधर्मी से इस घर का माहौल हर पल विषाक्त बना रहता था.

मां के अनुचित व्यवहार से न केवल वह दुखी रहती थी, बल्कि केशव बाबू भी उदास और थकेथके से रहते थे. वह पापा का दर्द समझती थी, परंतु कुछ कर नहीं सकती थी. सभी दुखों और कष्टों से नजात पाने के लिए वह किताबों की दुनिया में खो गई. वह अपना ज्यादातर समय पढ़ने में बिताती, ताकि मां की खिटखिट से छुटकारा मिल जाए और पिता का उदास व थका चेहरा देख कर उस की उदासी और ज्यादा न बढ़े. पढ़ाई में उस की एकाग्रता के कारण ही वह अच्छे नंबरों से पास होती रही. केशव बाबू के लिए बेटी को उच्च शिक्षा दिलाना एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था. उन के प्रोत्साहन से अनिका ने लगन से तैयारी की और उस का एक अच्छे कालेज में दाखिला हो गया. केशव बाबू ने उसे होस्टल में डाल दिया, ताकि घर के माहौल से वह दूर रह कर मन से पढ़ाई कर सके. रोजरोज की बकझक और लड़ाईझगड़े से वह पढ़ाई में मन कैसे लगाती? इस बीच, पतिपत्नी के बीच कितने विवाद हुए, वाकयुद्ध हुए, कितने लिटर आंसू बहे, कितनी धमकियां दी गईं, इन सब का बयान करना बेमानी है. बस, इतना कहना पर्याप्त है कि दोनों तरफ से तलवारें खिंची थीं, परंतु कत्ल नहीं हो रहे थे. यही गनीमत थी. यह तनाव घर में काफी दिनों तक बना रहा, परंतु धीरेधीरे खत्म हो गया.

अनिका और उस के पापा के बीच रोज फोन पर बातें होती थीं. अनिका मां से भी बातें करती थी. पहले तो मां ऐंठी रहती थी, परंतु धीरेधीरे वह सामान्य हो गई. जिंदगी की ऊंचीनीची डगर पर सब लोग हिचकोले खाते हुए यों ही आगे बढ़ रहे थे. घर का माहौल कुछ दिनों से सहमासहमा और डरावना सा था. केशव बाबू ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वे अपनी नित्य क्रियाओं में व्यस्त रहते. औफिस जाते और घर पर आ कर पढ़ने में व्यस्त रहते. नीता वैसे भी उन से खिचींखिचीं रहती थी, इसलिए वे उस के किसी प्रसंग में दखल नहीं देते थे. दफ्तर से आ कर वे ड्राइंगरूम में बैठे ही थे कि नीता अपना तमतमाया हुआ चेहरा ले कर उन के सामने खड़ी हो गई. लगभग चीखते हुए बोली, ‘‘आप को पता है, इस घर में क्या हो रहा है?’’

केशव बाबू ने इस तरह सिर उठा कर नीता को देखा, जैसे कह रहे हों, ‘मुझे कैसे पता चलेगा. घर में तो तुम रहती हो,’ फिर उपेक्षित भाव से बोले, ‘‘बताओ?’’

‘‘विप्लव एक सप्ताह से घर नहीं आया है.’’

‘‘अच्छा, मुझे तो वह कभी घर में नहीं दिखता. तुम्हें पता होगा, वह कहां होगा? न पता हो, फोन कर के पूछ लो.’’

‘‘पूछा है, कहता है कि अपनी गर्लफ्रैंड के साथ रहने लगा है, लिवइन रिलेशनशिप में.’’ केशव बाबू एक पल के लिए हतप्रभ रह गए. फिर एक व्यंग्यात्मक मुसकान उन के चेहरे पर दौड़ गई, ‘‘खुशी की बात है, उस ने मांबाप को शादी के झंझट से बचा लिया. सोचो, लाखों रुपए की बचत हो गई. तुम बेटी की शादी का खर्च बचाना चाहती थी. तुम्हारे बेटे ने स्वयं की शादी का खर्च बचा दिया.’’ नीता धम्म से सोफे के दूसरे किनारे पर गिर सी पड़ी. वह केशव बाबू के पैरों की तरफ झुकती हुई बोली, ‘‘आप को मजाक सूझ रहा है और मेरी जान निकली जा रही है. वह न तो कोई नौकरी कर रहा है, न उस का एमबीए पूरा हुआ है. ऐसे में वह बरबाद हो जाएगा. वह लड़की उसे बरबाद कर देगी.’’

