Editorial: भारत को ट्रंप की सजा – उद्योग जगत में मचा हाहाकार

Editorial: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अपने देश में आने वाले भारत के सामान पर 50 फीसदी के टैक्स से देश का कपड़ा, चमड़ा और डायमंड उद्योग बेहद खतरे में है. चमड़े के कारखानों में तकरीबन 50 लाख लोग काम करते हैं और 4,000 करोड़ रुपए का सामान बनाते हैं. इस में से एकचौथाई अमेरिका के व्यापारी खरीदते थे जिन्होंने अब और्डर देने बंद कर दिए हैं क्योंकि 50 फीसदी टैक्स भारतीय सामान पर देने की जगह वे वियतनाम, कंबोडिया, बंगलादेश से सस्ते में खरीदेंगे. डोनाल्ड ट्र्रंप ने यह सजा भारत को भारत सरकार के फैसलों पर दी है.

कानपुर, नोएडा, आगरा, तमिलनाडु ही नहीं, दूसरे छोटे राज्यों से भी चमड़े का जो सामान बनता था वह रुक गया है और 2,000 से ज्यादा कंपनियों में से कितनों का दिवाला इस चक्कर में पिट जाए पता नहीं.

दिल्ली में बैठे ऊंची जातियों के सवर्ण नेताओं को फर्क नहीं पड़ता कि जिस काम में ज्यादातर दलित कारीगर लगे हों वे ठप हो गए. उन्हें चिंता इस बात की है कि उन का अपना टैक्स न कम हो जाए जो वे ऐक्सपोर्ट में भी बीच की चीजों पर लगाते थे.

अमेरिका के और्डर अचानक बंद हो जाने से सैकड़ों कंपनियों के पास आज पैसे की तंगी हो गई है. वे न कर्मचारियों को बकाया पैसा दे पा रही हैं, न कर्ज पर ब्याज का भुगतान कर पा रही हैं. भारत सरकार को अपने गुरूर की फिक्र है कि विश्वगुरु देश को डोनाल्ड ट्रंप कैसे धमका सकता है और जिस तरह का व्यवहार नरेंद्र मोदी नोटबंदी, वोटबंदी, जीएसटी, घरबंदी, बुलडोजरी में करते रहे हैं, वैसा ही डोनाल्ड ट्रंप के साथ करने कीकोशिश कर रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप को शिकायत चमड़े के सामान से नहीं या भारत के व्यापारियों से नहीं है, उन्हें शिकायत इस बात पर है कि भारत रूस से पैट्रोल क्यों खरीद रहा है, अमेरिका से आने वाले सामान पर टैक्स ज्यादा क्यों लगा रहा है, बजाय अपने बड़े खरीदार को सुनने के मोदी सरकार उस मंदिर के पुजारी की तरह बरताव कर रही है जो सोचता है कि वह किसी भगवान की मूर्ति का पुजारी नहीं, खुद भगवान है. अछूतों, चमड़े का काम करने वाले दलितों को तो सरकार वैसे भी पिछले जन्मों के कर्मों के फल भोगने वाला मानती है. कुछ और दिन वे भूखे रह गए तो क्या हो जाएगा?

अमेरिका सिर्फ एक चौथाई चमड़े का बना सामान खरीद रहा है पर यह न भूलें कि जब धंधा अचानक एकचौथाई कम हो जाए तो वह पूरे धंधे को ले डूबता है. पानी में तैरती किश्ती को डुबोने के लिए एक छोटा सा छेद ही काफी होता है.

अफसोस इस बात का है कि सरकार ने अपना घमंड ऊपर रखा है, 50 लाख मजदूरों की रोजीरोटी का खयाल नहीं रखा. दूसरे सामानों में और कितने बेरोजगार हुए हैं, यह तो अभी न पूछें.

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बिना जनगणना कराए अमित शाह का कहना कि भारत में मुसलिमों की गिनती बढ़ रही है, एकदम गैरजिम्मेदाराना बयान है जिस का मकसद सिर्फ हिंदूमुसलिम झगड़ा बढ़ाना है. यह हो सकता है कि आज भी एक औसत मुसलिम औरत के बच्चे ज्यादा हो रहे हैं पर जो आंकड़े मिलते हैं उन के हिसाब से अगर हिंदू औरतों के 2.1 बच्चे हो रहे हैं तो मुसलिम औरतों के 2.3.

20 करोड़ की आबादी वाले मुसलिमों के 2024 के अनुमानों के हिसाब से तकरीबन 66 लाख बच्चे पैदा हुए और हिंदुओं के 2 करोड़. मुसलिम बच्चों के पैदा होने की गिनती भी लगातार गिर रही है क्योंकि मुसलिम औरतें भी अब घरों में बंद रह कर बच्चे पालना नहीं चाहतीं, वे आजाद हो कर घूमना चाहती हैं.

नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के हिसाब से 2015 में हिंदुओं की गिनती 105 करोड़ थी और मुसलिमों की 18 करोड़, 60 लाख. 2021 तक हिंदुओं की गिनती 7 करोड़ बढ़ कर 112 करोड़ हो गईर् और मुसलिमों की गिनती 1 करोड़, 40 लाख बढ़ कर 20 करोड़ हो गई यानी हिंदुओं की गिनती मुसलिमों से 3-4 गुना तेजी से बढ़ रही है पर आंकड़ों को घुमाफिरा कर अमित शाह फालतू का डर फैला रहे हैं. सरकार इसीलिए जनगणना को टाल रही है कि कहीं उस की पोल न खुल जाए.

एक तरह से मुसलिम औरत बुरके के अलावा हिंदू औरत से ज्यादा आजाद है क्योंकि उसे हर दूसरेतीसरे दिन व्रत, पूजापाठ, मंदिर में लाइनों में नहीं खड़ा होना पड़ता. उसे घंटों घर में कीर्तन, भजन में समय नहीं लगाना पड़ता. उसे बुरके का जहर तो पीना पड़ता है पर नंगे पांव सिर पर कलश रख कर मंदिरों से मंदिरों पैदल तो नहीं जाना पड़ता. वह सब के साथ बैठ कर खाने का हक रखती है, हिंदू औरतों की तरह पति को खिला कर ही खाने को मजबूर नहीं है.

मुसलिम आबादी बढ़ रही है इस के लिए दूसरे देशों से आने वाले घुसपैठियों को दोष देना देश के साथ एकदम बेईमानी है. पाकिस्तान के साथ देश की सीमा पर चप्पेचप्पे पर पहरेदारी है और वहां से लोग नहीं आ सकते, जबकि पाकिस्तान धर्म के चलते हर साल बदहाली की ओर बढ़ रहा है. और फिर पाकिस्तान से आने वाले वैसे भी अपने साथ औरतों को तो नहीं ला सकते और आबादी तो औरतों से ही बढ़ती है, आदमियों से नहीं.

बंगलादेश में अब भी कामधंधा भारत से ज्यादा है जबकि एक साल से वहां सरकार की अलटापलटी हुई है. मोहम्मद यूनुस, जो नोबेल पुरस्कार पाने वाला अर्थशास्त्री है, जानता है कि देश को कैसे चलाया जाता है.

वहां के लोग यूरोपअमेरिका जा रहे हैं, खाली हाथ वे भारत नहीं आ रहे क्योंकि भारत में तो खुद भुखमरी का हाल यह है कि 85 करोड़ को 5 किलो अनाज मुफ्त देना पड़ता है ताकि वे मरे नहीं. ऐसे भारत में छिपछिपा कर कौन आना चाहेगा.

अमित शाह अगर कह रहे हैं कि देश में घुसपैठिए आ रहे हैं तो यह गृह मंत्रालय पर एक बड़ा आरोप है निकम्मेपन का. भारत की बौर्डर सिक्योरिटी क्या कर रही है कि वह बाहर वालों को आने दे रही है. अब नेपाल, भूटान, चीन, म्यांमार से तो मुसलिम आने वाले नहीं हैं क्योंकि इन देशों में या तो हिंदू जनता है या बौद्ध.

वोटों की खातिर हिंदूमुसलिम झगड़ों में जनता को उल झाने का मतलब है उन से काम के मौके छीनना. सरकार बेरोजगारी, गंदगी, बेईमानी, रिश्वतखोरी, ठगी पर ध्यान दे, फालतू में धर्म का एजेंडा न बेचे. यह काम पंडों, मुल्लाओं को करने दें. Editorial

Social Inequality: पूरन कुमार की मौत: ऊंचे ओहदे पर भारी जाति के सवाल

Social Inequality, लेखक – शकील प्रेम

एससी तबके को सताने की खबरें आएदिन अखबारों में छपती रहती हैं. कहीं दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता है, तो कहीं किसी एससी को बेरहमी से पीटा जाता है. यह आम एससी समाज के हालात हैं.

कहते हैं कि आम और खास में फर्क होता है, लेकिन दुख तो इस बात का है कि इस तबके को सताने के मामले में आम और खास में कोई फर्क नहीं दिखता. एससी अगर आईपीएस अफसर भी बन जाए, तो वहां भी उस का शोषण होता है. एससी अगर राष्ट्रपति भी हो तो भी दबाया जाता है. सेना, पुलिस, यूनिवर्सिटी या देश का कोई भी इंस्टिट्यूटशन हो, हर जगह एससी तबके के साथ भेदभाव और शोषण होता ही है. बस, सताने के तरीके बदल जाते हैं.

7 अक्तूबर, 2025 को हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई. पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सैक्टर 11 के अपने सरकारी आवास के बेसमैंट में अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली थी.

वाई. पूरन कुमार 2001 बैच के एडीजीपी रैंक के अफसर थे. 8 पन्नों के सुसाइड नोट में उन्होंने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों के नाम लिए थे. इस नोट के मुताबिक इन तमाम बड़े अफसरों ने उन्हें लगातार सताया था.

सुसाइड नोट में वाई. पूरन कुमार ने कैरियर में भेदभाव और अपने सीनियरों के द्वारा जातिवादी बरताव का जिक्र किया था. उन की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने भी अपनी शिकायत में कहा था कि उन के पति की खुदकुशी ‘सिस्टमैटिक उत्पीड़न’ का नतीजा है.

वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी से 24 घंटे पहले उन के गनमैन हैड कांस्टेबल सुशील कुमार को रोहतक में शराब कारोबारी से ढाई लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पूछताछ में गनमैन ने
वाई. पूरन कुमार का नाम लिया था.

गनमैन सुशील कुमार के इसी बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई.

वाई. पूरन कुमार की पत्नी अमनीत पी. कुमार ने इस एफआईआर को एक साजिश बताया और उन्होंने कहा, ‘पूरन कुमार पहले से ही सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाते रहे थे. उन्होंने कोर्ट में कई याचिकाएं और शिकायतें लगाई हुई थीं, जिस से वे बड़े अफसरों के लिए मुसीबत बने हुए थे, इसलिए उन्हें रिश्वतखोरी की झूठी साजिश में फंसाया गया.’

वाई. पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में आला अफसरों पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं. एससी समाज के अफसरों को प्रशासनिक तौर पर किस तरह का उत्पीड़न झेलना पड़ता है, वाई. पूरन कुमार इस बात का उदाहरण हैं.

वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी के कुछ ही दिनों के अंदर रोहतक में हरियाणा पुलिस के एएसआई संदीप कुमार लाठर ने सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली. संदीप कुमार ने 6 मिनट का वीडियो और 4 पन्नों का सुसाइड नोट छोड़ा. इन में उन्होंने वाई. पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस घटना से एडीजीपी वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला और पेचीदा हो गया है.

एससी समाज से निकले आईपीएस वाई. पूरन कुमार भ्रष्टाचार में शामिल थे या नहीं यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा, पर अगर वे भ्रष्ट अफसर थे तो भी उन के साथ हुए जातीय भेदभाव से इनकार नहीं किया जा सकता.

अगर वाई. पूरन कुमार जैसे बड़े सरकारी अफसर ही जातिवाद की सोच का शिकार हो सकते हैं, तो निचले लैवल पर एससी मुलाजिमों के हालात का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. एससी तबके को कार्पोरेट सैक्टर में भी कोई राहत नहीं है. वहां भी हर लैवल पर भेदभाव होता है.

विवेक राज जो बैंगलुरु में एक कार्पोरेट अफसर थे. वे लाइफस्टाइल इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड में पोस्टेड थे. विवेक राज को उन के अपर कास्ट सीनियरों द्वारा इतना उत्पीड़न झेलना पड़ा कि उन्होंने साल 2023 में खुदकुशी कर ली थी. पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई.

पिछले 10 सालों में आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में 20 से ज्यादा एससी छात्रों ने जातिवाद के चलते खुदखुशी की. वैसे भी एससी छात्रों के साथ जाति आधारित भेदभाव तो प्राथमिक कक्षाओं से शुरू हो जाता है. यही वजह है कि देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों तक एससी तबके के छात्रों का पहुंचना भी मुश्किल होता है.

एससी तबके के छात्रों का प्राइमरी लैवल से ऊंची पढ़ाई तक पहुंचने का फीसदी काफी कम है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो प्राइमरी लैवल (कक्षा 1-5) पर 96.8 फीसदी, सैकंडरी लैवल (कक्षा 9-10) पर 80.6 फीसदी और हायर सैकंडरी लैवल (कक्षा
11-12) पर 57.9 फीसदी है. इस के बाद ऊंची पढ़ाईलिखाई (18-23 साल) में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो महज 25.9 फीसदी है.

इस का मतलब है कि प्राइमरी लैवल से शुरू करने वाले एससी छात्रों में से तकरीबन 26 फीसदी ही देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों या उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुंच पाते हैं, जबकि बाकी स्टूडैंट्स इस से आगे नहीं बढ़ पाते.

देश के टौप संस्थानों जैसे आईआईटी या आईआईएम में पहुंचने वाले स्टूडैंट्स का फीसदी तो 0.1 फीसदी से भी कम है, क्योंकि इन टौप की यूनिवर्सिटियों में सीटें सीमित होती हैं और रिजर्वेशन के बावजूद कंपीटिशन ज्यादा होता है.

इतनी जद्दोजेहद के बाद कुछ छात्र इन यूनिवर्सिटियों तक पहुंच भी गए तो उन्हें हर कदम पर जातिवाद झेलना पड़ता है या उन की संस्थागत हत्याएं कर दी जाती हैं. साल 2016 में रोहित वेमुला और साल 2023 में दर्शन सोलंकी इस बात के उदाहरण हैं.

घोड़ी चढ़ने का हक नहीं

गुजरात के सांदीपाडा गांव में आकाश कोटडिया नाम के एससी नौजवान की शादी थी. गांव के ही कुछ ऊंची जाति के लोगों ने आकाश को शादी के दौरान घोड़ी पर चढ़ने से मना कर दिया. मामला इतना बढ़ा कि पुलिस को अतिरिक्त बल बुलाना पड़ा.

