Funny Story In Hindi: रिश्वत का ऐक्सक्लूसिव कोड

Funny Story In Hindi: हे मेरे शहर की सेम पदों पर सेम काम की फाइल खुलवाने, निकलवाने की मनमरजी की रिश्वत लेने वालों से परेशान रिश्वत खिलाने को मजबूर आत्माओ, तुम्हें यह जान कर खुशी नहीं, हद से ज्यादा खुशी होगी कि जनाब ने शहर के ढाबों में चाय, परांठों, लंच, कच्चे, उबले अंडों के रेटों को ले कर ऐक्सक्लूसिव कोड जारी करने के बाद अब शहर के तमाम औफिसों में रिश्वत प्रोटोकाल में चल रही गड़बड़ी को ले कर बड़ी सर्जरी की है.

छोटीमोटी सर्जरी तो वे अकसर करते रहते हैं, पर यह सर्जरी असल में रिश्वत लेने वालों की नहीं होती, रिश्वत देने वालों की ही होती रही है. रिश्वत कोड लागू होने के बाद भी शहर के तमाम महकमों में एक से काम की अलगअलग दर के हिसाब से रिश्वत लेने पर जनाब को आ रही जनता की शिकायतों की अलगअलग प्रैक्टिस से तंग आ कर जनाब ने आखिर भ्रम के हालात अपने कठोर फैसले के बाद साफ कर दिए हैं.

जनाब मानते हैं कि उन के औफिसों में काम करवाने के बदले रिश्वत देने का कोड नहीं, ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड जारी किया है, ताकि जनता औफिसों के स्वच्छ प्रशासन के नारे के धोखे में रह कर धक्के खातेखाते परेशान न हो.

जनाब द्वारा अब पूरे शहर के औफिसों में सेम तरह के काम करवाने के सब महकमों में दाम तय कर दिए गए हैं. अब हर महकमे में किस तरह की फाइल के कितने रुपए रिश्वत में लिए दिए जाएंगे, जनाब द्वारा यह फिक्स कर दिया गया है.

जनाब की ओर से जारी हुए ताजा आदेशों में जनाब ने साफ कर दिया है कि अब छोटा बाबू, बड़ा बाबू या कोई और काबिल अफसर किसी काम के अपनी मरजी से किसी से रिश्वत नहीं वसूल कर पाएगा.

ऐक्सक्लूसिव रिश्वत प्रोटोकाल के तहत अब हर महकमे में एकसमान रिश्वत कोड होगा और वही हर मुलाजिम के लिए लास्ट कोड माना जाएगा. जनाब ने यह फैसला जनहित में जनता द्वारा रिश्वत देने की हड़बड़ी से निकालने के लिए लिया है.

गौर हो, पहले के रिश्वत प्रोटोकाल में रिश्वत लेने की असमानता, गलतफहमियों और जनता की नाराजगियों के मामले लगातार जनाब के सामने आ रहे थे, जिस के चलते जनाब को हालात हाथ में लेते हुए यह कठोर कदम उठा कर उस में दखल देने को न चाहते हुए भी मजबूर होना पड़ा.

पिछले कुछ समय से शहर के दफ्तरों में आम देखा जा रहा था कि किसी महकमे में एक ही टाइप की फाइल को निकलवाने के इतने तो दूसरे महकमे में उसी तरह की फाइल को निकलवाने के जनता से दोगुने पैसे वसूले जा रहे थे. ऐसे में रिश्वत लेने और रिश्वत देने वाले दोनों ही अपने अपने को असहज महसूस कर रहे थे.

इस सिलसिले में रिश्वत देने वालों का कहना था कि औफिसों में काम के बदले रिश्वत देना तो ठीक है, पर सभी औफिसों में एक से काम होने के बाद भी रिश्वत कोड में समानता क्यों नहीं, जबकि संविधान में सब को समानता का अधिकार है? ऐसे में हर जगह सेम काम का रिश्वत प्रोटोकाल अलगअलग क्यों?

इसी के बाद जनाब ने महसूस किया कि असल में रिश्वत के पुराने जनाब ने जो नियम तय किए थे, वे क्लियर होते हुए भी क्लियर नहीं थे. उन में संशोधन इतने हुए थे कि न रिश्वत देने वाला उन नियमों को समझ पा रहा था, न रिश्वत लेने वाला समझ पा रहा था कि रिश्वत लेनेदेने का नियम है तो सही, पर लास्ट नियम क्या है?

और उस से भी ज्यादा यह कि रिश्वत के प्राटोकाल जैसे सैंसेटिव मामले में समानता के न होने के चलते जनाब के औफिसों की कोई इमेज न होने के बाद उस की इमेज को नुकसान हो रहा था, इसलिए जनाब ने पुराने रिश्वत लेने के सारे नियमों को रद्द करते हुए ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड बनाने की सोची, ताकि अब उन के औफिसों की इमेज और खराब न हो, उन के वर्करों की इमेज तो उसी दिन खराब हो जाती है, जिस दिन जनता उन के पास अपने काम करवाने जेब पकड़े आती है.

जनाब मानते हैं कि कुछ वीवीआईपी मामलों में रिश्वत लेनेदेने के अलग नियम हो सकते हैं, पर इस का मतलब यह नहीं हो जाता कि ये नियम सब जगह लागू हों और इन का मनमाना गलत इस्तेमाल किया जाए.

बाकी नियमों की तरह समाज में रिश्वत के नियमों में भी नियम बने रहने से समाज में अफरातफरी के माहौल से बचा जा सकता है, इसलिए जनाब ऐक्सक्लूसिव कोड औफ रिश्वत के जरीए नए सिरे से सब के लिए कुरसी के हिसाब से रिश्वत लेना तय कर रहे हैं, ताकि पद के हिसाब से रिश्वत लेने में समानता बने.

जनाब का यह भी मानना है कि और जगह कंफ्यूजन होता हो तो होता रहे, पर इस ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड के लागू हो जाने के बाद से रिश्वत लेनेदेने में किसी तरह का कोई कंफ्यूजन नहीं रहेगा.

बड़े अफसरों से ले कर चपरासी तक को ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड के हिसाब से ही रिश्वत लेनी होगी. उस से आगे दाता जो मुलाजिम को अपनी खुशी के हिसाब से दे, उस की इच्छा.

ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड लागू हो जाने के बाद भी जो किसी मुलाजिम ने ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड का पालन नहीं किया और जनता ने किसी की शिकायत उन से की तो वे रिश्वतनिष्ठ मुलाजिम को ले कर इतने सख्त होंगे कि… ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड का पालन न करने पर उस का पक्ष सुने बिना मजे से उसे बरखास्त तक किया जा सकेगा.

जनाब मानते हैं कि कायदे से वैसे तो रिश्वत लेने के बाद जनता का काम पहली बार में ही हो जाना चाहिए, पर जो किसी वजह से वह काम करवाने को रिश्वत देने के बाद भी जो किसी कानूनी रुकावट के चलते दोबारा जनता को औफिस में विजिट करना जरूरी हो, तो अब से काम करवाने वाले से हर बार ऐक्स्ट्रा रिश्वत नहीं ली जाएगी.

जनाब जनहित में ऐक्सक्लूसिव रिश्वत कोड इसलिए भी ला रहे हैं, ताकि जनता की जेब पर रिश्वत देने का ऐक्स्ट्रा भार न पड़े, क्योंकि जनता पहले ही बहुत से ऐक्स्ट्रा भारों से दबी हुई है. और जगह ट्रांसपेरेंसी, इज्जत बची हो या नहीं, पर रिश्वत लेने ओर देने में इज्जत और ट्रांसपेरेंसी बची रहे. Funny Story In Hindi

Haryana Politics: गरीब की थाली से गायब हुआ बाजरा

Haryana Politics: हरियाणा सरकार के बाजरे के भंडार खाली पड़े हैं. लिहाजा, इस सीजन में बीपीएल कार्ड धारकों को राशन में गेहूं के साथ बाजरा नहीं मिलेगा. हरियाणा सरकार की ओर से दिसंबर महीने के लिए जारी स्टौक में बाजरे को शामिल नहीं किया गया है. पहले दिसंबर से फरवरी तक राशनकार्ड धारकों को 5 किलो अनाज में 2 किलो मोटा अनाज और 3 किलो गेहूं मिलता था.

साथ में चीनी और सरसों का तेल भी मिलता था. बाजरा नहीं मिलने की वजह अफसर बता रहे हैं कि सरकार ने बाजरे की खरीद नहीं की है. बारिश होने की वजह से बाजरे की फसल खराब हो गई और सरकार चाह कर भी बाजरे की खरीद नहीं कर पाई. ऐसे में बीपीएल परिवारों को बाजरा बाजार से खरीदना पड़ेगा. सरकार की ओर से उस की भरपाई के लिए गेहूं दिया जाएगा. Haryana Politics

Sexual Blackmailing: प्रोफैसर का बनाया न्यूड वीडियो

Sexual Blackmailing: छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले में कुछ लोगों ने एक प्रोफैसर को धोखे से अगवा कर उस का न्यूड वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दी. इतना ही नहीं, उन्होंने प्रोफैसर से 25 लाख रुपए की फिरौती भी मांगी. खास बात यह है कि इस कांड में ब्लैकमेलिंग गैंग का मास्टरमाइंड सीएफ का एक जवान भी निकला.

लूटपाट, अपहरण और फिरौती के इस मामले में पुलिस ने 4 आरोपियों पर बीएनएस की धारा 140(2), 308(2), 309(6), 61(2) के तहत केस दर्ज कर जेल भेज दिया. पकड़े गए इन आरोपियों में करन दिनकर, अरुण मनहर, श्यामजी सिन्हा, कार्तिकेश्वर रात्रे शामिल रहे. वहीं नाबालिग को बाल सुधारगृह में भेज दिया गया. ड्यूटी से गैरहाजिर चल रहे गैंग सरगना सीएफ जवान के पास पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल की गई एक बाइक और 5 मोबाइल फोन भी जब्त किए. Sexual Blackmailing

Best Hindi Story: गांव से बौलीवुड का सफर

Best Hindi Story, लेखिका – नीलम झा

रानी एक छोटे से गांव की साधारण लड़की थी, जिस के भीतर असाधारण सपने पलते थे. उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में बसे रामपुर गांव में उस का जन्म हुआ था. पिता किसान थे, जो खेतों में दिनरात मेहनत कर के अपनी जमीन और बच्चों को सींचते थे.

पिता की हथेली पर उकेरी मेहनत की रेखाएं रानी के लिए संघर्ष की पहली पाठशाला थीं. मां घर संभालती थीं, बच्चों को पढ़ाती थीं और गांव की औरतों के साथ हलकीफुलकी गपशप कर के जिंदगी को आसान बनाती थीं.

रानी को पढ़ाई का जुनून था, लेकिन गांव की सामाजिक और भौगोलिक सीमाएं उसे बांधे रखती थीं. स्कूल खत्म होते ही वह घर के कामों में हाथ बंटाती, गायों को चारा डालती और भाईबहनों की देखभाल करती.

उस की रातें सपनों में बीतती थीं. ऐसे सपने जो बौलीवुड की नकली चमक से भरे थे, जहां हीरोइनें स्क्रीन पर राज करती थीं और रानी उस चमक को असली मानती थी.

एक शाम, जब रानी किताबों में खोई थी, मां ने उस के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘रानी, ये सपने देखना छोड़ दे. गांव में ही बस जा, शादी कर ले. यही तेरी किस्मत है मेरी बच्ची.’’

रानी ने मुसकराते हुए मां की ओर देखा. उस की आंखों में गांव की मिट्टी से निकली एक अजीब सी जिद थी, जो आसमान छूने को बेताब थी.

‘‘मां, मैं शहर जाऊंगी. कुछ बनूंगी, नाम कमाऊंगी और आप को गर्व महसूस कराऊंगी,’’ रानी ने कहा.
स्कूल खत्म होते ही रानी ने अपना अटूट फैसला लिया. मुंबई, वहां का नाम सुनते ही उस का दिल उत्साह से धड़क उठता. उस ने ट्यूशन पढ़ा कर, घर के काम कर के पाईपाई जोड़ी. जब उस ने ट्रेन का टिकट लिया, तो गांव वालों ने ताने मारे, उन की आवाजें उस के कानों में जहर घोल रही थीं, ‘पागल है यह लड़की.

शहर खा जाएगा इसे. लड़की अकेली क्या करेगी वहां? कोई इज्जत नहीं बचेगी…’

लेकिन रानी नहीं रुकी. बैग में कपड़े, कुछ पैसे और असीम सपने ले कर वह मुंबई पहुंची. उस की आंखें फटी की फटी रह गईं… ऊंची इमारतें, हुजूम, स्टूडियो की चमकदमक. उस का संघर्ष तुरंत शुरू हो गया.

ऐक्स्ट्रा रोल्स करना, चाय सर्व करना, आडिशन के पीछे भूखे पेट भागना और रातें एक छोटे से रूम में संघर्षरत साथी लड़कियों के साथ गुजारना. यह उस की कठोर दिनचर्या बन गई, जिस ने उस की इच्छाशक्ति को और मजबूत किया है.

एक सीनियर ऐक्ट्रैस ने एक रात उसे हिम्मत देते हुए कहा, ‘‘तुम्हें कभी हार नहीं माननी है रानी. यहां टूटना आसान है, क्योंकि अकेलापन बहुत है.’’

