बच्चे हों या औरतें बलात्कार क्यों

8 सितंबर, 2017 की सुबह भोंडसी, गुड़गांव में श्याम कुंज इलाके की गली नंबर 2 में रहने वाले वरुण ठाकुर अपने बच्चों प्रद्युम्न और विधि को सुबह के 7 बज कर 50 मिनट पर रयान इंटरनैशनल स्कूल के गेट पर छोड़ गए थे. प्रद्युम्न दूसरी क्लास में पढ़ता था, जबकि विधि 5वीं क्लास में.

8 बजे स्कूल का एक माली दौड़ कर प्रद्युम्न की टीचर अंजू डुडेजा के पास गया और उन का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोला, ‘‘देखो,?टौयलेट में क्या हो गया है…’’

अंजू डुडेजा जब वहां पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि टौयलेट के बाहर गैलरी की दीवार के पास प्रद्युम्न का स्कूल बैग पड़ा था और टौयलेट के भीतर वह लहूलुहान हालत में.

8 बज कर 10 मिनट पर?स्कूल मैनेजमैंट ने प्रद्युम्न के पिता को उस की तबीयत खराब होने की सूचना दी. इसी बीच प्रद्युम्न को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी.

इस हत्याकांड में बस कंडक्टर को जिम्मेदार ठहराया गया. उस ने बच्चे के साथ यौन शोषण करने की कोशिश की थी या किसी और को बचाने के लिए बस कंडक्टर को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, ऐसे सवालों के जवाब तो समय आने पर ही पता चलेंगे, लेकिन सब से अहम बात यह है कि एक परिवार ने अपने मासूम बच्चे को खो दिया, वह भी इस तरह से कि जीतेजी तो उन के दिलोदिमाग से प्रद्युम्न की यादें नहीं जा पाएंगी.

प्रद्युम्न के पिता ने इस हत्याकांड की तह तक पहुंचने के लिए कानून का सहारा लिया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए खुद सभी प्राइवेट स्कूलों में सिक्योरिटी की जांच करने का फैसला लिया. लेकिन सवाल उठता?है कि ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि कोई बालिग आदमी किसी बच्चे को अपनी हवस का शिकार बनाता है, क्योंकि इस वारदात के तुरंत बाद दिल्ली के एक निजी स्कूल में 5 साल की एक बच्ची के साथ रेप की वारदात सामने आई थी.

गुड़गांव के ही एक पड़ोसी जिले फरीदाबाद में भी ऐसा ही शर्मनाक वाकिआ हो गया था. नैशनल हाईवे के पास सीकरी गांव के सरकारी स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ने वाले एक बच्चे को 24 अगस्त, 2017 को सीकरी गांव का रहने वाला 19 साला सूरज अपने साथ स्कूल के पीछे उगी झाडि़यों में ले गया था. वह उस के साथ गलत काम करना चाहता था. बच्चे ने विरोध किया, तो सूरज ने उस का गला दबाया और जबरदस्ती की. बाद में पहचान मिटाने के लिए पत्थर से वार कर के बच्चे का चेहरा कुचल दिया.

हाल ही में मुंबई में अपने सौतेले पिता द्वारा कथित तौर पर बलात्कार किए जाने के बाद पेट से हुई 12 साल की एक लड़की ने एक सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया. आरोपी को इसी साल जुलाई महीने में गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने बताया कि लड़की के पेट से होने के बारे में बहुत देर से, तकरीबन 7 महीने बाद पता चला था. लड़की ने अपनी मां को बताया था कि उस के सौतेले पिता ने उस के साथ कथित तौर पर कई बार बलात्कार किया था.

बड़े दुख की बात है कि भारत में साल 2010 से साल 2015 तक यानी 5 साल में ही बच्चों के बलात्कार के मामलों में 151 फीसदी की शर्मनाक बढ़ोतरी हुई थी. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2010 में दर्ज 5,484 मामलों से बढ़ कर यह तादाद साल 2014 में 13,366 हो गई थी.

इस के अलावा बाल यौन शोषण संरक्षण अधिनियम (पोक्सो ऐक्ट) के तहत देशभर में ऐसे 8,904 मामले दर्ज किए गए.

साल 2013 की बात है. छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले में कन्या छात्रावास में प्राइमरी क्लास की 9 आदिवासी छात्राओं के साथ यौन शोषण का एक मामला सामने आया था. इस वारदात की जानकारी मिलते ही पुलिस ने छात्रावास के चौकीदार दीनाराम और शिक्षाकर्मी मन्नूराम गोटर को गिरफ्तार कर लिया था.

तब छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व सांसद रमेश बैस ने सवाल उठाया था कि बराबरी या बड़े लोगों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन बच्चों के साथ ऐसा अपराध क्यों होता?है?

औरतें और बच्चे शिकार

सच तो यह है कि औरतों और बच्चों से बलात्कार करने का इतिहास बहुत पुराना है. जब कभी राजामहाराजा किसी पड़ोसी देश को लड़ाई में जीतते थे, तो हारे हुए राजा की जनता में से औरतों के साथ अपने सैनिकों को बलात्कार करने की छूट दे देते थे. वे सैनिक बच्चियों और औरतों में कोई फर्क नहीं करते थे. जो औरतें अपनी इज्जत बचाना चाहती थीं, उन्हें खुदकुशी करना सब से आसान रास्ता लगता था.

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे में भी न जाने कितनी औरतों और बच्चियों ने अपनी इज्जत गंवाई थी. वैसे, जब हवस हावी होती है, तो फिर छोटे लड़के भी बलात्कारी के शिकार बन जाते हैं.

भारत में जिन राज्यों में सेना की चलती है, वहां की लोकल औरतों की सब से बड़ी समस्या यह रहती है कि उन की व उन के बच्चों की इज्जत सुरक्षित नहीं है. जम्मू व कश्मीर में बहुत से सैनिकों पर बलात्कार करने के आरोप लगते रहे हैं.

फिलीपींस देश के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने तो एक चौंकाने वाला बयान दे डाला था. जब वे दक्षिणी फिलीपींस में मार्शल ला लगाने के 3 दिन बाद सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए वहां पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि सैनिकों को 3 औरतों के साथ बलात्कार करने की इजाजत है.

ऐसी क्या वजह?है कि कोई राष्ट्रपति अपने ही देश की औरतों के साथ बलात्कार करने की इजाजत देता है? क्या कोई सैनिक जब उन के आदेश को मानेगा, तो वह सामने औरत है या बच्ची, इस बात का ध्यान रखेगा?

चलो, एक बालिग लड़की या औरत के साथ जबरदस्ती करने की बात समझ में आती?है, हालांकि यह भी गलत?है, लेकिन किसी बच्ची को लहूलुहान करने में किसी मर्द को कौन सा सुख हासिल होता है?

जब कोई मर्द किसी औरत या बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाता है, तब उस की सोच क्या रहती?है? भारत की बात करें, तो यहां ऐसा मर्दवादी समाज है, जहां मर्दों को अपना हुक्म चलाने की आदत होती है. वे चाहते हैं कि औरतें उन के पैरों की जूती बन कर रहें. जब कोई बाहरी औरत उन की बात नहीं मानती है, तो वे उस की इज्जत से खेल कर उस के अहम को चोट पहुंचाते?हैं. जब औरत हाथ नहीं आती, तो बच्ची ही सही.

क्या आप ने कभी सोचा है कि जितनी भी गालियां बनी हैं, उन में औरतों के नाजुक अंगों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है? इस में भी मर्दवादी सोच ही पहले नंबर पर रहती है. कुछ लोगों के दिमाग में 24 घंटे हवस सवार रहती है. वे जब अपनी जिस्मानी जरूरत घर में बीवी से पूरी नहीं कर पाते?हैं, तो आसपड़ोस में झांकते हैं. जब कभी कोई बड़ी औरत फंस जाए तो ठीक, नहीं तो कम उम्र की बच्ची को भी नहीं छोड़ते हैं. फिर उन के लिए यह बात कोई माने नहीं रखती है कि मजा मिला या नहीं.