हालांकि, यह मामला फरवरी, 2020 का है, लेकिन इस मामले में खास बात यह है कि आकाश आर्मी का जवान था और जम्मूकश्मीर में तैनात था. वह कुछ दिन पहले छुट्टी ले कर शादी के लिए गांव आया था.

16 दिसंबर, 2024 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक दलित पुलिस कांस्टेबल के बेटे नंदराम सिंह की बरात के दौरान ऊपरी जाति के तकरीबन 40 लोगों ने हमला किया. उन्होंने दूल्हे को घोड़ी से जबरन उतार दिया. जातिवादी गालियां दीं. डीजे सिस्टम तोड़ा. औरतों से छेड़छाड़ की और बरातियों पर पथराव किया. इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

फरवरी, 2022 को मध्य प्रदेश के छतरपुर में 24 साल के दलित पुलिस कांस्टेबल दयाचंद अहिरवार की बरात में ऊपरी जातियों ने जम कर हंगामा किया और दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया. अगले दिन प्रशासन ने भारी पुलिस सुरक्षा में उन्हें घोड़ी पर चढ़ाया.

इन तीनों मामलों में दूल्हे आर्मी या पुलिस में थे, इसलिए इन तीनों मामलों में पुलिस ने सक्रिय भूमिका निभाई और मामला सुर्खियों में आया. आम एससी तबके के ऐसे अनेक मामले तो खबरों में ही नहीं आ पाते या इन मामलों में कोई मुकदमा ही दर्ज नहीं होता.

इन वारदात को रोकने के लिए कई जिलों में ‘समानता समितियां’ बनाई गई हैं और एससी दूल्हों को पुलिस सुरक्षा दी जाती है फिर भी हर साल दर्जनों ऐसे मामले दर्ज किए जाते हैं.

संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को गैरकानूनी घोषित किया गया है, लेकिन एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हर 20 मिनट में एससी तबके के खिलाफ ऐसे अपराध दर्ज होते हैं.

राष्ट्रपति होते हुए जातीय भेदभाव

रामनाथ कोविंद, जो 2017 से साल 2022 तक भारत के 14वें राष्ट्रपति रहे, केआर नारायणन के बाद वे भारत के दूसरे ऐसे राष्ट्रपति थे जो एससी तबके से आते थे. वे भाजपा द्वारा समर्थित राष्ट्रपति थे. यही वजह थी कि रामनाथ कोविंद की नियुक्ति को भाजपा ने ‘दलित उत्थान’ के प्रतीक के रूप में पेश किया था.

साल 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जगन्नाथ पुरी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना चाहते थे, लेकिन मंदिर के पुजारियों ने उन्हें रोक दिया था. मंदिर के परंपरागत नियमों के अनुसार गैरहिंदू या निचली जाति के लोगों को गर्भगृह में जाने की इजाजत नहीं है.

इसी तरह वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो संथाल जनजाति से आती हैं, भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं, जो 2022 में राष्ट्रपति चुनी गईं.

जून, 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिल्ली के श्री जगन्नाथ मंदिर में पूजा की. एक तसवीर वायरल हुई, जिस में वे मंदिर के गर्भगृह के बाहर पूजा करती दिखीं, जबकि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और धर्मेंद्र प्रधान गर्भगृह के अंदर पूजा करते दिखे. आदिवासी होने के कारण उन्हें गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया गया.

हालांकि, विवाद बढ़ने पर मंदिर के पुजारियों ने साफ किया कि राष्ट्रपति के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने ऐसा करते हुए सामान्य प्रोटोकौल का पालन किया.

सितंबर, 2023 में नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया. इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को न्योता ही नहीं दिया गया, जबकि देश का राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का सर्वोच्च प्रतिनिधि होता है. इस हिसाब से नए बने संसद का उद्घाटन राष्ट्रपति को ही करना चाहिए.

तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुए इस भेदभाव को ‘सनातन धर्म आधारित जातीय भेदभाव’ कहा और दावा किया कि आदिवासी महिला होने के चलते उन्हें इस समारोह से दूर रखा गया.

इस राष्ट्रपति के साथ जातीय भेदभाव

केआर नारायणन भारत के 10वें राष्ट्रपति (1997से 2002) थे, जो एससी बैकग्राउंड से आए थे. वे केरल के उ झावूर गांव में एक अछूत परिवार में जनमे थे. उन की पूरी जिंदगी भारत की जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की मिसाल है. उन्होंने प्राइमरी ऐजूकेशन से ले कर हायर ऐजूकेशन और फिर लैक्चरर की नौकरी तक में सताया जाना और भेदभाव झेला और राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे जातीय तानों का शिकार बने रहे.

साल 1943 में ट्रावणकोर यूनिवर्सिटी (अब केरल यूनिवर्सिटी) से एमए करने के बाद केआर नारायणन को उन की जाति के चलते लैक्चरर की नौकरी से निकाल दिया गया था. डिगरी समारोह में भी उन्हें बेइज्जत किया गया था. अपने आत्मसम्मान के लिए उन्होंने डिगरी लेने से ही इनकार कर दिया था.

बाद में, राष्ट्रपति बनने पर केआर नारारणयन उसी यूनिवर्सिटी में लौटे और अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मैं उन जातिवादियों को यहां नहीं देख पा रहा हूं, जिन्होंने मु झे अछूत होने के चलते नौकरी से निकाल दिया था.’’

साल 1948 में लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से अपनी पढ़ाई पूरी कर के केआर नारायणन आईएफएस के लिए चुने गए थे, लेकिन यहां भी वे सताए जाने का शिकार हुए थे. भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में प्रवेश के लिए उन्हें ऊपरी जातियों के अफसरों का विरोध झेलना पड़ा था. तब डाक्टर बीआर अंबेडकर की मदद से वे आईएफएस में शामिल हुए.

साल 1997 में भारत के 10वें राष्ट्रपति के चुनाव में केआर नारायणन को 95 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन तब उन पर आरोप लगे थे कि उन का चुनाव एससी कोटे के चलते हुआ न कि उन की काबिलीयत से. एक विदेशी यात्रा के दौरान उन्हें जहर देने की साजिश रची गई थी. इस साजिश के लिए दक्षिणपंथी ताकतों की भूमिका नजर आई थी.

गुजरात दंगों को रोकने के लिए राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सेना भेजने की मांग की थी, लेकिन उन की बात पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. यही वजह थी कि साल 2002 में दूसरे कार्यकाल के लिए उन का नाम प्रस्तावित हुआ, लेकिन भाजपा ने उन्हें दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने दिया था. केआर नारायणन ने बाद में इसे साजिश बताया था.

ओहदे पर जाति भारी

एससीएसटी तबका सदियों से अछूत रहा है. भारत के गांव अछूतों के लिए यातना केंद्र रहे हैं. यही वजह थी कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अछूतों को शहरों में बस जाने पर जोर दिया. शहरों में बस जाने से अछूतपन खत्म नहीं होता, लेकिन गांवों की बजाय रोजगार के मौके ज्यादा थे.

आजादी के बाद एससी तबके ने बड़ी तादात में शहरों की ओर पलायन किया. राहत जरूर मिली, लेकिन शहरों में भी सताया जाना खत्म नहीं हुआ.

लोकतांत्रिक नियमों के मुताबिक पढ़ाईलिखाई के दरवाजे सब के लिए खुले थे, लेकिन अछूतों के लिए सामाजिक नियम इतने कठोर थे कि उन के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं था. गांव हो या शहर एससी तबके की पढ़ाईलिखाई के मामले में दोनों जगह जातिवादी सोच कायम रही.

इस सब के बावजूद एससी तबके के लोग ऊंची तालीम की दहलीज तक पहुंचे और सिस्टम का हिस्सा बने, लेकिन उन्हें सताए जाने का दर्द भी झेलना पड़ा.

आज भी एससीएसटी तबके के लिए मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. शुरुआती पढ़ाईलिखाई तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन इस से आगे का रास्ता बेहद मुश्किल है. इन मुश्किल रास्तों पर चलते हुए कुछ लोग सिस्टम का हिस्सा बन भी रहे हैं, तो वहां भी जातिवाद उन का पीछा नहीं छोड़ रहा है. सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जातिवाद को खत्म करने का कोई समाधान है?

समाधान यही है की एससीएसटी तबके को पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झना होगा. प्राइमरी लैवल की पढ़ाईलिखाई में 97 फीसदी एससी बच्चे पहुंच रहे हैं, लेकिन ऊंची पढ़ाईलिखाई में यही रेशियो महज 26 फीसदी रह जाता है.

एससी तबके को सब से पहले प्राइमरी से ऊंची पढ़ाईलिखाई के बीच के इस ड्रौपआउट रेशियो को कम करना होगा. जो समाज जितना कमजोर होता है, उस के लिए संघर्ष उतना ही बड़ा होता है.

यूनिवर्सिटी की पढ़ाई तक जितने ज्यादा एससी छात्र पहुंचेंगे, उन को सताया जाना उतना ही कम होगा. नौकरियों में भी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल करनी होगी. हर लैवल पर संगठन को मजबूत करना होगा, ताकि भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई जा सके.

एससी तबके के सांसदों और विधायकों पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा, ताकि वे सिर्फ सत्ता सुख न भोगें, बल्कि समाज के हित में काम करें. समय लगेगा, लेकिन हालात जरूर बदलेंगे.

रहनसहन में बदलाव जरूरी

एससीएसटी और मुसलिम तबके मुख्यधारा से कटे हुए नजर आते हैं, तो इस में किस का दोष है? भारत के कल्चर का हिस्सा होते हुए भी कल्चर से अलग दिखने की नौटंकी क्यों? यहीं से समस्याएं शुरू होती हैं.

एससीएसटी और मुसलिम तबका खुलेपन और नएपन से परहेज करता है. मुसलिम अपने अकीदों के आगे किसी तरह का सम झौता नहीं कर पाते तो एससी तबका भी इसी रास्ते पर निकल पड़ा है.

एससीएसटी और मुसलिम तबके को शहरों में घर किराए पर लेना मुश्किल होता है, तो इस की वजह सिर्फ मकान मालिकों के अंदर भेदभाव भरी सोच ही नहीं है. ये लोग खुद ही मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाते.

खानपान, पहनावा और रहनसहन की आदतें नहीं बदल पाते. साफसफाई के तौरतरीके नहीं सीख पाते. घर में लड़ाई झगड़े, घर की औरतों को पीटना, घर में हमेशा शोरशराबा होना और ज्यादा बच्चे होना यह आम बात होती है, इसीलिए इन्हें कोई किराए पर नहीं रखता.

वर्ग संघर्ष कितना जरूरी

दुनिया के किसी भी समाज में इनसानों की कीमत उस की प्रोडक्टिविटी से तय होती है. परिवार भी ऐसे ही चलते हैं. आज के समय परिवार में जो जितना प्रोडक्टिव होता है उस की इज्जत भी उसी हिसाब से होती है.

परिवार का जो सदस्य प्रोडक्टिव नहीं तो वह अपने परिवार में ही हाशिए पर चला जाएगा. कोई समाज अगर प्रोडक्टिव नहीं है, तो वह भी बाकी समाजों के बीच हाशिए पर चला जाएगा.

जो जाति या समाज टौप पर है, तो उस ने अपनी जायज या नाजायज प्रोडक्टिविटी को साबित किया है और जो जाति या समाज हाशिए पर है, वह अपनी प्रोडक्टिविटी को साबित नहीं कर पाया. यही लोग वर्ग संघर्ष की बात करते हैं. किसी भी संघर्ष की कीमत होती है. जिन के पास बहुतकुछ है वे आसानी से अपना दबदबा नहीं छोड़ेंगे और जिन के पास कुछ नहीं वे किसी भी संघर्ष के लायक भी नहीं हैं, इसलिए वर्ग संघर्ष की बात ही बेमानी है.

इज्जत और सा झेदारी के लिए अपने भीतर का संघर्ष जरूरी है. प्रोडक्टिविटी में भागीदार बनना जरूरी है. इस के लिए प्रोडक्टिव होना जरूरी है. आज जमाना बदल गया है. क्रांतियां किताबों में ही अच्छी लगती हैं. धरातल पर तो जू झना होता है. एससीएसटी और मुसलिम समाज को यह बात सम झनी होगी. बराबरी के हकदार बराबरी के लोग ही होते हैं. यह कड़वी हकीकत है.

‘घेटो’ की घुटन से बाहर निकलना जरूरी

16वीं सदी में इटली के वेनिस शहर में यहूदियों को अलगथलग इलाकों, जिन्हें ‘घेटो नुओवो’ (यहूदियों की नई बस्ती) कहा जाता था, में रहने के लिए मजबूर किया गया था. ये इलाके दूर से पहचाने जा सकते थे.

इटली से ही ‘घेटो शब्द इतना मशहूर हुआ कि यह अमेरिका के नीग्रो गुलामों की अलगथलग बस्तियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा. ब्रिटिश, डच और फ्रांसीसी उपनिवेशों में किसी कबीलाई समुदाय या धार्मिक अल्पसंख्यक को जबरन साथ रहने के लिए मजबूर किया जाता, तो यही इलाके घेटो बन जाते थे.

घेटो की घुटनभरी गलियों में कोई भी बाहरी नहीं घुसना चाहता था. अमेरिका में घेटो गुलामों की फैक्टरियां थीं, तो यूरोप के घेटो यहूदियों को अलगथलग रखने के डिटैंशन कैंप थे. यहां केवल एकजैसे लोग रहते थे, जो घेटो में पैदा होते और यहीं मर जाते थे.

आज भी शहरोंकसबों के आसपास ऐसे इलाके मौजूद होते हैं, जो अनपढ़ता, गरीबी और अपराध के लिए बदनाम होते हैं. ये इलाके आज के घेटो हैं. अमेरिका में अफ्रीकीअमेरिकी या हिस्पैनिक समुदाय के लोग जिन इलाकों में रहते हैं, उन्हें आज भी घेटो कहा जाता है.

भारत में भी ऐसे ‘घेटो’ की कमी नहीं है. यहां तो सदियों से घेटो मौजूद रहे हैं. गांव हो या शहर एससी तबके के लिए हर लैवल पर घेटो बनाए गए थे. शहरों के घेटो आगे चल कर झुग्गी झोंपडि़यों में बदल गए. हर गांव में एक घेटो नजर आ जाएगा.

शहरों में मुसलिम बहुल इलाकों को ही देख लीजिए. ये भी घेटो ही हैं. कई दलित बहुल महल्ले भी ऐसे ही हैं, जहां घुसने में भी घुटन होती है, जबकि वहां ये लोग आराम से जीते हैं. आज के इन घेटो की पहचान खराब बुनियादी ढांचे, अनपढ़ता, सेहत से जुड़ी सेवाओं की कमी और अपराध दर में बढ़ोतरी से होती है.