बुढ़ापे में जो दिल बारंबार खिसका-भाग 1

पार्क के ट्रैक पर जौगिंग कर रही नेहा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. यह तो माथुर अंकल ने मुझे आंख मारी, एक बार नहीं बल्कि 2 बार. पिछले हफ्ते ही तो घर पर आए थे, पापाजी से बात कर रहे थे. मैं चाय दे कर आई थी. शायद धोखा हुआ है, पर दोबारा घूम कर आई तो फिर वही हरकत. नहीं, वही हैं माथुर अंकल, बदतमीज इंसान, इन्हें तो नमस्ते भी नहीं करना. वह शिखा के साथ आगे बढ़ गई. ‘‘क्या हुआ अचानक तेरा मुंह क्यों उतर गया और बोलती बंद?’’ शिखा उस के चेहरे को ध्यान से देख रही थी.

‘‘अरे यार, देख रही है ब्लू स्ट्राइप्स की टीशर्ट में जो अंकल 3 बंदों के बीच बैठे हैं, उस ने बिना सिर घुमाए आंखों से इशारा किया था. वे हर राउंड पर मुझे आंख मारे जा रहे हैं और मेरे घुसते ही हाथ का इशारा कर के गाना गाने लगे ‘जरा हौलेहौले चलो मोरे साजना…’ शिट, फादर इन लौ के जानपहचान के हैं वरना इन्हें अच्छे से सबक सिखा देती अभी. पिछले हफ्ते घर आए थे.

मुझ से मिले भी थे. फिर भी ऐसी हरकत, न उम्र का लिहाज न रिश्ते की मर्यादा. मम्मीजी को बोलूंगी, वही बताएंगी इन्हें.’’ ‘‘तू अभी नई है न यहां. अरे, ये चारों बुड्ढ़े हैं ही ऐसे. सभी को आएदिन चेतावनी मिलती रहती है, पर जबतब ये किसी को छेड़ने से बाज नहीं आते. मजाल है कि सुधर जाएं. कभी चाट वाले के पास, तो कभी कहीं…रोजरोज कौन मुंह लगे इन के. लेने दो इन को मजा. तुझे नहीं पता, नई खोज है, वैज्ञानिक बता रहे हैं कि महिला को छेड़नाघूरना आदमी की सेहत के लिए अच्छा होता है, उम्र बढ़ती है. बीवी बूढ़ी होगी तो ठीक से करवाचौथ रख नहीं पाती होगी, सेंकने दो इन्हें आंखें, बढ़ा लेने दो उम्र, इस से ज्यादा कर भी क्या पाएंगे. यार, इग्नोर कर, बस,’’ यह कह कर शिखा हंसने लगी.

‘‘समझा लीजिए इन्हें रेवती बहन, पानी सिर से ऊपर जा रहा है, रामशरणजी तो बहूबेटियों पर भी छींटाकशी से बाज नहीं आ रहे. बुढ़ापे में मुफ्त जेल की सैर हो जाएगी. कैसे रहती हैं ऐसे घटिया, लीचड़ आदमी के साथ. आप की भी बहू आने वाली है, तब देखेंगे,’’ भन्नाई हुई पड़ोसिन लीला निगम धमकी दे कर चली गईं. रामशरण माथुर अपनी आदत से लाचार थे. 60 साल के होने के बावजूद वे सड़कछाप आशिक बने हुए थे. बुढ़ापे में भी यही उन का शगल था. 2 ही बच्चे थे उन के. बड़ी लड़की रानी और बेटा रणवीर छोटा था. उन की ऐसी ओछी बातें सुनते ही वे दोनों बड़े हुए थे. पहले तो पड़ोस की औरतों के लिए लवलैटर क्या, पूरा रजिस्टर लिख कर अपने ही बच्चों को पढ़ापढ़ा कर हंसते, तो कभी चुपके से खत उन के घर फेंक आने को कहते और दोस्तों के साथ मजे लेते.

रेवती उन की बुद्धि पर हैरानपरेशान होती, अपने बच्चों के साथ कोई पिता ऐसा कैसे कर सकता है. नादान बच्चे गलत रास्ते पर न चल पड़ें, आशंका से रेवती गुस्सा करती, मना करती तो लड़ने बैठ जाते, समझते वह दूसरी औरतों से जलन के मारे ऐसा कह रही है. उसे चिढ़ाने के लिए वे ऐसी हरकतें और करने लगते. मां कुछ कहे, बाप कुछ और सिखाए, तो बच्चों पर अलग प्रभाव पड़ना ही था. रानी ने रोधो कर किसी तरह बीए किया. वह अपनी शादी के लिए लालायित रहती. जल्दी से जल्दी घर बसा कर इस माहौल से दूर चले जाना चाहती थी. बाप की हरकतों से जबतब कालोनी, कालेज की सखीसहेलियों में उसे शर्मिंदगी झेलनी पड़ती. ‘पापाजी तो अभी अपने में ही रमे हुए हैं, मेरी शादी क्या खाक करेंगे,’ यह सोच कर उस ने फेसबुक पर किसी रईस से पींगें बढ़ाईं और उस से शादी कर सुदूर विदेश चली गई.