जब किसी बड़े संस्थान या मैट्रो शहर में ऐसे बलात्कार होते हैं, तो अपराध सामने आ जाते हैं, लेकिन छोटे इलाकों में तो पता भी नहीं चल पाता है. समाज का डर दिखा कर घर वाले ही पीडि़त को चुप करा देते हैं, जिस से बलात्कारी के हौसले बढ़ जाते हैं. लेकिन बलात्कारी खासकर छोटे बच्चों को शिकार बनाने वाले समाज में

खुले घूमने नहीं चाहिए? क्योंकि वे अपनी घिनौनी हरकत से पीडि़त बच्चे के दिलोदिमाग पर ऐसी काली छाप छोड़ देते हैं, जो उस के भविष्य पर बुरा असर डालती है.

ऐसा पीडि़त बच्चा बड़ा हो कर अपराधी बन सकता है. यह सभ्य समाज के लिए कतई सही नहीं. लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि बलात्कारी आतंकवादियों के ‘स्लीपर सैल’ की तरह समाज में ऐसे घुलेमिले होते?हैं कि जब तक वे पकड़ में न आएं, तब तक उन की पहचान करना मुश्किल होता है. इस के लिए कानून से ज्यादा लोगों की जागरूकता काम आती है.

सैक्स ऐजुकेशन जरूरी

बच्चों के हकों के प्रति लोगों को जागरूक करने वाले और नोबल अवार्ड विजेता कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि बच्चे सैक्स हिंसा का शिकार न बनें, इस के लिए पूरे समाज को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा. साथ ही, स्कूलों में सैक्स ऐजुकेशन से बच्चों को इस जानकारी से रूबरू कराना चाहिए.

कैलाश सत्यार्थी की सब से बड़ी चिंता यह है कि बच्चों को उन के?घरों व स्कूलों में मर्यादा, इज्जत, परंपरा वगैरह की दुहाई दे कर इस तरह के बोल्ड मामलों पर बोलने ही नहीं दिया जाता है. अगर वे कुछ पूछना चाहते हैं, तो उन्हें ‘गंदी बात’ कह कर वहीं रोक दिया जाता है.

अगर कोई बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, तो उस के जिस्मानी घाव तो वक्त के साथ फिर भी भर जाते?हैं, पर मन पर लगी चोट उम्रभर दर्द देती है.

हिंदी फिल्म ‘हाईवे’ की हीरोइन आलिया भट्ट के साथ बचपन में उन्हीं के परिवार के एक सदस्य ने यौन शोषण किया था, जिस की तकलीफ से वे पूरी फिल्म में जूझती दिखाई देती हैं.

जहां तक इस समस्या से जुड़े कानून की बात?है, तो हमारे यहां बाल यौन शोषण को ले कर पोक्सो जैसे कानून हैं तो, पर उन का भी ठीक ढंग से पालन नहीं किया जाता है.

पिछले साल इस कानून के तहत तकरीबन 15 हजार केस दर्ज हुए थे, जिन में से महज 4 फीसदी मामलों में सजा हो पाई. 6 फीसदी आरोपी बरी हो गए और बाकी 90 फीसदी मामले अदालत में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. ऐसी ही लचर चाल रही, तो उन का फैसला आने में कई साल लग जाएंगे.

बच्चों को करें होशियार

सच तो यह है कि जब कोई छोटा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, तो उस में इतनी समझ नहीं होती कि उस के साथ हो क्या रहा है. अपराधी उन की इसी बालबुद्धि का फायदा उठाते हैं. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि बच्चों को उन की सिक्योरिटी के मद्देनजर जानकारी न दी जाए. कभीकभी कुछ टिप्स ऐसे होते हैं, जो मौके पर काम कर जाते हैं या फिर बच्चे को उस के साथ कोई अनहोनी होने का डर हो तो वह वक्त रहते किसी अपने को बता सकता है. कुछ जरूरी बातें इस तरह हैं.

* मातापिता बच्चे को अपना दोस्त समझें, ताकि वह अपने मन की बात खुल कर कह सके.

* हालांकि बहुत बार जानकार आदमी भी बच्चे के साथ यौन शोषण कर सकता है, लेकिन फिर भी बच्चों को किसी के गलत तरीके से उन के बदन के खास हिस्सों को छूने के प्रति आगाह कर देना चाहिए.

* अगर बच्चा डराडरा सा रहता है या चुप रहता है, तो खुल कर इस की वजह पूछें. आप की बात नहीं सुनता है, तो किसी काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है.

* स्कूल में टीचर का भी फर्ज बनता है कि वह अपने हर स्टूडैंट पर कड़ी नजर रखे. कुछ भी गलत होने की खबर लगे, तो फौरन मांबाप को इस की जानकारी दी जाए.

* अगर बच्चे के साथ कुछ गलत हो भी रहा है, तो वह शर्मिंदगी महसूस न करे, बल्कि अपने मातापिता को जानकारी दे.

मेरी गर्लफ्रैंड 16 साल की है, वो प्रेग्नेंट हो गई मैनें उसका अर्बाशन कराया, मैं क्या करूं?

सवाल
मैं 18 साल का हूं और मेरी गर्लफ्रैंड 16 साल की है. लगातार हमबिस्तरी करने की वजह से वह पेट से हो गई थी. लिहाजा, मुझे उस का गर्भपात कराना पड़ा. तब से वह बहुत उदास रहती है. मैं क्या करूं?

जवाब
आप उसे बाहर घुमाफिरा कर और खिलापिला कर खुश करें, मगर हमबिस्तरी कतई न करें. पहले पढ़ाई पूरी करें, फिर नौकरी करें और शादी की उम्र हो जाने के बाद शादी करें.

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44 साला उषा अपनी जवान होती बेटी निशा को देख कर सिहर उठती हैं कि कहीं उसे भी उन की तरह शादी के पहले इश्क के चक्कर में पड़ कर पेट से हो कर उन हालात से न गुजरना पडे़ जिन से वे कई साल पहले हो कर गुजरी थीं. हुआ यों था कि 20 साल पहले बीए करने के बाद उषा को अपने आशिक राकेश से बच्चा ठहर गया था. खुद के पेट से होने का पता उन्हें 4 महीने बाद चला था. वह भी एक सहेली के टोकने पर जिस से उन्होंने कहा था कि 4 महीने से पीरियड नहीं आ रहे हैं और शरीर में थकान व सुस्ती भी रहती है.

सहेली तुरंत भांप गई और राकेश से उन की हमबिस्तरी के बारे में पूछा तो उन्होंने सचसच बता दिया कि हां, कई बार बगैर कंडोम के भी संबंध बने थे. सहेली ने एक नर्सिंगहोम जा कर उषा के पेशाब की जांच कराई तो रिजल्ट पौजिटिव आया. इस पर उषा के पैरों तले जमीन खिसकने लगी. शुक्र इस बात का था कि घर में किसी को इस बात का अंदाजा नहीं हुआ था.

राकेश को जब उन्होंने यह बात बताई तो उस की भी हालत खस्ता हो गई. वह उषा से सच्चा प्यार तो करता था पर 2 बड़ी बहनों की शादी हो जाने तक भाग कर शादी कर लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था. इस पर उन दोनों ने तय किया कि सभी झंझटों से बचने के लिए बेहतर है कि बच्चा गिरा दिया जाए. पर यह कोई हंसीखेल वाली बात नहीं थी. अपने छोटे से शहर में तो जानपहचान के चलते वे बच्चा गिराने की बात सोच ही नहीं सकते थे, इसलिए राकेश नजदीक के बड़े शहर में गया और कई नर्सिंगहोम में बच्चा गिराने की बात कही लेकिन इस में दिक्कत यह थी कि बगैर लड़की की जांच किए कोई इस के लिए तैयार नहीं था.