भारत के घेटो एससीएसटी और मुसलिमों के लिए किसी डिटैंशन कैंप से कम नहीं हैं. आखिर मजबूरी क्या है? घेटो की दीवारों को तोड़ कर मुख्यधारा तक पहुंचना मुश्किल तो नहीं है, लेकिन घेटो में जीने की आदत पड़ गई है. यहां से निकलने का एकमात्र जरीया पढ़ाईलिखाई है, लेकिन इन समाजों को तालीम की सम झ ही नहीं है.

समस्या आप की, हल भी आप ही निकालें

एससीएसटी तबके के साथ इतिहास में गलत हुआ या आज भी गलत हो रहा है, इस बात का रोना रोते रहने से कुछ नहीं बदलेगा. मुसलिम बादशाहों ने हजार साल तक इस देश पर हुकूमत की, इस बात पर इतराने से मुसलिमों के आज के हालात नहीं बदल जाएंगे. एससीएसटी तबके और मुसलिमों को यह तय करना होगा कि वर्तमान में उन के समाज की परफौर्मैंस और प्रोडक्टिविटी क्या है?

यह इस बात से तय होगा कि आप के समाज में पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का लैवल क्या है?

पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का रास्ता मुश्किल है, लेकिन इस के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है. हालात का रोना रोते रहने से हालात नहीं बदलते. नेता आते हैं और अपना उल्लू सीधा कर गायब हो जाते हैं. समाज इन नेताओं का पिछलग्गू बना रहता है. समस्या आप की है, तो बदलाव भी खुद से शुरू करना होगा. Social Inequality

Latest Bollywood Updates: अमृता राव का अंधविश्वास

Latest Bollywood Updates: ‘इश्कविश्क’ और ‘विवाह’ के अलावा और भी अच्छी फिल्में करने वाली खूबसूरत हीरोइन अमृता राव का फिल्म कैरियर ज्यादा हिट नहीं रहा है. पर हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने यह कहते हुए सब को चौंका दिया कि उन पर किसी ने काला जादू किया था. जब उन्होंने यह सुना था तो वे भी दंग रह गई थीं. ऐक्ट्रैस ने कहा कि उन की 3 फिल्में भी बंद हो गई थीं.

अमृता राव ने उस इंटरव्यू में आगे दावा किया कि एक बार वे अपने गुरुजी से मिली थीं. उन्होंने उस समय तो आर्शीवाद दिया, लेकिन 1-2 दिन बाद उन की मां से कहा कि उन की बेटी पर किसी ने काला जादू और वशीकरण किया है.

अमृता राव यह बात सुन कर चौंक गई थीं और उन्होंने कहा, ‘मैं वशीकरण जैसी बात पर अपनी लाइफ में कभी भरोसा नहीं करती, अगर यह बात मेरे गुरु के अलावा किसी और ने बोली होती.’

मानुषी छिल्लर पर साधा निशाना

मानुषी छिल्लर ने ‘मिस वर्ल्ड 2017’ का खिताब जीता था. इस के बाद उन्होंने साल 2022 में अक्षय कुमार की फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज’ से हिंदी फिल्मों में डैब्यू किया था. फिर उन की 2 और फिल्में ‘मालिक’ और ‘तेहरान’ भी रिलीज हुई थीं, जबकि इस से पहले वे ‘बड़े मियां छोटे मियां’ और ‘द ग्रेट इंडियन फैमिली’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी थीं. पर इन में से एक भी फिल्म नहीं चल पाई, तो उन पर फ्लौप हीरोइन का ठप्पा लग गया.

अब मानुषी छिल्लर ने दलजीत दोसांझ के एक म्यूजिक वीडियो ‘कुफर’ में काम किया है, जिस के बाद सोशल मीडिया पर यह कहा जा रहा है कि अब वे इन्हीं के लायक रह गई हैं. इस में सचाई भी है, क्योंकि मानुषी छिल्लर को अब ज्यादा फिल्में नहीं मिल रही हैं और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जमे रहने के लिए ऐसे छोटेमोटे प्रोजैक्ट करने से कोई बात नहीं बनेगी.

एपी ढिल्लों का खुलासा

पंजाबी गायक एपी ढिल्लों का गाना ‘ब्राउन मुंडे’ जेनजी में काफी मशहूर हुआ था और आज भी डीजे पर खूब बजता है. अभी हाल ही में एपी ढिल्लों ने खुलासा किया कि वे एक बार अपने बौलीवुड डैब्यू के करीब आ गए थे. एक फिल्म के लिए वे गाना गाने के लिए फाइनल हो चुके थे. इस गाने की डील में इंडस्ट्री के 2 सब से बड़े लोग थे. हालांकि, यह डील आखिरी समय पर टूट गई, क्योंकि एपी ढिल्लों ने इस गाने के औनरशिप राइट मांगे थे, जिसे मेकर्स ने नहीं माना.

इस के बाद अपने एक इंटरव्यू में एपी ढिल्लों ने बताया, ‘मैं एक ऐसी इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं बनना चाहता, जो कलाकारों और उन की कला का पैसों के फायदे के लिए शोषण करती है.’

शरवरी वाघ को मिला सूरज बड़जात्या का साथ

महाराष्ट्र की लड़की शरवरी वाघ वैसे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काफी समय से हैं, पर उन्हें ज्यादातर परदे के पीछे ही काम करते देखा गया है. पर अब वे जल्द ही सूरज बड़जात्या की नई फिल्म में आयुष्मान खुराना के साथ रोमांस करती दिखाई देंगी.

इस फिल्म का नाम अभी फाइनल नहीं हुआ है, पर यह एकदम सूरज बड़जात्या स्टाइल फिल्म होगी, जिसे पूरा परिवार एकसाथ बैठ कर देख सकेगा. वैसे, शरवरी वाघ बहुत जल्द फिल्म ‘अल्फा’ में भी दिखाई देंगी, जिस में वे आलिया भट्ट और बौबी देओल के साथ स्क्रीन शेयर करेंगी. Latest Bollywood Updates

Hindi Kahani: मोबाइल गरम हो गया – सोनू और रेखा की चुहलबाजी

Hindi Kahani: सोनू एक गरीब घर का बेरोजगार नौजवान था. वह थोड़ाबहुत पढ़ालिखा था. काफी कोशिशों के बाद भी उसे सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो मजबूरन अपना गांव छोड़ कर एक शहर में आ गया और प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा.

शहर में सोनू किराए के मकान में रहता था. कुछ दिन बाद वहां मकान मालिक की एक रिश्तेदार रेखा रहने के लिए आई. वह बहुत खूबसूरत थी. गोरा रंग, कसा बदन, काले व घुंघराले बाल, बड़ीबड़ी आंखें, कोई भी देखे तो देखता ही रह जाए.

सोनू सुबह उठ कर खाना बनाता, बरतन मांजता और काम पर चला जाता. यह उस का रोज का काम था.

यह देख कर रेखा को बहुत तकलीफ होती थी. कुछ दिन बीत जाने के बाद रेखा ने उस से कहा, ‘‘सोनू, मैं तुम्हारे लिए खाना बना देती हूं.’’

यह बात सोनू को बहुत अच्छी लगी और अब वह रेखा के साथ खाना खाने लगा.

रेखा सोनू से खूब बतियाती थी और मस्ती भी करती थी, लेकिन सोनू कुछ नहीं कहता था. वह सिर्फ हंस कर रह जाता था.

अब सोनू को रेखा बहुत अच्छी लगने लगी थी. एक दिन उस ने हिम्मत कर के रेखा के गाल को छू दिया.

रेखा हंस कर रह गई और कुछ नहीं बोली. सोनू को यह देख कर बहुत अच्छा लगा.

एक दिन जब सोनू काम से वापस आया, तो रेखा ने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया और खूब जोर से उस के गाल पर काट लिया.

सोनू सिहर कर रह गया और बाहर चला गया. धीरेधीरे दोनों में नजदीकियां बढ़ती गईं.

एक दिन की बात है. सोनू काम से लौटा, तो उस ने देखा कि रेखा दरवाजे पर खूब सजधज कर खड़ी थी. वह सोनू को अंदर नहीं जाने दे रही थी.

सोनू ने भी सोचा कि जो होगा देखा जाएगा. उस ने रेखा को अपनी बांहों में भर कर उस के गाल पर ऐसा काटा कि दांत के निशान बन गए.

रेखा का गाल इतना लाल हो गया कि उस से खून निकल आएगा. उस की आंखों से आंसू निकलने लगे.

रेखा ने सोनू को बहुत डांटा, ‘‘मैं तो तुम्हें दोस्त सम?ाती थी और तुम एकदम निर्दयी निकले.’’

यह सुन कर सोनू शर्मिंदा हो गया. उस ने अपना बिस्तर उठाया और सोने के लिए छत पर जाने लगा.

जातेजाते उस ने रेखा से कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं अब दोबारा तुम्हें कभी नहीं छुऊंगा.’’

छत पर लेटे सोनू की आंखों से नींद कोसों दूर थी. यह कहावत भी सच है कि आग और फूस जब नजदीक होंगे, तो कभी न कभी आग जरूर लगेगी.

रात बीत रही थी. रात के तकरीबन 11 बज रहे थे. रेखा ने अपना मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए स्विच बोर्ड में लगाया.

थोड़ी देर बाद रेखा ने सोचा कि क्यों न वह मोबाइल चार्जर से निकाल कर अपने पास रख कर सो जाए. जब वह मोबाइल फोन निकालने लगी, तो उस ने देखा कि वह गरम हो गया था.

रेखा अंदर से दरवाजा धीरेधीरे पीटने लगी. छत पर लेटा सोनू जाग रहा था. वह सीढि़यों से उतर कर दरवाजे के पास आया और बोला, ‘‘रेखा, क्या बात है? इतनी रात को तुम जोरजोर से दरवाजा क्यों पीट रही हो?’’

रेखा ने कहा, ‘‘तुम अंदर आओ, तो बताऊं कि क्या बात है.’’

सोनू अंदर गया, तो रेखा ने कहा, ‘‘सोनू, मेरा मोबाइल फोन बहुत गरम हो गया है.’’

सोनू ने मोबाइल फोन को चार्जर से निकाल कर मेज पर रख दिया और कहा, ‘‘मोबाइल तो ज्यादा गरम नहीं है. थोड़े समय में ठंडा हो जाएगा.’’

फिर वे दोनों एकदूसरे को देखते रहे. सोनू बोला, ‘‘क्या अब मैं छत पर सोने जाऊं?’’

रेखा ने अंगड़ाई ली और कहने लगी, ‘‘अगर तुम नामर्द हो, तो जाओ. अगर मर्द हो, तो मेरा मोबाइल ठंडा कर के जाओ.’’

यह सुन कर सोनू ने दरवाजा अंदर से बंद किया और रेखा को बांहों में भर कर बिस्तर पर ले गया. फिर वे दोनों प्यार के सागर में इतनी बार डूबे कि सुबह कब हुई, पता ही नहीं चला. रेखा का बदन इतना टूट गया था कि उस में उठने की ताकत भी नहीं रही थी.

कुछ दिनों के बाद रेखा अपने गांव चली गई और सोनू को उसी मोबाइल फोन से फोन किया, जो उस रात गरम हो गया था.

फोन पर ही रेखा ने शादी करने का इरादा जताया. उस ने कहा, ‘‘प्यारे सोनू, अब तुम घर चले आओ.’’

सोनू उस के गांव गया और दोनों ने एक मंदिर में जा कर शादी कर ली. इस के बाद वे हंसीखुशी अपनी जिंदगी बिताने लगे. Hindi Kahani

Hindi Crime Story: अपराध – क्या थी नीलकंठ की गलती

Hindi Crime Story: ऐलिस का साथ पाने के लिए नीलकंठ ने अपनी दम तोड़ती पत्नी सुरमा को बचाने की कोई कोशिश नहीं की.

एंबुलैंस का सायरन बज रहा था. लोग घबरा कर इधरउधर भाग रहे थे. छुट्टी का दिन होने से अस्पताल का आपातकालीन सेवा विभाग ही खुला था, शोरशराबे से डाक्टर नीलकंठ की तंद्रा भंग हो गई.

घड़ी पर निगाह डाली, रात के 10 बज कर 20 मिनट हो रहे थे. उसे ऐलिस के लिए चिंता हो रही थी और उस पर क्रोध भी आ रहा था. 9 बजे वह उस के लिए कौफी बना कर लाती थी. वैसे, उस ने फोन पर बताया था कि वह 1-2 घंटे देर से आएगी.

‘‘सर,’’ वार्ड बौय ने आ कर कहा, ‘‘एक गंभीर केस है, औपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया है.’’

‘‘आदमी है या औरत?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘औरत है,’’ वार्ड बौय ने उत्तर दिया, ‘‘कहते हैं कि आत्महत्या का मामला है.’’

‘‘पुलिस को बुलाना होगा,’’ नीलकंठ ने पूछा, ‘‘साथ में कौन है?’’

‘‘2-3 पड़ोसी हैं.’’

‘‘ठीक है,’’ औपरेशन की तैयारी करने को कहो. मैं आ रहा हूं. और हां, सिस्टर ऐलिस आई हैं?’’

‘‘जी, अभीअभी आई हैं. उस घायल औरत के साथ ही ओटी में हैं,’’ वार्ड बौय ने जाते हुए कहा.

राहत की सांस लेते हुए नीलकंठ ने कहा, ‘‘तब तो ठीक है.’’

वह जल्दी से ओटी की ओर चल पड़ा. दरअसल, मन में ऐलिस से मिलने की जल्दी थी, घायल की ओर ध्यान कम ही था.

ऐलिस को देखते ही वह बोला, ‘‘इतनी देर कहां लगा दी? मैं तो चिंता में पड़ गया था.’’

‘‘सर, जल्दी कीजिए,’’ ऐलिस ने उत्तर दिया, ‘‘मरीज की हालत बहुत खराब है. और…’’

‘‘और क्या?’’ नीलकंठ ने एप्रन पहनते हुए पूछा, ‘‘सारी तैयारी कर दी है न?’’

‘‘जी, सब तैयार है,’’ ऐलिस ने गंभीरता से कहा, ‘‘घायल औरत और कोई नहीं, आप की पत्नी सुरमा है.’’

‘‘सुरमा,’’ वह लगभग चीख उठा.

सुबह ही नीलकंठ का सुरमा से खूब झगड़ा हुआ था. झगड़े का कारण ऐलिस थी. नीलकंठ और ऐलिस का प्रणय प्रसंग उन के विवाहित जीवन में विष घोल रहा था. सुबह सुरमा बहुत अधिक तनाव में थी, क्योंकि नीलकंठ के कोट पर 2-4 सुनहरे बाल चमक रहे थे और रूमाल पर लिपस्टिक का रंग लगा था. सुरमा को पूरा विश्वास था कि ये दोनों चिह्न ऐलिस के ही हैं. कुछ कहने को रह ही क्या गया था? पूरी कहानी परदे पर चलती फिल्म की तरह साफ थी.