रानी ने मजबूती से सिर हिलाया, ‘‘जी, मैं हार नहीं मानूंगी. मैं गांव की लड़की हूं, मैं ने सिर्फ संघर्ष देखा है, हारना नहीं आता मुझे.’’

दिन बीतते गए, महीने गुजरते गए. एक दिन रानी को एक फिल्म ‘देस विदआउट बौर्डर्स’ के आडिशन में छोटा सा चांस मिला. डायरैक्टर ने उस की मासूमियत और ऐक्टिंग की भूख को पहचाना. रोल मिल गया.

फिल्म रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर हिट हो गई. रानी रातोंरात स्टार बन गई. गांव में जश्न मनाया गया.

मां ने फोन पर रोते हुए कहा, ‘‘बेटी, तू ने कर दिखाया. तू ने मेरी आंखों में खुशी के आंसू ला दिए.’’

अब रानी का नाम था, शोहरत थी. उस ने एक के बाद एक कामयाब फिल्में दीं… ‘हार्टबीट’, ‘फ्लेम्स औफ लव’, ‘पल्स’. उस ने हर रोल में जान डाल दी. फैंस पागल थे, मीडिया उस के पीछे लगा था. लेकिन उस का दिल कहीं और था, सपनों के बीच प्यार की तलाश में.

2003 का साल था. मुंबई की एक भव्य पार्टी में रानी पहुंची. वहीं उस की मुलाकात विक्रम सिंह से हुई, जो लौन टैनिस का नैशनल चैंपियन और एक चमकता सितारा था. लंबा कद और एक दिलकश मुसकान जो किसी का भी दिल चुरा ले.

विक्रम ने सीधे रानी को देखा और कहा, ‘‘हाय, आप रानी हैं न? ‘देस विदआउट बौर्डर्स’ देखी. कमाल की अदाकारा.’’

रानी शरमाई, अपनी गांव की जड़ों को याद करते हुए, फिर बोली, ‘‘थैंक यू. आप विक्रम सिंह? मैं ने आप के बारे में बहुत सुना है.’’

‘‘हां. टैनिस खेलता हूं. लेकिन आप की फिल्में भी देखता हूं, मैं आप का फैन हूं.’’

बात बढ़ी. डिनर डेट्स हुईं, मीडिया ने फोटोज खींचे. ‘बौलीवुड स्टार और टेनिस हीरो का रोमांस’, यह हैडलाइन हर पत्रिका पर छाई थी. रानी खुश थी. विक्रम का साथ उसे अच्छा लगता था. उस की स्पोर्ट्स वर्ल्ड और रानी की फिल्मी दुनिया, यह एक शानदार जोड़ी लगती थी.

विक्रम ने एक शाम समंदर किनारे कहा, ‘‘रानी, तुम्हारे साथ समय बिताना बहुत मजा आता है. तुम लाइमलाइट में हो कर भी बहुत सच्ची हो.’’

रानी ने विक्रम का हाथ थामा. ‘‘मुझे भी लेकिन हमारा फ्यूचर क्या है विक्रम? तुम शादी के लिए तैयार हो?’’

विक्रम चुप रहा. यह चुप्पी कई महीनों तक चली. रोमांस चलता रहा, लेकिन शादी की बात नहीं हुई. विक्रम का कैरियर, ट्रेनिंग, टूर्नामैंट्स सब प्राथमिकता में थे.

रानी इंतजार करती रही, उस के दिल में असुरक्षा घर करने लगी. साल 2006 तक यह रिश्ता चला, फिर अचानक ब्रेकअप हुआ. मीडिया में खबरें फैलीं ‘रानी और विक्रम अलग हो गए?’

रानी ने कुछ नहीं कहा. उस का दिल टूटा, लेकिन वह मजबूत बनी रही, प्रोफैशनल मुखौटा लगाए रखा.
फिर रानी की मुलाकात हुई अर्जुन मेहरा से, एक शांत, कामयाब आर्किटैक्ट. वह कोलकाता का लड़का था, जिस ने अपने दम पर ‘मेहरा डिजाइंस’ फर्म खड़ी की थी. अर्जुन शांत था और लाइमलाइट से दूर रहता था.

एक कौमन फ्रैंड की पार्टी में उन की मुलाकात हुई, ‘‘हाय, मैं अर्जुन. आप की फिल्में पसंद हैं.’’

रानी मुसकराई. ‘‘थैंक यू. आप क्या करते हैं?’’

‘‘आर्किटैक्ट. बिल्डिंग्स डिजाइन करता हूं. मैं शोरगुल से दूर रहना पसंद करता हूं.’’

बातें हुईं. अर्जुन की सादगी रानी को भा गई. विक्रम के तूफान के बाद यह शांति उसे ठहराव का वादा लगी. डेट्स शुरू हुईं, ट्रिप्स लगे. अर्जुन ने 3 महीने बाद प्रपोज किया, ‘‘रानी, मुझ से शादी करोगी? मैं तुम्हें खुश रखूंगा.’’

रानी ने सोचा. उस का दिल अब अस्थायी चमक नहीं, बल्कि हमेशा का सुकून चाहता था. उस ने हां कहा.
19 मार्च 2006, रानी 33 की उम्र में अर्जुन से शादी के बंधन में बंधी. गांवभर में खुशी थी.

मां ने कहा, ‘‘बेटी, अब बस. तेरा घर बस गया और यही जरूरी है.’’

शादी के बाद रानी की जिंदगी बदल गई. उस ने फिल्में कम कीं. फैमिली फर्स्ट. अर्जुन का साथ, घर की शांति. 2007 में खुशी दोगुनी हुई, बेटी हुई आर्या मेहरा. रानी आर्या को गोद में ले कर रो दी, ‘‘मेरी जान. तू मेरा ग्लो है, मेरी सब से बड़ी कामयाबी.’’

अर्जुन ने रानी को गले लगाया, ‘‘हमारा परिवार पूरा हो गया रानी.’’

रानी ने कहा, ‘‘हां, अब सब ठीक है. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

पहले साल सुहाने थे. घर में शांति, आर्या की नन्ही हंसी. रानी मां बनी, फिल्मों से ब्रेक. लेकिन धीरेधीरे दरारें आईं. अर्जुन कारोबार में इतना बिजी रहने लगा कि उस का प्रैक्टिकल दिमाग रानी की भावनात्मक जरूरतों को समझ नहीं पाया.

रानी अकेली पड़ गई, आर्या को संभालना. फिर मुश्किलें आईं. रानी दोबारा प्रेग्नेंट हुई. खुशी थी, लेकिन डाक्टर ने कहा, ‘‘प्रौब्लम है. अबौर्शन करना पड़ेगा, नहीं तो तुम्हारी जान को खतरा है.’’

रानी रोई. अर्जुन ने हिम्मत दी, ‘‘अगली बार रानी. हम फिर कोशिश करेंगे, हिम्मत रखो.’’

फिर दूसरी बार, वही दर्द.

2 अबौर्शन, जिस ने रानी को अंदर से तोड़ दिया. रानी उदासी में डूब गई, उसे लगा कुदरत उस से उस का दोबारा मां बनने का सपना छीन रही है.

अर्जुन ने कहा, ‘‘सब ठीक हो जाएगा रानी. हम एकदूसरे के लिए काफी हैं. बच्चों के लिए खुद को खतरे में मत डालो.’’

लेकिन तनाव बढ़ा. झगड़े छोटी बातों पर होने लगे. अर्जुन प्रैक्टिकल, रानी भावुक. अर्जुन का बिजनैस माइंड, रानी का फिल्मी बैकग्राउंड. यह फर्क एक गहरी खाई बन गया.

अर्जुन ने एक यूरोप ट्रिप कैंसल की, ‘‘बिजनैस में बड़ा प्रैशर है रानी. क्लाइंट्स जरूरी हैं.’’

रानी गुस्से से बोली, ‘‘आर्या के लिए प्लान था. तुम हमेशा काम को चुनते हो, मैं नहीं, आर्या भी नहीं.’’

स्वभाव का फर्क बढ़ने लगा. झगड़े रोज होने लगे.

आर्या डरती थी, ‘‘मम्मी, पापा से लड़ाई मत करो. मुझे डर लगता है.’’

रानी रोई, बेटी को गले लगाया, ‘‘नहीं बेटी. सब ठीक हो जाएगा, अब नहीं लड़ेंगे, मैं वादा करती हूं.’’

2013 तक चला यह संघर्ष, 6 साल. आखिरकार तलाक.

अर्जुन ने यह कहते हुए फाइल किया, ‘‘हम दोनों को शांति चाहिए रानी.’’

रानी सदमे में थी, ‘‘क्यों अर्जुन? हम कोशिश करें. सब ठीक हो सकता है.’’

अर्जुन ने शांत मगर दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘नहीं चलेगा रानी. अब बहुत देर हो गई है. हम दोनों एकदूसरे को बस दुख दे रहे हैं.’’

कोर्ट, कस्टडी की लड़ाई. आर्या किस के साथ? रानी पूरी ताकत से लड़ी, ‘‘वह मेरी जान है अर्जुन. मैं उसे नहीं छोड़ सकती. मैं उस की मां हूं.’’

जज ने फैसला रानी के पक्ष में दिया… कस्टडी रानी को, लेकिन विजिटेशन राइट्स अर्जुन को. तलाक के बाद रानी अकेली रह गई. सिंगल मदर.

रानी ने टूटे दिल के साथ आर्या को संभाला. अब उसे वापसी करनी थी, आर्या के भविष्य के लिए, अपनी
अधूरी पहचान के लिए. वह शूटिंग पर जाती, आर्या को नानी के पास छोड़ती, ‘‘बेटी, मां काम पर जा रही है. यह सब तुम्हारे लिए है. शाम को आऊंगी.’’

आर्या ने समझदारी से कहा, ‘‘ओके मम्मी. लव यू… और आप अपना ध्यान रखना.’’

रानी मुसकराती, दर्द छिपाया. अबौर्शन का सदमा, तलाक का दर्द, कस्टडी फाइट… सब सहा.

2025 में रानी की फिल्म ‘क्राइसिस’ आई. एक पत्रकार ने रानी से पूछा, ‘‘तलाक दर्दनाक था, लेकिन आप ने सीखा क्या रानीजी?’’

रानी ने ईमानदारी से जवाब दिया, ‘‘तलाक दर्दनाक था. लेकिन मैं ने सीखा कि प्यार काफी नहीं होता.

एकदूसरे को समझना और इज्जत करना जरूरी है. अब मैं जानती हूं कि मेरी कीमत क्या है.’’

आर्या बड़ी हो रही थी, 18 की, स्कूल टौपर. रानी को गर्व था.

‘‘तू डाक्टर बनेगी,’’ रानी ने कहा.

आर्या जोर से हंसी और बोली, ‘‘हां मम्मी. आप जैसी स्ट्रौन्ग बनूंगी. मैं टूटना नहीं सीखूंगी.’’

रानी की जिंदगी गांव से बौलीवुड, प्यार से तलाक, दर्द से सीख. वह मजबूत बनी. अब वह अकेली रानी नहीं थी, वह एक योद्धा थी, जिस की चमक कभी फीकी नहीं पड़ने वाली थी.

रानी का सफर अनोखा था, प्रेरणा से भरा. तलाक ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि एक नया रास्ता दिखाया… आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का.

रानी की चमक अब नकली नहीं, बल्कि अनुभव की असली चमक थी. वह जानती थी कि उस के गांव की लड़कियां अब उस के नाम से सपने देखेंगी और यह उस की सब से बड़ी जीत थी. Best Hindi Story

Hindi News Story: गोवा नाइट क्लब अग्निकांड

Hindi News Story: 6 दिसंबर, 2025. विजय और अनामिका मस्ती करने गोवा गए हुए थे. चूंकि उन दोनों ने पहले से प्रोग्राम बना रखा था, तो वे अरपोरा विलेज के एक नाइट क्लब में बैठे हुए थे. माहौल बड़ा रंगीन था और शराब और शबाब की पूरी मस्ती थी.

विजय और अनामिका की सीट से सटी सीटों पर 4 जने बैठे हुए थे. एक लड़की और 3 लड़के. चारों जम कर शराब पी रहे थे.

अभी रात के 11 बजे थे. बर्च बाय रोमियो लेन नाम के इस नाइट क्लब का माहौल बड़ा गजब का था. क्लब की सजावट के लिए अंदर और आसपास बहुत सारे पाम ट्री लगे हुए थे.

हो भी क्यों न, बर्च बाय रोमियो लेन नाइट क्लब ‘नोमाडिक जंगल’ थीम पर बनाया गया था. इस में अंदर हर तरफ छोटेछोटे पुल और पैदल रास्ते बने थे, बीचबीच में स्विमिंग पूल और तालाब जैसे पानी वाले एरिया भी थे. स्ट्रा और बांस की सजावट में हर रात यहां आतिशबाजी भी होती थी.

‘‘विजय, मुझे लगता है यह लड़की पूरी तरह से शराब के नशे में मस्त हो गई है,’’ अनामिका ने विजय के कान में फुसफुसा कर कहा.

‘‘यार, यहां का माहौल ही ऐसा है. ऊपर से यह म्यूजिक माहौल को मादक बना रहा है,’’ विजय बोला.
इतने में वह लड़की उठी, पर थोड़ा लड़खड़ा गई. फिर संभलते हुए अकेले ही वाशरूम की तरफ बढ़ गई. उन 3 लड़कों को कोई फर्क नहीं पड़ा. वे तो बैली डांस का मजा ले रहे थे. शायद उन्होंने ड्रग भी ले रखी थी. कजाकिस्तान की एक खूबसूरत बैली डांसर क्रिस्टीना डांस कर रही थी.