रेवती चाहती थी छोटा बेटा रणवीर भी शादी कर अपना घर बसा ले. उस का माहौल बदले और वह खुश रहे. पर वह शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था. ऐसे वातावरण में होता भी कैसे, घर की प्रतिष्ठा पर पिता ही कीचड़ उछाल रहा था. वह किसी बड़ी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर जौब करने लगा था. बढि़या कमा रहा था. सो, घर की सारी जिम्मेदारी बाप द्वारा उस पर डाल दी गई कि उस के ऊपर इतना खर्च हुआ है, अब वह नहीं करेगा तो क्या हम बूढ़े करेंगे. जवानी में खूब पैसे उड़ाए, कुछ बुढ़ापे के लिए न जोड़ा न छोड़ा, कि बेटा आखिर होता किसलिए है? पढ़ायालिखाया, खर्च किया किसलिए? रेवती क्या, निर्लज्ज से वे बेटे को भी उस पर खर्च हुआ जुड़ाने लग जाते.

रेवती को गुस्सा आता, तो कह उठती, ‘‘ऐसा भी कोई बाप होता है? बेटे के लिए लोग क्याक्या नहीं करते, कितना कुछ कर गुजरते हैं उन के सुंदर भविष्य के लिए. इस ने तो हर जगह अपने दम से ऐडमिशन लिया, शुरू से स्कौलरशिप से पढ़ाई की. तुम तो उसे खिलाया आलूगोभी, आटादाल भी जोड़ लो, छि, कैसे पिता हो.’’ अब तो बेटा ही घर का सारा खर्च उठा रहा था, फिर भी जबतब अलग से कभी चाटजलेबी खाने, तो कभी वाकिंग शू, शर्ट कुछ भी खरीदने के लिए रामशरण आतुर रहते और बिना झिझके रणवीर के सामने हाथ फैला देते. पत्नी रेवती इस तरह के व्यवहार से पहले ही बहुत शर्मिंदा रहती. अब जो लोगों से बहूबेटियों को छेड़ने की शिकायत सुनती तो जमीन में धंसती जाती. वह उन्हें समझासमझा कर थक गई. वे कुछ सुनने को राजी नहीं. उस पर से हंसते कहते, ‘जोर किस का, बुढ़ाने में जो दिल खिसका.’

इस बार अगर रणवीर के कानों में यह बात पड़ गई तो गुस्से और शर्मिंदगी में वह जाने क्या कर डाले. पिछली बार भी ऐसी ओछी हरकत से शर्मिंदा हो कर कितना फटकारा था बाप को और फिर तंग आ कर आखिरी चेतावनी भी दी थी कि अगर नहीं सुधरे, तो वह घर छोड़ कर चला जाएगा. ‘अच्छा है, रणवीर आज 8 बजे तक आएगा, तब तक शायद मामला ठंडा पड़ जाए,’ रेवती सोचने लगी.

औफिस से निकलते समय रणवीर एक बैंक के एटीएम में जा घुसा, उस का कार्ड ब्लौक हो गया. वह अंदर बैंक में गया तो ‘मे आई हैल्प यू’ सीट पर जयंति सिन्हा का साइन बोर्ड रखा था. सीट खाली थी. कुछ जानापहचाना सा नाम लग रहा है, वह यह सोच ही रहा था कि सीट वाली आ गई. ‘‘सर, मैं आप की क्या हैल्प कर सकती हूं,’’ जयंति ने कुछ पेपर टेबल पर रख कर सिर उठाया था.

दोनों एकदूसरे को देख कर आवाक रह गए. ‘मिस खुराफाती सिन्हा?’ वह मन ही मन बोल कर मुसकराया. इतने सालों बाद भी रणवीर 7वीं-8वीं क्लास में साथ पढ़ी जयंति को पहचान गया, ‘यही नाम तो रखा था उस के सहपाठियों ने इस का.’