झुंझला कर क्रोध से पैर पटकता हुआ नीलकंठ बाहर निकल गया.

जातेजाते सुरमा के चीखते शब्द कानों में पड़े, ‘आज तुम मेरा मरा मुंह देखोगे.’

ऐसी धमकियां सुरमा कई बार दे

चुकी थी. एक बार नीलकंठ ने

उसे ताना भी दिया था, ‘जानेमन, जीना जितना आसान है, मरना उतना ही मुश्किल है. मरने के लिए बहुत बड़ा दिल और हिम्मत चाहिए.’

‘मर कर भी दिखा दूंगी,’ सुरमा ने तड़प कर कहा था, ‘तुम्हारी तरह नाटकबाज नहीं हूं.’

‘देख लूंगा, देख लूंगा,’ नीलकंठ ने विषैली मुसकराहट के साथ कहा था, ‘वह शुभ घड़ी आने तो दो.’

आखिर सुरमा ने अपनी धमकी को हकीकत में बदल दिया था. उन का घर 5वीं मंजिल पर था. वह बालकनी से नीचे कूद पड़ी थी. इतनी ऊंचाई से गिर कर बचना बहुत मुश्किल था. नीचे हरीहरी घास का लौन था. उस दिन घास की कटाई हो रही थी. सो, कटी घास के ढेर लगे थे. सुरमा उसी एक ढेर पर जा कर गिरी. उस समय मरी तो नहीं, पर चोट बहुत गहरी आई थी.

शोर मचते ही कुछ लोग जमा हो गए, उन्होंने सुरमा को पहचाना और यही ठीक समझा कि उसे नीलकंठ के पास उसी के अस्पताल में पहुंचा दिया जाए.

काफी खून बह चुका था. नब्ज बड़ी मुश्किल से पकड़ में आ रही थी. शरीर का रंग फीका पड़ रहा था. नीलकंठ के मन में कई प्रश्न उठ रहे थे, ‘सुरमा से पीछा छुड़ाने का बहुत अच्छा अवसर है. इस के साथ जीवन काटना बहुत दूभर हो रहा है. हमेशा की किटकिट से परेशान हो चुका हूं. एक डाक्टर को समझना हर औरत के वश की बात नहीं, कितना तनावपूर्ण जीवन होता है. अगर चंद पल किसी के साथ मन बहला लिया तो क्या हुआ? पत्नी को इतना तो समझना ही चाहिए कि हर पेशे का अपनाअपना अंदाज होता है.’

सहसा चलतेचलते नीलकंठ रुक गया.

‘‘क्या हुआ, सर?’’ ऐलिस ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं यह औपरेशन नहीं कर सकता,’’ नीलकंठ ने लड़खड़ाते स्वर में कहा, ‘‘कोई डाक्टर अपनी पत्नी या सगेसंबंधी का औपरेशन नहीं करता, क्योंकि वह उन से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. उस के हाथ कांपने लगते हैं.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं?’’ ऐलिस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जल्दी से डाक्टर जतिन को बुला लो,’’ नीलकंठ ने वापस मुड़ते हुए कहा. वह सोच रहा था कि औपरेशन में जितनी देर लगेगी, उतनी जल्दी ही सुरमा इस दुनिया से दूर चली जाएगी.

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ ऐलिस ने तनिक ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘डाक्टर जतिन को आतेआते एक घंटा तो लगेगा ही. लेकिन इतना समय कहां है? मैं मानती हूं कि आप के लिए पत्नी को इस दशा में देखना बड़ा कठिन होगा और औपरेशन करना उस से भी अधिक मुश्किल, पर यह तो आपातस्थिति है.’’

‘‘नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘यह डाक्टरी नियमों के विरुद्ध होगा और यह बात तुम अच्छी तरह जानती हो.’’

‘‘ठीक है, कम से कम आप कुछ देखभाल तो करें,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘मैं अभी डाक्टर जतिन को संदेश भेजती हूं.’’

डाक्टर नीलकंठ जब ओटी में घुसा तो आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था, कितने ही उद्गार मन में उठते और फिर बादलों की तरह गायब हो जाते थे.

सामने सुरमा का खून से लथपथ शरीर पड़ा था, जिस से कभी उस ने प्यार किया था. वे क्षण कितने मधुर थे. इस समय सुरमा की आंखें बंद थीं, एकदम बेहोश और दीनदुनिया से बेखबर. इतना बड़ा कदम उठाने से पहले उस के मन में कितना तूफान उठा होगा? एक क्षण अपराधभावना से नीलकंठ का हृदय कांप उठा, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उस के शरीर को झंझोड़ रही हो.

नीलकंठ ने कांपते हाथों से सुरमा के बदन से खून साफ किया. उस का सिर फट गया था. वह कितने ही ऐसे घायल व्यक्ति देख चुका था, पर कभी मन इतना विचलित नहीं हुआ था. वह सोचने लगा, क्या सुरमा की जान बचा सकना उस के वश में है?

लेकिन डाक्टर जतिन के आने से पहले ही सुरमा मर चुकी थी. नीलकंठ सूनी आंखों से उसे देख रहा था, वह जड़वत खड़ा था.

जतिन ने शव की परीक्षा की और धीरे से नीलकंठ के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे दुख है, सुरमा अब इस दुनिया में नहीं है. ऐलिस, नीलकंठ को केबिन में ले जाओ, इसे कौफी की जरूरत है.’’

ऐलिस ने आहिस्ता से नीलकंठ का हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए ओटी से बाहर ले गई. कमरे में ले जा कर उसे कुरसी पर बैठाया.

‘‘सर, मुझे दुख है,’’ ऐलिस ने आहत स्वर में कहा, ‘‘सुरमा के ऐसे अंत की मैं ने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी. मैं अपने को कभी माफ नहीं कर सकूंगी.’’

नीलकंठ ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘तुम्हारा कोई दोष नहीं, कुसूर मेरा है.’’

नीलकंठ आंखें बंद किए सोच रहा था, ‘शायद सुरमा को बचा पाना मेरे वश से बाहर था, पर कोशिश तो कर ही सकता था. लेकिन मैं टालता रहा, क्योंकि सुरमा से छुटकारा पाने का यह सुनहरा अवसर था. मैं कलह से मुक्ति पाना चाहता था. अब शायद ऐलिस मेरे और करीब आ जाएगी.’

ऐलिस सामने कौफी का प्याला लिए खड़ी थी. वह आकर्षक लग रही थी.

पुलिस सूचना पा कर आ गई थी. औपचारिक रूप से पूछताछ की गई. यह स्पष्ट था कि दुर्घटना के पीछे पतिपत्नी के बिगड़ते संबंध थे, परंतु नीलकंठ का इस दुर्घटना में कोईर् हाथ नहीं था. नैतिक जिम्मेदारी रही हो, पर कानूनी निगाह से वह निर्दोष था. पोस्टमार्टम के बाद शव नीलकंठ को सौंप दिया गया. दोनों ओर के रिश्तेदार सांत्वना देने और घर संभालने आ गए थे. दाहसंस्कार के बाद सब के चले जाने पर एक सूनापन सा छा गया.

नीलकंठ को सामान्य होने में सहायता दी तो केवल ऐलिस ने. अस्पताल में ड्यूटी के समय तो वह उस की देखभाल करती ही थी, पर समय पा कर अपनी छोटी बहन अनीषा के साथ उस के घर भी चली जाती थी. चाय, नाश्ता, भोजन, जैसा भी समय हो, अपने हाथों से बना कर देती थी. धीरेधीरे नीलकंठ के जीवन में शून्य का स्थान एक प्रश्न ने ले लिया.

कई महीनों के बाद नीलकंठ ने एक दिन ऐलिस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे जैसी पत्नी ही पाना चाहता था. तुम मुझे पहले क्यों नहीं मिलीं. यह सोच कर कभीकभी आश्चर्य होता है.’’

‘‘सर,’’ ऐलिस बोली, ‘‘सर.’’

नीलकंठ ने टोकते हुए कहा, ‘‘मैं ने कितनी बार कहा है कि मुझे ‘सर’ मत कहा करो. अब तो हम दोनों अच्छे दोस्त हैं. यह औपचारिकता मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘क्या करूं,’’ ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘सर, आदत सी पड़ गई है, वैसे कोशिश करूंगी.’’

‘‘तुम मुझे नील कहा करो,’’ उस ने ऐलिस की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘मुझे अच्छा लगेगा.’’

ऐलिस हंस पड़ी, ‘‘कोशिश करूंगी, वैसे है जरा मुश्किल.’’

‘‘कोई मुश्किल नहीं,’’ नीलकंठ हंसा, ‘‘आखिर मैं भी तो तुम्हें ऐलिस कह कर बुलाता हूं.’’

‘‘आप की बात और है,’’ ऐलिस ने कहा, ‘‘आप किसी भी संबंध से मुझे मेरे नाम से पुकार सकते हैं.’’

‘‘तो फिर किस संबंध से तुम मेरा नाम ले कर मुझे बुलाओगी?’’ नीलकंठ के स्वर में शरारत थी.

‘‘पता नहीं,’’ ऐलिस ने निगाहें फेर लीं.

‘‘तुम जानती हो, मेरे मन में तुम्हारे लिए क्या भावना है,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम मेरे सूने जीवन में बहार बन कर प्रवेश करो.’’

‘‘यह तो अभी मुमकिन नहीं,’’ ऐलिस ने छत की ओर देखा.

‘‘अभी नहीं तो कोई बात नहीं,’’ नीलकंठ ने कहा, ‘‘पर वादा तो कर सकती हो?’’ नीलकंठ को विश्वास था कि ऐलिस इनकार नहीं करेगी, शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

‘‘यह कहना भी मुश्किल है,’’ ऐलिस ने मेज पर पड़े चम्मच से खेलते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ नीलकंठ ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘आखिर हम अच्छे दोस्त हैं?’’

‘‘बस, दोस्त ही बने रहें तो अच्छा है,’’ ऐलिस ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ नीलकंठ ने खड़े होते हुए पूछा, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘यही कि अगर शादी कर ली तो इस बात की क्या गारंटी है,’’ ऐलिस ने एकएक शब्द तोलते हुए कहा, ‘‘कि मेरा भी वही हश्र नहीं होगा, जो सुरमा का हुआ? आखिर दुर्घटना तो सभी के साथ घट सकती है?’’

यह सुनते ही नीलकंठ को मानो सांप सूंघ गया. उस ने कुछ कहना चाहा, पर जबान पर मानो ताला पड़ गया था. ऐलिस ने साथ देने से इनकार जो कर दिया था. Hindi Crime Story

Hindi Family Story: विश्वासघात – सीमा के कारण कैसे टूटा प्रिया का घर

Hindi Family Story: प्रिया ने पालने में सोई अपनी नवजात बच्ची को मुसकराते देखा तो वह भी मुसकरा दी. प्रिया उस में अपना और निर्मल का अक्स ढूंढ़ने की कोशिश करने लगी. निर्मल को एक बेटी की चाह थी जबकि वह बेटा चाहती थी, क्योंकि वह निर्मल के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थी.

प्रिया एक छोटे शहर में पलीबढ़ी थी. इकलौती संतान होने के कारण मातापिता की दुलारी थी. निर्मल की बूआ उन के पड़ोस में रहती थीं. वे ही निर्मल का रिश्ता उस के लिए लाई थीं. निर्मल मुंबई में मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते थे. उन के मातापिता कार दुर्घटना में चल बसे थे. उन के जाने के बाद बूआ ने ही उन की परवरिश की थी. प्रिया के मातापिता को निर्मल पसंद थे, इसलिए चट मंगनी और पट ब्याह कर दिया.

शादी के 1 हफ्ते बाद प्रिया निर्मल के साथ मुंबई आ गई. निर्मल एक अपार्टमैंट में 7वीं मंजिल पर 3 कमरों के फ्लैट में रहते थे. शादी के बाद दोनों ने फ्लैट को बड़े जतन से सजाया. निर्मल अपने नाम के अनुसार स्वभाव से बहुत ही निर्मल थे. उन में बिलकुल बनावटीपन नहीं था.

कुछ ही समय बाद प्रिया ने निर्मल को 2 से 3 होने की खुशखबरी सुना दी. दोनों बहुत खुश थे. अब निर्मल उस का बहुत ध्यान रखने लगे थे. उसी दौरान निर्मल के प्रमोशन ने उन की खुशी को दोगुना कर दिया. परंतु काम की जिम्मेदारी बढ़ने की वजह से अब वे ज्यादा व्यस्त रहने लगे.

प्रिया दिन भर अकेले काम करते थक जाती थी, इसलिए दोनों ने एक बाई रखने का फैसला किया. महानगर मुंबई में लोग बहुत व्यस्त रहते हैं. किसी को किसी से कोई लेनादेना नहीं होता. अंतर्मुखी होने के कारण प्रिया भी ज्यादातर घर में ही रहती थी. इसीलिए उन्होंने बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड से बाई ढूंढ़ने के लिए मदद मांगी. कुछ ही दिन बाद उस ने एक बाई को भेजा.

लगभग 30 साल की दुबलीपतली रमा बाई को उन्होंने मामूली पूछताछ के बाद काम पर रख लिया. रमा बाई ने बताया कि वह पास की बिल्डिंग में और 3 घरों में काम करती है. उसके 2 बच्चे हैं. पति स्कूल में चपरासी है. इस से अधिक जानने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी.

रमा बाई सुबह 8 बजे काम पर आती और करीब 10 बजे तक काम निबटा कर चली जाती. जब वह काम करने आती तब निर्मल के औफिस जाने का समय होता था, इसलिए प्रिया ज्यादातर निर्मल के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करने में व्यस्त होती थी. धीरेधीरे रमा बाई घर की सदस्य जैसी बन गई. वह प्रिया के छोटेमोटे कामों जैसे बाजार से दूधसब्जी लाने में मदद करने लगी.

अब अकसर प्रिया का मौर्निंग सिकनैस की वजह से जी मचलाने लगा और उस के लिए खाना बनाना मुश्किल होने लगा. यह देख कर एक दिन रमा बाई ने उस के आगे एक प्रस्ताव रखा. बोली, ‘‘मैडमजी, मेरी एक छोटी बहन है. बेचारी गूंगी है, शादी नहीं हो पाई, इसलिए हमारे साथ ही रहती है.

अगर आप कहें तो जब तक आप की डिलिवरी नहीं हो जाती आप उसे खाना बनाने और दूसरे कामों के लिए रख लें. आप को जो ठीक लगे उसे दे देना. सुबह मैं साथ ले आया करूंगी और शाम को साथ ले जाया करूंगी.’’