उषा की दिक्कत यह थी कि उन्हें किसी बड़ी वजह के बिना शहर से बाहर जाने की इजाजत घर वालों से नहीं मिलने वाली थी. इस दफा भी सहेली ही काम आई जो उषा के घर बहाना बना कर उन्हें इंदौर ले गई और जैसेतैसे एक नर्सिंगहोम वाले को तैयार किया. 3 दिन अस्पताल में रह कर उन्हें इस मुसीबत से छुटकारा मिला मगर इस दौरान जो तकलीफें उन्होंने उठाईं, वे आज तक जेहन में जिंदा हैं.

बाद में उन्होंने घर वालों के कहने पर चुपचाप सुरेंद्र से शादी कर ली और राकेश को हमेशा के लिए भूल गईं. और जो नहीं भूल पाईं वह सब उषा अपनी बेटी निशा को बता देना चाहती हैं कि अगर प्यार वगैरह के चक्कर में पड़ जाओ तो पेट से होने से कैसे बचना है, जिस से कोई उंगली न उठे.

इस तरह जानें उषा का जमाना कुछ और था. तब आज जितनी सहूलियतें और साधन नहीं थे जिन से पेट से हो जाने का पता आसानी से चल सके और पता चल जाने पर बच्चा भी आसानी से गिरवाया जा सके. आमतौर पर कम उम्र की लड़कियां नहीं जानती हैं कि पेट से हो जाने के लक्षण क्या होते हैं और इस से शरीर में क्याक्या बदलाव आते हैं.

पेट से हो जाने का सब से अहम लक्षण है पीरियड का न आना. अगर आशिक से हमबिस्तरी की है और पीरियड आना बंद हो गया है तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि नतीजा आ गया है. इस नतीजे की तसल्ली के लिए आजकल तरहतरह की प्रैग्नैंसी टैस्ट किट मैडिकल स्टोर पर मिल जाती हैं जिन से मिनटों में हकीकत का पता चल जाता है. इस किट को खरीदने के लिए किसी डाक्टर के परचे की जरूरत नहीं पड़ती है.

किट पर दी गई हिदायतों के मुताबिक जांच करने पर अगर रिजल्ट पौजिटिव आता है तो बगैर देर किए किसी नर्सिंगहोम का रुख करना चाहिए. आजकल नर्सिंगहोम वाले फोटो, आईडी और उम्र साबित करने वाला सुबूत मांगते हैं जिन्हें साथ ले जाना चाहिए. इस में किसी का डर या झिझक की बात नहीं है क्योंकि बच्चा गिराने की बात प्राइवेट रखी जाती है.

इस के अलावा कुछ और लक्षण भी दिखते हैं, जैसे निप्पल सख्त हो जाना, बारबार पेशाब लगना, शरीर में सुस्ती और थकान के अलावा लगातार सिरदर्द और सुबह उठने पर थकान महसूस होना. सुबह उठने के बाद जी मिचलाना और उबकाई आना भी खास लक्षण हैं. पर ऐसा सभी लड़कियों के साथ हो, यह जरूरी नहीं. हमारे समाज में कुंआरी मां बनना आज भी अच्छा नहीं माना जाता है और कई वजहों के चलते यह ठीक भी नहीं है इसलिए संबंध बनाते वक्त एहतियात बरतना चाहिए. पार्टनर को कंडोम पहनने के लिए मजबूर करना चाहिए या खुद किसी लेडी डाक्टर से मिल कर औरल पिल्स ले लेनी चाहिए. इन्हें खरीदने में शर्म या देर नहीं करनी चाहिए. वजह, पेट से हो जाने पर मुसीबतें कई गुना बढ़ जाती हैं.

नाकामियों को सफलता की मंजिल का पड़ाव ऐसे माने

आईए समझते हैं किस तरह आपकी नाकामियां आपको आपके मंजिल के पास ले जाती है , कैसे आप उन से सीख कर अपने आप में सुधार कर के कामयाबी का नया इतिहास लिख सकते हैं . चार(04) बिंदुओ में समझते हैं :-

1.संघर्षों का सामना करके इतिहास बनाता है :-  हिटलर का प्रसिद्ध वाक्य है, ‘जो बिना संघर्ष के जीतता है वह विजेता कहलाता है लेकिन जो संघर्षों का सामना करके जीतता है वह इतिहास बनाने वाला कहलाता है.

अक्सर देखा जाता है कि युवा जब अपना सफल करियर नहीं बना पाते हैं तो इसका दोष वे दूसरों को देते हैं. अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने लगते हैं. यह याद रखिए अपनी नाकामी के जिम्मेदार आप खुद हैं.

2.लक्ष्य के प्रति समर्पण व्यक्ति असाधारण प्रतिभा वाला बना देता है :- अक्सर देखा गया है कि असफल व्यक्ति अनेक बातों का रोना रहते हैं, जैसे हमारे माता-पिता के कम पढ़े-लिखे होने के कारण वे हमारा करियर में मागदर्शन नहीं कर सके. हम पढ़ने की सुविधाएं नहीं मिली. पढ़ाई के दौरान हमें घर के कामों में लगाए रखा. घर में ज्यादा सदस्य होने से घरवालों ने हमारी ओर ध्यान नहीं दिया. ये ऐसी कुछ बातें हैं जो असफल युवा कहते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. अगर व्यक्ति कुछ करना चाहे और उसके हौसले बुलंद हों तो उसकी राह में कितनी भी मुसीबतें आएं वह सफल हो जाता है. एक अंग्रेजी कहावत का हिन्दी अर्थ है- ‘किसी एक विचार या लक्ष्य के प्रति समर्पण के कारण ही एक सामान्य योग्यता रखने वाला व्यक्ति असाधारण प्रतिभा से संपन्न व्यक्ति बनता है.’

3. कठिनाइयों को ढाल बनाकर सफलता की कहानी को लिखे :-

कठिनाइयां हर किसी के जीवन में आती हैं बस उनका स्वरूप और उनसे लड़ने के तरीके अलग हो सकते हैं. उन कठिनाइयों को ढाल बनाकर अपनी नाकामी को उजागर न करें, बल्कि हर स्थिति से निकलना सीखें. याद रखिए दुनिया भी उन्हीं को याद रखती है जो संघर्षों से निकलकर सफलता के शिखर पर पहुंचता है.

4. अनेक बाधा के सामने आप डेट रहे कामयाबी आपके कदमों में होगी :- नाकामियों को रोना छोड़कर चल पड़िए मंजिल की राह पर. मुश्किलें तो आएंगी. इन बातों जीवन में हमेशा रखें ध्यान –

अगर आप किसी क्षेत्र में करियर बनाने में असफल हो गए हैं तो यह न सोचिए कि सिर्फ वही क्षेत्र आपके लिए बना था.

आप दूसरे क्षेत्र में प्रयास कर सफलता को प्राप्त कर सकते हैं.

पहाड़ी की चढ़ाई करते समय हमेशा ऊपर चढ़ने वालों को देखना चाहिए. नीचे वालों को देखेंगे तो हमें ऊंचाई से डर लगेगा.

अपने आपको मोटिवेट कीजिए. सफलता की जो अनुभूति रहती है उसका मजा ही कुछ और है.

जीत कुछ कर गुजरने में है, हारकर बैठने में नहीं. प्रयास से सफलता मिल ही जाती है.

अंधविश्वास : डायन हत्या कब तक?

डायन बता कर महिलाओं की हत्या का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है. ऐसी घटनाएं अखबारों की सुर्खियां तो जरूर बनती हैं लेकिन बात आईगई हो जाती है. इस कुसंस्कारी प्रथा की आड़ में गंभीर अपराधों को अंजाम दिया जाता है. गांवदेहात या छोटे कसबों में रसूखदार, धनीमानी लोग ओझा, गुनीन, गुनिया, भोपा और तांत्रिकों के जरिए अनपढ़ व निरक्षर लोगों को उकसा कर महिलाओं पुरुषों को डायन, डाकन, डकनी, टोनही करार दे कर अपने स्वार्थ को साध लेते हैं.