‘‘मुझे लगता है कि वह लड़की संभल नहीं पाएगी. मुझे वाशरूम जा कर देखना चाहिए,’’ अनामिका ने कहा और वाशरूम की तरफ बढ़ गई.

पर वह लड़की वाशरूम में नहीं थी. अनामिका अपना मेकअप ठीक करने लगी. इधर बाहर विजय भी डांस का मजा ले रहा था.

अंगदिखाऊ नीले रंग की ड्रैस में वह बैली डांसर अपने बाल हिलाती हुई मादक डांस कर रही थी. उस के बदन में कमाल की लचक थी. डांस इतना भड़काऊ था कि विजय भी बेकाबू हो रहा था. डांसर के पीछे ड्रम वगैरह पर सफेद ड्रैस में साथी कलाकार पूरा साथ दे रहे थे.

इतने में क्लब की छत पर अचानक से आग की लपटें उठीं. किसी ने ज्यादा गौर नहीं किया, पर जब चिनगारियां नीचे गिरने लगीं, तो लोगों को होश आया कि आग लग गई है. वे तीनों लड़के अभी भी अपने मोबाइल से रील बना रहे थे.

इसी बीच किसी मनचले ने बैली डांसर की तारीफ में कहा, ‘‘आग लगा दी.’’

पर यह आग सच में लगी थी और इतनी ज्यादा भयंकर थी कि लोगों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया. वे तीनों लड़के पहली फुरसत में वहां से बाहर निकलने की जुगत भिड़ाने लगे.

विजय को अनामिका की याद आई. वह वाशरूम की तरफ भागा और अनामिका को देख कर चिल्लाया, ‘‘जल्दी बाहर चलो, आग लग गई है.’’

अनामिका को कुछ समझ नहीं आया. उस पर नशे का सुरूर था. वह बोली, ‘‘पर वह लड़की वाशरूम में नहीं है. कहां गई होगी?’’

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं देखता हूं,’’ विजय बोला और उन दोनों ने अपने मुंह पर पानी के छींटे मारे. आग लगने से उन का आधा नशा तो पहले ही काफूर हो चुका था.

वहां से एक रास्ता बेसमेंट में जाता था. वहां भी काफी लोग थे. वह लड़की गलती से बेसमेंट में चली गई थी और सीढि़यों पर बेसुध बैठी थी. वहां आग अपना असर दिखा चुकी थी. शायद वह लड़की जल चुकी थी, पर वहां धुआं इतना ज्यादा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.

अनामिका और विजय ने बड़ी फुरती से काम किया. विजय ने वहां चिल्ला कर कहा, ‘‘सब यहां से ऊपर की तरफ भागो.’’

पर शायद ज्यादातर लोग सुन नहीं पाए थे. 1-2 लोग किसी तरह हिम्मत दिखा कर भागे. विजय ने उस लड़की को उठा कर पीठ पर लाद लिया. अनामिका ने अपनी जैकेट उस लड़की को ओढ़ा दी.

वे तीनों जैसेतैसे बाहर निकले, पर तब तक आग का तांडव शुरू हो चुका था. क्लब की सजावट ही उस की सब से बड़ी दुश्मन साबित हुई. क्लब के इंटीरियर में सूखी घास, ताड़ के पत्ते, रैटन (बेंत) और बांस का भारी इस्तेमाल किया गया था. यहां तक कि छत भी इन्हीं ज्वलनशील चीजों से बनी थी. यह क्लब असल में एक ‘टिंडरबौक्स’ (बारूद के ढेर) जैसा था, जिसे बस एक चिनगारी की जरूरत थी.

क्लब में आनेजाने के लिए केवल एक ही रास्ता था, जो बेहद संकरा था. इस रास्ते पर भी ज्वलनशील पदार्थों से मेहराब बनाए गए थे, जिस ने आग भड़कने पर निकलने का रास्ता और मुश्किल कर दिया.

‘‘इस के साथी तो यहां नहीं दिख रहे. लगता है भाग गए हैं. हमें इसे जल्दी से डाक्टर के पास ले जाना होगा,’’ अनामिका बोली.

आधा घंटे में ही वे दोनों एक अस्पताल में थे. डाक्टर ने बड़ी तेजी दिखाई और उस लड़की का उचित इलाज किया. तब तक वह लड़की होश में आ चुकी थी. खुद को अस्पताल में देख कर वह रोने लगी.

‘‘आप घबराइए मत, ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. आप के जले के घाव जल्दी भर जाएंगे. निशान भी नहीं रहेंगे. आप किसी अपने को खबर कर दीजिए,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘जो लड़के मेरे साथ थे, वे सब कहां हैं?’’ उस लड़की ने सवाल किया.

‘‘वे तो आग लगते ही वहां से भाग गए. आप चिंता मत कीजिए, हम दोनों आप के साथ हैं…’’ अनामिका बोली, ‘‘वैसे मेरा नाम अनामिका है और ये हैं विजय.’’

‘‘मेरा नाम दीप्ति है और मैं नोएडा में रहती हूं. घर से यह बोल कर आई थी कि चेन्नई में कोई ऐग्जाम है. पर सब झूठ था. मैं अपने इन 3 दोस्तों के साथ यहां गोवा आ गई थी. सोचा था कि कुछ दिन मस्ती कर के चली जाऊंगी, पर अब बुरी तरह से फंस गई हूं.’’

‘‘वे तीनों कौन थे?’’ विजय ने पूछा.

‘‘कहने को तो मेरे दोस्त थे, पर मुझ पर मुसीबत आते ही भाग खड़े हुए,’’ दीप्ति ने बताया.

‘‘तुम अभी आराम करो. हम दोनों बाहर बैठे हैं. सुबह होने वाली है,’’ अनामिका ने कहा.

इस के बाद वे दोनों बाहर जा कर एक बैंच पर बैठ गए. विजय ने मोबाइल में खंगाला तो खबरों से पता चला कि वह क्लब पूरी तरह जल गया था. अस्पताल में भी कुछ लोग बात कर रहे थे कि तकरीबन 25 लोग मर गए हैं.

अगले दिन अखबार में खबर छपी कि बर्च बाय रोमियो लेन नाइट क्लब में वीकैंड पार्टी चल रही थी. डांस फ्लोर पर 100-150 लोग ?ाम रहे थे. बैली डांसर भी थिरक रही थी.

रात के तकरीबन 12 बजे क्लब की बेसमेंट में बनी किचन में अचानक एक सिलैंडर ब्लास्ट हुआ. कुछ ही मिनट में आग किचन से पहले फ्लोर तक पहुंच गई, जहां पार्टी हो रही थी.

आग देख कर डांस फ्लोर पर अफरातफरी मच गई. लोग इधरउधर भागने लगे. इस दौरान कई लोग आग की लपटों के शिकार हो गए. इन में से कई लोग बचने के लिए बेसमेंट की किचन में चले गए, जहां पहले से क्लब का स्टाफ फंसा हुआ था.

जब तक फायर ब्रिगेड आग पर काबू पाती, तब तक 25 लोगों की मौत हो चुकी थी. इस में 14 स्टाफ और 4 टूरिस्ट थे. 7 लोगों की पहचान अभी नहीं हो पाई. बताया जा रहा है कि ज्यादातर मौतें जलने की बजाय दम घुटने के चलते हुईं.

सुबह तक दीप्ति भी थोड़ा ठीक महसूस कर रही थी. पर वह इस बात से डरी हुई थी कि घर पर क्या कहेगी?

‘‘आप को सब सच बताना होगा,’’ विजय दीप्ति से बोला.

‘‘विजय, आप समझ नहीं रहे हैं. मैं कैसे अपने परिवार वालों को कह दूं कि यहां गोवा में 3 लड़कों के साथ मस्ती कर रही थी. चेन्नई और गोवा के बीच बहुत ज्यादा दूरी है. मेरे घर वाले बिना शादी किए ही मेरी औनर किलिंग कर देंगे. और वैसे भी जब से यह इंडिगो वाला मामला हुआ है, कोई कैसे यहां आ सकता है.

‘‘मेरा तो दिमाग खराब हो गया है. मैं अपने मम्मीपापा को कह दूंगी कि यहां चेन्नई में फंस गई हूं और बाद में आऊंगी,’’ दीप्ति ने कहा.

‘‘पर कब तक सच को छिपाया जाएगा. यह ठीक है कि कुछ दिनों बाद तुम्हारे घाव भर जाएंगे, पर इन के दाग जाने में समय लगेगा. फिर क्या जवाब दोगी? तुम्हें सब सच बता देना चाहिए. वे तुम्हारे अपने हैं, सब समझ जाएंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘एक तो यह हादसा हो गया है, ऊपर से इंडिगो ने नरक मचा रखा है. यह सब लापरवाही बरतने का नतीजा है कि मुसाफिरों को इतनी ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं.

‘‘दरअसल, पिछले कुछ दिनों से इंडिगो छोटी तकनीकी खराबियों का सामना कर रही थी. साथ ही फ्लाइट भी लेट हो रही थीं. तब यह एयरलाइन कंपनी इस के लिए खराब मौसम को जिम्मेदार ठहरा रही थी.

हालांकि, इस संकट की शुरुआत तब हुई, जब सरकार ने फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन के नए नियम लागू करने का फैसला लिया, जिस के तहत पायलटों को बहुत ज्यादा थकान से बचाना था. लेकिन एयरलाइन कंपनी पहले से ही स्टाफ की कमी झेल रही थी. नए नियमों से उन पर दबाव बढ़ गया, जिस से कई फ्लाइट रद्द की गईं.

‘‘सरकार के फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन लागू करने से इंडिगो को अपने पायलटों को आराम देना पड़ा. कंपनी में पहले ही स्टाफ की कमी थी, जिस से पूरा सिस्टम की चरमरा गया. कंपनी ने कई उड़ानें रद्द कर दीं, जिस से यह समस्या और बड़ी हो गई.

‘‘सच कहूं तो देश की सब से बड़ी एयरलाइन होना इस बार इंडिगो के लिए ही भारी पड़ गया. इतने बड़े नैटवर्क में जब एक चीज कमजोर हुई, तो उस का असर पूरे आपरेशन पर दिखने लगा. हजारों क्रू मैंबर, कई एयरपोर्ट और रोज चलने वाली 2,000 से ज्यादा फ्लाइट्स सब पर एकसाथ दबाव आ गया, जिस के कारण और ज्यादा हालात खराब हो गए,’’ विजय ने इंडिगो में मचे बवाल पर अपनी राय दी.

यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘अरे यार, मैं ने बीबीसी का एक लेख पढ़ा था, जिस में एविएशन ऐक्सपर्ट हर्षवर्धन ने बीबीसी न्यूज हिंदी से कहा, ‘कुछ हद तक यह बात सही है कि एविएशन इंडस्ट्री में इंडिगो की मोनोपौली है, तकरीबन 65 फीसदी. लेकिन यह मोनोपौली राजग सरकार के ही समय में नहीं बनी है.’

‘‘उन्होंने आगे कहा, ‘आज जोकुछ हो रहा है, उस में इस मोनोपौली का बहुत बड़ा हाथ है. इस की वजह से पूरा देश तकरीबन बंधक बन गया है. हमारे देश में एविएशन मार्केट काफी बढ़ गया है और ऐसे में जिस के पास 65 फीसदी हिस्सेदारी है, अगर उस कंपनी में दिक्कत आएगी तो यह संकट पूरे मार्केट को बैठा ही देगा.’

‘‘उन्होंने यह भी कहा, ‘किसी भी तरह का यातायात, खासकर हवाई यातायात किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भूमिका निभाता है. यह अर्थव्यवस्था की नसों में बहते खून की तरह है… सिर्फ राजग को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. संप्रग की सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार रही है.’

‘‘यह तो राजनीतिक बात हुई, पर इस सब में जनता ही पिसी. वे लोग अपनी मंजिल तक तो जा ही नहीं पाए, मानसिक पीड़ा हुई सो अलग.

‘‘दीप्ति, मेरा तो यह मानना है कि तुम इस हादसे को भूलने की कोशिश करो और अपने मांबाप को एकदम सही जानकारी दो. तुम्हारी जान बच गई है. यह ठीक है कि तुम झूठ बोल कर यहां आई, पर जिन 3 दोस्तों पर तुम ने भरोसा किया, वे तो हादसे वाले दिन ही दुम दबा कर भाग गए थे. उन्होंने अब तक तुम्हारी कोई खैरखबर नहीं ली.’’

‘‘तुम सही कह रही हो अनामिका. तुम दोनों ने न सिर्फ मेरी जान बचाई है, पर मेरा हौसला भी बढ़ाया है. मैं ने आज 2 सच्चे दोस्त पाए हैं. तुम मुझे फोन दो, मैं अभी पापा से बात करती हूं,’’ दीप्ति ने कहा.

अनामिका और विजय के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. Hindi News Story

Best Hindi Kahani: किनारे पर आ कर डूब गए

Best Hindi Kahani: मांगीलाल एससी समाज से था. वह अक्ल से जरा पैदल था. वह पिछले तकरीबन 20 साल से रामनारायण की पार्टी का सदस्य था और रामनारायण का विश्वासपात्र भी. वह गरीब जरूर था, मगर पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ता था. वह पार्टी की मीटिंग में दरिया बिछानाउठाना करता था. भले ही कार्यकर्ता उसे गालियां दें, मगर वह उन की बात का बुरा नहीं मानता था, बल्कि पार्टी का काम ईमानदारी से करता था. वह तो हमेशा कहा करता था कि उस का जनम तो पार्टी के लिए ही हुआ है.