प्रिया और निर्मल को उस की बात जंच  गई, इसलिए उन्होंने हां कह दिया. अगले ही दिन रमा बाई अपने साथ 22-23 वर्ष की लड़की को ले आई. उस ने उस का नाम सीमा बताया. सीमा देखने में बहुत सुंदर थी. प्रिया को उस के गूंगे होने पर बहुत तरस आया. सीमा उन के घर खाना बनाने का काम करने लगी. वह सभी काम बहुत अच्छे तरीके से व समय से पहले कर देती.

वह प्रिया को समय से फल काट कर खिलाती, समय पर खाना खिलाती. पतिपत्नी दोनों सीमा के काम से बेहद खुश थे. कभीकभी निर्मल को औफिस के काम से बाहर जाना पड़ता. तब प्रिया सीमा को रात को घर पर रोक लेती. सीमा निर्मल का कुछ विशेष ही ध्यान रखती थी, परंतु प्रिया को इस में कोई बुराई नजर नहीं आई, इसलिए उस ने उस पर कुछ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. फिर उन दिनों अकसर तबीयत खराब रहने के कारण वह परेशान भी रहती थी.

हालांकि प्रिया को सीमा का निर्मल के बूट पौलिश करना और बाथरूम में कपड़े रखना शुरू से अखरता था, परंतु दूसरे ही क्षण वह इसे नारीसुलभ जलन समझ कर भूल जाती. कभीकभी तो उसे अपने इस विचार पर खुद पर शर्म महसूस होती कि एक गूंगी लड़की पर शक कर रही है.

इस बीच प्रिया का चौथा महीना शुरू हो गया था. उस दिन निर्मल औफिस की फाइलें घर ले आए थे और आते ही ड्राइंगरूम में टेबल पर सभी फाइलें फैला कर काम करने बैठ गए. प्रिया की तबीयत सुबह से ही ठीक नहीं थी, इसलिए उस ने सीमा को रात को घर पर रोक लिया. खाना खा कर वह बैडरूम में आराम करने लगी और निर्मल अपना काम निबटाने में व्यस्त हो गए.

करीब रात के 1 बजे कुछ आवाजों से उस की नींद टूट गई. निर्मल बिस्तर पर नहीं थे. उन के तेजतेज बोलने की आवाज आ रही थी. वह ड्राइंगरूम की ओर तेज कदमों से भागी. वहां का दृश्य देख कर अवाक रह गई. सीमा एक ओर खड़ी रो रही थी.

उस के कपड़े अस्तव्यस्त और कई जगह से फटे थे. प्रिया को देख कर निर्मल हकबका कर सफाई देने लगे, ‘‘प्रिया, मैं ने कुछ नहीं किया. यह अचानक आ कर मुझ से लिपट गई. जब मैं ने इसे पीछे धकेला तो इस ने अपने कपड़ों को फाड़ना शुरू कर दिया.’’

सीमा लगातार रोए जा रही थी. वह प्रिया के गले से लिपट गई. उस की हालत देख कर प्रिया का चेहरा तमतमा उठा. उस के अंदर की औरत जैसे जाग उठी. बोली, ‘‘मुझे आप से कतई यह उम्मीद नहीं थी कि आप इतना गिर जाएंगे.’’

‘‘प्रिया, यह झूठी है… मैं सच कह रहा हूं… मैं ने कुछ नहीं किया,’’ निर्मल लगातार अपनी सफाई दे रहे थे. ‘‘सचाई सामने है और फिर भी आप…छि:,’’ कहते हुए वह सीमा को अपने बैडरूम में ले आई. प्रिया ने उसे पानी पिलाया और किसी तरह चुप करवाया.

‘‘सीमा, मैं बहुत शर्मिंदा हूं…प्लीज मुझे माफ कर दो,’’ प्रिया ने सीमा के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा.

प्रिया मन ही मन खुद को उस का कुसूरवार मान रही थी, क्योंकि उसी के कहने पर उस पर विश्वास कर सीमा रात को रुकी थी. फिर उस ने उसे अपने साथ ही सुला लिया. अगले दिन रमा बाई के आते ही सीमा ने रोरो कर और इशारों से उसे सब कुछ बता दिया.

वह बारबार निर्मल की ओर इशारा कर के रो रही थी. उस की हालत देख कर रमा बाई ने हंगामा खड़ा कर दिया. उस ने उन के सामने ही पुलिस को फोन कर दिया. प्रिया और निर्मल ने उसे रोकने का भरसक प्रयत्न किया. ‘‘क्या मैडमजी, तुम भी अपने आदमी को बचाना चाहती हो? सीमा की जगह तुम्हारी बहन होती तब क्या करतीं?’’ रमा बाई गुस्से से बोली.

10 मिनट में पुलिस की वरदी में 1 आदमी उन के सामने खड़ा था. निर्मल उसे और रमा बाई को अपनी सफाई देते रहे, पर दोनों ने उन की एक न सुनी. प्रिया दोनों हाथों से सिर पकड़े वहीं सोफे पर चुपचाप बैठी रही. पुलिस वाले ने निर्मल को थाने चलने को कहा. निर्मल बहुत घबरा गए. वे मिन्नत करने लगे. आखिर उस पुलिस वाले ने 50 हजार पर रमा बाई और निर्मल में समझौता करवा दिया.

अचानक बच्ची के रोने की आवाज से प्रिया की तंद्रा भंग हो गई. वह भूतकाल से वर्तमान में लौट आई. वह उठ कर बैठने का प्रयास करने लगी. तभी बाहर से निर्मल उस के मातापिता के साथ कमरे में दाखिल हुए और उन्होंने लपक कर बच्ची को गोद में उठा लिया. अपने मातापिता को देख कर प्रिया के पीले पड़े चेहरे पर खुशी फैल गई.

‘‘अरे हमारी गुडि़या अपने नानानानी के पास आने के लिए रो रही है,’’ प्रिया की मां ने निर्मल से बच्ची को अपनी गोद में लेते हुए कहा.

‘‘प्रिया, कैसी हो?’’ बाबूजी ने उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा.

‘‘बिलकुल ठीक हूं,’’ प्रिया ने मुसकरा कर उत्तर दिया.

‘‘तुम ने जूस नहीं लिया…यह लो जूस पी लो,’’ निर्मल ने जूस का गिलास उस के हाथ में थमा दिया.

प्रिया धीरेधीरे जूस पीने लगी. निर्मल के माथे पर बालों की एक लट झूलती बड़ी अच्छी लग रही थी. पिछले 2 दिनों से वे अकेले भाग दौड़ कर रहे थे. नर्स बता रही थी कि एक क्षण के लिए भी उन्होंने पलक नहीं झपकी. मां की गोद में गुडि़या सो गई थी. उसे पालने में लिटा कर मां ने उस के हाथ से जूस का खाली गिलास ले लिया.

‘‘नींद आ रही है…तू भी सो जा. मैं तेरे लिए नाश्ता बना कर लाती हूं,’’ फिर उस के बाबूजी से बोली, ‘‘आप भी नहा लीजिए. निर्मल बेटा, तुम किचन में सामान निकालने में मेरी मदद कर दो. मैं नाश्ता बनाती हूं. फिर सब साथ मिल कर बैठेंगे,’’ कहते हुए मां कमरे से बाहर निकल गईं. प्रिया को बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी. पिछले 5 महीने उस ने बड़े ही कष्ट से काटे थे.

वह मानसिक और शारीरिक यातना से गुजरी थी. सीमा वाले हादसे के बाद वह निर्मल के साथ एक छत के नीचे रहना नहीं चाहती थी, परंतु आने वाले बच्चे के भविष्य और मांबाबूजी के खयाल से उस ने चुप्पी साध ली. आज भी वह यह सोच कर कांप जाती है कि अगर उस ने अलग होने का फैसला कर लिया होता और अपने मायके लौट जाती तब कितना बड़ा अनर्थ हो जाता.

वह तो गनीमत थी कि डाक्टर की सलाह मान कर उस ने रोज पार्क जाना शुरू कर दिया था. वहीं उस की मुलाकात तनु से हुई. तनु उस के साथ स्कूल में पढ़ती थी. एक दिन उस ने बताया कि उस ने घर के काम के लिए एक लड़की रख ली है जो गूंगी है, तो प्रिया का दिल जोर से धड़कने लगा.

‘‘क्या नाम है उस का?’’ कांपते होंठों से प्रिया ने पूछा.

‘‘सीमा, बेचारी बोल नहीं सकती. मेरी बाई को बहन है,’’ तनु ने जवाब दिया.

प्रिया का दिल अनजाने डर से कांप उठा. उसे लगा कि अगर तनु को पता चल गया तो क्या सोचेगी उस के पति के चरित्र को ले कर. प्रिया ने तनु से मेलजोल कम कर दिया. तनु का फोन भी वह नहीं उठाती. लगभग 2 महीने बीत गए.

फिर एक दिन कैमिस्ट की दुकान पर तनु उस से टकरा गई. उस का रंग पीला हो गया था. वह कुछ बुझीबुझी सी थी. उस ने पहले की तरह उस से बातचीत करने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. औपचारिकता के नाते उस ने उस से बातचीत की.

उस के होंठों से हंसी जैसे गुम ही हो गई थी. 2 ही दिन बाद तनु उसे फिर से पार्क में मिल गई. वह बहुत उदास और बीमार सी लगी. प्रिया इस का कारण पूछे बिना रह नहीं सकी. थोड़ी सी नानुकर के बाद तनु टूट गई. उस ने रोतेरोते अपना दुख बांटा जिसे सुन कर प्रिया सकते में आ गई.

तनु ने उसे जो कुछ बताया वह हूबहू उस की कहानी से मिलता था. तनु के मोबाइल में सीमा का फोटो था, इसलिए उस के प्रति उस का संदेह गहरा हो गया.

उस ने अपनी आपबीती तनु को सुनाई. तब दोनों ने तय किया कि वे सीमा के बारे में पता लगाएंगी और फिर एक दिन वे दोनों सीमा और रमा बाई के बारे में पूछतेपूछते उन के घर जा पहुंचीं. बाहर गली में ही उन्होंने भीड़ लगी देखी. पानी भरने के लिए औरतें आपस में लड़ रही थीं.

‘‘तुम दोनों बहनें अपने को समझती क्या हो?’’ पानी की बालटी पकड़े एक औरत बोली.

‘‘खबरदार, जो कोई आगे आया, काट कर फेंक दूंगी सब को,’’ दूसरी आवाज आई. तनु और प्रिया वहीं रुक उन की लड़ाई देखने लगीं. दोनों यह देख कर हैरान रह गईं कि सीमा फर्राटे से बोल रही थी.

‘‘सब से पहले हम दोनों पानी भरेंगी. तुम सब चुडै़लें सुबहसुबह हमारा दिमाग क्यों खराब कर रहीं,’’ सीमा चिल्ला रही थी.

तनु प्रिया का हाथ पकड़ उसे खींचते हुए गली से बाहर ले आई.

‘‘यह सीमा गूंगी नहीं है. देखा कैसे फर्राटे से बोल रही है,’’ प्रिया ने कहा.

‘‘हां प्रिया, इस का मतलब इन दोनों ने जो हमारे साथ किया वह सोचीसमझी साजिश के तहत किया,’’ तनु ने गुस्से से कहा.

‘‘हमें इन्हें सबक सिखाना होगा, लेकिन कैसे, समझ नहीं आ रहा ,’’ प्रिया बोली.

‘‘चलो हम इन्हें पुलिस के हवाले करते हैं,’’ तनु ने प्रिया का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘लेकिन इस से पहले हमें इन के खिलाफ सुबूत इकट्ठे करने होंगे.’’ घर आ कर उन्होंने अपनेअपने पतियों को सारा माजरा समझाया. फिर सब ने मिल कर फैसला किया कि वे पुलिस के साथ मिल कर उस के सहयोग से इन्हें पकड़वाएंगे.

फिर चारों थाने में गए और अपने साथ हुई ठगी की आपबीती सुनाई. पुलिस ने सब से पहले मालूम किया कि वे दोनों फिलहाल कहां काम कर रही हैं. उन्हें पता चला कि वे अभी किसी नवदंपती के घर पर ही काम कर रही हैं. तब पुलिस ने उस दंपती के साथ मिल कर उन का भांडा फोड़ने की योजना बनाई. संयोग से उन के घर में सीसीटीवी कैमरा लगा था.

कुछ ही दिनों में रमा बाई और सीमा ने वहां भी ऐसा ही खेल खेला, परंतु कैमरे में उन की सारी हरकत कैद हो गई और जो आदमी पुलिस की वरदी में आया वह रमा बाई का शराबी पति था जो पहले दंपती को डराताधमकाता था और फिर पैसे ले कर समझौता करवाता था. उन तीनों को ठगी करने के जुर्म में जेल हो गई. प्रिया की मां उस के लिए नाश्ता ले आई थीं. उन्होंने प्रिया के सिर पर प्यार से हाथ रखा तो प्रिया मुसकरा दी. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: शिकार – काव्या के लिए रंजन की नफरत

Best Hindi Kahani: वह एक बार फिर उस के सामने खड़ा था. लंबाचौड़ा काला भुजंग. आंखों से झांकती भूख. एक ऐसी भूख जिसे कोई भी औरत चुटकियों में ताड़ जाती है. उस आदमी के लंबेचौड़े डीलडौल से उस की सही उम्र का पता नहीं लगता था, पर उस की उम्र 30 से 40 साल के बीच कुछ भी हो सकती थी.

वहीं दूसरी ओर काव्या गोरीचिट्टी, छरहरे बदन की गुडि़या सी दिखने वाली एक भोलीभाली, मासूम सी लड़की थी. मुश्किल से अभी उस ने 20वां वसंत पार किया होगा. कुछ महीने पहले दुख क्या होता है, तकलीफ कैसी होती है, वह जानती तक न थी.

मांबाप के प्यार और स्नेह की शीतल छाया में काव्या बढि़या जिंदगी गुजार रही थी, पर दुख की एक तेज आंधी आई और उस के परिवार के सिर से प्यार, स्नेह और सुरक्षा की वह पिता रूपी शीतल छाया छिन गई.

अभी काव्या दुखों की इस आंधी से अपने और अपने परिवार को निकालने के लिए जद्दोजेहद कर ही रही थी कि एक नई समस्या उस के सामने आ खड़ी हुई.

उस दिन काव्या अपनी नईनई लगी नौकरी पर पहुंचने के लिए घर से थोड़ी दूर ही आई थी कि उस आदमी ने उस का रास्ता रोक लिया था.

एकबारगी तो काव्या घबरा उठी थी, फिर संभलते हुए बोली थी, ‘‘क्या है?’’

वह उसे भूखी नजरों से घूर रहा था, फिर बोला था, ‘‘तू बहुत ही खूबसूरत है.’’