‘‘अरे तुम, मास्टर रोंदूतोंदू, खुला बटन, बहती नाक, पढ़ाकू वीर,’’ वह थोड़ा झिझकी थी फिर फ्लो में बोल कर खिलखिला उठी, ‘‘वाउ, तोंद तो गायब हो गई है. ओहो, अब तो बड़े स्मार्ट हो गए हो, चमकता सूटबूटटाई, महंगी वाच…क्या बात है, क्या ठाठ हैं?’’ अगलबगल खड़े लोग भी सुन रहे थे, रणवीर झेंप गया. ‘‘तो अब मास्टर से मिस्टर शर्मीले बन गए हो, अच्छा छोड़ो ये सब, यार बताओ, किस काम से आना हुआ यहां. मैं पहले दूसरी ब्रांच में थी, अभी कल ही यहां जौइन किया है. अच्छा इत्तफाक है, जल्दी बोलो, ड्यूटी आवर खत्म होने को है, फिर बाहर निकल कर ढेर सारी बातें करेंगे,’’ वह मुसकराई.

जयंति ने फटाफट उस की समस्या का समाधान करवाया और उस के साथ बाहर निकल आई. ‘‘कोई घर पर इंतजार तो नहीं कर रहा होगा?’’ वह मुसकराई.

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं, अभी शादी नहीं की. मां को इंतजार रहता है, फोन कर देता हूं.’’ और वे दोनों कौम्प्लैक्स के हल्दीराम रैस्टोरैंट में आराम से बैठ गए. मां को तभी आज उस ने 8 बजे घर पहुंचने का टाइम बता दिया. दोनों बचपन के किस्सों में खो गए. फिर अब तक क्याक्या, कैसे किया वगैरह एकदूसरे से शेयर करते व हंसते बाहर निकल आए. रणवीर बहुत दिनों बाद इतना हंसा था.

जयंति अब भी वैसी ही मस्तमौला खुराफाती है. उस को उस का साथ बहुत भला लगा. ‘इतनी परेशानियां झेली… पिता का असमय अचानक देहांत, मां का कैंसर से निधन, भाई का ससुराल में घरजमाई बन कर चले जाना और जाने क्याक्या उस ने इतने दिनों में. पर अपने मस्तमौला स्वभाव पर कोई असर न आने दिया. यह सीखने वाली बात है,’ यह सोच कर वह हलका महसूस कर रहा था. उस दिन रणवीर को कुछ मालूम नहीं चलने पाया कि कोई पड़ोसी फिर पापा की शिकायत कर के गए हैं.

वह खाना खा कर सो गया और दूसरे दिन सुबह फिर औफिस चला गया. रेवती ने चैन की सांस ली. बेकार ही इन पर गुस्सा हो कर उलझता, और फिर बहुत बड़ा बखेड़ा हो जाता. घर बिखर जाए, इस से पहले मैं ही कुछ करती हूं. पिछली बार अपनी सहेली संध्या के दरोगा भतीजे ने इन पर विश्वास कर, भला जानते हुए इन्हें छेड़खानी के आरोप से छुड़ाया था. उसी से मदद लेती हूं. बिना शर्म के बताऊंगी कि ये ऐसे ही मस्तमिजाज हैं. लोग सही आरोप लगाते हैं. तू ही सुधार के लिए कुछ कर, यही ठीक रहेगा. यह सोचते हुए वह कुछ आश्वस्त हुई.

चौखट-भाग 1 : प्रेम को तरसती रेशमी

टैंपो कुलदीप के दरवाजे पर आ कर रुक गया था. उस में आलूप्याज और तरहतरह की हरी सब्जियां लदी थीं. दरवाजे की चौखट से पीठ टिकाए कुलदीप की बीवी रेशमी उस के इंतजार में बैठी थी.

कुलदीप टैंपो से उतर कर सब्जी मंडी से आई सब्जियों को दरवाजे के सामने की चौकी पर रखने लगा. इसी चौकी पर बेचने के लिए सब्जियां रखी जाती थीं. रेशमी भी सब्जियों की टोकरी उठा कर रखने लगी थी.

गली के नुक्कड़ पर कुलदीप की सब्जी की दुकान थी. यह दुकान उस ने अपने टूटेफूटे पुराने घर में ही खोल रखी थी. इसी दुकान की कमाई से

2 जनों का पेट भरता था. कुलदीप रोज सुबह सब्जी मंडी से सब्जी ला कर दुकान लगाता था. शाम तक सारी सब्जियां बिक जाती थीं.

कुलदीप की बीवी रेशमी गोरीचिट्टी और खूबसूरत थी. वह कदकाठी की मजबूत थी. उस की आंखें कजरारी थीं. उस का हुस्न लाजवाब था. उसे देखने के लिए दुकान पर ग्राहकों का आनाजाना लगा रहता था, जिस से दुकान की बिक्री और ज्यादा बढ़ जाती थी.