मांगीलाल खोपरा गांव का रहने वाला था. उस की बीवी और 3 बच्चे थे. वह 5वीं जमात तक पढ़ा था, पर उस की बीवी कंचन हायर सैकंडरी तक पढ़ी थी. उस के 2 भाई थे, थोड़ी खेतीबारी थी. जब पिता जिंदा थे, तब वे खेत और घर का बंटवारा कर गए थे. कुछ खेतीबारी मांगीलाल के हिस्से में आई थी, इसलिए वह खेती करता था. मगर खेती से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि दो वक्त का पेट भर सके.

जब मांगीलाल की 20 साल पहले कंचन से शादी हुई थी, तब कंचन ने प्राइमरी स्कूल में मास्टर की नौकरी का फार्म भर दिया था. कंचन अपने मायके से ही बीटीआई कर के आई थी. इस का फायदा उसे मिला और वह गांव के प्राइमरी स्कूल में ही नौकरी पा गई. आज वह 30,000 रुपए महीना से ज्यादा पगार ले रही थी.

कंचन की जैसे ही मास्टरनी की नौकरी लगी, मांगीलाल निश्चिंत हो गया और ज्यादा समय पार्टी को देने लगा. रामनारायण उसे शहर ले जाते थे. ऐसे में कंचन बहुत नाराज रहती थी. आएदिन उसे सुनाती रहती थी, मगर वह एक कान से सुनता, दूसरे कान से निकाल देता. अब बच्चे भी जवानी की दहलीज पर आ चुके थे. मांगीलाल और ज्यादा लापरवाह हो गया था.

इधर, जैसे पंचायत चुनाव का ऐलान हुआ, उस के पहले सरपंच की सीट का रिजर्वेशन तय हो चुका था. यह देख कर रामनारायण ने मांगीलाल को सरंपच पद पर खड़ा होने का ऐलान कर दिया. पार्टी में विरोध हुआ कि मांगीलाल जैसे मंदबुद्धि को क्यों टिकट दे दिया, मगर रामनारायण ने तरकीब लगा कर सारा विद्रोह दबा दिया.

जैसे ही कंचन को मालूम पड़ा कि मांगीलाल को सरपंच का चुनाव लड़वाया जा रहा है, तब वह आगबबूला हो उठी. वह मांगीलाल से बोली, ‘‘यह मैं क्या सुन रही हूं…’’

‘‘क्या सुन रही हो?’’ मांगीलाल ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘क्या सरपंच के चुनाव में तुम्हें खड़ा कर रहे हैं?’’ कंचन ने पूछा.

‘‘हां,चुनाव में खड़ा तो कर रहे हैं,’’ मांगीलाल ने बताया.

‘‘अरे, पैसा कहां है तुम्हारे पास खर्च करने के लिए?’’ कंचन ने पूछा.

‘‘सब रामनारायणजी देंगे. मेरी बात हो गई,’’ मांगीलाल बोला.

‘‘तुम मना कर दो,’’ कंचन बोली

‘‘क्यों मना कर दूं. मेरी सेवा से खुश हो कर मुझे टिकट दिया,’’ मांगीलाल ने कहा.

‘‘सेवा के चलते नहीं, बल्कि मजबूरी के चलते ताकि तुम सरपंच बन जाओ, तो वे तुम्हें कठपुतली की तरह नचा सकें…’’ समझाती हुई कंचन बोली, ‘‘कोई यों ही मुफ्त में पैसा थोड़े ही लगाता है, इसलिए मना कर दो.’’

‘‘अरे, पैसा वे लगा रहे है, फिर क्यों न लड़ूं?’’ मांगीलाल ने सवाल किया.

‘‘रामनारायण तुम्हारा इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर तुम जीत गए न तुब तुम्हारे कंधे पर बंदूक रख कर घपला कर के कमीशन खाएंगे और अगर तुम हार गए, तो अंजाम क्या होगा जानते हो?’’ कंचन बोली.

‘‘हारना तो मुझे है नहीं,’’ मांगीलाल जोश के साथ बोला.

‘‘तुम भ्रम में जी रहे हो. अगर हार गए न, तब रामनारायणजी ने चुनाव में जितना पैसा खर्च किया है, उस से दोगुना वसूल कर लेंगे. इस बात को जानते हो?’’ समझाती हुई कंचन बोली, ‘‘इसलिए कहती हूं कि मना कर दो.’’

‘‘कंचन, तुम मुझ से जलने लगी हो, इसलिए ऐसी बात करती हो,’’ मांगीलाल को बुरा लगा.

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी समझ में नहीं आए, तब मरो,’’ गुस्से से लालपीली हो कर कंचन बोली.

पर फिर कंचन ने भी सोचा कि मांगीलाल को समझाना बेकार है, क्योंकि उस के पास समझने की ताकत नहीं है. भैंस के आगे बीन बजाना कहावत मांगीलाल के लिए ही बनाई गई है.

फिर क्या था, रामनारायण ने मांगीलाल से फार्म शहर जा कर भरवा दिया और चुनाव की सारी बागडोर उन्होंने ही संभाल ली. मांगीलाल को जिताने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी. पैसा भी खर्च किया.

मांगीलाल के पोस्टरों से सारा गांव पट गया. जो मांगीलाल के खिलाफ खड़ा हुआ था, वह भी कम नहीं पड़ रहा था. वह भी जबरदस्त प्रचार कर रहा था.

इस तरह पूरे गांव में चुनाव का घमासान मचा हुआ था. गांव वाले मजा ले रहे थे और साथ में मांगीलाल की खिल्ली भी उड़ा रहे थे. रामनारायण ने मांगीलाल को खड़ा कर के बहुत बड़ा दांव खेला है. अगर वह हार गया तब वे डूब जाएंगे.

जैसेजैसे वोट डालने की तारीख पास आती जा रही थी, चुनाव का जोश दोनों उम्मीदवारों में बढ़ता जा रहा था. सभी पर पागलपन सवार था. जैसे चुनाव ही अब सबकुछ हो गया था. कई बार झगड़े होतेहोते भी बचे, क्योंकि दोनों दल वाले अपनीअपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे. पर रामनारायण की इज्जत इस समय दांव पर लगी हुई थी. अगर मांगीलाल हार गया, तब गांव में वे मुंह दिखाने के काबिल न रहेंगे. लिहाजा, उन्होंने चुनाव जीतने के सारे हथकंडे अपना रखे थे.

चुनाव का दिन भी आ गया. बिना किसी विवाद के चुनाव पूरा हो गया. जब गिनती हुई तब मांगीलाल 25 वोटों से हार गया. मगर मांगीलाल को तो अपनी हार से कोई फर्क नहीं पड़ा. पर रामनारायण की नाक कट गई. मांगीलाल को ले कर जो दांव खेला था, जिस पर पैसा खर्च किया था, वह सब बेकार हो गया. किनारे पर आ कर नाव डूब गई.

वे अपनी हवेली में मांगीलाल के साथ बैठ कर गम मना रहे थे. अफसोस के साथ भीतर का गुस्सा फूट पड़ा था, ‘‘मांगीलाल, तुम ने मुझे डुबो दिया.’’

‘‘मैं ने आप को कहां डुबोया साहब?’’ मांगीलाल बोला.

‘‘तू हारा तो मेरी नाक कट गई…’’ गुस्से से रामनारायण बोले, ‘‘जानता है, तेरे पीछे मैं ने कितने पैसे खर्च किए.’’

‘‘कितने किए साहब?’’

‘‘2 लाख से ऊपर हो गए. अब इस की भरपाई किस से करूंगा?’’

‘‘हां, आप ने मेरे लिए पैसा तो खर्च किया,’’ सहमति देते हुए मांगीलाल बोला.

‘‘ये 2 लाख रुपए अब तुझे मुझ को देने होंगे.’’

‘‘मैं कहां से दूंगा?’’ मांगीलाल हाथ खड़े करते हुए बोला.

‘‘कहीं से भी ला कर दे, मगर…’’

‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था, मैं ठनठन गोपाल हूं,’’ बीच में ही बात काटते हुए मांगीलाल बोला.

‘‘तब चुनाव में क्यों खड़ा हुआ?’’

‘‘मैं कहां खड़ा हुआ, आप ने ही जबरदस्ती खड़ा किया,’’ सच बात उगलते हुए मांगीलाल बोला.

‘‘मैं ने तो तुझ से यह कहा था कि पैसे की मदद मैं करूंगा. जीतने के बाद सब उतार देना. अब तू हार गया तो 2 लाख रुपए वापस कर.’’

‘‘मगर आप ने ऐसा नहीं कहा था.’’

‘‘अब हार गया तो बदल गया. मुझे पूरे 2 लाख रुपए चाहिए,’’ रामनारायण गुस्से से बोले.

‘‘मगर मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, मैं कहां से दूंगा?’’ एक बार फिर मांगीलाल इनकार करते हुए बोला.

‘‘मकान बेच या खेत बेच, मगर मुझे 2 लाख रुपए चाहिए. 2 दिन की मोहलत देता हूं. अगर नही दिए तो…’’ कह कर रामनारायण चुप हो गए. फिर पलभर रुक कर वे बोले, ‘‘अगर नहीं दिए तो तेरी बीवी का ट्रांसफर काले पानी में करवा दूंगा. जा बंदोबस्त कर के आ. अब मुझे अकेला छोड़ दे.’’

मांगीलाल उठ कर चल दिया. अब वह कहां जाए. कहां से दे 2 लाख रुपए, जबकि ऐसा कोई करार नही हुआ. उसे रहरह कर कंचन की कही बातें याद आ रही थीं. वह रामनारायण का सारा गणित समझ गया.

अब वह कंचन के सामने जाने से डरने लगा. अब उस के सामने एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई थी. क्या करे? कंचन के पास जा भी नहीं सकता. उस ने पहले ही सचेत कर दिया था कि तुम अगर हार गए, रामनारायण दोगुना रकम वसूलेंगे. कंचन की बात सच निकली.

कहां जाए? क्या कुएं में कूद कर खुदकुशी कर ले? मगर उस के भीतर के मन ने कहा कि खुदकुशी करना गलत है, बुजदिलों का काम है. तब खुदकुशी करने का विचार उस ने त्याग दिया. वह कंचन के पास जा कर सब बातें कह देगा कि वह गुनाहगार है, जो सजा देनी है, वह झेलने को तैयार है. तब अपना मन कड़ा कर के वह घर की तरफ चल दिया. Best Hindi Kahani

Family Story In Hindi: मुखौटा

Family Story In Hindi: अमित अख्तर ने जब परचा मेरे आगे रखा, तो मैं हैरान हो उठा, ‘‘तुम एमएलए का चुनाव लड़ोगे?’’

‘‘हां, वकील बाबू, लेकिन आप को हैरानी क्यों हुई?’’

‘‘दरअसल…’’ मैं थोड़ा हिचकिचाया, ‘‘तुम तो हिस्ट्रीशीटर हो… क्या तुम्हें कोई पार्टी टिकट देगी? क्या तुम चुनाव जीत जाओगे? क्यों अपनी जिंदगीभर की कमाई मुफ्त में गंवाना चाहते हो?’’

‘‘वकील बाबू, इसी को तो राजनीति कहते?हैं. अगर आप को राजनीति के हथकंडे मालूम होते, तब चुनाव हम नहीं आप लड़ रहे होते. और रही हमारे हिस्ट्रीशीटर होने की बात, तो आप को बता दें, हमारे प्रदेश के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं, उन पर 38 मुकदमे चले हैं, जबकि हम पर तो अभी 22 ही चल रहे हैं.’’

मैं ने अमित अख्तर का परचा भर कर दे दिया. फिर शाम को उस के घर भी पहुंच गया.

अमित अख्तर के घर पर उस के चेलेचपाटों की महफिल जमी थी. शहर के नामीगिरामी गुंडे वहां मौजूद थे.

मुझे देखते ही अमित अख्तर ने हाथ मिलाया और अपने बराबर में ही एक कुरसी पर बैठा लिया, फिर मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोला, ‘‘वकील बाबू, अब आप हमारे हथकंडे देखिए.’’

फिर उस ने अपने एक चेले को आवाज दी, ‘‘मुकीम, तुम अपने साथ बब्बू, राम सिंह, राजू और अनीस को ले कर सेठ जहांगीरी के यहां चले जाओ और उस से कहो कि अमित दादा ने 50 हजार रुपए मंगवाए हैं.’’

‘‘जैसा हुक्म दादा…’’ मुकीम ने किसी पालतू कुत्ते की तरह गरदन हिलाई, ‘‘अगर सेठ रुपए देने से मना करे, तो उस का काम तमाम कर दूं?’’

‘‘नहीं, अगर वह मना करे, तो मुझे टैलीफोन करना. मैं उस से खुद बात कर लूंगा. और हां, एक बात और सुन… तुम और तुम्हारे सभी साथी आज से मुझे दादा नहीं, बल्कि नेताजी कह कर पुकारा करेंगे.’’

‘‘जैसा हुक्म, नेताजी.’’

कुछ ही पलों में 2 मोटरसाइकिलें स्टार्ट हुईं और तेज रफ्तार से दूर होती चली गईं.