ऐसा नहीं है कि डायन होने का आरोप केवल महिलाओं पर लगाया जाता है, कहीं कहीं पुरुषों को भी इसी आरोप में प्रताडि़त किया जाता है. कुछ महीने पहले मेघालय के एक गांव में जब 4 लड़कियां एक अनजाने किस्म की बीमारी की चपेट में आ गईं और डाक्टर के इलाज का कोई फायदा नजर नहीं आया तो शामत आ गई गांव के एक बुजुर्ग पर. उस बुजुर्ग को बीमारी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया और उसे पाखाना खाने को मजबूर किया गया. विडंबना यह है कि पाखाना खिलाने का फैसला गांव की पंचायत में लिया गया था. इस के बाद दावा किया गया कि बुजुर्ग के पाखाना खाने के बाद ही चारों लड़कियों की सेहत में सुधार होना शुरू हुआ.

पश्चिम बंगाल के मालदा, दिनाजपुर, बीरभूम, बांकुड़ा, पुरुलिया और बंगलादेश की सीमा से सटे पश्चिम सिंहभूम व छोटानागपुर में डायन बता कर हत्या की घटनाएं आएदिन घटती रहती हैं. देखने में आया है कि डायन हत्या के पीछे केवल अंधविश्वास नहीं होता, बल्कि ज्यादातर मामलों के पीछे संपत्ति विवाद, जातिगत द्वेष या फिर राजनीतिक उद्देश्य होता है.

दरअसल, डायन की हवा फैला कर निहित स्वार्थ वाले तत्त्व अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं. आदिवासी समाज में डायन हत्या पर लंबे समय से शोध कर रहे सुतीर्थ चक्रवर्ती का कहना है, ‘‘ऐसी हत्याओं की पुलिस फाइल बेशक तैयार होती है, जांच होती है और मामला अदालत तक भी पहुंचता है, लेकिन जितनी घटनाओं की पुलिस फाइल तैयार होती है, उन से कहीं ज्यादा तादाद में इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है और इन सब के पीछे कोई न कोई स्वार्थ होता है. जाहिर है पुलिस फाइल में जगह बनने से पहले ही ज्यादातर मामलों को दबा दिया जाता है.’’

दरअसल, आदिवासी बहुल क्षेत्र के दूरदराज के गांवों में फैली गरीबी, अशिक्षा और इन के बीच फैले कुसंस्कार का फायदा उठा कर निहित स्वार्थ वाले तत्त्व अपना उल्लू सीधा करते हैं. डायन के संदेह में जितनी भी हत्याएं होती हैं, उन में से ज्यादातर मामलों में अकेली और निरीह ऐसी महिला की हत्या होती है जिस के पास जमीन, खेत या गाय होती है. उन की न केवल संपत्ति पर कब्जा करने के उद्देश्य से पूरे परिवार की हत्या कर दी जाती है, बल्कि कई मामलों में तो हत्या से पहले बलात्कार भी किया जाता है और कुछ मामलों में सिर मुंडा कर निर्वस्त्र कर महिला को पूरे गांव में घुमाया भी जाता है.

संथालों में डायन मान्यता

भारतीय समाज में डायन प्रथा की शुरुआत किस तरह हुई, इस का कोई प्रमाणित तथ्य नहीं है. बंगाल में आईपीएस अधिकारी के रूप में असित वरण चौधुरी लंबे समय तक आदिवासी क्षेत्र में कार्यरत रहे हैं. इस दौरान उन्होंने आदिवासी समाज, विशेष रूप से संथालों को बहुत करीब से देखा. वे बताते हैं, ‘‘संथालों में मान्यता है कि उम्र बढ़ने के साथ जीवन की असफलता के मद्देनजर मन में ईर्ष्या और लालच का भाव पैदा होता है. इस से कुछ महिलाएं अपने तमाम दुर्गुणों के साथ अपदेवताओं की अलौकिक कृपा से डायन में परिवर्तित हो जाती हैं. विरासत के तौर पर ये तमाम मान्यताएं पीढ़ी दर पीढ़ी आदिवासी समाज में पोषित होती हैं.’’

डायनप्रथा को ले कर संथाल समुदाय के बीच एक कहानी बहुत प्रचलित है. इस कहानी का जिक्र असित वरण चौधुरी ने अपनी किताब ‘संथाल समाज में डायनप्रथा और वर्तमान संकट’ में किया है. उन का कहना है, ‘‘संथालों के समाज में पारिवारिक देवता को खुश करने के लिए मुर्गी की बलि चढ़ा कर प्रसाद के रूप में उस का मांस खाने का चलन बहुत पुराना है. लेकिन यह प्रसाद महिलाओं को खाने की मनाही है. एक संथाल परिवार की एक बच्ची ने चोरी छिपे अपने भाई और पिता के प्रसाद के जूठन से थोड़ा सा मांस खा लिया. इस के बाद बच्ची बीच बीच में मुर्गी का मांस खाने की जिद करने लगी.

‘‘अपनी जिद में वह न दिन देखती, न रात. आखिरकार यह जिद बाकायदा कुहराम में बदल गई. परिवार ने उस के इस कुहराम को देवता का बच्ची के शरीर में प्रवेश मान लिया. लेकिन रोज रोज के इस कुहराम से तंग आ कर बच्ची की मां आत्महत्या करने पर उतारू हो गई.

‘‘मान्यता है कि रात के अंधेरे में आत्महत्या के लिए गई मां के सामने देवता प्रकट होते हैं. देवता ने मां को अपने सोए हुए पति के नितंब का एक टुकड़ा बेटी को खिला कर खाने का निर्देश दिया और अंतर्धान हो गए. मां ने देवता के निर्देश का पालन किया. इस के बाद तो आए दिन देवता के आदेश निर्देश पर मां बेटी मांस उड़ाने लगीं. इस के बाद मां बेटी को आदिवासी समाज ने डायन करार दिया.’’

विदेशों में भी यह प्रथा

ग्रीस, रोम, जरमनी, इंगलैंड, अमेरिका और अफ्रीका में विच यानी डायनप्रथा रही है. इस के अलावा इटली, मिस्र, बेबीलोन, थाईलैंड में भी जादूटोना और डायन प्र्रथा का बोलबाला रहा है. पश्चिम में इस को विचक्राफ्ट का नाम दिया गया. ग्रीक लेखक डिमोस्थेनिस ने ऐथेंस में ईसा पूर्व 350 में थियोरिन लेमैंस नामक एक डायन का जिक्र किया था, जिसे जिंदा जला कर मार डाला गया था. लेकिन ग्रीस की सब से चर्चित डायन एरिकाहो रही है. रोमन कवि लुकान ने भी अपनी कविता में डायन का जिक्र किया है. यहां तक कि शेक्सपियर के मैकबेथ में डायन है.

16वीं से 17वीं सदी में जरमनी में डायन के नाम पर बहुत सारी हत्याएं की गई हैं. 16वीं सदी में अकाल के लिए डायनों को जिम्मेदार ठहराया गया था.

सुतीर्थ चक्रवर्ती का कहना है, ‘‘यह प्रथा, दरअसल, मानव समाज में सामंतवादी की देन है. इसीलिए औद्योगिक क्रांति के बाद जब सामंतवाद की जगह पूंजीवाद ने ले ली, तब पश्चिमी देशों में डायनप्रथा खत्म होने लगी.