रेशमी की शादी 7-8 साल पहले कुलदीप से हुई थी. रेशमी को अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ था. कुलदीप

की बूढ़ी मां पोतेपोती की आस में ही मर गई थी.

रेशमी में कोई कमी नहीं थी. खोट तो कुलदीप में था. कुलदीप को शराब पीने की बुरी आदत थी. वह शाम में ठेके पर जा कर शराब पीता था. घर लौटते समय वह नशे में चूर हो जाता था. किसी तरह खाना खा कर वह बिछावन पर निढाल हो कर सो जाता था. रेशमी को करवटें बदलते रात बीत जाती थी. सुबह होते उस का हुस्न बासी फूल की तरह मुरझा जाता था.

कुलदीप ने दुकान में बैठेबैठे पुकारा, ‘‘रेशमी यहां आना तो…’’

‘‘क्यों, क्या बात है?’’ रेशमी ने कमरे से आ कर पूछा.

‘‘यह सब्जी की टोकरी खाली हो गई है. इसे रख दो. इस का माल बिक गया है,’’ कुलदीप ने कहा.

खाली टोकरी रेशमी ने उठा ली. वह खाली टोकरी को देख कर सोचने लगी, ‘कुलदीप भी तो इसी टोकरी की तरह खाली हो गया है. उस की मर्दानगी बची नहीं है. उस का माल बिक गया है.’

रेशमी जोर से हंसते हुए टोकरी ले कर चली गई. कुलदीप उस के हंसने का राज समझ नहीं सका.

देशी शराब की दुकान पर चहलपहल थी. कुलदीप अपने दोस्तों किशन, सूरज और अजय के साथ बैठा दारू पी रहा था. वहां एक ठेले पर चखना के लिए मछली फ्राई बिक रही थी.

दारू पीते किशन ने कुलदीप से कहा, ‘‘दारू पीने से थकान दूर होती है. नींद खूब बढि़या आती है.’’

कुलदीप यह सुन कर मुसकराया.

सूरज ने कहा, ‘‘यार कुलदीप, दारू पीने से मर्दानगी उफान मारती है. औरत को बिछावन पर मर्द पछाड़ देता है.’’

‘‘हांहां, दारू में जिंदगी का असली मजा है,’’ अजय ने कहा.

कुलदीप ने हंस कर कहा, ‘‘एकदम बकवास हैं तुम सब की बातें. मुझे तो दारू पीने की आदत है, इसलिए हर रोज छक कर दारू पीता हूं.’’

कुलदीप के दोस्त शराब पीने के बाद अपनेअपने रास्ते निकल गए.

कुलदीप नशे में झूमता हुआ घर पहुंचा, तो रेशमी घर की चौखट के पास बैठी उस का इंतजार कर रही थी.

‘‘आ गए न पी कर… इसे समझाना मुश्किल है. तू हर रोज घर की गाढ़ी कमाई बरबाद कर देता है,’’ आते ही रेशमी बड़बड़ाई.

‘‘अरे भई, कमाता हूं तो पीता हूं. इस में किसी के बाप का क्या जाता है,’’ कुलदीप ने बेहयाई से कहा.

रेशमी ने उसे नफरत से देखा. उसे लगा कि वह कुलदीप को एक झापड़ लगा दे, लेकिन वह गुस्सा पी कर रह गई. रेशमी ने भोजन की थाली कुलदीप के सामने ला कर रख दी.

कुलदीप ने किसी तरह खाना खाया. पेट में तो दारू भरी थी, रोटी के लिए जगह कहां बची थी.

रेशमी पलंग पर जा कर लेट गई. खाना खा कर कुलदीप भी साथ में लेट गया. उस के मुंह से दारू की बदबू आ रही थी.

दारू के नशे में कुलदीप रेशमी को बांहों में भर कर चूमने लगा. उस के उभारों को सहलाने लगा. रेशमी ने भी उसे जोर से बांहों में जकड़ लिया.

जिस्म की आग भड़क चुकी थी. कुलदीप सैक्स करने लगा, लेकिन वह गीले पटाखे की तरह फुस हो कर रह गया. वह तुरंत पस्त हो गया था. रेशमी प्यासी ही रह गई.

कुलदीप करवट बदल कर खर्राटे भरने लगा. रेशमी की रात यों ही तड़पते हुए बीत गई.

रेशमी सुबह में सब्जी की दुकान पर बैठी थी, तभी एक नौजवान दुकान पर आया.