‘‘क्या मतलब…?’’ उस की आंखों से झांकती भूख से डरी काव्या कांपती आवाज में बोली.

‘‘रंजन नाम है मेरा और खूबसूरत चीजें मेरी कमजोरी हैं…’’ उस की हवस भरी नजरें काव्या के खूबसूरत चेहरे और भरे जिस्म पर फिसल रही थीं, ‘‘खासकर खूबसूरत लड़कियां… मैं जब भी उन्हें देखता हूं, मेरा दिल उन्हें पाने को मचल उठता है.’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हो…’’ अपने अंदर के डर से लड़ती काव्या कठोर आवाज में बोली, ‘‘मेरे सामने से हटो. मुझे अपने काम पर जाना है.’’

‘‘चली जाना, पर मेरे दिल की प्यास तो बुझा दो.’’

काव्या ने अपने चारों ओर निगाह डाली. इक्कादुक्का लोग आजा रहे थे. लोगों को देख कर उस के डरे हुए दिल को थोड़ी राहत मिली. उस ने हिम्मत कर के अपना रास्ता बदला और रंजन से बच कर आगे निकल गई.

आगे बढ़ते हुए भी उस का दिल बुरी तरह धड़क रहा था. ऐसा लगता था जैसे रंजन आगे बढ़ कर उसे पकड़ लेगा.

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस ने कुछ दूरी तय करने के बाद पीछे मुड़ कर देखा. रंजन को अपने पीछे न पा कर उस ने राहत की सांस ली.

काव्या लोकल ट्रेन पकड़ कर अपने काम पर पहुंची, पर उस दिन उस का मन पूरे दिन अपने काम में नहीं लगा. वह दिनभर रंजन के बारे में ही सोचती रही. जिस अंदाज से उस ने उस का रास्ता रोका था, उस से बातें की थीं, उस से इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि रंजन की नीयत ठीक नहीं थी.

शाम को घर पहुंचने के बाद भी काव्या थोड़ी डरी हुई थी, लेकिन फिर उस ने यह सोच कर अपने दिल को हिम्मत बंधाई कि रंजन कोई सड़कछाप बदमाश था और वक्ती तौर पर उस ने उस का रास्ता रोक लिया था.

आगे से ऐसा कुछ नहीं होने वाला. लेकिन काव्या की यह सोच गलत साबित हुई. रंजन ने आगे भी उस का रास्ता बारबार रोका. कई बार उस की इस हरकत से काव्या इतनी परेशान हुई कि उस का जी चाहा कि वह सबकुछ अपनी मां को बता दे, लेकिन यह सोच कर खामोश रही कि इस से पहले से ही दुखी उस की मां और ज्यादा परेशान हो जाएंगी. काश, आज उस के पापा जिंदा होते तो उसे इतना न सोचना पड़ता.

पापा की याद आते ही काव्या की आंखें नम हो उठीं. उन के रहते उस का परिवार कितना खुश था. मम्मीपापा और उस का एक छोटा भाई. कुल 4 सदस्यों का परिवार था उस का.

उस के पापा एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते थे और उन्हें जो पैसे मिलते थे, उस से उन का परिवार मजे में चल रहा था. जहां काव्या अपने पापा की दुलारी थी, वहीं उस की मां उस से बेहद प्यार करती थीं.

उस दिन काव्या के पापा अपनी कंपनी के काम के चलते मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे कि पीछे से एक कार वाले ने उन की मोटरसाइकिल को तेज टक्कर मार दी.

वे मोटरसाइकिल से उछले, फिर सिर के बल सड़क पर जा गिरे. उस से उन के सिर के पिछले हिस्से में बेहद गंभीर चोट लगी थी.

टक्कर लगने के बाद लोगों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ के दबाव के चलते कार वाले ने उस के घायल पापा को उठा कर नजदीक के एक निजी अस्पताल में भरती कराया, फिर फरार हो गया.

पापा की जेब से मिले आईकार्ड पर लिखे मोबाइल से अस्पताल वालों ने जब उन्हें फोन किया तो वे बदहवास अस्पताल पहुंचे, पर वहां पहुंच कर उन्होंने जिस हालत में उन्हें पाया, उसे देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

उस के पापा कोमा में जा चुके थे. उन की आंखें तो खुली थीं, पर वे किसी को पहचान नहीं पा रहे थे.

फिर शुरू हुआ मुश्किलों का न थमने वाला एक सिलसिला. डाक्टरों ने बताया कि पापा के सिर का आपरेशन करना होगा. इस का खर्च उन्होंने ढाई लाख रुपए बताया.

किसी तरह रुपयों का इंतजाम किया गया. पापा का आपरेशन हुआ, पर इस से कोई खास फायदा न हुआ. उन्हें विभिन्न यंत्रों के सहारे एसी वार्ड में रखा गया था, जिस की एक दिन की फीस 10,000 रुपए थी.

धीरेधीरे घर का सारा पैसा खत्म होने लगा. काव्या की मां के गहने तक बिक गए, फिर नौबत यहां तक आई कि उन के पास के सारे पैसे खत्म हो गए.

बुरी तरह टूट चुकी काव्या की मां जब अपने बच्चों को यों बिलखते देखतीं तो उन का कलेजा मुंह को आ जाता, पर अपने बच्चों के लिए वे अपनेआप को किसी तरह संभाले हुए थीं. कभीकभी उन्हें लगता कि पापा की हालत में सुधार हो रहा है तो उन के दिल में उम्मीद की किरण जागती, पर अगले ही दिन उन की हालत बिगड़ने लगती तो यह आस टूट जाती.

डेढ़ महीना बीत गया और अब ऐसी हालत हो गई कि वे अस्पताल के एकएक दिन की फीस चुकाने में नाकाम होने लगे. आपस में रायमशवरा कर उन्होंने पापा को सरकारी अस्पताल में भरती कराने का फैसला किया.

पापा को ले कर सरकारी अस्पताल गए, पर वहां बैड न होने के चलते उन्हें एक रात बरामदे में गुजारनी पड़ी. वही रात पापा के लिए कयामत की रात साबित हुई. काव्या के पापा की सांसों की डोर टूट गई और उस के साथ ही उम्मीद की किरण हमेशा के लिए बुझ गई.

फिर तो उन की जिंदगी दुख, पीड़ा और निराशा के अंधकार में डूबती चली गई. तब तक काव्या एमबीए का फाइनल इम्तिहान दे चुकी थी.

बुरे हालात को देखते हुए और अपने परिवार को दुख के इस भंवर से निकालने के लिए काव्या नौकरी की तलाश में निकल पड़ी. उसे एक प्राइवेट बैंक में 20,000 रुपए की नौकरी मिल गई और उस के परिवार की गाड़ी खिसकने लगी. तब उस के छोटे भाई की पढ़ाई का आखिरी साल था. उस ने कहा कि वह भी कोई छोटीमोटी नौकरी पकड़ लेगा, पर काव्या ने उसे सख्ती से मना कर दिया और उस से अपनी पढ़ाई पूरी करने को कहा.

20 साल की उम्र में काव्या ने अपने नाजुक कंधों पर परिवार की सारी जिम्मेदारी ले ली थी, पर इसे संभालते हुए कभीकभी वह बुरी तरह परेशान हो उठती और तब वह रोते हुए अपनी मां से कहती, ‘‘मम्मी, आखिर पापा हमें छोड़ कर इतनी दूर क्यों चले गए जहां से कोई वापस नहीं लौटता,’’ और तब उस की मां उसे बांहों में समेटते हुए खुद रो पड़तीं.

धीरेधीरे दुख का आवेग कम हुआ और फिर काव्या का परिवार जिंदगी की जद्दोजेहद में जुट गया.

समय बीतने लगा और बीतते समय के साथ सबकुछ एक ढर्रे पर चलने लगा तभी यह एक नई समस्या काव्या के सामने आ खड़ी हुई.

काव्या जानती थी कि बड़ी मुश्किल से उस की मां और छोटे भाई ने उस के पापा की मौत का गम सहा है. अगर उस के साथ कुछ हो गया तो वे यह सदमा सहन नहीं कर पाएंगे और उस का परिवार, जिसे संभालने की वह भरपूर कोशिश कर रही है, टूट कर बिखर जाएगा.

काव्या ने इस बारे में काफी सोचा, फिर इस निश्चय पर पहुंची कि उसे एक बार रंजन से गंभीरता से बात करनी होगी. उसे अपनी जिंदगी की परेशानियां बता कर उस से गुजारिश करनी होगी

कि वह उसे बख्श दे. उम्मीद तो कम थी कि वह उस की बात समझेगा, पर फिर भी उस ने एक कोशिश करने का मन बना लिया.

अगली बार जब रंजन ने काव्या का रास्ता रोका तो वह बोली, ‘‘आखिर तुम मुझ से चाहते क्या हो? क्यों बारबार मेरा रास्ता रोकते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें चाहता हूं,’’ रंजन उस के खूबसूरत चेहरे को देखता हुआ बोला, ‘‘मेरा यकीन करो. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. आंखें बंद करता हूं तो तुम्हारा खूबसूरत चेहरा सामने आ जाता है.’’

‘‘सड़क पर बात करने से क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम किसी रैस्टोरैंट में चल कर बात करें.’’

काव्या के इस प्रस्ताव पर पहले तो रंजन चौंका, फिर उस की आंखों में एक अनोखी चमक जाग उठी. वह जल्दी से बोला, ‘‘हांहां, क्यों नहीं.’’

रंजन काव्या को ले कर सड़क के किनारे बने एक रैस्टोरैंट में पहुंचा, फिर बोला, ‘‘क्या लोगी?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ तो लेना होगा.’’

‘‘तुम्हारी जो मरजी मंगवा लो.’’

रंजन ने काव्या और अपने लिए कौफी मंगवाईं और जब वे कौफी पी चुके तो वह बोला, ‘‘हां, अब कहो, तुम क्या कहना चाहती हो?’’

‘‘देखो, मैं उस तरह की लड़की नहीं हूं जैसा तुम समझते हो,’’ काव्या ने गंभीर लहजे में कहना शुरू किया, ‘‘मैं एक मध्यम और इज्जतदार परिवार से हूं, जहां लड़की की इज्जत को काफी अहमियत दी जाती है. अगर उस की इज्जत पर कोई आंच आई तो उस का और उस के परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है.

‘‘वैसे भी आजकल मेरा परिवार जिस मुश्किल दौर से गुजर रहा है, उस में ऐसी कोई बात मेरे परिवार की बरबादी का कारण बन सकती है.’’

‘‘कैसी मुश्किलों का दौर?’’ रंजन ने जोर दे कर पूछा.

काव्या ने उसे सबकुछ बताया, फिर अपनी बात खत्म करते हुए बोली, ‘‘मेरी मां और भाई बड़ी मुश्किल से पापा की मौत के गम को बरदाश्त कर पाए हैं, ऐसे में अगर मेरे साथ कुछ हुआ तो मेरा परिवार टूट कर बिखर जाएगा…’’ कहतेकहते काव्या की आंखों में आंसू आ गए और उस ने उस के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘इसलिए मेरी तुम से विनती है कि तुम मेरा पीछा करना छोड़ दो.’’

पलभर के लिए रंजन की आंखों में दया और हमदर्दी के भाव उभरे, फिर उस के होंठों पर एक मक्कारी भरी मुसकान फैल गई.

रंजन काव्या के जुड़े हाथ थामता हुआ बोला, ‘‘मेरी बात मान लो, तुम्हारी सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. मैं तुम्हें पैसे भी दूंगा और प्यार भी. तू रानी बन कर राज करेगी.’’

काव्या को समझते देर न लगी कि उस के सामने बैठा आदमी इनसान नहीं, बल्कि भेडि़या है. उस के सामने रोने, गिड़गिड़ाने और दया की भीख मांगने का कोई फायदा नहीं. उसे तो उसी की भाषा में समझाना होगा. वह मजबूरी भरी भाषा में बोली, ‘‘अगर मैं ने तुम्हारी बात मान ली तो क्या तुम मुझे बख्श दोगे?’’

‘‘बिलकुल,’’ रंजन की आंखों में तेज चमक जागी, ‘‘बस, एक बार मुझे अपने हुस्न के दरिया में उतरने का मौका दे दो.’’

‘‘बस, एक बार?’’

‘‘हां.’’

‘‘ठीक है,’’ काव्या ने धीरे से अपना हाथ उस के हाथ से छुड़ाया, ‘‘मैं तुम्हें यह मौका दूंगी.’’

‘‘कब?’’

‘‘बहुत जल्द…’’ काव्या बोली, ‘‘पर, याद रखो सिर्फ एक बार,’’ कहने के बाद काव्या उठी, फिर रैस्टोरैंट के दरवाजे की ओर चल पड़ी.

‘तुम एक बार मेरे जाल में फंसो तो सही, फिर तुम्हारे पंख ऐसे काटूंगा कि तुम उड़ने लायक ही न रहोगी,’ रंजन बुदबुदाया.

रात के 12 बजे थे. काव्या महानगर से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर एक सुनसान जगह पर एक नई बन रही इमारत की 10वीं मंजिल की छत पर खड़ी थी. छत के चारों तरफ अभी रेलिंग नहीं बनी थी और थोड़ी सी लापरवाही बरतने के चलते छत पर खड़ा कोई शख्स छत से नीचे गिर सकता था.

काव्या ने इस समय बहुत ही भड़कीले कपड़े पहन रखे थे जिस से उस की जवानी छलक रही थी. इस समय उस की आंखों में एक हिंसक चमक उभरी हुई थी और वह जंगल में शिकार के लिए निकले किसी चीते की तरह चौकन्नी थी.

अचानक काव्या को किसी के सीढि़यों पर चढ़ने की आवाज सुनाई पड़ी. उस की आंखें सीढि़यों की ओर लग गईं.

आने वाला रंजन ही था. उस की नजर जब कयामत बनी काव्या पर पड़ी, तो उस की आंखों में हवस की तेज चमक उभरी. वह तेजी से काव्या की ओर लपका. पर उस के पहले कि वह काव्या के करीब पहुंचे, काव्या के होंठों पर एक कातिलाना मुसकान उभरी और वह उस से दूर भागी.

‘‘काव्या, मेरी बांहों में आओ,’’ रंजन उस के पीछे भागता हुआ बोला.

‘‘दम है तो पकड़ लो,’’ काव्या हंसते हुए बोली.

काव्या की इस कातिल हंसी ने रंजन की पहले से ही भड़की हुई हवस को और भड़का दिया. उस ने अपनी रफ्तार तेज की, पर काव्या की रफ्तार उस से कहीं तेज थी.

थोड़ी देर बाद हालात ये थे कि काव्या छत के किनारेकिनारे तेजी से भाग रही थी और रंजन उस का पीछा कर रहा था. पर हिरनी की तरह चंचल काव्या को रंजन पकड़ नहीं पा रहा था.