कालाजादू की परंपरा

भारत, खासतौर से बंगाल, में काला जादू की परंपरा रही है. बंगाल के काला जादू की चर्चा पूरी दुनिया में है. बंग भंग से पहले पूर्वी बंगाल के मैमन सिंह, फरीदपुर, पावना और पश्चिम बंगाल में मेदिनीपुर, बीरभूम, बांकुड़ा, पुरुलिया, दिनाजपुर, मालदह के अलावा पूर्वोत्तर में असम के कामाख्या, गोयालपुर, कामरूप, दरंग, कोकड़ाझाड़ जिलों में डायन हत्या की वारदातें अकसर होती हैं. इस के अलावा मणिपुर, त्रिपुरा के साथ अंडमान निकोबार में भी काला जादू व डायनप्रथा है. लेकिन बंगालसके अलावा देश के विभिन्न राज्यों में आज भी डायन, भूतप्रेत, जादूटोने का चलन है.

मजे की बात यह है कि इस कुसंस्कार को बाकायदा विद्या का नाम दिया गया है. इस के कई नाम हैं. यह विद्या तंत्रविद्या, गुप्तविद्या या पिशाचविद्या के नाम से जानी जाती है. पिशाचविद्या में पारंगत होने के लिए बिलकुल सुनसान जगह में रात के अंधेरे में निर्वस्त्र हो कर तरह तरह की प्रक्रियाएं संपन्न की जाती हैं. इसलिए आमतौर पर विद्या में दीक्षित करने का काम श्मशान में होता है.

दरअसल, जिन चीजों से इंसान भय खाता है, उन तमाम चीजों का प्रयोग इस विद्या में किया जाता है. इस विद्या के साधक तांत्रिक और अघोड़ी श्मशान में अधजली लाश का मांस खाने से ले कर देशी विदेशी शराब तक पीते हैं. इस साधना में काली बिल्ली, खोपड़ी, हड्डियों का खूब इस्तेमाल होता है.

ओझा पर भरोसा

देश के कई राज्यों में केवल डायन का कुसंस्कार ही नहीं है, बल्कि ओझा या गुनीन से झाड़फूंक कराने का भी चलन है. देश के बहुत सारे इलाके ऐसे हैं, जहां डाक्टर नहीं हैं. बीमारी का समुचित इलाज नहीं हो पाता है. ऐसे में निरक्षर व देहाती लोग ओझा के फेर में पड़ ही जाते हैं. दूरदराज के गांवों के लोग सामान्य बुखार से ले कर हर तरह की बीमारी, यहां तक कि चोरी चकारी, बाढ़, अकाल, सूखा के लिए भी इन्हीं पर निर्भर हैं. दिलचस्प बात यह है कि ओझाओं का एक दूसरा नाम ज्ञानगुरु भी है.

इस के पीछे मान्यता यह है कि डायन लोगों को नुकसान पहुंचाती हैं, जबकि ओझा समाज का भला करता है.

गांवों में डायन की पहचान आमतौर पर यही ओझा ही करता है. ओझा पर लोगों के भरोसे का फायदा गांव के ताकतवर लोग बखूबी उठाते हैं. चूंकि ओझा की मदद से गांव वालों को शीशे में उतारना सहज हो जाता है, इसलिए ओझा को पैसों का लालच दे कर किसी को भी डायन करार दे दिया जाता है. दरअसल, गांव में आदिवासी महिला का यौनशोषण से ले कर उस की जमीन जायदाद हड़पने का काम होता है. यहां तक कि आपसी रंजिश के चलते हत्या करवाने के मकसद से डायन बता कर पूरे परिवार का भी सफाया कर दिया जाता है और फिर उन की संपत्ति हड़प ली जाती है.

सुतीर्थ चक्रवर्ती कहते हैं कि एक तरफ गांव के गैर आदिवासी धनी मानी या बड़े रसूखवाले आदिवासियों की जमीन हड़पने की ताक में रहते हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज में भी एक शोषक श्रेणी का उद्भव हुआ है जो गांव में अनजाने बुखार, अचानक हुई मौतों की ताक में रहते हैं. किसी कमजोर परिवार या अकेली महिला की जमीन जायदाद हड़पने की फिराक में उसे डायन बता कर निशाना साधते हैं.

गांव में हुई ऐसी मौतों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा कर गांव वालों की अशिक्षा और कुसंस्कार का फायदा उठा कर उन्हें भड़काया जाता है और फिर उन के गुस्से का फायदा उठा कर हत्या करवा दी जाती है.

समाज को शर्मसार करते आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 1991 से ले कर 2010 तक देशभर में लगभग 1,700 महिलाओं को डायन घोषित कर उन की हत्या कर दी गई थी. हालांकि राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2001 से ले कर 2014 तक देश में 2,290 महिलाओं की हत्या डायन बता कर कर दी गई है. 2001 से 2014 तक डायन हत्या के मामलों में 464 हत्याओं में झारखंड अव्वल रहा तो ओडिशा 415 हत्याओं के साथ दूसरे स्थान पर है. वहीं 383 हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर साल कम से कम 100 से ले कर 240 महिलाएं डायन बता कर मार दी जाती हैं. इन में ज्यादातर मामलों के पीछे संपत्ति विवाद होता है या फिर ऐसी हत्या के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य साधा जाता है.

डायन बता कर सब से ज्यादा हत्याएं 2011 में हुईं. उस साल पूरे देश में कुल 240 हत्याएं हुईं. उस साल का रिकौर्ड बनाया ओडिशा ने, जहां 39 महिलाओं की हत्या डायन बता कर की गई. 36 हत्याओं के साथ दूसरे नंबर पर झारखंड रहा. 28 हत्याओं को अंजाम दे कर आंध्र प्रदेश ने तीसरा स्थान बनाया. 2007 में 177 हत्याओं में अकेले झारखंड में 50 हत्याएं हुईं. 2010 में पूरे देश में 178 महिलाओं को डायन बता कर मौत की नींद सुलाया गया. 2013 में एक बार फिर से झारखंड में 54 महिलाओं को डायन बता कर मार डाला गया. 2015 में झारखंड में 47 महिलाओं और 2016 के सितंबर तक 33 महिलाओं की डायन बता कर हत्या कर दी गई. कुल मिला कर 2001 से ले कर 2014 तक के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उन के आधार पर कहा जा सकता है कि डायन हत्या के मामले में ओडिशा, झारखंड और आंध्र प्रदेश ने अपना नाम खराब किया है.

जहां तक हरियाणा का सवाल है, तो 2011 में 5 मामलों के बाद यह राज्य पिछले 3-4 सालों से डायन हत्या के मामले में नामजद नहीं हुआ है. वहीं, पूर्वोत्तर भारत में असम डायन हत्या के लिए बड़ा बदनाम रहा है. असम सरकार के आंकड़ों की मानें तो 2006 से ले कर 2012 तक 105 हत्याएं डायन के बहाने हो चुकी हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, 1987 से ले कर 2003 तक 2,556 महिलाओं की हत्या डायन के शक पर कर दी गई है.

क्या कहता है कानून

अब अगर कानून की बात करें तो डायन हत्या का मामला गैरजमानती, संज्ञेय और समाधेय है. इस की सजा 3 साल से ले कर आजीवन कारावास या 5 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकती है. किसी को डायन ठहराया जाना अपराध है और इस के लिए कम से 3 साल और अधिकतम 7 साल की सजा हो सकती है. वहीं, डायन बता कर किसी पर अत्याचार करने की सजा 5-10 साल तक की है. किसी को डायन बता कर बदनाम कर दिए जाने के कारण अगर कोई आत्महत्या कर लेता है तो आरोपी का जुर्म साबित होने पर 7 साल से ले कर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है. किसी को डायन बता कर उस के कपडे़ उतरवाने की सजा 5-10 साल की कैद तय की गई है. किसी बदनीयती से डायन करार दिए जाने की सजा 3-7 साल और डायन बता कर गांव से निष्कासित किए जाने की सजा 5-10 साल की तय की गई है.

बंगाल, महाराष्ट्र में अभी तक इस संबंध में कोई पुख्ता कानून नहीं है. अभी तक इन दोनों ही राज्यों में कानून का मसौदा ही तैयार हो रहा है. कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां डायन हत्या की रोकथाम के लिए विशेष कानून बनाया गया है. ऐसे राज्यों में राजस्थान, झारखंड,  छत्तीसगढ़ और असम के नाम आते हैं.