‘‘क्या चाहिए बाबू? कौन सी सब्जी तौल कर दे दूं?’’ रेशमी ने कहा.

‘‘यहां कोई कमरा खाली है. मुझे किराए का एक कमरा चाहिए था,’’ उस नौजवान ने कहा.

रेशमी कुछ सोच कर बोली, ‘‘एक कमरा तो खाली है, लेकिन उस कमरे में कुछ फालतू सामान रखा है.’’

‘‘कमरा दिखा दो,’’ नौजवान ने कहा. रेशमी ने घर के अंदर ले जा कर उसे कमरा दिखा दिया.

‘‘इस का किराया?’’ उस नौजवान ने पूछा.

‘‘महीने का 800 रुपए,’’ रेशमी ने कहा.

वह नौजवान कमरा लेने को तैयार हो गया. उस का नाम धीरेन था.

धीरेन उस कमरे में आ कर रहने लगा. वह गठीला नौजवान था. अभी

उस की शादी नहीं हुई थी. वह गांव से शहर में कमाने आया था. वह फर्नीचर बनाने की एक दुकान पर बढ़ई का काम करता था.

रेशमी की जिंदगी में थोड़ा बदलाव आया. वह धीरेन के आने से खुश रहने लगी. वह कामकाज से फुरसत पा कर बननेसंवरने लगी, जिस से उस का रंगरूप और निखर उठा.

धीरेन शाम को काम पर से घर लौट आता. वह बाजार से नाश्ते का कोई आइटम खरीद लेता, जिसे रेशमी को भी वह खाने को देता.

एक दिन बाजार से घर आते ही धीरेन ने रेशमी को पुकारा, ‘‘समोसे लाया हूं. आ कर जल्दी से खा लो.’’

रेशमी कमरे से बाहर चली आई. ‘‘अरे वाह, समोसे गरम हैं,’’ कह कर रेशमी समोसे खाने लगी.

धीरेधीरे दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगीं. धीरेन घर के छोटेमोटे काम भी निबटाने लगा, जिस से रेशमी को दुकान चलाने में सहूलियत होने लगी.

एक दिन कुलदीप घर पर नहीं था. रेशमी हरे रंग की नई साड़ी के साथ मैच खाता ब्लाउज पहने हुए थी. वह इस साड़ी में खूब जंच रही थी.

धीरेन आज जल्द घर आ गया. रेशमी बनसंवर कर उस के कमरे के पास जा कर खड़ी हो गई. धीरेन उसे देख कर मुसकराया, ‘‘रेशमी, तुम भोजपुरी फिल्म की हीरोइन लग रही हो.’’

‘‘तुम भी किसी हीरो से कम नहीं लगते हो,’’ रेशमी ने नशीली आवाज में कहा.

शह पा कर धीरेन ने रेशमी को बांहों में भर कर चूम लिया. वह भी उस से लिपट गई. दोनों एकदूसरे को चूमने लगे. वह रेशमी के उभारों को सहलाने लगा.

जिस्म की आग भड़क चुकी थी. दोनों कमरे की चौकी पर लेट गए. धीरेन सैक्स करने लगा. रेशमी उस का भरपूर साथ देने लगी. जिस्म की भूख जब शांत हुई, तब दोनों एकदूसरे से अलग हुए.

एक दिन कुलदीप दुकान पर ग्राहकों से मोलभाव कर सब्जियां बेच रहा था. रेशमी ने घरेलू काम से फुरसत पा ली थी. वह कमरे में बैठी पुराने दिनों के बारे में सोच रही थी.

अम्मा कहती थीं कि लड़कियों को घर की दहलीज नहीं लांघनी चाहिए. घर के बाहर लड़कियां महफूज नहीं होतीं. उन्हें हर हाल में अपनी आबरू बचा कर रखनी चाहिए.

पर जब मरद नकारा मिले तो औरत को आबरू की नकाब उतारनी एक मजबूरी होती है. आखिर कब तक आबरू की नकाब ओढ़े रहेगी. वह नकाब तो हटानी पड़ती है. रेशमी की इस सोच ने अपनी मंजिल पा ली थी.

जीवन की नई शुरुआत – भाग 1 : कोरोना का साइड इफैक्ट

‘‘अ रे रे रे, कोई रोको उसे, मर जाएगा वो,’’ अचानक से आधी रात को शोर सुन कर सारे लोग जाग गए और जो देखा, देख कर वे भी चीख पड़े. जल्दी से उसे वहां से खींच कर नीचे उतारा गया, वरना जाने क्या अनर्थ हो गया होता.