करीब 15 मिनट बाद टैलीफोन की घंटी बजी, तो अमित अख्तर ने चोंगा उठा कर कान से लगाया, ‘‘मुकीम, क्या कहा सेठ ने?’’

‘‘सेठ पैसा देने से मना कर रहा है.’’

‘‘तुम सेठ को फोन दो.’’

अगले ही पल सेठ की आवाज सुनाई दी, ‘‘अमित बाबू, हम पर दया कीजिए. 2-4 हजार की बात हो तो दे देता हूं, लेकिन 50 हजार रुपए मेरे बस की बात नहीं है.’’

‘‘सेठ, हमारी बात गौर से सुनो, हम चुनाव लड़ रहे हैं. हमें तलवार पार्टी से टिकट लेना है… हम एमएलए भी बनेंगे और बाद में मंत्री भी.

‘‘अगर हम मंत्री बन गए, तो तेरे सारे लाइसेंस रद्द करवा देंगे, तुझे भिखारी बना देंगे. अगर हम कुछ न बन पाए, तो सुन… हमारे ऊपर 22 मुकदमे चल रहे हैं, इन में से 10 कत्ल के हैं, 23 वां मुकदमा तेरे कत्ल का शुरू हो जाएगा… मैं चोंगा रखूं या तू कुछ बकता है?’’

‘‘मैं 50 हजार रुपए दे रहा हूं… लेकिन तुम मंत्री बनने के बाद हमारा खयाल जरूर रखना.’’

‘‘चिंता मत कर, तू अभी से गेहूं, चावल, चीनी जमा कर ले, चुनाव के बाद मैं मुख्यमंत्री से कह कर सभी चीजों के दाम बढ़वा दूंगा.’’

‘‘क्या आप की मुख्यमंत्री से बात हो गई है?’’

‘‘हां, उन्होंने ही मुझे मंत्री बनने के नुसखे बताए हैं. उन्होंने पार्टी का टिकट देने के लिए 5 लाख का चंदा मांगा है… यह चंदा मुझे तुम्हारे जैसे लोग ही तो देंगे.’’

चोंगा रख कर अमित अख्तर मेरी तरफ देख कर मुसकराया.

कुछ ही देर में उस के गुंडे सेठ जहांगीरी से 50 हजार रुपए ले आए.

‘‘नेताजी, इन रुपयों का क्या करना है?’’ मुकीम ने नोटों का बैग अमित अख्तर के आगे रख दिया.

‘‘सुनो, 1-1 हजार की 50 गड्डियां बनाओ. हर मंदिरमसजिद को हमारी तरफ से चंदा दे दो. जो रुपया बचे, उस की हरिजन बस्ती में शराब और गरीब मुसलमानों में बिरयानी बांट दो.’’

मुकीम और उस के साथियों के जाने के बाद मैं ने अमित अख्तर को घूरा, ‘‘तुम यह हराम की दौलत मंदिर, मसजिद को दान दे रहे हो?’’

‘‘अरे वकील बाबू, यह हराम… हलाल क्या होता है… रुपया तो रुपया होता है… इस पर हराम या हलाल कुछ नहीं लिखा होता. फिर मंदिर, मसजिद वालों को क्या मालूम, यह रुपया मैं ने कहां से और कैसे
कमाया है.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ, कुछ देर पहले तुम ने टैलीफोन पर मुख्यमंत्री को 5 लाख का चंदा देने की बात कही थी… यह 5 लाख तुम कहां से लाओगे?’’

अमित अख्तर ने जोरदार कहकहा लगाया, ‘‘बताए देता हूं, लेकिन इस बात का खयाल रखना, चुनाव से पहले यह यह बात किसी को बताना नहीं… अगर बताई तो… खैर सुनो, कुछ जगहों पर लूटखसोट होगी और 2-4 अपहरण की घटनाएं…’’

‘‘अगर पकड़े गए, तब क्या होगा?’’

‘‘यह काम मैं थोड़े ही करूंगा, चेले किस काम आएंगे.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ, तुम अख्तर से अमित अख्तर क्यों बन गए?’’

‘‘यह वोटों की राजनीति है. मैं ने हिंदू व मुसलिम वोटों को अपनी ओर खींचने के लिए अमित अख्तर नाम रखा है. मुसलमानों से मिलने जाऊंगा, तो सिर पर टोपी लगा लूंगा और हिंदुओं से मिलूंगा, तो माथे पर तिलक लगा लूंगा.’’

‘‘अगर दोनों धर्म वालों से एकसाथ मिले, तब…’’

‘‘तब मैं सिर पर गांधी टोपी लगा कर आदर्शवादी बन जाऊंगा,’’ कहते हुए उस ने जोरदार ठहाका लगाया.

फिर वैसा ही हुआ, जैसा अमित अख्तर ने कहा था. तलवार पार्टी ने अपने पुराने एमएलए को टिकट न दे कर अमित अख्तर को टिकट दे दिया. अमित अख्तर के गुंडों ने कहीं डराधमका कर, कहीं मतपेटियां लूट कर, तो कहीं दौलत लुटा कर चुनाव जीत लिया.

इस के बाद अमित अख्तर ने तलवार पार्टी के अध्यक्ष को सोने की तलवार भेंट की. इस के बदले में पार्टी ने उसे उपमंत्री बना दिया.

मंत्री बनने के बाद अमित अख्तर का नगर में शानदार स्वागत किया गया. जब वह मंच पर भाषण दे रहा था, तब लोगों की भीड़ में खड़े हुए मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह तो हिस्ट्रीशीटर अमित अख्तर है, मंत्री कैसे बन गया?’’

लोगों ने मुझे घूर कर देखा. एक आदमी बोला, ‘‘लगता है, तुम पुलिस के आदमी हो… शायद तुम्हें मालूम
नहीं, नेताजी के ऊपर पुलिस द्वारा झूठे मुकदमे चलाए गए थे. नेताजी तो गरीबों के हमदर्द हैं, दयालु हैं और महान देशभक्त हैं.’’

तभी वहां मौजूद भीड़ ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारे लगाने लगी.

मैं हैरान था और साथ ही मुझे गुस्सा भी आ रहा था कि हमारे देश की जनता कितनी जल्दी मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को भूल जाती है. Family Story In Hindi

Family Story In Hindi: दांव पर सत्या

Family Story In Hindi: जुए का नशा सब से मादक होता है. दांव हारने वाला जुआरी भी तब तक हार नहीं मानता, जब तक वह पूरी तरह से बरबाद न हो जाए.

गांव जटपुर का नेतराम, जिसे सब ‘नेतिया’ कह कर पुकारते थे, दांव पर दांव लगा रहा था और आज वह हर दांव हार रहा था. ऐसा लगता था कि आज का दिन उस का नहीं था. सबकुछ गंवाने के बाद भी वह वहां से उठने का नाम नहीं ले रहा था.

यही जुआ खेलने का नशा होता है कि आदमी चाह कर भी इस से अपना दामन छुड़ा नहीं पाता है, बल्कि दांव हारने पर खेलने का और ज्यादा जज्बा पैदा होता है.

‘‘नेतिया, अब तू अपना क्या दांव पर लगाएगा? अब तो तेरी जेब खाली हो गई,’’ बेलू ने हंसते हुए कहा.

‘‘क्यों? पैसा ही तो खत्म हुआ है, अभी तो मेरे पास बहुतकुछ है.’’

‘‘लगा तो फिर क्या लगाएगा दांव पर नेतिया? बिना कुछ दांव पर लगाए तो अगली बाजी खेल नहीं पाएगा,’’ शेरा ने ताश के पत्ते फेंटते हुए कहा.

‘‘तुम बताओ, इस बार की बाजी कितने की लगा रहे हो? देखना, नेतिया अपने बाप से नहीं अगर पीछे हट गया,’’ नेतिया ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा.

नेतिया को छोड़ कर सब बाजी जीते हुए बैठे थे. पीपल की छांव में बैठे हुए गांव के ये गरीब मजदूर तबके के लोग आखिर कितनी बड़ी बाजी खेल सकते थे. उन की बाजी 50-100 रुपए से शुरू हो कर हजार 2 हजार पर जा कर टिक जाती थी.

नेतिया के पास इकन्नी भी नहीं थी, लेकिन जुए की मादकता ने उसे अपनी गिरफ्त में ले रखा था. उसे हर हारे हुए जुआरी की तरह लग रहा था कि अगली बाजी उस की होगी, हर हाल में वही जीतेगा.

‘‘देख नेतिया, इस बार हम लोग 2-2 हजार का दांव खेलने जा रहे हैं. इस से ज्यादा रकम हम ले कर नहीं बैठे. अब तू बता दांव पर क्या लगाएगा?’’ शेरा ने पूछा.

नेतिया को लगा कि अगर वह यह दांव जीत जाता है, तो उस की पूरी वसूली ही नहीं हो जाएगी, बल्कि वह बड़ी रकम उठाने में भी कामयाब हो जाएगा और उसे पूरा यकीन था कि यह बाजी उस की होने वाली है.
जुआरी का यही विश्वास और लालच उस के अंदर आगे खेलने की आग और ललक पैदा करता है.

नेतिया ने जोश में कहा, ‘‘मैं दांव पर अपना ‘गबरू’ बछड़ा लगाता हूं.’’

‘‘न भाई न. बछड़े अब किसी काम के नहीं. अब खेतों की जुताई बैलबछड़ों से होती नहीं. छोटे से छोटा किसान भी अपने खेतों की जुताई ट्रैक्टर से कराता है. बछड़ा तो हम मुफ्त में भी न लें,’’ बेलू ने नकारते हुए कहा.

‘‘अरे, तो दांव पर क्या लगाऊं, कुछ सम?ा में नहीं आ रहा…’’ नेतिया बोला.

‘‘अरे नेतिया, सोचता क्या है… सत्या भाभी को दांव पर लगा दे युधिष्ठिर की तरह. जैसे द्वापर में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को जुएं में दांव पर लगा दिया था,’’ मलखान ने मजाक भी किया और सुझाव भी दिया.

‘‘ओ मल्खे, अपनी सलाह अपने पास रख. औरत को दांव पर नहीं लगाऊंगा.’’ नेतिया बोला.

‘‘तो फिर क्या लगाएगा? अब तेरे पास बचा ही क्या है? मकान पुश्तैनी है. उसे तू दांव पर लगा नहीं सकता. उस में तेरे भाई चेतराम का बराबर का हिस्सा है. खेतखलिहान पहले ही तेरी जोरू ने तेरे जुआरी होने के चलते अपने नाम लिखा रखे हैं, तो फिर तू अपनी जोरू को ही दांव पर लगा सकता है. उसे दांव पर लगा या फिर यहां से उठ जा और जुआ खेलने से तोबा कर.’’

नेतिया यह सुन कर बड़ी दुविधा में फंस गया कि या तो वह अपनी बीवी सत्या को दांव पर लगाए या फिर जुए का ‘रणक्षेत्र’ छोड़ कर भागे.

नहींनहीं, वह रणक्षेत्र छोड़ कर नहीं भागेगा. वह ऐसा कर के ‘रणछोड़’ नहीं कहलाएगा. वह दांव जरूर खेलेगा. वह बहादुर है कोई कायर नहीं. वैसे भी वह यह दांव जरूर जीतेगा…

यह सोच कर नेतिया जोश में आ कर बोला, ‘‘आओ बे, लगी सत्या दांव पर. मैं युधिष्ठिर, सत्या द्रौपदी. आओ बे कौरवो, देखना आज पांडव जीतेगा, कौरव हारेंगे. अब कोई उठ कर नहीं जाएगा. नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं,’’ नेतिया ने ऐलान किया.

कोलाहल. उत्सुकता का माहौल. भीड़ पर भीड़. बाजी लग गई. सब के चेहरे पर एक ही सवाल कि अगर नेतिया हार गया तो सत्या का क्या होगा?

ताश के एकएक पत्ते पर सब की निगाह… और फिर एक और महाभारत की शुरुआत. नेतिया दांव हार गया. भीड़ हैरान. चारों तरफ बेचैनी का ज्वारभाटा कि अब आगे क्या होगा? क्या सत्या जुआरियों की हो जाएगी?

सत्या का छोकरा दौड़ता हुआ घर आया, ‘‘मांमां, तू हार गई.’’

सत्या को एकदम से कुछ समझ में नहीं आया. वह झंझला कर चीख कर बोली, ‘‘क्या बक रहा है नाशपिटे? कौन हार गई?’’

‘‘मां, तू जुए में हार गई. बापू ने तुझे दांव पर लगाया था. वह दांव हार गया. पीपल के नीचे बापू सिर पकड़े बैठा है. लोग उस पर हंस रहे हैं.’’

सत्या को जैसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. हजारों बिच्छुओं ने जैसे उसे एकसाथ डंक मार दिया
हो. उसे पता था उस का आदमी जुआरी है, लेकिन वह उसे ही दांव पर लगा देगा, उसे इस बात का भरोसा नहीं हो पा रहा था.

लेकिन जुआरी कौन सा दांव खेल जाए, इस का क्या भरोसा… किसी अनहोनी के डर से सत्या ने अपने देवर चेतराम को आवाज लगाई, ‘‘चेता, ओ चेता.’’

चेतराम उस समय जानवरों को चारा डाल रहा था. वह अपनी भाभी की आवाज सुन कर आया, ‘‘हां, क्या हुआ भाभी?’’