छत्तीसगढ़ में 2005 में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम बनाया गया, जिस के तहत डायन बताने वाले शख्स को 3 से ले कर 5 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है. राजस्थान सरकार ने महिला अत्याचार रोकथाम और संरक्षण कानून 2011 में डायन हत्या के लिए अलग से धारा 4 को जोड़ा है. इस धारा के तहत किसी महिला को

डायन, डाकिन, डाकन, भूतनी बताने वाले को 3-7 साल की सजा और 5-20 हजार रुपए के जुर्माने को भरने का प्रावधान किया गया है.

अगस्त 2015 में असम विधानसभा ने डायन हत्या निवारक कानून पारित किया, क्योंकि इस राज्य में डायन हत्या एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रही थी. वहीं, बिहार में 1999 और झारखंड में 2001 में डायनप्रथा रोकथाम अधिनियम आया. खेद का विषय यह है कि देश में डायन हत्या का चलन अभी भी खत्म नहीं हुआ.

वियाग्रा सिर्फ सैक्स के लिए नहीं होती

डायमंड के आकार वाली छोटी सी नीली गोली वियाग्रा सैक्स पावर को बढ़ाने के अलावा दूसरी बीमारियों में भी कमाल का असर दिखाती है. वियाग्रा में मौजूद दवा सिल्डेनाफिल को मर्दों की सैक्स संबंधी कमजोरियों को दूर करने में असरकारक माना जाता है लेकिन एक नई रिसर्च के अनुसार, वियाग्रा अन्य कई गंभीर रोगों में भी फायदेमंद है.

कई देशों में वियाग्रा के साइड इफैक्ट्स के बारे में शोध करने पर इस के कई फायदे सामने आए जो चौंकाने वाले हैं. अमेरिका में किए गए एक शोध के अनुसार, ठंड के मौसम में अकसर लोगों की उंगलियों में ऐंठन, दर्द होना, मुड़ न पाना, पीली पड़ जाना जैसी समस्याएं हो जाती हैं. ठंड से बच कर इन समस्याओं से बचा जा सकता है.

इस समस्या से जूझ रहे मरीजों को सिल्डेनाफिल देने पर उन्हें काफी फायदा हुआ. ऐसे स्थान जहां अधिक बर्फ पड़ती है, वहां के लोगों को माउंटेन सिकनैस की समस्या हो जाती है. ऊंचे स्थानों पर औक्सीजन की कमी होने से ब्लड में इस का लेवल कम हो जाता है जिस से पल्मोनरी धमनियां संकरी हो जाती हैं. ऐसे में हृदय को पंपिंग करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है और व्यक्ति की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है.

पल्मोनरी हाइपरटैंशन जैसी समस्या में भी सिल्डेनाफिल काफी प्रभावशाली होती है. फेफड़ों की बीमारी व हृदय संबंधी गड़बडि़यां होने पर पल्मोनरी हाइपरटैंशन की समस्या हो सकती है. पल्मोनरी हाइपरटैंशन के इलाज के लिए पुरुष व स्त्री दोनों के लिए सिल्डेनाफिल की 20 एमजी की 1-1 खुराक दिन में 3 बार निर्धारित की गई है. क्लीनिकल ट्रायल्स में इस दवा के काफी बेहतर परिणाम मिले हैं.

हृदय रोगियों के लिए हालांकि वियाग्रा सुरक्षित नहीं है लेकिन एक ही जगह पर रक्त की अधिकता, जिस की वजह से हार्ट फेल्योर की समस्या उत्पन्न होती है, के मरीजों के लिए सिल्डेनाफिल काफी प्रभावकारी होती है.

स्ट्रोक जैसी समस्या में सिल्डेनाफिल कमाल का असर दिखाती है. इस विषय पर शोध करने वाले जरमनी के डा. मैक रैपर का कहना है कि सिल्डेनाफिल मस्तिष्क के स्ट्रोक को दूर  करने में काफी अच्छा काम करती है.

सिल्डेनाफिल को ले कर नए शोध जारी हैं.  शोधों में इस से होने वाले लाभ और नुकसान के नतीजे सामने आ रहे हैं. बहरहाल, अब तक किए गए नतीजों से वियाग्रा एक लाभदायक दवा के रूप में भी सामने आई है. मगर ध्यान रहे, ऐसी कोई भी दवा बिना विशेषज्ञों की सलाह के बगैर न लें.

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एक्स बॉयफ्रेंड पर खुलकर बोलीं प्रिंयका चोपड़ा कहा- केयर टेकर बन कर रह जाती!

इन दिनों बॉलीवुड-हॉलीवुड एक्ट्रेस प्रिंयका चोपड़ा सुर्खियों में है उनके चर्चा में आऩे की वजह उनके पिछले रिलेशनशिप है जिनपर उन्होंने कई सालों बाद खुल कर बात कही है साथ ही, वह अपनी आने वाली फिल्म ‘लव अगेन’ को लेकर भी चर्चा में बनी हुई है जिसका प्रमोशन भी एक्ट्रेस जोर-शोर से कर रही है. इसी दौरान एक्ट्रेस ने एक इंटरव्यू बताया है कि उनके पिछले रिलेशनशिप कैसे थे और वह उन रिश्तों में कैसे जकड़ी हुई थी.

 

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आपको बता दे, कि एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा  ने अपने पिछले रिलेशनशिप्स को याद करते हुए बताया कि वह एक के बाद एक लगातार रिलेशनशिप में रहीं, लेकिन इस दौरान उन्होंने खुद को बिल्कुल भी समय नहीं दिया. एक्ट्रेस ने बताया, “मैंने हमेशा उन एक्टर्स को डेट किया, जिनके साथ मैंने काम किया या फिर जिनसे मैं सेट पर मिली थी. इसलिए मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि कोई रिश्ता कैसा होना चाहिए. मैं हमेशा ऐसे रिश्ते की तलाश करती रही और उन लोगों को अपने रिलेशनशिप के आइडिया में फिट करने की कोशिश करती रही, जो मेरी जिंदगी में आए.

प्रियंका चोपड़ा ने आगे बताया कि मैं खुद को हर चीज के लिए जिम्मेदार समझने लगी थी. मुझे ऐसा लगता था कि मुझे एक केयरटेकर बनने की जरूरत है. एक्ट्रेस ने बताया, “जैसे मेरा काम, मेरी जॉब, मेरी मीटिंग और मेरी प्राथमिकता, इन सबमें वही सबसे आगे था. मैं सचमुच एक डोरमेट की तरह बन जाती और मैं कहती है कि यह ठीक है. क्योंकि महिलाओं को इतने लंबे समय से यही बताया जाता रहा है कि हमारी भूमिका परिवार को एक साथ जोड़ने की है और जब भी आपका पति घर आए तो उसे कंफर्टेबल महसूस कराने की है.” प्रियंका चोपड़ा के इस बयान के सामने आने के बाद हर कोई हैरान है.

 

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प्रियंका चोपड़ा के वर्क फ्रंट की बात करें तो, लव अगेन के अलावा एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा हाल ही में अमेजन प्राइम की ऑरिजनल वेब सीरीज ‘सिटाडेल’ में नजर आई हैं. इस सीरीज में प्रियंका स्पाई के किरदार में नजर आ रही हैं. सीरीज में प्रियंका का अंदाज और दमदार एक्शन फैंस को काफी पसंद आ रहा है.