यह तीसरी बार था जब रघु अपनी जान देने की कोशिश कर रहा था. लेकिन इस बार भी उसे किसी ने बचा लिया, वरना अब तक तो वह मर गया होता.

क्वारंटीन सैंटर का निरीक्षण करने पहुंचे डीएम यानी जिलाधिकारी को जब रघु की आत्महत्या करने की बात पता चली और यह भी कि वह न तो ठीक से खातापीता है और न ही किसी से बात करता है. वह खुद में ही गुमसुम रहता है. कुछ पूछने पर वह अपने घर जाने की बात कह रो पड़ता है, तो डीएम को भी फिक्र होने लगी कि अगर इस लड़के ने क्वारंटीन सैंटर में कुछ कर लिया तो बहुत बुरा होगा.

जिलाधिकारी ने वहां रह रहे एकांतवासियों से पूछा कि उन्हें दिया जा रहा भोजन गुणवत्तायुक्त है या नहीं? हाथ धोने के लिए साबुन, मास्क, तौलिया आदि की व्यवस्था के बारे में भी जानकारी ली, फिर वहां की देखभाल करने वाले केयरटेकर को खूब फटकार लगाई कि वह करता क्या है? एक इंसान आत्महत्या करने की क्यों कोशिश कर रहा है, उसे जानना नहीं चाहिए?

‘‘फांसी लगाने की कोशिश कर रहे थे, पर क्यों?’’ उस जिलाधिकारी ने जब रघु के समीप जा कर पूछा, तो भरभरा कर उस की आंखें बरस पड़ीं.

‘‘कोई तकलीफ है यहां? बोलो न, मरना क्यों चाहते हो? अपने परिवार के पास नहीं जाना है?’’ जब जिलाधिकारी मनोज दुबे ने कहा, तो सिसकियां लेते हुए रघु कहने लगा, ‘‘जाना है साहब, कब से कह रहा हूं मु?ो मेरे घर जाने दो, पर कोई मेरी सुनता ही नहीं.’’

कहते हुए रघु फिर सिसकियां लेते हुए रो पड़ा तो जिलाधिकारी मनोज को उस पर दया आ गई.

‘‘हां, तो चले जाना, इस में कौन सी बड़ी बात है, बल्कि यहां कोई रहने नहीं आया है. अवधि पूरी होगी, सभी को भेज दिया जाएगा अपनेअपने घर. बताओ, और कोई बात है? यहां किसी चीज की समस्या हो रही है?’’

‘‘नहीं… लेकिन, मेरे मांबाप बूढ़े और बीमार हैं, उन्हें मेरी जरूरत है,’’ कहते हुए रघु का गला भर्रा गया. लेकिन जिलाधिकारी को लग रहा था कि बात कुछ और भी है, जो रघु को खाए जा रही है.

अपने घरपरिवार से दूर क्वारंटीन सैंटर में 15-20 दिनों से रह रहे रघु पर मानसिक दबाव बढ़ने लगा था. वह रात को उठ कर यहांवहां घूमने लगता और अजीब सी हरकतें करता था. कभी वह क्वारंटीन सैंटर की ऊंची दीवार को नापता, तो कभी बड़े से लंबे दरवाजे को आंखें गड़ा कर देखता. कई बार तो वह पेड़ पर चढ़ जाता, ताकि वहां से फांद कर दीवार पार कर सके, पर कामयाब नहीं हो पाता.

रघु की इस हरकत पर उसे फटकार भी पड़ी थी. लेकिन उस का कहना था कि उसे घर जाना है. अब उस के सब्र का बांध टूटने लगा है. उस ने कई बार मरने की भी धमकी दी थी कि अगर उसे उस के घर नहीं जाने दिया गया तो वह अपनी जान दे देगा. लेकिन कौन सुनने वाला था यहां उस की? सब उसे ‘पागल बताते’ कह कर चुप करा देते और हंसते. जैसे सच में वह कोई पागल हो. लेकिन वह पागल नहीं था. यह बात कैसे सम?ाए सब को कि उसे यहां से जाना है, नहीं तो सब खत्म हो जाएगा.

जिलाधिकारी मनोज के पूछने पर रघु कहने लगा, ‘‘साहब, अच्छीखासी खुशहाल जिंदगी चल रही थी हमारी. किसी चीज की कमी नहीं थी. पर इस कोरोना ने एक ?ाटके में सब बरबाद कर दिया साहब, कुछ नहीं बचा, कुछ नहीं, न ही नौकरी और न ही मेरा प्यार…’’

बोलतेबोलते रघु की हिचकियां बंध गईं और वह बिलख कर रोने लगा, ‘‘साहब, हम गरीबों का तो समय ही खराब है, वरना क्या दालरोटी पर भी मार पड़ जाती? अच्छीखासी जिंदगी चल रही थी हमारी. मेहनतमजदूरी कर के खुश थे हम. लेकिन सब मटियामेट हो गया.’’