‘‘देख, तेरे भैया ने क्या नरक रचा है,’’ फिर सत्या ने सारी बात चेतराम को बताई.

चेतराम भाभी की बात सुनते ही भड़क गया, ‘‘भाभी, ऐसे काम नहीं चलेगा. इन्होंने इस युग को भी द्वापर युग ही समझ रखा है. ये द्रौपदी की जगह तेरा चीरहरण करना चाहते हैं. जरा मोटा वाला लट्ठ ला और तू भी लाठीडंडा उठा. मैं देखता हूं इन ससुर जुआरियों को.’’

‘‘सही कह रहा है तू चेता. इन सब के दिमाग में आज भी वही गोबर भरा हुआ है कि जब देखो औरत को दांव पर लगा दो. तू रुक जरा. मैं शेरा, भूरा, बेलू, मल्खे और टेलू जुआरियों की बीवियों को भी बुला लाती हूं.

वे सब की सब भी दुखी हैं इन की करतूतों से. अब इन्हें ठीक करने का समय आ ही गया है,’’

सत्या की आवाज सुन कर केवल जुआरियों की बीवियां ही नहीं, बल्कि घर की दूसरी औरतें भी आ गईं. इन
10-12 औरतों के हाथों में झाड़ूडंडे थे.

ये सब की सब चेतराम के साथ चुपके से पीपल के पेड़ के पास जा पहुंची, जहां पहले से ही भीड़ जमा थी. फिर इन्होंने अचानक से अपने जुआरी पतियों की ?ाड़ूडंडों से खबर लेनी शुरू कर दी… दे दनादन.

जुआरियों ने भागना चाहा तो औरतों ने मिल कर उन्हें नीचे गिरा लिया और उन की औरतें उन की छातियों पर चढ़ कर बैठ गईं.

सत्या नेतिया की छाती पर बैठी चीख रही थी, ‘‘चीरहरण करवाने चले थे मेरा इन जुआरियों, कबाबियों से. द्वापर की द्रौपदी समझ रखा है क्या सत्या को. द्वापर नहीं, यह कलियुग है कलियुग. किसी ने हाथ भी लगाया तो खून पी जाऊंगी उस का.’’

सत्या नेतिया का गरीबान पकड़े उस की छाती पर सवार थी. वह इस समय खतरनाक शेरनी बनी हुई थी.
तभी ग्राम प्रधान ने 112 पर फोन कर पुलिस को बुला लिया. दारोगा रामप्रकाश ने भी जुआरियों को खूब हड़काया, फिर उन्हें जीप में डाल कर आगे की कार्रवाई के लिए थाने ले गया.

एक सोचीसमझी रणनीति के तहत इन जुआरियों के परिवार में से कोई भी उन की मदद के लिए थाने नहीं गया. किसी ने उन की जमानत भी नहीं करवाई.

जब धरे गए सभी जुआरी सजा काट कर वापस आए, तो उन्हें घर में तभी घुसने दिया गया जब उन्होंने कान
पकड़ कर फिर कभी जुआ न खेलने की कसम खाई. Family Story In Hindi

Story In Hindi: लकवा

Story In Hindi: इस समय सुबह के साढ़े 7 बज रहे थे. मौसम ठीकठाक था. ज्यादा चुभती धूप नहीं थी. बच्चे स्कूल जा रहे थे. सफाई मुलाजिम सड़क साफ कर रहे थे. दूध वाले अपने ग्राहक के घर पर दस्तक दे कर ‘दूध ले लो, दूध आ गया’ की आवाज लगा कर उन को बाहर बुला रहे थे. कुलमिला कर सभी बिजी थे.

इधर मनु का ठेला भी तकरीबन तैयार था. अमरूद, केला, नाशपाती, पपीता, संतरा और सेब अच्छी तरह से लगा दिए गए थे.

मनु ने अपनी बहन बाली को चूम कर उस का धन्यवाद किया कि उस ने कितने करीने से सारा ठेला दुलहन के जैसे सजा दिया था.

दाएं हाथ से धीरेधीरे ठेलते हुआ मनु चल दिया. अपनी गली से आगे बढ़ कर दूसरी गली पर आया ही था कि ‘ओ हीरो, एक गुच्छा रख दे…’ उमा की आवाज आ गई.

उमा की बहन रमा को पीलिया था. सुबह उमा मनु से केले का गुच्छा रखवा लेती थी. रमा को केला, गन्ने का रस और छिलके वाली मूंग की दाल का आहार देना तय था.

उमा ने 10-10 के 3 नोट रख दिए मनु के हाथ में. मनु ने रुपए लिए, माथे से लगा कर जेब में रख लिए और हंस कर उसे धन्यवाद भी कहा और 24 घंटे के अंतराल में दोनों का आंखों ही आंखों में संवाद भी हो गया.

दोनों ने पलकें झपका कर एकदूसरे को अपनी कुशल दे दी थी.

उमा मनु की बचपन की साथी थी. उम्र में उस से 4 साल बड़ी थी, पर उस से कुछ नहीं होता. मनु और उस की खूब गहरी छनती थी. दोनों त्योहार पर रंगोली बनाते थे. गरबा रास में 9 दिन साथसाथ जाया करते थे.

कितना मजा था तब. जब मनु 16 का था और उमा 20 की थी.

मनु एक हाथ से ठेला खिसका रहा था. उस के बाएं हाथ में लकवे का असर था. 3 साल पहले उस के पूरे बाएं अंग में लकवा हुआ था. अब चेहरा तो ठीक हो गया है, पैर भी काफी दुरुस्त हैं, मगर हाथ अभी भी कमजोर है. बस, दायां हाथ ठीक चलता है.

उमा केले ले कर भीतर आ गई. हाथोंहाथ एक केला छील कर उस ने रमा को खिला दिया. उमा को 2 घंटे में काफी जल्दी से सब काम करने थे, उस के बाद उस को भी काम पर जाना था.

उमा की मां भी कहने को घर पर हैं, मगर वे अपने किसी विश्वास के चलते सुबह 6 बजे से 10 बजे तक मंदिर में जाप करती हैं, शायद रमा ठीक हो जाए. उन की नजर में यह पीलिया एक दैवीय प्रकोप है.

उमा ने लाख समझाया है कि यह दवा और आहार से ठीक होगा, मगर वे न तो डाक्टर हैं और न ही नौकरी करती हैं. वे शायद अपना होना और अपनी अहमियत को साबित करने के लिए मंदिर चली जाती हैं.

मां कहती रहती हैं, ‘‘मैं इतना नियमधर्म करती हूं तब जा कर यह घर सकुशल है.’’

घर पर भी उठतेबैठते मां कुछ न कुछ नाम जपती ही रहती हैं. उमा अपने घर पर, मां के इन धार्मिक ढोंग और पोंगापंडितों की चरणपूजा से नफरत करती थी.

उमा घर पर कहती भी थी कि शुद्ध घी का हलवा भगवान को भोग लगाने की जगह लावारिस लोग, जो फुटपाथ पर हैं, को सादा खिचड़ी ही खिला दो. भगवान के 4 समय पोशाक और परिधान बदलते हो, उस जूता मरम्मत करने वाले अंकल को बैठने के लिए एक आसन दे दो. मगर उस की कौन सुनता है. मां अगर उस की सुन लेंगी, तो उन को अपने बेरोजगार होने का डर है.

उमा अपना फर्ज पूरा करती है. वह अपना काम करती है और पूरे समर्पण से करती है.

रमा को अब पीलिया हुए 2 हफ्ते हो गए हैं. वह धीरेधीरे ठीक हो रही है, मगर मां का कहना है कि यह उन के तप और पूजापाठ का ही फल है.

अब डाक्टर के कहने पर उमा ने बूंद भर घी में बघारी हुई मूंग की दाल और पतलीपतली चपाती बना कर रमा को खिलाईं. इतना अच्छा खाना खा कर रमा तन और मन दोनों से चुस्तदुरुस्त होती जा रही है.

‘‘अब हफ्ते बाद सुबह तुम को आलू के परांठे बना कर मैं खिलाने वाली हूं,’’ कह कर उमा ने रमा को बगैर दूध की चाय बना कर भी पिलाई.

रमा के उमा का हाथ चूम लिया. रमा का हर राज जानती है उमा. रमा के प्रेम संबंध, उस का ब्रेकअप और ब्रेकअप के बाद का डिप्रैशन, सब उमा ने सुनसुन कर बांट लिया.

खुद रमा की उमा दीदी ने भी तो कैसा जीवन देखा है और झेला है. बस, वही तो जानती है. एक दिन तो वह अपने से छोटे मनु को मन ही मन पति मान बैठी थी. तब सारे महल्ले ने उस को कैसा बदनाम किया था.

उमा घबरा कर अपनी बूआ के पास दिल्ली चली गई थी, मगर वहां भी 10 दिन से ज्यादा न टिक सकी थी. बूआ का देवर खुलेआम छेड़ा करता था उस को. बूआ तो देख कर भी अनदेखा कर देती थीं.

उमा ने बूआ को एकाध बार उस ने संकेत भी किया, मगर वे तो खुद अपने देवर की आधी पत्नी बनी हुई थीं.

बूआ के पति सैकड़ों मील दूर झारखंड में कोयला खान में काम करते थे. वे महीनों तक घर नहीं आते थे. रखवाली के लिए अपना भाई अपनी पत्नी को सौंप गए थे. अब देवरभाभी एकदूसरे की काफी अच्छी देखभाल कर रहे थे.

इतनी बेहूदगी उमा से सहन नहीं हो रही थी, इसलिए उमा ने वहां से चले जाना ही ठीक समझा और लौट कर घर आ गई. तब तक मनु पर लकवे की मार असर कर चुकी थी.

रमा से यह खबर सुन कर उमा का तो कलेजा ही धक से रह गया था. उसे रातों को नींद नहीं आती थी. कितनी बार वह सोचती थी कि उसी की वजह से मनु को यह लकवा हुआ, मगर मनु की बहन बाली से तो उस का खूब प्यार का नाता था. बाली ने सब खुलासा किया. उस ने बताया कि गलत खानपान और बीड़ी पीने से यह समस्या हुई थी.

‘‘ओह, मनु…’’ इतना कह कर और अपना डूबता हुआ दिल संभालती हुई मनमसोस कर रह गई उमा.
मनु ने कालेज की पढ़ाई भी बीच में छोड़ दी थी. उसे किसी ने निजी बस में टिकट काटने का काम दिया था. हर रोज 100 मील चलती थी बस. उस को सुबह 9 से शाम 7 बजे की ड्यूटी करनी होती थी.

मनु को यह काम ठीक लगा था. उसी दौरान वह बस चालक की संगत में बीड़ी पीने लगा. खैर, अपनी कमाई थी. जो मरजी करो, कौन देखने और रोकने आ रहा था, इसलिए बिंदास पी रहा था वह. कभीकभार महंगी सिगरेट भी पी लेता था.

मगर एक दिन बस में कुछ मनचले छोकरों को टोकने पर मनु के साथ भयंकर हाथापाई हो गई थी और उस ने नौकरी छोड़ कर घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम ले लिया था. दूसरी से 5वीं तक के बच्चों को मनु गणित पढ़ाता था और बस इसी दौरान उस को लकवा मार गया.

मनु की एक छोटी बहन थी. वह भी 10वीं में पढ़ती थी. उस के वश में इतना ही था कि मजबूर और मजदूर मांबाप की खरीखोटी सुन कर उसे वैसा का वैसा मनु को सुना दे. मनु का सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा था. उस की इस गली से केवल 200 कदम दूर सरकारी अस्पताल था. उसी के करीब एक निजी अस्पताल भी था.

इलाज कराना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था, बस यह बायां शरीर काम करने लगे, अब मनु के लिए दिनरात सोतेजागते का एक यही सपना रह गया था.

वहीं 10 रुपए में एक थाली भोजन भी मिल जाता था. मनु घर आता और अपने आंसू पी कर बस चुपचाप बिस्तर पर पड़ा रहता था. डाक्टर उस से खूब बात करते थे.

दरअसल, मनु का पढ़ालिखा होना डाक्टर को अच्छा लगा. वे खुश थे कि अनपढ़ मजदूर मातापिता की संतान मनु की सोच अच्छी है. मनु में धीरज कूटकूट कर भरा था.

धीरेधीरे मनु अच्छा हो रहा था. डाक्टर ने ही उस को अपने किसी जानकार से कह कर 10,000 का बिना ब्याज का लोन दिलाया था. 8,000 का ठेला और 2,000 के फल खरीद कर मनु ने बहुत ही मन से ठेला लगाना शुरू कर दिया था. उस निजी अस्पताल के बाहर सेब खरीदने वाले आते ही थे, केले भी बिक जाते थे.

पहले ही दिन मनु की जेब में 3,000 रुपए थे, जबकि शाम ढलने तक सारे फल बिके नहीं थे. आज भी उस ने 10 रुपए का एक थाली भोजन खा लिया था. शाम को वह डाक्टर के पास रुपए ले कर गया.

डाक्टर ने मनु के हाथ में नोट देख लिए थे. वे हंस कर बोले, ‘‘कम से कम 3 महीने बाद लौटाना.’’

‘‘अरे, आज ही…’’ मनु बोला.

‘‘नहींनहीं, अभी बिलकुल नहीं चाहिए. अभी तुम खुश रहो. दवा लो और अपना खयाल रखो. हफ्ते बाद चैकअप करा लेना,’’ कह कर डाक्टर अपने राउंड पर चले गए. मनु अपने नोट दबाए वैसा ही बुत बना रहा.