गे क्लब की आड़ में ब्लैकमेलिंग का खेल

पुलिस हिरासत में बैठे उन चारों नौजवानों के चेहरों पर बेबसी के भाव झलक रहे थे. बेबसी इसलिए भी क्योंकि खुद को पाकसाफ बताने के लिए उन के पास कोई सुबूत नहीं था. उन्हें चौंकाने वाले गुनाह में गिरफ्तार किया गया था. वे समलैंगिक लोगों को गुपचुप अपना शिकार बनाते थे. इस के लिए वे अपना जाल बिछाते थे कि अपने जैसे जिस्म की चाह रखने वाले खुद ही उस में फंस जाते थे. जो एक बार उन के जाल में फंसता था, फिर उन की इजाजत के बिना निकल नहीं पाता था. ब्लैकमेलिंग उन का प्रमुख हथियार होता था. शिकार होने वाले अपने समलैंगिक होने पर पछताते थे. उन्हें लगता था कि उन की प्रवृत्ति ऐसी नहीं होती, तो ऐसा अपराध उन के साथ घटित न हुआ होता.

यों बिछाते थे अपना जाल उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की पुलिस ने 22 नवंबर 2016 को जिन 4 युवकों को गिरफ्तार किया उन में सुमित, सोनू, नितिन व देवेंद्र शामिल थे. इन में सोनू व नितिन एक ही गांव के थे जबकि सुमित और देवेंद्र अलगअलग गांवों के रहने वाले थे. सुमित व सोनू बीए सैकंड ईयर के छात्र थे जबकि उस के साथी देवेंद्र 12वीं कक्षा का व नितिन 8वीं कक्षा का. चारों के बीच गहरी दोस्ती थी.

सुमित अकसर सोशल नैटवर्किंग साइट फेसबुक पर ऐक्टिव रहता था. शातिर दिमाग सुमित शौर्टकट से पैसे कमाने की चाहत रखता था. उस ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर गे युवकों को फंसाने की योजना बनाई. इस के बाद गिरोह का सरगना सुमित फेसबुक पर हीरो की भूमिका में होता था. उस ने गलत नाम से अकाउंट बनाया हुआ था. जिस पर उस ने खुद को गे बताया हुआ था. फेसबुक पर वह बौडीबिल्डर की आकर्षक तसवीरें डालता था. लोग उस की तारीफ करते थे. गे युवक उसे देखते ही आकर्षित हो जाते थे. उन के साथ आसानी से फ्रैंडशिप भी हो जाती थी. उस के सोशल साइट्स के गे क्लब में हर उम्रवर्ग के लोग शामिल थे. वह दावा करता था कि क्लब के लोगों की हकीकत कोई दूसरा नहीं जान पाएगा. उन की पहचान को गुप्त रखा जाएगा. समलैंगिक लोग अपने अनुभव भी उस से शेयर करते थे. कोई अपने दबे हुए अरमान बताता था, कोई जिस्मानी भूख की चाहत बयां करता था. ऐसे ही लोगों में से सुमित अपने शिकार का चुनाव करता था. पहले वह चैटिंग से, फिर मोबाइल से खुल कर बातचीत करता था. समलैंगिक से उस की दबी हुई जिस्मानी ख्वाहिशों को जान कर उन्हें पूरा करने का अपनेपन से भरोसा देता था.

जब सुमित उन के विश्वास को जीत लेता था तब शिकार को अपनी बताई जगह पर जिस्मानी खेल खेलने के लिए बुलाता था. इस के लिए वह सड़क किनारे सुनसान इलाके और खेतों को चुनता था. सुमित के साथी उस के इशारे पर वहां पहले से ही छिप जाते थे. सुमित परपुरुष की चाहत वालों की ख्वाहिश पूरी करता और उस के साथी चुपके से मोबाइल के जरिए एमएमएस बना लेते. काम खत्म होने पर उस के साथी बाहर निकल आते और शिकार होने वाला समलैंगिक पुलिस के पास जाना तो दूर, अपने साथ हुई घटना का किसी से जिक्र तक नहीं करता था.

जिन समलैंगिकों को शिकार बनाया जाता, सुमित और उस के साथी उन का पीछा नहीं छोड़ते थे. कुछ दिनों बाद वे उस के मोबाइल पर एमएमएस क्लिप भेजते और पैसे की मांग करने लगते. पैसे न देने पर वे उसे इंटरनैट पर अपलोड करने के साथ ही समाज में बदनाम करने की धमकी देते. किसी के रोनेगिड़गिड़ाने का उन लोगों पर कोई असर नहीं होता था. इच्छानुसार वसूली का यह खेल महीनों जारी रहता. ऐसे लोगों को मनचाही जगह बुला कर वे उन से कुकर्म भी करते. सुमित ऐंड कंपनी ने एकएक कर के करीब एक दर्जन लोगों को अपना शिकार बनाया. लेकिन कभी पकड़े नहीं गए. इस से उन के हौसलों में अतिरिक्त इजाफा हो गया और वे आएदिन शिकार करने लगे. उन का हर शिकार छटपटा कर रह जाता और अपने समलैगिक रिश्तों पर आंसू बहाता था. समाज में बदनामी के डर से किसी ने कभी उन के खिलाफ शिकायत ही नहीं की.

गिरोह का शिकार मेरठ का एक व्यापारी युवक अनमोल (परिवर्तित नाम) भी हुआ. सुमित का फेसबुक प्रोफाइल देख कर अनमोल ने उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. दोनों के बीच जल्द ही दोस्ती हो गई. बातोंबातों में शातिर सुमित ने उस की आर्थिक हैसियत का पता लगा लिया. सुमित ने वादा किया कि वह मौका मिलते ही उस के अरमानों को पूरा करेगा. दोनों के बीच विश्वास का रिश्ता कायम हुआ, तो अनमोल सुमित की बताई सुनसान जगह पर मिलने के लिए पहुंच गया. सुमित ने पहले उस के साथ कुकर्म किया, फिर दोस्तों के साथ उस की स्कूटी, मोबाइल व सोने की चेन लूट कर उसे भगा दिया. साथ ही, उस ने धमकी दी कि यदि किसी से इस बात का जिक्र किया, तो वह समाज में उसे बदनाम कर देगा.

काफी सोचविचार के बाद अनमोल ने 16 अक्तूबर को थाना कंकरखेड़ा में सुमित व उस के साथियों के खिलाफ लूट का मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस भी इस तरह के अपराध से सकते में आ गई. एसएसपी जे रविंद्र गौड़ के निर्देशन में सीओ बी एस वीर कुमार व क्राइम ब्रांच को गिरोह की धरपकड़ के लिए लगा दिया गया. पुलिस ने मुख्य आरोपी सुमित का नंबर सर्विंलास पर लगा दिया. उस पर होने वाली बातचीत से यह साफ हो गया कि सुमित गिरोह चला रहा था. इस के बाद ही सुमित व उस के साथियों को पुलिस ने गिरफ्त में ले लिया. पुलिस ने स्कूटी, मोबाइल व अन्य सामान आरोपियों की निशानदेही से बरामद कर लिया.

समलैंगिकता विवादित रही है. विवाद कानून की चौखट से ले कर सड़कों पर तक है. इस का एक पहलू यह है कि समलैंगिकता अपराधों को भी जन्म देती है. समाज के बीच दोहरी जिंदगी जीने वाले समलैंगिंक वास्तव में मानसिक दबाव में जी रहे होते हैं.

औफिस बैग में ये ब्यूटी प्रोडक्ट्स जरूर रखें लड़के

लड़कियों के औफिस बैग में कुछ हो या न हो लेकिन मेकअप प्रोडक्ट जरूर मिल जाएंगे और हों भी क्यों न, सुबह से ले कर शाम तक औफिस में रहना होता है तो टचअप के लिए मेकअप प्रोडक्ट्स का होना जरूरी है क्योंकि ये भी कुछ उन पर्सनल चीजों में से हैं जो हम किसी और के इस्तेमाल नहीं कर सकते और न ही शेयर करनी चाहिए.