अपने आंसू पोंछते हुए रघु बताने लगा कि अभी 2 साल पहले ही वह अपने गांव सिवान से गुजरात आया था. वह यहां मिस्त्री का काम करता था, जिस से उस की अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. अपने मांबाप के पास घर भी पैसे भेजता था. लेकिन अब क्या करेगा, समझ नहीं आ रहा है.

बताने लगा कि वह यहां अहमदाबाद में एक कमरे का घर ले कर रह रहा था. सोचा था कि मांबाप को भी ले आएगा, सब साथ मिल कर रहेंगे. लेकिन जिंदगी में ऐसी उथलपुथल मच जाएगी, नहीं सोचा था.

रघु हमेशा खुश रहने वाला, हंस कर बोलने वाला इंसान था और यही बात मुन्नी को, जो उस की ही बस्ती में रहती

थी और नेपाल से थी, उस के करीब लाती थी.

रघु का साथ मुन्नी को खूब भाता था. उस के पिता बड़े बाजार से थोकभाव में सब्जीफल ला कर बाजार में बेचते थे. उसी से उन के 8 जनों का परिवार का खर्चा चलता था. मुन्नी भी दोचार घरों में

झाड़ बरतन कर के कुछ पैसे कमा लेती थी. मगर रघु को मुन्नी का दूसरे के घरों में

?ाड़ ूबरतन करना जरा भी अच्छा नहीं लगता था. उसे जब कोई गंदी नजरों से घूरता, तो रघु की आंखों में खून उतर आता. मन करता उस का कि जान ही ले ले उस की. कितनी बार उस ने मुन्नी से कहा कि छोड़ दे वह लोगों के घरों में काम करना. पर मुन्नी उस की बात को यह कह कर टाल दिया करती कि उसे क्यों बुरा लगता है? कौन लगती है वह उस की?

वैसे तो मुन्नी को भी दूसरे के घरों

में ?ाड़ ूबरतन करना अच्छा नहीं लगता था, मगर क्या करे वह भी? अब 8-8 जनों का पेट एक की कमाई से थोड़े ही भर सकता था. कितनी बार लोगों की भेदती नजरों का वह निशाना बनी है. जिन घरों में वह काम करती है, वहां के मर्द ही उस पर गंदी नजर रखते हैं.

कहते तो बेटीबहन समान है, पर गलत इरादों से यहांवहां छेड़ देते हैं. देखने की कोशिश करते हैं कि लड़की कैसी है? लेकिन मुन्नी उस टाइप की लड़की थी ही नहीं. वह तो अपने काम से मतलब रखती थी. गरीबों के पास एक इज्जत ही तो होती है, वही चली जाए तो मरने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता है. कुछ बोल भी नहीं सकती थी, अगर आवाज उठाती तो उलटे मुंह गिरती. सो, बच कर रहने में ही अपनी भलाई सम?ाती थी.

गलती मुन्नी के मांबाप की भी कम नहीं थी. एक बेटे की खातिर पहले तो धड़ाधड़

5 बेटियां पैदा कर लीं और अब उसी बेटी को दूसरेतीसरे घरों में काम करने भेजने लगे, ताकि पैसे की कमाई होती रहे.

चूंकि मुन्नी घर में सब से बड़ी थी, इसलिए छोटे भाईबहनों की जिम्मेदारी भी उस के ऊपर ही थी. बेचारी दिनभर चक्करघिन्नी की तरह पिसती रहती, फिर भी मां से गालियां पड़तीं कि ‘करमजली, कहां गुलछर्रे उड़ाती फिरती है पूरे दिन.’

इधर मुन्नी को देखदेख कर रघु का कलेजा दुखता रहता, क्योंकि प्यार जो करने लगा था वह उस से. अपने काम से वापस आ कर हर रोज वह घर के बाहर खटिया लगा कर बैठ जाता और मुन्नी को निहारता रहता था. लेकिन आज कहीं भी उसे मुन्नी नहीं दिख रही थी, सो हैरानपरेशान सा वह इधरउधर देख ही रहा था कि उस के सिर पर आ कर कुछ गिरा. देखा, तो पेड़ पर चढ़ी मुन्नी उस के सिर पर पत्ता तोड़तोड़ कर फेंक रही थी.

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