इस तरह ठेला खींचते हुए और फल बेचते हुए मनु को 2 महीने हो रहे थे. अब उमा भी कुछ बेशर्म हो गई थी. वह न महल्ले की चिंता करती थी, न कहनेसुनने वालों की. अपना काम बनना चाहिए, बस यही उस का मूल मंत्र हो गया था, इसलिए सुबह की मनु की पहली ग्राहक वही थी.

अब रमा ने एक अंगड़ाई ली और बारबार भुवन के बारे में सोचने लगी. रमा को एक पार्टी में बुलाया था उस ने. फोन पर संदेश था उस का. एक हफ्ते बाद 3 दिन तक जश्न है होटल हैवन में. किसी भी शाम को आना, बस बता देना. शाम 7 से रात 11 बजे तक पार्टी चलती रहेगी.

उमा अब तैयार हो गई थी. वह एक वृद्धाश्रम में नौकरी करती थी. उस का काम था 30 लोगों के इस वृद्धाश्रम में सुबह साढ़े 10 से शाम 5 बजे तक की दिनचर्या का पूरा रजिस्टर भरना. यहां आनेजाने वाले डाक्टर और दूसरे विजिटर्स का भी एक अलग रजिस्टर था. हर हफ्ते की पिकनिक और सिनेमा ले जाने का भी जिम्मा उमा का ही था.

उमा को यहां काम करते हुए 7-8 महीने होने आए थे. यहां रहने वाले बुजुर्ग लोग कितने अमीर थे, मगर कितने अकेले थे. उमा यह करीब से जानती और महसूस करती थी. उमा चली गई और मां अभी लौट कर आई नहीं थीं.

रमा ने आज कोशिश कर के स्नान कर लिया था. बुखार नापा. आज बुखार नहीं था. कुछ देर बाद एक कप दूध पी कर देखा. न तो उलटी आई और न ही जी मिचलाया यानी पीलिया जड़ से मिट रहा था. उस ने फोन पर एक गीत चलाया और नाचने लग गई.

नाचते हुए रमा आईने के करीब आ गई. आई ब्रो रेजर लिया और अपनी भवें तराश लीं. वाह, क्या चेहरा निखर गया था उस का. उस ने खुद को ही चूम लिया.

रमा शायद मूड में थी. उस ने मां को खींच कर अपने पास बिठा लिया. मां की गोदी में लेट कर पूछने लगी, ‘‘आज कुछ देर बाहर चली जाऊं मां?’’

‘‘मैं कुछ कहूं उस से पहले खुद से पूछ, ताकत है भी कि नहीं?’’ कह कर मां उस को थपकी देने लगीं.

रमा अपनी मां को कुछ दलीलें देने लगीं. मां उस की दलील सुन कर मन ही मन खिलखिलाहट से भर गईं. वे खुद भी तो ऐसी ही थीं आजादखयाल. मौजमस्ती की शौकीन. पिता और चाचा की लाड़ली. स्कूल में दर्जा 2 से मोहन के प्यार में पागल थीं वे. छठी जमात में आईं, तो उन दोनों ने मंदिर में शादी ही कर ली थी. दोनों दोपहर 2 बजे मंदिर गए. मंदिर बंद था, मगर मोहन ने बंद मंदिर को ही साक्षी बना कर उस की मांग भर दी.

फिर वे दोनों एकदूजे को गले लगा कर यों ही बैठे रहे थे. शायद ऐसे ही रहते और शाम से रात हो जाती, मगर ऐसा हुआ नहीं. कुछ आवाजों ने उन को झकझोर कर जगाया.

वह तो मोहन के दोस्त आ गए थे. ताजा खबर यह थी कि मोहन और मीना दोनों ने शादी कर ली.

यह सुनते ही मीना ने मोहन की मदद से मंदिर के अहाते में नल का पानी चला कर ताजा भरी हुई मांग को धोया और दोनों सरपट भागे अपनेअपने घर. दोनों के घर पर मुखबिर पहुंच गए थे. काफी नमकमिर्च लगा कर कहानी बना कर सुना दी गई थी.

अब 10 दिन मीना स्कूल नहीं गई. फिर टीचर और प्रिंसिपल के सम?ाने पर दोनों स्कूल जाने लगे थे. मीना के घर पर संयुक्त परिवार था. मोहन के घर पर उस का बड़ा भाई और मां ही थे. मीना अकसर ही मोहन के घर चली जाती थी. 10वीं तक तो पूरा कसबा ही उन दोनों को पतिपत्नी कह कर मजे लेने लगा था.

बस, अब सहन करना मुश्किल था. मीना और मोहन घर से भाग गए. भाग कर जाते किधर और कहां. कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कुछ दिन बाद बनारस की बस ले कर घाट पर भीख मांगने लगे. महीनेभर बाद धर लिए गए.

मीना को घर पर ला कर नजरबंद कर दिया गया.

मोहन की जिंदगी तो 3-4 दिन बाद सामान्य हो गई थी. 2 साल किसी जेल खाने वाली जिंदगी जी कर काटी मीना ने. इस बार वे दोनों ज्यादा तैयारी के साथ भागे, मगर कुछ मुखबिर उन से भी ज्यादा होशियार निकले.

एक हफ्ते बाद वे दोनों हरिद्वार में भीख मांगते हुए पकड़े गए और घर वापस लाए गए. मोहन की पिटाई हुई. फिर उस की अकेली मां को याद कर उसे धमकी देकर छोड़ दिया गया.

अब मीना 18 साल की थी. एक महीने में उस की सगाई कर दी गई. सूरत में कपड़े के कारोबारी की दुलहन बन कर वह ससुराल आ गई.

ससुराल में पति से ज्यादा जवान उस के ससुरजी थे. मीना कितनी ही बार ससुर के गलत स्पर्श से बची. अब वह पुरानी वाली मीना नहीं थी. मोहन को फोन कर उस ने सब बताया. एक दिन मोबाइल पर ससुरजी की वीडियो बनाई और अपने पीहर भेज दी.

इधर मीना के पीहर वाले उसे वापस ले गए और उधर मोहन से लगाव फिर शुरू हो गया था. थकहार कर परिवार ने उन दोनों को सात फेरों की इजाजत दे दी. मीना और मोहन अब पतिपत्नी बन गए. 10 महीने बाद उमा का जन्म हुआ. जीवन सरल था, मगर ठीक ही था मगर समय को कुछ और ही मंजूर था. उमा के जन्म के एक महीने के अंदर ही मोहन की सड़क हादसे में याददाश्त चली गई. वह अगर घर से बाहर जाता, तो घर का पता भूल जाता.

मीना ने मजदूरी शुरू कर दी. उस के पीहर से महीने का पूरा राशन और उमा का बेबी फूड समय पर आ जाता था, मगर अभी मोहन का छोटा भाई भी बेरोजगार था. मीना के पीहर की मदद से उस को भी काम मिल गया.

अब जैसा भी था, खाने पीने की कोई फिक्र नहीं थी. जीवन चल रहा था.

4 साल बाद रमा का जन्म हुआ और मोहन नींद में चल बसा.

मीना के पीहर ने उस की मदद की. रमा के लालनपालन की भी जिम्मेदारी ली. अब तो सास भी चली गई थी. देवर ने शादी कर के अलग घर बसा लिया था.

मीना का अजीबोगरीब जीवन अपनी गति से चल रहा था. अब वह इस कांटों भरे जीवन को अपनी ही हरकतों का नतीजा मानती थी. उसे लगता था कि आज उमा इतनी मेहनत कर रही है, काश, मीना सही रहती. परिवार का मान रखती. शायद आज उस के दिन कुछ और ही होते… काश.

‘‘मैं जा सकती हूं न?’’ रमा ने उस को झकझोर कर पूछा, ‘‘बताओ न?’’

‘‘जरूरजरूर, क्यों नहीं. अपने जीवन का जोखिम खुद ही उठाना सीखो. जाओ, और अपना खयाल रखो,’’ कह कर मीना चाय बनाने चली गईं.

शाम को घर आते ही उमा को भी खबर मिल गई कि तैयार हो कर रमा हैवन होटल जा रही है.

‘‘भुवन के चक्कर में है न?’’ उमा ने पूछा.

‘‘अरे, सब सेफ है दीदी, कोई खतरा नहीं. आप मुझ पर भरोसा रखो,’’ कह कर रमा ने उसे गले लगा कर चूम लिया. गुलाब के चालू किस्म के इत्र की महक उमा की नाक में भर गई.

‘‘रमा, कुछ भी तेल और मसाले का मत खा लेना. अभी सावधान रहना.’’

‘‘अरे, अभी तो देर है. अभी नहीं जा रही.’’

‘‘तब तो, इधर देख, सुन, रसोई में मूंग दाल है. उसे पी ले. पेट भर ले यहीं,’’ उमा ने उसे समझाया, तो रमा एकदम मान गई और दाल पीने लगी. आधापौना घंटा खुद को और संवार कर निखार कर वह चली गई.

भुवन रमा को सही जगह पर मिल गया. उस होटल में विदेशी मेहमान थे. रमा इस से पहले भी ऐसी पार्टी
में गई थी. अभी 3 लोग भाषणबाजी करेंगे. सब को गिफ्ट मिलेंगे और फिर खाना और पीना गपशप… फिर सब अपनेअपने घर.

रमा ने इधरउधर देखा. कुछ लड़कियां उस की देखीभाली सी लगीं. कुछ महीने पहले उस ने शालीमार होटल में इन को देखा था.

तकरीबन 3 घंटे बाद सब हंस कर विदा हुए. भुवन ने उसे घर तक छोड़ा. 500 का लिफाफा दिया. यही तो मेहनताना था. रौनक बढ़ाओ, खाना खाओ और 500 रुपए अलग से.

रमा के लिए यह क्या बुरा था. वैसे, वह बीए पास करने के बाद कुछ अच्छी नौकरी भी करने की सोच रही थी.

इसी तरह 3-4 हफ्ते और निकल गए. रमा एक बार और भुवन की बताई पार्टी मे सजसंवर कर शोभा बढ़ा आई थी. इस बार 700 रुपए मिले थे.

उधर मनु का फल का ठेला आमदनी देने लगा था. मनु को डाक्टर का भक्त बन गया था.

एक दिन डाक्टर ने उस को जिंदगी की सचाई पर एक प्रेरक भाषण दिया. डाक्टर ने बताया कि अगर बीमारी लाइलाज हो जाए तो इलाज में पैसा लगता है, इसलिए 2-4 लाख रुपए पास होने चाहिए. इस के लिए दुनियादार होना चाहिए. समझदार होना चाहिए.

21 साल के मनु को डाक्टर की हर बात बहुत अच्छी लग रही थी. वह गरदन हिला कर सुन रहा था.
अब डाक्टर की हर बात मनु के लिए माननीय होती. एक हफ्ते बाद डाक्टर उस को अपने साथ अपने फार्महाउस ले कर गए. तकरीबन आधा घंटा वहां रह कर मनु ने काफीकुछ देखा और सीखा.

वहां एक लड़की से परिचय कराते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘यह मेरी बहन की बेटी है. दिव्यांग है. उम्र 25 है मगर इस का दिमाग 14 साल का है. इस से शादी करो तो यह फार्महाउस मैं तुम को उपहार में देना चाहता हूं.’’

यह सुन कर मनु के सिर पर बिजली सी गिर गई. उस की आवाज कांपने लगी. उसे अचानक महसूस हुआ कि वह कितना अमीर है. वह कितना दौलतमंद है. कुछ बहाना बना कर उस ने टाल दिया डाक्टर ने उस की बात का बुरा नहीं माना. वे दोनों वापस लौट आए.

इस घटना के 2 दिन बाद मनु के मामा उस के घर आए. उस की मामी को अस्पताल लाए थे. मामी अभी 30-35 साल की थीं. उन के दिमाग में ट्यूमर हो गया था. मामी का सरकारी इलाज हुआ. दिमाग की सर्जरी हुई. कुल 4 लाख का खर्च आया. 3 लाख सरकार ने दिए.

एक लाख का मामा ने किसी तरह इंतजाम किया.

मामी को घर लाया गया. वह जिंदा थीं मगर अब उन का दिमाग मरा हुआ सा था. अब मामा को जिंदगीभर नौकरी भी करनी थी, मामी की सेवाटहल भी.

मामा की माली हालत ठीकठाक थी. अब तो यह सब देख कर मनु के पैरों से जमीन खिसक गई. वैसे तो वह भी लकवे के चलते दिमाग से हाथ धोने वाला था. वह तो उसे सही दवादारू मिल गई.

मनु ने अगले दिन डाक्टर से मुलाकात की. डाक्टर ने उस की एकएक बात गौर से सुनी. इस तरह सब ठीक हो गया.

अब एक साल बाद हालात एकदम अलग हैं. मनु अपने फार्महाउस पर रहता है. उस के दोनों हाथ सामान्य से लगने लगे हैं यानी लकवे का असर तकरीबन 10 फीसदी ही बचा है.

फार्महाउस में फल और फूल उग रहे हैं. कुछ कमरे किराए पर उठा रखे हैं. मनु की पत्नी अपने बचपने के साथ उस को कभी भी किसी भी समय गले लगा लेती है.

मनु की बहन बाली एक महंगे कालेज में पढ़ाई रही है. मनु के मातापिता एक किराने की दुकान पर ठाट से गल्ले पर बैठते हैं. दुकान संभालने के लिए असिस्टैंट है.