रंजन की सांसें उखड़ने लगी थीं और फिर वह एक जगह रुक कर हांफने लगा.

इस समय रंजन छत के बिलकुल किनारे खड़ा था, जबकि काव्या ठीक उस के सामने खड़ी हिंसक नजरों से उसे घूर रही थी.

अचानक काव्या तेजी से रंजन की ओर दौड़ी. इस से पहले कि रंजन कुछ समझ सके, उछल कर अपने दोनों पैरों की ठोकर रंजन की छाती पर मारी.

ठोकर लगते ही रंजन के पैर उखड़े और वह छत से नीचे जा गिरा. उस की लहराती हुई चीख उस सुनसान इलाके में गूंजी, फिर ‘धड़ाम’ की एक तेज आवाज हुई. दूसरी ओर काव्या विपरीत दिशा में छत पर गिरी थी.

काव्या कई पलों तक यों ही पड़ी रही, फिर उठ कर सीढि़यों की ओर दौड़ी. जब वह नीचे पहुंची तो रंजन को अपने ही खून में नहाया जमीन पर पड़ा पाया. उस की आंखें खुली हुई थीं और उस में खौफ और हैरानी के भाव ठहर कर रह गए थे. शायद उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की मौत इतनी भयानक होगी.

काव्या ने नफरत भरी एक नजर रंजन की लाश पर डाली, फिर अंधेरे में गुम होती चली गई. Best Hindi Kahani

Hindi Romantic Story: प्यार के साइड इफैक्ट – इश्क के मारे बनवारी बेचारे

Hindi Romantic Story: बनवारी की अभी शादी नहीं हुई थी, क्योंकि पढ़ाई करतेकरते आधी से ज्यादा उम्र खत्म हो गई थी और बाकी कसर नौकरी पाने की तैयारी ने निकाल दी थी.

आंखों पर ज्यादा नंबर के चश्मे ने बनवारी को जवान से धीरेधीरे अंकल की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया था, क्योंकि अब उन्हें लड़कियां भैया नहीं अंकल कहने लगी थीं.

बनवारी शादीशुदा नहीं था, पर लड़कियों को कैसे सुबूत दिया जाए कि अभी वे भैया की श्रेणी में हैं यानी कुंआरे हैं. कोई सिंदूर तो लगा नहीं था माथे पर.

नौकरी को अभी 6 महीने भी नहीं बीते थे कि बनवारी को आज अपनेआप पर गुमान हो आया. जो तमन्ना औफिस में पहले ही दिन घर कर गई थी, वह लगता था कि जल्दी ही पूरी होने वाली है. इस की भी एक वजह थी.

आज बनवारी के औफिस की छुट्टी थी. शाम का वक्त था कि तभी उन के फोन की घंटी बज उठी. एक अनजान नंबर से फोन आ रहा था. बनवारी जल्दी से कोई अनजान नंबर उठाते नहीं थे, पर न जाने क्या मन हुआ कि उन्होंने फोन उठा लिया.

उधर से शहद में घुली मीठी आवाज आई, ‘हैलो… हैलो… आप बनवारी बोल रहे हैं?’

बनवारी भी झट से बोल दिए, ‘‘हां, मैं बनवारी बोल रहा हूं. हैलो… हैलो…’’ इतना कह कर वे आवाज पहचानने की कोशिश कर रहे थे, पर उस लड़की की आवाज पहचान नहीं पा रहे थे. फिर उधर से ही आवाज आई, ‘मैं… प्रिया… बोल रही हूं.’’

अब बनवारी ने ट्रैक पकड़ लिया और सोचने लगे, ‘यह तो मेरे औफिस की ही लड़की है, जिस को मैं इतने दिनों से लाइन मार रहा था.’

प्रिया बोली, ‘बनवारी, मुझे आप से कुछ काम है, इसीलिए मैं ने आप को फोन किया. मु झे एक सिमकार्ड लेना है. अगर आप अपना आधारकार्ड दे दें तो…’

बनवारी सोच में पड़ गए, ‘आजकल तो हर कोई डाटा चोरी की बात कह रहा है. अगर किसी ने मेरा आधारकार्ड ले कर गलत इस्तेमाल कर लिया, तो मैं तो फंस जाऊंगा.

‘मान लीजिए, अगर इस लड़की का किसी आतंकवादी से संबंध हो तो, कहीं मु झे यह लड़की फंसा न दे. हो सकता है कि यह मेरा गलत इस्तेमाल कर ले.’

बनवारी काफी डर गए थे. बस सिमकार्ड के लिए आधारकार्ड मांगने से ही उन का जमीर किसी भी तरह आधारकार्ड देने को राजी न हुआ.

वे सोच कर बोले, ‘‘आधारकार्ड तो अभी आया ही नहीं है.’’

किसी तरह से प्रिया की बात को टाल कर बनवारी ने राहत की सांस ली.

दूसरे दिन बनवारी जब औफिस गए तो प्रिया मिल गई. वह बोली, ‘‘बनवारी, मेरा काम हो गया. वह गौतम है न, उस ने मु झे अपना सिमकार्ड दे दिया. आप से तो आधारकार्ड मांग रही थी, पर आप ने नहीं दिया. कोई बात नहीं.’’

प्रिया अपने मोबाइल में ह्वाट्सएप चला रही थी. बनवारी को लगा कि जैसे आधारकार्ड न दे कर उन्होंने कोई भारी गुनाह कर दिया हो.

प्रिया की उलाहना भरी बात उन के दिल में तीर, कटार, खंजर नहीं, बल्कि गोली जैसी लग रही थी. प्रिया बनवारी की छटपटाहट देख कर मुसकरा दी थी.

उसी दिन जब शाम को बनवारी घर आए तो उन्होंने अपने मोबाइल से प्रिया को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. उन की रिक्वैस्ट स्वीकार भी हो गई. लगे हाथ ह्वाट्सएप पर कनैक्ट हो गए. अब तो बनवारी का फेसबुक और ह्वाट्सएप पर ‘गुड मौर्निंग’, ‘गुड ईवनिंग’ और ‘गुड नाइट’ के मैसेज करना रोज का शगल हो गया जैसे कि कोई रोज सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर और रात का खाना हो. ड्यूटी से जब वे घर आते तो उन के हाथ से मोबाइल एक सैकंड के लिए नहीं छूटता था, जैसे कि इस के बिना उन को बदहजमी हो जाएगी.

जब से प्रिया ने बनवारी को फोन किया था, तभी से उन के दिल में प्रिया के लिए कुछकुछ हो गया था. वे हर वक्त प्रिया की खुशामद किया करते थे. चाय पीना हो या नाश्ता करना हो, बनवारी प्रिया का बहुत ही ज्यादा खयाल रखते थे.

कुछ दिन बहुत मजे से गुजरे होंगे, पर उन पर अचानक आफत का पहाड़ आ गिरा. इतवार का दिन था. बनवारी अभी कहीं घूमने का प्लान बना रहे थे कि तभी प्रिया का फोन आ गया. यह तो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाली बात थी.

वे मन ही मन में सोचने लगे, ‘आज तो प्रिया को मल्टीप्लैक्स में नई मूवी दिखाऊंगा, फिर रैस्टोरैंट में खाना खाएंगे, फिर हम लोग कुछ शौपिंग वगैरह करेंगे, उस के बाद देर रात घर लौट आएंगे.’

प्रिया फोन पर बोली, ‘बनवारी, आप से मुझे कुछ काम है. आप मना तो नहीं करेंगे न? मैं जानती हूं कि आप बहुत अच्छे इनसान हैं. मु झे कुछ रुपयों की मदद चाहिए. मैं जानती हूं कि आप मना नहीं करेंगे?’

बनवारी उलझन में पड़ गए. अभी तो कुछ देर पहले ही हवा में उड़ रहे थे, पर अब उन के पंख पानी से गीले हो गए थे.

बनवारी प्रिया को दुखी नहीं करना चाह रहे थे, क्योंकि वे एक मौका चूक गए थे. वे तपाक से बोले, ‘‘तुम्हें कितना पैसा चाहिए?’’

यह सुन कर प्रिया खुश होते हुए बोली, ‘मु झे डेढ़ लाख रुपए की जरूरत है. मैं आप की पाईपाई चुका दूंगी. मु झे घर में कुछ जरूरत है.

‘मैं ने यह बात सिर्फ आप ही से कही है, क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि आजकल लड़की देखी नहीं कि हर कोई उस का फायदा लेना चाहता है.’

बनवारी को अपनेआप में थोड़ा भरोसा बढ़ रहा था, फिर भी उन के मुंह से आखिर निकल ही गया, ‘‘ये तो बहुत  ज्यादा रकम है.’’

प्रिया पहले थोड़ी नाराज हुई, पर फिर बोली, ‘अगर आप एक लाख रुपए भी दे देते हैं, तो बाकी का मैं और कहीं से जुगाड़ कर लूंगी.’

बनवारी ने दूसरे दिन ही बैंक से रुपए निकाल कर प्रिया को दे दिए. उन को ऐसा लग रहा था, जैसे वे कोई अच्छा काम कर के आ रहे हों. लोग पुण्य कमाने के लालच में ढोंगी पंडे पुजारी, मुल्लामौलवी और फकीर को दानदक्षिणा देते हैं, कुछ उसी तरह की अनुभूति बनवारी को हो रही थी.

वे रुपए दे कर यही सोच रहे थे कि इतने दिनों तक जिस की आस में लगे रहे, वह फल अब जा कर उन की  झोली में गिरा है.

दूसरे दिन जब बनवारी औफिस गए तो उन का ध्यान प्रिया की कुरसी की तरफ गया. प्रिया की कुरसी खाली थी. मालूम करने पर पता चला कि उस ने तो 15 दिन की छुट्टी ले ली है.

बनवारी प्रिया का प्यार पाने के लिए उतावले रहते थे, पर अब औफिस में प्रिया को न पा कर उन को बड़ी निराशा हुई.

औफिस से 15 दिनों की छुट्टी बीतने के बाद भी प्रिया ने ड्यूटी जौइन नहीं की थी. अब बनवारी बेचैन हो उठे. वे प्रिया को फोन लगातेलगाते परेशान हो गए, पर वह फोन उठाने का नाम नहीं ले रही थी.

तकरीबन एक महीने बाद प्रिया घर से लौटी थी. जब वह औफिस में पहुंची तो बनवारी तो जैसे आंखें बिछाए उस का इंतजार ही कर रहे थे. वे प्रिया से बात करने की लाख कोशिश करते, पर वह उन्हें भाव ही नहीं दे रही थी.

बनवारी ने सोचा था कि रुपए का लालच पा कर प्रिया शायद उन के करीब आ जाएगी, पर ऐसा हो न सका.

बनवारी के मन में प्यार पाने की लालसा धीरेधीरे अब खत्म हो चली थी, क्योंकि रुपए लेने के बावजूद प्रिया बनवारी के मन की इच्छा पूरी न कर सकी थी. अब तो यह हाल था कि  औफिस में आमनेसामने देखने के बावजूद लगता था कि प्रिया उन्हें पहचानती ही न हो.

बनवारी को अब लग रहा था कि प्रिया का प्यार तो मिलने से रहा, अब किसी तरह रुपए ही वापस मिल जाएं तो बहुत बड़ी बात होगी.

बनवारी उस दिन प्रिया से औफिस में कुछ नहीं बोले, पर जब घर गए तो प्रिया को फोन लगाया. बहुत देर बाद प्रिया ने फोन उठाया.

बनवारी बोले, ‘‘प्रिया, मु झे रुपयों की जरूरत है, अगर मेरे रुपए लौटा दो तो…’’

यह सुन कर प्रिया का मूड खराब हो गया. वह तुनक कर बोली, ‘‘मैं आप से बोली थी कि रुपए 5-6 महीने में लौटा दूंगी और आप इतनी जल्दबाजी कर रहे हैं. इस से तो अच्छा था कि आप रुपए देते ही नहीं.’’

बनवारी कुछ बोल नहीं पाए.

धीरेधीरे 6 नहीं, 8 महीने बीत गए. पर बनवारी के रुपए नहीं मिले. वे जैसे बेचारे बन गए थे. अपने ही रुपए दे कर ऐसा लगता था कि कोई भारी अपराध कर दिया हो. उन को तो खजाना भी लुट गया था और वे अपराधी भी बन गए थे.

एक दिन फिर बनवारी प्रिया से रुपयों के बारे में बोले, क्योंकि प्यार के बारे में तो बोल नहीं सकते थे. आजकल लड़की न जाने कौन से अपराध में फंसा दे.

झूठी छेड़खानी में ही फंसा दे. रुपए तो जाएंगे ही, समाज में बदनामी भी होगी.

तकरीबन डेढ़ साल बाद बनवारी को टुकड़ोंटुकड़ों यानी किस्तों में रुपए मिले.

3 महीने का वादा कर के प्रिया डेढ़ साल बाद रुपए लौटा रही थी.

रुपए पा कर आज बनवारी को ऐसा लगा, जैसे उन्होंने प्रशांत महासागर को पार कर लिया हो.

अब बनवारी का प्यार के प्रति मोह भंग हो गया था. रुपए मिल गए, वही बहुत बड़ी बात थी.

इस घटना के सालभर बाद ही बनवारी की शादी हो गई. पर अब भी कभी जवान लड़कियों को देखते हैं, तो उन्हें बरबस उन खूबसूरत भोलीभाली लड़कियों में एक अलग इमेज दिखाई देती है. शायद और किसी को पता भी नहीं चलता होगा, पर बनवारी की नजर ऐक्सरे, सीटी स्कैन नहीं, बल्कि सीएमआरआई की सी हो गई थी लड़कियों को पहचानने में.

बनवारी पर इस तरह के ‘प्यार का साइड इफैक्ट’ पड़ना मुश्किल ही नहीं, अब नामुमकिन था. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: मजुरिया – मजदूर मां का सपना जीती उस की लाड़ली

Hindi Family Story: ‘‘बहनजी, इन का भी दाखिला कर लो. सुना है कि यहां रोज खाना मिलता है और वजीफा भी,’’ 3 बच्चों के हाथ पकड़े, एक बच्चा गोद में लिए एक औरत गांव के प्राइमरी स्कूल में बच्चों का दाखिला कराने आई थी.

‘‘हांहां, हो जाएगा. तुम परेशान मत हो,’’ मैडम बोली.

‘‘बहनजी, फीस तो नहीं लगती?’’ उस औरत ने पूछा.

‘‘नहीं. फीस नहीं लगती. अच्छा, नाम बताओ और उम्र बताओ बच्चों की. कौन सी जमात में दाखिला कराओगी?’’

‘‘अब बहनजी, लिख लो जिस में ठीक समझो.