लेकिन यहां हम बात कर रहे हैं लड़कों की, जी हां लड़कों को भी कुछ ब्यूटी प्रोडक्ट्स अपने औफिस बैग में कैरी करने चाहिए, क्या पता आप को अचानक औफिस से ही किसी पार्टी या किसी के घर जाना पड़ जाए या गर्लफ्रैंड के साथ डेट पर जाने का प्रोग्राम बन जाए या औफिस में ही आप को कुछ जरूरत पड़ जाए क्योंकि चाहे आप औफिस में पूरे दिन एयर कंडीशनर क्यूबिकल के अंदर बैठते हैं लेकिन शाम तक एक सुस्त, औइली, डल चेहरा महसूस कर सकते हैं. ऐसे में काम आएगा आप का छोटा सा स्किन केयर या ग्रूमिंग किट. चलिए बताते हैं उस किट में आप को क्याक्या रखना जरूरी है :

फेस वाश : एक माइल्ड क्लींजर चुनें जो आप की त्वचा को सूट करे. कई बार आप को सुस्ती या चेहरे की डलनैस को दूर करने के लिए औफिस में चेहरा धोना पड़ सकता है जिस के लिए एक अच्छा फेस वाश स्किन केयर किट में जरूर रखें जो आप को महका दे.

परफ्यूम या डिओडरैंट : औफिस ग्रूमिंग किट का जरूरी हिस्सा होता है गरमी या पसीने के कारण या बरसात के मौसम में परफ्यूम लगाना काफी नहीं होता. औफिस मीटिंग है तो गुलाब परफ्यूम का इस्तेमाल कर सकते हैं. गुलाब की खुशबू दिमाग शांत रखने में मदद करती है.

नौर्मल क्रीम या बीबी क्रीम : चाहे ??आप क्रीम का इस्तेमाल न करते हों लेकिन औफिस बैग में क्रीम जरूर रखें. खासकर जब आप के चेहरे पर पिंपल्स या दागधब्बे हैं. बीबी क्रीम न केवल उन को छिपाने में मदद करेगी बल्कि अचानक प्लान होने वाली पार्टी के लिए तैयार रखने में मदद करेगी.

मौइश्चराइजर : एक ऐसा ब्यूटी प्रोडक्ट है जो लड़की और लड़के दोनों की गू्रमिंग किट में होना जरूरी है. त्वचा चाहे कितनी ही तैलीय क्यों न हो बारबार धोने से मौइश्चर की मात्रा कम हो जाती है. औफिस में बारबार हाथ धोने से हाथ खुश्क हो जाते हैं तो मौइश्चराइजर की जरूरत पड़ती ही है.

लिप बाम : बाम भी लड़कों की ग्रूमिंग किट का हिस्सा है. फटे होंठ लड़कियों के हों या लड़कों के दोनों के ही भद्दे लगते हैं. एक रंगहीन लिप बाम का चयन करें और उस का इस्तेमाल करें. होंठों को मुलायम रखने के लिए एक अच्छा लिप बाम कैरी करना जरूरी है.?

मेरे प्रेमी ने शादी करने का वादा कर के मेरे साथ संबंध बना लिए थे पर अब वह शादी करने से मना कर रहा है, मैं क्या करुं?

सवाल
मेरे प्रेमी ने शादी करने का वादा कर के मेरे साथ हमबिस्तरी कर ली थी, मगर अब वह शादी करने से मना कर रहा है. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब
आप का प्रेमी धोखेबाज है. उस ने चालाकी से आप का इस्तेमाल किया है. आप फौरन उस बेईमान से नाता तोड़ लें और आइंदा उस की मीठी बातों में न आएं. अगर आप में जरा भी समझ है, तो अब शादी से पहले किसी के साथ हमबिस्तरी न करें.

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इंसान में सेक्स करने की इच्छा बहुत ही स्वाभिक होती है. एक खास उम्र में तो इसका जुनून ही सवार रहता है लेकिन ज्यादातर लोगों को सेक्स के बारे में सही जानकारी ही नहीं होती. इसे लेकर कई तरह के भ्रम भी रहते हैं जिसका मुख्य कारण होता है सेक्स के बारे में सही जानकारी न होना.

सेक्स संबंधी भ्रम के कारण जहां लोग इसका आनंद नही उठा पाते वहीं कई बार संबंधों में दरार पड़ जाती है और कभी कभी तो अज्ञानता की वजह से बीमारियां भी हो जाती हैं. आइए हम आपको बताते हैं क्या हैं सेक्स संबंधी भ्रम और सच्चाई.

  1.  भ्रम – ओरल सेक्स से कोई खतरा नही होता है. पुरुष हमेशा सेक्स के लिए तैयार रहते हैं.

सच्चाई – ओरल सेक्स से सेक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियों के फैलने का अधिक खतरा होता है. ओरल सेक्स के दौरान अगर मुंह या गले में कही कटा हो तो बीमारियों के होने का खतरा होता है. तनाव और थकान की वजह से अक्सर पुरष की रुचि सेक्स में कम होने लगती है. एक रिसर्च के अनुसार 14 फीसदी पुरुष सेक्स के बारे में हर 7 मिनट में सोचते हैं.

2. भ्रम- साइज मैटर नही करता है. फोरप्ले नही करना चाहिए.

सच्चाई- लिंग के साइज़ को लेकर आम धारणा है कि इसकी अच्छे सेक्स और पार्टनर को संतुष्ट करने में अहम भूमिका होती है लेकिन ये एकदम गलत है. साइज का सेक्स संबंध पर कोई असर नहीं होता. सेक्स के दौरान जरूरी है कि आप अपने पार्टनर की भावनाओं को समझें. सेक्स का आनंद लेने के लिए फोरप्ले बहुत जरूरी है. फोरप्ले के सही तरीके अपनाकर आप अपने पार्टनर को खुश कर सकते हैं.

3. भ्रम- प्रीमेच्योर इजेकुलेशन (शीघ्रपतन) बीमारी नही है. सेक्स के आसन नही करने चाहिए.

सच्चाई- यह बीमारी पुरुषों में सबसे सामान्य है. सेक्स के लिए तैयार होते वक्त फोरप्ले के दौरान ही अगर सीमन बाहर आता है तो इसे प्रीमेच्योर इजैकुलेशन कहते हैं. ऐसी स्थित में पुरुष अपनी महिला पार्टनर को संतुष्ट नही कर पाता है. सेक्स संबंध बनाते वक्त विभिन्न तरीके के आसनों को किया जा सकता है. लेकिन सुरक्षित और आसान आसनों का ही प्रयोग कीजिए.

4. भ्रम– सेक्स के दौरान सेक्स पॉवर बढ़ाने वाली दवाओं का प्रयोग करना चाहिए.

सच्चाई- बाजारों में मिलने वाली विभिन्न प्रकार की दवाओं का प्रयोग करके कुछ समय के लिए आप अपनी सेक्स क्षमता को बढ़ा सकते हैं लेकिन इन दवाओं का साइड इफेक्ट ज्यादा होता है. इसलिए इन दवाओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए और अच्छे डॉक्टर की ही सलाह पर इसका इस्तेमाल करें.

5. भ्रम- गर्भावस्था के दौरान सेक्स नही करना चाहिए. मेनोपॉज के बाद महिलाओं की सेक्स लाइफ समाप्त हो जाती है.

सच्चाई- गर्भावस्था के दौरान भी सेक्स संबंध बनाये जा सकते हैं. लेकिन गर्भावस्था की निश्चित अवधि के बाद सेक्स बिलकुल नही करना चाहिए. मेनोपॉज बंद होने के बाद भी महिलाएं सेक्स संबंध बना सकती हैं. मेनोपौज बंद होने का मतलब यह नही कि महिलाओं की सेक्स लाइफ समाप्त हो गई.

6. भ्रम- खान-पान का सेक्स लाइफ पर असर नहीं होता है.

सच्चाई- जी नहीं, खान-पान का सेक्स लाइफ पर पूरा असर पड़ता है. सेक्स पावर आपकी डाइट चार्ट पर निर्भर करती है. अगर आप हेल्थी और पोषणयुक्त भोजन करते हैं तो आपकी सेक्स पॉवर ज्यादा होगी.

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