उमा की नौकरी जस की तस है. रमा ने एक होटल में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली है.

महल्ले वाले मनु के घर की तरफ संकेत कर के कहते हैं कि ‘देखोजी, कौन मानेगा कि इस जगह जो कबाड़ी अपनी दुकान लगाता है, यहां मनु का परिवार रहता था’. Story In Hindi

Social Problem: बंदरों का खौफ

Social Problem: अभी हाल ही में एक खबर पढ़ने को मिली कि दिल्ली के कुछ इलाकों में बंदरों का खौफ कायम हो चुका है. हैरत हुई कि दिल्ली में बंदर, तो फिर वहां प्रशासन के क्या हालात हैं?

जब थोड़ी खोजबीन की तो दिलचस्प मामले सामने आए कि बंदर न सिर्फ चीजों को नुकसान पहुंचा रहे है, बल्कि उन के काटने की संख्या में भी बढ़ोतरी हो रही है, इसलिए दिल्ली नगरनिगम में लोग उन से बचाव के लिए गुहार लग रहे हैं.

बात यहां तक आ पहुंची है कि लोग अब शिकायतें करने लगे हैं कि दिल्ली नगरनिगम उन की शिकायतों पर ध्यान नहीं देता. उधर, नगरनिगम हैरान है कि वह इस समस्या से निबटे कैसे?

इस के पीछे वजह यही है कि लोगों की आस्था इन बंदरों के प्रति कुछ ज्यादा ही है. पहले तो वे इन्हें बड़े ही श्रद्धा और प्यार से केले, चने, मूंगफली जैसी चीजें खिलाते हैं कि हनुमानजी के वंशज हैं, पर जब ये बागबगीचों के पौधों या गमलों को तोड़ने और तहसनहस करने लगते हैं, तो लोगों की नींद टूटती है.

और अगर कहीं बंदर नोंच या काट लें, तो उन को दिन में तारे दिख जाते हैं. उन की आस्था धरी की धरी रह जाती है, क्योंकि बंदरों के काटने से भी रेबीज रोग होता है. ऐसे में महंगे इलाज के चक्कर में जेब पर तो चपत लगती ही है, समय का भी नुकसान होता है सो अलग.

दिल्ली की एक कालोनी ग्रेटर कैलाश पार्ट 2 में वैलफेयर एसोसिएशन के संजय राणा के मुताबिक, जहांपनाह वन और बत्रा अस्पताल के बीच बंदरों को खिलाने के लिए लोगों ने ‘मंकी पौइंट’ बना रखे हैं. अब बंदर हैं, तो वे खाने के लिए आगे बढ़ेंगे ही.

संजय राणा ने दावा किया कि खाने की तलाश में बंदर आगे बढ़ कर आसपास के इलाकों में चले जाते हैं और इन के रास्ते में जो भी आएगा, वह उन के हमले का शिकार होगा ही.

दरअसल, बंदरों का कौतुक हमें अच्छा लगता है. बंदरों का घरोंदीवारों पर चढ़नाभागना, चीखपुकार मचाना अच्छा लगता है कि कैसे वे किसी घर या दुकान से कोई सामान चुराते और ले भागते हैं.

पर ये बंदर कभी अकेले नहीं होते. झुंड के झुंड में बंदरों के बीच छीनाझपटी चलती है और सभी लोग इसे मुफ्त के मनोरंजन के रूप में देखते हैं.

दिक्कत तब होती है, जब उन्हीं लोगों में से कोई बंदर की चपेट में आता है और तब सारी आस्था और भक्ति भाव धरे के धरे रह जाते हैं. फिर ऐसे लोग सरेराह सरकार को कोसने और गालियां देने लगते हैं, जबकि बाकी लोग मजे लेते हुए तमाशबीन बने रहते हैं.

इन बंदरों को भगाने के लिए अनेक फौरी उपाय किए जाते हैं, मगर उन्हें जान से मारा नहीं जा सकता, क्योंकि तत्काल आस्था की बात उठ जाती है. ऐसे में एक उपाय यह है कि इन की नसबंदी कर दी जाए, ताकि इन की तादाद न फैले. मगर यह इतना आसान नहीं होता.

बंदरों को भगाने के लिए भाड़े पर लंगूर मंगाए जाते हैं. यहां यह जानना रोचक है कि बंदर हों या लंगूर, ये सभी तो हनुमान के ही वंशज माने जाने चाहिए, फिर ये बंदर इन लंगूरों से इतना डरते क्यों हैं कि उन से अपनी मारकुटाई से बचने के लिए यहांवहां भागते फिरते हैं?

दिल्ली नगरनिगम के अफसरों के मुताबिक, वर्तमान में 250 नगरपालिका वार्डों में निगम के पास 10 बंदर पकड़ने वाले हैं. एक अफसर ने स्वीकार किया कि हर दिन हमें मिलने वाली शिकायतों के आधार पर उन की मांग बहुत ज्यादा होने के चलते हम उन्हें उपलब्ध नहीं करा पाते, क्योंकि मंकी कैचर्स की संख्या बहुत कम है.

हम ने ज्यादा बंदर पकड़ने वालों को हमारे साथ काम करने के लिए एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया था.

दिल्ली सरकार के वन्यजीव विभाग की जारी रसीद के आधार पर नगरनिगम बंदर पकड़ने वालों को प्रति बंदर फंसाने पर 1,800 रुपए का भुगतान करता है. पकड़े गए बंदरों को असोला भट्टी खान में ले जाने के बाद वन्यजीव विभाग की ओर से बंदर पकड़ने वाले को रसीद जारी की जाती है, जिसे वे अपना प्रतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए सौंपते हैं.

इस के उलट लोगों ने जानकारी दी कि न तो बंदरों को फंसाने से और न ही नगरनिगमों की ओर से शुरू किए गए नसबंदी अभियान से उन की बढ़ती आबादी को रोकने में कामयाबी मिली है.

प्राइमैटोलौजिस्ट इकबाल मलिक ने बताया कि अचानक से बंदरों को पकड़ने से उन के झुंड छोटे हो जाते हैं, लेकिन फिर वे ज्यादा आक्रामक भी हो जाते हैं. इस के साथ लोग उन्हें हाई कार्बोहाइड्रेट और चीनी वाला आहार खिलाते हैं, जिस के वे आदी हो जाते हैं, इसलिए आवासीय इलाकों में जाते हैं.

यहां यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि बंदर के काटने का कोई रिकौर्ड नहीं रखा गया है और न ही अभी तक जानवरों की जनगणना की गई है. लेकिन माहिरों ने माना है कि बंदरों के ये झुंड ज्यादातर रिज, असोला गांव, एलजी हाउस के पास के इलाके, सिविल लाइंस, विठ्ठलभाई पटेल हाउस, मीना बाग एरिया, बड़ा हिंदू राव के पीछे के इलाके जैसे आवासीय इलाकों में भोजन की तलाश में जाते हैं.

ताजा घटना यह है कि दिल्ली के आयानगर में एक बंदर ने अकेले आतंक फैला कर रख दिया. उस ने तकरीबन 50 लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया. आमतौर पर होता यह है कि जब कोई पशु सघन रिहायशी इलाकों में आता है, तो भीड़ इकट्ठा हो जाती है.

ये पशु आमतौर पर भोजन की ही तलाश में आते हैं और जब कोई पशु तमाशबीनों की भीड़ पर हमला करता है, तो भगदड़ सी मच जाती है. इस भगदड़ से भी लोग घायल होते हैं. अब कोई असावधान है, या कोई वाहन चला रहा है, तो उस पर हमला हो या भगदड़ मच जाए, तो हादसे होंगे ही.

बंदरों के प्रति श्रद्धा की खास वजह यही रही है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में उन्हें ईश्वर का रूप बताया गया है. यह लोक आस्था है कि ‘रामायण’ में वर्णित सुग्रीव की बंदरों की विशाल सेना ने राम का सहयोग किया था. इस में हनुमान प्रमुख थे, जिन्होंने हमेशा राम के साथ सेवा भाव से सहयोग किया. और यही वजह है कि इन की उपासना की जाती है.

यहां तक तो ठीक है, लेकिन अगर आसपास से कहीं बंदरों का हुजूम आ कर रहने लगे, तो उन्हें भी बैठेबिठाए मंदिर परिसर में खाने को मिल जाता है. शुरू में लोग ध्यान नहीं देते कि चलो भगवान के दूत हैं ये बंदर. लगे हाथ इन्हें भी कुछ खिला देने में हर्ज क्या है. सो, वहां चने, मूंगफली, केले, फल वगैरह की भी दुकानें खुल जाती हैं.

इस से तीर्थयात्रियों या पर्यटकों का तो कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन स्थानीय लोगों को इस की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि बंदरों का यह हुजूम आगे बढ़ कर उन के घरबार के आगे उपद्रव मचाने लगता है.

हनुमान क्या हैं, इस पर भी विवाद है. यह तो तय है कि वे बंदर प्रजाति के हैं. अब बंदर के लिए ‘रामचरितमानस’ में 2 और शब्द हैं, कपि और वानर.

‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने बंदरों के संदर्भ में अनेक जगह पर कथावाचक शिव द्वारा उन्हें वानर कहा गया है. वानर यानी विशेष नर, जिस पर विद्वानों ने अपने विचार दिए हैं कि हनुमान बंदर नहीं, वानर हैं, जबकि तुलसीदास ने हनुमान का वर्णन आने पर अनेक जगह पर उन्हें कपि कहा है, जैसे ‘जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश तिहूं लोक उजागर’.

लोकप्रिय ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के अलावा तुलसीदास ने अन्य साहित्यिक कृतियों की रचना की है, जिन में से एक ‘हनुमानाष्टक’ भी है. वहां वे उन्हें कपिसूर कहते हैं.

हालांकि, ‘रामचरितमानस’ में राम को अपना परिचय देते हुए हनुमान कहते हैं, ‘नाथ सैल पर कपिपति रहई. सो सुग्रीव दास तव अहई’. इस का अर्थ यह है कि पर्वत पर बंदरों के राजा सुग्रीव हैं, जिन का मैं सेवक हूं.

वहीं जब लंका दरबार में अंगद से रावण पूछता है, ‘कह दसकंठ कवन तैं बंदर. मैं रघुबीर दूत दसकंधर’. इस का अर्थ यह हुआ कि अरे बंदर, तू कौन है? इस पर अंगद कहता है कि हे दशग्रीव, मैं रघुवीर का दूत हूं.

इसी बंदर प्रजाति में लंगूर भी आते हैं, जिस से बंदर बहुत डरते हैं. बंदर भगाने वाले लोग इसी पालतू लंगूर की सेवा लेते हैं. बंदर लंगूरों से इतना डरते हैं कि उस की आवाज भर से ही वह भाग जाते हैं, इसलिए कुछ लोग लंगूरों की आवाजें निकाल कर भी बंदरों का भगाने का काम करते हैं.

यहां सवाल यह भी है कि अगर सभी एक ही समुदाय के हैं, तो बंदर लंगूरों से डरते क्यों हैं? इस की वजह बस यही है कि बंदरों का खुराफाती स्वभाव, जो चीजों को नष्टभ्रष्ट करने, तोड़फोड़ करने और विरोध करने पर हमला करने में यकीन रखता है, मगर लंगूरों का यह स्वभाव नहीं होता. वे शारीरिक रूप से उन से बहुत बड़े और ताकतवर भी होते हैं और इसलिए वे बंदरों की पकड़ कर मारकुटाई कर देते हैं.

मगर सवाल यह है कि जब ये बंदर खतरनाक हो जाएं, तो क्या करें? सरकार को एक तरफ जनमानस का खयाल रखना होता है, दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखना होता है. पर्यावरण संतुलन के लिए पशु संरक्षण जरूरी है, लेकिन जब अति हो जाए, तो कोई क्या करे?

बंदरों के उत्पात को एक गंभीर समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए. इस अंधविश्वास से बचने की जरूरत है कि वे भगवान का प्रतीक हैं. भगवान का प्रतीक तो मनुष्य भी है, लेकिन जब वह अपराध करता है, तो क्या उसे दंड नहीं मिलता? कुछ यही हाल बंदरों का है. जब वे नुकसान पहुंचाते हैं, हमला करते हैं, तो हमें भी उस से बचाव का हक तो बनता ही है.

हमें बंदरों को उपद्रवी तत्त्व के रूप में उन की निशानदेही कर उन से बचाव के साधन अपनाने ही होंगे. यह भी समझने की जरूरत है कि कोई पैदल या अपने दोपहिया वाहन से कहीं जा रहा हो और उस पर अचानक से कोई बंदर कूद पड़े, तो कितना बड़ा हादसा हो सकता है.

आमतौर पर ये बंदर छोटे बच्चों और औरतों को अपना आसान शिकार मानते हैं. स्कूल जाते बच्चों के बैग और बाजार से खरीदारी कर लौट रही औरतों के हाथ से सामान छीन कर भागना इन का प्रिय शगल रहता है. एक तो हादसा हुआ, दूसरे सरे बाजार लोग मजाक भी उड़ाते हैं.

और कहीं कुछ काट लिया, तो महीनेभर तक के अस्पताल के खर्चों का इंतजाम हो जाता है, इसलिए पहली बात तो यह कि बंदरों को कुछ भी खानेपीने को न दिया जाए, दूसरी बात यह कि प्रशासन को उन्हें हटाने या भगाने में सहयोग किया जाए. Social Problem

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