‘‘बड़ी बेटी का नाम मजुरिया है. इस की उम्र 10 साल है. ये दोनों दिबुआ और शिबुआ हैं. छोटे हैं मजुरिया से,’’ बच्चों की मां ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘नाम मंजरी. उम्र 8 साल. देव. उम्र 7 साल और शिव. उम्र 6 साल. मजुरिया जमात 2 में और देव व शिव का जमात एक में दाखिला कर लिया है. अब मैं तुम्हें मजुरिया नहीं मंजरी कह कर बुलाऊंगी,’’ मैडम ने कहा.

मजुरिया तो मानो खुशी से कूद पड़ी, ‘‘मंजरी… कितना प्यारा नाम है. अम्मां, अब मुझे मंजरी कहना.’’

‘‘अरे बहनजी, मजुरिया को मंजरी बना देने से वह कोई रानी न बन जाएगी. रहेगी तो मजदूर की बेटी ही,’’ मजुरिया की अम्मां ने दुखी हो कर कहा.

‘‘नहीं अम्मां, मैं अब स्कूल आ गई हूं, अब मैं भी मैडम की तरह बनूंगी. फिर तू खेत में मजदूरी नहीं करेगी,’’ मंजरी बनते ही मजुरिया अपने सपनों को बुनने लगी थी.

मजुरिया बड़े ध्यान से पढ़ती और अम्मां के काम में भी हाथ बंटाती.

मजुरिया पास होती गई. उस के भाई धक्का लगालगा कर थोड़ाबहुत पढ़े, पर मजुरिया को रोकना अब मुश्किल था. वह किसी को भी शिकायत का मौका नहीं देती थी और अपनी मैडम की चहेती बन गई थी.

‘‘मंजरी, यह लो चाबी. स्कूटी की डिक्की में से मेरा लंच बौक्स निकाल कर लाना तो. पानी की बोतल भी है,’’ एक दिन मैडम ने उस से कहा.

मजुरिया ने आड़ीतिरछी कर के डिक्की खोल ही ली. उस ने बोतल और लंच बौक्स निकाला. वह सोचने लगी, ‘जब मैं पढ़लिख कर मैडम बनूंगी, तो मैं भी ऐसा ही डब्बा लूंगी. उस में रोज पूरी रख कर लाया करूंगी.

‘मैं अम्मां के लिए साड़ी लाऊंगी और बापू के लिए धोतीकुरता.’

मजुरिया मैडम की बोतल और डब्बा हाथ में लिए सोच ही रही थी कि मैडम ने आवाज लगाई, ‘‘मंजरी, क्या हुआ? इतनी देर कैसे लगा दी?’’

‘‘आई मैडम,’’ कह कर मजुरिया ने मैडम को डब्बा और बोतल दी और किताब खोल कर पढ़ने बैठ गई.

अब मजुरिया 8वीं जमात में आ गई थी. वह पढ़ने में होशियार थी. उस के मन में लगन थी. वह पढ़लिख कर अपने घर की गरीबी दूर करना चाहती थी.

उस की मां मजुरिया को जब नए कपड़े नहीं दिला पाती, तो वह हंस कर कहती, ‘‘तू चिंता मत कर अम्मां. एक बार मैं नौकरी पर लग जाऊं, फिर सब लोग नएनए कपड़े पहनेंगे.’’

‘‘अरे, खुली आंख से सपना न देख. अब तक तो तेरी फीस नहीं जाती है. कौपीकिताबें मिल जाती हैं. सो, तू पढ़ रही है. इस से आगे फीस देनी पड़ेगी.’’

अम्मां मजुरिया की आंखों में पल रहे सपनों को तोड़ना नहीं चाहती थी, पर उस के मजबूत इरादों को थोड़ा कम जरूर करना चाहती थी. वह जानती थी कि अगर सपने कमजोर होंगे, तो टूटने पर ज्यादा दर्द नहीं देंगे.

और यही हुआ. मजुरिया की 9वीं जमात की फीस उस की मैडम ने अपने ही स्कूल के सामने चल रहे सरकारी स्कूल में भर दी.

मजुरिया तो खुश हो गई, लेकिन कोई भी मजुरिया आज तक इस स्कूल में पढ़ने नहीं आई थी. एक दिन जब मजुरिया स्कूल पढ़ने गई और वहां के टीचरों ने उस की पढ़ाई की तारीफ की, तो वहां के ठाकुर बौखला गए.

‘‘ऐ मजुरिया की अम्मां, उधार बहुत बढ़ गया है. कैसे चुकाएगी?’’

‘‘मालिक, हम दिनरात आप के खेत पर काम कर के चुका देंगे.’’

‘‘वह तो ठीक है, पर अकेले तू कितना पैसा जमा कर लेगी? मजुरिया को क्यों पढ़ने भेज रही है? वह तुम्हारे काम में हाथ क्यों नहीं बंटाती है?’’ इतना कह कर ठाकुर चले गए.

मजुरिया की अम्मां समझ गई कि निशाना कहां था. लेकिन इन सब से बेखबर मजुरिया अपनी पढ़ाई में खुश थी. पर कोई और भी था, जो उस के इस ख्वाब से खुश था.

पल्लव, बड़े ठाकुर का बेटा, जो मजुरिया से एक जमात आगे गांव से बाहर के पब्लिक स्कूल में पढ़ता था. वह मजुरिया को उस के स्कूल तक छोड़ कर आगे अपने स्कूल जाता था.

‘‘तू रोज इस रास्ते से क्यों स्कूल जाता है? तुझे तो यह रास्ता लंबा पड़ता होगा न?’’ मजुरिया ने पूछा.

‘‘हां, सो तो है, पर उस रास्ते पर तू नहीं होती न. तू उस रास्ते से आने लगे, तो मैं भी उसी से आऊंगा,’’ पल्लव ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘न बाबा न, वहां तो सारे ठाकुर रहते हैं. बड़ीबड़ी मूंछें, बाहर निकली हुई आंखें,’’ मजुरिया ने हंस कर कहा.

‘‘अच्छा, तो तू ठाकुरों से डरती है?’’ पल्लव ने पूछा.

‘‘हां, पर मुझे ठकुराइन अच्छी

लगती हैं.’’

‘‘तू ठकुराइन बनेगी?’’

‘‘मैं कैसे बनूंगी?’’

‘‘मुझसे शादी कर के,’’ पल्लव ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘तू पागल है. जा, अपने स्कूल. मेरा स्कूल आ गया है,’’ मजुरिया ने पल्लव को धकेलते हुए कहा और हंस कर स्कूल भाग गई.

उस दिन मजुरिया के घर आने पर उस की अम्मां ने कह दिया, ‘‘आज से स्कूल जाने की जरूरत नहीं है. ठाकुर का कर्ज बढ़ता जा रहा है. अब तो तुझे स्कूल में खाना भी नहीं मिलता है. कल से मेरे साथ काम करने खेत पर चलना.’’

मजुरिया टूटे दिल से अम्मां के साथ खेत पर जाने लगी.

वह 2 दिन से स्कूल नहीं गई, तो पल्लव ने खेत पर आ कर पूछा, ‘‘मंजरी, तू स्कूल क्यों नहीं जा रही है? क्या मु?ा से नाराज है?’’

‘‘नहीं रे, ठाकुर का कर्ज बढ़ गया है. अम्मां ने कहा है कि दिनरात काम करना पड़ेगा,’’ कहते हुए मजुरिया की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘तू परेशान मत हो. मैं तुझे घर आ कर पढ़ा दिया करूंगा,’’ पल्लव ने कहा, तो मजुरिया खुश हो उठी.

अम्मां जानती थी कि ठाकुर का बेटा उन के घर आ कर पढ़ाएगा, तो हंगामा होगा. पर वह छोटे ठाकुर की यह बात काट नहीं सकी.

पल्लव मजुरिया को पढ़ाने घर आने लगा. लेकिन उन के बीच बढ़ती नजदीकियों से अम्मां घबरा गई. अम्मां ने अगले दिन पल्लव से घर आ कर पढ़ाने से मना कर दिया.

मजुरिया कभीकभी समय मिलने पर स्कूल जाती थी. पल्लव रास्ते में उसे मिलता और ढेर सारी बातें करता. कब 2 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला. आज मजुरिया का 10वीं जमात का रिजल्ट आएगा. उसे डर लग रहा था.

पल्लव तेजी से साइकिल चलाता हुआ गांव में घुसा, ‘‘मजुरिया… मजुरिया… तू फर्स्ट आई है.’’

मजुरिया हाथ में खुरपी लिए दौड़ी, उस का दुपट्टा उस के कंधे से उड़ कर दूर जा गिरा. उस ने पल्लव के हाथ से अखबार पकड़ा और भागते हुए अम्मां के पास आई, ‘‘अम्मां, मैं फर्स्ट आई हूं.’’

अम्मां ने उस के हाथ से अखबार छीना और हाथ पकड़ कर घर ले गई. पर उस की आवाज बड़े ठाकुर के कानों तक पहुंच ही गई.

‘‘मजुरिया की मां, तेरी लड़की जवान हो गई है. अब इस से खेत पर काम मत करवा. मेरे घर भेज दिया कर…’’ ठाकुर की बात पूरी नहीं हो पाई थी, उस से पहले ही अम्मां ने उसे घूर कर देखा, ‘‘मालिक, हम खेतिहर मजदूर हैं. किसी के घर नहीं जाते,’’ इतना कह कर अम्मां घर चली गई.

घर पर अम्मां मजुरिया को कमरे में बंद कर प्रधान के घर गई. उन की पत्नी अच्छी औरत थीं और उसे अकसर बिना सूद के पैसा देती रहती थीं.

‘‘मालकिन, मजुरिया के लायक कोई लड़का है, तो बताओ. हम उस के हाथ पीले करना चाहते हैं.’’

प्रधानजी की पत्नी हालात भांप गईं.

‘‘हां मजुरिया की अम्मां, मेरे मायके में रामदास नौकर है. पुरखों से हमारे यहां काम कर रहे हैं. उस का लड़का है. एक टांग में थोड़ी लचक है, उस से शादी करवा देते हैं. छठी जमात पास है.

‘‘अगर तू कहे, तो आज ही फोन कर देती हूं. मेरे पास 2-3 कोरी धोती रखी हैं. तू परेशान मत हो, बाकी का इंतजाम भी मैं कर दूंगी.’’

मजुरिया की अम्मां हां कह कर घर आ गई. 7वें दिन बैलगाड़ी में दूल्हे समेत 3 लोग मजुरिया को ब्याहने आ गए. बिना बाजे और शहनाई के मजुरिया को साड़ी पहना कर बैलगाड़ी में बैठा दिया गया.

मजुरिया कुछ समझ पाती, तब तक बैलगाड़ी गांव से बाहर आ गई. उस ने इधरउधर नजर दौड़ाई और बैलगाड़ी से कूद कर गांव के थाने में पहुंच गई.

‘‘कुछ लोग मुझे पकड़ कर ले जा रहे हैं,’’ मजुरिया ने थानेदार को बताया.

पुलिस ने मौके पर आ कर उन्हें बंद कर दिया. मजुरिया गांव वापस आ गई. जब सब को पता चला, तो उसे बुराभला कहने लगे. मां ने उसे पीट कर घर में बंद कर दिया.

मजुरिया के घर पर 2 दिन से न तो चूल्हा जला और न ही वे लोग घर से बाहर निकले.

पल्लव छिप कर उस के लिए खाना लाया. उस ने समझाया, ‘‘देखो मंजरी, तुम्हें ख्वाब पूरे करने के लिए थोड़ी हिम्मत दिखानी पड़ेगी. बुजदिल हो कर, रो कर तुम अपने सपने पूरे नहीं कर सकोगी…’’

पल्लव के इन शब्दों ने मजुरिया को ताकत दी. वह अगले दिन अपनी मैडम के घर गई. उन्होंने उसे 12वीं जमात का फार्म भरवाया. इस के बाद पल्लव मंजरी को रास्ता दिखाता रहा और उस ने बीए कर लिया. पल्लव की नौकरी लग गई.

‘‘मंजरी, मैं अहमदाबाद जा रहा हूं. क्या तुम मु?ा से शादी कर के मेरी ठकुराइन बनोगी?’’ पल्लव ने मंजरी का हाथ पकड़ कर कहा.

‘‘अगर मैं ने दिल की आवाज सुनी और तुम्हारे साथ चल दी, तो फिर कभी कोई मजुरिया दोबारा मंजरी बनने का ख्वाब नहीं देख पाएगी. फिर कभी कोई टीचर किसी मजुरिया को मंजरी बनाने की कोशिश नहीं करेगी.

‘‘एक मंजरी का दिल टूटने से अगर हजार मजुरियों के सपने पूरे होते हैं, तो मुझे यह मंजूर है,’’ मजुरिया ने कड़े मन से अपनी बात कही.

पल्लव समझ गया और उसे जिंदगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे कर वहां से चला गया. Hindi Family Story

Mamta Kulkarni Statement: “दाऊद इब्राहिम आतंकवादी नहीं है”

Mamta Kulkarni Statement: 90 के दशक की मशहूर और ग्लैमरस एक्ट्रेस ममता कुलकर्णी एक बार फिर चर्चा में हैं. लंबे समय से फिल्मी दुनिया से दूर रहने के बावजूद, ममता का नाम समय-समय पर विवादों से जुड़ता रहा है खासकर अंडरवर्ल्ड अंडरवर्ल्ड के साथ कनैक्शन से उनके करियर को बड़ा झटका लगा था. आपको बता दें कि ममता कुलकर्णी ने कुछ समय पहले किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर की उपाधि भी प्राप्त की थी. हालांकि, इस निर्णय को लेकर काफी विवाद हुआ और बाद में उन्हें अखाड़े से बाहर कर दिया गया.

बावजूद इसके, ममता ने किन्नर समाज से अपना जुड़ाव बनाए रखा और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं. हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में ममता ने दाऊद इब्राहिम को लेकर ऐसा बयान दे दिया, जिससे सोशल मीडिया पर बवाल मच गया है. इंटरव्यू के दौरान ममता ने कहा कि “दाऊद इब्राहिम कोई आतंकवादी नहीं है.” ममता का कहना है, “मेरा दाऊद इब्राहिम से कोई लेना-देना नहीं है. उसका नाम जरूर आया था, लेकिन उसने देश के अंदर कोई बम ब्लास्ट या एंटी-नेशनल काम नहीं किया. मैं उसके साथ नहीं हूं, मगर वो आतंकवादी नहीं है. जब आप दाऊद का नाम लेते हैं, तो ये समझिए कि उसने मुंबई में कभी बम ब्लास्ट नहीं किया. मैं उससे कभी मिली भी नहीं.”

उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोग उन्हें जमकर ट्रोल कर रहे हैं, वहीं कुछ यूज़र्स इसे ममता का पब्लिसिटी स्टंट भी बता रहे हैं. Mamta Kulkarni Statement

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